Friday, December 22, 2017



कहानी: गंध 
अपर्णा अनेकवर्णा






गंध 
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सपनों की गंध नहीं होती.. या होती हो शायद, जो छूट जाती है नींद के उस पार.. साथ आती है बस तेज़ी से मिटती स्मृति. फिर कोई सपना देखा था उसने और इस बार पता नहीं कैसे बस गंध साथ थी.. और सब उड़ गया.. सिमट गया.. लौट गया अपने किसी खोह में.
गंध इतनी गुंथी हुयी थी किसी याद से.. खुलती गयी और भीतर कुछ बनता बिगड़ता रहा. अक्सर ठीक पहचान लेती है. बस कभी-कभी कोई एक चुनौती बनकर तन जाती है जैसे कोई ऐसा पहचान वाला हो जिसे हम जानते तो हैं पर याद नहीं करना चाहते. भूले रहना चाहते हैं. इस बाघ गंध की तरह.
पहली बार, बाघ, दिखा नहीं था.. दिखने से पहले एक तीखी गंध बनकर महसूस हुआ था उसे.. छह बरस की थी वो. उसने काका की ऊँगली कसकर पकड़ ली थी. मेले के छोटे से चिड़ियाघर से आती बेचैन आवाजें उसे बुला भी रही थीं डरा भी रही थीं. और फिर दिखा था उसे.. सुनी-पढ़ी कहानियों सा होते हुए भी कितना अलग. अपनी लम्बाई जितने ही पिंजरे में बेचैन डोलता हुआ.. किसी को देखने, डराने में दिलचस्पी नहीं थी उसकी.. लगातार हांफता हुआ वो उतनी सी जगह में घूमने जैसा कुछ कर रहा था.. थोडा निराश हुयी थी याद है उसे. बस एक, आँखों में चुभने वाली तीखी गंध ने घेर लिया था उसे. उसी गंध को बालों में लिए घर लौटी थी.. बेचैन गंध..
तो क्या बाघ का सपना देखा था? नहीं.. अभी कुछ याद नहीं आता.. जैसे कोई शब्द जो जुबान पर होकर भी वही घुमड़ता रहेगा.. बाहर नहीं आएगा. नहीं सोचना है उसे.. आना होगा याद तो आ ही जायेगा.
नयी गृहस्थी है और अकेले हैं दोनों.. पर जाने क्या है जो आ बैठता है उनके बीच. उस पूर्वोत्तर प्रदेश में उसे आये हुए एक महिना ही हुआ है.. शादी हुए सवा महिना.. मन अभी तक महानगरीय गति से ही धड़कता है. यहाँ एक दिन कब पिघला और दूसरा हुआ या दूसरा ही अभी भी पहला है.. पता ही नहीं चलता. नए परिवेश, नए मौसम, नयी ज़िन्दगी में ढल ही रहे हैं दोनों.. कभी साथ.. दो खोये बच्चों की तरह.. कभी अपने अलग-अलग द्वीप में अकेले.
‘चलो तुम्हें सबसे मिलवाता हूँ,’ उसको खिड़की के पास खोयी सी खड़े देखकर पति के मन में मोह जागा. जाने दृश्य में खोयी थी या खुद में. अब तक उसे सामने दिखती पहाड़ियां की रेंज याद हो गयी थी. किसी दिन सात दिखतीं.. जिस दिन सारी नौ दिख जातीं वो दिन वो बस यूँ ही खुश हो जाया करती. पहले दिन बादलों को खिड़की से झांकते, कमरे में भितराते देख कितनी खुश हुयी थी. बाहें फैलाये दौड़ती रही थी.. उनकी गंध नहीं थी.. या थी शायद.. बादलों सी.. धूप और पानी सी.. पर वो भी अब सीली सी लगती है.
उसने माँ से बात की थी.. और चिढ गयी. ऐसे लगा जैसे सब उसके ब्याह से बहुत खुश हों.. क्यूँ? क्या उसके जाने की इतनी ख़ुशी थी उन्हें.. ‘अरे, ये क्या बात हुयी भला!’ माँ के स्वर के तार बस ज़रा सा ही ऊपर नीचे लगे उसे. उसने याद करने की कोशिश की.. माँ की गंध. ठीक से कुछ याद नहीं आता.. लौंग सी.. कपूर सी.. या उबले चावलों के मांड सी. सुहानी सी सुकून भरी एक गंध जो माँ के धुले कपड़ों से भी आती है. बचपन में छुपन-छुपाई खेलती वो सूखने को पसारी हुयी साड़ियों के पीछे छुपती जानबूझ कर.. सांस भर लेती.. माँ की गंध.. अब नहीं आती..
क्रिसमस की छुट्टियों से सब उत्तर भारतीय परिवार लौटने लगे हैं.. वहां के भीषण ठण्ड से यहाँ की सुहानी धूप भली.. फिर सब मिलेंगे.. वही मुट्ठी भर लोग.. वही दावतें... गेट-टुगेदर.. जहाँ पुरुष एक कमरे में पेग के साथ तब तक जोर-जोर से हँसने का सफल अभिनय करते हैं जब तक वहां बैठा सबसे बड़ा अधिकारी मन भर कर नशे में ना आ जाए. पत्नियां दूसरे कमरे में सॉफ्ट ड्रिंक लिए कपडे, मैका, ससुराल, एक दूसरे के फिगर.. बच्चे.. स्मार्ट शौपिंग सेंस.. लोकल भाषा, खानपान सबकी नुक्ताचीनी करने में मस्त.. उसके पति ने कहा उससे. हँसते हुए, बेखयाली में सच बोल गया. उसका मन पार्टी में जाने से पहले ही बुझ गया. दोनों ने बात वहीं छोड़ दी.. जाना तो है.. वहां देखेंगे क्या-क्या होगा..
सब ठीक वैसा जैसा पति ने कहा था. उसने सबसे मिलते ही एक बार फिर वो अजनबी गंध महसूस की.. जिसमें कई गंध आ-जा रही थीं.. घाघ-पैनी गंध.. देह पर रेंगती गंध.. छूने को आतुर गंध. वहां से जल्द ही उसे जनाना गोल में पहुंचा गया पति. इस बार वो लगभग तैयार है. बातें शुरू हुईं तो बस चल पडीं. उस अपरिचय के बगूले में उसे ससुराल का पहला दिन याद आया. लगभग वही सांस-सांस नापता-तौलता माहौल. ‘आओ मेरे साथ किचेन में मेरी मदद करो..’ गृहस्वामिनी ने उसे उबार लिया. किचेन में खाने की खुशबू ने पहचाने नाम उकेरे मन पर. एक ही शहर का एकहरापन दोनों के बीच पनप उठा. खैरियत है, यहाँ है एक कोना जहाँ वो अपनी गांठे खोल सके शायद.
पूरी शाम, जो अब तक गबरू रात हो चुकी है, उसने सुना बहुत कम.. बोला उससे भी कम.
‘भाई, आपकी मिसिस तो बहुत शांत हैं. कहीं शरमा तो नहीं रहीं. यहाँ इस ‘गॉड-फॉरसेकेन’ जगह में हम ही हैं जो बार बार मिलते-टकराते रहेंगे,’ अपनी हर बात को कहकहे से शुरू ख़त्म करने वाले महाशय अब साफ़-साफ़ झूम रहे हैं.. खाना निपटते बहुत देर हो गयी. वो थकने लगी. एक साथ देखे-सुने सारे चेहरे एक में मिलने लगे हैं. अचानक उसने बहुत ऊबी हुयी नज़रों से पति की ओर देखा और दोनों उठ खड़े हुए. रास्ते भर वो ऐसे अधिकारीयों की ऐसी पोस्टिंग्स के बारे में पूछती रही. दस लोगों में से बस चार का परिवार साथ है.. बाकि के अकेले. पत्नी बच्चों को लिए महानगरों में रह रही है. और, अकेले कितने, कितने मेले हैं, कितने झमेले, ये एक अलग कथा.
उनके निकलते-निकलते भी कोई बात.. कोई चुप्पी.. एक आँख.. या शायद एक पहचानी सी गंध.. उसकी पीठ पर चिपकी चली आई. हलकी ठण्ड होते हुए भी उसने पानी गुनगुना किया और देर तक नहाती रही.. गंध जाती रही थी.
धीरे धीरे नया परिवेश उसकी आदत का हिस्सा बनता जा रहा है. भाषा, लोग, पहनावा, संगीत, समाज, धर्म सब अलग अनूठा अनजाना सा. रात के अँधेरे में जाने किस कोने से आती लोकगीत की कड़ियाँ.. साथ कोई डफ बजा रहा है. गीत की भाषा अनजानी पर लय की भाषा तो आदिम है. कुछ देर मन पर बजती रही. पलट कर देखा तो पति भी जागा हुआ.
‘वो देखो ऊपर, बहुत ऊपर, एक इंटरनेशनल फ्लाइट की रौशनी.’ दोनों खुली खिड़की से तारों भरे आकाश के एक ‘तारे’ को धीरे-धीरे पूरब की ओर बहते देखते रहे. ‘सोचो तो वहां हजारों फुट ऊपर लोग होंगे.. खा-पी चुके होंगे.. हम-तुम जैसे सो रहे होंगे. ऊपर उतने ऊपर, दूर कितने, वो दुनिया जिससे हम ज्यादा करीब से जानते हैं और अभी हम यहाँ नीचे इस जगह हैं जहाँ सब कुछ अनजाना पता नहीं कब से जस का तस. ये धुन कितनी आदिम’ उसे झुरझुरी से आ गयी. पति ने उसे बहुत हौले से खुद से लगा लिया, ‘तुम यहाँ बहुत अकेली हो गयी हो न. देखो कब तक वापस ट्रान्सफर का जुगाड़ बने. कहो तो कुछ दिनों के लिए अम्मा के पास छोड़ आऊं?’ ‘ना, मुझे कहीं नहीं जाना,’ वो कुछ पति में और बहुत कुछ खुद में सिमट गयी. उसे फ़ोन पर अम्मा का स्वर याद हो आया.. माँ की गंध कहाँ छूट गयी.. क्यूँ? रुलाई गटक ली उसने.
उस रात, उसने सपना देखा.. ‘वो एक अँधेरे अंधे कूएं में पड़ी है जहाँ से कुछ नहीं नज़र आता.. बस बहुत दूर ऊपर सितारे हैं.. जिन्हें उससे कोई मतलब नहीं.. अजीब किस्म के बोर हैं वो.. वो अकेलेपन की दहशत से काँप रही है.. बस उठ भी नहीं पा रही.. बाहर ऊपर कहीं एक बेचैन गंध है - बाघ-गंध.. मंडरा रही है.. और हांका के नगाड़े और शोर उस गंध को उस के और पास लिए आ रहे हैं.’ हांफती हुयी वो ना जागी-ना सोयी उस बोझ से लड़ती रहती है. बदन पर पड़े उस अनाम भार को उतार फेंकना चाहती है पर हिल भी नहीं पाती. पति की आवाज़ सुन रही है. समझ नहीं आता जागी है या सो रही है.
‘उठो उठ जाओ.. सपना है’. इतना पसीना उसे यहाँ किसी दोपहर नहीं आया और अभी भोर में देखो. पानी का गिलास नहीं पकड़ा जा रहा उससे. पति ने थाम कर अपने हाथ से पानी पिलाया, ‘क्या हुआ है? कौन सी बात है जो परेशान हो इतना? यहाँ से जल्द लौटेंगे’. उसे ग्लानि लपेट लेती है.. वो अपना चेहरा उसके कंधे में गाड़े सोचती है ‘कुछ करुँगी अब. आई शाल नॉट सकम्ब टू एनी स्टुपिड नोशंस..’
शनिवार की भोर है. पीछे की गली उसकी खिड़की से तीन मजिल नीचे है जो घूमते हुए जब तक उसके मकान के आगे पहुँचती है तो उसके मंजिल के सामने से गुज़रती है. पहाड़ों के मकान ऐसे ही होते हैं. जैसे एक के अन्दर कई सारे. नीचे झांककर लगने वाले साप्ताहिक बाज़ार का जायजा लेती है. अभी सब खाली है. किसी ने एक बल्ब तार से जोड़ और जला कर पीछे उगे कटहल के पेड़ की निचली डालियों में टांग दिया है. उसकी रौशनी में सड़क के एक्के-दुक्के आने-जाने वाले, बड़ी और टेढ़ी-मेढ़ी परछाइयां मकान की पिछले दीवार पर फेंक रहे हैं. और दूर.. घाटी के पीछे सारे बादल नदी पर रात भर के लिए आ बैठे हैं. जैसे नदी को बिछा कर सो गए हों. अचानक उस चीख ने उसका ध्यान फिर से सड़क की और खींचा. ये क्या है?!! इतना बड़ा सूअर!! और वो उसे.. उसे मार रहे हैं. एक बड़ा सा काठ का हथौड़ा लिए ठीक उसके सर पर लगातार.. ओह! भय की गंध लहू के लोहे सी है..
पति का सहायक सिंघा मणिपुरी है. हिंदी अच्छी जानता है. बांग्ला उससे भी अच्छी. मणिपुरी, मिज़ो, अंग्रेजी मिलाकर कुल पांच भाषाएँ.. उसका आत्मविश्वास उसके उम्र और वहां के मुस्तकिल कर्मचारी होने की वजह से है. पति की पोस्टिंग कुछ साल की है ये वो अच्छी तरह जानता है और हाव-भाव मं हमेशा ज़ाहिर भी कर देता है. ‘मिमसाहेब, आप तो यहाँ परेसान हो जायेगा. आपको घर जैसा तो इधर कुछ भी नहीं. ये देस बहुत अलग है. मैंने देखा हूँ डिल्ली. यहाँ मन लगाओ.. लगेगा,’ उसने सूंघ लिया है शायद उसका उचटता मन. नहीं, वो ऐसी किसी चीज़ को पति की नौकरी के आगे नहीं आने देगी.. उसे कोशिश करना ही है.
शाम होते ही आकाश के अंधेरों को घटाते-बढाते दूर-पास घाटी-पहाड़ियों से आग की रौशनी फिर उनसे उठते धुयें की रेखायें.. ये रोज़ का सिलसिला है. ‘झुम’ करके पहाड़ साफ़ करना और खेती करना इनकी परंपरा.. पर साथ ही चर्च की घंटियाँ.. प्रार्थना के स्वर.. सब मिल कर ‘पैराडाइस लॉस्ट’ और ‘इन्फरनो’ के दृश्य उगा देते उसके मन में. वो खिड़की से पलट आती है. आज ऐसे ख़याल नहीं. आज उसने मन से खाना बनाया है. कैंडल नाईट डिनर प्लान किया है. पति उन्ही अफसर-मित्रों से मिल कर लौट रहा होगा. वो उसे सरप्राइज देगी आज. आते ही उसने उसकी ख़ुशी देखी.. ख़ालिस ख़ुशी.. खुद को इम्पोर्टेंस मिलने की ख़ुशी.. प्यार की ख़ुशी और उसने उसे माथे पर चूमते हुए ‘शुक्रिया’ कहा. उसके हाथों में एक बड़ा सा पैकेट पकड़ाते हुए वही शब्द दोहराया, ‘सरप्राइज.. मेरा भी’. पैकेट में किताबें.. ढेरों.. उस नहीं पढने वाले को खूब पता है उसे क्या पसंद है और उसने किसी कार्यालय की लाइब्रेरी से ये किताबें जुटाईं हैं. वो मुस्कुरा उठी.. वो मुस्कुरा उठा.. वो दोनों मुस्कुरा उठे. कमरे में ऑरेंज मोमबत्तियों की पकी सी खुशनुमा महक फ़ैलने लगी है. सब इतना बुरा भी नहीं. खासा अच्छा है इन फैक्ट. आँखें मूँद कर मुसकुरा रही है वो.. जैसे संतरे के फूलों से लदे बगीचे में एक पकी सी दोपहर की गंध जी रही हो.
इधर जितने बार भी वो उन एक सी गेट-टुगेदर में गयी उसने खुद को काफी सहज कर लिया है. अब किसी गंध के बारे में ना सोच कर उसे नियंत्रित किया जा सकता है.. वो सीख चुकी है. उसे पता है कितना कम बोलकर और ज्यादा मुस्कुरा कर काम चलाया जा सकता है. नयी सहेली भी अब पुरानी हो चली है और सहज भी. उसकी धारणाओं.. मतों को वो ध्यान से सुनती है पर परखती हमेशा खुद ही है. स्थानीय संस्कृति पर किताबें पढ़ रही है. वो घूम रही हैं मन में.
आज पार्टी में बस दो परिवार ही हैं. उसने सहेली से बाघ-मानव की किवदंती का ज़िक्र किया और धीरे-धीरे ऐसी ही बातों का सिलसिला शुरू हो गया. अक्सर चुप और अलग-थलग रहने वाले उस प्रशासनिक अधिकारी ने जो स्थानीय ही है.. आज कई कहानियाँ सुनाई. बचपन में उन्होंने ऐसे किस्से सुदूर गाँवों में घटे सुने थे.. जहाँ कोई आदमी जोग-टोना सीखता और दिन में मनुष्य और रात को बाघ बन जाता.. लोग जान नहीं पाते.. लौटता तो पास के झरने से नहा कर.. पर पत्नी को बेचैन करती उससे कभी-कभी आती तीखी बाघ-गंध. उस अधिकारी के विश्वास ने उसकी बात से ज्यादा माहौल भारी कर दिया. रात भी काफी हो गयी.. जिसे कभी बोलते नहीं सुना उसे इतना बोलते देखकर सब उसे कहने लगे, ‘भाभी, आपने कमाल कर दिया. आज आपने इसे बोलवा लिया.. क्या बात है.’ घर लौटते वक़्त हर अँधेरे मोड़ से उसने मुंह मोड़े रखा.
गर्भ के पहले चिन्ह उभरने लगे हैं. दोनों खुश हैं. पति नहीं चाहता वो यहाँ अकेले रहे. अब माँ बहुत याद आने लगी हैं और गंध ने फिर से सर उठा लिया है. कितने ही रूप में उसे घेर लेता है. सूखी मछली.. हरे अनाम साग, उबलते हुए पत्तागोभी.. मांस.. दाल.. अड़ोस-पड़ोस और अपनी ही रसोई से उठती हर गंध.. सबका भभका लगता है. उसके उबकाई के स्वर ने साथ के कमरे में भी खबर फैला दी है. सिंघा की पत्नी ने उससे पूछ ही लिया और खुद इतनी खुश हुयी कि उसे पहली बार एक अपनापा सा लगने लगा है.
अजीब से सपने फिर उभरने लगे हैं.. नए पुराने.. आधे-अधूरे.. सबका मतलब ढूंढता है मन.. भय, उम्मीद, चिंता, घबराहट, ख़ुशी, पति से दूरी और माँ से मिलने के दुःख-ख़ुशी के बीच जीती है. गोपाल मन्त्र रटती बस इन्ही ख्यालों में झूलती-टहलती रहती है. जल्द ही जाना है घर. ये सपने और ये गंध.. इनसे मुक्ति मिले शायद.. ‘ॐ देवकी सुत देहि मे तनयं.. कृष्ण त्वां अहम् शरणम् गतः’ हर सांस के साथ आते-जाते जल्द रट लिया है उसने.
कल की फ्लाइट है और बदस्तूर उसे विदा करने के लिए आज रात ये ‘सेंड ऑफ’ पार्टी. ये सात महीने और ये पार्टियां.. अब सब यंत्रचलित सा भी है और एक अजीब सी फमिलिअरिटी भी है. सब हाल-मिजाज़ पूछ लेते हैं और यहाँ घर से दूर उसे ये सब अच्छा लगता है अब. वही हर बार की तरह एक कमरे में जाम और दूसरे में महिला मंडली. परिचित सब और सब अजनबी.. बातें, हंसी, खाना, इंतज़ार और.. सबकी अलग से उठती और उसकी देह टटोलती नज़र.. जैसे आँखों ही आँखों में माप लेंगे पांच माह में उसके शरीर में हुयी तब्दीली को. कौन कितना पढ़ा-लिखा और कितना सभ्य है.. ये उसकी खुली और चोर नज़र से समझ आ जाता है. वो खुद में सिमटने लगी है. दोस्त ने भांप लिया, ‘सब तुम्हारी पसंद का बनाया है आज’. ‘अरे! थैंक्स.. बस ज्यादा कुछ खाया ही नहीं जाता’ हर बार कोई नयी गंध चिपट जाती है उससे..
आज कोई बड़ा अफसर नहीं.. सब हमउम्र ही हैं तो धीरे-धीरे सब साथ ही आ बैठे. पुराने रीति-रिवाजों. किंवदंतियों की बातें फिर छिड़ गयीं. वो आज भी हमेशा की तरह अकेला.. किनारे बैठा अकेले पी रहा है. उसने अक्सर दबे सुरों में उसके पीने की क्षमता के चर्चे सुने हैं. किसी ने उसकी पत्नी को नहीं देखा बस सुना है कि वो कोलकाता में रहती है. अक्सर बीमार अपनी बेटी को लेकर. उसका इलाज और पढाई वहीँ हो रही है. वो बोलता बहुत कम है पर उसकी नज़र सर चढ़ कर बोलती है. उसने अक्सर उन्हें महसूस किया है अपने चहरे पर मंडराते हुए.
कोई बहुत पुरानी गंध दबी होती है शायद सब में ही.. वो मिटती नहीं कभी भी. ज़हन में कहीं दुबक जाना.. पर्दा करना सीख जाती है. शायद और शातिर हो उठती है. चमकीले छद्म आवरण से ढकी बाहर आती है सब में ही. पर वो ऐसा नहीं. बोलता ही नहीं, क्या पता इसलिए कि बोलेगा तो सब सतह पर ही तैर रहा है.. झट बाहर आ जायेगा.. जस का तस.. और वो सबकी मुश्किल का सबब बन जायेगा.
आज फिर भी वो बोल रहा है. उसने किसी लोकगीत की धुन गुनगुनानी शुरू की है. उसे लगातार देखता हुआ.. उन बोलों के मायने नहीं जानता कोई पर कुछ बहुत गाढ़ा सा घुलने लगा है कमरे में.
लगातार उसे देखती उस दृष्टि ने अकेले उसे ही असहज नहीं किया. सब महसूस कर रहे हैं. ‘विश आई हैड माय गिटार टुनाइट’.. उसने रुक कर कहा और हंस पड़ा. रोती हुयी उदास हंसी. हर बात को समझना, उसे छांट कर किसी खास आले में दीमाग के डाल देना.. फिर उसे उसके हर आयाम से समझना.. जुगाली करना.. उसके रेशे-रेशे नोचना.. सब मज़े लेंगे फिर बाद में.
‘बहुत हुआ कप्पू.. यू हेड अ बिट टू मेनी फॉर द इवनिंग..’ ‘नो.. वन फॉर द इवनिंग.. वन फॉर द रोड.. एंड हा हा हा.. द लास्ट वन फॉर द डिच.. हा हा हा..’ उसने कहा. हंसी से आँखें मूँद लीं. कमरे में कुछ और आ बैठा है.. उन सबके बीच मंडरा रहा है. पहचान लिया उसने. बाघ-गंध है.. पीली चमकीली आँखों में डोलता बाघ.. बेचैन एक बंद कमरे में.. वो गंध इतने दिनों बाद आज फूट पड़ी है चारों ओर.. अचानक वो खड़ा हो गया और अपने डगमगाते क़दमों से उसकी ओर बढ़ा. ‘और एक आपके लिए माय लेडी.. फॉर आय विश यू वर माइन.. जस्ट अ विश.. प्लीज़ एक्स्क्यूस मी,’ उसने लडखडाती जुबान में बेहद उदास और संजीदा अंदाज़ में कहा.
सब सन्न हैं. किसी को होश भी नहीं कि कुछ सेकंड बीते हैं या एक काल पिघल गया. उसकी बेचैनी उसने पढ़ी या चुप्पी.. क्या पता. इससे पहले कभी कोई बात भी नहीं की.. पर आज उसके जाने के एक दिन पहले जाने क्या कह गया. ‘बाय.. थैंक्स फॉर द डिनर.. मैं अब जायेगा..’ वो कमरे से बाहर निकल गया.. पीछे छोड़ गया अपनी बेचैन बाघ गंध.. जो अब उसके बालों में रेंग रही है.. कितना कुछ अचानक हो गया..
वहां से खामोश ही घर लौटे दोनों. अपने बिस्तर पर ढह गयी. पति उसका सर सहलाता रहा और वो चुपचाप पड़ी रही. बहते आंसू भी नहीं पोछे उसने.. जैसे खुद को किसी एहसास से खाली कर देना चाहती हो. आज की शाम गूंजती रही, नाचती रही उसके सामने जब तक वो सो नहीं गयी.
हवाई अड्डे पर कोलकाता से आने वाली फ्लाइट का इंतज़ार करते समय उसने अपने पति को एअरपोर्ट मेनेजर से बातें करते देखा. दोनों उसकी ओर नहीं देख रहे पर कुछ तो हुआ है.
‘क्या हुआ?’ उसने पति से पूछा. ‘कुछ नहीं.. फ्लाइट आ गयी है. चलो सिक्यूरिटी के लिए’ उसने हाथ थाम कर उठाया. दोनों सिक्यूरिटी के लिए बढ़ गए. जहाज़ से उतर कर आते लोगों को लेने वालों में उसने एक परिचित लड़के को रोते देखा. वो तो उस अफ़सर का चचेरा भाई था या जाने ममेरा.. एक पीसीओ सेंटर का मालिक..
‘क्या हुआ है?’ पति की चोर नज़र पकड़ ली उसने, ‘बताइए न’. उतरे यात्रियों में एक.. मिज़ो है शायद.. औरत और साथ में एक १५-१६ बरस की लड़की उस लड़के से रोते हुए लिपट गए.
‘आप कहते क्यूँ नहीं..’ ‘तुम बैठ जाओ. बताता हूँ.. उसकी कही बात सच हो गयी कल रात. इतनी पी रखी थी उसने एक्सीडेंट कर बैठा कमबख्त.. गाड़ी लिए खाई में.. ओह!’ वो उसे देखती रही.. उसे पति की जगह कल रात का झूमता हुआ नशे में वाचाल बन बैठा एक उदास अकेला पुरुष दिखा जो उससे प्रेम कर बैठा था शायद. ‘लास्ट वन फॉर द डिच.. गुड नाईट माय लेडी..’
‘सुनो!’ उसने पति के हाथ पकड़ लिए.. ‘मुझे बाल धोने हैं अपने..’ एक गंध उसके बालों में उबलने लगी और उतरती हुयी उसे घेरने लगी.. वही पीली चिटकी हुयी बेचैन बाघ गंध..


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कहानी पर वाट्सअप समूह ,"साहित्य की बात" और "धागा " पर  आई प्रतिक्रियाएं 


अनिल अनलहातु: सर्वप्रथम तो अपर्णा जी को एक खूबसूरत अहसास और गंध की अद्भुत कहानी के लिए साधुवाद और बधाई । दूसरी बधाई इस कहानी के कथ्य के निर्वहन की निर्ममता के लिए , वरना इसी तरह के कथ्यों पर, आजकल के चालू स्त्रीवादी विमर्श के तहत लद्धड़ और आंसुढकेल कहानियाँ लिखी और सराही जा रही हैं ।
कहानी को पढ़ते हुए जैसा फ़ाक़ीर भाई ने कहा है , कि सहसा यह विश्वास नहीं होता कि यह लेखिका कि पहली कहानी है, शायद यह उनकी दृष्टि और जीवन की परिपक्वता का असर है ।इस कहानी को पढ़ते हुए मुझे लगातार मंटो की कहानी "बू" और शेखर जोशी की "बदबू" जेहन मे घुमड़ती रही , उन्हीं कहानियों की तरह अपर्णा जी ने भी इस कहानी मे गंध का इस्तेमाल कहानी के वातावरण के निर्माण मे अद्भुत कलात्मक अन्विति के साथ किया है ।
कहानी मे यथार्थवाद की पहचान का एक टूल विभावना व्यापार होता है । हमारी बहुत सारी स्मृतियाँ किसी ध्वनि , गंध या दृश्य से correlate हो जाती हैं , बाद मे जब भी उस ध्वनि,गंध या दृश्य से हमारा साबका होता है , हमारा मस्तिष्क उस गंध, ध्वनि या दृश्य से जुड़े विगत की स्मृतियों को ताज़ा कर देता है ।इस कहानी मे भी गंध से जुड़ी हुई तमाम स्मृतियाँ हैं जो मौके बे मौके कथानायिका को अलग अलग स्मृतियों मे ले जाती हैं और कहानी के वातावरण को ज्यादा यथार्थपरक बना देती हैं ।
कहानी की भाषा बहुत ही चुस्त है, कहीं कोई बिखराव नहीं है और न अनावश्यक स्फीति । यही कारण है कि कहानी का प्रभाव बहुत ही सघन ,सांद्र और स्पर्शी है । सबसे जो मार्के कि बात है वह यह कि अंत अंत तक पाठक यह अनुमान नहीं लगा पाता कि क्या वाकई कथानायिका का उस मिज़ो अफसर के प्रति कहीं कोई नर्म कोना था भी या नहीं, और यही इस अद्भुत कहानी कि सफलता है. कुछ इसी तरह कि एक कहानी प्रियंवद की है जो शायद "फाल्गुन की एक उपकथा" मे संग्रहीत है, उस कहानी मे भी यह सस्पेन्स अंत अंत तक बना ही रह जाता है ।
इस तरह की प्रेम कहानियाँ (अगर यह प्रेम कहानी, इकतरफा ही सही , है तो ) लिखना तलवार की धार पर चलने के समान है. थोड़ा सा चुके नहीं कि ..........
रिमोट और निर्जन जगहों की उदासी और अवसाद का बड़ा ही सुंदर और वास्तविक चित्रण इस कहानी को कलात्मक ऊँचाइयाँ देता है । बाकी बातें प्रीत सर ने विस्तार से लिख ही दिया है , मैं उनसे पूरी तरह इत्तेफाक रखता हूँ कि इस कहानी मे एक जबर्दस्त पठनीयता है और आप एक झपाटे मे एक लंबी कविता की तरह पढ़ जाते हैं ।अपर्णा जी को अनेकश: बधाई ।


राकेश पाठक: हमें कहानी हर मायने में अच्छी लगी..एक सम्पूर्णता जो पाठक को चाहिए वह है इसमें..यह बाघ गंध बेचैनी और नैराश्य का समन्वय लिये हर स्त्री जीती ही है...कुछ व्यक्त हो जाता है तो कुछ सदा के लिए अव्यक्त..यह अव्यक्त भाव ही जो बचपन से किसी कोने में सिमटा बैठा होता है ..स्त्री मन और मनोविज्ञान की बड़ी बारीक पड़ताल है इस कहानी में जो टूटा हुआ अव्यक्त रह जाता है हर स्त्री के अतीत में...यह बाघ गंध भी स्त्री का वही अतीत है...इस कहानी में बिम्बों, प्रतीकों, रूपकों सबका बड़ा ही संतुलित इस्तेमाल किया है अपर्णा जी ने...सच ही कहा है कहानी में की स्त्री का कोई कोना है क्या कहीं..?? एक माँ, एक पत्नी, एक बेटी हर रूप में स्त्री अपना कोना ढूंढती है पर उलझनों और जिम्मेवारियों के बीच उसे मिलता कहाँ हैं.. ? माँ की गरिमामय महानता उसकी कोना छीनती है तो एक पत्नी से उसका पति, या फिर बच्चे..बहुत वाज़िब सवाल की स्त्री का कोना कहाँ है..?? इस कहानी ने काफ़ी प्रभावित हुआ..ट्रेन में हूँ अतः लिखने में दिक्कत आ रही है ..इसलिये फिलहाल इतना ही..यह बताने के लिए काफी है कि एक अच्छे कहानीकार की संभावनाएं साकीबा ने बाहरी परिदृश्य को दे दिया है.


सुरेन सिंह: गन्ध कथा पर पूर्व में लिखी टीप , आज कथा के पुनः लगने पर पुनः प्रस्तुत कर रहा हूँ ।
गंध ...कथा ,पर कुछ कहने से पहले एक बात ये कहना चाहूँगा कि  ये अपर्णा की पहली प्रकाशित कथा है जिसे मैंने फेसबुक इनबॉक्स के बाद  निकट पत्रिका में पढ़ा था ।
इस  कथा में ये बात पक्की है कि पहली कथा का कच्चापन  नही है । लेखिका ने बड़ी सलाहियत और संवेदनशीलता से कथा को बयां किया है ।
इस कथा को पढ़ने पर पाठक का मन विविध नोशन्स पर काम करने लगता है ... जैसे जैसे कथा बढ़ती है .उसके मन में बाघ को लेकर जमे कई तरह के  प्रत्यय डोलने लगते है ...इनमे बाघ और आदमी के साहचर्य और एक दूसरे में कन्वर्ट होने के रस्किन बांड नुमा कथ्य , बाघ जो उद्दाम यौन क्षमता का प्रतीक है  , बाघ जो पोटेंशियल रखता है साथ ही उस पोटेंशियल की  बंधन युक्त लाचारगी (तुलना करे नाज़िम हिकमत के पिंजरे के शेर से जो कतई लाचारगी प्रक्षेपित नही करता ) , स्वप्न में  महसूस की गयी अंधकूप सी खोह और उसके ऊपर चमकते सितारों के मध्य वही बाघ गन्ध  की फील के  फ्रायडीय निहितार्थ , चूंकि बाघ गंध 6 वर्ष की उम्र से साथ है या कहे अवचेतन के निमार्ण काल से साथ है तो उस गंध के साथ  कोई यौनउत्पीड़न  के जुड़ाव का संकेत (...हालाँकि लेखिका ऐसे संकेत नही देती पर ये उपज सकता है पाठक मन में स्वभाविक रूप से )
इसके साथ ही नायिका का नए परिवेश से अपनी अन्तर्मुखीता के साथ तादाम्य और हिंदी पट्टी की शुचिता और उसपर संक्रमण से उपजा  अपराधबोध ..जिससे नायिका शरदचंद्रिय आंसू बहाती है और पति सर सहलाता है । अदिआदि ।
   
इन सब नोशन्स के एक साथ जागने पर जागरूक पाठक कथा की जटिलताओं से रूबरू होता हुआ कथा के मोटिव और लेखिका की लोकेशन और गेज़ की फीते से कथा को मापने ,नापने और आंकने  की  कोशिश करता है ।
 इस कोशिश में वो लेखिका की स्वर्ण हिन्दू मध्यम वर्गीय चेतना  की लोकेशन से उसके आस्वाद को परखते हुए कथा के मोटिव में निहित संवेदनशीलता को तो पाता है परंतु अपने समय के बोध की जटिलताओं को समझने की दृष्टि में कोई नया आयाम नही पाता ।
अब दूसरे पहलू से विचारने पर सबसे पहले गौतम याद आते है जो तथाकथित आत्मा (चेतना) के कम्पोजीशन को पञ्च स्कन्ध ..रूप,रस,गंध... से बना पाते है । अब इसमें आधुनिक अन्तर्मुखीता को जोड़ दे तो चेतना का प्रवाह जो प्रायः बाहर से भीतर की ओर है, में एक  व्यक्ति (नायिका)जब  अंतर्मुखी होता जाता है ,तब गंध,दृश्य और स्पर्श  जैसी संवेदनाये या इन्द्रिय बोध ... जो उसे बार बार उन विशिष्ट जगहों पर ले जाती है जहा से उसके अपने भीतर उतरने की यात्रा की शुरुवात की।कोई दृश्य आपको अपने भीतर बांधता है तो कोई आप को आपके ही भीतर बंध जाने को मजबूर कर देता है..... यही गंध और स्पर्श के साथ भी होता है ।कोई गंध विरक्त करती है तो कोई जीवन से भर देती है ............. तो पञ्च स्कंधों में से किसी एक को लेकर और उसके विस्तार ,विश्लेषण एवं सबलीमेशन को लेकर एक स्त्री पात्र के अवचेतन की खोह को छानने की प्रक्रिया को ये कथा पाठक के समक्ष इस भांति रखती है कि  पाठक ,सम्भवतः  निम्न तरह से विचार करने को उद्द्वेलित हो जाता है ...

बाघ गंध को लेकर कई मेटाफर और अपने अवचेतन से जुड़े कई आयामों पर पाठक सोचता रह जाता है ।

बचपन से इस बाघ गन्ध के अस्तित्व से नायिका का ही नही पाठक का अवचेतन भी प्रभावित होता है । एक साथ ही पाठक के मन पर पर कई विचार धावा बोलते है ...


जैसे फ़्रायड का स्वप्न सिद्धान्त    ,   रस्किन बांड नुमा आदम और  बाघ सहसंबंधी विचार ,  बाल यौन  शोषण संबंधी विचार ( हालाँकि फिर दोहराऊंगा कि लेखिका ने इशारा नही किया है इस तरफ पर वो उभरेगा ,ऐसा अनुमान किया जा सकता है  )  , कही कहीं शरदचन्द्रिय भावुकता को बाकि के कथा कांसेप्ट से एसोसिएट करने का विचार ...आदि आदि ।
एक छोटा सा तार्किक दोष जो दिखा ,हो सकता है न भी हो ...वो ये कि बचपन में अनुभूत बाघ गंध और वर्तमान की बाघ गंध में जो कोरिलेशन लेखिका बनाती है वह परफेक्ट नही है । क्योंकि एक वही प्रत्यय.. बचपन , वर्तमान स्वप्न , मिज़ो अफसर से विदाई , उसकी मृत्यु  की खबर  सब घटनाओ पर रेशनल तरह से तादात्मय नही बिठा पाता  ।
इस  भांति हम कथा के कई पाठ कर सकते है । लेखिका ने जो सोच कर लिखा ..जरुरी नही वैसा ही वो कागज पर उतरा हो । मतलब लेखिका का अपना भी पाठ होगा जो किसी पाठक से मैच कर भी सकता है और नही भी ।
  अंततः कथा लेखन कर्म के लिए  शुभकामनायें ..अपर्णा जी 💐💐 ,प्रवेश जी का शुक्रिया 🌸🌺

अनीता मंडा: गंध जब पहली बार साकीबा पर लगी थी तब भी ख़ासा प्रभावित कर गई थी, अभी 5-7 रोज़ पहले fb पर भी पढ़ना हुआ। मानव मन स्मृतियाँ संजोता हुआ, कहाँ किस चीज़ से क्या जोड़ लेता है यह एक यात्रा है। हम सब कहीं न कहीं इन्हें महसूसते हुए ही आगे बढ़ते हैं। नायिका का जीवन- संघर्ष या जीवन यात्रा  गंध के माध्यम से ही सामने आ रहा है, घटनाएँ बहुत कम हैं कहानी में, जो हैं वो भी बहुत सूक्ष्म, कहानी मन के धरातल पर अधिक चलती है, वो चाहे नये वातावरण से नायिका का घुलमिल पाने में सहज न होना, अकेलेपन का अवसाद। अपने पैतृक घर से दूर जाना, गन्ध के माध्यम से ही अतीत याद आना।
इस तरह से गंध शीर्षक एकदम वाज़िब है। कहानी की भाषा तो बहुत परिपक्व  है ही। घटनाओं का संयोजन, व माहौल का चित्रण भी सटीक है। परिदृश्य बुनने में तो कहीं कहीं निर्मल याद आ जाते हैं। ऐसा लगता है कहानी नाज़िल हुई है, कहीं भी सायास लेखन नहीं लगता।

अबीर आनन्द:  कहानी जिस इंटेंसिटी से शुरू होती है वह इंटेंसिटी अंत तक बनी रही. बहुत बड़ी बात है. कहानी ज्यादा लम्बी नहीं है पर उतनी छोटी भी नहीं है कि इंटेंसिटी बरकरार रखना आसान हो.
दूसरी बात जिसके लिए कहानी मुझे पसंद आई वो ये कि अपर्णा जी ने कविता की सी बुनावट और अपनी एक्सपेरीमेंटल मेधा को भी बरकरार रखा. कहानी है...इसलिए उसे अलग सा ट्रीटमेंट नहीं दिया. कुछ को यह शैली शायद अच्छी न लगे पर यह लेखक की अपनी चॉइस होनी चाहिए कि उसे क्या लिखना है और कौन सी शैली में लिखना है.

घरों से दूर ‘गॉड फोरसेकन’ जगहों पर बसेरा बनाने वाले अफसरों और उनके परिवारों का सटीक चित्रण है. दूर अँधेरे में बजते डफ की आवाज जिसकी भाषा अनजानी पर लय जानी-पहचानी है. नई पोस्टिंग में कुछ-कुछ ऐसा ही माहौल होता है. लगता है जैसे शरीर की पोस्टिंग हो गई हो पर आत्मा अभी वहीँ पुराने घर के आँगन में छूट गई है. इंटरनेशनल फ्लाइट की टिमटिमाती रोशनी और सूनेपन को भरने का प्रयास करते हुए अनमने से विचार कि हवाई जहाज में लोग सो चुके होंगे.
बहुत सारे वाक्य-विन्यास हैं जिन्होंने मुरीद सा बना लिया. बार-बार घूम-फिर कर उसी बात पर आने को जी चाहता है कि कविता की कल्पनाशीलता और प्रयोगधर्मिता का भरपूर लाभ उठाया गया है. यदि कोई आपकी कविताएं पढ़े बिना इस कहानी को पढ़े तो वह आपकी अगली कहानी की प्रतीक्षा जरूर करेगा (इंतज़ार अब भी है पर कविताओं ने पहले से एक आस जगा रखी है). लेखक की यह ललक बहुत पसंद आती है कि वह अपने सर्वश्रेष्ठ से इतर कुछ भी देने को राज़ी नहीं है.

माँ की गंध... लौंग सी, कपूर सी, या उबले चावलों के माड़ सी.. (अद्भुत)

हर बात को समझना, किसी ख़ास आले में डाल देना, हर आयाम से समझना, जुगाली करना, रेशे-रेशे नोचना (वाह).
कथन अच्छा है पर प्रवाह और किस्सागोई कहीं-कहीं पर खलती है. इसका एक कारण हो सकता है कि कहानी कहीं-कहीं धुंधली हो जाती है. कहानी के मूल-भाव से मैं बिलकुल सहमत हूँ पर मायके और बचपन के अतीत को, नायिका पर जिसकी गंध का काबिज़ हो जाना बिलकुल समझ में आता है, सही परिणिति नहीं मिलती. एक अलग सा ख़याल है किसी का नायिका पर मोहित हो जाना. ऐसे ही एक अलग सा ख़याल है बचपन की बाघ गंध का दबे रहना (पुरानी गंद दबी होती है, दुबक जाती है...पर्दा करना सीख जाती है (अद्भुत विन्यास)). बहुत आसानी से समझ में नहीं आता कि इन तीनों का आपस में बस इतना सम्बन्ध है कि ये अलग तरह की गंधें नायिका की स्मृति में, उसकी करवटों में घुल चुकी हैं जिनसे पीछा छुड़ाना कम से कम ‘गॉड फोरसेकन’ जगह पर तो संभव नहीं है. तीनों इवेंट्स नायिका की स्मृति में उबलती हुई परछाइयाँ हैं. यह सार समझना आम पाठक के लिए मुश्किल है. सच कहूँ तो पहली बार जब fb पर कहानी पढी तो मैं समझ ही नहीं पाया. आज दोबारा पढी और सुबह से घूम रही है...तब थोडा बहुत डेसिफर हो पायी है. इस धुंध को थोडा साफ़ करना एक बड़ी चुनौती है, ख़ास कर इसकी इंटेंसिटी से समझौता किये बिना. यदि ये धुंधलका हट जाए तो किस्सागोई और आकर्षित करेगी.
बहुत सारे डॉट-डॉट वाले, आधे-अधूरे वाक्यों वाले कथानक मेरी निजी पसंद बिलकुल नहीं हैं. संभव है किसी कहानी की किस्सागोई इस शैली से निखरती हो पर कम से इस कहानी में ऐसा नहीं लगता. एक ऊब सी होती है. हाँ, इन अधूरे वाक्यों का मनमाफिक प्रयोग करने में कोई दिक्कत नहीं है. एकबारगी लगा कि शायद इन वाक्यों की वजह से इंटेंसिटी जिन्दा रही हो. पर ऐसा नहीं है...जैसा कि अपर्णा जी की कुछ कविताओं में भी महसूस हुआ, इंटेंसिटी आपका नैसर्गिक गुर है. उसे इन विन्यासों की ज़रुरत नहीं है.



अलका प्रकाश: प्रस्तुत कहानी के कुछ अंश द्वारा इसके सूत्र को पकड़ा जा सकता है- भूले रहना चाहते हैं इस बाघ गंध की तरह।गंध को बालों मे लिए घर लौटी थी और कहानी के आखिर मे इस गंध से मुक्ति के लिए कथानायिका बाल धुलना चाहती है।अजनबी गंध में कई गंध आ जा रही थी।घाघ पैनी गंध ...छूने को आतुर गंध...देह पर रेगती गंध...एक पहचानी सी गंध....उसकी पीठ पर चिपकी चली आयी।गंध से पीछा छुड़ाने के लिए कथानायिका गुनगुने पानी से देर तक नहाती रही।बाघ गंध मडरा रही है।बदन पर पड़े उस अनाम भार को उतार फेंकना चाहती है पर हिल भी नहीं पाती। पर पत्नी को बेचैन करती उससे कभी-कभी आती तीखी बाघ-गंध।कोई बहुत पुरानी गंध दबी होती है शायद सब मे ही।कथानायिका तीन बार बाल धुलना चाहती है,जो बाघ गंथ से मुक्ति का प्रतीक है।यदि यह प्रेमी की गंध होती तो कथानायिका इससे मुक्ति का प्रयास नहीं करती।प्रेमी-युगल तो इस अहसास को बनाये रखना चाहते हैं ।
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कथाकार अपनी कथा-नायिका के मुख से गोपाल मंत्र का जाप करवाती हैं, जो कि हरिवंश पुराण से लिया गया है और इसका जप पुत्र-प्राप्ति हेतु किया जाता है।जाहिर है,यह प्रगतिशील या स्त्री -विमर्श की कहानी नहीं है,जहाँ होने वाले बच्चे के लिए हरिवंश पुराण का मंत्र जाप किया जा रहा है।स्त्री -दृष्टि अवश्य है,जहाँ एक माँ भावी शिशु की रक्षा हेतु प्रयास कर रही है।
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 इस कहानी को पढ़ते हुए स्वदेश दीपक जी बहुत याद आये।उनकी "किसी एक पेड़ का नाम लो"या शब्द शब्द शब्द कहानी मे इस तरह का ट्रीटमेंट है।निर्मल वर्मा जी के प्रभाव से इंकार नहीं किया जा सकता।आदरणीय दूधनाथ सिंह की रीछ कहानी की तरह इस कहानी में पति के अंदर से भी वही बाघ गंध आने लगती है।
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उस ऑफिसर की मृत्यु के बाद शायद कथानायिका इस बाघ के गंध की ग्रंथि से मुक्त हो जाय।यही इस कहानी का प्रस्थान बिंदु है।मुझे यह कहानी बहुत अच्छी लगी।फ्रायडीय काॅम्प्लेक्स और बाघ की गंध का मंतव्य यही है कि पहले भी कथानायिका का कोई चाहने वाला था,जिसने कुछ गलत  किया था।....और देह पर भार महसूस करती नायिका यदि हिल नहीं पाती तो किसी जबर्दस्ती की तरफ इशारा है।कहानी के जानकारों से यह बात छुपी नहीं रह सकती कि ऐसी कहानी पहले भी लिखी जा चुकी है।यदि अपर्णा जी अपनी कुछ और कहानियाँ प्रेषित करें तो उनके कथाकार रूप के प्रति एक मुक्कमल धारणा बन पायेगी।बहुत -बहुत बधाई।।

मधु सक्सेना: पहले भी पढ़ी ... आज फिर पढ़ा तो लगा जो पहले छूट गया था आज उसे भी पा गई ।हरवाक्य महत्वपूर्ण है और कोई अर्थ लिए हुए ।कहानी नायिका के ही चारों तरफ घूमती बहती है ।मन की विकलता गन्ध के रूप में उभरकर आती रहती है ।
लेखिका ने जिस गहराई से इसको रचा है उतने तक पाठक पहुंच पाया ये भी सवाल आ जाता है ।
एक मन को बांध कर उस पर शोध किया हो मानों और कहानी बहने लगती है ।गन्ध का अर्थ बार बार किसी घटना से जोड़ता है पाठक . .. पर गन्ध तो घटनाओं का समुच्चय हो जाता है ।जितना दिखा उतना ही छुपा ।अपनी पाठकीय दृष्टि का समुचित उपयोग करवा लेती है ये कहानी पाठक से ।
बेहतरीन लिखा अपर्णा
अगली कहानी के इंतज़ार में ।




Tuesday, December 19, 2017


पुस्तक समीक्षा: तीतर फांद,सत्यनारायण पटेल 



सत्यनारायण पटेल

सत्यनारायण पटेल
परिचय
कहानी संग्रह-
१- भेम का भेरू मांगता कुल्हाड़ी ईमान,
२- लाल छींट वाली लूगड़ी का सपना
३-काफ़िर बिजूका उर्फ़ इब्लीस
४- तीतर फांद 
उपन्यास-गांव भीतर गांव

पुरस्कार- 
वागीश्वरी सम्मान भोपाल
प्रेमचंद स्मृति कथा सम्मान, बांदा

पता- m-2/199, अयोध्या नगरी
(बाल पब्लिक स्कूल के पास) इन्दौर-452011( म.प्र.)
9826091605
bizooka2009@gmail.com


तीतर फांद: फंदे से मुक्ति का सपना

अरुण होता


हिंदी के कथा प्रेमी सत्यनारायण पटेल के कथा-संसार से भलीभाँति परिचित हैं। अपने दो कहानी-संग्रहों और एकमात्र उपन्यास ‘गाँव भीतर गाँव’ के माध्यम से सत्यनारायण ने अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। इन्हें आप उनकी कथा-पीढ़ी से भी अलग रूप में पाते हैं। संवेदना और शिल्प के धरातल पर भी सत्यनारायण की कहानियाँ उनके समकालीनों से भिन्न सुर की पाई जाती हैं। इनकी ‘तीतर फाँद’ शीर्षक कहानी के कुछ प्रमुख बिंदुओं पर विचार करना यहाँ हमारा उद्देश्य है। कहना न होगा कि यह कहानी बहुआयामी है तथा इससे गुज़रकर पाठकों को कहानीकार के सरोकार, उसकी चिंता और उसकी समय तथा समाज से गहरी संबद्धता का परिचय मिलेगा।

सबसे पहले कहानी के शीर्षक ‘तीतर फाँद’ पर विचार किया जाना उचित प्रतीत होता है। तीतर एक पक्षी है। उसे फँसाने के लिए शिकारी फाँद बिछाता है। यह रस्सी से बना होता है। इसकी बनावट बड़ी ढीली-ढाली होती है। शिकारी इसे खेत पर डाले रखता है। दाना चुगने के क्रम में तीतर का पैर फँसता है और वह फँदे से मुक्त होने के लिए दूसरे पैर की मदद लेता है तो उसके दोनों पैर फँदे में फँसे रहते हैं। अगर तीतर ने अपनी गर्दन की सहायता से अपने को मुक्त करना चाहा  तो उसका पूरा शरीर फन्दे में बँध जाता है। कहने का मतलब यह है कि शिकारी के फँदे में तीतर का फँसना ही फँसना है। यहाँ तीतर फाँद प्रतीकार्थक है। इस कहानी में तीतर ही नहीं, सभी पात्र तीतर फंदे में बँधे हुए हैं।
 नैरेटर, उसकी पत्नी, पड़ोसी, महाराज, ठग आदि सभी पात्र किसी न किसी फन्दे से आक्रांत हैं। जैसे, कथावाचक व्यवस्था के फंदे में फंसा हुआ है तो उसकी पत्नी गृहस्थी के तीतर फाँद में बुरी तरह फँसी हुई है। शिकारी युवक जंगल विभाग के फँदे में पड़ जाते हैं तो महाराज ठग के फँदे में। ऐसा कोई भी पात्र नहीं जो फंदे में न हो। दरअसल, आमजन से लेकर सत्ता के उच्चासन पर बैठा हुआ व्यक्ति एक दूसरे को फंदे में डालने के लिए भरपूर प्रयास करता है  और उसमें सफल होता दिखाई पड़ता है। कहानीकार ने अपने समय की इस विडंबना को कथासूत्र में पिरोया है। उसने समय के यथार्थ को अंकित किया है। सबसे बड़ा फँदा पूँजी का है। पूँजी के वर्चस्व के सामने सभी बौने और ठिंगने प्रतीत हो रहे हैं। आम आदमी को फँदे में डालकर शोषण करनेवाली सत्ता पूंजी के समक्ष अपने घुटने टेक देती है। सर्वाधिक पूंजीवाले देश का वर्चस्व न केवल तीसरी दुनिया पर बल्कि विकासशील और विकसित देशों पर भी कायम है।
ऐसी स्थिति से उबरने के लिए संघर्ष ही एक मात्र उपाय तथा भरोसा है। कहानीकार ने तीतर की अपार संघर्षशीलता अंकित कर अपनी इस दृष्टि का परिचय दिया है कि क्रांति कभी आती है तो वह निम्नवर्ग या आमजन की पहल से संभव होगी। पूँजीवादी व्यवस्था में विरोध और प्रतिरोध समाप्ति की ओर है । ऐसी स्थिति में तीतर का बार-बार सत्ता के प्रतीक हेड साहब और तिवारी तथा तमाम मनुष्य विरोधी शक्तियों पर रबड़ी छोड़ना कहानीकार की कथा दृष्टि से परिचित होना है। हर संभव प्रयास करना, जूझना एवं संघर्षशील बने रहना आदि को कहानीकार ने तीतर के माध्यम से चित्रित किया है। यह अलग बात है कि सवर्ण और सत्ता की मिलीभगत से छुटकी तीतर गंभीर रूप से आहत होकर मृत्यु को प्राप्त करती है, लेकिन उसकी अदम्य जिजीविषा, अपार संघर्षशीलता और बेहतरीन समझदारी उसे कालजीविता प्रदान करती है। फाँद से मुक्त रखती है।






फाँद के संदर्भ में एक बात और भी है। कहानीकार का भी एक फंदा होता है। वह भी एक घेरा बना लेता है और उसके इर्द-गिर्द  वह कथा बुनता है। वह फंदे में पड़कर एक ही तरह की रचनाएँ करता है। इससे उसकी कथा एकरेखीय बन जाती है। ऐसा लगता है कि वह एक ही कथा को कई कहानियों में बार-बार रच रहा होता है। खुशी की बात है कि सत्यनारायण पटेल ऐसा नहीं करते हैं। यह कथाकार बार-बार अपने को तोड़ता है, अतिक्रमण करता है। अपने को ‘रिपीट’  से बचाता है। शिल्प और संवेदना दोनों ही स्तर पर। ‘भेम का भेरू माँगता कुल्हाड़ी इमान’ हो अथवा ‘लाल लुगड़ी वाली छींट का सपना’, पल-प्रतिपल-78 में प्रकाशित कहानी ‘मिनी, मछली और साँड’ हो अथवा यह कहानी ‘तीतर फाँद’... सत्यनारायण एक ही तरह की कहानियाँ नहीं लिखते हैं। फाँद से मुक्त होकर कथा का सृजन करते हैं। इसलिए कहानीकार के लिए कहा जा सकता है कि वह फाँद से मुक्त तीतर फाँद है। इस कहानी को तीतर की तरह इसका रचनाकार अत्यंत जागरुक, संवेदनशील, प्रगतिशील और वैज्ञानिक सूझ-बूझ का है।

‘तीतर फाँद’ सही अर्थ में समकालीन परिवेश की कहानी है। इसकी समकालीनता भी महत्वपूर्ण है। समय और समाज की वास्तविकताओं तथा विडंबनाओं से टकराकर कहानीकार ने शिद्दत के साथ यथार्थ को अंकित करने का प्रयास किया है। असहिष्णुता हो अथवा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, कहानीकार ने गहरे रूप से अपनी संबद्धता तथा पक्षधरता को  कथा के माध्यम से स्पष्ट किया है। अत्यंत असहिष्णु दौर में भी सत्ता की चालाकियों को समझे बिना उसके समर्थन में शामिल होने वाले लोगों पर इस कहानी में धारदार व्यंग्य किया गया है। अभिव्यक्ति के संकट का भी मनोज्ञ चित्रण इस कहानी में तीतर के माध्यम से किया गया है। खूबी यह है कि तीतरी बिल्कुल निडर होकर अपनी वाक्-स्वतंत्रता का प्रयोग करती है। भूमंडलीकृत समाज में महामौन साधता है, पढ़ा-लिखा और अपने को बुद्धिजीवी समझने वाला वर्ग। मध्यवर्ग में तो घोर अवसरवादिता आ गई है, पहले भी कम न थी। हालाँकि, यह भी सच है कि वह वर्ग हमेशा ढीला-ढाला रहा है।

 स्वार्थपरता इसका स्वभाव है। सत्यनारायण ने मध्यवर्गीय मानसिकता को भी भली भांति रेखांकित किया है---“ किसी अंबानी अडानी जैसी तोप तो नहीं । किसान मजदूर का बेटा हूँ। पूरा मध्यमवर्गी भी नहीं। रोटी, कपड़ा और मकान के लालच में खुद को पहले ही गिरवी रख चुका हूँ। फिर फँदे में और क्या फँदवाऊँगा। मैं महाराजा से पंगा कैसे लूँ। क्या करूँ! छुटकी को क्या कहूँ। जब इतना सोच विचार कर भी कुछ न सुझा! झूठ-मूठ ही कहा कि रामजी की मौज है। बस यूँ समझूँ कि सोलह मई के बाद तो जैसे राम राज्य ही है।’’

कवि मुक्तिबोध ने पचास वर्ष पहले लिखा था--- “ अभिव्यक्ति के खतरे उठाने ही होंगे’’ लेकिन आज के चापलूस समाज में  अभिव्यक्ति के संकटों का कोई सामना नहीं करना चाहता है। बुद्धिजीवी वर्ग अपनी गोटी बिछाने में व्यस्त है। इस कहानी का नरैटर ‘कन्फ्यूज्ड’ तो है, पर पूरी तरह ‘कन्फ्यूज्ड’ नहीं है। उसे गलत-सही, उचित-अनुचित के बारे में जानकारी है। लेकिन वह खतरे उठाने के पक्ष में नहीं है। एक सरकारी कर्मचारी सुरक्षा को महत्व देता है। अपनी ही सुरक्षा उसकी सबसे बड़ी प्राथमिकता है। ढुल-मुल व्यक्तित्व वाले ऐसे कर्मचारियों की तादाद सर्वाधिक है। कहानीकार की बड़ी चिंता है कि ऐसे बिना रीढ़ की हड्‍डी वाले व्यक्तियों से समाज तथा राष्ट्र का निर्माण भला कैसे संभव है? 

इसी तरह असहिष्णुता, गोमांस भक्षण विवाद आदि विषयों पर भी कहानीकार की साफ दृष्टि नज़र आती है। वह गोमांस भक्षण का समर्थक नहीं है। ‘बीफ पार्टी’ आयोजित करने वालों के पक्ष में भी नहीं है। गोमांस निषेध के बहाने अपनी राजनीतिक स्वार्थ लिप्सा की पूर्ती करने वालों का भी पैरोकार नहीं है। दरअसल, पशु-पक्षी भी जीव होते हैं और मांसभोजियो की संख्या बढ़ती जाए तो कई प्रजातियों के तमाम जीव-जंतु विलुप्त हो सकते हैं। इससे घोर पर्यावरणीय असंतुलन उत्पन्न हो सकता है। अत: इस कहानी का एक पर्यावरणीय पाठ भी किया जा सकता है। पुन: अपने भीतर की संवेदनशीलता का विनाश हो जाए तो घोर अमानवीयता का साम्राज्य स्थापित हो सकता है। कभी यह भी दिन आ सकता है “दो किलो मांस हूण का देना….दो किलो मांस नीग्रो…. मुस्लिम…. हिन्दू’’ कैसा अत्यंत भयानक दिन होगा। सच तो यह है कि पूंजीवादी समय में मनुष्य तथा उसके नाते तथा रिश्तों को प्रॉडक्ट बनाकर छोड़ दिया है। अगर यह स्थिति बनी रही तो अमानवीयता की क्रूर लीलाएँ  छा जाने में कोई देर नहीं।

प्रस्तुत कहानी में रचनाकार की राजनीतिक चेतना अत्यंत परिपक्व प्रतीत होती है। आज की राजनीति सत्ता पाने का एक हथियार भर है। गंदी तथा कलुषित राजनीति  का महाजंगल के चुनाव के माध्यम से जो खाका बताया गया है वह मूल्यहीनता का सूचक है। देश सेवा के नाम पर अपना घर भरनेवाले राजनेताओं की असलियत को बिना लाग लपेट के कथाकार ने पाठकों के समक्ष रखा है---“ जी था तो भौत गरीब माँ का बेटा। पर था महाचतुर भिया। महालफ्फाज। फाँकोडिया। फेंकू। झाँसेबाज। भिया लोग कहते कि उसको जन्म से ही तीतर का बाल था।… वह अपनी चालाकी, ठगी और भाटपन से कुछ छोटे-छोटे कारनामे किया करता। कभी दो जाति-संप्रदाय को भिड़वा देता और खुद साबुत बच निकलता।’’ कथनी और करनी में पीरघाट और मीरघाट की दूरी होती है इन तथाकथित ‘विकास पुरषों’ की।
 खान-पान में भी महाराज की बराबरी कोई नहीं कर पाता—“ ये नया महाराजा तो जैसे ब्रह्मपिशाच हो। जो खाता तो खिचड़ी ही। लेकिन उसे सीझाता है सवा अरब तीतर के खून में।’’ संविधान तथा लोकतंत्र के नाम पर ‘तीतरों’ का शोषण करनेवाले प्रबल आक्रोश में न आते तो भला क्या करते। इसलिए कहानीकार ने ‘तीतर’ के माध्यम से अपना तीव्र विरोध दर्ज कराया है---" लेकिन उस दिन छुटकी के मूड को जाने क्या हुआ था। मेरी न सुनी और न रुकी। और यूँ एक-एक चीज पर रबड़ी टपकाने लगी, मानो बुरी, अप्रासंगिक, मृत चीजों को रबड़ी के नीचे दफ़न कर रही हो। फिर तो घर में मौजूद बाज़ार पर, संविधान पर, हर कानून पर छुटकी रबड़ी टपकाने लगी।’’

दो राष्ट्रों के बीच छिड़े संघर्ष अथवा युद्ध दरअसल दोनों राष्ट्रनायकों की अभीप्सा पूर्ति के उदाहरण हैं। लेकिन आम जनता इसे भी भली-भांति समझती है। दो महाराजाओं को ठग जिस प्रकार बेवकूफ बनाता है उसे आप अमेरिका की अस्त्र-शस्त्र विक्रय नीति के साथ मिलाकर पढ़ें तो निहितार्थ अच्छी तरह समझ में आयेगा। आमजन की इच्छा और आशंका है कि दुनिया के सभी लोग मिल-जुलकर रहें। दोनों राजाओं की आँखें खुल जाती हैं जब तीतरी कहती है—“ क्या हासिल होगा तुम्हें एक-दूसरे का खून बहाकर। धन-दौलत। यह सब तो तुम्हारे पास पहले से ही हैं। दोनों अपने सैनिकों और हथियारों पर जितने रुपये खर्च करते हो वह बंद कर दो। आपस में शांति-संधि कर लो।…दोनो के राज्य में सुख समृद्धि होगी। खुशहाली होगी।’’ 

इस कहानी में छुटकी तीतरी के माध्यम से दलित संदर्भ भी खुल कर प्रकट होता है। सत्ता और सवर्णों के संयुक्त आक्रमण से दलित जीवन असह्य हो उठता है। कहानी में शंभू सिंह किसान की आत्महत्या की घटना भी बहुत कुछ कहती है। लोग इसे तमाशा मानकर खड़े रहते हैं जबकि तीतरी अपनी जान जोखिम में डालकर अपनी संवेदना प्रकट करती है।
‘तीतर फाँद’ पूर्वदीप्ति शैली में लिखी गई एक मार्मिक कहानी है । तीतरी छुटकी के पात्र को इतनी आत्मीयता और संवेदनशीलता के साथ सिरजा गया है कि पाठक इसे लंबें समय तक याद रखेंगे। सत्यनारायण पटेल कथा लिखते नहीं, कहते हैं। अत: स्वाभाविकता मार्मिकता, रोचकता, पठनीयता तथा सरसता इनकी कहानी में स्वत: आ जाती है। एक अद्भुत किस्सागो हैं सत्यनारायण पटेल। मुख्य कथा के साथ प्रासंगिक कथाएँ भी घुली-मिली रहती हैं। किस्सों से किस्से निकालने में भी इन्हें बड़ी सफलता हासिल हुई है।
इस कहानी की सबसे महत्वपूर्ण खूबी है इसकी लोक कथा गूँजा और बाई की कथा के माध्यम से कथाकार ने अतीत, वर्तमान और भविष्य को अंतर्सूत्रों में ग्रथित किया है। इस कहानी में प्रयुक्त लोककथाएँ इतिहास को वर्तमान परिप्रेक्ष्य में जोड़ती हैं। मालवा अंचल की बोली-बानी में कहानी में जबरदस्त चढ़ाव भी आया है। उम्मीद ही नहीं, विश्वास है कि ‘तीतर फाँद’ को पाठक खूब सराहेंगे।
००



अरुण होता 




अरुण होता
वरिष्ठ आलोचक
2 एफ, धर्मतल्ला रोड, कस्बा,
कोलकाता- 700 042

साभार: पर प्रतिपल

Saturday, December 16, 2017

रचना प्रवेश

रचना प्रवेश
जीवनानंद दास की बांग्ला से हिंदी में अनुदित कविताएँ 

अनुवादक : सुशील कुमार झा एवं  समीर वरण नंदी 






परिचय 
जीवनानंद दास
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 जन्म : - 17 फ़रवरी 1899
 निधन :- 22 अक्तूबर 1954
जन्म स्थान:- बारीसाल, पश्चिम बंगाल, भारत
 कुछ प्रमुख कृतियाँ
झरा पालोक (1927), धूसर पाण्डुलिपि (1936), बनलता सेन (1942), महापृथ्वी (1944), सातटि तारारा तिमिर (1948), श्रेष्ठ कविता (1954), रूपसी बांग्ला (1957), बेला अबेला कालबेला (1961)


एक...

कविता :- बनलता सेन 
अनुवादक :-सुशील कुमार झा 
कवि :- जीवनानंद दास

हजारों बर्ष तक भटकता रहा इस धरा के पदचिन्हों पर,
नीरव अन्धकार में ही, सिंहल समुद्र हो या मलय सागर;
वहाँ भी, जहाँ था अशोक और बिम्बसार का धूमिल संसार;
और भी दूर विदर्भ में भी था, छाया था जहाँ धुंधला अन्धकार;
थका हारा क्लांत मैं; और चारों ओर था बिखरा जीवन;
हो मानो समुद्र का फेन;
दो घड़ी की भी शान्ति जिस ने दी, वह थी नाटोर की बनलता सेन!

श्रावस्ती के विश्वश्रुत शिल्प सा उसका मुख,
विदिशा की काली रात के अन्धकार से घने उसके केश;
और भी दूर समुद्र में, जैसे टूटी नावों में दिशाएँ खो चुका नाविक,
अचानक देखे दालचीनी के द्वीपों के बीच हरी पत्तियों का कोई देश;
उसी अन्धकार में देखा था; पूछा था ‘कहाँ थे तुम’ होकर बेचैन,
भटकों को ठौर दिखाती नजरों से तकती नाटोर की बनलता सेन!

दिन के बाद धीरे धीरे ओस की बूँद सी लरजती आती शाम;
डैनों से पोंछती चील गंध धूप की; बुझते हुए सभी रंग और
थमती हुई आवाज़ें;रहती केवल कोरी पाण्डुलिपि सी रात,
और उसमें कुछ भूली-बिसरी कहानियाँ बुनते झिलमिलाते जुगनु;
लौट जातीं सब चिड़ियाँ - सभी नदियाँ - खत्म जीवन का सब लेन देन;
बच जाता है सिर्फ अन्धकार, और सामने बैठी बनलता सेन!

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कविता :-बनलता सेन / 
अनुवाद :-समीर वरण नंदी / 
कवि:-जीवनानंद दास

 जीवनानंद दास » समीर वरण नंदी» बनलता सेन » Script
हज़ारों साल से राह चल रहा हूँ पृथ्वी के पथ पर
सिंहल के समुद्र से रात के अँधेरे में मलय सागर तक
फिरा बहुत मैं बिम्बिसार और अशोक के धूसर जगत में
रहा मैं वहाँ बहुत दूर अँधेरे विदर्भ नगर में
मैं एक क्लान्त प्राण, जिसे घेरे है चारों ओर जीवन सागर का फेन
मुझे दो पल शान्ति जिसने दी वह-नाटोर की बनलता सेन।

केश उसके जाने कब से काली, विदिश की रात
मुख उसका श्रावस्ती का कारु शिल्प-
दूर सागर में टूटी पतवार लिए भटकता नाविक
जैसे देखता है दारचीनी द्वीप के भीतर हरे घास का देश
वैसे ही उसे देखा अन्धकार में, पूछ उठी, ”कहाँ रहे इतने दिन?“
चिड़ियों के नीड़-सी आँख उठाये नाटोर की बनलता सेन।

समस्त दिन शेष होते शिशिर की तरह निःशब्द
आ जाती है संध्या, अपने डैने पर धूप की गन्ध पोंछ लेती है चील
पृथ्वी के सारे रंग बुझ जाने पर पाण्डुलिपि करती आयोजन
तब क़िस्सों में झिलमिलाते हैं जुगनुओं के रंग
पक्षी फिरते घर-सर्वस्व नदी धार-निपटाकर जीवन भर की लेन-देन
रह जाती अँधेरे में मुखाभिमुख सिर्फ़ बनलता सेन।




दो 

कविता :- बिल्ली 
अनुवाद:-  समीर वरण नंदी 
कवि:- जीवनानंद दास

दिन भर, घूम-फिर कर केवल मेरा ही
एक बिल्ली से सामना होता रहता है,
पेड़ की छाँह में, धूप के घेरे में,
बादामी पत्तों के ढेर के पास,
कहीं से मछली के कुछ काँटे लिए
सफे़दी माटी के एक कंकाल-सी
मन मारे मधुमक्खी की तरह मग्न बैठी है,
फिर, कुछ देर बाद गुलमोहर की जड़ पर नख खरोंचती है।

दिन भर सूरज के पीछे-पीछे वह लगी रही
कभी दिख गई
कभी छिप गई।

उसे मैंने हेमन्त की शाम में
जाफ़रानी सूरज की नरम देह पर
सफे़द पंजों से चुमकार कर
खेलते देखा।

फिर अन्धकार को छोटी-छोटी गेंदों की तरह
थपिया-थपिया कर
उसने पृथ्वी के भीतर उछाल दिया।
*


तीन 
कविता :- बीस साल बाद  
अनुवादक:- सुशील कुमार झा 
कवि :-जीवनानंद दास


बीस साल बाद एक बार फिर अगर मिल जाओ तुम?

कम नहीं होते बीस साल,
धुंधली पड़ जाती हैं यादें भी किसी भूली बिसरी सदी की तरह,
और ऐसे में मैदान के पार अगर तुम अचानक ही दिख जाओ?

कार्तिक की एक अलसाई शाम
दूर कहीं लंबी घासों में गुम होती
बलखाती सुरमई नदी के किनारे
पक्षी लौट रहें हों जब घोसलों को
ओस की बूँदों से घास हो रहें हों नर्म
कोई ना हो दूर धान के खेतों में
स्तब्धता सी पसरी हो चारों ओर
चिड़ियों के घोसलों से गिर रहे हों तिनके

और ऐसे में
एक बार
फिर से अगर तुमसे मुलाकात हो जाये?

और दूर मनिया के घर शिशिर की शीत सी झर रही हो रात
अँधेरी गलियों में खुली खिड़कियों से झाँक रही हो कांपते दीये की लौ

हो सकता है
चाँद निकला हो आधी रात को
पेड़ों की झुरमुट के पीछे से
जामुन, कटहल या आम के पत्तों से मुंह छुपाये
या बांस की लहराती टहनियों के बीच लुकाछिपी करते हुए

दूर मैदान में चक्कर काट उतर रहा हो कोई एक उल्लू
बबूलों के काँटों या फिर बरगद के जटाओं से बचता हुआ,

झुके पलकों सा समेट रहा हो पंखों को वही सुनहला चील,
जिसे चुरा ले गया था शिशिर पिछले साल,

कोहरे से धुंधलाती इस रात में
अगर मिल जाओ
अचानक
बीस साल बाद...

कहाँ छुपाऊँगा तुमको?




सौजन्य से साहित्य की बात वाट्स अप समूह ,कुछ चुनिन्दा प्रतिक्रियाएं 

मधु सक्सेना :  बनलता सेन ....जो भी हो ,कवि के मन के नज़दीक ही होगी तभी तो ये कविता रची गई ।

सभी कवितायें एक प्रवाह में चलते हुए अपने अलग वितान से मुखरित होती है । बिल्ली पर कविता  लिखना कठिन लगता है ..प्राश्चित कहानी ही याद आती है पर ये कविता वास्तविक दृश्य उपस्थित करती है ।

बीस साल बाद भी मिलने की अभिलाषा है कवि को ।हमे भी कई चेहरे याद आते है ,काश  कि अचानक वो सामने आ जाएं । सोच कर ही अच्छा लगता है ।
सरल सहज कविताएं ।

उपमा ऋचा :  भूगोल, इतिहास, सभ्यता, संस्कृति, कला, धर्म और भाषा के आधार पर टुकड़ों में बंटी दुनिया में राहत की बात है कि यहां कुछ सेतु हमेशा क़ायम रहे हैं। जो टुकड़ों के बीच एक साझा सड़क बनाकर आवाजाही को बरक़रार रखते हैं। अनुवाद भी एक ऐसा ही पुल है। आज जीवनानंद दास की कविताओं को पढ़ते हुए बार-बार सुशील कुमार झा और समीर वरण नंदी के साथ-साथ द्वितीय सेतु अनीता जी को शुक्रिया कहा क्योंकि यही वह पुल थे जिनके सहारे बंगाल की रोशनाई हमारे इनबॉक्स तक आई।

  बनलता के सामने आते ही बरबस बसंतलता और फागुनलता याद हो आईं। नहीं... ये तीनों सहोदरा नहीं हैं। कम से कम अपने रचयिताओं के आधार पर तो बिलकुल भी नहीं, लेकिन जहां तक बनलता से संवाद हुआ उससे मुझे यही लगा कि जैसे कोई कहानीकार अपनी कहानी में पात्र रचता है। वैसे ही कवि ने भी एक किरदार रचा। एक ऐसा किरदार जो दिक् काल की सीमाओं से उतना ही परे है। जितना कि कल्पनाओं का सीमांत संसार... मूल भाषा में बनलता जितनी अप्रतिम रही होगी, अनुवाद प्रक्रिया में उसका राई रत्ती भी सौंदर्य धूमिल नहीं हुआ। इसके लिए निश्चय ही सुशील कुमार झा साहब साधुवाद के पात्र हैं। समीर जी ने भी जिस शिद्दत के साथ बिल्ली की चपलता को थामा। उससे गुजरते हुए यही लगा कि बीस साल बाद क्या हज़ारों साल बाद तक इन कविताओं में बसी मिट्टी की गंध यूं ही महकती रहेगी...


अपर्णा अनेकवरना "  संस्करण का कवर स्वंय सत्यजीत राय ने स्केच और डिज़ाइन किया है। स्पष्ट है बंगाल बनलता सेन का बेहद स्थानीय परंतु लगभग उतना ही व्यापक असर वाला संस्करण है गुरुदेव टैगोर की एक ग्रामीण श्यामली सुंदरी पर लिखी कविता कृष्णकली आमी तारेई बॉली।
 नाटोर भी वर्तमान बांग्लादेश में है। तो कवि के गृहनगर बॉरीशाल से अधिक दूर नहीं। 😊
मुझे दूसरी कविता बेहतरीन लगी। बिडाल बंगाल के लोक कांशेंसनस का हिस्सा रहा है। जामिनी राय की पेंटिंग हो या किस्से कहानियों का केंद्र, बिल्ली एक लोकप्रिय बिंब है।
नंदी सर का अनुवाद भी कसा हुआ है।
बहुत ही स्नेह, लगाव और ध्यान से नित्य प्रतिदिन देखा हुआ विषय है जिसे सामान्य जन भी देखते होंगे पर कवि की दृष्टि से देखना इस कविता में संभव हुआ
मुझे दूसरी कविता बेहतरीन लगी। बिडाल बंगाल के लोक कांशेंसनस का हिस्सा रहा है। जामिनी राय की पेंटिंग हो या किस्से कहानियों का केंद्र, बिल्ली एक लोकप्रिय बिंब है।


माया मृग :..बहुत अच्छी कविताओं का अच्छा अनुवाद पढ़ने का अवसर मिला।
दोनो अनुवाद बढ़िया हैं। समीर जी के अनुवाद में प्रवाह अधिक है लेकिन आखिरी पंक्तियों के अनुवाद पहले वाले में ज्यादा सहज लगा।
 बनलता सेन एक व्यक्ति से एक मिथ में बदलती नायिका हैं। व्यक्ति की सीमाओं का अतिक्रमण मिथ से ही सम्भव है। जीवनानंद दास की विराट कल्पना के यह सर्वथा अनुकूल है। बिल्ली का बिम्ब भी जीवमात्र का चित्र नहीं उकेरता, उससे आगे जाता है।
बीस साल बाद तो एक कसक है, इसे जिया जा सकता है, कहा नहीं जा सकता।


ब्रज श्रीवास्तव :   जीवनानंद दास की यहां प्रस्तुत पहली कविता में महान कल्पनाएं और उपमाऐं मन को छू रही हैं हम चकित हो चलते हैं कि सौन्दर्य भास की अभिव्यक्ति इस तरह भी की जा सकती है.ऐसी कविताऐं ही कविताओं के प्रति भरोसा और प्रीति जगाती हैं. विदिशा का जिक्र देखकर सुखद एहसास हुआ.यहां की काली रात तक को उपमान के रूप में लिया गया. तो दिन के क्या कहने. कालिदास ने भी यहां की युवतियों का ज़िक्र मेघदूत में किया है.

Wednesday, December 13, 2017

 काफ़िर बिजूका उर्फ़ इब्लीस,सत्यनारायण पटेल के  कहानी संग्रह पर समीक्षा 
रमेश शर्मा 




सत्यनारायण पटेल

कहानी संग्रह-
१- भेम का भेरू मांगता कुल्हाड़ी ईमान,

२- लाल छींट वाली लूगड़ी का सपना

३-काफ़िर बिजूका उर्फ़ इब्लीस

४- तीतर फांद (शीघ्र प्रकाश्य)

उपन्यास-गांव भीतर गांव

पुरस्कार- 
वागीश्वरी सम्मान भोपाल
प्रेमचंद स्मृति कथा सम्मान, बांदा

पता- m-2/199, अयोध्या नगरी
(बाल पब्लिक स्कूल के पास) इन्दौर-452011( म.प्र.)
9826091605
bizooka2009@gmail.com







आदिम और उत्तर आधुनिक समय के मध्य डोलते लोक जीवन का महाआख्यान 


समकालीन हिन्दी कहानी की संरचना, उसके बिषय, कथ्य और शिल्प आधुनिकीकरण की रफ्तार में जिस तेजी से विस्तारित होकर अपनी नई राह पर गतिमान हुए हैं उससे हिन्दी कहानी के पाठकों को लगता रहा है कि अब कहानियों में गाँव,जनपद और लोकजीवन के लिए कोई बहुत स्पेस बचा नहीं रह गया है | पिछले एक दशक में युवा पीढी के कहानीकारों की कहानियों को लेकर जितने भी साहित्यिक पत्रिका के विशेषांक प्रकाशित हुए, उन्हें पढ़ते हुए यह बात बारम्बार लक्षित भी होती रही  है | संभव है देश दुनियां में तेजी से हुए बदलाव इसके कारण हों , पर इस बदलाव के पीछे की कहानियां , कहानी के बिषय बनने से अक्सर वंचित होते रहे हैं  | युवा पीढ़ी ने उत्तर आधुनिकता के रस में डूबे इस संचार क्रांति के युग में आत्मलीन होकर जो देखा और भोगा उसे ही उसकी अच्छाईयों और बुराईयों के साथ अपनी कहानियों का बिषय बना लिया, उनकी कहानियों में एक बृहत्तर ग्रामीण समाज और लोक जीवन का सिरे से इस तरह छूट जाना हिन्दी कहानी आन्दोलन की एक बड़ी घटना की तरह है जिसे हिन्दी कहानी की आलोचना में बहुत तवज्जो नहीं मिली | यह एक तरह से प्रेमचंद , अमरकांत या भीष्म साहनी जैसे कहानीकारों की परम्परा से परे जाने और एक नयी परम्परा विकसित करने की जिद के रूप में भी देखी समझी जा सकती है | आज जबकि ज्यादातर हिन्दी कहानियों में नगर ,महानगर और महानगरों की आधुनिक जीवन शैली से प्राप्त सुविधाएं ,उससे उपजे संघर्ष और जटिलताएं जैसे बिषय अपनी सघनता में समाहित हैं , ऐसे समय में सत्यनारायण पटेल जैसे कुछेक युवा कहानीकारों ने इस बदलाव के पीछे छुपी त्रासद कहानियों को अपनी कहानियों का बिषय बनाकर गाँव ,जनपद और लोक की खुश्बू को एक नये रूप में प्रस्तुत कर उसे बचाने की कोशिश की है | मैंने बहुत पहले कैलाश बनवासी का एक कहानी संग्रह "बाजार में रामधन" पढ़ते हुए लगभग यही बातें महसूस की थीं जो आज सत्यनारायण पटेल का कहानी संग्रह "काफिर बिजूका उर्फ़ इब्लीस" पढ़ते हुए महसूस हो रही है |  सत्यनारायण पटेल की कहानियों में गाँव जनपद और लोकजीवन में हुए त्रासद परिवर्तनों को बहुत सूक्ष्मता से न केवल देखा समझा परखा और महसूस किया गया है बल्कि उसे एक वैश्विक धरातल पर विमर्श हेतु पाठकों के सामने रख पाने में भी वे कामयाब हुए हैं  | कहानी की आदिम परम्पराओं में ,जबकि कहानियाँ एक विशिष्ट संरचना में संगुफित होकर दादी नानी से वाचिक रूप में ही लोगों तक पहुंचती रही हैं , कहानी की उस पारंपारिक संगुफन को आज के इस डिजिटल कहानी के युग में भी सत्यनारायण ज़िंदा रख पाने में अगर सफल हुए हैं तो इस बात का यह प्रमाण है कि कहीं न कहीं उस लोकजीवन को संवेदना के स्तर पर उन्होंने जिया और भोगा भी जरूर   है , यह संवेदना कागजी नहीं है , शायद इसलिए ही उनकी लगभग सारी कहानियाँ उस लोकजीवन के उत्स से आलोकित होकर जब उनके दुःख दर्द को बयाँ करती हैं तो उनमें एक स्वाभाविकता होती है | उनकी कहानियाँ ,लोकजीवन को आदिम और उत्तर आधुनिक युग के मध्य रखकर ऐसे तथ्यात्मक दृश्य गढ़ती हैं कि परिवर्तन की विभीषिका पाठक की भीतरी दुनियां को अंततः सीधे बेधने लग जाती है | यही बात सत्यनारायण को न केवल युवा पीढी के अन्य कथाकारों से अलगाती है , बल्कि आश्वस्त भी करती है कि कथा कहानी में आज भी गाँव बचे हुए हैं और उन्हें बचाने का एक आग्रह भी हिन्दी कहानी की परम्परा में शेष है |
काफिर बिजूका उर्फ़ इब्लीस संग्रह में कुल छः कहानियाँ हैं | संग्रह की पहली ही कहानी "पर पाजेब न भीगे" दो कथाओं को साथ-साथ लिए चलती है | एक कथा जहां नायक जो कि एक बंजारा है और व्यवसायी भी है ,वह नमक इसलिए महंगे दामों में बेचता है क्योंकि शहर से गाँव लाते समय गधे की पीठ पर लदी हुई नमक की बोरी बार-बार नदी में भीग कर आधी गल जाती है | नमक जैसी बुनियादी और जरूरी वस्तु को मुनाफे के तराजू पर तौल कर उसे महँगे दाम पर बेचे जाने को वहां का लोकसमाज कभी स्वीकार नहीं करता , अस्वीकार्यता इस हद तक कि बंजारा को कोई पिता अपनी लडकी ब्याहने को तैयार नहीं | नमक नदी में न भीगे ,उसे महंगे दाम में बेचने की मजबूरी खत्म हो सके, इन समस्याओं का हल खोजती यह कथा एक पुल की संरचना के साथ खत्म होती है|  इस कथा में मनुष्य की बुनियादी जरूरतों की सहज उपलब्धता के लिए मुनाफे से परे जाकर मनुष्य की नैतिकता को बचाए जाने के आग्रह के साथ बंजारा पुल के रूप में जो एक समाधान खोजने की कोशिश हुई है , ऎसी कोशिशें मुनाफे की जमीन पर गहरे जा धंसी आज की सामाजिक और राजनैतिक व्यवस्था  के युग में पूरी तरह विलुप्त हो चुकी हैं | कोशिशों की उसी विलुप्तता पर इस कहानी की पहली कथा एक बड़ा सवाल खड़ा करती है | इसी कहानी में साथ चलने वाली दूसरी कथा प्रेम में इस कदर रची पगी है कि बंजारा अपनी प्रेमिका बंजारन के लिए नदी पर ऐसा बाँध बनवाता है कि बंजारन के शर्त अनुसार बाँध पर उसकी पगथली तो भीगे पर पाजेब भीगने से बची रहें | प्रेम और समर्पण मनुष्यता की न केवल पहली शर्त है बल्कि लोक की सबसे बड़ी ताकत भी है जिसे सत्यनारायण अपनी कथा में चीन्हते हैं | इस कथा का बंजारा बाँध दो दिलों को जोड़ने का एक मानुषिक अनुबंध है | आज हम जिस कार्पोरेट युग में जी रहे हैं ,आज का यह दौर ऐसे मानुषिक अनुबंधों को रौंदते हुए मुनाफे का बाँध खड़ा करने का दौर है जहां गाँव के गाँव डूबकर जमीदोंज हो रहे हैं और मनुष्य की सारी नैतिकता धरी की धरी रह जा रही है |  
इस संग्रह की सबसे अधिक ध्यान खींचने वाली कहानी "न्याय" को पढ़ते हुए मोपासा की एक कहानी  ‘’रस्सी का टुकड़ा" मुझे याद हो आती है ! इस कहानी में एक बूढ़े किसान को मेले की यात्रा करते समय एक रस्सी का टुकड़ा ज़मीन पर पड़ा हुआ मिलता है ! पीठ में अत्यधिक दर्द होने के बावजूद वह उसे उठा लेता है , यह सोचकर कि शायद यह कभी उसके काम आ जाए | उस रस्सी के टुकड़े को उठाते हुए उसका एक पुराना मित्र जो अब उसका शत्रु है देख लेता है ! उसके ठीक दूसरे  दिन  एक अमीर व्यक्ति का रुपयों से भरा बटुआ उसी रास्ते पर कहीं खो जाता है ! अमीर व्यक्ति अपने प्रभाव का बेजा उपयोग करते हुए उस बूढ़े किसान को बुलवाता है , तब किसान को पता चलता है कि वह व्यक्ति जिसने उसे रस्सी उठाते हुए देख लिया था और जो उसको अपमानित होते हुए देखना चाहता था उसी ने इसकी शिकायत की है ! बूढा किसान तरह तरह की बातों से अपने को निर्दोष साबित करने की कोशिश करता है , अपनी जेब से रस्सी का वही टुकड़ा निकाल कर भी दिखाता है , तरह तरह की कसमें खाते हुए अपनी निर्दोषिता व्यक्त करने की कोशिश करता है , पर उसकी सारी कोशिशें बेकार हो जाती हैं और उसे दोषी करार दे दिया जाता है ! यह बात पूरे गाँव में आग की तरह फ़ैल जाती है और लोग उसे उलाहना देने लगते हैं , उसे कोसते हैं ! चोर का ठप्पा उसके माथे पर चस्पा हो जाता है | वह सिद्ध करना चाहता है कि वो निर्दोष है, पर उसकी बात नक्कारखाने में दब जाती है  ! बाद में वो बटुआ किसी अन्य व्यक्ति को सड़क पर पड़ा मिल जाता है और वह उस अमीर आदमी को सौंप देता है फिर भी लोग उस बूढ़े किसान पर विश्वास  नहीं करते ,उसका मजाक उड़ाते हैं , उससे घृणा करते हैं और अंत में इस हादसे से न उबर पाने की वजह से असमय उसकी मृत्यु हो जाती है | कमजोर,शोषित,और अल्पसंख्यक होना भी आज एक अपराध से कम नहीं है,सत्ता और शासक वर्ग के हाथों की कठपुतली बन चुकी न्यायव्यवस्था  इसे अपराध की नजर से देखती है | मोपासा की कहानी में न्याय व्यवस्था की विद्रूपता शासक और शोषित के संदर्भ में जिस तरह दिखाई पड़ती है , अल्पसंख्यक वर्ग के संदर्भ में वही सत्ता और न्यायव्यवस्था की विद्रूपता सत्यनारायण के कहानी संग्रह की "न्याय" कहानी में परिलक्षित होती है | आज जिस तरह एक ख़ास समुदाय के निरपराध युवाओं की धरपकड़ आतंकवाद के नाम पर की जा रही है , और उन मासूम और निरपराध युवाओं के जीवन को नारकीय बनाने में सत्ता , पुलिसिया आतंक के साथ-साथ  समाज की शंकाएं और अविश्वास की धारणाएं खाद पानी का काम कर रही हैं , न्याय कहानी इस अन्याय पर सघन रूप में एक बड़ा सवाल उठाती है |
आज विकास की अवधारणा को महानगरों में चमचमाती सड़कों ,पुल-पुलियों और वहां की चकाचौंध से ही अंतर्संबंधित कर दिया गया है , जबकि गाँव के गाँव आज भी सड़क, पुलिया ,बिजली जैसी बुनियादी आवश्कताओं से वंचित हैं | "घट्टी वाली माई की पुलिया" कहानी में घट्टी वाली माई इस अव्यवस्था के दंश को भोगी हुई वह लोक नायिका है जो बाढ़ के दिनों में नदी पर पुल न होने की वजह से अपने पति, जिसको सांप ने डस लिया है, को इलाज के लिए गाँव के बाहर नहीं ले जा सकती और उसे खो देती है | सत्ता के बहरेपन से उपजी बुनियादी आवश्यकताओं का अभाव लोकजीवन को कई बार त्रासद स्थितियों में पहुंचा देता है , किसी को खो देने जैसी यही त्रासदपूर्ण घटना कई बार घट्टी वाली माई जैसे लोकजीवन के पात्रों के भीतर प्रेम को नये रूप में सृजित कर देती है और यह प्रेम लोकजीवन की अपनी सांगठनिक ताकत बन जाती है जो उनसे खुद ब खुद ऐसा काम करवा लेती है जिसे सत्ता प्रतिष्ठान हमेशा उपेक्षित करते आए हैं | घट्टी वाली माई द्वारा निर्मित पुलिया लोकजीवन की उसी ताकत की मिशाल है जो सत्ता को कई बार आइना दिखाने का काम भी करती है जिसे सत्यनारायण अपनी कहानी में संजीदगी से रच पाने में कामयाब हुए हैं |
लालच मनुष्य की आदिम बुराइयों में सबसे बड़ी बुराई कही जा सकती है | मनुष्य के भीतर लालच  जिस अनुपात में विस्तारित होता है उसी अनुपात में ठग और फरेबी हो जाने की राह में उसके कदमों को गति मिलती है | "ठग" कहानी मनुष्य के ठग और फरेबी होने का महा आख्यान है जहां वह इस हद तक लालची होने लग जाता है कि जमीन ,नदी, नाले, पहाड़ को बेचकर लाभ कमाने का सपना देखने लगता है | कार्पोरेट युगीन सभ्यता में ऐसे ही बड़े-बड़े ठगों को लोकजीवन को विकास का सपना दिखाकर ठगते हुए जिस तरह हम आज देख रहे हैं , उस देखने को यह कहानी गहरे रंगों से भर देती है | मनुष्य की ठगी को परत दर परत दिखाने वाली यह कहानी पाठक को उसी ठगी से बचने को, आगाह भी करती है |
सत्यनारायण की कहानियों में लोककथा के तत्व अपने सघन रूप में विद्यमान हैं  | लोकजीवन में आसपास के नदी, पहाड़, पशु, पक्षी भी शामिल हैं | नृशंस शहरीकरण से उपजे स्त्री-पुरुष की उत्तर आधुनिक समस्याओं को चिका और चिकी पक्षियों के माध्यम से "एक था चिका एक थी चिकी" कहानी में चित्रित किया गया है | कथा नायिका अपनी भगिनी और भतीजे को चिका और चिकी पक्षियों की कहानी सुनाती है और अंत में वह खुद चिकी पक्षी के एक जगह बंधक होकर रह  जाने के दर्द से अपने दर्द को जोडकर महसूस करा पाने में कामयाब हो जाती है | एक जगह बंद कमरे में औरत के बंधक हो जाने की यह व्यथा पाठकों तक बखूबी इसलिए भी संप्रेषित हुई है क्योंकि सत्यनारायण अपनी ठेठ देशज शब्दों और वाचिक शैली के प्रभाव उत्पादक तत्वों का बखूबी स्तेमाल कर पाने में कामयाब हुए हैं | सत्यनारायण मूलतः लोकजीवन के उत्स से उर्जित कथाकार हैं और साम्प्रदायिक समस्याएं लोकजीवन से परे नहीं हैं | कहीं न कहीं यह समस्या समाज को विघटित करती आ रही है | संग्रह की अंतिम कहानी "काफिर बिजूका उर्फ़ इब्लीस" संकीर्ण धार्मिक साम्प्रदायिकता की जमीन पर बुनी गई लम्बी कहानी है ,जहां इस समस्या को देखे जाने के कई आयाम हैं | धर्म की अधकचरी और गलत रूप से व्याख्यायित जानकारियों को स्त्री शोषण में टूल्स की तरह इस्तेमाल करने वाले पढ़े लिखे प्रोफेसर हमजा कुरैशी जैसे चरित्र समाज के लिए कितने खतरनाक हैं एकतरफ उसे इस कहानी में देखा समझा जा सकता है तो प्रेम और साम्प्रदायिक कट्टरता के आदिम संघर्ष में संगसार होती स्त्रियों की व्यथा भी देखी जा सकती है | आम तौर पर बिजूका पशु पक्षियों को डराने वाली एक बेजान संरचना होती है जिससे कोई नहीं डरता पर इस कहानी में फिल्म क्लब के माध्यम से समाज को ग्लोबल ,धार्मिक और साम्प्रदायिक समस्याओं के प्रति सचेत करता हुआ हाड़ मांस का पात्र बिजूका शैतानों के भीतर डर पैदा कर पाने में कामयाब दिखता है जो ध्यातव्य है | धर्म की आड़ में पलकर हट्टे-कट्टे हो रहे  समाज के धार्मिक कठमुल्ले जो अपने को समाज का हितैषी बताने से कहीं नहीं चूकते , वास्तव में समाज के लिए इब्लीस बन जाते हैं और अपनी शैतानियों से हमेशा समाज को नुकसान पहुंचाते हैं | इन धार्मिक शैतानों की चपेट में आकर एक पिता अपनी बेटी के लिए भी कितना क्रूर हो सकता है ,इस बुराई पर भी यह कहानी प्रभावी चोंट करती है ।  सत्यनारायण के भीतर का कहानीकार इन सभी बुराइयों को अपनी इस लम्बी कहानी की सघन बुनावट में परत दर परत उघाड़ता हुआ आगे बढ़ता है और मानवीय प्रेम की पुनर्स्थापना को एक नया स्वर भी देता है | कहानीकार के भीतर मौजूद मानवीय प्रेम और संवेदना की पुनर्स्थापना का यह स्वर कहानी दर कहानी और अधिक मुखर होता हुआ आगे बढता  है । शायद इसलिए भी सत्यनारायण पटेल की इन कहानियों को  अलग से हम पहचान पाते हैं ।









रमेश शर्मा 
92 श्रीकुंज ,बोईरदादर ,रायगढ़, छत्तीसगढ़ 
कहानी संग्रह : काफिर बिजूका उर्फ़ इब्लीस 
कहानीकार : सत्यनारायण पटेल 
प्रकाशक : आधार प्रकाशन पंचकुला हरियाणा



Tuesday, December 12, 2017


ब्रजेश कानूनगो जी की कविताएं 



कविताएं 

अनवरत

पतझर की विदाई के बाद
बसंत का स्वागत
बारिश के बाद बीजों का
हरी बालियों में बदल जाना
अनवरत चलता रहता है चक्र

प्रतीक्षा की थकान से निढाल
पहली किरण के उजास से
मुस्कराने लगता दुखी आदमी।

दिनमान का अंतिम पुत्र
लड़ाई के आखिरी दौर में
जब फड़फड़ाने लगता है
बारह नए दोस्त सलाम कर
नए संघर्ष का ऐलान करते हैं।

शुरुआत और समापन तो
भ्रम है हमारा
एक मुग्ध नाग नाचता है
अपनी पूंछ को मुंह मे दबाए

उस्तादों के महा प्रस्थान के बाद
साजिंदे संभाल लेते हैं सितार
झूमते रहते हैं रसिक 
रवींद्र के जाने के बाद भी
जारी रहता है उनका संगीत

इतना समझ लीजिए
सुर में आया जीवन का कोई अंश
शिकार नही होता समय का

अंतिम की पूंछ पकड़
नव प्रसूत धीरे धीरे
पैरों पर खड़ा होने लगता है।



मन की रेत पर

ये जो निशान बने हैं ताजे
कोई गुजरा है अभी
रेत से होकर

इंद्रधनुष उड़ा मन के आकाश में 
लहरें पीछा करती लपकीं हमारी ओर 
तो दूर तक बनते गए
स्मृतियों के सुंदर फूल

लौटते जल से डब-डबाए
कदमों के निशान
जैसे आंसू खिलखिलाती आँखों में

फिर गीली होने लगी है रेत
निशानों को भरने लगा है मीठा समुद्र।





त्यागपत्र

मेड़ पर खड़ा
बरसों पुराना दोस्त
खुशियों के उत्पादन का साक्षी है

फसल की गन्ध फूटती है उसकी देह से
खेतीहर का पसीना
भिगोता रहा उसके तन को
घर से आई रोटियों की खुशबू से
उसने भी पाई है संतुष्टि
सुख में खूब खिलखिलाईं टहनियाँ
तो पीली हो गईं पत्तियां दुख में 

अचंभित है आज पेड़
कि जीवन में आये कम्प से
इस कदर घबरा जाएगा पुराना साथी
कम होती आवाज धड़कनों की
सुनता रहा रात भर
छाती से लगाए

मुक्त हो जाने की सूचना देती
लहरा रही है दोस्त की निर्जीव देह
त्यागपत्र की तरह
उदास पीपल के कंधे पर।






फाँस
कोई घाव मेरे भीतर
टीसता रहता
तुम्हारे दर्द के साथ साथ

शब्द जो लगा तीर सा
घायल हुआ
कभी तुम्हारा दिल

क्षमा के स्नेह और
पश्चाताप की बूंदों से
उभर आया है आज पुराना कांटा
मिट गई है धंसी फाँस की
सारी पीड़ा।





चीख
आप चाहे जितना कहें कि
कविता बहुत लाउड हो गयी है इन दिनों
पर यह चीखने चिल्लाने का दौर है
चीखना इस समय का प्रमुख स्वर है

एक चीख फ़ैली है हमारे चारों तरफ
जैसे गाँव पर उतर आती है दोपहर की उदासी
जैसे पसरा होता है सागवान के जंगलों में सन्नाटा
संग्रहालयों और स्मारकों के भीतर की शान्ति की तरह
हर कहीं महसूस की जा सकती है चीख की उपस्थिति

अगर सुन सकें तो जरूर सुनें
चौपाल से निकलती गंवई चीख की कमजोर आवाज
सूखे पत्तों को सहलाती हुई
जंगलों से एक चीख भी बहती हुई
चली आती है हमारे कानों तक

खामोश शिल्प और कलाकृतियों को सुनने के लिए
इतिहासकार या किसी पुरावेत्ता की जरूरत नहीं है अब
बंद दरवाजों को भेदते हुई
बाहर तक चली आ रहीं हैं पत्थरों की चीखें   

सड़क पर बेसुध पड़ा अकेला आदमी
एक चीख के बाद खामोशी से चीखता चला जाता है
चलती कार से उड़े दुप्पटे
और खँडहर में बिखरी रेत की आवाज बिलकुल वैसी है
जैसे किसी गर्म तंदूर से निकलती चीख 

चीखते सवालों के जवाब दिए जा रहे हैं
और अधिक जोर से चीखते हुए
यह तय कर पाना बहुत मुश्किल है
कि कौन विजेता है इस चीखने की प्रतियोगिता में
रेफरी तक को निर्णय सुनाना पड़ रहा है लगभग चीखते हुए

चीखने चिल्लाने के कई मंच सजे हैं
कई संस्थाएं खडी हो गईं हैं
जहाँ काबिल उस्ताद और गुणी पंडित
लोगों को इस कला का अभ्यास कराते नजर आते हैं
सबको निपुण बनाने के लक्ष्य में
चीख को सबसे पहले हाथ में लिया गया है शायद

वहाँ कोई चिल्ला रहा है तो कैसा अचरज कि
यहाँ की आवाज में भी नहीं सुनाई दे रहा कोई संगीत
परेशान नहीं होना चाहिए आलोचकों को
कि कविता बहुत चीख रही है इन दिनों.


 ब्रजेश कानूनगो




परिचय

ब्रजेश कानूनगो 
निवास : इंदौर (मध्यप्रदेश)

जन्मतिथि : 25 सितम्बर 1957 देवास म प्र
शिक्षा : हिंदी और रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर (मास्टर डिग्री)
प्रकाशन:  
व्यंग्य संग्रह - पुनः पधारें,व्यंग्य संग्रह-सूत्रों के हवाले से।
कविता पुस्तिका- धूल और धुंएँ के पर्दे में(वसुधा), कविता संग्रह- इस गणराज्य में।
कविता पुस्तिका- चिड़िया का सितार।
कविता संग्रह- - कोहरे में सुबह

छोटी बड़ी कहानियां- 'रिंगटोन' (बोधि)
बाल कथाएं-  ' फूल शुभकामनाओं के।' 
बाल गीत- ' चांद की सेहत'।

संप्रति: सेवानिवृत्त बैंक अधिकारी। साहित्यिक,सांस्कृतिक और सामाजिक गतिविधियों में संलग्न। तंगबस्ती के बच्चों के व्यक्तित्व विकास शिविरों में सक्रिय सहयोग।

संपर्क: 
503,गोयल रीजेंसी,चमेली पार्क,कनाडिया रोड, इंदौर-452018 
मो 9893944294 
ईमेल bskanungo@gmail.com




डॉ. पदमा शर्मा : प्रथम कविता अनवरत में प्रकृति की अनवरत यात्रा का वर्णन है।
बारह नए दोस्त से तात्पर्य मैं बारह घड़ी की सुइयों से लगा रही हूँ।
मन की रेत में स्मृतियों और रेत का भावसाम्य अच्छा लगा।
लौटते जल से डबडबाए कदमों के निशान अच्छी पंक्ति
त्यागपत्र
में किसान की समस्या बहुत सघनता से उपस्थित हुई है।
चीख समसामयिक विषय को प्रतिपादित कर रही है। सही है जिसकी आवाज में दम वही हमदम।
यह चीखने चिल्लाने का दौर है।
ब्रजेश जी की कविताएँ धीरे से अंतस में प्रवेश कर स्थापित हो जाती हैं और सोचने को मजबूर कर देती हैं। अलंकार स्वयं उनके काव्य में समाहित हैं। वर्तमान में जो कविता लिखी जा रही है उसमें अलंकारिकता शून्य हो रही है।

अनीता मंडा :  ब्रजेश सर की कविताएँ पढ़   बहुत सहजता से पाठक पर खुलती हैं और भाव विभोर करती हैं, कुछ मुहावरे नुमा पँक्तियाँ वाह कहलवाये बिना नहीं छोड़ती। सामाजिक समस्याओं पर चिंतन है इनमें लेकिन बोझिल करने की हद तक नहीं है। भाव शिल्प चीजों का सुंदर बेलेंस कविता को यादगार बना रहा है।
मैं कविता पढ़कर आनन्द लेती हूँ, कविता पर लिखने में सहज नहीं हूँ, अतः राई भर लिखे को पहाड़ भर मानने की गुज़ारिश।

ब्रज श्रीवास्तव :  पहली कविता में अनवरत को स्थापित करने के लिये अनूठे बिंब हैं,दर्शन की झलक लिये यह कविता हमें मुतमईन करती है कि हमारे पास अनवरत जीवट है.दूसरी कविता में उच्च काल्पनिकता के साथ कविता की कला नुमांया हुई है.अन्य कविताओं में भी विषय को उचित संदेश के संग गूंथा गया है.
अवसाद और आनंद,गहनता और सहजता एवं शब्द का भव्य और भावार्थ का नव्य ब्रजेश जी की कविता की पहचान है.


 शिल्पा शर्मा : बहुत सुंदर... दिल को छूती और दिलोदिमाग़ पर छाती हुई कविताएं हैं, ब्रजेश कानूनगो जी की। अनवरत में-उस्तादों के महाप्रयाण के बाद, साजिंदे संभाल लेते हैं सितार, झूमते रहते हैं रसिक, रवींद्र के जाने के बाद भी, जारी रहता है उनका संगीत... सृजन की सकारत्मकता से भर देता है मन को। मन की रेत पर- मन को तृप्त करती-सी कविता है। त्यागपत्र- हम सभी के दोस्त, अन्नदाता की त्रासद कहानी बयां कर रही है। घर से आई रोटियों की ख़ुशबू से संतुष्टि पाने के बाद अपने साथी की कम होती धड़कनों को छाती से लगाए सुनने की पीड़ा छलक रही है, इस कविता में। फांस- सच है कि क्षमा, स्नेह और पश्चाताप बड़ी से बड़ी दर्दनाक फांसों की पीड़ा हर सकते हैं, पर अमूमन लोग इनसे दूर रहकर फांसों की पीड़ा का ही जश्न मनाते रहते हैं। काश इस कविता की तरह सरल होता फांसों की पीड़ा से उबरना। चीख-हर कहीं महसूस की जा सकती है चीख की उपस्थिति,  चीखते सवालों के जवाब दिए जा रहे हैं, और  अधिक जोर से चीखते हुए...आज का सच, जस का तस।  अनवरत, त्यागपत्र और चीख कविताएं दिल मे उतर गईं। 


अजय श्रीवास्तव 1- अनवरत - बढ़िया कविता आशावाद जगाती...
2 - मन की रेत पर - अच्छी कविता - भाव को पकड़ने में थोड़ा प्रयास करना पड़ा।
3- त्यागपत्र - अच्छी कविता
4- फ़ांस - वाह ,क्षमा के स्नेह और पश्चाताप की बूंदों से, उभर आया है आज पुराना कांटा,मिट गई है धंसी फांस की , सारी पीड़ा।     उम्दा पंक्तियां , नायब अंदाज ...
5 - चीख - "चीखना इस समय का प्रमुख स्वर है" , " इतिहासकार या किसी पुरावेत्ता ...पत्थरों की चींखें" 
बहुत अच्छे भाव 

सभी कविताओं की शुरुआत बहुत ही प्रभावी है।त्यागपत्र कविता थोड़ी कम प्रभावी लगी।
ब्रजेश जी की कविताओं में जीवन दर्शन ,अनुभव की झलक दिखाई देती है। महज शब्दों का खेल या बिम्ब-प्रतिबिम्ब का आडंबर नही।यही पठनीय ,स्मरणीय बनाता है कविताओं को।


आरती तिवारी : बृजेश सर की कवितायेँ अपने समय के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं,जिनमें कहने से ज़्यादा अनकहा है, हर कविता अपने आप में विशिष्ट और पूर्ण है किंतु मुझे पहली कविता, अनवरत ने अलग से प्रभावित किया, इसमें निहित सन्देश का अर्थ अपनी क्षीण बुद्धि से लगाने के प्रयत्न में मैंने पाया, कि ये  चरैवेति चरैवेति कह रही है, जीवन और समय का चक्र अनवरत चलता रहता है एक के खत्म होने से पहले दूसरा नव पल्लवित प्राण उसे गति देता रहता है।

दिनमान का अंतिम पुत्र
लड़ाई के आखिरी दौर में
जब फड़फड़ाने लगता है
बारह नये दोस्त सलाम कर
नए संघर्ष का ऐलान करते हैं,

ये खत्म होते साल का अंतिम दिन है, जिसे 12 बजते ही एक नया साल रिले के बेटन की तरह थाम आगे बढ़ जाता है, रंगमंच पर अपनी भूमिका
का निर्वाह करने के लिए, ये तो हमारा भ्रम है कि ये ख़त्म हुआ दरअसल वो एक दूसरे नये की शुरुआत होती है।
मुझे ये कविता बहुत अच्छी लगी🏵🏵 सर की कविताओं पर हम क्या कहें हम उनसे सीखते हैं। उन्हें नये संग्रह कोहरे में सुबह की हार्दिक शुभकामनाएं

मधु सक्सेना : बृजेश जी की कविताएं अपने समय पर अपनी उंगलियों से अपनी बात लिख रहे है ।घायल उंगलियों की पहचान तो है पर चीख़ सिर्फ कवि ही सुन पाता है और वही चीख़ फिर शब्दों में बिखर कर पाठक को उद्देलित करती है मानों कोई धीरे से पिन चुभा दे और चिहुंक उठे बहुत से मन ।

बृजेश जी कविता लिखते नही कहते है ।शब्दों का खेल न रचकर  बात करती है कवितायें ।सामने बिठाकर धीरे से कठिन बात भी कर जाती है ।
कुछ कविताये तो इसी समूह में दिए विषय पर है ।
ये समूह लिखवा भी लेता है ।

कविताओं की कोमलता से कवि का स्वभाव भी पता चलता है तभी कह जाते है कवि मिट गई धंसी फांस की सारी पीड़ा।।।।।
कविताओं में कुछ जगह तारतम्य टूटा सा लगता है कुछ और कसावट हो तो कवितायें अपने स्वर को और मुखर करेंगी ।
बधाई बृजेश जी ..
आभार ....
सुधीर देशपांडे :आदरेय ब्रजेशजी की इन कविताओं में से कुछ कविताये लिखो कविता में पढ़ी हुई है। एक समर्थ रचनाकार के लिए किस तरह विषय सहज हो जाते उसका उदाहरण अंतर्मन, त्ययागपत्र फांस


अबीर आनंद :
अनवरत
एक मुग्ध नाग नाचता है 
अपनी पूंछ को मुंह मे दबाए।
प्रकृति के कई इशारो में स्वयं को ऊर्जा देने का आख्यान भी है। आदमी का अपना संघर्ष तो है ही पर कभी-कभी पेङ-पौधों और जानवरों को देखकर लगता है जैसे वे खुद को प्रेरित करने में आदमी से भी आगे हैं। वरना, न कोई संपत्ति, न अतिशय मोह, फिर भली क्यों मयूर भी सावन का मोल समझते हैं। 
मन की रेत पर
मन की रेत, आँसुओं की लहरें और स्मृति के फूल, सरल और सुंदर बिंब है। मीठा समुद्र में फिर एक सकारात्मक अपील है जो पुनः आशावादी सोच को रेखांकित करती है।
त्यागपत्र
शब्दों में एक मितव्ययता है जो आकर्षित करती है। थोङे में बहुत कुछ समेटने का प्रयास है। 'त्यागपत्र' अच्छी कविता है हालांकि शीर्षक कुछ सटीक नहीं लगा।
चीख
समसामयिक माहौल को कविता की अपील खोए बिना व्यंग्यात्मक लहजे में उतारती बहुत सुंदर कविता है। इस संकलन की  पसंदीदा कविता लगी। कई वाक्य गहरे उतर गए।
पर यह चीखने चिल्लाने का दौर है 
एक चीख फ़ैली है हमारे चारों तरफ...  
संग्रहालयों और स्मारकों के भीतर की शान्ति की तरह...
खामोश शिल्प और कलाकृतियों को सुनने के लिए
सड़क पर बेसुध पड़ा अकेला आदमी 
एक चीख के बाद खामोशी से चीखता चला जाता है
चलती कार से उड़े दुप्पटे 
जैसे किसी गर्म तंदूर से निकलती चीख



प्रस्तुत कविताएं और उन पर प्रतीक्रियायें वात्सअप पर साहित्यिक समूह साहित्य की बात पर सुरेन  सिंह द्वारा विमर्श हेतु   लगे गई |




Thursday, November 30, 2017

जब न्याय की तुला अन्याय के बोझ से अस्थिर हो जाती है ,जुल्म और सितम से त्रस्त जनता हाहाकार कर उठती है तब इन्कलाब आता  है और क्रांति की मशाल जलउठती है | |ऐसे समय में कलम भी  क्रांति की सिपहसालार होकर जनपक्ष में अपने शब्दों की समिधा  होम करती है |कुछ ऐसे ही शब्दों का आव्हान है, निर्बलजन और भूमिपुत्र  की पीड़ा की बैचेनी है सुरेन्द्र रघुवंशी के  तीसरा कविता संकलन "पिरामिड में हम "|

इसका विमोचन भोपाल में चल रहे भोपाल जनोत्सव में देश के प्रख्यात हिंदी साहित्यकार असग़र वज़ाहत और विष्णु नागर ने किया। इस अवसर पर समकालीन कविता के प्रमुख कवि बड़ी तादात में मौजूद रहे। विमोचन पूर्व परिचय में प्रमुख चित्रकार , कथाकार और संचालक 'सृजन पक्ष' पत्रिका के निरन्तर संचालन के लिए एवं सोशल मीडिया पर विभिन्न समूहों और फेसबुक के माध्यम से हिन्दी साहित्य के प्रचार प्रसार के लिए सुरेन्द्र रघुवंशी के निरन्तर महत्वपूर्ण अवदान का उल्लेख प्रमुखता से किया गया।




 सुरेन्द्र रघुवंशी की कुछ कवितायें ,मधु सक्सेना की समीक्षा और समकालीन साहित्यकार एवं सुधि पाठकों की प्रतिक्रियाओं के साथ आपके ब्लॉग रचना प्रवेश पर आपके अवलोकनार्थ ....                    

  || व्यवस्था का यह शीर्ष राक्षस ||   

भूसा के भाव बिक रहीं हैं फसलें
मजबूरी की मंडियों में नीलाम हो रहा है स्वाभिमान
हमारे सिर से उतार ली गई है पगड़ी
और पैरों से जूते निकाल लिए गए हैं
नंगे पाँव कंटीले और खाइयों वाले रास्ते पर है हमारी यात्रा

हमारे तलवों  का सीधे कांटों से मुकाबला है
यहां खून सपनों में नहीं बल्कि शरीर से चू रहा है
हमारे हाथ धोखे की रस्सी से बांध दिए गए है
और पैरों में आश्वासन की बेड़ियां हैं

हमारे अधिकारों के सितारे हाथों से छीन
उन्हें आसमान की चादर में टांक कर
जीवन और संसार के सौन्दर्य के गीत गा रहा है राक्षस
चारण झूम झूमकर गा रहे हैं यश गान
उन्हें मिला है अभयदान 

व्यवस्था का यह शीर्ष राक्षस गटक गया 
हमारे हिस्से की कल-कल स्वर से बहती सुन्दर नदियों को
और आजकल वह दे रहा है पानी के महत्व पर प्रवचन
हम ज़िंदा हैं कीचड़ से नमी की तलाश में

हमारे बिकने जा रहे खेत रोज सपनों में आलिंगन करते हैं
और रोते हुए बचने के लिए गुहार लगाते हैं
जैसे दलाल के चंगुल में फंसी औरत बिकने से बचने हेतु
रोती है बेबसी में मुक्त होने की उम्मीद में
कि पसीजेगा दुष्टों का हृदय और वे दया दिखाएंगे
भूलते हुए इस ज़रूरी सत्य को
कि विनती करने से न तो कभी इतिहास बदला है
और न ही बदलेगा वर्तमान...



🔶🔷🔶🔷🔶🔷🔶

 || शक्ति का गर्वोक्त प्रदर्शन ||

संग्रहालय की यह काली सुरंग
घूम फिरकर इतिहास के कलंक तक जाती है

जहां धोया गया है खून से सने इन हथियारों को
वहां खून की एक जमी हुई नदी है
उसमें लहराते हैं सैनिकों के असंख्य हाथ

हड्डियों का पुल है जिस पर चल रहे हैं
सरकारों के सत्ता रथ टप टप टप टप
यह जो शोर सुनाई दे रहा है चारों ओर
जन -जन का हाहाकार है
अनसुना ही रह गया आर्तनाद है अपने बचाव में

यह जो पेड़ हिल रहे हैं
इनके हिलने का कारण हवा बिल्कुल नहीं है
यह अपने भय के भयावह मिश्रण से कांप रहे हैं
हवा में तो पेड़ खुशी से झूम उठते हैं

खून की यह जमी हुई नदी
 पिघलकर बहने लगी है इतिहास से वर्तमान की ओर
जबकि खेतों की सूखती हुई फसलों को
पानी की वेगवती नदियों की ज़रूरत थी

यह कौन दैत्य आ गया हर गाँव के खेत और बगीचे में
जिसने अपने मायाजाल  से
 पेड़ों से सारे मीठे फल उतार लिए
और किसानों को मार-मारकर 
 पेड़ों की डालियों पर उनकी लाशों को लटका दिया

अपने चेहरों को ढके हुए 
ये अंधेरे के कौन पैरोकार हैं 
जो मनुष्यता के आकाश से
सभ्यता और विकास के सूरज को निगल रहे हैं
                                                         
यह शक्ति का महान गर्वोक्त प्रदर्शन है
जहां लोगों को मारने के लिए असंख्य हथियार हैं
और उनको बचाने के लिए उपायों पर
इतिहास से लेकर अब तक 
मौन की एक लम्बी और गहरी खाई है



🔶🔷🔶🔷🔶🔷🔶

 || हिटलरी जूतों की आवाज ||  

 मैं इस अंधेरे समय में
उम्मीदों का एक दीपक ढूंढ रहा हूँ 
दीपावली तो अमीरों के महलों में कैद है

यहां घिसट रही है उदास ज़िन्दगी
उसके चेहरे पर मजबूरी की मक्खियां भिनभिना रही हैं
खेत हार गए हैं अपने कंधों पर बोझा ढो- ढोकर

कर्ज़  और फसलों के लागत मूल्य से भी कम भाव
फांसी के फंदे तक ला रहे हैं धरती पुत्र को
यहां जीने की नहीं मरने की होड़ है
जबकि सरकार मदमस्त हाथी की तरह झूमते हुए 
अपनी अमरता का गौरव गान गाने में मस्त है
वह आजीवन नहीं छोड़ना चाहती  सत्ता की कुर्सी

देश अघोषित शवयात्रा में मौन धारण किए हुए चल रहा है
पर व्यवस्था के प्रतिक्रिया रजिस्टर में 
इसे मातम नहीं बल्कि उत्सव की तरह दर्ज़ किया जा रहा है..

व्यवस्था के गिद्दों और काले कौवों से भर गया है
अपनी प्रकृति में नीला और स्वच्छ रहने वाला आसमान
असंख्य जन चिड़ियाएं धरती पर चुपचाप रेंग रही हैं
क्योंकि काट दिए गए हैं इनके पंख
धरती लहू लुहान कर दी गई है

हवा में डरते-डरते हिलती हैं पेड़ों की शाखाएं
कुल्हाड़ियाँ लिए तमाम हाथ चले आ रहे हैं उनकी ओर
पटाखों के धमाकों की नहीं
बल्कि चलते हुए हिटलरी जूतों की आवाज़ कानों में सन्नाटा भर देती है..



🔶🔷🔶🔷🔶🔷🔶

        || प्रेम ||

उसमे इतना आवेग है
कि अपने प्रवाह पथ में
उसने कभी स्वीकार ही नहीं किया कोई अवरोध
वह कभी अपने तट के भीतर
तो कभी तट के बाहर बहा
हार कर रुक नहीं गई धार
उसकी तरलता में कृत्रिमता का नमक नहीं है

वह यथार्थ के ताप से उपजा है
ज़रूरी नहीं कि सभी देख पाएँ उसे
उसे देखने के लिए वैसी ही नज़र चाहिए जैसा वह है
वह आकाश में आवारा बादलों जैसा है
तो धरती पर पगली-सी बहती फिरती नदी जैसा भी है
पेड़ पौधों में फूलों जैसा है
शरीर में आँखों जैसा है
एक अकथनीय सत्य जैसा वह व्याप्त है हवा में
वह आँखों की तरलता में ध्वनित होता है
तो होंठों के फैलाव में विस्तार पाता है

मैंने उसे कई रूपों में देखा है
ठीक-ठीक कहूँ तो
वह बिल्कुल तुम्हारे जैसा है...



    🔶🔷🔶🔷🔶🔷🔶

         || प्रेम (दो) ||

वह क्या था जो उगा नितान्त बंजर में
जो लू के थपेडों में भी नहीं जला
जो तुम्हें पकड़कर लाया मेरे पास
जो दो अलौह देहों के बीच 
एक रंग विरंगी सशक्त चुम्बक था

जिसमें दुनिया का सबसे सुंदरतम राग छिपा था
जिसे मुस्कान से ऊर्जा मिलती थी
जिसे स्पर्श से मिलती थी खाद
जिसे आंखों के उदगम से निकली खारी नदियों से जीवन की हरियाली मिलती थी...

वह क्या था जो दुनिया के षड्यंत्रों से ऊबकर
द्वीपों के एकान्त में बसना चाहता था
जो बादलों में उड़ता था और फूलों में महकता था

वह आम हवा के साथ नहीं बहा
और उसकी अपनी मौलिक हवा थी
साहस की घटाओं से टकराती हुई
और सौन्दर्य की बरसाती झड़ी को भी झुलाती हुई

वह क्या था और क्या है
जो तुम्हारे और मेरे भीतर बिल्कुल एक जैसा है
वह दुनिया के जन्म के साथ उपजा है
और रहेगा दुनिया के रहने तक



🔶🔷🔶🔷🔶🔷🔶

         || गुफ़ा समय ||

कई बार मुझे लगता है
कि मेरे दुःस्वप्न को नींद से निकालकर
सीधे यथार्थ में बदल दिया गया है

मुझे बलात पटक दिया है सघन जंगल में
जहां हरियाली के महोत्सव के नाम पर 
काटे जा रहे हैं अनगिनित पेड़
पक्षी बेघर होकर आसमान में उड़ रहे हैं
 हाहाकार करते हुए चोंच फाड़-फाड़कर
वे थककर जब नीचे गिर जाते हैं
तो बहेलिए उन्हें उठा ले जाते हैं

भेड़िया शेर की खाल ओढ़कर दरबार लगाए बैठा है
और सारे  सियार  हू -हू  के अंध समर्थन में उत्सव मना रहे हैं

जब यही सच  मैंने बोल दिया सरेआम
तो हू-हू  पंचायत ने मुझे देशद्रोही  करार देकर
उग्र जंगलवाद का नारा बुलंद किया...

इस जंगलराज में इंसानियत नामक  युवती
अपनी लाज बचाने के लिए 
भटकती हुई फिर रही है
और उसके पीछे पड़े हैं खूंखार बलात्कारी

हमारा सामना सदियों पुरानी गुफाओं के अंधेरों से है
जो न तो विज्ञान के सूरज को मानते और न ही खुली हवा को मान्यता देते हैं....



   🔶🔷🔶🔷🔶🔷🔶

|| दीवारों की ऊँचाई की एक सीमा है  ||

मेरे पास तुम्हारी सहमति का अनन्त आकाश है
समर्पण की एक भुरभुरी धरती है
जहां उगती है विश्वास की हरी भरी दूब

दुनिया के यातनागृह के बाहर तुम एक खुला मैदान हो
जहां बन्दी नहीं हैं इच्छाएं
और जीवन का अर्थ विशुद्ध व्यापार , 
लाभ  या खजाना नहीं होता
यहां तराजू पर नहीं तौले जाते रिश्ते और निर्णय

तुम्हारा रंग बहुत मिलता है ऊंचाई पर उड़ते हुए पक्षियों से
तुम्हारे पंखों को अक्सर देखा है जो फड़फड़ाना चाहते  हैं
इन्हीं पंखों को सुरक्षित रखने और काटने  के 
दो पृथक द्वन्दात्मक वर्ग 
हमारी दुनिया की असल पहचान है

पर कितनी भी तलवारों और दीवारों की उपस्थिति
मनुष्यता की प्रतिबद्ध उड़ान को नहीं  रोक सकती

दीवारों की ऊँचाई की एक सीमा है
पर आज़ादी की उड़ान निस्सीम है
मैं तुम्हारे साथ इस उड़ान की अठखेलियों की 
अपेक्षित जुगलबन्दी पर निकल जाना चाहता हूँ....

      🌼 ||| सुरेन्द्र रघुवंशी ||| 🌼

***************
परिचय

 सुरेन्द्र रघुवंशी

🌷🌷🌷🌷🌷🌷


जन्म- 2 अप्रैल सन 1972
गनिहारी , जिला अशोकनगर मध्यप्रदेश में
शिक्षा- हिंदी साहित्य , अंग्रेजी साहित्य और राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर ।
आकाश वाणी और दूरदर्शन से काव्य पाठ
देश की प्रमुख समकालीन साहित्यिक पत्रिकाओं ' समकालीन जनमत' , ' कथाबिम्ब' , ' कथन' , 'अक्षरा' , 'वसुधा' , ' युद्धरत आम आदमी' , 'हंस' , 'गुडिया' , ' वागर्थ', ' साक्षात्कार' , ' अब' , 'कादम्बिनी' , ' दस्तावेज' , ' काव्यम' , ' प्रगतिशील आकल्प' ' सदानीरा' ' समावर्तन ' एवं वेब पत्रिकाओं ' वेबदुनिया' , ' कृत्या' सहित देश की तमाम प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में
कविताएँ , कहानी, आलोचना प्रकाशित ।
मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी द्वारा ' जमीन जितना' काव्य संकलन प्रकाशित

दूसरा काव्य संकलन 'स्त्री में समुद्र'
तीसरा काव्य संकलन ' पिरामिड में हम ' ।' साँच कहै तो मारन धावै ' (डायरी) प्रकाशित
शिक्षक आन्दोलन से गहरा जुडाव
विभिन्न जन आन्दोलनों में सक्रिय भागीदारी
अपने नेतृत्व में मध्य प्रदेश में 11000/- सरकारी शिक्षकों की सर्वोच्च न्यायालय के माध्यम से नियुक्ति ।
मध्य प्रदेश शासन के स्कूल शिक्षा विभाग में शिक्षक के रूप में कार्यरत ।
विभिन्न सामाजिक और मानवीय सरोकारों के विषयों पर विभिन्न मंचों से व्याख्यान ।
कुछ कविताओं का अंग्रेजी और फिलीपीनी टेगालोग भाषा एवं मराठी , गुजराती एवं मलयालम आदि भारतीय भाषाओँ में अनुवाद ।
कविता कोष में कविताएँ शामिल ।
हिंदुस्तान टाइम्स डॉट कॉम और नवभारत क्रॉनिकल का संयुक्त बोल्ट अवार्ड ।
एयर इंडिया का रैंक अवार्ड ।
मानवाधिकार जन निगरानी समिति में रास्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य के रूप में कार्य ।
प्रांतीय अध्यक्ष मध्य प्रदेश राज्य शिक्षक उत्थान संघ
जनवादी लेखक संघ में प्रांतीय संयुक्त सचिव (म. प्र.)
एडमिन/ सम्पादक-
'सृजन पक्ष' -वाट्स एप दैनिक एवं फेसबुक साहित्यिक पत्रिका
'जनवादी लेखक संघ'- फेसबुक साहित्यिक पत्रिका
'जनपक्ष'- फेसबुक साहित्यिक ग्रुप
संपर्क -महात्मा बाड़े के पीछे , टीचर्स कॉलोनी अशोक नगर मध्य प्रदेश, 473331 ।
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समीक्षा ,
मधु सक्सेना 


जब व्यवस्था जनता के हित की ना सोचे ,खुद के विकास पर घ्यान दे ,जब आकाश में क्रूरता के बादल छाए और घरती रक्तरंजित हो जाये ,जब मानवता की
बलि चढ़ाई जाने लगे तो,..... कोई आवाज ,कोई हाथ जरूर उठता है मानवता के पक्ष में । हज़ारों को स्वर देता है ...हज़ार हाथ बन कर परे धकेलता है आतताइयों को।
हिम्मत ,साहस ,हौसला और विवेक को साथ लेकर चल पड़ने वाले कवि के कथनी और करनी में अंतर नही है ।
जितनी कठोरता से ललकारते हैं उतनी हो कोमलता से प्रेम कवितायें लिखते है सुरेंद्र ...
कवि की कविताओं में भाव पक्ष  और कलापक्ष दोनों ही प्रबल हैं। वे यहां बिम्ब , प्रतीक और नवीन उपमानों के साथ उपस्थित हैं ।
 सुरेन्द्र रघुवंशी प्रतिरोध और साहस के हमारे समय के सबसे महत्वपूर्ण क्रांतिकारी कवि हैं। आम जन और गरीब किसान मजदूर के शोषण के ख़िलाफ़ व्यवस्था को गरियाते हुए वे कोई भी परवाह नहीं करते। साहित्य में जुगाडमेंट की राजनीति से दूर सुरेन्द्र रघुवंशी उम्मीद का एक आभामण्डल हैं। सुरेन्द्र रघुवंशी मूलतः धूमिल , पाश , बाबा नागार्जुन और दुष्यन्त कुमार की परम्परा के क्रांतिकारी जन कवि हैं। उन्हें पढ़ना निश्चित ही सुखद होगा।
जनवादीऔर क्रांतिकारी कवि सुरेंद्र रघुवंशी का तीसरा कविता संग्रह ''पिरामिड में हम '" अपनी पूरी ऊर्जा ,साहस ,और उद्देश्य को  लेकर हमारे सामने है ।कलम में आग भरकर लिखी ये कवितायें जितना झुलसाती है उतना ही अपनी गहरी प्रेम कविताओं से मन को सुकून भी दे जाती हैं । असल मे आग और पानी का संतुलन ही जीवन है ।
 मनुष्य को मनुष्य बनाये रखने की जद्दोजहद और ज़िद है कवि के मानस में ।हर विषय को समेट कर उनमे प्राणतत्व फूंक कर बुराई के खिलाफ शंखनाद करती है ये कवितायें । आसपास की विसंगतियों का पुरजोर  विरोध और जनमानस के मन के दुख की पड़ताल करती हैं । सच की धरती से उठी ,निर्भय कवितायें शब्द -शब्द से अलख जगाती है।
  कवि की चिंता में  सत्ता , अन्याय ,जंगल ,नदी ,सागर आग ,प्रेम ,लड़की आदि सब हैं ।इसीलिए ये कवितायें समूचे समाज को बदल डालने और हर व्यक्ति के हक़ में अंगद के पांव की तरह खड़ी है ।
प्रतीक ,विम्ब ,भाषा ,भाव ,लय , सम्प्रेषणीयता आदि के ताने बाने से गुंथी ये कवितायें आज के समय के लिए बहुत ज़रूरी हैं । कुछ उदाहरण देखिये ... 

1 .. जब दुनिया से गायब हो रहा है सत्य 
    कवि तुम विश्वास के बाल पकड़ कर 
    सत्य को चेहरे से झिझोड़कर जगा दोगे ।

2..प्राकृतिक सिद्धांत के बहाने ही सही 
   पर विचार करो सरकार !
पेड़ों पर तो खुशियों के फूलों में 
समृद्धि के फल लगते आये हैं हमेशा से 
पर तुम ये कैसा विनाशकारी मौसम ले आये 
कि इन पर लाशें लटकने लगी ...

3..प्रेम की आवारा हवाएं
किसी मौसम की मोहताज़ नही होती 
इच्छाओं की बदलियां बरसकर मिटा देती हैं 
हृदय के संताप को ....

 इस संग्रह में छियत्तर कवितायें है जो अपनी चमकदार उपस्थिति से पाठक को आंदोलित करती है ...राह सुझाती हैं ,सच की वकालत करती हैं और मानवता के पक्ष में निर्भीकता से खड़ी होती हैं । बधाई सुरेंद्र रधुवंशी जी को इस सार्थक लेखन के लिए ।उनके कलम की ताकत बनी रहे ।युगों तक साथ रहे उनका लेखन ।शुभकामनाएं ।

                           मधु सक्सेना
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उपरोक्त कविताओं पर चुनिंदा टिप्पणियां-

नौकरी के व्यस्ततम क्षणों के चलते समूह में सक्रिय नहीं हो पा रहा हूँ। सुरेंद्र की कविताएँ अभी पढ़ पाया। सुरेंद्र और उनकी कविताओं के बारे में कुछ बातें जो दोहराव हो सकती हैं लेकिन फिर भी दोहराना चाहूँगा। सुरेंद्र रघुवंशी से मेरा परिचय काफी पुराना है। लगभग 15 वर्षों पूर्व उन्होंने अपने पहले कविता-संग्रह ज़मीन जितना की पांडुलिपि मुझे पढ़ने को दी थी इस आग्रह के साथ कि मैं इसका फ्लैप लिखूँ। मैंने सुरेंद्र से कहा कि बेहतर होगा कि किसी वरिष्ठ कवि/आलोचक से लिखवाओ। मैं इस योग्य नहीं हूँ। लेकिन सुरेंद्र ने मानो ज़िद पकड़ ली थी कि नहीं लिखेंगे तो आप ही। मैंने आधे मन से प्रस्ताव स्वीकार कर लिया वह भी इस शर्त के साथ कि यदि मुझे कविताओं में कुछ दिखेगा तो लिख दूँगा। दरअसल सुरेंद्र उस समय लेखन के प्रारंभिक काल में  थे (जो हर कवि का होता है)। उनकी कविताओं को हिंदी साहित्य ने गंभीरता से नहीं लिया था। मैंने भी। छिट-पुट कविताओं से सुरेंद्र का कवि बन नहीं पा रहा था। कई दिनों तक पांडुलिपि यूँ ही पड़ी रही। फिर एक दिन जब मैंने उन्हें पलटना शुरू किया तो कुछ कविताएँ पढ़ कर ठहर  गया। मुझे लगा कि सुरेंद्र हल्के में लिए जाने वाला कवि नहीं है। वे किसी कवि के बनने के दौर की कविताएँ थीं। अपने तमाम काव्याभ्यासों के बावजूद उनमें संवेदनों की महीनता, अपनी ज़मीन से जुड़ाव की व्यग्रता और भाषा का देशजपन था। मैंने तीन बार स्क्रिप्ट पढ़ी और फ्लैप लिखा। खूब मन से लिखा। दरअसल यह इस तथ्य की भी तस्दीक थी कि कुछेक कविताओं से किसी कवि का चित्र साफ नहीं उभरता। जब हम किसी कवि की इकट्ठी कविताएँ एक साथ पढ़ते हैं तभी कवि समझ में आता है। उस पहले संग्रह के लोकार्पण में राजेश जोशी और रामप्रकाश त्रिपाठी अशोकनगर आए थे। राजेश जोशी को फ्लैप इतना पसंद आया कि जोश में कह गए कि मैं अपने अगले संग्रह का फ्लैप निरंजन से लिखवाऊंगा। तो तात्पर्य यह कि सुरेंद्र को पढ़ना मेरे लिए एक प्रीतिकर अनुभव है।  उनके बाद के संग्रहों में कवि का ऊर्ध्वाधर विकास स्पष्टतः परिलक्षित होता है। वे संदर्भों की सीमाओं का अतिक्रमण कर उन्हें नए अर्थों से भर देते हैं। यहाँ मधु जी द्वारा प्रस्तुत कविताओं में भी उनकी राजनीतिक/सामाजिक प्रतिबद्धता साफ देखी जा सकती है। सुरेंद्र की कविताएँ राजनीतिक/आर्थिक दुश्चक्रों के विरोध में उठा एक सार्थक स्वर है। वह मनुष्य के पक्ष में खड़ी कविता है। वे हिटलर के बूटों की आवाज़ से दहलते नहीं बल्कि मनुष्य को उसके खिलाफ एकजुट होने की जिजीविषा से भर देते हैं। आप इन कविताओं के शिल्प, भाषा और संवेदनों में किसी किस्म की सायास प्रविधि या प्रायोजना नहीं पाएँगे। एक साफ नीयत वाले कवि को इस तरह पढ़ना सुकूनदायी है।
               -  निरंजन श्रोत्रिय

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"देश अघोषित शवयात्रा में मौन धारण किए
हुए चल रहा है
पर व्यवस्था के प्रतिक्रिया रजिस्टर में
इसे मातम नहीं बल्कि उत्सव की तरह
दर्ज किया जा रहा है।"

सुरेन्द्र रघुवंशी की कविताएं कवित्व की परवाह किए बगैर रची गई हैं।
इन कविताओं में जो 'अपील' है वह अपना टटकापन इसी कारण अर्जित करती है। वे सत्ता से टकराती हुई सत्ताधारी के कुचक्रों को बेनकाब करती हैं। 
इन कविताओं की जनपक्षधरता पर्देदारी में न रहकर मुखर है, प्रकट है और निर्भ्रांत है।
यह तंद्राकारक कलासर्जना न होकर विचारोत्तेजक शब्द सृजन है।
कबीर का गुस्सा और कबीरी प्रेम दोनों इन रचनाओं में हैं।
पिंजर प्रेम प्रकासिया, अंतर भया उजास।
मुख कस्तूरी महमही, बानी फूटी बास।
       
भारतीय साहित्य में किसानों को लेखन के केन्द्र में लाने वाले पहले कवि को नमन।
उसी परंपरा में सुरेन्द्र रघुवंशी जी को पाकर प्रसन्नता का पारावार नहीं।

ये कबूतर शांति के प्रतीक नहीं, जीवन संघर्ष के रूपक हैं।
इन्हें नैतिक समर्थन देने के लिए सुरेन्द्र रघुवंशी जी इनके बीच में हैं।

- बजरंग बिहारी तिवारी
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सुरेंद्र भाई से मेरा पहला परिचय उनकी कविताओं के रास्ते ही हुआ था , पहली बार एक दूरदर्शन के कार्यक्रम में कुछ साल पहले । मित्रता तो बाद में हुई । उनके जीवन के बारे में जितना जाना , जितनी भी मुलाकातें हुई इस कवि के साथ उतनी  ही निकटता उनकी कविताओं के साथ होती गई । उनके जीवन और सृजन के बीच फांक नहीं दिखती। जैसे ठेठ और  अपनी धरती से जुड़े मनुष्य हैं वे ठीक यही देसीपन और ठेठ अंदाज उनकी कविता में दीखता है । कविता उनके लिए इस चित्र में दिख रही तोप की तरह ही लगती है , यह ज़ुनून हो सकता है पर उनके लिए यही सच है और हमे उनकी इस मासूमियत पर फक्र है और प्यार भी । जैसे दिखो वैसा लिखो , यही उनकी कविता का उत्स है । वे आम मनुष्यता की कविता रचते हैं। उनका रचना संसार धूल धूसरित समय के खिलाफ एक चेतवानी है , अलख भी । वे कलावादी लटको झटकों की ज्यादा परवाह नहीं करते । विचार उनकी कविता की रगों में रक्त बनकर दौड़ता है । अपने समय का हाहाकार , विवशता , आक्रोश सब एक साथ एक राग के रूप में हमारे सामने अभिव्यक्त होता है। अपने निजी जीवन में वे जिस तरह अपनी बस्ती और परिवेश के साथ जुड़े हैं - छात्रों का आंदोलन ही , शिक्षक साथियों की रैली हो , किसानों का आंदोलन हो , वे हर जगह मौजूद रहते हैं , अपनी सक्रियता के साथ । यहीं से वे अपनी कविता के लिए प्राण वायु लेते हैं । कवि को शुभकामनाएं , बस यूँ ही रचते रहो 👍💐

-मणि मोहन मेहता 
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गुफा समय में सुरेंद्र रघुवंशी की कविताएँ
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प्रत्येक कवि सत्ता पर अपनी नज़र रख रहा है। जो नज़र नहीं रखते सत्ता या व्यववस्था पर और लिखे जा रहे हैं उनकी काव्य चेतना पर हमें विचार करना होगा। जो सत्ता-व्यवस्था के व्यवहार के लिए कसीदे काढ़ रहे हैं उनपर विचार नहीं करना होगा। जो मौन हैं और सतत मौन हैं उनका मौन प्रायोजित है। इस प्रायोजित मौन की भयावहता भविष्य में परिलक्षित होनी है। ऐसे मौनियों को प्रणाम।
ये कविताएँ व्यवस्था के प्रति आलोचकीय दृष्टि रखती हैं अतः इनके मुखर होने में ही इनका अभीष्ठ है। 
कई कारणों से खेत, किसान, खेती-किसानी, किसानी सभ्यता आदि ने मुझे अचानक अपनी तरफ खींचा है। कहने की ज़रूरत नहीं कि इस देश में किसानों के साथ क्या हो रहा है! हम होश सम्भालने के बाद ही रटने लगते हैं कि भारत कृषि प्रधान देश हैं। देश की अर्थव्यवस्था का ८०% कृषि से आता है। सच्चाई कुछ और है। जहाँ की अर्थव्यवस्था कृषि पर निर्भर है उसका कॉर्डिनेट प्रति दिन फांसी लगा है। यही व्यवस्था आत्महत्या को मृत्यु का कोई दूसरा कारण सिद्ध कर दे रही है।
जिस देश के किसानों को रीढ़ मानना चाहिए उसे गोली मार दी जा रही है। उसकी पगड़ी उछली जा रही है। उसका आधार छीन लिया जा रहा है। जो किसान आत्महत्या नहीं कर रहे, आंदोलन कर रहे हैं उन्हें गोली मार दी जा रही है। कई राज्यों से आंदोलनों को नेगोशिएट किया जा रहा है। व्यवस्था हर हाल में किसानों के विरुद्ध नीतियां बना रही हैं। 
समूह के कितने साथी कपास-गन्ना उगाने वाले किसानों से जुड़े हैं। जबकि सूती/खादी सबों को चाहिए। चीनी के विरुद्ध गुड़ को हर कोई स्टेबलिश करने पर आमादा हैं।
विगत किसान-हत्याकांड के दिन, मैं सृजनपक्ष में बाद में जुड़ा, देर शाम मैंने व्हाट्सप ग्रुप्स के कई एडमिन को (जो मेरी विचारधारा से नहीं जुड़े हैं उनसे भी) आग्रह किया कि इस कुकृत्य के विरोध में अपने अपने समूह में संवाद कराएं। कुछ ने साफ मना कर दिया कि हमारा समूह साहित्य का है और यह मामला पोलिटिकल है। ऐसे लोगों से पूछा जाना चाहिए कि भाई क्यों लिखते हो, कागज़ क्यों बर्बाद कर रहे हो? लोगों की नज़रों में आने के सैकड़ों तरीक़े हैं, कुछ और करो पर यदि लेखन की तमीज़ न हो तो मत लिखो। 
इसी देश में एक फ़्रॉड हमसे-आपसे एक छोटा सा (बीमार होने का) बहाना बना कर लाखों रुपए उगाह ले रहा है और उसके साथ खड़े लोग तर्क देते हैं कि किस बात की कर्ज़ माफी, एक बैंकर भी जब कर्ज़ नहीं चुका पाता तो बैंक उससे पैसे उगाह लेती है। किसानों के खिलाफ ऐसे तर्कमारों के मुंह पर थूक देने का मन करता है। ये सभी फ़्रॉड हैं, जिन्हें चिह्नित कर साहित्य को एक हद तक गंदा होने से बचाएँ। मैं एक ही बात जानता हूँ, देश उसका जो खेत मे पसीने निचोड़े। जो किसी भी प्रकार से ज़मीन से नहीं जुड़ा उसे लिखने का हक़ नहीं है। 
सुरेंद्र रघुवंशी की कविताओं में वह ताप है जो यथास्थिति को पिघला दे। कविताओं में नाद है पंक्तियाँ देखें –

हड्डियों का पुल है जिस पर चल रहे हैं
सरकारों के सत्ता का रथ टप टप टप टप
यह जो शोर सुनाई दे रहा है चारों ओर
जन जन का हाहाकार है
अनसुना ही रह गया अंतर्नाद है अपने बचाव में

यह नाद किसानों के पक्ष में है अतः इस नाद में एक आवाज़ मेरी भी है। मैं हर उस व्यक्ति के साथ खड़ा हूँ जो खेतों के लिए, फसल के लिए, पेंड के लिए, जंगल के लिए, घास के लिए स्टैंड लेता है। मैं लिखने वाले प्रत्येक लेखक कवि के साथ हूँ जो ग्रास रुट पर लिखते हैं। इसीलिए मैं सुरेंद्र रघुवंशी के साथ खड़ा हूँ। काश के किसान हत्याकांड के दिन मैं सृजनपक्ष में होता, निश्चित ही  किसानों के पक्ष में व्यवस्था के प्रति आलोचकीय होते हुए हम समवेत स्वर में अपनी बात कहते।
समस्या यह है कि यह समय की व्यवस्था हंसोड़ है। रंग बदलने में माहिर। यह समय सिर्फ और सिर्फ उनका है जो व्यवहारिक रूप से पैरासाइट हैं। जिंदा वही रहेंगे जिन्हें संबंधों को चूस कर फेंक देने में सिद्धि प्राप्त हो। हम और आप इस गुफा समय में मिसफिट लोग हैं। मिसफिट लोग भविष्यदर्शी होते हैं। भविष्यदर्शी की कही को जब कोई कान देता है तब बड़ी असहजता होती है। कवि जब प्रायोजित शांति में कंकड़ मारेगा तो जिनने तथाकथिक शांति क्रिएट किया है वे बेचैन होंगे और आपको तड़ीपार करा देंगे (मानसिक ही सही)। गुफा समय का विस्तार इतना हुआ है कि वैज्ञानिक सिद्यांतो के खिलाफ आपके लिए ज़हर का प्याला तैयार है।
इस संक्रमित समय में जबकि कुछ भी अपने मूल स्वभाव में नहीं है, जब एक बड़े रद्दोबदल की ज़रूरत है, जब हर चीज़ पुनर्परिभाषित करने की मांग करती है चाहे संबंध हो या वस्तु; सुरेंद्र रघुवंशी की कविताएँ अनिवार्य कविताएँ हैं। 
शांडिल्य सौरभ
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सुरेन्द्र रघुवंशी समसामयिक विषयों पर गहरी दृष्टि रखने वाले कवि हैं खासकर जन जमीन से जुड़े विषय उन्हें उद्वेलित करते है
 उनकी कविताओं में आक्रोश है व्यवस्था और निज़ाम के ख़िलाफ़ इंकलाब है जो सोए हुए लोगों को जागते रहो कहकर होशियार करता रहता है ।
 आज़ आमजन की खासकर हमारे अन्नदाता किसान की वक़्त दर वक़्त मुसलसल बढ़ती जा रही मुश्किलों और तानाशाही टाइप निज़ाम 

की नीतियों पर उनकी पैनी नज़र है -देखें उनकी मारक पंक्तियां ,
हमारे सिर से उतार ली गई है पगड़ी /और पैरों से जूते निकाल लिए गए हैं ।
हमारे तलवों का सीधे कांटों से मुकाबला है ,,,,,।
इस तरह वे प्रहार करने में सफल हैं।
हड्डियों का पुल है जिस पर चल रहे हैं /सरकारों के सत्ता रथ टप टप टप टप /यह जो शोर सुनाई दे रहा है चारों ओर /जन जन का हाहाकार है ,,,,,।
  एक और रचना में उनका आक्रोश -मैं इस अंधेरे समय में/उम्मीदों का एक दीपक ढूंढ रहा हूं /यहां घिसट रही है उदास ज़िंदगी ,,,,।
आज़ की ज्वलंत समस्या किसान, कर्ज़ ,फांसी ,मंडी में लूट बढ़ती मंहगाई हम सब इससे दो चार हैं।
देश अघोशित शवयात्रा में मौन धारण किए हुए चल रहा है ,,l 
 दो रचनाएं प्रेम पर कवि की कोमल भावनाएं दर्शाती हैं तो सच बयानी और उजागर करने की नीति पर एक अजाना भय भी उसे परेशान करता है ।
 इस जंगलराज में इंसानियत नामक युवती /अपनी लाज बचाने के लिए /भटकती फिर रही है /और उसके पीछे पड़े हैं खूंखार बलात्कारी ,,,,।
 कुल जमा सुरेन्द्र की रचनाओं में सोच का एक वृहद दायरा है । उनकी भाषा सरल संप्रेषणीय है शब्दों में आक्रोश है जो मौन तोड़ने का आव्हान करते हैं । 


          - मुस्तफ़ा खान साहिल
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भाई सुरेन्द्र रघुवंशी की कविताएँ हमारे बुरे समय और हमारे समय के बुरे लोगों पर दूर तक जाकर चोट करने में सक्षम हैं।
            -  शहंशाह आलम
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सुरेन्द्र को हम ऐसा कवि कह सकते है जो खेत की मेड से लेकर संसद भवन के सामने खड़ा होंकर एक ही शिद्दत , हक और जूनून से कविता लिख सकते है। समाज  के आखिरी आदमी की कविता जो किसान से लेकर अध्यापक तक सब हो सकता है।
                -राजनारायण बोहरे
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सुरेंद्र जी की कविता सत्ताधारियों के ख़िलाफ़  निडरता के साथ बुलंद स्वर में अपनी बात कहती हैं। 
 चाहे किसानों पर हुए अत्याचार हों या आज़ादी की उड़ान का आह्वान हो या सत्ता की छुपी कुटिलता से भरी चाल हो ।  सभी का विरोध सुरेंद्र जी की कविताएं अपनी आक्रामक  शैली में  दबंगता से अपनी बात कहती हैं। आज ऐसी ही कविताओं की जन-जन को जरूरत है।
बधाई सुरेंद्र जी।
           - अर्चना मिश्रा
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बहुत बढ़िया कविताएँ हैं आज के परिवेश में प्रसंगिक सशक्त और सार्थक सुरेन्द्र जी निडरता से सत्ता के ख़िलाफ़ लिखते हैं । समाजिक सरोकार  की इन कविताओं की धार बहुत पैनी है । शुभकामनाएँ इसी तरह लिखते रहिए । 💐

-  शाहनाज इमरानी
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"इस जंगल राज में इन्सानियत खूंखार भेड़ियों   से अपनी जान बचाने  के लिए  भटक रही है।"बहुत  अच्छी  रचनाएँ  भाई  रघुवंशी  जी।  रचनाओं की स्थिति पर कुछ काम करें
।
      - रामकिशोर मेहता
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सुरेन्द्र रघुवंशी जी की कविताओं के स्वर  स्पष्ट हैं। वे जनपक्ष में जूझते ' सच के शब्द शिल्पी' हैं।
      
- हिमांशु शेखर झा
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: कविता जीवन का की रवानी के साथ साथ जीवन की सचाइयों को भी वया करती है इसमें कवि की ज़िदा दिली और खूबसूरती के साथ सच को देखने की आखे भी दी ब: सुरेन्द्र जी की कविताओं में एक रवानगी है बेवाकी है और समाज के सारोकरो की गहराई से अभिव्यक्ति।
             -अंजना बक्शी
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कवि मन 
कविता मेरे लिए जीवन, मिशन और आन्दोलन है।जिन्दगी और कविता मेरे लिए दो अलग स्थिति नहीं हैं। मुझे कविता व्यंजनाओं से खेलते हुए कोई चमत्कारपूर्ण, कलात्मक और सायास  काव्य शब्दावली या प्रविधि नहीं है। बल्कि जीवन की यथार्थपरक  धरती पर संघर्ष की सवेग बहती नदी और अपने साथ हुए छल के खिलाफ़ उसका विद्रोह और प्रतिकार ही मेरी कविता है। न यहां चट्टानों की परवाह है और न ही पर्वतों सहित खाइयों की।जिस कृषक समाज में मैंने जन्म लिया है उसका व्यवस्था द्वारा निरन्तर चीर हरण , मर्दन , शोषण और यहां तक कि हत्या झकझोरकर रख देते हैं। उसके हक़ की आवाज को बुलन्द करना  और प्रतिकार में साहस का हथियार उसके हाथ में देना यही मेरी आजीवन कविता है और उसका ध्येय भी जो जन का प्राण है वही प्राण मेरी कविता का भी है और मेरा भी।  

                                   -   सुरेन्द्र रघुवंशी
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 साहित्य सम्मेलन,"साहित्य की बात" 17-18 september 2022 साकिबा  साकीबा रचना धर्मिता का जन मंच है -लीलाधर मंडलोई। यह कहा श्री लीलाधर...

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