Wednesday, November 22, 2017

रचना प्रवेश

रचना प्रवेश
आज हम एक ऐसे विषय पर *दीप्ति कुशवाह* का आलेख पढ़ेगें जिसके बारे में हम अपनी नई पीढ़ी को रत देखते है ,उन्हें टोकते भी है पर शायद उनकी दुनियां को समझने की कोशिश नही करते कि क्यों उन्होंने मनोरंजन के नाम पर अपनी पसंद  हमसे अलग कर ली ,क्यों उन्होंने अपनी नई दुनिया बना ली ।


जी हां मैं बात कर रही हूं *वेब दुनिया की वेब सीरीज* की
क्यों लुभा रही है यह सीरिज उन्हें ,टीवी ,थियेटर मूवी से हट कर वो खो देते है अपने आप को इस वेब दुनिया में | निर्माता का आर्थिक उपायोजन  कितना है |
जानते है  इस् दुनिया के प्रति आकर्षण को और कोशिश करते है युवा मन को समझने की ।उनके आनन्द और मनोरंजन को देखते है एक नई नज़र से ।





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परिचय


नाम : दीप्ति कुशवाह

कृतियाँ : कविता संग्रह – “आशाएँ हैं आयुध”,
        कला पुस्तिका – “मोतियन चौक पुराओ (भारतीय भूमि-भित्ति अलंकरण शैलियों पर)

उपलब्धियाँ :
-    आशाएँ हैं आयुध” को महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी का काव्य श्रेणी का प्रथम पुरस्कार – “संत नामदेव पुरस्कार”  (२०१६)
-    भारत सरकार के संस्कृति विभाग की ओर से लोककला के क्षेत्र में सीनियर फेलोशिप (२०१७-२०१८)
-    हिंदी पत्रकारिता दिवस पर कोलाज प्रदर्शनियाँ तस्वीरें बोलती हैं

कविता- पहल, समावर्तन, प्रगतिशील वसुधा, अहा ज़िन्दगी, ज्ञानोदय, वर्तमान साहित्य, कथाक्रम, नवनीत, सनदवागर्थ जैसी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन
लोककला के क्षेत्र में प्रचुर लेखन और अनेक सम्मान
लोकचित्रकार, एकल प्रदर्शनियाँ आयोजित
दैनिक भास्कर, नागपुर की हिंदी साप्ताहिक परिशिष्ट प्रभारी
संपर्क - पंचायतन, आर. पी. टी. एस. मार्ग, लक्ष्मीनगरनागपुर ()४४०-०२२महाराष्ट्र
मोबाइल  09922822699,      ई मेल 


मुश्किलें ही मुश्किलें हैं राहे-मंजिल में यहाँ, हौसले ही हौसले हैं आज़माने के लिए ...शलभ 

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फिल्में बेकार, वेब से प्यार
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अगर आपसे पूछें कि आपके घर के टीनेजर्स टीवी पर आने वाले, सो कॉल्ड सासबहू सीरियल्स देखते हैं ? यकीनन आपका उत्तर ‘नहीं’ होगा | सही है | भई, आज की पीढ़ी न तो ‘नागिन’ पर रीझेगी न जानबूझकर ‘मक्खी’ निगलेगी | मेंहदी-गरबा, जनम-पुनर्जनम, टेसुआपंती-ड्रामेबाजी...इनके फंदे में कैसे फंसेंगे वे !


कुल मिलाकर टीवी है मम्मियों-आंटियों के लिए...बचाखुचा पापाजी और दादाजी के लिए | इसीलिए, अब युवा खड़े दिखाई दे रहे हैं,  “वेब सीरीज़’’ के साथ | यही है नए जमाने का एंटरटेनमेंट | आपने युवाओं को, कानों पर हैडफोन चढ़ा कर, सिर से सिर चिपकाए या अकेले, मोबाइल, टैब, लैपटाप पर मशगूल देखा होगा | ये फिल्म नहीं, वेब सीरीज़ देख रहे हैं | युवाओं को सिनेमागृहों की दहलीज से खीँच कर, हाथ में थामी हुई छोटी स्क्रीन पर ला खड़ा करने वाले इस हंगामाखेज माध्यम में न मेलोड्रामा है, न मीलों लम्बे एडवरटाइजमेंट, न टीवी के सामने बंधे रहने की कवायद |


वेब सीरीज़, यू-ट्यूब की पापुलर संतानें हैं | स्क्रिप्टेड वीडियोज़ की इन श्रंखलाओं का ट्रेंड अब सिर्फ यू-ट्यूब पर ही नहीं, ट्विटर, इन्स्टाग्राम पर भी छा रहा है | फेसबुक ने भी इनसे प्रेरित होकर लाइव वीडियो की सुविधा एड की है |


जो लुभाता है


अगर एक चीज़ पर ऊँगली रखना चाहें जिसके कारण युवा वेब सीरीज़ की तरफ मुड़े हैं...तो वह है, इसमें बोल्ड कन्टेंट की उपस्थिति | यहाँ सेंसर बोर्ड की छन्नी नहीं जिससे कड़क कन्टेंट अलग कर दिया जाये | भगवा ब्रिगेड के खंजर भी बेकार यहाँ | समझ लीजिए, यहाँ कुछ वर्जित नहीं | अधिकांश वेब सीरीज में नॉनवेज मैटेरियल है, मुँहछूट गालियाँ हैं, खुले-उघड़े दृश्य हैं | जो वास्तविक जीवन में कठिन, वह सब मिल रहा यहाँ | इस मोर्चे पर तो टीवी को मात खाना ही है, और भी अनेक कारक हैं जिनसे वेब सीरीज़ का वज़न बढ़ता है | प्राय: सीरीज़ 5 या 6 एपिसोड्स में खत्म हो जाती है | बहुचर्चित पिचर्स, परमानेंट रूममेट्स, बैंग बाजा बारात,...ये सब ५-६ एपिसोड्स से आगे नहीं गयीं |  अमूमन ये एपिसोड्स 15-20 मिनट के होते हैं | आज यूथ के पास समय की कमी है और महीनों देखने का धीरज भी नहीं | एक क्लासरूम से दूसरे क्लासरूम तक जाते हुए, हैंगआउट्स पर दोस्त की राह देखते हुए या जब मॉल में गर्लफ्रेंड अपनी पसंद की ड्रेस चुन रही होती है...एपिसोड खत्म किया जा सकता है | इनमें मौजूद विज्ञापनों को स्किप या फॉरवर्ड करने के विकल्प भी होते हैं | लीजिए, अंधा क्या चाहे, दो आँखें |


एक एपिसोड के बाद अगला कुछ अंतराल के बाद आता है इसलिए यूज़र बेसब्री से उसका इंतज़ार करता है | इनका कोई तयशुदा समय नहीं | आपकी फुरसत, इनकी स्टार्टिंग है | जब अवसर मिला, जब ऑनलाइन हुए, शुरू कीजिए देखना |


वेब सीरीज की दूसरी बड़ी खासियत है इनके विषय युवा पीढ़ी के जीवन से जुड़ते हैं | इनमें मुच्छड़ बाप नहीं, पूजा करती अम्माँ नहीं |   


वेब सीरीज के पक्ष को और तगड़ा करने वाली बात यह है कि लोगों को अपनी क्रियेटिविटी दिखाने का एक नया प्लेटफार्म मिल गया है | वेब सीरीज़ बनाने के लिए बड़े उपकरणों की ज़रूरत नहीं | सबके हाथ में मोबाइल हैं और उनमें कैमरे | किसी प्रशिक्षण की ज़रूरत नहीं | कोई भी अपने मित्रों को लेकर वेब सीरीज़ निर्माता बन सकता है | इसे यू-ट्यूब पर दिखाने के लिए किसी कागजाती-कार्यवाही को पूरा करने की झंझट नहीं, दफ्तरों में मत्था टेकने की ज़रूरत नहीं, पब्लिसिटी के पापड़ भी यहाँ बेलने नहीं पड़ते | जो कभी नाटक के मंच पर न चढ़ा हो और जिसने कभी माइक को हाथ न लगाया हो वे भी अपनी क्रियेटिविटी को वेब सीरीज़ में माँज सकते हैं | अंतरराष्ट्रीय शोहरत और व्यूअरशिप पाने के लिए यह बढ़िया चैनल साबित हो रहा है |


यूं जुदा फिल्म से


फिल्मों के मामले में कई बार ऐसा होता है आप अपना महत्वपूर्ण काम छोड़ते हैं, महँगी टिकटें खरीदते हैं और यह सोचते हुए वापस लौटते हैं कि फिल्ममेकर मिल जाए तो धुनक के रख दें उसे | यह टेंशन वेब सीरीज़ के दरबार में नहीं है | यहाँ आप कमेंट कर सकते हैं, लाइक-डिसलाइक ज़ाहिर कर सकते हैं, सुझाव दे सकते हैं | इस तरह यूज़र के लिए, कहानी से सीधे कनेक्ट करना हासिल है | यह भी न करना चाहें तो किसी अन्य कहानी के झरोखे भी खुले हैं उसके लिए | सो भी मुफ्त में |  यह इंटरनेट की दुनिया में समाजवाद की स्थापना ही तो है | यहाँ सबसे बड़ी ताकत यूज़र स्वयं है |


खिलाड़ी बड़े-बड़े


शायद आप सोच रहे हैं कि वेबसीरीज़ बस नौसिखियों का रचाया मायाजाल है | नहीं | परिणीति चोपड़ा, कल्कि कोच्लिन, स्वरा भास्कर, कुणाल कपूर, भूमि पेडणेकर, ऋचा चड्ढा, अली फज़ल, करणवीर मेहरा जैसे कलाकार यहाँ एक्टिंग के मैदान में हैं | बालीवुड के नामी डायरेक्टर अनुराग कश्यप ने अपनी बहुप्रशंसित फिल्म “गैंग्स ऑफ वासेपुर’’ को वेब सीरीज़ में ढाला और अब इसके आठ एपिसोड्स विदेशों में भी देखे जा रहे हैं | टेलीविजन क्वीन एकता कपूर, फरहान अख्तर, रितेश सिधवानी और बड़े बैनर यशराज फिल्म ने भी यहाँ अपनी उपस्थिति दर्ज कराने कराई है | रामगोपाल वर्मा जैसा खिलाड़ी यहाँ Guns and Thighs लेकर मौजूद है | टीवीएफ, एआईबी, स्टार इंडिया, सोनी, इरोज़, वायकाम 18 जैसे प्रोडक्शन हाउजेस के लिए भी वेब सीरीज सोने के अंडे देने वाली मुर्गी साबित हो रही हैं |


वेब सीरीज पहले हिंदी में आयीं, अब पूरे देश से प्रादेशिक भाषाओं में भी ये अपलोड हो रही हैं | हिंदी, जैसा कि आप समझ ही सकते हैं वही खिचड़ी भाषा या हिंगलिश है जिसे युवा उपयोग में लाते हैं | टाईटिल अधिकतर अंग्रेजी में ही हैं |                 


वेब सीरीज़ एक उदाहरण है कि तकनीक सामाजिकता को किस तरह प्रभावित करती है | कैसे उसके मनोरंजन माध्यम, पसंद-नापसंद को बदल डालती है | दूसरी बात, भारतीय समाज में एडल्ट कंटेंट्स को लेकर यूँ तो बड़ा टैबू है पर अंदरूनी तौर पर यह सबको लुभाता है |  वेब सीरीज इसी मानसिकता को दुह रही हैं |


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कुछ चर्चित वेब सीरीज़ :


Parmanent Roommates (TVF) : यह कहानी रिलेशनशिप पर है | लिविंग व्यवस्था में रहने वाले दो प्रेमियों की उहापोह की कहानी कि शादी करें, न करें | इसका दूसरा सीजन आया |


Baked (Pech.&Skoop.) की कथावस्तु दिल्ली यूनिवर्सिटी है | तीन दोस्त – एक में खाना बनाने का हुनर, एक जुगाड़ू, एक प्लानिंग में चतुर | इन्हीं विशेषताओं के बल पर अपना स्टार्टअप खड़ा करते हैं | 


Pitchers (TVF):  में चार दोस्त अपने शौक को दिशा देने के लिए अपनी नौकरियाँ छोड़कर, संघर्ष करते हुए खुद की स्टार्टअप कम्पनी शुरू करते हैं | दूसरा सीज़न आ रहा |


Bang Baja Barat ( Y Films) : अलग अलग पृष्ठभूमि से आये दो लोग शादी के लिए अपने परिवारों से मिलते हैं | यह हास्य आधारित कथा है |


Tripling (TVF): तलाकशुदा, हताश और बेरोजगार तीन भाई बहन एक सड़कयात्रा पर निकलते हैं और जीवन और सम्बन्धों को समझते हैं  |


Ladies Room (Y Films): परिस्थितियों से लड़ रहीं दो लड़कियां रेस्ट रूम में बॉस को गाली देने से लेकर अपने सारे अनुभव साझा करती हैं, स्मोक करती हैं | टॉयलेट में शूट हुए हैं एपिसोड्स |


The Other Lovestory (JLT Films): दो समलैंगिक लड़कियों और उनकी दिक्कतों की कहानी |


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भेड़चाल बहुत अपने यहां


*अभय छाबड़ा*


(वेब सीरीज़ Cyber Squad  और देश की पहली वेब फ़िल्म You Me & Ghar के डायरेक्टर , Chinese Bhasad के कोडायरेक्टर )


वेबसीरीज़ का भविष्य क्या है - वेब की इंडस्ट्री में जिस तरह का बूम आया है, उससे लगता तो है कि अभीpositivity बनी रहेगी पर जिस तरहSony, एकता कपूर Balaji Alt, Color वाले Voot या और Star वाले अपना Hot Star लाकर... अपने-अपने एप बना कर सीरीज़ डाल रहे हैं उससे लगता है कि बड़े और बड़े बनेंगे और छोटों के लिए struggleबना रहेगा ।


 In short यह कहूँगा कि हमारे यहाँ भेड़चाल बहुत मचती है इसमें super content ही जमेगा । बाकी का बह जायेगा।


हमारी और विदेशी वेब सीरीज में अंतर क्या है – बहुत से factors हैं पर मुख्य अंतर बजट का है | मैं Amazon, Netflix आदि पर उन्हें देखता हूँ , उनका बजट हमारी फिल्म जितना हो जाता है | हमारे पास बजट कम, सोर्सेस कम तो अच्छे आइडियाज़ पर काम नहीं कर पाते जैसे sciencefiction  या periodfilm करना चाहें तो बजट आड़े आ जाता है |


फिल्ममेकर्स का वेब की तरफ आने का कारण – कुछ स्क्रिप्ट्स पर फिल्म हो नहीं सकती और आप सेंसर आदि के भय के बिना खुलकर कुछ कहना चाहते हो और यूथ में popularity चाहिए तो वेब की तरफ आना ही होता है | और वेब से फिल्मों में जाने के लिए…..आपमें हुनर हो, काबिलियत हो तो फिल्मों से लोग आपको बुलाएँगे और बालीवुड में एक कहावत बहुत चलती है... Youshould be in the right place onthe right time .



धंधा कैसा है ?


समीर नाफड़े( सिने-विशेषज्ञ ) : वेब सीरीज़ के साथ earning का टाईअप तो है ही | वरना क्यों सब उधर भागते ? परन्तु यह फिक्स्ड फार्मूले जैसा नहीं है | generalize करके देखें तो 1000 व्यूज़ पर youtube से एक डॉलर इशू होता है |लगभग 5000 views के बाद दो डॉलर.... | payment के तीन slabs होते हैं | इशू होते ही डॉलर तुरंत आपके अकाउंट में नहीं आ जाता | बहुत सारे नियम आदि हैं | वे एक तय अमाउंट हो चुकने के बाद आपके अकाउंट में ट्रांसफर करते हैं |


संक्षेप में, बहुत कठिन है डगर earning की !


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देवश्री फडनवीस ( आई टी इंजीनियर - रायसोनी कॉलेज)


हमारी भी है तैयारी 
Indian films और टीवी सीरियल्स दोनों महाबोर | वही घिसेपिटे दकियानूसी subjects को ये कब तक रगड़ेंगे, पता नहीं ! मैं और मेरे सारे फ्रेंड्स वेब देखते हैं | हम कुछ फ्रेंड्स भी वेब बनाने वाले हैं | हम लोगों को सुमित व्यास, शांतनु अनम बालीवुड हीरोज़ से अधिक पसंद हैं | कम्पनियों की आपसी रेस के कारण अब हमारे यहाँ इंटरनेट बेहद सस्ता हो गया है, इसलिए वेब सबकी पहुँच में हैं | YouTube, Amazon, Netflix के अलावा, मैं तो डायरेक्ट एप्स इंस्टाल करके रखती हूँ, इससे नये एपिसोड का नोटिफिकेशन तुरंत मिल जाता है |



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Saurabh Shandily: क्या खूब आलेख है। रिच आर्टिकल। अमीर आलेख। *परमानेंट रूममेट्स* तो कइयों को दिखा चुका हूँ। मुझे एक झगड़ालू प्रवृत्ति की मित्र ने कहा था देखने को।




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अनीता मंडा :साइंस, टेक्नोलॉज की प्रगति ने इंसानी जीवन में बड़ा परिवर्तन किया है। इंटरनेट युग ने तो सिनेमा साहित्य पलट कर रख दिया है। ऐसे समय में हमारी नई पीढ़ी क्या कर रही है, किसे पसंद कर रही है, किसे नहीं, आदि जानने के लिए दीप्ति जी का आलेख एकदम सटीक है।
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कोमल समोरवाल :वेब सीरीज डिजिटल जगत की नवीन क्रान्ति है। भारत में युवा वर्ग का ख़ासा प्रतिशत है, युवा केन्द्रित कार्यक्रमों की माँग इस कारण से तीव्र है। सास बहु के डेली शॉप से कुछ अलग आधुनिक समस्याओं पर व अपने समय की मानसिक एवं अन्य उलझनों पर केन्द्रित एक कनेक्टिव प्लेटफोर्म युवा वर्ग चाहता है। वेब सीरीज एक नये आस्वाद में बेहद ही सहूलियत के साथ ये सभी चीजें उपलब्ध करवाती है। दीप्ति जी का ये समसामयिक आलेख लगभग हर आयाम पर प्रकाश डालता है, वेब सीरीज की लोकप्रियता के कारकों से लेकर इसके वर्तमान और दूरगामी प्रभाव पर बिन्दुवार मंथन करता है.. !!

Sunday, October 29, 2017

गीत अपनी लय और अर्थ के साथ जब हमारे जीवन के कथ्य को परिभाषित करता है तो उसके सृजन की सार्थकता प्रमाणित होती है |मनोज जैन मधुर आज ऐसे ही नवगीतों का सृजन कर गीत प्रेमियों को अपनी कलम के जादू से मुग्ध कर रहे है |इनके गीतों पर   आलेख लिखा है  डी यु के प्रोफ़ेसर डॉ सुरेश गौतम ने |इस आलेख को पढ़ते हुए मनोज जैन के गीतों को समझने की सम्यक द्रष्टि प्राप्त होती है |
रचना प्रवेश पर मनोज जैन के गीतों के साथ डॉ सुरेश गौतम को पढ़ते है |


★परिचय★
नाम- मनोज जैन 'मधुर'
जन्म- 25 दिसम्बर 1975
ग्राम- बामौरकलां, शिवपुरी (म.प्र.)
पिता- स्व. श्री मिन्टूलाल जैन
माता- स्व. श्रीमती गजरा बाई जैन
शिक्षा - अंग्रेज़ी साहित्य में स्नातकोत्तर
सम्प्रति - सीगल लैब इंडिया (प्रा.) लि. में एरिया सेल्स मैनेजर
प्रकाशित कृति- एक बूँद हम (गीत संग्रह) 
प्रकाशन - साक्षात्कार, वर्तमान साहित्य, प्रेस मैन, वर्तिका,  उत्तरायण, नए पाठक, साहित्य समीर, हरिगंधा, साहित्य सागर, संकल्प रथ, सार्थक,  अक्षरा,  अक्षर शिल्पी, समय के साखी, मसि कागद,  अछूते संदर्भ, अर्बाबे- क़लम, समावर्तन, नई ग़ज़ल,  वीणा, शिवम् पूर्णा एवं अन्य प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का नियमित प्रकाशन । दूरदर्शन एवं आकाशवाणी से रचनाएँ प्रसारित ।
संकलित- 'धार पर हम-2' (सम्पादक- वीरेन्द्र 'आस्तिक' ) एवं 'नवगीत नई दस्तकें' (सम्पादक- निर्मल शुक्ल) शोध-सन्दर्भ ग्रन्थ में गीत संग्रहीत ।
प्रकाशनाधीन- दो गीत संग्रह तथा पुष्पगिरि खण्डकाव्य  व बालकविताओं का संग्रह ।
सम्मान- (1) मध्य प्रदेश के महामहीम राज्यपाल द्वारा सार्वजनिक नागरिक सम्मान (2009)
(2) शिरढोणकर स्मृति सम्मान (2009)
(3) म. प्र.  लेखक संघ का रामपूजन मलिक नवोदित गीतकार-प्रथम पुरस्कार (2010)
(4) अ.भा. भाषा साहित्य सम्मेलन का साहित्यसेवी सम्मान (2010)
(5) साहित्य सागर का राष्ट्रीय नटवर गीतकार सम्मान (2011)
(6) ₹ 10000/-  का राष्ट्रधर्म गौरव सम्मान (2013)
(7) श्री रामकिशन सिंहल फ़ाउण्डेशन की ओर से गिरिजाशंकर नवगीत सम्मान (2014)
(8) भोपाल में आयोजित राजेश रसगुल्ला स्मृति सम्मान (2015)
(9) निर्दलीय प्रकाशन का राष्ट्रीय छंद विधा अलंकरण (2015)

सम्पर्क - सी. एम.- 13, इन्दिरा कॉलोनी, बाग़ उमराव दूल्हा, भोपाल- 462010 (म. प्र. )
मोबाइल- 0930133780609685563682
ईमेल- manojjainmadhur25@gmail.com

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कर्म -मथानी में

Tuesday, October 24, 2017

आज कवितायेँ छंद से मुक्त होकर एक अनंत आकाश में फेली हुई है |मुक्त छंद कविताओं की खूबसूरती उनके कथ्य में प्रयुक्त बिम्ब और भाषा का शिल्प होता है |अपर्णा अनेकवर्णा की कवितायें मौलिक बिम्बों से सजी ,सहजता से पाठक मन में सम्प्रेषित होती है |अनेक रंगों से रंगी कवितायें प्रस्तुत है रचना प्रवेश पर ,जिन्हें साहित्य की बात वाट्सअप समूह में प्रस्तुत किया है सुरेन सिंह ने |पाठको की त्वरित प्रतिक्रियाएं भी सलग्न है


*कवि परिचय *

नाम: अपर्णा श्रीवास्तव भगत
कविनाम: अनेकवर्णा
पिता: डॉ अशोक कुमार श्रीवास्तव
माता: श्रीमती चित्रा श्रीवास्तव
पति: श्री नीलेश भगत
पुत्री: रेवा भगत
जन्मस्थान: पटना
गृहनगर: गोरखपुर
शिक्षा: अंग्रेज़ी साहित्य में एम ए
निवास: नई दिल्ली
विशेष: पाँच वर्षों तक इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मिडिया में कार्यरत रही। 
लेखन: चार वर्षों से कविताएं और एक कहानी लिखी है। कुछ विभिन्न साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं, ब्लागों में प्रकाशित हुई हैं। कविता कोश में कविताएं हैं।





*अपर्णा अनेकवर्णा* की कविताएं ।

कविताओं का स्वर मद्धम सा है और पाठकीय पुनर्पाठ में यह स्वर आसानी से आत्मसात होने वाला है । कवि अपनी कविताओं को पिरोता है यहाँ आत्मीय धागे से और पाठक भी उस आत्मीयता को महसूस करता है । पाठक से मानसिक जिम्नास्ट कराने की कवि की मंशा नही लगती जैसा की आधुनिक कई कवियों की कविताओं में प्रतीत होती है । हाँ ,पाठक को इन कविताओं तक आना जरूर होगा ।

कवि अपने कहन को काव्य में ढालने के लिए जिन बिम्बो का उपयोग करता है वह सब आसपास के तो दृष्टिगत होते है परंतु अपने निहितार्थों में गझिन है । इस गहनता तक ही पाठक को आना होगा कविताओं को खोलने के क्रम में ।


कवि अपनी कविताई में  नए आयामो को पुरानो के साथ लगातार संश्लेषण की प्रक्रिया में संलग्न प्रतीत होता है इसलिए काव्य में अभी विश्लेषणात्मक तत्व नही आया है । यह एक कमी जैसा नही बल्कि क्रमिक या उत्तरोत्तर विकास को दर्शाते हुए काव्य में कुछ ऐसा स्थान पा जाने की छटपटाहट को इंगित करता है जहाँ से वह देख सके चीज़ों को इतनी दूर से कि स्पष्टता और आत्मीयता के साथ साथ एक अभीष्ट दूरी भी अनुरक्षित हो सके ।


इसके अतिरिक्त  काव्य के संरचनात्मक स्तर पर कवि अपने कौशल से ,शैली से ,बिंम्ब विधान से के साथ साथ अपने एनरिच एस्थेटिक सेन्स  से पाठक को आकृष्ट करने में कामयाब प्रतीत होता है ।

  -- सुरेन


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मैंने तुम्हें आज भी उस रसिक भीड़ में बहुत ढूंढा
कितने ही तो थे वहाँ
मुहावरे जैसा ही 'खचाखच' भरा था सभागार
पर तुम कहाँ थीं
तुम एक बार फ़िर कहीं नहीं थीं

चैता उत्सव में
संग साजिंदे, जगाती बंदिशें
गाती थीं गायत्री देवी, पद्मश्री!
एक श्वेत आभा मंडल 'जगमग'
सुर-स्वर की धूप-छांह  
मैं डूबता आनंद भाव में ज्यों
चौंक उपरा जाता त्यों
कहाँ थीं तुम
तुम आज फ़िर वहाँ नहीं थीं

बोली भी तुम्हारी थी
ठिठोली भी तो तुम्हारी ही थी
राग बसंत का कंपन था
और थी कहरवा की थपकियाँ
शब्द भाव बिंब तुम्हारी बातों से ही छन आए थे
समूचा पूरब आ बसा था उस बीच वहाँ
बस तुम हो
कि वहाँ थीं ही नहीं

राजधानी के सरज़मीं पर
तनते हैं चंदोबे
सितार, हारमोनियम, सारंगी, तबला साधते हैं तान
गायक कर ऋतु-स्वागत गान
बींध देते हैं मन प्रान

मैं बींधा हुआ सहसा
सम्मोहन के चिटकने के स्वर
समेटता हूँ
भरी सभा में उचट जाता हूँ
सोचता हूँ तुम गूंथ रही होगी मन
बेल रही होगी स्वप्न
सेंक रही होगी जीवन
और हौले हौले गुनगुना रही होगी
'एही ठंइयां झुलनी हेरानी हो रामा.. कहवां मैं ढूंढूं?'

मैं चाहता था
मैं चाहता हूँ
रेशमो-अतलसो-कमख़ाब में लिपटी
जूड़े में मोतिए का घना गजरा बाँधे
कलाईयों में इत्र की नफ़ीस लहक संभाले
तुम बस एक शाम आ जाओ
इस जश्ने मौसम में
भूल जाओ संसार की सारी अनबनी रोटियाँ
ढुलका आओ मसाले सालन सब्ज़ियाँ
सुर-स्वर-ताल की थाम सारी वल्गाएं
कर लो वो सारी यात्राएं जिन्हें तुमने अब तक सिर्फ़ स्थगित ही किया है
और मैं जब भी तुम्हें ढूंढू
उसी सभागार के एक कोने में गुम पाऊँ






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आलता लाल एक जोड़ी घिसे पाँव
निकल पड़े हैं आदिम दिशा को
कर आई विदा जिन्हें बस कल ही
वो पलटे नहीं न ठिठके
न ही बदली दिशा अपनी

पुकारता रहा आकाश
बरसता रहा जल
खूब धधकी अग्नि
चंदन पहने डोलती रही पवन
धरती ने फिर किया वहन
एक और वियोग का भार
अपने आदिम धैर्य से

संकोच ने रुंधन को जड़ दिया था ग्रंथियों में ही
दुबकी रही वह
महानगर की थमी विथिकाओं से उभरी संवेदना
जुटी और फिर वहीं लौट गईं
असहाय सी एक दूसरे से आँखें चुराए

लौटती मेरी देह से झूलता रहा
चिरायंध
चटकता रहा कानों में बंधनों का खुलते जाना
मन में बिखरा रहा कुछ देर शमशान-वैराग्य
फिर कपूर सा उड़ गया
बस एक चिन्ह से स्मृति में रुके हुए हैं
आलता से लाल एक जोड़ी घिसे पाँव




*उमस*
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फ़्रीडा की चिर रोगशय्या और फीतों वाली कसी पोशाक के बीच कहीं से
उसके पकते-सूखते घावों और आइने से चित्रों के रास्ते
वर्षावनों के किसी प्रौढ़ बारहसिंगे सी
ठिठक ठिठक कर बढ़ती आती है उमस

मीज़ो बांसवनों के उष्णकटिबंधीयता में उभरती
बज उठती है रह-रहकर झींगुर की तमाम पीढ़ीयों में
उनके गुणसूत्रों में पिरोई कड़ियाँ बनकर

हुगली-जल पर बहती, डूबती, उतराती
उमड़ आती है घाट की सीढ़ियों पर
कालीपद के जवा पुष्प सरका कर, तनिक सुस्ताती है
दर्शन को आई नववधु का सिंदूर
पसीजकर नाक की नोक तक जा बहता है
सबसे लाल जवापुष्प वही है

भाप के नख से कुरेदती है
लाल माटी, संथाल वनान्तर की
पुचकार पुकारती है बीज में सोए शिशु वनों को
हंड़िया, महुआ, सघा-साकवा, बांसुरी, मांदर के तिलिस्म के बीच
हुलसती है ममत्व से, छलक जाती है

हमने भी तो बालों में, सीने पर और कान के पीछे
पहन लिया है उसे गहनों की तरह
उमस हमारी साधी हुई दूरीयों में रेंगती है
व्यक्त होने की कगार से लौट-लौट
सर पटक कर केश बिखराए
हारी-थकी, बीच में आ पसरती है




*श्रद्धांजलि में दो मिनट का मौन*
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जो मारता है, वो कौन है
जो मारे गए, वो कौन थे
जो बचा न सके, वो कौन रहे
जो सियासत करेंगे, वो कौन हैं
और आज के संदर्भ में सबसे प्रासंगिक
जो प्रतिक्रियाएँ दे रहे, वो कौन हैं
इन सबसे हटकर वो कौन हैं जो मौन हैं
इन बिंदुओं पर सोचने की जगह हम सिर्फ़ नाराज़ हैं
ये फ़लसफ़ा नहीं क्रूर सच्चाई है
कितना आक्रोश भरा है कि हम वही करते हैं हर बार
एक प्रतिनिधि युद्ध लड़ते हैं
अपनी रोज़मर्रा के निजी पराजयों के विरुद्ध मात्र
बस जीतने भर की तृप्ति के लिए
अपनी जेबों से लेबल निकाल
हर दूसरे का माथा खोजते हैं
बहस/संवाद सुने बिना होते हैं
इस सार्वजनिक मंच पर जहाँ हम उतने ही निजी स्पेस में भी हैं
अपने अपने क्रोध से लैस
हम सिर्फ़ कहने बैठते हैं
ये भी आतंकवाद ही है
अरे साहब! या तो अपने स्तर वालों से भिड़ें
नहीं तो सामने वाले की समझ देख कर ही कुछ कहें
अपनी अपनी कहकर अपने अपने अहं को सहलाने वाले
हम सबके सब भी आतंकवादी हैं
और ये कोई कविता नहीं है


➖ *अपर्णा अनेकवर्णा*
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अपर्णा जी अपनी कविताओं में अपने अंदर की झुरझुरी को या यूँ कहें अपनी सोच को बृहद कैनवास में परिवर्तित करने की फिराक में
नये प्रयोगों से अवतरित होना चाहती हैं,और इसके लिए प्रयासरत रहती हैं.
कविताई के फार्मेट या समकालीन कविताओं की होड़ से अलग हट कर कुछ नया करना चाहती है, यही कारण है कि इनकी कविताओं की भाषा, बिंम्ब और प्रतीक गहन अर्थों से लिपटे हुए होते हैं. यही कारण है कि अपर्णा जी की कविताओं को पढ़ते समय बिलकुल अलग और गहरी सोच साधना पड़ता है.
आज जब कविता मन के भीतर उपजे भाव को व्यक्त करने का सहज,सरल और आम साधन हो गयी है तो कविता के भीतर कविता रचा जाना सार्थक लगता है,
अपर्णा जी की कविताएं कविता के भीतर की कविताएं है. इन्हें पूरे मनोयोग से पढ़ने के बाद ही समझ जा सकता है. मानता हूं इनकी कविताओं में गूढ़ अर्थों का समावेश हित है पर इन्हीं गूढ़ अर्थों में जीवन मूल्य का सार होता है.
आज की कविताएं इसका प्रमाण हैं.
ज्योति खरे 
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अपर्णा दी की कविताएं पाठक से बेहद अनुशासनात्मक पाठ की माँग करती है।

ये वो कविताएँ नहीं जो मन बहलाने के लिए पढी जाएँ, ये पहली पंक्ति में ही पाठक को आगाह करती दिखती हैं कि इन कविताओं को पढ़ने आप तभी आयें जब आप एक जहीन बुद्धिजीविता को ग्राह्य करें और यदि न कर सकें तो कम से कम उसे समझने या उस तक पहुँचने का प्रभामंडल साथ लिए हो..

पहली कविता में अंत तक एक omnipresent voidness नजर आती है..
कविता का नरेटर उसी खालीपन को भरने की कवायद में लगा नजर आता है जो वह अंतत: शून्यता में ही रखना पसंद करता है..
इस रिक्तता को भरने की यात्रा में वो प्राप्य से अधिक यात्रा का होकर रह जाता है..

दूसरी कविता में एक गहरी वेदना है वियोग की जो अपूर्णीय है.. किसी युवा स्त्री के दाहसंस्कार का ये दृश्य मन को अंदर तक व्यथित कर जाता है.. दृश्य की संवदेनाशीलता ही अत्यधिक है, उस पर इतनी मार्मिक पंक्तियाँ, बेजोड़ प्रभाव दिखाती हैं:

*लौटती मेरी देह से झूलता रहा*
*चिरायंध*
*चटकता रहा कानों में बंधनों का *खुलते जाना*
*मन में बिखरा रहा कुछ देर* *शमशान वैराग्य*
*फिर कपूर सा उड़ गया..*

तीसरी कविता बिम्ब प्रधान है और ये बिम्ब फ्रीडा के बनाये  चित्रों के जान पड़ते है..

कवियत्री कला प्रेमिका है और उनकी कला के प्रति गहरी समझ इस बात से परिलक्षित होती है कि एक कला को (चित्र) दूसरी कला(कविता) में इतनी खूबसूरती से अभिव्यक्त करती हैं.

चौथी कविता का फलक बेहद ही विस्तृत है.. पाठक को दो क्षण रूकने और अपनी बात पर मंथन करने को विवश करती कविता है..

चाहकर भी कोई विवेकशील पाठक इस कविता को बगैर सुने आगे नहीं बढ़ सकता, सहमति असहमति अलग मसला है किन्तु इसका स्वर अवश्य पहुँचता है..
जैसा कि ये कविता स्वयं कहती है,

*और ये कविता नहीं है*
यकीनन ये क्रूर सच्चाई है..

अपर्णा जी भावनाओं की कवि है, सार्वभौमिकता की कवि हैं और बन्धनों से मुक्त एक विशिष्ट कवि है..

कोमल सोमरवाल
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कविता के अंदर कविता है । वहां तक पहुंचना होता है ।

अपर्णा की कविताएं अपने पास बैठाकर सहजता से अपनी बात कहती है ।पाठक को उनके पास जाने की थोड़ी मेहनत करनी होगी ।

ये कवितायें  धीमे स्वर में अपने दुख बताती है ।न रुदन ,न चीत्कार.... बस हाथ थामती है और ये स्पर्श ही सब कह जाता है ।अनिता ने कहा मिश्री की डली ....सचमुच मिश्री की डली  है ....। धीरे धीरे मन मे घुलती है ।

गीता के पाठ की तरह है ।अपने को साथ लेकर महसूस करते हुए रास्ता तय करना होगा ..तब पता चलेगा कि इस घुमाव में  अपना बिछुड़ा कोई मिल गया ।
दुख है तो सहने की शक्ति भी है ।
गायत्री देवी ..न होने पर भी हैं ।
स्मृतियां होने और न होने के बीच की कड़ी है ।

आलता लगे पांव ....ये किसी करीबी का ही बिछोह है अपर्णा का  .." धरती ने फिर किया वहन
एक और वियोग का भार "  मन  रो उठता है ...पर श्मशान की सच्चाई कितनी देर ठहर पाती ।

उमस कविता में फ्रीडा का अर्थ समझ नही आया ।ये उपन्यास की  नायिका है क्या ..ये संथालियों की कोई  देवी ।

अंतिम कविता में बढ़िया तंज है ।

कबीर याद आ गए ....**जिन खोजा तिन पाइयाँ**
ऐसी ही है ये कवितायें ।
मधु सक्सेना 
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अपर्णा जी की कविताएँ जब भी पढ़ती हूँ ज़ेहन को खासी मशक़्क़त करनी पड़ती है समझने के लिए लेकिन कविताओं में छुपे गूढ़ रहस्यों तक पहुँच कर बहुत सुकून मिलता है कि कुछ अलग मिला पढ़ने को।उम्दा सोच से उपजी कविताएँ उनकी सख्सियत की परिचायक होती हैं। कविताओं में लिए गए बिम्ब बिलकुल अनोखे होते हैं जैसे ... प्रौढ़ बारहसिंगे सा ठिठक जाना,आलता से लाल एक जोड़ी घिसे पाँव। आज की सभी कविताएँ बेहतरीन हैं ।

गज़ाला तबस्सुम 
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अपर्णा दी कि कविताओं पर कुछ कहने से पूर्व आपके लिए दो शब्द कहना चाहूँगी। जितना मैंने जाना है सरलता सादगी और बौद्धिकता अपर्णा दी के कवि हृदय के विशेष गुण रहे हैं। जिनका आस्वाद कई बार चखा है।
आप मेरी चुनिंदा प्रिय कवियों में से एक हैं।
जिस तरह सरल शब्दों में गहन बात आपने रखी है उनसे कवि होने का लक्ष्य साधती हैं। अपनी कविताओं के पैनेपन से पाठक को चिंतन को विवश कर देती हैं।

*मैंने तुम्हें  आज भी उस रसिक भीड़ में  बहुत  ढूंढा*
अलग मिज़ाज की इस कविता में एक स्त्री जो अपने आप में सोलह कलाओं की स्वामिनी होती है। वह कभी किसी और कभी किसी बाधा में उलझी अपनी हर कला को आगे आने वाली हर परिस्थिति में ढालकर निढाल लेती है सगरा जीवन और जीवन के पथ पर अपनी ही गति को रोकते बढ़ाते चलती जाती है। शायद कभी किसी कला में से कोई नाद उभरे और जिन्दा कर दे वो रंग जो खो गए हैं कहीं ज़िन्दगी जीते जाने की जद्दोजहद में।
कविताएं बगैर लाउड हुए अपनी बात कहने में सक्षम हैं।
शिखा तिवारी 
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मन/कल्पनाओं/सुनहरी स्वप्नों की किताब खोलती पहली कविता!! विशिष्ट अवसरों पर मन व स्मृतियों के आँगन में किसी की कमी से अनायास उभरे मनोभावों  का बेहतरीन चित्रण!!!
अंतिम कविता में "और ये कोई कविता नहीं है" पंक्ति के अभिनव समावेश के विषय में कुछ भी कहना नाकाफी ही होगा। या कहिये कि कविता में निम्नलिखित  पंक्ति और बढ़ाने की गुंजाइश पैदा करने जैसा होगा कि -
"अगरचे कोई तुम्हे धिक्कारे भी     तुम्हारी इस नपुसंकता के लिए
तुम बस उसे एक कविता ही समझोगें
और वाह-वाह करने की रश्म अदायगी से
ढाँपने का प्रयत्न करोगे
अपनी कापुरुता को
भारत सिंह यादव
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अपर्णा जी की कविताएं अलग कहन की हैं। पाठक  शब्द दर शब्द  गहन वन में बारहसिंगा जैसा ठहरता है ।सूंघता मैं शब्द/बिम्ब के अर्थ।पहली कविता में व्याप्त व्यापक सूनापन बहुत स्पष्ट उभरा है।
शेष कविताएं समय मांगती पुनर्पाठ का।
श्रद्दांजलि  में दो मिनट का मौन आक्रोश व्यक्त तंज की अच्छी अभिव्यक्ति।
राजेन्द्र श्रीवास्तव
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अपर्णा की सबसे गज्जब बात है कि वो एक कठिन कवि है पर हमसबके लिए बेहद सहज सरल है। उसके कैनवस का विस्तार इतना बड़ा है कि हर बार चमत्कृत होता रहा हूँ। कभी पता नहीं कौन कौन से विदेशी कवियों के पंक्तियों पर कविता लिखेगी तो कभी अम्मा चौखट अंगना और खोइन्चा की बात कर गोरखपुर की ललाइन बन जाएगी . अपर्णा जन्म से कवि है और हमारे लिए प्रौढ़ शिक्षा वाली टीचर जैसी है।
मुकेश कुमार सिन्हा
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1 - *तुम कहां थी..?*
पहली कविता का कोई शीर्षक नही दिखाई दिया ,तो मैंने सोचा ,'छोटी-छोटी बातें पूंछने से अच्छा ,खुदी ही दे दो' ...
ऐसा लगता है कि अपर्णा जी को शास्त्रीय संगीत में भी गहन रुचि है, कविता जाहिर कर रही है ...आप से कविता का प्लाट ढूंढने में आईडिया मिला ...अब हम भी उन पर कविता लिख सकते हैं , जिसमें हम भी अच्छे जानकार हैं जैसे क्रिकेट,फुटबॉल, शतरंज आदि आदि ,धन्यवाद अपर्णा जी ।

2 - *वैराग्य ..* दूसरी कविता ,यह गंभीर किस्म की लगी और पढ़ते पढ़ते मन द्रवित हो गया ...कुछ ख्याल में भी आ गया...

3- *उमस* - यह और भी गूढ़ कविता लिखी आपने।पहले तो हम समझे ,फ्रीडा -स्लम डॉग वाली होगी ..फिर मालूम हुआ कि परदेशी है ...
सके बार तो लगा कि यह कविता KBC के 15 -16 प्रश्न जैसी है ...अब हम भी ऐसे ही कुछ फॉरेन का पढ़ेंगे और कविता लिखेंगे डराने के लिए ...

4 - *श्रद्धांजलि में दो मिनट का मौन* - यह कविता अपनी टाइप की लगी ...किसीं को नही छोड़ना का है ...अब इसमें सब कुछ इजी था तो शीर्षक की गुगली डाल दी आपने ...

खैर आपकी कविताओं में लिखना ,निहायती जरूरी था ,आप उन दुर्लभ जन में से हैं ,जो हमारी कविता में ,बिना नागा लिखती हैं ...
कविताएं सहज तो नही हैं समझने के लिए ...लेकिन बहुत कुछ सीखा जा सकता है ...
पटल में आपकी कविताएं फुल मेकअप में (कविता के सौंदर्य शास्त्र को पूर्ण करती हुईं , बिम्ब-उपमानों से युक्त) शोभायमान रहीं ...
अजय श्रीवास्तव
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अपर्णा जी की कविताएँ अक्सर ही पढ़ता रहता हूँ। एक तरह से मुरीद हूँ उनकी कविताओं का। किसी नए लेखक को कविता सीखनी हो तो मुझे नहीं लगता अपर्णा जी से बेहतर कोई गुरु हो सकता है।
विदेशी लेखकों की कविताएँ जब हिंदी में अनुवाद होकर आती हैं तो जरूर उनमें कुछ बात होती होगी। अपर्णा जी उसी अनुवाद वाले लेखकों श्रेणी में आती हैं। एक random खयाल आया भी था कि उनकी कविताओं का अनुवाद हो और वे एक विस्तृत मंच तक पहुँचें।
प्रयोगधर्मिता उनकी सबसे बङी पहचान है। इधर उधर बिंब तलाशने वाली, दिनचर्या की आम सी बातों में दर्शन की तलाश और एक परिपक्व लेखक लेखक के मँझे हुए शब्द बेहद प्रभावित करते हैं
अबीर आनन्द
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अपर्णा अनेकवर्णा जी आपके  खूबसूरत नाम  और व्यक्तित्व की तरह ही ...कुछ अलग सा चयन है आपकी हर कविता की पृष्ठभूमि का ...नये -नये प्रयोग ,अलग-अलग बिम्बों कीजगमगाहट साथ ही  भावों की गहराई में और अधिक गहरे का उभर आनाऔर फिर पाठक को कुछ नायाब  सा  अनुभव दे जाना ये  आपकी रचनाओं की  बड़ी अलग सी अदा है ।पाठक  के  सतत चिन्तन को  गतितिशीलता देती  है  ये  रचनाएँ....पाठक के  मन की कौतूहलता  को कहीं असीम में विलय  करते हुए अनवरत चाल से लक्ष्य तक पहुँचा कर एक नायाब अहसास हाथ दे जाती है जो बड़ा ही अनोखा है ...पहली दो  रचनाओं पर फ़िदा है ये दिल ...बहुत खूब !
ज्योत्सना प्रदीप
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अपर्णाजी की सारी कविताएं उदात्त भाव की कविताएं हैं। फिर वहाँ प्रेम हो, विदग्धता की स्थिति में फिर सम्भलने की कोशिश में लगी स्त्री या आदिवासी समुदाय की स्त्रियों की संवेदनाओं के साथ जुडते हुए देख पाना अदभुत है। अपर्णाजी की सम्वेदनाओं का कायल हूँ ही उसे प्रणाम भी करता हूँ।
सुधीर देशपाण्डे

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अपर्णा जी की कविताओं को पढ़ना खुद को समृद्ध करना है। देर तक साथ रहने वाली कविताएँ उनकी। मराठी की शैली में बोलना अच्छा लगेगा मुझे, 'अंतर्मुख करने वाली कविताएँ हैं।
दीप्ति कुशवाह
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कविताओं को यदि रंगों की भाषा में खोलना हो तो मैं कहूंगा चटक रंगों से बनी कविताएँ हैं। ताप की कविताएँ हैं अतः दूर से ही उष्णता का बोध करा देती है। कविता अपने सामर्थ्य पर खड़ी है और मज़बूती से खड़ी है अतः ये बरबस आकर्षित करने वाली कविताएँ हैं।

खचाखच भरा होने के मुहावरे का प्रयोग, साजिंदे, बंदिश, से लेकर उसी सभागार के एक कोने में गुम हो जाना मुखर बिंब हैं।

लाल अलता, अग्नि का धधकना से लेकर एक चिह्न का स्मृति में रुक/बस जाना मुखर बिंब हैं।

रोगशैया से लेकर हर-थक कर बीच में पसर जाना मुखर बिंब हैं।

श्रद्धांजलि में दो मिनट का मौन बहुत लाउड बिंब है।

कहने का गरज़ यह है कि कविताओं की इन्टेन्सिटी तीब्र है। ये कविताएँ कहती ही नहीं, अपनी बात चीख चीख कर कहती हैं।

हर कविता जिस नोट पर समाप्त हो रही हैं उस नोट को पकड़ने की ज़रूरत है। "उसी सभागार के एक कोने में गुम हो जाऊं" , "आलता से लाल एक जोड़ी घिसे पाँव" , "हारी-थकी, बीच में आ पसरती है" एवं "ये कोई कविता नहीं है" आदि केवल पंक्तियाँ मात्र नहीं हैं बल्कि हर पंक्ति बिंबों का विस्तार है।

बिंबों का क्रमिक विस्तार पोस्टमोडरनिज्म की कविताओं में खूब है और मैं व्यक्तिगत स्तर पर इसे बहुत पसंद करता हूँ, प्रयास करता हूँ कि अपनी कविताओं में भी यह चमत्कार कर पाऊं लेकिन इसके लिए कुब्बत आती सतत अभ्यास से है। मुझ जैसे काहिल के लिए यह संभव कहाँ है!? यह कलाकारी आपकी कविताओं में देख कर आनंदित होता हूँ। मुझे भी सिखाएँ दी प्लीज़।

प्रश्न है कि एक पंक्ति में कई बिंब कैसे हो सकते हैं तो तीसरी कविता की अंतिम पंक्ति देखें, (1.हारी-थकी, 2.बीच में आ पसरती है।) यहाँ प्रयोग भी है बिंबों में, अमूमन हम थकी-हारी पदबन्ध का प्रयोग करते हैं; यहाँ वाईस-वर्सा है।

प्रत्येक कविता की अंतिम की पंक्ति/पंक्तियाँ देखने में तो अंडरटोन लग रही हैं पर दरअसल है /हैं नहीं। ये पंक्तियाँ चीखती हुई पंक्तियाँ हैं और यह ऐसे ही नहीं कह रहा, स्त्री मन की सघनतम पंक्तियों की तीब्रता नापने की कोई यंत्र हो तो नाम लें।

स्त्रिमन से लिखी कविताएँ यदि एक बड़े मास को अपील कर रही हो या टारगेट कर रही हो तो उसका मूल स्वर तीसरे सप्तक में जाएगा। पुरुष मन को बहुत साधने पर ये चीज़ अनुभव में आएगी। पवन कारण की कविताओं में वह स्वर है लेकिन कविताओं का ताप अलग है। कुछ और पुरूष साथियों की कविताएँ हैं इस इंटेंसिटी की पर उनका टेस्ट अलग है।

सौरभ शांडिल्य
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