Saturday, December 16, 2017

रचना प्रवेश

रचना प्रवेश
जीवनानंद दास की बांग्ला से हिंदी में अनुदित कविताएँ 

अनुवादक : सुशील कुमार झा एवं  समीर वरण नंदी 






परिचय 
जीवनानंद दास
---------

 जन्म : - 17 फ़रवरी 1899
 निधन :- 22 अक्तूबर 1954
जन्म स्थान:- बारीसाल, पश्चिम बंगाल, भारत
 कुछ प्रमुख कृतियाँ
झरा पालोक (1927), धूसर पाण्डुलिपि (1936), बनलता सेन (1942), महापृथ्वी (1944), सातटि तारारा तिमिर (1948), श्रेष्ठ कविता (1954), रूपसी बांग्ला (1957), बेला अबेला कालबेला (1961)


एक...

कविता :- बनलता सेन 
अनुवादक :-सुशील कुमार झा 
कवि :- जीवनानंद दास

हजारों बर्ष तक भटकता रहा इस धरा के पदचिन्हों पर,
नीरव अन्धकार में ही, सिंहल समुद्र हो या मलय सागर;
वहाँ भी, जहाँ था अशोक और बिम्बसार का धूमिल संसार;
और भी दूर विदर्भ में भी था, छाया था जहाँ धुंधला अन्धकार;
थका हारा क्लांत मैं; और चारों ओर था बिखरा जीवन;
हो मानो समुद्र का फेन;
दो घड़ी की भी शान्ति जिस ने दी, वह थी नाटोर की बनलता सेन!

श्रावस्ती के विश्वश्रुत शिल्प सा उसका मुख,
विदिशा की काली रात के अन्धकार से घने उसके केश;
और भी दूर समुद्र में, जैसे टूटी नावों में दिशाएँ खो चुका नाविक,
अचानक देखे दालचीनी के द्वीपों के बीच हरी पत्तियों का कोई देश;
उसी अन्धकार में देखा था; पूछा था ‘कहाँ थे तुम’ होकर बेचैन,
भटकों को ठौर दिखाती नजरों से तकती नाटोर की बनलता सेन!

दिन के बाद धीरे धीरे ओस की बूँद सी लरजती आती शाम;
डैनों से पोंछती चील गंध धूप की; बुझते हुए सभी रंग और
थमती हुई आवाज़ें;रहती केवल कोरी पाण्डुलिपि सी रात,
और उसमें कुछ भूली-बिसरी कहानियाँ बुनते झिलमिलाते जुगनु;
लौट जातीं सब चिड़ियाँ - सभी नदियाँ - खत्म जीवन का सब लेन देन;
बच जाता है सिर्फ अन्धकार, और सामने बैठी बनलता सेन!

****
कविता :-बनलता सेन / 
अनुवाद :-समीर वरण नंदी / 
कवि:-जीवनानंद दास

 जीवनानंद दास » समीर वरण नंदी» बनलता सेन » Script
हज़ारों साल से राह चल रहा हूँ पृथ्वी के पथ पर
सिंहल के समुद्र से रात के अँधेरे में मलय सागर तक
फिरा बहुत मैं बिम्बिसार और अशोक के धूसर जगत में
रहा मैं वहाँ बहुत दूर अँधेरे विदर्भ नगर में
मैं एक क्लान्त प्राण, जिसे घेरे है चारों ओर जीवन सागर का फेन
मुझे दो पल शान्ति जिसने दी वह-नाटोर की बनलता सेन।

केश उसके जाने कब से काली, विदिश की रात
मुख उसका श्रावस्ती का कारु शिल्प-
दूर सागर में टूटी पतवार लिए भटकता नाविक
जैसे देखता है दारचीनी द्वीप के भीतर हरे घास का देश
वैसे ही उसे देखा अन्धकार में, पूछ उठी, ”कहाँ रहे इतने दिन?“
चिड़ियों के नीड़-सी आँख उठाये नाटोर की बनलता सेन।

समस्त दिन शेष होते शिशिर की तरह निःशब्द
आ जाती है संध्या, अपने डैने पर धूप की गन्ध पोंछ लेती है चील
पृथ्वी के सारे रंग बुझ जाने पर पाण्डुलिपि करती आयोजन
तब क़िस्सों में झिलमिलाते हैं जुगनुओं के रंग
पक्षी फिरते घर-सर्वस्व नदी धार-निपटाकर जीवन भर की लेन-देन
रह जाती अँधेरे में मुखाभिमुख सिर्फ़ बनलता सेन।




दो 

कविता :- बिल्ली 
अनुवाद:-  समीर वरण नंदी 
कवि:- जीवनानंद दास

दिन भर, घूम-फिर कर केवल मेरा ही
एक बिल्ली से सामना होता रहता है,
पेड़ की छाँह में, धूप के घेरे में,
बादामी पत्तों के ढेर के पास,
कहीं से मछली के कुछ काँटे लिए
सफे़दी माटी के एक कंकाल-सी
मन मारे मधुमक्खी की तरह मग्न बैठी है,
फिर, कुछ देर बाद गुलमोहर की जड़ पर नख खरोंचती है।

दिन भर सूरज के पीछे-पीछे वह लगी रही
कभी दिख गई
कभी छिप गई।

उसे मैंने हेमन्त की शाम में
जाफ़रानी सूरज की नरम देह पर
सफे़द पंजों से चुमकार कर
खेलते देखा।

फिर अन्धकार को छोटी-छोटी गेंदों की तरह
थपिया-थपिया कर
उसने पृथ्वी के भीतर उछाल दिया।
*


तीन 
कविता :- बीस साल बाद  
अनुवादक:- सुशील कुमार झा 
कवि :-जीवनानंद दास


बीस साल बाद एक बार फिर अगर मिल जाओ तुम?

कम नहीं होते बीस साल,
धुंधली पड़ जाती हैं यादें भी किसी भूली बिसरी सदी की तरह,
और ऐसे में मैदान के पार अगर तुम अचानक ही दिख जाओ?

कार्तिक की एक अलसाई शाम
दूर कहीं लंबी घासों में गुम होती
बलखाती सुरमई नदी के किनारे
पक्षी लौट रहें हों जब घोसलों को
ओस की बूँदों से घास हो रहें हों नर्म
कोई ना हो दूर धान के खेतों में
स्तब्धता सी पसरी हो चारों ओर
चिड़ियों के घोसलों से गिर रहे हों तिनके

और ऐसे में
एक बार
फिर से अगर तुमसे मुलाकात हो जाये?

और दूर मनिया के घर शिशिर की शीत सी झर रही हो रात
अँधेरी गलियों में खुली खिड़कियों से झाँक रही हो कांपते दीये की लौ

हो सकता है
चाँद निकला हो आधी रात को
पेड़ों की झुरमुट के पीछे से
जामुन, कटहल या आम के पत्तों से मुंह छुपाये
या बांस की लहराती टहनियों के बीच लुकाछिपी करते हुए

दूर मैदान में चक्कर काट उतर रहा हो कोई एक उल्लू
बबूलों के काँटों या फिर बरगद के जटाओं से बचता हुआ,

झुके पलकों सा समेट रहा हो पंखों को वही सुनहला चील,
जिसे चुरा ले गया था शिशिर पिछले साल,

कोहरे से धुंधलाती इस रात में
अगर मिल जाओ
अचानक
बीस साल बाद...

कहाँ छुपाऊँगा तुमको?




सौजन्य से साहित्य की बात वाट्स अप समूह ,कुछ चुनिन्दा प्रतिक्रियाएं 

मधु सक्सेना :  बनलता सेन ....जो भी हो ,कवि के मन के नज़दीक ही होगी तभी तो ये कविता रची गई ।

सभी कवितायें एक प्रवाह में चलते हुए अपने अलग वितान से मुखरित होती है । बिल्ली पर कविता  लिखना कठिन लगता है ..प्राश्चित कहानी ही याद आती है पर ये कविता वास्तविक दृश्य उपस्थित करती है ।

बीस साल बाद भी मिलने की अभिलाषा है कवि को ।हमे भी कई चेहरे याद आते है ,काश  कि अचानक वो सामने आ जाएं । सोच कर ही अच्छा लगता है ।
सरल सहज कविताएं ।

उपमा ऋचा :  भूगोल, इतिहास, सभ्यता, संस्कृति, कला, धर्म और भाषा के आधार पर टुकड़ों में बंटी दुनिया में राहत की बात है कि यहां कुछ सेतु हमेशा क़ायम रहे हैं। जो टुकड़ों के बीच एक साझा सड़क बनाकर आवाजाही को बरक़रार रखते हैं। अनुवाद भी एक ऐसा ही पुल है। आज जीवनानंद दास की कविताओं को पढ़ते हुए बार-बार सुशील कुमार झा और समीर वरण नंदी के साथ-साथ द्वितीय सेतु अनीता जी को शुक्रिया कहा क्योंकि यही वह पुल थे जिनके सहारे बंगाल की रोशनाई हमारे इनबॉक्स तक आई।

  बनलता के सामने आते ही बरबस बसंतलता और फागुनलता याद हो आईं। नहीं... ये तीनों सहोदरा नहीं हैं। कम से कम अपने रचयिताओं के आधार पर तो बिलकुल भी नहीं, लेकिन जहां तक बनलता से संवाद हुआ उससे मुझे यही लगा कि जैसे कोई कहानीकार अपनी कहानी में पात्र रचता है। वैसे ही कवि ने भी एक किरदार रचा। एक ऐसा किरदार जो दिक् काल की सीमाओं से उतना ही परे है। जितना कि कल्पनाओं का सीमांत संसार... मूल भाषा में बनलता जितनी अप्रतिम रही होगी, अनुवाद प्रक्रिया में उसका राई रत्ती भी सौंदर्य धूमिल नहीं हुआ। इसके लिए निश्चय ही सुशील कुमार झा साहब साधुवाद के पात्र हैं। समीर जी ने भी जिस शिद्दत के साथ बिल्ली की चपलता को थामा। उससे गुजरते हुए यही लगा कि बीस साल बाद क्या हज़ारों साल बाद तक इन कविताओं में बसी मिट्टी की गंध यूं ही महकती रहेगी...


अपर्णा अनेकवरना "  संस्करण का कवर स्वंय सत्यजीत राय ने स्केच और डिज़ाइन किया है। स्पष्ट है बंगाल बनलता सेन का बेहद स्थानीय परंतु लगभग उतना ही व्यापक असर वाला संस्करण है गुरुदेव टैगोर की एक ग्रामीण श्यामली सुंदरी पर लिखी कविता कृष्णकली आमी तारेई बॉली।
 नाटोर भी वर्तमान बांग्लादेश में है। तो कवि के गृहनगर बॉरीशाल से अधिक दूर नहीं। 😊
मुझे दूसरी कविता बेहतरीन लगी। बिडाल बंगाल के लोक कांशेंसनस का हिस्सा रहा है। जामिनी राय की पेंटिंग हो या किस्से कहानियों का केंद्र, बिल्ली एक लोकप्रिय बिंब है।
नंदी सर का अनुवाद भी कसा हुआ है।
बहुत ही स्नेह, लगाव और ध्यान से नित्य प्रतिदिन देखा हुआ विषय है जिसे सामान्य जन भी देखते होंगे पर कवि की दृष्टि से देखना इस कविता में संभव हुआ
मुझे दूसरी कविता बेहतरीन लगी। बिडाल बंगाल के लोक कांशेंसनस का हिस्सा रहा है। जामिनी राय की पेंटिंग हो या किस्से कहानियों का केंद्र, बिल्ली एक लोकप्रिय बिंब है।


माया मृग :..बहुत अच्छी कविताओं का अच्छा अनुवाद पढ़ने का अवसर मिला।
दोनो अनुवाद बढ़िया हैं। समीर जी के अनुवाद में प्रवाह अधिक है लेकिन आखिरी पंक्तियों के अनुवाद पहले वाले में ज्यादा सहज लगा।
 बनलता सेन एक व्यक्ति से एक मिथ में बदलती नायिका हैं। व्यक्ति की सीमाओं का अतिक्रमण मिथ से ही सम्भव है। जीवनानंद दास की विराट कल्पना के यह सर्वथा अनुकूल है। बिल्ली का बिम्ब भी जीवमात्र का चित्र नहीं उकेरता, उससे आगे जाता है।
बीस साल बाद तो एक कसक है, इसे जिया जा सकता है, कहा नहीं जा सकता।


ब्रज श्रीवास्तव :   जीवनानंद दास की यहां प्रस्तुत पहली कविता में महान कल्पनाएं और उपमाऐं मन को छू रही हैं हम चकित हो चलते हैं कि सौन्दर्य भास की अभिव्यक्ति इस तरह भी की जा सकती है.ऐसी कविताऐं ही कविताओं के प्रति भरोसा और प्रीति जगाती हैं. विदिशा का जिक्र देखकर सुखद एहसास हुआ.यहां की काली रात तक को उपमान के रूप में लिया गया. तो दिन के क्या कहने. कालिदास ने भी यहां की युवतियों का ज़िक्र मेघदूत में किया है.

Wednesday, December 13, 2017

 काफ़िर बिजूका उर्फ़ इब्लीस,सत्यनारायण पटेल के  कहानी संग्रह पर समीक्षा 
रमेश शर्मा 




सत्यनारायण पटेल

कहानी संग्रह-
१- भेम का भेरू मांगता कुल्हाड़ी ईमान,

२- लाल छींट वाली लूगड़ी का सपना

३-काफ़िर बिजूका उर्फ़ इब्लीस

४- तीतर फांद (शीघ्र प्रकाश्य)

उपन्यास-गांव भीतर गांव

पुरस्कार- 
वागीश्वरी सम्मान भोपाल
प्रेमचंद स्मृति कथा सम्मान, बांदा

पता- m-2/199, अयोध्या नगरी
(बाल पब्लिक स्कूल के पास) इन्दौर-452011( म.प्र.)
9826091605
bizooka2009@gmail.com







आदिम और उत्तर आधुनिक समय के मध्य डोलते लोक जीवन का महाआख्यान 


समकालीन हिन्दी कहानी की संरचना, उसके बिषय, कथ्य और शिल्प आधुनिकीकरण की रफ्तार में जिस तेजी से विस्तारित होकर अपनी नई राह पर गतिमान हुए हैं उससे हिन्दी कहानी के पाठकों को लगता रहा है कि अब कहानियों में गाँव,जनपद और लोकजीवन के लिए कोई बहुत स्पेस बचा नहीं रह गया है | पिछले एक दशक में युवा पीढी के कहानीकारों की कहानियों को लेकर जितने भी साहित्यिक पत्रिका के विशेषांक प्रकाशित हुए, उन्हें पढ़ते हुए यह बात बारम्बार लक्षित भी होती रही  है | संभव है देश दुनियां में तेजी से हुए बदलाव इसके कारण हों , पर इस बदलाव के पीछे की कहानियां , कहानी के बिषय बनने से अक्सर वंचित होते रहे हैं  | युवा पीढ़ी ने उत्तर आधुनिकता के रस में डूबे इस संचार क्रांति के युग में आत्मलीन होकर जो देखा और भोगा उसे ही उसकी अच्छाईयों और बुराईयों के साथ अपनी कहानियों का बिषय बना लिया, उनकी कहानियों में एक बृहत्तर ग्रामीण समाज और लोक जीवन का सिरे से इस तरह छूट जाना हिन्दी कहानी आन्दोलन की एक बड़ी घटना की तरह है जिसे हिन्दी कहानी की आलोचना में बहुत तवज्जो नहीं मिली | यह एक तरह से प्रेमचंद , अमरकांत या भीष्म साहनी जैसे कहानीकारों की परम्परा से परे जाने और एक नयी परम्परा विकसित करने की जिद के रूप में भी देखी समझी जा सकती है | ज जबकि ज्यादातर हिन्दी कहानियों में नगर ,महानगर और महानगरों की आधुनिक जीवन शैली से प्राप्त सुविधाएं ,उससे उपजे संघर्ष और जटिलताएं जैसे बिषय अपनी सघनता में समाहित हैं , ऐसे समय में सत्यनारायण पटेल जैसे कुछेक युवा कहानीकारों ने इस बदलाव के पीछे छुपी त्रासद कहानियों को अपनी कहानियों का बिषय बनाकर गाँव ,जनपद और लोक की खुश्बू को एक नये रूप में प्रस्तुत कर उसे बचाने की कोशिश की है | मैंने बहुत पहले कैलाश बनवासी का एक कहानी संग्रह "बाजार में रामधन" पढ़ते हुए लगभग यही बातें महसूस की थीं जो आज सत्यनारायण पटेल का कहानी संग्रह "काफिर बिजूका उर्फ़ इब्लीस" पढ़ते हुए महसूस हो रही है |  सत्यनारायण पटेल की कहानियों में गाँव जनपद और लोकजीवन में हुए त्रासद परिवर्तनों को बहुत सूक्ष्मता से न केवल देखा समझा परखा और महसूस किया गया है बल्कि उसे एक वैश्विक धरातल पर विमर्श हेतु पाठकों के सामने रख पाने में भी वे कामयाब हुए हैं  | कहानी की आदिम परम्पराओं में ,जबकि कहानियाँ एक विशिष्ट संरचना में संगुफित होकर दादी नानी से वाचिक रूप में ही लोगों तक पहुंचती रही हैं , कहानी की उस पारंपारिक संगुफन को आज के इस डिजिटल कहानी के युग में भी सत्यनारायण ज़िंदा रख पाने में अगर सफल हुए हैं तो इस बात का यह प्रमाण है कि कहीं न कहीं उस लोकजीवन को संवेदना के स्तर पर उन्होंने जिया और भोगा भी जरूर   है , यह संवेदना कागजी नहीं है , शायद इसलिए ही उनकी लगभग सारी कहानियाँ उस लोकजीवन के उत्स से आलोकित होकर जब उनके दुःख दर्द को बयाँ करती हैं तो उनमें एक स्वाभाविकता होती है | उनकी कहानियाँ ,लोकजीवन को आदिम और उत्तर आधुनिक युग के मध्य रखकर ऐसे तथ्यात्मक दृश्य गढ़ती हैं कि परिवर्तन की विभीषिका पाठक की भीतरी दुनियां को अंततः सीधे बेधने लग जाती है | यही बात सत्यनारायण को न केवल युवा पीढी के अन्य कथाकारों से अलगाती है , बल्कि आश्वस्त भी करती है कि कथा कहानी में आज भी गाँव बचे हुए हैं और उन्हें बचाने का एक आग्रह भी हिन्दी कहानी की परम्परा में शेष है |
काफिर बिजूका उर्फ़ इब्लीस संग्रह में कुल छः कहानियाँ हैं | संग्रह की पहली ही कहानी "पर पाजेब न भीगे" दो कथाओं को साथ-साथ लिए चलती है | एक कथा जहां नायक जो कि एक बंजारा है और व्यवसायी भी है ,वह नमक इसलिए महंगे दामों में बेचता है क्योंकि शहर से गाँव लाते समय गधे की पीठ पर लदी हुई नमक की बोरी बार-बार नदी में भीग कर आधी गल जाती है | नमक जैसी बुनियादी और जरूरी वस्तु को मुनाफे के तराजू पर तौल कर उसे महँगे दाम पर बेचे जाने को वहां का लोकसमाज कभी स्वीकार नहीं करता , अस्वीकार्यता इस हद तक कि बंजारा को कोई पिता अपनी लडकी ब्याहने को तैयार नहीं | नमक नदी में न भीगे ,उसे महंगे दाम में बेचने की मजबूरी खत्म हो सके, इन समस्याओं का हल खोजती यह कथा एक पुल की संरचना के साथ खत्म होती है|  इस कथा में मनुष्य की बुनियादी जरूरतों की सहज उपलब्धता के लिए मुनाफे से परे जाकर मनुष्य की नैतिकता को बचाए जाने के आग्रह के साथ बंजारा पुल के रूप में जो एक समाधान खोजने की कोशिश हुई है , ऎसी कोशिशें मुनाफे की जमीन पर गहरे जा धंसी आज की सामाजिक और राजनैतिक व्यवस्था  के युग में पूरी तरह विलुप्त हो चुकी हैं | कोशिशों की उसी विलुप्तता पर इस कहानी की पहली कथा एक बड़ा सवाल खड़ा करती है | इसी कहानी में साथ चलने वाली दूसरी कथा प्रेम में इस कदर रची पगी है कि बंजारा अपनी प्रेमिका बंजारन के लिए नदी पर ऐसा बाँध बनवाता है कि बंजारन के शर्त अनुसार बाँध पर उसकी पगथली तो भीगे पर पाजेब भीगने से बची रहें | प्रेम और समर्पण मनुष्यता की न केवल पहली शर्त है बल्कि लोक की सबसे बड़ी ताकत भी है जिसे सत्यनारायण अपनी कथा में चीन्हते हैं | इस कथा का बंजारा बाँध दो दिलों को जोड़ने का एक मानुषिक अनुबंध है | आज हम जिस कार्पोरेट युग में जी रहे हैं ,आज का यह दौर ऐसे मानुषिक अनुबंधों को रौंदते हुए मुनाफे का बाँध खड़ा करने का दौर है जहां गाँव के गाँव डूबकर जमीदोंज हो रहे हैं और मनुष्य की सारी नैतिकता धरी की धरी रह जा रही है |  
इस संग्रह की सबसे अधिक ध्यान खींचने वाली कहानी "न्याय" को पढ़ते हुए मोपासा की एक कहानी  ‘’रस्सी का टुकड़ा" मुझे याद हो आती है ! इस कहानी में एक बूढ़े किसान को मेले की यात्रा करते समय एक रस्सी का टुकड़ा ज़मीन पर पड़ा हुआ मिलता है ! पीठ में अत्यधिक दर्द होने के बावजूद वह उसे उठा लेता है , यह सोचकर कि शायद यह कभी उसके काम आ जाए | उस रस्सी के टुकड़े को उठाते हुए उसका एक पुराना मित्र जो अब उसका शत्रु है देख लेता है ! उसके ठीक दूसरे  दिन  एक अमीर व्यक्ति का रुपयों से भरा बटुआ उसी रास्ते पर कहीं खो जाता है ! अमीर व्यक्ति अपने प्रभाव का बेजा उपयोग करते हुए उस बूढ़े किसान को बुलवाता है , तब किसान को पता चलता है कि वह व्यक्ति जिसने उसे रस्सी उठाते हुए देख लिया था और जो उसको अपमानित होते हुए देखना चाहता था उसी ने इसकी शिकायत की है ! बूढा किसान तरह तरह की बातों से अपने को निर्दोष साबित करने की कोशिश करता है , अपनी जेब से रस्सी का वही टुकड़ा निकाल कर भी दिखाता है , तरह तरह की कसमें खाते हुए अपनी निर्दोषिता व्यक्त करने की कोशिश करता है , पर उसकी सारी कोशिशें बेकार हो जाती हैं और उसे दोषी करार दे दिया जाता है ! यह बात पूरे गाँव में आग की तरह फ़ैल जाती है और लोग उसे उलाहना देने लगते हैं , उसे कोसते हैं ! चोर का ठप्पा उसके माथे पर चस्पा हो जाता है | वह सिद्ध करना चाहता है कि वो निर्दोष है, पर उसकी बात नक्कारखाने में दब जाती है  ! बाद में वो बटुआ किसी अन्य व्यक्ति को सड़क पर पड़ा मिल जाता है और वह उस अमीर आदमी को सौंप देता है फिर भी लोग उस बूढ़े किसान पर विश्वास  नहीं करते ,उसका मजाक उड़ाते हैं , उससे घृणा करते हैं और अंत में इस हादसे से न उबर पाने की वजह से असमय उसकी मृत्यु हो जाती है | कमजोर,शोषित,और अल्पसंख्यक होना भी आज एक अपराध से कम नहीं है,सत्ता और शासक वर्ग के हाथों की कठपुतली बन चुकी न्यायव्यवस्था  इसे अपराध की नजर से देखती है | मोपासा की कहानी में न्याय व्यवस्था की विद्रूपता शासक और शोषित के संदर्भ में जिस तरह दिखाई पड़ती है , अल्पसंख्यक वर्ग के संदर्भ में वही सत्ता और न्यायव्यवस्था की विद्रूपता सत्यनारायण के कहानी संग्रह की "न्याय" कहानी में परिलक्षित होती है | आज जिस तरह एक ख़ास समुदाय के निरपराध युवाओं की धरपकड़ आतंकवाद के नाम पर की जा रही है , और उन मासूम और निरपराध युवाओं के जीवन को नारकीय बनाने में सत्ता , पुलिसिया आतंक के साथ-साथ  समाज की शंकाएं और अविश्वास की धारणाएं खाद पानी का काम कर रही हैं , न्याय कहानी इस अन्याय पर सघन रूप में एक बड़ा सवाल उठाती है |
आज विकास की अवधारणा को महानगरों में चमचमाती सड़कों ,पुल-पुलियों और वहां की चकाचौंध से ही अंतर्संबंधित कर दिया गया है , जबकि गाँव के गाँव आज भी सड़क, पुलिया ,बिजली जैसी बुनियादी आवश्कताओं से वंचित हैं | "घट्टी वाली माई की पुलिया" कहानी में घट्टी वाली माई इस अव्यवस्था के दंश को भोगी हुई वह लोक नायिका है जो बाढ़ के दिनों में नदी पर पुल न होने की वजह से अपने पति, जिसको सांप ने डस लिया है, को इलाज के लिए गाँव के बाहर नहीं ले जा सकती और उसे खो देती है | सत्ता के बहरेपन से उपजी बुनियादी आवश्यकताओं का अभाव लोकजीवन को कई बार त्रासद स्थितियों में पहुंचा देता है , किसी को खो देने जैसी यही त्रासदपूर्ण घटना कई बार घट्टी वाली माई जैसे लोकजीवन के पात्रों के भीतर प्रेम को नये रूप में सृजित कर देती है और यह प्रेम लोकजीवन की अपनी सांगठनिक ताकत बन जाती है जो उनसे खुद ब खुद ऐसा काम करवा लेती है जिसे सत्ता प्रतिष्ठान हमेशा उपेक्षित करते आए हैं | घट्टी वाली माई द्वारा निर्मित पुलिया लोकजीवन की उसी ताकत की मिशाल है जो सत्ता को कई बार आइना दिखाने का काम भी करती है जिसे सत्यनारायण अपनी कहानी में संजीदगी से रच पाने में कामयाब हुए हैं |
लालच मनुष्य की आदिम बुराइयों में सबसे बड़ी बुराई कही जा सकती है | मनुष्य के भीतर लालच  जिस अनुपात में विस्तारित होता है उसी अनुपात में ठग और फरेबी हो जाने की राह में उसके कदमों को गति मिलती है | "ठग" कहानी मनुष्य के ठग और फरेबी होने का महा आख्यान है जहां वह इस हद तक लालची होने लग जाता है कि जमीन ,नदी, नाले, पहाड़ को बेचकर लाभ कमाने का सपना देखने लगता है | कार्पोरेट युगीन सभ्यता में ऐसे ही बड़े-बड़े ठगों को लोकजीवन को विकास का सपना दिखाकर ठगते हुए जिस तरह हम आज देख रहे हैं , उस देखने को यह कहानी गहरे रंगों से भर देती है | मनुष्य की ठगी को परत दर परत दिखाने वाली यह कहानी पाठक को उसी ठगी से बचने को, आगाह भी करती है |
सत्यनारायण की कहानियों में लोककथा के तत्व अपने सघन रूप में विद्यमान हैं  | लोकजीवन में आसपास के नदी, पहाड़, पशु, पक्षी भी शामिल हैं | नृशंस शहरीकरण से उपजे स्त्री-पुरुष की उत्तर आधुनिक समस्याओं को चिका और चिकी पक्षियों के माध्यम से "एक था चिका एक थी चिकी" कहानी में चित्रित किया गया है | कथा नायिका अपनी भगिनी और भतीजे को चिका और चिकी पक्षियों की कहानी सुनाती है और अंत में वह खुद चिकी पक्षी के एक जगह बंधक होकर रह  जाने के दर्द से अपने दर्द को जोडकर महसूस करा पाने में कामयाब हो जाती है | एक जगह बंद कमरे में औरत के बंधक हो जाने की यह व्यथा पाठकों तक बखूबी इसलिए भी संप्रेषित हुई है क्योंकि सत्यनारायण अपनी ठेठ देशज शब्दों और वाचिक शैली के प्रभाव उत्पादक तत्वों का बखूबी स्तेमाल कर पाने में कामयाब हुए हैं | सत्यनारायण मूलतः लोकजीवन के उत्स से उर्जित कथाकार हैं और साम्प्रदायिक समस्याएं लोकजीवन से परे नहीं हैं | कहीं न कहीं यह समस्या समाज को विघटित करती आ रही है | संग्रह की अंतिम कहानी "काफिर बिजूका उर्फ़ इब्लीस" संकीर्ण धार्मिक साम्प्रदायिकता की जमीन पर बुनी गई लम्बी कहानी है ,जहां इस समस्या को देखे जाने के कई आयाम हैं | धर्म की अधकचरी और गलत रूप से व्याख्यायित जानकारियों को स्त्री शोषण में टूल्स की तरह इस्तेमाल करने वाले पढ़े लिखे प्रोफेसर हमजा कुरैशी जैसे चरित्र समाज के लिए कितने खतरनाक हैं एकतरफ उसे इस कहानी में देखा समझा जा सकता है तो प्रेम और साम्प्रदायिक कट्टरता के आदिम संघर्ष में संगसार होती स्त्रियों की व्यथा भी देखी जा सकती है | आम तौर पर बिजूका पशु पक्षियों को डराने वाली एक बेजान संरचना होती है जिससे कोई नहीं डरता पर इस कहानी में फिल्म क्लब के माध्यम से समाज को ग्लोबल ,धार्मिक और साम्प्रदायिक समस्याओं के प्रति सचेत करता हुआ हाड़ मांस का पात्र बिजूका शैतानों के भीतर डर पैदा कर पाने में कामयाब दिखता है जो ध्यातव्य है | धर्म की आड़ में पलकर हट्टे-कट्टे हो रहे  समाज के धार्मिक कठमुल्ले जो अपने को समाज का हितैषी बताने से कहीं नहीं चूकते , वास्तव में समाज के लिए इब्लीस बन जाते हैं और अपनी शैतानियों से हमेशा समाज को नुकसान पहुंचाते हैं | इन धार्मिक शैतानों की चपेट में आकर एक पिता अपनी बेटी के लिए भी कितना क्रूर हो सकता है ,इस बुराई पर भी यह कहानी प्रभावी चोंट करती है ।  सत्यनारायण के भीतर का कहानीकार इन सभी बुराइयों को अपनी इस लम्बी कहानी की सघन बुनावट में परत दर परत उघाड़ता हुआ आगे बढ़ता है और मानवीय प्रेम की पुनर्स्थापना को एक नया स्वर भी देता है | कहानीकार के भीतर मौजूद मानवीय प्रेम और संवेदना की पुनर्स्थापना का यह स्वर कहानी दर कहानी और अधिक मुखर होता हुआ आगे बढता  है । शायद इसलिए भी सत्यनारायण पटेल की इन कहानियों को  अलग से हम पहचान पाते हैं ।









रमेश शर्मा 
92 श्रीकुंज ,बोईरदादर ,रायगढ़, छत्तीसगढ़ 
कहानी संग्रह : काफिर बिजूका उर्फ़ इब्लीस 
कहानीकार : सत्यनारायण पटेल 
प्रकाशक : आधार प्रकाशन पंचकुला हरियाणा



Tuesday, December 12, 2017


ब्रजेश कानूनगो जी की कविताएं 



कविताएं 

अनवरत

पतझर की विदाई के बाद
बसंत का स्वागत
बारिश के बाद बीजों का
हरी बालियों में बदल जाना
अनवरत चलता रहता है चक्र

प्रतीक्षा की थकान से निढाल
पहली किरण के उजास से
मुस्कराने लगता दुखी आदमी।

दिनमान का अंतिम पुत्र
लड़ाई के आखिरी दौर में
जब फड़फड़ाने लगता है
बारह नए दोस्त सलाम कर
नए संघर्ष का ऐलान करते हैं।

शुरुआत और समापन तो
भ्रम है हमारा
एक मुग्ध नाग नाचता है
अपनी पूंछ को मुंह मे दबाए

उस्तादों के महा प्रस्थान के बाद
साजिंदे संभाल लेते हैं सितार
झूमते रहते हैं रसिक 
रवींद्र के जाने के बाद भी
जारी रहता है उनका संगीत

इतना समझ लीजिए
सुर में आया जीवन का कोई अंश
शिकार नही होता समय का

अंतिम की पूंछ पकड़
नव प्रसूत धीरे धीरे
पैरों पर खड़ा होने लगता है।



मन की रेत पर

ये जो निशान बने हैं ताजे
कोई गुजरा है अभी
रेत से होकर

इंद्रधनुष उड़ा मन के आकाश में 
लहरें पीछा करती लपकीं हमारी ओर 
तो दूर तक बनते गए
स्मृतियों के सुंदर फूल

लौटते जल से डब-डबाए
कदमों के निशान
जैसे आंसू खिलखिलाती आँखों में

फिर गीली होने लगी है रेत
निशानों को भरने लगा है मीठा समुद्र।





त्यागपत्र

मेड़ पर खड़ा
बरसों पुराना दोस्त
खुशियों के उत्पादन का साक्षी है

फसल की गन्ध फूटती है उसकी देह से
खेतीहर का पसीना
भिगोता रहा उसके तन को
घर से आई रोटियों की खुशबू से
उसने भी पाई है संतुष्टि
सुख में खूब खिलखिलाईं टहनियाँ
तो पीली हो गईं पत्तियां दुख में 

अचंभित है आज पेड़
कि जीवन में आये कम्प से
इस कदर घबरा जाएगा पुराना साथी
कम होती आवाज धड़कनों की
सुनता रहा रात भर
छाती से लगाए

मुक्त हो जाने की सूचना देती
लहरा रही है दोस्त की निर्जीव देह
त्यागपत्र की तरह
उदास पीपल के कंधे पर।






फाँस
कोई घाव मेरे भीतर
टीसता रहता
तुम्हारे दर्द के साथ साथ

शब्द जो लगा तीर सा
घायल हुआ
कभी तुम्हारा दिल

क्षमा के स्नेह और
पश्चाताप की बूंदों से
उभर आया है आज पुराना कांटा
मिट गई है धंसी फाँस की
सारी पीड़ा।





चीख
आप चाहे जितना कहें कि
कविता बहुत लाउड हो गयी है इन दिनों
पर यह चीखने चिल्लाने का दौर है
चीखना इस समय का प्रमुख स्वर है

एक चीख फ़ैली है हमारे चारों तरफ
जैसे गाँव पर उतर आती है दोपहर की उदासी
जैसे पसरा होता है सागवान के जंगलों में सन्नाटा
संग्रहालयों और स्मारकों के भीतर की शान्ति की तरह
हर कहीं महसूस की जा सकती है चीख की उपस्थिति

अगर सुन सकें तो जरूर सुनें
चौपाल से निकलती गंवई चीख की कमजोर आवाज
सूखे पत्तों को सहलाती हुई
जंगलों से एक चीख भी बहती हुई
चली आती है हमारे कानों तक

खामोश शिल्प और कलाकृतियों को सुनने के लिए
इतिहासकार या किसी पुरावेत्ता की जरूरत नहीं है अब
बंद दरवाजों को भेदते हुई
बाहर तक चली आ रहीं हैं पत्थरों की चीखें   

सड़क पर बेसुध पड़ा अकेला आदमी
एक चीख के बाद खामोशी से चीखता चला जाता है
चलती कार से उड़े दुप्पटे
और खँडहर में बिखरी रेत की आवाज बिलकुल वैसी है
जैसे किसी गर्म तंदूर से निकलती चीख 

चीखते सवालों के जवाब दिए जा रहे हैं
और अधिक जोर से चीखते हुए
यह तय कर पाना बहुत मुश्किल है
कि कौन विजेता है इस चीखने की प्रतियोगिता में
रेफरी तक को निर्णय सुनाना पड़ रहा है लगभग चीखते हुए

चीखने चिल्लाने के कई मंच सजे हैं
कई संस्थाएं खडी हो गईं हैं
जहाँ काबिल उस्ताद और गुणी पंडित
लोगों को इस कला का अभ्यास कराते नजर आते हैं
सबको निपुण बनाने के लक्ष्य में
चीख को सबसे पहले हाथ में लिया गया है शायद

वहाँ कोई चिल्ला रहा है तो कैसा अचरज कि
यहाँ की आवाज में भी नहीं सुनाई दे रहा कोई संगीत
परेशान नहीं होना चाहिए आलोचकों को
कि कविता बहुत चीख रही है इन दिनों.


 ब्रजेश कानूनगो




परिचय

ब्रजेश कानूनगो 
निवास : इंदौर (मध्यप्रदेश)

जन्मतिथि : 25 सितम्बर 1957 देवास म प्र
शिक्षा : हिंदी और रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर (मास्टर डिग्री)
प्रकाशन:  
व्यंग्य संग्रह - पुनः पधारें,व्यंग्य संग्रह-सूत्रों के हवाले से।
कविता पुस्तिका- धूल और धुंएँ के पर्दे में(वसुधा), कविता संग्रह- इस गणराज्य में।
कविता पुस्तिका- चिड़िया का सितार।
कविता संग्रह- - कोहरे में सुबह

छोटी बड़ी कहानियां- 'रिंगटोन' (बोधि)
बाल कथाएं-  ' फूल शुभकामनाओं के।' 
बाल गीत- ' चांद की सेहत'।

संप्रति: सेवानिवृत्त बैंक अधिकारी। साहित्यिक,सांस्कृतिक और सामाजिक गतिविधियों में संलग्न। तंगबस्ती के बच्चों के व्यक्तित्व विकास शिविरों में सक्रिय सहयोग।

संपर्क: 
503,गोयल रीजेंसी,चमेली पार्क,कनाडिया रोड, इंदौर-452018 
मो 9893944294 
ईमेल bskanungo@gmail.com




डॉ. पदमा शर्मा : प्रथम कविता अनवरत में प्रकृति की अनवरत यात्रा का वर्णन है।
बारह नए दोस्त से तात्पर्य मैं बारह घड़ी की सुइयों से लगा रही हूँ।
मन की रेत में स्मृतियों और रेत का भावसाम्य अच्छा लगा।
लौटते जल से डबडबाए कदमों के निशान अच्छी पंक्ति
त्यागपत्र
में किसान की समस्या बहुत सघनता से उपस्थित हुई है।
चीख समसामयिक विषय को प्रतिपादित कर रही है। सही है जिसकी आवाज में दम वही हमदम।
यह चीखने चिल्लाने का दौर है।
ब्रजेश जी की कविताएँ धीरे से अंतस में प्रवेश कर स्थापित हो जाती हैं और सोचने को मजबूर कर देती हैं। अलंकार स्वयं उनके काव्य में समाहित हैं। वर्तमान में जो कविता लिखी जा रही है उसमें अलंकारिकता शून्य हो रही है।

अनीता मंडा :  ब्रजेश सर की कविताएँ पढ़   बहुत सहजता से पाठक पर खुलती हैं और भाव विभोर करती हैं, कुछ मुहावरे नुमा पँक्तियाँ वाह कहलवाये बिना नहीं छोड़ती। सामाजिक समस्याओं पर चिंतन है इनमें लेकिन बोझिल करने की हद तक नहीं है। भाव शिल्प चीजों का सुंदर बेलेंस कविता को यादगार बना रहा है।
मैं कविता पढ़कर आनन्द लेती हूँ, कविता पर लिखने में सहज नहीं हूँ, अतः राई भर लिखे को पहाड़ भर मानने की गुज़ारिश।

ब्रज श्रीवास्तव :  पहली कविता में अनवरत को स्थापित करने के लिये अनूठे बिंब हैं,दर्शन की झलक लिये यह कविता हमें मुतमईन करती है कि हमारे पास अनवरत जीवट है.दूसरी कविता में उच्च काल्पनिकता के साथ कविता की कला नुमांया हुई है.अन्य कविताओं में भी विषय को उचित संदेश के संग गूंथा गया है.
अवसाद और आनंद,गहनता और सहजता एवं शब्द का भव्य और भावार्थ का नव्य ब्रजेश जी की कविता की पहचान है.


 शिल्पा शर्मा : बहुत सुंदर... दिल को छूती और दिलोदिमाग़ पर छाती हुई कविताएं हैं, ब्रजेश कानूनगो जी की। अनवरत में-उस्तादों के महाप्रयाण के बाद, साजिंदे संभाल लेते हैं सितार, झूमते रहते हैं रसिक, रवींद्र के जाने के बाद भी, जारी रहता है उनका संगीत... सृजन की सकारत्मकता से भर देता है मन को। मन की रेत पर- मन को तृप्त करती-सी कविता है। त्यागपत्र- हम सभी के दोस्त, अन्नदाता की त्रासद कहानी बयां कर रही है। घर से आई रोटियों की ख़ुशबू से संतुष्टि पाने के बाद अपने साथी की कम होती धड़कनों को छाती से लगाए सुनने की पीड़ा छलक रही है, इस कविता में। फांस- सच है कि क्षमा, स्नेह और पश्चाताप बड़ी से बड़ी दर्दनाक फांसों की पीड़ा हर सकते हैं, पर अमूमन लोग इनसे दूर रहकर फांसों की पीड़ा का ही जश्न मनाते रहते हैं। काश इस कविता की तरह सरल होता फांसों की पीड़ा से उबरना। चीख-हर कहीं महसूस की जा सकती है चीख की उपस्थिति,  चीखते सवालों के जवाब दिए जा रहे हैं, और  अधिक जोर से चीखते हुए...आज का सच, जस का तस।  अनवरत, त्यागपत्र और चीख कविताएं दिल मे उतर गईं। 


अजय श्रीवास्तव 1- अनवरत - बढ़िया कविता आशावाद जगाती...
2 - मन की रेत पर - अच्छी कविता - भाव को पकड़ने में थोड़ा प्रयास करना पड़ा।
3- त्यागपत्र - अच्छी कविता
4- फ़ांस - वाह ,क्षमा के स्नेह और पश्चाताप की बूंदों से, उभर आया है आज पुराना कांटा,मिट गई है धंसी फांस की , सारी पीड़ा।     उम्दा पंक्तियां , नायब अंदाज ...
5 - चीख - "चीखना इस समय का प्रमुख स्वर है" , " इतिहासकार या किसी पुरावेत्ता ...पत्थरों की चींखें" 
बहुत अच्छे भाव 

सभी कविताओं की शुरुआत बहुत ही प्रभावी है।त्यागपत्र कविता थोड़ी कम प्रभावी लगी।
ब्रजेश जी की कविताओं में जीवन दर्शन ,अनुभव की झलक दिखाई देती है। महज शब्दों का खेल या बिम्ब-प्रतिबिम्ब का आडंबर नही।यही पठनीय ,स्मरणीय बनाता है कविताओं को।


आरती तिवारी : बृजेश सर की कवितायेँ अपने समय के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं,जिनमें कहने से ज़्यादा अनकहा है, हर कविता अपने आप में विशिष्ट और पूर्ण है किंतु मुझे पहली कविता, अनवरत ने अलग से प्रभावित किया, इसमें निहित सन्देश का अर्थ अपनी क्षीण बुद्धि से लगाने के प्रयत्न में मैंने पाया, कि ये  चरैवेति चरैवेति कह रही है, जीवन और समय का चक्र अनवरत चलता रहता है एक के खत्म होने से पहले दूसरा नव पल्लवित प्राण उसे गति देता रहता है।

दिनमान का अंतिम पुत्र
लड़ाई के आखिरी दौर में
जब फड़फड़ाने लगता है
बारह नये दोस्त सलाम कर
नए संघर्ष का ऐलान करते हैं,

ये खत्म होते साल का अंतिम दिन है, जिसे 12 बजते ही एक नया साल रिले के बेटन की तरह थाम आगे बढ़ जाता है, रंगमंच पर अपनी भूमिका
का निर्वाह करने के लिए, ये तो हमारा भ्रम है कि ये ख़त्म हुआ दरअसल वो एक दूसरे नये की शुरुआत होती है।
मुझे ये कविता बहुत अच्छी लगी🏵🏵 सर की कविताओं पर हम क्या कहें हम उनसे सीखते हैं। उन्हें नये संग्रह कोहरे में सुबह की हार्दिक शुभकामनाएं

मधु सक्सेना : बृजेश जी की कविताएं अपने समय पर अपनी उंगलियों से अपनी बात लिख रहे है ।घायल उंगलियों की पहचान तो है पर चीख़ सिर्फ कवि ही सुन पाता है और वही चीख़ फिर शब्दों में बिखर कर पाठक को उद्देलित करती है मानों कोई धीरे से पिन चुभा दे और चिहुंक उठे बहुत से मन ।

बृजेश जी कविता लिखते नही कहते है ।शब्दों का खेल न रचकर  बात करती है कवितायें ।सामने बिठाकर धीरे से कठिन बात भी कर जाती है ।
कुछ कविताये तो इसी समूह में दिए विषय पर है ।
ये समूह लिखवा भी लेता है ।

कविताओं की कोमलता से कवि का स्वभाव भी पता चलता है तभी कह जाते है कवि मिट गई धंसी फांस की सारी पीड़ा।।।।।
कविताओं में कुछ जगह तारतम्य टूटा सा लगता है कुछ और कसावट हो तो कवितायें अपने स्वर को और मुखर करेंगी ।
बधाई बृजेश जी ..
आभार ....
सुधीर देशपांडे :आदरेय ब्रजेशजी की इन कविताओं में से कुछ कविताये लिखो कविता में पढ़ी हुई है। एक समर्थ रचनाकार के लिए किस तरह विषय सहज हो जाते उसका उदाहरण अंतर्मन, त्ययागपत्र फांस


अबीर आनंद :
अनवरत
एक मुग्ध नाग नाचता है 
अपनी पूंछ को मुंह मे दबाए।
प्रकृति के कई इशारो में स्वयं को ऊर्जा देने का आख्यान भी है। आदमी का अपना संघर्ष तो है ही पर कभी-कभी पेङ-पौधों और जानवरों को देखकर लगता है जैसे वे खुद को प्रेरित करने में आदमी से भी आगे हैं। वरना, न कोई संपत्ति, न अतिशय मोह, फिर भली क्यों मयूर भी सावन का मोल समझते हैं। 
मन की रेत पर
मन की रेत, आँसुओं की लहरें और स्मृति के फूल, सरल और सुंदर बिंब है। मीठा समुद्र में फिर एक सकारात्मक अपील है जो पुनः आशावादी सोच को रेखांकित करती है।
त्यागपत्र
शब्दों में एक मितव्ययता है जो आकर्षित करती है। थोङे में बहुत कुछ समेटने का प्रयास है। 'त्यागपत्र' अच्छी कविता है हालांकि शीर्षक कुछ सटीक नहीं लगा।
चीख
समसामयिक माहौल को कविता की अपील खोए बिना व्यंग्यात्मक लहजे में उतारती बहुत सुंदर कविता है। इस संकलन की  पसंदीदा कविता लगी। कई वाक्य गहरे उतर गए।
पर यह चीखने चिल्लाने का दौर है 
एक चीख फ़ैली है हमारे चारों तरफ...  
संग्रहालयों और स्मारकों के भीतर की शान्ति की तरह...
खामोश शिल्प और कलाकृतियों को सुनने के लिए
सड़क पर बेसुध पड़ा अकेला आदमी 
एक चीख के बाद खामोशी से चीखता चला जाता है
चलती कार से उड़े दुप्पटे 
जैसे किसी गर्म तंदूर से निकलती चीख



प्रस्तुत कविताएं और उन पर प्रतीक्रियायें वात्सअप पर साहित्यिक समूह साहित्य की बात पर सुरेन  सिंह द्वारा विमर्श हेतु   लगे गई |




Thursday, November 30, 2017

जब न्याय की तुला अन्याय के बोझ से अस्थिर हो जाती है ,जुल्म और सितम से त्रस्त जनता हाहाकार कर उठती है तब इन्कलाब आता  है और क्रांति की मशाल जलउठती है | |ऐसे समय में कलम भी  क्रांति की सिपहसालार होकर जनपक्ष में अपने शब्दों की समिधा  होम करती है |कुछ ऐसे ही शब्दों का आव्हान है, निर्बलजन और भूमिपुत्र  की पीड़ा की बैचेनी है सुरेन्द्र रघुवंशी के  तीसरा कविता संकलन "पिरामिड में हम "|

इसका विमोचन भोपाल में चल रहे भोपाल जनोत्सव में देश के प्रख्यात हिंदी साहित्यकार असग़र वज़ाहत और विष्णु नागर ने किया। इस अवसर पर समकालीन कविता के प्रमुख कवि बड़ी तादात में मौजूद रहे। विमोचन पूर्व परिचय में प्रमुख चित्रकार , कथाकार और संचालक 'सृजन पक्ष' पत्रिका के निरन्तर संचालन के लिए एवं सोशल मीडिया पर विभिन्न समूहों और फेसबुक के माध्यम से हिन्दी साहित्य के प्रचार प्रसार के लिए सुरेन्द्र रघुवंशी के निरन्तर महत्वपूर्ण अवदान का उल्लेख प्रमुखता से किया गया।




 सुरेन्द्र रघुवंशी की कुछ कवितायें ,मधु सक्सेना की समीक्षा और समकालीन साहित्यकार एवं सुधि पाठकों की प्रतिक्रियाओं के साथ आपके ब्लॉग रचना प्रवेश पर आपके अवलोकनार्थ ....                    

  || व्यवस्था का यह शीर्ष राक्षस ||   

भूसा के भाव बिक रहीं हैं फसलें
मजबूरी की मंडियों में नीलाम हो रहा है स्वाभिमान
हमारे सिर से उतार ली गई है पगड़ी
और पैरों से जूते निकाल लिए गए हैं
नंगे पाँव कंटीले और खाइयों वाले रास्ते पर है हमारी यात्रा

हमारे तलवों  का सीधे कांटों से मुकाबला है
यहां खून सपनों में नहीं बल्कि शरीर से चू रहा है
हमारे हाथ धोखे की रस्सी से बांध दिए गए है
और पैरों में आश्वासन की बेड़ियां हैं

हमारे अधिकारों के सितारे हाथों से छीन
उन्हें आसमान की चादर में टांक कर
जीवन और संसार के सौन्दर्य के गीत गा रहा है राक्षस
चारण झूम झूमकर गा रहे हैं यश गान
उन्हें मिला है अभयदान 

व्यवस्था का यह शीर्ष राक्षस गटक गया 
हमारे हिस्से की कल-कल स्वर से बहती सुन्दर नदियों को
और आजकल वह दे रहा है पानी के महत्व पर प्रवचन
हम ज़िंदा हैं कीचड़ से नमी की तलाश में

हमारे बिकने जा रहे खेत रोज सपनों में आलिंगन करते हैं
और रोते हुए बचने के लिए गुहार लगाते हैं
जैसे दलाल के चंगुल में फंसी औरत बिकने से बचने हेतु
रोती है बेबसी में मुक्त होने की उम्मीद में
कि पसीजेगा दुष्टों का हृदय और वे दया दिखाएंगे
भूलते हुए इस ज़रूरी सत्य को
कि विनती करने से न तो कभी इतिहास बदला है
और न ही बदलेगा वर्तमान...



🔶🔷🔶🔷🔶🔷🔶

 || शक्ति का गर्वोक्त प्रदर्शन ||

संग्रहालय की यह काली सुरंग
घूम फिरकर इतिहास के कलंक तक जाती है

जहां धोया गया है खून से सने इन हथियारों को
वहां खून की एक जमी हुई नदी है
उसमें लहराते हैं सैनिकों के असंख्य हाथ

हड्डियों का पुल है जिस पर चल रहे हैं
सरकारों के सत्ता रथ टप टप टप टप
यह जो शोर सुनाई दे रहा है चारों ओर
जन -जन का हाहाकार है
अनसुना ही रह गया आर्तनाद है अपने बचाव में

यह जो पेड़ हिल रहे हैं
इनके हिलने का कारण हवा बिल्कुल नहीं है
यह अपने भय के भयावह मिश्रण से कांप रहे हैं
हवा में तो पेड़ खुशी से झूम उठते हैं

खून की यह जमी हुई नदी
 पिघलकर बहने लगी है इतिहास से वर्तमान की ओर
जबकि खेतों की सूखती हुई फसलों को
पानी की वेगवती नदियों की ज़रूरत थी

यह कौन दैत्य आ गया हर गाँव के खेत और बगीचे में
जिसने अपने मायाजाल  से
 पेड़ों से सारे मीठे फल उतार लिए
और किसानों को मार-मारकर 
 पेड़ों की डालियों पर उनकी लाशों को लटका दिया

अपने चेहरों को ढके हुए 
ये अंधेरे के कौन पैरोकार हैं 
जो मनुष्यता के आकाश से
सभ्यता और विकास के सूरज को निगल रहे हैं
                                                         
यह शक्ति का महान गर्वोक्त प्रदर्शन है
जहां लोगों को मारने के लिए असंख्य हथियार हैं
और उनको बचाने के लिए उपायों पर
इतिहास से लेकर अब तक 
मौन की एक लम्बी और गहरी खाई है



🔶🔷🔶🔷🔶🔷🔶

 || हिटलरी जूतों की आवाज ||  

 मैं इस अंधेरे समय में
उम्मीदों का एक दीपक ढूंढ रहा हूँ 
दीपावली तो अमीरों के महलों में कैद है

यहां घिसट रही है उदास ज़िन्दगी
उसके चेहरे पर मजबूरी की मक्खियां भिनभिना रही हैं
खेत हार गए हैं अपने कंधों पर बोझा ढो- ढोकर

कर्ज़  और फसलों के लागत मूल्य से भी कम भाव
फांसी के फंदे तक ला रहे हैं धरती पुत्र को
यहां जीने की नहीं मरने की होड़ है
जबकि सरकार मदमस्त हाथी की तरह झूमते हुए 
अपनी अमरता का गौरव गान गाने में मस्त है
वह आजीवन नहीं छोड़ना चाहती  सत्ता की कुर्सी

देश अघोषित शवयात्रा में मौन धारण किए हुए चल रहा है
पर व्यवस्था के प्रतिक्रिया रजिस्टर में 
इसे मातम नहीं बल्कि उत्सव की तरह दर्ज़ किया जा रहा है..

व्यवस्था के गिद्दों और काले कौवों से भर गया है
अपनी प्रकृति में नीला और स्वच्छ रहने वाला आसमान
असंख्य जन चिड़ियाएं धरती पर चुपचाप रेंग रही हैं
क्योंकि काट दिए गए हैं इनके पंख
धरती लहू लुहान कर दी गई है

हवा में डरते-डरते हिलती हैं पेड़ों की शाखाएं
कुल्हाड़ियाँ लिए तमाम हाथ चले आ रहे हैं उनकी ओर
पटाखों के धमाकों की नहीं
बल्कि चलते हुए हिटलरी जूतों की आवाज़ कानों में सन्नाटा भर देती है..



🔶🔷🔶🔷🔶🔷🔶

        || प्रेम ||

उसमे इतना आवेग है
कि अपने प्रवाह पथ में
उसने कभी स्वीकार ही नहीं किया कोई अवरोध
वह कभी अपने तट के भीतर
तो कभी तट के बाहर बहा
हार कर रुक नहीं गई धार
उसकी तरलता में कृत्रिमता का नमक नहीं है

वह यथार्थ के ताप से उपजा है
ज़रूरी नहीं कि सभी देख पाएँ उसे
उसे देखने के लिए वैसी ही नज़र चाहिए जैसा वह है
वह आकाश में आवारा बादलों जैसा है
तो धरती पर पगली-सी बहती फिरती नदी जैसा भी है
पेड़ पौधों में फूलों जैसा है
शरीर में आँखों जैसा है
एक अकथनीय सत्य जैसा वह व्याप्त है हवा में
वह आँखों की तरलता में ध्वनित होता है
तो होंठों के फैलाव में विस्तार पाता है

मैंने उसे कई रूपों में देखा है
ठीक-ठीक कहूँ तो
वह बिल्कुल तुम्हारे जैसा है...



    🔶🔷🔶🔷🔶🔷🔶

         || प्रेम (दो) ||

वह क्या था जो उगा नितान्त बंजर में
जो लू के थपेडों में भी नहीं जला
जो तुम्हें पकड़कर लाया मेरे पास
जो दो अलौह देहों के बीच 
एक रंग विरंगी सशक्त चुम्बक था

जिसमें दुनिया का सबसे सुंदरतम राग छिपा था
जिसे मुस्कान से ऊर्जा मिलती थी
जिसे स्पर्श से मिलती थी खाद
जिसे आंखों के उदगम से निकली खारी नदियों से जीवन की हरियाली मिलती थी...

वह क्या था जो दुनिया के षड्यंत्रों से ऊबकर
द्वीपों के एकान्त में बसना चाहता था
जो बादलों में उड़ता था और फूलों में महकता था

वह आम हवा के साथ नहीं बहा
और उसकी अपनी मौलिक हवा थी
साहस की घटाओं से टकराती हुई
और सौन्दर्य की बरसाती झड़ी को भी झुलाती हुई

वह क्या था और क्या है
जो तुम्हारे और मेरे भीतर बिल्कुल एक जैसा है
वह दुनिया के जन्म के साथ उपजा है
और रहेगा दुनिया के रहने तक



🔶🔷🔶🔷🔶🔷🔶

         || गुफ़ा समय ||

कई बार मुझे लगता है
कि मेरे दुःस्वप्न को नींद से निकालकर
सीधे यथार्थ में बदल दिया गया है

मुझे बलात पटक दिया है सघन जंगल में
जहां हरियाली के महोत्सव के नाम पर 
काटे जा रहे हैं अनगिनित पेड़
पक्षी बेघर होकर आसमान में उड़ रहे हैं
 हाहाकार करते हुए चोंच फाड़-फाड़कर
वे थककर जब नीचे गिर जाते हैं
तो बहेलिए उन्हें उठा ले जाते हैं

भेड़िया शेर की खाल ओढ़कर दरबार लगाए बैठा है
और सारे  सियार  हू -हू  के अंध समर्थन में उत्सव मना रहे हैं

जब यही सच  मैंने बोल दिया सरेआम
तो हू-हू  पंचायत ने मुझे देशद्रोही  करार देकर
उग्र जंगलवाद का नारा बुलंद किया...

इस जंगलराज में इंसानियत नामक  युवती
अपनी लाज बचाने के लिए 
भटकती हुई फिर रही है
और उसके पीछे पड़े हैं खूंखार बलात्कारी

हमारा सामना सदियों पुरानी गुफाओं के अंधेरों से है
जो न तो विज्ञान के सूरज को मानते और न ही खुली हवा को मान्यता देते हैं....



   🔶🔷🔶🔷🔶🔷🔶

|| दीवारों की ऊँचाई की एक सीमा है  ||

मेरे पास तुम्हारी सहमति का अनन्त आकाश है
समर्पण की एक भुरभुरी धरती है
जहां उगती है विश्वास की हरी भरी दूब

दुनिया के यातनागृह के बाहर तुम एक खुला मैदान हो
जहां बन्दी नहीं हैं इच्छाएं
और जीवन का अर्थ विशुद्ध व्यापार , 
लाभ  या खजाना नहीं होता
यहां तराजू पर नहीं तौले जाते रिश्ते और निर्णय

तुम्हारा रंग बहुत मिलता है ऊंचाई पर उड़ते हुए पक्षियों से
तुम्हारे पंखों को अक्सर देखा है जो फड़फड़ाना चाहते  हैं
इन्हीं पंखों को सुरक्षित रखने और काटने  के 
दो पृथक द्वन्दात्मक वर्ग 
हमारी दुनिया की असल पहचान है

पर कितनी भी तलवारों और दीवारों की उपस्थिति
मनुष्यता की प्रतिबद्ध उड़ान को नहीं  रोक सकती

दीवारों की ऊँचाई की एक सीमा है
पर आज़ादी की उड़ान निस्सीम है
मैं तुम्हारे साथ इस उड़ान की अठखेलियों की 
अपेक्षित जुगलबन्दी पर निकल जाना चाहता हूँ....

      🌼 ||| सुरेन्द्र रघुवंशी ||| 🌼

***************
परिचय

 सुरेन्द्र रघुवंशी

🌷🌷🌷🌷🌷🌷


जन्म- 2 अप्रैल सन 1972
गनिहारी , जिला अशोकनगर मध्यप्रदेश में
शिक्षा- हिंदी साहित्य , अंग्रेजी साहित्य और राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर ।
आकाश वाणी और दूरदर्शन से काव्य पाठ
देश की प्रमुख समकालीन साहित्यिक पत्रिकाओं ' समकालीन जनमत' , ' कथाबिम्ब' , ' कथन' , 'अक्षरा' , 'वसुधा' , ' युद्धरत आम आदमी' , 'हंस' , 'गुडिया' , ' वागर्थ', ' साक्षात्कार' , ' अब' , 'कादम्बिनी' , ' दस्तावेज' , ' काव्यम' , ' प्रगतिशील आकल्प' ' सदानीरा' ' समावर्तन ' एवं वेब पत्रिकाओं ' वेबदुनिया' , ' कृत्या' सहित देश की तमाम प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में
कविताएँ , कहानी, आलोचना प्रकाशित ।
मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी द्वारा ' जमीन जितना' काव्य संकलन प्रकाशित

दूसरा काव्य संकलन 'स्त्री में समुद्र'
तीसरा काव्य संकलन ' पिरामिड में हम ' ।' साँच कहै तो मारन धावै ' (डायरी) प्रकाशित
शिक्षक आन्दोलन से गहरा जुडाव
विभिन्न जन आन्दोलनों में सक्रिय भागीदारी
अपने नेतृत्व में मध्य प्रदेश में 11000/- सरकारी शिक्षकों की सर्वोच्च न्यायालय के माध्यम से नियुक्ति ।
मध्य प्रदेश शासन के स्कूल शिक्षा विभाग में शिक्षक के रूप में कार्यरत ।
विभिन्न सामाजिक और मानवीय सरोकारों के विषयों पर विभिन्न मंचों से व्याख्यान ।
कुछ कविताओं का अंग्रेजी और फिलीपीनी टेगालोग भाषा एवं मराठी , गुजराती एवं मलयालम आदि भारतीय भाषाओँ में अनुवाद ।
कविता कोष में कविताएँ शामिल ।
हिंदुस्तान टाइम्स डॉट कॉम और नवभारत क्रॉनिकल का संयुक्त बोल्ट अवार्ड ।
एयर इंडिया का रैंक अवार्ड ।
मानवाधिकार जन निगरानी समिति में रास्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य के रूप में कार्य ।
प्रांतीय अध्यक्ष मध्य प्रदेश राज्य शिक्षक उत्थान संघ
जनवादी लेखक संघ में प्रांतीय संयुक्त सचिव (म. प्र.)
एडमिन/ सम्पादक-
'सृजन पक्ष' -वाट्स एप दैनिक एवं फेसबुक साहित्यिक पत्रिका
'जनवादी लेखक संघ'- फेसबुक साहित्यिक पत्रिका
'जनपक्ष'- फेसबुक साहित्यिक ग्रुप
संपर्क -महात्मा बाड़े के पीछे , टीचर्स कॉलोनी अशोक नगर मध्य प्रदेश, 473331 ।
मोबाईल 09926625886
email-surendraganihari@gmail.com
srijanpaksh@gmail.com
================================================

समीक्षा ,
मधु सक्सेना 


जब व्यवस्था जनता के हित की ना सोचे ,खुद के विकास पर घ्यान दे ,जब आकाश में क्रूरता के बादल छाए और घरती रक्तरंजित हो जाये ,जब मानवता की
बलि चढ़ाई जाने लगे तो,..... कोई आवाज ,कोई हाथ जरूर उठता है मानवता के पक्ष में । हज़ारों को स्वर देता है ...हज़ार हाथ बन कर परे धकेलता है आतताइयों को।
हिम्मत ,साहस ,हौसला और विवेक को साथ लेकर चल पड़ने वाले कवि के कथनी और करनी में अंतर नही है ।
जितनी कठोरता से ललकारते हैं उतनी हो कोमलता से प्रेम कवितायें लिखते है सुरेंद्र ...
कवि की कविताओं में भाव पक्ष  और कलापक्ष दोनों ही प्रबल हैं। वे यहां बिम्ब , प्रतीक और नवीन उपमानों के साथ उपस्थित हैं ।
 सुरेन्द्र रघुवंशी प्रतिरोध और साहस के हमारे समय के सबसे महत्वपूर्ण क्रांतिकारी कवि हैं। आम जन और गरीब किसान मजदूर के शोषण के ख़िलाफ़ व्यवस्था को गरियाते हुए वे कोई भी परवाह नहीं करते। साहित्य में जुगाडमेंट की राजनीति से दूर सुरेन्द्र रघुवंशी उम्मीद का एक आभामण्डल हैं। सुरेन्द्र रघुवंशी मूलतः धूमिल , पाश , बाबा नागार्जुन और दुष्यन्त कुमार की परम्परा के क्रांतिकारी जन कवि हैं। उन्हें पढ़ना निश्चित ही सुखद होगा।
जनवादीऔर क्रांतिकारी कवि सुरेंद्र रघुवंशी का तीसरा कविता संग्रह ''पिरामिड में हम '" अपनी पूरी ऊर्जा ,साहस ,और उद्देश्य को  लेकर हमारे सामने है ।कलम में आग भरकर लिखी ये कवितायें जितना झुलसाती है उतना ही अपनी गहरी प्रेम कविताओं से मन को सुकून भी दे जाती हैं । असल मे आग और पानी का संतुलन ही जीवन है ।
 मनुष्य को मनुष्य बनाये रखने की जद्दोजहद और ज़िद है कवि के मानस में ।हर विषय को समेट कर उनमे प्राणतत्व फूंक कर बुराई के खिलाफ शंखनाद करती है ये कवितायें । आसपास की विसंगतियों का पुरजोर  विरोध और जनमानस के मन के दुख की पड़ताल करती हैं । सच की धरती से उठी ,निर्भय कवितायें शब्द -शब्द से अलख जगाती है।
  कवि की चिंता में  सत्ता , अन्याय ,जंगल ,नदी ,सागर आग ,प्रेम ,लड़की आदि सब हैं ।इसीलिए ये कवितायें समूचे समाज को बदल डालने और हर व्यक्ति के हक़ में अंगद के पांव की तरह खड़ी है ।
प्रतीक ,विम्ब ,भाषा ,भाव ,लय , सम्प्रेषणीयता आदि के ताने बाने से गुंथी ये कवितायें आज के समय के लिए बहुत ज़रूरी हैं । कुछ उदाहरण देखिये ... 

1 .. जब दुनिया से गायब हो रहा है सत्य 
    कवि तुम विश्वास के बाल पकड़ कर 
    सत्य को चेहरे से झिझोड़कर जगा दोगे ।

2..प्राकृतिक सिद्धांत के बहाने ही सही 
   पर विचार करो सरकार !
पेड़ों पर तो खुशियों के फूलों में 
समृद्धि के फल लगते आये हैं हमेशा से 
पर तुम ये कैसा विनाशकारी मौसम ले आये 
कि इन पर लाशें लटकने लगी ...

3..प्रेम की आवारा हवाएं
किसी मौसम की मोहताज़ नही होती 
इच्छाओं की बदलियां बरसकर मिटा देती हैं 
हृदय के संताप को ....

 इस संग्रह में छियत्तर कवितायें है जो अपनी चमकदार उपस्थिति से पाठक को आंदोलित करती है ...राह सुझाती हैं ,सच की वकालत करती हैं और मानवता के पक्ष में निर्भीकता से खड़ी होती हैं । बधाई सुरेंद्र रधुवंशी जी को इस सार्थक लेखन के लिए ।उनके कलम की ताकत बनी रहे ।युगों तक साथ रहे उनका लेखन ।शुभकामनाएं ।

                           मधु सक्सेना
===========================================================

उपरोक्त कविताओं पर चुनिंदा टिप्पणियां-

नौकरी के व्यस्ततम क्षणों के चलते समूह में सक्रिय नहीं हो पा रहा हूँ। सुरेंद्र की कविताएँ अभी पढ़ पाया। सुरेंद्र और उनकी कविताओं के बारे में कुछ बातें जो दोहराव हो सकती हैं लेकिन फिर भी दोहराना चाहूँगा। सुरेंद्र रघुवंशी से मेरा परिचय काफी पुराना है। लगभग 15 वर्षों पूर्व उन्होंने अपने पहले कविता-संग्रह ज़मीन जितना की पांडुलिपि मुझे पढ़ने को दी थी इस आग्रह के साथ कि मैं इसका फ्लैप लिखूँ। मैंने सुरेंद्र से कहा कि बेहतर होगा कि किसी वरिष्ठ कवि/आलोचक से लिखवाओ। मैं इस योग्य नहीं हूँ। लेकिन सुरेंद्र ने मानो ज़िद पकड़ ली थी कि नहीं लिखेंगे तो आप ही। मैंने आधे मन से प्रस्ताव स्वीकार कर लिया वह भी इस शर्त के साथ कि यदि मुझे कविताओं में कुछ दिखेगा तो लिख दूँगा। दरअसल सुरेंद्र उस समय लेखन के प्रारंभिक काल में  थे (जो हर कवि का होता है)। उनकी कविताओं को हिंदी साहित्य ने गंभीरता से नहीं लिया था। मैंने भी। छिट-पुट कविताओं से सुरेंद्र का कवि बन नहीं पा रहा था। कई दिनों तक पांडुलिपि यूँ ही पड़ी रही। फिर एक दिन जब मैंने उन्हें पलटना शुरू किया तो कुछ कविताएँ पढ़ कर ठहर  गया। मुझे लगा कि सुरेंद्र हल्के में लिए जाने वाला कवि नहीं है। वे किसी कवि के बनने के दौर की कविताएँ थीं। अपने तमाम काव्याभ्यासों के बावजूद उनमें संवेदनों की महीनता, अपनी ज़मीन से जुड़ाव की व्यग्रता और भाषा का देशजपन था। मैंने तीन बार स्क्रिप्ट पढ़ी और फ्लैप लिखा। खूब मन से लिखा। दरअसल यह इस तथ्य की भी तस्दीक थी कि कुछेक कविताओं से किसी कवि का चित्र साफ नहीं उभरता। जब हम किसी कवि की इकट्ठी कविताएँ एक साथ पढ़ते हैं तभी कवि समझ में आता है। उस पहले संग्रह के लोकार्पण में राजेश जोशी और रामप्रकाश त्रिपाठी अशोकनगर आए थे। राजेश जोशी को फ्लैप इतना पसंद आया कि जोश में कह गए कि मैं अपने अगले संग्रह का फ्लैप निरंजन से लिखवाऊंगा। तो तात्पर्य यह कि सुरेंद्र को पढ़ना मेरे लिए एक प्रीतिकर अनुभव है।  उनके बाद के संग्रहों में कवि का ऊर्ध्वाधर विकास स्पष्टतः परिलक्षित होता है। वे संदर्भों की सीमाओं का अतिक्रमण कर उन्हें नए अर्थों से भर देते हैं। यहाँ मधु जी द्वारा प्रस्तुत कविताओं में भी उनकी राजनीतिक/सामाजिक प्रतिबद्धता साफ देखी जा सकती है। सुरेंद्र की कविताएँ राजनीतिक/आर्थिक दुश्चक्रों के विरोध में उठा एक सार्थक स्वर है। वह मनुष्य के पक्ष में खड़ी कविता है। वे हिटलर के बूटों की आवाज़ से दहलते नहीं बल्कि मनुष्य को उसके खिलाफ एकजुट होने की जिजीविषा से भर देते हैं। आप इन कविताओं के शिल्प, भाषा और संवेदनों में किसी किस्म की सायास प्रविधि या प्रायोजना नहीं पाएँगे। एक साफ नीयत वाले कवि को इस तरह पढ़ना सुकूनदायी है।
               -  निरंजन श्रोत्रिय

===================================================



"देश अघोषित शवयात्रा में मौन धारण किए
हुए चल रहा है
पर व्यवस्था के प्रतिक्रिया रजिस्टर में
इसे मातम नहीं बल्कि उत्सव की तरह
दर्ज किया जा रहा है।"

सुरेन्द्र रघुवंशी की कविताएं कवित्व की परवाह किए बगैर रची गई हैं।
इन कविताओं में जो 'अपील' है वह अपना टटकापन इसी कारण अर्जित करती है। वे सत्ता से टकराती हुई सत्ताधारी के कुचक्रों को बेनकाब करती हैं। 
इन कविताओं की जनपक्षधरता पर्देदारी में न रहकर मुखर है, प्रकट है और निर्भ्रांत है।
यह तंद्राकारक कलासर्जना न होकर विचारोत्तेजक शब्द सृजन है।
कबीर का गुस्सा और कबीरी प्रेम दोनों इन रचनाओं में हैं।
पिंजर प्रेम प्रकासिया, अंतर भया उजास।
मुख कस्तूरी महमही, बानी फूटी बास।
       
भारतीय साहित्य में किसानों को लेखन के केन्द्र में लाने वाले पहले कवि को नमन।
उसी परंपरा में सुरेन्द्र रघुवंशी जी को पाकर प्रसन्नता का पारावार नहीं।

ये कबूतर शांति के प्रतीक नहीं, जीवन संघर्ष के रूपक हैं।
इन्हें नैतिक समर्थन देने के लिए सुरेन्द्र रघुवंशी जी इनके बीच में हैं।

- बजरंग बिहारी तिवारी
===========================================================

सुरेंद्र भाई से मेरा पहला परिचय उनकी कविताओं के रास्ते ही हुआ था , पहली बार एक दूरदर्शन के कार्यक्रम में कुछ साल पहले । मित्रता तो बाद में हुई । उनके जीवन के बारे में जितना जाना , जितनी भी मुलाकातें हुई इस कवि के साथ उतनी  ही निकटता उनकी कविताओं के साथ होती गई । उनके जीवन और सृजन के बीच फांक नहीं दिखती। जैसे ठेठ और  अपनी धरती से जुड़े मनुष्य हैं वे ठीक यही देसीपन और ठेठ अंदाज उनकी कविता में दीखता है । कविता उनके लिए इस चित्र में दिख रही तोप की तरह ही लगती है , यह ज़ुनून हो सकता है पर उनके लिए यही सच है और हमे उनकी इस मासूमियत पर फक्र है और प्यार भी । जैसे दिखो वैसा लिखो , यही उनकी कविता का उत्स है । वे आम मनुष्यता की कविता रचते हैं। उनका रचना संसार धूल धूसरित समय के खिलाफ एक चेतवानी है , अलख भी । वे कलावादी लटको झटकों की ज्यादा परवाह नहीं करते । विचार उनकी कविता की रगों में रक्त बनकर दौड़ता है । अपने समय का हाहाकार , विवशता , आक्रोश सब एक साथ एक राग के रूप में हमारे सामने अभिव्यक्त होता है। अपने निजी जीवन में वे जिस तरह अपनी बस्ती और परिवेश के साथ जुड़े हैं - छात्रों का आंदोलन ही , शिक्षक साथियों की रैली हो , किसानों का आंदोलन हो , वे हर जगह मौजूद रहते हैं , अपनी सक्रियता के साथ । यहीं से वे अपनी कविता के लिए प्राण वायु लेते हैं । कवि को शुभकामनाएं , बस यूँ ही रचते रहो 👍💐

-मणि मोहन मेहता 
====================================================



गुफा समय में सुरेंद्र रघुवंशी की कविताएँ
➖➖➖➖➖➖➖➖➖➖➖

प्रत्येक कवि सत्ता पर अपनी नज़र रख रहा है। जो नज़र नहीं रखते सत्ता या व्यववस्था पर और लिखे जा रहे हैं उनकी काव्य चेतना पर हमें विचार करना होगा। जो सत्ता-व्यवस्था के व्यवहार के लिए कसीदे काढ़ रहे हैं उनपर विचार नहीं करना होगा। जो मौन हैं और सतत मौन हैं उनका मौन प्रायोजित है। इस प्रायोजित मौन की भयावहता भविष्य में परिलक्षित होनी है। ऐसे मौनियों को प्रणाम।
ये कविताएँ व्यवस्था के प्रति आलोचकीय दृष्टि रखती हैं अतः इनके मुखर होने में ही इनका अभीष्ठ है। 
कई कारणों से खेत, किसान, खेती-किसानी, किसानी सभ्यता आदि ने मुझे अचानक अपनी तरफ खींचा है। कहने की ज़रूरत नहीं कि इस देश में किसानों के साथ क्या हो रहा है! हम होश सम्भालने के बाद ही रटने लगते हैं कि भारत कृषि प्रधान देश हैं। देश की अर्थव्यवस्था का ८०% कृषि से आता है। सच्चाई कुछ और है। जहाँ की अर्थव्यवस्था कृषि पर निर्भर है उसका कॉर्डिनेट प्रति दिन फांसी लगा है। यही व्यवस्था आत्महत्या को मृत्यु का कोई दूसरा कारण सिद्ध कर दे रही है।
जिस देश के किसानों को रीढ़ मानना चाहिए उसे गोली मार दी जा रही है। उसकी पगड़ी उछली जा रही है। उसका आधार छीन लिया जा रहा है। जो किसान आत्महत्या नहीं कर रहे, आंदोलन कर रहे हैं उन्हें गोली मार दी जा रही है। कई राज्यों से आंदोलनों को नेगोशिएट किया जा रहा है। व्यवस्था हर हाल में किसानों के विरुद्ध नीतियां बना रही हैं। 
समूह के कितने साथी कपास-गन्ना उगाने वाले किसानों से जुड़े हैं। जबकि सूती/खादी सबों को चाहिए। चीनी के विरुद्ध गुड़ को हर कोई स्टेबलिश करने पर आमादा हैं।
विगत किसान-हत्याकांड के दिन, मैं सृजनपक्ष में बाद में जुड़ा, देर शाम मैंने व्हाट्सप ग्रुप्स के कई एडमिन को (जो मेरी विचारधारा से नहीं जुड़े हैं उनसे भी) आग्रह किया कि इस कुकृत्य के विरोध में अपने अपने समूह में संवाद कराएं। कुछ ने साफ मना कर दिया कि हमारा समूह साहित्य का है और यह मामला पोलिटिकल है। ऐसे लोगों से पूछा जाना चाहिए कि भाई क्यों लिखते हो, कागज़ क्यों बर्बाद कर रहे हो? लोगों की नज़रों में आने के सैकड़ों तरीक़े हैं, कुछ और करो पर यदि लेखन की तमीज़ न हो तो मत लिखो। 
इसी देश में एक फ़्रॉड हमसे-आपसे एक छोटा सा (बीमार होने का) बहाना बना कर लाखों रुपए उगाह ले रहा है और उसके साथ खड़े लोग तर्क देते हैं कि किस बात की कर्ज़ माफी, एक बैंकर भी जब कर्ज़ नहीं चुका पाता तो बैंक उससे पैसे उगाह लेती है। किसानों के खिलाफ ऐसे तर्कमारों के मुंह पर थूक देने का मन करता है। ये सभी फ़्रॉड हैं, जिन्हें चिह्नित कर साहित्य को एक हद तक गंदा होने से बचाएँ। मैं एक ही बात जानता हूँ, देश उसका जो खेत मे पसीने निचोड़े। जो किसी भी प्रकार से ज़मीन से नहीं जुड़ा उसे लिखने का हक़ नहीं है। 
सुरेंद्र रघुवंशी की कविताओं में वह ताप है जो यथास्थिति को पिघला दे। कविताओं में नाद है पंक्तियाँ देखें –

हड्डियों का पुल है जिस पर चल रहे हैं
सरकारों के सत्ता का रथ टप टप टप टप
यह जो शोर सुनाई दे रहा है चारों ओर
जन जन का हाहाकार है
अनसुना ही रह गया अंतर्नाद है अपने बचाव में

यह नाद किसानों के पक्ष में है अतः इस नाद में एक आवाज़ मेरी भी है। मैं हर उस व्यक्ति के साथ खड़ा हूँ जो खेतों के लिए, फसल के लिए, पेंड के लिए, जंगल के लिए, घास के लिए स्टैंड लेता है। मैं लिखने वाले प्रत्येक लेखक कवि के साथ हूँ जो ग्रास रुट पर लिखते हैं। इसीलिए मैं सुरेंद्र रघुवंशी के साथ खड़ा हूँ। काश के किसान हत्याकांड के दिन मैं सृजनपक्ष में होता, निश्चित ही  किसानों के पक्ष में व्यवस्था के प्रति आलोचकीय होते हुए हम समवेत स्वर में अपनी बात कहते।
समस्या यह है कि यह समय की व्यवस्था हंसोड़ है। रंग बदलने में माहिर। यह समय सिर्फ और सिर्फ उनका है जो व्यवहारिक रूप से पैरासाइट हैं। जिंदा वही रहेंगे जिन्हें संबंधों को चूस कर फेंक देने में सिद्धि प्राप्त हो। हम और आप इस गुफा समय में मिसफिट लोग हैं। मिसफिट लोग भविष्यदर्शी होते हैं। भविष्यदर्शी की कही को जब कोई कान देता है तब बड़ी असहजता होती है। कवि जब प्रायोजित शांति में कंकड़ मारेगा तो जिनने तथाकथिक शांति क्रिएट किया है वे बेचैन होंगे और आपको तड़ीपार करा देंगे (मानसिक ही सही)। गुफा समय का विस्तार इतना हुआ है कि वैज्ञानिक सिद्यांतो के खिलाफ आपके लिए ज़हर का प्याला तैयार है।
इस संक्रमित समय में जबकि कुछ भी अपने मूल स्वभाव में नहीं है, जब एक बड़े रद्दोबदल की ज़रूरत है, जब हर चीज़ पुनर्परिभाषित करने की मांग करती है चाहे संबंध हो या वस्तु; सुरेंद्र रघुवंशी की कविताएँ अनिवार्य कविताएँ हैं। 
शांडिल्य सौरभ
===================================================
सुरेन्द्र रघुवंशी समसामयिक विषयों पर गहरी दृष्टि रखने वाले कवि हैं खासकर जन जमीन से जुड़े विषय उन्हें उद्वेलित करते है
 उनकी कविताओं में आक्रोश है व्यवस्था और निज़ाम के ख़िलाफ़ इंकलाब है जो सोए हुए लोगों को जागते रहो कहकर होशियार करता रहता है ।
 आज़ आमजन की खासकर हमारे अन्नदाता किसान की वक़्त दर वक़्त मुसलसल बढ़ती जा रही मुश्किलों और तानाशाही टाइप निज़ाम 

की नीतियों पर उनकी पैनी नज़र है -देखें उनकी मारक पंक्तियां ,
हमारे सिर से उतार ली गई है पगड़ी /और पैरों से जूते निकाल लिए गए हैं ।
हमारे तलवों का सीधे कांटों से मुकाबला है ,,,,,।
इस तरह वे प्रहार करने में सफल हैं।
हड्डियों का पुल है जिस पर चल रहे हैं /सरकारों के सत्ता रथ टप टप टप टप /यह जो शोर सुनाई दे रहा है चारों ओर /जन जन का हाहाकार है ,,,,,।
  एक और रचना में उनका आक्रोश -मैं इस अंधेरे समय में/उम्मीदों का एक दीपक ढूंढ रहा हूं /यहां घिसट रही है उदास ज़िंदगी ,,,,।
आज़ की ज्वलंत समस्या किसान, कर्ज़ ,फांसी ,मंडी में लूट बढ़ती मंहगाई हम सब इससे दो चार हैं।
देश अघोशित शवयात्रा में मौन धारण किए हुए चल रहा है ,,l 
 दो रचनाएं प्रेम पर कवि की कोमल भावनाएं दर्शाती हैं तो सच बयानी और उजागर करने की नीति पर एक अजाना भय भी उसे परेशान करता है ।
 इस जंगलराज में इंसानियत नामक युवती /अपनी लाज बचाने के लिए /भटकती फिर रही है /और उसके पीछे पड़े हैं खूंखार बलात्कारी ,,,,।
 कुल जमा सुरेन्द्र की रचनाओं में सोच का एक वृहद दायरा है । उनकी भाषा सरल संप्रेषणीय है शब्दों में आक्रोश है जो मौन तोड़ने का आव्हान करते हैं । 


          - मुस्तफ़ा खान साहिल
====================================================

भाई सुरेन्द्र रघुवंशी की कविताएँ हमारे बुरे समय और हमारे समय के बुरे लोगों पर दूर तक जाकर चोट करने में सक्षम हैं।
            -  शहंशाह आलम
==================================================

सुरेन्द्र को हम ऐसा कवि कह सकते है जो खेत की मेड से लेकर संसद भवन के सामने खड़ा होंकर एक ही शिद्दत , हक और जूनून से कविता लिख सकते है। समाज  के आखिरी आदमी की कविता जो किसान से लेकर अध्यापक तक सब हो सकता है।
                -राजनारायण बोहरे
====================================================

सुरेंद्र जी की कविता सत्ताधारियों के ख़िलाफ़  निडरता के साथ बुलंद स्वर में अपनी बात कहती हैं। 
 चाहे किसानों पर हुए अत्याचार हों या आज़ादी की उड़ान का आह्वान हो या सत्ता की छुपी कुटिलता से भरी चाल हो ।  सभी का विरोध सुरेंद्र जी की कविताएं अपनी आक्रामक  शैली में  दबंगता से अपनी बात कहती हैं। आज ऐसी ही कविताओं की जन-जन को जरूरत है।
बधाई सुरेंद्र जी।
           - अर्चना मिश्रा
======================================================

बहुत बढ़िया कविताएँ हैं आज के परिवेश में प्रसंगिक सशक्त और सार्थक सुरेन्द्र जी निडरता से सत्ता के ख़िलाफ़ लिखते हैं । समाजिक सरोकार  की इन कविताओं की धार बहुत पैनी है । शुभकामनाएँ इसी तरह लिखते रहिए । 💐

-  शाहनाज इमरानी
====================================================

"इस जंगल राज में इन्सानियत खूंखार भेड़ियों   से अपनी जान बचाने  के लिए  भटक रही है।"बहुत  अच्छी  रचनाएँ  भाई  रघुवंशी  जी।  रचनाओं की स्थिति पर कुछ काम करें

      - रामकिशोर मेहता
====================================================

सुरेन्द्र रघुवंशी जी की कविताओं के स्वर  स्पष्ट हैं। वे जनपक्ष में जूझते ' सच के शब्द शिल्पी' हैं।
      
- हिमांशु शेखर झा
====================================================

: कविता जीवन का की रवानी के साथ साथ जीवन की सचाइयों को भी वया करती है इसमें कवि की ज़िदा दिली और खूबसूरती के साथ सच को देखने की आखे भी दी ब: सुरेन्द्र जी की कविताओं में एक रवानगी है बेवाकी है और समाज के सारोकरो की गहराई से अभिव्यक्ति।
             -अंजना बक्शी
=======================================================

कवि मन 
कविता मेरे लिए जीवन, मिशन और आन्दोलन है।जिन्दगी और कविता मेरे लिए दो अलग स्थिति नहीं हैं। मुझे कविता व्यंजनाओं से खेलते हुए कोई चमत्कारपूर्ण, कलात्मक और सायास  काव्य शब्दावली या प्रविधि नहीं है। बल्कि जीवन की यथार्थपरक  धरती पर संघर्ष की सवेग बहती नदी और अपने साथ हुए छल के खिलाफ़ उसका विद्रोह और प्रतिकार ही मेरी कविता है। न यहां चट्टानों की परवाह है और न ही पर्वतों सहित खाइयों की।जिस कृषक समाज में मैंने जन्म लिया है उसका व्यवस्था द्वारा निरन्तर चीर हरण , मर्दन , शोषण और यहां तक कि हत्या झकझोरकर रख देते हैं। उसके हक़ की आवाज को बुलन्द करना  और प्रतिकार में साहस का हथियार उसके हाथ में देना यही मेरी आजीवन कविता है और उसका ध्येय भी जो जन का प्राण है वही प्राण मेरी कविता का भी है और मेरा भी।  

                                   -   सुरेन्द्र रघुवंशी
=========================================================

Wednesday, November 22, 2017

रचना प्रवेश

रचना प्रवेश
आज हम एक ऐसे विषय पर *दीप्ति कुशवाह* का आलेख पढ़ेगें जिसके बारे में हम अपनी नई पीढ़ी को रत देखते है ,उन्हें टोकते भी है पर शायद उनकी दुनियां को समझने की कोशिश नही करते कि क्यों उन्होंने मनोरंजन के नाम पर अपनी पसंद  हमसे अलग कर ली ,क्यों उन्होंने अपनी नई दुनिया बना ली ।


जी हां मैं बात कर रही हूं *वेब दुनिया की वेब सीरीज* की
क्यों लुभा रही है यह सीरिज उन्हें ,टीवी ,थियेटर मूवी से हट कर वो खो देते है अपने आप को इस वेब दुनिया में | निर्माता का आर्थिक उपायोजन  कितना है |
जानते है  इस् दुनिया के प्रति आकर्षण को और कोशिश करते है युवा मन को समझने की ।उनके आनन्द और मनोरंजन को देखते है एक नई नज़र से ।





🅾🅾🅾🅾🅾🅾🅾🅾🅾🅾


परिचय


नाम : दीप्ति कुशवाह

कृतियाँ : कविता संग्रह – “आशाएँ हैं आयुध”,
        कला पुस्तिका – “मोतियन चौक पुराओ (भारतीय भूमि-भित्ति अलंकरण शैलियों पर)

उपलब्धियाँ :
-    आशाएँ हैं आयुध” को महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी का काव्य श्रेणी का प्रथम पुरस्कार – “संत नामदेव पुरस्कार”  (२०१६)
-    भारत सरकार के संस्कृति विभाग की ओर से लोककला के क्षेत्र में सीनियर फेलोशिप (२०१७-२०१८)
-    हिंदी पत्रकारिता दिवस पर कोलाज प्रदर्शनियाँ तस्वीरें बोलती हैं

कविता- पहल, समावर्तन, प्रगतिशील वसुधा, अहा ज़िन्दगी, ज्ञानोदय, वर्तमान साहित्य, कथाक्रम, नवनीत, सनदवागर्थ जैसी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन
लोककला के क्षेत्र में प्रचुर लेखन और अनेक सम्मान
लोकचित्रकार, एकल प्रदर्शनियाँ आयोजित
दैनिक भास्कर, नागपुर की हिंदी साप्ताहिक परिशिष्ट प्रभारी
संपर्क - पंचायतन, आर. पी. टी. एस. मार्ग, लक्ष्मीनगरनागपुर ()४४०-०२२महाराष्ट्र
मोबाइल  09922822699,      ई मेल 


मुश्किलें ही मुश्किलें हैं राहे-मंजिल में यहाँ, हौसले ही हौसले हैं आज़माने के लिए ...शलभ 

===========================================================


फिल्में बेकार, वेब से प्यार
..........................


अगर आपसे पूछें कि आपके घर के टीनेजर्स टीवी पर आने वाले, सो कॉल्ड सासबहू सीरियल्स देखते हैं ? यकीनन आपका उत्तर ‘नहीं’ होगा | सही है | भई, आज की पीढ़ी न तो ‘नागिन’ पर रीझेगी न जानबूझकर ‘मक्खी’ निगलेगी | मेंहदी-गरबा, जनम-पुनर्जनम, टेसुआपंती-ड्रामेबाजी...इनके फंदे में कैसे फंसेंगे वे !


कुल मिलाकर टीवी है मम्मियों-आंटियों के लिए...बचाखुचा पापाजी और दादाजी के लिए | इसीलिए, अब युवा खड़े दिखाई दे रहे हैं,  “वेब सीरीज़’’ के साथ | यही है नए जमाने का एंटरटेनमेंट | आपने युवाओं को, कानों पर हैडफोन चढ़ा कर, सिर से सिर चिपकाए या अकेले, मोबाइल, टैब, लैपटाप पर मशगूल देखा होगा | ये फिल्म नहीं, वेब सीरीज़ देख रहे हैं | युवाओं को सिनेमागृहों की दहलीज से खीँच कर, हाथ में थामी हुई छोटी स्क्रीन पर ला खड़ा करने वाले इस हंगामाखेज माध्यम में न मेलोड्रामा है, न मीलों लम्बे एडवरटाइजमेंट, न टीवी के सामने बंधे रहने की कवायद |


वेब सीरीज़, यू-ट्यूब की पापुलर संतानें हैं | स्क्रिप्टेड वीडियोज़ की इन श्रंखलाओं का ट्रेंड अब सिर्फ यू-ट्यूब पर ही नहीं, ट्विटर, इन्स्टाग्राम पर भी छा रहा है | फेसबुक ने भी इनसे प्रेरित होकर लाइव वीडियो की सुविधा एड की है |


जो लुभाता है


अगर एक चीज़ पर ऊँगली रखना चाहें जिसके कारण युवा वेब सीरीज़ की तरफ मुड़े हैं...तो वह है, इसमें बोल्ड कन्टेंट की उपस्थिति | यहाँ सेंसर बोर्ड की छन्नी नहीं जिससे कड़क कन्टेंट अलग कर दिया जाये | भगवा ब्रिगेड के खंजर भी बेकार यहाँ | समझ लीजिए, यहाँ कुछ वर्जित नहीं | अधिकांश वेब सीरीज में नॉनवेज मैटेरियल है, मुँहछूट गालियाँ हैं, खुले-उघड़े दृश्य हैं | जो वास्तविक जीवन में कठिन, वह सब मिल रहा यहाँ | इस मोर्चे पर तो टीवी को मात खाना ही है, और भी अनेक कारक हैं जिनसे वेब सीरीज़ का वज़न बढ़ता है | प्राय: सीरीज़ 5 या 6 एपिसोड्स में खत्म हो जाती है | बहुचर्चित पिचर्स, परमानेंट रूममेट्स, बैंग बाजा बारात,...ये सब ५-६ एपिसोड्स से आगे नहीं गयीं |  अमूमन ये एपिसोड्स 15-20 मिनट के होते हैं | आज यूथ के पास समय की कमी है और महीनों देखने का धीरज भी नहीं | एक क्लासरूम से दूसरे क्लासरूम तक जाते हुए, हैंगआउट्स पर दोस्त की राह देखते हुए या जब मॉल में गर्लफ्रेंड अपनी पसंद की ड्रेस चुन रही होती है...एपिसोड खत्म किया जा सकता है | इनमें मौजूद विज्ञापनों को स्किप या फॉरवर्ड करने के विकल्प भी होते हैं | लीजिए, अंधा क्या चाहे, दो आँखें |


एक एपिसोड के बाद अगला कुछ अंतराल के बाद आता है इसलिए यूज़र बेसब्री से उसका इंतज़ार करता है | इनका कोई तयशुदा समय नहीं | आपकी फुरसत, इनकी स्टार्टिंग है | जब अवसर मिला, जब ऑनलाइन हुए, शुरू कीजिए देखना |


वेब सीरीज की दूसरी बड़ी खासियत है इनके विषय युवा पीढ़ी के जीवन से जुड़ते हैं | इनमें मुच्छड़ बाप नहीं, पूजा करती अम्माँ नहीं |   


वेब सीरीज के पक्ष को और तगड़ा करने वाली बात यह है कि लोगों को अपनी क्रियेटिविटी दिखाने का एक नया प्लेटफार्म मिल गया है | वेब सीरीज़ बनाने के लिए बड़े उपकरणों की ज़रूरत नहीं | सबके हाथ में मोबाइल हैं और उनमें कैमरे | किसी प्रशिक्षण की ज़रूरत नहीं | कोई भी अपने मित्रों को लेकर वेब सीरीज़ निर्माता बन सकता है | इसे यू-ट्यूब पर दिखाने के लिए किसी कागजाती-कार्यवाही को पूरा करने की झंझट नहीं, दफ्तरों में मत्था टेकने की ज़रूरत नहीं, पब्लिसिटी के पापड़ भी यहाँ बेलने नहीं पड़ते | जो कभी नाटक के मंच पर न चढ़ा हो और जिसने कभी माइक को हाथ न लगाया हो वे भी अपनी क्रियेटिविटी को वेब सीरीज़ में माँज सकते हैं | अंतरराष्ट्रीय शोहरत और व्यूअरशिप पाने के लिए यह बढ़िया चैनल साबित हो रहा है |


यूं जुदा फिल्म से


फिल्मों के मामले में कई बार ऐसा होता है आप अपना महत्वपूर्ण काम छोड़ते हैं, महँगी टिकटें खरीदते हैं और यह सोचते हुए वापस लौटते हैं कि फिल्ममेकर मिल जाए तो धुनक के रख दें उसे | यह टेंशन वेब सीरीज़ के दरबार में नहीं है | यहाँ आप कमेंट कर सकते हैं, लाइक-डिसलाइक ज़ाहिर कर सकते हैं, सुझाव दे सकते हैं | इस तरह यूज़र के लिए, कहानी से सीधे कनेक्ट करना हासिल है | यह भी न करना चाहें तो किसी अन्य कहानी के झरोखे भी खुले हैं उसके लिए | सो भी मुफ्त में |  यह इंटरनेट की दुनिया में समाजवाद की स्थापना ही तो है | यहाँ सबसे बड़ी ताकत यूज़र स्वयं है |


खिलाड़ी बड़े-बड़े


शायद आप सोच रहे हैं कि वेबसीरीज़ बस नौसिखियों का रचाया मायाजाल है | नहीं | परिणीति चोपड़ा, कल्कि कोच्लिन, स्वरा भास्कर, कुणाल कपूर, भूमि पेडणेकर, ऋचा चड्ढा, अली फज़ल, करणवीर मेहरा जैसे कलाकार यहाँ एक्टिंग के मैदान में हैं | बालीवुड के नामी डायरेक्टर अनुराग कश्यप ने अपनी बहुप्रशंसित फिल्म “गैंग्स ऑफ वासेपुर’’ को वेब सीरीज़ में ढाला और अब इसके आठ एपिसोड्स विदेशों में भी देखे जा रहे हैं | टेलीविजन क्वीन एकता कपूर, फरहान अख्तर, रितेश सिधवानी और बड़े बैनर यशराज फिल्म ने भी यहाँ अपनी उपस्थिति दर्ज कराने कराई है | रामगोपाल वर्मा जैसा खिलाड़ी यहाँ Guns and Thighs लेकर मौजूद है | टीवीएफ, एआईबी, स्टार इंडिया, सोनी, इरोज़, वायकाम 18 जैसे प्रोडक्शन हाउजेस के लिए भी वेब सीरीज सोने के अंडे देने वाली मुर्गी साबित हो रही हैं |


वेब सीरीज पहले हिंदी में आयीं, अब पूरे देश से प्रादेशिक भाषाओं में भी ये अपलोड हो रही हैं | हिंदी, जैसा कि आप समझ ही सकते हैं वही खिचड़ी भाषा या हिंगलिश है जिसे युवा उपयोग में लाते हैं | टाईटिल अधिकतर अंग्रेजी में ही हैं |                 


वेब सीरीज़ एक उदाहरण है कि तकनीक सामाजिकता को किस तरह प्रभावित करती है | कैसे उसके मनोरंजन माध्यम, पसंद-नापसंद को बदल डालती है | दूसरी बात, भारतीय समाज में एडल्ट कंटेंट्स को लेकर यूँ तो बड़ा टैबू है पर अंदरूनी तौर पर यह सबको लुभाता है |  वेब सीरीज इसी मानसिकता को दुह रही हैं |


..........................................


कुछ चर्चित वेब सीरीज़ :


Parmanent Roommates (TVF) : यह कहानी रिलेशनशिप पर है | लिविंग व्यवस्था में रहने वाले दो प्रेमियों की उहापोह की कहानी कि शादी करें, न करें | इसका दूसरा सीजन आया |


Baked (Pech.&Skoop.) की कथावस्तु दिल्ली यूनिवर्सिटी है | तीन दोस्त – एक में खाना बनाने का हुनर, एक जुगाड़ू, एक प्लानिंग में चतुर | इन्हीं विशेषताओं के बल पर अपना स्टार्टअप खड़ा करते हैं | 


Pitchers (TVF):  में चार दोस्त अपने शौक को दिशा देने के लिए अपनी नौकरियाँ छोड़कर, संघर्ष करते हुए खुद की स्टार्टअप कम्पनी शुरू करते हैं | दूसरा सीज़न आ रहा |


Bang Baja Barat ( Y Films) : अलग अलग पृष्ठभूमि से आये दो लोग शादी के लिए अपने परिवारों से मिलते हैं | यह हास्य आधारित कथा है |


Tripling (TVF): तलाकशुदा, हताश और बेरोजगार तीन भाई बहन एक सड़कयात्रा पर निकलते हैं और जीवन और सम्बन्धों को समझते हैं  |


Ladies Room (Y Films): परिस्थितियों से लड़ रहीं दो लड़कियां रेस्ट रूम में बॉस को गाली देने से लेकर अपने सारे अनुभव साझा करती हैं, स्मोक करती हैं | टॉयलेट में शूट हुए हैं एपिसोड्स |


The Other Lovestory (JLT Films): दो समलैंगिक लड़कियों और उनकी दिक्कतों की कहानी |


..................................................


भेड़चाल बहुत अपने यहां


*अभय छाबड़ा*


(वेब सीरीज़ Cyber Squad  और देश की पहली वेब फ़िल्म You Me & Ghar के डायरेक्टर , Chinese Bhasad के कोडायरेक्टर )


वेबसीरीज़ का भविष्य क्या है - वेब की इंडस्ट्री में जिस तरह का बूम आया है, उससे लगता तो है कि अभीpositivity बनी रहेगी पर जिस तरहSony, एकता कपूर Balaji Alt, Color वाले Voot या और Star वाले अपना Hot Star लाकर... अपने-अपने एप बना कर सीरीज़ डाल रहे हैं उससे लगता है कि बड़े और बड़े बनेंगे और छोटों के लिए struggleबना रहेगा ।


 In short यह कहूँगा कि हमारे यहाँ भेड़चाल बहुत मचती है इसमें super content ही जमेगा । बाकी का बह जायेगा।


हमारी और विदेशी वेब सीरीज में अंतर क्या है – बहुत से factors हैं पर मुख्य अंतर बजट का है | मैं Amazon, Netflix आदि पर उन्हें देखता हूँ , उनका बजट हमारी फिल्म जितना हो जाता है | हमारे पास बजट कम, सोर्सेस कम तो अच्छे आइडियाज़ पर काम नहीं कर पाते जैसे sciencefiction  या periodfilm करना चाहें तो बजट आड़े आ जाता है |


फिल्ममेकर्स का वेब की तरफ आने का कारण – कुछ स्क्रिप्ट्स पर फिल्म हो नहीं सकती और आप सेंसर आदि के भय के बिना खुलकर कुछ कहना चाहते हो और यूथ में popularity चाहिए तो वेब की तरफ आना ही होता है | और वेब से फिल्मों में जाने के लिए…..आपमें हुनर हो, काबिलियत हो तो फिल्मों से लोग आपको बुलाएँगे और बालीवुड में एक कहावत बहुत चलती है... Youshould be in the right place onthe right time .



धंधा कैसा है ?


समीर नाफड़े( सिने-विशेषज्ञ ) : वेब सीरीज़ के साथ earning का टाईअप तो है ही | वरना क्यों सब उधर भागते ? परन्तु यह फिक्स्ड फार्मूले जैसा नहीं है | generalize करके देखें तो 1000 व्यूज़ पर youtube से एक डॉलर इशू होता है |लगभग 5000 views के बाद दो डॉलर.... | payment के तीन slabs होते हैं | इशू होते ही डॉलर तुरंत आपके अकाउंट में नहीं आ जाता | बहुत सारे नियम आदि हैं | वे एक तय अमाउंट हो चुकने के बाद आपके अकाउंट में ट्रांसफर करते हैं |


संक्षेप में, बहुत कठिन है डगर earning की !


.....................................................................


देवश्री फडनवीस ( आई टी इंजीनियर - रायसोनी कॉलेज)


हमारी भी है तैयारी 
Indian films और टीवी सीरियल्स दोनों महाबोर | वही घिसेपिटे दकियानूसी subjects को ये कब तक रगड़ेंगे, पता नहीं ! मैं और मेरे सारे फ्रेंड्स वेब देखते हैं | हम कुछ फ्रेंड्स भी वेब बनाने वाले हैं | हम लोगों को सुमित व्यास, शांतनु अनम बालीवुड हीरोज़ से अधिक पसंद हैं | कम्पनियों की आपसी रेस के कारण अब हमारे यहाँ इंटरनेट बेहद सस्ता हो गया है, इसलिए वेब सबकी पहुँच में हैं | YouTube, Amazon, Netflix के अलावा, मैं तो डायरेक्ट एप्स इंस्टाल करके रखती हूँ, इससे नये एपिसोड का नोटिफिकेशन तुरंत मिल जाता है |



====================================================



Saurabh Shandily: क्या खूब आलेख है। रिच आर्टिकल। अमीर आलेख। *परमानेंट रूममेट्स* तो कइयों को दिखा चुका हूँ। मुझे एक झगड़ालू प्रवृत्ति की मित्र ने कहा था देखने को।




===========================================

अनीता मंडा :साइंस, टेक्नोलॉज की प्रगति ने इंसानी जीवन में बड़ा परिवर्तन किया है। इंटरनेट युग ने तो सिनेमा साहित्य पलट कर रख दिया है। ऐसे समय में हमारी नई पीढ़ी क्या कर रही है, किसे पसंद कर रही है, किसे नहीं, आदि जानने के लिए दीप्ति जी का आलेख एकदम सटीक है।
===============================================

कोमल समोरवाल :वेब सीरीज डिजिटल जगत की नवीन क्रान्ति है। भारत में युवा वर्ग का ख़ासा प्रतिशत है, युवा केन्द्रित कार्यक्रमों की माँग इस कारण से तीव्र है। सास बहु के डेली शॉप से कुछ अलग आधुनिक समस्याओं पर व अपने समय की मानसिक एवं अन्य उलझनों पर केन्द्रित एक कनेक्टिव प्लेटफोर्म युवा वर्ग चाहता है। वेब सीरीज एक नये आस्वाद में बेहद ही सहूलियत के साथ ये सभी चीजें उपलब्ध करवाती है। दीप्ति जी का ये समसामयिक आलेख लगभग हर आयाम पर प्रकाश डालता है, वेब सीरीज की लोकप्रियता के कारकों से लेकर इसके वर्तमान और दूरगामी प्रभाव पर बिन्दुवार मंथन करता है.. !!

रचना प्रवेश

रचना प्रवेश

पिछले पन्ने