Tuesday, August 9, 2016

कुछ लिखी हुई कविताएं विरासत की इबारतें बन जाती है ,अमूल्य धरोहर के रूप में सहेजी जाती है |उन्हें जब जब पढ़ते है एक अलग ही उर्जा का संचार होता है और नत हो जाते है उस कलम के आगे |
वीरेन डंगवाल  ऐसी ही कलम के धनी थे |उनकी जीवटता को सादर नमन 

साहित्य की बात समूह ,(जिसके एडमिन ब्रज श्रीवास्तव है) पर  सप्ताह में एक दिन साहित्य विरासत पर ही चर्चा की जाती है और इस चर्चा के प्रभारी है सुरेन्द्र सिंह |
रचना प्रवेश पर प्रस्तुत है आज वीरेन  डंगवाल जी की कवितायें ,साथ में उनके साथी  ,प्रमुख साहित्यकारों के विचार ...क्या कहते है वो वीरेंन डंगवाल जी के बारे में ...

सलग्न है समूह में चर्चा के दौरान पाठकों की त्वरित प्रतिक्रियाए, जिनमे कई समकालीन साहित्यकार  भी शामिल है ...

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पहले उस ने हमारी स्मृति पर डंडे बरसाए
और कहा - 'असल में यह तुम्हारी स्मृति है


साथियों आज कविता विरासत में प्रस्तुत है  वीरेन डंगवाल ।
वीरेन डंगवाल जी की अभी 5 अगस्त को जयंती भी थी।आधुनिक कविता के प्रमुख स्वर वीरेन दा  केे बारे में समालोचक कहते है कि उनमें नागार्जुन और त्रिलोचन का सा विरल लोकतत्व निराला का सजग फक्कड़पन और मुक्तिबोध की बैचैनी और बौद्धिकता एक साथ मौजूद है।

विष्णु खरे जी  कहते है , वीरेन की जितनी दृष्टि व्यष्टि पर थी, उतनी ही समष्टि पर भी थी. वह न सिर्फ प्रतिबद्ध थे बल्कि वाम-चिन्तक और सक्रियतावादी भी थे. अपने इन आख़िरी दिनों में भी उन्हें जनमंचों पर सजग हिस्सेदारी करते और अपनी रचनाएँ पढ़ते देखा जा सकता था. पिछले कई वर्षों का गंभीर कैंसर भी उनके मनोबल, जिजीविषा और सृजनशीलता को तोड़ न सका बल्कि हाल की उनकी कविताओं, मसलन दिल्ली मेट्रो पर लिखी गई रचनाओं ने उनके प्रशंसकों और समीक्षकों को चमत्कृत किया ।


मंगलेश डबराल जी कहते है  उनकी रचनात्मकता के बहुत से छोर थे. कभी क्लासिकल, कभी तोड़फोड़ करने वाला, कभी छांदस, कभी एबसर्ड की तरफ झुका हुआ। परस्पर विरोधी धाराएं उनके व्यक्तित्त्व में शामिल थीं। वीरेन ने अपनी कविता में नगण्यता का गुणगान किया। समोसा, जलेबी, पपीता जैसी चीजों पर उन्होंने कवितायें लिखीं। वह हमारी पीढ़ी का सबसे बडा आशावादी था।


युवा आलोचक शिरीष मौर्य कहते है कि जब समकालीन हिंदी कविता, पाठ और अर्थ के नए अनुशासनों में अपना वजूद खोने के कगार पर खड़ी है, तब वीरेन डंगवाल कविता में कही गई बात को अर्थ के साथ (बल्कि उससे अलग और ज़्यादा) अभिप्राय और आशय पर लाना चाहते हैं। भाषा में दिपते अर्थ, अभिप्राय, आशय और राग के मोह के चलते वे एक अलग छोर पर खड़े दिखाई देते हैं, जो जन के ज़्यादा निकट की जगह है। वे हमारे वरिष्ठों में अकेले हैं जो हिंदी पट्टी के बचे हुए मार्क्सवाद - जनवाद के सामर्थ्य  के साथ उत्तरआधुनिक पदों को भरपूर चुनौती दे रहे हैं।

परिचय
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जन्म:  -  ५ अगस्त १९४७
कीर्ति नगर, टेहरी गढ़वाल, उत्तराखंड, 




मृत्यु: -  २८ सितंबर २०१५
बरेली, उत्तर प्रदेश

कार्यक्षेत्र  : कवि,लेखक ,अनुवादक ,संपादक

प्रमुख कृतियां : -  दुष्चक्र में सृष्टा,
कवि ने कहा,   स्याही ताल।

पुरुस्कार :  -  

रघुवीर सहाय स्मृति पुरस्कार (1992), श्रीकान्त वर्मा स्मृति पुरस्कार (1994), शमशेर सम्मान(2002), साहित्य अकादमी पुरस्कार (2004) सहित अनेक प्रतिष्ठित सम्मान और पुरस्कार से से विभूषित

आज विरासत में कुछ प्रतिनिधि कवितायेँ  वीरेन दा की प्रस्तुत कर रहा हूँ । तो आइये साथियो वीरेन जी  की कविता पर ,उसके दर्शन पर ,उनकी शख्सियत पर , उनके लेखन कर्म पर चर्चा करते है ।
                  ........  सुरेन 

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तोप
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कम्पनी बाग़ के मुहाने पर
धर रखी गई है यह 1857 की तोप

इसकी होती है बड़ी सम्हाल
विरासत में मिले
कम्पनी बाग की तरह
साल में चमकायी जाती है दो बार

सुबह-शाम कम्पनी बाग में आते हैं बहुत से सैलानी
उन्हें बताती है यह तोप
कि मैं बड़ी जबर
उड़ा दिये थे मैंने
अच्छे-अच्छे सूरमाओं के छज्जे
अपने ज़माने में

अब तो बहरहाल
छोटे लड़कों की घुड़सवारी से अगर यह फारिग हो
तो उसके ऊपर बैठकर
चिड़ियाँ ही अकसर करती हैं गपशप
कभी-कभी शैतानी में वे इसके भीतर भी घुस जाती हैं
ख़ासकर गौरैयें

वे बताती हैं कि दरअसल कितनी भी बड़ी हो तोप
एक दिन तो होना ही है उनका मुँह बंद



आएँगे, उजले दिन ज़रूर आएँगे
🅾🅾🅾🅾🅾🅾🅾🅾🅾

आतंक सरीखी बिछी हुई हर ओर बर्फ़
है हवा कठिन, हड्डी-हड्डी को ठिठुराती
आकाश उगलता अन्धकार फिर एक बार
संशय विदीर्ण आत्मा राम की अकुलाती

होगा वह समर, अभी होगा कुछ और बार
तब कहीं मेघ ये छिन्न -भिन्न हो पाएँगे

तहखानों से निकले मोटे-मोटे चूहे
जो लाशों की बदबू फैलाते घूम रहे
हैं कुतर रहे पुरखों की सारी तस्वीरें
चीं-चीं, चिक-चिक की धूम मचाते घूम रहे

पर डरो नहीं, चूहे आखिर चूहे ही हैं
जीवन की महिमा नष्ट नहीं कर पाएँगे

यह रक्तपात यह मारकाट जो मची हुई
लोगों के दिल भरमा देने का ज़रिया है
जो अड़ा हुआ है हमें डराता रस्ते पर
लपटें लेता घनघोर आग का दरिया है

सूखे चेहरे बच्चों के उनकी तरल हँसी
हम याद रखेंगे, पार उसे कर जाएँगे

मैं नहीं तसल्ली झूठ-मूठ की देता हूँ
हर सपने के पीछे सच्चाई होती है
हर दौर कभी तो ख़त्म हुआ ही करता है
हर कठिनाई कुछ राह दिखा ही देती है

आए हैं जब चलकर इतने लाख बरस
इसके आगे भी चलते ही जाएँगे

आएँगे उजले दिन ज़रूर आएँगे


कवि - 1
🅾🅾🅾

मैं ग्रीष्म की तेजस्विता हूँ

और गुठली जैसा

छिपा शरद का ऊष्म ताप

मैं हूँ वसन्त का सुखद अकेलापन

जेब में गहरी पड़ी मूँगफली को छाँटकर

चबाता फुरसत से

मैं चेकदार कपड़े की कमीज़ हूँ

उमड़ते हुए बादल जब रगड़ खाते हैं

तब मैं उनका मुखर गुस्सा हूँ

इच्छाएँ आती हैं तरह-तरह के बाने धरे

उनके पास मेरी हर ज़रूरत दर्ज़ है

एक फेहरिस्त में मेरी हर कमज़ोरी

उन्हें यह तक मालूम है

कि कब मैं चुप होकर गरदन लटका लूँगा

मगर फिर भी मैं जाता ही रहूँगा

हर बार

भाषा को रस्से की तरह थामे

साथियों के रास्ते पर

एक कवि और कर ही क्या सकता है

सही बने रहने की कोशिश के सिवा


कवि - 2
🅾🅾🅾

मैं हूँ रेत की अस्फुट फुसफुसाहट

बनती हुई इमारत से आती ईंटों की खरी आवाज

मैं पपीते का बीज हूँ

अपने से भी कई गुना मोटे पपीतों कोबी

अपने भीतर छुपाए

नाजुक ख़याल की तरह

हज़ार जुल्मों से सताए मेरे लोगो !

मैं तुम्हारी बद्दुआ हूँ

सघन अंधेरे में तनिक दूर पर झिलमिलाती

तुम्हारी लालसा

गूदड़ कपड़ों का ढेर हूँ मैं

मुझे छाटों
तुम्हें भी प्यारा लगने लगूँगा मैं एक दिन

उस लालटेन की तरह

जिसकी रोशनी में

मन लगाकर पढ़ रहा है

तुम्हारा बेटा।


इतने भले नहीं बन जाना साथी
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इतने भले नहीं बन जाना साथी
जितने भले हुआ करते हैं सरकस के हाथी
गदहा बनने में लगा दी अपनी सारी कुव्वत सारी प्रतिभा
किसी से कुछ लिया नहीं न किसी को कुछ दिया
ऐसा भी जिया जीवन तो क्या जिया?

इतने दुर्गम मत बन जाना
सम्भव ही रह जाय न तुम तक कोई राह बनाना
अपने ऊंचे सन्नाटे में सर धुनते रह गए
लेकिन किंचित भी जीवन का मर्म नहीं जाना

इतने चालू मत हो जाना
सुन-सुन कर हरक़ते तुम्हारी पड़े हमें शरमाना
बग़ल दबी हो बोतल मुँह में जनता का अफसाना
ऐसे घाघ नहीं हो जाना

ऐसे कठमुल्ले मत बनना
बात नहीं हो मन की तो बस तन जाना
दुनिया देख चुके हो यारो
एक नज़र थोड़ा-सा अपने जीवन पर भी मारो
पोथी-पतरा-ज्ञान-कपट से बहुत बड़ा है मानव
कठमुल्लापन छोड़ो
उस पर भी तो तनिक विचारो

काफ़ी बुरा समय है साथी
गरज रहे हैं घन घमण्ड के नभ की फटती है छाती
अंधकार की सत्ता चिल-बिल चिल-बिल मानव-जीवन
जिस पर बिजली रह-रह अपना चाबुक चमकाती
संस्कृति के दर्पण में ये जो शक्लें हैं मुस्काती
इनकी असल समझना साथी
अपनी समझ बदलना साथी


परंपरा
🅾🅾🅾

पहले उस ने हमारी स्मृति पर डंडे बरसाए
और कहा - 'असल में यह तुम्हारी स्मृति है'
फिर उस ने हमारे विवेक को सुन्न किया
और कहा - 'अब जा कर हुए तुम विवेकवान'
फिर उस ने हमारी आंखों पर पट्टी बांधी
और कहा - 'चलो अब उपनिषद पढो'
फिर उस ने अपनी सजी हुई डोंगी हमारे रक्त की
नदी में उतार दी
और कहा - 'अब अपनी तो यही है परम्परा'।



दुष्चक्र में सृष्टा
🅾🅾🅾🅾🅾

कमाल है तुम्हारी कारीगरी का भगवान,
क्या-क्या बना दिया, बना दिया क्या से क्या!

छिपकली को ही ले लो,
कैसे पुरखों
की बेटी छत पर उल्टा
सरपट भागती छलती तुम्हारे ही बनाए अटूट नियम को।
फिर वे पहाड़!
क्या क्या थपोड़ कर नहीं बनाया गया उन्हें?
और बगैर बिजली के चालू कर दी उनसे जो
नदियाँ, वो?
सूंड हाथी को भी दी और चींटी
को भी एक ही सी कारआमद अपनी-अपनी जगह
हाँ, हाथी की सूंड में दो छेद भी हैं
अलग से शायद शोभा के वास्ते
वर्ना सांस तो कहीं से भी ली जा सकती थी
जैसे मछलियाँ ही ले लेती हैं गलफड़ों से।

अरे, कुत्ते की उस पतली गुलाबी जीभ का ही क्या कहना!
कैसी रसीली और चिकनी टपकदार, सृष्टि के हर
स्वाद की मर्मज्ञ और दुम की तो बात ही अलग
गोया एक अदृश्य पंखे की मूठ
तुम्हारे ही मुखड़े पर झलती हुई।

आदमी बनाया, बनाया अंतड़ियों और रसायनों का क्या ही तंत्रजाल
और उसे दे दिया कैसा अलग सा दिमाग
ऊपर बताई हर चीज़ को आत्मसात करने वाला
पल-भर में ब्रह्माण्ड के आर-पार
और सोया तो बस सोया
सर्दी भर कीचड़ में मेढक सा

हाँ एक अंतहीन सूची है
भगवान तुम्हारे कारनामों की, जो बखानी न जाए
जैसा कि कहा ही जाता है।

यह ज़रूर समझ में नहीं
आता कि फिर क्यों बंद कर दिया
अपना इतना कामयाब
कारखाना? नहीं निकली कोई नदी पिछले चार-पांच सौ सालों से
जहाँ तक मैं जानता हूँ
न बना कोई पहाड़ या समुद्र
एकाध ज्वालामुखी ज़रूर फूटते दिखाई दे जाते हैं कभी-कभार।
बाढ़ेँ तो आयीं खैर भरपूर, काफी भूकंप,
तूफ़ान खून से लबालब हत्याकांड अलबत्ता हुए खूब
खूब अकाल, युद्ध एक से एक तकनीकी चमत्कार
रह गई सिर्फ एक सी भूख, लगभग एक सी फौजी
वर्दियां जैसे
मनुष्य मात्र की एकता प्रमाणित करने के लिए
एक जैसी हुंकार, हाहाकार!
प्रार्थनाग्रृह ज़रूर उठाये गए एक से एक आलीशान!
मगर भीतर चिने हुए रक्त के गारे से
वे खोखले आत्माहीन शिखर-गुम्बद-मीनार
ऊँगली से छूते ही जिन्हें रिस आता है खून!
आखिर यह किनके हाथों सौंप दिया है ईश्वर
तुमने अपना इतना बड़ा कारोबार?

अपना कारखाना बंद कर के
किस घोंसले में जा छिपे हो भगवान?
कौन - सा है वह सातवाँ आसमान?
हे, अरे, अबे, ओ करुणानिधान!!!


◼◻◼◻◼◻◼◻◼

समूह की प्रतिक्रियायें 


ब्रज श्रीवास्तव ....
आज के दिन का अब इस समूह के सदस्यो का इंतज़ार सा रहता है, क्योंकि मंगलवार को "विरासत" में हमें क्लासिक पढ़ने मिलता है वो भी उम्दा प्राक्कथन के साथ, दुनिया के तमाम बुद्धिजीवी अब समकालीन कविता से ही अपने माफिक कुछ हासिल कर पाते हैं, और इस कविता के एक ख़ास नक्षत्र हुए वीरेन डंगवाल, मुझे याद है राजकमल प्रकाशन के पत्र प्रकाशन समाचार में मैंने, दुष्चक्र में सृष्टा, कविता पढ़ी थी, और मैंने बहुत गुनी थी, तब एन्टी ईश्वर कुछ और अच्छी कविताएँ आ रहीं थीं, ऋतुराज जी ने, और शायद स्वप्निल श्रीवास्तव ने भी निहायत कविता के प्रारूप में इस विषय पर लिखा था, यह एक उत्तर आस्था जैसा कुछ था कि ग़ालिब से चलकर अब तक के कवि वैचारिक रूप से एक  विराट सत्ता के मुकाबिल थे. 

खैर. हम अगर साहित्य के विद्यार्थी हैं तो हम निसंदेह बेहतर ही पढ़ने के लिए तैयार हैं, हर  वो टिप्पणी हमें प्रिय है जो कविता की परतें खोल रही हो, टिप्पणी लिखने से  दरअसल हमारे गद्य लेखन का रियाज भी होता है, हालांकि इस वास्ते समय निकालने के लिए एक प्रतिबद्धता की जरूरत होती है, जो समूह के, प्रस्तुतकर्ता के लिए, या एडमिन के लिए से ज्यादा कविता और स्वयं के लिए हो तो ज्यादा अच्छा है . फिर भी यह सुखद संयोग कि हम सब यहां हैं और  slow and steady तरह से कुछ सार्थक कर पा रहे हैं तो धन्यवाद तो कहना चाहिए. 

कवि और कविता पर आज दीप्ति, शरद जी, ताई,  
अपर्णा जी , नरेश जी ,चंद्रशेखर जी ,घनश्याम सोनी जी , अजय  ,  भावना जी  संध्या जी , मीना जी ,संजीव जी ,पीयूष जी , मुकेश जी , दिनेश मिश्र जी ,अविनाश जी ,  ,हरगोविंद जी ,  सुधीर जी एवं प्रवेशजी, मधु जी ने चर्चा को बढाया,  आभार||
ब्रज श्रीवास्तव 

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नरेश अग्रवाल ....
वीरेनजी से फोन पर मेरी बातचीत मार्च 2015 में हुई थी। वे सख्त बीमार थे, कैंसर से। अफसोस दिल्ली में रहकर भी उनसे मिल न पाया!
मंगलेश डबराल जी कहते है - वीरेन के साथी कवि मंगलेश डबराल ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए लिखा हैः “कविता वीरेन की पहली प्राथमिकता भी नहीं थी, बल्कि उसकी संवेदनशीलता और इंसानियत के भविष्य के प्रति अटूट आस्था का ही एक विस्तार, एक आयाम थी, उसकी अच्छाई की महज़ एक अभिव्यक्ति और एक पगचिन्हक थी। तीन संग्रहों में प्रकाशित उसकी कविताएँ अनोखी विषयवस्तु और शिल्प के प्रयोगों के कारण महत्वहपूर्ण हैं, जिनमें से कई जन आन्दोलनों का हिस्सा बनी। उनकी रचना एक ऐसे कवि ने की है, जो कवि कर्म के प्रति बहुत संजीदा नहीं रहा। यह कविता मामूली कही जाने वाली चीजों और लोगों को प्रतिष्ठित करती है, और इसी के जरिए जनपक्षधर राजनीति भी निर्मित करती है। वीरेन की कविता एक अजन्मे बच्चे को भी माँ की कोख में फुदकते रंगीन गुब्बारे की तरह फूलते-पिचकते, कोई शरारत भरा करतब सोचते हुए महसूस करती है, दोस्तों की गेंद जैसी बेटियों को अच्छे भविष्य का भरोसा दिलाती है और उसका यह प्रेम मनुष्यों, पशुओं, पक्षियों, वनस्पतियों, फेरीवालों, नींबू, इमली, चूने, पाइप के पानी, पोदीने, पोस्टकार्ड, चप्पल और भात तक को समेट लेता है। वीरेन की संवेदना के एक सिरे पर शमशेर जैसे क्लासिकी ‘सौन्दर्य के कवि’ हैं, तो दूसरा सिरा नागार्जुन के देशज, यथार्थपरक कविता से जुड़ता है। दोनों के बीच निराला हैं जिनसे वीरेन अँधेरे से लड़ने की ताकत हासिल करता रहा। उसकी कविता पूरे संसार को ढोने वाली नगण्यता की विनम्र गर्वीली ताकत की पहचान करती कविता है, जिसके विषय वीरेन से पहले हिन्दी में नहीं आये। वह हमारी पीढ़ी का सबसे चहेता कवि था, जिसके भीतर पी.टी. उषा के लिए जितना लगाव था, उतना ही स्याही के दावात में गिरी हुई मक्खी और बारिश में नहाये सूअर के बच्चों के लिए था। एक पेड़ पर पीले-हरे चमकते हुए पत्तों को देखकर वह कहता है, पेड़ों के पास यही एक तरीका है यह बताने का कि वे भी दुनिया से प्यार करते हैं। मीर तकी मीर ने एक रुबाई में ऐसे व्यक्ति से मिलने की ख्वाहिश जाहिर की है, जो सचमुच ‘मनुष्य’ हो, जिसे अपने हुनर का अहंकार न हो, जो कुछ बोले, तो पूरी दुनिया सुनने को इकट्ठा हो जाये और जब ख़ामोश हो तो लगे कि दुनिया ख़ामोश हो गयी है। वीरेन की शख़्सि‍यत कुछ ऐसी ही थी, जिसके खामोश होने से जैसे एक दुनिया ख़ामोश हो गयी है।”

चंद्रशेखर श्रीवास्तव ...
आँखों पर पट्टी और उपनिषद.... वाह।
बहुत सारवान कवितायेँ।

आभार सुरेन जी।

घनश्याम दास सोनी ....
विरासत में आज सुरेंद्र जी द्वारा पोस्ट वीरेन डंगवाल जी की सभी रचनाएँ बहुत शानदार हैं । कुछ पंक्तियां तो बहुत गहरे तक असर करतीं हैं जैसे तोप की "खासकर गौरैयें वे बताती हैं कि दरअसल कितनी भी बड़ी हो तोप एक दिन तो होना ही है उनका मुहँ बंद" ,आयेंगे, उजले दिन आयेंगे की" हर सपने के पीछे सच्चाई होती है , हर दौर कभी तो ख़त्म हुआ ही करता है", दुष्चक्र में सृष्टा की ये पंक्तियां" प्रार्थनागृह ज़रूर उठाये गए एक से एक आलिशान, मगर भीतर छीने हुए रक्त के गारे से, वे खोखले आत्महीन शिखर-गुम्बद-मीनार ऊँगली से छूते ही जिन्हें रिस आता है खून !" बहुत ही गहरे अर्थ लिए । धन्यवाद सुरेन जी अच्छी रचनाओं की प्रस्तुति के लिए

 Sandhya:
 नरेश जी के कविता पोस्टर लाजवाब 👌

सुरेन जी के घर की पिछ्ली गली में ही रहते थे वीरेन जी मगर बरेली जाकर भी उनसे मुलाकात न हो पाई इसका अफ़सोस रहेगा 😞

मीना शर्मा ....
सुरेन जी..कभी-कभी शब्द कम पड़ जाते हैं तारीफ के लिये.
बस वही बात है...!
गज़ब का चुनाव  ..तोप.
कितनी भी बड़ी हो..एक दिन तो होना
ही है मँह बन्द .
आयेंगे उजले दिन जरूर आयेंगे.
सूखे चेहरे बच्चों के.... आगे बढ़ते हुए उम्मीद..की कविता है...!
मै ग्रीष्म की तेजस्विता हूं.
कवि १
कवि२
तुम्हें भी प्यारा लगने लगूंगा मैं
ॉएक दिन.... बहुत अच्छी कविताएँ हैं.हर कदम नये अर्थ...
इतने भले नहीं बन जाना साथी
 सुनने में नये रंग प्रेषित करता गीत हो जाता है.
परंपरा. बहुत सारे अर्थ बताती.:    :..
 दुष्चक्र में सृष्टा सार्थक  रचना.
सुरेन जी शानदार प्रस्तुति.
अनोखी दनियाँ है इन कविताओं में. 

धन्यवाद ..!

पियूष तिवारी ...
वीरेन जी की कवितायें पढीं , आनंद  तोप और उजले दिन में ही आया , शेष औसत सी लगीं मुझे ।

मेरी व्यक्तिगत सोच है , कृपया अन्यथा न लें यही कवितायें आज कोई युवा कवि लिखे तो शायद लोग  पढना भी न चाहें , लेकिन नाम तो नाम है , कुछ भी कहें ।
सादर धन्यवाद सुरेन जी व साकीबा 

नरेश अग्रवाल ....
मुझे वीरेन डंगवाल जी की निम्नांकित पंक्तियां बेहद प्यारी लगी- 
“नहीं निकली कोई नदी पिछले चार-पांच सौ सालों से 
जहाँ तक मैं जानता हूँ 
न बना कोई पहाड़ या समुद्र 
एकाध ज्वालामुखी ज़रूर फूटते दिखाई दे जाते हैं कभी-कभार। 
बाढ़ेँ तो आयीं खैर भरपूर, काफी भूकंप, 
तूफ़ान खून से लबालब हत्याकांड अलबत्ता हुए खूब 
खूब अकाल, युद्ध एक से एक तकनीकी चमत्कार 
रह गई सिर्फ एक सी भूख, लगभग एक सी फौजी 
वर्दियां जैसे 
मनुष्य मात्र की एकता प्रमाणित करने के लिए 
एक जैसी हुंकार, हाहाकार! 
प्रार्थनाग्रृह ज़रूर उठाये गए एक से एक आलीशान! 
मगर भीतर चिने हुए रक्त के गारे से 
वे खोखले आत्माहीन शिखर-गुम्बद-मीनार 
ऊँगली से छूते ही जिन्हें रिस आता है खून! 
आखिर यह किनके हाथों सौंप दिया है ईश्वर 
तुमने अपना इतना बड़ा कारोबार? “
वीरेनजी बहुत बड़े कवि और बेहद अच्छे इंसान थे। उनकी श्रेष्ठ रचनाएं  ‘कवि ने कहा-चुनी हुई कविताएं’  पुस्तक में संकलित हैं । इस पुस्तक के सहारे उनकी रचनाशीलता को अच्छी तरह से समझा जा सकता है। वे बड़े कवि इसलिए हैं कि उनकी भाषा में स्पष्टता है, वैसी चीजों का चयन है जो आम दृष्टि से प्रायः ओझल रहती हैं तथा व्यंग्यात्मक भाषा शिल्प जो समाज की कुरीतियों को बड़ी आसानी से कविता में गढ़ लेता है। 
 मैं सुरेनजी को भी अच्छी प्रस्तुति के लिए धन्यवाद देता हूँ ।

मधु सक्सेना .....
वीरेंद्र जी की कविताएँ सादगी से चलते चलते ऐसी  बात  कर जाती है जो चमत्कृत कर देती हैं ।साधारण में भी असाधारण का तत्व होता है ये आज जाना ।'एक दिन तो होना ही है उसका मुह बन्द ' ये बात मात्र कम्पनी बाग़ की न होकर विश्व की हो जाती है ।
'आयेगें उजले दिन जरूर आयेगें ' आशा के साथ विशवास भी कायम करती हैं ।चूहे आखिर चूहे हैं कह कर,...दुष्टता की समाप्ति की घोषणा करते हैं कवि ।अपने मनुष्य होने पर विशवास दिलाती कविता ।
कवि के अपने होने के अहसास को बनाये रखना और सही बनने की कोशिश करते रहना सबसे बड़ा उद्देश्य है ..ये कविताये कविता को मनुष्य से जोड़ती हैं ।
डंगवाल जी की सभी कविताएँ अपने जीवन्त  होने  का प्रमाण देती हैं । कहीं  विनती है तो कहीं समझाइश ... इस संसार में सुंदरता को तलाश ही लेती हैं ।और अपने होने के प्रति कृतज्ञ भी होती हैं ।मन में कहीं कोई कुंठा नहीं ...दुःख, कष्ट में भी सुख पर अगाध विश्वास उन्हें दुनिया से अलग खड़ा कर देता हैं ।मात्र शरीर नष्ट होने से ऐसे कवि नहीं मरते । जब तक इस संसार में जीवन है वीरेन जी मोजूद हैं ।नमन कवि को .

.आभार सुरेन ।💐

अलकनंदा साने 
वीरेन डंगवाल मेरे प्रिय कवि रहे हैं.परंपरा और दुष्चक्र में सृष्टा अद्भुत कविताएं हैं."दुष्चक्र में सृष्टा" में अवलोकन गजब का है और अंत में सीधे ईश्वर को चुनौती . बेहद प्रभावी .तोप पहले भी पढ़ी थी.सुरेन जी का चयन हमेशा ही अच्छा रहता है और सामयिक भी.

मैं पीयूष से सहमत हूँ कि लेकिन नाम तो नाम है , कुछ भी कहें. अक्सर ऐसा होता है. नाम के दबाव में या प्रभाव में सिर्फ तारीफ की जाती है , जबकि किसी भी सृजक  की सारी रचनाएं कभी भी न तो श्रेष्ठ होती है और न ही यह जरुरी है कि सभी उन्हें पसंद करें.


मैं ब्रज जी की इस बात असहमत हूँ कि पीयूष हमें इस तरह से नहीं सोचना चाहिए. लिखना तो और भी नहीं चाहिए. क्यों नहीं लिखना चाहिए ? ये तो वही बात हुई कि नाम वालों की हमेशा प्रशंसा होनी चाहिए.एक बार मैंने राजेश जोशी की एक कविता को एक समूह में नापसंद किया तो बवाल मच गया था.उंगली उठाने का उद्देश्य यदि गलत न हों तो सभी को मत देने का स्वातंत्र्य होना चाहिए.

अविनाश तिवारी 
प्रतिक्रियाएँ तो तभी आईं थीं जब बिना नाम की पोस्ट डलीं थीं।जहाँ तक वीरेन्द्र जी का सवाल है वे नि:संदेह श्रेष्ठ हैं मुझे उनकी तोप दगष्चक्र में सृष्टा और इतने भले भी न बने ने बहुत प्रभावित किया है । पीयूष जी निर्भीक रहिये उड़ने को आसमान अनन्त है।यह भी सच है कि इन वरिष्ठ गुणिजनों ने भी आसमान पर मुकाम बनाया है।

शरद कोकास 
वीरेन दा की कविताएं बहुत मामूली से बिम्बो में गहरी बात कहती हैं । तोप कविता में तोप साम्राज्यवाद के शेष अवशेषों का  प्रतीक है । चिड़िया ( चिड़िया में भी गोरैया सबसे निरीह मानी जाती है ) और बच्चे उस पीढ़ी के प्रतीक हैं जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के और ब्रिटिश शासन  बारे में नहीं सुना है लेकिन वे इतिहास से भयभीत नहीं हैं  यहाँ कवि यही कहना चाहते हैं कि एक न एक दिन  साम्राज्यवाद और पूंजीवाद को खत्म होना ही है शांत पड़ी तोप की तरह ।

HarGovind Maithil : 
वीरेन डंगवाल जी की बेहतरीन कवितायें ।तोप, संदेश देती है कि समय परिवर्तनशील है सदा एक समान नहीं रहता ।आएँगे, उजले दिन जरूर आएँगे , एक आशावादी दृष्टि कोण जगाती हुई कविता ।कवि 1 व 2 अच्छी कवितायें ।इतने भले नहीं बन जाना साथी, परंपरा और दुष्चक्र में सृष्टा भी गहन अर्थ लिए हुए ।
वीरेन जी को नमन और सुरेन जी का शानदार प्रस्तुतीकरण के लिए आभार ।
 Sharad Kokas Ji:
 उजले दिन ज़रूर आएंगे इस कविता में चूहों का बिम्ब शोषक ,उत्पीडक आतंक वादी , किसी भी रूप में देख सकते है आप , कवि यह मानता है कि यह लोग भीतर से बहुत डरपोक होते हैं आप इनके सामने डट कर खड़े हो जाइये यह भाग जायेंगे । दुनिया में जाने कब से हत्याएं हो रही है , लेकिन सब कुछ खत्म तो नही हुआ है ।
आज यह मंज़र जो दिखाई दे रहा है इसका भी कभी न कभी अंत होगा ।
Dr Dipti Johri Sakiba:
 कभी कभी ऐसा भी होता है कि कोई हाथ भर की दूरी पर होता है ,तो ऐसा लगता है कि इनको तो कभी भी सुन लिया जायेगा ,जान लिया जायेगा । कुछ ऐसा ही मुझे उनके साथ एक ही कालेज में रहते हुए लगता रहा। हाँ इस दौरान की अनगिनत छोटी बड़ी यादें तो संजो के रखी है ।जब भी मिलते थे तो इतने सहज ,सरल लगता ही नही था कि इतने बड़े कवि से मिल रहे है ।कुछ उन्होंने कालेज में कभी प्रदर्शन नही किया तो दूसरी तरफ ये भी कहना पड़ेगा कि कालेज को भी इतने विराट व्यक्तित्व की कद्र करनी नहीं आयी । खैर ये तो संस्थाओं का स्वाभाव ठहरा।
 उनकी कई कवितायेँ मुझे पसंद है , जिनमे "परंपरा " कविता काफी महत्वपूर्ण लगती है क्योंकि इसमें वो कविता के उस विद्रोही स्वर के साथ खड़े नज़र आते है जो सत्त्ता के विरुद्ध है यथास्थितिवाद के विरुद्ध है ,उन साज़िशों के विरुद्ध है जो वास्तविक स्मृतियां मिटा कर उसके स्थान पर छद्म रचने का  उत्तर आधुनिक उपक्रम कर रहे है ।जिसमे वर्चस्ववादी शक्तियां जनसाधारण के मनोजगत पर पूरी तरह कब्ज़ा कर लेना चाहती हैं ..और वही से कवि के मन में इस ताकत के लिए ललकार का भाव जन्मता है और यह उसका साहस ही है जो ठीक ठीक अपने युग की अतिरेकी छवियों से युक्त अवास्तविक संसार के निर्माण होते जाने को काव्य में ढाल पाते हैं ।
 Sharad Kokas Ji: 
कवि कविता में तो बिम्बों का अद्भुत खेल है हर बिम्ब अलग अलग अर्थ देता है ।

पपीते का बीज विचार का बीज है गूदड़ कपड़ों का ढेर । जैसे फुटपाथ से खरीदी हुई कमीज़ भी आपको अच्छी लगने लगती है । एक किसान के पढ़ने वाले बेटे से पूछिए कि लालटेन की रौशनी का क्या महत्व है ।

सुरेन :
परंपरा  , कविता इसलिए और भी महत्वपूर्ण हो जाती है कि कवि इस कविता के कहन में मिशेल फूको और देरिदा  के उत्तर आधुनिक कांसेप्ट को कविता में ढालरहा है । 
हाशिये के आदमी के इतिहास बोध को अतिक्रमित करने के सत्ता के पावर गेम को कवि चुनौती देता है । पुनःश्च  मानकीकरण की प्रक्रिया से उपजे लादे गये सामान्यीकरण को कवि की चुनोती असाधारण है । 

इस बौद्धिकता के तेवर को आप भारतीय कवियों में  सिर्फ मुक्तिबोध में ही पा सकते है संभवतः  ।

सुधीर देशपांडे 
वीरेन डंगवाल की कविता का मुहावरा आम जन के पास से होकर गुजरता है। इनको पढना अपने आसपास और कहीं गहरे भीतर से होकर गुजरता है। चाहे वह तोप हो या आएंगे उजले दिन जरुर आएंगे। या कवि शृंखला मे शामिल कविताएं। सकारात्मक और अपनी प्रखर आशावादिता के चलते वे पसंदिदा कवि हैं। अच्छा चयन सुरेनजी। ब्रज आभार

 Dr Dipti Johri Sakiba:
 हम औरतें
रक्त से भरा तसला है
रिसता हुआ घर के कोने-अंतरों में
हम हैं सूजे हुए पपोटे
प्यार किए जाने की अभिलाषा
सब्जी काटते हुए भी
पार्क में अपने बच्चों पर निगाह रखती हुई
प्रेतात्माएँ
हम नींद में भी दरवाज़े पर लगा हुआ कान हैं
दरवाज़ा खोलते ही
अपने उड़े-उड़े बालों और फीकी शक्ल पर
पैदा होने वाला बेधक अपमान हैं
हम हैं इच्छा-मृग
वंचित स्वप्नों की चरागाह में तो
चौकड़ियाँ
मार लेने दो हमें कमबख्तो !

 Dr Dipti Johri Sakiba: हम औरते कविता का बिम्ब विधान गज़ब का है इसमें दैनंदिन कार्यो को निपटाती निरीह औरत नहीं बल्कि उनकी कविता की  स्त्री वंचित स्वप्नों की चरागाहों में चौकड़ी का इच्छा मृग बनने की आकांक्षा रखने वाली है । वह एक स्त्री की वास्तविकताओं के असीम  संभावनाओं को तथा उसे एक सामान्य मनुष्य के  रूप में प्रतिष्टित करती हुई कविता है


Friday, August 5, 2016



किशोर कुमार का जन्म 4 अगस्त 1929 को मध्य प्रदेश के खंडवा शहर में वहाँ के जाने माने वकील कुंजीलाल के यहाँ हुआ था। किशोर कुमार का असली नाम आभास कुमार गांगुली था। किशोर कुमार अपने भाई बहनों में दूसरे नम्बर पर थे। उन्होंने अपने जीवन के हर क्षण में खंडवा को याद किया, वे जब भी किसी सार्वजनिक मंच पर या किसी समारोह में अपना कर्यक्रम प्रस्तुत करते थे, शान से कहते थे किशोर कुमार खंडवे वाले, अपनी जन्म भूमि और मातृभूमि के प्रति ऐसा ज़ज़्बा बहुत कम लोगों में दिखाई देता है।

शिक्षा

किशोर कुमार इन्दौर के क्रिश्चियन कॉलेज में पढ़े थे और उनकी आदत थी कॉलेज की कैंटीन से उधार लेकर खुद भी खाना और दोस्तों को भी खिलाना। वह ऐसा समय था जब 10-20 पैसे की उधारी भी बहुत मायने रखती थी। किशोर कुमार पर जब कैंटीन वाले के पाँच रुपया बारह आना उधार हो गए और कैंटीन का मालिक जब उनको अपने एक रुपया बारह आना चुकाने को कहता तो वे कैंटीन में बैठकर ही टेबल पर गिलास और चम्मच बजा बजाकर पाँच रुपया बारह आना गा-गाकर कई धुन निकालते थे और कैंटीन वाले की बात अनसुनी कर देते थे। बाद में उन्होंने अपने एक गीत में इस पाँच रुपया बारह आना का बहुत ही खूबसूरती से इस्तेमाल किया। शायद बहुत कम लोगों को पाँच रुपया बारह आना वाले गीत की यह असली कहानी मालूम होगी।


किशोर दा  के मस्त मौला  अभिनय और गायन के अंदाज़ से भला कौन  वाकिफ़ नहीं है |रूप तेरा मस्ताना ......,पाचँ रुपैया बारह आना .....जैसे गीत जब भी कभी कानों में रस घोलते है किशोर कुमार की अलमस्त अदा आँखों से चिरौरी करने लग जाती है |क्या आज भी किशोर दा की रूह उसी मस्ती और पुरसुकूं को महसूस करती है ??  यह महसूस करने के लिए पढ़ते है 
4  अगस्त २०१६ को उनके जन्म दिन पर खंडवा के ही किशोर दा के प्रशंसक  श्री संतोष तिवारी  का लिखा एक व्यंग ...





व्यंग (संतोष तिवारी )

अल सुबह 5 बजे डोर बैल बजी। उनींदा डगमगाते कदमो से नीचे पहुँच के दरवाज़ा खोला तो सामने किशोर दा एक पैर पर थोड़ा झुके हुए और  चेहरे पर वही मुस्कान। ताज़े गुलाब की तरह तरोताज़ा।  दरवाज़ा खोलते ही उछल कर बोले- बांगड़ू हमारा बर्थडे विश नही करेगा। मैं आधा जागा आधा सोया अलसाया सा बोला - हैप्पी बर्थडे दादा। पर आप तो ..... ? मेरी बात को बीच में ही लपकते हुए दादा बोले - दुनियां में नही रहा यही ना? ऊपर वाले को दो घण्टे  बैठा कर गाने सुनाये तब जा कर आज आने की मोहलत मिली।  पर  सिर्फ आज भर की। क्या है कि अपनी उधर भी बहुत डिमांड है।  पीठ घुमा कर अंदर आते हुए मैंने सोफे की तरफ इशारा करते हुए उनसे कहा- बैठिये। पर दादा तो मस्ती के मूड में थे । आँखें घुमाते हुए बोले- एक दिन तो मिला है उसको भी बैठने में बर्बाद कर दूँ क्या बांगड़ू। चल  दूध जलेबी खाएंगे और आज के दिन तो बस खंडवे के हो जायेंगे। 
"दादा फ्रेश तो हो जाऊं? "
"ठीक है पर जल्दी करले मेरे लड्डू गोपाल।"
हाज़त से फारिग होते होते राशोकि रमाकु ने घर भर में वो धमाचौकड़ी की कि श्रीमती जी ने आँखों आँखों में मुझे उन्हें जल्दी ले जाने का फरमान सुना डाला। बासे मुंह निकल पड़े मैं और दादा। मेरी खुमारी अभी तक उतरी नही थी। चाल थोड़ी मद्धम थी। दादा कूदते फांदते आगे आगे चले जा रहे थे। एक तो उनका उत्साह और दूसरे वक़्त की कमी। वो एक पल भी बर्बाद करने को राज़ी नही थे। बातें करते करते गौरी कुञ्ज आ गए। किशोर कुमार की माता गौरी देवी और पिता कुञ्जी लाल की याद में बना ऑडिटोरियम। आसपास झाड़ झंखाड़ और गंदगी का पसारा, भवन पर जगह जगह काई को देखते देखते दादा की चाल थोडी कम पड़ गयी। हॉल में दाखिल होते ही दर्शकों के एंगल से स्टेज निहारने के लिए जैसे ही सामने की एक कुर्सी पर बैठने को उद्यत हुए मैंने चिल्ला कर उनका हाथ थाम लिया-दादा दादा ज़रा बच के , कुर्सी टूटी हुई है। सहमे से वो मेरी और देखने लगे। उत्साह का एक हिस्सा दरक गया था और मायूसी का प्रश्नवाचक उनके चेहरे पर पढ़ा जा सकता था। धीरे से एक बच्चे जैसे उन्होंने अपनी  एक ऊँगली उठा कर लघुशंका जाने की फरियाद की। मैंने उन्हें हाल के बाजू से लगा कक्ष दिखा दिया। निपटने के बाद दादा ने आवाज़ दी - बांगड़ू पानी मिलेगा। मैंने कहा - दादा पानी का इंतज़ाम तो आयोजक ही करते हैं। दादा बोले - चल मेरे प्यारे! ज़रा ग्रीन रूम तो दिखा। मैंने कहा- चलिये आगे। दादा बोले -यहीं बाथरूम के अंदर से ??  थोड़ी सी शर्म अब मुझे भी आने लगी थी। धीरे से जवाब दिया - हां। ग्रीन रूम में जाकर दादा का चेहरा और उतर गया जब उन्होंने पाया कि जिसे ग्रीन रूम कह के मैं दिखला रहा हूँ वहां ड्रेसिंग टेबल तो छोड़िए एक अदद आईना तक नही है। दादा ने तंज़ कसा बड़ा अच्छा ऑडिटोरियम है। ज़रा गा कर तो देखूं। देखें तुम्हारा साउंड सिस्टम कैसा है। मैंने गर्दन छुपा लेने वाले अंदाज़ में कहा - दादा साउंड का इंतज़ाम भी आयोजक ही करते हैं। ऑडिटोरियम का अपना साउंड सिस्टम तो धूल फांक रहा है। प्रत्येक रहस्य से पर्दा उठाने के साथ मैं  किशोर दा की मस्ती और उत्साह में गिरावट दर्ज कर रहा था। "रख रखाव नही होता यहाँ?" दादा ने पूछा। 
" होता होगा दादा। मतलब चार्ज तो इसी का लिया जाता है।" 
" कितना चार्ज?"
" बारह हज़ार ।"
"छूट या रियायत नही मिलती।"
"दादा सरकारी कार्यक्रम या सरकार का कार्यक्रम हो तो मुफ्त भी मिल जाता है ऐसा सुना है मैंने। पर कलाकारों को तो....।" 
" समझ गया समझ गया।"
किशोर दा के चेहरे का वो बचपना जिसे सुबह दरवाज़ा खोलते वक़्त मैंने देखा था गायब सा हो रहा था और गम्भीरता आने लगी थी। वैसी ही जैसे किसी सैड सांग को गाते वक़्त आ जाया करती थी।
" लगता है सब भूल गए मुझे।" उन्होंने निराश स्वरों में कहा।
"नही दादा। हम सब आपको याद करते हैं। आपका नाम ले ले कर इतराया करते हैं। मंच से प्रेरणा देने का काम तो हर साल बिला नागा करते हैं।"
किशोर दा के चेहरे पर मुस्कान खिली। पूछ बैठे -अच्छा तो इस बार किस खंडवा वाले को प्रेरणा मिली है। मैंने कहा - दादा खण्डवा शहर से तो कोई नही है। हाँ आसपास के अंचलों और ज़िलों से ज़रूर लोगों के नाम आगे आये हैं। वो प्रश्न भरी निगाह से मुझे देखने लगे। 
हम गौरी कुञ्ज से बाहर निकले और शहर से होते हुए समाधि तक जाने लगे। रस्ते में उन्होंने खुद के घर की दशा देखी। मायूसी का अंधकार घना हो गया था। मैं अंदर चलने को कहता इसके पहले ही उन्होंने इशारे से मना कर दिया। रास्ते भर जाने किस किस को याद करते रहे अपनी बातों में।  कइयों के तो मैं नाम भी नही जानता। 
समाधि पर जाकर तो जैसे वो टूट से गये।  आँख की पोरों में मैंने कुछ नमी महसूस की। किशोर दा गुनगुना उठे- रहने दो छोडो जाने दो यार हम ना करेंगे प्यार। चलते चलते समाधि पर लगे दूध जलेबी के भोग में से अनमने तरीके से जलेबी का एक हिस्सा मुंह में डाला और धीरे धीरे उसी समाधि में जैसे  विलीन हो गए। 
मैं उन्हें इस तरह गायब होते देख ज़ोर से चिल्लाया-  दादा। 
अचानक झकझोरते हुए पत्नी ने जगाया। उठ जाओ सूरज सिर पर आ गया है। ओ तेरी की ये तो सपना था। सपने में महसूस हुई शर्म को मैं भूल गया जैसे हम खंडवे वाले भूल जाते हैं। और दादा के जन्मदिन के कार्यक्रमों को रिकॉल करने लगा। समाधि पर दूध जलेबी का भोग, फिर वहीँ ऑर्केस्ट्रा पर बड़े बड़े अधिकारियों की मान मनौव्वल कर एक दो लाइने गवाना, फिर जगह जगह किशोर दा की तस्वीरों पर  माल्यार्पण। शाम को प्रेरणाओं को पुरस्कार ऑर्केस्ट्रा की धमाचौकड़ी। और फिर बस।

टीवी पर गाना चल रहा था- कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन।
ओ माँ किशोर दा का सपना पर मैं सपने को सपने में भी याद नही करना चाहता था। तैयार होते समय आईने के सामने खड़ा मैं गुनगुना रहा था- 
जड़ दो चांदी में चाहे सोने में
आईना झूठ बोलता ही नही।

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परिचय 

संतोष तिवारी
#जन्म- 14 दिसम्बर 1966
#मुख्य विधा- कविता /ग़ज़ल
#अन्य विधाओं में भी कार्य

#कवि सम्मेलनों और अखिल भारतीय स्तर के मुशायरो में शिर्कत
#लगभग 200 सुप्रभात संदेशो की श्रृंखला का लेखन जिसमे जीवन जीने की कला और मानवीय संबंधों पर नए दृष्टिकोण से विश्लेषण किया है।
# सांध्य दैनिक अग्निबाण में  मन्तर नाम से कॉलम का प्रकाशन जिसमे सत्यार्थ के छद्म नाम से लेखन।
#स्थानीय समाचार पत्रों में कवितायेँ ग़ज़लें प्रकाशित
# इ टीवी उर्दू द्वारा प्रसारित ग़ज़ल के एक कार्यक्रम में ग़ज़ल पाठ
# आकाशवाणी खण्डवा एवं इंदौर से कवितायेँ एवं वार्ताएं प्रसारित
# कुछ अप्रकाशित व्यंग्य जिनमे से प्रस्तुत भी एक है।

# अखिल भारतीय साहित्य परिषद की जिला इकाई का सचिव
साहित्य की बात  'व्हाट्स अप समूह पर प्रस्तुत हुई आज मुकेश कुमार सिन्हा की कवितायें | जिसके मुख्य एडमिन है ब्रज श्रीवास्तव 
यह कवितायें आम आदमी की भाषा से गुजरती है |अपनी ही विशेष शैली में लिखी गई कविताओं की आधार भूमि कभी रेखागणित के समकोण त्रिभुज होते है तो कभी  रिश्तों की बायोलोजिकल कैमिस्ट्री ...कभी कभी ये डस्टबिन से भी कविता का उद्गम  कर लेते है तो कभी  मनीप्लांट की बेल में भी जीवन की जिजीविषा तलाश  कर कविता रच लेते है  |सामान्य से दिखने वाले प्रतिक इनकी कविताओं को असामान्य  अर्थ प्रदान करते है |जीवन की तमाम  उलझनों  से गुजरते हुए भी इनकी  कविताई द्रष्टि प्रेम की उस संरचना को पहचान लेती  है जहाँ प्रेम कविता की सुवास पाठक को ठहरने पर मजबूर कर देती है |ठीक उसी प्रकार जेसे कंटीली झाड़ियो में सुगन्धित गुलाब  पथिक की द्रष्टि को बाँध लेता है .....
.रचना प्रवेश पर प्रस्तुत है कुछ कविताये और साथ ही पाठकों की त्वरित प्रतिक्रियाएं .....

परिचय 

नाम :  मुकेश कुमार सिन्हा
जन्म : 4 सितम्बर 1971 (बेगुसराय, बिहार)
शिक्षा : बी.एस.सी. (गणित) (बैद्यनाथधाम, झारखण्ड)
इ-मेल: mukeshsaheb@gmail.com
ब्लॉग: "जिंदगी की राहें" (http://jindagikeerahen.blogspot.in/ )
      ( 2014-15 के सौ श्रेष्ठ हिंदी ब्लॉग में शामिल )
      “मन के पंख” (http://mankepankh.blogspot.in/ )
फेसबुक पेज: मुकेश कुमार सिन्हा (https://www.facebook.com/mukeshjindagikeerahen)
ट्विटर हैंडल : https://twitter.com/Tweetmukesh
मोबाइल: +91-9971379996
निवास: लक्ष्मी बाई नगर, नई दिल्ली 110023
वर्तमान: सम्प्रति कृषि राज्य मंत्री, भारत सरकार, नई दिल्ली के साथ सम्बद्ध I
संग्रह : “हमिंग बर्ड” कविता संग्रह (सभी ई-स्टोर पर उपलब्ध) (बेस्ट सेलर)
सह- संपादन: "कस्तूरी", "पगडंडियाँ", “गुलमोहर”, “तुहिन” एवं “गूँज”  (साझा कविता संग्रह)
प्रकाशित साझा काव्य संग्रह:

1.अनमोल संचयन, 2.अनुगूँज, 3.खामोश, ख़ामोशी और हम, 4.प्रतिभाओं की कमी नहीं (अवलोकन 2011), 5.शब्दों के अरण्य में , 6.अरुणिमा, 7.शब्दो की चहलकदमी, 8.पुष्प पांखुड़ी
  9. मुट्ठी भर अक्षर (साझा लघु कथा संग्रह), 10. काव्या
सम्मान: 1. तस्लीम परिकल्पना ब्लोगोत्सव (अंतर्राष्ट्रीय ब्लोगर्स एसोसिएशन) द्वारा वर्ष 2011 के
    लिए सर्वश्रेष्ठ युवा कवि का पुरुस्कार.
2. शोभना वेलफेयर सोसाइटी द्वारा वर्ष 2012 के लिए "शोभना काव्य सृजन सम्मान"
3. परिकल्पना (अंतर्राष्ट्रीय ब्लोगर्स एसोसिएशन) द्वारा ‘ब्लॉग गौरव युवा सम्मान’ वर्ष
   2013  के लिए
4. विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ से हिंदी सेवा के लिए ‘विद्या वाचस्पति’ 2014 में
5. दिल्ली अंतर्राष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल 2015 में ‘पोएट ऑफ़ द इयर’ का अवार्ड
6. प्रतिमा रक्षा सम्मान समिति, करनाल द्वारा ‘शेर-ए-भारत’ अवार्ड मार्च, 2016 में

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🔯पिता

पिता का बेटे के साथ संबंध
होता है सिर्फ बायोलोजिकल -
खून का रिश्ता तो होता है सिर्फ माँ के साथ
समझाया था डॉक्टर ने
जब पापा थे किडनी डोनर
और डोनर के सारे टेस्ट से
गुजर रहे थे पापा
"अपने मंझले बेटे के लिए"

जितना हमने पापा को पहचाना
वो कोई बलशाली या शक्तिशाली तो
कत्तई नहीं थे
पर किडनी डोनेट करते वक़्त
पूरी प्रक्रिया के दौरान
कभी नहीं दिखी उनके चेहरे पे शिक़न
शायद बेटे के जाने का डर
भारी पड़ रहा था स्वयं की जान पर

पापा नहीं रहे मेरे आयडल कभी
आखिर कोई आयडल चेन स्मोकर तो हो नहीं सकता
और मुझे उनकी इस आदत से
रही बराबर चिढ !
पर उनका सिगरेट पीने का स्टाइल
और धुएं का छल्ला बनाना लगता गजब
आखिर पापा स्टायलिस्ट जो थे !
फिर एक चेन स्मोकर ने
अपने बेटे की जिंदगी के लिए
छोड़ दी सिगरेट, ये मन में कहीं संजो लिया था मैंने !

पापा के आँखों में आंसू भी देखे मैंने
कई बार, पर
जो यादगार है, वो ये कि
जब वो मुझे पहलीबार
दिल्ली भेजने के लिए
पटना तक आये छोड़ने, तो
ट्रेन का चलना और उनके आंसू का टपकना
दोनों एकसाथ, कुछ हुआ ऐसा
जैसे उन्होंने सोचा, मुझे पता तक नहीं और
मैंने भी एक पल फिर से किया अनदेखा !
ये बात थी दीगर कि वो ट्रेन मेरे शहर से ही आती थी
लेकिन कुछ स्टेशन आगे आ कर
छोड़ने पहुंचे. किया 'सी ऑफ' !

पाप की बुढ़ाती आँखों में
इनदिनों रहता है खालीपन
कुछ उम्मीदें, कुछ कसक
पर शायद मैं उन नजरों से बचता हूँ
कभी कभी सोच कहती है मैं भी अच्छा बेटा कहलाऊं
लेकिन
'अच्छा पापा' कहलाने की मेरी सनक
'अच्छे बेटे' पर,पड़ जाती है भारी

स्मृतियों में नहीं कुछ ऐसा कि
कह सकूँ, पापा हैं मेरे लिए सब कुछ
पर ढेरों ऐसे झिलमिलाते पल
छमक छमक कर सामने तैरते नजर आते हैं
ताकि
कह सकूँ, पापा के लिए बहुत बार मैं था 'सब कुछ'
पर अन्दर है गुस्सा कि
'बहुतों बार' तो कह सकता हूँ,
पर हर समय या 'हर बार' क्यों नहीं ?

रही मुझमे चाहत कि
मैं पापा के लिए
हर समय रहूँ "सब कुछ"
आखिर उम्मीदें ही तो जान मारती है न !!


🔯पाइथोगोरस प्रमेय 

सुनो
पाइथोगोरस प्रमेय के
तहत
क्या प्रेम भरा रिश्ता
हो सकता है सिद्ध?

किसी ने बताया
गणित में कुछ भी सिद्ध करने से पहले
"मान लिया"
शब्द का करते हैं प्रयोग

तो सुनो
मान लो तुम हो समकोण त्रिभुज की
सबसे छोटी भुजा
तो भी हो अकड़ी,
चुप चाप खड़ी

और चलो मैंने माना
स्वयं को
सबसे बड़ी भुजा,
यानी कर्ण या विकर्ण
आखिर हूँ न बलिष्ठऔर वरिष्ठ

पर फिर भी मेरा पूर्णतया झुकाव
न्यूनकोनिक सा
है तुम्हारे प्रति !

दोनों के आधार के बीच की दूरी
यानी
प्रेम व आकर्षण का परिमाण
है लम्बाई में इतना
ताकि
संभव हो मिलन
पूर्णतया
ऐसे कह लो
अधरों का मिलन है संभव

यानी
पाइथोगोरस का प्रेम सिद्धांत
कहेगा
तुम्हरे प्रेम का परिमाण
व हम दोनों के बीच के
आकर्षण का परिमाण
का वर्गफल
है मेरे प्रेम के बराबर
खालिस प्यार

समझी न
ख़ाक समझोगी
पहले पहाड़ा पढो
दो का
दो मने
मैं और तुम...........!

दो दुनी चार का मतलब मत निकाल लेना
बेवकूफ !


🔯. राखी 

ईमेल एसएमएस की दुनिया में
डाकिये ने पकड़ाया लिफाफा
22 रुपए के स्टेम्प से सुसज्जित
भेजा गया था रजिस्टर्ड पोस्ट
पते के जगह, जैसे ही दिखी
वही पुरानी घिसी पिटी लिखावट
जग गए, एक दम से एहसास
सामने आ गए, सहेजे हुए दृश्य
वो झगड़ा, बकबक, मारपीट
सब साथ ही दिखा,
प्यार के छौंक से सना वो
मनभावन, अलबेला चेहरा
उसकी वो छोटी सी चोटी,
उसमे लगा काला क्लिप जो होती थी,
मेरे हाथों कभी
एक दम से आ गया सामने
उसकी फ्रॉक, उसका सैंडल
ढाई सौ ग्राम पाउडर से पूता चेहरा
खूबसूरत दिखने की ललक
एक सुरीली पंक्ति भी कानों में गूंजी
“भैया! खूबसूरत हूँ न मैं??”

हाँ! समझ गया था,
लिफाफा में था
मेरे नकचढ़ी बहना का भेजा हुआ
रेशमी धागे का बंधन
था साथ में, रोली व चन्दन
थी चिट्ठी.....
था जिसमे निवेदन
“भैया! भाभी से ही बँधवा लेना !
मिठाई भी मँगवा लेना !!”
हाँ! ये भी पता चल चुका था
आने वाला है रक्षा बंधन
आखिर भाई-बहन का प्यारा रिश्ता
दिख रहा था लिफाफे में ......
सिमटा हुआ...........!!!


🔯सुट्टे के अंतिम कश से पहले  सोचता  हूँ 

सुट्टे के अंतिम कश से पहले  सोचता  हूँ
कि क्या सोचूं ?
जी.एस.टी. के उपरान्त लगने वाले टैक्स पर करूँ बहस,
या, फिर सेवेंथ पे कमिशन से मिलने वाले एरियर का
लगाऊं लेखा जोखा
या, सरकारी आयल पूल अकाउंट से
पेट्रोल या गैस पर मिलने वाली सब्सिडी पर तरेरूं नजर
पर, दिमाग का फितूर कह उठता है
क्या पैसा ही जिंदगी है ?
या पैसा भगवान् नहीं है,
पर भगवान की तुलना में है ज्यादा अहम् !
और, अंततः, बस अपने भोजपुरी सिनेमा के रविकिशन को
करता हूँ, याद, और कह उठता हूँ
"जिंदगी झंड बा, फिर भी घमंड बा"

अब, अंतिम कश लेने के दौरान
चिंगारी पहुँचती है फ़िल्टर वाले रुई तक
भक्क से जल उठता है
तर्जनी और मध्यमा के मध्य का हिस्सा
और फिर बिना सोचे समझे कह उठता हूँ
भक्क साला .....
जबकि कईयों के फेसबुक स्टेटस से पा चुका हूँ ज्ञान
गाली देना पाप है
रहने दो, डेली पढ़ते हैं, डब्बे पर स्मोकिंग इज इन्ज्युरिअस टू हेल्थ
जलते गलते जिगर की तस्वीर के साथ
फिर भी, वो धुएं का अन्दर जाना,
आँखों को बाहर निकलते हुए महसूसना
है न ओशो के कथन जैसा
बिलिफ़ इज ए बैरियर, ट्रस्ट इज ए ब्रिज !

लहराता हूँ हाथ
छमक कर उड़ जाती है सिगरेट, साथ ही
हवाओं के थपेड़े से मिलता है आराम
फिर बिना सोचे समझे महसूसता हूँ
उसके मुंह से निकलने वाले जल मिश्रित भाप की ठंडक
देती है कंपकपी
ऐसे भी सोचा, उसकी दी हुई गर्मी ने भी दी थी कंपकंपी
अंततः
दिमाग कह उठा,  कल का दिन डेटिंग के लिए करो फिक्स

प्यार समय मांगता है
बिना धुंआ बिना कंपन

बेटर विदाउट सिगरेट ... है न !!!!

🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯


प्रतिक्रियायें 
 Saksena Madhu: मुकेश की कविताएँ आत्मीयता से बात करती प्रतीत होती हैं ...अपने पढ़े हुए विषयों को कविता के घोल कर कर  अलग रंग चढ़ा कर काव्य में नए समीकरणों को स्थापित किया है । पिता और  राखी कविता लिखने में पूरी सच्चाई और ईमानदारी दिखती है  नाटकीय महानता का जाम पहन कर आदर्श स्थापित करने का प्रयास किया नही किया ... मुकेश के काव्य सन्ग्रह ' हमिंग बर्ड की ' समीक्षा लिखते समय भी मुझे मुकेश के काव्य में सच्चाई , अवगुणों  स्वीकारोक्ति और बेबाकी बहुत अच्छी लगी ..'जस की तस धर दीन्ही चुनरिया ' वाली सहजता प्रभावित करती है । 'सुट्टे के अंतिम कश ' में एक आम आदमी की चिंता और पीड़ा है ।
अच्छी और अलग सी कविताओं के लिए बधाई मुकेश को ...
आभार प्रवेश .....

 Chandrashekhar Ji: मुकेश जी की कविताएँ कसी हुई लगीं...लगा की बार बार काम करते हैँ वे अपनी कविताओं पर...राखी मुझे सबसे अच्छी लगी..
बधाई मुकेश जी।

 अपर्णा: मुकेश जी की कविताओं का संसार हमारे आस-पास का संसार है। मनीप्लांट का पौधा,ऑफ़िस की घड़ी, दरवाज़ो की दरारें, प्रदूषित यमुना, गृहनगर का पुल, सिगरेट के छल्लों के पीछे का मन और उसका विज्ञान, सड़क, लिफ्ट सीढ़ियाँ ये सब इनकी कविताओं का विषय बनते आए  हैं। और हर कविता में टंका होता है एक सरोकार। मैंने इनकी कविताई को परिपक्व होते देखा है। 
आज की कविताओं में 'पिता' और 'सुट्टे के कश..' बहुत अच्छी लगीं। कहीं कहीं तनिक कसाव की ज़रूरत लगी मुझे। कहीं तनिक गद्यात्मकता की ओर भी झुकती हैं कविताएँ। पर एक निराले अंदाज़ को अनदेखा नहीं किया जा सकता। 
सृजनशीलता को प्रतिबद्ध इस 'ज़िद्दी' कवि को मेरी ढेरों शुभकामनाएँ। 
साकीबा पर इस प्रथम प्रस्तुति की बधाई दोस्त।
😊👍🏽
Sharad Kokas Ji: पिता पर लिखी कविता एक संस्मरण की तरह है । इसमें ब्यौरों की अधिकता है जो कविता में रूचि तो उत्पन्न करती है लेकिन कथ्य में अपनी बात शामिल करने से कवि को रोकती है । यह बात कविता के अंत में आ पाती है । पायथागोरस प्रमेय निस्संदेह अच्छी कविता है और बिम्बो का इसमें बेहतरीन प्रयोग  है जो कविता के प्रारंभ से ही अपनी विषय वस्तु में स्पष्ट है । यहाँ निर्वाह ठीक ढंग से हुआ है ।

 Nasir Ahamad Sikandar: बी एस सी गणित से हूँ सो पाइथागोरस प्रमेय कविता पसन्द आई।

 Braj Ji: कविता का एक अर्थ होता है भाव भरे वाक्य का संप्रेषित होने योग्य प्रवाह से भी भरा होना. ऐसा जुमला जो हमें बार बार अनन्य कल्पना लोक में ले जाये और कविता की अगली पंक्ति हमें फिर मुस्कराते हुए बुला ले, हम चकित से होते रहें, संवेदित होते रहें, और हाँ पढ़ते समय हमारा आलोचना वाला दिमाग कुछ न कहे, रसिक वाला दिल ही धड़कता रहे. 

ऐसे विचार मेरे मन में तब आये, जब मैं मुकेश कुमार सिन्हा की प्रस्तुत कविताएँ पढ चुका, इन कविताओं के विषय कोई नये नहीं, लेकिन कहन अलग है, अंदाज़ ए बयां और है, कवि के विचार जिस  शिद्दत से मन में आते हैं वह सघन होकर आते हैं, पिता पर कविता की मौलिकता ध्यान खींचती है, पायथागोरस की प्रमेय को कविता में इतने अच्छे से गठित करने का प्रयास विफल हो सकता था. पर कमाल हुआ.

थोड़ा और गठन पर ध्यान दीजिए, वैसे बायोडाटा कहता है कि यह अभ्यासी और सिद्ध कवि हो चले हैं. 

प्रस्तुत ठीक से किया गया है. समूह पर ऐसी ही पेशकश होना चाहिए. 

शुभकामनायें ||

ब्रज श्रीवास्तव.
 Anita Manda: मुकेश जी की सभी कविताएँ बहुत अच्छी लगी

Archana Naidu: मुकेश जी,  की कविताएँ यानि ताजगी भरा सुकूनी झोका।
जहां  प्यारी सी फिलिंग को शेयर करने के लिए  आसपास की तमाम चीजों को बिम्ब उपलब्ध रहते हैं। पाइथागोरस, के फार्मूले, डस्टबिन,  सिगरेट और न जाने क्या क्या। सच,   कवि की सोच का जवाब नहीं।  आपकी उपलब्धियां   और आपकी कलम की  अच्छी दोस्ती है।  सारी की सारी कविताएँ  अच्छी लगी। आप बहुत ऊंचे जायेंगे,। दुआयें है हमारी 😊

 Arti Tivari: सारी कवितायेँ बहुत सुंदर पर..पाइथोगोरस प्रमेय सबसे अच्छी लगी। इस कविता को कवि ने जैसे साधा है👌🏼👌🏼👌🏼👌🏼👌🏼 लाजवाब है🍀🌸😊

 Mukesh Kumar Sinha: सबसे पहले तो शुक्रिया और फिर माफ़ी, मुझे जरा भी भान नहीं था कि मेरी कवितायेँ साकीबा के विस्तृत फलक पर सुशोभित होगी ! बहुत दिनों पहले प्रवेश ने मेरी कुछ कवितायेँ ली थी, पर ये नहीं बताया था कि उन कविताओं का क्या प्रयोग होगा साथ ही अंतिम कविता मैंने प्रवेश को बस दिखाने भर के उद्देश्य से कल थी ............बहुत बहुत धन्यवाद मित्र !!

 Mukesh Kumar Sinha: दिल से आभार व्यक्त करता हूँ  पीयूष जी, के.के.श्रीवास्तव सर, मधु जी, चंद्रशेखर सर, अपर्णा , शरद सर, नासिर अहमद जी, ब्रज श्रीवास्तव सर, अनीता जी, अर्चना व आरती जी ......... | आप सबका तहे दिल से शुक्रिया जो मेरे जैसे नए रचनाकार के लिए आप सबने समय निकला !

 Hariom Rajoriyaa Ji: मैंने मुकेश की कवितायें पहली बार पढ़ीं । इन कविताओं में भविष्य की एक उम्मीद है । हम जो सोचते हैं उसे भाषा के माध्यम से पकड़ने का प्रयास कराटे हैं , कई बार घनीभूत अनुभव बेचैनी के साथ हमसे कविता लिखवा लेते हैं और शिल्प अपने आप बन जाता है । मुकेश की कवितायें उसी तरह की हैं । ये ऐसी नहीं , ऐसी होतीं ? जैसी कोई बात नहीं , ये जैसी हैं , बैसी ही हैं ।  मुकेश को बधाई ।
 +91 80850 96010: मुकेश जी मेरी भी बधाई स्वीकार कीजिए । अब आप नए रचनाकार नहीं अनुभवी हो चले हैं तभी तो जीवन की इतनी हलचल और आपाधापी में एक हल्की लरज के साथ आप प्रयोग कर पाते हैं  भले ही गद्य भाग थोड़ा ज्यादा हावी रहता है पर बात तो दिल तक पहुँच ही जाती है । आपकी कविता ठन्डे पानी का झोंका जो चेहरे पर मुस्कान ला देता है । मुझे भी पाइथोगारस कविता सबसे अच्छी लगी।   । बधाई आपको । । हमिंग बर्ड की उड़ान जारी रहे । 
धन्यवाद प्रवेश जी ।

 Meena Sharma Sakiba: मुकेश जी की कविताएँ कुछ अलग अन्दाज में गणित और प्रेम 
का भूगोल के साथ उत्सुकता से बाँध लेने में सफल. 
अच्छी या बहुत अच्छी की बात
नहीं..बस पढ़कर जरा मुस्कुराएँ..
पिता के सिगरेट के छल्ले आँखों मं
घूम गये..! मनीप्लाँट से लेकर राखी तक के रिश्ते पर बेबाक कलम
चलाकर खूबसूरत गठन में कसी कविताएँ...बधाई मुकेश जी
धन्यवाद प्रवेश जी.
Bhavna Sinha Sakiba: मुकेश जी की सारी कविताएँ  बहुत कोमल और संवाद करती हुई है।  इनके कविता को बयान करने का अंदाज अनोखा है। यहाँ प्रस्तुत कविताओं में  राखी मेरी पसंदीदा कविता हैं  --ढाई सौ ग्राम पाउडर से पूता चेहरा --  बस वाह वाह ।

अच्छी प्रस्तुतिकरण के लिए  प्रवेश जी को बधाई ।
 Mukesh Kumar Sinha: आभार हरीओम राजोरिया जी का ............ये ऐसी नहीं , ऐसी होतीं ? जैसी कोई बात नहीं , ये जैसी हैं , बैसी ही हैं । ..........आपका ये स्टेटमेंट दिल में लगा, बेहद शुक्रिया !!
 Mukesh Kumar Sinha: आभा .......आपको तो पता है, मेरी कविताओं के शब्द कैसे किस तरह से जूझते हैं, तभी तो वो समय दर समय संस्मरणात्मक से लगने लगते हैं ............कोशिश जारी है...शुक्रिया मित्र ! ..........अपर्णा ने सही कहा था, जिद्दी कवि😜 !  तभी तो एक व्यक्ति जो क से सिर्फ कहानी ही समझता था, वो भी पाठक के तौर पर, आज बेवजह की कवितायेँ रचने लगा है ........!! दिल से शुक्रिया

 Meena Sharma Sakiba: जूझते हुए  शब्द ही कविता को
नए अंदाज़ देते हैं.
 Mukesh Kumar Sinha: बेहद शुक्रिया मीना शर्मा जी ...........अगर मेरी कविता एक पल के लिए भी मुस्कान लाने में सफल है, तो मैं स्वयं को सफल ही समझूंगा ! दिल से आभार


Dr Mohan Nagar Sakiba: मैंने मुकेश जी की पायथागोरस प्रमेय शायद फेसबुक पर पढ़ी है और अन्य कविताएँ भी कुछ या हो सकता है भ्रम हो .. एकदम नये कलेवर की कविताएँ .. शैली और लेखन पर किसी भी तरह की छाप नहीं बल्कि अपनी ही मुकम्मल होती शैली अद्भुत लेकर आते दीखते हैं वे .... तमाम कविताएँ सरल सहज छूटी हुई लगती हैं .. लिखने की कोई कोशिश या ड्राफ्ट मिला मिलाकर तैयार हुई तो कतई ही नहीं। मेरी शुभकामनाएं उनकी आगे की यात्रा के लिए .. अद्भुत रचनाएँ


नरेश अग्रवाल ,....मुकेश जी की सारी कविताएँ  पिता,  पाइथोगोरस प्रमेय, राखी, सुट्टे के अंतिम कश से पहले  सोचता  हूँ , सभी अच्छी हैं। 
हां यह तो महत्त्वपूर्ण है की इन चारों कविताओं के शीर्षक याद करते ही कविता की कोई न कोई  पंक्ति याद आने लगती है जो कवि के प्रतिभाशाली होने का संकेत है। बधाई मुकेशजी को। पूरी उम्मीद है भविष्य में वे और भी अच्छा लिखेंगे।

साथ ही अच्छी प्रस्तुतिकरण के लिए  प्रवेश जी को बधाई ।

Saiyd ayyub इससे पहले कि आज की पोस्ट आ जाये, थोड़ा मुकेश कुमार सिन्हा भाई और उनकी कविता पर। मुकेश भाई मित्र हैं, बड़े भाई की तरह है। जहाँ-तहाँ हम लोग टकराते रहते हैं। दिल्ली की सभा-गोष्ठियों से लेकर फेसबुक तक। फेसबुक पर एक-दो बार बहुत तीखी नोक-झोंक भी हुई है। उसके बावजूद हम मित्र हैं। मुकेश भाई निहायत ही सज्जन आदमी हैं। अक्सर लड़ाई-बहस आदि से दूर रहने वाले। प्रधामंत्री कार्यालय में पोस्टेड हैं और कई प्रधानमंत्रियों के साथ फोटो खिंचवा चुके हैं। 😊 आपकी पत्नी अंजू सिन्हा जी बहुत ही भली महिला हैं। आप संपादक हैं और अपने संपादन में दो (या संभवतः चार) कविता संग्रह निकाल चुके हैं। एक का नाम है ''गूँज'' और दूसरे का संभवतः ''गुलमोहर।'' कुछ कविता केंद्रित कार्यक्रम भी आपने आयोजित किये, करवायें हैं और मेरे द्वारा आयोजित कुछ कार्यक्रमों में आपने कवि और श्रोता दोनों के रूप में भाग लिया है। 


अब आपकी कविता पर। यह तुलना थोड़ी अजीब होगी और शायद मैं तुलना कर भी नहीं रहा पर इस समय मुझे चेखव की वह प्रसिद्ध कहानी याद आ रही है जिसका मुख्य किरदार एक टाँगे वाला है। वह कहानी इसलिये महत्वपूर्ण है कि उसमें कुछ भी असाधारण नहीं है। वह साधारणता की असाधारण कहानी है। मुकेश भाई की कविताओं के बारे में यह तो नहीं कहूँगा कि वे साधारणता की असाधारण कविताएँ हैं पर इतना ज़रूर कहूँगा कि वे साधारणता की अच्छी और आवश्यक कविताएँ लिखते हैं। यहाँ प्रस्तुत की गयी उनकी कविताएँ और उनकी जो कविताएँ पहले पढ़-सुन चुका हूँ, उसके आधार पर यह बात कह रहा हूँ। जिस तरह उनकी कविताओं के विषय साधारण हैं उसी प्रकार कविता को लिख ही देने के उनके प्रयास भी साधारण हैं और इसी साधारणता में एक जादू है जो खींचता है, एक चुम्बक है जो चिपका लेता है, एक आकर्षण है जो आकर्षित करता है। उनकी कवितओं में कविता लिख देने का कहीं संघर्ष नहीं है, बिम्ब-प्रतीकों के प्रयोग को लेकर कहीं सायासता नहीं है, बस जो कुछ भी है, सहज-सरल रूप में रच दिया गया है। यह सहजता और साधारणता का जादू बना रहे, यही दुआ है।

 Hargovind maithili मुकेश कुमार जी की सुन्दर कवितायें ।पाइथोगोरस प्रमेय कविता अच्छी लगी ।बधाई मुकेश कुमार जी व प्रवेश जी का आभार ।

 Alaknanda sane Taai पहली कविता छोडकर सभी पसंद आईं । सुट्टे का अंतिम कश बेहतरीन है । पायथागोरस भी अच्छी है । ताजी हवा का झोंका ।

 Mani mohan mehata ji मुकेश भाई की कविताओं में एक ताजगी दिखी ।शेष वक्तव्य भाई मोहन नागर जी का जस का तस , कवि को बधाई ।

 Sudhir desh paande प्रवेश का आजमुकेश कुमार सिन्हा की कविताओं को प्रस्तुत करने का अंदाज ईर्ष्या भर गया।

रश्क करने लायक मनोज की कविताएं भी हैं। विषय विषयवस्तु अंदाजे बयां अलहदा है। प्रस्तोता और कवि दोनों को बधाई।

Wednesday, July 27, 2016

एक ज्वलंत समस्या ,युवा पीढ़ी के भटकाव  को सहजता से  शब्दबद्ध करती एक भाव प्रधान कहानी "गुरु दक्षिणा "|समाज में व्याप्त ऐसी समस्याएं मुँह बायें खड़ी है ।सीधे सरल विद्धार्थी  कैसे नक्सली ,आतंकी लुटेरे बन जाते है ,जड़ में मज़बूरी के सिवा और क्या वजह रहती होगी ।
 राजेन्द्र श्रीवास्तव जी की यह कहानी आज व्हाट्सअप के साहित्यिक समूह "साहित्य की बात " पर प्रस्तुत की गई |इस समूह के मुख्य एडमिन है  ब्रज श्रीवास्तव ... पाठकों की त्वरित प्रतिक्रिया के साथ कहानी प्रस्तुत है |


परिचय 

राजेन्द्र श्रीवास्तव.

जन्म :4 जून 1954 
शिक्षा :एम. एस. सी(प्राणी विज्ञान) 
पिता :स्व. श्री जगन्नाथ प्रसाद. 
जीवन संगिनी :श्रीमती शारदा श्रीवास्तव. 
रूचि :साहित्य पढ़ना, लिखना. 
शासकीय सेवा :1980 में बस्तर के लोहंडीगुडा में उच्च श्रेणी शिक्षक पर पहली नियुक्ति फिर पदोन्नति पाकर अंता गढ़, सुन्दरेल.,धामनोद के बाद आयुधनगर इटारसी से प्राचार्य हाईस्कूल से जून 2016 में सेवानिवृत्त. 


गीतिकविता और बाल कविता में विशेष काम. एक संग्रह" मछली रानी " प्रकाशित. 
एक लघुकाव्य" लाक्षागृह"शीघ्र प्रकाश्य. 


निवास...साँई कृपा, आर. एम. पी. नगर. फेस.. 1,विदिशा. म.प्र.
मोबाइल नंबर.. 9753748806
......




🔯गुरु दक्षिणा🔯




  ⛔जिनको चाय-पानी ,पान बिङी  गुटका तम्बाकू लेना करना हो जल्दी करलें
यहाँ बस दस मिनट रुकेगी"।कंडक्टर ने बस रुकते ही यात्रियों से मुखातिब हो कर कहा,और चाय पीने चल दिया।बस से
कुछ लोग उतरे कुछ थके-माँदे बैठे रहे ।
दस मिनट बाद बस ने नेशनल हाइवे छोड़ नारायणपुर की ओर रुख कर लिया ।नाममात्र की पक्की सङक पर बस हिचकोले खाती हुई आगे बढ़ रही थी ।इन मार्गों पर रात के नौ बजे भी आने-जाने से लोग कतराते हैं।
हेड लाइट के प्रकाश में ऊँचे साल-सागौन के बीच सर्पिल सङक पर अधिक दूर का कुछ दिखाई नहीं देता।
 अचानक ड्रायवर ने ब्रेक लगाये और बस हल्की घिसटती हुई रुक गई। सङक पर बङे-बङे पत्थर रख कर मार्ग अवरुद्ध किया गया था ।यात्रियों में सहज ही भय व्याप्त हो गया ,कोई तो इस बस में है,जो अब आगे की यात्रा नहीं कर सकेगा कदाचित जीवनयात्रा पर भी विराम लग जाय ।कुसुम ने सुधीर की ओर देखा तो सुधीर ने संकेत से ही उसे आश्वस्त किया।
एक शिक्षक से भला इन्हें क्या लेना-देना ?
सभी जान चुके थे जंगल से निकल कर अब बस को अपने कब्जे में कर चुके ये कौन लोग हैं ।ड्रायवर समझ चुका था कि आज हम बचें न बचें बस की होली तो जलना तय है ।  एक-एक कर यात्रियों को उतारना शुरु किया।किसी किसी की गेट पर तलाशी ली जा रही थी।ना-नुकर या
विरोध का प्रश्न ही नहीं ,दुश्परिणाम मात्र एक--'जीवन से हाथ धोना ।'बीच बीच में कुछ प्रश्न और डाँट -डपट ।सुधीर भी कुसुम का हाथ थामे अब गेट पर पहुँच चुका था अगला क्रम  उसका था ।
तलाशी ले रहे व्यक्ति ने सुधीर को गौर से देखा, क्षणैक ठिठका फिर यथावत्  तलाशी लेने लगा।सुधीर ने अनुभव किया कि  तलाशी  लेने वाले हाथ का स्पर्श कुछ ऐसा जैसे अपनत्व को छिपाने का प्रयास हो ।यह क्या ! तलाशी के अभिनय में चरणों का स्पर्श ! फिर कुसुम के साथ भी  कुछ ऐसा ही !!
"चqलो".... ।तलाशी ले रहे व्यक्ति ने अपने साथियो से कहा।
बस के भीतर शेष रहे यात्रियों में सुखद आश्चर्य तो बाहर खङे यात्री आशंका से भरे अगले आदेश की प्रतीक्षा में खङे थे। साथियों को उस व्यक्ति की बात पर कुछ आश्चर्य तो हुआ ।उन्हें यह व्यवहार  अप्रत्याशित लगा पर चुप रहे,और सब के सब एक दूसरे को कवर करते हुये  जंगल  में तिरोहित हो गये ।यात्रियों ने पत्थर हटाकर बस में अपनी जगह ली ।सुधीर ने अपने  ईश्वर व  बङे-बुजुर्गों का स्मरण कर मन ही मन प्रणाम किया ।
"आज तो अपना पुनर्जन्म समझो भाई"
एक ने कहा ।
हाँ ।किसी को एक खरोंच तक नहीं "
दूसरे ने कहा ।
"तलाशी भी  बीच में रोक कर चले गये,कुछ समझ में नहीं आ रहा"
"अरे भैया प्राण बच गये बस इतना समझ लो ।"
"आप सब इस घटना का जिक्र किसी से न करें, नहीं  तो वेवजह लेने के देने पङ जायेंगे ।आप भी  परेशान होंगे और हम भी  बस खङी करके थाना-कचहरी  में फँस जायेंगे।" कंडक्टर ने समझाईश भरा आग्रह किया ।
"हम जिंदा घर पहुंच रहे हैं ,बाकी सब बातें भूलना चाहते हैं ।" किसी एक का कहा यह वाक्य आम राय में परिवर्तित हो गया । शीघ्र अपने घर पहुँचने की व्यग्रता बातों में झलक रही थी ।
"सुनो!..आपने उसका चेहरा देखा ?" कुसुम ने धीमी आवाज में सुधीर से पूछा।
"कुछ पहचाना सा तो लगा" ।
उसने मेरे  पैर छुये,फिर तलाशी खतम,और चले भी  गये ...।ऐसा क्यों...?"
"चलो पूँछ कर आते हैं"।
"आपको ऐसे में भी  विनोद सूझ रहा है ।"
"कुसुम इन सब प्रश्नों के उत्तर मेरे पास भी नहीं हैं"  ।
बस, स्टाप पर सुधीर-कुसुम व कुछ अन्य यात्रियों को उतार कर आगे बढ़ गई ।
इस घटना के कुछ दिनों बाद एक रात लगभग दस बजे सुधीर कोई किताब पढ़ रहे थे कि किसी ने हलके से दरवाज़ा खटखटाया।
कुसुम ने आशंकित नेत्र सुधीर पर टिका दिये ।यहाँ रात के दस ,अर्धरात्रि के बाद का समय जैसा निश्तब्ध व भयावह हो जाता है ।आठ बजे के बाद घर के बाहर प्रकाश पर अघोषित प्रतिबंध रहता है । सीमित साधन व सीमितआवश्यकताएँ ।
दरवाज़ा खुलते ही एक व्यक्ति सुधीर को लगभग ठेलते हुये भीतर आ गया , उसने
किवाड़ बंद कर लिये ।
"माँ पहिचाना मुझे ?"
दोनों के पैर छूकर एक कुर्सी पर बैठते हुये उसने कुसुम से पूँछा ।
यह वही  तलाशी लेने वाला युवक है,
दोनों के मन में निश्चितता थी,किन्तु निश्चिंतता न के बराबर ।
"तुम मंगलू हो न...?"कुसुम ने आशंकित स्वर में कहा।
"मैं जानता था ,सर भले ही भूल गये हों माँ  नहीं भूलेंगी ।"
"अब याद आया .. कई बर्ष बाद मिल रहे हो , वह भी ..........."  सुधीर ने बैठते हुये वाक्य अधूरा छोड़ दिया ।
कुसुम ने पानी का गिलास बङाते हुये पूँछ ही लिया -"इस रास्ते पर कैसे आ गये ।"
"आ गये या पहुँचा दिये गये  पता नहीं" मंगलू ने गहरी सांस भरते हुये कहा ।
"यहाँ किसलिए ?..किसी को पता चल गया तो नौकरी तो जायगी ही जेल भी  होगी "।सुधीर ने चिंतित हो कर कहा।
"मैं बस निकलता ही हूँ, आपको  कुछ नहीं  होने दूँगा ।"
मैं  आपसे जानना चाहता हूँ, क्या मेरा यह रास्ता सही नहीं है ?"
सुधीर चुप रहा।
"अपने विद्यार्थी के प्रश्न का उत्तर दीजिये"
कुसुम ने आग्रह के स्वर में कहा ।
"बेटे!वहाँ से स्थानांतरित हुये लगभग बारह साल हो गये हैं ।तुमने आगे पढ़ाई जारी रखी या नहीं ! , प्रताड़ना ,याअसीम उपेक्षा !!
अन्याय या शोषण और शोषक वअन्यायी के प्रति बदले की भावना अथवा विरासत में मिले अभाव... . .!!!  इस रास्ते पर आने की इनमें से कौन सी वजह है ,मुझे यह भी  नहीं पता ।हो सकता है किशोर -सुलभ उत्साह व जोश में यह कदम उठाया हो । बिना जाने क्या  कह दूँ ।"

 मंगलू क्या कहे!कुछ लोगों को ड्रेस-विशेष में एक अलग अंदाज़ में देखा तो उत्साही किशोर मन खिंचता चला गया ।
जिज्ञासा के साथ-साथ कदम भी बढ़ते गये ।और अब.....गहन जंगल में स्वयं को खङा हुआ पाता है।झंझावात से जूझता हुआ।                                     "सर ,...कदम तो बढ़ा चुका हूँ ।दुविधा तो यह है कि रास्ता सही है या गलत?"
"मैने  केवल पाठ्यक्रमआधारित किताबें पढ़ी है, व निर्मल बच्चों के बीच रहा हूँ
जैसे बारह साल पहिले तुम थे।बस इतना जानता हूँ कि इस रास्ते पर चलने वालों को समाज केवल भयभीत दृष्टि से देखता है ।वहाँ न प्रेम है न सहानुभूति न ही स्वैच्छिक समर्थन ।"
"तो क्या हमारा समाज असामाजिक है ?"
"तुम्हारा समूह है ,समाज का बहुत छोटा रूप - जो इस समाज से अलग दिशा में
 चल रहा है अपनी विचारधारा के साथ।"
अब तक कुसुम बिस्किट के साथ चाय ले कर आ गई थी। उसे वह मंगलू याद आ गया  जो इसी तरह अपनी  जिज्ञासाओं का पिटारा खोल कर काॅपी-किताब ले कर सुधीर के सामने बैठ जाता था।             परआज के प्रश्न जटिल , गंभीर व अलग                 तरह के हैं ,पाठ्यक्रम से अलग हट कर।जीवन-क्रम से जुडे हुये ।
"तो हमारा वाद जन-हितैषी नहीं है?"
"मैने पहिले ही कहा तुम्हारे वाद या सिद्धांत पढ़ने -समझने का अनुकूल अवसर ही नहीं  मिला ।और कितना हित किया है तुमने जन का ?.... इसका आकलन तुम्हें स्वयं करना चाहिये ।"
"तो क्या मुझे  लौट आना चाहिये ।"
"यह इस पर निर्भर है कि अब तक कितना  रास्ता तय कर चुके हो व लौटने अथवा  लक्ष्य पाने की संभावना कितनी शेष है।
या उस लक्ष्य को प्राप्त करने का कोई दूसरा सुनिश्चित जनप्रिय मार्ग है?"        
"समाज स्वीकार कर सकेगा?इतना आसान जीवन तो नहीं होगा।"
"बिल्कुल सही सोचा ,सहजता से समाज समाहित नहीं करने वाला!वहाँ की शत्रुता यहाँ का संदेह झेलना होगा । जीवन तो अभी भी आसान नहीं ।संघर्ष तो अभी  भी कर रहे हो। मृत्यु का भय वहाँ भी है,यहाँ भी रहेगा।अंधेरा कहाँ है ? वहाँ या यहाँ...,यह तुम स्वयं सोचो ।प्रकाश कहाँ पाओगे स्वयं पता लगाओ।
"हुम्म्........" मंगलू आँख बंद कर चुप रह गया।   कुसुम को चुप्पी खलने लगी तो उसने मंगलू से पूँछा--
"घर पर सब कैसे है?माई कैसी हैं?"
"माँ  ठीक है। कल थोड़ी देर के लिये गया था।उन्हें बस वाली घटना बताई तो उसने मुझे सर से मिल कर चर्चा करने का आग्रह किया "। " अरे हाँ ! माँ ने आपके लिये नींबू भेजे हैं अचार के लिये ।वे आप के हाथ का अचार का स्वाद अभी  तक नहीं भूली।"मंगलू बिल्कुल बच्चा बनकर बोल रहा था बारह साल छोटा ।सब तनावों से मुक्त  सब चिंताओं से दूर।अपने साथ लाये थैले को उसने कुसुम की ओर बढ़ा दिया।
"आज भी माई ने खाली हाथ नहीं आने दिया"कुसुम ने आत्मीयता से कहा ।
"मेरी गुरु दक्षिणा  लाया है "सुधीर ने भी  विनोद किया ।
वातावरण की गंभीरता उङनछू हो गई।
"नहीं सर !गुरुदक्षिणा तो आज भी  नहीं दे सकूँगा ।पर जल्दी ही इस ऋण से मुक्त
 हो जाऊँगा ।मेरी गुरुदक्षिणा से आपको भी प्रसन्नता ही होगी ।"
"अब आज्ञा दीजिये ।"
"बेटे! तुम्हारी दुविधा  दूर नहीं कर सका ।आज यह शिक्षक स्वयं पर शर्मिंदा है।
निर्णय तुम्हें स्वयं करना है वह भी  समय रहते। तुम्हारी जरूरत उन्हें भी है ,और समाज भी आशा भरी निगाह से तुम्हें निहार रहा है ।हम भी ।"
"सार्थक सर्वसम्मत जनहित वहाँ रह कर कर अधिक सुगमता से कर सकोगे या यहाँ आ कर।पूर्वाग्रह त्याग कर विचार करोगे ,तो यह तय करने में तुम्हें कोई कठिनाई नहीं होगी। मेरे या किसी अन्य के विवेक या विचार पर निर्भर मत बनो "।
"जी!..चलता हूँ ।... मेरी दुविधा  अब मेरे साथ नहीं है ।"
 दोनो के चरण स्पर्श कर वह पलक झपकते ही अंधेरे में विलीन हो गया ।
कुसुम अभी भी अधखुले दरवाजे के पास खङी थी।
"क्यों जी !वह वापिस आयेगा ?"
"शायद...।"

"लेकिन वह गया ही क्यों! उसने अपनी  माँ के बारे में क्यों नहीं सोचा!कहाँ गया होगा?"
"चलो देख कर आते हैं"
"आपका हर वक्त का मजाक शोभा नहीं देता।"कुसुम का स्वर रुआसा हो रहा था।     मंगलू के प्रति कुसुम की ममता से परिचित सुधीर ने दरवाज़ा बंद कर कुसुम को कुर्सी पर बैठाकर पानी का गिलास देते हुये कहा ।
"तुम्हारे सामने ही वह गुरु दक्षिणा के ऋण से जल्द मुक्त होने का वचन देकर गया है ।"
"चलो रात काफी हो गई है।"
"अरे हाँ ...तुम्हें कल नींबू का अचार भी तो बनाना है।"
.......
"वह कब आयेगा अचार लेने?" कुसुम ने सहज ही पूँछा ।
"ऐसा करो तुम अचार डालो ,तब तक मैं पूँछ कर आता हूँ ।"
सुधीर के स्वाभाविक विनोद पर स्मित हास्य अब कुसुम के चेहरे पर झलक रहा था।मन के अंधेरे में,आँखों में आशा के जुगनू चमक रहे थे।

कुछ दिनों बाद सुधीर ने समाचारपत्र से एक समाचार कुसुम को दिखाया।
कुसुम ने पढ़ा कि --मंगलू ने स्व विवेक से साथियों सहित मुख्यधारा में जुङने का निर्णय लिया है ।साथ ही समाज के सहयोग से अपने उन्ही उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु सतत प्रयास करते रहने का संकल्प भी  व्यक्त किया है।
कुसुम की आशा भरी निगाहें द्वार की ओर चली गई ।


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प्रतिक्रियाये 
अजय श्रीवास्तव 
कोई तो इस बस में है, जो अब आगे की यात्रा नही कर सकेगा , कदाचित जीवन यात्रा पर भी विराम लग जाये ...।बहुत सहज तरीके से , प्रभावशाली अभिव्यक्ति...
हार्दिक शुभकामनायें 
कहानीकार श्री राजेंद्र श्रीवास्तव जी को ...💐

मधु सक्सेना 
राजेन्द्र जी कहानी की शुरुआत बहुत अच्छी है पर आगे जाकर कहानी में लेखक का असमन्जस दिखाई देता है ।वे खुद ही किसी निर्णय पर नहीं पहुंच पाते ।कहानी कमज़ोर होने लगती है ।समस्या को भी सही तरीके से नहीं उठा पाये लेखक ... । इस कहानी को फिर से लिखा जाना चाहिए ।संवाद अच्छे हैं ।शुभकामनाएं लेखन को ।आभार प्रवेश ।

घनश्याम दास सोनी 
ग्लैमराइज्ड किये जाने वाले  अपराध तथा अपराधियों का बचपन के अबोध मन पर चाहे अनचाहे प्रभाव पड़ता ही है , कुछ उससे प्रभावित होकर उस तरफ कदम बढ़ा देते हैं , जिसका समाज पर पड़ने वाला प्रभाव व ऐसे लोगों का नतीजा  सर्वविदित है । कहानी का नायक लगता है सही समय पर अपने शिक्षक से मार्गदर्शन पा गया और परिणाम सुखद रहा । कहानी बहुत शानदार लगी , चाचाजी श्री राजेंद्र श्रीवास्तव जी को बधाई
A. असफल 
राजेन्द्र जी की कहानी "गुरु दक्षिणा" काफी अच्छी है। बल्कि महत्वपूर्ण भी। क्योंकि नक्सलवाद हो, उग्रवाद या आतंकवाद मनुष्य समाज के अप्रिय किन्तु आवश्यक प्रसंग हैं। राज्य-समाज में जब व्यवस्थागत तरीके से प्रत्येक इकाई को उसका हक नहीं मिलता, कहीं कोई व्युतिक्रम होता है, तब विद्रोह अवश्यम्भावी हो जाता है। एक ऐसा गतिरोध जिसका हल आसान नहीं। कहानी में समस्या पर अच्छा विमर्श है। बड़ी स्वाभाविकता से पूरी कहानी बुनी गयी है। चलती भी अत्यंत सरल तरीके से है। पर समस्या का समाधान इतना सरल भी नहीं। जैसा कि कहानी में दिखा दिया गया। मेरे ख्याल से इसे यहीं ख़त्म क्या जाता, "सुधीर के स्वाभाविक विनोद पर स्मित हास्य अब कुसुम के चेहरे पर झलक रहा था। मन के अंधेरे में,आँखों में आशा के जुगनू चमक रहे थे।" तो कहानी भी रेडीमेड नहीं लगती और एक सुखद आशा भी जगाए रखती कि गुरु दक्षिणा के रूप में शायद कभी न कभी समस्या का निदान हो जाए।

लक्ष्मीकांत कालूस्कर 
कहानी एकदम से अच्छी है।एक विचार,एक समस्या को लेकर चली है और जो निदान बताया है वही एकमात्र सार्थक हल है।समाज और व्यवस्था के माध्यम से हो रहे अत्याचार के प्रति विरोध-विद्रोह भी जरूरी है और इस विद्रोह से जन्म लेने वाली समस्या की ओर भी समाधानकारक उपाय ढूंढना है।राजेन्द्र जी अभिनंदन।

 Mahjabin
राजेन्द्र जी की कहानी...... 'गुरुदक्षिणा' बहुत अच्छी कहानी है.. एक गंभीर समस्या प्रधान कहानी है... पढ़े-लिखे नौजवान कैसे नक्सलियों के चक्रव्यूह में फंस जाते हैं.... और उनकी जिंदगी ख़राब हो जाती है... जब्कि नौजवान लड़के देश का भविष्य हैं.... जब देश में, ग़रीबी भूखमरी, बेरोजगारी फैली हुई है तो, ऐसे में ग़लत संगठन के लोग, परेशानी से जूझ रहे, नौजवानों को अपने ज़ाल में फंसा लेते हैं... लेकिन एक अच्छा शिक्षक, हमेशा अपनी शिक्षा से अपने शिष्यों का उचित मार्गदर्शन करता है..... उन्हें दलदल में जाने से रोकता है... शिक्षक ही देश और राष्ट्रनिर्माण में नौजवानों को शिक्षा देकर, सहयोग करता है.... कहानी की मूल संवेदना भी यही है.. शिष्य और गुरू का रिश्ता बहुत गहरा होता है.... संवेदनशील होता है... कुर्आन की एक आयत में, उस्ताद का दर्ज़ा, माँ-बाप के बराबर बताया है..... और है भी यह रिश्ता बहुत अज़ीम... कहानी की भाषा भी बहुत भावपूर्ण है... अच्छी कहानी के लिए लेखक को बधाई....

Rajendr Shivastav Ji: महजबी जी बहुत धन्यवाद , आपका कहना सही है।इन भटके नौजवानों को कुसुम जैसे पात्र की भी चाह है ।जो यकीन दिला सकें कि हम तुम्हें अब भी पहले जैसा ही चाहते है
 Meena Sharma 
 राजेन्द्र जी की कहानी,अपने आस- पास के वातावरण को बारीकी से उकेरती हुई अपनी बात, बिना किसी व्यवधान के कहती चलती है.
एक भटके हुए युवक में  संस्कार
हैं कि वह चरण स्पर्श करता है ...
संवेदना है कि वह नींबू के अचार के बहाने गुरु के साथ वार्तालाप को सहज बनाये रखता है.
कैसे सहज ही कोई बदल सकता
है अपनी मानसिकता.  ? संस्कार वश वह मुख्य धारा में वापस आता है.
कहानी किसी एक मापक में नहीं
लिखी जाती.
हर लेखक की सोच भिन्न है....पाठक की सोच अलग है...! 
मार्गदर्शन है इसमें..   ..! 
समाज को दिशा देती कहानी..
अच्छी है...मेरे लिये.
प्रोत्साहन सदैव हमें और बेहत करने की प्रेरणा देता है....शुभकामनाएँ राजेन्द्र जी को !प्रवेश जी धन्यवाद एक नई कहानी देने के लिए....!
संचालन की खूबी कुछ अलग बनाती है आपको प्रवेश जी....!
बधाइयाँ !

 Aalknanda Sane Tai: अमूमन इस माध्यम पर कहानी जैसी लंबी रचनाओं को पढ़ना मेरे बूते का नहीं होता.अक्सर शुरुआत और अंत पढ़कर संतुष्ट हो लेती हूँ, लेकिन आज यह कहानी मुद्रित माध्यम की तरह एक सांस में पढ़ गई.एक ज्वलंत विषय पर सधे हुए तरीके से, बिना लाऊड हुए यह कहानी लिखी गई है, जिसके लिए कहानीकार बधाई के पात्र हैं.संवाद लंबे और उबाऊ होने से बच गए हैं, जिसकी इस कहानी में पूरी सम्भावना थी.शिक्षक को भी अकारण  गंभीर नहीं दिखाया जाना जीवंतता का प्रतीक है.धन्यवाद प्रवेश, एक बेहतरीन विषय पर बेहतरीन कहानी के लिए.

 Mukta Shreewastav: आज की कहानी गुरु दक्षिणा बहुत ही अच्छी कहानी है वास्तव मैं आज की युवा पीढ़ी भटक रही है और उसे सही मार्गदर्शन की आवश्यकता है।

के के श्रीवास्तव 
आज की युवा पीढ़ी की भटकाव पर आधारित बेहद प्रासंगिक कहानी ।  दिल को छू गई ।  धन्यवाद प्रवेश जी।
 अमूनन मैं कहानी को ज्यादा पढ़ नहीं पाता जो मेरी कमजोरी है या जो भी ।राजेन्द्र जी की इस कहानी को बिना रुके पढ़ गया जिसमें संवेदना है संस्कार हैं जीवंतता है । कहानीकार का सहजभाव से कहने का प्रस्तुतिकरण अद्भुत है .गुरु और शिष्य के सम्बंधों को गहरा करती यह कहानी युवा पीढ़ी की ज्वलन्त समस्या को अच्छे ढंग से प्रगट करने में पूर्ण सफल है .लेखक को बधाई । धन्यवाद प्रवेश जी
..

ब्रज श्रीवास्तव 
कहानी, बहुत मार्मिक है. मैं तो चकित हूँ कि चाचाजी कितना अच्छा लिख लेते हैं. उनकी भाषा, वाक्यों का गठन, कथ्य निर्वाह और कहन विवेक कितने संतुलन में अपना उत्स यहां दे सके हैं. असफल जी ने अंत के बारे में जो कहा तो मैं कहना चाहूंगा लगभग इतना ही सहज अंत कहानी में था, लेकिन मैंने सुझाव देकर कहा कि थोड़ा बदल दीजिए. तो अब पशेमान हूँ कि चाचाजी ने पहले ठीक ही किया था. साकीबा में यह.. प्रस्तुत हो सकी मुझे अच्छा लगा. आज ताई, कालुस्कर जी, भावना जी, मधु जी, मीना और मेहज़बीं ने टिप्पणी दी तो मुझे अच्छा लग रहा है. प्रवेश की पहल तो हर दम बेहतर होती ही है... 🌂ब्रज श्रीवास्तव

सुदिन श्रीवास्तव 
 कोई व्यक्ति क्रोध,अपमान या बदले की भावना के आवेग वश अपराध कर बैठता है लेकिन अपराधी को समाज मुख्य धारा में आसानी से स्वीकार नहीं  कर पाता यह बात शिक्षक भी जानता है और मंगलू के मन में भी इसी बात को लेकर संशय है । अपराध की इसी पृष्ठभूमि से उपजी कहानी गुरूदक्षिणा
में कहानीकार राजेन्द्र श्रीवास्तव जी ने   भावावेशी परिस्थितियों में अपराधी बने मंगलू के प्रति ऐक शिक्षक के सुधारवादी और आशावादी दृष्टिकोण को स्पष्ट रखा है । शिक्षक सदैव समाज की मुख्यधारा के प्रति आस्थावान रहता है । अपनी कहानी के द्वारा उन्होंने शिक्षक की सामाजिक सकारात्मक भूमिका का निर्वाह गरूदक्षिणा कहानी में बहुत भावपूर्ण प्रवाह के साथ किया । राजेन्द्र जी को बहुत बहुत बधाई । अच्छे गीतकार का कसा हुआ गद्य रूप प्रस्तुत करने के लिये उतनी ही बहुआयामी प्रतिभाओं वाली प्रवेश जी का विशेष आभार


हरगोविंद मैथिल ..
 गुरु दक्षिणा एक अच्छी और भाव प्रधान कहानी है ।जिसकी सरल भाषा और सहज संवाद कहानी को प्रवाह के साथ आगे बढ़ाते है ।कहानी पाठक को  अंत तक बाँध कर रखती है ।लेकिन कहानी के शीर्षक से सहज ही अंदाज लगाया जा सकता है कि यह एक सुखान्त कहानी है ।कहानी के नायक पर अपने शिक्षक की शिक्षा और उनकी पत्नी कुसुम के स्नेह का गहरा प्रभाव पड़ा जिसके कारण वह मुख्य धारा में लौटने का साहस पूर्ण कार्य कर सका ।कहानी में सबसे ज्यादा प्रभावित करने वाली बात है अंत में शिक्षक द्वारा मंगलू को कोई उपदेशात्मक ज्ञान न देकर स्व विवेक से निर्णय लेने की छूट प्रदान करना ।आ. राजेन्द्र प्रसाद जी को बधाई और प्रवेश जी का आभार ।साथ ही आ . श्री वास्तव जी का इस नए रूप में हार्दिक स्वागत ।🙏🙏


Ravindra Swapnil: 
इस कहानी को पढ़ने के बाद ये तो लगा की कहनी अच्छी है।
क्या बताऊँ कहानी अच्छी होना ही पर्याप्त होता तो सब कहानियां अच्छी हो जाती। तारिफ  बहुत लोग कर चुके। मेरा ये कहना व्यर्थ के शब्द् होंगे कि कहानी बहुत शानदार है।
कहानी में शिक्षक की भूमिका बेहद लिजलिजी है। कहा जाता है कि भारतीय शिक्षक ने 1 हजार साल के इतिहास में जब से क्रांति की बात बंद की है तब से ये देश गुलाम हुआ। यहाँ शिक्षक की भूमिका पर सवाल खड़े किये जा सकते हैं।

एक इसमें भाषा का बहुत लोच है।इसमें कृत्रिम सा माहौल बन जाता है।
Padma sharma
 राजेन्द्र श्रीवास्तव जी की कहानी गुरुदक्षिणा सहज सरल शैली में अपने उद्देश्य की पूर्ति में सफल हुई है।
आज आतंकवाद जैसी अनेकानेक समस्याएँ चल रही हैं उनमे कुछ लोग बाहरी चमक दमक से प्रेरित होकर सम्मिलित हो जाते हैं और अपने भविष्य को बर्बाद कर लेते हैं। कहानी के अंत के लिए
असफल जी से सहमत हूँ।

बधाई लेखक को

Uday dholi 
आदरणीय राजेन्द्र श्रीवास्तव जी की कहानी अच्छी लगी भटके हुए युवक का मुख्यधारा में लौटना ही सकारात्मक हल है ,हमारी सनातन परंपरा में गुरु के लिए जो आदर का भाव है वह आज भी कायम है एक शिक्षक के नाते लेखक का यह निजी अनुभव रहा होगा।
कहानी में रोचकता शुरुआत से आखिर तक बनी हुई है कहीं भी झोल नहीं है।

Saturday, July 23, 2016

                                        नींव खुदाई बाप ने ,माँ ने फेंकी गार |
                          अब बेटों ने डाल दी आँगन में दीवार ||

रचना प्रवेश -  दोहे रामनारायण 'हलधर '


दोहों की बात से शुरू आज दोहों के संकलन 'शिखरों के हकदार '  पर ही बात करते है |समकालीन दोहाकार  श्री रामनारायण मीणा "हलधर "जी का प्रथम दोहा संकलन 'शिखरों के हकदार "बोधि प्रकाशन ,जयपुर से २०१२ में प्रकाशित हुआ | संकलन के दोहे पाठक के मन में गहरी पैठ बनाने में पूर्ण सक्षम है |सरल स्वभाव हलधर जी अपने भावुक मन की स्याही से दोहों को कलमबद्ध करते है तो लगता है जैसे गागर में सागर समा दिया |संकलन के सम्बन्ध में क्या कहते है लेखक ,पाठक ,समीक्षक ,मित्र और पत्रकार ...
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परिचय 


          नाम                     रामनारायण ‘हलधर’ 
            तुरन्त सम्पर्क              (0) 94133-51749, 0744-2327327
            जन्म                    1 अपै्रल 1970
           
            शिक्षा                    स्नातकोत्तर (हिन्दी साहित्य)
            सम्प्रति                 आकाशवाणी कोटा में वरिष्ठ उदघोषक

            निवास व पता             डी-27, रोड़ नम्बर-1, कृष्णा नगर
                                             पुलिस लाइन, कोटा - 324001
                                
 पुरस्कार-सम्मान-   
1.    डॉ0 अमबेडकर फैलोशिप ( भारतीय दलित साहित्य अकादमी नई दिल्ली
2.    साहित्य श्री सम्मान 2009 (श्री भारतेन्दु समिति कोटा)
3.    डॉ0 रतनलाल शर्मा स्मृति पुरस्कार, कोटा
4.सृजन साहित्य सम्मान .२०१३
लेखन विधाऐं-          दोहा, गजल, गीत (हिन्दी-राज.) मुक्तक,चौपाई,
                        मुक्त छंद, हास्य व्यंग्य लेख एंव रेडियो
                        साक्षात्कार।

प्रकाशन-  चर्चित दोहा संग्रह.शिखरों के हक़दारए प्रकाशित
 समकालीन भारतीय साहित्य एदैनिक जागरण (पुर्ननवा - सप्तरंग), सण्डे नई दुनिया (दिल्ली), सरिता, पां´्चजन्य दैनिक नई दुनिया (इंदौर), दैनिक भास्कर (मधुरिमा, रसरंग), राजस्थान पत्रिका (परिवार), डेली न्यूज (पत्रिका प्रकाशन जयपुर), मधुमति (राज. सा. अका.उदयपुर), हिमप्रस्थ (हिमाचल साहित्य अका.), व्यंग्य यात्रा,  सुमन-सौरम,  पंजाब सौरभ आदि पत्र पत्रिकाओं में रचनाओं का निरंतर प्रकाशन।


प्रमुख रेडियो साक्षात्कार- डॉ0 ज्ञान चतुर्वेदी, श्री प्रेम जनमेजय,  विष्णु नागर, डॉ0 बालेन्दु शेखर तिवारी (सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार) डॉ0 लीलाधर जगूड़ी,    निदा फाजली, सईद कादरी, (सुप्रसिद्ध फिल्मी गीतकार) वेदव्रत वाजपेयी, बशीर बद्र, बशीर अहमद मयूख, डॉ. दया कृष्ण विजय।

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दोहे हिंदी और हिंदी परिवार की अन्य निकटवर्ती भाषाओँ में काव्याभिव्यक्ति के बहुत लोकप्रिय  और सशक्त माध्यम रहे है |राजस्थानी भाषा में तो छंद ने अपनी लोकप्रियता के कारण लम्बे समय तक "छंदराज " होने का सम्मान पाया है |विद्द्वानो का मत है कि अपने लघु आकार ,सहज प्रवाह ,और त्वरित गति से -किन्तु सधे हुए शब्दों में सार्थक बात कह देने के कारण दोहा उत्तर अपभ्रंश काल से ही लोक के मन में ऐसा पैठा कि आज भी कई कहावतों को "दोहा रूप 'में ही कहा जाता है |इस बात को हम यों भी  कह सकते है कि कुछ दोहों की अभिव्यक्ति इतनी सार्थक और सधी हुई रही की लोक उन दोहों को पूर्णत:या अंश रूप  में कहावतों  में इस्तेमाल करने लगा |

हमारे समय के दोहाकारों में रामनारायण 'हलधर 'की धार धार अभिव्यक्ति बहुधा चमत्कृत करती है -


                                        नींव खुदाई बाप ने ,माँ ने फेंकी गार |
                                        अब बेटों ने डाल दी आँगन में दीवार ||



                                       प्रतिबंधो ने तान दी सीने पर बन्दुक  |

                                       अरमानों ने खोल ली ,सुधियों की संदूक ||        



                                       मिलने की जब आपसे ,टूट गई हर आस |

                                       मुस्कानों ने ले लिया ,चहरे से संन्यास ||


जैसे दोहे उनके भावुक मन की बेकली को तो अभिव्यक्त करते ही है ,उनके सृजन ,चिंतन की विलक्षण पहचान के तौर पर सभी  के सामने आते है |
रहीम या कबीर के समय से अब तक दुनिया की सभी नदियों के तटो  को छूकर इतना पानी बह गया है कि पानी को सहेजना ,समय की सबसे बड़ी आवश्यकता बन गया है |इतनी बड़ी आवश्यकता कि दुनिया डरने लगी है कि कहीं अगले विश्व युद्ध का सबब पानी ही नं बन जाए  |हम दुआ करते है की मानवता को ऐसे दुर्दिन कभी  न देखनें पड़े |याद करे कवी रहीम ने सदियों पहले एक दोहे में ही कहा था --

                                         रहिमन पानी राखिये ,बिन पानी सब सुन 
                                         पानी गए न ऊबरे -मोती ,मानस ,चुन ||

चिंता के इसी धरातल पर खड़े होकर संकलन के कवि ने कहा है -

                                          सोच समझ कर आजकल ,नल की टोंटी खोल 
                                          जल की इक- इक बूंद है ,अमृत सी अनमोल |


                                         कल सबको लड़ना पड़े ,अपनो से ही युद्ध |

                                         शायद फिर भी ना मिले ,पानी हमको शुद्ध ||


                                        चरण सगे माँ -बाप के ,  छूने में शरामाय |

                                        नेताजी की जूतियाँ ,हंस -हंस बहुत उठाय ||



जैसे दोहे एक संवेदनशील रचनाकार के ह्रदय में कही बैठे ,एक असरकारक व्यंगकार को उजागर करते है |व्यक्तिगत तौर पर मेरा मानना है कि बिना संवेदना व्यंग जन्मता ही नहीं है 


"शिखरों के हक़दार " दोहा संकलन के लिए 

कवि ,व्यंगकार ,उपन्यासकार ,कथाकार columnist श्री अतुल कनक जी के भाव 
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परम मित्र श्री रामनयण जी 'हलधर ' साहिब की प्रस्तुत कृति मुझे बहुत ....बहुत अच्छी लगी ....इसे पढ़कर जो सुखद अनुभूति हुई उसे पूरी तरह शब्दबद्ध नहीं कर पाई..क्योंकि यह इतना आसन नहीं है | पुस्तक बहुत स्तरीय है | जितना कर पाई आप के समक्ष है ....प्लीज त्रुटियाँ जरुर बता दीजियेगा ताकि दुरुस्त कर सकूँ ... शुक्रिया ...

‘शिखरों के हक़दार ’ कृति : गागर में सागर
.‘शिखरों के हक़दार’ पढ़ने का  सुअवसर  मिला , एक अरसे बाद दोहा विधा की इतनी खूबसूरत कृति पढ़ी ,वाकई ये दोहे शिखरों के हक़दार  हैं | एक - एक दोहा ‘गागर में सागर’ | यह पुस्तक बरबस ही रहीम , बिहारी की याद दिला रही है |
 श्री रामनारायण जी ‘हलधर’ के कई –कई दोहे लोक की जुबान पर चढ़ चुके हैं , जो एक कृतिकार की लोकप्रियता और साधना को चिन्हित करते हैं |इसी के साथ - साथ विषयगत वैविध्य देखते ही बनता है | नूतनता और पारम्परिकता का अभूतपूर्व सम्मिश्रण यहाँ देखा जा सकता है | इस पुस्तक की सब से बड़ी विशेषता है , हलधर जी की मौलिक सोच, अंदाज़े – बयां , प्रतीकों की सुषमा , गीतात्मकता ... मिठास , लोक संस्कृति की अभिव्यक्ति ...सरलता , माधुर्य , सौन्दर्य ....आदि आदि |
             हलधर जी ने जहाँ मौसम ,श्रृंगार , नारी मन , दाम्पत्य , प्रकृति - चित्रण , स्मृतियाँ ,रूप लावण्य को बहुत ही सूक्षमता के साथ  अभिव्यक्त किया है |वहीँ आम आदमी की पीड़ा , संत्रास , अभाव, अश्रु , ग्रामीण जीवन , टूटते  , रिश्तों की टीस और मानवीय संवेदानाओं को बखूबी  छूकर  एक नया मुहावरा प्रस्तुत किया है |वर्तमान परिवेश , मानवीय संबंधों की धड़कन इन दोहों में जीवंत हो उठी है | रामानारायण जी गहन चिंतन – मनन के सागर में डूबकर एक –एक मोती चुनकर लाये हैं |हर दोहा बेजोड़ है |इन के एक –एक दोहे पर बड़े –बड़े निबन्ध  लिखे जा सकते हैं और कृति पर शोधकार्य हो सकते हैं |
    अलंकर , बिम्ब ,गीति तत्व , शब्द सौन्दर्य ,शब्द शक्ति , व्यंजना , ध्वनि , अर्थात कला पक्ष को सुघड़ता और सौन्दर्य कृति में चार चाँद लगा रहे हैं |  बहुत ही कशमकश में हूँ कि किस दोहे को संदर्भित करूँ किसे नहीं |.....इतने अच्छे दोहे कोई कैसे लिख सकता है भला |....ये ही सोचकर अचम्भित हूँ  | इतना  मौलिक चिंतन – प्रस्तुतीकरण ,  बात कहने का नायाब सलीका  रामनारायण जी का ही हो सकता है जो काबिले – तारीफ है |. बतौर बानगी देखिये ... 
‘ तुम कहते हो प्रेम की , यादें बड़ी ख़राब 
क्यों रक्खे हैं आज तक , सूखे हुए गुलाब 
अहसानों  का सिलसिला इतना ना बढ़ जाये 
तेरी नीयत पर मुझे , शक होने लग जाये 
कहाँ छुपाऊँ आप को , कहाँ जताऊँ प्यार 
इतना छोटा शहर है , इतने रिश्तेदार 
मौसम की शैतानियाँ , छू न सके दहलीज 
 हर पौधे को बांधता , रहता हूँ ताबीज 
लिखूं स्वयं के नाम के , साथ आप का नाम 
लगता है पापा खड़े , मेरी उंगली थाम 
और दिशाएं प्रीत की , मनवा बैठा भूल 
तुम सूरज तो हम हुए , सूर्यमुखी के फूल 
 हर दोहा अपने आप में नाविक का तीर है | हलधर जी के लोक  भी बहुत प्रचलित हैं ,ख्याति  अर्जित कर रहे हैं  | बड़े –बड़े विद्वानों ने इन दोहों की भूरि - भूरि सराहना की हैं |श्रोता इन को सुनकर मन्त्र मुग्ध हो जाते हैं |पाठक  निहाल हो जाते हैं |सच कहूँ तो इन के दोहों में चमत्कारिक असर है | हलधर जी को दोहों का शहजादा  कहा जा सकता है | यह अत्युक्ति नहीं अपितु यथार्थ  है | इन के उत्तरोत्तर उन्मेष के लिए अनंत शुभकामनाएं ..., साधुवाद | दोहों के गगन में ध्रुव की भाति दैदीप्यमान रहें .... इन्ही शुभाशंषाओं के साथ 


कृष्णा कुमारी (कवियत्री ) 
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सतसैया के दोहरे,ज्यों नाविक के तीर
देखन में छोटे लगें
घाव करें गंभीर।

कविराज बिहारी के विषय में कही गई यह उक्ति हलधर जी के लिए बिलकुल सटीक है।दो पंक्तियों का दोहा छंद जो मात्राओं के अनुशासन में बंधा है-हलधर जी के मन की भावनाओं को विस्तार देने में कहीं सीमा या बाधा नहीं बना है।सम्वेदनशील भावुक मन और भाषा की गहरी पकड़ हलधर जी के दोहों को परिपूर्ण भावाभिव्यक्ति देती है।उनके दोहे कथा की अविव्यक्ति नहीं करते किन्तु व्यथा की अभिव्यक्ति बखूबी करते हैं।
 उनकी सतत रचनाधर्मिता का उपहार दोहा संग्रह"शिखरों के हकदार" पढ़ा। सिर्फ पढ़ा कहना उचित नहीं होगा क्योंकि प्रत्येक दोहा पढ़ने के पश्चात विचारोत्तेजक और प्रयोजनपूर्ण लगा। - कुछ यादों के पिटारे खुल गए, कहीं व्यथा का समानीकरण हो गया और कहीं स्थितियों पर क्रोध आया।कुल मिलाकर पाठक को सोचने पर विवश कर देते हैं हलधर जी के दोहे।
कविता संसार में वर्गीकरण बेमानी है।सब कुछ संलग्न है, मिला हुआ है।हलधर जी का भावसंसार भी ऐसा ही है।भावनाओं की विविधता इस संग्रह में खूब उजागर हुई है।कहीं कवि का भावुक मन 
तुम आए बजने लगे मन में लाख सितार,
धड़कन हो गई दादरा,नैन हुए मल्हार।
        और
तुम आए गाने लगी,पायल की झनकार
रोम-रोम संतूर सा मन वीणा के तार।

जैसे दोहे रचता है।और कहीं


 नीवें खोदी बाप ने माँ ने फेंकी गार,

अब बेटों ने डाल दी,आँगन में दीवार।

दादाजी के वास्ते घर में सब सामान,

खाने को फटकार है ,पीने को अपमान।

जैसे दोहों में पीड़ा को सांझी करता है 

कहीं प्रतीकों के माध्यम से अपने गांव की सैर करा लाते हैं, जैसे

नवल बनी सी ग्रीष्म ऋतु, फूल फूल सिंगार,

गुलमोहर की ओढ़नी,अमलतास के हार

 नेताओं की वादाखिलाफी हो या सूदखोरों की निर्ममता,रिश्तों का उथलापन हो या माता-पिता का निस्वार्थ प्रेम,शृंगार की गुनगुनाहट हो या मौसम के मस्ताने अंदाज सभी मिजाज के दोहे इस संकलन  में पढ़ने को मिले हैं।जीवन के हर रंग,हर पहलू को हलधर जी ने क्या खूब उकेरा है।यही कहूँगी कि फूलों से दोहे और उपवन सा संकलन।बहुत खूब!!!!


स्मृति शर्मा ,कोटा 

(सुधि पाठक )
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कुछ प्रमुख पत्रिकाओं   में 
















 साहित्य सम्मेलन,"साहित्य की बात" 17-18 september 2022 साकिबा  साकीबा रचना धर्मिता का जन मंच है -लीलाधर मंडलोई। यह कहा श्री लीलाधर...

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