Friday, May 24, 2019

भाषायी विद्रूपता और मानसिक नियंत्रण
बनाम संचार माध्यम
  डॉ. संजीव कुमार जैन
  सह प्राध्यापक हिन्दी
 डॉ संजीव जैन 


भाषा ही संचार है और वह मानवीय इतिहास का उत्पाद है। वह संस्कृति और मूल्यों, संवेदनाओं और बोधात्मकता की संवाहक और संसार को रचने का काम करती है। जिसे हम संसार कहते हैं वह मानवीय प्रयत्नों और भौतिक पदार्थों के बीच बने संबंधों और संरचनाओं का नाम है।
ये संबंध और संरचनायें भाषा की संचरणशीलता के कारण ही निर्मित होती हैं और इन्हें समझने अर्थात् बोधात्मक बनाने का काम भी भाषा ही करती है। मानवीय संरचना की सबसे बड़ी विशेषता है विचार करना, सोचना। बिना भाषा के मानव सोच नहीं सकता और अकेला एक मानव भी नहीं सोच सकता।

‘‘इस प्रकार संप्रेषणीयता और संस्कृति के रूप में भाषा एक दूसरे का उत्पाद है। संप्रेषणीयता से संस्कृति का निर्माण होता है: संस्कृति संचार का एक साधन है। भाषा संस्कृति की वाहक है और संस्कृति अपने मौखिक और लिखित साहित्य के जरिए मूल्यों के उस समूचे पुंज को लेकर चलती है जिसके जरिए हम स्वयं से साक्षात्कार करते हैं और विश्व में अपनी स्थिति का एहसास करते हैं। लोग किस तरह खुद से साक्षात्कार करते हैं यह बात इस तथ्य से प्रभावित होती है कि लोग किस दृष्टि से अपनी संस्कृति, अपनी राजनीति और प्रकृति और अन्य चीजों के साथ अपने समूचे संबंध को देखते हैं। इस प्रकार मानव समुदाय के ऐसे समूह के रूप में जिसका एक खास स्वरूप, खास इतिहास और विश्व के साथ खास संबंध है, हमारे साथ भाषा का एक अविभाज्य संबंध है।’’1.

व्यक्ति का सोचना दूसरों के सोचने से जुड़ा हुआ है इसी तरह एक व्यक्ति का ‘होना’ दूसरों के होने से जुड़ा हुआ है - ‘‘मैं प्रामाणिक तौर पर नहीं सोचता जब तक दूसरे न सोचें। मैं दूसरों के सोचने का काम या दूसरों के बिना सोचने का काम कर ही नहीं सकता। यह दावा अपने अंतर-निहित संवादमूलक चरित्र के कारण निरंकुश मानसिकता को डिगा देता है।’’2





मनुष्य की सोचने की क्षमता और स्वतंत्रता की भावना उसे निरंतर संरचनाओं को तोड़ कर उनके परे जाने के लिए उकसाती है। यही कारण है कि आधुनिक वर्चस्वी ताकतों ने उसकी इस क्षमता को पंगु बनाने के लिए सोचना आरंभ किया। देह पर नियंत्रण तो सैनिक ताकत से संभव हो सका पर बिना मन पर नियंत्रण के उसे हमेशा के लिए गुलाम बना कर नहीं रखा जा सकता था। विचारों पर नियंत्रण के लिए उनकी दिशा को बदल दिया, स्वतंत्र सोचने के लिए स्वतंत्र समय ही उसके पास नहीं रहने देने के प्रयत्न आरंभ हुए। उसकी मानसिक क्षमता का लाभ कुछ लोगों को मिलता रहे इसके लिए उसे अनेक तरह से नियंत्रित किया गया। मानसिक नियंत्रण के लिए किए गए प्रयत्नों में सबसे सशक्त प्रयत्न संचार के आधुनिक माध्यमों के विकास के रूप में सामने आया है। हम पाते हैं कि संचार के तमाम माध्यमों पर विश्व के लगभग सौ बहुराष्ट्रीय कंपनियों का वर्चस्व है और तमाम तरह के कार्यक्रम और नीतियाँ ये कारपोरेट तय करते हैं किस तरह उनके उत्पादों के पक्ष में विश्व जन मानस को अनुकूलित किया जाए।
इस संबंध में नाम चॉम्स्की ने लिखा है कि -‘‘यह जनतंत्र के लिए विशेष रूप से नुकसानदेह है कि मीडिया तंत्र निजी निरंकुश तंत्रों के हाथों में है....यह एक विशाल तंत्र है, जो सार्वजनिक खर्चों के सहारे खड़ा किया गया है। ज्यादातर मीडिया विश्लेषण कर्ता यह देख पा रहे हैं तथा लिख रहे हैं कि अंततः समूचा मीडिया तंत्र, दुनिया के पैमाने पर कोई आधा दर्जन अतिमहानिगमों के हाथों में सिमट जाने वाला है। यह इस्पात तथा कंप्यूटर जैसे क्षेत्रों के संचालित कर रहे अल्पतंत्रों से भी भयानक मामला होने जा रहा है, क्योंकि यहाँ हम सूचना तथा संचार की एक नई पद्धति के, निजी सत्ता के हाथों में सौंपे जाने की बात कर रहे हैं।’’3 

संचार माध्यमों में प्रिंट मीडिया सबसे प्राचीन है। यह तंत्र भी इन्हीं निगमों के हाथों में कैद है और वह भी मानसिक नियंत्रण और अनुकूलन के लिए कार्य कर रहा है। इसके लिए मैं एक उदाहरण देना चाहूंगा - ‘‘संस्कृति और सूचना क्षेत्र के उत्पाद व्यक्तिगत उपभोक्ता सामानों की परंपरागत इकाइयों के उत्पादों की तुलना में बहुत ज्यादा मूल्य का प्रतिनिधित्व करते हैं: वे विश्व पूँजीवादी व्यवस्था की वैचारिक विशिष्टताओं के मूर्त रूप भी होते हैं। वे व्यवस्था के मूल्यों या कम से कम उसके उपकरणों और औजारों के पक्ष में जनसमर्थन जुटाने और बढ़ाने में अत्यंत प्रभावी ढंग से सहायक होते हैं। उदाहरण के लिए, एक शक्तिशाली विज्ञापन एजेंसी, ओगिल्बी एंउ मैथर, के संस्थापक डेविड ओगिल्बी ने रीडर्स डाइजेस्ट की उन्मुक्त प्रशंसा करते हुए टिप्पणी की: ‘पत्रिका अमेरिकी जीवन के सर्वश्रेष्ठ मूल्यों का निर्यात करती है। मेरे विचार से जनमानस को जीतने की लड़ाई में डाइजेस्ट उतना कुछ कर रही है जितना संयुक्त राज्य की सूचना एजेंसी।’’4 

क्या हम संचार माध्यमों की नीतियों और उद्देश्यों के आधार पर उसमें प्रयुक्त होने वाली भाषा चाहे वह कोई सी भी क्यों न हो, उसका मूल्यांकन कर सकते हैं? इसके लिए हमें उनके पीछे के ‘क्यों’ और कैसे का पर्दाफाश करना होगा। भाषायी विद्रूपता और विकृति की जो चिन्ता हिन्दी और अन्य भाषाओं को हो रही उसके लिए इस नीति का विखंडन आवश्यक है।

अतः हम कह सकते हैं कि संसार भाषा की निर्मिति है अतः शब्दों को पढ़ने का अर्थ संसार को पढ़ना होता है, और शब्दों को रचने का अर्थ संसार को रचना होता है-‘‘जिसे मैं संसार को पढ़ना और शब्दों को पढ़ना कहता हूँ। मेरी इस बात में केवल शब्द की पढ़ाई करने या केवल संसार की पढ़ाई करने की बात नहीं है। एक द्वंद्वात्मक एक जुटता में दोनों काम एक साथ करने की बात कही गई है।’’5 

प्रसिद्ध शिक्षाविद पाओलो फ्रेरे का यह कथन भाषा और मानव जीवन के अन्तर्संबंधों की सटीक व्याख्या करता है। हम शायद यह अनुभव नहीं कर पाते हैं कि संसार भौतिक वस्तुओं की संरचना मात्र नहीं है। इन भौतिक पदार्थों और उनके प्रकार्यों से मानव का जो संबंध है वह भाषा के बिना असंभव है। भाषा सिर्फ शब्दों के लिखित और मौखिक रूप तक सीमित नहीं है, मनुष्य के अन्य मनुष्यों और प्रकृति के साथ संबंधों की निर्मिति भी भाषा का ही प्रकार्य है। हम जीवन में निरंतर जो कार्य करते हैं, उत्पादन और पुनरुत्पादन करते हैं, इस प्रक्रिया में प्रकृति के पदार्थों और अन्य प्राणियों के साथ हमारा जो संबंध कायम होता है वह भी एक भाषा है। भाषा ही वह तत्व है जिसने वर्तमान विश्व को यह रूप दिया है। ज्ञान और भाषा का संबंध भी बहुत जटिल है। ज्ञान के विस्तार और अनन्त शाखाओं में विभाजन भी भाषा के माध्यम से ही संभव हुआ है। भौतिक वस्तुओं से निर्मित इस संसार और मनुष्यों के बीच प्रकार्यों का जो विशिष्ट संबंध है वह एक संरचना है। यह संरचना भाषायी संरचना के अनुरूप संरचित हुई है।

मानवीय अनुभव और ज्ञान का संचार इस संसार की दूसरी वस्तुओं और मनुष्यों तक भाषा के माध्यम से ही संभव है। इस अर्थ में भाषा सबसे ताकतवर और दीर्घजीवी संचार व्यवस्था है जिसका अविष्कारक आदि मानव है। इतनी विकसित और स्थायी संचार व्यवस्था का अविष्कार दुनिया में दूसरा नहीं हुआ। इस संदर्भ में भाषा संस्कृति की वाहक होती है और जो मूल्य हम निरंतर प्रकृति और अन्य मनुष्यों से द्वंद्वात्मक संपर्क और संघर्ष से अर्जित करते हैं, या जो मूल्य हमें विरासत में मिलते हैं, उनकी वाहक भी भाषा ही होती है। इस अर्थ में भाषा मूल्यों का एक संचित कोष होती है जो निरंतर आगे की पीढ़ियों को संप्रेषित करती रहती है। भाषा बच्चों के मस्तिष्क में संसार का बिम्ब बनाती है। वह रंगों, आकृतियों और प्रकार्यों का सामंजस्य स्थापित करती है जैसा कि न्गुगी और थ्योंगो ने लिखा है - ‘‘इस प्रकार संस्कृति के रूप में भाषा का जो दूसरा पहलू है वह किसी बच्चे के मस्तिष्क में बिंब निर्माण करने का एक माध्यम भी है। व्यक्तिगत और सामूहिक रूप से एक जनसमूह के रूप में अपने होने की हमारी समूची अवधारणा उन बिंबों और प्रतीकों पर आधारित है जो प्रकृति के साथ हमारे वास्तविक संबंधों के एकदम अनुरूप भी हो सकती है और नहीं भी हो सकती है।’’6  संचार माध्यम भाषा की इस बिंब निर्माण क्षमता को आभासी यथार्थ के माध्यम से कुंद कर रहे हैं।

वर्तमान के संचार के साधन और भाषा की संचार क्षमता के बीच मूलभूत अंतर है। सबसे पहली बात जो ध्यान में रखना चाहिए वह यह कि ये तमाम संचार साधन भाषायी तत्व पर आधारित है। बिना भाषा के किसी भी संचार साधन की कल्पना संभव नहीं है। पशुओं के लिए किसी भी तरह के संचार साधन उपयोगी नहीं है, क्योंकि उनके और संसार के बीच कोई संरचनात्मक संबंध नहीं है। दूसरी बात यह है कि ये तमाम संचार के साधन मानवीय आवश्यकता के लिए नहीं है जैसा की भाषा है। इनके विकास के पीछे जो वर्चस्वी विचारधार काम कर रही है वह मुनाफा कमाने और मानसिक गुलाम बनाने की है जैसा कि नाम चॉम्स्की ने संचार माध्यमों के विकास के संबंध में लिखा है कि ‘‘शुरू से ही, इसका लक्ष्य पूरी तरह खुल्लमखुल्ला तथा सचेत रूप से, जैसा कहते हैं कि ‘जनमानस का नियंत्रण’ रहा है। सदी के शुरू से ही जनमानस को, निगमों के लिए सबसे बड़े खतरे के तौर पर देखा जाता रहा है।’’7

इसलिए आधुनिक संचार साधनों और भाषा का कोई मौलिक या तात्विक संबंध नहीं है जैसा मानव और भाषा के बीच है। इनका उद्देश्य और कार्य कुछ खास लोगों के स्वार्थ और वर्चस्व को बनाए रखना है। यह वह तत्व है जो हमें समझना चाहिए।





भाषा जीवन और जगत के संबंधों और प्रक्रियाओं को कोडयुक्त बनाती है। शिक्षक का काम उसे कोडमुक्त करना है जो बिना संसार को पढ़े संभव नहीं है। इसलिए पहले जिए गए अनुभव का ज्ञान अर्जित किया जाना संचार के लिए आवश्यक है जो संचार के तकनीकी साधनों से संभव नहीं है। जीवन और जगत के संबंधों और प्रक्रियाओं को कोडयुक्त करने और कोडमुक्त करना हर मनुष्य की सांस्कृतिक विरासत युक्त भाषा में ही संभव है। संचार माध्यमों की भाषा में सांस्कृतिक विरासत का कोई तत्व नहीं होता इसलिए वह जीवन के जिए गए अनुभवों से रहित होती है। संचार के साधन आज के युवा वर्ग की एक ऐसी छवि गढ़ते हैं जो एक विकृत और बेजान भाषा के इस्तेमाल को ही अपनी पहचान मानते हैं और इससे वे सांस्कृतिक विरासत और अनैतिहासिक वर्ग बन जाते हैं। एक ऐसा वर्ग जिसकी जन जीवन में कोई जड़ें नहीं है और जनसामान्य, या उपेक्षित जनों से जिन्हें इस भूमंडलीकरण की योजना से बाहर रखा गया से कोई संवेदनात्मक या वर्गीय संबंध नहीं है।
सैनिक और हथियार मनुष्य के शरीर को गुलाम बनाते हैं और मनुष्य की चेतना और अन्तरात्मा को गुलाम बनाया जाता है उनकी भाषा छीन कर। उपनिवेशवाद और नव उदारवादी साम्राज्यवादी नीतियों ने मनुष्य की मौलिक चेतना को विकृत और विदू्रपित करने के लिए उसकी भाषा को उससे छीनना प्रारंभ किया। इसके लिए औपनिवेशिक ताकतों ने अपनी भाषा और उसके माध्यम से संस्कृति को उपनिवेशित लोगों पर थोप कर उनकी मौलिकता और चेतना की हत्या कर दी।
  ‘‘उपनिवेशवाद का वास्तविक उद्देश्य जनता की संपत्ति पर नियंत्रण रखना था। उन्हें इस पर भी नियंत्रण रखना था कि जनता किस चीज का उत्पादन करती है, किस तरह उत्पादन करती है और इसका वितरण किस तरह होता है। दूसरे शब्दों में कहें तो वास्तविक जीवन की भाषा के समूचे साम्राज्य पर उसे नियंत्रण रखना था। उपनिवेशवाद ने भौतिक संपदा के सामाजिक उत्पादन पर सैनिक विजय के जरिये अपना नियंत्रण रखा और राजनीतिक अधिनायकवाद द्वारा उसे परिपुष्ट किया। लेकिन प्रभुत्व का इसका सर्वाधिक महत्वपूर्ण क्षेत्र उपनिवेश की जनता का मानसिक जगत था, जिस पर उसने संस्कृति के जरिए नियंत्रण स्थापित किया। बिना मानसिक नियंत्रण के आर्थिक और राजनैतिक नियंत्रण का मतलब दूसरों के संदर्भ में खुद को कारगर। जनता की संस्कृति पर नियंत्रण का मतलब दूसरों के संदर्भ में खुद को परिभाषित करने के उपकरणों पर नियंत्रण करना है।’’8 

यही कार्य नवउदारवादी ताकतों ने संचार के नए साधनों के माध्यम से आरंभ किया। नव उदारवादी ताकतें यह समझ गईं थीं की आम आदमी के मन और विचारों को नियंत्रति करने के लिए उसकी भाषायी चेतना को विकृत किया जाना आवश्यक है। इसके बिना वे मानव के मन को नियंत्रित नहीं कर सकते थे और बिना मानसिक नियंत्रण के उसे सदियों तक बेवकूफ नहीं बनाया जा सकता है। उसके श्रम के द्वारा अकूत मुनाफा कमाने के लिए शरीर पर नियंत्रण की औपनिवेशिक नीतियाँ कारगर नहीं रहीं। औपनिवेशिक नीतियों के खिलाफ हजारों विद्रोह भारत में ही हुए पर नवउदारवादी नीतियों के खिलाफ कोई विद्रोह नहीं हुआ। यही मानसिक नियंत्रण की वह तकनीक है जो नव साम्राज्यवादी नीति निर्माताओं ने अपनायी और उसमें बहुत हद तक वे सफल भी रहे - ‘‘इस प्रकार सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक क्षेत्र पर नियंत्रण स्थापित करके उत्पीड़क राष्ट्र और वर्ग एक ऐसी स्थिति सुनिश्चित करने में लगे रहते हैं जिसमें गुलाम लोग यह मान बैठते हैं कि गुलाम होना एक सामान्य मानवीय अवस्था है।’’9 

संचार माध्यमों के ‘जन’ विशेषण के पीछे के ‘क्यों’ का पर्दाफाश करना और उसके निहित स्वार्थों को ‘जन’ तक पहुँचाना संचार माध्यम और उनमें प्रयुक्त भाषा के अध्ययन का लक्ष्य होना चाहिए। जैसा कि हमने पहले कहा है कि शब्द को पढ़ना संसार को पढ़ना है। संचार माध्यम शब्द और संसार के इस संबंध को विकृत कर रहे हैं। वे शब्द की क्षमता और संसार को अभिव्यक्त करने की उसकी तकनीक के यथार्थ संबंध को आभासी अयथार्थ में बदल रहे हैं। वास्तविक संबंधों को आभासी संबंधों में बदलना संचार माध्यमों का वास्तविक लक्ष्य है। यह लक्ष्य मनुष्य की वास्तविकताओं के जिये गए अनुभव और ज्ञान को विद्रूप कर देता है। यथार्थ और जीवन के समीकरण को आभासी अनुभव और जीवन के समीकरण में बदल कर मनुष्य को अवास्तविक वस्तु में बदल देता। इससे मनुष्य आपसी जीवंत संबंधों से कट जाता है और सोशल मीडिया के अयथार्थ संबंधों में जीवन की सार्थकता को पाने की कोशिश में मानसिक विकृति और जड़ता की ओर बढ़ता जा रहा है।
इस मानसिक विकृति और जड़ता का ही परिणाम है हिंसा, बलात्कार, मानवीय क्रूरता के निठारी कांड, पर्यावरण के विनाश, अनेक प्रजातियों के विलीन होते जाने, जीवन के अक्षत स्रोतों का निरंतर प्रदूषित करते जाने की हद तक तकनीक को बिना किसी हिचक के अपनाते जाने में परिलक्षित हो रहा है। यह मनुष्य के यथार्थ से निरंतर दूर होते जाने का ही परिणाम है जो संचार माध्यमों की भाषा से निर्मित हो रहा है।

संचार माध्यमों में प्रयुक्त होने वाली भाषा चाहे जो हो उसके पीछे काम करने वाली नीति और लक्ष्यों को जाने बिना भाषा की विदू्रपता और विकृति के कारणों और परिणामों को नहीं समझा जा सकता। वे स्थानीय या देशीय भाषाओं को हमेशा दोयम दर्जे पर रखते हैं और उनके प्रति हिकारत की मानसिकता पैदा करते हैं। यह कार्य वे संचार माध्यमों की मूल भाषा या वर्चस्वी सताधारियों की भाषा को श्रेष्ठ और अत्यधिक क्षमताशील बताकर करते हैं। इस मानसिक विकृति का ही परिणाम होता है कि हिन्दी जैसी भाषाओं को दैनिक व्यवहार में प्रयुक्त करने में हिन्दी भाषा पढ़ालिखा युवा शर्म महसूस करता है और अंग्रेजी जैसी वर्चस्वी और गैर सांस्कृतिक भाषा के प्रयोग में गर्व महसूस करता है। यह गर्व अपने वजूद की शर्त पर किया जाने वाला गर्व है जो दरअसल इस गुलाम वर्ग की दासता को ही अपना वजूद मानलेने की स्थिति का द्योतक है।

संचार माध्यमों के जरिए जिस उपभोक्तावाद को लादा जा रहा है, वह अपनी निजी भाषा को विद्रूप और विकृत किए बिना संभव नहीं था। एक ऐसी भाषा को समान रूप से स्वीकृत कराया जा रहा मानो उसके बिना मनुष्य का अस्तित्व ही नहीं है। विकास और अंग्रेजी भाषा का तादात्म्य इस तरह से हिन्दी भाषा-भाषी चेतना पर थोप दिया गया है कि अंग्रेजी के बिना हम अपने होने की कल्पना भी नहीं कर पा रहे हैं। बिना अंग्रेजी के जैसे शिक्षा और आजीविका का कोई रास्ता ही दिखाई नहीं दे रहा है। यह एक पूरी पढ़ी लिखी पीढ़ी को सदियों तक गुलाम बनाये रखने की साजिश है जिसे समझने और तोड़ने का प्रयत्न इसलिए नहीं हो रहा है कि जो वर्ग इसके खिलाफ लड़ सकता था वह तो अपने का धन्य समझ रहा है। अब क्या मजदूर वर्ग से सांस्कृतिक गुलामी के खिलाफ संघर्ष करेगा? शायद ऐसा हो पर यह स्थिति निकट भविष्य में तो दिखाई नहीं दे रही है।

भाषा हमारी चेतना को मूर्त रूप देती है और हमारे हाथ और मूँह को सार्थक करती है। इसके बिना पशुओं के हाथ और मूँह और हमारे हाथ और मूँह के होने में कोई फर्क नहीं होता। मगर आज हम अपने हाथ और मूँह को गुलामी की सुनहरी जंजीरों में बंधवानें को तैयार हैं। यह गुलामी की निकृष्टतम अवस्था है और गुलाम बनाने वाले की चरम सफलता जब गुलाम गुलामी को खुशी-खुशी स्वीकार कर ले और इसे ही अपने अस्तित्व की, अपने होने की, अपने वजूद की सार्थकता मानने लगे। आजादी के बाद भारत में इसी मानसिक गुलामी की परंपरा इसी स्वीकार के साथ फैलती जा रही है और यह सर्वमान्य स्थिति की तरह स्वीकृत हो गई है। हिन्दी भाषा की अपनी क्षमता और ताकत को इससे बहुत बड़ा झटका लगा है।

हिन्दी सिर्फ एक बोली नहीं है, एक संपूर्ण सांस्कृतिक मूल्यों की विरासत है इसके पीछे कम से कम एक हजार वर्षों की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत काम कर रही है। इससे एक बहुत बड़ा जन समूह अपने अस्तित्व को सार्थक करता है, शेष विश्व के साथ अपने वजूद को संपूर्णता प्रदान करता है। संचार माध्यम इस विशिष्ट पहचान और अस्तित्व को समाप्त करने की राह पर चल रहे हैं। इसका अर्थ है कि हम धीरे-धीरे अपने अस्तित्व को मिटाते जाने की प्रक्रिया से गुजर रहे हैं।






हिन्दी भाषा और संचार माध्यमों के अन्तर्संबंधों को समझने के लिए इन कुछ तथ्यों का ध्यान रखना आवश्यक है। चूँकि भाषा एक संरचना होती है और हर भाषा का अपना गठन अलग होता है, उसके प्रतीक और बिंब अलग होते हैं, मूल्यों को वहन करने की क्षमता और उन्हें संप्रेषित करने की तकनीक अलग होती है, उसका व्याकरणिक गठन अलग होता है। प्रत्येक भाषा का यह वैशिष्ट्य उसके प्रयुक्त करने वालों के भौगोलिक, राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक तथा सांस्कृतिक विशिष्टताओं से निर्धारित होता है। जब हम किसी भी भाषा को इन से काट कर प्रयुक्त करते हैं तो भाषा प्राण रहित निर्जीव शरीर की तरह रह जाती है और यही तो इन संचार माध्यमों का लक्ष्य है कि जन मानस निर्जीव होकर जिए, उसमें सोचने विचारने की क्षमता ही न बचे जो उनके स्वार्थों और लक्ष्यों के खिलाफ आवाज उठा सकें। यदि वे सोचें भी तो एक ऐसी भाषा में जो उनके परिवेश के मूल्यों से उपजी न हो। इससे उनका मस्तिष्क उस भाषा के मूल्यों के प्रति अनुकूलित होगा और वे उनके स्वार्थों के हिमायती हो जायेंगे।

आज संपूर्ण भारत और विश्व में संचार माध्यम और बहुराष्ट्रीय निगमों के माध्यम से इसी तरह की गुलाम मानसिकता को बढ़ाया जा रहा है जो विकास और पैकेज की सुंदर शब्दावली में पेश की जा रही है। हिन्दी भाषा और हिन्दी भाषी लोग भी इसी षड्यंत्र का शिकार हो रहे हैं जिस पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। संचार माध्यमों की भाषा का स्वरूप् नियंत्रणकारी होता है, वह संचार माध्यमों के उपभोक्ता को निष्क्रिय प्राप्तकर्ता के रूप में स्वीकार करती है। वह मस्तिष्क विहीन समाज और व्यक्ति की अवधारणा को मानकर चलती है, इस अर्थ में वह निरंकुश और तानाशाही से भरपूर होती है। संचार माध्यमों की भाषा का प्रभाव क्षणभंगुर होता है, उसे इस तरह प्रयुक्त किया जाता है ताकि ग्रहणकर्ता तात्कालिकरूप से तो उत्तेजित हो जाता है और कुछ समय पश्चात उसके मस्तिष्क से उसका प्रभाव समाप्त हो जाता है - ‘‘संचार समामाजिक स्तरीकरण के तमाम खाके को खाली छोड़ देता है और प्राप्तकर्ता के समक्ष मस्तिष्कविहीन समाज की छवि पेश करता है, जिसे वही अनजाना निर्धारणकर्ता निर्देशित करता है। इस तिलिस्म को और ज्यादा मजबूत करने के लिए प्रतीक अपने साथ इससे जुड़ी हुई कई अवधारणाओं को साथ लेकर चलता है, जो सामाजिक भंगुरता को महत्वपूर्ण बनाते हैं जैसे ‘उपभोक्ता समाज’, ‘प्रचुरताशील समाज’, ‘जनसमाज’, ‘आधुनिक समाज’ और ‘जनमत’ इत्यादि।’’10 

संचार माध्यमों की भाषा उसके पीछे की वर्चस्वी ताकतों को शोषणकारी बहुराष्ट्रीय निगमों को अदृश्य बनाती है। वे उनके हितों को छिपाते हैं और स्वयं को जनहित के लिए समर्पित के रूप में पेश करते हैं। यह भाषा की विद्रूपता है। जन सामान्य के जीवन के वास्तविक विद्रूपताओं और उनके कारणों को अदृश्य रखती है और ऐसा वातावरण पेश करती है मानो कहीं कोई समस्या ही नहीं है, सर्वत्र सुख और भोग सामग्री की नदी वह रही है। यह आम आदमी के साथ क्रूरता है, उसकी गरीबी का मजाक है और यह सब संचार माध्यमों की भाषा करती है। वे अत्यंत्र त्रासद स्थितियों में जीने को विवश लोगों की पीड़ा और दुखों की यथार्थभाषा को विलोपित कर देते हैं। ये संचार माध्यम अपनी एक स्तरीय भाषा और रचे गए प्रतीकों एवं बिंबों से एक मायालोक का आभामंडल चारों और फैला देते हैं जिसमें करोड़ों लोगों के यथार्थ का गायब कर दिया जाता है-

‘‘आधुनिक संचार की शब्दावली के ये अहम शब्द उस तथ्य को छिपा देते हैं कि हकीकत की व्याख्या करने के लिए इन शब्दों के अर्थों को एक विशेष सामाजिक वर्ग द्वारा हम पर एकतरफा रूप से थोपा जाता है। दूसरे शब्दों में, इनकी भाषा, जिसे मीडिया द्वारा बार-बार दोहराया जाता और पुनरुत्पादित किया जाता है, एक पर्दे का काम करती है, ताकि अपराधी की स्थिति छुपी रहे और यह क्रूर तंत्र अपना काम जारी रखे। और इस प्रकार एक फार्मूले के बतौर तमाम अवधारणाएं, जैसे आधुनिकता, विज्ञापन, उपभोग, पर्यटन और ऐतिहासिकता, रोजमर्रा की जिंदगी के वाहक बन जाते हैं। जनतम की आड़ में, ये कुछ लोगों  की मुट्ठी में बंद यह प्रेस जनआंदोलनों पर दमन की मांग करता है।’’11 

संचार माध्यम एक ऐसी भाषा का इस्तेमाल करते हैं जो उत्पीड़नकारी के हितों को साधती है और उनकी वैचारिक ताकत को ही आतंक की तरह थोपती है। यह उन लोगों की भाषा को निरंतर और तीव्रगति से संप्रेषित करती है जिनका उत्पादन, वितरण और मुनाफा कमाने की प्रक्रिया पर पूरा कब्जा होता है। ये संचार साधन उस वर्ग की विचारधारा को ही निरंतर संप्रेषित करते हैं जो पृथ्वी के अधिकांश स्रोतों पर अधिकार जमाये हुए हैं और बचे हुए भागों पर भी कब्जा करने के लिए प्रयत्नशील हैं -‘‘संचार मीडिया फर्जी चेतना की फर्जी चालाकी का द्योतक है। असल में वह सत्ताशील ताकतों और नौकरशाही की वैचारिक सत्ता का मजबूत करता है। अपनी उर्ध्वाधर भाषा के माध्यम से यह नौकरशाही इस व्यवस्था को न्यायोचित करार देती है और इस सामाजिक सौहार्द्रता का दर्जा भी देती है जिसमें कुछ रद्दोबदल तो किए जा सकते हैं मगर पूरी तरह से परिवर्तित नहीं किया जा सकता।’’12 

निष्कर्ष रूप में हम देख सकते हैं कि तमाम संचार माध्यमों की भाषा एक वर्गीय रुझान को संप्रेषित करने वाली होती है, विविधता दिखाने का भ्रम रचती है, हकीकत में एकरूपीकरण के प्रति अनुकूलित करती है, स्वतंत्रता के और चुनने के अधिकार के विकल्प को आजादी के अनुभव के रूप में पेश करती है, पर वास्तव में प्राप्तकर्ता को मानसिक गुलामी की ओर ले जाती है। इस बात को आर्मंड मैतेलार्त के शब्दों में बहुत ही सटीक तरीके से समझाा जा सकता है -
  ‘‘दूसरी तरफ महिलाओं की पत्रिका महिलाओं को नारीत्व की दुनिया के मिथक में बांधे हुए होती है। बेशक यह कितना ही आधुनिक लगे असल में वह उसे मुक्ति के अधिकार से वंचित रखती है और वे ये दिखावा करते हैं कि इत स्वतंत्रता को बढ़ावा दे रहे हैं। प्रेम पत्रिकायें पाठकों को दिल की बात सुनने के लिए उकसाती हैं। ये तमाम सांस्कृतिक उत्पाद फर्जी सत्ताविरोध को पैदा करते हैं जो बड़े व्यवस्थित ढंग से मौजूदा सामाजिक संबंधों (आध्यात्मिक-भौतिक, काम करने-फुरसत, परंपरागत-आधुनिक, परिवार-राजनीति) को बदलने की इच्छा को ही रोक देते हैं। हमें इस बारे में साफ होना होगा कि यह कोई विविधता नहीं है और न ही यहाँ कोई रुचियों की प्रचुरता का मामला है। ये तमाम चीजें अपने आप में शोषणकारी हैं। ये सभी वे मान्यतायें हैं जिनको आधार बनाकर प्रत्येक पत्रिका और प्रत्येक टेलीविजन चैनल के कार्यक्रम संचालित होते हैं। यह एक विकृति है।’’13 

इस तरह संचार माध्यम न केवल जनभाषा को विकृत कर उसका इस्तेमाल अपने लाभ के लिए कर रहें हैं बल्कि जन मानस पर नियंत्रण करके अपनी तानाशाही के अनुकुल उनके विचारों को ढालने के लिए भी प्रयत्नशील हैं। तमाम संचार माध्यम वैचारिक रुग्णता के शिकार हैं और वे मानसिक रुग्णता को ही पैदा करते हैं।


 डॉ. संजीव कुमार जैन
522 आधारशिला, ईस्ट ब्लाक एक्सटेंशन
 बरखेड़ा भोपाल
462022
मो. 09826458553



संदर्भ - 
1. न्गुगी वा थ्योंगो, औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति, ग्रंथशिल्पी, पृ. 76
2. फ्रेरे पाओलो, उम्मीदों का शिक्षाशास्त्र, ग्रंथशिल्पी, पृ. 114
3. पूंजीवाद और सूचना का युग, ग्रंथशिल्पी, पृ. 225
4. संचार माध्यम और सांस्कृतिक वर्चस्व, ले. हरबर्ट आई. शिलर,ग्रंथशिल्पी, पृ. 14
5. फ्रेरे पाओलो, उम्मीदों का शिक्षाशास्त्र, ग्रंथशिल्पी, पृ. 114
6. न्गुगी वा थ्योंगो, औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति, ग्रंथशिल्पी, पृ. 75
7. पूँजीवाद और सूचना का युग, ग्रंथशिल्पी, पृ. 216 
8. न्गुगी वा थ्योंगो, औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति, ग्रंथशिल्पी, पृ. 77-78
9. न्गुगी वा थ्योंगो, औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति, ग्रंथशिल्पी, पृ. 77-78
10. जनतंत्र जनमाध्यम और वर्तमान संकट, आर्मंड मैतेलार्त ग्रंथशिल्पी, पृ. 117-118
11. जनतंत्र जनमाध्यम और वर्तमान संकट, आर्मंड मैतेलार्त ग्रंथशिल्पी, पृ. 118
12. जनतंत्र जनमाध्यम और वर्तमान संकट, आर्मंड मैतेलार्त ग्रंथशिल्पी, पृ. 132
13. जनतंत्र जनमाध्यम और वर्तमान संकट, आर्मंड मैतेलार्त ग्रंथशिल्पी, पृ. 134

Friday, May 3, 2019

पुस्तक समीक्षा "तुरपाई "
लेखक:  ओम नागर 
प्रकाशक: कलमकार मंच , जयपुर  ( राज ०)
समीक्षक: सवाई सिंह शेखावत 

सवाईसिंह शेखावत 

परिचय 
श्री सवाई सिंह शेखावत

जयपुर जिले के ललाणा गांव में  संवत 2003  में जन्मे सवाई सिंह शेखावत  ने अपने साहित्यिक जीवन की शुरुआत एक कवि के रूप में की। पिछले लगभग तीस वर्षों से रचनाशील शेखावत ने कुछ कहानियाँ और आलोचनात्मक लेख भी लिखे। उन्होंने हिन्दी के अतिरिक्त राजस्थानी में भी कहानियाँ और ग़ज़लें लिखीं। उनकी पहली राजस्थानी कहानी कूँपळ काफ़ी चर्चित रही और तेलुगू तथा हिन्दी में अनूदित हुई।
उनके पहले दोनों कविता–संग्रह पुरस्कृत हुए।

घर के भीतर घर 1987, राजस्थान साहित्य अकादमी द्वारा सुमनेश जोशी पुरस्कार से तथा पुराना डाकघर और अन्य कविताएँ 1994, राजस्थान साहित्य अकादमी द्वारा सुधीन्द्र पुरस्कार से पुरस्कृत। उनका तीसरा कविता–संग्रह दीर्घायु हैं मृतक अपनी अनूठी व्यंजनात्मकता के कारण साहित्यिक हलके में खासा चर्चित रहा।
शेखावत ने अनियतकालीन साहित्यिक अख़बार बखत तथा राजस्थान सरकार के विकास विभाग द्वारा प्रकाशित पत्रिका राजस्थान विकास का भी कुछ वर्षों तक सम्पादन किया। 

सवाई सिंह शेखावत (फरवरी १३, १९४७) के आठवें कविता संग्रह ‘निज कवि धातु बचाई मैंने (२०१७) को इस वर्ष राजस्थान साहित्य अकादमी के मीरा पुरस्कार से सम्मानित





ओम नागर  का तीसरा कविता संग्रह “तुरपाई “ ,जिसमे  प्रेम कविताओं के साथ है गद्य में  कुछ मन की बातें....गद्य और पद्य का यह अनुपम समावेश मीठे झरने का संगीत कानों में गुंजाता है तो  गद्य की गहराई  मानो सागर के अतल में ले जाकर छोड़ देती है ....लो चुनलो जो मन भाये और वहाँ कुछ भी छोड़ने का मन नही होता |

पहली बारिश में धरती सी गंध तुम्हारी साँसों में भी आती है .....जैसे भीगा हो पहली बार प्रेम  की बारिश में मन और सुवासित कर दी हो उसने साँसे | यह सौंधी महक धमक के साथ बस जाती है तन मन में और प्रकृति के साथ एक मेक होकर कवि कहने लगता है कविता |
कविता यूँ तो सायास  नहीं लिखी जा सकती ,लिखने के पहले जी जाती है कविता |बूंद –बूंद प्रेमत्व रिसता है उसके ह्रदय के सोतों में ,द्रग के कोरों से फूटती है सतरंगी आभा जिससे सारा भुवन हो जाता सतरंगी |बुरा ,बुरा नहीं लगता ,अच्छा और अच्छा लगने लगता है ...स्पर्श की माया तो  समूचा रंग ही बदल देती है यही प्रेम की नैसर्गिकता है जिससे सराबोर है संग्रह की तमाम कविताएँ|

तुरपाई ,यानि महीन सिलावट |शब्द शब्द ने बारीक़ बखिये के रूप  में साकार की कविताओं पर समीक्षा लिखी है सवाई सिंह शेखावत जी ने



प्रेम में कवि ओम नागर की नफ़ीस 'तुरपाई'
**********************************************सवाई सिंह शेखावत
प्रकाशन की दुनिया में अपनी सार्थक सहभागिता के ज़रिए तेजी से जगह बनाते कलमकार मंच- जयपुर के बैनर तले कोटा,राजस्थान से युवा कवि ओम नागर का तीसरा कविता-संग्रह आया है-'तुरपाई-प्रेम की कुछ बातें,कुछ कविताएँ' शीर्षक से।शीर्षक पढ़ा तो चौंका कि प्रेम विषयक किसी संकलन का तुरपाई से क्या लेना-देना?लेकिन जब संग्रह उल्टा-पलटा तो अचानक मस्तिष्क में लोक की वह पुरानी उक्ति कौंधी कि-जीवन में कैंची-सा मत बनिए, जो काट-पीट का बायस बनती है।बन सके तो सुई-धागा बनिए जो कपड़ों को फिर से जोड़कर जीवन के लिए ज़रूरी पौशाक सींते हैं।
लेकिन इस उद्यम में भी जोड़ने के लिए सिलाई फिर फिनिशिंग टच देने के लिए तुरपाई का काम किया जाता है।सवाल यह है कि कवि ओम नागर ने यहाँ प्रेम की प्रक्रिया के लिए तुरपाई शब्द का ही चयन क्यों किया?
थोड़ा गहराई में जा कर सोचा तो कवि अभिव्यंजना को लेकर कायल हुआ।सिलाई बेशक़ वस्त्रों को जोड़ने का महत्वपूर्ण काम करती है,लेकिन तुरपाई उस जुड़ाव का सुघर साक्ष्य है।प्रेम में भी किसी से जुड़े होने का सबूत किंचित दृष्टिगोचर होना अपेक्षित है।
ग़ालिब-'रगों में दौड़ते रहने के हीं नहीं,बल्कि आँख से टपकने वाले लहू के कायल थे'।वस्त्र-विन्यास में भी तुरपाई उसी स्नेह-सूत्र का सलौना साक्ष्य है।
इस संग्रह की दूसरी अनूठी विशेषता प्रेम विषयक कविताओं के साथ प्रेम बाबत कुछ आत्मीय जीवन प्रसंगों का गद्यमय समावेश भी है।डायरी और संस्मरण विधा के मिले-जुले स्वरुप वाले ये प्रसंग संग्रह की पठनीयता और आत्मीयता का विस्तार करते हैं।
पहले ही अंश 'एक बात जो कहनी थी तुम्हें' में हम कवि ओम नागर के गद्य-निकष का नमूना देख सकते हैं।जिसमें प्रकृति का सजीव चित्रण,भावों का अनूठा दीप्त-राग,यूकेलिप्टस जैसे पर्यावरण के नाम पर बदनाम दरख्त में भी प्रिया के नयनों का तीखापन देख सकने ,आषाढ़ी जामुन से रची जीभ का दुर्लभ ज़ायका महसूस करने व बारिश की बूंदों के बाद धरती से उठती सौंधी गंध इस संस्पर्श को जिंदा बनाते हैं।






पहली कविता 'यहाँ सारी संख्या सम हैं, तुम्हारा रूँठना विषम' में 'तुम जो साथ चलो' का विनम्र अनुरोध है।ऐसे संग-साथ में रात को भी सूरज उगा लेने का आश्वासन है।प्रेम में चार शब्द सुनने का आत्मीय आग्रह,होठों के दो से चार होने की निर्दोष ख्वाहिश और ऐसा करते हुए दुनियाई गणित का हल होते-होते फिर से मीठा उलझाव कवि की प्रेम विषयक धारणाओं के तरल संस्पर्शी भावानुकूलन को दर्शाता है।
ओम नागर की इन कविताओं को पढ़ते हुए मुझे टॉलस्टॉय द्वारा गोर्की को दी गई वह सीख भी याद आई जिसमें उन्होंने कहा था कि 'जीवन जैसा है वैसा रचो कोई सिद्धान्तबाज़ी उसमें मत घुसेड़ो!रचना से सिद्धान्त निकले वह स्वस्थ स्थिति है,किसी सिद्धांत की वेदी पर रचना को शहीद मत करो!'
ओम नागर प्रेम के नैसर्गिक कवि हैं,इसलिए वे उसके भावावेग को कहीं सेंसर नहीं करते।यहाँ तक कि रेल के खचाखच भरे तीसरे दर्ज़े के डिब्बे में भी 'नैनन ही नैनन में हुई रजामंदी' को भी ढूँढ लेते हैं।
'यहाँ रोज़ छूट ही जाता है कुछ न कुछ' के ग़म हैं तो 'तुम तो आत्मा में हो/आत्मा तो अजर-अमर है प्रिये' का आश्वासन भी।सूख गई जूड़े में टाँगी गेहूँ की बालियाँ जैसे देशज बिम्ब हैं तो परवीन शाकिर का 'खुश न था मुझसे बिछड़ कर वो भी/उसके चेहरे पे लिखा था लोगों' का कयास भी।कोरा कागज़ और नेल पॉलिश लगी अंगुलियों की नूरानी महक के साथ ही 'तुमने कुछ न कहा और मैं हो गया तुम्हारा' वाली मनुहार भरी कवायद भी।
जहाँ कवि हवा-बादल,धरती-आकाश,
नदी-समंदर,देह-साँस,आँख-रोशनी,छाँव-पेड़,प्यास-जल,
स्वाद-नमक,नींद-सपना,रेखाएँ-हथेली,कीचड़-कमल,ईश्वर-अर्चन,फल-दुआ, अँगुलियाँ-मुट्ठी,कान-प्रेम गीत,डोर-पतंग,काजल-पलक, नाक-खुशबू,कली-भँवरा, अंधेरा-दीपक,लोहा-पारस..जैसे 36 युगल रूपकों में जाता हुआ प्रेम का अनुबंध रचता है।
कवि ओम नागर की इस सुघर तुरपाई में फिर-फिर वे ही प्रेम के ढाई आखर हैं।फूल के सही खिलने का अंदाज़ न तितली को पता होता है न भँवरे को
जैसी प्रेम की सूक्ष्म व्यंजनाएँ हैं।एक लंबी साँस जो अभी-अभी भीतर गई/उसी का छोटा-सा उच्छवास है प्रेम-जैसे सूक्त-वचन हैं।'तुम्हारा साथ यूँ ही बना रहे सदा/तो पल में गुज़र जाएँ बरसों जैसे सिद्ध फार्मूले हैं।और कवि का उत्स यहीं से/जो नदी को दिखाता है समंदर की राह,काले तिल वाली लड़की
प्रेम बचा रहे दरम्यां/बची रहेगी पृथ्वी/आकाश भी बचा रहेगा धरती के मोह में,धरती के कान में कुछ कहने के बहाने बारिश की प्रेम पाती भिजवाता आकाश और समंदर से बाँथ भर मिलने को पहाड़ से मैदान की ओर दौड़ पड़ती नदी जैसे उदाहरण भी जिनके ज़रिए कवि ने प्रेम की तरल-सांद्र निगूढ़ व्यंजना को निरूपित किया है।
धुंध छँटने के बाद धूप बुनती अधेड़ महिला,जो
आज भी स्वेटर बुनने के धैर्य को बचाए हुए है, उजाले से अंधेरे को देखते हुए, सुबह जिस भी स्टेशन पहुँचेगी रेल वहाँ उजाला होगा जैसी उम्मीद, दुनिया के विष को कमतर करने की कोशिश में आज भी जुटे नीलकंठ से कवि-लेखक,धूप की फेरी से छँटता अंधेरा और घट-बढ़ रहा उजास,नए साल की रोटी में पुराने साल के नमक का स्वाद, फिर नमक की अधिक दिनों तक न टिकती स्मृति में बावजूद उसे चखने में लगने वाले बरसों के विरल काव्य अनुभवों को आप इस संग्रह गद्य की गली में टहलते पाएंगे।धर्म की बिना पर बंद होते शहर, ऐसे विडंबनाओं भरे समय मे भी होली के सुरंगे दिनों में सतरंगी इंद्रधनुष खिलाने की जिंदा ख्वाहिश,अपनी ही किसी कविता की तारीफ में आये वरिष्ठ कवि लीलाधर जगूड़ी के फोन की आत्मीय स्मृति तक से कविताएँ गूँथने का हुनर जानते हैं कवि ओमनागर।
कवि आज भी 'प्यार पर जब-जब भी पहरा हुआ है/प्यार उतना ही गहरा हुआ है, जैसे यकीन पर यकीन करता है।उसके यहाँ 'तुमने जैसे ही बात भर से छूना चाही मेरी देह/मेरी भुजाओं में उतर आईँ हजारों-हजार मछलियाँ' का जज्बा बचा है। उधड़े हुए दिल को वह आह भी नज़रों से रफ़ू करने के कौशल में विश्वास करता है।प्यार में बंजारा बने रहने की कवि ज़िद उसे फिर बसने,उजड़ने,फिर-फिर बसने के उसी पुराने सिलसिले की ओर ले जाती है।तेरी याद में कोई ख़त न लिखा जाएगा मुझसे अब,गुड्डे गुड़िया का खेल खेलते पड़ोस वाला लड़का और छोटी संदूक वाली लड़की का हँसना-रोना,बाईसा के बीरे से तारों की चूंदड़ी लाने का प्रचलित लोक अनुरोध और धूप की तुरपाई में निगोड़े इश्क वाले नमक की डिबिया को सनम की गली में फिर ले आने का निहुरा,पाँच पतासियाँ खाकर प्यार में दो दूनी पाँच होने का विरल अनुभव प्रेम में गणित न होने के बावजूद सारे का सारा गणित उसीसे सीखने का सलीका जैसा कितना कुछ है प्रेम के इस अनूठे कवि के यहाँ...
कवि ओमनागर के पिछले कविता-संग्रह 'विज्ञप्ति भर बारिश' की भूमिका में वरिष्ठ कवि राजेश जोशी ने लिखा था कि-गाँव की जमीनों पर भूमाफिया के कब्ज़े, बाज़ार से गाँव हाट तक पसरते पाँव,उधर
किसानों की आत्महत्याएँ, सूखते जलाशय जैसे हमारे समय में ये ऐसी आत्मीय कविता है जिसे अपनी देशज बोली-बानी से अटूट सम्बन्धों के बिना नहीं पाया जा सकता। लेकिन एक कवि का अनूठापन किसी दे दिए गए समकालीन अथवा पुराने ट्रेक के विरुद्ध जीवन के विविध अनुभवों की गली में गश्त करना और ज्हाँ पहुँच कर वह अपनी तरह से चीज़ों की फिर से शिनाख्त करना है।प्रेम की बारिश में बूंदों का कोरस गाते हुए कवि ओम नागर इस संग्रह में इश्क के समकालीन सेल्फ़ीनामा तक भी गए हैं।जहाँ 'हम न दरिया में डूबेंगे सनम' का अहद है तो 'कभी तेरी जन्नत का अंधेरा हो' कर प्यार का पूरे का पूरा इंद्रधनुध पाने की तलब भी।
कवि की भाषा का अनूठापन यहाँ यूपीयन हिंदी से इतर हाड़ौती के आत्मीय संस्पर्श से कविताएँ रचने में भी है।प्रेम जैसे आदिम आवेग को कवि ओम नागर ने यहाँ जिस ललित ललाम आत्मीय ढंग से रचा-सिरजा है-यक़ीनन वह रश्क करने जैसा है।

  

ओम नागर 
                                           
                      

ओम नागर
मोबा: 09460677638
ई-मेल: omnagaretv@gmail.com


Wednesday, April 24, 2019

नदी ,धरती और समंदर 
ऋतु जोशी 



ऋतु जोशी 




1
प्रेम एक वहम है
की तुम किसी के हो
और कोई तुम्हारा ...

2
प्रेम एक जिद्धी, बिगडैल, बेलगाम घोडा
नहीं सुनता किसी की भी बात

3
प्रेम गणित में कमजोर एक बच्चा
जो एक और एक जोड़ कर
बार बार एक ही लिख देता है






प्रेम की ऐसी अविरल परिभाषाएं पढने को मिलती है ऋतु जोशी के कविता संग्रह "नदी ,धरती और समंदर" में |
संग्रह में छोटी बड़ी कविताएँ अपनी बात पुरे असर से पाठक तक  पहुंचाने में सक्षम है |प्रेम में मिलना ही प्रेम नहीं होता ,प्रेम में रूठना भी प्रेम है तो शिकवा शिकायत भी प्रेम का  श्रृंगार करते है |विरह के क्षण प्रेम को घटाते नहीं बल्कि उद्दात वेग से मन को प्रेम  से आप्लावित कर देते है |प्रेम के विध रंग ...हर रंग में प्रेम प्रगाड़ता से मन में रचा रहता है और तब रची जाती  है प्रेम कविताएँ तो हर शब्द प्रेम का महाकाव्य प्रतीत होता है|

विज्ञान विषय की विद्धार्थी रही ऋतू जोशी कविता के बारे में कहती  है कि ”विज्ञानं तथ्यों के विश्लेषण के  संस्कार देता है लेकिन कविता तथ्यों के विश्लेष्ण से अधिक भावजगत में विचरण करती है|”

छपास सुख से परे आप कविता लिखने मात्र को सुखों का राजसूय पूरा होना मानती है |भावजगत में विचरती कवी सम्पूर्ण स्रष्टि में प्रेम के ठीये पर तनिक ठहर कर अपने सहज समर्पण के अद्दभुत कौशल  से अपनी कविताओं में  प्रेम मौक्तिक की आकर्षक माला पिरोती है |

कल रात अपने ख्वाब में
मै मिलने चली गई थी तुमसे
बतियाती रही
उस ख्वाब में तुमसे देर तक
कल रात
क्या तुम्हारे ख्वाब में
भी मै तुमसे मिलने आई थी ?

सवाल ...?? नहीं यह सवाल नहीं ,यह तो जिज्ञासा है कि प्रेम जितना डुबो रहा है मुझे ,तुम साथ तो हो न ....तिर जाने के लिए |







इतनी खाली सी क्यों हूँ मै?
तू बिन बोले
बिन बताये
भीतर से कहीं चला गया क्या ?

प्रेम जिन्दगी को मायने देता है ,प्रेम बिना कैसा होता जीवन

ये तो तुम हो
जिसने दे दिए
इस जिन्दगी को मायने
वरना सोचती हूँ
कितनी बोझिल और बेवजह गुजर जाती यह जिन्दगी |

क्या शब्दों में प्रेम पूरा व्यक्त हो पाया है ?जितना लिखा गया ,कहीं न कहीं कुछ छुट ही जाता है ...प्रेम पत्र पर लिखी एक मोहक कविता

यूँ तो कभी प्रेम पत्र
नहीं लिखा तुझे
पर अक्सर ये सोचती हूँ
जो लिखती भी
तो क्या लिखती ?
क्या प्रेम कभी शब्दों में पूरी तरह से
अभिव्यक्त हो सका है भला
बातों का अव्यक्त रह जाना तो
बहुत बड़ी कमजोरी रही है प्रेम की |







प्रेम कविताओ के साथ संग्रह की अन्य कविताएँ भी पाठक का हाथ पकड़ रोक लेती है |स्त्री कवि मन स्त्री विमर्श को कितना व्यक्त कर पाता है यह भी देखने की बात है |हालाँकि शब्द अधूरे है अभी पूरे स्त्री मन को लिखने में ...

एक पारम्परिक लीक पर चलती स्त्री उस लीक को तोड़ने को जीवन समझ ले तो उसके मन की उथल –पुथल को महसूस किया जा सकता है |वो नहीं करना चाहती सेवा ,समर्पण ..नहीं  निभाना चाहती  मर्यादा  के मापदंड |वर्जनाये रोकती है उसकी साँसे तब वो कुछ पल ही सही आज़ादी चाह पाल ही लेती है ...और यहाँ आवाज़ आती है उसके पावों में पड़ी अद्रश्य बेडियो के चटकने की....

तोड़ कर सब वर्जनाये
चाहती हूँ जीना एक दिन
लांघ कर सब अपेक्षित मर्यादाएं
चाहती हूँ एक दिन आज़ाद करना
बरसों से मेरे भीतर कैद उस स्त्री को
जिसके बाहर आने से
सब कुछ उलट पलट हो जाएगा |


शीर्षक कविता नदी ,धरती और समंदर में नदी का अल्ल्हड़पन,समन्दर की चंचलता को अपने धेर्य से समेटे हुए धरती अपने खुरदरेपन को तटस्थता से जीती है |जीवन का त्रिकोण है पर वह न समन्दर के सुख को कम करना चाहती न नदी की तरह सुबकना चाहती ,जिससे समन्दर खारा हो .....धरती धेर्य की पराकाष्ठा का  पाठ सिखाती है इसमें |
अच्छा संग्रह लगा ,शुभकामनाये



प्रवेश सोनी
कोटा ,राजस्थान                                                                               

Tuesday, April 16, 2019

मधु सक्सेना की कविताएँ 
संग्रह "एक मुठ्ठी प्रेम" 







अधूरे की पूर्णता 

अधूरी होती है हर कविता
हर गीत और ग़ज़ल भी

आखिरी पैरा कभी लिखा नही जाता
इंतज़ार होता है गीत के अंतिम बन्ध का
ग़ज़ल तरसती रहती अपने आखिरी शेर को

प्रेम के ये अद्भुत रूप
नही मिलते अंतिम छोर को
नही मिल पाता दूसरा किनारा

किनारे की बालू की नमी प्रेम का आरंभ
और मझधार डुबोने को आतुर
डूबने और उबरने से परे
क्षितिज पर उगा
रंगहीन चाप में एक रंग बन जाना होगा
अपूर्णता में पूर्णता को संवारना होगा

अपनी अधूरी रचना को
डबडबाई आँखों से निहार कर
भीच लेना कलेजे में
करके देखना ..
शायद यही प्रेम है ......




प्रेम का अंतिम चरण

जो मन मे था
वो कहाँ लिख पाई
बहती नदी का वेग ही सम्हालने में लगी रही
नदी के साथ ही बह जाती तो मुक्त हो जाती

तुम्हे सोचती रही ...आँखो में भरती रही
सारी आराधनाएं रीती रही
कह ही नही पाई

धरी रह गई प्रार्थनाएं
प्रेम में रहे को कुछ दिखता भी तो नही
ईश्वर को पा चुकी थी फिर भी खोजती रही ..

प्रेम के उद्दात्त उछाल में प्रफुल्लित हुई
पर डर भी गई थोड़ा सा ..
वक़्त के हाथों कसी हमारी डोर
ये तो पता है
पर नही पता प्रेम का अंतिम चरण

क्या होता है सबसे महत्वपूर्ण ?
क्या है सत्य ....
प्रेम को खुद में रख लेना या
प्रेम में खुद को रख देना......?





खबर

खबरों का अलग ही होता है
अपना वज़न
कभी, बिना हाथ पैर लिए
उड़ पड़ती है हवा की तरह
इतिहास बदलती, कभी भूगोल ....

सतयुग से लेकर कलयुग तक
खबरों ने लड़ी लड़ाइयां
खबरों ने ही मारा रावण को
पन्ना धाय ने उजाड़ दी अपनी कोख
मीरा पी गई विष
चिनाब की गोद मे सो गई सोहणी
क्लाइव की मुठ्ठी में आया बंगाल ....

खबरों ने ही घर तोड़े
अपनों को किया बेगाना
बच्चे बेधर हुए और
आनन्द धाम के बहे आँसूं

खबरों में ही सांई बाबा की तस्वीर रोई
गणेशजी पी गए दूध
इंसान बन गए ईश्वर
बार बार बनी बिगड़ी धर्म की परिभाषा ..

खबरों की खबर कौन ले
सच झूठ को कौन आंके
बिना जड़ के फैली इस अमरबेल का
मुश्किल है सच जानना ..


पर सच तो कुनमुनाता है
खोज रहा बाहर आने की राह ..

कविता ही पाएगी खबर का सच
कभी मासूम बनकर
कभी आक्रोशित होकर.
थाम लेगी हाथ
जकड़ लेगी पांव ..

हृदय की शिराओं में बहते हुए
दे देगी सांत्वना
अपने विस्तृत आकाश में चमक भर
उतार रही धरती तक
उम्मीद की एक सरल रेखा ...

..दोस्तों ...!!
ये मात्र खबर नही सच है ......





कहीं ऐसा हो जाए तो 

बाज़ार में कहीं से मार्क्स आकर
पूछ बैठे हालचाल मज़दूरों का
बाबा नागार्जुन की लताड़ से
सहम जाएं सब अचानक

धूमिल डांटने लगे जोर से
पाश पूछ बैठे लड़ाई और सपनों के बारे में
दुष्यंत आकर छेड़ दे गज़लों की बात...

ये सच हो जाय तो ..?

शब्द साथ छोड़ देगें
उत्तर उखड़ने लगेगें
मूंछ पर ताव देने वाले
हाथ नीचे कर लेगें ।
कितने कवि कान पकड़ कर
माफी मांगने लगेगें ....

ये असम्भव सी बात
सम्भव हो जाये
ये दुनिया पलट जाए
उससे पहले ही
जाग जाना कवि ...

जाग जाग कर सबको
जगा जाना कवि .....




 अधूरे की पूर्णता 

अधूरी होती है हर कविता
हर गीत और ग़ज़ल भी

आखिरी पैरा कभी लिखा नही जाता
इंतज़ार होता है गीत के अंतिम बन्ध का
ग़ज़ल तरसती रहती अपने आखिरी शेर को

प्रेम के ये अद्भुत रूप
नही मिलते अंतिम छोर को
नही मिल पाता दूसरा किनारा

किनारे की बालू की नमी प्रेम का आरंभ
और मझधार डुबोने को आतुर
डूबने और उबरने से परे
क्षितिज पर उगा
रंगहीन चाप में एक रंग बन जाना होगा
अपूर्णता में पूर्णता को संवारना होगा

अपनी अधूरी रचना को
डबडबाई आँखों से निहार कर
भीच लेना कलेजे में
करके देखना ..
शायद यही प्रेम है ......




प्रेम का अंतिम चरण 

जो मन मे था
वो कहाँ लिख पाई
बहती नदी का वेग ही सम्हालने में लगी रही
नदी के साथ ही बह जाती तो मुक्त हो जाती

तुम्हे सोचती रही ...आँखो में भरती रही
सारी आराधनाएं रीती रही
कह ही नही पाई

धरी रह गई प्रार्थनाएं
प्रेम में रहे को कुछ दिखता भी तो नही
ईश्वर को पा चुकी थी फिर भी खोजती रही ..

प्रेम के उद्दात्त उछाल में प्रफुल्लित हुई
पर डर भी गई थोड़ा सा ..
वक़्त के हाथों कसी हमारी डोर
ये तो पता है
पर नही पता प्रेम का अंतिम चरण

क्या होता है सबसे महत्वपूर्ण ?
क्या है सत्य ....
प्रेम को खुद में रख लेना या
प्रेम में खुद को रख देना......?





मधु सक्सेना 




परिचय-
श्रीमती मधु सक्सेना 
जन्म- खांचरोद जिला उज्जैन मध्यप्रदेश
कला , विधि और पत्रकारिता में स्नातक ।
हिंदी साहित्य में विशारद ।
प्रकाशन (1) मन माटी के अंकुर (2) तुम्हारे जाने के बाद ( 3 ) एक मुट्ठी प्रेम ।सब काव्य संग्रह है ।
आकाशवाणी से रचनाओं का प्रसारण 
मंचो पर काव्य पाठ ,कई साझा सग्रह में कविताएँ ।विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशन ।सरगुजा और बस्तर में साहित्य समितियों की स्थापना । हिंदी कार्यक्रमों में कई देशों की यात्रायें ।
सम्मान..(1).नव लेखन ..(2)..शब्द माधुरी (3).रंजन कलश शिव सम्मान (4) सुभद्रा कुमारी चौहान सम्मान (5) प्रोफे. ललित मोहन श्रीवास्तव सम्मान - 2018 ......
 पता .. सचिन सक्सेना H -3 ,व्ही आई पी सिटी, उरकुरा रोड ,सड्डू  रायपुर (छत्तीसगढ़ )पिन -492-007  मेल - saxenamadhu24@gmail. Com फोन .9516089571


प्रस्तुत कविताएँ "साहित्य की बात " वाट्स अप समूह पर ब्रज श्रीवास्तव जी द्वारा लगाईं  गई 
इन्हें पाठकों द्वारा  खूब पसंद किया गया |

पाठकीय प्रतिक्रियाएं 

Shikha Tiwari
बहुत सुन्दर कविताएं हैं। कोई एक चुनना कठिन है। सभी ने प्रभावित किया है।
कहीं ऐसा हो जाए तो शीर्षक कविता बिल्कुल अलहदा है।
सच में ऐसा हो गया तो...।



 नीता श्रीवास्तव: 
एक मुट्ठी प्रेम
द्वारा मधु सक्सेना

प्रतीक्षारत काव्यसंग्रह 'एक मुट्ठी प्रेम' मधु जी ने मुस्कुराते हुए यूं थमाया मेरे हाथ में जैसे सारे जहां का प्यार मुझ पर उड़ेल दिया हो और मैं अभिभूत हो गई |
इस काव्य संग्रह में प्रवाहमयी और संवेदनाओं को गहराई तक स्पर्श करने की क्षमता रखने वाली 104 रचनाएं हैं जहां हर एक रचना पढ़ कर यूं प्रतीत हुआ कि कवियित्री के ही जीवन के पृष्ठ खुले हैं या हम में से ही किसी के जीवन की कथा या व्यथा है |
समीक्षा करने का सामर्थ नहीं पर पढ़कर कुछ कहने को मन बेताब हुआ तो आपको अपनी बात सौंप रही हूँ |
मधु जी शब्दों के ताने बाने से रच कर रोशनाई के उजाले से कविताओं के रूप में अपनी स्मृतियों की गठरी से एक मुट्ठी प्रेम निकालकर बिखेर देती है कोरे कागज पर,जहां पर कभी कोई कविता फूलों पर बिखरी ओस  की नमी से पाठकों को भिगोती है तो कभी झील के रुमाल पर चांद का कशीदा टांक कर हतप्रभ कर देती है
      यूं तो मधु जी की सभी रचनाएं प्रेम और स्मृति से जुड़ी है जो कभी घर परिवार और समाज में नारी पर होते अन्याय पर कटाक्ष के रूप में है जहां उनका विरोध ना कर पाने का अफसोस समाया है |
जैसे 'मैं लिखूंगी जरूर' रचना में अंत में चुप्पी के खिलाफ लिखने का निर्णय भले ही छूट जाए मेरे अपने |
एक रचना 'अलाव' जहां अलाव  सेंकते  दादू के अलिफ लैला, अकबर बीरबल के किस्से, और आल्हा की तान, रसिया काआलाप में  नींद भी आंखों के बदले अलाव  किनारे बैठ जाती किस्से सुनने |
किसी ने सोचा नहीं था कभी कोई तकनीक और शहर बुझा देंगे सारे अलाव और दफन कर देंगे किस्सों की दुनिया |
 वाह लाजवाब सोच|
समाज की विसंगतियों से आहत मन आक्रोश उगलने बेताब दिखता है जैसे 'क्या लिखूं ' कविता में क्या होगा लिखकर- फिर जाने कितने बच्चे भीख मांगेंगे पता नहीं, निर्भया को न्याय मिलेगा या नहीं खेतों में फसलों के बदले लाश मिलेगी किसान की -उफ़ इतना दर्द?   कभी उनकी रचनाओं में प्रकृति के मानवीय भावों का अकूत खजाना मिलता है तो कभी बड़ी, पापड़, सत्तू की खुशबू और कहीं अंतर्मन में निखालिस प्रेम की टोह|
बढ़ती उम्र में भी मन की जमीन पर उगी नन्हीं कोंपलों से टपकता बचपन उड़ना चाहता है किलकार करना चाहता है मगर बार-बार सुनती है  'इस उम्र में क्या करोगी'?
 समझ नहीं आता क्या साठ के बाद करने को कुछ नहीं होता? एक प्रश्न परिवार से समाज से--
मधु जी कहीं चीले पकौड़े और भुट्टे की सुगंध में अपनी स्मृतियां तलाशती  हैं तो कहीं चांद, सूरज, झील,नदिया केअलौकिक सौंदर्य को गढ़ कर  विम्ब  के माध्यम से नया आकार प्रस्तुत करने से भी नहीं चूकती|
सबसे अधिक दिल को छू लेने वाली रचना जहां एक स्त्री के दर्द की पराकाष्ठा है
वह है 'सरहद'
जहां स्त्री समाप्त होती नदी के अस्तित्व की तरह कुछ बूंद आंखों में भर कर चार बाय छह के पलंग पर सिमटी सिकुड़ी इंतजार कर रही है अपनी पूरी तरह सूखने का |
 फलना फूलना और  सूख जाना यूं तो नियति है
 पर सदा रहेगा एक मुट्ठी प्रेम,
अंजुरी भर साध,
बूँद  भर करुणा ,
ये राह और दो पाँव
और यह कवियित्री की केंद्रीय रचना है संग्रह का नामकरण इसी से हुआ है  जहां से गुजरते हुए कथ्य के वैविध्य के एहसास के साथ गहन विम्ब और स्वाभाविक भाषा में डूबने उतराने का आनंद प्राप्त हुआ|
 इस संग्रह में गुजरते लम्हों को महसूसते हुए महीन कशीदाकारी ने एक ऐसी फुलवारी प्रस्तुत की है जहां पतझड़ के पेंतरों से बचते हुए अभिसार के गुलाबी रंगों के चटखने का इंतजार है|
 मधु जी के …



 Uday Basant Dholi:
सभी कविताएँ एक से बढ़कर एक हैं।
कहीं ऐसा हो जाए तो,और अधूरे की पूर्णता बहुत ही अच्छी लगीं प्रेम का अंतिम चरण में में जो प्रश्न उठाया है वह शाश्वत अनुत्तरित प्रश्न है।संवेदना से परिपूर्ण कविताएँ मन को छूने का सामर्थ्य रखती हैं।


 Aannd Saurabh:
 तुम्हारे जाने के बाद एक मुट्ठी भर प्रेम का जन्म लेना
निश्चित रूप से जीवन के सुख-दुख के बीच की कहानी को बयान करती कविताएं
स्त्री के संसार को बहुत ही बेबाकी से कह देना चाहती हैं
आदरणीय मधुर सक्सेना दी की प्रत्येक कविताओं में स्त्री विमर्श देखने को मिलता है
वास्तविक आत्म संघर्ष और एहसास का एक सघन अनुभव उनके एक मुट्ठी भर प्रेम में पाया गया है.

आज पटल पर प्रस्तुत कविता का शीर्षक अधूरे की पूर्णता अंदर से एक कौतूहल जगाता है वास्तव में यह कविता प्रेम को एक नई परिभाषा में परिमार्जित कर रही है
"प्रेम का अंतिम चरण" कहीं न कहीं मंजिल पा ही लेता है .
ईश्वर को पा चुकी थी फिर भी खोजती रही इन पंक्तियों ने मुझे अंदर से प्रभावित कर दिया
 उत्कृष्ट लेखन है आपका.
खबर शीर्षक की कविता बहुत ही मार्मिक और विचारोत्तेजक है
 अंधविश्वास पर कटाक्ष करती सामाजिक रूढ़ियों पर करारा प्रहार है
"कहीं ऐसा हो जाए" जरूर हो सकता है आप ऐसे ही समाज को बदलने वाली अपनी कविताओं से
 लोगों की सोच बदलने में कामयाब होंगी.
कुल मिलाकर कह सकता हूं कि
 अनावश्यक सनसनी और उत्तेजना उत्पन्न किए बगैर आप बहुत ही सरलता पूर्वक पाठक के हृदय तक पहुंचने में कामयाब हो जाती हैं.

मधु दीदी आपको इस संग्रह के लिए बहुत-बहुत बधाई एवं शुभकामनाएं
आपका लेखन उच्च कोटि का है
 पटल पर कविता प्रस्तुत करने के लिए आदरणीय  ब्रज श्रीवास्तव सर को बहुत-बहुत बधाई




सुरेन्द्र रघुवंशी 
मधु सक्सेना की कविताएं स्त्री मन की स्वाभाविक अभिव्यक्ति हैं। स्त्री जीवन के तमाम जाल इन कविताओं में हूबहू आये हैं। "साहित्य समाज का दर्पण है " इससे पहले वह रचनाकार का अपना दर्पण भी है जिसमें वह स्वयं अपना अक्स देखता और दिखाता भी है। मधु सक्सेना की ये कविताएँ अपनी और स्त्री जीवन और दिनचर्या की प्रतिध्वनि हैं। एक स्त्री का विस्थापन आजीवन चलता है और अघोषित रूप से वह पुरुष संसार से कहीं न कहीं बहिष्कृत कर दी जाती रही है। इसी बहिष्कार और दुनियाबी डबल स्टैंडर्ड से अभी तक स्त्री को मुक्ति नहीं मिल पाई है। इसी चोट के निशान स्त्री की कविताओं में बार-बार देखने को मिलते हैं। उसके भीतर कोई  अदृश्य गहरा घाव है जो निरन्तर रिसता रहता है। इसी सत्य पर सुनवाई करते हुए निर्णय में हमें पुरुष वर्चस्ववादी दुनिया को पाखण्डी और स्त्री के प्रति अन्यायी कहना होगा। मधु सक्सेना की कविता यात्रा परिष्कार और व्यंजनात्मक  परिपक्वता की माँग करती है। यहां अपेक्षाकृत और मुखरता और विद्रोह की जरूरत है। एक अनावश्यक पारम्परिकता का पुरातन मधु सक्सेना के कविता सृजन और पाठ में बाधक है। उम्मीद है वे जिस तरह कविता और जीवन में आगे बढ़ी हैं उसी तरह उनकी यह कविता यात्रा और भी आगे जायेगी।                     
 - सुरेन्द्र रघुवंशी





 Sunita Pathak: 
एक मुट्ठी प्रेम
मुट्ठी भर कहां है
समन्दर की तरह असीमित प्रेम को समेटे ये रचनाएंअपने साथ धीमे धीमे बहने को प्रेरित करती हैं

अधूरे की पूर्णता
कविता ने तो प्रेम का पूरा विस्तार ही प्रस्तुत कर दिया है
और अंतिम पंक्ति ने सारा सत्य सामने रख दिया है

अपनी अधूरी रचना को डबडबाई आंखों से निहार कभींच लेना कलेजे में
करके देखना
शायद यही प्रेम है
वाह बहुत खूब
और अंतिम चरण में
सत्य की खोज
प्रेम को खुद में रख लेना
या प्रेम में खुद को रख लेना

क्या बात है
प्रेम में जी भर जी लिए
खबरों में सारी दुनिया समाई है
नीरा श्रीवास्तव की समीक्षा ने
संग्रह को प्राप्त करने के लिए लालायित कर दिया


Vijay Panjwani:
मुझे भी लगता है कि इधर मधु जी ने
कविता की बुनावट पर बहुत ध्यान दिया है । यह दिल से की गई तारीफ़ है
रस्मन नहीँ । आज प्रस्तुत कविताओं में
" प्रेम का अन्तिम चरण " और
" ख़बर " कविताएँ भायीं ।


 Kumar Suresh: 
मधु जी की कविताएँ पढ़ कर अच्छा लगा । लगा जैसे ये वही कविताएँ हैं जो मेरे भीतर अनुगूँज करती हैं। शायद मेरी कविताओं में कहीं ऐसा ही कुछ होगा भी।
पहली ही कविता ने मन को पकड़ लिया । वस्तुतः सत्य कभी कहा नहीं जा सकता । यह संभव नहीं है । हम जो कुछ भी अनुभव करते हैं वस्तुतः वो भाव या अनुभव या अहसास होता है । शब्द उस भाव को अभिव्यक्त करने का हमेषा माध्यम ही होते हैं लेकिन वो पूरी तरह से अभिव्यक्त कभी नहीं कर पाते। कर भी नहीं सकते । यह वैसे ही है जैसे कि जिसने खीर नहीं चखी वह खीर को शब्दों से कभी नहीं समझ सकता । उसे समझाया भी नहीं जा सकता । जिसने खीर चखी है वो बार बार समझाने की कोशिश करेगा । कहेगा कि खीर मीठी होती है । पतली होती है । स्वादिष्ट होती है । लेकिन कहने वाले और सुनने वाले में हमेशा ही समझ का भेद बना रहेगा । कहने वाले को हमेषा लगेगा कि वो ठीक से कह नहीं पाया । उसकी कहन अधूरी है । कवि को हमेशा अपूर्णता में पूर्णता को संवारना होता है । और प्रेेेम करके और खीर खा के ही जानी जा सकती है । वाह ।
मेरी एक कविता का अंतिम भाग है -
‘‘मनुष्य होने की गरिमा से परिपूर्ण
आधा अधूरा हूँ मैं
हमेशा पूरा होने की कोशिश करता हुआ । ’’
यही पूर्णता की तलाश ही किसी इंसान  को कवि बनाती है ।

दूसरी कविता प्रेम का अंतिम चरण  पहली कविता का ही विस्तार है ।
कमोबेश मैंने भी अपनी कविताओं में इन्हीं प्रष्नों से मुठभेड़ की कोशिश की है -
‘शापित है यह खेल
भुगतनी होती है
खो देने की पीड़ा
खेल कर ही चलता है पता
संभव नहीं
कुछ भी पूरी तरह पाना। ’’
मुझे यह कहने के लिये मधु जी माफ करें कि अगली कविता ‘खबर’ अपनी बनक और विषय वस्तु में पृथक होने के बावजूद कवि की वही सत्य कह पाने की ललक लिये हुये है। ये जरूर है कि जो कहना है वो अब रूहानी नहीं दुनियावी है । उनका कहना है कि अगर सच कहा ही जाना है तो खबर नहीं कविता ही इस सच को अधिक सक्षमता से संप्रेषित कर सकती है ।
आखिरी कविता कव कर्म में आ गयी कथनी और करनी में अंतर को रेखाकिंत करते हुये कवि से सत्य के ही अन्वेषण का अनुरोध करती है ।
सत्य को संप्रेषित करने की प्रखर इच्छा से भरी सुंदर कविताओं के लिये मधु जी को बधाई ।
 यह कहना छूट गया कि इन कविताओं को लिखने वाले कवि मेँ दर्शन के प्रति जरूर गहरा रुझान होना चाहिए । इन कविताओं का आस्वाद स्त्री विमर्श कि द्रष्टि से न लेकर मनुष्य मात्र के विमर्श से ही लिया जा सकता है।




Anil Kumar Sharma:
एक मुठ्ठी प्रेम 💐
मधु जी की इस पुस्तक के विमोचन समारोह मे शामिल हुआ । बोधि प्रकाशन से पुस्तक ख़रीद कर उस पर महान लेखिका के हस्ताक्षर लिये । सुखद लगा मधु जी से मिलकर
प्रेम ,वह भी सिर्फ़ ,एक मुठ्ठी

बहुत ईमानदारी से मधु जी ने अपने उद्गगार के नग कविताओं के आभूषणों में जड़े हैं ।
प्रेम को इतनी ख़ूबसूरत तरीक़े से परोसना , लेखिका के पाक- विद्या में दक्ष होने का द्योतक है।सच में प्रेममय हो गया रोम रोम 🙏प्रेम भी एक मुट्ठी लिया
सही किया ,बाक़ी प्रेमियों के लिये छोड़ना ईमानदारी है
गम्भीर बात को इतनी सरलता से कहना कि समझने मे तनिक भी मेहनत न करनी पड़े ,कविताओं की विशेषता है
भूत को वर्तमान मे रचकर भविष्य के लेखन के लिये लेखक /कवियों को सावधान करना सराहनीय है ।
सिर व पैर नहीं होते खबर के  लेकिन जब चलती है तो हवा भी पीछे रह जाये , खबर की खबर तो बस खबर ही ले सकी है बाक़ी तो सब अफ़वाह है ।
पूर्णता को प्राप्त हो जाना बिरलों को ही नसीब है ,एक अधूरी सी जिदंगी जी कर ही तो चले जाना होता है दुनिया से
प्रेम,दर्शन के साथ आयना दिखाती हुई कवितायें हैं




ज्योति खरे 
 मधु जी की मन को छूती कवितायें हैं
मुठ्ठी भर प्रेम को मधु जी ने अपनी कविताओं के माध्यम से सागर जैसी गहराई दी है और सागर जैसा गंभीरता भी , जिसमे पाठक डूब जाता है गहरे तक.
मधु जी को बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएं💐🌸🙏🙏




सुदर्शन  शर्मा :
शानदार कविताएं।बधाई मधु जी।

प्रेम को ख़ुद में रख लेना या प्रेम में ख़ुद में रख लेना  दोनों ही जगह एकात्मकता है,दोनों ही सत्य हैं और जो कविता यह गूढ़ प्रश्न उठाए वो भी सत्य।
हर युग में कविता के कंधों पर हस्तक्षेप का भार होता है। ये मात्र ख़बर नहीं सच है
कहीं ऐसा हो जाये सशक्त कविता।ज़रूरी विमर्श। बहुत पसंद आयी साधुवाद।



 Anita Manda:
 बहुत समय बाद संवेदनशील कविताएँ पढ़ी। मधु दी एक समर्थ कवि हैं, इनके एक काव्य संग्रह से गुज़र चुकी हूँ।
ये कविताएँ भी स्मृति में थी।
स्मृति में रह जाना ही बहुत कुछ कह देता है।
बहुत बधाई इस पुस्तक के लिए। ख़ूब सारी शुभकामनाएँ। रचते रहें।


Sudhir Deshpande 
हम कब पूर्ण हुए हैं। हर बार बाकी रह ही जाता है कुछ कहना। हर बार कोई इच्छा अधूरी ही रह जाती है। ज़िंदगी एक कविता एक ग़ज़ल एक गीत ही तो है। वहीं वे प्रेम को पूर्णता का पर्याय कह देती है। सच ही तो है प्रेम के वशीभूत व्यक्ति के उहापोह और प्राप्ति के बाद का आनंद उसी पूर्णता की अनुभूति देता है।



 Pravesh Soni: 
मधु और उसकी कविताएं दोनों एक दूसरे में गूथे हुए प्रेम के भाव है ।एक मुट्ठी प्रेम  जीवन में बचा रहे तो ऐसी ही सार्थक कविताओं की परिभाषा गढ़ता है ।

संग्रह हाथ मे है ,सुबह से इन कविताओं से गुजर रही हूं ।प्रेम की ऐसी अनुभूति इन कविताओं में पाती हूं जो बरबस जीवन दर्शन का सार समझा देती है ।

अक्सर  प्रेम में पूर्ण पाने  की अधीरता प्रेम को शून्य कर देती है जबकि अपूर्णता ही प्रेम को बचाये रखती है ।
एक मुट्ठी रेत हाथ से फिसल कर जीवन का अर्थ समझा देती है वही मुठ्ठी भर प्रेम मन को भर भर देता है ।

मधु के लेखन की विशेषता है वो एक शब्द को लेकर उसके समस्त भाव रच देती है ।और एक भाव को अनेक शब्दों की बंदिश में रख देती है ।प्रथम संग्रह तुम्हारे जाने के बाद की सृजन यात्रा से गुजर कर हैरान थी कि कोई विछोह को कितना और किस किस शब्दों से व्यक्त कर सकता है ,यह अनूठापन उन सब कविताओं को पढ़ते हुए महसूस हुआ था ।

कभी कभी इसकी कविताओं की प्रथम पाठक बन जाती हूं ,तब इसकी सृजनशीलता की गहराई मुझे भी अपने मे डुबो लेती है ।प्रतीक  और बिम्ब कविताओं की साज-सज्जा एक सधे शिल्पकार की तरह करते है ।

गर्व होता है कि मैं इसकी अजीज दोस्त हूं और यह मेरी  काव्य गुरु है ।
इसके जैसा लिखने की बहुत तमन्ना है दिल मे ।

शुभकामनाएं सखी ,लिखती रह 😍🌹


Naresh Agrawal:
मधु जी की सारी कविताएं बहुत ही सुंदर है, ज्ञानवर्धक हैं एवं मन को छूने वाली हैं।

 चाहे यह अधूरे की पूर्णता हो या प्रेम का अंतिम चरण खबर हो या अंतिम कविता कहीं ऐसा हो जाए तो।
इन सारी कविताओं में एक वरिष्ठ कवि की झलक मिलती है जो कि निश्चित रूप से मधु जी हैं और इन कविताओं को पढ़ने के बाद मुझे प्रेरणा मिली कि मैं उनकी पुस्तकों को अमेजॉन से  प्राप्त करूं, जिसके लिए मैंने उनको ऑर्डर दिया और उन्होंने यह पुस्तकें मुझे भेज भी दी है। शायद तीन-चार दिनों में मिल भी जाए।

 यह बड़े आश्चर्य की बात है कि इस विदिशा जैसी छोटी सी जगह में भी एक से एक बड़े कवि हैं, जैसे आदरणीय मणि मोहन जी, ब्रज जी, अखिलेश श्रीवास्तव, मधु जी आदि आदि ।

मैंने ब्रज जी की पुस्तकों को भी मंगाया है और मणि मोहन जी की और अखिलेश की पुस्तक तो मुझे पहले ही मिल चुकी है।

 मुझे बहुत खुशी होगी अगर आपलोगों की कविताएं देश में प्रकाशित सारी पत्रिकाओं में छपती रहे ताकि आप जैसे विद्वानों को सभी  लोग जान सके। बहुत-बहुत धन्यवाद इतनी सुंदर कविताएं पढ़वाने के लिए।🙏🙏🙏



Archana Naidu:
 एक मुट्ठी प्रेम ।
जितना गूढ़ शीर्षक उतनी ही गहराई।
मधु दीदी  ने कविताओं को जी भर जिया है ,क्योकि वे खुद प्रेम की गहराई में डूब कर लिखती हैं। खूबसूरत ,परिपक्व और खूब मंझी हुई कलम है दीदी की। जहाँ हर शब्द मोती है हर भाव पारस हैं ।एक छोटा सा मेरा भी सलाम ।गर्व होता है हम आपके स्नेह से बंधे है ।
अभी ट्रेलर देखा है पूरी पिक्चर अभी बाकी हैं । क्योकि हम अभी भी नर्सरी में ही है ।
दीदी  बहुत दूर तक ले जायेंगी ये कविताये ।हमारी भी शुभकामनाये ।🙏🙏🙏🙏🙏


हरगोविंद मैथिल 
आज पटल पर प्रस्तुत कविताएँ  मधु सक्सेना जी के सद्य प्रकाशित कविता संग्रह एक मुट्ठी प्रेम से चुने हुए नायाब मोती हैं ।
इनकी खूबसूरती यह है कि ये बहुत ही मार्मिक और संवेदनशील है तथा पाठक के अंतस तक अपनी चमक बिखेर कर उसे आलोकित करते हैं ।




बबिता
 अपने अंद र की  अनुभूतियों, अनुगूँज को शब्दों के मोतियों में पिरोकर, अवतरित कविताये,प्रेम आकंठ में डूबी,दुःख-सुख की नदी में डूबती-उतराती
प्रेम की पूर्णता-अपूर्णता की यथार्थपरकता का परिलक्षित करना अद्भुत प्रतीकात्मक  शब्दों से सृजन
वक्त के हाथों कसी डोरी,धरी रह गई  प्रार्थनाएं, भींच लेना कलेजे में ,सब कुछ कह देते हैं जीवन दर्शन का

खबरों की व्यापक, विश्लेषणात्मक सूचना
सही हैं खबर ने ही रावण मारा और खबरें ही अंधविश्वास फैलाने की घनी सूचक,लेकिन यह भी सच हैं, झूठ के पाँव नहीं होते,सो सट जानने को कुलबुलाती हैं, झकझोर देती है,खबरों की खबर लेने पर ही चैन की सांस मिलती हैं, फिर स्त्रोत कविता ही क्यों न हो ।

अंतिम कविता, समाज की विसंगतियों पर अपनी बात कहने वाले सुधारक मार्क्स हो या धूमिल  या नागार्जुन या दुष्यंत  आकर पूछ बैठे तो बस हब की खटिया खड़ी हो जाये इससे पूर्व चेतावनी देती कवियों की।
बेहतरीन कविताओं को पढवाने के लिए धन्यवाद ब्रज सरजी
बधाई  मधु दी।



ज्योति गजभिये 
 एक मुट्ठी प्रेम ने तो सर से पाँव तक भिंगो दिया | प्रेम के विविध स्वरूप हैं | अपूर्णता में पूर्णता खोजना, प्रेम का सत्य इत्यादि बातें दर्शन उत्पन्न करती हैं | किताब भी मैं एक दिन में पढ़ गई थी | सुंदर कविताएँ ! बधाई मधु जी ! धन्यवाद ब्रज जी



 Mustafa Khan: 8871447166
   मधु सक्सेना जी की कविताएं अपने समय के सुख-दुःख का सीधा सरल बयान है ।
    अधूरे की पूर्णता - अधूरी होती है हर कविता जैसे कोई ज़िंदगी रह जाती अधूरी,पूरी का कोई समय तय नहीं ।
   प्रेम का अंतिम चरण- बहुत कुछ अधूरा रहा जो मन में रह अलिखा रह गया इच्छाएं शेष रह गईं ।अंतिम दोनों बातें महत्वपूर्ण हैं।
   ख़बर - याद आया कि ,
कभी कहा न किसी से तेरे फसाने को न जाने कैसे ख़बर हो गई ज़माने को ।
 पर सच तो कुनमुनाता है ।
     कहीं ऐसा हो जाए तो- जग जाना कवि /जाग जाग कर सबको/ जगा जाना कवि,,,,।
    उल्लेखनीय कविताएं ,बधाई मधु जी ।आभार प्रस्तुति व संचालन ।

नयना कानिटकर : बहुत स्वाभाविक कविताएँ हैं मधु जी. स्त्री मन को बखूबी अपने शब्दों में रचती हुई. बहुत अच्छी कविताएँ

वनिता बाजपाई:
बहुत अच्छी कविताएं
मधु जी अपने समय की महत्वपूर्ण रचनाकार हैं जो दुनिया को देखने का विरल अंदाज रखती हैं , प्रस्तुत सभी कविताएं इस बात का उदाहरण हैं
बार बार पढ़ने को जी चाहता है



राजेन्द्र श्रीवास्तव 
मधु जी की यह कविताएँ संवेदनाओं की सरिता जैसी हैं। हल्के से उद्दीपन  मात्र से भावनाओं के उद्दीप्त बर्तुल विस्तार पाने लगते हैं। कहीं स्पष्ट व मुखर तो कहीं अव्यक्त वेदना पाठक अनुभूत कर सकता है।
 प्रेम को अलग अलग तरह से अभिव्यक्त करती कोमल स्वर की कविताएँ तो हैं ही, 'खबर..' जैसी कविता भी पाठक को आगाह सी करती लगती है।
ब्रज जी के सोजन्य से कुछ दिन पहले 'एक मुठ्ठी प्रेम' की एक प्रति पा गया हूँ।
क्रमशः पाठ जारी है।
मुझे विश्वास है, यह संग्रह सुधी पाठकों से भरपूर सराहना व अपेक्षित प्रतिसाद प्राप्त करेगा।
बहुत बहुत बधाई





Sunday, February 17, 2019


अनुदित कविताएँ

अनुवाद कंचन लता  जायसवाल 


कंचन लता जायसवाल 




हजारों सालों में...

हजारों सालों में कुछ भी शेष नहीं बचेगा
वह सब कुछ जो इस शताब्दी में लिखा जा चुका है।

वे ढीले वाक्यों,खो चुकी स्त्रियों के चिन्हों,
गतिहीन बच्चों के हिस्सों को पढेंगे।
बस तुम्हारी मंद हरी आंखें
मौजूद नहीं होंगी।
यह यूनानी पौराणिक  कथाओं की तरह होगा
लेकिन फिर भी बहुत अलग।
जैसे जाड़े में समन्दर के किनारे
किसी दूसरे आश्चर्य, किसी दूसरे उदासियों के लिए।


राबर्टो  बोलानो





अब तुम अकेले....

अब तुम बार्सिलोना के घाटों के साथ
अकेले टहलते हो।
तुम एक ब्लैक सिगरेट  पीते  हो और
एक क्षण के लिए सोचते  हो, अगर बारिश होती
तो कितना अच्छा  होता।
ईश्वर ने तुम्हें धन नहीं दिया है
लेकिन उन्होंने तुम्हें अनोखी  इच्छा  शक्ति दी है।
ऊपर देखो
बारिश हो रही है। 

राबर्टो  बोलानो






विधवाओं  के बारे मे...

विधवाओं, त्याग दिए गए लोगों, बुजुर्गों,
विकलांगों, विक्षिप्तों के बारे में लिखते हुए।
महान युद्धों और महान कारोबारों के पीछे
जिससे यह संसार चलता है- वहीं ये भी हैं।
रोजमर्रा के जीवन जीते हुए, कर्जे लेते हुए,
नन्हे लाल धब्बों को पढते हुए
हमारे शहरों के,
हमारे खेलों के,
हमारे गीतों के।


राबर्टो बोलान्यो







अकेलापन


क्या यह तुम्हे खुश करता है कि मैं प्रथम  पुरुष  मे लिखता हूँ।
क्या यह तुम्हें  खुश करता है कि  मैं कभी कभी कहता  हूँ
कि अगले  सौ सालों  में हम बिल्कुल  अकेले होंगे।
मैं  तुम्हारे बारे में
कुछ  नहीं  जानता  हूँ  सिवाय  इसके  कि
तुम  मेरी  बहन हो।
बारियोगाटिको* के ठंडे घरों में
कभी  कभी बारिश  की  आवाज  सुनते हुए
या चूमते हुए
या  दर्पण के सामने  चेहरे  बनाते  हुए।


राबर्टो बोलान्यो






दुःस्वप्न    की शुरुआत वहाँ से होती है.....

दुःस्वप्न की शुरुआत  वहीं से होती  है, ठीक वहीं से।
आगे की, ऊपर नीचे,  सब  कुछ दुःस्वप्न  के  हिस्से  हैं।
उस  अस्थि  कलश से  अपने  हाथ  मत  सटाओ।
उस  नरकीय गुलदस्ते  से  अपने  हाथ  मत  सटाओ।
उस  जगह  जहाँ  दुःस्वप्न  की  शुरुआत  होती  है  और वहां
तुम  कुछ  भी  करते  हो  वह तुम्हारी  पीठ  पर  कूबड़  की  तरह उगेगा।
दूर रहो, उस गोल  घेरे  के चारों  तरफ  लटके  मत  रहो।
यदि  तुम्हें  अपने  प्रेमी  के  पंखुड़ियों  जैसे  होंठ  दिखाई  दे,
यदि  तुम्हें  फूलों  जैसी  पलकें दिखाई  दे,
तुम  भूल जाना  चाहते  हो  या  वापिस  जाना  चाहते  हो।
दूररहो।
इन्हीं  गलतियों  के चारों  तरफ  दौडो़  मत।
एक  ऊंगली  भी  मत  उठाओ।
मेरा  भरोसा  करो,
उस जगह  जो  केवल  एक  चीज  उगती  है
वह दुःस्वप्न  है।


राबर्टो बोलान्यो



परिचय 
कंचन लता जायसवाल

प्रधानाध्यापक प्राइमरी शिक्षा मे.

विभिन्न पत्रिकाओं में कविता एंव कहानियां प्रकाशित. यथा,- कथाक्रम, रेवान्त,स्वतंत्रता पत्रिका  ।
राजनीति शास्त्र में ph.d.
भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाओं की भूमिका विषय पर.



 साहित्य सम्मेलन,"साहित्य की बात" 17-18 september 2022 साकिबा  साकीबा रचना धर्मिता का जन मंच है -लीलाधर मंडलोई। यह कहा श्री लीलाधर...

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