Tuesday, July 3, 2018

उपन्यासनामा 

पितृसत्तात्मक व्यवस्था और पचपन खंभे लाल दीवारें 
उषा प्रियंवदा 


उषा प्रियंवदा 


आधुनिकताबोध की सशक्त हस्ताक्षर के रूप में उषा प्रियंवदा के उपन्यासों को देखा जा सकता है। उषा जी ने नगरीयकरण, जो की आधुनिकता का पहला लक्षण है, को अपनी रचनात्मकता का क्षेत्र चुना। उनके उपन्यासों की विषय वस्तु भारत के महानगरों से लेकर अमेरिका के नगरों तक फैली हुई है। उनके उपन्यास हैं - ‘पचपन खंभे लाल दीवारें’, ‘रुकोगी नहीं राधिका’, ‘शेषयात्रा’, ‘अंतर्वंशी’, ‘भया कबीर उदास’ और ‘नदी’।

आपने मध्यवर्गीय जीवन की विषमताओं, विडंबनाओं, विद्रूपताओं को अपने उपन्यासों की अन्तर्वस्तु के रूप में चुना है। उनके सभी उपन्यास नायिका प्रधान हैं। ‘स्त्री’ आधुनिकताबोध और परंपरागत पितृसत्तात्मकता के बीच विद्रूपताओं और विडंबनाओं को जीती रहती है। आपने उपन्यासों में स्त्री-पुरुष के संबंधों के बीच आयी टूटन को, विखराव को बारीकी से देखा और अभिव्यक्त किया है। आपके नारी पात्र आधुनिक जीवन की छटपटाहट, ऊब, संत्रास, अजनबीपन, अकेलापन, बिडंबनाबोध इत्यादि स्थितियों का गहराई से अनुभव करते हैं। उषा जी जीवन को संपूर्णता में देखती और लिखती रहीं हैं। पुरुष के प्रति कोई दुराग्रह उनके लेखन में नहीं है।


पचपन खंभे लाल दीवारें  

कहा जाता है उषा जी के इस उपन्यास का शीर्षक उनके कालेज के वास्तुकला पर आधारित है। दिल्ली के जिस कालेज में वे जाब करतीं थीं उसके कारीडोर में पचपन खंभे हैं और उसकी दीवारें लाल हुआ करतीं थीं उस वक्त। उपन्यास का शीर्षक अपने परिवेश और उसके प्रति लेखिका के बोध को प्रतिध्वनित कर रहा है। आइये इसकी रचनात्मक संवेदना और भावबोध पर कुछ बात करें।

सबसे पहले उपन्यास पर कुछ बात-चीत और बाद में इसकी नायिका सुषमा के संदर्भ में पचपन खंभों के बीच घुटती जिंदगी की कहानी पर बात करेंगे।

उषा प्रियंवदा का यह उपन्यास मध्यवर्गीय परिवार के बीच कामकाजी स्त्री के जीवन की बिडंबना और विसंगतियों को रेखांकित करता है। स्त्री की मुक्ति का आख्यान रचने का भ्रम देने वाली आधुनिक पूँजीवादी व्यवस्था ने परंपरागत पारिवारिक ढाँचे को तोड़े बिना स्त्री को घर से बाहर जाने की आजादी का अवसर देकर उसके शोषण, उत्पीड़न और उसके साथ होने वाले अन्याय के नए आयामों को ही रचा है। आधुनिक हिन्दी में महिला लेखन का स्वर स्त्री पराधीनता की इन्हीं तकनीकों को बदलने के संघर्ष के रूप में पाया जा सकता है। उषा प्रियंवदा का उपन्यास ‘पचपन खंभे लाल दीवारें’ स्त्री के इसी संघर्ष और अन्तर्द्वंद्व की कथा है।

 यह उपन्यास विवाह और यौनिकता के आपसी संबंध को तार-तार करके रख देता है। इसमें सुषमा के माध्यम से जीवन को विवाह और आधुनिकता के मूल्य के बीच उपजेे द्वंद्व को उभारा गया है। स्त्री के जीवन की परंपरागत मर्यादाओं और भूमिकाओं को बदलते आर्थिक संबंधों के बीच चित्रित करने का प्रयास भी इसमें है। बिडंबना और द्वंद्व के बीच का अन्तर्द्वंद्व भी इसमें अभिव्यक्त होता हुआ दिखाई देता है। इसमें आधुनिकता के कारण परिवार के विखरने और टूटने की कगार पर पहुँचने के कारणों को भी रेखांकित किया गया है।

‘‘उषा प्रियंवदा का उपन्यास ‘पचपन खंभे लाल दीवारें’ एक ऐसी सुशिक्षित और आत्मनिर्भर स्त्री की मर्म कथा है जो पारिवारिक और आर्थिक कारणों से विवाह नहीं कर पाती और अंततः अविवाहित रहने का ही निर्णय लेती है। लेकिन सारी सीमाओं (को तोड़ने) के बावजूद व्यक्तिगत स्तर पर (चोरी-छिपे) ‘प्रेम’ भी करती है और देह-संबंध भी बनाती है। कहना मुश्किल है कि जान-बूझ और सोच-समझकर ऐसा करती है या किन्हीं दुर्बल क्षणों में। मगर विश्वास से कहा जा सकता है कि देह संबंधों को लेकर न तो उसे कोई अपराध-बोध है और न वैध-अवैध का अंतर्द्वंद्व। वह न मातृत्व में सार्थकता तलाशती है और न ‘संपूर्ण स्त्री’ होने का स्वप्न-दुस्वप्न पालती है। हाँ उसके व्यवहार के अंतर्विरोध और विसंगतियों का कारण समय, समाज और भौतिक स्थितियाँ ही हैं।’’1





इस उपन्यास का कथानक सुषमा के व्यक्तिगत जीवन और उसके द्वारा परिवार के दायित्वों को सम्हालने के बीच के द्वंद्व की रेखाओं से रचा गया है। एक और सुषमा दिल्ली के कॉलेज में प्रोफेसर है और जल्द ही वह गर्ल्स हॉस्टल की बार्डन भी बन जाती है। इसके बाद उसका सम्पर्क उसकी मौसी के रिश्तेदार नील से होता है। नील उम्र में उससे छोटा है, पर वह सुषमा की सुगठित देह और प्रौढ़ मानसिकता से आकर्षित होता है। उसका सुषमा से मिलना-जुलना बढ़ता जाता है। हॉस्टल में उसका यह संबंध चर्चा का विषय बन जाता है। उनका मेल-जोल प्रेम में बदल जाता है और अन्ततः उनका प्रेम भौतिक संबंधों में बदल जाता है। सुषमा स्वयं को नील के आगे समर्पित कर देती है। इस दैहिक समर्पण के प्रति उसके अन्दर कोई अपराधबोध नहीं है।

‘‘नील के साथ देह संबंधों को लेकर सुषमा के चेतन-अवचेतन में किसी प्रकार का कोई अपराध बोध नहीं है। नील से संबंध सुषमा का व्यक्तिगत निर्णय है और यह निर्णय वास्तव में उसका मूक विद्रोह भी है और यौन-नैतिकता के आदेशों-उपदेशों की अवज्ञा भी। यह उसके मानसिक विकास का मुक्त रूप भी हो सकता है और बदलते समय में टूटती यौन वर्जनाओं का परिणाम भी। गर्भ निरोधक गोलियों या उपकरणों ने भी यौन-वर्जनाएँ तोड़ने में निश्चय ही एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।’’2

‘पचपन खंभे लाल दीवारें’ कामकाजी, अविवाहित स्त्री के सामाजिक परिवेश और व्यक्तिगत आकांक्षाओं के बीच जटिल अंतर्संबंधों की मनोवैज्ञानिक स्तर पर सूक्ष्म जाँच पड़ताल और सामाजिक स्तर पर बेहतर विकल्प की खोज में संघर्षरत पहली महत्वपूर्ण अभिव्यक्ति है। विवाह संस्था की अनिवार्यता पर प्रश्न चिह्न लगाती नायिका का दृष्टिकोण न नितांत व्यक्तिवादी है और न ही पूर्ण रूप से परंपरावादी। इसलिए उसे हर बार व्यक्ति और समाज के बीच की संधि रेखा पर खड़े होकर सोचना और समझना पड़ता है। सबकी (समेत अपने) स्थितियों, क्षमताओं, अपेक्षाओं और सीमाओं को संवेदना और समग्रता में देखती-समझती नायिका को ‘पलायनवादी’ या ‘आत्मपीड़न’ की शिकार कहना उचित नहीं।

 सुषमा का कहना कि ‘‘पैंतालीस साल की आयु में मैं एक कुत्ता या बिल्ली पाल लूँगी-उसे सीने से लगाकर रखूँगी’’ या ‘‘और कुछ समय बाद यदि तुम मेरे लिए कोई धनी व्यवसायी जुटा सको, तो मैं शादी भी कर लूँगी’’, दरअसल क्षणिक आवेश, तनाव, हताशा, निराशा और असुरक्षा से हैरान-परेशान व्यक्ति की खीज, झुँझलाहट या छटपटाहट ही है।’’3

एक ओर सुषमा नील के साथ जिन्दगी की सार्थकता को पाने का प्रयास करती है तो दूसरी और उसे अपने पारिवारिक दायित्वों का बोध भी है। उसके पिता की पेंशन से घर का खर्च नहीं चलता। सुषमा के वेतन से ही घर का खर्च चलता है। छोटी बहनों को पढ़ाना है, भाई को पढ़ाना है उनकी शादी के लिए दहेज एकत्र करना है। उसकी माँ सुषमा से यही अपेक्षा करती है कि वह विवाह न करे और उसके पति की जिम्मेदारियों को निभाती रहे। यदि उसका विवाह हो जायेगा तो घर कैसे चलेगा? इस दबाव को सुषमा भी महसूस करती है और वह नील को भी यह बताती है। यद्यपि नील यह कहता है कि तुम्हारे परिवार वाले तुम्हारा बेजा फायदा उठा रहे हैं। तुम्हारे भाई-बहन तुम्हारी जिम्मेदारी नहीं हैं। पर सुषमा जानती है कि उसके भाई-बहन उसकी ही जिम्मेदारी हैं। यही द्वंद्व उसे नील से विवाह नहीं करने देता और अन्ततः वह अपने हॉस्टल के पचपन खंभों और लाल दीवारों में कैद होकर रह जाती है।

‘‘उपन्यास की नायिका सुषमा (उम्र 33 साल) शादी के सवाल पर अपनी एक सहेली से कहती है ....आप भी क्या यही मानती हैं कि विवाह होना चाहिए? मेरे पास तो सभी कुछ है, आर्थिक रूप से स्वतंत्र हूँ, जो चाहूँ, कर सकने में समर्थ हूँ। लेकिन विवाह न होने (हो पाने) की स्थितियों पर सोचते-सोचते उसके अंदर न जाने कितना ‘कडुवापन’ भर जाता है। सुषमा का फैसला अपना कहाँ है? परिवार की आर्थिक परिस्थितियों के कारण उसका विवाह नहीं हो पाया या अन्य कारणों से मगर वह अकसर खिन्न हो उठती और उसे अपने माता-पिता ही दोषी प्रतीत होते। दरअसल सुषमा न आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो पाती और न ही ‘जो चाहे कर सकने’ में समर्थ। परिवार के दायित्व और व्यक्तिगत आकांक्षाओं के अंतर्विरोधों में छटपटाती कडुवाहट और कुंठाएँ ही तो कहती हैं, ‘मैं कुआंरी रह गई तो कौन सा आसमान फट पड़ा। आर्थिक रूप से स्वतंत्र सुषमा जो चाहे कर सकने में समर्थ होती या हो सकती, तो इतनी अकेली अपने दुख, अपमान और लज्जा की गहराइयों में भटकती आर्तचीत्कार करती हुई दिखाई न पड़ती।’’4 

‘‘परिवार के लिए कमाऊ बेटी होने की वजह से उसके माता-पिता ने कभी ‘यह चाहा ही नहीं कि सुषमा की शादी हो, उनके अंतर्मन में यह बात अवश्य होगी की सुषमा से उन्हें सहारा मिलेगा। ‘दरअसल उसकी शादी करने से उनकी सारी आर्थिक व्यवस्था गड़बड़ हो जाती। भारतीय समाज में आज हजारों-हजार ऐसी सुषमाएँ हैं जो आजीवन कुँआरी रहने को विवश हैं। विवाह योग्य उम्र में आर्थिक समस्याओं और दहेज की माँग के कारण योग्य वर नहीं मिलता और अधिकांश एक उम्र के बाद स्वयं कुंठाओं, मानसिक असंतुलन और हीन भावना की शिकार हो जाती है। विवाह संस्था से बाहर हर संबंध को अनैतिक और प्रेम को रंगरेलियाँ कहकर कीचड़ उछालने वालों की कोई कमी नहीं। हर विकल्प ऐसी बंद गली है, जिससे निकलने की कोई राह नहीं। कहने को सही है कि किसी के ‘व्यक्तिगत जीवन में किसी को दखल देने का क्या हक है? लेकिन सामाजिक व्यवहार में इस सिद्धांत की धज्जियाँ उड़ाते हुए हम सब प्रायः रोज ही देखते हैं। कोई सुषमा ‘एक पुरुष मित्र बनाकर तो देखे’ कि परिवार, रिश्तेदार, सहेलियाँ, सहकर्मी, छात्राएँ और अन्य लोग क्या क्या आरोप नहीं लगाते! इसके बाद आत्मग्लानि, अपराध-बोध, मानसिक विक्षिप्तता और जटिल मनोग्रंथियाँ अकसर आत्मपीड़न से लेकर आत्महत्या तक ही ले जाती हैं, या फिर पलायन और स्थितियों से समझौता और संपूर्ण समपर्ण करवा देती है।’’5

सुषमा के बीच से गुजरते हुए पचपन खंभे लाल दीवारें  
को समझने के दौरान हम पाते हैं कि मनुवादी पितृसत्तात्मक व्यवस्था में स्त्री होने की सार्थकता विवाह और ‘पुत्र की माँ’ बनने में ही है। ‘विवाह’ स्त्री की यौनिकता को नियंत्रित करने की कारगर तकनीक थी जो हजारों वर्षों से सफल रही है। मातृत्व (वैध) को महिमामंडित और स्त्री की चरम सार्थकता में तब्दील करना भी पितृसत्ता द्वारा स्त्री को घर की चाहरदीवारी में कैद रखने के औचित्य साधन की सफल तकनीक रही है। आज का पूरा स्त्री विमर्श मूलतः इन्हीं दो बिन्दुओं से संघर्ष, मुक्ति और नए विकल्प तलाशने की प्रक्रिया के रूप में ही प्रस्तुत होता है। इसके साथ जो मूल एजेंड़ा था वह परिवार और संपत्ति वैध उत्तराधिकारी को हस्तांतरित किये जाने की निरंतरता को बनाए रखना।

‘‘उषा प्रियंवदा के अगले चर्चित उपन्यास ‘पचपन खंभे लाल दीवारें’’ की नायिका भी मूलतः राधिका की चेतना को ही अधिक परिपक्व और व्यावहारिक धरातल पर प्रकट करती है। साथ ही, यह पात्र राधिका से अधिक प्रतिनिधि भारतीय मध्यवर्गीय स्त्री चरित्र है।’’6

आधुनिक हिन्दी में महिला लेखन का स्वर स्त्री पराधीनता की इन्हीं तकनीकों को बदलने के संघर्ष के रूप में पाया जा सकता है। उषा प्रियंवदा का उपन्यास ‘पचपन खंभे लाल दीवारें’ स्त्री के इसी संघर्ष और अन्तर्द्वंद्व की कथा है।

‘‘उपन्यास की नायिका सुषमा (उम्र 33 साल) शादी के सवाल पर अपनी एक सहेली से कहती है ‘‘....आप भी क्या यही मानती हैं कि विवाह होना चाहिए? मेरे पास तो सभी कुछ है, आर्थिक रूप से स्वतंत्र हूँ, जो चाहूँ, कर सकने में समर्थ हूँ।’’7

 सुषमा एक परंपरागत जकड़न में जकड़ी स्त्री है। उसमें मुक्ति की छटपटाहट है, पर वह विवश महसूस करती है। उसके पास आर्थिक ताकत है, वह कमाती है, घर का खर्च चलाती है, छोटे भाई बहनों को पढाने दिखाने के सारे दायित्व पूरा करती है, परन्तु उसमें इतना साहस नहीं है कि वह अपनी जकड़न को तोड़ सके। इस विवशता को दिखाकर उषा जी ने भारतीय स्त्री की मुक्ति के रास्तों की अड़चनों को, पितृसत्तात्मक सामाजिक परिवेश में अकेली स्त्री आर्थिक रूप से स्वतंत्र होकर भी पितृसत्ता की जकड़न से मुक्त नहीं हो पाती। दरअसल सुषमा की बिडंबना उस स्त्री की बिडंबना बन जाती है जो पढ़-लिख गई है, आधुनिक जीवन मूल्यों को जीना चाहती है, आर्थिक रूप से पर निर्भर नहीं है, परन्तु सामाजिक और पारिवारिक परिवेश उसके इस बदलाव को पचाने और स्वीकार करने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं है।





हमारे सामाजिक और पारिवारिक संरचनागत ढाँचे में इस तरह की पितृसत्तात्मक व्यवस्था के द्वारा दी गई भूमिकाओं से बहार जाती हुई स्त्री को स्वीकार किए जाने की क्षमता तब भी नहीं थी और अब भी नहीं है। सुषमा के जीवन की विवशता सामाजिक और पारिवारिक ढाँचे की विशेषता के कारण हैं। सुषमा की जीवन विसंगतियाँ और बिडंबनायें हमें यह बताती हैं कि हमारी व्यवस्था और परिवेश अभी आधुनिकता की अधकचरी अवस्था से गुजर रहा है। पितृसत्तात्मक व्यवस्था आधुनिकता को अपने अनुकूल बनाने के कार्यों में जुटी है। वह स्त्री को उतनी ही आजादी देना जानती है जितने में उसके स्वार्थ सधते रहें। स्त्री की वास्तविक मुक्ति इस व्यवस्था में संभव नहीं। उसे जो भी जितनी भी आजादी मिलेगी वह पितृसत्ता की सीमाओं के दायरे में ही रहेगी और यही कारण है कि घर से बाहर निकलने का अर्थ घर की चाहर दीवारी से मुक्ति नहीं, बल्कि गले पड़ी रस्सी की लंबाई का बड़ जाना मात्र है। सुषमा इस बड़ी हुई लंबाई के कारण ही निरंतर स्वयं को बंधा हुआ महसूस करती है। यह मुक्ति का भ्रम मात्र है जिसे आधुनिकता के बहाने परोसा गया है।

‘‘सुषमा का बीच-बीच में यह कहना कि ’नील, अब तुम मझसे न मिला करो’’8
 सचमुच उस सामाजिक परिवेश का दबाव है, जिसमें उसे बार-बार यह समझाया-बताया गया है कि ‘‘कभी ऐसा कुछ न करना, जिससे किसी को कुछ कहने का अवसर मिले’’ या तुम्हारी बदनामी की वजह से परिवार की नाक कट जाए।’’ सहकर्मियों और छात्राओं द्वारा छींटाकशी से ही सुषमा को ‘चक्कर’ आने लगते हैं।’’9 

यहाँ सुषमा को इन स्थितियों का सामना करना चाहिए था साहस और हिम्मत से, जो कि वह नहीं कर पाती। यह स्त्री की कमजोरी है, जिसका सामना करना स्त्री को आना चाहिए। स्त्री को इन स्थितियों का सामना करने की हिम्मत क्यों नहीं होती? क्योंकि वह जानती है कि इस मामले में वह अकेली ही खड़ी है, उसके साथ रहने वाली स्त्रियाँ भी उसका साथ नहीं देंगी। यह जो सामाजिक परिवेश की पितृसत्तात्मक अनुकूल मानसिकता है, वह स्त्री की इस अर्जित आजादी को भी पराधीनता में बदल देती है।

‘‘भावना और कर्तव्य के बीच झूलती सुषमा अंततः ‘अच्छी लड़की’ बनने या बने रहने की ही कोशिश करती रहती है। त्याग, तपस्या, बलिदान के धार्मिक-सामाजिक पाठ पढ़ते-सुनते खुद सुषमा को लगने लगता है कि नील के साथ प्रेम संबंध एक पागलपन था, एक मैडनेस। हालाँकि वह अकसर यह भी सोचती रहती है, ‘नील के बगैर मैं कुछ भी नहीं हूँ, केवल एक छाया, एक खोए हुए स्वर की प्रतिध्वनि; और अब ऐसी ही रहूँगी, मन की वीरानियों में भटकती हुई, क्योंकि वह मानसिक रूप से जैसे नील की दासी हो गई थी। नील की किसी बात के लिए निषेध करना उसके वश में न रहा।’’10

सुषमा एक मध्यवर्गीय परिवार की लड़की है, उसमें वे तमाम मूल्य और नैतिकतायें हैं जिन्हें समाज और परिवार उससे अपेक्षा करता है। नील के साथ उसका संबंध इसी नैतिक मर्यादा भावना के कारण ही टूट जाता है। कोई भी पौधा अपने परिवेश से अनुकूलित होकर ही अपना अस्तित्व बनाए रख सकता है। स्त्री की मुक्ति नामक यह पौधा भी तब ही पल्लवित और पुष्पित हो सकता है जब परिवेश उसके अनुकल परिवर्तित हो जाऐ। अन्यथा यह पौधा यूं ही दम तोड़ता रहेगा, जैसे सुषमा का जीवन।

सुषमा नील से प्रथम समर्पण के बाद यह कहती है कि वह ‘‘तैंतीस साल बाद भी अछूती और बेदाग तुम्हारी बाँहों में कैसे आई?’’11 
यह कहना स्वयं को कौमार्य के मिथक को स्वीकारने के कारण है।
‘‘नील के साथ प्रेम या देह संबंध उसकी अपनी देह (दुर्बलताओं या स्वतंत्रताओं) की मानवीय अभिव्यक्ति है, जिसके लिए उसे कोई अपराध बोध नहीं। हालाँकि नील देह पर विजय के बाद सुषमा के प्रति एकदम तटस्थ हो जाता है।’’

सुषमा मध्यवर्गीय स्त्री चरित्र है, वह परिवार और परिवेश के दबावों को झेलती है। चूँकि मध्यवर्गीय चेतना की विशेषता है कि वह खुलकर परंपरागत मूल्यों के प्रति विद्रोह नहीं कर पाती और न खुलकर आधुनिक मूल्यों को स्वीकार पाती है। सुषमा एक ऐसी ही मध्यवर्गीय लड़की है। जो पढ़-लिखकर नौकरी करने लगती है और यही उसके व्यक्तिगत जीवन की विडंबना बन जाती है। चूँकि हमारा समाज और पितृसत्तात्मक व्यवस्था इस तरह की पढ़ीलिखी और स्वतंत्र विचारों की लड़की को उसके स्वतंत्र व्यक्तित्व के साथ पचा नहीं पाती और उसे अपने अन्य हितों के लिए इस्तेमाल करने लगता है। जैसा कि सुषमा की माँ कहती है -

‘‘अम्मा ने बड़े मजे से उत्तर दिया, ‘‘तुम जानो कृष्णा, सुषमा की शादी तो अब हमारे बस की बात रही नहीं। इतना पढ़-लिख गई, अच्छी नौकरी है और अब तो, क्या कहने हैं, होस्टल में वार्डन भी बननेवाली हैं। बंगला और चपरासी अलग से मिलेगा, बताओ, इसके जोड़ का लड़का मिलना तो मुश्किल ही है। तुम्हारे जीजा तो कहते हैं कि लड़की स्यानी है, जिससे मन मिले, उसी से कर ले। हम खुशी-खुशी शादी में शामिल हो जायेंगें’’12 

सुषमा की माँ यह मानकर चल रही है कि अब उसकी शादी नहीं होगी। जब हो सकती थी तब उसे मनमर्जी से लड़का चुनने की आजादी नहीं थी। आजादी तो अब भी नहीं है, सिर्फ बहाना है अपनी जिम्मेदारी से मुँह मोड़ने का। अम्मा द्वारा दी गई आजादी का सच यह है -‘‘तुम एक पुरुष मित्र बनाकर तो देखो, तुम्हारी अम्माँ सबसे पहले तुम्हारी खबर लेंगी। हमारा समाज किसी को जीने नहीं देता।’’13

 बावजूद इसके सुषमा पुरुष मित्र बनाती है। नील से उसके संबंध बनते हैं, वे दोनों साथ-साथ उठने बैठने और घूमने लगे हैं। मन ही मन एक दूसरे से प्रेम करते हैं, परन्तु सुषमा को बार-बार लगता है कि नील का इस तरह उससे मिलना, रात-बिरात उसे छोड़ने आना, बाहर घूमने जाना, सामाजिक मर्यादाओं के खिलाफ लगता है। उसमें सामाजिक नैतिकता का द्वंद्व है - ‘‘वह बेफ्रिक तरूणी तो नहीं है। उसकी हर क्रिया को सूक्ष्म दृष्टि से देखा जाता है। बेकार में ऐसी बातों को क्यों जन्म दिया जाए।’’14

 उसे सामाजिक सीमाओं का ख्याल है, यही उसकी बिडंबना है कि वह प्रेम जैसे उन्मुक्त अनुभव को जीना चाहती है, पर मर्यादाओं के बंधन उसे ऐसा करने से रोकते हैं - ‘‘पर वह कितनी अदृश मर्यादाओं में बँधी है, यह वह नील को कैसे समझाये?’’15

 नील का साथ उसे अच्छा लगता है। नील उसे पसंद करता है यह एहसास उसे अन्दर से भर देता है। नील से मिलने के बाद उसे लगा कि उसने जीवन के बहुत कीमती वर्ष यूँ ही गंवा दिए। ‘‘जीवन की भाग दौड़ और आजीविका के प्रश्नों में चुपचाप विलीन हो गए वे वर्ष और अब तो उसके चारों ओर दीवारें खींच गईं थीं, दायित्व की, कुंठाओं की, अपने पद की गरिमा और परिवार की।’’16




 सुषमा आधुनिक जीवन को परंपरागत परिवेश में जीने की विवशताओं से तंग आ जाती है और उसे एक साथी की आवश्यकता महसूस होती है। उसे पति और प्रेमी के विशेषणों की आवश्यकता नहीं थी, पर जब वह परिवार के दायित्वों को निभाते हुए थकान महसूस करने लगती है तो उसे साथी की जरूरत लगने लगती है। ‘‘सुषमा को प्रेमी नहीं चाहिए था। उसे पति की आकांक्षा भी न थी, पर कभी-कभी उसका मन न जाने क्यों डूबने लगता। अपने परिवार का सारा बोझ अपने ऊपर लिए, सुषमा काँपने लगती। तब वह चाह उठती कि दो बाँहें उसे भी सहारा देने को हों, इस नीरवता में कुछ अस्फुट शब्द उसे भी सम्बोधन करें।’’17

यह चाहना बंधनों और सीमाओं से परे समानता के स्तर पर जीने वाले साथी की है। पति और प्रेमी अन्ततः पुरुष ही होते हैं और प्रेमी भी जब पति का पद पाता है तो वह निखालिस पुरुष बन जाता है और नहीं पाता तो भी उस पर हक मर्दीय अहं के साथ जताता है। वह उसे उसके द्वंद्व और सामाजिक बिडंबना के साथ स्वीकार नहीं करता। जैसा की नील के साथ होता है। नील के लिए सुषमा अन्ततः एक सुगठित देह ही है, जिससे खेलने का पूर्ण अधिकार वह पाना चाहता है और सुषमा की सामाजिक जिम्मेदारी को स्वीकार नहीं करना चाहता।
सुषमा जिस परंपरागत परिवेश के बीच रहती है उसमें उसे निरंतर इस बात का एहसास कराया जाता है कि ‘‘सामाजिक मापदंड़ों का जो उल्लंघन करता है, उसे दंडित होना ही पड़ता है, सुषमा! मुझे स्वाति से बिल्कुल भी सहानुभूति नहीं है।’’18

  मिसेज पुरी का यह कथन हमारे पितृसत्तात्मक समाज की विचारधारा का प्रतिनिधित्व करता है, जो सुषमा और स्वाति जैसी स्त्रियों को न जीने देता है और न मरने देता है। ‘‘जिसके चारों और द्वार बन्द हों वह क्या करे? उसी कारागार में रहता रहे, सीखंचों से आती धूप और मद्धिम प्रकाश के बल पर साँसे लेता रहे।’’19 

सुषमा नील को अपने जीवन संघर्ष के संबंध में बताते हुए कहती है, जो एक आम मध्यवर्गीय स्त्री के जीवन की सच्चाई भी है - ‘‘नील, पिछले ग्यारह सालों से मैं जिन्दगी से निरन्तर लड़ रही हूँ। सुषमा ने एक आह भरी, फिर सामने शून्य की ओर ताकते हुए कहा, ‘‘तुम्हें विस्तार में नहीं बताऊँगी, पर मैं यह तुम्हें जताना चाहती थी कि यह नौकरी मेरे लिए बहुत कीमती है। निर्धन मैं भले ही रही होऊँ, पर स्वाभिमानी भी बहुत रही। जीवन में कभी-कभी ऐसे अवसर भी आए, जबकि मैं अपने शरीर के मोल से धन और आराम पा सकती थी। पर वह मैंने स्वीकार नहीं किया। एम. ए. करने के बाद मैंने एक प्राइवेट कॉलेज में नौकरी की। वहाँ के सेक्रेटरी नगर के पुराने रईसों में थे। उन्होंने किस वस्तु का प्रलोभन नहीं दिया मुझे, पर मैंने वह नौकरी छोड़ दी।’’

‘‘जब मैंने माँ को बताया कि मैंने नौकरी से इस्तीफा दे दिया है तो उन्होंने पूछा, ‘और इन बच्चों का क्या होगा? पिताजी साल भर से बीमार थे और बिना वेतन के छुट्टि पर थे। मुझे उस नौकरी की सख्त आवश्यकता थी। पर वह मोल चुकाना मुझे सह्य न था।’’20

 सुषमा का यह बयान दरअसल आत्मद्वंद्व की स्थिति है, नैतिकता और दायित्वबोध की सीमाओं का पता चलता है। देह समर्पित करना बिना अपनी मर्जी के यह उसे स्वीकार्य नहीं था। देह पर उसका अपना अधिकार है, जिसे वह अपनी मर्जी से समर्पित करेगी और उसने नील को अपनी देह समर्पित की। यह उसका निर्णय था, विवशता नहीं। यह सुषमा का नैतिकता का बंधन नहीं, बल्कि देह पर अपने अधिकार का बोध है।

सुषमा अपने परिवार के लिए अपना जीवन होम कर देती है, और अपने बारे में सोचते हुए भी कोई ऐसा निर्णय नहीं लेती जो उसके छोटे-भाई बहनों के जीवन को नरक बना देता। इसे भी हम उसका अपना निर्णय ही मानेंगे। पारिवारिक दायित्वबोध को विवशता के स्तर पर जीते हुए भी यह उसका अपना निर्णय था। यही उसके व्यक्त्वि को नया रूप देता है। वह अपने स्वत्व को कायम रखते हुए भी अपना जीवन होम करती है। ‘‘इसीलिए मैं तुमसे कह रही थी कि मेरी जिन्दगी खत्म हो चुकी है। मैं केवल साधन हूँ। मेरी भावना का कोई स्थान नहीं। विवाह करके परिवार को निराधार छोड़ देना मेरे लिए संभव नहीं। मैंने अपने को ऐसी जिन्दगी के लिए ढाल लिया है। तुम चले जाओगे तो मैं फिर अपने को उन्हीं प्राचीरों में बन्दी कर लूँगी।’’21  

इस स्थिति में व्यक्ति के अन्दर एक बेगानापन पैदा होता है। यह जो अपने को अपने किए से अलग होने का बोध है, यह व्यक्ति में अमानवीय स्थितियों को पैदा करता है। वह अपने बारे में नहीं सोचता, अपने को खपा देता है विवशता में। अजनबीपन, बेगानापन, अकेले होने का बोध, सुषमा अपने अन्दर अनुभव करती है। नील विदेश चला जाता है, सुषमा उससे मिलने हवाई अड्डा जाना चाहती है, टेक्सी भी बुला लेती है, पर वह जा नहीं पाती। वह प्रेम और दायित्व बोध के द्वंद्व में फंसी रहती है और अकेलेपन को स्वीकार कर लेती है।

इस तरह सुषमा का चरित्र आधुनिकताबोध के पितृसत्तात्मक संस्करण की मिली जुली अभिव्यक्ति है। उसमें मध्यवर्गीय स्त्री के परंपरागत मूल्यों के अवशेष भी हैं और आधुनिकताबोध की छटपटाहट भी। यह छटपटाहट और बैचेनी ही उषा जी की उपलब्धि है। यह उपलब्धि भी इसलिए मूल्यवान है, क्योंकि अब तक स्त्री में अपने होने की, स्वयं के मुक्त होने की छटपटाहट भी नहीं थी, उसने दी गई व्यवस्था को ही अपनी नियति मान रखा था। सुषमा जैसी नायिकायें समाज में स्त्री की मुक्ति और विवशता के बीच की छटपटाहट को अभिव्यक्ति कर रहीं हैं। यह भी परिवर्तन का संकेत है। ‘पचपन खंभे और लाल दीवारें’ सुषमा के जीवन की कैद की सीमायें बन जाती है और पितृसत्तात्मक व्यवस्था के आधुनिकबोध की प्रतीक। वह तमाम जीवन उनके दायरे से बाहर नहीं आ पाती।

00
संजीव जैन
भोपाल 

संदर्भ सूची
1. औरत अस्तित्व और अस्मिता, अरविन्द जैन पृ. 45-46
2. वही, पृ. 49
3.वही, पृ. 46
4. वही, पृ. 48
5 वही, पृ. 47-48
6. कुछ जीवन्त कुछ ज्वलंत, कात्यायनी, पृ. 165
7.पचपन खंभे लाल दीवारें, उषा प्रियंवदा, पेपरबेक, पृ. 82
8. पचपन खंभे लाल दीवारें, उषा प्रियंवदा, पेपरबेक, पृ. 72
9. औरत अस्तित्व और अस्मिता, अरविन्द जैन पृ. 49 
10 वही,पृ. 49
11पचपन खंभे लाल दीवारें, उषा प्रियंवदा, पेपरबेक, पृ. 72-73
12 वही, पृ. 13
13 वही, पृ. 14
14. वही, पृ. 30
15 वही, पृ. 30
16वही, पृ. 34
17 वही, पृ. 34
18. वही, पृ. 37
19.वही, पृ. 51
20.वही, पृ. 73
21.वही,पृ. 74



संजीव जैन 



Saturday, June 30, 2018


संजीव जैन की प्रेम कविताएँ




संजीव जैन 




 मैं और मेरा लिखना

लेखन एक संघर्ष है। हम अपनी ही जड़ता के खिलाफ जब लगातार संघर्ष करते हैं तो एक सच्ची कविता कहानी बनती है। इसके बाद जब हम जड़ हो चुकी भाषा और चुक चुके शब्दों से संघर्ष करते हैं तब वह रचना जीवंत और मूर्त्त रूप लेती है। चूंकि लेखन मुझे गति देता है और गति हमेशा जड़ता के खिलाफ होती है।
लेखन हमारी चेतना में रची-बसी मूढ़ताओं को, विकृतियों को, अंधत्व को यदि नहीं तोड़ता है तो वह मुक्तिदायी लेखन नहीं हो सकता। 
प्रेम मुझे मुक्त करता है हर कविता के साथ कुछ न कुछ जड़ता को तोड़ देता है, समाज और सत्ता के द्वारा रोपित अंधत्व के कुहासे को पिघला कर मेरी चेतना को निरभ्र बनाता है इसलिए मैं प्रेम कविताएं लिखता हूं।
प्रेम अभौतिक नहीं होता और  भौतिक होने का मतलब मांसल होना ही नहीं होता। प्रेम का सिर्फ रूहानी रूप उसे जीवन विहीन बना देता है और दैहिकता उसे वासना के दल-दल में धकेल देती है।




प्रेम-
एक

बरगद जितना फैलता है बाहर
अपनी जटाओं के साथ
तनों से लटकती जटायें
शिव की तपस्या की तरह लंबी
पार्वती की साधना की तरह
गहरी………
हिमालय के विस्तार की तरह
असीम…..
प्रेम के अगाध विस्तार
का प्रतीक बरगद
अपनी गहरी और उलझी जड़ों को
मिट्टी की गहराई और फैलाव
के रेशे रेशे में
संवेदना की तरह
रखता है ……..
देता है छांव उपेक्षित जीवन को
संवेदनाओं के पक्षी बनाते हैं घोंसला
करते हैं, प्रजनन अपनी संभावनाओं का
प्रेम इस तरह
देता है जीवन
फैलता है…
जीवन की जड़ों में
मिट्टी के भरोसे पर उठता है आसमान की ओर
फैलाता है अपनी शाखाओं प्रशाखाओं को
मिट्टी से रिश्ता तोड़ते संसार के
सामने……...।




 प्रेम-
 दो

आकाश का अनंत विस्तार
गहराई और सतह के बिना महसूस करना
कितना अद्भूत होता है
समय और दूरियों के हमारे पैमाने
नहीं चलते हैं…….
संसार के बीच इंसान का होना
आकाश गंगा में एक तारे
की मौजूदगी……
पर प्रेम की आकाशगंगा
मन के आकाश में
भरती है दूधियारंग
आकाश के गहन अंधेरों को
नहलाती है उजलेपन से
कभी न खत्म होनेवाले
दूधिया प्रकाश से भर देती है
जीवन के अभावों की खाली माँग…
मेरे जीवन को
इस तरह सुहागन बनाकर
तुमने भर दिया है
जीवन को आकाशगंगाओं से..।



                           







प्रेम -
 तीन

हिम का शीतलपन
फैला हुआ है…
ग्लेशियरों की अतल गहराई में
सदियों से
ठंडे पहाड़ों की सतह पर….
इसी तरह
समय ने समाज की आंतरिकता में
और व्यक्ति की चेतना की सतह पर
जमा दी है परत
शीतलता की…….
भयानक शीतलता…..
हड्डियों को गला दे…..
रक्त को जमा दे
संवेदनायें ग्लेशियर की तरह
शिराओं में जम गयीं हैं……
संबंधों पर छा गया है
ठंडापन कडवाहट की हद तक
प्रेम की ऊर्जा
पर्वत में उबलते लावे की तरह
पिघला देती है
सदियों की जमी बर्फ को
इंसानी गर्माहट से भर जाता है जीवन
रोओं से उठी सनसनाहट
शिराओं में जमे रक्त को
दौडने को करती है विवश
इस तरह तुम्हारी छुअन
कराती है अहसास
आदम के द्वारा
हब्बा को किये
प्रथम स्पर्श का...
प्रेम के प्रथम अंकुरण का….।




तुम -

एक

तुम्हारी मुस्कान
मेरे लिये
एक तूफान की तरह है
जो मेरे अंदर की
तमाम बैचेनी
व्यर्थता
और वेदना को
तिनके की तरह
ले जाती है
पहाड़ की दूसरी
ओर……..
तुम जब
देती हो आवाज
मेरी चेतना में
प्रतिध्वनि का खुला आसमां
गूंज उठता है
मेरी देह के शब्दकोश में
संवेदनाओं की तरंगें
लहरों की तरह
उठने लगती हैं….!
तुम जब
आती हो
मेरे करीब
जीवन के पर्यावरण का
‘घना कोहरा’
छंटने लगता है
एक उजला
झकास
दिन
खिल उठता है
मेरी
दलदल से भरी अनुभूतियों
के बीच
तुम्हारी सांसों की
सरगम
रेगिस्तान सी फैली
मेरी रिक्तता में
तरलता के संगीत का नखलिस्तान
बना देती है…….!!!
तुम्हारी देह की सोंधी गंध
कस्तूरी की तरह
फैल जाती है
मेरे मन के जंगल में
और इस तरह
तुम
दैहिक चेतना के साथ
समा जाती हो
मेरे वजूद में।









तुम -

 दो

तुम्हारी
‘देह’
एक ‘देह मात्र’ नहीं है
आकाश की
तरह खुली है
जिसमें उड़ान भरना तो आसान है
पर उसके विस्तार को
पा सकना असंभव
और
समुद्र की तरह गहरी
जिसमें तैरना
आसान नहीं
और गहराई तक पहुँचने के लिये
गहरी और बहुत लंबी
जीवन सांसों की जरूरत होती है ।
तुम्हारी देह
मलयानिल की तरह
प्रवाहित होती है
मेरी चेतना में
जिसे मैं हर वक्त
महसूस करता हूँ
पुलकित होते
रोम रोम से।





तुम - 

तीन

मेरी
देह की भाषा
तुम्हारी देह के
भूगोल से
लेती है
आकार
तमाम ‘शब्द’ बने हैं
दैहिक भूगोल के साथ
मेरे संबंधों से
हर स्पर्श एक ध्वनि की तरह
उठता है मेरी चेतना में
और होंठों तक आते आते
बन जाता है एक
वाक्य “………………’
जिसे ‘मैं’
बोलना चाहता हूँ
कब से.........
तुम्हारे इतने नजदीक से
जिसे सिर्फ और सिर्फ
तुम्हारी देह रूपी वीणा के
तार ही महसूस कर सकें
तुम्हारे श्रवण यंत्र भी
सुनने में हों असमर्थ
और ईश्वर तो
बहुत कोशिशों के बाद भी
न सुन सके
कि मैंने किस भाषा में
कहा है तुम से
‘वह एक वाक्य’
जिसे मैं ‘सदियों’ से कहने के लिये
उगता रहा
उस मिट्टी की तलाश में
जिस मिट्टी से बनती रही तुम्हारी देह।









तुम - 

चार

तुम
बनाती रहीं
घर ……..
बुनती रहीं दूसरों का जीवन
अपनी संवेदनाओं की सलाइयों से
रिश्तों के धागे
टूटते बिखरते रहे
तुम हर बार उनका सिरा ढूंढती रहीं
कभी नहीं पड़ने दी गांठ
हर बार नये तरीके से बुना जीवन को
फिर भी
छूटता रहा जीवन
तुम्हारी अंगुलियों में पड़ी हुई गांठें
हाथेलियों के छाले
ऐड़ियों की दरारें
पीठ की खरोंचें
मन के छाले कभी नहीं देखे गये
कभी नहीं जाना गया
कि ये कैसे हुए
कभी जब हुआ इनका स्पर्श तो
कहा गया कि “क्या मजदूरों जैसे हाथ” हैं
नरमाई तो है ही नहीं छूने में
और तुमने
हाथों को नरम बनाना कर दिया शुरू….
ताकि इनका स्पर्श उन्हें
“अच्छा” लगे……
तुम
कतरा कतरा, किरचें किरचें
बनती रहीं, बिखरती रहीं
फिर स्वयं को समेट कर
कर देतीं रहीं प्रस्तुत
ताकि वे न जान सकें कि
उनके सुख का साधन
किरचों में बदल चुका है…...
बदलता रहता है जीवन
तुम्हारा
सूखे खेत की तरह
तुमने कभी नहीं कहा
सावन से कि
मुझे हमेशा चाहिए तुम्हारा बरसना
दरकती हुई मिट्टी की तरह
जीवन का सृजन करती रहीं तुम
बिना गिले-शिकवे
और शिकायत।





तुम -

 पांच

‘तुम्हारे
आगोश की गंध से
गंधाती रही
उम्र भर
मेरी देह
जीवन की मूल्यवत्ता के लिए
बस
इतना ही काफी था
कि तुमने
अपने अस्तित्व को चुनौती देते हुए
मेरी चेतना को
प्रेम की सोंधी-सोंधी गंध से
भर दिया….
तुम्हारा इस तरह
मुझमें समा जाना
मुझे अपने वजूद में
मिला कर
मेरी अस्मिता को
नयी पहचान से भर देना
अद्भुत था…...
ईश्वरीय सत्ता के लिये
एक चुनौती बना
चेतना और गंध का यह सम्मिश्रण
तेल और पानी के सम्मिश्रण की तरह
सुबह और शाम के मिलन की तरह
असंभव संभावना को
कर दिया संभव
तुमने।









तुम - 

छह

तुम सुनो!!!
कानों से नहीं
सिहरन से
कंपन से
रोओं के खड़े होने से
सरसराती हुई लहर के
चलने से उठी
नि:शब्द ध्वनि को
जो हर वक्त तुम से
कुछ कहना चाहती है
कभी सुनो अपनी देह की आवाज
देह की धुन को
धड़कनों की लय को
अगर नहीं सुनोगे
तो पखावज की तरह बजने लगेगी
देह की वीणा
ये बेआवाज बजने वाली धुनें
तुम से कहतीं हैं
बहुत कुछ
तुम करती हो लगातार अनसुनी
पेट जब कुलबुलाता है
तो सुन ली जाती है
उसकी आवाज
पर दिल और देह जब
कुनमुनाती हैं तो
अनसुनी की जाती है उनकी कुनमुनाहट
तब देह लगातार होती है
उपेक्षित
जंग लगने लगती है
अंगुलियों के स्पर्श से
उठने वाले सिहरन भरे संगीत में
देह रूपी सितार के स्वरों में
दौड़ते हुए
संगीत में
इसलिए
सुन ही लेना चाहिए
देह तंतुओं से उठी हर
आवाज को।



तुम -

 सात

तुम
एक विदेह
की तरह हो
जिसे मैं महसूस करता हूं
अपने आसपास
अमूर्त वैक्रियक* देह की तरह
हवा के प्रत्येक स्पर्श में
तुम ही तो
लिपट जाती हो
मुझसे
रात रानी, वेला के फूलों की
महक के साथ
तुम्हारी देह की गंध ही तो
करती है प्रवेश मेरे अस्तित्व में
शरद की पूर्णिमा को जब में
खुले आसमां के नीचे
तुम्हें कर रहा होता हूं
महसूस
तुम्हारा विदेह होना
ओस की बूंदों की तरह
बरसता है
और बर्फ के छोनों की तरह
पसर जाता है मेरी देह पर
चुपचाप…..
तुम्हारा विदेह होना
मेरी चेतना के रेगिस्तान पर
ठंडी हवा की तरह बहना है
गर्म रेत की तलहटी में
चुपचाप सोती हुई नमी की तरह है
जीवन के अंकुरण
की प्रक्रिया है…….
तुम्हारा होना।

*वैक्रियक शब्द जैन दर्शन में एक ऐसी देह के लिये प्रयोग किया जाता है जो भौतिक है पर बाधित नहीं है किसी भी भौतिक वस्तु से। वह एक सूक्ष्म शरीर होता है जो कहीं भी कभी आ जा सकता है।



                    संजीव जैन

Saturday, June 23, 2018


पड़ताल: कहानी संग्रह फुगाटी का जूता 
गंगाशरण सिंह  


मध्यप्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन भोपाल का प्रतिष्ठित वागीश्वरी सम्मान-2017 मनीष वैद्य जी  के कहानी 

संग्रह "फुगाटी का जूता' "  को दिए जाने की घोषणा हुई |संग्रह पर युवा आलोचक गंगा शरण सिंह,  की समीक्षा के साथ प्रतिनिधि  कहानी फुगाटी का जूता  "रचना प्रवेश " पर 



युवा आलोचक गंगा शरण सिंह, मुंबई ने 'फुगाटी का जूता' को अपनी समीक्षात्मक संपन्न दृष्टि में इस तरह पाया... यहाँ जस की तस उनकी टिप्पणी 


गंगाशरण सिंह 



"अँधेरा बाहर का हो या भीतर का, उजाले के लिए हथियार उठाना ही पड़ता है।"
मनीष वैद्य पिछले कुछ वर्षों के दौरान एक महत्वपूर्ण कहानीकार के रूप में उभरे हैं। 2013 में आये पहले कहानी संग्रह "टुकड़े टुकड़े धूप" के बाद इस अंतराल में उनकी जो कहानियाँ देश की प्रमुख पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहीं, उन्हीं का संकलित स्वरूप "फुगाटी का जूता" के रूप में हमारे सामने हैं। इन कहानियों से गुज़रते हुए हुए मैंने पाया कि मनीष जी ने इन बीते वर्षों में भाषा और शिल्प पर काफी मेहनत की है। उनकी समृद्ध भाषा और संवेदनशील सम-दृष्टि कई कहानियों को यादगार बना जाती है। उनके लेखन की एक और विशेषता उनकी रचनाओं का कथ्य है। विविध प्रकार के चरित्र और विषयवस्तु उनकी झोली में मौजूद हैं। घर और समाज से विस्थापित और व्यवस्था की संवेदनहीनता का शिकार हुए लोग उनकी रचनाओं में बार बार आते हैं।
इसी संग्रह की कुछ चुनिन्दा कहानियों पर एक नज़र। साथ ही एक कहानी पाठक मित्रों के लिए। कृपया इसे प्रतिनिधि कहानी न मानकर संग्रह की एक बानगी के तौर पर देखें।
घड़ीसाज--
"वह दुनिया के समय को बदलने, ठीक करने और अपनी तरह का समय बताने की एवज में अपना समय भुला देता है। समय बीतने पर क्या बचता है। हम दरवाजे पर चौकसी करते रहते हैं और वह कम्बख़्त खिड़कियों से गुज़र जाता है।
अब तो अपनी घड़ियाँ ही नहीं, लोग अपने समय तक को दुरुस्त नहीं करते। उपयोग के बाद फेंक देते हैं सब कुछ।"
संग्रह का आगाज़ एक घड़ीसाज की संवेदनशील कथा से होता है, जो आधुनिकीकरण के दौर में न सिर्फ़ अपनी दुकान बल्कि इस दुनिया से ही बेदखल कर दिया जाता है।
"आदमी जात" एक लम्बे कालखण्ड को प्रस्तुत करती है। विभाजन के समय सिंध नदी के किनारे स्थित एक छोटे से गाँव से जान बचाकर भागा हुआ किशोर शरणार्थी कैम्प्स में भटकते हुए एक दिन अपने परिवार को पा लेता है। किन्तु बचपन की दोस्त शीनू और उसके परिवार का दुखद अंत उसे जीवन भर का दुख दे जाता है। घर परिवार और ज़िन्दगी की व्यस्तता के बीच सत्तर साल गुजर जाने के बाद भी उसके ख़यालों की आवाजाही सरहद के इस पार से उस पार तक चलती रहती है।
"फुगाटी का जूता" पिछले वर्ष पहल पत्रिका में प्रकाशित हुई थी। बाजार के फैलते पाँवों और ब्रांड के पीछे भागती नई पीढ़ी की ये कहानी वास्तविकता की अंदरूनी तहों तक ले जाती है हमें।
"....कि हरदौल आते हैं---
(एक स्त्री के लिए विवाह के बाद कितना कुछ बदल जाता है। बोली, पानी, खान-पान, आचार-व्यवहार, बाना-पहनावा। फिर भी तमाम चीजें रह जाती हैं जो कभी नहीं बदलतीं। भौगोलिक सीमाओं से परे भी। जैसे उनकी नियति। जो यहाँ है, वही वहाँ भी है।)
जनश्रुतियों में जीवित हरदौल की ऐतिहासिक लोक-कथा का वर्तमान संदर्भों में किया गया सफल पुनर्लेखन है। इसका मार्मिक घटनाक्रम वर्तमान कहानी में मौजूद पात्रों के साथ पाठक को भी रोमांचित कर जाता है।
"उज्जड़" एक शालीन प्रहार है उन लोगों पर जो अपने वैभव के अहंकार में गरीबों को छोटा करके आँकते हैं, जबकि किसी आकस्मिक विपत्ति के समय यही।लोग निःस्वार्थ भाव से काम आते हैं।
"काग़ज़ ही काग़ज़ में बोलता है"
(सावन के बाद हमेशा भादौ ही नहीं आया करता। कभी कभी सावन के बाद फिर से आषाढ़ आ जाया करता है। ऐसा ही है ज़िन्दगी का भूगोल।)
ये एक ऐसे निःसंतान शख़्स की व्यथा कथा है जो पत्नी की मृत्यु के बाद शहर में एकाकी जीवन बिताते हुए एक दिन गाँव वापस लौटने का निर्णय करता है। भतीजे और बहू का अनमना व्यवहार देखकर उसकी उलझन बढ़ती ही जाती है। कुछ दिनों बाद उसे मालूम पड़ता है कि उसकी जमीन को हड़पने के लिए उसके भतीजे ने उसे मृत घोषित कर रखा है। स्पष्टीकरण माँगने पर "जो उखाड़ना है, उखाड़ लो" की धमकी मिलती है।
"अब्दुल मज़ीद की मिट्टी"
( क्या हुआ? अब्दुल मज़ीद मिला? अब तो वक़्त ने भी उसे रफू कर दिया। बरखुरदार, हमें ये गुमान होने लगता है कि हम बहुत बड़े रफ़ूगर हैं, जबकि वक़्त से बड़ा कोई रफ़ूगर नहीं होता। सब कुछ बदल देता है वह.. सब कुछ..)
घड़ीसाज के मुख्य पात्र की तरह इस कहानी का नायक भी इस बेरहम वक़्त का शिकार है। अपनी रफूगरी के लिए मशहूर इस शख़्स को अपने हुनर और इस हुनर की कद्र करने वाले लोगों पर इतना यकीन है कि बेटे के समझाने के बावजूद किसी और काम के लिए तैयार नहीं होता। कहानी का उत्तरार्ध हमारे समय की अमानवीयता और भयावह बाजारीकरण का दुखद स्वरूप प्रस्तुत करता है।
"ख़ैरात" शासकीय चालों और दबंगों के बीच पिसते साधारण जन की कहानी है। प्रशासनिक आदेश से एक गाँव के भूमिहीन गरीबों को जमीन आवंटित की जाती है। इनमें से अधिकांश जमीन नालों और ऊसर बंजर पहाड़ियों पर निकलती है। जिसके हिस्से में उपजाऊ जमीन आयी उन पर पहले से ही गाँव के पटेलों का कब्जा। इस बारे में बात करने पर उनकी ओर से धमकियाँ मिलती हैं। धीरे धीरे एक ऐसी पार्टी का अस्तित्व वहाँ उभरता है जो लोगों के आक्रोश को भुनाने में विशेषज्ञ है और एक दिन पूरा क्षेत्र आंतरिक युद्ध के मुहाने पर खड़ा हो
जाता है।
"हरसिंगार सी लड़की" एक मासूम सी प्रेम कहानी है। विषयवस्तु और पात्रों के अनुरूप परिवर्तित भाषा का खिलंदड़ापन आनन्दित करता है।
"खोए हुए लोग"
( जो ज़िन्दगी भर सबकी चिट्ठियाँ सही पते पर, आज वह खुद अपना पता भूल गए।)
यह इस संग्रह की श्रेष्ठ कहानियों में एक है। स्मृति लोप का शिकार इस कहानी का बुजुर्ग पात्र अपने गाँव को अपना मानने से इनकार कर देता है। उनकी जिद है कि उन्हें उनके गाँव पहुँचाया जाय।
ये सोचकर कि शायद कुछ दिन यहाँ से दूर रहकर उनकी जिद कम हो जाय, घरवाले उन्हें लेकर तीर्थयात्रा पर चले जाते हैं। हालाँकि उनकी मनःस्थिति पर इस सबका कोई प्रभाव नहीं पड़ता। उनकी गतिमान स्मृति यात्रा हमें प्रसंगवश गाँवों के निरंतर परिवर्तित होते हालात और लोगों की हिंसक मनोवृत्ति से जुड़ी कुछ घटनाओं से रूबरू कराती है। अतीत की इन्हीं दुखद यादों से उनकी वर्तमान मनोदशा के तार जुड़े हुए हैं।
"सुगनी" हमारे समाज के उस दौर और उन क्षेत्रों की दास्तान बयान करती है जहाँ अशिक्षा और अज्ञान का अंधकार इस कदर व्याप्त रहता है कि सही और ग़लत की सारी विभाजन रेखाएँ ख़त्म हो जाती हैं। एक गरीब, असमर्थ और विधवा स्त्री पहले ताकतवर लोगों द्वारा जमीन और घर से रहित की जाती है और बाद में डायन घोषित कर उस पर अत्याचार की इंतिहा कर दी जाती है। दुखद अंत वाली यह कहानी बरबस मिथिलेश्वर के प्रसिद्ध उपन्यास "युद्धस्थल" की याद ताजा कर जाती है।
बोधि प्रकाशन जयपुर से इसी वर्ष आयी इस किताब का आवरण कलात्मक और प्रकाशन उच्चस्तरीय है। इन दिनों पढ़ी गयी अन्य किताबों की तुलना में प्रूफ़ की गुणवत्ता भी प्रशंसनीय है।








कहानी 

फुगाटी का जूता

मनीष वैद्य

अब जूता उनके दिमाग में था या कहें कि जूता दिमाग में इस कदर अपना दखल कायम कर चुका था कि वे उससे इतर सोच भी नहीं पा रहे थे। जूता कुछ इस तरह से उनके भीतर रच–बस गया था कि कई बार झटकने पर भी निकल नहीं पा रहा था। गोया जूता नहीं उन्होंने कोई बीमारी गले लगा ली थी।

मौसम बदल रहा था। गुनगुनी ठंड अब बिदा लेने को आतुर थी। सुबह-शाम फागुनी बयार तन–मन को सुहाने लगी थी। उन्होंने अपने ड्राइंग रूम में सोफे पर पसरते हुए दूर तक निगाहें दौडाईं। सुबह की मुलायम धूप पूरब के पेड़ों से छनकर उजाले का इन्द्रधनुष बनाते लॉन की घास पर कुछ तिरछी आकृतियाँ बना रही थी। आम के पेड़ों पर फूल लद गए थे। कोयल अपनी कूक में तान भरने लगी थी। पास के तालाब से कुछ प्रवासी परिंदे उनके लॉन के पेड़–पौधों पर मंडराते चले आए थे। क्यारियाँ फूलों से भर गई थी।

 कोई और दिन होता तो शायद वे इस दृश्य को जी रहे होते, लेकिन आज...आज तो वह जूता उनकी समूची चेतनाबोध पर भारी पड़ रहा था। उस अकेले जूते ने उनकी समूची चेतना को झनझना दिया था। उन्हें लगा कि यह सब सोचने का अब कोई मतलब नहीं है। इससे कुछ नहीं होने वाला है। उन्हें अब मान ही लेना चाहिए कि वे समय को पीछे नहीं ले जा सकते और न ही भागते हुए समय को पकड़ने की कूबत अब उनमें बची है।
 हालाँकि उन्होंने कभी तीव्रगामी पहियों पर सवार वक्त की रफ्तार को इतनी हडबडी में बदहवास भागते भी नहीं देखा। उनके दौर में भी वक्त कभी ठहरा नहीं पर इस तरह उद्दंड, उद्दाम वेग से समूची सभ्यता और उसकी चेतना को रौंदते, धराशायी करते हुए वक्त से उनका साबका पहली ही बार है। वह भी उस जूते की वजह से। वह जूता नहीं होता तो शायद वे उसको इस तरह नहीं ही देख पाते। बदलते दौर की आहट से तो वे बावस्ता थे लेकिन वक्त के इतना दूर चले जाने की कल्पना भी उन्हें नहीं थी।

 कभी उन्हें लगता कि जूता उनके गाल पर जड़ दिया गया है। वे दर्द और अपमानबोध से तिलमिला उठते हैं। कभी लगता कि जूते का आकार अनायास बड़ा हो रहा है। वह बढ़ते–बढ़ते इतना बड़ा हो जाता है कि बाज़ार से घर तक फ़ैल जाया करता है। वह बाज़ार से घर तक की समूची जगह को घेर लेता है। वे डरने लगते हैं। जूते से नहीं, बाज़ार और घर के बीच की जगह कम होते जाने से। उन्हें डर है कि कहीं यह जूता बड़ा-और बड़ा होते हुए उनके घर में तो नहीं पसर जाएगा।
वह जूता अब वहाँ नहीं था। वह लौट गया था लेकिन उनकी स्मृतियों में वह जूता अब भी वहीँ रखा हुआ था। उस खाली जगह पर अब भी उनकी स्मृतियों का जूता पड़ा हुआ था। चमचमाता हुआ काले रंग के चमड़े का जूता। उस पर करीने से काले रंग के महीन फीते गुंथे हुए थे। पैर की उँगलियों की और जाते हुए जूता नुकीला हो गया था। आम जूतों की तरह होते हुए भी उसमें कोई बात थी। ख़ास बात। मन मोह लेने वाली अदा थी उस जूते की। उसके अनाम कारीगर का हुनर क्या रहा होगा। यह उसका हुनर ही रहा होगा,जिसने उस जूते में अपनी जान डाल दी थी।

 अकूत दौलतमंद और ताकतवर एक बादशाह था। उसने दुनिया के सबसे हुनरमंद कारीगरों से कहा कि ऐसी मोहक और खूबसूरत तामीर की जाए कि दुनिया में किसी ने कभी सोची तक न हो। ख़्वाबों से भी हसीन। हजारों मजदूरों ने अपने खून–पसीने से कुछ ही सालों में ऐसी बेमिसाल तामीर का महल बनाया कि चांदनी रात में वह मोतियों की तरह झरता। नदी के पानी में अपना अक्स देख–देख महल इतराता। दुनिया ने ऐसा महल पहले कभी नहीं देखा था। इतना सुंदर तो बादशाह का ख्वाब भी नहीं था। दूसरे दिन कारीगरों को दरबार में बुलाया गया। कारीगर खुश थे कि उन्हें बड़ा इनाम मिलेगा। तख़्त पर बैठे बादशाह ने वजीर को आदेश दिया कि इन कारीगरों के हाथ काट दिए जाएँ ताकि ये और कहीं ऐसी तामीर नहीं कर सकें। कुछ ही देर में उनके हाथ काटे जा चुके थे। तब से लेकर अब तक फिर कहीं कोई ऐसी तामीर नहीं हुई हाँ, बादशाहियत बनी रही। बादशाह बनते, बिगड़ते और बदलते रहे।

 बचपन में सुना यह किस्सा उनकी स्मृतियों में हमेशा बना रहा। वे जब कोई नायाब चीज देखते तो उसके कारीगर के बारे में सोचते हुए डरने लगते। क्या पता उसके हाथ सलामत होंगे या नहीं। पहले पहल उन जूतों को देखकर भी उन्हें यही लगा था।

 उन्हें अपने गाँव का कालू मोची अभी भी याद है। अपने छोटे से घर के आँगन में पत्थर पर जूते गांठते हुए चमड़े को रांपी से काटता या हथौड़ी से ठोंकता तो लगता वह चमड़े को नहीं अपने समय को ठोंक–पीट रहा हो। वह जब अपनी पिरैनी से चमड़े को गाँठ रहा होता था तो लगता कि वह अपने अभावों को गाँठ रहा हो। रैदास के गीत गुनगुनाते हुए भी उसके हाथों की सधी हुई उँगलियाँ चमड़े को ठीक ऐसी मोडती कि चमडा खूबसूरत मोजडी में बदल जाया करता। उस पर चमड़े का फीता लगाता और सतरंगी फुंदा बांधता। फिर मोजडी का जोड़ा आँखों के सामने कर लेता। उसकी आँखे हंसने लगती। अपने ही हुनर पर शायद वह फ़िदा हो जाता। वह कभी खाली नहीं होता था, कभी जानवरों की खाल साफ़ करते हुए तो कभी मोजडी बनाते तो कभी फटे हुए जूतों में पैबंद लगाते हुए वह हर समय काम में लगा रहता।

 उसके आसपास नौसादर के पानी में सड़ते हुए चमड़े की बदबू फैली रहती। उन्हें लगता कि कालू अपने छोटे–छोटे औजारों से किसी बड़ी लड़ाई की तैयारी कर रहा है। वे उसे जीतता हुआ देखना चाहते थे लेकिन बादशाह और कारीगर के किस्से से भीतर ही भीतर डर जाया करते। कालू के हाथ तो नहीं काटे गए लेकिन अब उसके सीधे हाथ में कोई हरारत नहीं। उसकी देह के दाएं अंग को फ़ाज़िल हो गया है। अब वहाँ गीले चमड़े की गंध कहीं नहीं है। उसकी उंगलियाँ किसी छोटी-सी हरकत के लिए अब भी कसकती होंगी, थरथराती होंगी। वह अब आँगन में नहीं बगल की बरसाती में सारी रात खांसते और थूंकते हुए पड़ा रहता है। आँगन की छाती पर एक छोटी दुकान उग आई है। डायमंड फुटवेयर। उसके लडके शहर से नई चलन के जूते–चप्पल लाकर बेचते हैं। लडके कहते हैं कि इसमें मेहनत भी कम और मुनाफा ज्यादा। कालू बात काटता है, 'मुनाफा है पर हूनर...' लडके उसे खा जाने वाली निगाह से घूरते हैं। वह सहम जाता है।

 वे भी तो सहम गए थे। ठीक उसी तरह, जब मन्नू से उन्होंने जूते पर बात की थी। वे खुद को कालू में बदलते देख रहे थे... तो क्या हम सबकी नियति यही है। एक-सी नियति के लोग। अपने ही घर–परिवार से धीरे–धीरे हाशिये पर खिसकते लोग। उन्हें अब लगता है, उन्हें नहीं कहना थी मन्नू से जूते वाली बात... कहकर भी क्या हुआ। चुप रह लेते तो यूँ आज मन भारी नहीं होता। लेकिन नहीं कहते तो न जाने कब तक भीतर फांस चुभती रहती। खैर, अब उन्हें भी इस बात को नजरअंदाज़ कर देना चाहिए हमें थोडा–थोडा नजरअंदाज़ करना भी सीखना होगा। नजरंदाजी की आदत बनानी होगी।
 एक बार फिर उन्होंने उस खाली जगह को देखा, जहाँ कुछ देर पहले तक वह जूता पड़ा था। उस खाली जगह में उन्हें जूते की मुस्कराती छवि दिखाई दी। उस जूते ने इस बार एक कदम आगे बढ़कर घमंड से इतराते हुए जीत की कुटिल मुस्कान उनकी ओर फेंकी। यह उन्हें इतना उपहासिक लगा कि वे सहन नहीं कर सके, दर्द की ठंडी नश्तर धंस गई थी। वे जानते थे कि यह भ्रम है पर उसमें इतना गहरा तंज था कि वे भीतर तक बिलबिला उठे।

 उन्होंने अपनी पूरी ज़िन्दगी में कभी इतनी जलालत नहीं सही थी, लिहाजा यह उनके लिए पहला मौका था। वे अपने बचपन से ही गांधी दर्शन से खासे प्रभावित थे और अपरिग्रह का पालन करते हुए अपने लिए कम से कम संसाधन रखते थे। कम से कम ज़रूरतें और अच्छे विचार। अधिकारी होते हुए सादा पहनावा और ईमानदारी से उन्होंने घर चलाया। बच्चों को भी शुरू से अनुशासन में रखा और खूब पढाया–लिखाया। दोनों बेटियों की शादियाँ की, वे अपने घर चली गईं। बेटा मन्नू आगे पढाई के लिए यूएसए चला गया। वहीँ उसकी जॉब भी लगी। वे उसके वहाँ जॉब करने के खिलाफ थे। उन्हें लगता था कि बेटा पढाई के बाद इंडिया आए और यहीं कहीं नौकरी करे। सेलेरी भले ही कम हो पर यहीं रहे। पहले माँ–बहने भी खिलाफ रहीं फिर वहाँ मल्टीनेशनल कंपनी में साल की तनख्वाह आठ अंकों में सुनी तो उनकी खिलाफत ठंडी पड गई वे आखिर तक अड़े रहे। लेकिन उनकी किसी ने नहीं सुनी। यह उनकी पहली हार थी।

 फिर धीरे–धीरे पिता का स्नेह जीतता गया और उनकी हार फीकी पड़ने लगी। करीब–करीब हर रोज ही वीडियो कालिंग से उनकी बेटे–बहू और बच्चों से बातें हो जाया करतीं। साल में दो बार मन्नू बच्चों के साथ घर आता। माँ–पिता को बीमारियों का वास्ता देते हुए अपने साथ ले जाने की जिद करता। बहनों के यहाँ मिलने जाता।

 हालाँकि मन्नू के रहन-सहन का तौर–तरीका पूरी तरह से बदल गया था। उसकी हर ज़रूरत अब ब्रांड में बदलने लगी थी। पहनावे से लेकर क्रीम–पाउडर और चड्डी–बनियान तक। वह इस तरह इनका आदी हो गया था कि इनके बिना उसको अनकम्फर्ट महसूस होने लगता। वे अपनी ज़िन्दगी में जब, जहाँ और जो भी मिला, वापरते रहे पर मन्नू को देखकर वे सिहर उठते। ये लड़का किस तरफ जा रहा है। वे देखते कि मन्नू बेतहाशा और बिना सोचे-समझे अपने और अपने परिवार पर खर्च करने लगा है। उन्हें चिंता होने लगती। बावजूद इसके सब कुछ ठीक–ठीक चल रहा था।
 दरवाजे पर हुई आहट ने उन्हें चौंकाया। देखा तो सरूप था। उनके मुंह से अनायास निकला–"सरूप अच्छे वक्त पर आए हो, बड़ा बुरा लग रहा था। मन में न जाने क्या–क्या ख्याल आ रहे थे। चाय पियोगे ...?"
 सरूप अपनी आदत के मुताबिक पहले खांसा था और फिर लंबी सांस लेते हुए कहने लगा–"इधर से गुजर रहा था साहब तो आपकी याद आ गई, क्यों मन दुखी करते हो आप भी... अब मन्नू भैया का तो ऐसा ही चलता है। मन्नू भैया बच्चों के साथ आते हैं तो घर में होली और दीवाली साथ–साथ आ जाती है और जब जाते हैं तो..."

 “बात वह नहीं है सरूप, उसकी तो अब आदत बन गई है। पता है कि वो दो–चार दिन ही हमारा वक्त हुआ करता है। वक्त ने हमको अपनी तरह से ढाल लिया है।"
 वे सरूप को सब कुछ बताना चाहते थे। उससे खुलकर बात करना चाहते थे। अपने मन में चल रही घनमथान पर बातें करते हुए वे हल्के हो जाना चाहते थे। लेकिन भीतर कुछ था, जो उन्हें रोक रहा था। सरूप उनके नजदीक था पर आखिरकार बाहर का ही। घर की अंदरूनी बातें उससे करना ठीक नहीं होगी।

 उधर सरूप चिंता में पड गया था।–"साहब, तबीयत नरम–गरम तो नहीं हो रही। ब्लड प्रेशर की दवाई लेना तो नहीं भूल गए, अस्पताल ले चलूँ क्या?"
 "अरे, चिंता की कोई बात नहीं रे सरूप, यह तो उमर का ही कसूर है। इस दौर में आदमी ज़रूरत से ज़्यादा सोचने–समझने लगता है। नहीं सोचना चाहिए पर क्या करें, बस में भी कहाँ...यह भी जानते हैं कि इससे कुछ नहीं बदलेगा। सब कुछ अपनी रफ्तार से ही चलेगा। हम उसे बदल नहीं सकते। हम इस रफ्तार से बाहर किए हुए लोग हैं, जहाँ से हम पैवेलियन के दर्शक की तरह उन्हें रफ्तार में दौड़ते हुए देख रहे हैं।"–उनका चेहरा तमतमा गया था।

 "हाँ, साब दुनिया ऐसे ही बनती है। नया आता है तो पुराने को जाना ही पड़ता है। देखिए न मैं भी तो रफ्तार का ही शिकार हूँ। उन निर्जीव मशीनों की रफ्तार ने एक ही रात में हम बारह सौ मजदूरों को फेक्ट्री से निकाल बाहर कर दिया। सवाल मशीनों का भी नहीं है, मशीने पहले भी थी और वक्त के साथ बदलती जाएंगी। सवाल तो हमारी सोच का है। विदेशों में आबादी कम होने से ज्यादातर काम मशीनों से करना पड़ता है पर हमारे यहाँ आबादी ज़्यादा होने पर भी मशीनों का मोह इसीलिए है कि इससे मजदूर कम रखने होते हैं। तनख्वाह कम तो मुनाफा ज्यादा। एक झटके में हम रफ्तार से परे धकेल दिए गए थे। फेक्ट्री को हमने अपने खून–पसीने से सींचा था। भूखे–प्यासे रहकर भी उसकी साख बनाई थी। आज दुनियाभर में इसके जूतों का डंका बजता है तो हमारे ही हुनर पर..."
 उसने खांसने के बाद लंबी सांस भरी और कहने लगा–"यह हमारा हूनर ही था कि जूते मुंह से बोलते थे। सन सत्तर के आसपास जब फेक्ट्रियां लगाने के लिए सरकार ने इस कस्बे को चुना। तभी टाटा ने पहली बार यहाँ चमड़े का सामान बनाने का कारखाना खोला था। दो रोटी की चाह में हम भी जुट गए थे। गाँव में खबर पंहुची तो पिता उखड़ पड़े थे- “यही बाक़ी रह गया था। इसीलिए तुम्हें पढाया–लिखाया कि ठाकुर की औलाद होकर जूते गांठने का काम करो। क्यों मेरे नाम पर बट्टा लगा रहे हो। गाँव आ जाओ, खेत इतना तो देते ही हैं कि कोई भूखा न रहे। पर साब नहीं लौटे तो नहीं लौटे हम भी... डटे रहे और खटते रहे यहीं पर।"

 "सरूप, तुम्हारी ये कहानी कई बार सुन चुका हूँ पर क्या करें... हम सब इस समय के आगे बेबस हैं। बेबस और निहत्थे। हमारे पास न इसके उस पार जाने का रास्ता है और न ही कोई तैयारी। इस चकाचौंध में हमारी आँखों की पुतलियाँ रतौंधी का शिकार हैं। हम मुट्ठीभर लोग बख्तरबंद हो भी जाएं तो क्या कर सकते हैं। हमारी हड्डियां थक चुकी हैं और नए लोगों से तो कोई उम्मीद भी नहीं..."
 "अच्छा मैं चाय बनाता हूँ। मन्नू की माँ सत्संग में गई है। उसे लगता है कि बुढापे में यही रास्ता बच रह गया है। पता नहीं उसे लगता है या सत्संग वाले स्वामीजी की बात को ही दोहराती रहती है। कहती है कि सारी ज़िन्दगी अपने लिए जीते रहे, आखरी वक्त तो ऊपर वाले की लौ जगा लो। यही साथ जाएगा। यही सत्य है। मुझे नहीं लगता कि यह सत्य होगा। यही सत्य होता तो स्वामीजी इतना बड़ा मठ क्यों खड़ा करते। सत्संग में वे जिस माया को परे धकेलने की बात करते हैं, खुद उसमें ही क्यों उलझे रहते।"

 सरूप बगीचे में काम करने चला गया और वे चाय बनाने किचन में। उन्होंने चाय चढ़ाकर लाइटर से गैस चूल्हा ऑन कर दिया। चाय धीरे–धीरे उबलने लगी। उबाल उनके भीतर भी फूट रहा था।
 सरूप से उनका वास्ता करीब दस साल पहले हुआ था, जब चमड़े की टाटा फेक्ट्री से उसे निकाला जा चुका था। वह बहुत सदमे में था। उसके बच्चे अभी आठवीं–दसवीं में ही पढ़ रहे थे। नौकरी छूटने से उसका परिवार अब कैसे चलेगा। यह चिंता उसे खाए जा रही थी। उसने पढाई के बाद फेक्ट्री में काम करते हुए चमड़े के काम का हुनर सीख लिया था। इसके अलावा रोजी–रोटी के लिए उसे कोई काम नहीं आता था। तब उन्होंने ही उसे कुछ पैसे दे जूते बनाकर बेचने के लिए प्रेरित किया था। वह टाटा से कच्चा माल ले आता। उसने भी कुछ पैसे जोड़े थे, उससे ज़रूरी औजार खरीद लिए फिर जूते बनाने लगा। पहली जोड़ी उन्होंने ही उससे खरीदी थी। उसने बहुत सुंदर, फिट और आरामदेह जूता बनाया था। कुछ और जोड़ियाँ भी बनाई, उन्हें बेचने के लिए खूब हाथ–पैर मारे। बाज़ार भर में मेहनत की पर कुछ नहीं हुआ। हर किसी को ब्रांड चाहिए था। वे जूता नहीं पहनते थे, ब्रांड पहनते थे। अब जूता पैरों के लिए ज़रूरी नहीं,स्टेट्स सिंबल बन चुका था।

 उन्हें पिता याद आए, जो एक ही जूते को कई सालों तक पहना करते। जूते में छोटी–मोटी टूट–फूट भी हो जाती तो वे मोची से उसे दुरुस्त करवा लिए करते। बारिश के चार महीनों में चमड़े के जूतों को कपड़े में बांधकर सहेजते, फिर बारिश खुलने पर उनकी सफाई और पालिश करते। उनमें नए फीते डालते तो उन्हें लगता कि नए जूते पहने हैं। नए जूते काटते तो वे उनमें रुई के फाहे चिपका लेते। बारिश के दिनों में वे नायलोन के जूते पहनते और बारिश के बाद उन्हें सहेज कर रखते अगली बारिश के इंतज़ार में। उनके जूते देखकर हम मौसम का हाल पता कर लेते थे।
 चाय उबल गई थी। उन्होंने दो प्यालों में गर्म चाय उंडेली और प्यालों को दोनों हाथों में थामे उन्हें ड्राइंगरूम के सेंटर टेबल पर रख दिया। सरूप को आवाज़ दी और चाय के प्यालों से उठते धुंए के छल्लों को वे देर तक देखते रहे। उन्हें लगा हमारे बच्चे भी इन छल्लों की तरह ही हमसे दूर कहीं खो गए हैं। इस चकाचौंध भरे मेले में कहीं गुम चुके हैं।

 सरूप और वे दोनों चाय पी रहे थे। ड्राइंगरूम में खामोशी पसरी थी। कभी-कभार सिर्फ़ चाय की सिप सुनाई देती थी। यह खामोशी उनके पूरे दौर की खामोशी थी। भीतर के भरे–पूरे उबाल के बावजूद बाहर की खामोशी। वे चाय नहीं अपने वक्त की सिप ले रहे थे। घूंट–घूंट। ड्राइंगरूम के बाहर की ज़िन्दगी रोजमर्रा की तरह आबाद थी। बाज़ार सुबह की अंगडाई लेने के बाद खुलने लगे थे। दुकानों के सिर पर ताज की तरह सजे वस्तुओं के ब्रांड के साइनबोर्ड धूप में छुरे की मानिंद चमकते हुए जगमग हो रहे थे। टीवी पर संसद में विदेशी निवेश को बढ़ाने का प्रस्ताव पास हो रहा था। ठीक उसी वक्त इस ड्राइंगरूम में दो बूढ़े अपनी चित परिचित उदासी में डूबे खामोश चाय पी रहे थे। छले जा चुके बूढ़े।

 चाय पीते हुए वे सोच रहे थे उसी जूते के बारे में। मन्नू के जूते के बारे में। उन्होंने फिर एक बार उस जगह पर डरते हुए दृष्टि डाली,जहाँ कल तक वह जूता रखा था। उन्हें हैरत हुई कि अब वहाँ जूता नहीं था। सरूप के आने के पहले तक वही जूता उन्हें चिढाने का भ्रम दे रहा था पर अब वह यहाँ नहीं है। क्या सरूप की आँखों का लिहाज कर रहा है।
 जब पिछली बार मन्नू आया था तब वे उसे टाटा कंपनी के आउटलेट पर ले गए थे। एक हजार से लगाकर तीन हजार तक के अच्छे से अच्छे जूते वहाँ थे। नई से नई डिजाइन और उम्दा दर्जे के जूते लेकिन मन्नू को नहीं जंचे थे। मन्नू बाहर निकल आया था और कार के पास खड़े होकर किसी से मोबाइल पर बतिया रहा था।

 उन्होंने काउंटर पर बैठी लडकी से मुस्कराते हुए कहा था...”आजकल के बच्चों की पसंद भी बड़ी टिपिकल होती है। उन्हें चीजों से ज़्यादा उसके ब्रांड की ज़रूरत हुआ करती है।“
 काउंटर पर बैठी लडकी भी मुस्कराई थी। फिर उसने अपनी सूनी आँखों में चमक भरते हुए कहा–"कोई बात नहीं सर... टाटा का ब्रांड भी पूरे देश में पहचाना जाता है और हमें यह बताते हुए प्राउड फील हो रहा है कि ये जूते यहाँ से एक्सपोर्ट भी होते हैं। दुनिया के नामी ब्रांड के जूते यहीं से जाते हैं।"

 "मैं कुछ समझा नहीं... दुनिया के नामी ब्रांड के जूते यहीं से...कैसे?"
 उसने काउंटर के पीछे अपनी कुर्सी से खड़े होते हुए कहा–"सर, बात यह है कि दुनिया के कई नामी ब्रांड ऐसे होते हैं, जो खुद कोई चीज नहीं बनाते। वे सिर्फ़ अच्छी चीजें खरीदते हैं और उन्हें अपने टेग लगाकर ऊँचे दाम पर बेचते हैं। यही जूता यूएसए में जाकर फुगाटी का नामी जूता हो जाता है।"
 "फुगाटी का जूता तो काफी महंगा होता है...?" उन्होंने आश्चर्य से आँखे फैलाकर पूछा था।
 "हाँ सर, वहाँ करीब तीस–बत्तीस हजार का पड़ता है।"
 "ओह्ह, एक टेग लगा देने से सीधे दस गुना कीमत बढ़ जाती हैं"
 "हाँ सर और लोग वहाँ ख़ुशी–ख़ुशी साढ़े चार सौ डालर में इसे खरीदते हैं।"
 बाद में इसकी तस्दीक उन्होंने सरूप से भी की थी। इस बात को कई महीने बीत गए इस बीच मन्नू दो बार इंडिया आया भी। बात आई–गई हो गई
सरूप अपना प्याला खालीकर फिर से बगीचे में काम करने लौट गया था। वे सिलसिलेवार तीन दिन पुराने वाकिये को याद कर रहे थे।
 इस बार जब मन्नू यहाँ आया तो चमचमाता चमड़े का जूता उसके पैरों में था। उसने घर में घुसने से पहले ठीक इसी जगह उतारा था अपना वह जूता। उन्होंने फिर उस खाली जगह को देखा, बिच्छु के डंक की तरह वह जगह उन्हें झनझना रही थी। जब मन्नू आया था तो जूते को पहन कर लेकिन जब लौटा तो जूते ने उसे पहन लिया था।
 उन्होंने जूते के बारे में मन्नू से पूछा तो उसने बताया कि यूएसए  के प्रसिद्ध शोरुम से इसे साढ़े चार सौ डालर में खरीदा है। यह दुनिया की सबसे बड़ी ब्रांड फुगाटी का जूता है। इसकी चमक देखिए, पहनने पर इतना हल्का और कम्फर्ट लगता है जैसे आपने जूता पहना ही नहीं।
 फुगाटी का नाम सुनते ही उनका पारा चढ़ गया था।
 "तुम्हें कुछ पता भी है। फुगाटी कोई जूता नहीं बनाती, वह सिर्फ़ अपना टेग लगाती है। यह जूता तो यहीं की फेक्ट्री में बना हुआ है। इसकी कीमत यहाँ महज ढाई–तीन हजार की है। यानी महज चालीस डालर का"-उनकी आवाज तल्ख होती जा रही थी।
 "अरे, इसमें इतना हायपर होने की क्या बात है। वहाँ साढ़े चार सौ डालर मेरी दो दिन की कमाई है। कुछ कम-ज्यादा दे भी दिया तो कौन-सी मुसीबत टूट पड़ी।"-मन्नू ने बेपरवाही से जवाब दिया।
 मन्नू की माँ ने उन्हें रोक दिया, वे कहना चाहते थे कि यह थोड़े पैसे ज़्यादा दे देने भर की बात नहीं है। यह जूता मारा है फुगाटी ने तुम्हारे चेहरे पर। तुम्हारे पूरे समाज पर।
 उनकी साँसे उखड़ने लगी थी।
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मनीष वैद्य 


परिचय

मनीष वैद्य
जन्म – 16 अगस्त 1970, धार (म.प्र.)
शिक्षा -एम ए, एम फिल (हिंदी साहित्य), राहुल सांकृत्यायन पर शोध
हंस, पहल, कथादेश, वागर्थ, पाखी, कथाक्रम, इन्द्रप्रस्थ भारती, अकार, लमही, परिकथा,
 कथाबिम्ब, वीणा, साक्षात्कार, आउटलुक, पुनर्नवा, अक्षरपर्व, युद्धरत आम आदमी सहित
 महत्वपूर्ण सहितियिक पत्र - पत्रिकाओं में 60 से ज्यादा कहानियाँ प्रकाशित.
पानी, पर्यावरण और सामाजिक सरोकारों पर साढे तीन सौ से ज्यादा आलेख पत्र – पत्रिकाओं 
में प्रकाशित, आकाशवाणी से भी नियमित प्रसारण.
कहानी संग्रह -
टुकड़े-टुकड़े धूप (2013)
फुगाटी का जूता (2017)
पुरस्कार -
प्रेमचन्द सृजनपीठ उज्जैन से कहानी के लिए सम्मान
यशवंत अरगरे सकारात्मक पत्रकारिता सम्मान (2017)
कहानी के लिए प्रतिलिपि सम्मान (2018)
संप्रति -पत्रकारिता और सामाजिक सरोकारों से जुडाव

संपर्क- 11 ए मुखर्जी नगर, पायोनियर स्कूल चौराहा,
  देवास (मप्र) पिन 455001
           मोबाइल - 9826013806
           manishvaidya1970@gmail.com





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