Thursday, July 14, 2016



समालोचन के सोजन्य  से  कथाकार राकेश दुबे की कहानी "कउने  खोतवा में  लुकइलू " प्रस्तुत है |

इस कहानि को "उसने कहा था" के समानांतर देखा जा रहा  है |आपकी क्या राय है |क्या इस कहानी में भी "उसने कहा था" जितनी प्रेम की गहराई है ?

यह कहानी व्हाट्स अप के साहित्यिक समूह "साहित्य की बात "  जिसके एडमिन ब्रज श्रीवास्तव है पर पोस्ट की गई |जहाँ पर कहानी के कई अनछुए पहलुओं पर भी विषद चर्चा हुई | समूह की प्रतिक्रियाए सलग्न है |इसी कहानी पर आलोचक ,समीक्षक ,कथाकार राकेश बिहारी ने  विस्तृत विश्लेषण करते हुए सटीक  व्याख्या की है ,जिसके उजास में पाठक कहानी को नई द्रष्टि से देख ,समझ पाता है |समालोचन पर राकेश बिहारी के आलेख का लिंक है ....
http://samalochan.blogspot.in/2016/07/blog-post_5.html






कहानी
कउने खोतवा में लुकइलू                                       

राकेश दुबे  





वंशी काका आजकल दिन में तीन चार बार मोहन के घर जाकर यह जरूर पूछते हैं कि वह शहर से कब आएगा. उनके इस बेचैनी का रहस्य मोहन के घर वाले बखूबी जानते हैं. वे ही क्या पूरा गांव जानता है कि उनके इस तरह से बेचैन होने का क्या मतलब है. मोहन के घर वाले मुस्कराते हैं ‘काका इस बार तो मोहन महीने भर बाद ही घर आएगा.’

उनके इस जवाब पर तड़प उठते हैं काका ‘लेकिन वह तो हर शनिवार को घर आता है.’
आता तो है लेकिन इस बार परीक्षा की वजह से नहीं आएगा.

अरे कौन सी कलेक्टरी की परीक्षा है जो एक दिन घर आने से खराब हो जाएगी. झल्लाते हैं वंशी काका. काका की झल्लाहट का मतलब साफ है. मोहन शहर जाते समय जरूर उनको छूकर चला गया होगा.अब जब तक वे भी मोहन को छू नहीं लेंगे ऐसे ही बेचैन रहेंगे.

वर्षों हो गये यदि कोई वंशी काका को छू ले तो जब तक वे उसे दुबारा छू न लें चैन नहीं आता उन्हे. वे ऐसा क्यों करते हैं किसी को इसका ठीक ठीक कारण नहीं पता है लेकिन अनुमान सबके पास है. किसी के लिए यह मानसिक बिमारी है तो किसी के लिए भूत प्रेत का साया. कारण चाहे जो भी हो पर काका की इस आदत ने बच्चें को मनोरंजन का एक नया साधन दे दिया है. वे काका को छूकर भाग जाते हैं काका उन्हे छूने के लिए उनके पीछे जी जान से दौड़ लगा देते हैं. कई बार उन बच्चों को न छू पाने की कातरता उनकी आंखो से आंसुओं के रूप में दिखने लगती है.बच्चे जल्दी ही सबकुछ भूल दूसरे काम में लग जाते. उन्हे आश्चर्य तब होता जब दो चार दिन बाद आचानक काका उन्हे छूकर धीरे से मुस्करा उठते ‘देखा. मैने तुम्हे छू लिया.तुम उस दिन मुझे छूकर भाग गये थे.’ उस समय उनके चेहरे की खुशी देखने लायक होती. धीरे धीरे पूरा गांव उनकी इस आदत से परिचित हो गया. अब तो नात रिश्तेदार भी जान गये हैं. बच्चों के साथ साथ बड़े बूढ़े भी अब मजे लेकर उनकी इस आदत का जिक्र करते हैं.

उनकी इस आदत के अलाव बच्चे उन्हे एक और बात के लिए तंग करते हैं. जब भी वे उन्हे एकांत में पाते हैं घेर कर खड़े हो जाते हैं ‘काका.गाना सुनाइए न.’
चुप ससुर नहीं तो. गाना सुनाइए.अपने बाप से क्यों नहीं कहते गाना सुनाने को. काका डपट देते.

काका अगर गाना नहीं सुनाओगे तो हम तुम्हे छूकर भाग जाएंगे. बच्चे अपना आखिरी और सबसे मजबूत दांव आजमाते.

इस दांव पर काका हमेशा ही हथियार डाल देते हैं. वे तुरत पालथी मार कर बैठ जाते हैं जैसे पूजा की तैयारी कर रहे हों. बच्चे भी उन्हे चारो ओर से घेरकर बैठ जाते हैं. सभी यह जानते हैं कि बाबा वही गीत सुनाएंगे फिर भी सब दम साधे रहते हैं.अनगिनत बार वे यह गीत सुन चुके हैं लेकिन जब भी काका यह गीत सुनाते हैं गाँव का उदंड से उदंड बच्चा भी भाव विभोर हो उठता है. बाबा की आवाज वातावरण को बेध उठती है

‘कवने खोतवा में लुकइलू अहि रे बालम चिरई.’ वर्षों से बाबा केवल यही गीत गाते हैं.एक अजीब सी तड़प होती है उनकी आवाज में. कभी कभी तो रात के बारह बजे जब पूरा गांव दिन भर की मेहनत के बाद गहरी नींद सो रहा होता है काका की तड़पती टेर न जाने कितने कलेजों में कसक पैदा कर जाती.

लेकिन गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि वंशी कभी और भी गाने गाते थे. वे उनकी उठानी के दिन थे. बहुत जल्दी ही उनकी आवाज का जादू गांव जवार के सर चढ़कर बोलने लगा. वे देखते देखते ही गांव की कीर्तन मंडली की शान बन गये.कसा हुआ सलोना शरीर कंठ में साक्षात् सुरसती का वास.वे जब भी कहीं बाहर गाने जाने को तैयार होते मां सर और गले पर काजल का टीका जरूर लगातीं. वंशी कई बार झल्ला उठते ‘अब मैं कोई छोटा बच्चा नहीं हूँ जो किसी की नजर लग जाएगी.’

मां मुस्कराती ‘तुम कितने भी बड़े हो जाओ लेकिन मेरे लिए तो बच्चे ही रहोगे. तुम्हे क्या पता है एक से एक जादूगरनियां हैं एक नजर से ही ऐसा गला बांध देती हैं कि सांस नहीं निकलती. वंशी चुप होकर हौले से मुस्कराने लगते. जब वे गांव के शिवाले पर ढोल और मजीरे की थाप पर ‘तुहरे सरनियां में बानी सुन हे भोला अवढर दानी’ का आलाप लेते तो बड़ी बूढ़ी औरतों के तमाम पहरे के बावजूद अनगिनत खिड़कियां खुलने की जिद कर बैठतीं.

गांव वालों को अब होली का बेसब्री से इन्तजार है.इस बार होली पर फाग्ाका मुकाबला पड़ोस के गांव बीरपुर में होना है.इन दोनों गांवो का सम्बन्ध भारत पाक सम्बन्धो की याद दिलाता है. खेल हो संगीत हो या मेड़ डांड़ का मसला हो हर जगह एक दूसरे को नीचा दिखाने का कोई भी मौका कोई नहीं छोड़ना चाहता है. होली के दिन फाग के मुकाबले की परंपरा वर्षों पुरानी है जो एक साल इस गांव में तो दूसरे साल बीरपुर में होता है.फाग के रूप में बकायदा जंग. साल भर गवइयों की टोली केवल इसी दिन के लिए रियाज करती है. विजेता की औपचारिक घोषणा न होने के बावजूद यह पता चल ही जाता है कि कौन बीस रहा.प्रतिद्वंदिता के बावजूद श्रेष्ठता पर वाह वाह करने का कलेजा गांव की विशिष्टता है.

गांव के लोग मन ही मन यह स्वीकार करते हैं कि बीरपुर वाली टोली अच्छा गाती है.लेकिन इस बार वंशी की गायकी देखकर उनके मन में उत्साह है.वंशी जैसा गवैया उनकी टोली में नहीं है.वह अकेले पूरे गांव पर भारी पड़ेगा. माना कि मुकाबला उनके गांव में है लेकिन अच्छी गायकी का वे भी सम्मान करते हैं. प्रधान जी ने ऐलान कर दिया है ‘अगर बीरपुर में झण्डा गड़ गया तो पूरी टोली को पंचायत की ओर से दावत.’

वंशी भी उत्साहित है. नहा धोकर सबेरे ही काली माई के चौरे पर कपूर जला आया ‘माई लाज रखना. मर्द की जान भले ही चली जाए लेकिन शान नहीं जानी चाहिए. पानीदार मरद का जीवन शान के बिना मृतक के समान होता है. पगड़ी की लाज रखना माई.’

पेट्रोमैक्स की रोशनी में समूचा बीरपुर नहाया हुआ है. बुजुर्ग चारपाई पर तो बच्चे और जवान नीचे ही बैठकर मुकाबले का मजा ले रहे हैं. एक किनारे औरतों की मण्डली भी जमी हुयी है. मुकाबला अब तक बराबरी का ही चल रहा है.

वंशी के उठते ही माहौल में गरमी आ गयी. उसकी गायकी की खबर बीरपुर में भी पहुँच चुकी है. वे जानते हैं कि यह मुकाबले का निर्णायक दौर है. वंशी ने मन ही मन काली माई का सुमिरन किया फिर भीड़ का जायजा लेना शुरू कर दिया. आचानक उसकी नजर औरतों की टोली में ठहर गयी. एक चेहरे ने मानो उसे बांध ही लिया. उसने कोशिस किया वापस आने का लेकिन सफलता नहीं मिली. भीड़ का उत्साह चरम पर था.

वंशी को चुहलबाजी सूझी. नजरों से ही पूछ लिया ‘का गुइयां.साथ दोगी.’
नजरें मुस्कराईं ‘गांव से दगा नहीं कर सकती.’
वंशी के होठ फड़के ‘लड़की का असली गांव तो ससुराल का होता है न.’
उधर भी होठ बुदबुदाए ‘इतनी जल्दी.पहले जीतो तब सोचेंगे.’
दिल धड़क उठा वंशी का ‘तो इसे स्वयंवर समझे.तुम हार जाओगी.’
धड़कन ही इठलाई ‘देखेंगे.’
वंशी ने खुद को संयत किया सुर का संभाला और आलाप लिया

‘तुहरे झुलनी के कोर कटारी जान हति डारी.
कि झुलनी तू नइहर पवलू कि पवलू ससुरारी.
कि झुलनी कोई यार गढ़ावत कि कइलू सोनरवा से यारी जान हति डारी.’’

गांव के लोगों ने वंशी को कंधे पर उठा लिया. काली माई की जय महावीर स्वामी की जय से वातावरण गूंज उठा. वंशी ने मैदान मार लिया. बीरपुर के लोगों ने भी खुले मन से बधाई देना शुरू कर दिया. लेकिन भीड़ में घिरा वंशी किसी और को ही तलाश रहा था.
जाते जाते चेहरे ने पलट कर देखा. वंशी मुस्कराया ‘वादा याद रखना गुइयां.तुम हार गयी.’
चेहराया मुस्कराया ‘तुम सचमुच जीत गये.’

पूरा गांव इस जीत से उत्साहित है.वर्षों बाद पड़ोसी गांव के सामने सर उंचा करके चलने का मौका आया है.पंचायत की ओर से कीर्तन मंडली को दावत दी गयी.वंशी के लिए तो प्रधान जी विशेष रूप से शहर जाकर जींस की पैंट और टी शर्ट लाए.वंशी गांव का नया हीरो हो गया है लेकिन यह केवल वंशी को पता है कि वह हार गया है.उसे ऐसा लग रहा है जैसे वह उस रात वापस ही नहीं आ पाया.रात को जब भी सोना चाहता है दो उदास आंखे सामने खड़ी हो जाती हैं ‘हमने तो तुम्हे अपना मान लिया है.कहीं तुम वादा भूल तो नहीं जाओगे.’

वंशी करवट बदलता है ‘तुम्हे भूल ही तो नहीं पा रहा हूँ गुइयां. पर तुम्हे ढूंढे भी कहां. नाम तो तुमने बताया ही नहीं अपना.’

‘बुद्धू तुमने पूछा भी कब.’
पूछता कैसे. तुम इतनी भीड़ में जो थी.

वंशी बेचैन हो उठता.यह बेचैनी हर दिन बढ़ रही थी. मंडली वाले साफ महसूस कर रहे थे कि बीरपुर से आने के बाद वंशी बेमन हैं. अब वे श्रृंगार में भी विरह का आलाप लेने लगे हैं. घर के किसी काम में मन नहीं लगता.लोग सोच में हैं.क्या यह वही वंशी है जो मिलने पर घंटो इधर उधर की बातें करता.कई बार तो लोग झुंझला उठते ‘अरे भाई तुमको को तो कोई काम धाम है नहीं हमें बहुत काम करना है.’

वंशी मुस्कराकर कहता ‘कभी हम भी काम करेंगे.’ आज वही सामने से इस तरह निकल जाता है जैसे देखा ही न हो. आजकल उसका अधिकांश समय बीरपुर के सिवान पर ही बीतता है. अकेले सिवान पर बैठे बैठे वह बीरपुर की ओर न जाने क्या एकटक निहारता रहता है.कई बार अकेले ही बड़बड़ाता है ‘यह तुमने क्या किया वंशी.कहां दिल लगा बैठे.न नाम पूछा न पता.पता नहीं उसे तुम्हारी परवाह भी है या नहीं.कहां परवाह है. परवाह होती तो इस तरह से आराम से घर में थोड़े ही बैठी होती.जरूर किसी न किसी माध्यम से खबर भेजती.लेकिन खबर भेजती भी तो कैसे.जब वह मर्द होकर खबर नहीं भेज पाया तो वह बेचारी.वंशी आलाप लेते हैं

‘मंदिर से मस्जिद ले ढूंढली गिरिजा से गुरूद्वारा
काशी से मथुरा ले ढूंढलीं ढूंढलीं तीरथ सारा
पंडित से मुल्ला ले ढूंढली ढूंढलीं घरे कसाई
सगरी उमरिया छछनत जियरा कंहवा तुहके पांई कवने बतिया पर कोंहइलू अहि रे बालम चिरई.’’

राप्ती की बाढ़ सचमुच इस साल कहर ढाने पर आमादा है. हर तरफ पानी ही पानी. सारी फसल बर्बाद. गांव के लोग बिल्कुल खाली. जब फसल ही नहीं तो काम क्या करेंगे. कल तो पानी गांव में भी प्रवेश कर गया. पांड़े चाचा बताते हैं कि पिछले 25 सालों में यह पहला मौका है जब राप्ती का पानी गांव में पहुँचा है. सभी बंधे पर शरण लिए हैं. बाढ़ ने समाजवाद ला दिया है. वंशी मन ही मन मुस्कराता है. जय हो राप्ती मइया. तुम्हारी लीला अपरंपार है. एक झटके में दूबे चौबे यादव हरिजन सबको बराबर कर दिया.थोड़े से जगह में पूरा गांव.किसी के छूने से किसी का धरम नहीं बिगड़ रहा है.

वंशी के खुश होने का एक और भी कारण है जिसे वह किसी से भी जाहिर नहीं करता.बाढ़ के कारण बीरपुर के लोग भी इसी बंधे पर आ गया है. और वे जाते भी कहां. जीवन की चाह सभी मान सम्मान पर भारी पड़ती है और जीवन फिलहाल इसी बंधे पर है.वंशी उत्साहित है. यही मौका है उसे ढूंढ़ने का.ढूँढ़ लो अपनी गुइयां को.

पूरे बंधे पर केवल प्लास्टिक के तंबू नजर आ रहे हैं जैसे विशाल जलराशि में तमाम नौकाएं तैर रही हों. औरतें बच्चे बूढ़े सभी उसी बरसाती में.दोनों गांवो के बीच की दीवारें भी तमाम चीजों के साथ इसी जल में विलीन हो गयी हैं. वर्षों बाद यह देखने को मिला है जब दोनों गांवो के लोग एक साथ मिलकर राप्ती मइया की प्रार्थना कर रहे हैं ‘हम वर्षों  से तुम्हारी छांव में जीवन बसर करते रहे हैं. तुमने हमेशा हमें माँ की तरह प्यार दिया है अब हमसे कौन सी ऐसी गलती हो गयी है जो तुम इस तरह से नाराज हो गयी हो.’

बनवारी यादव खांसते खांसते बोल उठते हैं ‘धरती पर जितना ही अधरम बढ़ेगा उसका यही परिणाम होगा.परलय आखिर इसी को तो कहते हैं.’

सुदामा समर्थन करते हैं ‘ठीक कहते हो बनवारी भाई.जहां देखो वहीं झूठ फरेब और मक्कारी.आदमी आदमी का गला काटने में लगा हुआ है.यह तो केवल चेतावनी भर है आगे आगे देखो होता क्या है.’

तमाम परेशानियों के बावजूद नौजवान खुश हैं.कोई काम नहीं सिर्फ दिन भर की तफरी.सबेरे से ही बोरियां बिछाकर ताश की अलग अलग टोलियां जम जाती हैं.मजीद मास्टर का हृदय परिवर्तन उन्हे आश्चर्य चकित कर रहा है.नाव पर सवार होकर कस्बे से गुटखा लाते हैं.आम दिनों में अपने बाप को भी उधार देने से मना करने वाले मास्टर आजकल किसी को भी मना नहीं कर रहे हैं.जिसके पास नहीं भी पैसा है उसे भी.पूछने पर मुस्करा देते हैं ‘अब इसमें क्या हिसाब रखना.जो बचेगा वह जोड़ेगा.कोई लेकर थोड़े ही जा पाएगा.’मजे की बात यह कि आम दिनों में उधार न देने पर मास्टर को गालियां देने वाले आजकल उधार लेने से बच रहे हैं ‘कौन जाने जिन्दा भी रहें या नहीं.फिर किसी का उधार खाकर क्या मरना.’

ताश और गुटखे की जुगलबन्दी. मजा यह की कोई टोकने वाला भी नहीं.और दिन होता तो गालियों से कान पक जाते ‘ससुरे आवारा हो गये हैं. न कोई काम न धाम. जब देखो तब ताश.इन तशेड़ियों ने गांव का माहौल खराब करके रख दिया है.’शिवपूजन मिसिर का यह रटा रटाया जुमला है जिसे सुनने की आदत हर नौजवान को है.आजकल वही शिवपूजन मिसिर अक्सर कहते सुने जाते हैं ‘लड़के भी बेचारे क्या करें. अब कोई काम धाम भी तो नहीं रह गया है.अब ताश भी न खेलें तो कहां जाएं.

सूरज के मगन होने के अपने कारण हैं. वह रोज राप्ती मइया का धन्यवाद देता है ‘हे मइया.पूरे महीने ऐसे ही कृपा रखना. कहां रधिया से मिलने के लिए दिन रात जुगत भिड़ानी पड़ती थी कई कई दिन चक्कर लगाने के बाद भी देखना नसीब नहीं हो पाता था और आज्कल राप्ती मइया की कृपा से बिल्कुल बगल में ही उसकी बरसाती है. रधिया इतनी नजदीक है कि वह रात को उसकी धड़कन को भी साफ साफ महसूस कर सकता है. गांव के तमाम प्रेमी प्रेमिकाओं की आजकल चांदी है.

शाम होते ही कीर्तन मंडली जम जाती है. समय जो काटना है.दोनो गांवो के लोगो को एक साथ गाते हुए देखना सबको सुखद लगता है. देर रात तक ढोल मजीरों की थाप पर जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी को ठेंगा दिखाते देखना किसी के लिए भी आश्चर्यजनक हो सकता है पर यहां के लोगों के लिए यह स्वाभाविक सा ही है.वंशी की कमी जरूर सबको खलती है. उसे पता नहीं आजकल क्या हो गया है मंडली में शामिल ही नहीं होता. बहुत कहने सुनने के बाद यदि आता भी है तो बस चुपचाप बैठा रहता है. उसे तो आजकल समाजसेवा का धुन सवार है. दिन भर समाजसेवी संस्थाओं की गाड़ियों की बाट जोहता रहता है.खाने के पैकेट दवाइयां कपड़े इकट्ठा करता है फिर शाम को घर घर घूम कर बांटता है. बड़े बूढ़े उसकी इस लगन से गदगद् हैं ‘वंशी बहुत समझदार और संवेदनशील लड़का है.जब गांव पर इस तरह की विप़त्ति आयी हो तो भला गाना बजाना कैसे किया जा सकता है.गीत गवनई तो उछाह का मामला है.उ न्हे इस बात का थोड़ा जरूर मलाल रहता है कि वंशी अपने गांव से अधिक बीरपुर का खयाल रखता है.

तुम वंशी हो ना. ’छोटी बच्ची के इस सवाल पर वंशी अचकचा गया.
हां लेकिन तुम्हे कैसे पता.’
क्योंकि मुझे सोना दीदी ने बताया था.’
अच्छा. लेकिन तुम्हारी सोना दीदी मुझे कैसे जानती हैं.
क्योंकि तुम चोर हो.
क्या तुम्हारी सोना दीदी पुलिस हैं.
नहीं.
फिर वह मुझे कैसे जानती हैं.
क्योंकि तुमने उनका कुछ चुरा लिया है.
अच्छा.क्या चुराया है मैने तुम्हारी सोना दीदी का.
यह तो मुझे नहीं पता लेकिन वह जरूर कोई कीमती चीज ही होगी.
तुम्हे कैसे पता.
वह इतना उदास जो रहती है आजकल.
अच्छा.लेकिन तुम्हारी सोना दीदी रहती कहां हैं.

बच्ची ने एक बरसाती की ओर इशारा किया.

वंशी मुस्कराया ‘और क्या बताया तुम्हारी सोना दीदी ने मेरे बारे में.
यही कि शायद आजकल तुम भी कुछ उदास रहते हो.
यह कैसे पता चला तुम्हारी दीदी को.
आजकल तुम गाना जो नहीं गाते हो.

वंशी का मन कर रहा था कि वह उस बच्ची से खूब बातें करे लेकिन बच्ची तो भाग गयी.वंशी मुस्कराया ‘अब तो गाना ही पड़ेगा गुइयां.’
उस रात वंशी का अलाप चरम पर था

‘जब रात रही बाकी कुछहूँ छिप जाई अंजोरिया आ जइह.
वोही जगहा पर मिलब हम बनि ठनि के गुजरिया आ जइह.
कहीं वादा कइल तू भुलइह ना आवे के बेर लजइह ना
बड़ा दिन भइल देखला तुहके देखब भरि नजरिया आ जइह

कोई कितना भी गा ले लेकिन वंशी की बात ही और है. वह कलेजे से जो गाता है.
चारो तरफ राप्ती का पानी. आकाश में अलसाता हुआ चन्द्रमा और हर ओर निस्तब्धता.केवल दो जोड़ी आंखे थी जिनमें जीवन की सबसे गहरी चमक थी. आज अगर नींद आ गयी तो पूरे जीवन सोना मुश्किल हो जाएगा.

ऐसे क्या देख रहे हो.
देख रहा हूँ कि इतनी सुन्दर होकर भी तुम इतना निर्दयी कैसे हो सकती हो.
अच्छा. अब हमीं निर्दयी भी हो गये. तुम्हे तो हमारी इतने दिनों तक याद भी नहीं आयी.
हम तुम्हे भूले ही कहां थे जो याद करते.
बातें बनाना तो कोई तुमसे सीखे.
तुम्हारी कसम गुंइया.
हम नहीं मानते.इतना ही प्रेम था तो आ न जाते.
मैं तो रोज सिवान पर तुम्हारी राह देखता था.
ससुराल के सिवान में ऐसे ही थोड़ी आया जाता है.
अब तो आओगी न.
देखेंगे.
क्या तुम्हे हमारी जरा भी परवाह नहीं है.
तुम्हे हमारी है.
बातें समाप्त होने का नाम नहीं ले रही थीं और रात थी की दौड़ी ही चली जा रही थी.
तुम हमे भूल तो नहीं जाओगे.
खुद को भूल जाऊंगा पर तुम्हे नहीं.
अगर मैं नहीं मिली तो.
इसी राप्ती मइया की धारा में छलांग लगा दूँगा.
सोना ने तड़पकर अपना हाथ वंशी के मुंह पर रख दिया ‘खबरदार जो ऐसी बातें दुबारा की तो.कसम है हमारी.राधा जी को कहां मिले किसन जी.तो क्या उन्होने जान दे दिया.परेम का अर्थ केवल मिलना ही थोड़े ही होता है.हम मिले या न मिले लेकिन जान कोई नहीं देगा.
वंसी अपलक निहार रहा थासोना को.
ऐसे क्या देख रहे हो.
देख रहा हूँ कि तुम कितनी समझदार हो.
धत्.अच्छा मैं अब चलती हूँ.
कल आओगी.
देखूँगी.
मैं यहीं इन्तजार करूंगा.

सोना नहीं आयी. सारी रात इन्तजार करता रहा वंसी.अगले कई रातों तक भी.कहीं नाराज तो नहीं हो गयी.
सोना दीदी तो अपने मामा के घर चली गयीं.’छोटी बच्ची की इस खबर से वंशी सन्न रह गया.
कब.
कई दिन हो गये.
क्यों.

उसके मामा के गांव में बाढ़ जो नहीं आती.अब वह बाढ़ खतम होने पर ही आाएगी.
वंशी उसी जगह उदास बैठा है ‘जाना ही था तो आयी क्यूं थी गुंइया.’ भीग आयी आंखो की कोर को पोछते हुए वंशी मुस्करा उठा ‘तुम्हारा छूना ही आज से मेरी पूंजी है. मैं इसे जीवन भर संभाल कर रखूंगा.’

महीनों लग गये राप्ती का पानी कम होने में.सोना की शादी उसके मामा ने अपने घर से ही कर दिया यह खबर वंशी को भीतर तक उदास कर गयी.अब वह न किसी से बोलता है न हंसता है. गाना तो कबका भूल गया है. बस गुमसुम सा बैठा रहता है. कई बार तो अकेले सिवान में बैठा बैठा खुद से ही बातें करने लगता है.जरूर किसी चूड़ैल का साया पड़ गया है. चूड़ैलें अक्सर नौजवानों को ही अपना शिकार बनाती हैं. रामसमुझ मिसिर के पास इस तरह की कहानियों का भण्डार है ‘जान लो बच्चा.आसमान में सुकवा निकल आया था.हम पड़ोस वाले गांव से नाच देखकर अकेले ही चले आ रहे थे. अकेले थे सो मस्ती में गा भी रहे थे.गांव के पूरब वाले पीपल के पास पहुंचे तो क्या देखते हैं कि सफेद कपड़ों में खूब सुन्दर लड़की बैठी हुयी है. हमारे तो हाथ पांव फूल गये.मन ही मन हनुमान जी का सुमिरन करने लगे.उसने हमसे कहा ‘डरो मत.हमे तुम्हारा गाना सुनना है.’

हमें तो काटो तो खुन नहीं. मरता क्या न करता. सो गाना शुरू किया. गाते गाते कब आंख लग गयी पता भी नहीं चला.आंख खुली तो दिन चढ़ आया था. लड़की गायब थी. घर आते ही बुखार ने ऐसा पकड़ा कि पूछो मत. महीनो दवाई खाई. कोई फायदा नहीं. फिर पीर बाबा से दुआ कराया तब जाकर जान छूटी.’

वंशी न तो पीर बाबा की दुआओं से ठीक हुए नहीं सोखा ओझा की झाड़ फूँक से.अम्मा का रोते रोते बुरा हाल था.एक वंशी ही सहारा था उसे भ ीन जाने किसकी नजर लग गयी.वंशी ने अपनी एक अलग दुनिया बना ली थी जिसमें वह खोते ही चले जा रहे थे.

जिस रात अम्मा को काले नाग ने डसा वंशी बंजारों की टोली में बैठे हुए थे.जबसे बंजारे गांव में आए हैं वंशी को उनके साथ बैठना अच्छा लगता है.अम्मा उन्हे बराबर मना करती ‘ये लोग तमाम जादू टोना जानते हैं. अभी गधे ने कम ही खेत खाया है.अगर फिर से कुछ हो गया तो कहीं के न बचोगे.’ लेकिन वंशी को बंजारे अच्छे लगते हैं. उनका खुलापन उन्हे आकर्षित करता है.कोई परदा नहीं नहीं कोई भेद भाव.काश कि वे भी बंजारा होते तो आज सोना उनके साथ होती.

गांव में कोहराम मच गया.वंशी घर की ओर भागे. अम्मा का शरीर नीला पड़ गया था और मुँह से झाग निकलने लगा था. एक बंजारा जानता था सांप का विष उतारना.वह घंटो कोशिस करता रहा.सब बेअसर. कौड़ी फेंकनी पड़ेगी. यह अन्तिम उपाय है.यह कौड़ी उस सांप को खीच कर लाएगी.वही विष खींचेगा.लोग दम साधे देख रहे थे.यह सबके लिए नया अनुभव था.भला मंत्र और कौड़ी के प्रभाव से सांप आएगा.लेकिन सांप आया.उसके फन पर दोनो कौड़ी चिपकी हुयी थी. लोग हैरान रह गये.काला भुजंग नाग.सांप अम्मा के पैरो के पास घूमने लगा. बंजारा कभी मंत्र पढ़ता कभी सांप का मनुहार करता.वंशी लगातार रोए जा रहे थे ‘अम्मा .तुम भी मुझे छोड़कर चली जाओगी.’

सांप ने एक बार उस स्थान पर मुंह लगाया जहां डंसा था लेकिन अगले ही पल मुड़ा और वापस चला गया.बंजारे ने आंखे खोल दी ‘देर हो गयी.तुम्हारी अम्मा जा चुकी है वंशी.

वंशी के चित्कार से पूरा गांव हिल उठा.सबकी आंखे नम थी.भगवान ऐसी विपत्ति किसी को न दे.

अम्मा के क्रिया कर्म के बाद एक शाम वंशी सांप झाड़ने वाले बंजारे के सामने बैठे थे ‘मैं सांप का विष उतारने वाला मंत्र सीखना चाहता हूँ.’

बंजारा मुस्कराया ‘क्यों.इसमें खतरा बहुत है.’
वैसे भी मुझे जीवन से बहुत प्रेम नहीं रह गया है गुरूजी लेकिन मैं चाहता हूँ कि किसी और की अम्मा अब सांप के जहर का शिकार न हो.मुझे जीने का एक मकसद भी मिल जाएगा.’वंशी उसके पैरों की तरफ झुकते चले गये ‘अब आपको गुरू मान लिया है.जब तक हां नहीं कहेंगे हटूंगा नहीं.

वंशी का जीवन के प्रति उपेक्षा का भाव उनके मंत्र सीखने में लाभदायक सिद्ध हुआ.खतरनाक से खतरनाक सांप को भी सामने देखकर उनके मन में जरा भी सिहरन नहीं पैदा होती.गुरू उनके इस निडरता पर मंत्रमुग्ध हो जाते ‘सांप का जहर उतारने में निडरता बहुत जरूरी है.तुम मुझसे भी बड़े ओझा बनोगे.’

वंशी एक फीकी हंसी हंस देते ‘डरता तो वह है जो जीना चाहता है.’

गूरू जी की मृत्यु के बाद वंशी जब गांव लौटे तो सांप का विष उतारने में महारत हासिल कर चुके थे.उनके इस हुनर ने गांव वालों को एक दिलासा दिया.वंशी काका के रहते कोई सांप के डसने से नहीं मर सकता.वंशी ने अब तक उनके भरोसे को बनाए रखा है.अब तो दूसरे गांवो से भी लोग आने लगे हैं.काका इसी एक काम को अब भी पूरे लगन से करते हैं.रात विरात दिन दुपहरिया जब भी कोई सांप का काता मरीज आता है वे चाहे जिस स्थिति में हों तत्काल उसके इलाज में लग जाते हैं. बाकी कोई काम करने क ीन तो उन्होने कोशिस क ीन ही जरूरत पड़ी.

इधर वे किसी के छूने को लेकर ज्यादे ही संवेदनशील हो गये हैं.बेचैन हो जाते हैं अगर कोई उन्हे छू ले और वे उसे न छू पाएं तो.कई बार तो आंखो से आंसू तक बहने लगते हैं.

गांव वाले उनकी इस दशा से दुखी हैं क्योंकि उनका होना गांव जवार के लिए बहुत जरूरी है. कुछ पढ़े लिखे लोगों का मानना है कि वे किसी मानसिक अवसाद के चलते ऐसा कर रहे हैं. आजकल इसकी दवा बाजार में उपलब्ध है.वे ठीक हो सकते हैं.

प्रस्ताव को सुनते ही काका आगबबूला हो गये ‘सालों.पागल तुम तुम्हारा बाप तुम्हारा सारा खानदान.मैं बिल्कुल ठीक हूं और किसी डॉक्टर के पास नहीं जाऊंगा.’
प्रधान जी और गांव के तमाम बुजुर्गों के बहुत समझाने पर काका किसी तरह तैयार हुए.शहर के एक नामी चिकित्सक को दिखाया गया.उसकी दवा से कुछ आराम जैसा लगता है.

तीन महीने बाद डॉक्टर ने मुस्कराते हुए काका के पीठ पर हाथ रखा ‘अब आप बिल्कुल ठीक हैं.अब आपको किसी दवा की जरूरत नहीं है.’डॉक्टर अपने केबिन में चला गया.

जीप जैसे ही स्टार्ट हुयी काका चिल्लाए ‘जरा रूकना.डॉक्टर बाबू से एक बात पूछना तो भूल ही गया.’

काका दौड़कर डॉक्टर के पास पहुँचे और उसकी पीठ पर हाथ रखकर मुस्कराए ‘तुमने ठीक कहा बेटा. अब मैं बिल्कुल ठीक हो गया हूँ.’और झटके से बाहर निकल गये.
डॉक्टर मुस्कराने लगा.

आज शाम से ही काका बेमन हैं. खाने में भी मन नहीं लग रहा है. घंटो से करवट बदल रहे हैं लेकिन नींद आंखो में दूर दूर तक नहीं है.आज पता नहीं क्यों तमाम पुरानी बातें याद आने लगी हैं. अम्मा राप्ती की बाढ़ एक छोटी सी बच्ची और सोना भी.

प्रधान जी की आवाज पर चौंके काका.इतनी रात को.कहीं किसी को सांप ने तो नहीं डस लिया.

‘काका. डुमरी के ठाकुर साहब की पत्नी को नाग ने डंस लिया है. वे लोग बाहर खड़े हैं.’प्रधान जी की आवाज पर काका झटके से बाहर आ गये. ठाकुर साहब इलाके के बड़े जमींदार है. गाड़ी घोड़ा नौकर चाकर सबकुछ है. काका ने मरीज को गाड़ी से बाहर निकालकर चौकी पर लिटाने को कहा. ठाकुर साहब बेचैन थ ‘मेरी बीबी को बचा लो वंशी अब तुम्हारा ही आसरा है.’

‘आप चिन्ता मत कीजिए ठाकुर साहब. गुरू की रहमत और उपर वाले का आशीर्वाद रहा तो मालकिन बच जाएंगी.’ काका नब्ज देखने के लिए झुके.

नब्ज छूते ही उनके शरीर में एक अजीब सी झनझनाहट होने लगी. काका आंखे बंद किए देर तक मौन रहे. फिर न जाने क्यों मुस्करा उठे. यह पहली बार है जब वे किसी मरीज को सामने देखकर मुस्करा रहे हैं वरना मरीज के परिजनों से अधिक सांप काटे मरीज को देखकर वे दुखी होते रहे हैं. कई बार तो रोते भी देखे गये हैं. शायद हर मरीज उन्हे माँ की याद दिलाता हो या फिर कुछ और. लेकिन मुस्कराते तो किसी ने उन्हे नहीं देखा.फिर आज क्या हो गया है काका को. गुरू जब किसी को सांप का जहर उतारने वाला मंत्र देता है तो यही वादा कराता है कि किसी भी स्थिति में रहोगे अगर सुन लिया कि किसी को सांप ने काटा है तो जरूर जाना होगा.

काका ने जल्दी से एक लड़के को अपने घर के भीतर से पीतल की थाली लाने को कहा.गांव के लोग जानते हैं कि अगर किसी को सांप ने काटा या छुआ है तो थाली उसके पीठ पर चिपक जाएगी.

थाली ठकुराइन के पीठ पर चिपक गयी. मतलब सांप ने छुआ नहीं बल्कि काट लिया है.काका हाथ में मिट्टी लेकर मंत्र पढ़ते हैं और थाली पर मिट्टी से मारते हैं.जैसे ही मिट्टी थाली पर पड़ती है ठकुराइन का शरीर लहराने लगता है.गांव के लोग काका को देखते देखते पूरी प्रक्रिया को समझ चुके हैं. यह ‘लहर’ है.जितनी अधिक लहर हो मतलब सांप उतना ही जहरीला.लेकिन आज सबकुछ सामान्य नहीं लग रहा है.जितनी ‘लहर’ ठकुराइन के शरीर मे उठ रही है उससे अधिक काका लहरा रहे हैं. लेकिन काका आज तक कभी हारे नहीं हैं. जहर जैसे उनका आदेश मानता हो.देर भले लग जाए लेकिन उसे शरीर से उतरना ही होगा.

इधर पढ़े लिखे लोगों की जमात बढ़ने से कुछ नयी व्याख्याएं भी सामने आयी हैं. कुछ लोग कहते हैं कि पीतल में ऐसा गुण होता है कि वह जहर को खींच लेता है. कुछ ऐसे भी लोग हैं जो यह मानते है कि वास्तव में आदमी साँप के जहर से नहीं बल्कि डर से मर जाता है इसलिए जब काका मंत्र पढ़ते हैं तो उनका भय समाप्त हो जाता है और वे बच जाते हैं.

काका मिट्टी पर फूँक मारते मारते खुद बेदम होने लगे हैं.लहर बढ़ती ही जा रही है लेकिन ठकुराइन की हालत में सुधार नहीं आ रहा है.क्या आज वह हो जाएगा जो वर्षों से नहीं हुआ.काका की बादशाहत खतम हो जाएगी.आचानक ठकुराइन्ा का शरीर बहुत जोर से लहराया.यह अब तक की सबसे तेज लहर थी.इतनी तेज कि ठकुराइन को पकड़ने वाले लोग उन्हे संभाल नहीं सके और उनके सिर से साड़ी पूरी तरह सरक गयी. चांदनी रात जैसे जवान हो गयी हो.इस उमर में और सांप के विष के बावजूद ऐसा लावण्य.काका ने ध्यान से मरीज के चेहरे की ओर देखा.आंखे सिकुड़ गयीं.लोग दम साधे हुए थे. काका दौड़ कर घर के भीतर चले गये. लोग सन्न रह गये. आज तक काका किसी मरीज को छोड़कर नहीं गये. ठाकुर साहब दहाड़ मारने लगे.गांव के लोग कुछ समझ पाते इसके पहले काका को देखकर जान में जान आई. लेकिन यह क्या.काका बरषों पुरानी मुड़ी तुड़ी जिंस और टी शर्ट पहने हैं. नौजवान हंसी रोकने की लगातार कोशिस कर रहे हैं. काका ने ठाकुर साहब के कंधे पर हौले से हाथ रखा ‘चिन्ता मत कीजिए ठाकुर साहब. यमराज को भी आज हारना ही पड़ेगा.’

काका ने जेब से एक ब्लेड निकाला और कांपते हाथों से उस जगह हल्का चीरा लगाया जहां सांप ने डंसा था. फिर मुंह लगाकर खुन चूसने लगे.खुन का घूँट मुँह में भरकर थूकते फिर खींचते. लोग चिन्तित हो उठे हैं. यह तरीका तो बहुत खतरनाक है.  इसमें काका की जान भी जा सकती है. काका आज तक केवल मंत्र से ही जहर उतारते रहे हैं.यह तो जान की बाजी लगाने जैसा है. कुछ लोग उन्हे रोकना भी चाह रहे हैं.लेकिन वे जानते हैं कि काका जिद के कितने पक्के हैं. वे नहीं रूकेंगे.

ठकुराइन का शरीर अब सहज होने लगा है. वे अब सामान्य हैं.उन्होने आंखे खोलने की कोशिस शुरू कर दी है. ठाकुर साहब की जान में जान आने लगी है. आचानक काका ने आलाप लिया

छंद छंद लय ताल से पुछलीं पुछलीं सुर के मन से.
धरती अउर आकास से पूछलीं पूछलीं नील गगन से.

हिया हिया में पइठ के पूछली पूछली मस्त पवन से कउने सुगना पर लुभइलू अहि रे बालम चिरई . इधर ठकुराइन ने आंखे खोलीं उधर काका की गरदन लुढ़क गयी.लोग कुछ समझ नहीं पा रहे थे. वंशी काका बुलाने पर भी नहीं बोल रहे.शरीर बेजान हो उठा है.यह क्या हो गया उन्हे. इतने वर्षों से सांप का विष उतार रहे हैं कभी कोई परेशानी नहीं हुयी फिर आज क्या हो गया.

ठाकुर साहब ने वंशी की नब्ज टटोलनी शुरू की.जीवन का कोई लक्षण नहीं.उन्हे कहना पड़ा ‘वंशी अब इस संसार से जा चुके हैं.’
सभी सन्न हो गये.सबकी आंखो में आंसू थे.

दो और भी आंखे थी जिनमें पानी छलछला रहा था लेकिन उन पर किसी की नजर नहीं पड़ी थी.
________
राकेश दुबे
mob. 8958344456
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प्रतिक्रियायें 


[13/07 08:40] Sandhya: प्रेम किसी एक व्यक्ति के साथ सम्बन्धों का नाम नहीं है यह एक ‘दृष्टिकोण’ है, एक ’चारित्रिक रुझान’ है- जो व्यक्ति और दुनिया के सम्बन्धों को अभिव्यक्त करता है न कि प्रेम के सिर्फ एक ‘लक्ष्य’ के साथ उसके संबंध को. अगर एक व्यक्ति सिर्फ दूसरे व्यक्ति से प्रेम करता है और अन्य सभी व्यक्तियों में उसकी जरा भी रुचि नहीं है- तो उसका प्रेम प्रेम न होकर मात्र एक समजैविक जुड़ाव भर है, उसके अहं का विस्तार भर है.”

(एरिक फ्रॉम की पुस्तक ‘द आर्ट ऑफ लिविंग’ के हिन्दी अनुवाद ‘प्रेम का वास्तविक अर्थ और सिद्धान्त’ (अनुवादक- युगांक धीर,से)

उपर्युक्त उद्धरण राकेश बिहारी जी ने अपनी समीक्षा में उद्धत किया है ।कहानी रचना समय के दुसरे विशिष्ट कहानी अंक में पढी थी और तब भी इतना ही उद्वेलन हुआ था और उसने कहा था की याद आई थी ।
कहानी को प्रतिकृति नहीं कहा जा सकता इसका अपना एक विस्तृत अलग प्रभाव है ।राकेश बिहारी जी की समीक्षा इसे लौकिकता के दुसरे कोण से भी देखती है।
राकेश बिहारी जी की समीक्षा गहन है ज़रूर पढी जाना चाहिए।
बेहतरीन कहानी...विस्तार से शाम तक😊💥
[13/07 11:39] Saksena Madhu: अभी कहानी और राकेश बिहारी की समीक्षा पढ़ी है  ....कहानी के बाद समीक्षा पढ़ना मानों कहानी के अधखुले दरवाजों को खोलकर हर पात्र से बतिया लेना होता है । वंशी और सोना की प्रेम कथा की गहराई में मुझे जयशंकर प्रसाद की कहानी पुरस्कार की याद आ गई । मधुलिका का उत्कृष्ट प्रेम .. देशप्रेम और प्रिय प्रेम को अलग करता है वो उसका विस्तार रहा और फिर प्रिय के साथ मृत्यु मांगना निजी प्रेम का निर्णय रहा ... 
  इस कहानी में भी प्रेम किसी न किसी रूप में विस्तारित हुआ और फिर निजता पर आकर रुक गया ..
कहानी हमे लोकरंग और लोकगीतों के माध्यम से अपनेपन से अपने साथ घुमाती हुई हर पात्र से परिचित करवाती है । 
कहानी में प्रेम का उत्कृष्ट रूप दिखाया गया । 
जब अपने प्रिय पर तेज़ाब फेंकना ,ब्लैकमेल करना और हत्या करने जैसे अपराध बढ़ते जा रहे है ऐसी ऊर्जावान प्रेम कहानियों की बहुत आवश्यकता है ।
हमेशा की तरह बढ़िया चयन कहानी का ।आभार  प्रिय सखी प्रवेश ..तुम्हारे कारण अलग लोक की शानदार सैर कर पा रहे है  ।
आभार एडमिन जी और उनकी टीम का ।
[13/07 12:03] Pravesh soni: धन्यवाद मधु 
कहानी के बाद राकेश बिहारी जी की  समीक्षा कहानी के अधखुले दरवाज़े खोल देना ..... कहानी को  पूर्ण गहराई से समझने के लिए इस तरह की समीक्षा पाठक की किस तरह मदद करती है ।

मधु तुमने बहुत अच्छी बात कही ,एसिड अटैक ,ब्लैकमेल ,हत्या करने वालें को इस तरह की उर्जावान कहानी पढ़ने की आवश्यकता है 
👌👌👌👌

काश प्रेम,प्रेम ही रहे ...कुंठा में में न बदले ।प्रेम तो अधूरा रहकर भी पूर्णता लिए होता है ।
[13/07 15:47] Sudin Ji: प्रेम व्यक्ति से प्रकृति में और प्रकृति से व्यक्ति में विस्तारित होने और समाहित होने की क्रिया है । सोना के हाथ के स्पर्श को गांव के बच्चे बच्चे के स्पर्श में महसूस करने की इच्छा वंशी के सोना के प्रति मौन प्रेम का त्रिलोकी विस्तार है । कोई अच्छा लगता है तो आपके भीतर सारी प्रकृति गुनगुनाने और बतियाने लगती है  वंशी का प्रेम इकतरफ़ा नहीं है यह जानकर वंशी के समर्पण में सम्पूर्णता आ गयी और इसी समर्पण के कारण सांप के मंत्र के असफल होने के बाद भी वंशी के द्वारा सोना के शरीर में अपने प्राण फूंकना संभव बना । प्रेम इसी इंतहाई शिद्दत का नाम है । कहानी को गांव के पूरे वातावरण और लोकगीतों के साथ गुथते हुये विस्तार देने के लिये राकेश दुबे जी को बहुत बहुत बधाई और हमेशा बेहतरीन कहानी का चयन करने के लिये प्रवेश जी का बहुत बहुत आभार ।
[13/07 15:48] ‪+91 94256 36550‬: भावना जी का आभार सम्बंधित रचनात्मक जानकारी के लिए।
स्वतन्त्र पाठ में भी अच्छी रचना।
[13/07 15:49] ‪+91 94256 36550‬: कहानी पूरी पढ़ी।बहुत अच्छी लगी।
[13/07 15:55] ‪+91 95463 33084‬: बहुत दिनों के बाद इतनी अच्छी प्रेम कहानी पढ़ने को मिली ।आभार प्रवेश जी एवं एडमिन ।गुइयाॅ शब्द का अर्थ मुझे नहीं पता ।कहानी में एक जगह गाँव के सिवान का जिक्र है , हमारे तरफ यानी बिहार के ऑचलिक भाषा में इसे सीमान कहते हैं ....दो गाँव के बीच की सीमा रेखा ।यह मेरी जिज्ञासा भर है ....वस्तुतः यह कहानी पढनी नहीं पड़ती बल्कि खुद ही पढवा लेती है ।कथाकार राकेश दुबे जी को इस उत्कृष्ट कहानी हेतु हार्दिक बधाई🌹🌹प्रवेश जी से आग्रह है कि राकेश बिहारी जी की समीक्षा भी यहाँ लगाएँ जिससे कहानी को और बेहतर दृष्टिकोण से समझा जा सके ।राकेश बिहारी जी न केवल अच्छे समीक्षक है अपितु अच्छे कथाकार भी हैं ।🙏🙏🙏
[13/07 15:58] Mukta Shreewastav: राकेश दुबे जी की कहानी वंशी और सोना की अनोखी प्रेम कथा है।वास्तव में प्रेम खोने का ही नाम है,वंशी का सारा जीवन लोगों के लिए खेल वन गया।लेखक ने कहानी का अंत बहुत ही अच्छा किया है।
[13/07 16:04] ‪+91 80850 96010‬: राकेश दुबे जी की इस कहानी को आज पांचवीं बार पढ़ रही । ये कहानी रचना समय में भी आई है । कहानी अगर एक बार में पढ़वा ले जाये सबसे पहले उसकी यही सफलता है । ये ऐसी ही कहानी है जिसे बिना पूरी पढ़े आप नहीं छोड़ सकते । 
ये एक ग्रामीण परिवेश में बनी गई प्रेम कहानी है ।प्रेम के कितने रूप, हो जाने के कितने अफ़साने । पर प्रेम को प्रेम उसका त्याग भाव ही बनाता है ।हासिल करने का भाव प्रेम को प्रेम नहीं रहने देता ।कहानी इस मुद्दे पर कई बार मन को झकझोरती भावुक कर जाती है । सुन्दर शब्द प्रयोग कहानी के हर दृश्य का खाका खींच देता है । अगर मुझसे पुछा जाये कि रचना समय की कौन सी कहानी बेहतरीन लगी तो बिना अगर मगर मैं इस कहानी पर ऊँगली रख दूंगी । 
साकीबा में इस कहानी का स्वागत है और इस पर जरूर चर्चा होनी चाहिए। 
राकेश दुबे जी समूह से जुड़ गए हैं तो और भी बेहतरीन कहानियों से हम रूबरू होंगे । उनका स्वागत है 💐
[13/07 16:05] ‪+91 80850 96010‬: ग्रामीण परिवेश में बुनी गई
[13/07 17:29] Meena Sharma Sakiba: ग्रामीण परिवेश और प्रेम में आकंठ डूबी यह कहानी, गीतों के
साथ आगे बढ़ती...हर हृदय की
चाह ...कि यह प्रेम कहाँ खो गया ?
फिर -फिर पढ़ना... सुनना ...देखना और जी लेना...एक भावपूर्ण कहानी के साथ बाँध गया ! अद्भुत
चरित्र-चित्रण,भाव, और प्रेम से सराबोर ...कहानी के लिये राकेश जी
को बधाइयाँ एवं प्रवेश जी करबद्ध नमन प्रस्तनति के लिये
👍
[13/07 17:41] Manjusha Man: राकेश जी की कहानी पढ़नी प्रारम्भ की तो एक  मुस्कुराहट के साथ प्रारम्भ हुई.... किन्तु अंत तक आते आते आँखे नम हो आईं। अभी अच्छी कहानी है। 

बहुत अच्छी प्रेम कहानी हैं।
[13/07 17:49] Saksena Madhu: किसी किस्से जैसी लग रही कहानी ..
कई क्षेत्रों में अलग अलग प्रेम कहानियां प्रचलित हैं ।
[13/07 18:03] Archana Naidu: राकेश जी की कहानी ने अंत तक बांधे रखा, अच्छी रचना की यही सफलता है, हमारी बधाई,  प्रवेश जी  आपका सलेक्शन अच्छा रहता है,  👍👍😊😊
[13/07 18:11] Ravindra Swapnil: मखमल जेसी नरम और जटिल सामाजिक परिवेश को शानदार तरीके से कहानी में सवांरा गया है।  लेकिन कई चीजें नयेपन को उपेक्षा
की और ले जाती है। मेरा सवाल ये होता है कि किसी कहानी को तुलनात्मक या उसके अपने परिवेशगत रूप से देखा जाये। या दोनों से। या केवल ग्रुप की मान मर्यादा से। इस कहानी में जो उपेक्षा वाली बात है यही है की इस तरह का वर्णन हमारे कई वरिष्ठों की रचनाओं में मिलता है। गांव को आज भी पुराने अंदाज में मिला कर उकेरा है। प्रेम पर तो हमारे बाकि सदस्यों ने बोल ही दिया है।
                                   स्वप्निल
[13/07 18:24] अपर्णा: इस गीत से परिचित हूँ। अक्सर सुनती हूँ। गोरखपुर से हूँ तो इस भाषा और संस्कृति से अलग सा ही लगाव है। राप्ती, बाढ़, बंधा, गीत, फगुआ, होरी, चैती सब नितांत आत्मियऔर निजी बिंब उभार रहे हैं मेरे लिए। 
अब कहानी पर आती हूँ । कहानी ने रेणु की 'पंचलैट' और उससे भी गहराई से 'रसप्रिया' की याद दिलाई। राकेश बिहारी जी ने  अद्भुत विश्लेषण किया है। विषय को उसका आंचलिकता के साथ पढ़ना एक लार्जर पिक्चर उपस्थित करता है।एक विशिष्ट फ्लेवर देता है। 
लेखक ने वंशी की स्पर्श से जुड़ी ज़िद या सनक को यहाँ लाकर ऐसे इंटेंस व्यक्तित्व की परतों का निर्माण किया है जिसके लिए उसके प्रेम और उससे उपजे वियोग की हर छोटी बात बहुत गहरी बन चुकी है। वो प्रेम को तो छुपा गया पर उससे जुड़ी छोटी बड़ी बातें उसके प्रकट व्यवहार का हिस्सा बन गईं। अपने स्व को वो लोक में दबा देता है। जान न दे कर जान बचा रहा है।
शुभकामनाएँ  राकेश जी। 
राकेश बिहारी जी ने बेहतरीन तौर पर कथा को रेशा रेशा खोला है। आभार।
[13/07 18:31] ‪+91 87208 02790‬: सात्विक प्रेम का इजहार करने वाली ह्रदय स्पर्शी कहानी के चयन के लिए प्रवेश जी को बधाई
[13/07 19:08] Sudhir Deshpande Ji: आंचलिक पुट
कहन शैली जबरदस्त
वंशी काका का चरित्र चित्रण देशकाल परिस्थिति का सुंदर प्रयोग। नायिका चित्रण अदभुत। कितनी कोमलता से और विभिन्न अंगों की क्रियाओं से वार्तालाप कराया। वाह।
[13/07 19:12] Dinesh Mishra Ji: राकेश दुबे जी की वंशी और सोना की प्रेम कथा शुरुवात में सामान्य कथा जैसी ही लगी, पर जब उसके नेपथ्य की कथा यानि वंशी की व्यथा से रूबरू होते हैं, तो यूँ लगता हैं मानों वंशी की व्यथा और सोना के नयन जैसे हमारे मनोमस्तिष्क पर ऐसे चस्पा हो गए हैं की कथा को पूरी पढे बिना चैन ही नहीं पड़ता, साथ ही भोजपुरी केअद्भुत लोक गीत जो अर्थ समझ न आने पर भी वंशी के दर्द को हम तक पहुंचा देते हैं, आखरी में वंशी का जीन्स पहनकर आना और सोना की आँखे भीगना हमे अंदर तक भिगो देता है।
बहुत अच्छी कहानी
बधाइयाँ।
[13/07 19:15] Dinesh Mishra Ji: प्रवेश जी
इस अद्भुत कथा के चयन के लिए अनेकों मुबारकबाद और हमे पढ़ने का मौका दिया इसके लिएभी।
[13/07 19:48] Pravesh soni: सुधीर जी धन्यवाद ,देशकाल के बारें में  जाचेंगे तो थोडा विभेद लगेगा ,वंशी का जीन्स ,T शर्ट पहनना ,और सुचना  तकनीक का अभाव  ..... राप्ती में बाढ़ कब ,आप समीक्षा पढ़ेंगे तो  इस बात पर भी सोचने को विवश होंगे ।
[13/07 20:06] Rakesh Dubey: बहुत बहुत आभार आप सभी का कई बार रचनाकार के रूप मे हम इस तरह नहीं सोच पाते
[13/07 21:38] Sudin Ji: जींस टी शर्ट पहनने वाला हर व्यक्ति सूचना तकनीकी से जुड़ा हुआ हो आवश्यक नहीं । हममें से कुछ कुछ ऐसे हैं जो फेसबुक पर नहीं हैं तो इन बातों को समीक्षा से दूर रखते हुये मूल कहानी पर ही ग़ौर करना मेरी समझ से ज़्यादा ठीक होगा।
[13/07 22:07] Lakshmikant Kaluskar Ji: कहानी बांध कर रखती है।कथा खत्म होने के पहले ही संकेत देने लगती है कि किधर मुड़ने वाली है क्यों कि प्रेमकथाओं की परंपरा में दो रास्ते ही होते है,चौराहे नही होते।त्याग के साथ प्रेम की उत्कटता कुछ अलग ही नूर लिये रहती है जो इस कहानी में है।
[13/07 22:29] Braj Ji: कहानियां हमें धैर्यवान पाठक बनातीं हैं. हमें दूसरे के जीवन में देर तक रखती हैं. कहानियां हमें हंसाती हैं रुलाती हैं. 

कहानियाँ हमें कई तरह के इंसानों से मिला देतीं हैं. दूर दूर की ऐसी जगहें जो हमारे पास जैसी होती हैं, उनको हमारे और करीब ले आती हैं. और कुछ ऐसी जगहों पर भी कहानियां हमें ले जाती हैं जहां हम कभी नहीं जा सकते, 

कहानियों में कोई होता है जो हमारे और तुम्हारे जैसा होता है पर वो तुम्हारे और हमारे जैसा चुप्प नहीं रहता, 

कहानियों में और कौन होता है 
कहा गया है कि जिंदगी और कुछ भी नहीं, तेरी मेरी कहानी है. 

राकेश दुबे की कहानी में अनेक कहानियां हैं, वंशी की मां, बाढ़, गायन, सोना, सांप, लोकगीत, और भी कितने ही बिंब जो हम सबके साथ होकर हमारे जीवन की कहानी में इसलिये शामिल हो गए हैं कि यही उनकी फितरत है. ऐसी सुगठित कहानी को कथा और किस्सा कहने में संकोच होता है, यह केवल कहानी है |

बहुत कल्पनाशीलता के साथ, दृश्य और समकालीन भाषा के साथ ही कोई ऐसी स्थिति को रचना में बदल सकता है. बेशक राकेश दुबे ने इस कहानी के जरिए पाठकों को बड़ी चीज़ दी है. 

ब्रज श्रीवास्तव
[14/07 01:07] Devilal Patidar Ji Artist: पड ली कहानी व आज सकिबा पर जो भी हे . 
सब अच्छा ही नही बहुत अच्छा हे . बधाई लेखक व सब को .
[14/07 01:13] Devilal Patidar Ji Artist: एक सवाल भी 
जब हम सब को इतने मासुम  भोले निरदोस लोग इस कदर पसंद हे तो फिर हम खुद येसे क्यो नही बन जाते .
[14/07 07:57] Pravesh soni: सुदिन जी मेरा यह मतलब नही की जीन्स टी शर्ट पहनने वाले के पास सुचना तकनीक भी हो ,
मेरा आशय  कहानी के लेखन काल से है ।जींस का आगमन हुआ तब तक टेलीफोन भी आ गए थे ।कथा नायक ने युवा वस्था में जीन्स का  उपयोग किया और कहानी के अंत तक वह चर्चा में रही तो  उसके साथ आपसी संवाद के लिए सुचना तकनीक कहानी से दिखाई नही दी ।
लेखक मेरा आशय समझ गए ,और इस छोटी सी त्रुटि को उन्होंने स्वीकार भी लिया ।
धन्यवाद आपका 
कालुस्कर जी ,आपने अच्छी प्रतिक्रिया दी आभार आपका 
ब्रज जी आपके धैर्य का प्रणाम ,आखिर आपने कहानी को पढ़ कर लिखा ।साथ ही आज का दिन भी चर्चा के लिए रखा ,धन्यवाद 
पियूष जी धन्यवाद 
देवी सर आपका बहुत बहुत आभार ,आपके दो शब्द भी अपार ऊर्जा प्रदान करते है ।
आपके  मासूम सवाल का कभी जवाब मिलें ....😔
रविन्द्र जी राकेश बिहारी जी समूह में नही है ,आपको को जो वाक्य या शब्द समझ नही आये उनकी चर्चा यहाँ भी अवश्य करे और उनसे बात करके उनका आशय हमें भी अवश्य समझाए ।
जो हमसे छूटा उसे जरूर बतायें ।


अन्य सभी मित्रों से विनम्र अनुरोध है ,वो भी समय निकाल कर कहानी पर अपनी बात अवश्य कहें ।

सुरेन जी ,आनंद जी ,आरती और भी सभी सम्मानीय सदस्य , आपकी प्रतिक्रिया का इन्तजार है
[14/07 11:09] ‪+91 96800 04736‬: शरद जी

रविन्द्र जी की टीप व् ब्रज जी की सुचना, और फिर आपकी प्रतिक्रिया आप तीनों को बहुत बड़ा बनती है।

👍🏻
💐💐💐
[14/07 11:13] ‪+91 96800 04736‬: कहानी में बहुत अच्छा प्रवाह लगा...

साकीबा में प्रस्तुत उत्तम दर्जे की कहानी ...

कहानी का समय काल ऐसा लगता है की सन् साठ से पहले की है ...
कहानीकार व् प्रस्तुतकर्ता दोनों को बधाइयाँ ..

🙏🏻
[14/07 11:41] ‪+91 94240 74638‬: कल कहानी आधी पढ़ी थी , आज पूरी क़ी , सब कुछ पता होने के बाद भी बांधे रहती है , मासूम दिलों की दास्तान है ये , प्रवेश जी धन्यवाद
[14/07 11:56] Sudin Ji: शरद जी आपके कुछ कहने का हमेशा इंतज़ार रहता है
[14/07 12:26] Sharad Kokas Ji: राकेश दुबे की कहानी *कउने खोतवा में लुकइलू*पढ़ी ।यह कहानी बहुत रोचक है और जरा भी उबाऊ नहीं है । कहानी को पढ़ते हुए मुझे बार-बार यह ख्याल आता रहा कि इस कहानी पर एक रोचक और मसालेदार फिल्म बनाई जा सकती है । हालांकि कई दृश्य मुझे विभिन्न कहानियों और फिल्मों से जुड़े हुए भी दिखाई दिए । शायद महुआ या और कोई फिल्म थी जिसमे नायक नायिका के सांप के काटने पर मुंह से खींचकर उसका जहर उतारता है । 

प्रेम कथा के बारे में मैं कुछ विशेष नहीं कहना चाहता क्योंकि यह बहुत साधारण प्रेमकथा है और अनेक लोक कथाओं में इस तरह की प्रेम कथा का जिक्र हुआ है । फर्स्ट साईट लव में बाद नायिका का विवाह अन्य किसी व्यक्ति से हो जाना और उसके बाद नायक का दुखी रहना, गीत गाना और मानसिक रोगी की तरह व्यवहार करना आदि अनेक प्रेम कथाओं में होता है । एक तथ्यगत ग़लती और है ,बाढ़ का पानी उतरने में महीनों नहीं लेता वह दो तीन दिन में उतर जाता है ।

इस कहानी में उत्तरार्ध में जब नायक साहब उतारने सांप का जहर उतारने वाला ओझा बनता है उस वक्त यह कहानी मेरा ध्यान आकर्षित करती है । यह कहानी मैंने अपने एक सर्प विज्ञानी मित्र को भेजी तो उन्होंने कई मजेदार बातें बताई । वे बातें मैं आपके साथ में शेयर करना चाहता हूं । सांप का ज़हर किसी मंत्र से नहीं उतरता यह बात मांत्रिक भी अच्छी तरह जानते हैं लेकिन समाज में एक प्रतिष्ठा बनाने के लिए वह मंत्र से सांप उतारने का अभिनय करते हैं । 93 प्रतिशत सांप जहरीले नहीं होते और 7  % सांप में ही तेज़ जहर होता है । सर्प दंश के निशान से ओझा जान जाता है कि सांप जहरीला है या नहीं । ज़हरीले सांप का दंश एक या दो दांतों के निशान होते है और नॉन पायज़नस सांप के अंग्रेजी के U आकार के होते हैं । ख़तरे की स्थिति में ओझा मरीज़ को सीधे अस्पताल रेफर करते हैं ।सांप के काटने के दो तरीके होते हैं एक ड्राई बाईट और एक वेट बाईट । अगर इंसान को काटने के पहले सांप ने किसी जानवर लकड़ी या पत्थर पर दंश किया हो तो उसकी ज़हर की थैली खाली हो जाती है और यह ज़हर भीतर नहीं जाता । सांप के जहर के शरीर में समाने के 2 तरीके होते हैं एक वेन्स द्वारा और एक मसल के द्वारा । डॉक्टर भी इसी दो प्रकार के इंजेक्शन लगाते हैं यह आपको पता होगा । वेन्स में अगर दंश होता है तो सांप का जहर तेजी से भीतर प्रवेश कर जाता है और हार्ट  तक पहुंचता है जहां से वह धमनियों में फैल जाता है । मसल्स का ज़हर धीरे-धीरे प्रवेश करता है ।

इस कहानी में सांप का जहर शायद मसल्स में ही रहता है जिसके कारण ब्लेड से चीरा लगाकर और मुंह से खींचकर उसका निकालना संभव हो सकता  है लेकिन अगर वेन्स में ज़हर चला जाए तो वह तुरंत हार्ट  तक पहुंचता है और उसे मुंह से खींचकर निकालना संभव नहीं होता । दूसरी बात यह है कि मुंह से खींचकर जहर निकालना और उसी स्थिति में खींचने वाले की मृत्यु केवल उसी स्थिति में हो सकती है जब मुंह के भीतर कोई घाव आदि हो और जहर उस में प्रवेश कर जाए अन्यथा सांप का जहर प्रोटीन और एंजाइम होता है जो सीधे हजम हो जाता है । 

हालाँकि कहानी में यह लिखने की जरुरत भी नहीं है लेकिन क्योंकि आप सब लोग साहित्य की बात के सदस्य  हैं तो यह वैज्ञानिक दृष्टिकोण की बात आपको बताना मैंने उचित समझा । कुछ देर पश्चात डॉक्टर गजेंद्र जो बस्तर में किरंदुल नामक जगह पर वैज्ञानिक हैं और सांपों पर उनका काफी काम है अपना लेख भेज रहे हैं जिसे मैं यहां पर आप लोगों के लिए प्रस्तुत करुंगा ।

*शरद कोकास*
[14/07 12:44] Dinesh Mishra Ji: शरद भाई
कहानी पर पसंदगी ज़ाहिर करते हुए आपने अपना वैज्ञानिक पक्ष भी रखा, जिससे हमारी जानकारी में इज़ाफ़ा हुआ, शुक्रिया।
पर आप एक साहित्यकार और वैज्ञानिक के मिले जुले नज़रिये से जब कृतियाँ पढ़ते हैं, तो क्या किसी कृति का भरपूर आनंद लेने में कोई अवरोध तो महसूस नहीं होता।
जाने क्यों मुझे लगा की आपसे ये सवाल पूछूँ?
[14/07 12:50] Braj Ji: दिलो दिमाग दोनों पर अच्छा सवाल दिनेश जी
[14/07 13:03] Aanand Krishn Ji: दिनेश जी, आपने शरद जी से बहुत अच्छा सवाल पूछा है । वे इसका जवाब शायद टाइप कर रहे हैं । मैं भी साहित्य को पढ़ते हुए उसके वैज्ञानिक आयामों पर सतर्क दृष्टि रखता हूँ इसलिए मैं कह सकता हूँ की ऐसा करके मैं उस रचना का और अधिक रसास्वादन कर पाता हूँ । हालांकि बहुत सी रचनाओं में वैज्ञानिक दृष्टि की कमी या वैज्ञानिक व्यवधान होने से रचना की संप्रेषणीयता बाधित होती है ।
[14/07 13:06] Aanand Krishn Ji: विज्ञानं, तथ्यों का संश्लेषणात्मक और विश्लेषणात्मक अध्ययन करके निष्कर्ष निकालने की प्रक्रिया है । यही प्रक्रिया साहित्य की भी है । इस बिंदु पर कोई रचना लिखना वास्तव में वैज्ञानिक आचार है ।
[14/07 13:12] Sharad Kokas Ji: धन्यवाद दिनेश भाई ,कहानी कविता ,उपन्यास पढ़ते हुए या फिल्म देखते हुए मैं औरों से ज़्यादा आनंद लेता हूँ इसलिए कि मुझे पता होता है मेरे भीतर जो भाव जन्म ले रहे हैं वे किस वज़ह से हैं और कौनसे हार्मोन उन्हें बढ़ाने या घटाने में मदद कर रहे हैं . 
हाँ यह ज़रूर होता है कि पहली बार में ही अगर तर्क वाला पक्ष जाग जाए तो आनंद में व्यवधान उत्पन्न हो जाता है ,लेकिन ऐसी स्थिति में  मैं सायास अवचेतन को साध लेता हूँ और तर्क वाले स्विच को कुछ समय के लिए ऑफ़ कर देता हूँ 😀😀

बस फिर क्या है , कॉमेडी वाले दृश्यों  पर पेट पकड़ कर हँसता हूँ , भावुक दृश्यों पर आंसू बहाता हूँ ,नास्टेल्जिक होता हूँ , उदास होने वाले गीत गाता हूँ . छोटी छोटी बातों पर खूब खुश होता हूँ , दुखी भी होता हूँ ..कुल मिलाकर ऐसा करते हुए भी एन्जॉय करता हूँ .

लेकिन लिखते हुए और अपनी या अन्य की समीक्षा करते हुए मैं सारे स्विच ऑन रखता हूँ ,मेरा प्रयास रहता है कि कोइ तथ्यगत ग़लती नज़र से छूट न जाये .आलोचना में मैं सबसे ज़्यादा अपने लिए ही निर्मम हूँ . हालाँकि इस तरह से भी रचना को एन्जॉय किया जा सकता है . मैंने इसीलिए कहा कि मैं औरों से ज़्यादा कई तरीकों से आनंद लेता हूँ .

*शरद कोकास*
[14/07 13:14] Sharad Kokas Ji: आनंद की बात से सहमत हूँ कि विज्ञान, तथ्यों का संश्लेषणात्मक और विश्लेषणात्मक अध्ययन करके निष्कर्ष निकालने की प्रक्रिया है । यही प्रक्रिया साहित्य की भी है
[14/07 13:23] Sharad Kokas Ji: यहाँ प्रस्तुत कहानी में भी वैज्ञानिक तथ्य आराम से जोड़े जा सकते थे ,मुश्किल से सौ शब्द और बढ़ाने पड़ते . जैसे नायक के मुंह में छाले या घाव का एक ज़िक्र या गुरु मान्त्रिक द्वारा शिष्य को वास्तविकता बताकर
[14/07 13:25] Aanand Krishn Ji: उसे गुटखा खैनी खाने का आदी बता कर, जिससे उसके मुंह में घाव हो जाता । 😀😀😀
[14/07 13:31] Sharad Kokas Ji: इस कहानी में स्पर्श ग्रंथि का बहुत बढ़िया प्रयोग है । यह एक तरह की मानसिक ग्रंथि है । प्रणय संबंधों में यह सबसे ज़्यादा सक्रिय रहती है ।
[14/07 13:34] Aanand Krishn Ji: जी भैया । पर इसे मानसिक ग्रंथि क्यों कह रहे हैं ? स्पर्श के संकेत सीधे मस्तिष्क में जाते हैं और वहां सम्बंधित हिस्से को सक्रीय करते हैं ।
[14/07 13:37] Aanand Krishn Ji: यह बात सही है कि प्रणय संबंधों में यह अनुभूति सबसे ज़्यादा सक्रिय रहती है ।
[14/07 13:49] Sharad Kokas Ji: स्पर्श के संकेत मस्तिष्क तक जाना स्वाभाविक प्रक्रिया है इसके बारे में विस्तार से मैं एक कड़ी में बता चुका हूँ . किन्तु किसी के छू लेने पर दोबारा उसे छूने या प्रत्युत्तर में छूने की इच्छा रखना मानसिक ग्रंथि है .कई लोगों में तुमने देखा होगा वे छू छू कर बात करते हैं यह भी मानसिक ग्रंथि है बस या रेल यात्राओं में कुछ पुरुष जानबूझकर स्त्रियों को स्पर्श करते हैं या छूने की कोशिश करते हैं वह भी एक मानसिक ग्रंथि है  वह भी एक ग्रंथि है .
[14/07 14:04] Saksena Madhu: इस कहानी में लेखक  भी नायक की  मासूमियत को कम नहीं करना चाहता होगा ..इसलिए ऐसे तर्क नहीं दिए जैसे आनन्द जी ने कहा ... 
अब ये बातें हमे भी नहीं पता थी ।
[14/07 14:39] Sharad Kokas Ji: मधु जी , जो सिद्धहस्त लेखक होता है और जिसके पास वैज्ञानिक दृष्टिकोण होता है उसे सायास कहानी में तर्क डालने की ज़रूरत नही होती । ऐसी कई कहानिया लिखी जा चुकी हैं ।

जैसा की इस कहानी में हो सकता था .... 
वंशी ने जैसे ही सर्पदंश को देखा उसके मुंह से निकला ....  उफ़ ... घोडा करैत । फिर मन ही मन सोचा , अब तो कोई उपाय काम नही करेगा । एकबारगी उसका मन हुआ कि चौधरी जी को उसे अस्पताल ले जाने की सलाह दे । फिर उसने ध्यान से देखा ज़हर भीतर तक नही गया था और देह के तट पर कहीं हिलोरे ले रहा था । एक पीतल की थाली लाओ , उसने आदेश दिया । हालांकि वह जानता था कि इस टोटके से भी कोई लाभ नही है । फिर भी उसने ............
एंड सो ऑन.......
[14/07 15:33] Sharad Kokas Ji: और यह याद रखा जाये कि यह प्रेम कथा है , मानवीय भाव सब तर्कों से परे होते हैं । 
प्रेमचंद की ' मन्त्र' कहानी को याद कीजिये ।
[14/07 16:08] Avinash Tivari Sir: कहानी बहुत अच्छी प्रेम कहानी है फार्मूला फिल्मों की तरह अंत में अतिनाटकियता का शिकार हो गई लगती है जब बूढ़ा बंशी दादा गांव दूर इलाज करने जाता है और सर्प दंशक अपनी प्रेमिका को देख अपनी जान न्यौछावर कर बचा लेता है यहाँ तक बिलकुल ठीक चली है किन्तु भाग कर बरसों पुरानी जींस टी शर्ट पहन कर इलाज करना नाटकीय हो गया है।गांव के दृश्य जीवन शैली और खास कर गीत बहुत ही सजीव हैं।बहुत बहुत बधाई आभार राकेश जी एडमिन जी।।
[14/07 16:27] Saksena Madhu: मुझे जीन्स  टी शर्ट वाली गलत नहीं  लगी गांव में कई लोग जीन्स टीशर्ट पहनते है और मोबाइल नहीं रखते या टेक्निक का उपयोग नहीं करते ।कई पढेलिखे जानकार लोग भी जानबूझकर इन चीजों का उपयोग नहीं करते ... हमारे कई रचनाकार fb और वाट्सप पसन्द नहीं करते और उनसे दूर हैं ।
[14/07 16:33] ‪+91 96800 04736‬: कहानीकार ने इंगित किया है , परिधान विशेष के साथ मधुर स्म्रतियां जो जुडी हुई हैं नायक की ....

💐
[14/07 16:54] Meena Sharma Sakiba: पुराने कपड़े उस वक्त की स्मृति
के लिये पहने है कहानी के नायक
ने.वह अपनी सारी शक्ति ...सारा
प्रेम , जैसे एकत्र कर रहा हो,नायिका के उपचार के लिये. 
पराकाष्ठा ...प्रेम की. ..बहुत 
अच्छी कहानी है,जो पढ़ते 
वक्त साइंस के नहीं....केवल 
प्रेम के साथ बुनी गई है...पुन: 
प्रवेश जी  को धन्यवाद उस 
कहानी की प्रस्तुति के लिये...
जिसे बार-बार पढ़ा गया और जिस पर अभी तक चर्चा ने विराम 
नहीं लिया है.
[14/07 16:56] Pravesh soni: सहमत हूँ मीना जी आपसे ,लंबे समय के विछोह के बाद यदि अपने प्रेम को बचाने का प्रश्न आये तब तमाम स्म्रतियां  शक्ति का संचार करती है ।
धन्यवाद  मित्र
[14/07 17:02] Meena Sharma Sakiba: प्रवेश जी आपने जिस तरह कहानी
के साथ बीच-बीच में आकर कमान कसी है, वह भी काबिले तारीफ है...!
[14/07 17:11] Sudin Ji: कई बार कहानी हू ब हू लेखक के जीवन से गुज़री होती है और वह बस पूरी घटना को शब्द देता है । कभी कभी नायक को सबसे अलग और विशेष दिखाने के लिये भी कुछ ख़ास लिबास में बताया जाता है । कहानियों में यह सब ऐक आम बात है । जींस टी शर्ट भी शायद उसे विशेष  बताने के लिये ही बतायें गये हों। अब वंशी की सोना से दूर रहते हुये कभी बात ही नहीं हुयी लेखक ने इसीलिए मोबाइल का ज़िक्र ना किया हो ऐसा मुझे लगता है
[14/07 17:35] Rakesh Dubey: आप सभी के प्रति आभार. मेरा यह मानना है कि रचनाकार को अपनी रचना पर बोलने से बचना चाहिए, लेकिन व्रज जी और प्रवेश जी का आदेश है तो कुछ बाते विनम्रतापूर्वक कह रहा हूँ. मेरा उद्देश्य केवल एक प्रेम कहानी लिखना था न कि सर्प और विष विग्यान पर जानकारी देना वैसे गांव के जो लोग मन्त्र से झाड़ते है  उनमे से अधिकान्श इस विग्यान को नही जानते लोग उनके पास आते है वे ठीक हो जाते हैं और विश्वास वनता जाता है. जहाँ तक सूचना क्रान्ति की बात है तो तीन दिन पहले पिथौरागढ़ की एक गर्भवती महिला को अस्पताल ले जाने के लिए 5 किमी डोली से और 40किमी ट्रक पर लादकर अस्पताल ले जाया गया महिला मर गयी. मेरे अपने गांव मे 2002 मे बिजली और पहला टावर वाला टेलीफोन लगा. जहॉ तक जीन्स पहनने का सवाल है वह लाक्छणीक प्रयोग मात्र है जो प्रथम मिलन स्म्रीति से सम्बन्धित है. कहानी का प्राथमिक उद्देश्य मेरी नजर मे मनोरन्जन है जो अनिवार्यतः कोई न कोई सन्देश देती ही है. मै इसी उद्देश्य से लिखना भी चाहता हूँ
[14/07 17:40] Rakesh Dubey: वैसे भी प्रेम मे तर्क कहॉ होता है 2 प्रेमी कई दिन विना किसी मुद्दे के बात कर सकते हैं
[14/07 17:42] Braj Ji: राकेश दुबे जी.. ठीक बात है. कहानी की जो जान है वो प्रेम का एक वाकया बताना है. आपने अपनी बात रखी. शुक्रिया. हर रचना की अति क्रिटिक्स उसके रचनात्मक, और पहुंच के उत्स को नीचे भी कर देती है. लेकिन मुझे लगता है कि चर्चा का भी अपना स्वभाव होता है. और हम सब उसकी जरूरत भी महसूस करते हैं.
[14/07 17:42] Rakesh Dubey: एक व्यक्ति है मेरे गॉव मे जो किसी के छूने से व्यथित हो जाते हैं
[14/07 17:51] Sudhir Deshpande Ji: कहानी जहां आपके भावोद्वेग से जुड जाती है तब विज्ञान, तर्क आदि तेल लेने जाते हैं। ऐसा मैंने देखा। आपका अवचेतन स्विचाफ होता ही है।
[14/07 18:00] ‪+91 96800 04736‬: भावनाएं ही तो भविष्य से परे(un predictable) होती हैं, शायद इसलिए कला जगत , विज्ञान जग से अनूठा होता है ...
[14/07 18:24] Sharad Kokas Ji: अवचेतन पर हमारे समूह में पहले भी काफी बातें हो चुकी हैं । हम जो कुछ भी पढ़ते लिखते हैं वह इसी अवचेतन से ही संभव होता है । यहाँ हमारा शब्द भंडार  होता है जिससे हम हर चीज का मतलब समझते हैं ।
[14/07 18:30] Sharad Kokas Ji: जीन्स का प्रयोग गलत नहीं है । जीन्स 70 के दशक में आ चुकी थी । मैंने पहली जीन्स 72 में खरीदी थी। मोबाइल क्या तब घरों में फोन भी नहीं होते थे । गांव में बिजली नहीं थी । 
लेकिन सर्प वाली घटना तक वह जीन्स पुरानी हो चुकी है इसलिए प्रवेश का यह शंका करना स्वाभाविक है। 
अगर इसमें कुर्ता पायजामा अचकन जैसे वस्त्रो का प्रयोग होता तो वह ज़्यादा स्वाभाविक लगता ।
[14/07 18:42] Meena Sharma Sakiba: राकेश जी आपने जिस उद्देश्य
को लेकर कहानी लिखी है, आप
उसमें पूर्णत: सफल रहे हैं..  
पात्रों की चरित्र चित्रण बखूबी
हुआ है.. 
शानदार कहानी के लिये.
आभार !
[14/07 18:43] Sharad Kokas Ji: राकेश जी का उद्देश्य कहानी लिखने का भले ही मनोरंजन हो लेकिन लेखक को तथ्यगत बातों का भी ध्यान रखना जरुरी होता वर्ना पढ़ते हुए व्यवधान उत्पन्न होता है । 
मैंने पूर्व में यह बताया है कि किस तरह एक दो जगह संवादों को चेंज कर यह बात लाई जा सकती है । आपने एक दो जगह पढ़े लिखे लोगों का ज़िक्र भी किया है यह अच्छी बात है उनके माध्यम से भी यह बात लाई जा सकती है ।
कहानी केवल ब्यौरे नही होती , कहानीकार का अपना अध्ययन ,अनुभव और दृष्टिकोण उसमे शामिल होता है । 

दुर्ग के हमारे मित्र प्रसिद्ध कथाकार मनोज रूपड़ा की एक कहानी में रेलवे इंजन का ड्राइवर एक पात्र था उसके संवादों में स्वाभाविकता लाने के लिए वे तीन माह तक अपने मित्र पूरण हार्डी जो रेलवे ड्राइवर थे उनके साथ इंजन में बैठकर दुर्ग से डोंगरगढ़ जाते थे  और इंजन की बारीकियाँ सीखते थे ।

Sunday, July 10, 2016


 आज  इन्टरनेट हर इंसान की जरुरत बन गया है ,यह संचार क्रांति का सुगम और तेज माध्यम है ,इसने जोड़ने का अद्दभूद काम किया है | इन्टरनेट क्रांति से   हमारे देश में जनसंख्या का  एक बड़ा प्रतिशत उपयोग करके दुनिया जहाँ में अपने विचारो के तार जोड़ रहा है | लगता है जैसे सारी दुनिया मुठ्ठी में और एक क्लिक में समां गई है | फेसबुक जैसी सोअशल साईट के बाद आज व्हाट्सअप ने लोगो को द्रुत गति से जोड़ने का काम किया है |यहाँ बने साहित्यिक  समूह विचारविमर्श का बड़ा मंच साबित हो रहे है  |ऐसे ही एक साहित्यिक  समूह "विश्व मैत्री मंच " पर एक बहुत ही संवेदित विषय "विस्थापन " पर हुई चर्चा को आज मै प्रवेश सोनी "रचना प्रवेश " पर रख रही हूँ | इस समूह की मुख्या एडमिन है सुश्री  संतोष श्रीवास्तव ,जो समकालीन प्रतिष्ठित लेखिका है |इस समूह  की विशेष बात यह है की इसकी सभी सदस्य स्त्रियाँ है और वो यहाँ पर अपने लेखन के अलावा अन्य विषयों पर भी जम कर चर्चा करती है |विस्थापन जैसे संवेदनशील विषय पर हुई चर्चा यह साबित करती है कि आज की  स्त्रियों के सोचने के मापदंड बदल गए है वो अच्छा साहित्य पढ़, लिख तो रही है ,साथ में  उच्य  वैचारिकता  का भी परिचय दे रही है ,जिसे व्हाट्स अप ने  और मुखर कर दिया है |


♻परिचर्चा♻
विषय :विस्थापन 

संतोष श्रीवास्तव 
'विस्थापन ' एक ऐसा शब्द है जो दर्द के सिवाय कुछ  नहीं देता ... नए -पुराने  ,राष्ट्रीय -अंतराष्ट्रीय स्तर पर अनेको विस्थापित हमे मिल जायेगें या जिनके बारे में जानकारी हमे रही ।हरसूद ताजा उदाहरण है । अंतराष्ट्रीय स्तर पर मनुष्य ने विस्थापन का दर्द बहुत झेला है ।उसको विस्तार से बताने की आवश्यकता नहीं।
 इस विषय पर साहित्य बहुत कम लिखा गया है  ,अगर इस विषय पर विपुल साहित्य लिखा जाता तो क्या विस्थापन को रोका जा सकता था ? साहित्य जन चेतना का आधार भी तो है ना ?
दूसरी बात कभी कभी ये भी देखा है की विस्थापन उन्नति का कारण भी बना है ।  पारिवारिक ,आर्थिक ,सामाजिक ,राजनैतिक कारण है  विस्थापित व्यक्ति उन्नति भी करता।
 जीवन की कठिनाइयां संघर्ष की शक्ति भी देती हैं ।हम सब भी कहीं न कहीं से उठकर आये हैं स्वेच्छा या मज़बूरी में ......
तो क्या कहना है साथियों ...
विस्थापन  से दर्द मिला या उन्नति  ?
विकास के मार्ग खुले या अवरुद्ध हुए ?
आज इसी पर बात करके कुछ निष्कर्ष निकलते हैं .....कारण सहित अपनी बात कहें ।

रुपिंदर जी 
शुभ प्रभात vmm🙏
एक सार्थक विषय के साथ मंच पर संमिधा परोसी है मधु दीदी ने।विषय ज्वलंत है,क्यों कि कहीं न कहीं पूरा विश्व ही झेल रहा है इस विस्थापन के दंश को।जैसा कि आदि काल से देखते आए हैं, एक शासक की छत्र छाया में विद्रोह पनपते थे।मानव का स्वभाव ही है सदैव सत्ता पाने हेतु आमजन का सहारा लेकर अलगाव से स्वयं की सत्ता को स्थापित करना।पर इस सत्ता में भी क्या आम जन को राहत मिली है।आज सब इस विषय का मनन करेंगे और इस चर्चा को समृद्ध कर कुछ तो हल निकालने की चेष्टा करेंगे कि आने वाली पीढ़ी इस दंश से राहत महसूस करे।

‪+जया जी 
91 81099 90582‬: विस्थापन का दर्द तो वृक्षों को भी होता है फिर इंसान तो समझो टूट ही जाता है। सब कुछ नए स्थान पर नए सिरे से बीते को भुलाकर करना पड़ता है। हम भी तो विसाथापित ही हैं बहनो। एक सोची समझी समाज की परंपरा को निभाने के लिए जब हम माँ, पापा, भाई, बहन को छोड़कर ससुराल आते हैं तो साल दो साल लग जाते हैं सामन्जस्य बिठाने में। फिर जिन्हें मजबूरी में अपना सब छोड़ना पड़ता है उन्हें तो अनेक मुसीबतों का सामना करना पड़ता है।
 विस्थापन को टाला नहीं जा सकता। उसके बाद पुनर्स्थापन में जीवन की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर एक के बाद एक कार्य करना पड़ता है। कई बार हमें सहयोगी मिल जाते हैं तब कुछ आसानी होती है पर जहाँ कोई मार्गदर्शक न मिले तो मुश्किलें बढ़ जाती हैं।

 Manjusha Man: विस्थापन चाहे जिस भी कारण से दर्द ही देता है। गहरी पीड़ा से भरा शब्द है विस्थापन। हर व्यक्ति इसे कभी न कभी झेलता ही है। कभी प्राकृतिक आपदा के चलते तो कभी मानव जन्य आपदाओं के कारण।

बाढ़, सुखा विस्थापन की बदे कारण है आज के दौर के। साथ ही सामाजिक वातावरण, दंगे, हिंसा, कठोर परम्पराये भी विस्थापन को जन्म देतीं हैं।

आज अगर देखें तो रोजगार की तलाश, बेहतर जीवन की  आस भी विस्थापित का कारण बनते हैं।

हमारे समाज में स्त्री का भी विस्थापन होता है। विवाह के बाद अपना सबकुछ छोड़ कर नई जगह, नए परिवार में जीवन प्रारम्भ करना भी विस्थापन ही है।

पर जो भी हो अपनी जड़ों से कटने का दर्द तो झेलना ही पड़ता है।

आज के इस विषय पर आप सभी के विचारों की प्रतीक्षा है।



रुपिंदर जी 
91 77729 99154‬: जी हाँ इस दिशा में पूरे विश्व की भागीदारी होना आवश्यक है।जैसे की युनिसेफ जैसी संस्थाओं को विश्व जागरण कर उनके लिए सुविधाओं को मुहैया करना एक सराहनीय कार्य है।और भी बहुत सो ऐसे समूह हैं।किन्तु क्या इनकी राहत परिपूर्ण होती है यह भी एक ज्वलंत प्रश्न है।

 एक एक कर बात करने से उचित रहेगा।कई प्रकार की विस्थापना को एक साथ चर्चा में लेंगे तो भटक जाएंगे।बेहतर होगा मंजुषा मन जी प्रश्न करें और उसी का सब उत्तर देंवे।🙏🙏🙏😊

रत्ना पाण्डे जी  ‪
91 93291 17910‬: अपनी मिट्टी अपने वतन से दूर एक अनजान जगह  में रहकर  फिर से जिन्दगी की शुरूआत करना  बहुत मुश्किल होता है
नई भाषा और संस्कृति के साथ कदमताल करते बरस बीत जाते हैं  पर  जब उन्हें  बाहरी ही समझा जाता है  तो दुख  भी होता है
कई बार खुद भी अलग थलग रहकर  खुद को बाहरी समझने का भाव भी स्वाभाविक विकास में बाधा बनता है
इतना निश्चित है कि कोई ब्यक्ति ऐसी स्थिति जानबूझकर नहीं लाना चाहेगा  पर यदि किसी कारण ऐसी स्थिति बनती है तो  स्थानीय रहवासियों को खुले दिल का परिचय देना होगा  दूसरे देश के या स्वदेश के विस्थापितों के साथ एक मानवीय सदाचरण तो किया ही जा सकता है  सब कुछ सरकार भरोसे नहीं छोड़कर अपनी जिम्मेदारी भी निभानी होगी  समय परिस्थिति  का क्या भरोसा   ऐसी स्थितियाँ किसी के साथ भी आ सकती हैं

रुपिंदर जी 
91 77729 99154‬: जी रत्ना जी आज भी तो विस्थापित इसकक दंश झेल ही रहे हैं।हाल ही में कश्मीरी पंडितों का विस्थापन कितना दुखद है क समय काल परिस्थितियों वातावरण सब को झेला हैं इन्होंने ओर झोल भी रहे हैं।बंगाल के विस्थापित आज भी रिफ्यूज़ी कहलाते हैं।पाकिस्तान में गए भारतीय मुस्लिम आज भी मुजाहिर कहलाते हैं।

 Manjusha Man: अच्छे विचार आ रहे हैं। विस्थापन की त्रासदी से बचने के उपाय तलाशे जाना आवश्यक है।

नीलम दुग्गल जी 
‪+91 99539 27728‬: जब तक राजनीतिज्ञ हमारे भाग्यविधाता रहेंगे राजनीतिक विस्थापन नहीं रोका जा सकता।
 अपनी खुशी से कौन अपनी धरती छोड़ना चाहता है

Santosh Shreewastv: सखियों बहुत अच्छी चर्चा चल रही है।एक नज़र अपने देश पर भी डालिये ।आज़ादी मिलने के बावजूद कश्मीर से जान बचाकर भागे और जम्मू में विस्थापन का दर्द झेल रहे कश्मीरी ब्राह्मण जिनके घर ज़मीन उनकी बाट जोह रहे है।क्या गुनाह था उनका ?

 Santosh Shreewastv: इसी तरह बांग्ला देशी भी भटक रहे है।मशहूर लेखिका तस्लीमा नसरीन को भी लज्जा लिखने के ज़ुर्म में इधर उधर भटकना पड़ रहा है।
Manjusha Man: क्या कारण है विघटन एवं विस्थापन के?

रुपिंदर जी 
91 77729 99154‬: बहुत से कारण हैं मंजुषा जी।जब देशों में विस्थापन होते हैं तो उनके कारण स्पष्ट होते हैं माँ तो दो देशों में युद्ध की स्थिति माँ फिर आर्थिक मार।
जब स्थितियां देश के भीतर की होती हैं तो कई बार मुख्यतः प्राकृतिक आपदाएं होती हैं।
वगत सालों में आंतकवाद एवं नकस्लवाद का घिनौना रुप सामने आया है जो कि प्रमुख कारणों में एक है।उसके पश्चात् पलायन भी एक बड़ी समस्या है।जीवीका के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान विस्थापित होना आम हो गया है,पहले भी महानगरों का आकर्षण लोगों को अपनी ओर खींचता आया है।

किरण वैद
91 98265 16430‬: विस्थापन की कारणों से हो सकता है।विभाजन,  शिक्षा ,रोज़गार चयन, आपसी मनमुटाव , संयुक्त परिवारों का विघटन ,शहरों का विस्तार, सौंदर्यीकरण, या मानव की अपनी महत्वाकांक्षा ।हालात कुछ भी हों पर विस्थापन अक़्सर दुखदायी होता है।
क्योंकि विस्थापन के बाद उतपन्न होती हैं व्यव्स्थापन की समस्या। जिसके चलते मानसिक,आर्थिक भावनात्मक सांस्कृतिक समझौते करने पड़ते हैं।फलस्वरूप जीवन तनावपूर्ण और एकाकी हो जाता है।

जया जी 
91 81099 90582‬: पारिवारिक आपसी कलह जब विस्थापन का करण बनती है तब सबसे अधिक पीड़ा महिलाओं को सहना पड़ती है। उनका संवेदनशील मन व्थित हो उठता है।

 Manjusha Man: अगला प्रश्न यही है कि...
क्या झेलना पड़ता है विस्थापन में, और किसे किस स्तर पर??
जया जी
 सबसे पहले यदि देश से बाहर जाना पड़े तो बच्चों को स्कूल, भाषा,आदि की समस्या आती है।
 मुखिया को रोजगार की तथा धन से जुड़ी जिम्मेदारियों के लिए जूझना पड़ता है
 महिलाओं को भी आसपड़ौस से सामन्जस्य बिठाने में समय लगता है।

Saksena Madhu: विस्थापन को साहित्य में कितना स्थान मिला ? इस पर भी चर्चा हो ।
विस्थापन के दर्द को उकेरने में अमृता प्रीतम के पिंजर को याद करिये सखियों ।
 हरसूद का बाँध की डूब में आना और पुरे गांव को विस्थापन का दंश झेलना ......ये उन्नतई है  या अवनति ?

सुनीता जी 
91 96468 56989‬: सखियों औऱ मन जी को नमस्कार!!
 बहुत सार्थक बहस चर्चा की भागीदारी का सौभाग्य!!
 क्या विस्थापन सिर्फ़ तक़लीफदायक ही है!!!!
 मेरा मानना है नहीं।
जिस तरह पानी एक जगह जमा होकर सड़ता जाता है
मेरा मत है उसका अविरल बहना अत्यंत आवश्यक है,
उसी तरह हमारा भी।
बंध के या एक ही जगह से जुड़े रहना हमारी उतरोतर उन्नति में बाधक हैं।
नया परिवेश, नये लोग, नई भाषा औऱ नया जीवन!!
यूँ भी घर की साज -सँवार ही बदल देने से उत्साह औऱ ऊर्जा में आशातीत परिवर्तन आ जाता है तो क्या हमें विस्थापन नई प्रक्रिया में प्रवेश नहीं दिलाएगा!!!!!
अगर सकारात्मकता से सोचें तो ऋतुऐं बदलती हैं,
पेड़ नए वस्त्र धारते हैं, चलन बदलते हैं, इक्छाऐं  बदलतीं हैं ,उम्र बदलती है,सोच बदलती है------- ये बदलाब निश्चित हमें अच्छा लगता है।
विस्थापन भी हमें विकास की ओऱ ही ले जाता है वरना हम स्वयं में मगन  रहकर ही जी पाएंगे।
मंजूषा जी सुंदर संचालन की बधाई!!💥

पूर्ती खरे जी 
91 91071 65448‬: नमस्कार सखियों🙏
 आदरणीय मधु जी सदैव ही इतना रोचक विषय देती हैं की खुद को लिखने से रोक ही नही पाती।
 समझ नही आता कहाँ से अपनी बात शुरू करूँ... आप सब बात अपने एक दायरे तक ही कर रहीं हैं, पर मुझे विस्थापन बिल्कुल पसन्द नही , हाँ ये अवश्य है की ये समय की माँग के अनुरूप और दाल-रोटी के लिये मन मार कर करना ही पड़ता है।
 वो सब ठीक पर मैंने जो विस्थापन की कहानीयाँ सच्ची कहानियां जम्मू के लोगों के मुँह से सुनी मेरे रोंगटे खड़े हो गए। यहाँ पर हर शख्स की विस्थापन की अपनी कहानी है, कश्मीरी पण्डितों की कहानी, कई मुस्लिमों की कहानी इतना दर्द है इनकी बातों में यादों में की आप अपने आँसू रोक न पायेगें, आपका सभी का मन होता होगा अपने पुराने गाँव जाने का पुराने घर को देखने का, और आप सभी स्वेक्षा से उसे छोड़ कर आये पर जिन्हें जबरजस्ती अपने घर से निकाला गया उनका क्या?
 बेहद उदास हो जाते ये लोग जब भी इनसे पुरानी बातें करो, ये जानते हैं विस्थापन का दर्द।
 और ऐसे ही कई सिख, हिन्दू भाई बहिन हैं जो कश्मीर या उनके आस-पास बासे हैं मजबूरन विभाजन के दौरान पकिस्तान छोड़ कर आये।
 इनका दर्द इतना गहरा है की व्यक्त करना मुश्किल।
 इस विस्थापन के दर्द से ये कई बार गुजरे हैं।

किरण वैद जी 91 98265 16430‬: सुनीता जी आपने विस्थापन के उजले पक्ष पर प्रकाश डाला मैं भी इस से सहमत हूँ।पर विस्थापन के दुःख ज़्यादा हैं ,खुशियां कम । अपनी जड़ों से दूर कुछ ही रोपे पनप पाते हैं।जिनमें हम बेटियां अपनी मिसाल रखती हैं।
बेटी बिरवा धान का,जित रोपें उग जाए।
अपनी माटी छोड़ के,और जगह हरियाए।

 Pravesh soni: ‘‘विस्थापन  एक ऐसी परिघटना होती है, जो ठोस वस्तुगत यथार्थ  में घटित होती है। इसके मूल में विवशता  और बेबसी की चीख होती है। व्यक्ति या व्यक्तियों का समूह जब विस्थापित किया जाता है तो उसमें उनकी परिवेशगत जड़ों से कटने का दंश होता है, और चूँकि यह दूसरों के द्वारा लिया गया निर्णय होता है इसलिए यह विवशता में ही स्वीकार किया जाता है। यह चाहे विकास के नाम पर हो या देश पर कुर्बान होने के नाम पर हो।
‘विस्थापन’ शब्द में ‘‘स्थान’’ जो सिर्फ एक जमीन का टुकड़ा भर नहीं होता, एक मानवीय जीवन की संपूर्णता का जीवंत परिवेश  होता है, वहाँ के कण कण के साथ व्यक्ति का आंतरिक जुड़ाव होता है, जिससे उसका विस्थापन किया जा रहा होता है। यह ठीक उस तरह की प्रक्रिया होती है जिसमें अपने शरीर से रक्त और चेतना को अलग किया जा रहा हो और देह एक जड़ भौतिक वस्तु की तरह कहीं और फेंक दी गई हो।
स्वेच्छा से दूसरे स्थान पर रहने जाना या रोजगार के लिए जाना विस्थापन की श्रेणी में नहीं आता है। इसके साथ जोड़कर विस्थापन की भयावह सच्चाई को हल्का नहीं किया जाना चाहिए।

Rachana Groaver: *विस्थापन*
एक दर्द है
एक आह है
एक सिसकी है
दंश झेलती हैं
लड़कियाँ
जब बन जाती बहुएँ
तुम्हारे उस घर में होगा ये नियम
हमारे यहाँ नहीं चलता*
जैसे वाक्य चीर कर रख देते हैं
उसका सीना

विस्थापन देखा है मैंने
अपने पिता की आँखों में
जब कभी बात करो सन् 47 की
आँखों में क्रोध घृणा जैसे भावों
के साथ दर्द की एक लहर
साथ चली आई हो
भिंचे होंठ
तकलीफ बयान करते
आँखें भीग उठती
यादो के साये तले

विस्थापन
दंगे
रोज़गार
विभाजन
की परिभाषा के शब्द हैं ये
एक शब्द और है
विवाह
जिसमें विस्थापित होती है
कन्या बिरवें की भांति
बन जाती है पूरा दरख्त
बन जाती है पूरा दरख्त
@रचनाग्रोवर

डॉ मञ्जूषा हर्ष जी 
91 94792 31098‬: सखियो विस्थापन के अनेक कारण होते है सामाजिक ,आर्थिक, जनसंख्या के कारण,जातिगत समस्या, घटना विशेष के कारण,
राजनीतिक कारण आदि
उदाहरण के लिए भारत पाक विभाजन रानीतिक कारण था,कश्मीर में  एक विशेष वर्ग ने उस पर पूर्ण आधिपत्य के लिए साम ,दंड,भेद व हिंसा के द्वारा जबरन विस्थापित किया तो पश्चिमी
पाकिस्तान (वर्तमान बंगला देश )से हजारों  ने शरणाऑर्थी के रूप में भारत में क्षरण ली
विस्थापित होने वालों निश्चित ही बहुत  कुछ खोना पड़ता हैऔर घोर पीढ़ा व दर्द सहना पड़ता है पर अगली पीढ़ियों में वो तीव्रता नहीं होती
  विकास कार्यों जैसे बाँध निर्माण में गाँव केगाँव डूब क्षेत्र में आ गए थे पर उनको आज तक न्याय नहीं मिला
 Rachana Groaver: मधु दी
विस्थापन को साहित्य में कितना स्थान मिला?
आपके इस प्रश्न का उत्तर
पिंजर
पकिस्तान मेल
डार सेबिछुड़ी
टोबा टेक सिंह
गर्म हवा
इस्मत आपा हो या अमृता प्रीतम
सर सहादत हसन मंटो
भीषम साहनी का तमस
बहुत लिखा गया है।

रुपिंदर जी 91 77729 99154‬: सही कहना है आपका मंजुला दी।पर क्या कारण हो सकता है इसके पीछे क्या वह इतनी तीव्र वेदना देता है कि उसके बारे में लिखना स्वयं में त्रासदी भोगना है।

डॉ मञ्जूषा हर्ष जी +91 94792 31098‬: विवाह में विस्थापन सामाजिक आवश्यकता के साथ भारतीय परंपरा है क्योंकि किसी पेड़ के नीचे पौधे पल्लवित नहीं होते पर दर्द व टीस तो रहती ही हैजबकि दक्षिण भारत में मातृ प्रधान परिवार हैं
 पर आज जीवन यापन के लिए सारे समीकरण बदले हुए हैं
जड़ से उखड़ने का दर्द तो पेड़ ही बता सकता है
संम्पूर्ण दृश्य ही परिवर्तित हो जाता हैअपनी माटी, देश,समाज तो याद रहेंगे ही स्मृतिमें
ऱिर माँपिता सा प्यार तो अपनी माटी ही देती है
रुपेन्द्र राज जी एक बात और है जो अपनत्व माँ या अपनी माटी देती वह दुबारा नहीं मिल पाता
विवाह एक जिम्मेदारी है इसमें फिर वही चक्र चलता है जो हमारे मातापिता ने झेला,
समय,काल परिस्थिति के कारण कुछ परिवर्तन हो सकते है पर वो बचपन की बेफिक्री वाली अवस्था नहीं लौटती और मन के एक कोने में बचपन सदैव रहता है

रुपिंदर जी 91 77729 99154‬: जी मंजुला जी आप शब्दश: सही कह रही है अपना कभी नहीं छुटता और जब छूट जाता है तो वह केवल एक त्रासदी बन जाता है।विस्थापन एक त्रासदी ही है।एक जगह से दूसरी जगह जाना पूरी आत्मा को झिंझोड़ देता है और विस्थापन सदैव विवशता से जुड़ा होता है।
किरण वैद जी 91 98265 16430‬: विस्थापन का एक कारण सही स्थान या मान न मिलना भी है।हमारे देश में प्रतिभाओं/योग्यताओं को/ क्षमताओं को सही स्थान न मिलने के कारण आज युवा  विदेशों को पलायन करहा है। और झेल रहा है उसके साथ ही उसका परिवार भी यह त्रासदी।इसके लिए हमारी आरक्षण नीति दोषी हैं जिसके कारण सवर्ण सुयोग्य उम्मीदवारों का शोषण हो रहा है ।

 Santosh Shreewastv: मैंने एक किताब सम्पादित की है जो विस्थापन पर मुम्बई के कथाकारो द्वारा लिखी कहानियो का संग्रह है।
"नही अब और नहीं'
यह किताब बेहद चर्चित हुई है। इसमें मेरी विस्थापन पर लिखी कहानी "जड़ो से उखड़ी" है।

किरण वैद जी 91 94792 31098‬: आपने सही कहा प्राचीन काल से शोषण की समस्या है
अंग्रेजों ने एग्रीमेंट के आधार पर एकमुश्त पैसा देकर कॉफी,जूट  व चाय आदि के पौधे लगाने देश विदेश ले गए  फिज़ी आदि दुवीपों में वे गिरमिटिया (   एग्रीमेंट का अपभ्रंश) मजदूर कहलाए
ये भोजपुरी बिहारी भाषा बोलते  हैं इन्होंने अपनी संस्कृति नहीं छोड़ी पर विस्थापन का दर्द| सहा
 इन्हें दिनरात काम करना पड़ता था मार खानी पड़ती थी घोर शोषण हुआ  ये तो आज भी चल रहा है
आर्थिक,सामाजिक रूप से पिछड़े,अशिक्षित,किशोरों का जो जीवन की सच्चाई नहीं जानते,पैसे की लालच में अंधी युवा पीढ़ी
सबका विस्थापन व शोषण होता है,लड़कियों से गलत काम कराए जाते हैं ये गिरोह के रूप में काम करते है

Rachana Groaver: विस्थापन एक विस्तृत विषय है
विस्थापन अर्थात एक विशेष क्षेत्र को छोड़ कही अन्य स्थान पर चले जाना । इसके अनेक कारण है प्राकृतिक राजनैतिक पारिवारिक आर्थिक ।
प्राकृतिक आपदाएँ मनुष्य को विस्थापित कर देती हैं। 1947 के दंगे हों या कश्मीरी पंडितो का दर्द या1984 के दंगे इन्हें जिसने झेल है उसकी ऑंखें आज भी नम है।
किसान आदिवासी तो आए दिन गए अपनी ज़मीन और जंगलों से बेदखल कर दिए जाते हैं।
आर्थिक कारण अपना गांव छोड़ झुग्गी झोपड़ी में रहने को
अभिशप्त है मजदूर वर्ग।
धारावी इनकी ही बस्ती है।
पारिवारिक कारण भी रोजीरोटी से जुड़े हैं।
आज देश का युवा अपना भविष्य विदेशों में अधिक देखता है

पर याद रहे वह प्रवासी है
विस्थापित नहीं
विकास ने शहर डुबाए हैं
हरसूद और टिहरी इसके उदाहरण है।
हमने विस्थापित किया है पशुपक्षियों को उनके ही घरों से।ं

मीरा श्रीवास्तव जी +91 91623 09770‬: विस्थापन की समस्या ,इसके गुणात्मक और ऋणात्मक पहलुओं पर आज वि मै मं के सदस्यों की सकारात्मक सक्रियता देखने को मिली है ।अनेक मत मतान्तरों के बीच मैं इस विषय पर कुछ बोलने से पहले शैलेन्द्र चौहान जी की एक कविता आपसबों के साथ बाँटना चाहूँगी --
सारा पानी
खंभात की खाड़ी में बह जाये
उससे बेहतर बने ऊँचा बाँध
केवड़िया गाँव के पास
दिखेगा नीला ,गहरा
ठहरा-ठहरा पानी पहुँचेगी नहर
कच्छ के रन तक
बदल जायेगा थार का रेगिस्तान
 हरे -भरे नखलिस्तान में
विद्युत धारा जायेगी मध्य प्रदेश
महाराष्ट्र ,गुजरात पर्यटनस्थल
सरदार सरोवर ,हरी -भरी
वादियों में सतपुड़ा की डूब की
परिधि में साढ़े छ:हजार गाँव
अड़तालीस हजार ग्रामवासी
हैं जो ,उनका क्या ?
पुनर्वसन में लपकती लोभ की
लंबी जिह्वाएँ ,चमकती लालच की सहस्त्रों शहतीरें
मिटा देतीं फर्क इंसान और
श्रगाल ,गिद्ध ,भेड़ियों में
दरकता है सरदार सरोवर
लपकती मगरमच्छों सी
राजनीति
बेदखल नागरिकों की
गरदनें दबोचने के लिए ..........
मित्रों विस्थापन अपने साथ केवल स्थानांतरण की पीड़ा लेकर नहीउ आती ,गाँव के गाँव  का वजूद नेस्तनाबूत हो जाता है ,केवल भौगोलिक दृष्टि से ही नहीं बल्कि आदमी का वजूद भी  खत्म हो जाता है।अपनी जमीन से छूटकर व्यक्ति की अस्मिता पर ही खतरा मँडराने लगता है ,उसका आत्मविश्वास डगमगाने लगता है ,जब न तो अपने पाँव तले की जमीन और न ही सिर के उपर के आसमान से उसका कोई परिचय होता है।उसकी जिजीविषा नई पहचान बनाने के लिए कोंचती है ,लेकिन कितने समझौतों की बिना पर ,अपने स्वाभिमान को किस कदर लहुलूहान करके ?इतने पर भी ताउम्र वह विस्थापन के दर्द और दंश को सहने के लिए अभिशप्त बना रहता है ।नई जमीन से जुड़ने की हर ईमानदार कोशिश उसे अविश्वसनीयता के संशय से मुक्त नहीं करा पाती।
 उन्नति का मार्ग विस्थापन  ने किस तरह प्रशस्त किया है ,यह शैलेन्द्र जी की कविता बखूबी बयान करती है ।
 बहरहाल मंच पर एक सामयिक और सार्थक मुद्दे पर परिचर्चा में मेरी सहभागिता स्वीकार करने के लिए आप सभी विद्वजनों का हार्दिक आभार।संतोष जी का बहुत -बहुत धन्यवाद मुझे पुन:स्वीकृति देने के लिए ।🙏🙏🙏🌷🌷😊

रुपिंदर जी +91 77729 99154‬: सच है रचना जी आपने अंत में बहुत मार्मिक बात कही विस्थापित किए पशु पक्षी ।विस्थापन और प्रवासी होना तथ प्लायन करना यह है तो एक ही सूत के ताने बाने किन्तु बहुत ही महीन फर्क है इनकी केवल व्याख्या का।विस्थापन अर्थात उखाड़ फैकना।प्रवास अर्थात स्व इच्छा।और पलायन अर्थात रोजी रोटी की खोज में भटकना।
 मीरा श्रीवास्तव जी शैलेंद्र चौहान जी की कविता का माध्यम से विस्थापन के दुख उसके कारक उसके घटकों के पीछे का घानौना सच उसकी पीड़ा सहते निरीह ।सब कुछ तो कह दिया इस कविता ने।यह एक सम्पूर्ण परिचय है विस्थापन के शाब्दिक अर्थ का ।बहुत सुंदर विवेचन काया है आपने मीरा जी चर्चा में आपकी सक्रिय भागीदारी के लिए हार्दिक आभार।🙏🙏🙏💐💐💐😊

मीरा श्रीवास्तव जी 91 91623 09770‬: विस्थापन से जुड़ी समस्याओं पर चर्चा के दौरान इतने सार रोचक तथ्य सामने आ रहे हैं कि मैं अपने को फिर से जोड़ने से रोक न सकी।विस्थापन सिर्फ ,राजनैतिक ,आर्थिक ,सामाजिक ,प्राकृतिक एवं भौगोलिक कारणों से ही नहीं मानवीय स्वार्थ की पूर्ति के लिए भी  होता है।भारतीय संयुक्त परिवार के पारंपरिक संरचनात्मक विघटन भी  ऐच्छिक वैयक्तिक विघटन का कारण बना।आबादी के बढ़ते बोझ ने भी विस्थापन को पलायन के रुप में बढ़ाया।और सबसे घातक विस्थापन का शिकार मनुष्य बना आधुनिकत
की दौड़ में शामिल होकर ,दिशाहीन स्थिति में वह अपने घर में ही बेघर हो गया ।
ये सारी स्थितियाँ हमें सोचने पर विवश तो करती हैं किन्तु
प्रयास में तीव्रता लाने की आवश्यकता है।एक निश्चित दिशा में विचार विमर्श एक समाधान हो सकता है ।इस दिशा मे आपसबों के प्रयास के लिए साधुवाद ।शुभ रात्रि।

मल्लिका मुख़र्जी 91 97129 21614‬: आज के विषय पर मैं इतना कुछ कहना चाहती हूँ पर समय ने मार दिया। जैसे संतोष जी ने पूछा बँटवारे के समय जो शरणार्थी बने क्या वे विस्थापित नहीं कहलायेंगे ? बिलकुल कहलायेंगे जी। मेरे माता-पिता दोनों पूर्व बंगाल से शरणार्थी बन अपने परिवार के साथ पश्चिम बंगाल आये जब वे जवानी की दहलीज पर क़दम रख ही रहे थे। उनकी हालत किसी वृक्ष को जड़ से उखाड़ दिए जाने की थी। उनसे मैंने बंटवारे का दर्द इतनी बार सुना कि मैंने जैसे खुद उसे झेल हो। आज वे इस दुनिया में नहीं है पर मैंने 2013 में बांग्लादेश का दौरा किया उनकी जन्मभूमि देखी। मुँह से यही गीत निकला -ओ आमार सोनार बांग्ला आमि तोमाय भालोबासी। उस धरती से मुझे भी प्यार हो गया।

Santosh Shreewastv: आस्ट्रेलिया भी पहले मात्र विभिन्न देशो के कैदियों को सज़ा देने के लिए  उपयोग में लाया जा लाया जाता रहा ।इस निर्जन द्वीप में जिन जिन देशो के कैदियों ने कैद की सज़ा भोगी जब वे देश आजाद हुए तो ये कैदी उन देशो में वापस नहीं लौटे और उन्होंने ही ऑस्ट्रेलिया को बसाया ।इसीलिए ऑस्ट्रेलिया में विभिन्न देशों के लोग ,भाषा और संस्कृति मिलती है।
रुपिंदर जी 91 77729 99154‬: बहुत अच्छी जानकारी संतोष दी द्वारा।आस्ट्रेलिया जहां एक निर्जन टापू  था आज एठ समृद्ध देश है।और बिलकुल विविधता में अनेकता का संगम मिलता है। वहाँ।धन्यवाद संतोष दी एक ज्ञानवर्धक सत्य कड प्रकाश में लाने के लिए।🙏🙏💐💐

 Santosh Shreewastv: इस विषय पर डॉ गिरीराजकिशोर ने उपन्यास लिखा है " पहला गिरमिटिया" और ये पहलस गिरमिटिया था महात्मा गांधी जिन्होंने साउथ अफ्रिका से आवाज़ उठाई थी ।हमारे पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोग अंग्रेज़ो ने  गिरमिटिया बनाकर भेजे थे सूरीनाम ,मॉरीशस ,हॉलैंड, फीजी आदि देशो में ,जो वही बस गए और उन देशो की तरक्की में सहायक हुए।

आशा जी 91 99200 57574‬: सही कह रहे हो आप संतोष जी। माफ कीजिएगा सुबह से लिख नहीं पाई पर सबके पोस्ट पढ़ रही थी। विस्थापन हमेशा किसी भी प्रकार का हो दुख से किसी न किसी तरह जुड़ा होता है। पर ये ज़रूरी नहीं की उसका परिणाम भी बुरा हो। जब हिंदुस्तान और पाकिस्तान का विभाजन हुआ कई गांव उजड़े, लाखों डर उजड़े और कई लोग मानसिक संतुलन तक खो बैठे। कौमी दंगे दिन पे दिन और भयानक होते रहे। ये उन लोगों का साहस ही था जो उन्हें उससे आगे की सोचने का हौंसला दे सका। कइयों के पास ज़रिया होते हुए भी उनके देश प्रेम ने उन्हें जाने नहीं दिया। हमारे देश के सैनिक भी अपने आप को देश के हवाले कर देते हैं। कइयों को देश भर की मिट्टी संजोए रखने के लिए अपने घर और गलियारों से दूर रहना पड़ता है। इसके बदले में उनके परिवार को सेना के संरक्षण में ऐसा माहौल मिलता है जहाँ वे उन सुविधाओं का लाभ उठा पाते हैं जो शायद उनके गांव में उपलब्ध न होती। आजकल बच्चे कौलेज होते ही आगे की पढ़ाई के लिए निकल जाते हैं और कई बार घर से दूर ही नौकरी भी लग जाती है पर विस्थापन उसके भविष्य का निर्माण करता है। इस में भी महीनों इंतज़ार में बिछी माँ की आँखें हैं और उसके हाथ के बने खाने को तरसते बच्चे।

Saturday, July 9, 2016

"अपनी देह और इस संसार के बीच "
मुईसेर येनिया
जन्म : 1984 , इज़मिर .

अभी तक दो कविता संकलन ।विश्व के अनेक कवियों के रचनाकर्म का अंग्रेजी , तुर्की और स्पेनिश भाषा में अनुवाद किया ।विश्व की विभिन्न भाषाओँ में कविताएँ अनूदित ।अनूदित कविताओं का एक संकलन " अपनी देह और इस संसार के बीच " हाल ही में बोधि से प्रकाशित । ____________



मुइसेर येनिया
तुर्की कविताओ का हिंदी अनुवाद 

अनुवादक= मणि मोहन मेहता
मणि मोहन 

जन्म  : 02 मई 1967 ,
           सिरोंज (विदिशा) म. प्र.
शिक्षा : अंग्रेजी साहित्य में स्नातकोत्तर
            और शोध उपाधि
प्रकाशन : देश की महत्वपूर्ण साहित्यिक पत्र - पत्रिकाओं ( पहल , वसुधा , अक्षर पर्व ,  समावर्तन , नया पथ , वागर्थ ,जनपथ, बया , आदि ) में कवितायेँ तथा अनुवाद प्रकाशित ।
वर्ष 2003 में म. प्र. साहित्य अकादमी के सहयोग से कविता संग्रह ' कस्बे का कवि एवं अन्य कवितायेँ ' प्रकाशित ।वर्ष 2012 में रोमेनियन कवि मारिन सोरेसक्यू की कविताओं की अनुवाद पुस्तक  ' एक सीढ़ी आकाश के लिए ' प्रकाशित ।वर्ष 2013 में  कविता संग्रह  " शायद " प्रकाशित ।इसी संग्रह पर म.प्र. हिंदी साहित्य सम्मेलन द्वारा वागीश्वरी पुरस्कार ।कुछ कवितायेँ उर्दू , मराठी और पंजाबी में अनूदित ।
इसके अतिरिक्त  " भूमंडलीकरण और हिंदी उपन्यास " , " आधुनिकता बनाम उत्तर आधुनिकता " तथा " सुर्ख़ सवेरा " आलोचना पुस्तकों का संपादन ।
सम्प्रति : शा. स्नातकोत्तर महाविद्यालय , गंज बासौदा ( म.प्र ) में अध्यापन ।
संपर्क : विजयनगर , सेक्टर - बी , गंज बासौदा म.प्र. 464221
मो. 9425150346
ई-मेल : profmanimohanmehta@gmail.com


देह  और संसार के बीच  का एकालाप है यह कविताये | देह किसकी ...!!!
स्त्री ...!! ,जी   , हां
बे शक आज समय बदल गया है ,स्त्रीयो में अत्याचार  के विरुद्ध चेतना जाग्रत हुई है |फिर भी न जाने क्यों स्त्री तन की पीड़ित  स्म्रतियां आकर स्त्री  मन को सिहरा जाती  है |क्यों आखिर क्यों ,स्त्री देह ही सहती है ....इस हद्द तक की सहते सहते उसे अपनी देह से घ्रणा हो जाती है |वो पुरुषों की बात  तक नहीं  करना चाहती ,क्यों ???
श्रृष्टि के  सृजन कर्ता ईश्वर पर सवाल उठाती है ,...कितने दुखों की गाठें बाँधी होगी उसने मन में ,की हर दुःख उसे पत्थर बनाता गया |
उसकी व्यथा  ने ही शायद  कवि को लिखने  के लिए प्रेरित  किया हो ....देह से परे क्या है . और क्या सोचता है संसार उस देह के बारे में .......यह एक अर्थपूर्ण बिंदु है जिसे कवियत्री    ने  विशाल आकाश दिया ...उसमे वेदना का ताप भरा ,और तिक्त भाव से देह के दर्द को  जिसमे ,जीने की विवशता ओर हताशा  है ,देह को रोंधे जाने की अकथ्य पीड़ा है,अकेलापन है .उन्हें शब्दों. में उकेरने की कोशिश की ...आत्मा का नर्तन करती हुई कवितायेँ है यह ......

कभी कभी मनुष्य मरते -मरते भी थक जाता है 
कभी कभी वो उस मुल्क की तरह होता है 
जिसे सबने छोड़ दिया है |

जीवन की हताशा  और अकेलेपन से भरी यह पंक्तियों से कवी जीवन की उकताहट को व्यक्त कर रहा है |

एक स्त्री का दूसरी स्त्री (माँ) से विकल होकर कहना ..
एक स्त्री का अर्थ रोंदा जाना है ,ओ माँ 
एक स्त्री ने मेरा बचपन लिया 
एक पुरुष ने मेरा स्त्रीत्व .....

ईश्वर को स्त्री की रचना नहीं करनी चाहिए 
ईश्वर को जन्म देना नहीं आता ....

अत्याचार  को सहते हुए कहा जाता है
वो चिडियों के संगीत पर बमबारी करेंगे 
चिड़ियाएँ सिक्को की खनक नहीं पैदा करती ........चिड़ियाएँ यानि स्त्रियायें


पृथ्वी ऐसी ही है 
लोगो के मुहँ में शब्द है 
शब्दों के भीतर अकेलापन है |

शब्द अभिव्यक्त नहीं  कर सकते मेरी अनुभूति को 
शब्द हुकूमत करते है ......उफ्फ्फ शब्द भी शासित 

मै अधूरे कदमों से चल रही हूँ 
उन पहाड़ों पर ,जो कभी थे ही नहीं 
मेरी देह बरसा रही है पत्थरों की आंधी ....

क्या कोई इतना भार भर लेता है अपनी देह में जो  पत्थरों की आंधी में तब्दील हो जाता है ....

कवि  स्त्री है ,वो स्त्री देह की  पीड़ा को शब्द दे रही है ,क्या कोई पुरुष  उसी तरह स्त्री  देह की पीड़ा को समझ कर अभिव्यक्त कर सकता है .....लेखिका ने इस पर लिखा

एक पुरुष कवी नहीं हो सकता 
एक पुरुष कवी के लिए कलम हो सकता है ......


पुस्तक की कुछ कविताये आज whatsapp के समूह साहित्य की बात पर प्रस्तुत हुई ,जिसके मुख्य एडमिन है श्री ब्रज श्रीवास्तव |यहाँ वो कवितायेँ और उन पर आई पाठको की प्रतिक्रियाए प्रस्तुत है |
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तलवार का घाव 
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खुद के सिवा कोई नहीं मेरे पास
एक भी दिन नहीं
इस रात के बाहर मेरे पास

बर्फ़बारी के बीच मैं नींद के आग़ोश में जा रही हूँ
इस देह के साथ जिसे कुत्तों ने
तार-तार कर दिया है

मैं इंतज़ार कर रही हूँ ज़िन्दगी के गुज़रने का
तलवार का एक गहरा घाव है
मेरी जांघो के बीच

मैं यहाँ आई
एक स्त्री की कोख भरने के बाद

मुझे नापसन्द थी यह दुनियां
जिसे मैंने उसकी नाभि से देखा था

खुद से बाहर कोई नहीं मेरे पास
एक दिन तक नहीं
रात से बाहर
मेरे पास ।

विलाप
---------

एक स्त्री होने का अर्थ
रौंदा जाना है , ओ माँ !

उन्होंने सब कुछ छीन लिया मुझसे

एक स्त्री ने मेरा बचपन लिया
एक पुरुष ने मेरा स्त्रीत्व ....

ईश्वर को स्त्री की रचना नहीं करनी चाहिए
ईश्वर को जन्म देना नहीं आता

यहाँ , सभी पुरुषों की पसलियां
टूटी हुई हैं

हमारी ग्रीवायें बाल से भी ज्यादा पतली हैं

पुरुष उठाये हुए हैं हमें
अपने कन्धों पर ताबूत की तरह

हम उनके पैरों के नीचे रहे

किसी पँख की तरह
हम उड़े एक दुनियां से
एक आदम की तरफ

और मेरे शब्द , ओ माँ !
उनके पदचिह्न हैं .....

मुझसे पुरुषों की बात मत करो
--------------------------------------

मेरी आत्मा इतनी दुखती है
कि मैं धरती के भीतर सोये पत्थरों को जगा देती हूँ

मेरा स्त्रीत्व
एक गुल्लक है जिसमे भरे हैं पत्थर
एक घर कीड़े-मकोड़ों का , कठफोडवों का
एक गुफा चढ़ते-उतरते भेड़ियों के लिए
मेरी देह पर , मेरी बाँहों पर
नए बीज बिखेरे जाते हैं
तुम्हारे जीवन के लिए पुरुष तलाशा जाता है
यह बेहद गम्भीर मसला है

मेरा स्त्रीत्व , मेरा ठण्डा नाश्ता
और मेरा वस्ति प्रदेश , खालीपन से भरा एक घर
इसी पर टिकी है यह दुनियां
और तुम ! उस गन्दगी के साथ जी रही हो
जो फेंक  दी गई है तुम्हारे अंदर

जब वह जा चुके , उससे कहना
कि नाख़ून छूट जाते हैं मांस में
कि तुम जीती हो इस टूटन की विज्ञान के साथ
उस गम्भीर बीमारी के बारे में उसे बताना

किसी भेड़ के चमड़े की तरह , मैं ठण्डी हूँ तुम्हारी घूरती निगाह में
मैं तुम्हारी माँ की कोख की कर्जदार नहीं हूँ  , श्रीमान !
मेरा स्त्रीत्व , मेरा अधीनित महाद्वीप

और न मैं खेती वाली जमीन हूँ ...
खरोंच कर मिटा दो उस अंग को जो मेरा नहीं
साँप की केंचुल की तरह , काश मैं उससे मुक्त हो सकती
हत्या के लिए माँ बने रहना तार्किक नहीं

यह टुकड़ों में विभाजित सरज़मीन नहीं
एक स्त्री की देह है
अब मुझसे पुरुषों की बात मत करो !

चलो सोने चलते हैं
-----------------------

चलो सोने चलते हैं
उस तन्हा अँधेरे में

अच्छा हो कि पैर में पड़े लकड़ी के जूते
सूती वस्त्र में बदल जायें

चलो सोने चलते हैं
उस बन्द पलकों वाले महल में

चलो अपने कन्धों से उतारें अपनी देह
चलो उस घोड़े पर सवार हो जायें
जिसकी पूंछ एक बादल है

जैसे हम पराजित हो चुके हों
आसमान की चमक से

जैसे हमारे पास कोई सिरहाना न हो
सिवा धरती के

अच्छा हो कि गेंहू की हरितमा
हमारे सपनों पर झुक जाये

चलो सोने चलते हैं ।
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प्रतिक्रियाएं 
Anita kardekar
स्त्री विमर्श पर केन्द्रित महत्वपूर्ण कविताएॅ, विचारणीय है कि विश्व भर में नारी देह उसकी निजता और उस पर स्वयं उसके अधिकार के प्रश्न अनुत्तरित हैं।
घनश्याम दास  सोनी 
आज की अनूदित कविताओं को पढ़ कर दिमाग में एक प्रश्न  बार बार उठता है कि क्या सारे विश्व में पुरुषों ने स्त्रियों के साथ अत्याचार ही किया है ? इन रचनाओं से लगता है कि पुरुष जाति सभ्यता से कोसों दूर है । या कविताओं के लिये यह एक सर्वसुलभ विषय है । चूँकि मैं एक पाठक हूँ , अतः दिमाग में यह प्रश्न उठता है । यदि प्रश्न अनुचित लगे तो मैं सम्मानीय साथियों से पहले ही क्षमा मांग रहा हूँ ।
ब्रज श्रीवास्तव 
जी.. चर्चा जारी रहे.. आप लोग मंथन कर रहे हैं. यह अच्छा है. कविता कोई सार्वजनिक उदघोष नहीं होता. उसमें अनेकांत निहित होता है. अनूदित कविताएँ भी एक दृष्टिकोण और स्वानुभूति की बानगी हो सकती हैं. सामान्य तौर पर स्त्री जीवन पुरूषों की तुलना में मुश्किल होता है यही बात इन कविताओं में है..

डॉ दीप्ती जोहरी 
 स्त्री अस्मिता के प्रश्न ,देह से शुरू हो के देह के संजाल में समाप्त होने को अभिशप्त है......जैविकीय विशिष्टताएँ किस प्रकार आधी आबादी के जीवन परिदृश्य को आच्छादित किये रहती है इसकी झलक ये कविताये दिखा पाती हैं। अनुवाद एक दुरूह कार्य है और इसमें निजी तौर पर मुझे अंतिम कविता सर्वश्रेष्ठ  लगी   ... चलो अपने कन्धों से उतारे अपनी देह को …में इस संजाल से मुक्ति का एक स्वप्न तो है ही ..और वेणुगोपाल जी के शब्दों में .....न हो कुछ भी ,सिर्फ सपना हो, तो  भी हो सकती है शुरुआत..... मणि जी को अच्छे अनुवाद के लिए बधाई💐
के के श्रीवास्तव 
अनुवादित कविताओं में स्त्री जीवन की हताशा  रेखांकित है हालाँकि पहले सम्पूर्ण विश्व्  में स्त्रियों पर अत्याचार होते आये हैं लेकिन वर्तमान में स्थिति इससे भिन्न है  . महिलाओं को सशक्त बनाने में अनेकानेक गुंजाईशों से इंकार नहीं किया जा सकता साथ ही   इसके चलते समाज में स्त्रिओं के प्रति हमें हमारी सोच को परिवर्तित करना होगा . इस अच्छे अनुवाद के लिए मणि जी को बधाई
मधु सक्सेना 
 मणि जी द्वारा अनूदित मुइसेर येनिया की कविताएँ ......अपने पुरे दर्द और नफरत को लेकर उभरती है और स्त्री पर हुए अत्याचार की सनद है ।
'ईश्वर को स्त्री की रचना नहीं करनी चाहिए ....ईश्वर को जन्म देना नहीं आता ..' इन पंकियों में सदियों की कहानी निहित है । ' मुझसे पुरषों की बात मत करो '..कह कर येनिया ने अपनी नफरत की इन्तहां की बात की ।ये मात्र एक आवाज़ नहीं ....आवाज़ों का समूह है ...चीत्कार है ।ये कविताये दिल दहला देती हैं ...।
एक बात पूछना चाहती हूँ मणि जी से ...इन कविताओं के अनुवाद के समय उन्हें कोई विशेष अनुभूति हुई ? जब उन्होंने पहली बार इन कविताओं को पढ़ा तो हृदय कितना विचलित हुआ ....?
मैं येनिया और पूरी स्त्री जाति की तरफ से मणि जी को धन्यवाद देती हूँ ।इन आवाजों को दूर तक फैलाने में सहायक बनने के लिए । आभार ।

 Mukta Shreewastav: कविताएँ अच्छी लगीं.और जो बातचीत से कविताएँ और महत्वपूर्ण लगीं
सुदिन श्रीवास्तव 
स्त्री स्वतंत्रता, स्त्री शिक्षा, स्त्री के समाज में बढ़ते महत्व, समाज में कंधे से कंधा मिलाकर चलती स्त्री, अपने पैरों पर खड़ी स्त्री जैसी तमाम चर्चाओं के बीच क्या वास्तव में आज भी कोई स्त्री इतने ही भय से घिरी हुयी रहती है घर से निकलते वक्त । क्या पुरूष समाज के प्रति हरेक स्त्री इसी भय से ग्रस्त रहती है और क्या विश्व भर की महिलायें इसी भय से घिरी हुयीं हैं ।ऐसे सवाल कविताओं को पढ़ने के बाद से लगातार परेशान कर रहे हैं । यदि स्त्री अपने इस भय से मुक्त नहीं हो पा रही है तो हम ये किस भय मुक्त समाज की बात कर रहे हैं और हमारे स्त्री विमर्श का क्या परिणाम निकल रहा है। कविताओं में ऐक स्त्री जो अपना भोगा हुआ यथार्थ दिखा रही है वह बहुत दुखी करने वाला है । आपने अनुवाद नहीं किया मणि भाई शब्द चित्र उकेरे हैं सच । आपकी इस योग्यता और क्षमता का बहुत साधुवाद

Friday, July 8, 2016

अहसास की रवानी है ग़ज़ल ,मेरी अपनी कहानी है ग़ज़ल .....`

कभी यूँ  भी आ मिरी आँख में की मिरी नज़र को खबर न हो 
मुझे  एक  रात  नवाज़ दे  मगर  इस के  बाद  सहर न हो 

ग़ज़ल जजबात और अल्फाज़ का एक बेहतरीन गुलदस्ता है जिसको पढ़कर या लिख कर दिलो -दिमाग पर ताजगी  छा जाती  है |ग़ज़ल उर्दू काव्य का एक अत्यंत लोकप्रिय ,मधुर ,दिलकश और रसीला अंदाज़ है |
ग़ज़ल का जिक्र हो तो ग़ालिब ,मीर तकी मीर ,फैज़ , फराज़,फिराक  ,आदि कई चेहरे सामने आ जातें है |और साथ में उर्दू जुबां  भी ,......लेकिन आज हिंदी के कई  फनकारों ने अपने अशआरों से ग़ज़ल का श्रृंगार किया है जिनमे दुष्यंत ,बशीर बद्र जैसे कई नाम शामिल है |हिंदी में आज ग़ज़ल उतनी ही पसंद की जा रही है  जितना कभी उर्दू में इसका परचम था |बल्कि भाषाकी सहूलियत से हिंदी में आज ज्यादा गज़ले कही जाने लगी है |

आज ऐसे ही एक उभरते गज़लकार की गज़ले आपके सामने पेश है |  कहीं  नाजुक मिजाज के अशआर पिरोये है सुदिन जी ने अपनी गज़लों में  तो कही तल्खी भी शुमार की ...कुछ शिकवें भी जेहन में रहे तब धर्म के अमन चैन को चन्द  लोगो की खता का अंजाम बताया |


बड़े शायरों. को पढ़ते हुए उलझे भी ,तब नए शेर भी कहे .....देखिये क्या कहतें है सुदिन श्रीवास्तव जी ...

ऐक बार मैं बहुत तन्हा रह गया । परिवारी और पहचानने वाले सब किसी ना किसी वज़ह से दूर हो गये तब ऐक ख़याल आया नज़म की सूरत लिये
"वो ख़्वाब जिनके लिये तुमने मुझको छोड़ा था
  बता सबको तो बताना वो ख़ाब कैसे हैं


निदा फ़ाज़ली साहब की ऐक मशहूर ग़ज़ल है
"कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता
कभी ज़मीन तो कभी आसमां नहीं मिलता ।
     
 आदरणीय शलभ जी ने ग़ज़ल कही
"अगर लिया तो मुकम्मल जहान लूँगा मैं 
यही ज़मीन यही आसमान लूंगा मै 
 ऐक कह रहे हैं नहीं मिलता ।ऐक कह रहे हैं मुकम्मल जहान लूंगा मैं
मैंने दोनों ग़ज़लें सुनीं तो ज़ेहन में आया
"रट क्या लगा रखी है ज़मीं आसमान की
गिरने से पहले,छत तो बचाओ मकान की
                        1
जो कुछ दिखा है वो तो मुकम्मल नहीं लगा
सूरत है क्या बताओ मुकम्मल जहान की


सुदिन श्री वास्तव 

नाम -सुदिन श्रीवास्तव 
पिता -स्व•मथुरा मोहन श्रीवास्तव
शिक्षा-ऐम काॅम, ऐम•ऐ (शास्त्रीय गायन) बी•ऐड़
 शास्त्रीय गायन के ग्वालियर घराने से सम्बद्ध ।
 अखिल भारतीय सिविल सर्विसेज की प्रतियोगिता में म•प्र•का      प्रतिनिधित्व करते हुये राष्ट्रीय स्तर पर तृतीय स्थान प्राप्त ।
 आकाशवाणी भोपाल से गायन का प्रसारण भी हुआ।
 आकाशवाणी और दूरदर्शन से काव्यपाठ भी किया।

 पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन ।





▶उम्मीद की बयार है तो उनकी वज़ह से 
 सबकी नज़र में प्यार है तो उनकी वज़ह से 

 हमको हज़ार हाथ कोइ पूछता न था 
 अपना कहीं शुमार है तो उनकी वज़ह से 

 दुनियां के किसी शहर से दूरी नहीं रही 
 नज़दीक हर दयार है तो उनकी वज़ह से 

  इक सबसे बड़ी बात समझ आई के हमें 
  दुनियां पे ऐतबार है तो उनकी वज़ह से

  कहने को नज़म, गीत, ग़ज़ल और फ़साने 
  करने को इंतज़ार है तो उनकी वज़ह से
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▶चंद लोगों की ख़ता का दोस्तों अंजाम है
चैन से है न सनातन धर्म ना इस्लाम है

दोस्तो दुनियां को ये कहने का मौक़ा ना मिले
बटन रहा टुकड़ों में भारत वर्ष का आवाम है

फूलते फलते हैं सब मज़हब तमद्दुन जिस जगह
मुल्क हिन्दुस्तान दुनियां में उसी का नाम है

उसके सजदे के लिये मस्जिद ज़ुरूरी तो नहीं 
उसके दर्शन को ज़ुरूरी ना अयोध्या धाम है

दोस्ती वरदान है सारे ज़माने के लिये
दुश्मनी सारे ज़माने के लिये इल्ज़ाम है

इस ज़मीं पर प्यार से बढ़कर कोई मज़हब नहीं 
आप सबके वास्ते मेरा यही पैग़ाम है
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▶हर नयेपन से लगा तुम हो यहाँ 
अपने जीवन से लगा तुम हो यहाँ 

सारे रिश्तों पर जवानी आ गयी
सबके यौवन से लगा तुम हो यहाँ 

घर की हर दीवार उजली हो गयी
साफ़ आंगन से लगा तुम हो यहाँ 

पांव की छम छम ने भी जतला दिया
और खन खन से लगा तुम हो यहाँ 

ख़त्म सारे घर का राशन हो गया
ऐसे ज्ञापन से लगा तुम हो यहाँ 

कब लगा,कैसे लगा मत पूछिये
बस सनातन से लगा तुम हो यहाँ
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▶मुतमइन होने की सूरत अब तलक आयी नहीं 
हसरतों से या के अपनी ही शनासायी नहीं 

आरज़ूओं और उमीदों के लिये मशहूर है
इस जहाँ में कोई दिल जैसा तमाशायी नहीं 

सीख बस अपने तजुर्बों की मुझे देते रहे
मेरे अजदादों ने देखी मेरी गहरायी नहीं 

दिल को अब इसके लिये तैयार मैंने कर लिया
ऐ फ़रेबे आरज़ू लेती क्यूँ अंगड़ायी नहीं 

ग़ैर के दामन तलब वो हैं तो ख़ुद को रोक ले
इस दिले कमबख़्त में इतनी भी दानायी नहीं

सुदिन श्रीवास्तव



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 साहित्य सम्मेलन,"साहित्य की बात" 17-18 september 2022 साकिबा  साकीबा रचना धर्मिता का जन मंच है -लीलाधर मंडलोई। यह कहा श्री लीलाधर...

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