Friday, September 23, 2016

प्रेम का बीज जब मन में अंखुआता है, भाव शब्द के छौने कुलांचे भरने लगते हैं।हृदय के तारों का स्पंदन प्रेमगीत अलापने लगता है।प्रकृति जन्य मौसमो से भिन्न होता है प्रेम का मौसम।

प्रेम के मौसम से ही बहार मांगता है बसंत।शिशिर लरजता है प्रेम की शीतल बयार से और बरसता है प्रेम बादलों से जब धरती और आकाश बंध जाते हैं प्रेम के बंधन में।ग्रीष्म की तपन दहकती है जब प्रेम यज्ञ में देहों की समिधा होम होती है।

अभिमंत्रित प्रेम कविता का होता है तब सृजन।

सभ्यता के उद्गम से भी पूर्व स्थापित था प्रेम।ताम्रपत्रों में गढ़ी गई थी इसकी इबारत और चकमक पत्थर की खोज का आधार बना था प्रेम।शताब्दियों के गुजरने के क्रम में कभी नहीं गुजरा प्रेम, वह दो हृदयों की थिरकती साँसों की लय पर, देह के छोड़ जाने पर भी रहा सदा सदा रूह में अहर्निश...

कुछ ऐसी ही प्रेम पगी कविताओं की धड़कन का दस्तावेज है डॉ राकेश पाठक का कविता संग्रह बसंत के पहले दिन से पहले कविताओं में प्रेम तो रचा बसा है ही इनसे स्मृतियो का उपवन भी शब्द दर शब्द महक रहा है।भाषा कोमल भावों को उकेर रही है।

कठिन समय में अपने प्रेमिल स्पर्श से दुलारती कविताएं बरबस कह उठती है अभी संवेदनाएं जीवित है।जबकि समय की क्रूरता खाप बन कर फ़ुफ़कार रही है।आदिम संस्कारों की बलि देकर हवस नंगा नर्तन कर रही है।ऐसे समय में सांसरिक उद्यमों और विकृत समय में कवि का प्रेम कविता को बचा लेना, प्रेम को जीवन दान देना सम है।

आश्चर्यचकित कर देने वाले प्रतीक और वाक्य विन्यास से सजी कविताएं स्मृति में बार-बार दस्तक देती है।ईमेल 1, 2, 3 प्रेम की मासूमियत का कच्चा चिट्ठा है। कितना ही वयस्क क्यों ना हो जाए प्रेम उसकी मासूमियत चिरस्थाई होती है। जैसे सूखे फूलों को अंगुलिया सहलाती है किताबों में, अंगुली के स्पर्श से मन के कोने कोने महक जाते हैं।प्रेम में जहां मिलन की उत्कट अभिलाषा होती है विदा के पल भी साथ साथ चलते हैं।विदा के गीत में दर्द, प्रेम का ही प्रतिरूप होता है।

 हाशिए में सिमट कर रह गई जिंदगी ,
एक ढलती शाम बन कर रह गई जिंदगी
शब्द तो तुम साथ ले  गई हो साथ अपने ही सभी 
इक अधूरा गीत बनकर रह गई जिंदगी


डॉ राकेश पाठक के कविता संग्रह बसंत के पहले  दिन से पहले 
से कुछ कवितायेँ है आज रचना प्रवेश में 
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परिचय

डॉ. राकेश पाठक
प्रधान संपादक ,डेटलाइन इंडिया
# जन्म: 1 अक्टूबर 1964 
गोरमी  जिला भिण्ड मप्र  में।
# शिक्षा:
 एम ए (सैन्य विज्ञान)
 एम ए (इतिहास) 
 पीएच.डी.(सैन्य विज्ञान)
# ग्वालियर में कुछ वर्ष शासकीय प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक ।
# सन् 1989 से सक्रिय पत्रकार
#अनुभव:

संपादक  नईदुनिया ग्वालियर 
संपादक नवभारत ग्वालियर 
संपादक नवप्रभात  ग्वालियर
संपादक  प्रदेश टुडे ग्वालियर ।
सांध्य समाचार, स्वदेश,  आचरण और लोकगाथा  आदि समाचार पत्रों में महत्वपूर्ण दायित्व का निर्वाह।

# पुरस्कार-सम्मान
 * सत्यनारायण श्रीवास्तव स्मृति पत्रकारिता पुरस्कार,
* जगदीश प्रसाद चतुर्वेदी  पत्रकारिता पुरस्कार
* राज भारद्वाज सम्मान 

# विशेष:
 * न्यूयॉर्क में आयोजित विश्व हिन्दी सम्मेलन
    में भागीदारी,
* राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटिल की लाओस एवं कंबोडिया की आधिकारिक यात्रा का कवरेज
* कोसोवो (पूर्व यूगोस्लाविया) में संयुक्त राष्ट्र शांति    मिशन की रिर्पोटिंग । 
# प्रकाशित पुस्तकें:
 * यूरोप का यात्रा वृतांत
   ‘काली चिड़ियों के देश में' मेधा बुक्स दिल्ली 
    से प्रकाशित
* कविता संग्रह
  "बसंत के पहले दिन से पहले " दखल प्रकाशन दिल्ली से प्रकाशित।
*शोध पुस्तक
 'हिन्दी पत्रकारिता का इतिहास- मध्यप्रदेश'       छत्तीसगढ़ हिंदी ग्रन्थ अकादमी से प्रकाशित
आने वाली पुस्तक:
"परमाणु बम के मुहाने पर"
सम्प्रति : प्रधान संपादक  
           डेटलाइन इंडिया 
संपर्क :     शिव प्रसाद 
एम-157 ए, माधव नगर, ग्वालियर - 474002 म.प्र.
फोन : 0751-2627700, 
मोबाइल : 098260-63700,

    ई-मेल : rakesh pathak0077@gmail.com







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 हम दोनों .

सभ्यता के प्रारम्भ में
चकमक पत्थर से
आग खोज कर लाये थे
हम दोनों

सिंधु घाटी की वीथिकाओं में
हमने ही तो रखे थे पहले कदम
ताड़ पत्रों पर लिखे थे
मनुष्यता के पहले प्रेम पत्र

शैलाश्रयों में सहस्त्राब्दियों पहले
हम दोनों ने ही बनाये थे भित्ति चित्र

महाप्रलय के बाद
सिर्फ हम दोनों ही तो बचे थे
पिरामिडों की दीवारों पर
पीठ लगाकर हम ही तो बैठते थे

बेबीलोन के झूलते बगीचों में
 सबसे पहले भरीं थीं पीगें

अगले महा विस्फोट के बाद भी
हम दोनों ही बचे रहेंगे

प्रेम करने के लिए
अहर्निश।


दुःख
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रात के अँधेरे में
दबे पाँव निकलूंगा घर से

पथरीले किनारों वाली नदी के पास बैठूंगा
उदास बहते पानी के कान में
धीरे से बताऊंगा अपना दुःख
नदी मेरा दुःख सहेजेगी
बहा ले जायेगी दूर बहुत दूर

किसी निर्जन पहाड़ पर जाऊँगा
और बूढ़े बरगद के सीने पर
सिर रखकर सुबक लूँगा थोड़ी देर
बरगद अपनी जड़ों में सोख लेगा मेरा दुःख

शहर से दूर प्राचीन खँडहर में
भटकता रहूंगा सारी दोपहर
वहीँ कहीं किसी कोने में चुपचाप
छोड़ आऊंगा अपनी व्यथा

किसी को नहीं बताऊंगा अपना दुःख
और उसकी वजह
तुम्हें तो कतई नहीं
कभी नहीं।



मैंने प्रेम किया

मैंने प्रेम किया
आखेटक की तरह

तैयार किए अस्त्र-शस्त्र
मेहनत से बांधा मचान
ठीक किए सब कील काँटे
पैने किए तीर और
खींचकर परखी कमान

रेशम के महीन धागे से बुना जाल
और बिछा दिया उसके रास्ते में
भरमाया उसे प्रेम के 'मृग जल' से
अंतत: किया उसकी देह का संधान

मैंने प्रेम किया
प्रेम का अभिनय करते हुए।




2. उसने प्रेम किया

उसने प्रेम किया
आलता घोल कर
पैरों में रचाया
हवन के लिए वेदी सजाई
आटे से चौक पूरा
और नवग्रह बनाए

रोली, चावल और थोड़ा सा कपूर रखा
पालथी मारकर बैठी
सिर पर जरा-सा आगे किया पल्लू
हथेली पर गंगाजल लेकर किया आचमन
‘आवाहनम् न जानामि’ कहते हुए
किया देवताओं का आह्वान

प्रेम हवन में खुद को करती रही स्वाहा
‘पूजाम् चैव न जानामि’ कहते हुए
उसने प्रेम किया
पूजा की तरह।



लौट आना

लौट आना इस बार भी
जैसे लौटती रही हो अब तक

लेकिन लौट आना
बसंत के पहले दिन से पहले

लौट आना
सावन की पहली बारिश  में
मिटटी की सौंधी गंध से पहले

पूस के महीने में
जब आसमान से रुई की तरह
झरने वाली हो ओस
ठीक उससे पहले लौट आना

जेठ में सूरज से
बरसने लगे आग
और सुलगने लगे धरती
कुछ भी हो जाये
उससे पहले तुम लौट ही आना

हमें साथ साथ ही तो चुनने हैं
बसंत में पहली बार खिले फूल
पहली बारिश के बाद
गीली मिट्टी पर बनाने हैं
दो जोड़ी पाँव के निशान

ठिठुरती सर्दी में
बरोसी के पास बैठ
करनी हैं ढेर सारी कनबतियां
और जेठ की तपती दुपहरी में
तुम्हारे सुलगते होठों पर
रखनी हैं गुलाब की पंखुड़ियां

जीवन की वही आस
और चेहरे पर हास लिए
मेरे विश्वास की तरह
तुम ज़रूर लौट आना।



 विदा से पहले

एक दिन
सिर्फ एक बार मिलना

आखिरी बार ही सही
मिलना ज़रूर
विदा से पहले

पानी पोता से पोंछ डालना
मन की स्लेट पर लिखी
हमारी प्रेम कथा

बस छोड़ देना
अपने अपने नाम का पहला अक्षर

दुबारा कभी मिले तो
उसी पहले अक्षर से
शुरू करेंगे फिर एक बार
अपनी प्रेम कथा।



विदा के बाद

हो सके तो रखना
थोड़ी सी जगह मेरे लिए
विदा के बाद भी

ज्वार उतरने के बाद
मन के किनारों की रेत पर
बचा कर रखना थोड़ा सा गीलापन
जैसे अलगनी पर छोड़ कर रखती हो
हमेशा एक रूमाल की जगह

जैसे बची ही रहती है
तुम्हारे बेतरतीब पर्स में
बिंदी के पत्ते के लिए गुंजाईश।






तुम्हारा पता

देश देशान्तरों को
पार करके पहुंचा मैं
मीलों पसरे मैदानों में
पीले सोने जैसी सरसों से
पूछा तुम्हारा पता

ऊंचे पहाड़ों पर
आसमान से बातें करते
देवदार के पास ठहरा
झुक कर उसने कान में
बताया रास्ता

महासागरों के किनारों पर
ठहरा रहा सदियों
तब लहरों ने आगे बढ़ कर
मेरा हाथ थामा

न जाने कितने प्रकाश वर्ष
लम्बा सफर तय करते करते
निविड़ अंधकार के बीच
जुगनुओं ने दिखाई राह
घनघोर सन्नाटे को चीर कर
झूंगुर बढ़ाते रहे मेरा हौसला

अबूझ जंगलों को पार करते समय
परिंदों ने सुनायीं परी कथाएं
सर्द रातों में
पुच्छल तारों ने की रौशनी
कि भटक न जाऊं

दिन की तेज़ रौशनी में
सूरज ने अपने घोड़े दे दिए
कि जल्द से जल्द पा सकूं
तुम्हारा पता

तब मिलीं तुम
घर की देहरी पर खड़ी
पैर के अंगूठे से
धरती को कुरेदती हुयी
मेरे लिए
अनंतकाल से प्रतीक्षारत।


  डॉ राकेश पाठक

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