Friday, December 17, 2021
Thursday, September 23, 2021
रिपोर्ताज
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| श्रीमती आशा सक्सेना |
नारी मन को आवाज़ देती हैं आशा सक्सेना और मोनी माथुर की रचनाएं : मेहरुन्निसा परवेज़
हिंदी लेखिका संघ के 'पुस्तक पर्व' आयोजन में साहित्य सागर की पूर्व सह संपादक एवं 'लोकगीत श्री' आशा सक्सेना के दोहा संग्रह एवं पूर्व प्राध्यापक व शिक्षाविद डॉ. मोनी माथुर की पहली कृतियों का ऑनलाइन विमोचन एवं पुस्तक विमर्श संपन्न हुआ.
"हम अपने आसपास घट रहे सच को देखकर भी उसे लिखने से डरते हैं. हालांकि मैं कभी डरी नहीं, भले मुझ पर मामले मुकदमे तक दर्ज होते रहे. किसी से कुछ छुपा हुआ नहीं है, सबको खुलकर अपनी और आसपास की बातें बयान करना चाहिए." शनिवार शाम दो पुस्तकों पर चर्चा के इस आयोजन की अध्यक्षता कर रहीं श्रीमती परवेज़ ने अपने अनुभवों को साझा करते हुए लेखिकाओं को बधाई और शुभकामनाएं दीं. इस कार्यक्रम में हिंदी लेखिका संघ की अध्यक्ष अनीता सक्सेना जी सारस्वत अतिथि, संस्था की पूर्व अध्यक्ष डॉ. राजश्री रावत राज मुख्य अतिथि और संस्था से सम्मानित रचनाकार श्रीमती मधु सक्सेना विशेष अतिथि के तौर पर उपस्थित थीं.
जीवन के नूतन बिम्ब हैं आशा के दोहे
पुस्तक चर्चा सत्र में आशा सक्सेना के दोहा संग्रह 'आशा के कमल' पर समीक्षात्मक चर्चा करते हुए चर्चित लेखिका डॉ. कुमकुम गुप्ता ने कहा, "जीवन के संघर्ष, सुख दुख, सौंदर्य आदि को इन दोहों में मार्मिक अभिव्यक्ति मिली है. आशा सक्सेना के दोहा संग्रह में विविधता है, जो कथ्य से लेकर भाषा के स्तर तक दिखती है."
वहीं, उन्नाव से कार्यक्रम में जुड़ीं समीक्षक एवं रचनाकार जयप्रभा यादव ने इस संग्रह पर केंद्रित वक्तव्य में कहा, "संवेदनाओं से समादृत ये दोहे समाज को संदेश देते हैं, जिनमें देश राग है तो प्रीति के पहलू भी, प्रकृति के तत्व हैं तो नैतिकता के पक्ष भी. जीवन के हर भाव को आशा जी ने सरलता और सुंदरता से व्यक्त किया है. इन दोहों के बिम्ब और प्रतीक नूतन और मनोरम हैं."
नारी संबंधी विषयों की सशक्त कहानियां
पुस्तक चर्चा सत्र में इससे पहले, डॉ. मोनी माथुर की पुस्तक 'गुलाबी दुपट्टे की आभा' पर चर्चा हुई. पुस्तक समीक्षा करते हुए वरिष्ठ लेखिका डॉ. सुमन ओबेरॉय ने कहा, "इस कथा संग्रह के मूल विषय स्त्री प्रताड़ना, स्त्री समर्पण, त्याग और स्त्री शक्ति जैसे पहलुओं को उठाते हैं यानी यह कथा संग्रह स्त्री विमर्श के संदर्भ में महत्वपूर्ण है. वहीं, वरिष्ठ रचनाकार कुलतार कौर कक्कर ने अपने उद्बोधन में महत्वपूर्ण बात रखी कि "ये कहानियां इतनी नारी सुलभ हैं कि इनमें कहीं हिंसा की झलक नहीं हैं. भावना और संवेदना को ये कहानियां केंद्र में रखती हैं."
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| डॉ मोनी माथुर |

सारगर्भित कोट्स : अतिथियों ने क्या कहा?
"आशा जी और दोहा एकरूप हो चुके हैं. वर्षों से लेखिका संघ के सारस्वत मंच की संचालक आशा जी की पुस्तक परिवार की भावनाओं और मूल्यों को चरितार्थ करती है. श्रीमती प्रवेश सोनी रचित इस पुस्तक के मनोरम मुखपृष्ठ पर एक नैन और और कमल पुष्प, इस किताब के शीर्षक के कई अर्थ खोलते हैं. वहीं, शांत रहकर समाज की सेवा करने वाली मोनी जी की कहानियां शांति से मुखर बयान देती हैं."
— अनीता सक्सेना, सारस्वत अतिथि
"आशा जी ने अपने संग्रह के माध्यम से हिंदी साहित्य को सशक्त दोहे प्रदान किये हैं. ये दोहे नारी मन की निश्चल अनुभूतियां और एक पत्नी के कोमल भावों की विनम्र अभिव्यक्तियां हैं. वहीं, मोनी जी की कहानियों में कविता जैसी लय और संवेदना के बारीक तत्व हैं. उनका साहित्य सृजन प्रणम्य है."
— डॉ. राजश्री रावत राज, मुख्य अतिथि
"मोनी जी अपनी कहानियों में नये विचार और नये रास्ते दिखाती हैं. दूसरी ओर, आशा जी के दोहों में चारों वेदों के सार की तरह विभिन्न विषयों पर गहन दृष्टि नज़र आती है."
— मधु सक्सेना, विशेष अतिथि
ऐसे संपन्न हुआ सरस रचनात्मक आयोजन
सुमधुर कवयित्री एवं लेखिका राधारानी चौहान ने कार्यक्रम का प्रवाहमान एवम् सरस संचालन करते हुए सबसे पहले सरस्वती वंदना के लिए आशा श्रीवास्तव जी को आमंत्रित किया. श्रीमती महिमा वर्मा के तकनीकी सहयोग से आयोजित कार्यक्रम में अतिथियों का वर्चुअल स्वागत किया गया. चर्चा सत्र के बाद दोनों उत्सव मूर्ति रचनाकारों श्रीमती सक्सेना एवं डॉ. माथुर ने अपने संग्रहों के चुनिंदा अंश के तौर पर रचनापाठ भी किया. कार्यक्रम के अंत में दोनों ध्रुव रचनाकारों ने आभार प्रदर्शन किया. साथ ही, शायर एवं पत्रकार भवेश दिलशाद एवं सिंगापुर से जुड़ीं अदिति माथुर ने भी आभार स्वरूप अपने संक्षिप्त विचार रखे.
Thursday, September 2, 2021
'दिल धड़कता है'
,सुभाष पाठक 'ज़िया' द्वारा उर्दू में लिखा गया ग़ज़ल संग्रह है |उर्दू से हिंदी में अनुदित ग़ज़लें" रचना प्रवेश" ब्लॉग पर आपके ध्यानार्थ प्रस्तुत हैं
सुभाष पाठक 'ज़िया' का ग़ज़ल संग्रह 'दिल धड़कता है' वर्ष 2020 में मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी के अनुदान से शेरी अकादमी द्वारा प्रकाशित हुआ है जिसकी भूमिका डॉ अशोक मिज़ाज बद्र साहब ने लिखी है और फ्लैप पर मोहतरम शारिक कैफ़ी साहब एवं मोहतरमा नुसरत मेहदी साहिबा ने अपनी दुआओं से नवाज़ा है। इनके अलावा डॉ महेंद्र अग्रवाल साहब, इशरत ग्वालियरी साहब और यूसुफ़ क़ुरैशी साहब ने ग़ज़लों पर विस्तृत बातें लिखी हैं। संग्रह का कवर पेज प्रवेश सोनी ने बनाया है।
ग़ज़ल कम शब्दों में बड़ी बात कह देने का हुनर है और इसमें सुभाष पाठक 'ज़िया' ने दो मिसरों में ज़िंदगी के तमाम रंगों को समेटने का प्रयास किया है। इनकी ग़ज़लें जहाँ भूख, ग़रीबी, बेबसी पर आवाज़ उठाती हैं वहीं प्रेम और सौहार्द का संदेश भी देती हैं और लोगों को अपनी ख़ुद्दारी के साथ दिलों में हौसले का चिराग़ लेकर चलने का जज़्बा भी देती हैं। ज़िया जी की ग़ज़लों में जहाँ एक ओर रिवायती शाइरी का रंग है, शेरियत है, तग़ज़्ज़ुल है, रवानी है ,वहीं दूसरी ओर ग़ज़ल का जदीद रंग भी है जहाँ तमाम क़ाफ़िये इस तरह से इस्तेमाल किये हैं जो पढ़ने वाले को चौंका देते हैं और सीधे उनके दिल पर असर करते हैं। इन ग़ज़लों में कुछ नई और लंबी रदीफ़ों के प्रयोग भी हैं जिन्हें वरिष्ठ ग़ज़लकारों , आलोचकों, समीक्षकों एवं समकालीन साहित्यकारों ने ख़ूब सराहा है और अपना स्नेह आशीर्वाद दिया है।
डॉ. नुसरत मेहदी- अपनी उम्र से ज़्यादा संजीदा शायर हैं सुभाष । ये पायमाल रदीफों का इस्तेमाल नहीं करते बल्कि अपना डिक्शन ख़ुद तैयार कर रहे हैं।
शारिक कैफ़ी- सुभाष पाठक 'ज़िया' की ग़ज़ल नई नस्ल के शायरों के जहन को एक ताबिन्दगी और तवानाई अता करने में पूरी तरह कामयाब है। उनकी ग़ज़ल में क्लासीकल अंदाज़ की बाज़गश्त भी है और बेपनाह हम असरियत के साथ एक नया तर्ज़े इज़हार एक जुदागाना फ़िक्र और इन्फिरादी असलूव भी हैं।
डॉ.अशोक मिज़ाज बद्र- हर मिसरे में बोलता है सुभाष पाठक 'ज़िया'। उनकी ग़ज़लों में कुछ चौकाने वाले प्रयोग देखने को मिलते हैं जिसमें कुछ अलग रदीफ़ क़ाफिये हैं ।
डॉ.महेंद्र अग्रवाल- सुभाष के शेरों में अयाँ मंज़र एक बड़े कैनवास या किसी मुकम्मल कहानी को ज़ाहिर करते हैं। इनकी इमेजरी बाकमाल होती है। ये जितना बाहर की दुनिया से मुख़ातिब रहते हैं उतना ही अंदरूनी दुनिया से भी। एक शेर में कोई दास्तां बयां करने का हुनर इन्हें बख़ूबी आता है।
डॉ.मुहम्मद आज़म- सुभाष की शायरी में हिंदुस्तान की मुश्तरका तहज़ीब की नुमाइंदगी मिलती है। इनकी ग़ज़लों में शगुफ़्ता लहजा , आसान लफ्ज़यात ख़ूबसूरत बंदिशें, मौजूं क़ाफ़ियों का इंतिख़ाब चस्पा होने वाली रदीफ़ों का चुनाव, सब उन्हें एक ज़ीहोश शायर की सफ़ में खड़ा करने के लिए काफ़ी है।
डॉ अफ़रोज़ आलम- सुभाष पाठक 'ज़िया' ने अपने दम पर अपनी शायरी के फ़लक को झिलमिलाने की कोशिश की है। 'ज़िया' की शायरी के समंदर में लहरों की जो हल्की धारियां नज़र आ रही हैं वो यक़ीनन एक रोज़ तूफ़ान का रुख़ इख़्तियार करेंगी।
ए. एफ. नज़र- दिल और दिमाग़ के तावाजुन का शायर है सुभाष पाठक 'ज़िया'।
ग़ज़ाला तबस्सुम- 'दिल धड़कता है' में रौशन ख़यालों की ज़िया है।
रूपेंद्र राज -रिवायती कशिश और जदीद रंग का मजमुआ है 'दिल धड़कता है'।
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| सुभाष पाठक 'जिया ' |
1.
हम कहां ज़िन्दगी से हारे हैं
रूह का पै'रहन उतारे हैं
अब चमकते नहीं तो क्या कीजै
होने को भाग्य में सितारे हैं
ज़िंदगी के लिए ये काफ़ी है
तुम हमारे हो हम तुम्हारे हैं
ज़ायक़ा तो चखो मुहब्बत का
दर्द मीठा है अश्क खारे हैं
कोई शिकवा नहीं है दरिया से
कश्तियों से ख़फ़ा किनारे हैं
क्या बिगाड़ेगी आपकी तलवार
हम तो पानी के बहते धारे हैं
बात बेबात हँस रहे हैं जो
ऐ 'ज़िया' वो भी ग़म के मारे हैं
**
2
तू चाहता है जो मंज़िल की दीद साँकल खोल
सदायें देने लगी है उमीद साँकल खोल
तुझे ख़बर भी नहीं कब गुज़र गया इक दौर
क़दीम था वो मैं दौरे जदीद साँकल खोल
बड़े मज़े में उदासी है बंद कमरे में
मगर हँसी तो हुई है शहीद साँकल खोल
फ़िज़ा बदलने से भर जाये ज़ख़्म ए दिल शायद
निकलना घर से हो अब के मुफ़ीद साँकल खोल
थकन से चूर हूँ , प्यासा हूँ मैं , अकेला भी
है उसपे धूप भी कितनी शदीद साँकल खोल
गया न छत पे तू तो चाँद आ गया दर पे
लगा गले से मना ले तू ईद साँकल खोल
तुझे है शम्स से नफ़रत, है धूप से शिकवा
ये रौशनी तो है तेरी मुरीद साँकल खोल
**
3
दुश्मनी में ही सही वो ये करम करता रहा
आइना मुझको दिखाकर ऐब कम करता रहा
वो तक़ाज़ा -ए-मुहब्बत था तो मैंने उफ़ न की
फिर तो ज़ालिम उम्रभर दिल पर सितम करता रहा
ख़ैरियत ही पूछने आयेगा तू ये सोचकर
मेरा दिल बीमार ख़ुद को ऐ सनम करता रहा
दुश्मनों की दुश्मनी भी उनके आगे कुछ नहीं
साज़िशें जो हरक़दम पर हमक़दम करता रहा
लाड़ले ने ख़त के बदले पैसे भिजवाये मगर
बाप मिलने की तमन्ना दम-ब-दम करता रहा
झूठ तो कर के दिखावा बन गया सच्चा वहाँ
सच मगर कोने में बैठा आँख नम करता रहा
लिख न पाया अब तलक तू बात दिल की ऐ 'ज़िया'
सिर्फ़ इसका उसका अफ़साना रक़म करता रहा
**
4.
दबा ली दाँत से उँगली कि ऐसा हो गया कैसे
हमारी जान का दुश्मन हमारा हो गया कैसे
ज़माना सोचता है चाँद कितना ख़ूबसूरत है
मगर मैं सोचता हूँ चाँद मैला हो गया कैसे
अब इसका ज़िक्र भी करने लगा है रूह को ज़ख़्मी
मुहब्बत का ये नाज़ुक फूल कांटा हो गया कैसे
सितम ये कुछ नहीं है ज़ह्र उसने दे दिया मुझको
सितम ये है कि पूछा जिस्म नीला हो गया कैसे
तुझे मैं अपना समझा था तुझे मेरा ही रहना था
ज़रा बतला दिले नादाँ तू उसका हो गया कैसे
हवा गर मिल न पाये कुछ नहीं फिर तेल बाती भी
दिया ये जानकर दुश्मन हवा का हो गया कैसे
**
5
क्यूँ न अब उसके रू ब रू रोयें
अब के आँसू नहीं लहू रोयें
मैं ज़ियादा न आप कम रोओ
पास आओ कि हू ब हू रोयें
कौन है, किसको फ़र्क़ पड़ता है
घर में रोयें कि कू ब कू रोयें
ख़ुश्क आँखों का रोना भी क्या है
आँसुओं से करें वुज़ू रोयें
वक़्त ए रुख़्सत है सो ख़ुदा के लिए
रख लें आँखों की आबरू रोयें
हाय छिन जायगा हमारा दर्द
ज़ख़्म होने लगे रफ़ू रोयें
हाँ अभी अश्क दर्द देते हैं
धीरे धीरे बनेगी ख़ू रोयें
ऐ 'ज़िया' तेरे ज़ख़्म की लज़्ज़त
दोस्त तो दोस्त हैं अदू रोयें
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6
न आई जिसकी सहर, एक रात ऐसी भी
गुज़ार आये मगर , एक रात ऐसी भी
इधर गुज़रती हैं जैसे अज़ाब में रातें
गुज़रती काश उधर, एक रात ऐसी भी
बुझा सकूँ मैं दियों को ख़ुशी ख़ुशी जिसमें
तू मेरी नज़्र तो कर, एक रात ऐसी भी
जुदा है दश्त की शब तेरे शह्र की शब से
ले चल समेट के घर , एक रात ऐसी भी
मैं जानता हूँ न निकलेगा रात में सूरज
मैं चाहता हूँ मगर , एक रात ऐसी भी
वो जिसमें आँख ही ख़्वाबों से रश्क करती थी
'ज़िया' ने की है बसर , एक रात ऐसी भी
**
7
ज़ब्त कर ग़म को कि जीने का हुनर आयेगा
बाद कांटों के ही फूलों का सफ़र आयेगा
राह सहरा की चला है तो ये भी सुन ले तू
सोचना छोड़ दे रस्ते में शजर आयेगा
आइना होना ही काफ़ी नहीं है कमरे में
साफ़ होगा वो तभी अक्स नज़र आयेगा
जिस पे हर सिम्त से ही आते रहे हों पत्थर
कैसे उस पेड़ पे फिर कोई समर आयेगा
इतना ख़ुश भी न हो तूफ़ान गुज़र जाने पर
ये समन्दर है यहाँ फिर से भंवर आयेगा
ले के इमदाद का झूठा सा बहाना कोई
मुझको औक़ात बताने वो इधर आयेगा
अपने आगोश में ले लूंगा 'ज़िया' मैं उसको
रात को चाँद जो दरिया में उतर आयेगा
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8
ज़मीं दिल के हसीं रिश्तों की बंजर हो गई अब तो
नदी मेरे ग़मों की भी समंदर हो गई अब तो
ये सुनकर जल उठे हैं लोग कुछ शोले शरारों से
कि चादर मेरे पैरों के बराबर हो गई अब तो
नदारद ख़्वाब हैं इससे, नदारद अश्क हैं इससे
यक़ीनन ये छलकती आँख पत्थर हो गई अब तो
न रखना रौशनी की आस इन बुझते चराग़ों से
सुना है तीरगी इनका मुक़द्दर हो गई अब तो
मचल जाती है कलियों का तबस्सुम देखकर अक्सर
ये नीयत है कि जैसे रेत का घर हो गई अब तो
किसी भी रास्ते निकले मगर मंज़िल को पायेगा
जवां-मर्दी 'ज़िया' की यार रहबर हो गई अब तो
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9
है तमन्ना अगर उजालों की
तो हिफ़ाज़त करो चराग़ों की
भूल मत जाना तुम ज़मीं अपनी
बात करते हुए सितारों की
ढूंढते हो दिलों में क्यूँ इसको
है वफ़ा चीज़ अब फ़सानों की
पास दरिया है प्यास फिर भी है
बेबसी देखिये किनारों की
आरियां भी चलाये पेड़ों पर
और उम्मीद भी बहारों की
दूर से जो लगे समन्दर सा
अस्ल में है डगर सराबों की
कुछ जले या बुझे हरिक सूरत
होगी मौजूदगी हवाओं की
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10
न बैठ चुप तू सुना दर्द, दर्द का क़िस्सा
किसी बहाने उठा दर्द, दर्द का क़िस्सा
मैं दास्तान तलक ही रहूँ तो अच्छा है
न कर दे मुझको मुआ दर्द, दर्द का क़िस्सा
बहार ने लिखी है दास्तान ख़ुशियों की
ख़िज़ाँ की रुत ने लिखा दर्द, दर्द का क़िस्सा
शबे फ़िराक़ उतरने लगी ढलान से जब
जवान होने लगा दर्द, दर्द का क़िस्सा
तुम्हारे जाने से इस पर शबाब आया था
तुम आये ख़त्म हुआ दर्द, दर्द का क़िस्सा
अलाव जिस पे गुजारीं ख़ुशी- ख़ुशी रातें
उसी अलाव में था दर्द, दर्द का क़िस्सा
सुना किसी को इसे बाँट ले किसी के साथ
कि बढ़ गया है 'ज़िया' दर्द, दर्द का क़िस्सा
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11
ये आँसू और दर्दे दिल मेरे हमदम नहीं होते
जो तेरा ग़म नहीं होता तो इतने ग़म नहीं होते
मज़ा क्या ज़िन्दगी में था अगर उल्फ़त की राहों में
हमारे तुम नहीं होते तुम्हारे हम नहीं होते
अगर ये आप कहते हैं तो शायद ठीक ही होगा
हक़ीक़त है यही शोले कभी शबनम नहीं होते
इधर कश्ती भी जर्जर है उधर तूफ़ान सर पर है
है साहिल दूर लेकिन हौसले भी कम नहीं होते
न होता फ़ख़्र यूँ महसूस ऐ मंज़िल तुझे पाकर
जो तेरी राह में इतने ये पेचो- ख़म नहीं होते
'ज़िया' ये सोचकर ही आज मौसम के मुताबिक़ हूँ
कि मर्ज़ी के मुताबिक़ तो कभी मौसम नहीं होते
**
12
है कुछ अजीब सा आज़ार, दिल धड़कता है
हर इक सदा पे हरिक बार, दिल धड़कता है
करे न ज़िक्र भरी बज़्म में कोई उसका
मेरे हबीबो ख़बरदार, दिल धड़कता है
हमारा यार तो रहता है झील के उस पार
सदा जो आती है इस पार, दिल धड़कता है
कोई निगाह लगातार देखती है मुझे,
सो यूँ समझिये लगातार, दिल धड़कता है
है आज उससे मुलाक़ात की तमन्ना भी
कि उस पे आज है इतवार, दिल धड़कता है
लिखा था जिस पे मेरा नाम चॉक से तुमने
जो देखता हूँ वो दीवार, दिल धड़कता है
नये ख़याल की आमद से ज़ेहन है रोशन
कि होंगे कुछ नए अशआर, दिल धड़कता है
'ज़िया' के साथ शजर को उदास रहने दे
सो ऐ परिंदे न 'पर' मार, दिल धड़कता है
**
13
कोई दामन कोई शाना होता
मेरे अश्कों का ठिकाना होता
तू नहीं कोई नहीं है जैसे
तू अगर होता ज़माना होता
ख़ार चुभते न अगर हाथों में
क़ीमत ए गुल को न जाना होता
इक ज़रा तेरी हँसी भर देती
ज़ख़्म कितना भी पुराना होता
लज़्ज़ते इश्क़ न जाती दिल से
काश वो छुपना छुपाना होता
होती पुरलुत्फ़ मुलाक़ात 'ज़िया'
उसके लब पे जो बहाना होता
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14
धूप ढल जाती है घटाओं में
ये असर होता है दुआओं में
पत्थरों को भी मोम कर देंगी
इतनी तासीर है वफ़ाओं में
उसको महसूस करता है ये दिल
फूल तितली शजर हवाओं में
सांस लेना मुहाल है अब तो
है धुआँ ही धुआँ फ़िज़ाओं में
ऐ 'ज़िया' इतनी भी सज़ा मत दो
लुत्फ़ आने लगे सज़ाओं में
**
15
लुत्फ़ सारा मुहब्बत का जाता रहा
मैं उसे वो मुझे आज़माता रहा
अपना ग़म तो वो हँस कर उठाता रहा
मेरा ख़ुश रहना उसको सताता रहा
टुकड़े टुकड़े बिखर तो गया आइना
सच दिखाया था सच ही दिखाता रहा
दुश्मनी थी अँधेरों से उसकी मगर
रात भर दिल हमारा जलाता रहा
जीत में भी मज़ा जीत का था कहाँ
हारने वाला जब मुस्कुराता रहा
छू न पाई हँसी होंठ उसके कभी
उम्र भर जो सभी को हँसाता रहा
ऐ 'ज़िया' इन्तिहा है ये तन्हाई की
एक दर्दे जिगर था सो जाता रहा
**
16
हमारा दर्द ज़रा सख़्त था कि जैसे बर्फ़,
ग़मों की आँच से गलने लगा कि जैसे बर्फ़
बला की आग जिगर में छुपाई थी उसने
वो शख़्स शक्ल से जो सर्द था कि जैसे बर्फ़
रखे है हाथ वो कुछ देर हाथ पर हँसकर
मगर फिर ऐसे उसे छोड़ता कि जैसे बर्फ़
तू सर्दियों में किसी झील का सा आबे सर्द
मैं जमअ झील के ऊपर रहा कि जैसे बर्फ़
हरेक मोड़ पे वो रंग रूप बदले है
अभी है आब कभी संग था कि जैसे बर्फ़
तुम्हारा दर्द था भारी सो दिल में बैठ गया
ये ग़म तो आंख में ही तैरता कि जैसे बर्फ़
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17
लहू गिरे तो करें 'वाह' कांच के टुकड़े
हमारे पाँव के हमराह कांच के टुकड़े
चलें जो एक पे तो दूसरा झुका ले सर
हमारे दर्द से आगाह कांच के टुकड़े
निकल रहे हैं सभी बच के पर उठाते नहीं
पड़े हुये हैं सरे राह कांच के टुकड़े
नहीं नहीं इसे उनका सितम नहीं कहिये
हमारे ज़ख़्म की हैं चाह कांच के टुकड़े
समझ गया वो सबब मेरे लड़खड़ाने का
कि मेरे होंठो पे था आह कांच के टुकड़े
कभी जिगर में कभी आंख में कभी दिल मे
'ज़िया' ने रक्खे हरिक गाह कांच के टुकड़े
**
18
महरूमियों का साथ निभाना पड़ा मुझे,
मजबूरियां थीं ज़िद पे तो जाना पड़ा मुझे
मैं कश्मकश में सोच न पाया कि क्या करूँ
हाँ रास्ते में एक ठिकाना पड़ा मुझे
ज़ख़्म ए जिगर को देख के हँसने लगी थी रात
बस इसलिये चराग़ बुझाना पड़ा मुझे
वो तितलियां बना रहा था इक वरक़ पे सो
इक फूल इक वरक़ पे बनाना पड़ा मुझे
दिल साफ़ था मगर ये ज़ुबाँ जब फिसल गई
इल्ज़ाम ए बेहयाई उठाना पड़ा मुझे
वो कह रहा था ख़्वाब हूँ ख़्वाबों का क्या वजूद
फिर यूँ हुआ कि ख़ुद को जगाना पड़ा मुझ
**
19
कहें तो कौन सुनेगा कि ख़ुश नहीं हैं हम,
न कहना ठीक रहेगा कि ख़ुश नहीं हैं हम,
तुम्हारे रुख़ पे चमक आएगी कि तुम ख़ुश हो
हमारा ख़ून जलेगा कि ख़ुश नहीं हैं हम
तलाशती हैं दवायें मरीज ए दिल में सुकून
कहाँ से ज़ख़्म भरेगा कि ख़ुश नहीं हैं हम
सुना है पुण्य मिलेगा उन्हें जो ख़ुश होंगे
हमें तो पाप लगेगा कि ख़ुश नहीं हैं हम
हरेक शख़्स यहाँ रंज ओ ग़म में डूबा है
सो कौन किससे कहेगा कि ख़ुश नहीं हैं हम
जो थी हमारी ख़ुशी वज्ह उसके जीने की
तो अब वो कैसे जियेगा कि ख़ुश नहीं हैं हम
तुम्हारी बज़्म में जायेंगे शादमा होकर
ये राज़ घर में रहेगा, कि ख़ुश नहीं हैं हम
'ज़िया' तमाम कहानी बनेगीं, अफ़साने
अगर कोई ये कहेगा कि ख़ुश नहीं हैं हम
**
20
क़त्ल करता है मुस्कुराहट का
उफ़ क़यामत है दर्द का झटका
सब गुज़रते हैं मेरे सीने से
मैं हूँ इक पायदान चौखट का
बादलों से बचा लिया मैंने
चाँद लेकिन शजर में जा अटका
एक मुद्दत हुई ये दरवाज़ा
मुन्तिज़र है तुम्हारी आहट का
मैं जो दीदार को तड़पता हूँ
ये करिश्मा है तेरे घूँघट का
पास हैं हम कि दूर क्या समझें
फ़ासिला है तो एक करवट का
जिस्म बिस्तर पे ही रहा शब् भर
दिल न जाने कहाँ कहाँ भटका
**
21
ज़ुबाँ तक बात भूखे पेट की आने नहीं देती
ये ख़ुद्दारी तो हरगिज़ हाथ फैलाने नहीं देती
बहाता है पसीना भूख जो अपनी मिटाने को
कभी भी रूह उसकी जिस्म को ताने नहीं देती
चला जाता मैं तुमको छोड़ कर यूँ ही मुसीबत में
मगर इंसानियत यूँ छोड़कर जाने नहीं देती
कोई उम्मीद बाक़ी अब नही है ज़ीस्त में फिर भी
न जाने दिल मे क्या है ज़हर जो खाने नहीं देती
मिलाना चाहते हैं हाथ हिन्दू और मुस्लिम पर
सियासत है कि इनको पास भी आने नहीं देती
**
22
किसे आवाज़ देता है, यहाँ पर कौन तेरा है
न रातें हैं सवेरों की न रातों का सवेरा है
बुरी शै भी कभी बाइस बनी है अच्छे कामों की
उजाला ढूँढ लाये हम सबब इसका अंधेरा है
ये आँखे हैं, नुमाइंदा तसव्वुर के जहानों की
यहाँ यादों की गलियां हैं यहाँ ख़्वाबों का डेरा है
यही मौसम तुम्हें जो दे रहा है वस्ल की लज़्ज़त
यही मौसम हमारी राहते जाँ का लुटेरा है
शजर से टूटते पत्ते, उतरता झील का पानी
ये कोई रुत नहीं है, दर्द कुदरत ने उकेरा है
'ज़िया' ये सोचना छोड़ो, ज़िया को देख पाओगे
चराग़ों ने तुम्हारी सिम्त से मुँह आज फेरा है,
**
सुभाष पाठक 'ज़िया'
परिचय:
नाम - सुभाष पाठक 'ज़िया'
पिता - श्री कमलकिशोर पाठक
जन्मतिथि- 15 सितम्बर 1990
शिक्षा- बी.एस.सी, बी .एड, एम. ए(हिंदी)
व्यवसाय- अध्यापक
सम्प्रति- शासकीय हाई स्कूल समोहा
प्रकाशन- शेरी मजमुआ 'दिल धड़कता है' (मध्य प्रदेश उर्दू अकादमी भोपाल से उर्दू में 2020 में प्रकाशित)
देश-विदेश की तमाम साहित्यिक पत्रिकाओं, ग़ज़ल विशेषांकों में ग़ज़लें प्रकाशित
सम्पादन- ये नए मिज़ाज का शहर है (लोकोदय प्रकाशन)
प्रसारण- आकाशवाणी और दूरदर्शन से नियमित काव्य पाठ, साक्षात्कार प्रसारित
विशेष-
1.ग़ज़ल 'जाने क्यों दिल ये ख़ता करता है'
ग़ज़ल गायक अहमद रज़ा मुंबई द्वारा आकाशवाणी इंदौर से गाया गया
2.ग़ज़ल- 'कोई दामन कोई शाना होता' को मोहतरमा राखी चटर्जी साहिबा द्वारा केरल लिटरेचर फेस्टिवल में गाया गया
3.ग़ज़ल- 'क्यूँ न अब उसके रू ब रू रोयें'
को ग़ज़ल गायक अज़हर मेवान ने राष्ट्रीय कला महोत्सव दिल्ली में आवाज़ दी
4. ग़ज़ल 'अबके दिल बेहतरीन टूटा है',
ग़ज़ल 'मुझे सलीके से बर्बाद भी नहीं करते', आदि
को ग़ज़ल गायक अहमद रज़ा ने कई लाइव शो में गाया
5. 'टाइम्स ऑफ इंडिया' अलवर द्वारा मेरे गीत 'उम्मीद' को कोरोना एंथम में शामिल किया गया जिसे मो0 वकील द्वारा गाया गया
सम्मान- अदबी उड़ान संस्था द्वारा 2017 में 'अदबी उड़ान युवा ग़ज़लकार सम्मान '
पुनर्नवा सम्मान भोपाल 2018 (मध्य प्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन भोपाल द्वारा)
हिंदी साहित्य सम्मेलन शताब्दी युवा साहित्यकार सम्मान, पटना 2019 (बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन पटना द्वारा)
शाद अज़ीमाबादी सम्मान 2021, पटना
विभिन्न साहित्यिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित
पता-
ग्राम/ पोस्ट- समोहा
तहसील -करेरा
ज़िला -शिवपुरी , मध्यप्रदेश,
पिनकोड 473660
मो- 8878355676
ईमेल- subhashpathak817@gmail.com.
Thursday, August 13, 2020
किसी मुल्क पर दुसरे मुल्क का कब्ज़ा करके उसे नक़्शे से मिटा देना सामान्य बात नहीं है विशेषकर वहां के वाशिंदों के लिए तो टूट कर बिखर जाने वाली बात होती है |विस्थापित होकर दूसरी जगह अपनी पहचान को बचा कर रखना सहज नहीं होता |भावनाओं के इसी भंवर को कहानी में रचने की शानदार कोशिश की है प्रसिद्ध समका लीन कथाकार तरुण भट्नागर ने | और वह इसमें पूर्णतया सफल भी हुए है |
उनके द्वारा लिखित कहानी "भूगोल के दरवाजे पर " सुधि पाठक डॉ कंचन जायसवाल ने अपनी बात रखते हुए समीक्षा लिखी है |
रचना प्रवेश पर पढ़िए कहानी और कंचन जायसवाल की समीक्षा -
डॉ कंचन जायसवाल
तरुण भटनागर की कहानी “भूगोल के दरवाजे पर"
यह कहानी ‘तिब्बत' के बारे में है ,एक ऐसा मुल्क जो अब दुनिया के नक्शे में नहीं है. कहानी का एक पात्र मास्टर है, जो गांव में एक स्कूल चलाता है .वह अपने बच्चों को तिब्बत के बारे में बतलाता है, जबकि वह जानता है कि यह विषय अब उनके भूगोल के कोर्स में नहीं है. बच्चे भी छोटी उम्र के हैं. कोर्स के बाहर की चीज को जानना उनके लिए जरूरी नहीं है।
‘ तिब्बत शानदार मुल्क था ,लोग उसे देवताओं की भूमि कहते थे' ।
कहानी छत्तीसगढ़ के मैनपाट जगह से शुरू होती है जहां विस्थापित तिब्बती आकर बसे हुए हैं ।इनकी अपनी एक पहचान है ,शक्लो- सूरत है, भाषा है, गीत- संगीत है, धर्म है, और अपना दर्द है जिसकी टीसें वे कभी भुला नहीं पाते और यह दर्द पीढ़ी दर पीढ़ी वे अपने वारिसों को सौपते चले जाते हैं। 30 साल हुए उन्हें मैनपाट में बसे पर मैनपाट उनका घर नहीं है, उनकी जगह नहीं है, उनका मुल्क कहीं और है, बल्कि अब कहीं नहीं है।
“ खुद को यकीन दिलाना एक थका देने वाला काम है। “
“यह जो यकीन नाम की शै है ,उनके बदन पर घाव के निशान हैं।”
कहानी का एक अन्य पात्र ग्याल्त्सो है ,विस्थापित तिब्बती बुजुर्ग जो कि मास्टर का दोस्त है ।मास्टर मैनपाट आता जाता रहता है। बच्चों ने ग्याल्त्सो को देखा है मास्टर से मिलते- जुलते ।वह उन्हें चीनी जैसा लगता है ।बच्चे उसे चीनी- चीनी कहकर चिढ़ाते हैं। बुजुर्ग ग्याल्त्सो गुस्से में उन्हें दौड़ाताहै ।वह मास्टर से शिकायत करता है कि बच्चे उसे चीनी कहते हैं ,पर शिकायत करते- करते वह रो पड़ता है।
गुस्सा करना बच्चों के लिए सामान्य बात है पर किसी बुजुर्ग का रो देना उनके लिए बहुत बड़ी बात है। बच्चे सहम जाते हैं ।मास्टर बच्चों को डांटता है और कहता है,-“ वह तिब्बती है चीनी नहीं”.
“ हर किसी को यह जानना चाहिए कि तिब्बती और चीनी दो अलग लोग हैं.”
अब मास्टर के लिए यह जरूरी है कि वह बच्चों को बतलाए तिब्बत के बारे में ।वह अपने बचपन में लौट जाता है ।वह बच्चों को बतलाता है कि जब उसने भूगोल पढ़ा था तब उसकी किताब में तिब्बत का जिक्र एक मुल्क के रूप में होता था ।एक ऐसा मुल्क जो भारत का पड़ोसी था और उसकी सरहदें भारत की सरहदों से लगती थीं। वह बतलाता है कि अब भूगोल की किताब में तिब्बत का जिक्र एक देश के रूप में नहीं है क्योंकि अब तिब्बत नक्शे में कहीं नहीं है। उस पर चीन का कब्जा हो चुका है।
“ देखो बात ऐसी है कि जमीन उसी की होती है ,जो उस पर कब्जा कर लेता है.”
“किसी मुल्क को जीतने के कई तरीके हैं .पर सबसे आसान है, जबरदस्ती घुस आओ और ताकत के बल पर कब्जा कर लो ।“
बच्चे गौर से मास्टर की बातें सुनते हैं ।मास्टर बतलाता है-“ स्कूल का कोर्स ही क्या दुनिया की किसी भी किताब में हारे हुए मुल्कों का नाम नहीं मिलता ,तुम्हें किसी भी किताब में हारे हुए मुल्कों के गीत और कहानियां नहीं मिलेंगी। तुम पूरा बाजार छान मारो, चाहे अंबिकापुर चले जाओ, चाहे उससे भी आगे रायपुर या दिल्ली ,या उससे भी आगे”.
“ मास्टर एक बात कहता था जो बिल्कुल भी समझ ना आती थी. वह कहता था किहारने का मतलब सिर्फ हारना नहीं होता है ।इसका मतलब होता है स्मृति में से मिटा दिया जाना।“
बच्चे यद्यपि उम्र में छोटे हैं पर मास्टर की बातें और ग्याल्त्सो के आंसू मिलकर उनके मासूम मन में तिब्बत की ,एक खोए हुए देश की मौजूदगी दर्ज कर देते हैं। ग्याल्तसो को खुश करने के लिए सभी बच्चे अपनी भूगोल की किताब में एशिया के मुल्कों के नाम में तिब्बत का नाम भी जोड़ देते हैं ।
“उस जगह हम सब ने लिख दिया- देश तिब्बत ,राजधानी लहासा।“
बच्चे अपनी किताबें मास्टर को दिखाते हैं मास्टर सबकी किताबें देखता है और चुप रहता है। वह यह तो समझता है कि बच्चों ने तिब्बत का नाम एशिया के मुल्कों के नाम में जोड़ दिया है पर तिब्बत है कहां । ग्याल्त्सो भी यह जानकर खुश होता हैपर वह बच्चों को हिदायत देता है कि परीक्षा के लिए वे उसे याद न करें क्योंकि परीक्षा में जो है उसी के बारे में लिखना है ,जो अब बस यादों में है उसके बारे में नहीं, अन्यथा उन्हें नंबर नहीं मिलेगा ।
कहानी आगे बढ़ती है एक चिट्ठी के आने पर जो ग्याल्त्सो के लिए है पर ग्याल्त्सो जो कि अनपढ़ है उस तक यह चिट्ठी कैसे पहुंचाई जाए ।मैनपाट से एक तिब्बती आकर मास्टर को चिट्ठी के बारे में बताता है, उस पर यह जिम्मेदारी छोड़ देता है कि वह ग्याल्त्सो को बताए मास्टर और ग्याल्त्सो की दोस्ती बहुत पुरानी है। मास्टर बच्चों कोआउटिंग के बहाने मैनपाट लेकर आता है।बच्चे मैनपाट देखने के लिए उत्साहित हैं ।वहां पर जो तिब्बती रहते हैं उन में से 10 तिब्बतियों को हर साल अपने मुल्क को देखने का मौका मिलता है। तिब्बत देखने के लिए जाने वालों में ग्याल्त्सो का नाम है पर दूसरा तिब्बती जिसकी जिम्मेदारी है कि वह 10 लोगों का नाम चयनित करें वह चाहता है कि ग्याल्त्सो तिब्बत ना जाए, क्योंकि उसे जो चिट्ठी मिली है उसके अनुसार अब तिब्बत में ग्याल्त्सो के परिवार का कुछ भी बचा नहीं है ।5 साल पहले ही उसका सब कुछ खत्म हो चुका है,, उसका बेटा उसका घर,सब कुछ।पर यह सूचना वह ग्याल्त्सो को कैसे दे। जबकि ग्याल्त्सो जाने के लिए बहुत उत्साहित है ।जब मास्टर ग्याल्त्सोको मना करता है ,वह कहता है-
“ 25 साल .क्या तुम गिन सकते हो? 25 सालों को कोई नहीं गिन सकता। पर मैंने गिना और रुका रहा। पर फिर भी तुम कहते हो कि वहां जाना बेमतलब है ।अंततः बेमतलब।“
मास्टर उसे पत्र के बारे में बताता है और कहता है कि अब वहां कुछ भी नहीं है ।ग्याल्त्सो समझ जाता है और दुख के गहरे सागर में डूब जाता है ।उसकी रुलाई पूरे मैनपाट को दुखी कर देती है। अपनों को खोना, अपना सब कुछ खो देना क्या होता है ,एक इंतजार, एक उम्मीद जो ग्याल्त्सो को जिंदा रखती है कि एक दिन वह अपने मुल्क जाएगा ,अपने परिवार से मिलेगा, अपने वतन की मिट्टी को छुएगा ,अपनी हवा, अपना पानी ,अपने आसमान के नीचे खड़ा होगा, सब खत्म हो जाता है।ग्याल्त्सो कि स्मृति में बचा हुआ उसका मूल्य अब पूरी तरह से मिट चुका है।
“तिब्बत एक अनुमान था, अंधेरे में उंगलियों की एक टटोल था तिब्बत“………………
मास्टर उसी रोज अपने बच्चों के साथ अपने गांव वापस लौट आता है।
कहानी
भूगोल के दरवाज़े पर
तरुण भटनागर
एक
जब तक हमने वहाँ के बाशिंदों को नहीं देखा था, वह गाँव ठेठ ही लगा. देखने में वह गाँव जिस तरह से गाँव होते हैं उससे अल्हदा दीखता था, उसमें बने मकान, लंबे और चोंगे के आकार का मंदिर और हवा में फरफराती तमाम तरह की चौकोर रंग बिरंगे कपडों की लडों से सजा-धजा वह गाँव एक अलग दुनिया सा दीखता रहता.
बचपन के किसी किस्से में सुनी किसी जगह जैसा. कोई जगह जिसके बारे में बचपन की किसी कहानी में सुना जाना था, कुछ-कुछ वैसा ही. पर फिर भी उसमें एक गाँव पन था, एक ठेठपन जो इस सबके बावजूद उसकी फितरत में था. उसके बाशिंदों को देखते ही उसका यह ठेठपन बिला जाता था. पल भर को लगता कि वह कितनी अल्हदा जगह है, हमारी दुनिया से कितनी मुख़्तलिफ, न कभी देखी, न जानी. यूँ तो यह भ्रम ही था कि अगर लोग अलग से दीखते हों तो वह दुनिया जिसमें वे रहते हैं वह भी अलग सी दुनिया होती है. हम स्कूल जाते बच्चे थे. और इस तरह यह भ्रम हमें बताता रहता था कि वह गाँव कितना तो अलग है. छुटपन के, उन दिनों के आलम में, यह अलग सा दीखने वाला गाँव अजूबेपन की हद तक अल्हदा नजर आता रहता था.
यह बात थी उन्नीस सौ अस्सी की. उन लोगों के उस गाँव में सबसे पहले बसने के तीस साल बाद की. तीस साल पहले उनकी जो पहली आमद हुई थी इस गाँव में उसके बारे में कोई खास मालूमात नहीं हैं. बस इतना ही पता चलता है कि वे आये और बस गये.
छत्तीसगढ़ में जो जगह समुद्र तल से सबसे अधिक ऊँचाई पर बसी है, वह यही गाँव है. जैसा कि है ही कि वहाँ के बाशिंदे हमारे यहाँ के से नहीं जान पडते. नहीं दीखते. और यह भी कि लंबे बीते वक्त ने यह जतलाया कि चपटे चेहरे, सीधे खडे बाल और छोटी-छोटी आँखों वाले ये लोग दूसरों से अलग नहीं हैं, सिवाय इसके कि वे अलग दिखते हैं. उनके पास जाओ, उनसे बात करो तो लगता है कि सिवाय इसके कि वे अलग दीखते हैं कुछ भी तो अलग नहीं. अलग दीखना भी वैसा ही भ्रम है जैसा कि उस गाँव का मुख़्तलिफ सा लगना. वे एक ऐसी जगह से आये थे, तीस साल पहले, जिसके बारे में बहुत कम लोगों को पता था. तीस साल पहले वह जगह दुनिया के तमाम अखबारों में सुर्खियाँ बनी थी. तब वे सैंकडों की तादाद में उस जगह को छोडकर चले आये थे. टाइम्स मैगजीन से लेकर न्यूयार्क टाइम्स तक और बी.बी.सी. लंदन से लेकर दुनिया के तमाम समाचारों में वे ही वे थे. उन पर बातें थीं. उनकी ही तस्वीरें दीखती थीं. पर वे इन सब से बेखबर चलते-चले थे. वे सैंकडों की तादाद में आये. फिर यहीं रह गये.
उनके बारे में जो नहीं पता था, वह यह था कि बीते तीस सालों में और उस दिन जब हम उनके उस गाँव गये थे तब भी, उन्होंने यह मानने की भरसक कोशिश की है, खुद को यकीन दिलाया है कि यह जमीन, यह आकाश, यह जंगल, दूर तक फैले हरे घास के मैदान, ये तमाम लोग, आसमान के चाँद सितारे सब ... सब उनके ही तो हैं. यह बात समझ न आती थी कि कोई खुद को इस तरह का यकीन क्यों दिलाता रहता है कि सारी कायनात उसकी ही तो है ? चारों ओर देखो तो लगता है सबकुछ अपना ही तो है. हम यहाँ रहते हैं. हमारा मकान है यहाँ. हमारा परिवार. फिर यह बात क्यों ? पर यह सब था ही. इतना ही नहीं बल्कि उन्हें लगता कि खुद को यकीन दिलाना एक थका देने वाला काम है. कब तक और किस तरह से कोई खुद को यकीन दिलाता रहे. आप अगर बार-बार खुद को यकीन दिलायें तो थक जायें. खुद को यकीन दिलाने वाले लोगों के चेहरे पर बेवक्त ही झुर्रियाँ आ जाती हैं. उनके बाल जवानी में ही पकने लगते हैं और उनकी आँखों का नूर बितर जाता है. यह जो यकीन नाम की शै है उसके बदन पर घाव के निशान हैं. यकीन नाम की इस शै के जिस्म से खून रिसता रहता है. पर फिर भी वे खुद को यकीन दिलाते रहते हैं और धीरे-धीरे यकीन पर से उनका यकीन दरकता रहता है. झूठ कोई ऐसी चीज तो नहीं कि कोई खुद से झूठ कहकर खुद को ढ़ांढ़स देता रहे. उनके यकीन के साथ यही गडबड है. उनका यकीन झूठ के ढाँचे पर तना है. इसलिये उनके जेहन में जब-जब उनका यकीन उठकर खडा होना चाहता है, वह इस कोशिश में पलटकर गिरता है. पछाड खाकर भीतर कहीं बेहोश हो गये यकीन की देखभाल करना सबसे कठिन काम होता है. पर कोई क्या करे ? कोई राह नहीं सूझती.
दो
मैनपाट. छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले का ही एक गाँव है. कहते हैं समुद्र तल से लगभग एक हजार एक सौ मीटर ऊपर. पहाडों पर रहने वालों को यह ऊँचाई कम लग सकती है, पर यकीन करें मैनपाट में आये ये लोग जिस जगह से आये थे वह जगह समुद्र तल से पाँच हजार मीटर की ऊँचाई वाली जगह थी. इतने ऊँचे तो पहाड भी कहाँ होते हैं. पूरे छत्तीसगढ़ में मैनपाट सबसे ऊँचाई पर है. इससे ऊपर कोई और गाँव नहीं है. यह आसमान के सबसे पास है. जिस जगह जो जगह सबसे ऊँचाई पर होती है वही उस जगह आसमान के सबसे पास होती है. यही माना जाता है.
तारीख गवाह है, कि तीस साल पहले जब उनसे उनकी जमीन, मकान, परिवार, सबकुछ छीन लिया गया था, तब वे हजारों की तादाद में एक अनिश्चित सी उम्मीद के साथ हमारे यहां आये थे. कोई नहीं जानता कि वे अपनी आँखों में जलते मकानों के मंज़र लेकर आये थे. गिराये जाते मकानों के खौफनाक नजारे उनके जेहन से गुजरते रहते थे. उनकी खामोश आँखों में बेगुनाह कस्बों की गलियों में बहते मासूमों के खून का मंजर एक ऐसी चीज थी जिसे वे किसी को बता न सकते थे. उन में से कुछ इतने मजबूर थे कि उन्होंने दरवाजे की ओट से छिपकर देखा था अपने परिवार का कत्ल. इस तरह वे आये थे. वे आये और कुछ जगहों पर बसे. मैनपाट भी ऐसी ही जगहों में से एक है. वे लोग आज भी मैनपाट में है. पर लोग इसे एक घूमने फिरने वाली जगह के रूप में जानते हैं. लफरी घाट और टाइगर नाम के झरनों और उल्टा पानी नाम की एक जगह जहाँ पानी उल्टा बहता है इस जगह की प्रसिद्धी की वजह हुई. यह एक हिल स्टेशन जाना गया. इस तरह इस जगह की तमाम बातों में उन लोगों की कहानियाँ शामिल नहीं हो पाईं
वे अपने साथ बुद्ध को लेकर आये थे. इस गाँव में उन्होंने बुद्ध का एक मंदिर बनाया. उन्होंने बुनने का और खेती का काम किया. उन्होंने लसाप्सा नाम के कुत्तों को पाला और उन्हें बेचा. जीने की एक राह उन्होंने खोजी. वे अपनी जबान में बोलते-बतियाते. अपने मुल्क का गीत गाते, उनका मुल्क, वह मुल्क जो अब धरती के नक्शे में दीखता नहीं. अगर आप दुनिया के नक्शे को देखें तो जिस तरह तमाम मुल्कों के अलग-अलग रंग दीखते हैं. उनकी अलग-अलग सरहदें दीखती हैं. उस तरह से उस मुल्क को अलग रंग और सरहद में नहीं दिखाया जाता है. किसी मुल्क का दुनिया के नक्शे से गायब हो जाना कोई छोटी बात नहीं है. दरअसल हुआ इस तरह था कि पहले तो वह मुल्क नक्शे से गायब हुआ और फिर वह धीरे-धीरे लोगों की बातों से भी गायब होने लगा. लोग उसके बारे में बातें करना भूल गये. नक्शे से गायब हो जाने के बाद लोगों को भी यह बहाना मिल गया था कि उस मुल्क पर बात करने की अब क्या जरुरत ? इस तरह जब बात नहीं हुई तो वह मुल्क फिर आहिस्ते-आहिस्ते भुला दिया गया. कुछ इस तरह कि तमाम लोगों से अगर आप पूछें कि वह मुल्क हिंदोस्तान का पडोसी मुल्क था और आकार-प्रकार में आज के पाकिस्तान जैसे मुल्क से भी काफी बडा तो एकबारगी उनमें से कइयों को लगे कि आखिर यह किस मुल्क की बात की जा रही है ? वह कौन सा मुल्क था जो हिंदोस्तान का पडोसी था, पर आज दुनिया के नक्शों में नहीं है और जो आकार-प्रकार में आज के पाकिस्तान से बडा था ? इतना ही नहीं हिंदोस्तान से मिलने वाली उसकी सरहद किसी भी दूसरे मुल्क से मिलने वाली हिंदोस्तान की सरहद से कहीं ज्यादा लंबी थी. वह सबसे लंबी सरहद वाला हिंदोस्तान का पडोसी था.
वे उसी मुल्क के लोग थे. वहीं से आये और मैनपाट में बसे.
तीन
वह इन्हीं लोगों में से एक था. मैनपाट की घाट से साईकिल चलाता आता था. उसका नाम ग्याल्त्सो था. हम सब उसके नाम को ठीक-ठीक बोल न पाते थे. हम लोग याने हम सब बच्चे और स्कूल का मास्टर. उसका पूरा नाम कुछ और था. वह इतना लंबा और अजीब नाम था कि हम बोल न पाते थे. इस तरह हम उसे सिर्फ ग्याल्त्सो कहते थे. हम ठीक से ग्याल्त्सो भी न कह न पाते थे. पर इससे उसे कोई दिक्कत न थी. स्कूल के मास्टर से उसकी दोस्ती इतनी गहरी थी कि उसने उससे दोस्ती के खातिर किसी भी तरह से कह दिये जाने वाले अपने नाम को, हमारी जबान से मंजूर कर लिया था.
उस दिन हम दस स्कूली बच्चे अपने इसी मास्टर और गाइड मास्टरनी के साथ मैनपाट आये थे. वह शाम थी और हमें वहाँ की प्राथमिक शाला के एक भवन में आगे पाँच दिनों तक रहना था. मास्टर ने हमें बताया था, कि इसे ‘आउटिंग’ कहते हैं. उस रात हमें उस गाँव के सिर्फ दो लोग मिले थे, जिन्हें मास्टर और हमारे आने का पता था. वे मुझे अजीब से लगे थे- पीला रंग, छोटी-छोटी आँखें, धँसे हुए गाल, उभरी गाल की हड्डी, चमकता चेहरा, सफाचट और अधकचरी दाढ़ी-मूँछ, ठिगना कद, छोटे-छोटे खड़े काले बाल....... इतनी ठण्ड में भी उन्होंने बहुत कम कपड़े पहन रखे थे. फिर उनमें से एक कुछ देर बाद एक केतली में चाय लेकर आया. मक्खन वाली तिब्बती चाय. जिसकी अजीब खुशबू से मुझे उबकाई आई थी, पर बाकी सब बडे चाव से उसे पी रहे थे.
‘तिब्बत एक शानदार मुल्क था. लोग उसे देवताओं की भूमि कहते थे.’
स्कूल का मास्टर हमें बताता. मैनपाट मास्टर की पसंदीदा जगह थी. तिब्बत पसंदीदा विषय. तिब्बत कोर्स में न था. जब वह भूगोल की किताब में मुल्कों की फेहरिस्त में ही न था तो कोर्स में कैसे होता. जब वह नक्शे में ही न दीखता था तो कोर्स में कैसे होता. पर भी मास्टर उसके बारे में बताता था. हम छोटे थे. इस तरह इस बात को न जानते थे कि ऐसे मुल्कों के बारे में बात करने वाले लोग कैसे होते हैं ? कैसे होते हैं वे लोग जो ऐसे मुल्कों के बारे में बातें करते हैं जो दुनिया के नक्शे में नहीं दीखते ? वे लोग जो भूगोल की किताब में न दीख पडने वाले मुल्कों के बारे में बताते हैं ? जो उन मुल्कों के बारे में बात करते हैं जो कोर्स में नहीं हैं ? ऐसे मुल्क जिनके बारे में बताते हुए आउट ऑफ़ द कोर्स जाना पडता है ? ऐसे लोग ? कैसे होते हैं ? इस तरह तिब्बत और मास्टर के बीच की बात समझ न आती थी. पर वह तिब्बत पर बात करता था.
इस सब की शुरुआत एक वाकये से हुई थी. हमें ग्याल्त्सो अजीब लगता था. हम छोटे थे और यह मानते थे, कि हर छोटी आँख वाला और पीली खाल वाला आदमी चीनी होता है. छोटी आँख वाले, ठिगने पीले लोगों के लिए हमारे पास बस एक ही शब्द था- चीनी .... सो हम ग्याल्त्सो को चिढ़ाते थे- चीनी, ऐ चीनी .... और... ग्याल्त्सो आगबबूला होकर हमें मारने को दौड़ता. एक दिन ग्याल्त्सो ने मास्टर से हम सबकी शिकायत कर दी. मास्टर को सबकुछ बताते-बताते वह रुआँसा हो गया. हमें बड़ा अजीब लगा, क्योंकि हमने तब तक पैंसठ-सत्तर साल के किसी बुजुर्ग को हमारे चिढ़ाने पर, इस तरह रुआँसा होते नहीं देखा था. अलबत्ता गुस्सा होते ज़रूर देखा था. ग्याल्त्सो को गुस्सा दिलाने में हमें मजा आता था. इसीलिए हम उसे चीनी, चीनी कहकर चिढाते थे. ग्याल्त्सो का गुस्से से दुःखी हो गया चेहरा हमें बडा अजीब लगा था. चिढाने से बच्चे रो देते हैं. पर बुजुर्ग भी रो देते हैं यह बात हमें अजीब लगी थी.
मास्टर ने हमें सख्त हिदायत दी कि हम उसे चीनी ना कहें. ग्याल्त्सो के जाने के बाद उसने हमसे कहा कि हमने ग्याल्त्सो को तकलीफ पहुँचाई है. हमें इस बात का अफसोस होना ही चाहिए कि हमने एक नेक आदमी के दिल को दुखाया. उसे चीनी, चीनी कहकर चिढाया. ‘वह तिब्बती है, चीनी नहीं’- मास्टर ने सख़्त लहजे में हमसे कहा. पर फिर शायद उसे लगा कि हम इतने अकलमंद नहीं हैं कि चीनी और तिब्बती के बीच के अंतर को जान सकें. तो फिर उसने हमें समझाया भी- ये दोनों चीजें बिल्कुल अलग हैं. चीनी और तिब्बती में बहुत अंतर होता है. हर किसी को यह जानना चाहिए कि तिब्बती और चीनी दो अलग लोग हैं.
चार
मास्टर ने यह भी बताया कि जब वह हमारी तरह छोटा था और स्कूल में पढ़ता था, तो स्कूल की भूगोल की किताब आज की भूगोल की किताब से अलग थी. उस वक्त की भूगोल की किताब में लिखा होता था, कि तिब्बत एक मुल्क है. उनके दौर की भूगोल की किताबों में लिखा था, कि हिमालय के उत्तर में एक बहुत सुंदर जगह है, जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं. कि यह एक मुल्क है. बिल्कुल दूसरे मुल्कों की तरह, अलग और अपने आप में रचा बसा. भूगोल की किताबों में यह भी लिखा होता था कि, इस मुल्क की अपनी राजधानी है, जिसका नाम ल्हासा है. पर आज के छात्र यह सब नहीं जानते. क्योंकि वे भूगोल की दूसरी किताबें पढ़ते हैं. उनकी किताबों में तिब्बत का नाम ही नहीं है. मास्टर हमसे पूछता- ‘बताओ बताओ है क्या ? बोलो बोलो’. हम सब एकसाथ चिल्लाते ‘नहीं’.
मास्टर हमसे पूछता ‘क्या भूगोल की किताबों में हिंदोस्तान के पड़ोसी मुल्कों में तिब्बत का नाम लिखा है?’ हम सब एकसाथ चिल्लाते ‘नहीं’.
मास्टर हमारी भूगोल की किताब उठा लेता. उसके सारे पन्ने एक साथ फुरफुराता पलटता- ‘देखो देखो इसमें तिब्बत कहीं भी नहीं है.’ फिर कुछ सोचता. थोड़ा सँभलता फिर कहता -
‘देखो. बात ऐसी है कि जमीन उसकी होती है, जो उस पर कब्जा कर लेता है. जमीन ही क्या, रोड, पुल, नाले, नदियाँ, मकान, जंगल, पहाड़...याने वह सब कुछ जो दीखता है उस सब पर भी किसी का कब्जा हो सकता है. इसी तरह कोई भी मुल्क उसका होता है, जो उसे जीत लेता है. किसी मुल्क को जीतने के कई तरीके होते हैं. पर सबसे आसान है, जबरदस्ती घुस आओ और ताकत के बल पर कब्जा कर लो. फिर वहाँ के लोगों को वहाँ से खदेड़ दो. जैसा कि तिब्बत में हुआ. जैसा कि चीन ने तिब्बत के साथ किया. जो हुआ वह गलत था. ग्याल्त्सो और उसके लोगों के साथ जो कुछ भी हुआ वह गलत था.’
मास्टर बताता कि इस तरह एक मुल्क दूसरे मुल्क को जीत लेता है. जीतने के साथ ही उसे एक और अधिकार मिल जाता है. वह है, किताबें लिखने का अधिकार. कि यह दुनिया का कायदा है, किताबें वही मुल्क लिखेगा जो जीत चुका हो. हर किताब किसी विजेता ने ही लिखी है. जिन लोगों ने तमाम किताबें लिखी हैं वे या तो विजेता लोग हैं, या विजेताओं अपने लोग हैं. जैसे तुम्हारी यह भूगोल की किताब. दुनिया कि तमाम किताबों की तरह तुम्हारे कोर्स की भूगोल की यह किताब भी किसी विजेता ने ही लिखी है. ऐसा नहीं है कि हारे हुए मुल्क किताब नहीं लिखते हैं. दिक्कत यह है कि उनकी किताबें चलती नहीं हैं. कम से कम कोर्स में तो आ ही नहीं सकतीं. कोर्स में जो किताबें हैं वे जीते हुए मुल्कों की किताबे हैं. इसलिए उसमें हारे हुए मुल्कों का जिक्र नहीं. इसलिए इसमें तिब्बत नहीं है.- भूगोल की किताब को फरफराता पलटता मास्टर कहता.
स्कूल जंगल के बीच था. वह एक बेहद दूर का स्कूल था. छत्तीसगढ के एक ऐसे गाँव का स्कूल जहाँ लाइट न थी, उन दिनों. वह गाँव बारिश के मौसम में सारी दुनिया से कट जाता. उस गाँव के रास्ते उफनाते नालों के भीतर समा जाते. उसके जंगल हरे-भरे होकर और फैल जाते. दो कमरों के उस स्कूल में जिसके बच्चे गाँव से खेत खलिहानों के रास्ते मेडों और पगडण्डियों से चलकर स्कूल पहुँचते थे, उस स्कूल का मास्टर स्कूल के कोर्स के बाहर की एक बात को पूरे मन से और हिदायत के साथ उन बच्चों को बताता रहता था- स्कूल का कोर्स ही क्या, दुनिया कि किसी भी किताब में हारे हुए मुल्कों का नाम नहीं मिलता. तुम्हें किसी भी किताब में हारे हुए मुल्कों के गीत और कहानियाँ नहीं मिलेंगी. तुम पूरा बाजार छान मारो, चाहे अंबिकापुर चले जाओ, चाहे उससे भी आगे रायपुर या दिल्ली, या उससे भी आगे,
तुम्हें भूगोल की एक किताब नहीं मिलेगी जिसमें दुनिया के मुल्कों की फेहरिस्त में तिब्बत का भी नाम लिखा हो. तुम बड़ी से बड़ी लाइब्रेरी में एक भी भूगोल की ऐसी किताब नहीं ढ़ूँढ़ सकते जिसमें लिखा हो कि तिब्बत भी एक मुल्क है और दूसरे मुल्कों की ही तरह उसकी अपनी राजधानी है, अपनी मुद्रा है. तुम भूगोल की एक किताब नहीं ला सकते जिसमें लिखा हो कि भारत की सबसे लंबी सरहद जिस मुल्क से मिलती है, उसका नाम तिब्बत है.- मास्टर न जाने क्या-क्या बताता रहा था. कहता रहता था. मास्टर एक बात कहता था जो बिल्कुल भी समझ न आती थी. वह कहता था कि हारने का मतलब सिर्फ हारना नहीं होता है, इसका मतलब होता है स्मृति में से मिटा दिया जाना... .
इन सब बातों का हम पर जो असर पडा वह कुछ इस तरह था कि हमें इस बात का अहसास हो गया था कि हमने जो कुछ ग्याल्त्सो के साथ किया था, उसे चिढाकर, उसका मजाक बनाकर, वह बेहद गलत था. हम उसे एक ऐसे नाम से चिढाते थे जो वह बरदाश्त न कर पाता था. हमने सचमुच किसी बुजुर्ग को चिढाने पर इस तरह रुआँसा होते न देखा था. जिससे यह लगता ही था कि कोई भारी भूल हमसे हुई थी. इस तरह हम यह मानने लगे कि हमने एक भारी गलती की है. ग्याल्त्सो का दिल दुखाकर हमने कोई ऐसा काम किया है जो बहुत गलत और नाकाबिले बरदाश्त है. कि हमें अपनी गलती का कुछ न कुछ प्रायश्चित तो करना ही चाहिए. जो तकलीफ हमने ग्याल्त्सो को पहुँचाई थी उसका प्रायश्चित. हमने सोचा कि हम कुछ ऐसा करें कि ग्याल्त्सो को अच्छा लगे. कोई ऐसा काम जिससे वह और मास्टर दोनों खुश हो सकें. पर ऐसा क्या कर सकते थे हम ? फिर हमारे एक दोस्त को एक तरकीब सूझी. यह तरकीब हम सबको अच्छी लगी.
पाँच
हम सब उस दोस्त की सुझाई तरकीब को मानने को तैय्यार हो गये थे. हम सबने अपनी-अपनी भूगोल की किताब में एक तब्दीली कर ली. किताब में एशिया के मुल्कों के नाम लिखे थे. इन मुल्कों की फेहरिस्त थी. फेहरिस्त जहाँ खत्म होती थी उसके नीचे जरा सी जगह थी. उस जगह हम सबने लिख दिया- देश- तिब्बत, राजधानी -ल्हासा. इस तरह हम सब की भूगोल की किताबों में एशिया के मुल्कों की फेहरिस्त के नीचे लिखा गया- देश -तिब्बत, राजधानी- ल्हासा. फिर हमने सारे दोस्तों की भूगोल की किताबें चैक कीं. हर किताब में लिख गया था- देश-तिब्बत, राजधानी--ल्हासा.
हम सबमें से एक लडका जो थोडा बोलने में माहिर था और मास्टर से जरा कम ही डरता था उससे हम सबने कहा कि वह मास्टर को बतलाये कि हम सबने भूगोल की हर किताब में लिख लिया है- देश -तिब्बत, राजधानी -ल्हासा. वह बताये कि ठीक है कि इस सरजमीं की भूगोल की किसी भी किताब में नहीं लिखा है- देश- तिब्बत, राजधानी- ल्हासा. ठीक है, कि तिब्बत ग्लोब में नहीं दीखता. भूगोल में जो एटलस होता है, उसमें वह अलग रंग से नहीं दर्शाया जाता है. दुनिया के नक्शों में उसमें कोई अल्हदा रंग नहीं भरा जाता. सब जानते हैं कि नहीं है तिब्बत दुनिया जहान के नक्शों में, अपनी सरहद के साथ कहीं भी. नहीं है देश-दुनिया में. चर्चा में भी नहीं है. वह जो तुम कहते हो मास्टर कि रोज के रेडियो में भी कोई खबर तिब्बत पर नहीं आती है. कि जो तुम्हारा दोस्त ग्याल्त्सो खोजता है, तिब्बत का वह नाम, रोज सुबह पेपरों में, पर वह जो उसे कभी मिलता नहीं. कि वह जो कहता है, उदास, कि तिब्बत पर कहीं कोई फिल्म नहीं देखी. ठीक है कि तुम्हारे मुताबिक तुम जो वह बताते हो कि यू.एन.ओ. की फेरिस्त में भी नहीं है तिब्बत. कहते हो कि नहीं है, ओलंपिक के झण्डाबरदार खिलाड़ियों की परेड में. नहीं है, डाक टिकटों में. कहीं नहीं, किसी मुल्क में नहीं तिब्बत का कोई राजदूत, कोई एम्बेसेडर. संसार में कहीं नहीं तिब्बत का कोई दफ्तर.... पर देखो यह हमारी किताबों में आ गया है. हम सबने लिखा है. हमारे कोर्स की भूगोल की किताबों में- देश-तिब्बत, राजधानी- ल्हासा. हर किताब में लिखा है. हर छात्र ने लिखा है. यह कोई छोटी बात तो नहीं है न मास्टर जी.
मास्टर ने हमारी किताबों में से एक दो किताबें देखीं. फिर बाकी किताबों को भी देखा. एक के बाद एक. हर किताब में लिखा था- देश -तिब्बत, राजधानी -ल्हासा. मास्टर कुछ कहना चाहता था. पता नहीं क्या तो. पर वह चुप ही रहा और चुपचाप हमारी भूगोल की किताबों को देखता रहा. बाद में यह लगा कि मास्टर भी यह मानता था कि किताबों में यह लिखा जाना-देश-तिब्बत, राजधानी- ल्हासा कोई छोटी बात नहीं है. यह ठीक है कि यह बच्चों ने खुद लिखा. कोई कह सकता है कि बच्चे मासूम होते हैं. पर यह भी तो सच है कि बच्चे सच्चे होते हैं. जो जी में आता है कर देते हैं. दिल में जो आता है कर गुजरते हैं. इसीलिए इस बात का मोल है कि उन्होंने लिख लिया- देश- तिब्बत, राजधानी - ल्हासा. हर बात के मायने हैं. हर अच्छे काम की अहमियत है. कोई काम इस वजह से तो कमतर नहीं हो जाता कि वह बच्चों ने किया. ऐसा वह कहता था.
एकाद बार उदास मन से उसने यह भी कहा था कि पता नहीं दुनिया को कभी यह पता भी चले या नहीं कि इस स्कूल में ऐसे बच्चे पढते थे जिन्होंने, सब बच्चों ने, एक साथ, अपनी-अपनी भूगोल की अपनी किताब में एशिया के मुल्कों की फेहरिस्त में यह लिख लिया था-देश -तिब्बत, राजधानी -ल्हासा. यह जगह जहाँ यह स्कूल है यह दुनिया से कितनी दूर है और यह कितना छोटा स्कूल है. इस गाँव, इस स्कूल के बारे में लोगों को पता ही नहीं है. इस तरह वे कहाँ यह जान पायेंगे कि स्कूल के सब बच्चों ने खुद-ब-खुद लिखा - देश -तिब्बत, राजधानी- ल्हासा. बिना इस परवाह के कि यह आउट ऑफ़ द कोर्स है. वे बस पश्चाताप करना चाहते हैं. ग्याल्त्सो को यह बताना चाहते हैं कि वे उसके साथ हैं. कि वे भी मानते हैं, जो वह और उसका मास्टर मानता है. पता नहीं कभी दुनिया के लोगों को यह बात पता भी चले या नहीं. मास्टर सोचता था. उसने बच्चों से कहा था- अगर कोई बडा काम किसी छोटी जगह पर हो जाये तो भी वह बडा काम ही होता है. भले कोई उसके बारे में कोई जाने या न जाने, इससे कोई फर्क नहीं पडता. वह एक बडा काम होता है. बच्चों तुमने जो यह काम किया यह बडी बात है. कोई याद रखे या न याद रखे. किसी को पता चले या न पता चले. कोई तरजीह दे या न दे. पर तुम अपनी पूरी जिंदगी याद रखना कि तुमने लिखा था अपनी भूगोल की किताब में, एशिया के देशों की फेहरिस्त में- देश- तिब्बत, राजधानी -ल्हासा. और यह तुमने किया क्योंकि तुम एक तिब्बती से माफी माँगना चाहते थे. यह बडी बात है. इसे सारी जिंदगी याद रखना. - कहता था मास्टर.
छह
बाद में मास्टर ने ग्याल्त्सो को इस बारे में बताया था. ग्याल्त्सो ने भी भूगोल की उन किताबों को पलटकर देखा था. वह पल भर को किताब में लिखे- देश-तिब्बत, राजधानी - ल्हासा को देखता रहा था. फिर मुस्कुराते हुए उसने बच्चों से कहा था - आज से हम सब दोस्त हुए. और दोस्त की पहली सलाह यह है कि यह जो तुमने लिखा- देश- तिब्बत, राजधानी- ल्हासा यह तो एक नेक बात है और जो मास्टर कहता है कि इसे याद रखना वह भी ठीक है पर इसे इम्तिहान के लिए याद मत करना. इम्तिहान में अगर तुमने एशिया के मुल्कों के नामों में तिब्बत का नाम लिख दिया तो तुम्हारे नंबर कट जायेंगे. इम्तेहान की तैय्यारी के हिसाब से हिंदोस्तान का कोई ऐसा पडोसी मुल्क नहीं है जिसका नाम तिब्बत हो. इम्तेहान के लिए यह तुम्हें याद रखना होगा. इस बार बोर्ड का इम्तेहान है और इस मामले में मास्टर भी तुम्हारी कोई मदद नहीं कर सकता- मुस्कुराते हुए ग्याल्त्सो ने कहा था. उसकी मुस्कान नकली लगती थी. उसके चेहरे पर दर्द की न जाने कौन सी लकीर थी और वह कहता था कि इम्तिहान के लिए इसे याद मत करना. सिर्फ जीवन के लिए इसे याद रखना. मास्टर भी ग्याल्त्सो की बात पर रजामंद था कि इम्तेहान और जीवन के लिए अलग-अलग बातें याद की जाती हैं. जो बात इम्तेहान के लिए याद की जाती है वह जीवन के लिए नहीं होती और जो बात जीवन के लिए याद की जाती है वह इम्तिहान के लिए नहीं होती. देश-तिब्बत, राजधानी- ल्हासा, एक ऐसी बात हुई जो जीवन के लिए याद की जानी है, इम्तेहान के लिए नहीं.
इस तरह ग्याल्त्सो से हमारी भी दोस्ती हुई थी. हमने उसे चीनी,चीनी कहकर चिढाना छोड दिया. स्कूल में जब भी वह आता हम में से कई उसे घेरकर खडे हो जाते. वह हमें दुनिया जहान के किस्से सुनाता. न जाने कहाँ-कहाँ की बातें. वह हमें अजीब-अजीब चीजों के बारे में बताता और हम उसे गौर से सुनते. वह बताता कि उसका गाँव ग्यान्त्से शहर के पास था. कि उसके पास एक सुंदर थांगका याने तिब्बतियन तस्वीर जैसा कुछ है. कि साल का पहला दिन लोजार होता है. कि उसने अनि त्सान्खुंग नुनेरी और चान्गझू के मंदिर देखे हैं. कि सबसे अच्छा गोम्पा जोखांग है और इसके बाद कुम्बुम और दोरजे द्रक. कि हम सब बच्चों को अच्छे हीरो, याने गेजार के माफिक होना चाहिए. कि.... फिर वह कहता कि मैनपाट में खूबसूरत झरने हैं. वहाँ एक जगह है उल्टा पानी. क्या तुम लोगों ने कभी उल्टा बहता पानी देखा है ? किसी नदी में जहाँ वह नीचे से ऊपर को बहता है. मैनपाट में है वह. उसे उल्टा पानी कहते हैं. - वह बताता, बताता कि वहाँ एक मंदिर है बुद्ध का मंदिर, इस इलाके का और दूर-दूर का ऐसा इकलौता बुद्ध का मंदिर.....फिर कहता- तुम सब एक दिन मैनपाट आओ, मैं तुम सबको मोमो खिलवाऊँगा, स्वादिष्ट मजेदार मोमो- वह कहता.
तुम्हारा नाम ग्याल्त्सो क्यों है ग्याल्त्सो ?’
उसी बच्चे ने पूछा जिसने सबसे पहले मास्टर को भूगोल की किताबों में लिखा हुआ- देश- तिब्बत, राजधानी- ल्हासा दिखाया था. जो मास्टर से बेखौफ अपनी बात कहता था.
‘जैसे हर नाम के मतलब होते हैं वैसे ही ग्याल्त्सो का भी मतलब है. ग्याल्त्सो माने समुद्र.’ ग्याल्त्सो ने बताया.
मास्टर अक्सर मैनपाट जाता ही रहता था. वह साईकिल से मैनपाट जाता था. इस तरह सबकी बातों से यह तय हुआ कि इस बार स्काउट की आउटिंग के लिए मैनपाट चलेंगे. सब चलेंगे. सारे बच्चे, मास्टर और गाइड वाली मास्टरनी. ग्याल्त्सो तो वहाँ मिलेगा ही. इस तरह हम सब साइकिलों से मैनपाट गये थे. सुबह चले और शाम को पहुँच गये.
सात
तो यह था ही कि बचपन में तिब्बत एक बात थी. एक पाठ था. पाठ जो कि आउट ऑफ़ द कोर्स था. पर जिस पर मास्टर बात करता था. जिस पर बात कर हर किसी को अच्छा लगता था. तिब्बत एक अनुमान था, अँधेरे में उँगलियों की टटोल था तिब्बत, मास्टर की उन बातों का जो कहीं खो जाती थीं, अचानक छूटकर खत्म हो जाती थीं. उन दिनों तिब्बत एक अनिवार्यता थी, मास्टर को सुनने की अनिवार्यता,जो मास्टर के डर से उस गाँव की उस क्लास में फैल जाती थी. तिब्बत का मतलब था भूगोल की किताबों में लिखा- देश -तिब्बत, राजधानी - ल्हासा - जिसके मार्फत ग्याल्त्सो से दोस्ती हुई, जिसके मार्फत मास्टर को लगता था कि उसके बच्चे दुनिया की सबसे जरुरी पढाई कर रहे हैं.
इस तरह उस दिन मास्टर हमें ग्याल्त्सो की वजह से ही मैनपाट आउटिंग के लिए ले गया था. ग्याल्त्सो से हम सब की दोस्ती के साथ ही कुछ और भी था जिसके लिए वह हम सबको मैनपाट ले आया था. इस काम में उसे गाइड वाली मास्टरनी की मदद की जरुरत भी थी. यह काम न होता तो हम फिर कभी मैनपाट जाते. पर काम इतना जरुरी था कि मास्टर ने जल्दी ही मैनपाट जाने की योजना बना ली थी. हमें बस इतना ही पता था, कि मास्टर को ग्याल्त्सो से कुछ बात करनी थी. और उस बात को करने के लिए वह सबसे पूछ रहा था कि वह, कब और कैसे उससे वह बात करे ? मास्टर की ग्याल्त्सो से दोस्ती बड़ी पुरानी थी, लगभग पंद्रह साल पुरानी और करीब दो दिन पहले से एक दूसरा तिब्बती उससे कहता फिर रहा था कि, वह ग्याल्त्सो से वह बात करे. कि वह उसका सबसे अच्छा दोस्त है. ग्याल्त्सो अकेला है. उसका कोई और है भी नहीं. इसलिए यह बात उसे ही ग्याल्त्सो से करनी चाहिए. बस वही वह बात कर सकता है. कि उसकी बात का असर होगा. कहते हैं बस वही बात मास्टर को ग्याल्त्सो से करनी थी. इसीलिए वह हम सबको अपने साथ मैनपाट ले आया था. ताकि ग्याल्त्सो से उसकी वह बात भी हो जाये और आउटिंग भी हो जाये.
उस रात जब मक्खन की चाय और बिस्कुट खाने के बाद हम सब सोने की तैयारी कर रहे थे, तब वह दूसरा तिब्बती आया था. फिर मास्टर, गाइड वाली मास्टरनी और वह तिब्बती काफी देर तक बात करते रहे. कमरे में पुआल बिछी थी और पुआल पर दरी पड़ी थी, हम सब दरी में अपने-अपने कंबलो में घुसे थे और वे तीनों लालटेन के किनारे बैठे बात कर रहे थे. उन दिनों मैनपाट में लाइट नहीं थी.
‘तुम्हें कब से पता है ?’
तरुण भटनागर
Friday, May 22, 2020
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| दिनेश मिश्र |
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| डॉ वनिता वाजपेयी |
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| पद्मनाभ |
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| बबिता गुप्ता |
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| शाहिद अली शाहिद |
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| ज्योति गजभिये |
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| सुधीर देशपांडे |
अनिल कुमार शर्मा कहँते है अगर मैं नहीं लिखता तो एक संवेदनशून्यता का अदृश्य हथियार मेरे भाव की मेरी अभिव्यक्ति की हत्या कर देता और मैं भी उस हत्या दोषी होता-
कविता एक भाव
जैसे ईश्वर व्याप्त है कण-कण मे , वैसे ही प्रकृति की हर शय में अपने समग्र सौंदर्य के साथ कविता बसी हुई है।
कवि की दृष्टि कहॉं और किस भाग पर पड़ी उसको कवि ने किस भाव के साथ आत्मसात किया और किस भाव से अंतर से शब्द निकल कर लिपि-बद्ध हुऐ या सिर्फ स्वर ही प्रस्फुटित हो सका ।
जो लिख नहीं सकता कविता वह जीव भी कहता है अपनी वेदना में अपने आनंद में .उमंग में गाता है ,पुचकारता है प्रपोज़ करता है
मोर के नाचने में कविता दिखती है एक लय व मात्रायें नजर आती है ,हर बालक के स्वर में चाहे व जानवर ,पक्षी किसी का हो एक लयबद्ध गान सुनाई देता है
गार्गी -उम्र दो साल -गाना एक लय
आ-आ-आ-आ आ-आ-आ-आ
ऊँ-ऊँ-ऊँ-ऊँ-ऊँ-ऊँ
कविता के उद्गम को पहचानना आसान नहीं ,वह अकारण भी आ सकती है और कारण के साथ तो लिख ही रहें हैं कवि लेखक ।
कविता बिखरी पड़ी है ब्रह्मांड में
दृष्टि व भाव के गेज में फ़िट होते ही स्वत: आमद होने लग जाते हैं शब्द और रच जातीं हैं कवितायें
मैने अपनी पुस्तक ‘पाने खोने के बीच कहीं ‘में कविता के बारे में कुछ ऐसे लिखा
विवशता
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दिल परेशान है इसलिये लिखता हूँ
मन पशेमान है इसलिये लिखता हूँ
तू मेरा मेहमान है इसलिये लिखता हूँ
शब्दों में जान है इसलिये लिखता हूँ
लेखनी जवान है इसलिये लिखता हूँ
मन विचारों की खान है इसलिये लिखता हूँ
ईश्वर मेहरबान है गुरु निगेहबान है
एक पहचान है इसलिये लिखता हूँ
न लिखने से लेखनी का अपमान है
इसलिये लिखता हूँ
एक अहसास है इसलिये लिखता हूँ
समय की मॉंग है सुलग चुकी आग है
अंतर में क्रदंन है कहीं कुछ बंधन है
ये ‘उसका ‘अभिनन्दन है
विचारों का मंथन है
इसलिये लिखता हूँ
अनिल कुमार शर्मा
अनिल कुमार शर्मा ,आगरा
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| अनिल कुमार शर्मा |
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