Monday, October 1, 2018

उपन्यासनामा: भाग सात 

ठीकरे की मंगनी 
नासिरा  शर्मा         



ठीकरे की मंगनी और एक अविस्मरणीय चरित्र महरूख

नासिरा जी मानवीय रिश्तों की सूक्ष्म पकड़ रखती हैं और वह अपने चरित्रों तथा परिस्थितियों के वर्णन के माध्यम से उसे प्रस्तुत भी ‘करती हैं। ‘ठीकरे की मंगनी’ हो या ‘शाल्मली’ फिर चाहे ‘जिंदा मुहावरे’ ही क्यों न हो रिश्तों को बनाये रखने में स्त्री के संघर्ष और समर्पण को रेखांकित करने में कहीं भी नहीं चूकती हैं। लेकिन रिश्तों के माध्यम से नाजायज फायदा उठाने की दरकार जब कोई करता है तो उनके स्त्री चरित्र अपने व्यक्तित्व की गरिमा और मानवीय व्यवहार के माघ्यम से उसे नाजायज फायदा उठाने से रोक देती हैं। ठीकरे की मंगनी’ लगभग इसी आधार पर लिखा गया उपन्यास है।
इस उपन्यास के माध्यम से लेखिका ने बताया है कि औरत का भी उसका अपना बजूद होता है समाज में पहचान होती है। उसकी मेहनत उसके सपनों का भी घर हो सकता है। जो केवल उसका अपना होता है। आज के जमाने की नई युवा पीढ़ी में ऐसी कई महरूख हैं जो केवल अपनी पहचान चाहती हैं और कुछ रफतमियां जैसे भी हैं जो केवल मानवीय रिश्तों को सफलता के शिखर तक जाने के लिए मात्र उन रिश्तों का उपयोग सीढ़ी के तौर पर करते हैं।

स्त्री पुरुष के पारस्परिक संबंध जितने सरल सहज स्वाभाविक दिखाई देते हैं उतने होते नहीं हैं। दोनो के बीच आकर्षण तो सामान्य रूप से मान लिया जाता है, लेकिन उसकी परिणति घोर अरूचि में कैसे हो जाती है। स्त्री-पुरुष को एक सूत्र में बांधे रखने के लिए ही विवाह नाम की संस्था बनी होगी। यह संस्था अनेक बुराइयों, दोषों, कमजोरियों के बावजूद आज तक चली आ रही है। 

    सदियों से चली आ रही विवाह प्रथा से विभिन्न समाजों के सदस्य इतने अनुकूलित हो गए हैं कि इसकी परिधि से परे बनाऐ जाने वाले संबंधों को ये किसी सूरत में हजम कर ही नहीं पाते। किसी लड़का-लड़की का समय रहते विवाह न होना, वैवाहिक जीवन का सफल न होना, विवाह विच्छेद होना, वैवाहिक प्रतिबद्धता का उलंघन  आदि कुछ ऐसी बातें हैं जो सभी समाजों में सामान्य हो चली हैं।


नासिरा जी ने अपनी कथा रचनाओं के माध्यम से हिन्दी साहित्य को अविसमरणीय स्त्री चरित्र दिए हैं। उनके चरित्र पाठक के मानस पर अपनी गहरी छाप छोड़ते हैं। महरूख एक ऐसा ही अविस्मरणीय चरित्र है जो स्त्री चरित्रों की परंपरा में सबसे अनूठा कहा जाये तो अतिशयोक्ति नहीं होगी

विवाह की एक प्रतीकात्मक घटना है जो इस उपन्यास की नायिका महरूख के जन्म के साथ ही घटित हुई थी। ‘‘खालिदा, आज से यह लड़की मेरी हुई।’’ कानपुर वाली खाला ने उसकी पैदाईश के फौरनवाद गन्दगी से भरे ठीकरे पर चांदी का चमचमाता रुपया फेंक कर कहा था। यह टोटके की रस्म थी, ताकि लड़की जी जाए, इसके ददिहाल में तो लड़कियाँ जीती ही न थीें। शाहिदा ने पैदा होते ही उसे गोद ले लिया था, मगर टोटके की रस्म सच पूछो, ‘ठीकरे की मंगनी’ में बदल डाली थी।’’1 

जैदी खानदान में चार पुश्तों के बाद अल्लाह की नेमत के रूप में लड़की पैदा हुई थी। इस लड़की का नाम रखा गया महरूख। ‘‘महरूख दादा की आंखों का नूर और दिल का सरूर थी। अम्मी और अब्बू की खुशी और गुरूर का नायाब तोहफ़ा, चचा और ताया के लिए एक रूहानी राहत का सामान और बाकी खानदान वालों के लिए एक इत्मीनान कि चलो खानदान पर से फ़क़ीर की दी बद्दुआ का साया तो हटा और हमें एक लड़की का मूँह देखना नसीब हुआ।’’2 








इस उपन्यास में महरूख के पैदा होने और उसके बाद खानदान में खुशियों और बधाइयों के जो स्वर सुनाई पड़े, उनसे नासिरा जी ने इस मिथक को तोड़ने की कोशिश की है कि लड़की का पैदा होना गौरव की बात है न कि अफसोस की। जैसा कि पूरी दुनिया में खास तौर पर भारत में यह भ्रम फैलाया गया है कि इस्लाम में और उसके अनुयायी स्त्री विरोधी होते हैं और स्त्रियों पर अत्याचार करना उनके लिए कोई शर्म की बात नहीं होती। नासिरा जी ने महरूख के जन्म से उसके जीवन के अन्तिम पढ़ाव तक की कहानी लिखकर इस भ्रम को तोड़ने की कोशिश की है।
लड़की के प्रति जो हिंसक और पर्दानशीं होने का मिथक गढ़ा गया वह इस्लाम के आगमन के बाद से ही संभव हुआ। इस उपन्यास के माध्यम से हम इस मिथक की हकीकत से भी दो चार होते हैं। ‘‘सच कहा है किसी ने, लड़की घर की बरकत होती है।’’ ‘‘रसूले खुदा का घर भी लड़की की रोशनी से मुनव्वर हुआ था, लड़कियाँ तो प्यार की बरकत होती हैं।’’....सच पूछो तो नगर की रौनक और दुनिया की आबादी इन्हीं के दम से है।’’3
दादा-पोती के संबंध - महरूख भी अपने दादा जान से बहुत प्यार करती है और दादा जान भी उस पर जान न्यौछावर करते हैं।
महरूख बचपन से ही अलग मिजाज की लड़की है। वह अन्दर से भावुक होते हुए भी बाहर से सुदृढ़ है। अपनी कमजोरी को अन्दर ही अन्दर पी जाना उसकी आदत है। उसके व्यक्तित्व की रेखाओं को इस तरह उकेरा गया है - ‘‘रोना उसकी शान के खिलाफ था। वह हुक्म देना जानती थी। बात मनवाना जानती थी। वह तो दिलो पर हुकूमत करती थी और हुकम्रां कभी रोते नहीं है। दादी ने इस हुकक्मरां की अकड़ को प्यार से सहला-सहलाकर एक नाजुक लड़की में बदलना शुरू कर दिया था।’’4 

हमारा समाज एक लड़की को हुक्मरां के रूप में स्वीकार नहीं कर सकता। न घर के बड़े बूढ़े न आस-पड़ौस के लोग। इसीलिए महरूख की दादी ने उसे एक लड़की बनाने का कार्य प्रारंभ कर दिया था। यह वह प्रक्रिया है जिसके तहत सिमोन द बोऊवार ने कहा था कि ‘‘औरत पैदा नहीं होती बनाई जाती है।’’ चाचा और आस-पड़ौस ने महरूख के उठने-बैठने पर चलने-फिरने पर शिकायतें करनी प्रारभं कर दीं। उसका गली मोहल्ले में लड़कों के साथ खेलना भी लोगों को पंसद नहीं आता और उसकी दादी और अम्मी को उसकी इन गतिविधियों को रोकने के लिए कहा जाता। उसके घर से बाहर निकलने पर पाबंदी लगा दी गईं।

‘‘महरूख पर लगी पाबन्दियाँ उसकी उम्र के साथ बढ़ती गईं। महरूख के बालिग हो जाने के पहले नहान के बाद, जब उसकी गोद तरह-तरह के फलों से भरी गई और लाल दुपट्टे उसको सजाया गया, तो उसके अन्दर एक ऐसी लड़की का जन्म हुआ, जो झिझकना, शरमाना जान गई थी, जो काढ़ना, बुनना और पकाना सीखना चाहती थी, जो दूसरों के दुख पर उदास हो जाती थी।’’5  

महरूख की मंगनी रफ़त से हुई थी। जब उसके अब्बू न निकाह की बात की तो रफत भाई ने लड़की को आगे पढ़ाने के लिएक कहाँ चूँकि रफत भाई कम्यूनिस्ट विचारधारा के हैं इसलिए वे कुछ प्रगतिशील बातों में विश्वास करते हैं। उन्होंने महरूख का दिल्ली में पढ़ाने का प्रस्ताव रखा। महरूख रफत मियां के साथ दिल्ली जाती है पढ़ने। यह एसका अपने घर से बाहर दुनिया से जुड़ने का अवसर था। उसकी अम्मी उसके पढ़ने के पक्ष में थीें। ‘‘मगर तालीम से समझ तो बढ़ी, अपना हक तो पहचाना-गलत तेजी की तरफदार तो मैं भी नहीं हूँ, मगर लड़की अपना अच्छा बुरा समझे यह अक्ल तो तालीम इी दे सकती है।’’6  

इस तरह अम्मी के यह प्रगतिशील विचारों ने महरूख को सही गलत के बीच चुनने की तालीम, निर्णय करने की क्षमता के विकास के लिए आगे पढ़ने भेजने का निर्णय लिया। उसकी दादी भी सुलझे विचारों की हैं और उसकी माँ को सांत्वना देते हुए कहती हैं कि -ग ‘‘वह जमाना कब का लद चुका है, जब औरत नए-नए पकवान बनाकर, ससुराल वालों की खिदमत करके मियां का दिल जीतती थीं, आज तो उसे इन सबके साथ बाहरी दुनिया में भी अपने पैर जमाने हैं। घर-बाहर दोनों जह अपनी खूबी का सिक्का जमाना होता है, फिर पढ़ी-लिखी लड़कियाँ किसी पर बोझ बनकर नहीं रहतीं, बल्कि गिरे वक्त में घर को मर्द की तरह संभालती हैं।’’7

दादी के यह विचार स्त्री विमर्श के संबंध में एकदम उचित हैं। हमारे समाज और परिवार को लड़कियों के संबंध में इसी तरह के दृष्टिकोण और विचारों का अपनाने की आवश्यकता है। रफत भाई और उसके परिवार के लोगों के यह विचार समाज के विचार बनें। नासिरा जी ने उन्हें इसी रूप में प्रस्तुत किया है। पितृसत्ता के विभिन्न रूपांे को यहाँ उदारकृत और मानवीय भूमि पर पेश किया गया है। यद्यपि वे अपने मूल रूप में पितृसत्तात्मक व्यवस्था के प्रतीक ही हैं।

महरूख विवाह के संबंध में सोचती है कि ‘‘हर औरत को शादी के बाद अपने का मिटाकर अपने वजूद को शौहर के वजूद में मिलाना पड़ता है। पता नहीे अम्मी शादी के पहले कैसी आदतों की होंगी! फिर क्यों हमसे कहा जाता है कि इस तरह रहना चाहिए, यह हमारे घर का रिवाज है और फिर एक दिन सब कुछ छोड़ कर अपने को नए सांचे में ढालना पड़ता है। आखिर क्यों?’’8 

यहाँ महरूख एक महत्वपूर्ण सवाल उठा रही है? कि जब विवाह के बाद लड़की को ससुराल के रीति-रिवाज की अपनाने हैं, अपनी पहचान और वजूद को शौहर की पहचान और वजूद में क्यों मिलाना पढ़ता है? और जब मिलाना ही है तो उन्हें मायके के रीति-रिवाज और परंपरायें सीखने को क्यों कहा जाता है? इस सवाल का जबाव यह हो सकता है कि मायके में रीति-रिवाजों को अपनाने के लिए इसलिए कहा जाता है ताकि उसे रीति-रिवाज अपनाने की आदत पढ़ जाए। यह आदत उसे ससुराल में भी वहाँ की रीति-रिवाजों और परंपराओं को स्वीकारने में सहयोग देती है। इससे लड़की में विद्रोह की आग नहीं सुलगपाती है। वह सर झुकाकर नए परिवेश में अपने वजूद को विलीन कर देती है। यही पितृसत्तात्मक व्यवस्था की सुक्ष्म तकनीक है जो लड़की को लड़की बनाय रखने के लिए इस्तेमाल करती है।
दिल्ली में पढ़ते हुए उसकी दोस्ती रवि से होती है। कुछ ही समय में वह रवि के साथ कभी-कभी दिल्ली घूमने निकल जाती थी। एक शाम रवि के कमरे में दोनों काफी पी रहे थे। इसी बीच जब रवि ने उसे अपनी बांहों में भर लिया तो महरूख को गहरा सदमा लगा। रवि ने उसे इतने हल्के किरदार की लड़की कैसे समझ लिया। रवि एक मर्द है और वह औरत के साथ दोस्ती को इसी रूप में लेता है और जो महरूख जैसी औरत उसके काबू में न आये तो उसे लगता है कि वे नाम के लिए आधुनिक हैं, दरअसल तो वे उन्हीं पुरानें ख्यालातों की हैं, तभी तो वह कहता है ‘‘मिस जैदी, केवल ऊपरी आवरण के बदल लेने से मनुष्य का आंतरिक रूप नहीं बदल जाता है। आधुनिकता का तो नाटक है, वरना रूढ़िवादिता तो लोगों के हावभाव से टपकती है।’’9

एक अकेली लड़की को मर्दवादी विचारधारा हमेशा ही गर्मगोश्त के रूप में देखती रही है, तमाम प्रगतिशील विचारों को अपनाते हुए भी। महरूख को रवि की यह बात बहुत चुभती है ‘‘ रह रह कर एक बात मन को मथती रही कि यदि दो लड़कों की मित्रता इस स्तर पर होती, तो क्या वह भी इस नतीजे पर जा पहुँचती, फिर लड़की के साथ दोस्ती का मानवीय सन्दर्भ अपने अर्थ क्यों खोने लगता है और एक बंधे-बंधाए रास्ते पर चल पड़ता है? उसे हैरत होती कि इस विश्वविद्यालय में भी औरत को देखने वाली नजरों का वही पुराना दृष्टिकोण है, तो फिर वह किस अर्थ में अपने को स्वतंत्र, प्रगतिशील और शिक्षित कहते हैं? उसके किसी सवाल का जबाव इस माहौल ने नहीं दिया। यहाँ तो सिर्फ सवालों की फसल उगती है, सिर्फ सवालों की।’’10 

महरूख के जीवन की दिशा परिवार और दिल्ली के इस प्रवास के बाद ही तय होती है। इस माहौल में ही उसे स्त्री होने का बोध होता है और यह भी कि दिल्ली का विश्वविद्यालय परिसर हो या गाँव की गलियाँ सभी जगह औरत को यौनिकता के संदर्भ में ही देखा जाता है। उसे उपभोग की वस्तु के रूप में ही देखा जाता है और उसी तरह का व्यवहार उसके साथ किया जाता है।
महरूख ने अपने व्यक्तित्व को इस माहौल के खिलाफ एक मानवीय संदर्भ में देखे और समझे जाने के रूप में डाला और पितृसत्ता के विभिन्न रूपों के समक्ष पेश किया। ‘‘महरूख के दिल में एक बात कील की तरह गड़ गई थी कि अब उसे अपने को ऊपर से भी ऐसा ही बनाना है, जैसी वह अन्दर से है, जो महरूख तो हो, मगर साथ इस माहौल की चुनौतियाँ का सामना करने के लिए सीना तानकर खड़ी हो सके, आते हुए तीरों को कुन्द कर सके और अपने ढाल जैसे व्यक्तित्व पर उसका निशान तक पड़ने न दे।’’11 







पितृसत्ता की भूमिकाओं से इंकार - और अन्ततः महरूख ने स्वयं को चुनौतियाँ का सामना करने के लिए तैयार कर ही लिया और उसने निकाह करने से इंकार कर दिया और एक गाँव में बच्चों को पढ़ाने का गुरूतर भार ग्रहण कर लिया। यह उसने अपने विवेक पूर्वक विकल्प का चयन किया है। दुनिया और परिवार के दबावों के आगे झुकी नहीं। अपने लिए गए निर्णय पर साहस पूर्वक, संकल्प सहित चलती रही। रास्ते मंे आने वाली चुनौतियों का भी सामना किया और अपना संतुलन भी नहीं खोया। न तो उसे अपने निर्णय पर अफसोस है और न जिंदगी से कोई गिला-शिकवा। एक बार वापस आने के बाद जब खानदानी मकान बिक जाता है तो वह पुनः अपने उसी गाँव लौट जाती है।
महरूख निरंतर पितृसत्तात्मक व्यवस्था द्वारा दी गई भूमिकाओं और परंपराओं से टकराती रही। उनको नकारती रही, नए सिरे से सोचने के लिए विवश करती रही और स्वयं अपने जीवन में उनकी भूमिकाओं का नकारती रही। नए विचारों को अपनाना, और आधुनिकता की आड़ में स्वच्छन्दता को जीने का रास्ता जो रवि जैसे अधिकांश युवा अपना लेते हैं, उसने नहीं अपनाया। उसने एक कठिन और बीहड़ राह चुनी, दिल्ली जैसे महानगर और विश्वविद्यालय से पढ़कर प्रगतिशील से प्रगतिशील व्यक्ति भी गाँव की राह नहीं पकड़ता, विदेश का रास्ता तलाशता है, जैसा कि रफत भाई, परन्तु महरूख के माध्यम से नासिरा जी ने नई पीढ़ी और खास कर ‘स्त्री’ को यह दिशा दी है कि प्रगतिशीलता और स्वयं की मुक्ति का रास्ता इधर से जाता है।
ठीक ऐसा ही निर्णय कठगुलाब की स्मिता और असीमा करती हैं। दोनों चरित्रों की सोच की समानता को देखा जा सकता है।
उसके विरोध के स्वर को इन शब्दों में देखा जा सकता है ‘‘यह क्या बात हुई, अम्मी, जो होता चला आया है, वह क्यों होता चला जाएगा? पहले और आज की जरूरतों में बहुत फ़र्क है। यह बात हमें समझनी पडे़गी।’’12  

महरूख वर्तमान जीवन की आवश्यकताओं को पहले देखती है और परंपरा निर्वाह के नाम पर पैसे लुटाना उसे पसंद नहीं। वह अपनी अम्मी अब्बु से घर की हालात का वास्ता देती है और उसे सुधारने की बात कहती हैं।
महरूख की जिन्दगी का रुख रफत मियां के अमेरिका जाने के बाद से बदलता है। उसे खबर मिलती है कि रफत मियां वहाँ किसर वैलरी नामक अमेरिकन युवती के साथ ‘लिविंग टु-गेदर’ जैसी जिंदगी गुजार रहे हैं तो उसका पुरुष पर निर्भरता का भ्रम चकनाचूर हो गया। ‘‘रफत भाई के व्यक्तित्व का फानूस टूटना था सो टूट गया। उससे फूटती फैलती रोशनी के दायरे से वह हमेशा के लिए आजाद हो गई थी, मगर जिस अंधेरे से वह जा लगी थी, उसने जिंदगी का मकसद ही खत्म कर दिया था।’’13 

‘‘ (उसे) महसूस हुआ, दुनिया का हर रिश्ता झूठा है। एतबार नामकी चीज का कोई वजूद इन्सानी रिश्तों के बीच अब बाकी नहीं बचा है।’’14 

‘‘आज उसे महसूस हो रहा था कि इन्सानी रिश्ते भी कागज की नाव की तरह होते हैं, जो सारी एहतियात के बाद हालात के समन्दर में डूब जाते हैं।’’15 

‘‘हवाई किले की सैर से महरूख लौट आई थी। अब उसकी समझ में यह बात आ गई थी कि वह रफत भाई के दिल व दिमाग में कभी नहीं थी। वह तो रिश्ते के नाम पर एक पोस्टर थी, एक नारा थी, जिसे रफत भाई समाज की दीवार पर चिपका कर अपनी पहचान का झण्डा ऊँचा रखना चाहते थे, वरना वह महरूख का हक किसी और औरत को क्यों दे बैठते? उसके दिल में बगावत के तूफान उठने लगते। गम के बादल छंट गए थे। अब वहाँ नफरत और हिकारत का आसमान फैला हुआ था, जो महरूख को बताता कि सबने उसे छला है, कभी प्यार के नाम पर, कभी जिम्मेदारी के नाम पर, कभी रिश्तेदारी के नाम पर।’’16

  पितृसत्तात्मक समाज में एक स्त्री को कितनी तरह से ठगा जाता है, महरूख का यह अनुभव हमें बताता है। इसी अनुभव से गुजर कर महरूख को एक नई दिशा की खोज करनी पड़ी और वह सारे रिश्तों को धत्ता बताते हुए अपने लिए नई जमीन बनाने में जुट गई। उसने पुरुष पर निर्भरता के सारे लबादे फेंक दिए और बिना किसी पुरुष की सहायता के अकेले ही अपनी पहचान बनाने में और अपने वजूद को कायम रखने में किस तरह कामयाब हुई इसकी कहानी है महरूख का जीवन संघर्ष।

उसे पांच हजार की आबादी वाले गाँव में, अपने अस्तित्व की लड़ाई किस तरह लड़नी पड़ी यह वही जानती है, क्योंकि हमारा परंपरागत सोच वाला समाज यह बात सहज रूप से पचा नहीं पाता कि एक पढ़ी लिखी सुंदर लड़की अकेली छोटे-से गांव में नौकरी क्यों कर रही है? ‘‘महरूख गाँव के मुसलमानों के लिए एक ‘राज’ थी और बाकी लोगों के लिए एक पहेली। ऐसी पाक साफ, निखर लड़की, जिसके दामन पर नमाज पढ़ी जा सकती हो, वह इतनी तन्हा, अलग-थलग क्यों रहती है? एक साल तक यह सवाल पूरे गाँव में नाचा, मगर जब कोई जबाव न मिला, तो थक हार कर सवाल खुद महरूख की तारीफ में ढल गया।’’17 

संबंधों में विखराव और पारिवारिक विघटन - महरूख के जीवन में परिवार बसने से पहले ही विघटित हो चुका है। उसके संबंध जो ठीकरे की मंगनी के टोटके से बचपन से ही बंध गए थे, वे जब वाकई बंधने का अवसर आया तो समाप्त हो चुके थे। संबंधों में विखराव समय की मांग थी या रफत भाई की आवश्यकता ताकि वह अपने को बडा  बना सके, महरूख को सीढ़ी बनाकर वह आसमान की सैर करना चाहता था तो उसने किया। महरूख ने इस विखराव को अपनी ताकत बनाकर एक नए जीवन को चुनाव किया। दिल में कसक तो जिंदगी भर बनी रही, परन्तु वह टूटी नही, विखरी नहीं, स्वयं को जलते तवे पर खड़ा रखकर भी जिंदगी का संतुलन बनाए रखा।
महरूख एक विचारशील लड़की है। वह इंसानी रिश्तों और खून के रिश्तों और सामाजिक रिश्तों के बारे में खुले दिल और दिमाग से सोचती है। उसे यह भी समझ में आता है कि इंसानी रिश्तो अन्य रिश्तों से ज्यादा ताकतवर होते हैं, सफल होते हैं।

‘‘अपनी जिंदगी जीता तो अकेला इंसान है, मगर उसकी जिंदगी में कितने लोग जुड़े होते हैं! कितने रिश्ते बंधते हैं, जो हालात् को बनाते-बिगाड़ते हुए चाहे-अनचाहे उस इन्सान की किस्मत का फैसला भी करते हैं और इन सबसे जुड़े रहने के बावजूद इन्सान को अपनी निजी जिंदगी की सलीब खुद उठानी पड़ती है, अपनी जिन्दगी का जबावदेह होना पड़ता है।’’18 

‘‘इन्सानी रिश्ते कभी कभी खून के रिश्तों से ज्यादा सुख देते हैं।’’19

महरूख ने अपनी जिंदगी को समाज के निचले तबके के लोगों को जीवन के अधिकारों की लड़ाई लड़ने का तरीका सिखाने का बीड़ा उठाया है और इसके लिए उसे आरोप-प्रत्यारोप भी सहने पड़ने थे।
महरूख का असली द्वंद्व और संघर्ष उस वक्त प्रारंभ होता है जब रफत भाई अमेरिका से डिग्री लेकर बिना मेंम के लौट आये थे। अब लोगों का भी और रफत भाई का भी ख्याल था कि महरूख को उनसे निकाह कर लेना चाहिए। जब रफत भाई ने पूछा कि ‘‘तुम खुश तो हो ना?....मेरी खुशी से क्या बनना बिगड़ना है।’’ ...किसी का मंगेतर डॉक्टरेट की डिग्री लेकर आये, तो क्या खुशी की बात नहीं है? रफत ने लहजे में दुलार-भर कर पूछा। ....‘‘किसका मंगेतर और कैसी खुशी, रफत भाई?’’20

 यह जो महरूख का जबाव है यह उसके साहस और स्वतंत्र व्यक्तित्व की गरिमा से ओत-प्रोत है। यहाँ उसके आत्मनिर्णय और स्वतंत्र व्यक्तित्व का झलक मिलती है। उसने रफत की मजबूरी बताये जाने के बाद कहा कि ‘‘डिग्री आपको मुबारक हो, मगर मैं तो इन ख्वाहिशों के बंधन से कब की आजाद हो चुकी हूँ।’’21 

यह आजादी की घोषणा उसके अन्दर से व्यक्तित्व के गौरव और आत्मविश्वास की आवाज है। वरना आज की कौन लड़की इस तरह का जबाव दे सकती है। इसके बाद रफत कहते हैं कि मेरा सहारा मिलेगा तो तुम्हें आसानी होगी। पितृसत्ता अपना जाल फेंकती है। पुनः लाभ-लालच और भय का जाल फेंकती है, कैसे भी कोई लड़की बिना उसके सहारे कैसे विकास कर ले कैसे अपना अस्तित्व बना ले।
महरूख का रफत भाई को जबाव है - ‘‘रहम खाइये, रफत भाई, मुझ पर रहम खाइए। मुझे फिर तराशने और चमकाने की जिम्मेदारी मत लीजिए। मुझे फिर एक खूबसूरत जिंदगी का भुलावा मत दीजिए। मेरा सुकुन मत छीनिये। मैंने बड़ी मुश्किलों से दोबारा इसे पाया है।’’22 

महरूख का स्वयं को किसी चीज या वस्तु की तरह देखे जाने का तीव्र विरोध किया। जब रफत कहते हैं कि मैं तो सोचता था कि जैसे मैं तुम्हें महकता हुआ छोड़ गया था, वैसा ही लौट कर पाऊँगा। तो महरूख कहती है ‘‘मैं जगह, चीज या मकान नहीं थी, रफत भाई, जो वैसी की वैसी ही रहती। मैं इन्सान थी, कमजोरियों का पुतला। मैंने आपको जिस भरोसे से भेजा था, आप भी वैसे कहाँ रह पाए? कुछ चीजें कितनी बेआवाज टूटती हैं। मैं बेआवाज टूटी थी, किरच-किरच होकर बिखरी थी। बड़ी मुश्किल से अपने को चुना है, समेटा है, जोड़ा है, तब कहीं जीने के काबिल हुई हूँ। मुझसे अब मेरी यह जिन्दगी वापस मत छीनिये।’’23 

पुरुष हमेशा ही औरत के विरोध को उसके पीछे छिपे मानवीय पहचान के दर्द को गुस्से या क्षणिक आवेग का नाम देकर उपेक्षित करता है। महरूख भी यह समझती है, तभी तो वह कहती है ‘‘मेरे जज्बात को सिर्फ गुस्से का नाम देकर इसकी अहमियत कम मत करिए। यह सब कुछ हमारी जिन्दगी की हकीकत है, जिसने हमें तोड़ कर अलग कर दिया है।’’24 

जब रफत भाई कहते हैं कि क्या अब तुम्हारी जिंदगी पर मेरा कोई हक नही तो महरूख का जबाव है - ‘‘अब मेरे पास समझ है।  मैं अपना बुरा-भला खुद समझ सकती हूँ। ठोस जमीन पर ठोस जिन्दगी चाहती हूँ। मेरी जिन्दगी पर सिर्फ मेरा हक है।’’25 
यह एक ब्रह्म वाक्य महरूख ने बोला है कि मेरी जिन्दगी पर सिर्फ और सिर्फ मेरा हक है। इस वाक्य के पीछे पूरा स्त्री विमर्श का स्वरूप और सिद्धांत खड़ा है। स्त्री की जिंदगी पर से स्त्री का हक छीनने का ही तो पूरा षड्यंत्र पितृसत्ता ने रचा रखा है। यह बात कह कर महरूख ने स्त्री की आवाज को समाज के सामने पेश किया है।
स्त्री के आँसू उसके वजूद के सबसे बड़े दुश्मन होते हैं। पुरुष उसकी इस भावुकता और कमजोरी का फायदा उठाता है। यही कारण है कि महरूख रफत भाई के सामने स्वयं को कमजोर नहीं पढ़ने देती और सोचती है - ‘‘वह रफत भाई के सामने रो कर अपने को छोटा नहीं करेगीं वह अपनी कमजोरी को यूँ रुसवा नहीं करेगी। वह एक बूंद आँसू किसी के सामने नहीं गिरने देगी।’’26 

महरूख को अपने निर्णय और जिंदगी पर भरोसा है। वह अपने निर्णय पर शर्मिंदा  नहीं है। तभी तो वह अपने अब्बू से कहती है ‘‘अब्बू, मैं अपनी मौजूदा जिन्दगी से पूरी तरह मुतमईन हूँ।’’27 

महरूख भी स्कूल को अपना जीवन लक्ष्य बनाती है। चाक में सारंग स्कूल और सकूल मास्टर के लिए सब कुछ दांव पर लगाती है। कठगुलाब की स्मिता और असीमा गाँव को अपना कर्मक्षेत्र चुनती हैं।
महरूख अपनी नौकरी को अपना सब कुछ बना लेती है और सोचती है कि ‘‘घर का मतलब अगर ईंट, गारे पत्थर की चहारदीवारी होता है और शौहर का मतलब जिन्दगी की बुनियादी जरूरतों का जरिया, तो फिर वे दोनों चीजें मेरे पास मौजूद हैं। यह दीवारें और नौकरी जो मेरा सहारा है।’’28 

महरूख का यह सोचना भी पितृसत्ता के उस विचार को धराशायी करना है जिसके तहत स्त्री को घर की सुरक्षा और अस्मिता और पेट की बुनयादी आवश्यकताओं की संरक्षा के लिए पुरुष पर निर्भर बनाया गया था। उसके पास नौकरी है अर्थात् वह इन दोनों चीजों की  जरूरत पूरी कर लेती है। अतः उसे पुरुष और उसके द्वारा दी गई सुरक्षा की आवश्यकता नहीं है।






महरूख ने पुरुष पर निर्भरता के खिलाफ स्वयं को खड़ा किया है, पुरुष के खिलाफ नहीं और न ही उसके मन में मर्द के खिलाफ नफरत का जहर है जैसा कि असीमा और स्मिता (कठगुलाब, और आवां) के मन में है। जब रफत भाई उससे कहते हैं कि ‘‘क्या तुम्हारे मन में मर्द के लिए नफ़रत पैदा हो गई है?’’....है तो उसका जबाव है कि ‘‘नहीं बिल्कुल, नहीं, औरत की जिन्दगी के सारे करीबी व ज़जवाती रिश्ते मर्द से ही होते हैं। बाप, भाई, शौहर, बेटा जैसी अहमियत को नकार कर औरत कहाँ जायेगी, रफत भाई? सवाल मर्द से नफरत का नहीं है, बल्कि सवाल यह उठता है कि मैं आपके ख्वाबों में बसे घर की मालकिन बन सकती हूँ या नहीं? मुझे लगता है, यह नामुमिकन है।’’29  

यह सवाल औरत को औरत के नजरिये से देखने की मांग करता है। यह सवाल औरत ने स्वयं खड़ा किया है और स्वयं इसका जबाव दिया है। यह स्त्री के द्वारा स्त्री की भूमिका को स्वीकारना है और अपनी भूमिका को स्वयं चुनना है। यह चुनाव उसे अलग व्यक्तित्व देता है। स्वतंत्र व्यक्तित्व, पुरुष के द्वारा दी गई भूमिका के बिना बना उसका अस्तित्व और उसकी पहचान।
महरूख के लिए स्त्री पुरुष के संबंध एक अलग ही विचार पर केन्द्रित हैं। सामान्यतया जो सोचा जाता है जो आधार और आवश्यकता पितृसत्ता ने बना रखी है, महरूख के लिए वे वही नहीं है। वह रफत भाई से कहती है ‘‘क्या बताऊँ रफत भाई? आप तो खुद रिश्तों की गहराई और फैलाव का समझते हैं। कुछ के लिए रिश्ते महदूद होते हैं और उसका इजहार कभी बलात्कार, कभी झुंझलाहट और कभी तरस और नफरत, तो कभी नस्ल की बढोत्तरी होता है, मगर एक और नजरिया रखने वाले के लिए यह मर्द-औरत के ताल्लुक का सबसे खूबसूरत इजहार है। मेरी नजर में जहाँ दिल और दिमाग मिलते हैं वहीं अपनी खुदी देने की ख्वाहिश उभरती है और उस खुदी को, उस नफ्स को कोई कैसे दे सकता है, जब तक...?30

महरूख ने रफत भाई के सामने बहुत स्पष्ट शब्दों में यह बात रख दी की आपने जो घर का ख्वाब देखा था उसे पूरा करने के लिए आप विवाह कर लें। इसके साथ यह भी कि अब यह आवश्यक नहीं की जो ख्वाब आपने देखा है वही मेरा भी हो और मैं उसे ही अपनी हकीकत बनाऊँ। ‘‘मेरे पास कोई ख्वाब आपको लेकर या जिन्दगी को लेकर नहीं है, जो कुछ मेरा है, उसे जो भी कह लें, ख्वाब या हकीकत वह यह गाँव है, यहाँ के लोग हैं, यह नौकरी, जो मेरी पहचान है, जो मेरा भविष्य और वर्तमान है।’’31

महरूख ने पितृसत्ता का यह अहं तोड़ दिया कि स्त्री की पहचान बनाने का काम वही करती है - ‘‘मैं ही तो उसे बनाने वाला हूँ। अगर न ले आता दिल्ली, तो क्या वह आज इतनी समझदार और खुले दिमाग की मालिक बन सकती थी?’’32 
महरूख ने रफत भाई से अपने विवाह होने से इंकार कर दिया। विवाह के बंधन और पति के साथ घिसटते रहने से उसने इंकार कर दिया। उसने अपनी जिंदगी का लक्ष्य आम आदमी के साथ चलना तय किया न कि पूँजीवादी विकास की रफ्तार में दौड़ना। ‘‘आपको बहुत आगे जाना है और मुझे एक जगह ठहरकर बहुत लोगों के साथ चलना है।’’33
वह विवाह को एक समझौते के रूप में जीने से इंकार करती है। क्योंकि वह मानवीय संबंधों को दिलो दिमाग से जीना चाहती है। ‘‘यदि रिश्ता बना भी तो बस वह एक समझौता होगा, फिर कुछ दिन बाद रफत भाई अपने रेस के मैदान में उतर जायेंगे, फिर नई रफ्तार, नई चुनौतियाँ, नई स्कीमें उन्हें उकसायेंगी और वह उनसे इंकार नहीं कर पायेंगे। तब वह उनकी बीबी होगी। उनके साथ घिसटते हुए ही सही दौड़ना तो पडे़गा और उस दौड़ के बीच वह कहीं...? ऐसी जिंदगी वह अब नहीे जी सकती है। कोई मजबूरी, कोई मुसीबत नहीे आन पड़ी है उस पर जो वह सर झुका कर इस समझौते पर हस्ताक्षर कर दे।’’34

 मर्दों की दुनिया में मर्दोे के सामने उनके द्वारा लिए गए निर्णय से इंकार करके अपना निर्णय सुनाने का साहस महरूख दिखाती है। जब रफत भाई यह कहते हैं कि उसकी जिंदगी में यदि कोई और है तो वह रास्ते से हट जायेंगे तो महरूख कहती है ‘‘आखिरी बार मैं सबके सामने, खासकर अब्बू मैं आपसे कह रही हूँ कि रफत भाई मेरे बड़े भाई हैं। मैं उनको अपने बुजुर्ग की तरह देखती हूँ, बस! चेहरे की तमतमाहट, आँखों से टपकता फैसला खड़े होने का अन्दाज और आवाज में आत्मविश्वास, इन सबने पल भर में ही मसले को हल कर दिया था।’’35  

पितृसत्तात्मक व्यवस्था की सच्चाई बताते हुए ताई जी कहती हैं -‘‘मर्द सौ गलती करें, तो उन्हें माफी, औरत एक करे तो उसके लिए पिस्तौल तैयार है। कभी सुना है कोई मर्द औरत के नाम पर बैठा रहा हो, मगर औरत एक मर्द के नाम पर जिन्दगी तज देती है। सारी जिन्दगी उसी के नाम की माला जपती रहती है। जमाना कभी नहीं बदलेगा। औरत मर-मर कर जियेगी, चुप रह-रह कर सहेगी। (माई, गीतांजली श्री)’’36

इस पूरी घटना में सबसे महत्वपूर्ण बात जो हुई, वह यह कि एक औरत ने मर्द को ठुकरा दिया। पितृसत्तात्मक व्यवस्था में एक टूटन दिखाई दी। ‘‘परंपरागत खानदान के लिए यह हादसा जितना शर्मनाक था, उतना हैरतअंगेज भी कि औरत मर्द को ठुकरा दे? गम की परतों और फिक्र की घटनाओं के बीच कहीं इस बात का दबा-दबा गुरूर भी था।’’37






क्या आज का स्त्री विमर्श और उसके पैरोकार इस गुरूर को गुरूर बनाकर जी सकते हैं? शायद नहीं, अधिकांश स्त्रियाँ महरूख जैसी औरत को ही दोषी और कुलच्छनी कहेंगी।
महरूख ने अपने अंदर की लड़की को, स्त्री चेतना को खोज लिया है, पा लिया है और वह उसकी सबसे बड़ी उपलब्धी है। इसके साथ ही वह यह भी समझ गई कि मुझे जो निरंतर औरत बनाया जा रहा था, एक परंपरागत स्त्री के रूप में ढाला जा रहा था, उसने उससे अलग अपने वजूद को पा लिया है, अब वह उसक दांव पर नहीं लगा सकती।
‘‘महरूख कमरे में विस्तर पर औंधी पड़ी सोच रही थी कि जिस महरूख को पूरा खानदान बचपन से मुझ पर लादता आया था, वह महरूख मैं नहीं थी। मुझे सांस ही कब किसी ने लेने दी, जो मैं अपने अंदर छिपी लड़की को ढूंढती, समझती, पाती और पहचानती। आज जब मैंने अपने को पहचान लिया है, तो उस लड़की को पा लिया है, जो मेरे अन्दर है, जिसका सही नाम महरूख है और मैं दावे के साथ कह सकती हूँ कि उसकी पहचान जो भी हो, मगर रफत भाई हरगिज नहीं है।’’38  

यह जो उसने रफत यानि की पुरुष के बना और उससे अलग अपनी पहचान बनाने का कार्य किया है, वह अपने आप में बेमिसाल है।
विवाह से इंकार और विकल्प - ‘‘महरूख अम्मी की इन बातों को सुनकर सोचने लगती कि शादी हर औरत-मर्द के लिए जरूरी है, मगर इतनी भी जरूरी नहीं है कि वह बेजान दीवारों और बेजबान पलंगों से कर ले या जो भी अंधा, लूला, लंगड़ा रास्ते में आ टकराए उसी के साथ निकाह पढ़वा लिया जाए। आखिर हर जिंदगी का एक ही चौखटा तो नहीं हो सकता।’’39 

‘‘सही और गलत की कसौटी ‘औरत’ होती है, मजहब और रीति रिवाज की जिम्मेदारी भी औरत होती है, राजनीतिक बदलाव को दर्शाने वाली भी औरत होती है। परिवार और कुल की मर्यादा औरत होती है। कुल मिलाकर इस दुनिया को जिन्दा रखने चाली ‘शै’ भी औरत होती है, फिर औरत को इतनी  हिकारत की नजर से क्यों देखा जाता है? क्या सिर्फ इसलिए कि एक गुलाम, एक वेजुबान कनीज की जो आदत सदियों से पड़ गई है, उसे कोई छोड़ना नहीं चाहता है। वरना संबंधों की तानाशाही किस पर चलेगी और तानाशाही का अपना एक मजा होता है। क्या स्वयं में यह दृष्टिकोण एक प्रकार की राजनीति नहीं है,? फिर उससे औरत क्यों दूर रहे? उस राजनीति में उसका बराबर से हिस्सा होना चाहिए। उसकी मांग, जरूरत, और पुकार को तभी दूसरा पक्ष समझ पायेगा।’’40 
स्त्री जाति का यह विश्लेषण वास्तविकता के धरातल पर है। इसमें उसके होने को दुनिया के लिए आवश्यक बताया गया है और उसके पक्ष को दूसरा पक्ष बराबरी के स्तर पर सुने और समझे इसकी प्राकृतिक आवश्यकता को स्वीकार किया गया है।
स्त्री विमर्श का स्वर पुरुष के खिलाफ नहीं होना चाहिए, बल्कि पितृसत्तात्मक व्यवस्था के खिलाफ होना चाहिए। महरूख के माध्यम से नासिरा जी ने यह बात बहुत ही सटीक ढंग से प्रस्तुत की है। अमृता के संघर्ष में वह उसे समझाती हुई कहती है ‘‘मर्द न हमारा दुश्मन है, न हरीफ़-वह हमारी तरह का इंसान है। मानती हूँ औरतों की तकलीफें बेशुमार हैं, मगर मर्द कब अपनी उलझन से आजाद है? उसकी सबसे बड़ी उलझन तो आज की बदलती औरत है जिसे वह समझ नहीं पा रहा है -मर्दों को हम जज़्बाती नजर से न देखकर उन्हें व्यावहारिक तौर पर देखें तो शायद हम उनकी कुण्ठाओं की गिरहें खोल सकें और उन्हें बहुत कुछ समझा सकें।’’41

वे स्त्री की लड़ाई में पुरुष को प्रतिद्वंद्वी नहीं सहयोगी बनाने का सुझाव रखती हैं। ‘‘हमारी लड़ाई अपनों से संघर्ष की लड़ाई है, यानी भूमिगत, अपने अन्दर अपने को समझने और मजबूत बनाने की -हमें मर्द नहीं बनना है न ही मर्द को औरत बनाना है - एक दूसरे को लबादा पहनने की यह ललक ही मुसीबत बन रही है। जरूरत है अपनी -अपनी जगह खड़े होकर अपने आप को समझने और दूसरे को समझाने की जब समझ कह दे, यह नामुमकिन है तो उसे कबूल कर लो, मगर इस तरह से मर के नहीं - याद रखो, इन्सान का जिन्दगी सिर्फ एक बार मिलती है और उसे सिर्फ एक के लिए खत्म करना नासमझी ही नहीं; जुर्म भी है।’’42 

स्त्री-पुरुष के संबंध को पति-पत्नी के संबंध में बांधना पितृसत्ता का वर्चस्वी राजनीति की तकनीक थी। स्त्री के माँ बनने के प्राकृतिक अधिकार को सामाजिक और नैतिक कानून से जोड़कर शुचिता और पवित्रता का वास्ता देकर पितृसत्तात्मक भूमि और बीज के संबंध में क्यों बदल दिया गया। इस पर भी महरूख विचार करती है।
‘‘अपने चारों तरफ गूंजते-गंुधते सन्नाटे में उतरती हुई महरूख महसूस करती कि औरत को बनाते हुए खुदा ने कोख तो उसी के बजूद में बनाई है, अपने बाद सृष्टि का अधिकार उसे ही दिया है फिर उसका श्रेय मर्दों के नाम पर किसने चढ़ा दिया है? हर औरत की माँ बनने का पैदाइशी हक खुदा ने दिया है, तभी तो कयामत के दिन करम का लेखा-जोखा तय करते समय मुर्दों को उनकी माँ के नाम से पुकारा जायेगा। फिर इस दुनिया में जिन्दा इन्सानों के बीच बच्चे की पहचान और नाम माँ न होकर बाप क्यों हो गया है और बाप भी ऐसा जो पति हो, मजाजी खुदा हो, सामाजिक बन्धनों के मुताबिक हो वरना....?’’43

महरूख ने जहाँ से पितृसत्ता द्वारा दी गई भूमिका के आगे अपनी सरहदें फैलाई थीं, वहीं से उसकी पहचान बन थी और वह तय शुदा भूमिकाओं - पत्नीत्व, मातृत्व को न निभाते हुए भी एक मुकम्मल इंसान है और अंदर से पूर्णत्व और मुक्ति का अनुभव करती है।
‘‘अब वह अम्मी को क्या कहे और उन्हें कैसे समझाये कि आपकी महरूख रिवायती दायरे को तोड़कर एक नई जमीन पर खड़ी है। वह अगर माँ नहीं बनी तो चाह अधूरी नहीं है। यह ख्याल अपने में कितना बेमानी है, फिर खुद तो इसकी ख़तावार महरूख नहीं, बल्कि वह माहौल और हादसे हैं जिन्होंने नई महरूख को जन्म दिया।’’44 

महरूख स्त्री के वजूद और पहचान को बंधे-बंधाये ढर्रे से हट कर सोचने पर मजबूर करती है। वह समाज और पितृसत्ता के सामने यह प्रश्न उठाती है कि क्यों औरतों की बोलियाँ लगाना बंद किया जायेगा और कब इनको कोड़ियों और ठीकरों में नापना बंद होगा?

‘‘महरूख अपने बिस्तर पर लेटी चुपचाप अम्मी की यह बेकली देख रही थी कि औरतों की खुशकिस्मती और बदकिस्मती के कितने बंधे-बंधाये ढर्रे हैं। बरसों से चली आ रही यह सोच कब बदलेगी? कब औरत की कीमत ठीकरों और कौड़ियों से नापना बन्द होगा? कब उसे इन्सान समझ कर उसकी बोलियाँ लगनी बन्द होंगी? कब उसे मर्दों के सहारे के बिना दुनिया जीते देखना पसन्द करेगी? कब उसे अपनी तरह जीने की आजादी मिलेगी? आखिर कब?’’45 

महरूख ने अपने लिए गए फैसले की कीमत भी चुकाई है, आने वाली चुनौतियों का सामना किया है। स्त्री को यदि मुक्त होना थोपी गई भूमिकाओं से तो उसे महरूख की तरह फैसले लेने होंगे और साहस के साथ चुनौतियों और कठिनाइयों का सामना करना होगा।

‘‘तो मैंने भी अपने पसन्द की जिन्दगी जीने की कीमत अदा की है, मैं अपनी जिन्दगी से मुतमईन हूँ। मैंने कुछ खोकर पाया है अम्मी! आप इसे न जान सकें तो वह अलग बात है, मगर मैंने सचमुच हादसों से घिर कर तजुर्बों की सुरंगों से निकल कुछ पाया है जो बहुत कीमती, बहुत पुरमयानी है जो आप नहीं मगर आने वाली नस्लों की औरतें समझेंगी कि उसका सफ़र कब से शुरू हुआ था - और वह औरत भावनात्मक धरातल पर हमसे ज्यादा मजबूत होगी, हर चोट को हर चिटकन को गहराई से समझ कर उसे रचनात्मक मोड़ देना इमसे कहीं ज्यादा जरूरी समझेगी।’’46 

महरूख के इस निर्णय से भविष्य की औरत आजाद होगी, स्वतंत्र व्यक्तित्व की धनी  होगी और अपने फैसले स्वयं करेगी। इस संभावना को महरूख इन शब्दों में व्यक्त करती है - ‘‘जहरा बीबी, तुम क्या कोई भी किसी लड़की को अब नहीं रोक पायेगा। रोज हालात की भट्टी में पक-पक कर कैसी पुख्ता लड़कियाँ निकल रहीं हैं। इस खानदान की मै पहली लड़की सही, मगर इस दुनिया की तो नहीं। बाहर निकल कर जमाने को तो देखो, आसमान कैसे-कैसे रंग बदल रहा है! सच कहा है किसी ने, जो दिल ग़म से आश्ना ने हो, वह दूसरों का दर्द क्या जाने।’’47
मर्द से अलग अपना भी औरत का घर हो सकता है, उसकी दुनिया हो सकती है, उसका अपना परिवेश और समूह हो सकता है। जिसमें मर्दों का बहिष्कार नहीं साथ भी हो सकता है और उनका वर्चस्वी रूप नहीं हो सकता है।
‘‘एक घर औरत का अपना भी तो हो सकता है, जो उसके बाप और शौहर के घर से अलग, उसकी मेहनत और पहचान का हो।....मेरा अपना घर वही पुराना है, जहाँ मैं पिछले तीस साल रही हूँ। तुम लोग अपने-अपने घर रहे हो, मैं अपने घर लौट रही हूँ। इसमें इतना पेरशान होने की क्याबात है? महरूख ने बड़े इत्मीनान से कहाँ’’48

इस तरह महरूख स्त्री विमर्श की नई दिशा, सोच और व्यवहार का ‘जिन्दा मुहावरा’ है।



डॉ संजीव जैन 

डॉ. संजीव कुमार जैन
सह-प्राध्यापक हिन्दी
शासकीय महाविद्यालय,
गुलाबगंज, म.प्र. संपर्क
522 - आधारशिला, ईस्ट ब्लॉक एक्सटेंशन
बरखेड़ा, भोपाल, म.प्र. 462021
मो. 09826458553





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1. ठीकरे की मंगनी, नासिरा शर्मा, पृ. 17
2. वही, पृ. 12
3. वही, पृ. 12
4. वही, पृ. 14
5. वही, पृ. 17
6. वही, पृ. 22
7. वही, पृ. 26
8 वही, पृ. 40-41
9. वही, पृ.
10. वही, पृ. 49
11. वही, पृ. 50
12. वही, पृ. 51
13. वही, पृ. 61
14. वही, पृ. 61 
15. वही, पृ. 61
16. वही, पृ. 62
17. वही, पृ. 65
18. वही, पृ. 74
19. वही, पृ. 75
20. वही, पृ. 115
21. वही, पृ. 116 
22. वही, पृ. 116
23. वही, पृ. 117
24. वही, पृ. 117
25. वही, पृ. 117-118
26. वही, पृ. 118
27. वही, पृ. 119
28. वही, पृ. 125 
29. वही, पृ. 126
30. वही, पृ. 127
31. वही, पृ. 127
32. वही, पृ. 121
33. वही, पृ. 131
34. वही, पृ. 132
35. वही, पृ. 133
36. वही, पृ. 135
37. वही, पृ. 136
38. वही, पृ. 136
39. वही, पृ. 136
40. वही, पृ. 178
41. वही, पृ. 180
42. वही, पृ. 181
43. वही, पृ. 189
44. वही, पृ. 190
45. वही, पृ. 193
46. वही, पृ. 194
47. वही, पृ. 196
48. वही, पृ. 197

               

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Sunday, September 9, 2018

उपन्यासनामा: भाग छ:
ज़ीरो रोड 
नासिरा  शर्मा
नासिरा शर्मा 





सुपर हाइवे बनाम ज़ीरो रोड
डॉ. संजीव कुमार जैन


आज हम सिर्फ स्थानीय या राष्ट्रीय परिस्थितियों से ही प्रभावित नहीं होते हैं और न हमारा जीवन अपने आस-पड़ोस तक ही व्याप्त है। जीवन की परिस्थितियाँ वैश्वविक कारणों और परिणामों से जटिलतर होती जा रही हैैं। जीवन सतह पर तैरती नौका की तरह है जो समुद्र की न केवल गहराई में होने वाली हलचलों से प्रभावित होता है, बल्कि दूरस्थ सिरे पर होने वाली हलचलों से भी डगमगाता है। सागर में कहीं भी होने वाली हलचलें सागर पर तैरने वाले सभी जहाजों और नौकाओं को प्रभावित करती हैं। हाँ इतना अवश्य है कि बड़े जहाज छोटी-मोटी हलचलों को आसानी से झेल जाते हैं, परन्तु छोटी नौकायें जल्द डगमगाने लगती हैं और डूबती जाती हैं। उनके डूबने से कोई खास हलचल सतह पर नहीं होती ये अलग बात है।


इलाहाबाद की ज़ीरो रोड से दुबई के शानदार चकाचौंध तक की यात्रा कराता है ज़ीरो रोड। आज जब पूँजी का अविरल प्रवाह सागर के जल की तरह लहरा रहा है और उसमें रोज आने वाले ज्वार-भाटों में ही न जाने कितनी नौकायें हिचकोले खा रही हैं और कितनी रोज डूब रहीं हैं? इसका कोई लेखा जोखा नहीं हैं, तो अब जबकि इसमें ‘सुनामी’ जैसी लहरें अमेरिका से उठने लगी हैं और सारा विश्व इसके दुष्परिणामों को भोगने के लिए विवश है। इस विवशता में आम आदमी की जिंदगी की भयावहता यदि देखनी हो तो नासिरा जी के जीरो रोड उपन्यास में देख सकते हैं।

जीरो रोड भूमंडलीकरण का दुर्दांत चेहरा है। यह एक ऐसा उपन्यास है जो 21वीं सदी की सही तस्वीर पेश करता है। इसको पढ़ते हुए सिर्फ और सिर्फ मार्केज के उपन्यास ‘एकान्त के सौ वर्ष’’ की याद ताजा हो उठती है। इस की सबसे खास बात है इसका सागर की गहराई की तरह शांत और स्थिर कथानक। इसमें हलचलें तो बहुत हैं, प्रवाह भी है, मगर सतह पर सुनामी नहीं है। इसकी वजह है नासिरा जी की आम आदमी की जिन्दगी की गहरी समझ। आम आदमी जो कहीं का भी निवासी हो, उसके जीवन में तूफान तो बहुत आते हैं, परन्तु उसका प्रभाव सिर्फ उसके और उसके परिवार वालों पर ही होता है और यही कारण है कि वह तूफान व्यक्तिगत घटना बन कर रह जाता है, सुनामी नहीं बन पाता। नासिरा जी ने इस सच को अपनी पूरी तल्ख सच्चाई के साथ पेश किया है।
पूँजीवाद की पहचान आम आदमी की अस्मिता और अस्तित्व के संकट में दिखाई देती है। व्यक्ति जितना स्वयं से और अपनों से बेगाना होता जायेगा पूँजीवाद उतना ही सफल और सार्थक होता जायेगा। पूँजीवाद अपने विकृततम रूप में आज विद्यमान है जिसे भूमंडलीकरण का सम्मोहक नाम दिया गया है। पूँजी का भूमंडलीकरण और आम आदमी का अकेलापन, बेगानापन, व्यर्थताबोध, निराशा, हताशा और रोजी के लिए मृगमरीचिका की तरह रेगिस्तान में अंधी दौड़, इस सम्मोहक, चमकदार, सिक्के के दो पहलू हैं, परन्तु इसका सबसे बड़ा पैरोकार मीडिया इसका इस सिर्फ एक पहलू ही पेश करता है और उसे ही पूरा सच कुछ इस तरह से प्रतिपादित करता है ताकि दूसरे पहलू की ओर देखने की कोशिश भी न की जाये। नासिरा जी का यह उपन्यास इसके दूसरे पहलू को जानने, समझने और व्याख्यायित करने की सफल कोशिश है-

 ‘‘हम यहाँ कैसी कैसी उम्मीदें लेकर आते हैं। मगर जब हम जाते हैं तो हमारे सूटकेसों में भले ही जो भी भरा हो हमारा वजूद खाली होता है - बिल्कुल इस बेकराँ रेगिस्तान की तरह। कभी-कभी अजीब बात सोचता हूँ। हमारे अपनों के लिए जैसे हम तेल का कुआँ हैं - जब तक एक-एक बूँद उलच न ली जाए, हम गहरे और गहरे ड्रिल किये जाते हैं और खाली होने के बाद हमें एबेंडेंट करार देकर पत्थरों से पाट दिया जाएगा।’’1 

व्यक्ति के बजूद को बेकराँ रेगिस्तान की तरह बना कर सिर्फ ‘तेल’ की तरह जिंदगी को ड्रिल करने की प्रक्रिया इस विराट सभ्यता ने अनवरत चला रखी है। हर व्यक्ति ड्रिल किया जा रहा है, दूसरों के लिए, दूसरा अन्य दूसरे के लिए और यह अनंत प्रक्रिया है, इसका लाभ जिसे मिल रहा है वह है ड्रिल मशीन का मालिक। वही उस तेल का मालिक है जो ड्रिल करने की प्रक्रिया में उत्पादित हो रहा है। भूमंडलीय शोषण व्यवस्था का एक पुर्जा मात्र बना कर रख दिया है इंसान को।

वैश्वीकरण की प्रक्रिया ने मानवीय जीवन की सहजता और सरलता को जिस तरह स्नेह रिक्त रेत में तब्दील किया है, उसके व्यापक दुष्परिणाम मानवीय समाज भोग रहा है। मानवीय जीवन को संबंधों की पूँजी से बहिष्कृत कर दिया गया है और स्वार्थ और भोग की ‘फार्मूला वन रेस’ में शामिल कर लिया गया है।
आधुनिक सभ्यता के तथाकथित विकास की चरम स्थिति दुबई जैसे नगरों में देखी जा सकती है। यहीं से इस उपन्यास का कथानक उठाया गया है। विकास के पैमाने को ही विखंडित करने का प्रयास किया गया है। इस जड़ता के विकास के अन्तर्विरोध के रूप में संबंधों की चेतना की सजग और सचेत प्रतिष्ठा जीरो रोड में दिखाई देती है।
‘‘जीवन-साथी का प्यार और हमदर्दी बड़े से बड़े दुखों से मुक्ति दिला देती है। एक स्पर्श काफी है सारे दिन की थकन उतारने के लिए। पता नहीं लोग रिश्तों को छोड़ नशे का सहारा क्यों लेते हैं।’’2 

आधुनिक सभ्यता जिसे विकास का चरम कहा जा रहा है, वह एक जीते जागते इन्सान को रेत और तेल में किस तरह तब्दील कर रही है इसके सैकड़ों प्रसंग इस उपन्यास में जिन्दगी की तरह बिखरे पड़े हैं। एक उदाहरण काफी होगा - ‘‘किस्मत जब तक साथ देती है जिन्दगी यूँ ही चलेगी। रानो ने गहरी साँस ली। फिर उदास स्वर में बोली, जब मैं बूढ़ी हूँगी तब तक लड़कियाँ जवान हो चुकी होंगी। मेरे दो बच्चे बिना इलाज के जमीन के अन्दर सोये पड़े हैं। मेरे जानने वालों की गोदें कैसे खाली हुईं, वह सब कैसे सहा। उसने मुझे बेहिस बना दिया है। जब तुम प्यार की बातें करते हो तो मुझे आराम से ज्यादा तनाव महसूस होता है, क्योंकि यह नर्म अहसास तो मेरी जिन्दगी से कब का दूर चला गया है।’’3







उपन्यास का तानाबाना मानवीय संबंधों की पुनर्खोज के धागों से बुना गया है। जीवन क्या है? सिर्फ पैसा कमाना और भौतिक सुविधायें जुटाना! नहीं, यह उपन्यास इस आधुनिकता के मिथक को सख्ती से नकारता है। जीवन संबंधों की गरमाहट का नाम हैं। मानवीय जीवन की ऊर्जा संबंधों की संरचना और स्पर्श में है न कि रेत की तरह रूखी पूँजी में।

क्या दिया है मानवता को आज की इस सभ्यता ने? रानो जैसी लाखों स्त्रियाँ इसी तरह बेहिस होती जा रहीं हैं और प्यार के नर्म अहसास को खोती जा रहीं हैं। आखिर कौन है इनका जिम्मेदार? यह वह सभ्यता है जिसमें आदमी का आदमी से मिलना जश्न की तरह देखा जाता है - सिद्धार्थ का यह कथन
‘‘आदमी से आदमी का मिलना वास्तव में किसी जश्न से कम नहीं होता है।’’4

आज की इस भूमंडलीय सभ्यता और विकास के संजाल में आदमी का मिलना वाकई जश्न मनाने जैसा ही है, जैसा कि प्राचीन सभ्यता में ईश्वर का मिलना जश्न मनाने के लिए होता था। इंसान विकास के रथ के नीचे कहीं बहुत गहरे दफन हो चुका है। अब आपको टेक्नोक्रेट, इंजीनियर, डॉक्टर, मैनेजर, उद्योगपति, पूँजीपति, व्यापारी, ऐजेंट, कॉरपोरेट, और मजदूर, मजबूर, गरीब, भिखारी, कॉलर्गल, रिसेप्शनिस्ट, कम्प्यूटर ऑपरेटर और न जाने कौन कौन मिलेगा। सब एक व्यवस्था के पूर्जे, हांफते-भागते, इंसानी जिस्म में कैद मशीनें, विज्ञापन में लेबल की तरह चिपके जिस्म मिलेंगे, पर आदमी कहीं नहीं मिलेगा।

जीरो रोड सुपर हाईवे संस्कृति के बरक्स एक उबड-खाबड़ रास्ता बिछाता है। सुपर हाइवे, दुबई बुर्ज और वर्ल्ड ट्रेड सेंटर जैसे किले अन्ततः उसी सामंतीय संस्कृति के आधुनिक संस्करण हैं जिनमें राजा किलों और विशाल मंदिरों का निर्माण करते थे। सिर्फ इसलिए ताकि आम आदमी पर विशालता का आतंक काबिज किया जा सके। किलों में प्रवेश की कल्पना भी आम आदमी नहीं कर सकता था। हाँ उन्हें बनाने तक उसकी गति होती थी, इसके बाद तो वह उसके लिए डरावनी चीज हो जाती थी। यही कार्य आज के विकास के प्रतीक सुपर हाइवे और दुबई बुर्ज तथा वर्ल्ड ट्रेड सेंटर जैसी इमारतें कर रही हैं।

बुर्जुआ संस्कृति का सम्पूर्ण तानाबाना इन्हीं प्रतीकों के माध्यम से बुना जा रहा है। नासिरा जी ‘जीरो रोड’ में इसी विकास के पैमाने पर सवाल खड़े करती हैं और उसे सवालों के कटघरे में ले आती हैं। वे यह मानती हैं कि इस विकास की अवधारणा में आम आदमी की जिंदगी ‘रेत’ के कणों का महासागर बनती जा रही है। बुर्जुआ संस्कृति के बुर्जों की ऊँचाई जितनी बढ़ती जा रही है आम आदमी का कद और वजूद उतने ही छोटे कणों में विखरता जा रहा है। बाजारू संस्कृतिक की यह चमक और ऊँचाइयाँ आम आदमी के लिए नहीं हैं। सिद्धार्थ अपने भाई विवेक से कहता है कि ‘‘दुनिया चमकीली है मगर वह चमक हमारे लिए है भी और नहीं भी। उसे हम देख सकते हैं मगर उसके मालिक नहीं बन सकते।’’5 

जीरो रोड में नासिरा जी बुर्जुआ संस्कृति के प्रतीक दुबई के माध्यम से ऐसा आख्यान प्रस्तुत करती हैं जिसमें उस आम आदमी की जीवन गाथा है जिसकी कोई पहचान नहीं है, कोई वजूद नहीं है। वह सिर्फ ड्रिल किया जा रहा है कभी पूँजीपतियों द्वारा तो कभी अपने परिवार के द्वारा। जिस भूमंडलीकृत संस्कृति ने आम आदमी को बजूद और पहचान रहित बनने के लिए विवश किया है उसे नासिरा जी ने ‘‘पब्लिक गार्डेननूमा अन्तरराष्ट्रीय मंडी’’6 कहा है। इस मंडी में इन्सान का इन्सान से मिलना किसी जश्न से कम नहीं होता, क्योंकि वह ‘क्रास रोड’7 चौराहे पर से निरंतर गुजरता है जहाँ किसी का मिलना ईश्वर के मिलने की तरह असंभव होता है। यदि आप इस मंडी में किसी से मिल लिए तो हर एक के पास ‘‘एक दर्दनाक दास्ताँ’’8 है जो अपने अन्दर छिपाए बैठा है।

इस अन्तरराष्ट्रीय मंडी में आदमी के पास कोई आधार नहीं है जिस पर खड़ा होकर वह अपने को स्थिर महसूस कर सके। अस्थिरता और अनिश्चतता इसकी खास पहचान है। तकनीक हो या नौकरी कोई भी पुरानी अच्छी नहीं लगती, दोनों निरंतर बदलती रहती हैं। इसीलिए इसे ‘कंडोम संस्कृति’ कहा जाता है अर्थात् ‘यूज एंड थ्रो।’ कभी आदमी तकनीक को बदलता है तो कभी तकनीक आदमी को बदलने पर विवश कर देती है। जो नहीं बदलता वह इस मंडी में टिक नहीं सकता। उसे उठाकर फेंक दिया जायेगा अनन्त रेगिस्तान में या तेल का कुआँ बना कर निरंतर ड्रिल किया जाता रहेगा। तभी तो सिद्धार्थ कहता है ‘‘बड़ी उलझी है यह दुनिया, कोई रास्ता सीधा जाता ही नहीं है। कुछ दूर चलकर या बन्द गली से टकराता है या फिर रास्ता ही गुम हो जाता है। कल रात महसूस हुआ था कि पैरों के नीचे जमीन है और आज महसूस हो रहा है कि पैर फिर उखड़ गये हैं। चारों तरफ दलदल ही है।’’9 

विकास की चमक के नीचे के गहन अंधकार को देखना और उसे सार्थक अभिव्यक्ति देना नासिरा जी की उपलब्धि है। इसका कथ्य इलाहाबाद से दुबई तक की ही यात्रा नहीं करता बल्कि सम्पूर्ण विश्व में जीरो रोड पर बसने वालों की दर्दनाक दास्ताँ को वाणी देता है, क्योंकि ‘‘जुल्म का चेहरा हर जगह एक है, बस उसकी तीव्रता और देशकाल में थोड़ा-बहुत अन्तर किया जा सकता है।’’10

संवेदना की इस जमीं पर खड़े होकर ही इसके कथ्य को समझा जा सकता है। नासिरा जी की दृष्टि बहुत साफ है कि यह तथाकथित विकास वह दुनिया में कहीं भी हो रहा हो उसका फायदा किसे हो रहा है? और कौन इस विकास के नरमेघ यज्ञ में बलि का बकरा बना हुआ है।






‘‘दिखावे के लिए इथोपिया में विकास योजना अपना काम कर रही है। नयी इमारतें, नयी सड़कें बन रही हैं, क्राइम कम हो रहा है और कहवे और फूलों की तिजारत बढ़ रही है मगर लाभ कहाँ और किसको मिल रहा है। नंदी ग्राम में मुसलमान बहुल इलाका, किसानों से जमीन छीन पूँजी लगानेवाले को देने में क्या बात केवल धर्म की है? इन देशों में डेमोक्रेसी के नाम पर हुए चुनाव का क्या हुआ? जब लोग नहीं रहेंगे, जिंदगी नहीं रहेगी, बच्चे जिन्दा नहीं बचेंगे तो आपकी डिमाक्रेसी वहाँ क्या करेगी? तब समस्या खुलती है कि यह सब कुछ आप अपने लिए कर रहे हैं और कितना अजीब है हम जुल्म सहने वाले बर्बाद होने वाले किसी एक मुद्दे पर एकत्रित नहीं हो पाते हैं। उधर हमारा शोषण करने वाला कितना बड़ा घेरा बना हमको अपने ही इलाकों में बन्दीगृह में कैद कर उकसाता है कि बल्कि धर्म के नाम पर या मारो या मरो।’’11 

‘‘विकास हमेशा खुशी लेकर नहीं आता है बल्कि पुरानी आबादी के लिए दुख का कारण बनता है जिन्हें अपने इलाके, अपने घर, अपनी जमीन से गहरा जुड़ाव होता है।’’12 इसका उदहरण है दिल्ली में मेट्रो का बनना। इस विकास की रेल के कारण लगभग 20 लाख गरीब परिवारों को विस्थापित होना पड़ा है अपने रोजगार और रहने की जगहों से। इसका असर उनके स्वास्थ्य और मजदूरी पर गहरे तक हुआ है। इसका अध्ययन कोई मीडिया प्रस्तुत नहीं करता।

‘जीरो रोड’ जिस आदमी के मिलन, संघर्ष, जिजीविषा, कर्मशीलता का प्रतीक है वह इलाहाबाद में स्थित है, परन्तु उसका प्रतीकार्थ दुबई में साकार रूप लेता है। दुबई दुनिया का फ्री व्यापार ज़ोन है, वह अन्तरराष्ट्रीय मंडी है, क्रास रोड है जहाँ लगभग 100 देशों के लोग बसते हैं। इनमें व्यापार के लिए पूँजीपति और उद्योगपति आते हैं। वहीं बड़ी संख्या में मजदूर और कामगार लोग भी आते हैं। वहाँ की मूल आबादी सिर्फ 20 प्रतिशत है। अरबों का भारत से संबंध बहुत पुराना है, यह सच है परन्तु आज की सच्चाई बहुत अलग है। ‘‘अरबों का भारत से रिश्ता पुराना है जो साहित्य में मिलता है मगर दुबई से इंडिया का रिश्ता बड़ा गहरा है और नया है।’’13

इस रिश्ते की गहराई में जो खाई है उसे पहचानना और रेखांकित करने में भी नासिरा जी ने महारत दिखाई है।
‘‘बड़े स्टेज की सबसे मामूली कठपुतली कर भी क्या सकती है? हम हालात् के शिकार तो नहीं हुए मगर हालात् ने हमें बनाया। दुबई में रहना, जीना, काम करना आसान नहीं है। संघर्ष की हजार पर्त हैं। दोबारा भारत आकर मुझे महसूस हुआ कि मेरे मम्मी और डेडी को अपने गाँव में कितना कष्ट था, जो वह अपना वतन छोड़कर बाहर गये थे। आज यहाँ आकर हर पल महसूस करता हूँ कि कम से कम यहाँ वह दौड़ तो नहीं है जो हम रोज जीने के लिए लगाते हैं? भूख है, बीमारी है, बेकारी है, पिछड़ापन है मगर एक संतोष है, सुरक्षा है - जो हमारे पास सबकुछ होने के बाद नहीं है। हर दम एक भय पीछा करता है कि ये सब वैसा ही जमा जमाया रहेगा जैसा आज है कि सब कुछ हमसे एक पल में छिन जायेगा?’’ रमेश कह उठा।’’14

जीरो रोड वास्तव में काम की तलाश में आये लोगों की जीवन गाथा है। इसकी खासियत इस बात में है कि यह पूँजीवाद का, भूमंडलीकरण का विलोम रचती है। भूमंडलीकरण के कारण अपनी जड़ों से उखड़े लोग - जिनमें सिद्धार्थ, फिरोज मीखची, शाहआलम, बरकत उस्मान, श्री निवासन, गुलफाम, रानो, रशीद, सुदर्शन, फरहाम, जरयाब, रमेश और ईयाद हैं। इन सबके बीच जो इन्सानी रिश्तों का सोता फूटता है वह पूँजीवाद की तमाम पथरीली और कठोर चट्टानों को चटका देता है। इन्सान अपने अंदर के दर्द और पीड़ा को दूसरों के सामने सीधे नहीं खोलता मगर साहित्य और कला इस ज्वालामुखी को अभिव्यक्ति देने के साधन बन जाते हैं और अन्ततः सबके निजी ज्वालामुखी एक व्यापक ज्वालामुखी बन कर फूट पढ़ते हैं। ‘डॉ. जिबागो’ और ‘आऊट ऑफ अफ्रीका’ नामक फिल्म और कुछ उपन्यास और इलाहाबाद में मुन्ना हाफिज की किताबों की दुकान जो बाद में कट्टरपंथियों द्वारा जला दी जाती है, अन्ततः साहित्य और कला की सामाजिक भूमिका को रेखांकित करती हैं।

 ‘‘सिद्धार्थ जब अपने कमरे में पहुँचा तो बाकी लोगों की तरह झुँझलाया या बेकसी से फड़फड़ा नहीं रहा था। बल्कि उसका दिमाग़ जैसे जाग उठा था। उसके अंधेरे कोने में रोशनी भर गयी थी। फिल्म ने सबके अन्तर्मन की भावनाओं को नोकें चुभोयी थीं। ऊपर से जो भी तल्ख बहस हुई हो, मगर सच यह था कि सभी को उनके सरोकारों और वैचारिक धरातल पर जोड़ने का काम हुआ था। उनके अन्दर की पथरीली दुनिया कई जगह से तड़की थी, जिसकी दरारों से स्वच्छ पानी बहना शरू कर दिया था। यकीनन ये सोते इंसानी मोहब्बत के थे। एक दूसरे के दुख को स्पर्श कर उस सिहरन को महसूस करने के जो आज तक अकेले महसूस कर रहे थे।’’15

इसके पीछे जो तर्क नासिरा जी का है वह भी सांदर्भिक है - ‘‘इनसानों द्वारा इनसानों के शोषण की कहानी जितनी पुरानी है उतनी ही पुरानी इनसान का इनसान के प्रति आकर्षण की भी। इस संसार में कितनी तरह के लोग रहते हैं। गोरे, काले, पीले, सांवले। सुन्दर, कुरूप परन्तु जो चीज सबके पास एक तरह की है वह है भावना। यही भावना है जो दो इनसानों के बीच कभी प्रेम तो कभी नफरत, कभी मित्रता तो कभी शत्रुता का बीज बोती है! सारा झगड़ा क्या हम इनसानों के बीच केवल सत्ता का है? महानता साबित करने का है? इस पूरी दुनिया में आज कितने तरह के मोर्चे खुले हुए हैं। क्या कहीं भी मानव सुरक्षित हैं? भय, द्वेष, घृणा, ईष्या आज के आधुनिक संसार की हस्ताक्षर लय बन चुकी है। जो बार-बार बताती है कि विजय का कोई सुख नहीं है। लेकिन इनसान इस सच को माने तब न? आज इनसान इनसानी खून सबसे तुच्छ, महत्वहीन और सस्ता हो गया है। पानी से भी ज्यादा सस्ता। यह केवल आर्थिक समानता की लड़ाई नहीं है कि किसके पास कितने शक्तिशाली साधन हैं बल्कि वह महान है जो दूसरों का हक छीन सकता है, वही पूजनीय है, वही तानाशाही को लोकतन्त्र का नाम दे अपने को मसीहा समझता है।’’16

क्या यह उद्धरण किसी विश्लेषण की मांग करता है? यह अपने आप में इतना सपाट और सीधा सच है जो सिर्फ स्वीकारने की माँग करता है, समझने और क्रियान्वित करने की माँग करता है। आज के समय की वीभत्स सच्चाइयों से जीरो रोड भरा पड़ा है।

पश्चमी सभ्यता, आधुनिक सभ्यता, गोरी सोच की सभ्यता, अमेरिकी बर्बरीय सभ्यता जिसने दुनिया को असभ्य कह कर स्वयं को सभ्य मानने के लिए विवश किया। दुनिया पर स्वयं के सभ्य होने का विचार थोपने के लिए न जाने कितने नरसंहार किये और कर रही है? बीसवीं शताब्दी जिसे सभ्यता के विकास की शताब्दी या विज्ञान के विकास की शताब्दी कहा जाता है दरअसल समय के इतिहास की सबसे अमानवीय और बर्बरता की शताब्दी भी है। विकास के बुर्ज और टॉवर वास्तविक रूप में करोड़ों मनुष्यों के माँस, मज्जा और रक्त से निर्मित है।

सिद्धार्थ का यह निष्कर्ष ‘‘यह बात तो हर फिल्म में उभरकर आयी थी कि पश्चमी देशों ने किस बुरी तरह छोटे कमजोर राष्ट्रों को दोहन किया था। इसमें वे देश भी शामिल थे जिनके पास सभ्यता एवं सस्कृति का सुनहरा इतिहास है, जिन्होंने वास्तव में आज के आधुनिक संसार की नींव डाली थी। आज की तकनीक ने, खासकर खतरनाक हथियारों ने साहित्य व कला को नकार कर यह साबित करना शुरू कर दिया कि संवेदना का कोई महत्व दिमागी दुनिया में नहीं रह गया है। यह एक देश का विचार है जो हथियारों के कारण महान् शक्ति बन चुका है। जो बाजार का एक नया संसार रच रहा है। उस महाशक्ति को हराने के लिए क्या उन देशों के पास कोई मंत्र या शक्ति नहीं बची है? ये वही तो थे जिन्होंने सभ्यता के विकास में अपना योगदान दिया था। आज वह एकजुट क्यों नहीं हो पा रहे हैं? क्या अब हथियार ही विजयी होंगे? उनकी धार कोई भी देश कुन्द नहीं कर पायेगा? कितना अजीब है सब कुछ! एक तरफ खतरनाक हथियारों का अविष्कार और दूसरी ओर उन्हीं हथियारों का उन आतंकवादी घोषित किए गए देशों में बाजार पनपाना। और उससे ज्यादा खतरनाक हथियारों को उन्हीं देशों पर बरसा कर उनको तबाह कर यह कहना कि जैविक हथियारों का फार्मूला रखते हैं! कैसी पेचीदा सियासत है इन विकसित देशों की।’’17 

‘जीरो रोड’ अपने प्रतीकार्थ में पूँजीवाद का विलोम और उत्तराधुनिकता का आख्यान रचती दिखाई देती है। जीरो रोड पर आकर मिलने वाले तमाम इनसान, इनसान पहले हैं जाति, धर्म, नस्ल, राष्ट्रीयता जैसे विभेदीकृत अवधारणाओं से मुक्त इनसान जो पूँजीवाद और उसके विकास के प्रतिमानों से उपजी रिक्तता, व्यर्थताबोध, निराशा, बेरोजगारी, साम्प्रदायिकता, आतंकवाद, अजनबीयत, अमानवीयता, शोषण, हिंसा और बलात्कार के बनते रेगिस्तान पर आ कर मात्र इनसान होने की पहचान बनाये रखने लिए संघर्षरत हैं।

श्रम ही वह बिन्दु है जो इन्हें आपस में जोड़ता है। यहाँ हम मार्क्स के उस कथन को याद कर सकते हैं जिसमें उन्होंने कहा था कि ‘‘दुनिया के मजदूरो एक हो, क्योंकि तुम्हारे पास खोने के लिए कुछ नहीं है और पाने के लिए सारी दुनिया।‘‘ मार्क्स का यह दर्शन यहाँ जिन संदर्भों और स्थितियों में फलीभूत होता है, संभवतः ये वही स्थितियाँ हैं जिनकी कल्पना मार्क्स ने की होगी। इन तमाम चरित्रों के पास खोने के लिए कुछ भी नहीं है, ये सब अपना सब कुछ या तो गँवा कर आये हैं या दाँव पर लगा कर, इसलिए एक इनसानी रिश्ते में बंध जाते हैं। एक दूसरे के सुख-दुख के सहभागी होते हैं, क्योंकि ‘‘हम आप लोगों की तरह ज्यादा कमाने की हवस में नहीं, पेट भरने की मजबूरी से आये हैं, अगर हमारे नेता एक वर्ग विशेष तक विकास, सुविधा साधनों को सीमित न रखें तो शायद ही कोई हमारे वर्ग में आकर यहाँ भटकना पसन्द करे।’’18 

हिन्दी में अभी जो उपन्यास लिखे जा रहे हैं, उनमें जीरो रोड एक अलग तरह का उपन्यास है। रेहन पर रग्घु जैसे एकाआयामी उपन्यास की चर्चा बहुत हो रही है। मगर मुझे लगता है कि 21 वीं सदी के अभी तक लिखे गए हिन्दी उपन्यासों में जीरो रोड का कोई सानी नहीं है। नासिरा के ‘अक्षयवट’, जिंदा मुहावरे और कुंइयाजान जैसे उपन्यास चर्चित हो चुके हैं। जीरो रोड का कथानक कई सदंर्भों में चलता है। साम्प्रदायकिता और आतंकवाद इसके मूल मेेें है। इलाहाबाद की जिन्दगी, सिद्धार्थ के पिता का चरित्र परिवर्तन, हामिद की हत्या और उसकी बहन से सिद्धार्थ का प्रेम और ‘‘मुझे बख्स दो’’ के माध्यम से की गई आत्मालोचना, उसकी बहन का अस्पताल में घायलों की सेवा करना और भाई हामिद को याद करना इसकी ठेठ भारतीय जीवन की झांकी प्रस्तुत करता है।
इसमें रेगस्तिान का संगीतमय सौन्दर्य है, इलाहाबाद का कुंभ है, रेड डेजर्ट, गोल्डन डेजर्ट और ओमान रेगिस्तान है। रमेश और ईयाद जैसे लोग हैं जो संस्कृति और सभ्यता के विकास और प्रसार में अपना जीवन अर्पित कर देते हैं।
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डॉ संजीव जैन 





डॉ. संजीव कुमार जैन
सह-प्राध्यापक हिन्दी
शासकीय महाविद्यालय,
गुलाबगंज, म.प्र. संपर्क
522 - आधारशिला, ईस्ट ब्लॉक एक्सटेंशन
बरखेड़ा, भोपाल, म.प्र. 462021
मो. 09826458553




संदर्भ सूची  - 
1. जीरो रोड, पृष्ठ 212 
2. वही पृष्ठ 188
3. वही पृष्ठ115
4. वही पृष्ठ 166 
5. वही पृष्ठ 190
6. वही पृष्ठ 159 
7.वही पृष्ठ 159 
8. वही पृष्ठ 163 
9. वही पृष्ठ 167
10. वही पृष्ठ 226 
11. वही पृष्ठ 228
12. वही पृष्ठ 242. 
13. वही पृष्ठ 64 
14. वही पृष्ठ 85
15. वही पृष्ठ 134 
16. वही पृष्ठ 135
17. वही पृष्ठ 135
18. वही पृष्ठ 232

Tuesday, September 4, 2018

सिद्धेश्वर सिंह की कविताएं


सिद्धेश्वर सिंह


कवि का जाना
( स्मृति : केदारनाथ सिंह )
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कवि के जाने के दुख से 
अगर उबरना है तो 
उसकी कविता में उतर जाओ अकेले और चुपचाप
इसके लिए मत खोजो किसी का संग -साथ
मत पूछो कि हिमालय किधर है?

उसके लिखे शब्दों पर गौर करो
रखो चौकस निगाह
देखो कि उजास के कितने रंग हैं वहाँ
गिनो सको तो गिनो कि कितने -कितने छिद्रों से छन कर
पृथ्वी पर आने को विकल हैं 
सूर्य चंद्र और अन्यान्य अनाम ग्रह नक्षत्र ।

छुओ कविता को
उसका हाथ अपने हाथ में लेकर महसूस करो
कि कितना अंधकार सोख लिया है इस सोख्ते ने
देखो कि यहां वहां  ये जो दिख रहे हैं 
दाग़ धब्बे और बदरंग चकत्ते तमाम
इन्हीं में कहीं दबा है मेरा तुम्हारा और उनका भी दुख
जिनकी कहीं थी ही नहीं कोई आवाज
कि गला खंखारकर पूछ सकें कि गाड़ी अभी कितनी लेट है?

सृष्टि पर लगा है पहरा फिर भी
भाषा का एक पुल है 
मांझी के पुल की तरह ठोस और लोच से भरपूर
इस पर ठहरो
जैसे ठहर जाते हैं पानी में घिरे हुए लोग
अभी बस अभी करो यह एक जरूरी काम
उतरो कविताओं जल में जूते चप्पल और खड़ाऊं उतार कर।

कहीं नहीं जाता है कोई कवि
भले ही वह बताता रहे 
कि 'जाना' हिंदी की सबसे खौफनाक क्रिया है !









बनता हुआ मकान
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यह एक बनता हुआ मकान है
मकान भी कहाँ
आधा-अधूरा निर्माण
आधा-अधूरा उजाड़
जैसे आधा-अधूरा प्यार
जैसे आधी-अधूरी नफ़रत ।

यह एक बनता हुआ मकान है
यहाँ सबकुछ प्रक्रिया में है -- गतिशील गतिमान
दीवारें लगभग निर्वसन है
उन पर कपड़ॊं की तरह नहीं चढ़ा है पलस्तर
कच्चा-सा है फ़र्श
लगता है ज़मीन अभी पक रही है
इधर-उधर लिपटे नहीं हैं बिजली के तार
टेलीफोन-टी० वी० की केबिल भी कहीं नहीं दीखती ।
अभी बस अभी पड़ने वाली है छत
जैसे अभी बस अभी होने वाला है कोई चमत्कार
जैसे अभी बस अभी
यहाँ उग आएगी कोई गृहस्थी
अपनी सम्पूर्ण सीमाओं और विस्तार के साथ
जिसमें साफ़ सुनाई देगी आलू छीलने की आवाज़
बच्चॊं की हँसी और बड़ों की एक ख़ामोश सिसकी भी ।

अभी तो सब कुछ बन रहा है
शुरू कर कर दिए हैं मकड़ियों ने बुनने जाल
और घूम रही है एक मरगिल्ली छिपकली भी
धीरे-धीरे यहाँ आमद होगी चूहों की
बिन बुलाए आएँगी चीटियाँ
और एक दिन जमकर दावत उड़ाएँगे तिलचट्टे ।

आश्चर्य है जब तक आऊँगा यहाँ
अपने दल-बल छल-प्रपंच के साथ
तब तक कितने-कितने बाशिन्दों का
घर बन चुका होगा यह बनता हुआ मकान ।








कवि का कुरता
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यह कविता पाठ के मध्यान्तर का
चाय अंतराल था
जिसे कवि नायक कहे जाने वाले
एक दिवंगत कवि के शब्दों में
कहा जा सकता था- 'हरी घास पर क्षण भर'।

वहाँ कई कवि थे सजीव
जिनमें से एक ने पहना था
खूब चटख ललछौंहे रंग का कुरता
उसे घेर कर खड़े थे कुछ लोगबाग
जिनमें से 'कुछ थे जो कवि थे'
जैसा कि शीर्षक है
इधर के एक नए कवि के नए कविता संग्रह का
और कुछ ऐसे भी
जिनकी नेक नीयत थी कवि होने की
(नियति को क्या होगा मंजूर
यह और अलग बात !)
चटख कुरते वाला कवि आकर्षण का केन्द्र था
बोल भी वही रहा था सबसे ज्यादा
क्योंकि वह बड़ा कवि था
वह आया था बड़ी जगह से
उसके होने भर से
हो जाता था हर कार्यक्रम बड़ा
यह एक बड़ी चर्चित बात थी
साहित्य के समकालीन परिसर में
जबकि परिधि पर कुछ न कुछ लिखा जा रहा था लगातार
चर्चा से दूर और उल्लेख से उदासीन
(ओह , फिर याद आया वह दिवंगत कवि
अरे ! यायावर रहेगा याद !)

बड़े कवि को मिल चुके थे कई बड़े ईनाम
कई बड़े कवियों के
बड़े अंतरंग और बड़े तरल किस्से थे उसके पास
और वह आजकल
लिखना चाह रहा था संस्मरणों की एक बड़ी किताब
जो कि लिखे जाने से पूर्व ही
हो चुकी थी खासी मशहूर और लगभग पुरस्कृत
सब जन लगभग चुप
सब जन चकित
सब जन श्रोता
वक्ता वह केवल एक
और बीच - बीच में हँसी का एकाध लहरदार समवेत।

यह एक अध्याय था
कस्बे के एक साहित्यिक आयोजन के मध्यांतर का
जिसके बैनर पर लिखे थे
'राष्ट्रीय' और 'कविता' जैसे कई चिर परिचित शब्द
जिसकी सचित्र रपट तैयार कर ली गई थी उसकी पूर्णाहुति से पूर्व
किन्तु जिसे याद किया जाना था आगामी कई वर्षों तक
बड़ी जगह से आए
एक बड़े कवि के
चटख ललछौंहे रंग के कुरते के बावजूद







बोलती हुई बात
 ( स्मरण : शमशेर बहादुर सिंह)
--------------

प्यास के पहाड़ों पर
चढ़ता रहा
हाँफता
गलती रही बर्फ़
बनकर नदी
नींद थी
नहीं थे स्वप्न
मैं न था
तुम थे साथ
यह कौन - सी यात्रा थी
नयन नत
उर्ध्व शीश
देह स्लथ
और सतत
बस एक पथ नवल।
* *
रोशनाई में घुलते आईने
आईनों में डूबती रात
एक तिनके तले दबा दिन
दूब की नोक से सिहरता व्योम
चाँदनी में सीझता चाँद
कोई उतराती स्मृति
और विस्मृति में डूबता सर्वस्व
किस्से - कहानियों जितना अपना होना
रेत के एक कण - सा यह भुवन मामूल
कवि तुम
तुम कवि
और बाकी बस बोलती हुई बात।







बीच बहस में
---------------

मैं हूँ
तुम हो
और वे हैं जो कि
अनुपस्थित चल रहे हैं लगातार

शब्द हैं
वाक्य हैं
आरोह - अवरोह है वाणी का
नहीं हैं ; बस नहीं हैं विचार

कहाँ है उत्स
किधर है परिणति
इस प्रयोजन का क्या ध्येय
संप्रति एक ही लय झंकृत बारंबार

ज्योतित खद्योत
सहमे सिकुड़े कपोत
सबकुछ विरुद से ओतप्रोत
गुंजित चहुंदिशि जय जयकार

यह बहस है
यही विमर्श
यही है अभिनव संवाद
यही भक्ति यही शक्ति यही मुक्ति का द्ववार !

और अंत में
 ( प्रार्थना की तरह )
इस युग को नमन - नमस्ते - नमस्कार !




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परिचय
सिद्धेश्वर सिंह

जन्म :  11  नवम्बर 1963, गाँव : मिर्चा , दिलदार नगर , जिला गा़जीपुर ( उत्तर प्रदेश )

शिक्षा : एम०ए०( हिन्दी ) , नेट (जे.आरएफ़.),पी-एच० डी०

प्रकाशन : विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कवितायें , कहानियाँ, समीक्षा  व शोध आलेख प्रकाशित।भारतीय लोक भाषा सर्वेक्षण की टीम के सदस्य के रूप में उत्तराखंड की थारू भाषा पर कार्य। विश्व कविता से अन्ना अख़्मतोवा, निज़ार क़ब्बानी, ओरहान वेली, वेरा पावलोवा , हालीना पोस्वियातोव्स्का , बिली कालिंस और अन्य महत्वपूर्ण कवियों की कविताओं के अनुवाद।  कविता संग्रह ' कर्मनाशा' 2012  में प्रकाशित। एक कविता संग्रह व अनुवाद  की दो पुस्तकें शीघ्र प्रकाश्य।  2007 से 'कर्मनाशा' शीर्षक ब्लॉग का संचालन- संपादन।
फिलहाल : उत्तराखंड प्रान्तीय उच्च शिक्षा सेवा में एसोशिएट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत।  

संपर्क : ए- 03, आफीसर्स कालोनी, टनकपुर रोड, 
अमाऊँ, पो० - खटीमा , 
जिला - ऊधमसिंह नगर  ( उत्तराखंड ) पिन - 262308  
मोबाइल - 09412905632 , 
ई मेल: sidhshail @gmail.com



Wednesday, August 29, 2018



विहाग वैभव की कविताएँ




विहाग वैभव 


















हत्या-पुरस्कार के लिए प्रेस-विज्ञप्ति
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वे कि जिनकी आँखों में घृणा 
समुद्र सी फैली है अनंत नीली-काली

जिनके हृदय के गर्भ-गृह
विधर्मियों की चीख 
किसी राग की तरह सध रही है सदी के भोर ही से 

सिर्फ और सिर्फ वही होंगें योग्य इस पुरस्कार के

जुलूस हो या शान्ति-मार्च
श्रद्धांजलि हो या प्रार्थना-सभा
जो कहीं भी , कभी भी 
अपनी आत्मा को कुचलते हुए पहुँच जाए 
उतार दे गर्दन में खंजर 
दाग दे छाती पर गोली 
इससे तनिक भी नहीं पड़े फर्क 
गर्दन आठ साल की बच्ची की थी 
छाती अठहत्तर साल के साधू की थी 

देश के ख्यात हत्यारे आएँ 
अपना-अपना कौशल दिखाएँ
अलग-अलग प्रारूपों में भिन्न-भिन्न पुरस्कार पाएँ 

मसलन
बच्चों की हत्या करें चिकित्साधिकारी बनें 
स्त्रियों की हत्या करें , सुरक्षाधिकारी बनें 

विधर्मियों की लाशें कब्रों से निकालें फिर हत्या करें 
मुख्यमंत्री बनें 
देश की छाती में धर्म का धुँआ भरकर देश की हत्या करें 
प्रधानमंत्री बनें 

इच्छुक अभ्यर्थी हत्या-पुरस्कार के लिए 
निःशुल्क आवेदन करें और आश्वस्त रहें 

पुरस्कार-निर्णय की प्रक्रिया में 
बरती जाएगी पूरी लोकतांत्रिकता । 





मृत्यु की भूमिका के कुछ शब्द
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परिवार के सीने पर पहाड़ रखकर 
गर मर जाऊँ साथी 
तो जलाना मत 
दफ़नाना मत 
बहाना मत 
फेंक देना किसी बीहड़ में निचाट नंगा मुझे 

कौन जाने किस जंगल का हाथ काटा जाये 
मुझे राख और धुँआ बनाने के क्रम में 
कि जो डाल मेरी चिता के साथ जल रही हो 
वह किसी कठफोड़वा का घर उजाड़ कर लायी गयी हो 
या फिर उस डाल पर हर रोज 
सुस्ताने आता हो कोई शकरखोरा जोड़ा 
और एक दिन उदास वापस लौट जाए
हमेशा-हमेशा के लिए 

यह कितना पीड़ादायक होगा 

चूँकि मैंने इस धरती पर तनिक भी जमीन नहीं जन्मा
तो लाठे भर जगह लेने का कोई अधिकार नहीं बनता मेरा 
सड़ी हुई लाश बनकर बह भी गया तो
किसी हिरण या हाथी के पेट मे समा जाऊँगा
प्यास में मृत्यु बनकर 

और यह वह अपराध होगा 
जिसके लिए 
किसी मरे हुए इंसान को भी फाँसी की सजा दी जानी चाहिए

तुम मेरी मिट्टी को उठाना 
और फेंक देना किसी दूर मैदान में 
कुछ गिद्धों और कौवों का निवाला हो जाने देना 
इसतरह मुझे सुकून से मरने में मदद मिलेगी
अच्छा लगेगा किसी का स्वाद होकर 

बस इसी स्वाद के लिए साथी 
गर मैं मर जाऊँ
तो जलाना मत 
दफ़नाना मत 
बहाना मत 
फेंक देना किसी बीहड़ में निचाट नंगा मुझे । 


अमृतलाल वेगड़ 





देश के बारे में शुभ-शुभ सोचते हुए
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अभी हमें देखना है कि 
पहाड़ों के शीर्ष से 
खून के बड़े-बड़े फव्वारे छूटेंगें
बड़े व्यापारी और राजा 
तर होकर नहायेंगें उसमें 
पहाड़ों के कुण्ड में जमा खून 
हमारा , आपका , इसका और उसका होगा 

अभी हम देखेंगें कि 
दूसरे बस्ती की 
गर्भवती महिलाओं के पेट से 
तलवारों के नाखूनों से खींचकर बाहर 
पँचमासी बच्चे का सिर काट दिया जाएगा 
और इस तरह से धर्म की साख बचा ली जाएगी 

अभी हम देखेंगें कि
बहुत काली अंधेरी रात के बाद
एक खूँखार भोर का पूरब 
विधर्मियों के रक्त से गाढ़ा लाल होगा 
धीरे-धीरे और चमकदार होती हुई तलवारें 
खनकते स्वरों में गाएंगीं प्रार्थना - 
सर्वे भवन्तु सुखिनः
वसुधैव कुटुम्बकम 

अभी सौहार्द और अधिकारों की बातें करने वाली जीभ को 
एक काँटे में फँसाकर लटकाया जाएगा 
जब तक कि पूरी जीभ 
आहार नली से फड़फड़ाते हुए बाहर नहीं आ जाती 
( इस पर सत्तापक्ष के लोग ताली बनायेंगें ) 

अभी राज्य का प्रचण्ड हत्यारा 
ससम्मान न्यायाधीश नियुक्त होगा 
अभी राज्य के कुख्यात चोरों के हाथों 
सौंप दिया जाएगा 
देश का वित्त मंत्रालय 

अभी देश की जनता 
देवताओं से रक्षा के लिए 
असुरों के पाँव पर गिरकर गिड़गिड़ायेगी 

विधर्मियों का गोश्त प्रसाद में बँटेगा 
भेड़िये अपने नाखून गिरवी रखकर नियामकों के पास 
चले जाएँगें अनन्त गुफा की ओर सिर झुकाए
असंख्य हत्याकांडों का पुण्य घोषित होना बचा हुआ है अभी 

अभी इस देश ने 
अपने भाग्य और इतिहास के 
सबसे बुरे दिन नहीं देखे हैं । 






सपने 
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विशाल तोप की पीठ पर चित्त लेटकर
दंगों के के बीच तलवार ओढ़कर सोते हुए
मणिकर्णिका पर जलाते हुए अपने जवान भाई की लाश 
उठते , बैठते , जागते , दौड़ते हुए 
हममें से हर किसी को सपने देखने ही चाहिए 
सपने , राख होती इस दुनियाँ की आखिरी उम्मीद हैं 

सपने देखने चाहिए लड़कियों को -

सभ्यता के बचपने उम्र 
आत्मा के पूरबी उजास में गुम लड़कियों ने 
जरा कम देखे सपने 
नतीजन , धकेल दी गईं चूल्हे चौके के तहखाने 
गले में बाँध दिया गया परिवार का पगहा
भोग ली गईं थाली में पड़ी अतिरिक्त चटनी की तरह
गिन ली गईं दशमलव के बाद की संख्याओं जैसीं
मगर अब 
जब लड़कियाँ भर भर आँख 
देख रही हैं बहुरंगी सपने 
तो ऐसे कि
दौड़कर लड़खड़ाते कदम चढ़ रही हैं मेट्रो 
लौट रही हैं ऑफिस से 
धकियाते , अपनी जगह बनाते भीड़ में 
ऐसे कि लड़कियों का एक जत्था
विश्वविद्यालयों के गेट पर हवा में लहराते दुपट्टा 
अपना वाजिब हिस्सा माँग रहा है 
ऐसे कि
पिता को फोन पर कह दी हैं वो बात 
जिसे वे पत्र में लिखकर कई दफा
जला चुकी हैं कई उम्र 
जिसमें प्रेमी को पति बनाने का जिक्र आया था अभिधा में 

सपने हमें नयी दुनियाँ रचने का हौसला देते हैं 
हममें से हर किसी को सपने देखने ही चाहिए 

सपने देखने चाहिए आदिवासियों को -
देखने चाहिए कि 
उनके जंगल की जाँघ चिचोरने आया बुल्डोजरी भूत का शरीर
जहर बुझी तीर की वार से नीला पड़ गया है 
देखने चाहिए कि 
उनकी बेटीयाँ बाजार गयी हैं लकड़ियाँ बेचने 
और बाजार ने उन्हें बेच नहीं दिया है
और यह भी कि 
मीडिया , गाय को भूल 
कैमरा लेकर पहुँच गया है उनके रसोईघरों में 
और घेर लिया है सरकार को भूख के मुद्दे पर 

सपने हमें हमारा हक दें या न दें 
हक के लिए लड़ने का माद्दा जरूर देते हैं 

सपने देखने चाहिए उन प्रेमियों को -
जो आज अपनी प्रेमिकाओं से आखिरी बार मिल रहे हैं 
आज के बाद ये प्रेमी 
रो-रोकर अपना गला सुजा लेंगें 
जिससे साँस लेना भी दुष्कर हो जायेगा
आज के बाद ये प्रेमी 
बिलख- बिलखकर पागल हो जायेंगें
और आस-पास के जिलों में 
युध्द के गीत गाते फिरेंगें 
इन प्रेमियों को भी सपने देखने चाहिए 
सपने भी ऐसे कि 
ये प्रेमी लड़के डूबने उतरते ही तालाब में 
कोई हंस हो गए हों 
और बहुत पुरानी तालाब की गाढ़ी काई को चीरते हुए 
बढ़ रहे हों दूसरे घाट की तरफ 
कि वहाँ इनका इन्तजार किसी और को भी है
इन प्रेमियों को सपने देखने चाहिए ऐसे कि -
इनके समर्पण की कथाएँ 
जा पहुँची हैं दूर देश
और यूनान का कोई देवता 
इनसे हाथ मिलाने के लिए बेताब है

सपने हमें पागल होने से बचा लेते हैं 

एक सामूहिक सपना देखना चाहिए इस देश को - 

यह देश जो भाले की तरह चन्दन को माथे पर सजाए
विधर्मियों की लाशों पर 
भारतमाता का झण्डा गाड़ते हुए 
आगे बढ़ने के भ्रम में 
किसी जंगली दलदल में फँसा जा रहा है 

या जब धर्म चरस की तरह चढ़ रहा है मस्तिष्क पर 
और छींक में आ रहा है विकलांग राष्ट्रवाद 
तो ऐसे में 
सपने देखना इस देश की जवान पीढ़ी की जिम्मेदारी हो जाती है 

एक सपना बनता है कि 
तुम भी जियो 
हम भी जियें 
एक ही मटके से पियें 
मगर भ्रष्ट करने के आरोप में 
किसी का गला न काट लिया जाये

एक सपना बनता है कि 
तुम अपने मस्जिद से निकलो 
मैं निकलता हूँ अपने मन्दिर से 
दोनों चलते हैं किसी नदी के एकांत 
और बैठकर गाते हों कोई लोकगीत
जिसमें हमारी पत्नियां गले भेंट गाती हों गारी 

सपने देश को रचने में हिस्सेदारी देते हैं भरपूर 

और अब 
यह समय जो धूर्त है 
इसमें 
राजा गिरे हुए मस्जिद की गाद पर बैठकर 
सत्ता में बने रहने का सपना देख रहा है 
उल्लू देख रहे हैं सपने 
सालों साल लम्बी अँधेरी रात का 
दुनियाँ को खरगोश भरा जंगल हो जाने का सपना 
भेड़िए देख रहे हैं 
और गिद्धों के सपने में देश 
एक मरी हुयी गाय की तरह आता है 

तो ऐसे में हमें इस कविता को 
किसी प्रार्थना या युद्धगीत की तरह गाया जाना चाहिए - 

कि विशाल तोप की पीठ पर चित्त लेटकर
दंगों के के बीच तलवार ओढ़कर सोते हुए
मणिकर्णिका पर जलाते हुए अपने जवान भाई की लाश 
उठते , बैठते , जागते , दौड़ते हुए 
हममें से हर किसी को सपने देखने ही चाहिए 
सपने , राख होती इस दुनियाँ की आखिरी उम्मीद हैं । 






ओझौती जारी है 
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तपते तवे पर डिग्रियाँ रखकर 
जवान लड़के जोर से चिल्लाये - रोजगार 

बिखरे चेहरे वाली अधनंगी लड़की 
हवा में खून सना सलवार लहराई 
और रोकर चीखी - न्याय 

मोहर लगे बोरे को लालच से देख 
हँसिया जड़े हाथों को जोड़ 
किसान गिड़गिड़ाया - अन्न 

उस सफेद कुर्ते वाले मोटे आदमी ने 
योजना भर राख दे मारी इनके मुँह पर 
मुस्कुराकर कहा - भभूत  । 






तलवारों का शोकगीत 
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कलिंग की तलवारें 
स्पार्टन तलवारों के गले लगकर 
खूब रोयीं इक रोज फफक फफक 

रोयीं तलवारें कि उन्होंने मृत्यु भेंट दिया 
कितने ही शानदार जवान लड़को के 
रेशेदार चिकने गर्दनों पर नंगी दौड़कर
और उनकी प्रेमिकाएँ 
बाजुओं पर बाँधें 
वादों का काला कपड़ा 
पूजती रह गयीं अपना अपना प्रेम 
चूमती रह गयीं बेतहाशा 
कटे गर्दन के होंठ 

तलवारों ने याद किये अपने अपने पाप 
भीतर तक भर गयीं 
मृत्यु- बोध से जन्मी जीवन पीड़ा से 

तलवारों ने याद किया 
कैसे उस वीर योद्धा के सीने से खून 
धुले हुए सिन्दूर की तरह से बह निकला था छलक छलक 
और योद्धा की आँखों में दौड़ गयी थी
कोई सात आठ साल की खुश 
बाँह फैलाये , दौड़ती पास आती हुई लड़की 

कलिंग और स्पार्टन तलवारों ने 
विनाश की यन्त्रणा लिए 
याद किया सिसकते हुए 
यदि घृणा , बदले और लोभ से भरे हाथ 
उन्हें हथेली पर जबरन न उठाते तो 
वे कभी भी अनिष्ट के लिए 
उत्तरदायी न रही होतीं 

दोनों तलवारों ने सांत्वना के स्वर में 
एक दूसरे को ढाँढस बँधाया -
तलवारें लोहे की होती हैं 
तलवारें बोल नहीं सकतीं 
तलवारें खुद लड़ नहीं सकतीं ।


अमृतलाल वेगड़




छद्म संवेदनाओं को भुना लो साथी
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छद्म संवेदनाओं को भुना लो साथी
कहीं दुर्घटनाओं का यह सुअवसर निकल न जाये 

भीतर से जरा और दम साधो
आंखों में तनिक और नमी लाओ
चेहरे पर पोत लो रोना और भी अधिक 
कि भुक्तभोगी जान जाय कि तुम उसके दुख में उससे अधिक दुखी हो

उसकी माँ को अँकवार में भींच लो बच्चे की तरह 
और अपनी शर्तिया वेदना से उसे तृप्त कर दो 
जबतक की वह तुम्हारी धूर्त संवेदना को पहचान न ले 

उसके दुख में सर्वाधिक करुणा उगलो
और उसका सबसे बड़ा हितकारी बनने की प्रतियोगिता में प्रथम आओ 

दुर्घटना की एक-एक जानकारी बहुत करीने से लो ऐसे
कि जैसे तुम देवता हो और उसमें कुछ जरूरी बदलाव कर सकते हो ।

इन सबके बीच एक जरूरी काम यह भी करना कि 
वह जो भीड़ से अलग खड़ा अपनी ही खामोशी में विलखता जा रहा है 
उसे परिदृश्य से बाहर ही धकेले रखना 
कहीं वह फूट पड़ा तो 
तुम्हारे आँसुओं का नकलीपन पहचान में आ जायेगा । 

उसके फूटने के पहले 
छद्म संवेदनाओं को भुना लो साथी 
कहीं दुर्घटनाओं का यह सुअवसर निकल न जाये । 





चाय पर शत्रु - सैनिक
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उस शाम हमारे बीच किसी युद्ध का रिश्ता नही था 
मैनें उसे पुकार दिया - 
आओ भीतर चले आओ बेधड़क 
अपनी बंदूक और असलहे वहीं बाहर रख दो 
आस-पड़ोस के बच्चे खेलेंगें उससे 
यह बंदूकों के भविष्य के लिए अच्छा होगा 

वह एक बहादुर सैनिक की तरह 
मेरे सामने की कुर्सी पर आ बैठा 
और मेरे आग्रह पर होंठों को चाय का स्वाद भेंट किया 

मैंनें कहा - 
कहो कहाँ से शुरुआत करें ?

उसने एक गहरी साँस ली , जैसे वह बेहद थका हुआ हो 
और बोला - उसके बारे में कुछ बताओ 

मैंनें उसके चेहरे पर एक भय लटका हुआ पाया 
पर नजरअंदाज किया और बोला - 

उसका नाम समसारा है 
उसकी बातें मजबूत इरादों से भरी होती हैं 
उसकी आँखों में महान करुणा का अथाह जल छलकता रहता है 
जब भी मैं उसे देखता हूँ 
मुझे अपने पेशे से घृणा होने लगती है

वह जिंदगी के हर लम्हें में इतनी मुलायम होती है कि 
जब भी धूप भरे छत पर वह निकल जाती है नंगे पाँव 
तो सूरज को गुदगुदी होने लगती है 
धूप खिलखिलाने लगता है 
वह दुनियाँ की सबसे खूबसूरत पत्नियों में से एक है 

मैंनें उससे पलट पूछा 
और तुम्हारी अपनी के बारे में कुछ बताओ ..
वह अचकचा सा गया और उदास भी हुआ 
उसने कुछ शब्दों को जोड़ने की कोशिस की - 

मैं उसका नाम नहीं लेना चाहता 
वह बेहद बेहूदा औरत है और बदचलन भी 
जीवन का दूसरा युद्ध जीतकर जब मैं घर लौटा था 
तब मैंनें पाया कि मैं उसे हार गया हूँ 
वह किसी अनजाने मर्द की बाहों में थी 
यह दृश्य देखकर मेरे जंग के घाव में अचानक दर्द उठने लगा 
मैं हारा हुआ और हताश महसूस करने लगा 
मेरी आत्मा किसी अदृश्य आग में झुलसने लगी
युद्ध अचानक मुझे अच्छा लगने लगा था 

मैंनें उसके कंधे पर हाथ रखा और और बोला -
नहीं मेरे दुश्मन ऐसे तो ठीक नहीं है 
ऐसे तो वह बदचलन नहीं हो जाती 
जैसे तुम्हारे  सैनिक होने के लिए युद्ध जरूरी है 
वैसे ही उसके स्त्री होने के लिए वह अनजाना लड़का 

वह मेरे तर्क के आगे समर्पण कर दिया 
और किसी भारी दुख में सिर झुका दिया 

मैंनें विषय बदल दिया ताकि उसके सीने में 
जो एक जहरीली गोली अभी घुसी है 
उसका कोई काट मिले - 

मैं तो विकल्पहीनता की राह चलते यहाँ पहुँचा 
पर तुम सैनिक कैसे बने ? 
क्या तुम बचपन से देशभक्त थे ? 

वह इस मुलाकात में पहली बार हँसा 
मेरे इस देशभक्त वाले प्रश्न पर 
और स्मृतियों को टटोलते हुए बोला - 

मैं एक रोज भूख से बेहाल अपने शहर में भटक रहा था 
तभी उधर से कुछ सिपाही गुजरे 
उन्होंने मुझे कुछ अच्छे खाने और पहनने का लालच दिया 
और अपने साथ उठा ले गए 

उन्होंने मुझे हत्या करने का प्रशिक्षण दिया 
हत्यारा बनाया 
हमला करने का प्रशिक्षण दिया 
आततायी बनाया 
उन्होनें बताया कि कैसे मैं तुम्हारे जैसे दुश्मनों का सिर 
उनके धड़ से उतार लूँ 
पर मेरा मन दया और करुणा से न भरने पाए 

उन्होंने मेरे चेहरे पर खून पोत दिया 
कहा कि यही तुम्हारी आत्मा का रंग है
मेरे कानों में हृदयविदारक चीख भर दी 
कहा कि यही तुम्हारे कर्तव्यों की आवाज है 
मेरी पुतलियों पर टाँग दिया लाशों से पटा युद्ध-भूमि 
और कहा कि यही तुम्हारी आँखों का आदर्श दृश्य है 
उन्होंने मुझे क्रूर होने में ही मेरे अस्तित्व की जानकारी दी 

यह सब कहते हुए वह लगभग रो रहा था 
आवाज में संयम लाते हुए उसने मुझसे पूछा - 
और तुम किसके लिए लड़ते हो ?

मैं इस प्रश्न के लिए तैयार नहीं था 
पर खुद को स्थिर और मजबूत करते हुए कहा - 

हम दोनों अपने राजा की हवश के लिए लड़ते हैं 
हम लड़ते हैं क्यों कि हमें लड़ना ही सिखाया गया है
हम लड़ते हैं कि लड़ना हमारा रोजगार है 

वह हल्की हँसी मुस्कुराते मेरी बात को पूरा किया -
दुनियाँ का हर सैनिक इसी लिए लड़ता है मेरे भाई 

वह चाय के लिए शुक्रिया कहते हुए उठा 
और दरवाजे का रुख किया 
उसे अपने बंदूक का खयाल न रहा
या शायद वह जानबूझकर वहाँ छोड़ गया 
बच्चों के खिलौने के लिए 
बंदूक के भविष्य के लिए 

वह आखिरी बार मुड़कर देखा तब मैंनें कहा -
मैं तुम्हें कल युद्ध में मार दूँगा 
वह मुस्कुराया और जवाब दिया - 
यही तो हमें सिखाया गया है । 




सीरिया के मुसलमान बच्चे 
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अल्लाह के बागान में जिन्हें 
उधम कर दौड़ जाना था अगले आँगन 
वे बम से फ़टे सड़क पर गला फाड़ रोते हुए 
अपनी माँ के चिथे स्तन चूम रहे हैं 

जिन्हें इतनी बड़ी विशाल दुनिया को गेंद की तरह उछाल खिलखिला देना था चहकते हुए 
वे अपने घरों में भाई के जिस्म का टुकड़ा बटोर रहे हैं 

जिन्हें एक डोरी के सहारे पृथ्वी को खींचकर उठा लेना  था हथेली पर
वे अपने संगियों की लाशों को झकझोर रहे हैं , अनन्त नींद से उठाने के लिए । 

सीरिया के मुसलमान बच्चे 
जिन्हें अपने मुसलमान होने की भी खबर न थी 
न ही कोई मतलब था सीरिया या अमेरिका के होने से 

सीरिया के मुसलमान बच्चे अमेरिका की थाली में परोसे गए हैं 

उनका गला फटा जा रहा है रोकर कि उनके अब्बू की सिर्फ जाँघ मीली चिपककर बिलखने के लिए 

सीरिया के बच्चे पाँव में अपनी लाश बाँध 
बदहवाश भटक रहे हैं अपने मोहल्ले के रास्तों पर 

अमेरिका हँस रहा है 

अमेरिका बहुत बड़ा देश है 
अमेरिका राजा देश है 
जैसे जंगल का सबसे खूँखार , क्रूर और बदमिजाज जानवर हो जाता है राजा 

सीरिया के बच्चे आज भटक रहे हैं 
सीरिया के आज से बचे बच्चे
एक रोज जवान हो जायेंगें 
उनसे महात्मा के व्यवहार की उम्मीद मत करना 

ये बचे हुए बच्चे एक रोज बड़े हो जायेगें

वे ईश्वर का कलेजा चबा जायेंगें पलक झपकते ही 
वे तुम्हारे आलीशान गगनचुंबी इमारतों को एक फूँक से उड़ा देंगें 
तुम्हारी परछाइयों तक की राख तक नहीं देंगें तुम्हारी पीढ़ियों को
वे तुम्हारे किले में घुसते ही खून और पानी का भेद मिटा देंगें 

ये लोरियों की उम्र में मर्शिया गाते हुए बच्चे
हर साँस में जहर पीते हुए बच्चे 
हर चीख में मौत रोते हुए बच्चे 

तुम देखना 
एक दिन जवान हो जायेंगे
ये सीरिया के मुसलमान बच्चे ।






लड़ने के लिए चाहिए 
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लड़ने के लिए चाहिए 
थोड़ी सी सनक , थोड़ा सा पागलपन
और एक आवाज को बुलंद करते हुए
मुफ्त में मर जाने का हुनर 

बहुत समझदार और सुलझे हुए लोग 
नहीं लड़ सकते कोई लड़ाई 
नहीं कर सकते कोई क्रांति 

जब घर मे लगी हो भीषण आग 
आग की जद में हों बहनें और बेटियाँ 
तो आग के सीने पर पाँव रखकर 
बढ़कर आगे उन्हें बचा लेने के लिए 
नहीं चाहिए कोई दर्शन या कोई महान विचार 

चाहिए तो बस 
थोड़ी सी सनक , थोड़ा सा पागलपन 
और एक खिलखिलाहट को बचाते हुए 
बेवजह झुलस जाने का हुनर 

जब मनुष्यता डूब रही हो 
बहुत काली आत्माओं के पाटों के बीच बहने वाली नदी , तो 
नहीं चाहिए कोई तैराकी का कौशल-ज्ञान

साँसों को छाती के बीच रोक
नदी में लगाकर छलाँग 
डूबते हुए को बचा लेने के लिए
चाहिए तो बस 

थोड़ी सी सनक , थोड़ा सा पागलपन
और एक आवाज की पुकार पर 
बेवजह डूब जाने का हुनर ।

बहुत समझदार और सुलझे हुए लोग 
नहीं सोख सकते कोई नदी 
नहीं हर सकते कोई आग  
नहीं लड़ सकते कोई लड़ाई ।
000


परिचय- 

विहाग वैभव 

शोध-छात्र : हिंदी विभाग ,  बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी , 

नया ज्ञानोदय , वागर्थ , आजकल , अदहन पत्रिकाओं सहित अनेक ब्लॉगों और और वेबसाइटों पर कविताएँ प्रकशित । 

मोबाइल- 8858356891

 साहित्य सम्मेलन,"साहित्य की बात" 17-18 september 2022 साकिबा  साकीबा रचना धर्मिता का जन मंच है -लीलाधर मंडलोई। यह कहा श्री लीलाधर...

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