Wednesday, August 29, 2018



विहाग वैभव की कविताएँ




विहाग वैभव 


















हत्या-पुरस्कार के लिए प्रेस-विज्ञप्ति
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वे कि जिनकी आँखों में घृणा 
समुद्र सी फैली है अनंत नीली-काली

जिनके हृदय के गर्भ-गृह
विधर्मियों की चीख 
किसी राग की तरह सध रही है सदी के भोर ही से 

सिर्फ और सिर्फ वही होंगें योग्य इस पुरस्कार के

जुलूस हो या शान्ति-मार्च
श्रद्धांजलि हो या प्रार्थना-सभा
जो कहीं भी , कभी भी 
अपनी आत्मा को कुचलते हुए पहुँच जाए 
उतार दे गर्दन में खंजर 
दाग दे छाती पर गोली 
इससे तनिक भी नहीं पड़े फर्क 
गर्दन आठ साल की बच्ची की थी 
छाती अठहत्तर साल के साधू की थी 

देश के ख्यात हत्यारे आएँ 
अपना-अपना कौशल दिखाएँ
अलग-अलग प्रारूपों में भिन्न-भिन्न पुरस्कार पाएँ 

मसलन
बच्चों की हत्या करें चिकित्साधिकारी बनें 
स्त्रियों की हत्या करें , सुरक्षाधिकारी बनें 

विधर्मियों की लाशें कब्रों से निकालें फिर हत्या करें 
मुख्यमंत्री बनें 
देश की छाती में धर्म का धुँआ भरकर देश की हत्या करें 
प्रधानमंत्री बनें 

इच्छुक अभ्यर्थी हत्या-पुरस्कार के लिए 
निःशुल्क आवेदन करें और आश्वस्त रहें 

पुरस्कार-निर्णय की प्रक्रिया में 
बरती जाएगी पूरी लोकतांत्रिकता । 





मृत्यु की भूमिका के कुछ शब्द
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परिवार के सीने पर पहाड़ रखकर 
गर मर जाऊँ साथी 
तो जलाना मत 
दफ़नाना मत 
बहाना मत 
फेंक देना किसी बीहड़ में निचाट नंगा मुझे 

कौन जाने किस जंगल का हाथ काटा जाये 
मुझे राख और धुँआ बनाने के क्रम में 
कि जो डाल मेरी चिता के साथ जल रही हो 
वह किसी कठफोड़वा का घर उजाड़ कर लायी गयी हो 
या फिर उस डाल पर हर रोज 
सुस्ताने आता हो कोई शकरखोरा जोड़ा 
और एक दिन उदास वापस लौट जाए
हमेशा-हमेशा के लिए 

यह कितना पीड़ादायक होगा 

चूँकि मैंने इस धरती पर तनिक भी जमीन नहीं जन्मा
तो लाठे भर जगह लेने का कोई अधिकार नहीं बनता मेरा 
सड़ी हुई लाश बनकर बह भी गया तो
किसी हिरण या हाथी के पेट मे समा जाऊँगा
प्यास में मृत्यु बनकर 

और यह वह अपराध होगा 
जिसके लिए 
किसी मरे हुए इंसान को भी फाँसी की सजा दी जानी चाहिए

तुम मेरी मिट्टी को उठाना 
और फेंक देना किसी दूर मैदान में 
कुछ गिद्धों और कौवों का निवाला हो जाने देना 
इसतरह मुझे सुकून से मरने में मदद मिलेगी
अच्छा लगेगा किसी का स्वाद होकर 

बस इसी स्वाद के लिए साथी 
गर मैं मर जाऊँ
तो जलाना मत 
दफ़नाना मत 
बहाना मत 
फेंक देना किसी बीहड़ में निचाट नंगा मुझे । 


अमृतलाल वेगड़ 





देश के बारे में शुभ-शुभ सोचते हुए
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अभी हमें देखना है कि 
पहाड़ों के शीर्ष से 
खून के बड़े-बड़े फव्वारे छूटेंगें
बड़े व्यापारी और राजा 
तर होकर नहायेंगें उसमें 
पहाड़ों के कुण्ड में जमा खून 
हमारा , आपका , इसका और उसका होगा 

अभी हम देखेंगें कि 
दूसरे बस्ती की 
गर्भवती महिलाओं के पेट से 
तलवारों के नाखूनों से खींचकर बाहर 
पँचमासी बच्चे का सिर काट दिया जाएगा 
और इस तरह से धर्म की साख बचा ली जाएगी 

अभी हम देखेंगें कि
बहुत काली अंधेरी रात के बाद
एक खूँखार भोर का पूरब 
विधर्मियों के रक्त से गाढ़ा लाल होगा 
धीरे-धीरे और चमकदार होती हुई तलवारें 
खनकते स्वरों में गाएंगीं प्रार्थना - 
सर्वे भवन्तु सुखिनः
वसुधैव कुटुम्बकम 

अभी सौहार्द और अधिकारों की बातें करने वाली जीभ को 
एक काँटे में फँसाकर लटकाया जाएगा 
जब तक कि पूरी जीभ 
आहार नली से फड़फड़ाते हुए बाहर नहीं आ जाती 
( इस पर सत्तापक्ष के लोग ताली बनायेंगें ) 

अभी राज्य का प्रचण्ड हत्यारा 
ससम्मान न्यायाधीश नियुक्त होगा 
अभी राज्य के कुख्यात चोरों के हाथों 
सौंप दिया जाएगा 
देश का वित्त मंत्रालय 

अभी देश की जनता 
देवताओं से रक्षा के लिए 
असुरों के पाँव पर गिरकर गिड़गिड़ायेगी 

विधर्मियों का गोश्त प्रसाद में बँटेगा 
भेड़िये अपने नाखून गिरवी रखकर नियामकों के पास 
चले जाएँगें अनन्त गुफा की ओर सिर झुकाए
असंख्य हत्याकांडों का पुण्य घोषित होना बचा हुआ है अभी 

अभी इस देश ने 
अपने भाग्य और इतिहास के 
सबसे बुरे दिन नहीं देखे हैं । 






सपने 
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विशाल तोप की पीठ पर चित्त लेटकर
दंगों के के बीच तलवार ओढ़कर सोते हुए
मणिकर्णिका पर जलाते हुए अपने जवान भाई की लाश 
उठते , बैठते , जागते , दौड़ते हुए 
हममें से हर किसी को सपने देखने ही चाहिए 
सपने , राख होती इस दुनियाँ की आखिरी उम्मीद हैं 

सपने देखने चाहिए लड़कियों को -

सभ्यता के बचपने उम्र 
आत्मा के पूरबी उजास में गुम लड़कियों ने 
जरा कम देखे सपने 
नतीजन , धकेल दी गईं चूल्हे चौके के तहखाने 
गले में बाँध दिया गया परिवार का पगहा
भोग ली गईं थाली में पड़ी अतिरिक्त चटनी की तरह
गिन ली गईं दशमलव के बाद की संख्याओं जैसीं
मगर अब 
जब लड़कियाँ भर भर आँख 
देख रही हैं बहुरंगी सपने 
तो ऐसे कि
दौड़कर लड़खड़ाते कदम चढ़ रही हैं मेट्रो 
लौट रही हैं ऑफिस से 
धकियाते , अपनी जगह बनाते भीड़ में 
ऐसे कि लड़कियों का एक जत्था
विश्वविद्यालयों के गेट पर हवा में लहराते दुपट्टा 
अपना वाजिब हिस्सा माँग रहा है 
ऐसे कि
पिता को फोन पर कह दी हैं वो बात 
जिसे वे पत्र में लिखकर कई दफा
जला चुकी हैं कई उम्र 
जिसमें प्रेमी को पति बनाने का जिक्र आया था अभिधा में 

सपने हमें नयी दुनियाँ रचने का हौसला देते हैं 
हममें से हर किसी को सपने देखने ही चाहिए 

सपने देखने चाहिए आदिवासियों को -
देखने चाहिए कि 
उनके जंगल की जाँघ चिचोरने आया बुल्डोजरी भूत का शरीर
जहर बुझी तीर की वार से नीला पड़ गया है 
देखने चाहिए कि 
उनकी बेटीयाँ बाजार गयी हैं लकड़ियाँ बेचने 
और बाजार ने उन्हें बेच नहीं दिया है
और यह भी कि 
मीडिया , गाय को भूल 
कैमरा लेकर पहुँच गया है उनके रसोईघरों में 
और घेर लिया है सरकार को भूख के मुद्दे पर 

सपने हमें हमारा हक दें या न दें 
हक के लिए लड़ने का माद्दा जरूर देते हैं 

सपने देखने चाहिए उन प्रेमियों को -
जो आज अपनी प्रेमिकाओं से आखिरी बार मिल रहे हैं 
आज के बाद ये प्रेमी 
रो-रोकर अपना गला सुजा लेंगें 
जिससे साँस लेना भी दुष्कर हो जायेगा
आज के बाद ये प्रेमी 
बिलख- बिलखकर पागल हो जायेंगें
और आस-पास के जिलों में 
युध्द के गीत गाते फिरेंगें 
इन प्रेमियों को भी सपने देखने चाहिए 
सपने भी ऐसे कि 
ये प्रेमी लड़के डूबने उतरते ही तालाब में 
कोई हंस हो गए हों 
और बहुत पुरानी तालाब की गाढ़ी काई को चीरते हुए 
बढ़ रहे हों दूसरे घाट की तरफ 
कि वहाँ इनका इन्तजार किसी और को भी है
इन प्रेमियों को सपने देखने चाहिए ऐसे कि -
इनके समर्पण की कथाएँ 
जा पहुँची हैं दूर देश
और यूनान का कोई देवता 
इनसे हाथ मिलाने के लिए बेताब है

सपने हमें पागल होने से बचा लेते हैं 

एक सामूहिक सपना देखना चाहिए इस देश को - 

यह देश जो भाले की तरह चन्दन को माथे पर सजाए
विधर्मियों की लाशों पर 
भारतमाता का झण्डा गाड़ते हुए 
आगे बढ़ने के भ्रम में 
किसी जंगली दलदल में फँसा जा रहा है 

या जब धर्म चरस की तरह चढ़ रहा है मस्तिष्क पर 
और छींक में आ रहा है विकलांग राष्ट्रवाद 
तो ऐसे में 
सपने देखना इस देश की जवान पीढ़ी की जिम्मेदारी हो जाती है 

एक सपना बनता है कि 
तुम भी जियो 
हम भी जियें 
एक ही मटके से पियें 
मगर भ्रष्ट करने के आरोप में 
किसी का गला न काट लिया जाये

एक सपना बनता है कि 
तुम अपने मस्जिद से निकलो 
मैं निकलता हूँ अपने मन्दिर से 
दोनों चलते हैं किसी नदी के एकांत 
और बैठकर गाते हों कोई लोकगीत
जिसमें हमारी पत्नियां गले भेंट गाती हों गारी 

सपने देश को रचने में हिस्सेदारी देते हैं भरपूर 

और अब 
यह समय जो धूर्त है 
इसमें 
राजा गिरे हुए मस्जिद की गाद पर बैठकर 
सत्ता में बने रहने का सपना देख रहा है 
उल्लू देख रहे हैं सपने 
सालों साल लम्बी अँधेरी रात का 
दुनियाँ को खरगोश भरा जंगल हो जाने का सपना 
भेड़िए देख रहे हैं 
और गिद्धों के सपने में देश 
एक मरी हुयी गाय की तरह आता है 

तो ऐसे में हमें इस कविता को 
किसी प्रार्थना या युद्धगीत की तरह गाया जाना चाहिए - 

कि विशाल तोप की पीठ पर चित्त लेटकर
दंगों के के बीच तलवार ओढ़कर सोते हुए
मणिकर्णिका पर जलाते हुए अपने जवान भाई की लाश 
उठते , बैठते , जागते , दौड़ते हुए 
हममें से हर किसी को सपने देखने ही चाहिए 
सपने , राख होती इस दुनियाँ की आखिरी उम्मीद हैं । 






ओझौती जारी है 
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तपते तवे पर डिग्रियाँ रखकर 
जवान लड़के जोर से चिल्लाये - रोजगार 

बिखरे चेहरे वाली अधनंगी लड़की 
हवा में खून सना सलवार लहराई 
और रोकर चीखी - न्याय 

मोहर लगे बोरे को लालच से देख 
हँसिया जड़े हाथों को जोड़ 
किसान गिड़गिड़ाया - अन्न 

उस सफेद कुर्ते वाले मोटे आदमी ने 
योजना भर राख दे मारी इनके मुँह पर 
मुस्कुराकर कहा - भभूत  । 






तलवारों का शोकगीत 
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कलिंग की तलवारें 
स्पार्टन तलवारों के गले लगकर 
खूब रोयीं इक रोज फफक फफक 

रोयीं तलवारें कि उन्होंने मृत्यु भेंट दिया 
कितने ही शानदार जवान लड़को के 
रेशेदार चिकने गर्दनों पर नंगी दौड़कर
और उनकी प्रेमिकाएँ 
बाजुओं पर बाँधें 
वादों का काला कपड़ा 
पूजती रह गयीं अपना अपना प्रेम 
चूमती रह गयीं बेतहाशा 
कटे गर्दन के होंठ 

तलवारों ने याद किये अपने अपने पाप 
भीतर तक भर गयीं 
मृत्यु- बोध से जन्मी जीवन पीड़ा से 

तलवारों ने याद किया 
कैसे उस वीर योद्धा के सीने से खून 
धुले हुए सिन्दूर की तरह से बह निकला था छलक छलक 
और योद्धा की आँखों में दौड़ गयी थी
कोई सात आठ साल की खुश 
बाँह फैलाये , दौड़ती पास आती हुई लड़की 

कलिंग और स्पार्टन तलवारों ने 
विनाश की यन्त्रणा लिए 
याद किया सिसकते हुए 
यदि घृणा , बदले और लोभ से भरे हाथ 
उन्हें हथेली पर जबरन न उठाते तो 
वे कभी भी अनिष्ट के लिए 
उत्तरदायी न रही होतीं 

दोनों तलवारों ने सांत्वना के स्वर में 
एक दूसरे को ढाँढस बँधाया -
तलवारें लोहे की होती हैं 
तलवारें बोल नहीं सकतीं 
तलवारें खुद लड़ नहीं सकतीं ।


अमृतलाल वेगड़




छद्म संवेदनाओं को भुना लो साथी
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छद्म संवेदनाओं को भुना लो साथी
कहीं दुर्घटनाओं का यह सुअवसर निकल न जाये 

भीतर से जरा और दम साधो
आंखों में तनिक और नमी लाओ
चेहरे पर पोत लो रोना और भी अधिक 
कि भुक्तभोगी जान जाय कि तुम उसके दुख में उससे अधिक दुखी हो

उसकी माँ को अँकवार में भींच लो बच्चे की तरह 
और अपनी शर्तिया वेदना से उसे तृप्त कर दो 
जबतक की वह तुम्हारी धूर्त संवेदना को पहचान न ले 

उसके दुख में सर्वाधिक करुणा उगलो
और उसका सबसे बड़ा हितकारी बनने की प्रतियोगिता में प्रथम आओ 

दुर्घटना की एक-एक जानकारी बहुत करीने से लो ऐसे
कि जैसे तुम देवता हो और उसमें कुछ जरूरी बदलाव कर सकते हो ।

इन सबके बीच एक जरूरी काम यह भी करना कि 
वह जो भीड़ से अलग खड़ा अपनी ही खामोशी में विलखता जा रहा है 
उसे परिदृश्य से बाहर ही धकेले रखना 
कहीं वह फूट पड़ा तो 
तुम्हारे आँसुओं का नकलीपन पहचान में आ जायेगा । 

उसके फूटने के पहले 
छद्म संवेदनाओं को भुना लो साथी 
कहीं दुर्घटनाओं का यह सुअवसर निकल न जाये । 





चाय पर शत्रु - सैनिक
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उस शाम हमारे बीच किसी युद्ध का रिश्ता नही था 
मैनें उसे पुकार दिया - 
आओ भीतर चले आओ बेधड़क 
अपनी बंदूक और असलहे वहीं बाहर रख दो 
आस-पड़ोस के बच्चे खेलेंगें उससे 
यह बंदूकों के भविष्य के लिए अच्छा होगा 

वह एक बहादुर सैनिक की तरह 
मेरे सामने की कुर्सी पर आ बैठा 
और मेरे आग्रह पर होंठों को चाय का स्वाद भेंट किया 

मैंनें कहा - 
कहो कहाँ से शुरुआत करें ?

उसने एक गहरी साँस ली , जैसे वह बेहद थका हुआ हो 
और बोला - उसके बारे में कुछ बताओ 

मैंनें उसके चेहरे पर एक भय लटका हुआ पाया 
पर नजरअंदाज किया और बोला - 

उसका नाम समसारा है 
उसकी बातें मजबूत इरादों से भरी होती हैं 
उसकी आँखों में महान करुणा का अथाह जल छलकता रहता है 
जब भी मैं उसे देखता हूँ 
मुझे अपने पेशे से घृणा होने लगती है

वह जिंदगी के हर लम्हें में इतनी मुलायम होती है कि 
जब भी धूप भरे छत पर वह निकल जाती है नंगे पाँव 
तो सूरज को गुदगुदी होने लगती है 
धूप खिलखिलाने लगता है 
वह दुनियाँ की सबसे खूबसूरत पत्नियों में से एक है 

मैंनें उससे पलट पूछा 
और तुम्हारी अपनी के बारे में कुछ बताओ ..
वह अचकचा सा गया और उदास भी हुआ 
उसने कुछ शब्दों को जोड़ने की कोशिस की - 

मैं उसका नाम नहीं लेना चाहता 
वह बेहद बेहूदा औरत है और बदचलन भी 
जीवन का दूसरा युद्ध जीतकर जब मैं घर लौटा था 
तब मैंनें पाया कि मैं उसे हार गया हूँ 
वह किसी अनजाने मर्द की बाहों में थी 
यह दृश्य देखकर मेरे जंग के घाव में अचानक दर्द उठने लगा 
मैं हारा हुआ और हताश महसूस करने लगा 
मेरी आत्मा किसी अदृश्य आग में झुलसने लगी
युद्ध अचानक मुझे अच्छा लगने लगा था 

मैंनें उसके कंधे पर हाथ रखा और और बोला -
नहीं मेरे दुश्मन ऐसे तो ठीक नहीं है 
ऐसे तो वह बदचलन नहीं हो जाती 
जैसे तुम्हारे  सैनिक होने के लिए युद्ध जरूरी है 
वैसे ही उसके स्त्री होने के लिए वह अनजाना लड़का 

वह मेरे तर्क के आगे समर्पण कर दिया 
और किसी भारी दुख में सिर झुका दिया 

मैंनें विषय बदल दिया ताकि उसके सीने में 
जो एक जहरीली गोली अभी घुसी है 
उसका कोई काट मिले - 

मैं तो विकल्पहीनता की राह चलते यहाँ पहुँचा 
पर तुम सैनिक कैसे बने ? 
क्या तुम बचपन से देशभक्त थे ? 

वह इस मुलाकात में पहली बार हँसा 
मेरे इस देशभक्त वाले प्रश्न पर 
और स्मृतियों को टटोलते हुए बोला - 

मैं एक रोज भूख से बेहाल अपने शहर में भटक रहा था 
तभी उधर से कुछ सिपाही गुजरे 
उन्होंने मुझे कुछ अच्छे खाने और पहनने का लालच दिया 
और अपने साथ उठा ले गए 

उन्होंने मुझे हत्या करने का प्रशिक्षण दिया 
हत्यारा बनाया 
हमला करने का प्रशिक्षण दिया 
आततायी बनाया 
उन्होनें बताया कि कैसे मैं तुम्हारे जैसे दुश्मनों का सिर 
उनके धड़ से उतार लूँ 
पर मेरा मन दया और करुणा से न भरने पाए 

उन्होंने मेरे चेहरे पर खून पोत दिया 
कहा कि यही तुम्हारी आत्मा का रंग है
मेरे कानों में हृदयविदारक चीख भर दी 
कहा कि यही तुम्हारे कर्तव्यों की आवाज है 
मेरी पुतलियों पर टाँग दिया लाशों से पटा युद्ध-भूमि 
और कहा कि यही तुम्हारी आँखों का आदर्श दृश्य है 
उन्होंने मुझे क्रूर होने में ही मेरे अस्तित्व की जानकारी दी 

यह सब कहते हुए वह लगभग रो रहा था 
आवाज में संयम लाते हुए उसने मुझसे पूछा - 
और तुम किसके लिए लड़ते हो ?

मैं इस प्रश्न के लिए तैयार नहीं था 
पर खुद को स्थिर और मजबूत करते हुए कहा - 

हम दोनों अपने राजा की हवश के लिए लड़ते हैं 
हम लड़ते हैं क्यों कि हमें लड़ना ही सिखाया गया है
हम लड़ते हैं कि लड़ना हमारा रोजगार है 

वह हल्की हँसी मुस्कुराते मेरी बात को पूरा किया -
दुनियाँ का हर सैनिक इसी लिए लड़ता है मेरे भाई 

वह चाय के लिए शुक्रिया कहते हुए उठा 
और दरवाजे का रुख किया 
उसे अपने बंदूक का खयाल न रहा
या शायद वह जानबूझकर वहाँ छोड़ गया 
बच्चों के खिलौने के लिए 
बंदूक के भविष्य के लिए 

वह आखिरी बार मुड़कर देखा तब मैंनें कहा -
मैं तुम्हें कल युद्ध में मार दूँगा 
वह मुस्कुराया और जवाब दिया - 
यही तो हमें सिखाया गया है । 




सीरिया के मुसलमान बच्चे 
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अल्लाह के बागान में जिन्हें 
उधम कर दौड़ जाना था अगले आँगन 
वे बम से फ़टे सड़क पर गला फाड़ रोते हुए 
अपनी माँ के चिथे स्तन चूम रहे हैं 

जिन्हें इतनी बड़ी विशाल दुनिया को गेंद की तरह उछाल खिलखिला देना था चहकते हुए 
वे अपने घरों में भाई के जिस्म का टुकड़ा बटोर रहे हैं 

जिन्हें एक डोरी के सहारे पृथ्वी को खींचकर उठा लेना  था हथेली पर
वे अपने संगियों की लाशों को झकझोर रहे हैं , अनन्त नींद से उठाने के लिए । 

सीरिया के मुसलमान बच्चे 
जिन्हें अपने मुसलमान होने की भी खबर न थी 
न ही कोई मतलब था सीरिया या अमेरिका के होने से 

सीरिया के मुसलमान बच्चे अमेरिका की थाली में परोसे गए हैं 

उनका गला फटा जा रहा है रोकर कि उनके अब्बू की सिर्फ जाँघ मीली चिपककर बिलखने के लिए 

सीरिया के बच्चे पाँव में अपनी लाश बाँध 
बदहवाश भटक रहे हैं अपने मोहल्ले के रास्तों पर 

अमेरिका हँस रहा है 

अमेरिका बहुत बड़ा देश है 
अमेरिका राजा देश है 
जैसे जंगल का सबसे खूँखार , क्रूर और बदमिजाज जानवर हो जाता है राजा 

सीरिया के बच्चे आज भटक रहे हैं 
सीरिया के आज से बचे बच्चे
एक रोज जवान हो जायेंगें 
उनसे महात्मा के व्यवहार की उम्मीद मत करना 

ये बचे हुए बच्चे एक रोज बड़े हो जायेगें

वे ईश्वर का कलेजा चबा जायेंगें पलक झपकते ही 
वे तुम्हारे आलीशान गगनचुंबी इमारतों को एक फूँक से उड़ा देंगें 
तुम्हारी परछाइयों तक की राख तक नहीं देंगें तुम्हारी पीढ़ियों को
वे तुम्हारे किले में घुसते ही खून और पानी का भेद मिटा देंगें 

ये लोरियों की उम्र में मर्शिया गाते हुए बच्चे
हर साँस में जहर पीते हुए बच्चे 
हर चीख में मौत रोते हुए बच्चे 

तुम देखना 
एक दिन जवान हो जायेंगे
ये सीरिया के मुसलमान बच्चे ।






लड़ने के लिए चाहिए 
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लड़ने के लिए चाहिए 
थोड़ी सी सनक , थोड़ा सा पागलपन
और एक आवाज को बुलंद करते हुए
मुफ्त में मर जाने का हुनर 

बहुत समझदार और सुलझे हुए लोग 
नहीं लड़ सकते कोई लड़ाई 
नहीं कर सकते कोई क्रांति 

जब घर मे लगी हो भीषण आग 
आग की जद में हों बहनें और बेटियाँ 
तो आग के सीने पर पाँव रखकर 
बढ़कर आगे उन्हें बचा लेने के लिए 
नहीं चाहिए कोई दर्शन या कोई महान विचार 

चाहिए तो बस 
थोड़ी सी सनक , थोड़ा सा पागलपन 
और एक खिलखिलाहट को बचाते हुए 
बेवजह झुलस जाने का हुनर 

जब मनुष्यता डूब रही हो 
बहुत काली आत्माओं के पाटों के बीच बहने वाली नदी , तो 
नहीं चाहिए कोई तैराकी का कौशल-ज्ञान

साँसों को छाती के बीच रोक
नदी में लगाकर छलाँग 
डूबते हुए को बचा लेने के लिए
चाहिए तो बस 

थोड़ी सी सनक , थोड़ा सा पागलपन
और एक आवाज की पुकार पर 
बेवजह डूब जाने का हुनर ।

बहुत समझदार और सुलझे हुए लोग 
नहीं सोख सकते कोई नदी 
नहीं हर सकते कोई आग  
नहीं लड़ सकते कोई लड़ाई ।
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परिचय- 

विहाग वैभव 

शोध-छात्र : हिंदी विभाग ,  बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी , 

नया ज्ञानोदय , वागर्थ , आजकल , अदहन पत्रिकाओं सहित अनेक ब्लॉगों और और वेबसाइटों पर कविताएँ प्रकशित । 

मोबाइल- 8858356891

Sunday, August 19, 2018

उपन्यासनामा:भाग पांच 
कागज़ की नाव 
नासिरा  शर्मा 



नासिरा शर्मा 


रिश्तों की आंतरिक बुनावट और काग़ज़ की नाव

नासिरा जी का नया उपन्यास ‘कागज की नाव’ मानवीय जीवन की आंतरिक बुनावट के सूत्रों को बखूबी पकड़ता है, न केवल पकड़ता है बल्कि उन्हें भरपूर जीने की कोशिश भी करता है। वर्तमान मानवीय जीवन जिस तरह से खांचाबद्ध होता जा रहा है, बावजूद इसके ‘काग़ज़ की नाव’ जीवन को रिश्तों और संबंधों की आंतरिक लय में प्रस्तुत करता है। नासिरा जी अपने लेखन के आरंभ से ही भारतीय जीवन को उसकी संपूर्णता में, संबंधों की जटिल बुनावट में, रिश्तों की कड़वाहट के साथ उनकी अनिवार्यता में और यह दिखाते हुए कि रिश्तों की इस संरचना के बिना जीवन संभव नहीं है, प्रस्तुत करती रहीं हैं। वे महरूख जैसा चरित्र ‘ठीकरे की मंगनी’ में रच चुकी हैं, शाल्मली अंत तक रिश्ते को जीने और बनाये रखने के लिये प्रयत्नशील रहती है। ‘जीरो रोड’ जिस तरह से मानवीय रिश्तों को ‘तेल के कुयें की तरह ड्रिल किये जाने’ के बीच बुनता है वह बेमिसाल है। जीरो रोड में जिस तरह अरब देशों में रोजगार की तलाश में भारतीय युवा जाते हैं, और वहाँ जो नारकीय जीवन जीते हैं, ‘डॉ. जिवागो’ देखते हैं और मानवीय रिश्तों की अहमियत को पहचानते हैं उसी तरह इस उपन्यास में भी अरब देशों में पैसा कमाने गये युवा अपने परिवार को यहाँ तमाम जिम्मेदारियाँ उठाने छोड़ जाते हैं, और जीवन को विघटित होते जाने से बचाने के प्रयास में उनके बूढे़ माँ-बाप संघर्ष करते हैं वह देखने लायक है।

काग़ज़ की नाव की कहानी अमजद और महजबीं के परिवार और रिश्तों-नातों के बीच बुनी गई है। सामान्य भारतीय परिवार की यह कहानी ‘परिवार’ का केन्द्र ‘स्त्री’ के सामाजिक जीवन से अनुकूलित ‘चरित्र’ और ‘सोच’ के बीच परिवारों के बनने और बनते हुए बिगड़ने या टूटने की कगार तक पहुँचने की स्थितियों को बहुत ही सामान्य सी दिखने वाली, परन्तु महत्वपूर्ण गतिविधियों के माध्यम से उकेरती है। ‘महजबीं’ अमजद की पत्नी हैं, उसके दो बेटियाँ हैं, महलका और माजदा। अमजद का एक परिवार था जिसमें उसके माता पिता और बड़े भाई भी साथ थे पर महजबीं की मानसिक बुनावट में विघटन रचा बसा था, जिसके चलते उनका परिवार टूट गया और बड़े भाई और माता पिता विदेश में बस जाते हैं। इसी सोच के कारण महजबीं अपनी बेटियों के घर भी इसी तरह तोड़ने के लिये प्रयासरत रहती है, मगर उसकी बेटियाँ ऐसा नहीं होनें देतीं।

महजबीं एक परंपरागत अंधविश्वासी और ढेरों गलतफहमियों को शिकार है, उसने मान रखा है कि उसके निजी जीवन में अपने पति और बच्चों के अलावा किसी का हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। यही वह करती भी है। अमजद अपने घर में आये दिन के झगड़ों के कारण घर का बंटवारा स्वीकार कर लेते हैं और अपनी पत्नी और बेटियों के साथ अलग रहने लगते हैं। पर महजबीं को अपने पति की मानसिक पीड़ा और तकलीफ का अहसास नहीं होता। वह तो अपनी मर्जी और संपत्ति की मालिक बनकर रहने का ख्वाब पाले हुई थीे जो वह पूरा करती है। परंतु बाद में उसे अहसास हो जाता है कि वह गलत थी। यह अहसास कोई सामान्य सी हृृदय परिवर्तन की घटना नहीं है। नासिरा जी ने जीवन को इस तरह रचा बुना है कि अमजद की खामोशी और छोटी बेटी माजदा के सकारात्मक प्रयास महजबीं को अपनी विघटनकारी सोच के प्रति पश्चाताप और प्रयाश्चित की आग में जलने को विवश कर देती हैं।

महजबीं अंधविश्वास की गिरफ्त में है। जादू-टोने, मूठ मारने और गंडा-तावीज के द्वारा पुरुष को अपने बस में रखना, सास ससूर को बीमार करना, परेशान करना, बेटी की ससुराल में भी यह सब करने के लिये वह ओझा-आमिलों के चक्कर लगाया करती है। जैसा कि नासिरा जी ने लिखा है कि शहर की अधिकांश औरतें इनके चक्करों में फंसी हुईं हैं। - ‘‘महजबीं इस शहर की अकेली औरत थोड़ी थी जो जादू टोने से अपने हालात सुधारने की कोशिश में जुटी थी। पूरा शहर न सही मगर आधे शहर की औरतें खुदा और ईश्वर से ज्यादा आमिलों और ओझाओं के रिश्में और जादू टोने पर यकींन रखने लगीं थीं क्योंकि उन्हें मियां के दिल पर हुक्मरानी और ससुराल वालों के दिल जीतने की जगह मियां की कमाई पर कब्जा करने की तमन्ना थी ताकि वह खुलकर अपनी मर्जी से जी सकें। इस सोच में अनपढ़ से ज्यादा पढ़ी लिखी महिलायें शामिल थीं। जो अब किसी प्रकार का अत्याचार, अंकुश और जकड़न सहन करने की क़ायल नहीं रह गईं थीं।’’1  








मानवीय रिश्तों की द्वंद्वात्मकता को और अन्तर्विरोधों को बखूबी उभारा है नासिरा जी ने। महजबीं और अमजद के बीच छोटी बेटी माजदा के विवाह को लेकर जो बहस होती है उसमें इन दोनों के रूप दिख जाते हैं। महजबीं अपनी बेटी के ससुराल में गंडा तावीज के माध्यम से उसका वर्चस्व स्थापित करने के लिये उसे उकसाती है, परन्तु माजदा जब इससे इंकार कर देती है तो अमजद को भी अपने पति और पति होने का अहसास जागता है और वे माजदा को अपने विचारों का प्रतिनिधि कहते हुए उसे बेटे के बराबर होने का दर्जा देते हैं। वे अपनी पत्नी को अहसास दिलाते हैं कि तुम अपनी बेटी का घर बरबाद करने पर तुली हो। इस बहस में जो बात साफ उभरती है, वह यह कि महजबीं अपनी बेटी को सुखी देखना चाहती है, इसके लिये वह ससुराल के लोगों पर जादू टोने से उसका अधिकार करवाने का रास्ता अख्तियार करना चाहती है। उधर अमजद भी बेटी को सुखी देखना चाहते हैं, परन्तु इसके लिये वे रिश्तों की साफ और खुली समझ को पेश करते हैं, और इसके लिये वे बेटी के विचारों से सहमत हैं। यही द्वंद्वात्मकता है कि दोनों ही बेटी को खुश देखने के लिये प्रयत्नशील है, परन्तु अन्तर्विरोध यह है कि दोनों ही अलग रास्ते अपनाते हैं। पूरी कहानी में इसी तरह रिश्तों के बीच के अन्तर्विरोध और द्वंद्वात्मकता उभरती है। अमजद मियां रिश्तों को मानवीय संवेदना और स्थितियों में देखने और जीने के विचारों के प्रतिनिधि है और उनकी तरह ही उनकी छोटी बेटी माजदा उनके विचारों को अपनाती है। दूसरी ओर रिश्तों पर अधिकार और वर्चस्व की सोच से बंधी हुई महजबीं है जो अपने और अपनी बेटी के अधिकारां और परिवार पर पूर्ण अधिकार के लिये अंधविश्वास और टोने टोटकों की शरण में जाती है।
स्त्रियों के मन की अस्थिरता और अधिकारहीनता की स्थिति का फायदा समाज में अंधविश्वास फैलाने वाले उठाते हैं और उनके परिवार तोड़ने के लिये किये गये प्रयासों से आर्थिक लाभ भी कमाते हैं और उनके प्रभुत्व में वृद्धि भी होती है। हमारे समाज की यह सबसे खतरनाक बुराई है जिसके कारण मानवीय रिश्ते और मानवीय गरिमा को निरंतर विखंडित होना पड़ता है। अंधविश्वास और जादू टोने मानवीय जीवन और रिश्तों का तार तार किये हैं। इनकी गिरफ्त में स्त्रियाँ अधिक आसानी से आ जाती हैं। स्त्रियाँ अपने जीवन से और अपनी छोटी सी दुनिया से बहुत गहरे तक प्यार करती हैं, वे किसी भी कीमत पर उसे खोना नहीं चाहतीं हैं। यही कारण है उसकी सुरक्षा और सुख के लिये वे गलत रास्तों पर चलने लगती हैं। महजबीं भी अपने बच्चों और पति से बहुत प्यार करती है और स्वयं अपने से भी। इस छोटी सी दुनिया को सुखी बनाये रखने के लिये उसे लगता है कि उसके ससुराल के अन्य सदस्य और उसकी बेटियों के परिवार के अन्य सदस्य उनके सुख और स्वतंत्रता में सबसे बड़े बाधक हैं। महजबीं इन बाधाओं का हटाने के लिये जिन रास्तों पर चलती है, नासिरा जी ने उन्हें इस उपन्यास में प्रस्तुत किया है। इस तरह की वैयक्तिक सुखों की तलाश में रिश्तों को तहस नहस करने के प्रयत्न मानवीय जीवन में बुरी तरह व्याप्त हैं।

महजबीं की चेतना का जो आंतरिक विघटन होता हुआ दिखाया गया है उसके मूल में उसका जीवन के प्रति बेइंतेहा प्यार है। यह प्यार ही है जो वे अपने पति की आत्महत्या की धमकी के बाद पिघल जाती हैं और अपनी बेटी माजदा को उसके अपने तरीके से जीने की आजादी दे देती हैं। वे पश्चाताप में भर कर कहतीं हैं - ‘‘तेरी माँ, तेरी दुश्मन नहीं है, ममता में  अंधी होकर मैं गलत तौर तरीक़ा अपना बैठी थी। खुदा की बारगाह में गिरकर उनसे अपने गुनाहों की माफी मांगूंगी मगर पहले, हाँ पहले मैं तेरा शुक्र अदा कर दूं जो तूने दोजख की आग में जलने से बचा लिया। सही कहते थे अब्बा मरहूम कि बचपन में जिस तरह जवान माँ-बाप बच्चों को चलना, बोलना सिखाते हैं, सही और गलत की समझ देते हैं, ठीक उसी तरह जवान होकर बच्चे बूढे़ माँ-बाप की देखभाल कर उनको सेहतमंद सोच देते हैं।’’ इतना कहकर महजबीं ने माजदा का माथा चूमा।’’2 

महजबीं की ससुराल के प्रति जो सोच बनी उसका भी ठोस कारण है। यद्यपिज  वह अपने घर से ससुराल के लिये बिदा ले रही थी तो उसकी माँ ने उसे जो सलाह दी थी, वह इंसानी रिश्तों को निभाने और बनाये रखने की थी। उसकी माँ ने कहा था कि - ‘‘उन्हें याद आया ज बवह विदा हो रही थी भय और सवालों में उलझी हुई थी, उन्हें माँ की सीख सुनाई पड़ी थी, महजबीं, ससुराल में सबकी खिदमत करना, सास ससुर को माँ बाप समझना और कड़वे घूंट को शरबत की तरह पीना..........’’3
इस सीख पर महजबीं ने माँ को शिकायती नजरों से देखा था और मन नही मन कसम खाई थी - ‘‘हरगिज नहीं.....कभी नहीं।’’4
.ऐसा क्यों हुआ? महजबीं अपने माँ की सीख के उलट क्यों चली? इसकी वजह थी उसकी बुआ की ससुराल में दुर्दशा और जहर खा कर आत्महत्या करना। इस घटना ने उसके अंदर ससुराल के प्रति जहर भर दिया और उसकी चेतना में यह बात बैठ गई थी कि ससुराल और ससुराल वाले बहुओं के दुश्मन होते हैं तो उसे भी दुश्मनों की तरह उनके साथ व्यवहार करना है। इस घटना से नासिरा जी ने एक मानवीय अवचेतन के मनोविज्ञान को उकेरा है कि किस तरह एक नकारात्मक घटना बच्चों के मन के अंदर से रिश्तों की कागज की नाव को धुंआ की घुटन से भर देती है। इस एक घटना ने महजबीं के पूरे जीवन को तहस नहस कर दिया - ‘‘उन्हें माँ और बाप से शिकायत थी कि उनके न चाहने पर भी उनकी शादी कर दी और अब उसे दकियानूसी सोच दे रहे हैं। फूफी का बदला लेना है। इन ससुराल नाम के इंस्टीटयूशंस से बगावत करनी है। जहर खाकर फूफी की तरह मरना नहीं.....मरना नहीं। तब उनके आंसू अचानक रूक गये थे। उनके अंदर के भय की जगह एक तरह का विश्वास उभरा था।’’5 







उसने न केवल अपने परिवार को विखरने पर मजबूर कर दिया बल्कि अपनी बड़ी बेटी महलका को भी यही सब सिखाया। इसके बाद अपने छोटी बेटी माजदा को भी वह यही सिखाने जा रही थी, पर माजदा ने इसे अपनाने से इंकार किया और उसके इंकार में उसके पिता अमजद भी शामिल हुऐ तब कहीं महजबीं की चेतना में रिश्तों की अहमियत जागी। महलका महजबीं की बड़ी बेटी का पति विदेश में कमाने गया हुआ है, घर में उसके ससुर, एक नौकर गोलू, दो बेटे और बेटी हैं। पर महलका ने भी अपने ससुर के साथ गैर इंसानों जैसा व्यवहार अपना रखा है। उनकी पत्नी और जवान बेटी अल्लाह को प्यारी हो चुकीं है, बेटा बाहर है तो ज़हूर मियां एक दम अकेले और महलका की महरबानियों पर जिंदा हैं। उनके जीने का मकसद ही जैसे खत्म हो चुका है। इस स्थिति में जब महलका के माँ-बाप उसके घर आते हैं और सबसे पहले ज़हूर मियां से मिलने जाते हैं तो उनकी दुर्दशा देख अमजद मियां तरस खा जाते हैं। उनके अंदर ज़हूर मियां की दशा देख जो एक इंसानी लगाव उभरा था वह नासिरा जी की रिश्तों की कहानी को बयां करता है।

अमजद उनके कमरे के घुटन भरे माहौल से उनको बाहर निकालने के लिये कहते हैं कि कुछ देर बाहर दालान में बैठा जाये तो नासिरा जी ने ज़हूर मियां की जो प्रतिक्रिया दी है वह कैदी होने के बोध को हमारे सामने व्यक्त करती है, अमजद मियां कहते हैं कि -
‘‘अगर आप पसंद करे तो कुछ देर के लिये बाहर दालान में चलकर बैठते हैं।’’ अमजद ने ज़हूर मियां से आग्रह भरे लहजे में कहा।
‘‘अम्मा मना करेली।’’ गोलू झट से बोल उठा।
ज़हूर मियां का सिर इतना झुका कि सीने से आ लगा।’’6 

इस वाक्य में एक बूढे़ पिता, एक ससुर, एक दादा की वास्तविक स्थिति को उकेरा गया है। उनकी मानसिक स्थिति यह थी कि जैसे वे स्वयं ही अपने प्रति अपराधी हैं। जबकि वे शिकार थे, उनका बेटा लाखों रुपया कमा कर भेजता था, पर उनकी दशा विचित्र थी। अपनी लड़की के ससुराल में महजबीं की मानसिक स्थिति का जो परिवर्तन दिखाया है, वह रिश्तों के प्रति सकारात्मक सोच का प्रगट करता है। महजबीं ने महलका के ससुर का कमरा साफ किया उसे इंसानों के रहने लायक बनाया और अमल की पुड़िया और पानी को पेड़ों की जड़ों में डाल कर अपनी बेटी से कहा कि - ‘‘अब अमल की चीजों की नहीं आमाल ठीक करने का वक्त है।’’ यह परिवर्तन हम पूरी कहानी में देखते हैं।
महलका अकेली है, उसका पति विदेश में है, यहाँ वह राशिद नामक युवक से नये रिश्ते में जुड़ गई है और वह उसके पैसे के पीछे उससे संबंध बनाये रखता है। ज़हूर मियां इसके संबंधों का जानते हैं, पर मन मसोस कर रह जाते हैं, उसके इन संबंधों की खबर उसकी माँ को भी है जो बाद में उसको समझाती है कि तीन बच्चों की माँ से कोई युवक प्रेम नहीं करेगा, सिर्फ इस्तेमाल करने के लिये तुम से संबंध बनायेगा - ‘‘तेरी अक्ल घास चरने गई है? एक कुंवारा जवान एक ब्याहता, वह भी जीन बच्चों की माँ से मुहब्बत नहीं करता, फायदा उठाता है। अपना मतलब और आराम तलाश करता है। इतनी भी समझ तुममें नहीं रही महलका?’’7
इस तरह महजबीं उसे सही रास्ते पर लाती है। कागज की नाव के केन्द्र में महजबीं है। चारों तरफ के रिश्तों और कहानियाँ के सूत्र महजबीं से आकर जुड़ते रहते हैं। इस तरह रिश्तों का एक पूरा महाकाव्य रच दिया है नासिरा जी ने।
महजबीं का पश्चाताप दूसरी बार, पहली बार माजदा को लेकर अमजद और उसके बीच हुई बातचीत में खुला था, महलका के सामने इस तरह खुलता है, - ‘‘मैंने तुम्हें कई बातों में गलत मशविरे दिए, वह मेरी ममता की खुदगर्ज़ी थी। अब मेरी आंखें खुल चुकी हैं। जैसे मैंने अपनी गलती मान ली है, अब तुम भी मान लो और तौबा करो। तौबा का दरवाजा हमेशा खुला रहता है। उस नेक बंदे को जो तुम्हारे शौहर का बाप है उसकी खिदमत कर अपना कफ़फ़ारा अदा करो वरना मैं तुम्हें दूध बख़्शने वाली नहीं हूँ, यह मेरा आखि़री फै़सला है।’’8

महजबीं के परिवार की कहानी के साथ कुछ अन्य रिश्तों और मानवीय संदर्भों की कहानी भी इस उपन्यास में चलती हैं। महलका की ननद की उसके सुसराल में मौत हो जाती है। शगुफ़्ता पर उसकी सास के द्वारा अपने ही बेटे के लिये अमल करवाया जाता है। शगुफ़्ता की ननद और सास मिलकर उसकी मौत या आत्महत्या की वजह बनतीं हैं। उन्हें जेल भी होती है पर चूंकि शगुफ़्ता का भाई यानि महलका का शौहर विदेश में है तो कोई केस लड़ने वाला नहीं होता है, वे छूट जाते हैं। उसके बाद उनका बेटा भी मृत्यु को प्राप्त हो जाता है। इधर उसके छोटे भाई की बीबी शीरीं पर प्रतिबंध लगा दिये जाते हैं कि वह मायके नहीं जायेगी और घर में कोई उससे मिलने नहीं आयेगा। शीरीं घुटन भरी जिंदगी जीने को विवश है। अंत में वह अपने शौहर के पास मुंबई चली जाती है। उसकी ससुराल में जो मानसिक स्थिति थी उसे लेखिका ने इन शब्दों में उकेरा है - ‘‘यह कैसी जिंदगी है? उसे अपनी माँ पर भी गुस्सा आ रहा था कि ऐसे घर में उसे जलती आग में झौंक दिया, वह भी गीली लकड़ियों के साथ जो न पूरी तरह सुलगती है और न ही उसे पूरी तरह जलाकर राख करती हैं। इस अधजली कैफ़ियत से उसे दूर भागना है.....दूर चाहे जैसे भी हो।’’9
इस तरह एक लड़की अपने ही घर में जिस तरह घुटन और जलन महसूस करती है, उसे बड़ी ही खूबी से चित्रित किया है नासिरा जी ने रिश्तों की अजीब सी स्थितियाँ पैदा होती हैं। हम देखते हैं कि हर घर में, प्रत्येक परिवार में आग लगी है। कहीं बहू जल रही है, सास ससुर, ननद उसे जला रहा है, तिल तिल कर मरने पर मजबूर कर रहे हैं, तो कहीं बहुयें सास ससुर को उसी तरह मरने को विवश कर रहीं हैं। सुख चैन की जिंदगी तो जैसे दुनिया में है ही नहीं। इस सबके पीछे रिश्तों में प्यार की जगह पैसा, अघिकार, वर्चस्व जैसे मूल्यों को बैठ जाना है। धन-पैसों पर वर्चस्व बनाये रखने के लिये इंसान अपने दूसरों का जीवन तबाह करता है और साथ स्वयं का अमन-चैन भी छिन जाता है।
नासिरा जी ने बहुत खूबी से पुरुष चरित्रों को कुछ अधिक मानवीय और इंसानी रिश्तों को गहराई से समझने और अनुभव करने वाला दिखाया है। इसके नायक अमजद, ज़हूर मियां और क्रांति झा जैसे पुरुषों के जीवन में देख सकते हैं। अमजद मियां का चरित्र अनौखा है। वे अपनी बीबी महजबीं की तमाम ज्यादतियाँ सहन करते हैं। यहाँ तक उनकी परिवार टूट जाता है, बड़े भाई और उनका परिवार तथा माँ-बाप सब विदेश जा कर बसने को मजबूर हो जाते हैं, यह सब महजबीं के व्यवहार के कारण होता है। परन्तु अमजद मियां अंत तक महजबीं का साथ नहीं छोड़ते और अन्ततः हम देखते हैं, उनके सहनशील व्यक्तित्व की जीत होती है। महजबीं के जीवन और जीवन के प्रति उसकी गलत-नकारात्मक सोच में परिवर्तन होता है।
 वह न केवल स्वयं की जिंदगी को सवांरती है बल्कि अपनी बेटी महलका और माजदा के जीवन को भी सही दिशा और राह दिखाती है। महलका को राशिद जैसे इंसान के साथ संबंधों की सच्चाई का अनुभव कराती है। उसके ससुर के साथ उसके शौहर को भी प्यार करना सिखाती है। जीवन को रिश्तों के प्रति भरोसे मंद बनाने में और अंत में अपने मियां को उनके परिवार से मिलने जाने के लिये की स्वीकृति भी देतीं हैं। महजबीं स्वयं अपने शौहर के बारे में सोचती हैं -
‘‘यह शख्स अपनी बनावट से मजबूर है। अपना हो या ग़ैर हर एक के साथ नेकी भरा बर्ताव करता है। बदले और गुस्से के पागलपन से कोसों दूर और एक मैं हुँ, जरा सी बात नागवार गुजरी नहीं कि फ़लीते की तरह सुलग उठती हूँ। सामने वाले को नेस्तनाबूद करने पर तुल जाती हूँ। कितना भी जब्त से काम लूं मगर आतिश फिशां को फटने से रोक नहीं पाती हूँ।’’10

फिर वे आत्मालोचन करती हैं, यह आत्मालोचन इंसानी रिश्तों की खुशबू से पैदा होता है। वे सोचती हैं - ‘‘यह असद और जलन का जज़्बा कब मेरे अंदर सूखेगा और मैं बिना किसी तकलीफ के जी सकूंगी। अपनी बेटी खुश है ससुराल में तो बुरा लग रहा है। सास सुसर उसे इज्जत दे रहे हैं, तो कोफ्त हो रही है। अरे डायन भी सात घर छोड़ देती है और मैं डायन से भी सौ कदम आगे अपनी बेटी का घर जलाकर राख कर देने की सोच रही हूँ। सिर्फ इतनी सी बात पर वह मेरा फोन नहीं उठाती। मुझ से खुलकर बात नहीं करती है। या खुदा, मुझे तूने औरत क्यों बनाया। अगर यूं मेरी बनावट में ज़हर मिलाना था तो बना देता बिच्छु या सांप।’’11

मानवीय रिश्तों की विवधिता और उनके बनने बिगड़ने के कारणों के प्रति पूरा उपन्यास सचेत करता है। जीवन बहुत बारीक धागों से बुना हुआ होता है। जरा सी लापरवाही में वे उलझ जाते हैं, और कई जिंदगियाँ तबाह हो जाती हैं। जीवन के इन बनते बिगड़ते संबंधों के पीछे धन एक बहुत महत्वपूर्ण कारण है। पैसा है तो भी रिश्ते टूटते हैं, और नहीं है तो भी टूटते हैं, या बन ही नहीं पाते। नासिरा कई स्थलों पर इस बात को विवेचित करती हैं कि पैसा कमाना अलग बात है, गरीबी तो अभिशाप है ही पैसा होना भी जीवन को मनहूस बना देता है। हमारे समाज में अतिरिक्त समृद्धि और अतिरिक्त गरीबी दोनों ने जीवन को विखंडित किया है। पूरा बाजार विदेशी वस्तुओ और विदेशी पैसे के कारण अलग ही राह पर चल रहा है। इससे रिश्ते भी बदल रहे हैं और मानवीय संबंध भी। पूरा देश इस स्थिति से तबाह हो रहा है। लेखिका चिंता जाहिर करती हैं -

‘‘इस शहर को बाज़ार ने बिगाड़ा है और बाज़ार आया कहाँ से? बात सिर्फ पैसे की है। हमारा यह इलाका पैसे का लालची हो चुका है। बाहर का आया पैसा जो हमारे मर्दों के खून-पसीने की कमाई है, उनकी कुर्बानी और तन्हाई का निचोड़ है। वह अपनी जगह से चल हमारे बैंकों में जब पहुँचता है तो कभी दु    गुना तो कभी चौगुना हो जाता है। उस मेहनतकश इंसान के कुनबे वाले उससे सिर्फ पेट नहीं भरते हैं बल्कि अय्याशी में लग गये हैं। गुलछर्रे उड़ाते हैं। इस पैसे ने हमारे रिश्तों में दरारें डाल दी हैं। माँ हो या बाप, भाई हो या बहन, सास हो या ससुर, नंद हो या फूफी, सब सोने के अंडे देने वाली मुर्गी को अपना बनाकर रखना चाहते हैं, कोई लुतरेपन से तो कोई भुस में चिंगी डालकर तो कोई शैतानी अमल करवाकर। और मारा जाता है वह इंसान जो रात दिन मेहनत करता है अपने ख़ानदान के लिये ताकि सारे लोग घर के पढ़ सकें, साफ सुथरे घर में रह सकें। माँ का इलाज हो सके, बाप की आंख खुल सके, बहन की डोली उठ सके और रहन पड़ी जमीन छूट सके.........’ अमजद के दिमाग के सारे दरवाजे खुल चुके थे। वह चुपचाप जाकर कुर्सी पर बैठ गये।’’12

 नासिरा जी ने इस विदेश से आये पैसे के प्रति जो रुख प्रस्तुत किया है वह आज की भारतीय राजनीति और अर्थनीति की समीक्षा भी मानी जा सकती है। हमारा पूरा ध्यान पैसे के आने पर है, परन्तु यह पैसा जब आता है तो उसके साथ उसकी बुराइयाँ और विघटन भी आता है। कमाने वाले इंसान के प्रति वे लिखती हैं - ‘‘वही आदमी एक तरफ घरवालों से गन्ने की तरह चूसा जाता है तो दूसरी तरफ अपने मालिकों से .....पूँजीपतियों को मुनाफा चाहिये और.....।’’13 
जीरो रोड में भी उन्होंने इसी तरह की बात कही थी कि ‘विदेश में अरब देशों में इंसान रेत के कुयें की तरह ड्रिल किये जाते हैं और तेल निकलना बंद हो जाये तो रेत से भर दिये जाते हैं।’’ यह एक महत्वपूर्ण अध्ययन है नासिरा जी का। पैसे के प्रति हमारी हवस और महत्व ने इंसान को रेत की तरह रूखा बना दिया है। इंसानी संवेदनशीलता, रिश्तों की गर्माहट और संबंधों की उष्मा को समाप्त कर दिया है।

इंसानी रिश्तों का दूसरा पहलू इस उपन्यास में हमें माजदा के ससुराल में देखने को मिलता है। माजदा इंसानी रिश्तों को जीना जानती है और उन्हें समझना भी। उसमें अपने पिता की छाप है। रिश्तों को निभाना और सम्हालना उसे आता है। उसकी सास और सुसराल एक मानवीय संबंधों की सकारात्मक बुनावट को दिखाते हैं। नासिरा जी ने यह बताया है कि जीवन में अभाव और गरीबी हमें ज्यादा इंसानियत देती है। माजदा की सास उसे अपने परिवार के संबंध में बताते हुए कहती है कि वह जब विवाह करके यहाँ आयी थी तो घर परिवार की हालत बदतर थे, पर वे सब एक गरीबी और अभाव के धागे से बंधे थे। उनमें प्यार और दुश्मनी के लिये समय ही नहीं था। वे अपनी परिस्थितियों में अपने अस्तित्व की लड़ाई को जीतने में इतने मश्गूल थे कि इन बेकार की बातों के लिये किसी के पास समय नहीं था।







‘‘प्यार और दुश्मनी के लिये इस घर में तब किसी को फुरसत न थी। हम साथ-साथ मेहनत करते और थककर सो जाते थे। भूखे पेट को भरने के लिये हमें एक दूसरे पर भरोसा करना पड़ता था। एक दूसरे का सहारा बनना पड़ता था। ऐसे मौकों पर लोगों के दिलांे में एक दूसरे के लिये दर्द उभरता था। इसे लगाव कहो या भरोसा, हमारे बीच बहुत गहरा था।’’ इतना कह सास चाय का घूंट भरने लगीे।’’14

माजदा और सास के संबंधों के माध्यम से नासिरा जी ने रिश्तों की नई संभावनाओं को तलाशा है और परिवार के बीच की नई इबारत को लिखा है। यदि जीवन में अभावों को साथ साथ जिया गया हो और भरोसे के साथ रिश्तों को देखा गया हो तो जीवन स्वर्ग बन जाता है। माजदा की सास उससे कहती है - ‘‘चाहती हूँ तुम इस घर को बड़े चाव से संवारो। जो चारों तरफ हो रहा उसकी नकल न करना। ये सब बड़ी ओछी हरकतें हैं। यहाँ का सब कुछ तुम्हारा है, मैं भी और बेटा भी। छीना-झपटी का कोई मतलब नहीं है। जीतोगी तो अकेली हो जाओगी। हारोगी तो हम सबकी बनकर रहोगी और वही तुम्हारी असली जीत होगी।’’15 

माजदा की सास और उनकी जीवन के प्रति सोच इस समाज के लिये बहुत आवश्यक है, अनिवार्य है। वे माजदा को जीवन के विविध तरह के लोगों और उनके घर तोड़ने वाली साजिशों के प्रति आगाह करती हैं। वे कहती हैं उनके ससुर ने उन्हें तालीम देना आरंभ किया उस वक्त जब परिवार की स्थिति सुधरने लगी थी। वे कहती हैं कि परिवार कैसे बनता है? यह जानना माजदा को जरूरी है ताकि परिवार की नींव के प्रति गहरी निष्ठा पैदा हो और दूसरों के बहकावे में ना आये वह।

माजदा की सास कहतीं हैं - ‘‘यह सब बताना तुम्हें जरुरी था ताकि तुम जान सको के इस घर की बुनियाद तुम्हारे बुजुर्गों ने अपने खून पसीने से डाली है, जिसमें मुहब्बत और रिश्तों की कसावट का हमेशा ध्यान रखा गया। इसलिये उस घर की नींव को खोदना मुनासिब नहीं है। इस घर को हमें एक मिसाली घर बनाना है ताकि चारों तरफ फैली जिहालत, तंगनज़री, जलन, हसद के अलावा भी हमारे आस-पास वालों को कुछ दिख सके कि अरे इस रास्ते पर चलकर भी आदमी कामयाब हो सकता है। याद रखो अकेला पैसा तहजीब नहीं लाता है, कलह लाता है। खुदग़र्ज़ी और दुश्मनी लाता है। आज हमारा शहर, हमारे लोग उसकी चपेट में आ गये हैं। पैसे के लालच ने उन्हें अंधा बना दिया है। अपने खून के रिश्तों के खि़लाफ़ खड़ा होना सीख गए हैं। तुम ऐसा हरगजि न करना। मुझे तुम पर पूरा भरोसा है। फिर भी तुमको ये बुनियादी बातें बताना और समझाना जरूरी समझती हूँ।’’16
परिवार और रिश्तों की आंतरिक बुनावट को उसकी वास्तविक और मजबूत नींव को इस एक पैराग्राफ में नासिरा जी ने व्याख्यायित कर दिया है। पूरे ‘कागज की नाव’ की जान है यह पैराग्राफ। बहुत गहरी मानवीय सोच और शिक्षा माजदा को मिलती है और माजदा के माध्यम से पूरा समाज इस शिक्षा का ग्रहण कर सकता है।
रिश्तों की खुशबू किस तरह फैलती है? और रिश्तों में पैदा की गई कड़वाहट और दुर्गंध भी कैसे फैलती है? इसके बहुत मार्मिक चित्रण उपन्यास में देखने को मिलते हैं। यही नासिरा जी की रिश्तों की बुनियादी समझ की विशेषता भी है। वे जानती हैं कि नफरत और दुर्गंध से भरे इस माहौल में एक फूल भी यदि सुगंध दे सकता है तो उसकी खुशबू पूरे जहाँ में फैलनी चाहिये। वे ऐसा करती भी हैं।
माजदा सास के साथ अपनी संवेदनशील मुलाकात के बाद अपनी माँ को फोन करती है और जो वह अपनी माँ महजबीं से कहती है, वह भी सोचने विचारने पर मजबूर करता है। वह कहती है कि - ‘‘यहाँ का माहौल बिलकुल अलग है मम्मी। सब मेरा बेहद खयाल रखते हैं। आज मैं देर तक सोती रही तो अम्मी ने नाश्ता नहीं किया। मेरे इंतजार में तब तक भूखीं रहीं जब तक मैं नींद से जागी नहीं। हमने साथ नाश्ता किया। उन्होंने मुझे अपने बारे में बताते हुये कुछ नसीहतें कीं जो मैं हमेशा याद रखूंगी। आपको कैसे और क्या बताऊँ, वे कितनी सुलझी और समझदार ख़ातून हैं।’’17

 एक बहु का अपनी सास के प्रति यह कथन रिश्तों के ऊपर भरोसा और संवेदनशीलता का सबक है। ‘कागज की नाव’ रिश्तों की बारीक बुनावट और इंसान के स्वभाव की रेखाओं के रचे जाने की कहानी है। इसमें एक परिवार के केंद्र के आसपास कई परिवार हैं, जो उससे जुड़ें हैं अपनी सामाजिक संरचना में, और कहानी उनके साथ साथ भी चलती है। कमोबेश परिवार के विघटन और जुड़ने के कई अवसर नासिरा जी प्रस्तुत करती हैं। यह व्यापक मानवीय जीवन के अलग अलग चित्र नहीं हैं। एक संपूर्ण मानवता की विवधता के दृश्य हैं, जो अपनी आंतरिक बुनावट में एक ही तरह की रेखाओं और परिस्थितियों से बनते बिगड़ते हैं। जीवन की विविधता को खंड खंड करके वैयक्तिकता में देखना विखंडनकारी है। तमाम संबंधों और व्यापक इंसानियत को एक अखंड चित्र के रूप में देखना और उनके प्रभावों तथा परिणामों को तमाम बारीकियों के साथ इस उपन्यास में प्रस्तुत करने में नासिरा जी सफल हुईं हैं।




डॉ संजीव जैन 


    डॉ. संजीव कुमार जैन
    सहायक प्राध्यापक हिन्दी
    शासकीय महाविद्यालय, गुलाबगंज
    विदिशा म.प्र.
    



                                      
संदर्भ सूची -
1.कागज की नाव, पृ. 20-21
2.वही पृ. 29
3.वही पृ. 32
4. वही पृ. 32
5. वही पृ. 32
6. वही, पृ, 36
7. वही पृ.49
8. वही पृ. 49
9. वही पृ. 59
10. वही पृ. 110
11. वही पृ. 110
12. वही पृ.66
13. वही पृ. 66
14. वही पृ. 102
15. वही पृ. 103
16. वही पृ. 103
17. वही पृ. 104

Monday, July 30, 2018

उपन्यासनामा:- भाग चार ,शेष यात्रा 
उषा प्रियम्वदा 

उषा प्रियम्वदा 






“वस्तु में बदली जाती स्त्री के प्रतिरोध की : शेष यात्रा”
               
उषा प्रियंवदा का यह उपन्यास स्त्री जीवन की अनोखी यात्रा का दस्तावेज है। ‘रुकोगी नहीं राधिका’ की राधिका जो विदेश से वापस आती है और अपने ‘होने’ को पूरी पितृसत्तात्मक व्यवस्था के बरक्स प्रूफ करती है। जबकि शेष यात्रा की अनुका एक सीधी-साधी परंपरागत स्त्री जो अपने ‘होने को’ व्यवस्था और पुरुष के संदर्भ में ही पाती है और खोती है। इस पाने खोने के साथ एक ऐसी यात्रा करती है जो स्त्री के भौतिक और बौद्धिक विकास की यात्रा बन जाती है। वह स्त्रीपन के ‘होने’ और अपने ‘होने को पति द्वारा नकार दिए जाने के बीच अपने होने का अर्थ और संदर्भ स्वयं अपने बूते पर न केवल अर्जित करती है, बल्कि पति और पितृसत्तात्मक व्यवस्था के अहं और अकड़ को धराशायी भी कर देती है।
‘‘पति द्वारा त्याग दिये जाने पर वह नारी की परंपरागत सामर्थ्यहीनता को अनुकरणीय रूप में तोड़ती है। वस्तुतः उच्चमध्यवर्गीय प्रवासी भारतीय समाज इस उपन्यास में अपने तमाम अंतर्विरोधों, व्यामाहों और कुठाओं सहित मौजूद है। अनु, प्रणव, दिव्या और दीपांकर जैसे पात्रों का लेखिका ने जिस अंतरंगता से चित्रण किया है, उससे वे पाठकीय अनुभव का अविस्मरणीय अंग बन जाते हैं।’’1
इस उपन्यास की कहानी का प्रारंभ अनुका के इस अन्तर्द्वंद्वपूर्ण कथन से होता है - ‘‘क्या किया जाए इस अनुका नाम की औरत का, जिसकी जिंदगी एक बेबुनियाद इमारत की तरह उसके अपने पैरों के पास ढही पड़ी है। जिसकी पूर्णता, जिसका पत्नीत्व, स्त्रीत्व, सबकुछ नकार दिया गया है, जिसकी पूरी आइडेंटिटी, पूरा अनु-पन एकदम झकझोर दिया गया है। लहरों ने उसे कूड़े की तरह रेत पर लाकर पटक दिया है और जैसे अनेक आवाजें उसे चिढ़ा-चिढ़ाकर कहती रहती हैं-तुम कुछ नहीं हो, तुम कुछ नहीं हो।’’2 

अनुका के इस द्वंद्व का कारण है उसके पति द्वारा उसे मझधार में छोड़ दिया जाना। प्रणव जो उसे विवाह करके अमेरिका ले गया था और उसे एक आरोपित जिंदगी दी थी। इस जिंदगी में प्रणव उसके जीवन को वस्तुओं से भर देता है और उसे वस्तु की तरह इस्तेमाल करता है। अनुका वस्तुओं के जंजाल में प्रणव के इंतजार में अपना  वक्त व्यतीत करती है। एक दिन उसे पता चलता है कि प्रणव किसी और से प्रेम करता है। इसके बाद अनुका की जिंदगी बदल जाती है और वह अपनी सहेली दिव्या के साथ रहने लगती है और अन्त में डॉक्टर बनकर दिपांकर के साथ सेटल हो जाती है।





अतः इस उपन्यास का अन्त होता है अनुका के द्वारा अपनी पूर्ण स्वतंत्रता पा लेने के बाद, पुरुष के रूप में दीपांकर है पर वह बराबरी का साथी है पितृसत्तात्मक व्यवस्था का प्रतीक नहीं - ‘‘इतने सालों की स्वतंत्रता, अनु सोच उठी। अपने निर्णय अपने आप लेने की जिम्मेदारी, अपनी कमाई का पैसा बचाया जाए या बहाया जाए, कहाँ रहे, कैसे रहे, वह सब अपनी मर्जी से करने का सुख, न किसी का दबाव, न जबावदेही। उसके साथ दीपांकर इस संबंध के लिए उत्सुक है तो वह भी निर्णय ले चुकी है, अब पीछे हटने का सवाल नहीं उठता। दीपांकर उसे हर तरह से सुखी रखने की कोशिश करेगा, वह यह जानती थी। वह अपने लिए महत्वाकांक्षी नहीं था, पर अनु को वह कभी कोई भी निर्णय लेने से नहीं रोकेगा। यह होगी बराबर की साझेदारी, न कोई बड़ा, न छोटा, न सुपीरियर, न इन्फीरियर।’’3 

अनुका की इस जीवन यात्रा के दौरान उसने जो अनुभव अर्जित किए, जो थपेड़े खाए, जिन परिस्थितियों की पीड़ा से गुजर कर उसने अपनी राह बनाई, उनका वर्णन उपन्यास में प्रामाणिकता के साथ किया है। इन्हीं परिस्थितियों से गुजर कर ही तो ‘अनु’ ने अपने आपको पाया है, अपने घर, परिवार की सुरक्षा कवच से परे विदेश में जिस पति (पुरुष) प्रणव के सहारे वह गई थी, उसके द्वारा ही त्याग दिए जाने पर ही उसने अपने ‘होने’ की अर्थवत्ता को पाया, जाना और अनुभव किया कि ‘अनु’ भी है और यह अनु वह अनु नहीं जिसे प्रणव विवाह करके अपने साथ अपने सहारे यहाँ लाया था - ‘‘किसी के प्यार में न होना, किसी में अपने को समाहित न करना, इसका भी एक पॉजिटिव पक्ष है। मैं हूँ, अनु, अपने में तुष्ट, अपने स्वत्व बोध में सुखी, अपने सुख-दुख में अकेली, अपने में स्वाधीन। उसे यह अनुभूति प्रिय लगती है। उसने अपने व्यक्तित्व और अस्तित्व का लक्ष्य पा लिया है। अब आगे जो भी समय और भाग्य दे, पूरे एहसास और जिम्मेदारी से स्वीकार करेगी। अगर कुछ न भी मिले तो भी कोई शिकायत नहीं होगी। अपनी डॉक्टरी की उपाधि तो होगी, सुख-चैन से तो रह सकेगी, काम करने का संतोष तो मिलेगा। स्थाई रूप से पुरुष जीवन में न हो, तो न हो। जरूरत भी किसे है!’’4

 दरअसल अनुका जिस परंपरागत परिवेश और परिवार से आयी है, उसमें स्त्री एक वस्तु की तरह ही इस्तेमाल होती रही। उसकी कोई व्यक्तिगत सत्ता नहीं है। कोई निजी पहचान नहीं है। उसका अपना कोई वजूद नहीं हैं। सज-धज कर बकरे की तरह विवाह वेदी पर हलाल होने के लिए तैयार की जाती रही है। घर की चाहरदीवारी ही उसकी दुनिया होती है। घर में चोके चूल्हे, खाना बनाना, बच्चों और बड़ों की सेवा शुश्रुषा करना, पुरुषों की शारीरिक और मानसिक जरूरतों को पूरा करना, बस इतना ही उनका संसार है  - ‘‘अनु ने बचपन से बही पुराने ढंग का घर देखा और जाना था। उसमें ड्योढ़ी थी, मेहराबदार दालान, मुजरेवाली कोठी, चौकोर कमरे, घुटी-घुटी बंद कोठरियाँ, तहखाने, दुछत्तियाँ, संडास, कहारिन, नाई, बूढ़ी महराजिन। उस घर की एक अपनी गति थी, हर प्राणी उसी गति में अपने को ढाल लेता था, नई-ब्याही बहुएँ, आते-जाते मेहमान। बड़ी मामी घर की मालकिन थीं, छोटी मामी सबकी लाड़ली, सबसे सुन्दर, नखरीली, पढ़ी लिखी अनु की दोस्त। बड़ी मामी दूध और धोबी का हिसाब रखतीं, घर की खाने-पीने की जिम्मेदारी भी उन पर ही थी। छोटी मामी सज-संवरकर बैठी रहतीं, उपन्यास पढ़तीं, जेठ जेठानी को अपने हाथ से पान बनाकर देती; लिपिस्टक लगाकर रात के शो में सिनेमा जातीं। अनु को छोटी मामी बड़ी ग्लैमरस लगतीं - बंबई, कलकत्ता, कहाँ-कहाँ घूमी हुई। अनु के स्कूल में ऊँची-ऊँची चहारदीवारी थी, घर में भी सिर्फ त्योहार या शादी पर ही स्त्रियों का बाहर निकलना होता था।’’5 





इस दमघोंटू माहौल से निकली अनु जब अमेरिका के खुले और बिंदास परिवेश में पहुँचती है तो उसका एक दूसरी ही दुनिया से परिचय होता है। यहाँ यह भी देखने लायक है कि अमेरिका से आया प्रणव अनुका जैसी सीधी-सादी घरेलू गुड़िया को क्यों पसंद करता है?

यहाँ पितृसत्तात्मक व्यवस्था का वह चेहरा उभरकर सामने आता है जिसके तहत पुरुष एक निखालिस जिस्म में तब्दील चेतना वाली स्त्री को चुनना चाहता है ताकि उसकी देह की बर्बर आवश्यकताओं को घर में वह पूरी करती रहे और घर से बाहर की उसकी ऐयाशियों पर भी कोई रोक-टोक न लगे। अतः पढ़ा लिखा उच्चमध्यम वर्ग अपनी विशुद्ध शारीरिक भूख को अपने ज्ञान और विज्ञान की चेतना से विवेकपूर्ण नहीं बनाता बल्कि और अधिक बर्बररूप में उसे पूरी करना चाहता है। प्रणव अनु के जीवन में भौतिक पदार्थों की चकाचौंध को इस तरह भरता है ताकि उसकी चेतना उन भौतिक जड़ पदार्थों के उपभोग में उलझकर जड़ होती जाये और उसका उपभोग निर्बाध चलता रहे। प्रणव की घर के बाहर की ऐयाशियों की और उसका ध्यान ही न जाये।

उसका विवाह प्रणव के साथ तय कर दिया जाता है, पर उससे पूछने या उसे बताने तक की कोई जरूरत नहीं समझी जाती। जब वह प्रणव के साथ अमेरिका जाने के लिए एयरपोर्ट पर बेहोश सी हो जाती है तो प्रणव की पुरानी दोस्त रेखा कहती है ‘‘प्रणव, टेक केयर ऑफ हर; शी इज जस्ट अ किड।’’6

अनु एक बच्ची है, दरअसल बच्ची नहीं गुड़िया है जिसकी देखभाल करना ‘केयर करना’ आवश्यक है।
प्रणव एक सुंदर वस्तु की तरह उसकी देखभाल करता है और ढेर सारी वस्तुओं के बीच उसे भी एक वस्तु में तब्दील करता जाता है - ‘‘अनु खाना गरम करती है, दोनों साथ-साथ खाते हैं। एक सुखद चुप्पी में, सबकुछ साफ-सुथरा-एक अच्छी सी पार्सल की तरह बंधा जीवन। कभी मूड होने पर उसे बाहर ले जाता हैं। अनु जो कहती उसे तुरत खरीद देता। अनु के घर के एक कमरे में चीजों का ढेर लगना शुरू हो गया है। आलमारियों में चीजें सँजोते हुए अनु को अक्सर बेंत का अपना बक्स याद आता है।’’7

 इस वस्तुओं से भरे घर में अनु भी वस्तु में तब्दील होती जा रही थी। उसके आसपास जो अन्य स्त्री पात्र हैं और जो कि एक सखी सम्मेलन में संगठित हैं - ‘‘रूपल, कंचन, कीरत, रानी, विभा और मिनि। वैसे विभा को छोड़कर सभी गृहिणियाँ थीं।’’8 

ये सब की सब वस्तु की तरह व्यवहार करतीं हैं और वस्तुओं के घेरे में ही अपने होने को तलाशती रहती हैं। पश्चिम की औरत अपने होने के बोध को जल्दी महसूस कर लेती है अतः वह घर, पति, बच्चों के सुरक्षा चक्रव्यूह को तोड़कर अपने वजूद की तलाश में भाग जाती है। ‘‘अच्छे घर, मियाँ और बच्चों के बावजूद भी तो एक औरत को कुछ खाली-खाली लग सकता है।’’9





 विभा का यह कथन स्त्री की अस्मिता की तलाश और वजूद को बचाने का अहसास है। भारत जैसे परंपरागत समाजों में इस तरह की प्रवृत्ति को सिर्फ यौन संतुष्टि और असन्तुष्टि के रूप में देखकर स्त्री की चरित्रहीनता से जोड़ा जाता है।
अमेरिका की जीवनशैली में अपने खालीपन को भरने के लिए दावतें, पार्टी, और शॉपिंग, घर में वस्तुओं का अम्बार, शराब पीना, और अपने वजूद को पाने के लिए विवाहेतर सेक्स संबंध बनाना शामिल हैं।
अनु पूरी तरह इस तरह के माहौल में रम गई है। प्रणव की मर्जी और सोच ही उसके जीवन को संचालित करते हैं। वह जो कुछ भी करती है प्रणव के विचारों के अनुसार और अनुकूल ही करती है। वह पूरी तरह प्रणव पर निर्भर है। बिना प्रणव के वह अपाहिज है -‘‘प्रणव से मशविरा किए बिना वह कोई निर्णय नहीं ले पाती, ‘आज क्या खाओगे’ से लेकर मैं शाम को क्या पहनूँ’ सभी कुछ प्रणव की मर्जी से होता है। अनु प्रणव के मूड से चलती है। वैसे ही हँसती है, वैसे ही चुप हो जाती है।..........उसकी दुनिया में किसी चीज की कमी नहीं है, न महँगाई है, न भूख, न अकाल। उनके चारों तरफ एक जुलूस है, बीच में वह दोनों हैं, नंबर वन जोड़ा।’’10 

स्त्री के जीवन की पूरी पटकथा दूसरे ही निर्धारित करते हैं। विवाह से पहले की पटकथा को पिता और चाचा, मामा और भाई तथा विवाह के बाद पति - ‘‘जिंदगी की यह पटकथा अनु को बचपन से ही मिली थी। वह किसी चीज के लिए जिम्मेदार नहीं है, उसकी सारी जिंदगी दूसरों ने निर्धारित की थी, साल में एक बार जब सारे घर के कपड़े सिलते थे, अनु के कपड़े भी बन जाते थे - पसंद नापसंद का सवाल ही नहीं उठता था। जो महराजिन परस देती थी, वह खा लेती थी। स्कूल जाती थी, कॉलेज जाने लगी, वह क्या पढ़े, क्या विषय ले; अनु के लिए कभी प्रश्न नहीं उठा। अनु ने कभी इस बारे में सोचा भी नहीं, जो सब लड़कियों ने लिए, उसने भी ले लिए। उसका भाग्य सराहते हुए जब बिरादरी की औरतों ने कहा - ‘लौंडिया के भाग जगा है। विलायत का डॉक्टर, इतना गहना-कपड़ा’, तब अनु को लगा, हाँ शायद भाग्योदय हुआ है। वह प्रणव के प्रति कृतज्ञ थी, इतना सबकुछ, सिर्फ एक छोटी सी आकस्मिक झलक पाने भर पर ही। दृश्य बदल गया था, पटकथा का रवैया वही था। जो जिम्मेदारी प्रणव ने पकड़ाई थी, जो भूमिका दी गई थी, वही निभा रही थी। खाना बनाना, घर साफ-सुथरा रखना, प्रणव की पोजीशन के अनुसार कपड़े पहनना, पार्टियों में चुपचाप मुस्कराते रहना।’’11

 आधुनिकता की जीवनशैली में बहुत कुछ ग्लैमरस और आकर्षक दिखाई देता है। दूर से। जब उसमें आप अन्दर घुसते हैं तो उसकी एकरसता और वही-वही-वही, दुहराव और एकसापन महसूस होने लगता है और उसमें कहीं भी विविधता नहीं होती। अनु को भी धीरे-धीरे इस एकरसता का बोध होने लगा और उसमें प्रणव के न होने पर बोरियत पैदा होने लगती थी। लेकिन वह सखी सम्मेलन की अन्य स्त्रियों की भांति दूसरे पुरुष के साथ सहवास करने की सोच भी नहीं सकती। यह उसके पितृसत्तात्मक व्यवस्था के दिए संस्कार हैं। उसके अंदर सेक्स और यौनिकता अपने पति तक ही सीमित है। जब वॉटरमैन उसके साथ एक रात सोने का प्रस्ताव करता है तो वह हक्की-बक्की रह जाती है और कहती है कि ‘‘मैं अपने पति के साथ बहुत सुखी हूँ। किसी दूसरे पुरुष का ध्यान भी मैं पाप समझती हूँ।’’12 






लेकिन दूसरी तरफ प्रणव कई अन्य स्त्रियों के साथ दैहिक संबंध रखता है और उसे कोई अपराधबोध नहीं होता। यह पितृसत्तात्मक व्यवस्था के दो मुहे संस्कार हैं जो पुरुष के अंदर उसी अपराध के लिए कोई नैतिकता से विचलन का बोध पैदा नहीं करता और एक स्त्री उसी कार्य के लिए सोचना भी पाप समझती है।

आधुनिक जीवन पद्धति और मूल्य व्यवस्था में नैतिक और मानवीय मूल्य से संचालित स्त्री बिल्कुल अनफिट महसूस करती है। वह इस व्यवस्था में अपने को असंगत महसूस करती है। अनु भी जब कीरत के यहाँ सुबह सुबह पहुँचती है, तो उसके घर का माहौल और उसकी लड़की गोगी का व्यवहार उसे अजनबी की तरह महसूस करता है। ‘‘उसे एकदम अपनी उपस्थिति उस कमरे में असंगत-सी लगने लगी।’’13

 कीरत जैसी स्त्रियाँ जो अपने आपको उस आधुनिकबोध की विडंबनात्मक व्यवस्था में ढालने की कोशिश कर रहीं हैं। निरंतर एक वस्तु में तब्दील होती जा रही हैं। बिना शराब के उनके चेहरे पर नॉर्मलटी नहीं आती। वे बिना शराब और मर्द जिस्म के बिल्कुल बेकार की वस्तु में तब्दील होने लगती हैं - ‘‘धनराज के जाने के बाद शाम बीतती ही नहीं, न रात को नींद आती है। मुझे अपने बगल में धनराज का शरीर रोज चाहिए। जब वह नहीं होता तो गोली खाकर सोना पड़ता है।’’14  


मातृत्व के संबंध में अनु का सोचना है कि इसका निर्णय भी प्रणव का ही होगा। उसे माँ बनने से कोई एतराज नहीं और इसकी जल्दी भी नहीं। मातृत्व स्त्री का अधिकार है, परन्तु पितृसत्तात्मक व्यवस्था ने उसके इस अधिकार को अपने अधीन कर लिया। वह कब माँ बने और कब नहीं इसका निर्णय पुरुष के पास है। वह तो एक उपकरण की तरह इस्तेमाल में लायी जाती है। अनु की यह मानसिकता सदियों से स्त्री के मानस को अनुकूलित करने का परिणाम है। बच्चे के संबंध में ‘‘निर्णय प्रणव का होगा और निश्चय ही प्रणव को कोई जल्दी नहीं थी।’’15

मर्द अपनी आकांक्षाओं और वासनाओं की पूर्ति के लिए घर से बाहर जाता है और पत्नी के शिकायत करने पर कि उसका बहुत देर तक घर से बाहर रहना उसे अच्छा नहीं लगता, तो वह उसे घर गृहस्थी के काम गिनाने लगता है। यह पितृसत्तात्मक व्यवस्था द्वार स्त्री को दी गई भूमिका है। ‘‘तुम्हें इससे समझौता करना पड़ेगा अनु। मेरा काम तो फैलता ही जा रहा है। तुम्हें भी तो कितने काम रहते हैं घर की देखभाल, कूकिंग,.... फिर उसने जोड़ा, यह एकाएक असंतोष क्यों?’’

अनु को धीरे-धीरे इस जीवन की एकरसता से बोरियत महसूस होने लगती है और फिर प्रणव का निरंतर बाहर रहना काम के बहाने उससे दूरी बनाना और उसके जीवन को घर की चाहरदीवारी तक सीमित करते जाना। उसे समझ में आने लगता है कि यह जिंदगी बहुत दिनों तक नहीं चल सकती। प्रणव भी अनु से ऊब गया और अपने होने की, ‘मर्द होने’ की सार्थकता कहीं और ढूंढने लगा। चूंकि अनु के पास प्रणव के इंतजार और घर की देखरेख के अलावा कोई दूसरा काम नहीं है। अतः उसके जीवन का विस्तार भारतीय परंपरागत घरों की तरह ही घर तक सीमित हैं। फिल्म डायरेक्टर चंद्रिका राणा जब उसे नाश्ता सर्व करते देख कहती है कि ‘‘आप सिर्फ यही करती हैं? उसका प्रश्न अचानक गोली की तरह निकलता है।’’16 







इस बात को प्रणव सम्हालने की कोशिश करता है और वही पितृसत्तात्मक व्यवस्था की भूमिका निभाने की बात कहता है। ‘‘यही अनु को बहुत व्यस्त रखता है। इतना बड़ा घर, फिर मेरी देखभाल, इतना ही इनके लिए काफी है।‘‘
‘‘आप नहीं चाहते कि यह कुछ करें?’’

मुझे कैरियर गर्ल नहीं चाहिए थी, प्रणव ने कहा, ‘‘मैं चाहता था सरल, स्नेहशील बीबी, जिसके साथ बैठकर मुझे सुख-चैन मिले।’’17 

इसका मतलब है कि जो स्त्री घर से बाहर काम करती है, वह स्नेहशील नहीं होती, सरल नहीं कुटिल होती है, उसके साथ बैठकर पुरुष को सुख-चैन नहीं दुख और बैचेनी मिलती है। चंद्रिका इस बात का विरोध भी करती है। परन्तु प्रणव उसकी बात को टाल देता है और उसे चुप रहने को विवश कर देता है।

इस घटना के बाद प्रणव की प्रतिक्रिया उसके पशुपन और अहं को लगी चोट को अभिव्यक्त करती है। वह अनुका के साथ जिस तरह से संभोग करता है, वह प्यार नहीं बलात्कार है और अनुका भी इस बलात्कार को महसूस करती है।
 ‘‘प्रणव के होंठ क्रूर थे, वह एक हिंसक आक्रोश में अनु को झकझोर रहा था, प्यार में नहीं। अनु ने उसे दूर ठेलना चाहा। वह प्रणव, जो देर तक उसे सहलाता, दुलारता रहता था, इस वक्त कहाँ खो गया था! रह गया था एक पुरुष मात्र, जिसका अव्यक्त रोष, और ऐंठती हुई ताकत वह महसूस कर रही थी, पर जिसका कारण जानने में वह असमर्थ थी। वह देर तक कुचली, टूटी, चुकी हुई पढ़ी रही।’’18

 यह पत्नी के बलात्कार का दृश्य है, इसलिए थोड़ी शालीन भाषा और संवेदनात्मक क्रूरता के साथ लिखा गया है। वरना बलात्कार की पूरी बर्बरता और एक स्त्री के स्त्रीत्व को सिरे से नकारने की, उसके वजूद को पूरी तरह कुचल देने की कार्यवाही है।
पुरुष को रोज रोज वही का अहसास खीझ से भर देता है, पर वह यह नहीं सोचता कि एक स्त्री वही..वही....रोज...रोज... बिना इच्छा-अनिच्छा के कैसे बर्दाश्त करती है? ‘‘रोज-रोज वही परस देती हो, वही दाल-रोटी, वही गोश्त.....’’19 

यहाँ उसकी वेदना रोटी-दाल की अपेक्षा अनु के जिस्म के गोश्त की पुनरावृत्ति की अधिक है और उसकी खीझ भी इसी को लेकर है।
प्रणव के कई स्त्रियों से संबंध हैं, विभा से, शिकागो में परमानेंट गर्ल फ्रेंड, चंद्रिका आदि। इन सबसे संबंधों के बारे में अनु को ज्योत्सना से पता चलता है। पश्चिम की स्त्री की नियति है कि ‘‘यहाँ की सभ्यता में पत्नी को सबसे बाद में पता चलता है, जबकि तरकश से तीर निकल चुका होता है।’’20 

अनुका की इस ‘शेष-यात्रा’ में उसका सामना जीवन के कटु यथार्थ से होता है - उसके ऊपर का साया, पितृसत्तात्मक व्यवस्था का सुरक्षा घेरा, जिसमें अब तक वह वस्तु, एक गुड़िया बन कर रहती आयी थी, अचानक हट जाता है और वह एकदम बिल्कुल अकेली हो जाती है, तब वह अपने आपको पहचानती है। वह स्वयं को, अपने चारों और की दुनिया-जहान को नई आंखों से देखती है, पितृसत्तात्मक व्यवस्था का परदा उसकी आंखों पर से हट जाता है, पुरुष की आंख से दुनिया को देखने की आदत ने उसे अपनी दृष्टि से ही अपरिचित बना दिया था। अब वह नई - अपनी, बिना किसी चश्मे के - आंखों से अन्दर-बाहर की दुनिया को देखने को लालायित है - ‘‘नई आंख से सब कुछ देखना होगा? सब कुछ का मतलब सब कुछ। अंदर, बाहर, अपने को, दूसरों को, प्रणव को। विशेष तौर से प्रणव को।
एक आदमी, एक औरत। प्रणव और अनु। औरत रोती है।






‘‘मैंने क्या कसूर किया है? चोरी की? झूठ बोला? क्या मैं दुश्चरित्र हूँ?’’

झर-झर आँसू। आँसू कि खत्म ही नहीं होंगे। आदमी का चेहरा कड़ा है, वह औरत की तरफ पीठ करके बाहर देखने लगता है।’’

‘‘नई आँख से सब कुछ देखना होगा। अंदर, बाहर अपने को, दूसरे को, प्रणव को। सबसे पहले बाहर, बाहर  से अंदर; फिल्मी कैमरे की आँख की तरह। पहले बाहर का दृश्य।’’21

अनु का यह जो तीसरा नेत्र खुला है, नई आंख और नई दृष्टि के रूप में, उससे अपने चारों और की दुनिया देखी, समझी और अपने वजूद को पहचाना। उसने पहचाना कि ‘वह है’।  उसका होना भी अपने आप में मायने रखता है। वह अब तक हमेशा ही दूसरों के संदर्भ में होती रही थी। अब वह सारे संदर्भों से मुक्त है और अपने आपका संदर्भ खुद स्वयं है।

अनुका को जब अपनी इस विचित्र स्थति का पता चलता है तो अनु के पैरों के नीचे से जमीन निकल चुकी होती है। वह विक्षिप्त सी हो जाती है। सारे घर में तोड़-फोड़ मचा देती है -
‘‘तो ऐसे टूटता है दिल। अनु जैसे सचमुच अपने दिल का टूटना सुन सकती है। उसके दिल को जैसे कोई पंजे में पकड़कर ऐंठ रहा है। वह मुट्ठियों से अपने बाल कसकर पकड़ लेती है। फिर चीख उठती है। उसके अंदर हजारों ज्वालामुखी फूट पड़ते हैं। सबसे पहले चाय का प्याला फेंका, जाकर खिड़की से टकराता है और खनखनाकर टूटता है। वह मेज से पूरी ट्रे उठाकर पूरे जोर से नीचे पटक देती है, फिर मेज कांच सहित, टेबल लैम्प, टेप रिकार्डर, प्रणव के यत्न से इकट्ठे किए रिकार्ड, उन्हें पैरों से रोंदते हुए उसे वहशियाना सुख मिलता है।
प्रणव की शराब की बोतलें, महँगी बोतलें रसोई में जहाँ तहाँ गिरती हैं। जिस चीज पर हाथ जाता है, उसी को बिना सोचे, तोड़-फोड़, फेंक-फांक, तहस-नहस करती जा रही है। एक बबंडर की तरह। आज कुछ नहीं बचेगा वह अपनी पहनी हुई साड़ी को नोचकर उसकी धज्जियाँ बिखेर देती है। प्रणव सामने पड़ता तो शायद उसका खून कर देती।
 नीरजा के बच्चे का गला दबा देगी। डॉक्टर विभा को गोली मार देगी, फिर खुद भी तर जायेगी। उसके बाल बिखर गए हैं, आँखें लाल हैं। वह दीवार से बार-बार सिर टकराती है। पूरा घर पागल चीखों से गूँज रहा है, चीखों पर चीखें। क्या यह उसकी ही आवाज है? उसे होश नहीं है।’’22  

अनु की यह प्रतिक्रिया इस बात के लिए महत्वपूर्ण है कि उसने उन सारी वस्तुओं को तहस-नहस किया है जिनके कारण उसे वस्तु में तब्दील क्या गया और घर की तरह उसे भी अकेला निर्जीव समझ कर छोड़ दिया गया। वह इन वस्तुओं के मायाजाल को तहस-नहस करके अपने स्वत्व को पाती है। विक्षिप्त अवस्था में ही अपने निज को पाती है। यह वस्तु से निज तक की यात्रा में वह अपने आप तक पहुँच जाती है।अनु की मैरिज टूट चुकी है। वह अकेली है बिल्कुल अकेली। ‘‘अब सिर्फ वह है, अकेली।’’23

विवाह टूटने की आवाज पश्चिम में बहुत तेज नहीं होती, पर अनुका पश्चिम में रहकर भी भारतीय संस्कारों के अधीन है और बार-बार प्रणव से साथ ले चलने की भीख के बाद भी जब वह नहीं पिघलता तो, वह प्रणव पर भूखी शेरनी की तरह आक्रमण कर देती है।
‘‘तुम? तुम खुद बदचलन हो, गुंडे हो, आवारा हो.... तभी तो रंडियों से फँसे हुए हो....’’ अनु के मूँह से शब्द नहीं निकल पा रहे थे, ‘‘ थूऽऽ तुम पर....’’24 
यह थूंकना पूरी पितृसत्ता पर थूंकना है। यह उस घृणा का प्रतीक है जो इस व्यवस्था ने उसे दी है।
अनु का इस तरह पागल की तरह व्यवहार करना दरअसल आधुनिक पितृसत्तात्मक व्यवस्था में स्त्री की बिडंबनात्मक व्यवस्था का प्रतिफल है। 

कीरत, विभा, नीरजा जैसी स्त्रियाँ इस व्यवस्था की विकृति में अपने को ढाल लेती हैं, अतः वे इस तरह का पागलपन प्रकट नहीं करतीं। वे अन्दर से खोखल मात्र हैं, उन्हें अपनी पहचान और वजूद को इसी तरह इस्तेमाल करना आता है। अनु इस व्यवस्था की विकृति को जीवन शैली बनाकर जी नहीं पाती इसीलिए वह पागल हो जाती है। इस पागल के अन्त में वह प्रणव का दिया घर और सामान वहीं छोड़कर अपनी पुरानी सहेली दिव्या के पास चली जाती है। यह उसके नए जीवन का प्रारंभ है।

अनुका प्रणव से अलग होने की पीड़ा और विक्षिप्त स्थिति को भोगने के बाद अपनी सहेली दिव्या के पास जाती है। दिव्या अपने पति के साथ रहती है। स्वाभिमानी और मेहनत-कस इंसान हैं दोनों। छिन्नमस्ता में प्रिया रिचर्ड और जैनी के साथ रहती है। उनकी दोस्ती और समझदारी उससे संबल देती है। ठीक इसी तरह अनुका की यह दोस्त है दिव्या। अनुका उसे बताती है कि प्रणव ने उसे छोड़ दिया है। कारण बताते हुए जो वह कहती है, वह आदर्श पत्नीत्व के मिथक को चकनाचूर कर देता है - ‘‘मैं तो अपने पत्नीत्व में डूबी थी, पर शायद प्रणव का एक ही स्त्री से काम नहीं चलता। शायद मैंने कभी प्रणव को समझा ही नहीं, जाना ही नहीं। कभी यह नहीं सोचा कि दाल-सब्जी और शरीर से परे भी कोई और चाह होती है। प्रणव की वह मानसिक प्यास मैं शायद नहीं बुझा सकी। मैं सहचरी, जीवनसंगिनी थी, मगर सोलमेट नहीं। मुझमें दोष ही दोष दीखने लगे।’’25

अनु सोचती है कि पति के सामने पूरी तरह समर्पित रहकर उनका प्रेम पा लूँगी। मगर यह मनोवृत्ति भी पितृसत्तात्मक व्यवस्था की ही देन है जो स्त्री को अपने स्वार्थ के लिए दी जाती है। इसका अर्थ इतना ही है कि स्त्री पति को न छोड़े, यदि पति छोड़ना चाहता है तो उसके यह आदर्श पत्नीत्व के गुण किसी काम के नहीं हैं -‘‘मैं समझती थी के पति-प्रेम एक ऐसी जादू की बूटी है, जिससे सारी आधियाँ-व्याधियाँ दूर हो जाती है। अगर मैं मनसा-वाचाकर्मणा समर्पित रहूँगी तो सबकुछ ठीक हो जायेगा। मेरा प्रेम उन्हें जीत लेगा।’’26 

‘‘तो वह सब झूठ था। झूठ था न दिवी? सारे व्रत, त्यौहार, जप तप, कथा कहानियाँ, सब झूठ थीं न। झूठ हैं। मेरा सारा डिवोशन, प्रणव के चरणों पर निछावर हो जाना, सब कुछ झूठा पड़ गया।’’27 

दिव्या उसे अपने आत्म सम्मान की याद दिलाती है, प्रेरित करती है कि वह प्रणव के आलाव भी कुछ है - ‘‘तुम्हारा आत्मसम्मान कहाँ है अनु? दिव्या का रोष अब छिपता नहीं, ‘‘तुम जिंदगी भर अपने को पायदान बनाए रखोगी कि प्रणव तुम्हें खूँदता रहे?’’28 

अनु अपने आपको इतना भूल चुकी है कि स्वयं को मंगतों की श्रेणी मे रखने लगी। यही दशा पितृसत्तात्मक व्यवस्था ने स्त्री के आत्मसम्मान की कर रखी है। इतनी बार इतने तरीके से उसका आत्मसम्मान कुचला गया है कि वह यह भूल ही गई कि वह भी एक स्त्री है, इंसान है, मानवीय गौरव और सम्मान पाने की अधिकारी है। वह कहती है - ‘‘मँगतों में आत्मसम्मान नहीं होता।’’29

 अनु दिव्या और उसके पति के साथ रेस्टौरेंट में काम करने लगती है। श्रम से जुड़कर, पैसा स्वयं कमाकर उसमें एक इंसान होने का गौरव जागता है। प्रणव का घर बिक जाने पर वह उसमें आधा हिस्सा ले लेती है। यहीं से उसका विवेक और आत्मसम्मान जाग जाता है। (यहाँ कठगुलाब की दर्जिन बीबी से तुलना करने पर फर्क समझ में आता है, उसका पति जब उसे छोड़ कर जाता है तो वह उससे पैसे नहीं लेती। उसका आत्मसम्मान पति के आगे झुकने नहीं देता।)

प्रणव से अलग होने पर ही अनु एक परंपरागत स्त्री से विचारशील, कर्मशील स्त्री में बदलती है - ‘‘पर यह सच है कि अगर परिस्थितियों ने मुझे ऐसे ढकेला न होता तो आज मैं भी वही परंपरागत स्क्रिप्ट जीती रहती - पूरी तरह से आप पर निर्भर, एक सफल डॉक्टर की निकम्मी बीबी की ..... जानते हैं, कचहरी में विदा लेते वक्त आपकी उस शार्क मछली-सी वकील ने मुझसे क्या कहा था?...‘आपके भविष्य के लिए शुभकामनायें, ‘तो मेरे मूँह से कड़वा वाक्य निकल गया-‘यह सहानुभूति आप अपने मुवक्किल को ही दीजिए’ - उस दिन के बाद में एक बार भी नहीं रोई। मालूम नहीं मेरे अंदर इतना तेज, इतना करेज कहाँ से आ गया। मुझे लगा, मैं कुछ भी बन सकती हूँ।’’30 
यह कुछ भी बन सकने की सामर्थ्य का बोध अनु जैसी स्त्री को नई स्त्री में बदल देता है। यही नई स्त्री स्वतंत्र और दायित्वपूर्ण जीवन को जी सकती है।

संदर्भ सूची

01. शेष यात्रा, उषा प्रियंवदा के पृष्ठभाग से उद्धृत
02. शेष यात्रा, (पेपर बेक) पृ. 09 
03. वही पृ. 128
04 वही पृ. 115
05. वही पृ. 11
06. वही पृ. 17 
07. वही पृ. 23
08. वही पृ. 23 
09. वही, पृ. 24 
10 वही पृ. 25
11. वही पृ. 25
12. वही पृ. 27
13. वही पृ. 30
14. वही पृ. 32 
15. वही पृ. 36
16. वही पृ. 41
17. वही पृ. 41 
18. वही पृ. 42
19. वही पृ. 42 
20. वही पृ. 55
21. वही पृ. 09-10
22. वही पृ. 55
23. वही पृ. 60 
24. वही पृ. 63 
25. वही, पृ. 69
26. वही, पृ. 70
27. वही, पृ. 70
28. वही, पृ. 77
29. वही, पृ. 77
30. वही, पृ. 11

०००
डॉ संजीव जैन 


डॉ. संजीव कुमार जैन
सहायक प्राध्यापक हिन्दी
शासकीय संजय गाँधी स्मृति स्नात्कोत्तर महाविद्यालय,
गुलाबगंज 
522 आधारशिला, बरखेड़ा
भोपाल, म.प्र.
मो. 09826458553



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