Sunday, February 12, 2017

अपारे काव्य संसारे कविर्एका:प्रजापति  के आलोक में कहें तो यह कि ईश्वर के बाद अगर कोई सर्जक है तो वह है कवि, पर कवि केवल भावोच्छवास करने वाला, शब्द क्रीड़ा करने वाला कोई व्यक्ति नहीं होता, बल्कि वह एक स्वप्नदृष्टा होता है, जो दुनिया को और बेहतर, और बेहतर होते देखने के वास्ते तड़पता है, विचार करता है, और अपने परिवेश में दखल देता है |और समर्थ यत्न अपनी तरफ से भी करता है ताकि सूरत बदले. सूरत बदलने के अहद के संग अभी एक कवि दिन रात दीपक के मानिंद जल रहा है, उसका नाम है निलय उपाध्याय, साहित्य की बात समूह में आज उनके रचना और मोर्चा पर चर्चा के लिए प्रस्तावना और संचालन युवा कवि और विचारक अखिलेश कर रहे हैं..." साहित्य की बात " समूह  संचालक  ब्रज श्रीवास्तव 


मित्रों, आज मै एक पूर्ण कवि की अवधारणा को अपने कृतित्व व व्यक्तित्व से यथार्थ में बदल देने वाले समकालीन कविता के उस महत्वपूर्ण हस्ताक्षर को आपसे सामने रखता हूँ जिसके बिना गांव,किसान और गंगा की बहुत सी चिंताओ को स्वर नहीं मिल सकता था उसके सिसकियो को चीख और ललकार में बदल देने के लिए जिस कंठ की आवश्यकता थी वह सिर्फ निलय के पास है । कविता को अभियान बना देना उसे नारा बना देने से आगे की चीज है ।
निलय उपाध्याय नवे दशक से आरम्भ हुई हिंदी कविता के उस पीढी का प्रतिनिधित्व करते है जिसने अपने स्वत्व व अस्मिता की लड़ाई लड़ी है कविता कैसे कवि के आत्म का बोध होता है और कैसे वह उसके अंधेरे कोने में फैला उजास है यह देखना हो तो निलय की कविताएँ देखी जा सकती है ।भोजपुरी अंचल का वृहदतर क्षेत्र अपनी सांस्कृतिकता, अनन्यता,संघर्ष शीलता और स्वप्नशीलता के साथ साथ बेपनाह वेदना के जिन आयामो के साथ निलय की कविताओ में व्यक्त होता है उतना किसी और समकालीन कवि की कविता में नहीं ।ठेठ देशी मुहावरो में जीवन के संघर्षो से सिरजे बिम्ब जब कवि के अन्तर्मथन को स्वर देते है तो यह कविता एक जीवन राग में बदल जाती है ।जय पराजय के भाव से अलग यह कविता हिंदी जनता के जागरण की कविता है जिसमें पराजय की क्षणिक आवेग है तो जय उसकी संकल्प चेतना का प्रबल भाव ।
निलय मुंबई मे जब रेखाकिंत किये जाने तक की हद तक स्थापित थे तब वह फिल्मी दुनिया का वैभव त्याग साइकिल से गंग्रोती से गंगा सागर तक की यात्रा पर निकल पड़े,गंगोत्री से गंगा सागर तक यात्रा वृतांत लिखा जो एक प्रामाणिक ग्रंथ जैसा बन गया है। यात्रा के वर्तमान चरण मे वो घर परिवार का त्याग कर गंगा के लिए जीवन समर्पण का व्रत ले चुके है ।बनारस के घाटो पर महीनो गोष्ठियो व साहित्य सृजन से लोग जुटे है जिसमें आम जन से लेकर देशभर के पर्यावरण विद, लेखक शामिल है,नहीं शामिल है तो विदेशी कंपनियां, सत्ता तंत्र व सरकार ।
तो आइये आज एक कवि के संघर्षो का उत्सव मनाते है वो हमारे कुल के है हम सब का साथ उन्हें संबल देगा ।
..अखिलेश श्रीवास्तव 


कवि परिचय : 
जन्म : 28 जनवरी 1963 
स्थान : दुल्हन पुर,बक्सर बिहार ।
कृतिया : 
कविता संग्रह : अकेला घर हुसैन का , कटौती ,जिबह बेला 
 उपन्यास : अभियान वैतरणी और पहाड़
यात्रा वृतांत : गंगोत्री से गंगा सागर तक 
नाटक : पापकार्न विद परसाई 
इसकू अलावा निलय ने टीवी सीरियल देवो के देव महादेव आदि का भी लेखन किया है ।

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1. मैं गाँव से जा रहा हूँ

कुछ चीज़ें लेकर जा रहा हूँ
कुछ चीज़ें छोड़कर जा रहा हूँ

मैं गाँव से जा रहा हूँ

किसी सूतक का वस्त्र पहने
पाँच पोर की लग्गी काँख में दबाए

मैं गाँव से जा रहा हूँ

अपना युद्ध हार चुका हूँ मैं
विजेता से पनाह माँगने जा रहा हूँ

मैं गाँव से जा रहा हूँ

खेत चुप हैं
हवा ख़ामोश, धरती से आसमान तक
तना है मौन, मौन के भीतर हाँक लगा रहे हैं
मेरे पुरखे... मेरे पित्तर, उन्हें मिल गई है
मेरी पराजय, मेरे जाने की ख़बर

मुझे याद रखना
मैं गाँव से जा रहा हूँ ।


2.जिबह बेला 

मेरे मुँह मे ठुँसा है कपड़ा
ऐंठ कर पीछे बँधे हैं हाथ

कोई कलगी नोचता हॆ
कोई पाख
कोई गर्दन काटता हॆ
कोई टाँग
हलक मे सूख गई हॆ
मेरी चीख़

मारने से पहले जैसे बिल्ली
चूहे से खेलती है
कोई
खेल रहा है हमसे 

लो 
फिर आ गए
फिर आ गए सात समन्दर पार से
कसाई...

गंडासा है दिल्ली के हाथ ।

3. शबरी के पिता: 

पिता के आने की खबर सुनकर 
कुछ कह नहीं पाई 
शबरी
और आंख भर आई 

लोटा में पानी ले आई
मल मल कर धोया गिलास
पीतल के थाल में धोयेगी पांव ..उतार देगी

छह कोस पैदल की थकान
यह क्या कम है कि 
इस उम्र में चलकर आये पिता 
जूते के आहट से जान लेती थी शबरी 
कि पिता आ रहे है ..
आज भी जान लेगी कि पार 
कर गये है घर का चौखट
बरामदा
इस घर में उनकी बेटी है 
परदे पर कढ़े फूल से समझ जायेंगे ।

देर हुई तो थाल में पानी बदल दिया 
ग्लास में लगी थी मिट्टी जरा सी कहीं
मल मल कर साफ किया 
बिस्तर झाड़ा
बक्सा पर कपड़ा डाला
और कुछ न बचा करने को तो रो पड़ी

कैसी हो बेटी 
कैसे कट रहे है दिन 
कहने को कह ही देगी शबरी 
ठीक ..बिलकुल ठीक..कौन बेटी चाहेगी
कि बेटी का हाल जान 
दुखी हो पिता 

लोटा फुटहा है 
बूंद बूंद कर रिस गई शबरी
झन्न से बजी पीतल की थाल 
चकरधिन्नी कीतरह घूम गया आकाश
और बचपन से जवान होने तक की 
तमाम यादो को
एक मोटर साइकिल रौंदती हूई चली गई
जिसे नहीं दे सके थे पिता 
तत्र करने के बाद भी 

जरूर कांप रहे होंगे 
जाते हुए 
पिता के गठिया वाले पांव ।

4. और गोली चलती है 

आखिर क्या चला जायेगा 
एक रंडी का 
नंगा होकर नाचने में 

उसकी कीमत हम चुकायेगें

खत्म हो जायेगा 
शादी का उत्सव 
खत्म हो जायेगी शादी की रौनक 
उतर जायेंगे लाल पीले रंग 
बची रहेगी शान नंगा नचाने की 

एक औरत को नंगा नचाने की शान

किसी कौरव की सभा नही है यह 
उत्सव है शादी का 
ध्वनि और प्रकाश की जगर -मगर 
लोगों से खचाखच भरा बावन चोभ का शामियाना 
और कांप रही है एक औरत 
दो दिलो के मिलन में 
खुशियो का सट्टा है जिसका
वे जरूर नचायेगें 
उसे नंगा 

छोड़ जायेंगे 
गंगा के पवित्र मैदानी इलाके में 
शराब की खाली बोतलें और 
एक औरत को नंगा नचाने की शान 

अगर इंकार करेगी
तो चलेगी गोली...

और गोली चलती है ...

5. बेदखल 

मैं एक किसान हूँ
अपनी रोजी नहीं कमा सकता इस गाँव में
मुझे देख बिसूरने लगते हैं मेरे खेत

मेरा हँसुआ 
मेरी खुरपी
मेरी कुदाल और मेरी,
जरूरत नहीं रही
अंगरेज़ी जाने बगैर सम्भव नहीं होगा अब
खेत में उतरना

संसद भवन और विधान सभा में बैठकर
हँसते हैं
मुझ पर व्यंग्य कसते हैं
मेरे ही चुने हुए प्रतिनिधि

मैं जानता हूँ
बेदख़ल किए जाने के बाद
चौड़े डील और ऊँची सींग वाले हमारे बैल
सबसे पहले कसाइयों द्वारा ख़रीदे गये

कोई कसाई...
कर रहा है मेरी बेदख़ली का इंतजार

घर के छप्पर पर
मैंने तो चढ़ाई थी लौकी की लतर -
यह क्या फल रहा है?
मैने तो डाला था अदहन में चावल 
यह क्या पक रहा है?

मैंने तो उड़ाये थे आसमान में कबूतर
ये कौन छा रहा है?

मुझे कहाँ जाना है-
किस दिशा में?

बरगद की छाँव के मेरे दिन कहाँ गये
नदी की धार के मेरे दिन कहाँ गये
माँ के आँचल-सी छाँव और दुलार के मेरे दिन कहाँ गये
सरसों के फूलों और तारों से भरा आसमान
मेरा नहीं रहा

धूप से
मेरी मुलाकात होगी धमन-भट्ठियों में
हवा से कोलतार की सड़कों पर
और मेरा गाँव?

मेरा गाँव बसेगा
दिल्ली मुम्बई जैसे महानगरों की कीचड़-पट्टी में .      
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गत वर्ष नवम्बर में निलय भैया विशेष रूप से साबरमती नदी के किनारे बसे अहमदाबाद शहर की मल जल निकास परियोजना देखने के उद्देश्य से आये थे।परंतु इस यात्रा के दौरान निलय भैया ने  साबरमती नदी का अनकहा एवं अनदेखा स्वरुप दिखाया वह मेरे जैसे वर्षो से अहमदाबाद में रहने वाले लोगो के लिए हैरान कर देने वाला था। उस अनकहे सत्य को निलय भैया ने मरी हुई नदी का मुकुट नाम दिया था, जिसे हम सभी साबरमती रिवेरफ़्रॉन्ट कहते आये है। 
उस यात्रा की निलय भैया के साथ की कुछ तस्वीरें साझा कर रहा हूँ
सभी तस्वीरें जितेन्द्र राजपूत जी के सोजन्य से 
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निलय जी की कविताओं के  सापेक्ष समूह के  कुछ सदस्यों ने भी  सूखती नदियों के दर्द को अपनी रचनाओं में व्यक्त किया 
गंगा- दोहे
करती विष का आचमन, गंगा की हर धार।
भागीरथ अब अवतरे, करने बेड़ा पार।।

आँचल मैला हो गया, काया पल-पल क्षीण।
गंगा हँसती खेलती, क्यों है अब ग़मगीन।।

गंगा में मुख देखता, चाँद हुआ बेहाल।
मैली छवि को पोंछने,  बादल हुआ रुमाल।।

शुभ्र धवल आँचल कहाँ, मैली गंगा देह।

बिसरा बैठे लाल ही, माँ से अपना  नेह।।
अनीता मंडा 
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और कुछ दिन देखता जा देखता रह जाएगा
सूख जाएगी नदी ये पुल खड़ा रह जाएगा।

एक प्यासा दूसरे से प्यास का मांगेगा हल
आसमानों की तरफ हर सर उठा रह जाएगा।

गर्म आंखें सुलगी सांसें और दहकता हर बदन
रहमतों की बारिशों को ही खोजता रह जाएगा।

गोलमेज़ें जब उठेंगी बात करके प्यास पर
बिसलरी की बोतलों का मुंह खुला रह जाएगा।

हादसे की चाप है दिलशाद साहिब ये ग़ज़ल
जो समझ लेगा वो शायद कुछ बचा रह जाएगा।
- भवेश दिलशाद

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गंगा का पुत्र संवाद :
कल गुजरा 
चांद के करीब से 
साफ दिखाई पड रही थी 
चेहरे की झुर्रिया
मुक्तिबोध ने कहा
और बूढा हो गया चांद 

यूं ही गंगा भी 
सुनती है निलय की बात 
उनके बलिया आने की खबर 
हवाओ ने दी चीतल को 
कछार पर पानी पीते चीतल ने 
बताया डाल्फिन को 
और फिर उसी ने कहा होगा गंगा से 
कि तेरा बेटा आ रहा है बलिया 
बचा खुचा पानी समेट
बुढापे में बंधा तोड
बढियाई गंगा पहुच गई गांव के मुहाने
पुत्र के पांव पखारे घुटने तक 
प्यासे पूत ने मांगा जल 
पर मां जानती है 
अब जल, जहर है सो
गंगा ने आंखो के नीर से भरा 
उसका कासा ,कंमडल
पहले फफकी
फिर दहाड मार लिपट गई गले से
बुदबुदाई कान मे 

अब इहे कंमडल टांग ल कांधे
ले चलअ गंगा सागर 
लेटा द चंदन लकडी पे
फोड द मटका 
कई द दाहा तापी 
जटा से बा उद्गम
तोहरे कमंडल मे हो जाई मुक्ति 

आ तबले कही द तनि हाकिम से
बडकी दतवा वाला मशीनवा हटा ले
छतिया से
कोडे ले बाबू लोग
त बहुत पिराला ।
अखिलेश
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हर शहर और गाँव में 
रोज ही
मर रही है एक नदी
मेरे कस्बे में परासरी पूरी मर चुकी है
बेतवा मरने की कगार पर है
पास में नेवन सिर्फ दिखती है
बरसात में
और फिर 
उज्जैन में क्षिप्रा भी तो
नर्मदा के पानी से जिंदा है.......!!!!
सब कोई देख रहा है अपने जीवन में
मरती हुई नदियों को.........
गंगा अकेली नहीं है
देश में 
दिल्ली में यमुना और
नासिक में गोदावरी भी तो मर चुकी हैं 
पूरी की पूरी.........
नदियों का मरना
सभ्यताओं के खात्मे का संकेत है
जैसे नदियों के होने से बनी-बसीं थीं सभ्यतायें
नगरों के प्रति हमारा मोह
विकास के प्रति हमारा दुराग्रह
मार रहा है नदियों को................
कोई नहीं बचा सकता
इस तरह मरती हुई सभ्यताओं
जैसे नदी के मरने पर रह जाती है गंदगी
वैसे ही सभ्यताओं के मरने से
नगरों में जिंदा लाशें चलती फिरती
दिखाई देंगी.........
सभ्यताओं के बिना मनुष्य

जिंदा लाश ही तो रह जायेगा एक दिन.......।
संजीव जैन 
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कविताओं पर प्रतिक्रियायें 

ब्रज श्रीवास्तव ....अग्रज मित्र कवि की कविताओं को साकीबा में, देखकर विभोर हूँ, यहां कविता के बहाने, कुछ यथार्थ तैर रहे हैं, कुछ विवश सत्य गांव से शहर की ओर बढ़ते ही जा रहे हैं. अपने ही प्रतिद्वंद्वी से पनाह मांगने के दिनों में कुछ शख्स कविता में सच को स्थापित करते हुए, समझौतों को स्थगित करते जा रहे हैं, उनमें से एक हैं निलयऐसे कवि प्रलयके बाद तक रहे आने की संभावना को स्थापित करते हैं. धन्यवाद अखिलेश जी, दोस्तो, आज न चूकिये, आपके शब्दों का गुच्छा न केवल कवि और कविता की महत्ता बढ़ायेगा, बल्कि साहित्य जगत की सत्ता के पथ में एक फूल बिछाकर कवि को हौसला देगा...    

सईद अय्यूब ....ये जो कविताएँ प्रस्तुत की गयी हैं, वे निलय के कवि और कविपन को पूरी तरह प्रतिनिधित्व नहीं दे पातीं। कम से कम उनकी दस कविताएँ देनी चाहिये थी। इन कविताओं से जैसा प्रतीत होता है, निलय जी उससे बड़े, बहुत बड़े कवि हैं। बड़े कवि होने के साथ ही साथ वे बड़े इंसान भी हैं। मैं व्यक्तिगत रूप से उन्हें बहुत नहीं जानता। बस एक बार मुलाक़ात हुई है। पिछले साल के विश्व पुस्तक मेले में। पर जितना जानता हूँ उसके आधार पल उपरोक्त बातें कह रहा हूँ। अखिलेश भाई, शुक्रिया उन्हें यहाँ प्रस्तुत करने के लिये।    


 दिनेश मिश्रा .....निलय जी की कविता सीधे सीधे दिल को छू लेने वाली कविताएँ हैं, सीधे सच्चे तरीके से गाँव और उससे जुड़े अहसास को असरदार तरीके से बयान करती हुई, कविता कभी खुश करती हैं, तो कभी पलकें भिगो देती हैं, खुरपी कुदाल से लेकर शबरी की फ़िक़्र हमे भी फ़िक़्रों में डुबो देती हैं।
प्रस्तुति के लिये धन्यवाद     


 सुमन सिंह ....."मौन के भीतर हाँक लगा रहे हैं मेरे पुरखे...।कितनी गहरी अभिव्यक्ति, कितना गहरा दर्द।,
जिबह के माध्यम से समाज मे मचे घमासान पर बहुत सटीक टिप्पणी। "लोटा फुटहा है,बूँद बूँद रिस गयी शबरी....चकरघिन्नी की तरह घूम गया आकाश.....जरूर काँप रहे होंगे जाते हुए पिता के गठिया वाले पाँव... कितने ही भाव , कितनी ही शबरीयों का दर्द पिरोये पंक्तियाँ। निलय जी को बहुत बधाई। अखिलेश जी को इतनी सुन्दर कवितायें पढ़वाने के लिये बहुत धन्यवाद🙏   


हरमिंदर सिंह :...अखिलेश जी बहुत बहुत आभार निलय जी से रूबरू करवाने के लिये..निलय जी के शब्द बोलते हैं और वे गूंजते हैं बार-बार..                        
 किसान और गांव की बात जमीन से जुड़े मन की बात है..                        
 Akhilesh Shreewastav: हरमिन्दर भाई, आप उपन्यासकार हो  । आपने बहुराष्ट्रीय कंपनियों व जन और उसके लेखन का संघर्ष भी कमोवेश देखा है निलय की चिंताये भी वही है उनकी दृष्टि बड़ी है ।          
 और गोली चलती  है : निलय उपाध्याय
प्रस्तुत कविताओं में चौथी कविता स्त्री विमर्श की नहीं उसके सशक्तिकरण की कविता है ।स्त्रीयो में भी एक उपेक्षित वर्ग है जिन्हें हम सिर्फ जीवन के विलास में शामिल करना चाहते है उनके लिए हमारे पास कुछ नियत घंटे है ,कुछ अंधेरा है, रात है पर दिन नही है वो हमारे लिये जिंदा कबाब है वो हमसे दो घूंट आब चाहती है पर हमारे पास उनके लिये सिर्फ शराब है ।
स्त्री विमर्श क्या मध्यम वर्ग की स्त्रीयो तक सिमट गया है यह विमर्श अपना दायरा क्यो नहीं बढ़ाता और इन स्त्रीयो को शामिल क्यों नहीं करता । वह इन्हे स्त्री मानता भी या नहीं या फिर निलय की पहली कविता पंक्ति जैसे युद्ध हार चुका है और विजेता से पनाह मांग रहा है ।
इस कविता का पूरा कविता तत्व इसकी अंतिम पंक्ति में है कि और गोली चलती है ... 
यह कितना बड़ा इंकार है यह ऐसा है जैसे वहशी भेडि़यो के बीच फंसी एक हिरनी अचानक कंठ से शेरनी की आवाज निकालने लगे जबकि उसे पता है कि दांत गले पर गड़ने वाले है ।
अगर इंकार करेगी
तो चलेगी गोली...
और गोली चलती है ...
स्त्रीयो को बहुराष्ट्रीय माँल्स में खरीदारी करने को महिला सशक्तिकरण बताने वाला साहित्य व सरकार जुगलबंदी कर रही है जबकि असली लड़ाई ये स्त्रीया लड रही है इन स्त्रीयो के साहस पर कोई थपरी नही पीटता, निलय सुनते है और देखते है उनका संघर्ष ।
यही निलय का साहित्य, उनका विमर्श है जो उन चिंताओं को साहित्य मे शामिल करता है जिस पर दिल्ली मौन है इन पर लिखने के लिये कवियो को अंधेरो की, गंगा के किनारों पर फेकी शराब  की बोतलो तक पहुँचना पड़ेगा तब उस नीरव में वह सशक्त इंकार सुनाई पड़ेगी,तब वह पुरूषिया ग्रंथि और उससे उपजा अट्टहास सुनाई पड़ेगा जिसमे स्त्री को नंगा नचा देना पुरूष होने की शर्त है ।

                       
भवेश दिलशाद...  निलय की कविताई एक आवाज़ है
लम्बे समय से मेरे मन में उहापोह चल रही है कि साहित्य या तो केवल साहित्यकारों के लिए लिखा जा रहा है या फिर साहित्य के विद्यार्थियों के लिए। लोक के लिए साहित्य का सृजन हाशिये पर है। खास तौर से कविता में यह हादसा बहुत गंभीर दिखता है। ऐसा है भी कि मैं किसी अनुचित विचार की गिरफ्त में हूं? ऐसा है तो क्यों है? क्या यह अकादमिकता का कोई षडयंत्र है? आदि-आदि प्रश्नों से जूझता हुआ मैं कभी-कभाी उस कविताई से भी रूबरू हुआ जो कश्मकश के इस अंधकार में पौ पफटती सी लगी। इसी आलोक में आज अग्रज निलय की पांच कविताएं बाध्य कर रही हैं, कुछ कहने के लिए, कुछ विचार के लिए और कुछ समझने के लिए भी।
बड़ी कविता पाठक से किसी किस्म की तैयारी की अपेक्षा नहीं करतीं, बल्कि पाठक को उद्वेलित कर और उठने के लिए तैयार करती हैं। बड़ी कविताएं चुंबकीय आकर्षण के साथ खींचती हैं अपनी ओर, न कि पाठक को नीचा दिखाते हुए आमंत्रित करने का ढोंग करती हैं। निलय की कविताएं बड़ी कविताएं हैं। अपने कथ्य में बख़ूबी गठी हुई ये कविताएं उन परदों को फाड़ती हैं जिनके पीछे छुपा समाज इस हकीकत को भूल गया है कि वह कितना नंगा है।
अगर मैं इस तरह कहूं कि पहली कविता औद्योगिकीकरण की कुरूपता, दूसरी कविता बाज़ारवाद की साज़िश और चौथी कविता पूंजीवाद व समाज की मानसिक विकृति आदि आदि को बयान करती है तो यह उथली समीक्षा होगी। यह सब है तो सही केंद्र में लेकिन बावजूद इसके इन कविताओं में इसके अलावा जो तत्व हैं, वाकई वह कविता को कविता और बड़ी कविता बनाते हैं। संवेदना का धरातल, विमर्श छेड़ने का माद्दा, सवालों के आईने में समाज को निरुत्तर कर देने की सलाहियत, तमाचा जड़ने जैसा प्रहार, एक साथ कई आंतरिक स्तरों को झकझोरने की क्षमता और शर्मसार या दुखी कर देने की तीव्रता जैसे अनेक तत्व इन कविताओं की कविताई के मरकज़ में हैं।
व्यंग्य तो आजकल ललित व सीधा भी होता है इसलिए व्यंग्य को इन कविताओं के संदर्भ में एक तीक्ष्ण विशेषण या किसी और बेहतर पर्याय की आवश्यकता पड़ती है। एक व्यंग्य वह होता है जो ताने जैसा चुभता है लेकिन यहां व्यंग्य तमाचे और मुक्के जैसा पड़ता है। लेकिन आभासी है। कुछ साहित्य की पुरोहिती सोच वाले कह सकते हैं कि ऐसा व्यंग्य, व्यंग्य की श्रेणी में नहीं आता लेकिन यहां तो आ रहा है। एक रंडी का नंगा होकर नाचना, बची रहेगी शान नंगा नचाने की, फिर आ गये कसाई... गंडासा दिल्ली के हाथ में है, गांव बसेगा महानगरों की कीचड़ पट्टी में... ये पंक्तियां पारंपरिक व्यंग्य की श्रेणी में नहीं हैं, इन्हें आंका जाना चाहिए। समर्थ आलोचक विचार करें।
निलय की कविताएं वास्तव में लोक की बात करती हैं, लोक के लिए सिरजी गयी हैं और लोक के हित के प्रश्नों की आवाज़ हैं। ये किसी साहित्यिक विमर्श को आमंत्रित करें या न करें, साहित्यकारों को जंचे या न जंचे, परन्तु लोक विमर्श का पटल प्रस्तुत करती हैं, लोक में पहुंचती ही नहीं, उसे उद्दीप्त करने की सामर्थ्य भी प्रदर्शित करती हैं। ये कविताएं आवाज़, एक बुलंद और बाग़ी आवाज़ की तरह हवाओं में गूंजने की सिफ़त रखती हैं और जो कविता आवाज़ बन सकती है, उसे न तो रोका जा सकता है, न नकारा जा सकता है और न ही क़ैद किया जा सकता है।
अग्रज निलय जी को साधुवाद और उम्मीदों व अपेक्षाओं से सिक्त शुभकामनाएं। अखिलेश को बधाई कि एक महत्वपूर्ण पोस्ट के ज़रिये चैतन्यता को सुषुप्तावस्था से निकाला और ब्रज भाई को भी एक गुलदस्ता कि मंच को ऐसे अवसरों के लिए ओपन रखा है।                        
 Akhilesh Shreewastav: प्रमोद भाई 
भवेश ने मान रख लिया यह पोस्ट देकर ।आपने जिन कविता तत्वो के आधार पर कवि व उसके साहित्य को समझने हेतु इंगित किया था भवेश भाई ने उन पर वह दृष्टि डाली है जो एक रचनाकार अपने साहित्यिक जीवन में निरंतर रच कर विकसित करता है । 
भवेश की एक गज़ल जल विमर्श का उन्वान रचती है पढ़वाऊंगा शाम को ।उसके दो शे़र तब तक रहेगे जब तक धरती पर जल है ।
भवेश को धन्यवाद नहीं कहूँगा, तुम्हें गले लगाये बिना यह शब्द बेमानी है ।   
                     
राकेश पाठक ..... आज साकिबा में जानदार प्रस्तुति...निलय जी के बारे में जानकार बेहद अच्छा लगा...
टटका बिम्बों और देशज शब्दों से भरी अपनी कवितायेँ लग रही है..यथार्थ को जमींदोज किये जा रहे उस घट की उत्तरकथा है इन कविताओं में । जो सर्वहारा और सर्वस्व हारा जन की दुर्दशा के इर्द गिर्द की जिंदगी में देखी है कवि ने..कवि की इन कविताओं और भाषा से ज्यादा कवि के उस मनोदशा को समझने की जरुरत है जो रची जा रही कविताओं के मूलस्वर का वायस बनी है...कवि की भाषा में समाज की चिंता है..देश के सपने है..और उन सपनों में हाड तोड़ रहे उस जन की बातें है जो इंडिया और भारत के दोआब में धंसे, दरकिनार कर दिए गए है.. 
कविताओं में जनवाद कवि की मौलिकता नहीं विवशता है बल्कि विचार के स्तर पर उस उद्वेलन की परिणीति है जो किसी आंदोलन का कारण बनने की उम्मीद लिए लिखी गयी है...
निलय जी मौन के कवि है, स्वाधीनता के कवि हैं, राही नहीं, राहों के अन्वेषी हैं, वे काल चिंतन के कवि हैं, वे आत्मान्वेषण के कवि है, यायावर हैं, वे नई भाषा संवेदना और शिल्प के चाकचिक्य के कवि हैं, वे अकेलेपन के अनुगायक हैं। आज की प्रस्तुत उनकी कवितायेँ जन और वाद के प्रतिमान की तरह है। 
लोक-शिल्प,स्थानीये रंगों और अनुभूतियों को बड़े ही खूबसूरती से इसे शब्दों में ढ़ाला गया है कवि निलय ने। 
दरअसल इस कविता की मनोदशा विवशता की बर्बरता की दास्तां की तरह है जो पूरी कविता में ही व्यक्त हुआ है... व्यथा की कविता संवेदना का जटिल शास्त्र लिखता है..और तब कविता, भाषा की बर्बरता के साथ ही पटल पर आ पाती है...पर यहाँ कविता का मूल जिस सरलता और तरलता के साथ व्यक्त हुआ है वह काबिलेगौर है। 
कविता की शाश्वतता कवि मन की जटिलता का परत दर परत का अक्षुण्ण विवेचन है... पहली कविता "मैं गावँ से जा रहा हूँ" तथा "जिबहबेला" जिस भावप्रणित्ता के साथ लिखी गयी है वह देशज और खांटीपने के साथ शहर के जीवन से परपस्पर सवांद करती है। इस कविता में मार्क्सवादी विचार का बुनियाद छुपा है तो साथ ही व्यथापूर्ण कंटकीय जीवन का विवरण भी है....समाज का दोहरा चरित्र पर कटाक्ष और जातीय वर्गीकरण के उत्पीड़न का इतिहास भी.... जिबहबेला कविता की अंतिम पंक्ति...गड़ासा है दिल्ली के हाथ पढ़ते ही राजनीति, राजनीतिज्ञ और सत्ता के बीच क्षुद्र लालच के लिए रचा जा रहा पूरा परिदृश्य और गाँव की मुश्किल हालात सामने आ जाते है।
इसी तरह सबरी के पिता कविता भी संवेदना से घनीभूत है। इसमें वेदना भी है तो दुर्दुम्भ तल्ख़ सच्चाई से पिता और पुत्री के अदृश्य नयन संवाद से नम आँखों की विवशता भी। भावनाओं के ज्वार से भरी बड़ी मार्मिक कविता है जिसमें संवेदना का उत्कर्ष आँखों के कोर गीले कर देता है। 
निलय जी जन जन के कवि यायावर है। इनका लिखा पढ़ने से यह सुकूँ मिलता है कि कोई फक्कड़ कवि शहरों में गावँ लिए चल रहा है...
अखिलेश भाई इस शानदार प्रस्तुति के लिए बहुत बहुत आभार मित्र..इनकी फ़क्कड़ी की डायरी पढ़ाइये.. आधुनिक सांकृत्यायन सरीखा यह व्यक्तित्व विश्व पटल पर ज़ल्द गावँ गंगा का आवाज बनेगा....
सादर

Anita Manda: अखिलेश जी के ज़रिये निलय जी की कविताओं से रूबरू होने का अवसर मिला, इन पर आई टिप्पणियों ने उन्हें और अधिक गहनता से आत्मसात करने में सहायक की भूमिका निभाई।
राजनितिक विद्रूपता के विरुद्ध हथियार सरीखी धार कविताओं में मौज़ूद है। उपेक्षित वर्ग की पीड़ा, हाशिये के लोगों की कराह और दुनिया की आधी आबादी का संघर्ष उनके लेखन में परिलक्षित होता है।
मौन के भीतर हाँक लगा रहे हैं
मेरे पुरखे... मेरे पित्तर, उन्हें मिल गई है
मेरी पराजय, मेरे जाने की ख़बर
मुझे याद रखना
मैं गाँव से जा रहा हूँ ।
निलय की कविताएँ पाठक से संवाद करती हैं। उसके आँसू पोंछती हैं,  वे आत्ममुग्धता की शिकार नहीं बल्कि कवि और समाज के बीच का पुल हैं।
समाज के अंतहीन ज़ख्मों के गहरे निशानों की अंतहीन चित्रावली इनमें मौजूद है जो कभी भूमिहीन किसान का दर्द दिखाती है, कभी मजबूर औरत की तस्वीर
किसी कौरव की सभा नही है यह 
उत्सव है शादी का 
ध्वनि और प्रकाश की जगर -मगर 
लोगों से खचाखच भरा बावन चोभ का
 शामियाना 
और कांप रही है एक औरत 
दो दिलो के मिलन में 
खुशियो का सट्टा है जिसका
वे जरूर नचायेगें 
उसे नंगा 
अपसंस्कृतियों से निजात पाने व मूल्यों को स्थापित करने के मार्ग में निलय का रचनाकर्म गंगा की माफ़िक है।
                    
जतिन अरोरा .... इन्हें बस कुछ कविताएँ कह लेना ज़्यादती  होगा..... ये जीवन दर्शन है .....ये जीवन संघर्ष है ......बरसों से चल रहे गोरखधंधे की दुकान पर ताले की गुंजाइश है....एक एक शब्द के नीचे लंबी लड़ाई और तपस्या की नींव है। एक एक शब्द सूखती नदियों की रेत से सना है...एक एक शब्द में मरते परिंदों का रूदन है...कटते गिरते दरख्तों की आह है। सीमेंट तले चरमराते झोपड़ें हैं। हर शब्द गंगा के आँसू लिए हुए है।
इन कविताओं  लिखा नहीं गया है जिया गया है. पल पल ज़हर की मानिंद निगला गया है। 
स्त्री के मान की और झूठी शान की आवाज.
गाँवों में घुसते शहर..साथ में घुसती तबाही का आलम....
आम आदमी के दर्द को लेकर चलती और सूखती गंगा....निलय जी को सिर्फ साहित्यकार के ताैर पर देखना संभव नही....मेरे लिए वह इतर हैं। कलम लेकर निकले इन्कलाबी हैं....एक आंदोलन हैं,... 
अखिलेश जी बहुत बहुत शुक्रिया... निलय जी को आपसे सुना था...जाना नहीं था...परसों ही आप ने कहा था परिचय करवाएंगे.. धन्य हूँ कि जान पाया....चाहे अंशमात्र  ही सही 🙏   
                     
 Madhu Saksena: अखिलेश ये कैसी कविताएँ पोस्ट की आज ?
नही ,ये कविताएँ नही है ।ये तो जर्जर होती संस्कृति और और मानसिकता की कहानियाँ है ।ये शांत होकर कहती है और हम आग हो जाते है ।
मैं गांव से जा रहा हूँ ....बात इतनी सी ही नही ....भूत वर्तमान और भविष्य को धार पर रख देती है ।एक मुठ्ठी दर्द पक कर दर्द का ज़खीरा बन जाता है ।छतीसगढ़ में हूँ .. ये कहानी यहां भी कही जाती है ।कोई एक बात सब  देश की सीमा तोड़ जाती है और पूरी धरती को समेत लेने की योग्यता रखती है ।
गंडासा है दिल्ली के हाथ में .....बस यही तो कहा निलय जी ने और सारे गंडासे चमक गए ।आँख नही खुल पा रही इनकी चमक से ।चमक से या भर भर आने से ...समझ ही नही पा रही ।
शबरी के पिता ... ये कविता अगर निलय जी की नही बताई जाती तो निश्चित ही अखिलेश की समझती ।अब समझ गई ।निलय जी की अगली पीढ़ी तैयार हो रही ...उनके विजय पथ की पताका थामे
 । शुभकमनाएं अखिलेश ।शबरियों की आँख सपने देखने लगी होगी ।'पाश' भी खुश हो लेगें ।
और गोली चलती है ...आज भी चल रही ।कभी उत्सव कभी धर्म का बहाना पहन कर ।कई मन्दिर सिद्ध कर रहे की वहां सिर्फ पत्थर हैं ।पत्थर ही तो है कभी राह में ,कभी जीवन पर और सबसे ज्यादा अक्ल पर ।
मैं किसान हूँ .....कभी धीरे धीरे तो कभी झन्न से गिर ही गए सब सपने ।छोटे छोटे ही तो थे ..बखरे तो समेट ही नही पाये हाथ ।वे कठोर मेहनतकश हाथ भी मज़बूर .....
निलय जी की कविताएँ ... हथियार लेकर खड़ी है और मानो हम खुद उनसे खुद को घायल किये जा रहे ।उनके मौन में इतना शोर भरा है विचारों के अंधड़ में  कांपती है मानवता ....
बहुत बधाई निलय जी को ।
आभार अखिलेश ।       

 कोमल सोमरवाल :...समकालीन कवियों को पढना बेहद रुचिकर लगता है।
जब ईमानदारी बेमानी लगने लगती है और सत्ता छलावे की सीमाएँ लाँघ जाती है, जब आम आदमी की कठिनाइयां विद्रोह में तब्दील होने लगती है तब उठती है परिवर्तन की माँग..  निलय जी की कविताओं में ऐसे ही परिवर्तन की माँग स्पष्टत: परिलक्षित होती है।
निलय जी की "और गोली चलती है" कविता विडंबनात्मक यथार्थ की इस तरह की सपाट अभिव्यक्ति दुर्लभ नहीं सहज उपलब्धि है। T.S. Eliot की "The Preludes" में नारी की इस दशा को लेकर इस्तेमाल किये कुछ पंक्तियाँ याद आती है जिसका अनुवाद करने की कोशिश की है:-
सड़क महिला के समान
लेटती है पीठ के बल
वो झेलती है पुरुषों के दबाव
जो गुजरते है उस पर से
और रौंद देते है उसकी आत्मा
कई हजारों बार
मैं गाँव से जा रहा हूँ कविता पलायन की मनोस्थिति दर्शाती है। प्रवास हमेशा संवेदनाओं से जुड़ाव रखता है। 
"अपना युद्ध हार चुका हूँ मैं
विजेता से पनाह मांगने जा रहा हूँ"
गहरी संवेदनाएँ.. बेदखल में नगरीकरण पर निलय जी ने उम्दा कटाक्ष किया। 
मानस पटल को झकझोर देने वाली प्रस्तुति के लिए अखिलेश जी को बधाई.. और पटल को आभार💐💐💐  

प्रवेश सोनी ....अखिलेश जी आज आपको पुनः धन्यवाद दे रही हूँ ,यह कविताएं मात्र पढ़ने के लिए नही है इनके विद्रोह को ,विवशता को ,बैचनी को ,अपने भीतर महसूस करने की जरूरत है ।यह कवितायेँ सकीबा के लिए एक दिन का उत्स नही है हमेशा याद रखी जाने वाली कविताएं है ।निलय जी का रचना कर्म जन के बेबस मन की आवाज़ है ।
गाँव से जा रहा हूं …...पनाह मांगने जा रहा हूं  ,
इस कविता में  गाँव से बिछुड़ने का दुःख गर्दन झुका कर रोम रोम से बिसूर रहा है ।किसी सूतक का वस्त्र पहने........दीनता के भाव में बेबसी 
गंडासा है दिल्ली के हाथ , राजनीती के छल प्रपंच ,समझते है फिर भी जिबह हो रहे है कवि ने आगाह किया फिर आगये ....
यह सच कहा है कि एक कवी की कलम ही हमें ऐसी विद्रूपताओं से बचा सकती है ।
शबरी और पिता की आँखों का संवाद एक बार फिर  आँखों को नमी दे गया ।झन्न से बजी पीतल की थाल ,चक्करधिन्नी की तरह घूम गया आकाश ....आह ,शब्द नही कह पाते ऐसे दुखों का मर्म 
और गोली चल गई ....अखिलेश जी आपकी बात से सहमत हूं क्यों यह स्त्री वर्ग स्त्री विमर्श की श्रेणी में नहीं आ पाता ।लेकिन एक सत्य से भी वाकिफ़ हूं स्त्री विमर्श कैसा ....इस कविता का इन्कार दहला तो देता है पर इन्कार शब्द को नवाज़ देता है ।
बेदखल ,सर्वहारा वर्ग की बेबसी अपनी जड़ों से छूट कर कोन हरा रह पाया है ।कसाई कर रहा है मेरी बेदखली का इन्तजार ,....इस कलम के आगे नत हूं ।

बोधिसत्व जी ....निलय जी की कविताओं का प्रभाव असीम है, वे हिंदी की एक अमिट वाणी हैं
ये अमर कविताएँ हैं
कालिदास बाल्मीकि भास तुलसी के स्तर की लेखनी है निलय की 
उनको अनेक साधुवाद    

मीना शर्मा ...घर परिवार के सुख त्यागकर ,गंगोत्री से गंगासागर तक की कठिन यात्रा का अमृत बन कर छलकना "निलय" जी के कठोर तप का फल है ।
,कविता या पूरा खंडकाव्य ,दो ही पंक्तियाँ काफी हैं....
किसी सूतक का वस्त्र पहने
पाँच पोर की लग्गी काँख में दबाए
मैं गाँव से जा रहा हूँ ।
हर कविता गहन ,गंभीर अर्थ 
लेकर साहितय की जड़ों को सींचती ।
निलय जी की कविता की गूँज ज्यों गंगा के तट पर शंखनाद !!
बधाई निलय जी !
आभार अखिलेश जी काल चिंतन की कविताओं से रू ब रू 
कराने के लिए ।
💐💐💐💐💐💐💐   

अबीर आनंद ......ग्रामीण परिवेश की कविता आज पढ़ने को मिली तो लगा मानो बाल पकड़ कर निलय जी ने झकझोर दिया हो। शहर के छलावे में एक अरसे से रहते हुए विचार आता था कि राजनैतिक नारों की बुलंदियों में शायद कुछ बदल गया हो पर ऐसा कुछ भी हुआ लगता तो नहीं है। कविता में यदि एक आध पंक्ति भी जीवन भर याद रहे तो कविता सार्थक हो जाती है। निलय जी की कविता आज कल के राजनीति को तटस्थ रखकर भी, बिना कोई पक्ष लिए देहाती पिछड़ेपन को रेखांकित करती है और एक जनजागरण का अलख जगाती है। मैं एक शिक्षक की भाँति विवेचना करने से बचता हूँ क्योंकि शिक्षक विवेचना मन में बहुत देर तक नहीं गूँजती। निलय जी की कविता सीधे सपाट शब्दों में समझें तो देर तक झकझोरती रहती है, कौंधती रहती है।     

प्रमोद कुमार तिवारी ...आज जबकि जीवन और कृतित्‍व में दूरी बढ़ती जा रही है और अनेक मोर्चों पर अलग अलग रूपों में रह कर चालाकी से काम को साध लेना एक सफलता की तरह देखा जा रहा हो। निलय जी जैसे लोग एक भरोसे की तरह नजर आ रहे हैं। कि सबकुछ बाजार नहीं तय करेगा, सब कुछ भौतिक सुविधाओं के तर्क से नहीं चलेगा ‍कि हमारा होना केवल शरीर और मजे का होना नहीं है। और घर परिवार के बाहर भी हमारा अस्तित्व है। सुख शब्‍द जिसके मूल में ही (सु-ख-- सुंदर विस्‍तार या आकाश) विस्‍तार निहित है वह कितना संकुचित होता जा रहा है। इतना कि पड़ोसी तक के ‍लिए या अपने ही परिवार के बुजुर्ग तक के जगह नहीं अंटती उसमें। ऐसे समय में प्रकृति और पानी के हक में खड़ा होना एक बड़ा काम है। सवाल यह नहीं है कि इससे समाज को या गंगा को या सरकार को ‍कितना फर्क पड़ेगा। मेरे लिए कम से कम यह महत्‍वपूर्ण है कि मुझे कितना फर्क पड़ रहा है। एक व्‍यक्ति के भीतर कुछ बदल रहा है या नहीं। गंगा बहुत बड़ी हैं और सरकार का भी अपना ढंग है परंतु इससे किसी व्‍यक्ति का काम छोटा नहीं हो जाता और इस बात को राम के सेतु निर्माण के समय गिलहरी के माध्‍यम से बहुत पहले दिखाया जा चुका है। जानता हूँ कि कुछ लोग इसे निलय जी की बड़ी महत्वाकांक्षा से भी जोड़ेंगे पर कुछ समय बाद ये बातें महत्व नहीं रखतीं। आज निलय जी की कविताओं पर सुखद चर्चा हो रही है। कविता और जीवन के साथ की जरूरत दिन प्रति दिन बढ़ती जा रही हैै। कच्‍चे अनुभवों की मात्रा कम कवियों में दिखती है। निश्चित रूप से कुछ कवि कम अनुभवों से भी शानदार ईमारत बनाने में सिद्धहस्‍त हैं परंतु अनुभव अपनी बात अलग से कहते हैं। निलय जी क‍ी कविताओं में कलात्‍मक उत्‍कृष्‍टता से कहीं अधिक वैयक्तिक ईमानदारी नजर आती है जिसे उनकी विशिष्‍टता के रूप में देखा जा सकता है। 

Tuesday, January 31, 2017

 बसंत पंचमी यह ऋतु अपने साथ कई परिवर्तन लेकर आती हैI कभी सुखकर दरकती धरती, तो कभी उसे रिमझिम फुहारों से भिगोकर मनाने कि चेस्टा करते देख, कभी शरद कि कुनकुनी धुप तो घने कोहरे मैं किसी उदास मन सी उलझी उलझी यह धरतीI मानो जैसे जो कुछ भी इंसान के मन में चल रहा है, यही प्रकृति में भी प्रतिबिंबित हो रहा हैI
शिशिर की विदाई और बसंत का आगमन ..जैसे सूरज ने रजाई से झाँक कर देखा स्रष्टि को और चारो और प्रकृति स्वागतातुर हो गई सूरज की बसंती रश्मियों के लिए ... ,चटक कर खिल गई हर कलि ..भ्रमर ने प्रीत गीत गुंजाये और धरती ने ओढ़ ली धानी चुनर ....सब ने एक स्वर में कहा लो आगया बसंत मेहमां बन ...मन को कर तरंगित हरषाया पलाश तो कोयल की कूक से बौराया आम ...सरसों  की आभा इठलाई पवन झकोरों से .... तो परदेसी कन्त की राह में प्रिय ने अपनी नज़र बिछाई |
बसंत पंचमी पर साहित्य शिरोमणि श्री सूर्यकांत त्रिपाटी निराला जी  का जन्मोत्सव मनाया जाता है और माँ सरस्वती का पूजन का दिवस भी| शायद ही कोई ऐसा कवि  रहा हो जिसने  अपनी कलम से बसंत पर साहित्य सृजन न किया हो |सबने अपने अपने मन से बसंत को देखा और उन भावों को शब्दों से सजाया |निराला जी  ,पद्माकर,धूमिल , त्रिलोचन केदारनाथ सिंह ,मंगलेश डबराल  और समकालीन कवियों  की रचनाओं के साथ आज रचना प्रवेश पर प्रस्तुत है साहित्य की बात समूह के  रचनाकारों की भिन्न भिन्न भावों को संजोई हुई रचनाएं |
 कूलन में केलि में कछारन में कुंजन में
          क्यारिन में कलिन में कलीन किलकंत है.
कहे पद्माकर परागन में पौनहू में 
          पानन में पीक में पलासन पगंत है
द्वार में दिसान में दुनी में देस-देसन में 
          देखौ दीप-दीपन में दीपत दिगंत है
बीथिन में ब्रज में नवेलिन में बेलिन में 
          बनन में बागन में बगरयो बसंत है
निराला जी
सखि, वसन्त आया
भरा हर्ष वन के मन,
नवोत्कर्ष छाया।

किसलय-वसना नव-वय-लतिका
मिली मधुर प्रिय उर-तरु-पतिका
मधुप-वृन्द बन्दी-
पिक-स्वर नभ सरसाया।

लता-मुकुल हार गन्ध-भार भर
बही पवन बन्द मन्द मन्दतर,
जागी नयनों में वन-
यौवन की माया।

अवृत सरसी-उर-सरसिज उठे;
केशर के केश कली के छुटे,

स्वर्ण-शस्य-अंचल
पृथ्वी का लहराया।
(गीत)
आओ, आओ फिर, मेरे बसन्त की परी--
छवि-विभावरी;
सिहरो, स्वर से भर भर, अम्बर की सुन्दरी-
छबि-विभावरी;

बहे फिर चपल ध्वनि-कलकल तरंग,
तरल मुक्त नव नव छल के प्रसंग,
पूरित-परिमल निर्मल सजल-अंग,
शीतल-मुख मेरे तट की निस्तल निझरी--
छबि-विभावरी;

निर्जन ज्योत्स्नाचुम्बित वन सघन,
सहज समीरण, कली निरावरण
आलिंगन दे उभार दे मन,
तिरे नृत्य करती मेरी छोटी सी तरी--
छबि-विभावरी;

आई है फिर मेरी ’बेला’ की वह बेला
जुही की कली’ की प्रियतम से परिणय-हेला,
तुमसे मेरी निर्जन बातें--सुमिलन मेला,
कितने भावों से हर जब हो मन पर
विहरी--
छबि-विभावरी;
         *निराला*
रुखी री यह डाल ,वसन वासन्ती लेगी.
देख खड़ी करती तप अपलक ,
हीरक-सी समीर माला जप .
शैल-सुता अपर्ण - अशना ,
     पल्लव -वसना बनेगी-
     वसन वासन्ती लेगी.
हार गले पहना फूलों का,
ऋतुपति सकल सुकृत-कूलों का,
स्नेह, सरस भर देगा उर-सर,
      स्मर हर को वरेगी .
      वसन वासन्ती लेगी.
मधु-व्रत में रत वधू मधुर फल 
देगी जग की स्वाद-तोष-दल ,
गरलामृत शिव आशुतोष-बल 
        विश्व सकल नेगी ,
       वसन वासन्ती लेगी.
      *निराला*
*हिन्दी के सुमनों के प्रति पत्र*
मैं जीर्ण-साज बहु छिद्र आज,
तुम सुदल सुरंग सुवास सुमन,
मैं हूँ केवल पतदल--आसन,
तुम सहज बिराजे महाराज।

ईर्ष्या कुछ नहीं मुझे, यद्यपि
मैं ही वसन्त का अग्रदूत,
ब्राह्मण-समाज में ज्यों अछूत
मैं रहा आज यदि पार्श्वच्छबि।

तुम मध्य भाग के, महाभाग!--
तरु के उर के गौरव प्रशस्त
मैं पढ़ा जा चुका पत्र, न्यस्त,
तुम अलि के नव रस-रंग-राग।

देखो, पर, क्या पाते तुम "फल"
देगा जो भिन्न स्वाद रस भर,
कर पार तुम्हारा भी अन्तर
निकलेगा जो तरु का सम्बल।

फल सर्वश्रेष्ठ नायाब चीज
या तुम बाँध कर रँगा धागा;
फल के भी उर का, कटु, त्यागा,
मेरा आलोचक एक बीज।
  *निराला*
आज का विषय *बसंत* काव्य के लिए बहुश्रुत विषय है । जिस पर आदि काल से रीति काल और आधुनिक समय तक के कवियों ने सुंदर रचनाएं हमे दी हैं ।
आज विषय के सापेक्ष अपने समय को काव्य में बताने वाले कुछ कवियों की महत्वपूर्ण रचनाएं परंपरानुसार प्रस्तुत कर रहा हूँ । देखिएगा हर कवि बसंत को कैसे महसूस करता है और कैसे काव्य में उतारता है । बसंत ... प्रेम है , उन्माद है ,उदासी है , अकेलापन है , तुर्शी है , स्मृति है , आत्मनिरीक्षण है ,.... और भी बहुत कुछ है । देखिये ,सुनिये ,गुनिये और हो सके तो कुछ कहिये भी

               ➖ *सुरेन*
*बसंत आएगा*
▪▪▪▪▪
--स्वप्निल श्रीवास्तव
बसंत आएगा इस वीरान जंगल में जहाँ 
वनस्पतियों को सिर उठाने के ज़ुर्म में 
पूरा जंगल आग को सौंप दिया गया था 
वसन्त आएगा दबे पाँव हमारे-तुम्हारे बीच 
संवाद कायम करेगा उदास-उदास मौसम में 
बिजली की तरह हँसी फेंक कर बसंत 
सिखाएगा हमें अधिकार से जीना 
पतझड़ का आख़िरी बैंजनी बदरंग पत्ता समय के बीच 
फ़ालतू चीज़ों की तरह गिरने वाला है बेआवाज़ एक ठोस शुरूआत फूल की शक्ल में आकार लेने लगी है मैंने देखा बंजर धाती पर लोग बढ़े आ रहे हैं कंधे पर फावड़े और कुदाल लिए देहाती गीत गुनगुनाते हुए उनके सीने तने हुए हैं बादल धीरे-धीरे उफ़क से ऊपर उठ रहे हैं ख़ुश्गवार गंधाती हवा उनके बीच बह रही है एक साथ मिलकर कई आवाज़ें जब बोलती हैं तो सुननेवालों के कान के परदे हिलने लगते हैं वे खिड़कियाँ खोलकर देखते हैं दीवार में उगे हुए पेड़ की जड़ों से पूरी इमारत दरक गई है
*इन ढलानों पर* ▪▪▪▪▪मंगलेश डबराल इन ढलानों पर वसंत आएगा हमारी स्मृति में ठंड से मरी हुई इच्छाओं को फिर से जीवित करता धीमे-धीमे धुंधुवाता खाली कोटरों में घाटी की घास फैलती रहेगी रात को ढलानों से मुसाफ़िर की तरह गुज़रता रहेगा अंधकार चारों ओर पत्थरों में दबा हुआ मुख फिर से उभरेगा झाँकेगा कभी किसी दरार से अचानक पिघल जाएगा जैसे बीते साल की बर्फ़ शिखरों से टूटते आएँगे फूल अंतहीन आलिंगनों के बीच एक आवाज़ छटपटाती रहेगी चिड़िया की तरह लहू लुहान *वसन्त* ▪▪▪--धूमिल इधर मैं कई दिनों से प्रतीक्षा कर रहा हूँ : कुर्सी में टिमटिमाते हुए आदमी की आँखों में ऊब है और पड़ौसी के लिए लम्बी यातना के बाद किसी तीखे शब्द का आशय अप्रत्याशित ध्वनियों के समानान्तर एक खोखला मैदान है और मासिकधर्म में डूबे हुए लत्ते-सा खड़खड़ाता हुआ दिन जाड़े की रात में जले हुए कुत्ते का घाव सूखने लगा है मेरे आस-पास एक अजीब-सा स्वाद-भरा रूखापन है उधार देने वाले बनिये के नमस्कार की तरह जिसे मैं मात्र इसलिए सहता हूँ कि इसी के चलते मौज से रहता हूँ मेरे लिए अब कितना आसान हो गया है नामों और आकारों के बीच से चीज़ों को टटोलकर निकालना अपने लिए तैयार करना – और फिर उस तनाव से होकर – गुज़र जाना जिसमें ज़िम्मेदारियाँ आदमी को खोखला करती हैं मेरे लिए वसन्त बिलों के भुगतान का मौसम है और यह वक़्त है कि मैं वसूली भी करूँ – टूटती हुई पत्तियों की उम्र जाड़े की रात जले कुत्ते का दुस्साहस वारण्ट के साथ आये अमीन की उतावली और पड़ौसियों का तिरस्कार या फिर उन तमाम लोगों का प्यार जिनके बीच मैं अपनी उम्मीद के लिए अपराधी हूँ यह वक़्त है कि मैं तमाम झुकी हुई गरदनों को उस पेड़ की और घुमा दूँ जहाँ वसन्त दिमाग से निकले हुए पाषाणकालीन पत्थर की तरह डाल से लटका हुआ है यह वक़्त है कि हम कहीं न कहीं सहमत हों वसन्त मेरे उत्साहित हाथों में एक ज़रूरत है जिसके सन्दर्भ में समझदार लोग चीज़ों को घटी हुई दरों में कूतते हैं और कहते है : सौन्दर्य में स्वाद का मेल जब नहीं मिलता कुत्ते महुवे के फूल पर मूतते हैं *वसन्त* ▪▪▪-एकांत श्रीवास्तव वसन्‍त आ रहा है जैसे मॉं की सूखी छातियों में आ रहा हो दूध माघ की एक उदास दोपहरी में गेंदे के फूल की हॅंसी-सा वसन्‍त आ रहा है वसन्‍त का आना तुम्‍हारी ऑंखों में धान की सुनहली उजास का फैल जाना है काँस के फूलों से भरे हमारे सपनों के जंगल में रंगीन चिडियों का लौट जाना है वसन्‍त का आना वसन्‍त हॅंसेगा गॉंव की हर खपरैल पर लौकियों से लदी बेल की तरह और गोबर से लीपे हमारे घरों की महक बनकर उठेगा वसन्‍त यानी बरसों बाद मिले एक प्‍यारे दोस्‍त की धौल हमारी पीठ पर वसन्‍त यानी एक अदद दाना हर पक्षी की चोंच में दबा वे इसे ले जाएँगे हमसे भी बहुत पहले दुनिया के दूसरे कोने तक। *बसंत* ▪▪--केदारनाथ सिंह और बसंत फिर आ रहा है शाकुंतल का एक पन्ना मेरी अलमारी से निकलकर हवा में फरफरा रहा है फरफरा रहा है कि मैं उठूँ और आस-पास फैली हुई चीजों के कानों में कह दूँ 'ना' एक दृढ़ और छोटी-सी 'ना' जो सारी आवाजों के विरुद्ध मेरी छाती में सुरक्षित है मैं उठता हूँ दरवाजे तक जाता हूँ शहर को देखता हूँ हिलाता हूँ हाथ और जोर से चिल्लाता हूँ- ना...ना...ना मैं हैरान हूँ मैंने कितने बरस गँवा दिए पटरी से चलते हुए और दुनिया से कहते हुए हाँ हाँ हाँ...|  

बिना टिकट के
गंध लिफ़ाफ़ा
घर-भीतर तक 
डाल गया मौसम
रंगों डूबी
दसों दिशाएँ
विजन डुलाने लगी हवाएँ
दुनिया से बेख़ौफ़ 
हवा में
चुंबन कई 
उछाल गया मौसम।
दिन सोने की
सुघर बाँसुरी
लगी फूँकने...फूल-पाँखुरी,
प्यासे अधरों पर ख़ुद 
झुककर
भरी सुराही 
ढाल गया मौसम।
-इसाक अश्क

सीधी है भाषा बसंत की
त्रिलोचन ...
कभी आँख ने समझी कभी कान ने पाई कभी रोम-रोम से प्राणों में भर आई और है कहानी दिगंत की नीले आकाश में नई ज्योति छा गई कब से प्रतीक्षा थी वही बात आ गई एक लहर फैली अनंत की|
वासंती समझौते 
दस्तख़त पलाश के।
गंधों के दावों का
एक बाग फूला,
आँखों ने कलियों पर
डाल दिया झूला,
कहाँ रहे कोयल के
आज मन हुलास के।
आसमान छूने को
परचम लहराए,
कौवों ने सुबह-सुबह
काँव गीत गाए,
उगल रही तोती भी
शब्द कुछ भड़ास के।
तेज़ हुई आँधी में
डोलते बबूल,
डाल की गिलहरी भी
राह गई भूल,
टिड्डी दल पाले है
-बृजनाथ श्रीवास्तव

प्रत्यंचा टूट गई
छूट गए फूलों के वाण
ऋतुओं के गंध कलश छलक गए
रेशमी हवाओं की
रस्सियाँ भाँजता
बटरोही वसंत
वन-बगीचों में झाँकता
कोयल के पैने संधान
अंध कूप में गहरे सरक गए
शहज़ादे सलीम-सा
बौराया आम
मेंहदी हसन-सी
ग़ज़ल पढ़ती है शाम
पहाड़ों पर नदी के पैतान
गुलमोहर निगाहों में करक गए
जंगल ने ओढ़ ली 
खुशबू की चादर
धरती ने लगा ली
जैसे महावर
रंगों के तन गए वितान
गीत-क्षण शीशे-सा दरक गए
-कैलाश पचौरी

संयम के टूटेंगे फिर से अनुबंध,
महुए की डाली पर उतरा बसंत।

मधुबन की बस्ती में,
सरसिज का डेरा है।
सुमनों के अधरों तक,
भँवरों का फेरा है।
फुनगी पर गुंजित है, नेहों के छंद।
महुए की डाली पर उतरा बसंत।

किसलय के अंतर में, 
तरुणाई सजती है।
कलियों के तनमन में,
शहनाई बजती है।
बहती, दिशाओं में जीवन की गंध।
महुए की डाली पर उतरा बसंत।

बौरों की मादकता,
बिखरी अमरैया में,
कुहु की लय छेड़ी,
उन्मत कोयलिया ने।
अभिसारी गीतों से, गुंजित दिगंत।
महुए की डाली पर उतरा बसंत।

सरसों के माथे पर,
पीली चुनरिया है।
झूमे है रह रहकर,
बाली उमरिया है।
केसरिया रंगों के, झरते मकरंद।
महुए की डाली पर उतरा बसंत।
बूढ़े से बरगद पर,
यौवन चढ़ आया है।
मन है बासंती पर,
जर्जर-सी काया है।
मधुरस है थोड़ा, पर तृष्णा अनंत।
महुए की डाली पर उतरा बसंत।
अजय पाठक
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साहित्यिक समूह साहित्य की बात के रचनाकारों की कविताएं |समूह के संचालक है श्री ब्रज श्रीवास्तव जी
1
बसंत का अग्रदूत
पर जीवन ऐसा
जब भी आने को होता
बसंत पतझड साथ
चली आती है उसके
पूरा बसंत 
अकेला बसंत
एक साथ 
नहीं मिलता जीवन में कभी
जैसे पूर्णिमा के साथ
ही आरंभ हो जाती है
अमावस्या........।

संजीव जैन 
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2
आ गया वसन्त झूमती दिशा दिगन्त
नहीं आए मेरे कन्त मन डोल-डोल जाए रे
मन्द-मन्द डोलती प्राण रस घोलती 
फागुनी बयार ,जैसे प्रेम गीत गाए रे !
खुल गए हैं देख कलियों के बाजूबन्द
फूल-फूल की सुगन्ध मकरन्द छलकाए रे
रुत अलबेली जैसे रागिनी नवेली
जैसे प्रीत की पहेली कोई छन्द लिख जाए रे !
खेत-खेत ,मोड़-मोड़ सारे काम-धाम छोड़,
सरसों रंगीली जो चुनर फहराए रे
कोकिला के सोर और आम पे लदा ये बौर
देख टेसू ठौर-ठौर रंग बगराए रे !!

मीना शर्मा

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3
*बसंत*
▪▪▪
प्रिय , जैसा कि तुम जानते हो
मौसम  ... 
जिसे फागुन कहते है
तुमने साल भर जो चोटियाँ
बाँधी है ,
वे एक साथ खुल-खुल जाती है
यूँ रह -रह कर खुलते केशों से
किसी भी पत्ते का पर्ण हरित
लह लहा के मेरी ओर
ध्यानाकर्षण प्रस्ताव पेश करता है
ऐसे में तुम्हे प्यार ना करने की जिद
और तुम्हे जहन से हटाने की सारी कोशिशे ,
तुमसे कहना नहीं चाहता 
और न ही  जताना ....।
            
 ➖➖ *सुरेन*
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4

 *उम्र में जुड़ता बसन्त*
शहर की ऊंची इमारतों 
और कंक्रीट के जंगल में
सेवानिवृत्त हो ,
मल्टी स्टोरी की एकमात्र छत पर टहलता है
मौसम का हरकारा पवन।

वातानुकूलित कार्यगृहों में 
बारह महीने सूट में अकड़े रहते हैं बदन ,
किटी पार्टी में कट कट के 
अतिसभ्य  सुचिता में छोटा हुआ पचरंगी दुपट्टा 
नहीं करता अब  हवा से ठिठोली 

खिलखिलाती मटर, 
फ्रोज़न  हो गई 
लहलहाती गेहूं की बालियां 
पिसे आटे के ब्रांडेड बेग पर 
उदासी का फोटो बन चिपकी रहती है,
पीली सरसों की महक का 
अब कहीं कोई परिचय नहीं है 

बालकनी के अय्याश गमलों में 
मठेठ से मुस्कुराते हैं 
बोनसाई गुलाबी कनेर 
चेतुवे की गुनगुनाहट याद नहीं 
अब दौड़ते-भागते शहर को 

विविध भारती पर गूंजता  फरमाइशी गीत
" केतकी गुलाब जूही चंपा के वन फूले 
ऋतु बसंत अपनो कंत गोदी गरवा लगाए"…
सुनकर जोड़ लिया 
सबने उम्र के सालों में एक और बसंत।

प्रवेश सोनी 
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5
बसन्त!!
पलाश की टहनियों पर
फूटने लगे हो तुम,
कुछ दिनों में
दहक कर पूरे जंगल पे
बुझ जाओगे...
और कहीं कहीं
कुछ भी न बदलेगा,
बना रहेगा सब
जस के तस।

मंजूषा मन
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6
पता नहीं 
कैसा होता है 
सुबह का आलम 
नदी में सूरज की पहली किरण का 
अक्स कैसा होता है पता ही नहीं 

कैसे होते हैं चमकदार शहर
हंसते मुस्कराते हुए लोग कैसे होते हैं खुश
कुछ पता नहीं 
प्रेम का कामयाब रस्ता 
कोई बता दे
मुझे तो नहीं पता 
कैसा होता है. 

यहां तो बस 
काम करने के लिए सुबह होती है 
न थकने के लिए दोपहर और 
बोझ लेकर घर लौटने के लिए 
होती है शाम
रात केवल सोने के लिए ही कैसे होती है नहीं पता हमें 
चटख रंग चिढ़ाते हुए मिलते हैं हमें
शीत ऋतु छोड़ कर जाती है हमारे घर
तब भी हम हिसाब से  ठिठुरते रहते हैं 
कर्ज की मार सहते हुए हम देख ही नहीं पाते खिले चेहरे के नूर
फूलों की खेती की झंझट बड़ी है हमारे गांव में 
हमें नहीं है पता 
बसंत किसे कहते हैं लोग. 
ब्रज श्रीवास्तव 
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7
आम पर बौर
तन पर.मदहोशी
जंगल में टेसू
मन की उमंग
हरी हरी लहराती बालियाँ
जैसे.जीवन की बांछे खिल जाना
शांत नदियाँ
जैसे चुपके से तुम्हारा आना
जीवन में बसंत…..।
संजीव जैन 
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8
अभी अभी पीपल के पेड़ से
गिरा है 
एक निःशब्द पत्ता
लहराते हुये .
पहली और अंतिम दफा 
उठाया है उसने विरक्ति का ये लुफ्त
लहराने पर .
धरा ने लगा लिया
ह्र्दय से
चुंबन पर जड़ दिये
धूल के कुछ कण.
इसका यूं विरक्त होना
छाँह का टूटना अवश्य है 
पर क्या करे 
बसन्त जो आ रहा है ।
   🔵कुंजेश श्रीवास्तव  

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9
 #प्रेमी#
पत्ते उगते हैं
झड़ जाते हैं
फिर उगने के लिए
फूलों का भी ऐसा ही है कुछ
खिलना और मुरझा जाना
रख दो कलम किनारे
वो देखो मेरी चाँदनी
और उसकी लट
हे कवि
अब लिखो बसंत पे कविता
बस इतना सा ख्याल रखना
लिखने में न आए
खुलने न पाए लट
✍जतिन अरोरा 
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10
 बसंत 
कोयल से कहा मैंने सखि ! 
मेरी बोली को दे -दे थोड़ी सी मिठास 
वह झट से मान गई
फूलों ने मुझे दे दी खुश -खुश खुशबू की बहा
कलियों ने फिर भर -भर अँजुरी 
 मुझ पर दी उड़ेल अपनी 
 हँस कर अपनी उन्मुक्त हंसी 
 भौरों से सीख लिए मैंने सब प्यार के गीत 
 भीनी -भीनी गुन -गुन 
 पायल में हवाओं में 
 भर दी रुन -झुन ,रुन झुन 
 और झरनों का
 इठलाना बक्श दिया 
 तितली ने स्वयं मुझ को\ 
 और झील के पानी की उद्दाम तरंगों ने 
 दी अपनी चंचलता 
 रक्ताभ पलाशों ने रंग डाले कपोल मेरे 
 मेहंदी ने हथेली पर रख दी अपनी सुर्खी 
 इक वृद्ध अशोक ने फिर वरदान दिया मुझ को
 जीने का शोक रहित 
 और मुझ में उतर आया मानों कि समूचा वसंत 
 जो रोप गया खुशियाँ 
 मेरे अंतस में अनंत 
 कृष्णा कुमारी 
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11आहट होती है,
मन की चादंनी मे, 

तुम ,आकर कुछ समय बाद ही चले जाते हो.....,
तुम्हारी प्रतीक्षा मे भुल जाती हूं,
श्याम पट की कालिमा 
औऱ
श्वेतपट पर लिख देना चाहती हूं,
ढेर सारे रंगों से 
नई कविता ...

अब तो आ जाओ
प्रिय कंत 
आया है
बसंत.....

राखी तिवारी               
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 12         
मुझको याद तुम्हारी आई अरसे बाद।
नैनों ने गगरी छलकाई अरसे बाद।

मन-वीणा के तारों में झनकार जगी
अंतस में गूँजी शहनाई अरसे बाद।

मेरे मन-मधुबन में प्यार के फूल खिले
कोयल ने भी कूक सुनाई अरसे बाद।

पतझड़ बीता अब मधुमास है आने को
लाई संदेशा ये पुरवाई अरसे बाद।

ख़बर सुनी जब से ऋतुराज के आने की
बौराई सी है अमराई अरसे बाद।

            उदय ढोली

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13
  बसन्त 
******
जीवन में बसंत आ रहा है
उतर कर ससरता हुआ
पेड़ों की लचकती 
शाखों से
अमराइयाँ लेने लगी हैं 
उच्छ्वास गहरे
कुहकती कोकिल के
शब्द बेधी बाण बींध रहे हृदय... आग सी लगाता पलाश मैं भी झुलसना चाहती हूँ इस बसन्त में देखा है पहली बार आँखें खोल..... बदलता मौसम देह पर बौराया बसन्त चहकता, महकता, दहकता, लरजता छूकर कलियाँ थिरकते पाँव, बजती झाँझर दौड़ पड़ती हिरनी पलाश वन में झुलसने को सहेज लेना तुम अपने हिस्से के सुख बसन्त कुछ छोड़ जाए तो ... इस तरह आया है अबके बसन्त जीवन में बौराया सा !! मीना सारस्वत !

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14
चलो अब आ गया फिर से अम्मलतास का मौसम 
🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹
ये कैसा गीत है जो गा रही कोयल मगन होकर 
लगी छाने कशिश दिल में,कि है उल्लास का मौसम 
🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹
यूँ लगता है कि जैसे हॅस रहा हो ये चमन ,ये घर
तेरे आने से   बदला है मेरे पास का  मौसम 
🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹
मिटे कैसे समझ आता नहीं जो प्यास दिल में है
कि आया लौट अब तो फिर नज़र की प्यास का मौसम 
🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹
नशा है फाग का छाया ज़मीं से आसमां तक अब
हॅसी फूलों की ,समझो तुम कि है आभास का मौसम 

🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹
भावना
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15
 "फिर आएगा वसन्त"

हम जो चुपचाप बैठे हैं हताश से
अपनी ही लगाई गाँठों की ऐंठन में जकड़े से
प्रसन्नता से निर्वासित लोग हम
बदलेगा मौसम हमारे लिए भी
देखना फिर आएगा वसन्त चुपके से
डालेगा बसेरा हमारे आँगन में
पीले नीले मिल नारंगी रंगो से
पूर पूर देगा हमारे गलियारे

खेतों में,बागों में,गली कूचों में
हौले से बिखर जायेगा जैसे बिखर जाती है खुशबू
सांसों की सरगम में,राग भोर का गायेगा,चूमेगा वल्लरी से झरती कलियों को
फ़ैल जायेगा वसन्त का जादुई उजाला सवेरे की रेशमी झालर में झिलमिल सा

टेसू के उन्मादी रंग से घुल जायेगी केसर सी
उसके आने की आहट से  समीर बना रही अल्पनाएँ पराग कणों से
कोयल गायेगी मादक गीत
भौरों की गुनगुन में उसकी आमद का संगीत स्वर लहरियों में नाचने लगा है

अपने गिटार के तारों को छूकर छेड़ते ही वो उखाड़ फेंकेगा तुम्हारी उदासी की केंचुल
पपड़ाये होंठ हिलने लगेंगे और फिर से जीने लगेंगे 
कब तक आखिर कब तक 
भूख,हमे संत्रास देगी
वसन्त के आते ही होगा एहसास अनोखा तृप्ति का
जी उट्ठेगा जग सारा देखना 
अँधेरे को चीर आयेगा वसन्त
छा जायेगा हमारे दिलो-दिमाग पर वसन्त का मादक नशा
आयेगा वसन्त अपनी पूरी की पूरी जिजीविषा के साथ
@c आरती तिवारी

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16
 बसंत और पतझड़
इसमें है दुनिया के तमाम रंगों की आभा देदीप्यमान 
इसमें है संगीत के सातों सुर की स्वर लिपि  जाज्वल्यमान
ऋतु यह लाजवाब है
बस!
मुझे पसंद नहीं इसकी एक बात
सुख की आदत डाल
दो चार दिनों बाद
दु:खमय दौर 
सौगात हमें
दे जाता 
लेकिन पतझड़--- ?
भावना सिन्हा 
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17
संत बसंत 
बसंत
ऋतुओं का संत
मौसम के सितार पर 
थिरकाता अपनी अंगुलियां
  
स्वप्न में डूबी 
जैसे मन्त्र मुग्ध महफ़िल 
जैसे मोहिनी राग में 
झर रहे सुगंध से सने 
निर्मल शब्द

गुनगुनी मदमस्त बयार से  
बेसुध पूरी बगिया   

झूठ कहते हैं लोग
कि ऋतुओं के महाराज पधारे हैं

ये शिविर आनन्द का कुछ दिन 
प्रेम लुटाकर  लौट जाएगा 
इश्क में डूबा फ़कीर।

ब्रजेश कानूनगो
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18
*फिर इस बसंत में*
फिर बसंत  में होंगी बातें  फूलों की
रंग , खुशबू ,बहार और  झूलों की

पीठ से जा लगे हैं कितने  पेट
बसंत को याद नहीं बुझते चूल्हों की

दरख्तों  का घना साया महलों पर 
अपने हिस्से में है छाँव  बबूलों की

उनकी दरियादिली का  आलम है
पहाड़ों पर बस्ती लंगड़ों - लूलों की

अब नही आता यौवन कलियों पर
नज़रे उन पर दरिन्दे शूलों की

वो ज़खीरा लिये बैठे हथियारों का
सज़ा हवाओं को उनकी भूलों की

मुल्क की पैमाइश का पैमाना क्या
नक्शों में छिड़ी जंग भूगोलों की

जले बदन की बू है बयारों में
बाज़ार में कीमत बढ़ेगी दूल्हों की

शिकायत करें अब हम किससेे
अकाल में सूखी फसल उसूलों की

*शरद कोकास*

19
 *1985 का बसंत*
*संदर्भ भोपाल गैस कांड*

*बसंत क्या तुम उस ओर जाओगे*

बसंत क्या तुम उस ओर जाओगे
जहाँ पेड़ देखते देखते
क्षण दो क्षण में बूढ़े हो गए
देश की हवाओं में घुले 
आयातित ज़हर से
बीज कुचले गए
अंकुरित होने से पहले
और जहाँ
वनस्पतियाँ अविश्वसनीय हो गईं
जानवरों के लिए भी

जाओ उस ओर
तुम देखोगे और सोचोगे
पत्तों के झड़ने का 
अब कोई मौसम नहीं होता
उगते हुए नन्हें नन्हें पौधों की कमज़ोर रगों में इतनी शक्ति शेष नहीं कि वे सह सकें झोंका तुम्हारी मन्द बयार का पौधों की आनेवाली नस्लें शायद अब न कर सकें तुम्हारी अगवानी पहले की तरह खिलखिलाते हुए आश्चर्य मत करना देखकर वहाँ निर्लज्ज से खड़े बरगदों को । *शरद कोकास*
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२०
सोलहवें बसंत की अदायें ''
कमसिन सी ,अल्हड़ तितली सी ,
सतरंगी सपने बुन रही है वो ! मृगया ,मृगनयनी ,मृगमन लिए , बचपने को भूल रही है वो ! चंचलता को बांध चोटी  में ,
शरारतों को छेड़  रही है वो ,
बावरी सी निहारती दर्पण ,
खुद ही इठला रही है वो !
बीते सालों की पतझड़ी पत्तियाँ बीन,
तन -मन बुहार रही है वो !
ओंस से  भींगी कोपल को चूम ,
खुद ही खुद शर्मा रही है वो !
कभी चुरा कर आँखों से काजल ,
मानो कच्ची उम्र ही चुरा रही है वो ,
कभी लगा कर काजल का टीका ,
बुरी नज़रो से खुद को बचा रही है वो ! 
इन मधुमासी मधुर बयार संग ,
महक -बहक जा रही है वो !
देख ,फूलो संग भवरों  का खेला ,
लाज  से लजा रही है वो !
सुनकर यौवन की आहटें ,
अंगड़ाइयाँ ले रही है वो !
सोलहवें बसंत की अदाएं लिए  
पिया की पदचापे सुन रही है वो !
ई अर्चना नायडू 
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21
इस वर्ष बसंत सूना रहेगा , 
हर बयार में ढूँढेंगे उन्हें , 
जो मिल न सकेंगे कभी , 
बयार चलेगी , बादल आयेंगे , 
ओलावृष्टि भी हो शायद ,
हम साझा न कर पायेंगे ।
आम के बौर आयेंगे , 
होली आयेगी , 
हम ये रंग बता नहीं पायेंगे , 
दुनिया जब रंगीन होगी , 
शायद हम रंगहीन नजर आयेंगे, 
अब चूँकि आप ब्रम्हलोक में हैं , 
बिना किसी दृष्टिदोष के प्रत्यक्ष  देख पायेंगे ...

पूज्यनीय पिता जी को समर्पित 
पीयूष तिवारी 
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२२
काँधे तक कंबल सरका कर, सर-से सर्दी भागी
तब थोड़ी-सी राहत आई जब बसंत ऋतु जागी

सूरज करने लगा ठिठोली, लगा ठहरने ज़्यादा
चंदा घर जल्दी जाने की, लांघ रहा मर्यादा

तारों ने भी शुक्र मनाया, घटी जो पहरेदारी
खींचा-तानी में दिन जीता, रात बेचारी हारी

पीले-पीले फूल खिले, सरसों ने ली अंगड़ाई
हल-चल भई बाग के भीतर, अमवा भी बौराई

फागुन खड़ा द्वार के बाहर, राग मल्हार अलापे
कोयल पपिहा बेर-बेर, घर आँगन, झाँके-ताके

गोरी का मनवा अति हर्षित, मन ही मन मुसकाए
जो घर साँवरिया आ जाए, मन मुराद मिल जाए

कहे आज़मी मैं भी अपने दिल का हाल सुनाऊँ
जो बसंत पर पिय माने तो, पीहर तक हो आऊँ

(सरस्वती तिवारी आज़मी)
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23
माली अपनी खुरपी लिए
क्यारियों को रहा है खंगाल 
देखती हूँ मुग्ध रंग बदलना 
मिट्टी का.. सांस खींच भीतर 
अपने होने की सबसे आदिम गंध
से सींचती हूँ ख़ुद को
देखती हूँ टपकते स्वेद को 
मिट्टी का भूरा खारा होता जाता है

खोलती हुँ पति का बटुआ
निकालती हूँ नोट दो सौ के
बीज, खाद, श्रम का मूल्य तय है
पाती हूँ एक बार फिर एक गंध खारी

बसंत के आगमन पर
एक श्रम से दूजे श्रम तक
पुल बन जाती हूँ
मेरी बगीची में आने को है
बसंत....................
अनेकवर्णा
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24
कोंपलें फिर फूटने को है 
स्मृतियां फिर जुड़ने को है 
पलाश फिर दहकने को है 
हल्की सी जुम्बिश ही सही थोड़ा पानी तो हिल जाये कोई चिंगारी तो सुलग जाये हम दोनों के बीच ही नही स्नायु को फड़का जाये मेरे शीत से उनींदे तन मन को झकझोर दे भले धीरे से नर्म है धूप तो क्या कीजे नम्र है हवा तो क्या कीजे चिटकने चाहिए कुछ किल्ले कब तक पुकारूँगा ,तुम्हे कुछ अपनी सांस भी दिख जाए कुंडली में जो बैठा है फन काढ़े कब देखा तुमने कर दे रीढ़ को फिर सीधा
... ...ओ बसंत !
सुरेन के सिंह 
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25
 बसंत : 

सारे पत्ते
पीले पड़ रहे है
जैसे रंग उड़ जाता है पैरहन  का
पुराने हो जाने पर ।

सबसे पहले
ऊंचे पेड़ो की फुनगिंया 
गिराती है धरा
जैसे स्त्री ने हटाया हो माथे का टीका।

धीरे धीरे एक एक पर्ण गिरा रही है 
नग्न हो रही है धरती
ठंड़ से जीर्ण पड़ चुके सूर्य 
उत्तेजना में फिर गर्म हो रहे है 

मलय पवन की सरसराहट संकेत है 
सूर्य ने एक साथ करोड़ो रश्मियां
धरती पर उड़ेल दी है 
बंसत सूर्य का स्खलन है ।

यह सृजन का समय हैं 
सृजन हेतु पैरहन का न होना जरूरी है 
ईश्वर नंगा है ।
अखिलेश
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26
 "बसन्त"
महक उठी जग,घर,मन,फुलवारी
पहने पीत वसन बसंत वसुधा नारी
श्रंगार कर रहीं रसिक फन कारी
ह्रदय हुलास लरज रही धानी बाली

ठुमक चमक नव कपोल मुस्काई
तरुवर हर्षित कलियाँ बिकसाई
मधुर-मधुर मदरिम सुगन्ध बिखराई
भवरों ने सुर साधे कोयल गाना गाई
पवन प्रेंम मैं डूब ओस अँजुरी भर लाई

हरित तृणों के लहंगे में
रूप का सागर छलका
देख पलाश दहक प्रेंम में
फूला लाल सुमन सा
टेसू देखें सँवर-सँवर और
बौरें अमुआं झूला झूलें
चलें बसन्ती हवाएं फिर
जो मद में डुबो रहीं हैं

पड़े अटारी कनक बने
विलग हुए जो पात
मैं देखूं और सोचती
ये जीवन का सच बताता 
रेखा दुबे 
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चित्र :गूगल से साभार

 साहित्य सम्मेलन,"साहित्य की बात" 17-18 september 2022 साकिबा  साकीबा रचना धर्मिता का जन मंच है -लीलाधर मंडलोई। यह कहा श्री लीलाधर...

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