Tuesday, December 6, 2016

बच्चे ,फूल से कोमल ह्रदय वाले जिनकी मासूमियत भरी मुस्कान दो जहाँ की दौलत लुटा देती है |किसे प्यारे नहीं लगते हँसते - खिलखिलाते  बच्चे |यदि यही मासूम खिलखिलाहट कहीं खोई खोई सी मिले , फूल सा कोमल ह्रदय मुरझाया हुआ मिले तो क्या कहेंगे आप उस बचपन को | चिंता का विषय  है बच्चो का अपने आप में गुम हो जाना |इस संजीदा विषय पर  परिचर्चा की गई वात्स अप के साहित्यिक समूह "विश्व मैत्री मंच " पर ,जिसकी मुख्य एडमिन है सु श्री संतोष श्रीवास्तव और परिचर्चा का विषय  दिया अमर  त्रिपाटी जी ने |चर्चा के दौरान कई बिंदु इस विषय पर सामने आये जिन्हें हम किसी भी हाल में नकार नहीं सकते |तकनिकी प्रिय जीवन आज मासूम  बचपन को  कहाँ से कहाँ ले गया ...विचार करने योग्य है की इसके लिए हम  किसे कुसूरवार ठहराए .....??

समूह के जागरूक सदस्यों ने इस परिचर्चा में अपने अपने विचार रखे
रचना प्रवेश पर प्रस्तुत है समूह की परिचर्चा ****





बच्चे कही शिकार न हो जाये'
   मानसिक रोग के।
आने वाले दिनों में जो सबसे बड़ा खतरा हमारे जीवन मे हैं वह हैं मानसिक रोग का। यूथ तो इसके शिकार हो ही रहे है,पर ख़तरा बच्चो पर ज्यादा मंडरा रहा है।बाल्यावस्था से किशोरावस्था तक पहुँचते पहुँचते जिस तरह से बच्चो मे मोबाइल फ़ोन और टेब की आदत पड़ती जा रही है उसका परिणाम यह हैं कि उनकी सम्बेदना धीरे धीरे कम होती जा रही है।परिवार में रहकर भी अकेले होते जा रहे है। टाइम्स ऑफ़ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार देश की बहुतायत आबादी मानसिक रोग से त्रस्त हैं और उनको पता भी  उन्हें नही है।
मानसिक रोगों की दवा सस्ती है dr महंगे। समय रहते लोग डॉ के पास जाने से कतराते है।
समय रहते सचेत होने की आवश्यकता है। अगर बच्चे  लंबे समय तक मो 0 पर गेम खेल रहे है तो समय सीमा तय करने की आवश्यकता है।
गाँव में गरीबी थी ।इतनी सुविधा नही थी।बच्चे सुबह उठकर खेलते थे,दौड़ते थे, लोगो के साथ रहते थे,परिवार से जुड़े रहते थे।
शहर ने सुविधा  तो दी पर बच्चो को अवसाद भी दिया। पहलेसुबह उठकर रेडियो के गाने सुनकर दिनभर हँसते गाते थे।अब जानकारी को बढ़ाने में इंटरनेट ने मदद जरूर की पर बच्चे अकेले होते जा रहे है।

कुछ बाते ध्यान देने की है।
1
कही आपका बच्चा ख़ामोश तो नही होता जा रहा है,टीचर से पता लगाएं और टीचर से प्यार से ही बात करे।

2 बच्चो के सामने किसी भी हालत में झगड़ा न करे ।

3
अपने दुःख या किसी बड़े परेशानी की भी बात उनसे मत कीजिये

ख़ुशनुमा माहौल बनाये रखें, किसी नज़दीकी जिसे वो बहुत सम्मान करते हो उनके बारे में कोई झगड़ा या उनके अपमान की जानकारी  देने से बचें ।

सबसे महत्वपूर्ण
अगर आपका मान लो किसी सम्बन्धी से झगड़ा है तो आप भले सम्बन्ध तोड़ ले वहाँ  मत जाइये पर बच्चो को उनसे या खासकर उनके बच्चों से अलग मत कीजिये।

मूलमन्त्र


बच्चो को तो बच्चे चाहिए हरहाल में, अपने मतभेदों की सज़ा उनको मत दीजिये
🙏🏽
अमर त्रिपाठी
परिचय
लेखक और कहानीकार,कवि तथा चित्रकार तथा गुणवत्ता के आधार पर साहित्यिक रूप से सम्पन्न हर विधा में अंग्रेजी,मराठी तथा हिंदी भाषा में बिना धन लिए पुस्तक प्रकाशित करने के एक शानदार प्लेटफॉर्म स्टोरी मिरर में कॉन्सेप्ट एडिटर।



















एडमिन सुश्री संतोष श्रीवास्तव का कथन 
अमर त्रिपाठी द्वारा प्रस्तुत किए गए आज के विषय को लेकर मुझे मन्नू भंडारी लिखित आपका बंटी याद आ रहा है। वैसी ही पीड़ा और मानसिक स्थिति से  गुजरते न जाने कितने बच्चे आपका बंटी हो जाते हैं।

बच्चों का किसी बात पर उदास होना, चोट पहुँचना, उखड़ जाना और बढ़ती हुई उम्र में कई तरह की भावनाओं से गुज़रना सामान्य बाते हैं. लेकिन, कुछ बच्चों में ये भावनाएँ लंबी अवधि के लिए रह जाती हैं और उनके भावनात्मक और मानसिक स्वास्थ्य पर असर डालती हैं.
अवसाद बच्चों के लिए एक बड़ी वास्तविक चिंता है. इसका असर बच्चों के सोचने, महसूस करने और उनके व्यवहार पर पड़ सकता है।
आज के प्रतिस्पर्धी युग में, बच्चों पर पढ़ाई लिखाई और अन्य गतिविधियों में बेहतर से बेहतर प्रदर्शन का अनावश्यक दबाव हो गया है. अभिभावक और शिक्षक इस बात को नज़रअंदाज़ कर देते हैं कि हर बच्चा अलग है. बच्चे को जबरन एक कट्टर सिस्टम और कड़े नियमों का पालन करने के लिए कहा जाता है। लेकिन इस दबाव को झेलना उनके लिए मुश्किल भी हो जाता है. बच्चों में अवसाद की एक प्रमुख वजहों में से एक ये भी हो सकती है क्योंकि वे अपना अधिकांश समय सीखने में ही बिताते हैं चाहे घर पर हों या स्कूल में. इसके साथ ही कई अन्य मनोवैज्ञानिक कारक भी हो सकते हैं जो बच्चे की मानसिक सेहत पर असर डालते हैं. ऐसे बच्चे जो भावनात्मक और मानसिक उतारचढ़ाव नहीं झेल पाते हैं, वे अवसाद के संभावित शिकार हो सकते हैं.।
वजह माता पिता के तनावपूर्ण या टकराहटभरे माहौल से लंबे समय तक बने रहने वाला मानसिक तनाव, मिसाल के लिए पिता नशा करते हों या माँ बाप के बीच वैवाहिक संबंध अच्छे न हों.।कई बार बच्चे सदमे वाली स्थितियाँ जैसे हिंसा, शारीरिक या मानसिक शोषण या उपेक्षा का भी शिकार हो जाते है। इस अवसाद से घिरा बच्चा खुद को व्यर्थ महसूस करता है. उसे अपना जीवन बेकार लगता है. उसे उदासी की भावना और नकारात्मक विचार लगातार घेरे रहते हैं और वह उनसे निकल नहीं पाता है.। अगर सचमुच अभिभावक बच्चों को लेकर  सही दृष्टिकोण अपनाएं हैं तो उन्हें बच्चों की सार-संभाल बहुत सावधानी से करनी होगी तभी एक स्वस्थ समाज का निर्माण होगा।
 संतोष श्रीवास्तव




सरोज ठाकुर 
आज पटल.. हमारे आदरणीय अमर त्रिपाठी जी  ने.. बहुत  ही सुंदर महत्वपूर्ण विषय रखा है.. वाकई आज मोबाइल और टेब बच्चों की जरूरत नही आदत बन गई  है  आज सुबह से शाम तक बस इसी में व्यस्त रहते है..... जिसके चलते वे अपनो के बीच में  होते हुये भी अकेले  है। उनको लगता है कि उनकी खुशी इसी में है। क्यो कि आज हमारे बडों के पास भी अपने बच्चों के लिऐ वक्त नहीं है। आज हमें अपने बच्चों को इन सबसे बचाने के लिये पहल हमें करनी होगी... ऐ एक महत्वपूर्ण विषय है हम सबके लिये.....
डॉ निरुपमा वर्मा 
आदरणीय अमर जी ने ज्वलन्त विषय उठाया है । यहाँ बात मोबाईल , टी वी से ज्यादा चिंता का विषय है बच्चों की परवरिश में परिवार की चूक कहाँ हो रही है ?  मोबाईल आदि तो भौतिक संस्कृति है , जिस की गति हमेशा तीव्र होती है । यही कारण है कि अभौतिक संस्कृति उस से पिछड़ जाती है ।
सच है ये कि बच्चों ने हंसना ही छोड़ दिया है। यह भी तो एक कटु सत्य है कि जब बच्चे हंसेंगे नहीं तो गुमसुम रहेंगे तथा अपने आप में ही डूबे-डूबे और खोए रहेंगे जब यह स्थिति बनी रहेगी तो वह अपने ही विचारों की उठती उथल-पुथल के कारण मानसिक तनाव झेलेंगे। बच्चों को ऐसी हालत में देखना किसी भी तरह सुखद तो नहीं कहा जा सकता।

जब वयस्कों ने तनाव झेलना शुरू कर दिया है तो परिवार के बच्चे इससे अछूते कैसे रह सकते हैं। आजकल पैरेंट्स संतान के जन्म लेते ही तनाव में आ जाते हैं। वह दिन-रात इस चिंता में घुलने लगते हैं कि पता नहीं बच्चे का भविष्य क्या होगा? वह पढ़ाई में कैसा रहेगा? स्कूल में कैसा परफॉर्म करेगा। इसका मस्तिष्क किन विद्युत तरंगों को आत्मसात करेगा जिनके कारण वह जीनियस कहलाएगा। जब माता-पिता अपने बच्चों के साथ उनकी पढ़ाई अथवा उनके परीक्षा परिणामों को लेकर ही लगातार बात करते रहेंगे कि उसे तो केवल परीक्षा परिणाम में अच्छे प्रतिशत लाना है और इसके अतिरिक्त न तो किसी बात के विषय में सोचना है और न ही ध्यान देना है। सच ये भी है कि बच्चा जन्म से रोने और हँसने के सिवा और कुछ भी सीखकर नहीं आता। यदि यह समस्या विकट होती गई (वैसे अब भी कम विकट नहीं है।) तो हंसना केवल एक यौगिक क्रिया रह जाएगी जिसे पूरी कृत्रिमता के साथ योग करते समय एक क्रिया तक करना सीमित रह जाएगा। जब तक यह क्रिया जारी रहेगी लोग हंसेंगे तो नहीं पर हंसने की आवाजें जरूर निकालेंगे। शायद हम वर्तमान पीढ़ी को यहीं तक सीमित रहने की बंदिश में बांध रहे हैं। यदि ऐसी नौबत तक नहीं पहुंचना है और बच्चों की स्वभाविक और प्राकृतिक हंसी को लौटाना है तो कोशिश करें कि वह कुछ समय अपने फ्लैट या घर से निकलकर अपने हम उम्र साथियों के बीच जाएं।
मनोवैज्ञानिक हेरियट मैक्समिलन ने अपने पांच सहयोगियों के साथ काॅलेज मे अध्ययन करने वाले लगभग पांच हजार युवकों की प्रवृतियों का अध्ययन किया। अध्ययन से यह पता चला कि जिन युवकों की बचपन मेें पिटाई होती थी, उनमें से 21 प्रतिशत युवाओं में उग्रता के लक्षण पाए गए। 13 प्रतिशत शराब और नशीली दवाओं के आदी हो गए। 12 प्रतिशत अपराधी प्रवृति वाले, 10 प्रतिशत उम्र के हिसाब से कम बौद्धिक स्तर वालें तथा 9 प्रतिशत गंभीर मानसिक तनाव से ग्रस्त पाए गए। एक अन्य मनोवैज्ञानिक का कहना है कि अति किसी भी चीज की बुरी होती है, चाहे वह बच्चों के साथ अति प्यार की बात हो या मारपीट की, बच्चों के साथ हमेशा की जाने वाली डांट-डपट या मारपीट से बच्चा डरा सहमा रहता है। इस वजह से उसके काम में गलतियां अधिक से अधिक होती है जरूरी नहीं कि इसके परिणामस्वरूप बच्चें उग्र स्वभाव के ही होते है या कि गलत दिशा की ओर ही अग्रसर होते है। कई बार ऐसे बच्चें बिल्कुल चुप हो जाते हैं। वे दब्बू और डरपोक हो जाते है। उनका आत्मविश्वास समाप्त हो जाता है। उनकी निर्णय क्षमता तो प्रभावित होती है, साथ ही उनका बौद्धिक विकास भी रूक जाता है। कई बार बच्चें कुछ ऐसे कदम भी उठा लेते है, जिनकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते ।
शोधकर्ता मैरीलीन कैंपबेल ने कहा कि डर और मानसिक तनाव के बीच सीधा संबंध है। ज्यादातर बच्चे जिन गतिविधियों में आनंद अनुभव करते हैं उन्हीं से कुछ बच्चे डरते हैं।
शोधकर्ताओं ने कहा कि यह कोई निष्कर्ष नही है लेकिन यह एक संकेत है कि डरपोक बच्चे भविष्य में तनाव के शिकार हो सकते हैं। जीवन भर तनाव से गुजरना एक त्रासद अनुभव है। अगर हम बच्चों में पहले ही तनाव के कारणों का पता लगा लें तो यह उनके भविष्य के लिए बेहतर होगा।
अपर्णा शर्मा 
आदरणीया ड़ाॅ.निरूपमा जी - आपने बच्चों के मनोवैज्ञानिक विश्लेषण आधार पर उनके अंदर ही अंदर एकाकी होते जाते और गलत आदतों के शिकार होने के प्रभावी विचार रखें हैं । आजकल के एकल परिवारों में जहाँ अधिकांश युगल में से दोनों नौकरीपेशा वहाँ बच्चों को पर्याप्त समय और देखरेख न दे पाने अभाव में बच्चे स्वाभाविक रूप से सहज उपलब्ध सोशल वेब साइट्स और इंटरनेट के माध्यम से खुद को व्यक्त करने और एकाकीपन दूर करने का जरिया बना लेते हैं जहाँ गंभीर रूप से छिपी पहचान वाले अपराधी,   विकृत मानसिकता के लोग आसान शिकारों को अपनी चपेट में जकड़ लेते हैं । बच्चों का कोमल भावुक मन सही-गलत की पहचान न होने के कारण अक्सर ही गलत संगत में पड़ जाता है। हर परिवार में बच्चों के साथ रोज आत्मीय संवाद और उनके मित्र और गतिविधियों पर नजर रखना आवश्यक है। ये भी कि वे सोशल वेबसाइट्स पर किस तरह की गतिविधियों में लिप्त हैं या कैसे दोस्त रखते हैं ।

मैंने स्वयं देखा है कि परिवारों में बच्चों को साथ लेकर चला जाता है और  आपसी संवाद के जरिए उनको स्वयं को व्यक्त करने पूरा मौका दिया जाता है वहाँ बच्चे मानसिक रूप से अधिक मजबूत होते हैं ।

सुरेश राजन अय्यर 
        आज का विषय बच्चे . बहुत ही गंभीर विषय है. मेरा ये मानना है कि बच्चे कभी भी गलत नहीं होते. उनके मातापिता जिम्मेदार होते हैं. बच्चे वही करते हैं जो उनके मातापिता करते हैं इसलिए किसी भी पालक को बहुत सोच समझ कर हर काम करना चाहिए . Child psychology में बच्चा छे साल की आयु तक बहुत कुछ सीख लेता है. उसके बाद  वह बच्चा अपने सीखे हुए बातों को अपने जीवन में अमल करता है. यह बात भी सच है आपका बच्चा ही आप को माता या पिता बनाताहै.  इसलिए बच्चोंकी देखभाल में मातापिता की बहुत बडी नैतिक जिम्मेदारी होती है . -  सुरेश राजन अय्यर 


महेश दुबे 
आदरणीय अमर त्रिपाठी जी का इतना संक्षिप्त परिचय चौंका गया।  दरअसल ये किंग मेकर हैं । परदे के पीछे रहने के उस्ताद । विषय बहुत अच्छा चुना है जिसपर विद्वानों ने खूब लिखा भी है।  कुछ और कहने की योग्यता तो मुझमें नहीं है । इसी विषय पर एक अपनी रचना प्रस्तुत है ।



बल्ली

           आज फिर बल्ली को खूब पीटा । दोनों हाथों से बाल पकड़ कर इतनी जोर से खींचे कि कई सारे तो जड़ से उखड़ गए । गालों पर तड़ातड़ इतने तमाचे जड़ेे कि गोरे गाल सिंदूरी लगने लगे और उनपर उँगलियों की छाप उभर आई। पीठ पर घमाघम कई मुक्के धरे पर मजाल है जो इस लड़के के मुंह से चूँ भी निकली हो। आँखों से पानी छलछला आया आँखें ऐसी लाल हो गई मानो सुबह का सूरज हो पर इसने मुंह नहीं खोला । परसों रात को रमन की दूकान से चांदी की जो ठाकुर जी की मूर्ति ले आया था और कल एकादशी को पंडित जी को दान करनी थी वह इस बल्ली के बच्चे ने किसके हाथ बेची वह नहीं बताया। मुझे खूब याद है । रमन की दूकान से डिबिया लेकर निकला और लाकर सीधे मंदिर की दराज में रखी । रास्ते में न कहीं रुका न किसी से मिला । अब देखा तो केवल रसीद और खाली डिबिया । तो क्या ठाकुर जी कहीं उड़ गए? वैसे भी जब डिबिया रख रहा था तब बल्ली महाराज पलंग पर लेटे दीदे फाड़े देख रहे थे।और कल शाम शिवलोचन ने इसे गुरशरण छोले वाले के यहां छोले और कुल्फी उड़ाते अपनी आँखों से देखा था।
        जब से इसकी माँ मरी है ये लड़का मानो मेरी जिंदगी का नासूर हो गया है । न पढ़ना न लिखना। केवल मुहल्ले के नालायकों की संगत और मुझे दुःख देने के सारे उपक्रम करता रहता है । ढीठ भी इतना हो गया है कि किसी तरह काबू में नहीं आता । बस ओठ सी लेता है। और चुप्पे से भला कभी जीता है कोई ? पर आज मैंने भी पूरी भड़ास निकाली । पीट पीट कर बेदम कर दिया और जब खुद थक गया तो बाजार को निकला। आखिर सुबह ही रामाधार शास्त्री जी दान लेने प्रकट जो हो जाते । रमन की दूकान में घुसते ही दूर से उसने पालागन की,और नजदीक आकर बोला,भइया आज कल कहाँ खोये रहते हो? परसों पैसा दिए रसीद कटवाए और ठाकुर जी को यहीं भूलकर खाली डिबिया लेकर चल दिए? इतना कहते उसने ठाकुर जी की नन्ही सी मूर्ति काउंटर पर रख दी। मेरे मुंह से बोल न फूटा । लाल रेशमी कपड़े में लिपटे ठाकुर जी मानो मुझे घूर रहे थे ।

                        महेश दुबे      

रूपेंद्र 
आदरणीय अमर जी प्रिय अपर्णा जी सर्वप्रथम तो आप दोनों को हार्दिक बधाई मंच पर द्वीय संचालन की।👏👏👏🌹💐
आदरणीय अमर जी एक सामयिक विषय पर आज आपका लेख परिचर्चा हेतु सटीक एवं सार्थक लेख हुआ।आज अपने आसपास घटता हुआ बच्चों का मानसिक स्तर देखने को मिलता है।संस्कार और सभ्यता से छूट कर आधुनिकता के अंधेपन का अनुसरण करते हुए हमारे भविष्य गर्त में गिर रहे हैं।न चाहते हुए भी अभिभावक यह सब सह रह रहे हैं। तकनीक के साथ समझौता हमें भारी पड़ रहा है।छोटे बच्चों का मानसिक विकास भी शिथिल हो रहा है जो अपने वातावरण में पनपता है वह अस्वाभाविक ढंग से विकसित हो रहा है जो उनके और सामाजिक भविष्य के लाए भी घातक है।स्वास्थ्य पर विपरीत असर छोड़ने वाले तथा मानसिक रूप से दुर्बल करने वाले मीडिया के यह उपकरण हमारे विकास के नहीं नाश को द्योतक न बन जाएं।सहज रूप से एक खिलौना लगने वाला उपकरण शिशुओं को पकड़ा दिया जाता है उसके रंग बिरंगे पटल उसके मनस पर विपरीत प्रभाव डालते हैं उसका खान पान सब प्रभावित होता है जिसका परिणाम उसके मानसिक व शारीरिक विकास पर पड़ने लगता है।

ईरा पन्त
गरीब बच्चे दिल से अमीर होते हैं, दिल खोल के हँसते है ख़ुशी बांटते है इसलिए शायद उदासी उनके पास आने से डरती है ।
🙏 सार्थक पोस्टर।

आज की परिचर्चा का विषय बहुत ही संवेदनशील है।
आधुनिकता के रंग में रंगे बच्चों का सबसे आकर्षक खिलौना आज मोबाइल ही है। कितना भी रो रहा हो बच्चा हाथ में मोबाइल आते ही चुप।
बच्चों को खाना खिलाना आज हर माँ पिता की समस्या है, और तब टीवी, मोबाइल या टैब, का ही सहारा होता है।
असल में बच्चे नहीं माँ बाप ही इस समस्या के जनक हैं। बालू में मत खेलो, पत्थर न उठाओ, भाई तो स्वाभाविक विकास कैसे होगा उनका।

मुझे लगता था काश मेरी पोती जो अमेरिका में है, बालू मिट्टी पानी से जी भर खेले, पर कैसे? लेकिन जब मैंने उसका स्कूल देखा तो मन तृप्त हो गया। यहाँ 5 बरस तक बच्चे सिर्फ और सिर्फ खेलते हैं और बालू के टीले, पानी, बागवानी सब से जी भर खेलते हैं बच्चे।
एक बैडमिंटन खिलाड़ी क्लब में अपनी जुड़वाँ बच्चियों को लाता है। दोनों को टैब दे रखा है। जब तक वो खेलता है, यानी 3 घण्टे,  बच्चियां टैब में उलझी रहती हैं।
एक बात यह भी है कि वर्तमान पीढ़ी अपने बच्चों को बहुत लाड़ प्यार से पाल रही है। आत्मविश्वासी हैं आज के बच्चे। हमारी तरह डरपोक नहीं।

बच्चों से पेरेंट्स की दोस्ती ज़रूरी है। हर बच्चा अपने पैरेंट्स से हर बात शेयर कर सके ताकि कोई उसे भयभीत न कर सके और न शोषण।

मेरा बेटा जब मेरी बात नहीं मानता था तो कई बार ख़ुशी होती थी कि वह अपने निर्णय खुद ले रहा है।

अपने झगड़े मतभेदों, दुश्मनी से नन्हों को अछूता ही रखना चाहिए ताकि कोमल मन मुरझाने न पाए।
और अवसाद से न भरे।

कच्ची मिट्टी से हैं ये बच्चे, इसे सुन्दर आकार दीजिये,
असमय न मुरझाये कोई फूल ये  जतन कीजिये,
घर, समाज, देश की पहचान हैं, शान हैं ये बच्चे,
इनके नन्हे सपनों को साकार कीजिये।
🙏
ईरा पन्त


जयश्री 
माँ बाप आज की परिस्थिति में माता पिता बच्चों में संस्कार दाल ही नहीं प् रहे हैं 
बच्चे जब ढाई साल का होता है उसे किसी नर्सरी स्कुल में दाल दिया जाता है जहाँउसे एक प्रोफेशनल शिक्षिका मिलती है जिसका उद्देश्य अपनी दाल रोटी होता है उसे बहुत कम पैसा मिलता है जिससे उसकी आवश्यकता की पर्ति नहीं होती
उसका व्यवहार बच्चों के प्रति म
उतना स्नेह मयि नही होता 
मेंजितने स्नेह की आवश्यकता बच्चे को होती है

बच्चा माँ के स्नेह से वंचित भी रहता है  हम इस गलत फहमी


सुनीता जैन 
अमर जी
नमस्कार!
आज आपने चर्चा को जो मुद्दा उठाया है वो बेहद अहम् है, ज़िम्मेदाराना है और सामयिक भी!
  मैं जब 87में सरिता ,धर्मयुग ,साप्ताहिक हिंदुस्तान ,गृहशोभा में लिखना शुरू हुई ,तब भी ऐसे विषयों के आलेख की माँग होती थी ,मैंने लिखा भी! किंतु हर युग में ये समस्या जस की तस सो लेखन भी सामयिक!
     पहले मोबाइल और इंटरनेट नहीं थे ,तो भी समस्या थी, बाल्यावस्था से किशोरावस्था तक वे कुंठाओं का शिकार ,गलत संगत या नशे में लिप्त हो जाना ,घर से भागना ,असफल प्रेम में आत्म हत्यायें या शिक्षा की असफलता से आहत हो जीवन बर्वाद कर लेना --- कुछ ऐसी समस्याएँ हैं ,जिनसे बाल मन को आहत होने का विशेष डर बना रहता है ,तब भी / अब भी! 

 आपके लेख में सब कुछ दर्शाया ,समझाया है ,अनुभव भी हैं तो तथ्य भी! 


नीलम दुग्गल 
 बढ़िया विषय। 
यदि बचपन स्वस्थ (मानसिक तौर पर भी) होगा तभी एक स्वस्थ समाज की रचना संभव है। पर हो इसके विपरीत रहा है। मैंने एक स्कूल ज्वॉइन किया कुछ वर्ष पूर्व। वहां अनुशासन की समस्या इतनी विकराल और विकट थी कि पूरे पी जी टी स्टाफ ने रिजा़इन देने की ठान ली। फिर चेयरमैन ने बुला कर बात की कि ज्यादातर बच्चे टूटे परिवारों से थे। धीरे-धीरे समस्याएं समझ आने लगी और कई केस सुलझाए भी। पर बच्चों को समझाना आसान था बनिस्पत मां बाप के।                        

 बच्चे बड़ों से बचने के लिए भी मोबाइल टैब में व्यस्त रहना पसंद करते हैं


सुरभि पाण्डेय 
हाजिर हूँ अमर जी, बात तो अभी करनी बाक़ी हैं कि बात निकलेगी तो दूर तलक जायेगी.......
लेकिन आप जो मुझे ये विनम्र कहते हैं तो मेरे बच्चे बड़ा हँसते हैं, वो कहते हैं कि ये जोक ऑफ़ द डे नहीं, इस सदी का सबसे बड़ा मजाक़ है😀
मैंने भी कह रखा है कि दरअसल अमर जी ही हमें सही समझे हैं🌹
हाँ मैं चर्चा को हमेशा बल देना चाहती हूँ ,बल्कि सच कहूँ तो सच बात कहने से वो बलशाली हो जाती है, मेरी ही नहीं किसी की भी बात!!!!!!!!!
अभी दो तीन दिन पहले एक कहानी पढ़ी, एक आदमी घर में आये हर पुरुष मेहमान पर शक करता है कि वो उसके छोटे से घर में उसके बेटे के साथ वैसे ही यौन दुराचार करेगा जैसा उसके साथ उसकी किशोर उम्र में हो चुका है, घर आये हाई प्रोफ़ाइल मेहमान के द्वारा........कहानी का नायक साल में कई बार रातों को यूं ही जागता , चक्कर काटता रहता है, यहाँ तक कि बीवी के प्रिय कज़िन पर भी शक की सुई, जाते वक्त दोअर्थी कमेंट्स!!!!!!!!

न मेहमान को बात समझ आती है न बच्चों को और बीवी को तो आख़िर आख़िर तक.....बस कथाकार ने गोपन तऱीके से पाठक को बता रखा है उसके बचपन का ब्लैक पार्ट😌

मौक़ा मौज़ू है एक बात और निवेदित, अंग्रेजी की कहावत है कि ईश्वर हर जगह मौजूद नहीं रह सकता इसलिये वो माँ बनाता है, लेकिन ये माँ बस माँ ही बनी रहे तो अच्छा , कभी कभी ये माँ मासूम बचपन पर प्रेत की तरह से चढ़ जाती है और फिर ये प्रेत बेताल सिद्ध होता है, कभी बच्चे के सर से उतरता ही नहीं है।

कभी कभी ये प्रेत की तरह से बच्चे के अंतर्मन पर सवारी करने का काम पिता श्री भी करते हैं, लेकिन उनका प्रतिशत थोड़ा कम होता है।चूंकि मां को पूरा समाज दबाये रखता है तो बच्चा हाथ में आते ही वो उसे अपनी निजी संपत्ति समझती है फिर उसके स्वतंत्र विकास का सत्यानाश करती है और जब तक जीवित रहती है करती रहती है, कई बार तो बच्चे समझ ही नहीं पाते कि इसके मरने पर हंसें या रोएं।

लेखा सिंह 

आज परिचर्चा के लिये जिस विषय का चुनाव किया गया है वो वाकई ज्वलंत है।

आज के अभिभावक निस्संदेह अपने बच्चों की अच्छी परवरिश के लिये जी तोड़ मेहनत तो करते हैं परन्तु अपने ही बच्चों को उनके हक का समय दे नहीं पाते। और यहाँ ये कहना गलत नहीं होगा कि बच्चों को समय देना भी उतना ही आवश्यक है जितना कि हम अपने आपको देते हैं।

अमूमन यही पाया जाता है और देखा भी जाता है, कामकाजी अभिभावक स्वयं के आराम करने में कोई बाधा न हो करके अपने बच्चों को उनके पसन्द के चैनल देखने या मोबाइल व् टैब ने उनके पसन्द के खेल खेलने की मंज़ूरी दे देते हैं जो सरासर गलत है।

अब, यदि आप इन कामकाजी अभिभावकों (सभी नहीं ) से कहेंगे कि ये सही नहीं है तो उनका जवाब यही होता है कि.... बाहर से थककर घर आते हैं तो थोड़ी सुकून की साँस चाहिये होती है, अतः उन्हें उनके हाल पर छोड़कर ज़रा सा आराम कर लेते हैं...... अब, इनका कहना भी गलत नहीं होता है। आज की भाग दौड़ की जिंदगी की भी यही माँग होती है। परन्तु..... इन सभी परिस्थितियों में सामन्जस्य बिठाकर, यदि चला जाय तो बहुत कुछ सम्भव हो सकता है। मसलन, बच्चों को समय देकर उनके साथ quality time  बिताना। और समय बिताते हुये उन्हें व्यवहारिक जानकारियाँ भी दे सकते हैं।

मेरा भी यही मानना है कि बच्चे जो देखते हैं, सुनते हैं, वही सब उनके आचरण में शनैः शनैः घर करने लगता है। अतः हम अभिभावकों को चाहिये कि उनके समक्ष आपस में सन्तुलित व्यवहार करना चाहिये। हमारा यही  सन्तुलित व्यवहार हमारे बच्चों में शिष्टता व् व्यवहारिकता लाएगा जिसकी भविष्य में उनके सफल होने में महत्वपूर्ण भूमिका होगी। उनके सही मार्गदर्शन हेतु उनके समक्ष हमे एक आदर्श उदाहरण प्रस्तुत करना होगा।
हम स्वयं अनुशासन ने रहकर बच्चों को अनुशासित कर उन्हें शिष्ट व् व्यावहारिक बना सकते हैं जो हमारी नैतिक जिम्मेदारी है।
मैं स्वयं दो वर्ष से, शिक्षिका पद से इस्तीफ़ा देकर अपने पुत्र के साथ समय व्यतीत कर रही हूँ और उसमें सकारात्मक बदलाव देख रही हूँ ।
मैंने जो भी लिखा है वो केवल शब्दों का समूह नहीं है बल्कि मेरा अपना व्यक्तिगत अनुभव है जिसे मैं इस ज्वलंत विषय पर, पटल  पर साझा करना चाहती थी।
अब, आप श्रद्धेय जनों से मार्गदर्शन की अपेक्षा है।

............ लेखा ...............

आशा रावत : 
अमर जी! बहुत महत्वपूर्ण विषय उठाया आपने।आज के बच्चे बचपन को इंजॉय करें तो कैसे? न वे खेल के मैदान रहे न वह सामाजिक साहचर्य का तानाबाना।एकल परिवार में एकाकी से बच्चे हैं।माता पिता के पास भी उनके लिए इतना समय नहीं है । पर हल तो उन्हीं को निकालना है ताकि आगे स्थिति विस्फोटक न हो।उन्हें अपने बच्चों को भरपूर समय देने के साथ ही शाम को किसी हाॅबी क्लास में डालना चाहिए । इससे उनमें एक अतिरिक्त रचनात्मक व्यस्तता आएगी, जो दिमाग को खालीपन से उपजी कुंठाओं से बचायेगी।                        
 Madhu Saksena: 

अमर जी .....विषय हमारे नोनिहालों से जुड़ा है जिनकी परवाह हमे है ... पर क्या हम पूर्ण माता -पिता है .? बच्चों के साथ कहाँ कैसा व्यवहार करना चाहिए क्या ये हम जानते हैं ? अपने में झांक कर देखें क्या हर बार हमने सही किया .. क्या उनके सामने झूंठ नही बोले ,किसी की बुराई नही की , काम चोरी नही की ..? पापा को मत बताना या चॉकलेट या कोई चीज का लालच देकर काम करवाना ..नही किया ?

बात बच्चों को नही खुद को  सुधारने की है ...बच्चे उपदेशों से नही अनुसरण से सीखते है ।
मुझे तो लगता  है कोर्स होना चाहिए बच्चों को पालने का ।उस कोर्स को किये बिना माता -पिता बनने की इज़ाज़त न हो ।

बच्चों को मोबाइल से खेलना या फास्ट फ़ूड खाना कौन सिखाता है ? हम अपनी सुविधा के लिए उन्हें मोबाइल , टैब , इंटरनेट सब मुहैया करा देते है ..वो जब उसके आदी  हो जाते है तो चिंता करते है ।बच्चों को सुधारने की बात करते है। पत्तों को खाद पानी देते है, जड़ को भूल जाते हैं । सदियों से यही चल रहा ।और सदियों से चिन्ता चल रही ।और नतीजा वही 'ढाक के तीन पात ' । शब्दों की जुगाली कर के थक कर बच्चों के हाथ में खिलोना पकड़ा कर सो जाते हैं । 

मन्नू भंडारी के 'आपका बंटी ' ही नहीं मुझे तो  ' हज़ार चोरासी की माँ ' भी याद आ गई ।

अर्पणा ....अमर जी .. जो कुछ आज इस मंच से कहा जा रहा है ... अमल  में भी हो। ... बच्चे तो गीली मिट्टी है .. आकार के आकांक्षी .. 

आवेश में  बहुत कह गई ... मन दुखी हो गया ... सबसे पहले अपना गिरेबां देखना है ।हमारा बचपन जैसा भी बीता हो अगला बचपन अपनी पूरी ऊर्जा और विश्वाश से जिए ।दुआएं है ।

     .......मधु सक्सेना ....

गीता भट्टाचार्य 
बच्चे कोमल मिट्टी कीतरह होते हैं।जिन्हें  माती-पिता जैसा चाहेआकार दें।आजकल  माता -पिता अतिमहत्वाकांक्षीहोगये हैं।हर किसीको अपना बच्चासवॆगुणसंपन्नचाहिए।हरकोई अपना बच्चा डाॅक्टर,इंजीनियर ,कलेक्टर ही बनाना चाहता है।बच्चे की चाहे संगीत-नृत्य ,चित्रकला,खेलकूद की ओर  रूझान क्यों न हो।बस यहीं से शुरू हो जाती है जद्दोजहद।बच्चे पर माता -पिता अपनी इच्छा  थोप देते हैं बच्चा बनना चाहता है कुछ और बन जाता है कुछ और फिर आजकल  एकल परिवार का चलन है।जहाँ
माता-पिता दोनोंकामकाजीहैं ।सो बच्चों  को समय नहीं  दे पाते बदलेमे वे भारीजेबखचॆ,मोबाईल,लेपटाप,गाड़ी इत्यादि दे देते हैं ।इसके साथ ही बच्चे को अगर गलतसंगति मिल गई तो सोने पेसुहागा होजाता है।इसीलिए कहा जाता हैअति सवॆत्र वजॆयेत"।अतः माता -पिता को बच्चोंकी परवरिशके लिए बच्चों के भीतर झांकने कीजरूरत होती है।बच्चा क्या चाहता हैइस पर सबसे पहलेध्यान दें।
किशोरवय के बच्चे शारीरिक -मानसिक परिवर्तन के चलते वैसे ही परेशान रहते हैं तिस पर परिवार से पूणॆ सहयोग न मिल पाना उन्हें कुंठित करदेता है।परित्यकता,तलाकशुदामाताएँ या विधुर पिता बच्चों के खचॆ जैसे-तैसे उठा लेते हैं लेकिन  बच्चों  की मानसिक अवस्था काआंकलन ठीक  से नहीं  करपातेऔर उन्हे अवसादग्रस्त कर देते हैं ।अतः माता-पिता अगरसुयोग्य,मजबूत बच्चेचाहते हैं तो बच्चोंकी मनोदशा की ओर अवश्यध्यान देवेउन्हेंभरपूरप्यार देवें।पति-पत्नी  के आपसी संबंध भी मजबूत होने चाहिए ।अपने -अ पने अहं का त्याग
करें क्योंकि माता-पिता की असली संपत्ति है सुयोग्य बच्चे जिनके लिए उन्हें भी सुयोग्य होना पड़ेगा।
गीता भट्टाचार्य


शरद कोकास 
धन्यवाद अमर जी मैं आपके प्रति आभार व्यक्त करना चाहता हूं कि आपने आज चर्चा का यह बहुत महत्वपूर्ण विषय उठाया है।
 सभी लोगों ने बहुत अच्छे विचार दिए है ।
दरअसल यह इतना व्यापक विषय है कि इस पर काफी कुछ लिखा जा सकता है । हम लोग मध्यवर्गीय हैं इसलिए हम अपने वर्ग के भीतर सबसे पहले इन चीजों को देखते हैं लेकिन जहां तक बच्चों की मानसिकता और उनके विकास की बात है वे एक ऐसे समाज में रहते हैं जहां पर सभी वर्गों के लोग रहते हैं इसलिए उनका अपरिपक्व मानस और उसकी निर्मिति पर भी विभिन्न वर्ग के बच्चों का प्रभाव पड़ता है जैसे एक वैज्ञानिक के घर के बच्चे को उसके घर काम करने वाला एक नौकर भी भूत-प्रेत जादू-टोने जैसे अंधविश्वास उसके मन में डाल सकता है । इसलिए यदि हम समग्रता में इसे देखें तो यह एक सामाजिक प्रश्न है जिसका हल हम सबको मिल जुलकर ढूंढना है ।
मैंने इस विषय पर काफी लिखा है और एक पुस्तक मस्तिष्क की सत्ताभी इस विषय पर फिलहाल लिखना जारी है जिसमें संस्कार , व्यक्तित्व ,सेल्फ सजेशन के नियम जैसे विषय शामिल है । इन विषयों पर लगातार चर्चा होनी चाहिए।


ज्योति गजभिये 
बचपन फूल सा कोमल, उसे पुष्पित और सुगंधित होने के मध्य कोई भी बाधा नहीं आनी चाहिये पर ऐसा कई बार नहीं हो पाता और बच्चे झेलते हैं उदासी, तनाव , अकेलापन ....जैसे क्यारी को काँटे की बाड़ से बाँध दिया हो....
आजकल ही डिप्रेशन बच्चों पर हावी होता है, यह कहना गलत है, जैसा कि सुनीता जी ने बताया पहले भी पत्रिकाओं में इस विषय पर लेख आते रहे हैं, पहले भी बच्चों का शारीरिक, मानसिक शोषण होता आया है जिसे भूत-प्रेत बाधा या किसी की बुरी नजर या साया कह टाल दिया गया, आज पालक जागरूक हो गये हैं, वे बच्चों को मनोचिकित्सक के पास ले जाने का साहस करते हैं, इसे योग्य भी समझते हैं, आधुनिक युग में कई समस्याओं के साथ एक यह भी समस्या उभरी है कि पति -पत्नि दोनों नौकरी करते हैं और उनके पास बच्चों के लिये समय नहीं होता , कई दम्पत्ति तो शीघ्र बच्चे ही नहीं चाहते क्योंकि जो धरती पर पैदा हुआ वह एक स्वतंत्र व्यक्तित्व बनने वाला है उसे अपने हिस्से की धरती अपने हिस्से का आकाश चाहिये, बच्चों को पैदा करने से पहले उनके पालन-पोषण के विषय में जानकारी आवश्यक है.
हमारे समय में इतनी जल्दी विवाह होते थे कि माता-पिता खुद बच्चे होते थे, उन्हें क्या जानकारी बच्चों को पालने की बड़े लोग भी कई बार योग्य सलाह नहीं देते थे, पल जाते थे बच्चे मार खाकर, या अत्याधिक लाड़ पाकर, आज उम्र वाले माँ-बाप है फिर भी दूसरी समस्यायें हैॆ.
बहुत कुछ लिखना था पर संभव नहीं है,
अमर जी ने इस विषय पर लिखने के लिये प्रवृत किया, धन्यवाद

ज्योति गजभिये


डॉ लता 
अभी जस्ट यूनिवर्सिटी से सेमिनार अटैंड कर आ रही हूँ। संयोग वहाँ भी यही चर्चा महिलाओं में कि बच्चों को समय नहीं दे पा रहे। कहीं यह विवशता है तो कहीं महत्वाकांक्षा । किन्तु सत्य यही है कि  परिस्थितियां सभी के लिए विकट हैं। कुछ बच्चों की मानसिकता में भी अंतर आया है। जो बच्चे कभी तेज आवाज से डरते थे, अंधेरों से उन्हें भी लगता था आज वे तेज स्वर में संगीत सुनना पसंद करते है। सस्पेंस के नाम पर भूतिया फिल्में पसन्द करते हैं। इन्हें देखकर लगता है बच्चे मानसिक रोगी हो चुके हैं।
डॉ लता

Varhsa Raval:
अमर जी ,आपको साधुवाद इतना सम्वेदनशील विषय देने के लिए । सुबह से अकुलाहट है कि इतना विस्तृत विषय संकुचित कैसे हो , कहाँ से बात शुरू की जाए । जिससे एक नवजात शिशु से लेकर अच्छा इंसान बनने तक की सफल कहानी निहित हो , लेकिन बात  कहीं से तो शुरू करना ही है।
,,आजकल बच्चों को नींद सुहानी नही आती
क्योंकि दादा दादी को कहानी नही आती,,
वैसे भी अब संयुक्त परिवार रह कहाँ गए हैं जो बच्चों में प्रेम, सहयोग, सामंजस्य, कर्तव्य , और भावनाओं से रूबरू करवा सकें,, खैर संयुक्त परिवार एक अलग तरह का विषय हो सकता है जिस पर शायद फिर कभी चर्चा हो । लेकिन फिर भी बच्चे के सर्वांगीण विकास के लिए उसकी भूमिका को नज़रअंदाज़ करना सही न होगा । एकल परिवार में बच्चों की मानसिक स्थिति और यूँ कहूँ कि स्तर भी बनाने में अभिभावक की भूमिका होती है , निश्चित ही पूरी तरह से तब तक , जब तक वो स्कूल नही जाता उसके बाद ही धीरे2 बाहर की दुनिया से उसका सामना होता है और उसके लिए बेहद मुश्किल समय भी होता है क्योंकि तभी उसे माता पिता के अलावा और लोगों के साथ भी सामंजस्य सीखना होता है । अगर घर में माता पिता जो अक्सर दोनों ही जॉब पर होने लगे हैं तब परवरिश उचित तरह से हो नही पाती क्योंकि दो कुंठाग्रस्त लोग जो ऑफिस और घर की ज़िम्मेदारियों में खुद दिमागी रूप से असन्तुलित हों उनसे किस तरह के व्यवहार की अपेक्षा कर सकता है बच्चा, ऐसे में इतने छोटे से दिमाग में तमाम परेशानियां लिए घूमता है बच्चा , जो उसे मानसिक रोगी , मोबाइल , टीवी या वीडियो गेेम का एडिक्ट बना देता हैं  । इसके अलावा जो सबसे महत्वपूर्ण है माता पिता के आपसी सम्बन्ध। दोनों का एक दूसरे के प्रति सम्मानजनक न होना बच्चे में भी वैसा ही इंसान बनने की बीज डालता होता है , कुछ अवसरों में ये अपवाद अवश्य हो सकता हैं । हमने डाकू को इंसान बनते और इंसान को डाकू बनते भी देखा है । लेकिन मूल में हमेशा ही एक नर्म दिल बच्चा होता है जिसे समय रहते पहचाना सुधारा जा सकता है। जीवन मूल्य क्या है ,वही जिसे करते देख बच्चा बड़ा होता है । हमेशा बच्चे पर रोक टोक नही किया जाना चाहिए, उसे खुद ही परिणाम तक पहुंच पाने में सक्षम बनाना चाहिए , निर्णय लेने की क्षमता भी सिखाना चाहिए । दूर से देखकर सही गलत की पहचान करवाना ज़रूरी है बनिस्बत अपनी मर्ज़ी थोपने के। अक्सर हम बड़ों की आदत होती है अपनी छोटी बड़ी गल्ती दूसरे पर थोपते हैं , एक बार भी नही सोचते कि वजह क्या हो सकती है । पिता गल्ती पत्नी पर ,बच्चा अपने भाई बहन पर ,बॉस अपनी गल्ती कर्मचारियों पर आप चाहे कोई भी रिश्ता देख लें । ऐसा करके हम अपने अहम्  को ही सन्तुष्ट करते हैं ।ऐसा इसलीए कि हमने यही सीखा है , अपने को निर्दोष साबित करने के लिए दूसरों को वजह बता दो ,जिस दिन अपना मूल्यांकन करने की बात हम सोचने लगेंगे तब निश्चित ही बेहतर समाज बनेगा जिसके कर्णधार होंगे आजके नौनिहाल।
मेरा अपना मानना है कि बच्चे में किसी भी तरह की कला का विकास उसे मानसिक टूटन से न केवल बचाता है बल्कि उसमे विपरीत परिस्थितियों में भी लड़ना और जीतना सिखाता है सो हमे ध्यान देना होगा कि उसकी अपनी अभिरुचि किसमे दिख रही है और उस ओर ही हमे प्रेरित करना है ।ख़ुशी की बात है कि विदेशो की तर्ज़ पर हमारे यहां भी अभिभावकों के लिए जीवन मूल्यों पर ट्रेनिग होती है , जिसमे अभिभावक भी बच्चे के साथ अपने व्यवहार का पाठ पढ़ते हैं। छत्तीसगढ़ महाराष्ट्र,गुजरात में इस तरह के प्रयोग हो रहे हैं जो धीरे2 अन्य राज्यों में भी सफल हो रहे हैं। मेरी तरह छत्तीसगढ़ के अन्य साथी जानते हैं कि ,, जीवन विद्या,, को ट्रेनिग है जिसमे हम सही अभिभावक ही नही बल्कि सही इंसान कैसे बनते हैं , यही सीखते हैं और क्रियान्वयन करते हैं। इसमें बच्चों की स्कूल भी हैं जो अभी प्रारम्भिक अवस्था में है वो प्रभावित करती है उन स्कूलों का नाम ही , अभिभावक विद्यालय, है । ये तो थी महज़ एक जानकारी , लेकिन फिर भी बच्चों की बढ़ती मानसिक बीमारी दरअसल उनकी नही हम्म अभिभावकों की है बहुत कम लोग जानते हैं कि हमारे देश में एक बहुत बड़ा प्रतिशत किसी न किसी रूप में मानसिक बीमारी के रूप में सभी में है , जिसका पता स्वयं उसे भी नही होता ,लेकिन जिसका असर साथ रहने वाले सदस्यों के जीवन पर गम्भीर रूप से पड़ता है और अगर घर में भी इस ओर ध्यान न दिया जाए तो उसकी हरकतों का असर समाज के कई लोगों पर पड़ता है । इसलिए आत्मावलोकन ज़रूरी है ताकि समय रहते हम इसे समझ सकें और बाक़ी लोग प्रभावित न हों । बच्चों को हम जो सिखाते हैं ज़रूरी नही कि वे केवल वही सीखते हैं बल्कि अनजाने, अनचाहे ही हम उन्हें विरासत के रूप में वो सौंप जाते हैं जो उनके व्यक्तित्व के निर्माण में कदापि सही नही ।
निश्चित ही बहुत कुछ छूट गया होगा विषय से और कुछ अनावश्यक आ गया होगा , ये विषय ही ऐसा है जो परेशान कर देता है मानसिकता को ,आज इतना ही..........

वर्षा......                      
91 98181 03292: बालदिवस पर विशेष-
माता-पिता के अनावश्यक लाड़-प्यार के कारण आज बहुत से बच्चे असहिष्णु होते जा रहे हैं। आजकल बच्चों में जिद करना, कहना न मानना, तोड़फोड़ आदि की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है और वे दिन-प्रतिदिन ईर्ष्यालु व अहंकारी बनते जा रहे है। यह वास्तव में चिन्ता का विषय है।
         आज इस इक्कीसवीं सदी में शिक्षा का प्रचार-प्रसार बढ़ा है। इसलिए घर में पति-पत्नी दोनों ही उच्च शिक्षा ग्रहण करके नौकरी अथवा अपना व्यवसाय कर रहे हैं। सवेरे से शाम तक अपने कार्यों में इतने व्यस्त रहते हैं कि उन्हें अपने बारे में भी सोचने का समय नहीं होता। इससे उनका अपना सामाजिक जीवन भी प्रभावित होता जा रहा है।
           वे लोग अपने परिवार के बारे में सोचने से पहले कैरियर के विषय में सोचते हैं। इसीलिए समयाभाव के कारण पहली बात तो वे बच्चे पैदा ही नहीं करना चाहते और यदि चाहते भी है तो बस एक। चाहे वह लड़की हो या लड़का, उन्हें इस बात से कोई अन्तर नहीं पड़ता।
           आज परिवार सीमित होते जा रहे हैं। बच्चों की जायज-नाजायज माँगों को पूरा करके वे उन्हें जिद्दी बना रहे हैं। जब उनकी माँग किसी कारण से पूरी नहीं हो सकती तो वे पैर पटकते हैं और तोड़-फोड़ करते हैं। सारे घर को सिर पर उठा लेते हैं। और हंगामा करते हैं।
          किसी दूसरे बच्चे के पास जो भी नई वस्तु देखते है वही उन्हें चाहिए होती है। चाहे उसकी जरूरत उन्हें हो या न हों। चाहे  खरीदकर उसे कोने में पटक दें। दूसरों को अपने से छोटा समझने की प्रवृत्ति उनमें बढ़ती जा रही है। उन्हें ऐसा लगता है कि उनके माता-पिता के पास बहुत-सा पैसा है और वे जो चाहें या जब चाहें कुछ भी खरीद सकते हैं। इस प्रकार के व्यवहार से वे अहंकारी बनते जा रहे हैं। यह किसी भी प्रकार से उनके सर्वांगीण विकास लिए उपयुक्त नहीं है।
        हर उस बच्चे से वे ईर्ष्या करते है जो उनसे किसी भी क्षेत्र में आगे बढ़ रहा हो। वे इस बात को आत्मसात नहीं कर सकते कि उन्हें कोई भी किसी भी क्षेत्र में हरा दे और उनसे आगे निकल जाए। हर समय तो भाग्य साथ नहीं देता और जब ऐसा हो जाता है तो मानो उनकी दुनिया में कुछ भी नहीं बचता। अपने को पटकनी देने वाले का समूल नाश करने के लिए षडयन्त्र करने लगते हैं। ऐसे ही बच्चे बागी होकर फिर  गैगस्टर बन जाते हैं और हाथ से निकल जाते हैं।
         उनके माता-पिता उस अवस्था में स्वयं को असहाय अनुभव करते हैं। तब उनकी सोचने-समझने की शक्ति जवाब दे जाती है और वे सोच भी नहीं पाते कि इन सपूतों को वापिस फिर इंसान कैसे बनाया जाए।
          माता-पिता को चाहिए कि बच्चों को उनकी आवश्यकता के अनुसार सब कुछ खरीद कर दें। साथ ही उन्हें न सुनने की आदत भी डालें। ऐसा होने से बच्चे को यह समझ में आ जाएगा कि हर बात के लिए जिद नहीं की जाती। यदि कोई मनचाही वस्तु किसी कारण से न मिल पाए तो घर में न तो हंगामा करना होता है और न ही तोड़फोड़। इससे उनमें स्वत: सामंजस्य की समझ भी आ जाएगी।
         बच्चे घर की शोभा होते हैं, माता-पिता का मान होते हैं और राष्ट्र की धरोहर होते हैं। वे कच्ची मिट्टी की तरह कोमल होते हैं। उन्हें जिस भी साँचे में ढाला जाए वे वही आकार लेते हैं। इसलिए उनका चरित्र निर्माण करते समय बहुत सावधानी की आवश्यकता होती है।
        अत: माता-पिता का नैतिक दायित्व बनता है कि वे अपने व्यस्त कार्यक्रम में से थोड़ा-सा समय निकालकर बच्चों को संस्कारित करें। अति लाड-प्यार से उन्हें बिगाड़कर उनके शत्रु न बनें और अपने पैरो पर कुल्हाड़ी मारकर जीवन भर का सन्ताप मोल न लें।
चन्द्र प्रभा सूद

वन्या जोशी                      
 मंच पर सभी को यथायोग्य  नमस्कार 🙏🏻 आज का पोस्टर  बहुत बढिया लगा👌🏻 आज अमर जी ने जो जीवंत  मुद्दा मंच पर रखा है वो बहुत ही महत्वपूर्ण  है ! बच्चे  कहीं मानसिक रोग का शिकार  न बने ये हर परिवार  की मूल जिम्मेदारी  होनी ही चाहिये | पर ये बढते मोबाइल लगाव की वज़ह से कदापि नहीं  हो सकता ! ये तो सदियों से चली आ रही एक ज्वलंत  वेदना है जिसे पहले स्वीकारा ही नहीं गया ! लालन पालन,मार,शोषण ,बच्चे के डर या परेशानी  को नज़रअंदाज  करना ,रोते बच्चे को रोने के लिए  भी पीट देना और सास या पति के लिए  खाना बनाना इत्यादि  ज्यादा  जिम्मेदार  हैं ! बच्चों  के लिए  समय निकालना, उनको विश्वास  दिलाना कि उन्हें सिर्फ  बच्चा समझकर नज़रअंदाज़  नहीं किया जायेगा ,बहुत ज्यादा  टोका टाकी न करना( जैसे बाथरूम  जाओ ,पानी पी लो ,नाणा बांध  लो !)उनको जताना कि वो गलती करने पर घर वालों को बता सकते हैं उन्हें ग़लती की ढांठ तो पडेगी पर वो फिर भी घर की प्यारी संतान रहेंगे ! इन सब बातों से एक सकारात्मक  बदलाव  आएगा ही ! मंच के सामने मोबाइल  के पक्ष में यह कहना चाहूंगी कि आजकल  कई साईट्स हैं जो बच्चो को अपनी पीडा अपनी वेदना share करने के लिए प्रोत्साहित  करते हैं जैसे the artidote जिससे बच्चे अपना मन हल्का कर लेते हैं ! आदरणीय  ने जो विषय उठाया  है उस मानसिक पीडा के निवारण हेतू कई वषों  से सक्रिय हूं और बच्चों को भी उनके rights से अवगत  कराने  का कार्य  भी कपती हूं |१०९८ मिलाकर  बच्चे तुरंत  न्याय पा सकते हैं ! मंच ने इतना अच्छा  विषय उठाया  उसके लिए धन्यवाद  और बधाई इस विषय ने और सभी बुद्धिजीवियों की प्रतिक्रियाओं ने मंच की गरिमा बढाई

आनंद बाला शर्मा 
ज्वलन्त और सामयिक समस्या ।
बच्चों के लालन पालन में अक्सर आड़े आते हैं
हमारे सपने,हमारे डर एवं कुंठाएँ,हमारी सामाजिक ,पारिवारिक और आर्थिक स्थिति ,
हमारी सोच, आदतें और स्वभाव ,हमारी शिक्षा व
कामकाज की स्थिति ,परिवेश आदि आदि।परिणाम
जो भी हों हम भी  झेलते हैं और बच्चे भी।अगर
कहीं कुछ गलत है तो उसे बदलने की आवश्यकता
है।
        हम कुछ सदस्य जो गायत्री परिवार से जुड़े
हैं।स्कूलों में जाकर बाल संस्कार शाला के अन्तर्गत बच्चों को नैतिक मूल्यों की शिक्षा देते हैं और कहानी,कविता सुनाकर साहित्य के प्रति रुचि
पैदा करते हैं।
नौनिहालों के प्रति छोटा सा योगदान


रूपेंद्र 
बहुत ही सार्थक चर्चा हो रही है। मिडिया ,मोबाईल और सोशल साइट्स की तिकड़ी ने जैसा जकड़ रखा है लगता नहीं उससे आज़ाद होना आसान है।महेश जी से सहमत हूँ स्वयं पर तो हम प्रतिबद्ध हैं नहीं बच्चो को कैसे टोकें।मैंने ऐसी माओं को देखा है जो अबोध बच्चों को यह उपकरण पकड़ा कर निश्चित हो जाती हैं।घर मे बड़ो के मना करने पर उन पर ही बिफर जाती हैं।समय के व्यस्थित नहीं कर पा रहे हैं।आज भी जिस पर चर्चा हो रही है वह भी यही माध्यम है।केवल ऊब ही हमें इसके अति प्रयोग से बचा सकती है अथवा इसके प्रयोग से होने वाले हमे शारीरिक व मानसिक स्थितियों पल  विपरीत प्रभाव।


डॉ निरुपमा वर्मा 
बच्चों में भारी इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का इस्तेमाल कहीं सहानुभूति, सामाजिक एवं समस्या समाधान के कौशल को बाधित कर कर सकता है। ये सारी योग्यताएं बच्चों में अध्ययन, खेल और साथियों से बातचीत के जरिए अर्जित होती हैं।  इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बच्चों में ज्ञानेंद्रिय एवं दृश्य-मोटर कौशल के विकास के लिए आवश्यक गतिविधियों की जगह ले लेते हैं। यह कौशल गणित एवं विज्ञान सीखने और जीवन में उनके इस्तेमाल के नजरिए से महत्वपूर्ण है।
यह बात सर्वज्ञात है कि छोटे बच्चे चेहरे की भावनाओं और गतिविधियों को देखकर ज्यादा सीख पाते हैं। मोबाईल , या अन्य इलेक्ट्रॉनिक बच्चे को भाव भंगिमा से परिचित नहीं करा सकता । इसे समझना जरूरी है                      
हनुमंत शर्मा 
Vmm पर चर्चा का विषय अच्छा रहा...उम्दा टिप्पणीया  भी आई....पिश्ट पेषण और पुनरावृत्ति दोनों ही अनुचित होगी...
लेकिन यहाँ सवाल बच्चो का उतना नहीं है जितना बडो का
हर नई पीढी  अपने साथ नये गेजेट्स नयी तकनीक लेकर आती है
आयेगी ही
हम नहीं रोक सकते
हम जो बात रोक सकते है वह है जीवन को मशीन होने से रोकना
और जीवन को वापस जीवंतता की तरफ़ लौटाना काम मुश्किल है लेकिन और विकल्प नहीं है
पुरानी पीढी tv पर लगी रहे
और
नयी नेट पर
फर्क ज्यादा नहीं है
हाँ नई पीढ़ी को और तेज़ स्पीड चाहिये
लेकिन 4G और बुलेट ट्रेन कौन लेकर आ रहा है साठोत्तरी पीढी का नेता
तो हमारा पूरा समाज अब एक ऐसे ट्रेप मे फँस चुका है
जिसका अंत अपने ही भार से चरमराकर टूटी हुई सभ्यता मे होना तय है
कारण वापस लौटा नहीं जा सकता
और आगे सिर्फ डेड एंड आना है
मुझे वुदरिंग हाइट्स की याद आती है
जहाँ काला ही सफेद के रूप मे स्थापित हो जाता है
एक लिँगोदर समय
मनोहर श्याम जोशीके हरिया क्योलीस का गूम लेंड या उनका ही हमजाद
तो हमारा मेट्रो  समाज एक मेंटल असाय्लम मे लगभग बदल चुका है
पता नहीं कैसे इसे समाज कहा जा सकता है
सामाजिकता के तमाम लक्षणों से रिक्त
फिर भी जैसा विषय है बच्चो को इस भयानक असमाजीकता की व्याधि से बचाकर हम शायद भविष्य बचा ले
मैरे लिहाज से डीटेकनालाईजेश्न और रूसो के बेक टू नेचर के बारे मे सोचने का समय आ गया है
लेकिन नेचर भी कहाँ बचा है
इसलिये मोदी बाबा को स्वैप मशीन से पहले एक पौधा बाँटने पर विचार करने की ज़रूरत है
Thnx vmm उम्दा परिचर्चा के लिये


डॉ अल्का प्रकाश 

मुझे अपना बचपन याद आ रहा,जब हम सब भाई-बहन आपस मे ख़ूब खेलते,लड़ते-झगड़ते थे।कोई कमी नहीं थी।उदासी क्या होती है?यह पता ही नहीं था।दरअसल आज औरत  गृहणी मात्र नहीं रही,उसका कार्य -क्षेत्र बढ़ गया है।परिवार मे पुरुष अपनी भूमिका आज भी नहीं बदल पाया है।महिलाओं पर काम का दुहरा बोझ है और ऊपर से यह मोबाइल । समयाभाव के कारण माॅएं बच्चों का पहले जैसा ध्यान नहीं दे पा रहीं।जब बड़े कंट्रोल नहीं कर पा रहे तो बच्चे कहाँ तक करेंगे?एक क्लिक पर उपलब्ध पोर्न सामग्री बूढों तक को लम्पट बना रही,फिर बच्चे? ?कोई माॅनिटरिंग नहीं है।यौन -अपराध बढ़ने मे स्मार्ट फोन की भी भूमिका है। बच्चे जितना  प्रोजेक्ट नहीं तैयार करते या ऑन लाईन पढ़ते नहीं, उससे ज्यादा चैट करते और गेम खेलते हैं ।गेम भी  ज्यादातर हिंसक किस्म के हैं ।यू ट्यूब पर सर्च कुछ करो रीलेटेड लिंक कुछ और ही आने लगता है।साइबर क्रांति ने माता-पिता की ज़िम्मेदारी बहुत बढ़ा दी है।अनवरत निगरानी और ख़ुद स्मार्ट फोन से दूरी बना कर ही बच्चों का भविष्य बनाया जा सकता है।दरअसल बच्चों की एकाग्रता कम हो रही ।उनका पूरा ध्यान गेम के अगले लेवल तक पहुँचने मे लगा हुआ है।हम जितना ज्यादा त्याग करेंगे हमारे बच्चों का भविष्य उतना सुंदर बनेगा।निर्णय हमें लेना है कि ख़ुद की लोकप्रियता जरूरी है या बच्चों का भविष्य ।सब एक साथ नहीं सधता ,सच यही है।बच्चों के सामने आदर्श उपस्थित करने के लिए हमे स्वयं आभासी दुनिया से एक निश्चित दूरी बनानी होगी।मेरे साथ साइबर-अपराध हो चुका है,भुक्तभोगी हूँ ।उचित वक्त आने पर यह लड़ाई लड़ूंगी।
          -डाॅ.अलका प्रकाश


अमर त्रिपाटी 
Internet ke liye
  जिधर देखता हूं,उधर तू ही तू है
न तेरी सी खुशबू न  तेरी सी बू है
रहे ख़ुद पे काबू तो ,तुझसा ना कोई
बहे ज्ञान गंगा,गजब यार तू है
 
बस थोड़ा सा ही इस्तेमाल हो तो इंटरनेट वरदान है नही तो लोग रस्ता चलते एक दूसरे से टकरारहे है और व्हाट्सप पर लगे हुए है।पत्नी पूछ रही है एक रोटी और दू
पति का जवाब ही नही आ रहा है एक हाथ से खाना एक हाथ से whatsap

ड्राइविंग करते वक्त भी चेक कर रहे है लोग घँटी बजते ही मोबाइल ऑन

आज बहुत सुंदर सुन्दर लेख पढ़े, बहुत कुछ सीखा अर्पणा जी का साथ मिला स्टोरी मिरर के बिभू जी बहुत प्रभावित है जी आपसे ।
साथ जुड़ने वाले सभी साथियों को प्रणाम खासकर राजम नटराजन बिभू दत्ता जो दोपहर को ओडिशा से आये और व्यस्त समय से भी समय निकाल कर अपना वक्त दिया।

आप सब को पढ़ने और आप सब से बहुत कुछ सीखने को मिला

इस चर्चा को फिर कभी आगे बढ़ाएंगे,विशेषज्ञ बुलाकर उनकी भी राय लेंगे।
बहुत कुछ शेष है फ़िर कभी
अमर त्रिपाठी🙏🏽

Sunday, November 13, 2016

नदियों में बहता जल महज जल  नहीं एक संस्कृति है ,सदियों  की कहानियों  का साक्ष्य है ,निर्मल जल  के तरल में भी एक तरल भाव है जिसे महसूस कर उपन्यास जूण जातरा का सृजन किया कवि ,कथाकार ,उपन्यासकार ,व्यंगकार ,आलोचक ,समीक्षक ,अनुवादक श्री अतुल कनक ने |२०१२ में इस उपन्यास के लिए अतुल कनक जी को साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया |

राजस्थानी भाषा से हिंदी में अनुवाद कर रचना प्रवेश पर प्रस्तुत किये ,उपन्यास के कुछ अंश प्रवेश सोनी ने 


नदी से पूछ कर देखो

नदी से पूछ कर देखो
करती है
घाट से आपस में
बहुत दिनों से ऐसी बातें
नदी
किया करती है इन दिनों
जाने कैसी –कैसी बातें
नदी के मन में क्या है ,
कैसी है उसकी पीड़ा
किसी दिन डूब कर देखो ...

प्यासा न रहे कोय
ऐसा वचन धारण किये हुए थी
कैसा लगता है
जब वचन टूटता है
यह जानने के लिए
नदी की तरह सूख कर देखों|


अतुल कनक 
जन्म 16फरवरी
कोटा ,राजस्थान 
शिक्षा- एम ए (हिन्दी, अंग्रेजी, इतिहास)
नौ पुस्तकें प्रकाशित
हिन्दी, अंग्रेजी, राजस्थानी में लेखन
13 साल की उम्र से कविसम्मेलनों में सक्रिय
माध्यमिक शिक्षा बोर्ड राजस्थान और वर्धमान महावीर खुला विश्वविद्यालय के राजस्थानी पाठ्यक्रमों में रचनाएँ शामिल
साहित्य अकादमी सहित देश के कुछ पुरस्कार/ सम्मान


जूण जातरा


अपने पिता की अस्थि विसर्जन करते  समय नदियों से अपने मन को बांधकर लेखक ने उनके जीवन को अपने भीतर समेट लिया | जैसे नदी उनके  भीतर बह रही हो, जैसे कल कल करती लहरों के मीठे संगीत के साथ नदी के भीतर आर्तनाद करता दर्द बह रहा हो |नदियों का जल सदियों से धरा पर प्रहावित है उस प्रवाह में सभ्यता की जननी बन बह रही नदियां ,इतिहास की स्मृतियों को समेटे हुए |जीवनदायिनी, मोक्षदायिनी कल कल करती लहरों  से ,मन में हिलोरे लेती नदियां सूख कर अब बेरंग उदास बेवा सी हो गई है | मानव सभ्यता और विकास की कहानी कहती यह नदिया मनुष्य और उसके आचरण का बखान करे तो  किससे ?उसके आसुओंकी नमी से अपने ह्रदय को भिगो कर लेखक ने लिखा  उपन्यास “जूण –जातरा “ |
यह उपन्यास राजस्थानी भाषा में लिखा हुआ है और इस की विशेष बात यह है की यह सम्पूर्ण उपन्यास नदी के कथ्य में है |चम्बल नदी अपने कथन में देश विदेश की समस्त नदियों ,उनसे जुडी संस्कृति और कथा –कहानियों से जुड़े उनके सुख –दुःख  का बखान  करती है |

चंबल नदी की पीड़ा उसके ही शब्दों में

मैं चंबल हूं वहीं चंबल हूँ,चर्मण्यवती  जो विंध्याचल के आँगन से निकलकर यमुना जी में स्वयं को समर्पित कर देती हूँ।
लोग मुझे सदासलिला भी कहते हैं याने वह नदी जिसमें हमेशा पानी का प्रवाह बना रहे।लेकिन लोग कुछ भी कहें....पर मैं इसे समर्पण का ही प्रताप मानती हूं|
आप अपनी खुशी दूसरों के सुख में समा कर देखो आपके  अस्तित्व के अंश अंश पर ऐसा अमृत समा जाएगा  कि काल कितना भी विकराल हो जाए ,आपकी कीर्ति को छू भी नहीं सकता |आज आप सोच रहे होंगे कि बहती नदी को आज बात करने की फुर्सत कैसे मिल गई |नदी की नियति तो निरंतर बहना ही है| ठहरने का नाम तो मौत है जिंदगी प्यारी है तो लगातार भागते रहो |महानगर और इंसानों की तरह ,जिनको दम लेने की भी फुर्सत नहीं |लेकिन नदी और महानगर के लोगों की भागमभाग में बहुत फर्क है |नदी अपने भीतर का  नेह बांटने को बहती है ,और इंसान ज्यादा से ज्यादा पाने  के लिए भागता है |महानगर में भागते  इंसान को न अपने लिए समय है न  अपनों के लिए |पर नदियां तो अनजानों से भी खुलकर मिलती है |

नदी यदि अपना पराए का भेद करती तो उसके  स्पर्श मात्र से पाप मिटने की ताकत उसे नहीं मिलती |लेकिन पाप मिटाने की सामर्थ ही नदियों के लिए बहुत बड़ा श्राप बन गई |सरस्वती  नदी को शायद इसका भान हो गया था कि कलयुग में मनुष्य नदियों से ऐसा बुरा बर्ताव करेगा ,इसलिए ऐसी लुप्त हुई थी अपनी कोई निशानी भी पृथ्वी पर नहीं छोड़ी| वह सरस्वती थी उसे ही यह ज्ञान नहीं ,होता तो और किसे होता |
अन्य  नदियां ऐसी बड़भागी नहीं हो सकी |जब तक रही तब तक वेद मंत्रों की रचना की महत्ता बताती रही और जब दुनिया की नियत पर पाप की पणी चढ़ने लगी तो अपने को धरती के गर्भ में समा लिया |

नदिया अपने जल के साथ संस्कारों की घुट्टी भी देती है |सभ्यता  की जननी बन जाती है |चाहे इस राह पर उम्हे कितने ही कष्ट उठाने पडे |गंगापुत्र भीष्म वचनबद्ध होकर ताउम्र दुख दुविधाओं को झेलते रहे लेकिन वचन से कभी डिगे नहीं |यह गंगा मां के ही संस्कार थे उनमें |हालाँकि वो भी  कौनसी सुख से रही |आज कलयुग में गंगा ही ऐसे ऐसे मनुष्यों के पाप धोने के लिए बह रही है जिन पापों को यमराज भी अपने लेखों से नहीं मिटा सकता |

दहेज के लिए बहू को जला देना ,पराई बहन बेटियों की इज्जत का हरण करने में ज़रा भी न हिचकना , सत्ता में बने रहने के लिए मानवता को नीलाम कर देना ,धर्म की आड़ में भोले भाले नर-नारियों के विश्वास भरोसे से खेलना.. ऐसे पापों की गंदगी को कौन धो सकता है |जमाने के पाप धोने की धुन में गंगा मैली होती गई और सब ने उसकी इस दशा से आंखें मूंद ली |

यह कैसा रंग है जमाने पर मुझे गंगा मां की चिंता हो रही है| कावड  में माता पिता को यात्रा कराने वाले श्रवण कुमार और पिता के वचन की लाज  रखने की खातिर दर दर भटकने वाले राम की भूमि पर आज गंगा मां का किसी संतान को खयाल नहीं| पत्थर पत्थर पूज कर औलाद पाने वाले मां-बाप को आज औलादों से तिरस्कृत होना पड़ रहा है |तो  गंगा मां की कौन सुध ले |

नदियां तो सारे संसार को एक समान समझती है लेकिन मनुष्य ही मनुष्य होते हुए भी मनुष्य -मनुष्य में भेद करता आया है |जाति ,धर्म ,भाषा, प्रांत ,वर्ण  और देश में सब को बांट दिया| जल तो मनुष्य के जीवन का मोरमुकुट है.... ,आन है ..कोई कैसे अपनी ही आन पर पाँव रख उसे रोंध सकता है |लेकिन लगता है इस युग में सब अंधे हो गए है ,उन्हें अपने स्वार्थ के सिवा कुछ दिखाई ही नहीं देता |आज यदि मनुष्य की आँख का पानी नहीं मरा होता तो ,नदियों के पानी के साथ ऐसा बुरा बर्ताव नहीं करता की उनकी आने वाली नस्लों के लिए पीने का शुद्ध पानी भी न बच सकें |

 एक दूसरे से बड़ा होने के जुनून की  कुभावना श्रेष्ठ नहीं बनाती है |बड़ा होने के लिए तो बड़प्पन होना जरूरी है सरल होना जरूरी है| पांडवों के राजसूय यज्ञ में विष्णु अवतारी कहे जाने वाले कृष्ण ने सभी मेहमानों केपाँव  धोने  की जिम्मेदारी ली ,जिसके चरणों की धूल से सारे पाप मिट जाते हैं वह अवतारी दूसरों के पाँव धुलाता है  ,यह कृष्ण की महानता और बड़प्पन था |

प्रेम की बात सब करते हैं लेकिन प्रेम की गहराई को कोई नहीं समझता |नदी के सुख-दुख की गहराई को समझने के लिए नदी की धारा के साथ बहना होता है| समय अपने  निशान बहती धारा पर छोड़ देता है |जिन्हें नदियाँ अपने गर्भ में समां लेती है | युगों में करवट लेते समय की काल कलवित होती कहानियों की साक्षी बनी नदियां अनवरत बह रही है |हिमालय के उतुंग से समुद्रतल में समा जाने की यात्रा में समेट रही है |

 हम नदियों ने मनुष्य के साथ रिश्ते को दुखी होकर भी निभाया |उसके कई कुकर्मों ने आंखों के आंसुओं को सुखा दिया |नर्मदा के आस-पास के गांव में आज भी ये रिवाज है कि बेटी के जन्म होने पर उसे मां बाप नर्मदा में बहा देते हैं| स्त्री और नदी की जीवन यात्रा एक समान होती है| हाड मॉस की मनुष्य योनि में भी स्त्री को सांस लेने की इजाजत नहीं दी |नन्हे से जीव को कोई कैसे पानी में डाल सकता है |मनुष्य तो निपट पत्थर ही हो गया है|जिस  नर्मदा के स्पर्श से पत्थर तक शिव  हो जाते हैं और यह मनुष्य पत्थर बना ऐसे पत्थरदिल सरीके कर्म करता रहा  |ओकारेश्वर में कंकर कंकर में शिव दिखाई देते हैं |मैंने कई बार नर्मदा जी का रोना सुना |मनुष्य के ऐसे कर्मों को देख कर हम नदियां रोये नहीं तो क्या करें| ऊपर से पाखंड देखो.हाथ जोड़कर कहते हैं .नर्बदा जी बच्ची को आप के सहारे छोड़ कर रहे हैं .आप पाल सको तो पाल लेना|

आग ,पानी, हवा, आकाश ,धरती पंचतत्व से बने शरीर को नदियों के वश में नहीं हो सकता पालना |पानी का स्वभाव तो पानी हो जाना है|रिवाजों और गरीबी के वशीभूत इन मूर्खों की बात तो समझ आती है, लेकिन सर्व सम्रद्ध परिवारों में जन्म से पहले की कोख में लड़कियों की हत्या कर देना किस प्रकार की तरक्की का बयान है |कैसा विकास है |यह लोग नहीं जानते मां के गर्भ में पलते जीव की हत्या से हम नदियों के शरीर के खून में से हीमोग्लोबिन का एक हिस्सा खत्म हो जाता है (लेखक की कल्पना का आधार )लोग यदि इस तरह लड़कियों को गर्भ में ही मारते रहेंगे तो हम सभी नदियों भी खून में लोहे की कमी से मर जाएगी |

हुबली से लेकर ह्वांग हो ही तक श्राप की इतनी कहानियां बिखरी पड़ी है की गिनती बीत जाएगी पर आंखों से बहने वाले आंसू नहीं बीतेंगे इन दर्द भरी कहानियों की वजह से |चीन की पीली नदी के उत्तर इलाके में मिनघुन प्रथा में जिंदा लड़की बहाने से भी खतरनाक रीत है |यह भी चीन के इस दौर में शुरू हुई थी जिस दौर को चीन के इतिहास का जोहाग युग कहा जाता है | उस समय यह चलन था कि कोई युवा पुरुष की मृत्यु बिना शादी के हो जाए तो उसी की हमउम्र लड़की को उसके साथ दफना देते थे |ताकि उस युवक को  अगले जन्म में सब सुख प्राप्त हो| मनुष्य की ऐसी करतूतों के डर से कौन  न पीला पड़ जाए| पीली नदी यों ही पीली नहीं पड़ी।

स्त्री जीवन सदैव संघर्षरत ही रहा |आम्रपाली की मुक्ति तथागत की वजह से हो गई वरना उसे नगरवधू बना दिया था | राजा भर्तहरी की कहानी यहाँ उलट है |यहाँ स्त्री ने ही धोखा दिया ,राजा भर्तहरी ने  अपनी किताब में लिखा है ....भगवती मानी जाने वाली गंगा स्वर्ग से उतरी तो शिवजी के माथे पर ,वहाँ से हिमालय पर और प्रथ्वी पर से होती हुई समुद्र में गिरी| एक बार गिरना शुरू हुआ तो गिरती ही चली गई |यह बात स्त्री पर भी चरितार्थ होती है|

विदेशी जमीन पर भी नदियों के दर्द कम नहीं है |इंग्लेंड में एक जगह है ‘डेवोम’ |उसके पास बिकलेघ  का किला है चौदहवीं सदी की बात है |बिकलेघ के किले पर कब्ज़ा करने की सोच ने सर अलेक्जेन्डर क्रोस ने केयोर घराने के बहुत लोगों को मौत के घाट उतार दिया |इनमे एक एक युवा की गर्दन उतार कर उसके शारीर को पास में बहती नदी में जिस जगह फेंका ,उस जगह आज भी २४ जून के दिन वो नदी लाल हो जाती है |इतनी सदियों पहले फेंके गए शारीर से आज भी नदी में रक्त बह रहा है |ऐसे अत्याचारों से नदी आज भी खून के आंसू बहा रही है |


और भी कई कहानियां जो बह रही है पूरी पृथ्वी पर नदियों की धाराओ के साथ ,जिन्हें इस उपन्यास में सहेजा है श्री अतुल कनक ने |


Wednesday, November 2, 2016

समकालीन कविता की प्रचलित शब्दावली में यदि कही किसी कवि की कविता में कोई शब्द आपको झटके से रोक कर अचम्भित कर दे तो वही ठहर जाने का मन होता है। उस शब्द के सृजन और कविता के अर्थ से पाठक अपने को आसानी से मुक्त नहीं कर पाता। कुछ ऐसे ही शब्द, प्रतिक और ताज़ा बिम्बों से तराशी कवितायें है युवा कवि अखिलेश श्रीवास्तव की, जिन्हें वाट्सअप के साहित्यिक समूह, साहित्य की बात पर श्री ब्रज श्रीवास्तव ने प्रस्तुत किया।

अखिलेश जी की कवितायेँ जीवन के राग विराग के साथ मानवता की पक्षधर कविता भी है। कविता के स्वर वर्तमान समय की विद्रूपताओं को भी ध्वनि देते है, और कहीं-कहीं वैज्ञानिक आधार भी बनते है। इन कविताओं में हताशा का बीहड़ है तो संघर्ष के साथ जीवन की जिजीविषा भी।

सम्भावना और ऊर्जा से भरे युवा कवि अखिलेश श्रीवास्तव की कवितायें है आज रचना प्रवेश पर

परिचय
नाम : अखिलेश श्रीवास्तव

जन्म तिथि :14.02.81 ,गोरखपुर
शिक्षा : हरकोर्ट बटलर टेक्नोलाजिकल इन्स्टीट्यूट  कानपुर से केमिकल इंजीनियरिंग में बी.टेक की डिग्री ।

प्रकाशित कृति : साझा काव्य संकलन सम्भावना. काम मे 6-7 कविताएं संकलित । नेट पर से ही पंकज बिष्ट के संमयातर व हरमिन्दर के समय पत्रिका मे प्रकाशित। कुछ बडे आलोचकों ने कविताएं समीक्षाओ में कोट की ।आज तक एक भी कविता छपने के लिए नहीं भेजी ।अंतरजाल पर एक राष्ट्रीय कविता प्रतियोगिता मे प्रथम स्थान ।

अनुभव: हिंदयुग्म.काम  मे सक्रिय भूमिका व कुछ काव्य संग्रहो का प्रकाशन अनुभव ।

संप्रति: प्रतिष्ठित मल्टीनेशनल कंपनी मे वरिष्ठ प्रबंधक 

निवास: भरूच , गुजरात।
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1..|चांद पर पानी 

संरचना: असंघनित अणुओं के रूप में 
रंग: रंगहीन
सुगंध: गंधरहित
स्वाद: आंशिक क्षारीय
स्थान: चाँद के मस्तक के ठीक नीचे

वैज्ञानिको, मत चिल्लाओ 
यूरेका यूरेका
जो मिला है वो पानी नहीं है।

ढाई सौ टन का जो उपग्रह टकराया है सतह से
उसी से रुआँसा हो गया चाँद 
निकल पड़े है आँखों से आँसू।

आये दिन कोई न कोई
रपटईया आता चाँद को
देखो जरा
चाँद का मुँह टेढ़ा हो गया है।

जब तक बूढ़ा चाँद
कला के साथ रहता था
खुश था

विज्ञान के वादों में आकर
चाँद उलझ गया है
हजारों टन उपग्रहीय कचरे में 
कभी कभी तो बेचारा
मुँह भी नहीं देख पता
धरती का।

पिछले दिनों 
एक उपग्रह टकरा गया
सप्त ऋषियों से
जब वो जा रहे थे सुबह को बुलाने
चटक गया अगस्त ऋषि का कमंडल
लहूलुहान हो गए अत्री
और टांग तुड़वा बैठे है ऋषि गौतम
चिड़चिड़े हो गए सप्त ऋषि
क्रोध में बड़बड़ाते रहते हैं
और
बढ़ जाती है धरती पर सुनामियाँ।

उधर ग्राम भुसना में
परसु कहार
सुबह से इंतज़ार में है 
कि जुठारे ठाकुर कुएँ का पानी 
बना दे गंगा जल 
तो हमहू तर करे गला।

चाँद पर पानी मिलने की खबर से
कहार मगन है
पर कहारिन उतार देती है नशा 
'मिली पानी त
पहिले पिहे ब्रह्मण 
फिर पिहे ठाकुर 
औ जबले तोहार
लम्बर आई
ओरा जाई पानी।'

२...महंगाई- चीनी / दाल / चावल / गेहूँ

चीनी: 
पिता जी चिल्लाकर 
कर रहे हैं रामायण का पाठ 
बेटा बिना खाए गया है स्कूल 
छुटकी को दी गयी है नाम कटा 
घर बिठाने की धमकी 
माँ एकादसी के मौन व्रत में 
बड़बड़ाते हुए कर रही है 
बेगान-स्प्रे का छिड़काव 
हुआ क्या है? 
कुछ नहीं ... 
कल रात 
चिटियाँ ढो ले गयी हैं 
चीनी के तीन दाने 
रसोई से।

गेहूँ: 
तैतीस करोड़ देवताओ में 
अधिकांश को मिल गए हैं 
कमल व गुलाब के आसन 
पर लक्ष्मी तो लक्ष्मी है 
वो क्षीर सागर में लेटे 
सृष्टिपालक विष्णु के 
सिरहाने रखे 
गेहूँ की बालियों पर 
विराजमान हैं। 

चावल : 
आध्यात्मिक भारत बन गया है 
सोने की चिड़िया 
और चुग रहा है मोती 
पर छोटी गौरैया की 
टूटे चोच से रिस रहा है खून 
जूठी पर 
साफ़ से ज्यादा साफ़ 
थालियों में आज भी 
नहीं मिल पाया चाउर खुद्दी का 
इक भी दाना 
बेहतर होता 
अम्मा की नज़र बचा 
खा लेती 
नाली के किनारे के 
दो चार कीड़े। 

दाल :
बीमार बेटे को 
सुबह का नुख्सा और 
दोपहर का काढ़ा देने के बाद 
वो घोषित कर ही रहा होता है 
अपने को सफल पिता 
कि 
वैद्य का पर्चा डपट देता है उसे 
दो सौ की दिहाड़ी में कहाँ से लायेगा 
शाम को 
दाल का पानी

३....प्रेम
आओ मिल कर खोजें प्यार
लुप्त प्रजातियों की भाँति।
चाहो तो पूछ लो
अरगनी पर टँगे चाँद से
या फिर डाल दो इक मेल
मंगल को।
परिंदों,
किसी खुली खिड़की से घुस जाओ
आसमान के घर में
या फिर डाल्फिन से कहो
खोजे समुंदर के तलहट में
हो सकता है
टाइटॅनिक के नीचे दबा हो प्यार
वर्तमान और निकट भविष्य में भी
प्रेम इतना दुर्लभ है
कि आओ सब मिल कर
प्रेम को परमात्मा मान लाते हैं।
हम दोनो को खोजते रहना चाहते हैं
पाना नही।
अभी खबर आयी है
पश्चिमी उत्तर प्रदेश से
पाए गये है दो लोग प्यार करते हुए
एक को गोली मारी गयी
दूसरे को काटा गया गडासे से
प्यार का खून पा
लहलहा गयी प्रधान की चुनावी फसल
पंच के फ़ैसले पर
उठा ले गये कुछ लोग प्रेमी की बहन को
खेत में
परमात्मा प्रेम का हश्र देख
बिला गये है जाने कहाँ
देख ले रे नकुला
जंघवा पर तिल।
हो हो हो
कै बरिस के होई
ए फ़ैसला त पंचे करिहे।
खी खी खी
सारे गाँव वाले खिखिया कर
हँस रहे थे पर
खेत शर्मिंदगी झेल नही पाए
सूखा गयी सरसों
किरा गये धान
सारे पत्ते गिरा कर
नंगी औंधी पड़ी है अरहर
गाँव के बीचो बीच
लड़की की तरह...

 ४...पिता 
वैदिक मंत्रोच्चार के बीच
जब चार आँखों ने मिल कर देखा
कोई एक सपना।

कुछ रक्ताभ शामों में
दो चेहरे खिलखिलाए होंगे
किसी  इक ही बात पर।

कुछ स्वर्णिम रातों में
जब दो देह बाँट रही होंगी
पसीने की खुशबू।

तभी सिर्फ़ प्रेम नामक रसायन से
पुरुष रच देता है कुछ ऐसा
जिसे हज़ारो वैज्ञानिक
सैकड़ों साल से
पूरे लाव-लश्कर से साथ
ढूँढ रहे है
चंद्रमा से मंगल तक।

अचानक किसी रात
शर्माती, सकुचाती
कोई देवी मना कर देती होगी
आलिंगन से
लज़ाई आँखे गड़ा देती होगी
पेट पर
और हाथ अपने आप
परे धकेल देते होंगे
पुरुष को
तब एक क्षण के लिए ही सही
उसे अहसास होता होगा
अपने ब्रह्मा होने का।

संभोग से समाधि के
सफ़र में
इक पड़ाव है
पिता।

*अखिलेश श्रीवास्तव *

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प्रतिक्रियाये 
Suren: अच्छी है कविताये , कहन का टटकापन और कहन की व्यग्रता में चाँद ,मंगल और विज्ञान के प्रयोग .....साथ ही मानवीय इच्छाओं ,दुर्बलताओं और तथ्यता का समावेशन काव्य को ताज़गी देता है ।
बढ़िया अखिलेश .…यूँ ही लौ ऊँची कर चलते रहो । 👍🏽

कविता विशेष पर शाम/रात तक लिखने की कोशिश करूंगा ।
 Mani Mohan mehta: बेहतरीन कविताएं ...सुबह के ताजे हवा के झोंके की तरह ...पहली कविता में चाँद पर पानी मिलने की खबर के बहाने सदियों से चली आ रही जाति प्रथा पर कटाक्ष किया गया है पर इस विषय पर  लिखी जा रही अन्य कविताओं से एकदम अलग और हट के ....नागर कविताओं में लोक का इस्तेमाल बहुत खूबसूरती से करते हैं अखिलेश .....

मंहगाई को लेकर सीरीज में उनकी कविताएं भी प्रभावित करती हैं ....इन कविताओं में मंहगाई को लेकर सिर्फ छाती पीटना नहीं है पर लोक जीवन के टटके बिम्बों ने इन कविताओं को सम्वेदना के स्तर पर सम्प्रेषणीय बनाया है ....

वैसे तो सभी कविताएं प्रभावी हैं पर पहली और तीसरी कविता मुझे ख़ास लगीं ।तीसरी कविता प्रेम खोजने जैसे सामान्य पद से शुरू होकर पच्छिमी उत्तर प्रदेश की एक भयावह खबर तक आती है और एक अंतिम पंक्तियों में जिस बर्बरता का जिक्र बिम्बों के माध्य्म से करती है यह अद्भुत है .....

( अखिलेश की इन कविताओं को पढ़कर आश्वस्त हूँ कि आने वाले दिनों में हिंदी कविता के परिद्रश्य में एक नया सितारा चमकने को तैयार बैठा है ....कवियों सावधान 😎😀
Anita Manda: बेबाक लेखन और शानदार तरीके से  बात को सलीके से रखने का हुनर
कवि को हार्दिक बधाई सशक्त अभिव्यक्ति की।

 Abha Bodhisatva: घर से लेकर समाज तक की कुरूतियों को अपने ढ़ग से रेखांकित किया है कवि ने ।चाँद पर पानी में उँच -नीच के भेदभाव और अपूर्णता -मार्मिकता को बड़े सहद ढंग से व्यक्त करता है -' ओरा जा ई पानी' अद्भुत ।
दाल ,चावल चीनी से मँहगाई को तौलते -घर को भी तौल देतें हैं सटीक और बेबाक । प्रेम का हश्र गाँव और समाज की छोटी मानसिकता को व्यक्त करते हुए ,पिता को अंतिम चार लाइनों में अपने ही अंदाज में पेश किया क्या खूब ।वैज्ञानिक छौक के साथ कवि अपने ढ़ंग स अपनी बात रख गए ....

शुभकामनाएँ अखिलेश जी को ।जल्दी में हूँ विदा
Jatin: चाँद का कचरा और जात का कचरा.  वक्त के साथ बढ़ता कचरा.शुक्र है वो चाँद के आँसू हैं वरना चाँद टीन टप्पर के बीच जात के कचरेे को भी रोता .बेहद खूबसूरत रचना.
त्योहारों के बीच एक तबका एेसा भी जाे दाल के पानी के लिए मोहताज.अच्छी रचना है।
मेरी पसंदीदा रचना प्रेम.हम इनसान इतनी तलहटी में जा पहुँचे हैं कि प्रेम जैसी
पवित्र भावना को छू पाना भी बस में नहीं. शुक्र है खेत शर्मिन्दा है. नग्न मानव शर्मिन्दा होने लायक शर्म भी नहीं बचा पाया।
पिता के पड़ाव को खूबसूरती से निभाया आपने.
अखिलेश जी आज सुबह आपका नाम पढ़ते ही साेचा था कि सभी टोटम आपको ब्याज समेत वापस करने का मौका मिला
है लेकिन प्रेम ने मेरा सारा मजाक छीन लिया। अति भावुक कर देने वाली रचना.एक उदासी भरी शाम के लिए शुक्रिया अखिलेश जी.
 Sayeed Ayub Delhi: बेहतरीन कविताएँ। कवि और प्रस्तुतकर्ता दोनों को बधाइयाँ। विस्तार से ऑफ़िस से निपट लूँ फिर आता हूँ
अपर्णा: 'कोई ताज़ा हवा चली है अभी..' बहुत दिनों बाद नए स्वर की कविता का आस्वाद मिला। आप तो कमाल लिखते हैं अखिलेश। शुक्रिया आपका। आपको और पढ़ने की इच्छा है। ढेरों शुभकामनाएँ!👍🏽😊
Sanjiv Jain : चाँद पर पानी की खोज में अरबों बर्बाद और जमीन पर पानी के लिए हाहाकार। जीवन में पानी प्यास से नहीं जात से और अब धंधे से संचालित हो रहा है जिसे कविता में संकेतित किया है। चाँद और पानी का संबंध सागर और ज्वार उठने से भी जुड़ा है। चाँद और पानी के बीच जिस संबंध को रेखांकित किया है वह कई संभावनाएँ पैदा करता है।
 Rajendr Shivastav: अखिलेश जी ,आज आपके इस रूप को निहारने का अवसर मिला।चकित होना स्वाभाविक है। अलग वअनूठी कविताएँ। कहन का अंदाज़ भी  मन को भा गया। बहुत गहरे तक प्रभाव छोङती है।
सामाजिक बिसंगति , व अभावों से जूझते जनमानस पर बोलती ,व्यथित करती कविताएँ । मोती जैसे चुनकर पिरोये लोक बोली के शब्द कविता के मर्म को आम जन तक पहुँचाने में सफल होंगे ।
चाँद के आँसू,
चीनी के तीन दाने
औंधी बिछी अरहर
नकुला
दाल का पानी
मात्र शब्द नहीं है।जो है उनके भावों को  शब्दों मेंव्यक्त करने की क्षमता मुझमें नहीं हैं।
सा की बा से जुङे रहने की सार्थकता  फिर परिलक्षित हुई है।
मेरी हार्दिक बधाई स्वीकारें।😊
 Uday Dholi: एकदम नये अंदाज़ की कविताएँ हैं ,अखिलेश जी मुबारक हो।💐💐
Sudhir Deshpande: अखिलेशजी की कविताओं का टटकापन भाया। अभी तक कवियों की यात्रा चीन रुस और सोमालिया तक होती रही पर अखिलेश चंद्रमा और मंगल की यात्रा करा रहे है। एक तीक्ष्ण काव्य बोध से सम्पृक्त कवि की कविताओं को पढकर दृष्टि संपन्नता का आभास भी होता है। पिता कविता इन सारी कविताओं मे प्रभावपूर्ण और प्रवाहपूर्ण हो गई है।
 Ghanshym Das soni: आज प्रस्तुत रचनायें अलग तरह की हैं "चाँद पर पानी" के माध्यम से कवि हमारे समाज की विसंगतियों की ओर इंगित कर रहा है आज के समय भी अनेक क्षेत्रों में सामाजिक भेदभाव दबंगों के चलते मौजूद है  चाँद हमारे मंहगाई -चीनी/दाल/चावल/गेंहूँ आवश्यक वस्तुओं के बढ़ती कीमतों पर अनोखे ढंग से चिंता व्यक्त की गई है "प्रेम" गुम हो गई चीजों की भांति खोजने के प्रयास पर बहुत सार्थक पंक्ति "हम दोनों को खोजते रहना चाहते हैं पाना नहीं"। रचनायें बहुत शानदार हैं श्री अखिलेश जी को बधाई व प्रस्तुतकर्ता ब्रज जी का आभार ।
 Sanjiv Jain : अच्छी हैं कवितायें । कुछ और मेहनत करें कंटेंट पर तो सोने पर सुहागा हो जायेगा। थोड़ी सा भाषा पर भी कुछ और पैनापन चाहिये।
जो हे उसमें कोई कमी नही लिखते  रहिये।

 Lakshmikant Kaluskar : अखिलेश जी आपकी ये ठेठ कविताएं और वह भी ठेठ भाषा में आपकी कवि रेंज को इतना व्यापक बना रही हैं कि उसके ओर-छोर नापना मुश्किल है.
'चाँद का मुंह टेढ़ा है 'और 'कला और बूढ़ा चाँद' का उपयोग बखूबी करते हुए पानी की अहमियत को तो बताया ही, साथ ही प्राकृतिक संपदा पर भी कैसे श्रेष्ठिवर्ग ने अपना पहला हक जमाया हुआ है य
 यह भी बड़े ठेठ लहजे में अंकित कर दिया है.
आपकी कविता धारदार तो है है,व्यापक दृष्टि का भी परिचय देती है.अगर कहूं अद्भुत कविताएं हैं तो बात पूरी होगी.जैसा मणिमोहन जी ने कहा,किसी बड़े कवि ने दरवाजा खटखटा दिया है हिंदी कविता के क्षेत्र में.बहुत बहुत बधाई इन विलक्षण कविताओं के लिये.
Shaahnaaz: बहुत बढ़िया और प्रभावशाली कविताएँ हैं चाँद पर पानी अलग स्वाद की कविता बेहतरीन कविता है । महंगाई की कविताएँ जिसमें लोक जीवन के बिम्बों का बहुत सुंदरता से इस्तेमाल हुआ है और बहुत मार्मिक कविता बन गई है ।
तीसरी कविता अद्भुत और ताज़गी लिए हुए है ।
समाजिक सरोकार की सम्प्रेषणीय कविताओं में सशक्त अभिव्यक्ति है अखिलेश की बहुत बधाई और ढेर सारी शुभकामनाएँ ।💐
ब्रज जी धन्यवाद बहुत अच्छे कवि से परिचय के लिए । 🙏🏻
 Bhavna Sinha: कविता सर्वथा नूतन तरीके से लिखी गयी है अलग अलग विषयों को एक साथ जोड़ने और अलंकृत   करने में कविता समर्थ है। कवि को बहुत बहुत शुभकामनाएँ
💐💐
Madhu Saksena: अखिलेश की कविताओं पर क्या लिखूं ? ये अलग तरह की भाषा और विचार पर अपने विचार कहाँ से लाऊँ ? ये सब तो मैंने कविता के लिए सोचा ही नही था जो आज कविता में दिख गया ।
चाँद पर पानी ...... चाँद के रोने का अहसास हुआ कवि को ..फिर बूढ़ा भी हो गया चाँद ? फिर सप्त ऋषियों से टकरा गया उपग्रह .? फिर कूद कर आ गए ग्राम भुसना में परसु कहार के घर और पानी के छुआछुत का मामला ।लगा ...कितना अछलकुद कर रही  कविता ।कविता है या रिपोर्ट ?
पर बात में  दम है बात पानी से शुरू की और पानी पर ही खत्म ।बीच में दर्द की लकीरें ...गहरे तक अहसास हुआ ।प्यास लग आई ।आँख के पानी और पीने के पानी की कथा इति  श्री ।
मंहगाई ...चीनी ,गेहूं ,दाल  और चावल जैसी आवश्यक आवश्यकताओं की पूर्ति भी ना हो पाने की व्यथा ।सीधी बात कहीं नही  पर मजबूरी और व्यथा का सटीक चित्रण ।कवि पैनी नज़र रखते हैं ।
प्रेम .,.प्रेम की खोज  ज़ारी है ।खाप पंचायत और प्रेम के खिलाफ लोगो के बीच भी ।किस ज़मीन से उगी ये कविताएँ ? दुःख और खीज साथ साथ उपजती है ।विषय बदलती पर नट की तरह साधे रहती खुद को ।
पिता ...... ओशो याद आ गए ।अपने होने और अपने अस्तित्व को बनाये रखने का गर्व निहित होता है उस 'ना ' में ।अखिलेश की कविताएँ आसमान की सैर करती ,चाँद से बतियाती , सप्तऋषि का हाल जानती ज़मीन पर उतर कर पानी और महगाई की बात करती हुई बिलकुल अंतरंग होकर राज की बात भी बताती है। ये कूदती - फाँदती कवितायें पढ़ने में बाधा तो उतपन्न करती है पर फिर मुद्दे पर आकर राहत दे जाती है ।बधाई और शुभकामनाएं अखिलेश को ।
आभार एडमिन जी ।
 Manoj Jain Madhur: साकीबा----
के प्रबुद्ध मंच पर आज अखिलेश जी की चंद कविताएं पढ़ी,साथ ही
कविताओं पर ब्रज जी की संक्षिप्त टीप --
युवा हस्ताक्षर की पहली ही पस्तुति ने सभी को चौंका दिया--कवि के पास काव्य की अपनी अर्जित भाषा  मौलिकता है ,अनूठे और टटके बिम्ब हैं,
इसीलिये प्रस्तुत सभी कविताएं आपसे संवाद करती हैं और देरतक आपके साथ रहती हैं
और यही इन कविताओं की सार्थकता है --
फिलहाल कवि अखिलेश जी के उज्ज्वल भविष्य की कामना--
एडमिन ब्रज श्रीवास्तव जी का बहुत आभार इस सधी हुई प्रस्तुति के लिए।
 Vivek Nirala: टटके ताज़े बिम्बों से बनी भाषा को लेकर आए हुए इस संभावनाशील युवा कवि का स्वागत है। कवियों की बिरादरी में नवप्रवेशी इस कवि ने विज्ञान से लेकर जीवन-जगत में मनुष्य की रोज़मर्रा की ज़रूरतों और मुश्किलों तक के ओर-छोर परस्पर घंघोल दिए हैं। इस रसायन से यह केमिकल इंजीनियर कवि कविताओं का ऐसा विलयन बनाता है जिससे संतृप्त हो जाता है पाठक। मैं इस भिन्न प्रकार के कवि को बधाई भी देता हूँ और इसके माथे पर एक डिठौना भी धर देता हूँ कि इसे सर्वज्ञाता और सर्वसिद्ध समकालीन कवियों की नज़र न लगे। पुनः बधाई।
 Kavita Varma: चांद पर पानी कविता में जातिवाद पर करारा तंज किया गया है। मंहगाई कविता अपने आसपास के छोटे छोटे वाक्यों से उठा कर विस्तार पाती है और स्तब्ध कर देती है। प्रेम कविता के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं और पिता कविता पिता को अहसास में बदल देती है। सभी कविताएँ बेहद अच्छी और यादगार हैं। बधाई अखिलेश जी
 Pravesh soni: चाँद पर पानी ,
गज़ब कर दिया सच में भाई ।इस कविता में तो सबको टाँग दिया आपने लाइन से ।सप्त ऋषि भी, और धरती पर आये तो ठाकुरों को भी ।वैज्ञानिकों को तो शुरू में ही डपट दिया और हम बैचारे पाठक 😳😳😳
सच में बेहतरीन कविता है
इसके लिए हैट्स ऑफ
महँगाई
अच्छी है कविता पर कुछ अटक गया ,....चीनी के तीन दाने और बेगॉन स्प्रे
बात हज़म नही हुई भाई ।बेगॉन स्प्रे खरीदने में 2 किलो चीनी तो आसानी से आ जाती है ।
बाकि दाल चावल की गरीबी को पचा लिया क्योंकि उसके बिम्ब दिल में उतर गए ।😊

प्रेम ,कविता में प्रेम का दुर्लभ हो जाना सटीक लगा और अंत का तंज आँखों में एक सवाल छोड़ गया ..ऐसा है प्रेम का अंत तो उसे बिना खोजे ही कही छुपा रहने दो न ।

पिता ,कविता का कहन अद्भुद लगा ।
बधाई कवि आपके लिए अनंत शुभकामनाएं

HarGovind Maithil : चाँद पर पानी जहाँ एक ओर मानव विकास की बात करती है तो दूसरी ओर वर्ग भेद की चिंता को भी रेखांकित करती है ।
 सभी कवितायें सुन्दर बिम्बों से सुसज्जित और संप्रेषणीय ।
अखिलेश जी को बधाई और एडमिन जी का आभार ।
अलकनंदा साने :अखिलेश,  क्या कविताएं हैं , गजब!  मैं दुबारा यहाँ आई हूं और यह पहली बार हुआ है । पहली कविता विज्ञान से होते हुए सीधे सामाजिक परिस्थितियों पर तंज करती है  । अद्भुत । महंगाई में सबसे प्रभावी 'दाल' है । अरहर और लड़की का बिंब , मैं अंदर तक हिल गई । इन सबके बीच पिता चमकदार होते होते रह गई ।

ब्रज जी, रहम कीजिए दो/तीन दिन । कुछ भी लगाइए पर इतनी अच्छी कविताएं मत लगाइए । गुझिया, पपड़िया कब बनाएंगे ? महिलाओं पर अत्याचार है यह । 😀😀
Dinesh Mishra : अखिलेश जी
सारी कविताएँ बहुत अच्छी और सार्थक कविताऐं हैं।
चाँद पर पानी~ चाँद के बहाने से दिन रात होने वाले वैज्ञानिक शोध और प्रयोगों से भले ही बहुत कुछ हासिल हुआ हो, पर कुदरत ने जो खोया है, उसकी विस्तार से पड़ताल इस  रचना में की गई है, उपग्रहीय कचरे ने हमारी मान्यताओं के साथ साथ हमारे तारा मंडल तक को आहत किया है, कविता के आखिर में सामाजिक विषमता और पानी उपलब्ध होने की ख़ुशी पर भी चिन्ता की लकीरे उभरकर सामने आ रही है, की इसे पहले पियेगा कौन??
महंगाई ~ पूरी कविता पर्यावरण की फ़िक़्र में आकंठ डूबी हुई है, चिड़िया से लेकर पानी और पूरी कुदरत को लेकर सवाल उठा रही है।
प्रेम और पिता अंत की दो कवितायें बहुत सच्ची और अच्छी लगीं, चंद्रमा से मंगल तक प्रेम को खोजा जा रहा है, सब कुछ है सिवाय प्रेम के।
अखिलेश जी अनेकों बधाईया इस अनूठे नज़रिये और सच्ची कविताओं के लिए, प्रस्तुति के लिए भी धन्यवाद।
 Meena Sharma: अखिलेश जी  की सक्रियता, अल्हड़ संवाद , और कविताओं में यह गम्भीर लेखन में चाँद पर पानी को
वैग्यानिकों के विवरण से लेकर
अगस्त मुनि के कमंडल तक आकर बात करने वाले संभावनाशील कवि से आज एक नया परिचय हुआ !
मंहगाई के साथ चीनी की  एक अलग परिभाषा गढ़ते हुए दाल के पानी तक ठहरना बहुत मुश्किल है !
प्रेम को मिलकर खोजने से अगर मि जाता तो अखिलेश जी , ....
साहित्य की बात, ग्रुप सबसे पहले
आपके साथ चल पड़ता जहाँ आप ले जाते !
खेत खलिहानों के साथ, अरहर और लड़की का.औंधा बिछना ....
किस तरह ये बिंब उभरा होगा आपके
मन-मस्तिष्क में...आश्चचर्य चकित हूँ
पढ़कर ....!
पिता पर कुछ अलग से अर्थ भरी कविता पहली बार पढ़ी !
सामाजिक सरोकार और गहन चिंतन
उज्जवल भविष्य की ओर बढ़ती सीढ़ियों की ओर एक इशारा
है और सब समझ रहे हैं !!
एक सशक्त कवि का स्वागत !!
बधाई अखिलेश जी !
आभार ब्रज जी !!
पूत के पाँव पालने में दिखाने के लिए !!.💐💐
 Suren: चौथी कविता के कहन ने विशेष आकर्षित किया । इस कविता की ओर शायद कम ध्यान गया ,इसलिए इसका जिक्र कम हुआ ।

तो , ..... पिता   , कविता पर कहना चाहूंगा की कवि यहाँ कहन की व्यग्रता से प्रेरित होकर कविता के अंत तक आते आते जो डीराइव(derive) करता है वो पाठक को एक क्षण को थोड़ा चमत्कृत सा करता है कि पिता जो उसकी उतपत्ति में उसकी माँ के साथ हिस्सेदार होता है वह उसके स्वयं के आने की सूचना भर से माँ को ब्रह्मा/सृजनकर्ता के भाव से भर देता है और यही सूचना जब माँ , पिता को आलिंगन से ना कह कर इंगित करती है तो पिता उस क्षण को काम/वासना से ऊपर उठ जाता है । ये पिता का काम से परे उठ जाना ,संतान हित में उसके सम्भोग से समाधि की यात्रा में एक पड़ाव की भांति कवि का निष्कर्ष के रूप में निगमित करना इसलिए इररेशनल प्रतीत हुआ कि जिस आचार्य रजनीश का  टर्म यहां एक निगमित निष्कर्ष के रुप में प्रयुक्त हुआ है वह इसको जब निगमित करते है या कहे जब वह सम्भोग से समाधि के बीच के परास के मध्य सम्भोगकर्ता के ओर्गास्म/कामोन्माद के क्षण पर साक्षी भाव के क्रमशः अभ्यास से आने वाले भाव के  रीक्रिएशन को उपलब्धि/तथाकथित समाधि  का दर्जा दे कर ,श्रोता को भ्रमित करते है...... जबकि कवित्त यहां भ्रम को निरूपित करे ,ऐसा कवि की मंशा तो नही लगती ।

तो इस कविता में पिता का माँ की उस ना से सम्भोग से समाधि के मध्य एक पड़ाव निष्कर्षित करने की मंशा कविता को जैसा ऊपर लिखा  इक क्षण को चमत्कृत बिंम्ब तो देती है पर उस क्षण के बाद बस भाषिक चमत्कार की स्फुर्लिंग से पाठक मुस्कुरा ही सकता हैं ।


अखिलेश , हो सकता है इस कविता का मेरा पाठ आपको कंविंसिंग ना लगे पर इतना जरूर कहूंगा कि जो इस पाठ में अनकंविंसिंग लगे उसे जरूर साझा करें जिससे मैं भी अपने पाठ को दुरुस्त कर सँकू ।
Akhilesh: सुरेन सर
आप तो कवि मन के हर कोश तक पहुचते है आप से क्या छुपा है ..
पर मैने पिता का संतान हित मे काम से परे उठ जाने को एक पडाव के रूप मे नहीं सोचा क्योंकि वह क्षणिक है ।क ई बार मिथक सत्य लगने लगते है एक मिथक है संतान से मोक्ष को पाना । सो यदि मोक्ष पाना है तो पिता बनना अनिवार्य है सो पिता बनने की घटना एक पडाव जैसा है कि ये कंडीशन पूरी हो गई अब ये येऔर करगें तो मोक्ष मिल सकता है ..।
बाकी आपने जो दृष्टि दी है वो तो एक नयी कविता का बीज बन सकती है ।
आपका होना हमें समरि्दध करता है ँ
 Dr D. N. Tiwari: अखिलेश जी की कवितायें :
चांद पर पानी ,चांद को बूढा कहने की बजाय सुंदर कह देते भाई जी
कविता नं २ :
मंहगाई सभी चीजों का अच्छा विश्लेषण
नंबर ३
प्रेम :
अरहर और लडकी की तुलना ,भाषा अटपटी ।
नंबर चार पिता :-कुल मिलाकर अच्छी भाषा का प्रयोग है ।
ये मेरे निजी विचार हैं अखिलेश जी और अच्छी टीप का प्रयास रहेगा अगली बार ।

Anuma Aachary: "उपग्रही़ीय कचरा", सोने की चिड़िया पर विलुप्तप्राय गौरैया, दुशासनों की जमात.....हर सरोकार से सरोकार रखने वाले कवि को कड़क सैल्यूट है. "जज़्बा बरक़रार रहे" आपके लिये ये संदेश भी है और शुभकामना भी.
 एक तो दिन का अंतिम प्रहर और मेरी स्पीड.....न्याय नहीं कर पाई. Supplementary लेकर लिखूँगी
 Bodhisatv Ji: अखिलेश की सब कविताएँ अच्छी हैं, कल विस्तार से लिखूँगा, अच्छी कविताओं के लिए बधाई अखिलेश जी
 Avinash Tivari: अखिलेश जी ने चांद की बहुत अच्छी समीक्षा की है जिसमें केमिकल इंजीनियर होने का बखुबी परिचय दिया है। पानी का रासायनिक गुण पानी आने का कारण उपग्रह का चांद की सतह सेे टकराने जैसी तकनीकी रिपोर्ट और फिर चांद का मुंह टेढ़ा होने का कलात्मक कारण और इससे बढ़कर वैज्ञानिक प्रयोग उसे चांद की सतह पर बढ़ते प्रदूषण की चिंता सब कुछ अद्भुत और मजेदार है चांद पर पानी मिलने से परसू कहार मगन है इसी तरह जिस तरह कि हम जैसा जनता मगन हैं अच्छे दिनों के विवाह संजय वाह सपनों
 अच्छे दिनों के दिवा स्वपनों में, गरीबी हटाओ के नारों में समाजवाद में साम्यवाद मैं धार्मिक मकड़ जाल में जकड़े हुए हैं। पानी क्या प्रकृति के सभी संसाधनों पर पहले पैसे और ताकत वाले रसूखदारोंका कब्जा रहता है वे सभी ब्राह्मण नहीं होते अमेरिका रुस चीन जर्मनी इंग्लैंड जापान यह सभी अंतरिक्ष समुद्र धरती सब पर यथा शक्ति अधिकार जमा हुए हैं बकौल अखिलेश ये सब ब्राम्हण हैं फिर उनसे कमजोर क्रमशः ठाकुर  वैश्य शूद्र जैसे आते हैं।गरीब और निम्नमध्यम वर्ग और गरीब देश तो शूद्रों की श्रेणी में आते हैं,इनका नम्बर भी संसाधनों पर सबसे बाद में और बहुत जरूरी समझे जाने पर लगता है।अखिलेश जी ने चांद पर बहुत अच्छा लिखा है।
महंगाई चीनी दाल चावल गेहूं महंगाई को अलग दृष्टि से देखती कविता है किंतु कविता को आकर्षित बनाने के लिए हमेशा की तरह हमारे धर्म देवी देवता को कोसने का निर्मम प्रयास किया गया है अच्छा लिखने वाला वाले ऐसा नहीं कर के भी बहुत अच्छा लिख सकते हैं अखिलेश जी भी इससे अछूते नहीं है।
प्रेम बहुत अच्छी रचना है एक-एक शब्द अर्थ पूर्ण और सीधा दिल को चोट करने वाला है आखिरी  भाग तो बहुत  ही मार्मिक है।
पिताभी उतनी ही अच्छी रचना है स्त्री पुरुष सृष्टि के सृजनकर्ता हैं। स्त्री पुरुष के प्रेम के रसायन को विज्ञान तो अभी तक डी कोड नहीं कर पा रहा है परंतु हदय की प्रयोगशाला में यह हमेशा से डिकोड होता आया है और संभोग से समाधि तक के सफर में एक दूसरे का हाथ थामे चलते रहे स्त्री पुरुष इस कविता में पिता को महत्व दिया गया है जबकि सृजन में दोनों का महत्व समान लगता है।
अखिलेश जी आपने बहुत अच्छा लिखा है प्रतिक्रिया मेरे अपने विचार है आप इससे भी अच्छा लिख सकते हैं।आप भविष्य की संभावना है बहूत बहुत शुभकामनाऐं।एडमिन जी संचालक जी आपको धन्यवाद आभार।।

Sarad Kokas : चाँद पर पानी कविता की शुरुआत एक यथार्थ से होती है जो बिम्बों में ढलते हुए कल्पना के आवरण में फिर विगत के यथार्थ तक ले जाती है कविता यथार्थ और फैंटेसी के मेल के साथ आगे बढती है चाँद पर पानी के साथ कुछ मिथकों का प्रयोग भी किया गया है लेकिन यह असावधान प्रयोग है , चाँद के बारे में अनेक प्रचलित मिथक हैं यदि उनका प्रयोग होता तो ठीक होता पिछले दिनों ...... इन पंक्तियों में फैंटेसी का अच्छा प्रयोग है लेकिन इसे थोड़ा और विस्तार चहिये था , दरअसल फैंटेसी बिम्बों से बिलकुल अलग कला होती है , दोनों का घालमेल नहीं होना चाहिए . उसी तरह कविता का अंत लाजवाब है , यह पूरी वर्ण व्यवस्था पर तंज़ है लेकिन यह हिस्सा भी कविता में अलग से जुड़ा हुआ लगता है . अगर कविता को वर्णव्यवस्था पर प्रहार तक पहुंचना है तो उसका प्रारंभिक कथ्य कुछ भिन्न होगा , कविता एक साथ कई मुद्दों को लेकर बात करती है लेकिन किसी भी मुद्दे का पूरी तरह निर्वाह नहीं हो पाता , बेहतर होगा इसे ठीक तरह से विस्तार दिया जाए .
 दल चावल चीनी अच्छी कविताएँ हैं , इस श्रंखला में और भी कविताएँ लिखी जा सकती हैं , जिनमे किसान का श्रम , राजनेताओं द्वारा रुपये दो रुपये किल में गेहू चावल बेचने की राजनीती जैसे विषय शामिल किये जा सकते हैं .

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 साहित्य सम्मेलन,"साहित्य की बात" 17-18 september 2022 साकिबा  साकीबा रचना धर्मिता का जन मंच है -लीलाधर मंडलोई। यह कहा श्री लीलाधर...

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