Friday, March 25, 2016


तक़सीम



प्रज्ञा 




ये शहर भी अजीब हैं न अनोखे? लाख गाली दे दिया करें रोज मैं और तू इन्हें पर इनके बिना तेरे-मेरे जैसों का कोई गुजारा है बोल? कितने साल बीत गए हम दोनों को यहां आए। अब तो ये ही दूसरा घर बन गया है हमारा। हम रहते यहीं हैं, कमाते-खाते यहीं, यारी-दोस्तियां भी अब तो यहीं हैं बस एक परिवार ही तो गांव में हैं। याद है न तुझे शुरू-शुरू में मन कैसा तड़पता था कि थोड़े पैसे जोड़ें और भाग लें अपने गांव। कुछ भी न सुहाता था मुझे तो यहां का। आज से कई साल पहले जब आया था तो कुंवारा था। होगा कोई सोलेह-सत्रह का। बस पूछ न ऐसा लगता था कि कोई रेला बह रहा हो शहर में। रेला भी कैसा कि बस सब एक-दूसरे को बिना पहचाने भागे जा रहे हों। हर समय अम्मी का चेहरा याद आया करता और खाने के नाम पे रूलाई छूट जाती। एक कमरे में चार-पांच हम लड़के। न कायदे का बिछौना, न खाना। पांच लोगों के कपड़ों-बर्तनों से ठुंसा एक जरा-सा कमरा। मजबूरी जो न कराए थोड़ा। गंदी- सी बस्ती, बजबजाती नालियां। अब तो फिर भी मोटर की सुविधा हो गयी है नहीं तो पहले दो-एक नल। बस... वहीं नहाना, पानी भरना। मार तमाम गंदगी और शोर-शराबा, आए दिन के लड़ाई -झगड़े।’’

‘‘ तो अब क्या सब खत्म हो गया है? गंदगी के साथ लड़ाई-झगड़े तो और बढ़े हैं बस्ती में। मर्द-लुगाई कुत्तों की तरह लड़ते हैं यहां। कौन से हीरा-मोती जड़े हैं जो सब चिपके हैं यहां से?’’

जमील को अनोखे की आवाज सुनाई ही नहीं पड़ रही थी बस होंठ हिलते दीख रहे थे। उसका मन अतीत के गलियारे में जो एक बार दाखिल हुआ तो समय आज से पीछे न जाने कितने वर्षों की यादों में खोने लगा।

‘‘मुझे नहीं जाना शहर अम्मा। यहीं फेरी लगा लूंगा मैं भी अब्बा की तरह। मना कर दे तू उनसे। पहले भी खालू के काम में क्या-क्या न सुनने को मिला था, भूल गई तू।’’

‘‘ न जमील, मेरे बस की नहीं है उनको समझाना। समझदार होके कैसी बातेें करता है तू। देखता नहीं यहां क्या कमाई है। जिनके पास मौके की जमीने थीं वो सब हाईबे निकलने से अच्छे दाम कमाकर शहर चले गए। उनके रहते काम-धंधा ठीक चलता भी था अब फेरी के काम में वो बात कहां रही? कोई दिन ठीक बीत भी गया तो कई दिन के फाके। फिर कोई जमीन है नहीं हमारे पास जो जोते-बोएं, कमाएं-खाएं। जानता नहीं है रे तू हारी-बीमारी, ब्याह-शादी जीवन के सब तौर-तरीके निभाने पड़ते हैं। इस कमाई में दो पैसे बचाना तो दूर खाना मिल जाए बड़ी बात।... नहीं आज नहीं तो कल तुझे जाना ही पड़ेगा। मैं कुछ न कहूंगी उनसे।’’

उत्तर-प्रदेश में खतौली के पास छोटे से गांव का रहने वाला था जमील। न पढ़ा-लिखा और न ही जमीन-जायदाद वाला। उसे तो मुफलिसी में बीता बचपन भी बड़ा शानदार लगता। दिल में उमंग और दिमाग में अब्बा की जेब की राई-रत्ती चिंता नहीं। सारा दिन घुमक्कड़ी,पोखर में डुबकियां और खेल-कूद। जरा बड़ा हुआ तो अब्बा के साथ फेरी पर जाना और वहां भी मस्ती। घरों से निकले पुराने कूड़े-कबाड़ से उनके दिन जगमगाए रहते। पुराने कपड़े, जूते, बर्तन,कागज, खाट की पैबंद लग-लग कर घिस चुकी निवाड़ें, लोहा-लक्कड़ उठाने, बोरों में भरने में अब्बा की मदद करता था जमील। उन्हें बिकवाने कस्बे में जाता और फिर वहां से आकर अपनी पुलिया पर। बड़ा होते ही ये पुलिया उसका स्वर्ग हो गयी थी जहां अशरफ, युसुफ, उमेश और रामफल के साथ उसकी महफिल जमती। दुनिया भर की गप्पें, हंसी-ठठ्ठे,मन के छिपे राज की साझेदारी, साथ जवान हो रही लड़कियों के किस्से-कल्पनाएं और सुनहरे जीवन के सपने। घंटों-घंटों ये पुलिया उनके सपनों से आबाद रहती। आपस में लड़ते भी थे पर जल्दी सुलह भी हो जाती।
: इस बार अम्मा-अब्बा पूरा मन बना चुके थे जमील को शहर भेजने का। बस रहमत चाचा का आना बाकी था इस बार जैसे ही आएं जमील उनके हवाले। अम्मा के मायके के रहमत चाचा कई बरसों  से दिल्ली में बसे हुए थे। उनके आने में अभी समय था। इधर कुछ समय से गांव में अजीब-सी हरकत दिखाई दे रही थी। अचानक गोधरा-गुजरात का शोर बढ़ रहा था। ठीक वैसे ही जैसे कई साल पहले मचा था। तब राम मंदिर बनना था और राममंदिर बनाने की जमीन के लिए बाबरी मस्जिद तोड़ी जानी थी। हिंदुओं ने एक रूपया-एर्क इंट की फरमाईश कर दी थी गांव भर में। कार-सेवा के लिए चंदे और लोग मांगे जाने लगे थे। गांव के कितने किशोर उस रेले में शामिल हुए उस दफा। इस बार शोर वैसा ही था और माहौल में सनसनी फैली थी।

‘‘ बदला तो हम लेके रहेंगे। छोड़ेगें नहीं। समझ क्या रखा है?’’- उमेश का स्वर बड़े दृढ़ निश्चय के साथ निकला।
अखबार और टी.वी. की खबरें गांव भर में फैल चुकी थीं। खबरों पर सवार जलजला गांव में दाखिल हो गया। गांव में हिंदू-मुसलमानों की संख्या बराबर थी पर देश में किसका पलड़ा भारी है हर कोई जानता था और इसी बीच हिंदू नौजवानों को अपना देश और अपना धर्म बचाने के रास्ते पर डाल दिया गया था। इनमें से कई भटके नौजवान अपने बचपन के दोस्तों से देश में रहने और देशभक्ति की कीमत अदा करने की बात करने लगे। उस दिन जमील, युसुफ से भी उमेश इसी हक से बात कर रहा था। पुलिया पर बैठना मिनट-मिनट भारी हो जमील और युसुफ के लिए। एक काला सन्नाटा तारी था वहां। उस सन्नाटे में वीर पुरूष की तरह प्रकाशवान था उमेश, रामफल परेशान था और जमील-युसुफ अकारण ही कठघरे में खड़े कर दिए गए थे। ये प्रकाश अंधेरे को भयभीत कर, और स्याह कर रहा था। उस दिन तो रामफल ने किसी तरह किस्सा निबटवाया पर उमेश की ठसक बरकरार थी। आज सुलह का रास्ता नदारद था।

घर लौटते समय  जमील ने महसूस किया कि आतंक का साया उसके पीछे चला आया है। घर पहुंचा तो खालू और खाला आए हुए थे। खाला ने उसे देखते ही गले लगाकर माथा चूमा, शमशेर खालू की दबंग आवाज में किस्से जारी थे  खालू जबरदस्त किस्सागो थे और गांव से जाने के बाद भी उनका रसूख आज भी यहां कायम था। गांव के बड़े-बूढे़ बड़ा मान देते थे उनको। शमशेर जहांगीराबाद चला गया था अपने परिवार के साथ। उसका बढ़ईगिरी का धंधा जम गया था वहां। पहले कारीगर था अब तो सालों बाद छोटे-मोटे ठेके मिलने शुरू हो गए थे। एक बार जमील को भी ले गया था अपने संग पर उससे तो आरी ही न सधी। रोज़ साथ काम पर ले जाता शमशेर उसे। जमील को बिठा भी देता। जमील उठाई-धराई के काम तो कर देता पर लकड़ी न चिरती उससे। मालिक जब उसे ठलुआ देखता तो उसका भी पारा चढ़ता। हिकारत की नज़र ही नहीं हिकारत के शब्द भी जब मुक्त हो गए तो जमील का दाना-पानी उठ गया वहां से। इस काम में मन नहीं लगा जमील का।

खाने के बाद खालू ने भी बाबरी मस्जिद के समय की बात उठा दी।
‘‘वोट की राजनीति में अब तक पीसे जा रहे हैं भईया। मुसलमान होने का कर्ज चुकाओ और चुप रहो-यही तो सिखाया जा रहा है न। हम कुछ न बोलें तो देशभगत और बोलें तो पाकिस्तानी। कौन है यहां पाकिस्तान का जरा बताओ? हमारे-तुम्हारे बाप-दादा तो इसी मिट्टी के रहे और बोलो हम-तुमने कभी देखा है पाकिस्तान? कभी जाने की सोची है वहां? ’’ खाट पर औंधे लेटे खालू अब्बा से बोले।

‘‘ और मस्जिद तो अल्ला का घर ठहरा फिर उसे क्यों तोड़ा था उन्होंने? सैंतालीस के तक्सीम किए आज भी अलग ही पड़े हैं हम।’’ अब्बा के सवाल में छिपे डर को पहली बार महसूस किया जमील ने। पर तक्सीम की बात जमील को कुछ ज्यादा समझ में नहीं आई। वह सोचने लगा ‘‘सन सैंतालीस.... कित्ते बरस हो गए होंगे चालीस-पचास या उससे ज्यादा पर तक्सीम.... बंटवारा...?
... और आज...आज क्यों तक्सीम की बात कर रहे हैं अब्बा? उमेश की आज की बात से पहले तो मुझे रामफल और उमेश अपने से अलग न लगते थे  मुझे क्यों नही दिखा ये बंटवारा?’’

‘‘हक की लड़ाई है भाई! वरना हमारे गांव की मजार पर हिंदू मन्नत नहीं मांगते। धूप-अगरबत्ती न जलाते? बाबरी के बाद भी। इतने सालों में हुआ यहां कोई झगड़ा तुम्हारे देखे? और वहां जहांगीराबाद का ही सुन लो न जबसे गया हूं सब ठीक ही चल रहा था कोई झगड़ा न था धर्म के नाम पर। बाबरी मस्जिद के समय की बात है कुछ बाहरी लोगों ने हिंदू-मुस्लिम के नाम पर भड़का दिया। अब जान लो कि ये सदियों का नाजुक मामला ठहरा और सदियों से भड़कते आए लोग फिर भड़क गए। दोनों भूल गए बरसों पुराने अपने रिश्तों को और मार-पीट पर उतारू हो गए। जवान लड़के जिनके न कोई काम न धंधा गुटबाजी में लग गए और भड़काने वाले न इधर कम थे न ही उधर। दोनों तरफ हथियारों की होड़ मचनी शुरू हो गयी। इन जवानों के मन में भड़की आग देखके परधान को लगा कि अनर्थ हो जाएगा। दंगा हो गया तो घरों के चिराग बुझकर मातम में बदल जाएंगें। अरे बड़े तरीके से संभाला भइया उसने तो। मार-काट का अंदेशा होने पर उसने कही कि ‘जब लड़के ही फैसला करना है तो लड़ो पर खबरदार कोई बाहर का आदमी न लड़ेगा। आज जाओ सारे गांव वाले, शाम को मैदान में अब लड़कर ही फैसला ले लो।’’

 शमशेर की बात को सब दम साधकर सुन रहे थे। जमील के मन में वैसी ही उथल-पुथल मच रही थी जैसे उस दिन गांव भर के लोगों में मची होगी। उस दिन शाम तक कितने घर झंझावातों से हिल गए होंगे? कितनी खलबली, कितनी तैयारियां और फिर जीता कौन? जमील का मन निचावला न था, उसकी आंखों से ‘फिर क्या’ का इशारा पाकर शमशेर ने सांस खींचकर दोबारा कहानी का सिरा आगे बढ़ाया-‘‘ तो भइया हुआ ये कि जहां शाम को मार-काट की बन आई थी हुआ एकदम उलटा ही। मांओं-बापों ने मुसीबत समझ कर धमका दिए अपने लाडले। बड़ों ने समझदारी दिखाई जनम-मरण के बरसों पुराने साथ ने सबको चेता दिया और फिर हाय-हत्या से उजड़ जाने वाले सबके काम-धंधों पर मंडलाता खतरा नहीं था क्या? और लो शाम को चिड़िया का बच्चा तक न फटका मैदान में। परधान की बात का ऐसा असर पड़ा कि सबके होश ठिकाने आ गए। आखिर कौन चाहता है बेबात की लड़ाई। रोज हिंदुओं को हमसे काम पड़ता है और हमारा उनके बिना गुजारा नहीं। इत्ती पुरानी दोस्तियां और लेन-देन ठहरा। जानते हो जब काम से दिल्ली जाता था बड़े ठेकों के लिए तो कितने पंडत दोस्त शहर आते और फरमाईश से मीट-मुर्गा पकवाते। झककर खाते थे सब। बस जहांगीराबाद में तो उस दिन सब कुशल की अल्ला और राम ने। अब फिर ये नई मुसीबत है गोधरा की।’’
आखिरी बात को अनसुना करते हुए जमील के मन को अपार संतोष मिला। ऐसा हौसला जागा कि अभी जाए उमेश के घर जाए बताए उसे पूरी कहानी। उसका मन को जहां राहत मिली थी  उसने महसूस किया कि अब्बा पहले से तो जरूर कुछ ठीक लग रहे हैं पर उनकी चिंता मिटी न थी अब तक।

अगले दिन पता चला कि उमेश कई और लड़कों के संग गायब है। रामफल ने बताया उस पर भी संग चलने का बड़ा दबाव था लेकिन रामफल पर घर की सैंकड़ों जिम्मेदारियां थीं तो उसने बड़ी मुश्किल से जान छुड़ाई । गांव में यों तो सब शांत दिखता था पर धरम की बातें खुलकर नहीं होती थीं अब। पहले की तरह। एक बिना लड़ी लड़ाई चल रही थी जो ज्यादा खतरनाक थी। एक भारी-जानलेवा सा माहौल। इन दिनों पुलिया भी जमील को न सुहाती। उमेश था नहीं और युसुफ और रामफल के काम अचानक ही अधिक बढ़ गए थे। यों तो जमील पहले भी पुलिया पर कई बार एकांत का सुख उठा चुका था पर अब वह एकांत डराता और हौआ- सा खड़ा करता । इस बीच उमेश लौट आया और दिन-दिन भर हिंदू धर्म की महागाथाओं के किस्से सुनाया करता । साफ पता चल रहा था कि किसी बड़े हिंदू जलसे में शामिल होकर लौटा है। अपने धरम की जयजयकार और बाकी सब को दुत्कार रहा है। जमील जैसों के लिए गहरी नफरत और हिंसा उसकी आंखों में ऐसे ही नहीं उग आई थी। आज कौन कह सकता था कि ये जिगरी दोस्त थे कभी? उससे आमना-सामना होने से जमील भी कतराने लगा अब तो। कहीं मन न लगता था। युसुफ से भी एक दिन अच्छी कहा-सुनी हो गयी उसकी।

‘‘ अरे चल न मेरे संग। जब ये लोग अपना धरम बचाने को कूद रहे हैं तो हमें भी एक होना होगा न। जब मार-काट, आगजनी के इल्जाम धरे ही जा रहे हैं हम पर तो पूरा करके ही दिखा देते हैं... चल न... जाकिर भाई बहुत सच्ची बातें बोलते हैं । आखिर को सगे हैं हमारे। चल बुलाया है उन्होंने। ’’

युसुफ के शब्दों से आग लग गई जमील को। जाकिर के मन में भरे जहर से वो वाकिफ था फिर जाकिर यों भी उसे पसंद न था। मुसलमान लड़कों को घेरकर अल्ला के नाम पर उनका लीडर बना रहता था जाकिर। जमील ने युसुफ को समझाने की को़शिश की पर बात-बात में मामला बिगड़ गया। जमील की मर्दानगी को चुनौती देता युसुफ अपनी राह चला गया। रोज ही एक उदास सुबह से शुरू हुआ जमील का दिन निराश रात में बीतने लगा। जहां से जाने की कल्पना उसमें अजीब सी सिरहन भर देती थी आज वो इस जगह से भाग जाने की सोचने लगा। और फिर सब कुछ भांपकर मां-बाप ने उसे रहमत के हवाले कर दिया। रहमत उसे दिल्ली ले आया।

‘‘देखो बेटा अब जो भी है यही सच है कि तुम अब तरीके से कमाने की सोचो। मां-बाप का सहारा बनो। रहने-ठहरने की थोड़ी बहुत रकम दी है तुम्हारे अब्बा ने पर खुद न कमाओगे तो खाओगे क्या और घर क्या भेजोगे? कमरे का इंतजाम कर देंगे। कई जन साथ रहेंगे। मिलजुल के रहते हैं यहां तो तुम भी रहो। फेरी के काम में मन लगता है न तुम्हारा तो एक जगह बात कर ली है। कल लिवा ले चलेंगे। अपना काम समझो और करो। कोई परेशानी होगी तो हम हैं ही यहां।’’

नई जगह को अभी समझ नहीं पाया था जमील पर जिम्मेदारी समझ आ गई थी। यों जीवन से बहुत बड़ी उम्मीदें तो नहीं थीं उसकी। हां रहे थे कुछ सपने जो पुलिया पर बैठे बड़े रंगीन और शानदार लगते थे। पर अब न तो पुलिया रही न पुलिया के सपने। पुलिया की हवाई कल्पनाओं के बरक्स आज कई ठोस हकीकतें जमील के आगे थीं जिनका सामना उसे अब अकेले ही करना था।

‘‘ रद्दी..ई.ई..पेपर’’ की आवाज से गलियों-गलियों घबराता सा घूमने वाला जमील थोड़े ही दिन में सब ठिकानों का आदि हो गया। घरों, मोहल्लों की उसे सही पहचान हो गयी थी। भाव-तौल का पक्का, देखने-सुनने में अच्छा और फालतू किसी से बोलना नहीं। गंदी बस्ती में रहने के बाद भी साफ-सुथरा बनके रहता। यों रोज नहाने की आदत तो उसकी बचपन से ही थी। यार-दोस्त छेड़ते-‘‘अरे पिछले जनम में बामन रहा होगा तू?’’ रद्दी बेचने के ठिए भी उसने जल्दी ही जान लिए। रोज के सामान को रोज ही ठिकाने लगाने का नियम बना लिया था उसने। कुछ बरसों में काम जमा लिया जमील ने। अब पैदल नहीं एक साइकिल थी साथ में और हाथ में एक घड़ी भी। शहर की हवा उसे भी छू रही थी। जमील को ये छुअन भली लगती पर हवा में बहना उसे पसंद न था। शहर की अपनी छूट भी थी कि किसी को उसके धरम से कुछ लेना न था, सबको अपने काम से मतलब। संगी-साथियों का भी धर्म मजदूरी था और जात दिहाड़ी मजदूर थी। अपने-अपने घरों से उखड़कर अब सबने अपने ये जो छोटे-छोटे घर बना लिए थे तो सब होली-ईद मिलकर मनाते थे। हां धरम के नाम पर एक-दूसरे का खुलकर मजाक उड़ाते और पूजा-पाठ का अगर समय निकलता तो वो भी कर लिया करते।

‘‘अबे पहली शादी कब कर रहा है तू?’’
‘‘क्या मतलब?’’
‘‘पहली करेगा तभी तो तीन और कर पाएगा न यार। तुम्हारे में तो खुल्ली छूट है।’’

‘‘ साले इस कमाई में एक को पाल लूं तू चार की बात करता है। हमने तो नहीं देखी अपने यहां किसी की चार शादी । तूने देखी है क्या? ’’ मजा लेने के लिए यों सब हंस लेते ।


अचानक एक दिन मोहल्ले की शांत- सी जिंदगी में हलचल मच गई। रात ही रात में किसी ने कोठियों के आगे खड़ी दो बड़ी गाड़ियों के टायर और एक का स्टीरियो निकाल लिया। डाॅ. यादव की गाड़ी तो एकदम नई थी तो गुप्ता जी की गाड़ी भी चंद साल पुरानी थी पर टायर अभी बदले गए थे। सुबह से ही पुलिस की गाड़ियां खड़ी थीं और पूछताछ चल रही थी। ड्यूटी पर तैनात एक गार्ड भी आज गायब था।

‘‘ एक दिन में नहीं हो सकता ये कारनामा साहब। बड़े दिनों की प्लैनिंग है।’’ घटनास्थल पर मौजूद लोग आपस में बतिया रहे थे।

‘‘ गलती आप सबकी है। मैं कितनी बार कहा पर आप लोगों ने ध्यान नहीं दिया। कभी रात ही रात में नालियों पर ढके, ढक्कन गायब हो रहे हैं। कभी एक-एक करके बच्चों की मंहगी वाली साइकिलें। पर किसी ने परवाह की? बैठे रहो जब तक आग आपके घर को नहीं लगती। पर फिर ये शिकायत न करना कि कोई नहीं आया मदद को। हम क्या पागल हैं कि आज जब कोई हमारा साथ नहीं दे रहा तो हम कल उसके साथ खड़े होंगे ?’’ गुस्से में गुप्ता जी क्या बोले जा रहे थे उन्हें होश नहीं था ।

सारे लोगों को कठघरे में खड़ा कर दिया था गुप्ता जी ने और लोगों पर भी अब नैतिक जिम्मेदारी आ गई थी । लोग कुछ कर तो सकते नहीं थे पर अपनी बातों से गुप्ता जी और डाॅ. साहब को ढाढस तो बंधा ही सकते थे। और सबसे बड़ी बात लोग इस समय अपनी पूरी संवेदनशीलता के साथ खड़ा दिखाई देना चाहते थे। चोरी की इस वारदात ने सबको सचेत कर दिया था। सबको अगला नम्बर अपनी ही गाड़ी का आया लगने लगा।

‘‘काम तो उसीका है जिसने यहां घरों को बड़े ढंग से आॅब्ज़र्व किया है। और ये बात भी पक्की है कि गार्ड ने उसकी मदद की है।’’ लोगों ने दोनों की परेशानी को अपनी परेशानी मानकर बोलना शुरू किया।

‘‘आज गाड़ी पर हाथ साफ किया है, कल घरों पर करेंगे देख लेना। ’’  लोगों के तनाव और बेचैनी के साथ मुहल्ले में आमदरफ्त भी बढ़ गई थी। रोज के काम तो आखिर अपनी ही गति से चलने थे। पुलिस तफ्तीश अभी जारी थी। मोहल्ले में काम करने वाली महरियों से लेकर दूध, सब्जी वाले, घरों में चिनाई-पुताई करने वाले मजदूरों के संग ‘रद्दी पेपर’ की हांक लगाता जमील भी रोज की तरह समय पर आ गया। भीड़-भाड़ देखकर सब जानने के लिए वह भी भीड़ का हिस्सा बन गया। डाॅ. साहब के रसूख और पुलिस महकमे में खासी जान-पहचान से इनक्वायरी की गंभीरता के मद्देनजर पूछताछ के लिए कुछ लोगों को निकट के थाने में ले जाया जरूरी था। पूछताछ के लिए कुछ लोगों के साथ जब जमील का नाम लिया गया तो वो सकते में आ गया।

‘‘मैं क्यों? मैंने क्या किया है? मेरा क्या लेना-देना इस सबमें?’’ उसके मन ने कई सवाल किए। पर जाना तो था ही। घबराहट के बावजूद उसकी मुद्रा बेधड़क थी ,कोई अपराध नहीं किया था उसने।

‘‘सवाल ही तो पूछेंगे न पूछ लें। मैं कोई मुजरिम थोड़े ही हूं। हां दिहाड़ी तो खोटी होगी आज।’’ आगे की घटना का अनुमान लगाकर उसने अपने मन से ही सवाल-जवाब का क्रम तैयार किया। थाने में पूछताछ के दौरान जब जमील का नम्बर आया तो वह पूछे गए सवालों का सही-सही जवाब दे रहा था। इतने में डाॅक्टर साहब ने चौकी पर तैनात थानेदार से कहा-
‘‘यू नो दीज़ पीपुल... दे आर बाॅर्न क्रीमिनल।’’ अंग्रेजी  उसके पल्ले नहीं पड़ी पर हाव-भाव से समझ गया बात कुछ उसके विरोध की ही है। डाॅक्टर साहब के कथन पर थानेदार ने बड़ी तेजी से अपना सर हिलाया और सवाल जारी रखे-
‘‘ तो ये बता कहां बेचता है तू अपना माल? पुराना कबाड़ ही बेचता है या गाड़ी के टायर-टूयर भी? और ये बता स्टीरियो कहां बेचता है ?’’ जमील की बलिष्ठ शारीरिक संरचना को ताड़ते हुए थानेदार बोला।

हैरत में पड़े जमील को जैसे सुनाई देना बंद हो रहा था। अपनी पूरी शक्ति से वह अपने कान और ध्यान सवालों पर लगाने की कोशिश करने लगा। शरीर में जैसे खून का दौरा किसी दबाव से रूक गया हो और उसकी सारी चेतना जड़ता में तब्दील होने लगी। बिना सबूत,गवाह, कोर्ट-कचहरी के जमील को सीधे-सीधे दोषी करार दिया जा रहा था। इस अपमान के बावजूद अपनी जड़ होती जा रही इंद्रियों को जबरन सचेत करते हुए, सामने बैठे लोगों से कोई सवाल न करते हुए भी उसे जवाब देना जारी रखना था। उसकी नजर में यही उसके बेगुनाह होने का अकेला रास्ता था।

‘‘जी मैं तो सिर्फ रद्दी-लोहा,प्लास्टिक ही उठाता हूं घरों से....ऐसी चीजें कहां।’’ टूटे हुए मन से जमील ने कहा।
‘‘ और जो उठाएगा भी तो क्या तू इतना संत आदमी है कि हमें बता देगा? और कौन-कौन साथ हैं तेरे,  इस धंधे में?..बता?’’ थानेदार की आवाज गरजी ।

साथ बैठे बेलदार प्रकाश से रहा न गया-‘‘साब! ये बेकसूर आदमी है। मैं जानता हूं इसको। मेरे साथ रहता है।’’
 मुसीबत के वक्त प्रकाश के इन शब्दों ने सच में अंधेरे को चीर दिया। पर अगले ही क्षण थानेदार हरकत में आ गया। सीट से उठकर एक भरपूर थप्पड़ पड़ा प्रकाश के गाल पर।

‘‘ अबे तू क्या राजा हरिश्चंदर के खानदान का है?, जो तुझ पर विश्वास कर लूं। और साले तुझे कौन जानता है यहां? बिहार से आया है या यूपी का है? तू भी इसके संग शामिल है क्या चोरी में?’’ प्रकाश थानेदार का मुंह ताकता रह गया। गाल पे पड़े तमाचे से उभर आईं लाल परतों के किनारे खौफ की सफेद परत भी खिंच गई थी।

 जमील सब समझ रहा था ये थप्पड़ उसीके नाम का है जो प्रकाश को पड़ा है। लंबी,उबाऊ कार्यवाही से संतुष्ट होकर डाॅक्टर साहब चल दिए। आज हाॅस्पीटल में उनकी ओ.पी.डी. थी और गुप्ताजी को भी पुलिस के आसरे न बैठकर गाड़ी दुरूस्त करानी थी। थानेदार ने इतना सच तो बता दिया था उन्हें कि कुछ मिलने की उम्मीद न रखें पर समझौता इस बात पर हुआ कि इन लोगों को सस्ते में न छोड़ा जाए । इनको मिली सजा, सबक बने औरों के लिए। कुछ मजदूर भी भेज दिए गए पर जमील, प्रकाश और गार्ड को नहीं भेजा गया। अपमान के साथ-साथ आज की दिहाड़ी मारे जाने का भी जमील को दुख था। और अब कल से कौन बुलाएगा उसे अपने घर कबाड़ लेने? इस थुक्का-फजीहत से निकल भी गया तो थाने की कहानी कई दिन चलेगी और फिर डाॅक्टर साहब और गुप्ता जी अब क्या उसे जमे रहने देंगे वहां? कितने सवाल जमील पर अपना शिकंजा कसते ही जा रहे थे। और सबसे बड़ा सवाल तो यही था इस बेबात की कैद से कब छूटेंगे?

उन तीनों को एक कोने में मुजरिम की तरह बिठा दिया गया। बरसों पहले उमेश के चेहरे पर जिस नफरत को जमील ने पाया था वही आज और धारदार होकर थानेदार के चेहरे पर उग आई थी। एक नाम, सिर्फ एक नाम की वजह से जमील मुख्य अपराधी मान लिया गया था और उसके साथ बैठे दो लोग अपराध को अंजाम देने वाले उसके साथी के रूप में बिठाए गए थे। उसके मन में बरसों पहले की अब्बा की बात लहर की तरह उठी ... तक्सीम। जब शहर आया था तो उसने सोचा था यहां किसी को किसी के जात-धर्म से कुछ लेना-देना नहीं है। राजधानी का खुलापन उसने इसी रूप में महसूस किया और सराहा था। पर आज की घटना ने उसके सामने एक बड़ा सच ला खड़ा किया कि बातें जब तक ढकी-छिपी रहें सब बहुत सुंदर दिखाई देता है। परत उघाड़ दो तो हर जगह एक बजबजाता नाला ही है और कुछ नहीं।

 अपमान और आतंक की परतें तनिक शिथिल हुईं तो भूख की मारी आंतों ने मुंह उठाया। पर यहां कौन सुनेगा? सुबह से शाम होने को आई। सब तो पूछ डाला, अब क्या? इतने में रहमत चाचा के साथ ठेकेदार संतोष आता दिखाई दिया। संतोष का आना-जाना है इन थानों में। कहीं कोई अवैध निर्माण करवाता है तो मालिकों से थाना-पुलिस की झोलियां वही तो भरवाता है। जमील और प्रकाश समझ गए कि यहां से छूटे मजदूरों ने ही ये दूर की कौड़ी खोज निकाली है। उम्मीद और बेचैनी की कसमसाहट माथे पर खिंचती चली जा रही थी। आखिरकार वही हुआ। यहां भी संतोष ने पुलिस की झोली भरवाई। पूरे दिन की उनकी ‘मेहनत’ जाया नहीं हुई। अच्छी कमाई हुई।


‘‘चाचा अब न रूक सकूंगा मैं यहां।’’ शहर में सब कुछ खत्म हुआ मानकर एक गहरी हताशा में जमील ने कहा।
‘‘ कहीं भी चला जा बेटा तेरा सच तो संग चलेगा ही। फिर अब गांव में क्या धरा है तेरे लिए? और शहर, ये हो या कोई और क्या फर्क पड़ता है। थोड़े दिन में भूल जाएंगे सब। तू कोई और मोहल्ला पकड़ लियो।’’ रहमत चाचा ने समझाते हुए कहा।

‘‘लोग भूल भी जाएं चाचा पर मैं क्या भूल सकूंगा?’’ सवाल वाजिब था और रहमत से जवाब देते न बना।
  कुछ दिन उदास रहने के बाद जमील सचमुच गांव चला आया। घटना के चंद दिन हताशा में जरूर बीते पर उसे ये समझा गए शहर ही अब उसका अंतिम ठिकाना है। अच्छा-बुरा चाहे जैसा। घर की गरीबी, गांव में नौजवानों के लिए पसरी बेकारी, दिन ब दिन बढ़ती जिम्मेदारियों की सोच ने जमील की जिल्लत को कहीं बहुत दूर धकेल दिया। फैसला लेने के बाद भी उसका एकदम से संयत और सहज होना असंभव था। थाने से जान छुड़ाने के चक्कर में रूपये भी काफी खर्च हो गए थे। गांव वापिस लौटकर उसे फिर वैसी राहत मिली जैसी कभी यहां से शहर आकर मिली थी। समय की इस अजीबोगरीब शक्ल-सूरत को वह बनते-बिगड़ते बड़े नजदीक से देख रहा था।

घर में उसने शहर का सच किसी से नहीं कहा। सबने माना घर की याद के चलते जमील वापिस आया है पर उसकी उदासी किसी से छिपी न रह सकी। अब्बा रोज ही उसे यार-दोस्तों के घर जाने और गांव के बुर्जगों से मिलने की बात कहते। ऐसा नहीं है कि जमील को पुराने दोस्तों से मिलने में कोई एतराज था। वैसे भी जिस तरह समय की धरती पर तीखे पत्थरों के नुकीले कोने पानी की गोद में पड़े रहने से अपना नुकीलापन खो बैठते हैं ऐसा ही जमील के साथ हुआ था। उमेश और युसुफ की बात वह लगभग भुला चुका था। अब तीनों घर-परिवार वाले हो चले थे और उमेश आज भी हिंदू लड़कों के लीडर के रूप में ही जाना जाता था। मिलने पर सबके बीच कटुता के निशान नहीं थे पर रामफल को छोड़ सबमें एक झिझक बाकी थी जो पुलिया के दिनों को हरा नहीं होने दे रही थी। घूमते-घामते जमील पुलिया पर भी हो आया। पुलिया आज भी किशोर-जवान दोस्तों का अड्डा थी। वहां आज भी कोई चिंता, दुख, परेशानी और तकलीफ नहीं थी बस चेहरे बदल गए थे। जमील को लगा जैसे इन चेहरों ने वक्त की धारा को उसके लिए पीछे मोड़ दिया है। कुछ क्षण अतीत में जी कर जब जमील लौटा तो सब नदारद था। चेहरे की उदासी कुछ और बढ़ गई। इधर उसने पाया जाकिर का रूतबा भी बढ़ चला था गांव में। जाकिर भाई खासी इज्जत से नवाजे जाने लगे थे। अल्लाह और ईमान की राह का हवाला देकर अच्छा रूआब जमा लिया था उन्होंने। अब्बा ने कई दफा उनसे मिल आने की बात कही पर जमील का मन न माना । उसकी याद में अब भी जाकिर का सच जिंदा था। और आज के शांत माहौल में भी जाकिर और उमेश के उस समय के चेहरे याद आते ही उसका मन उचाट हो जाता था।

उसे लगता ऐसे ही लोग जिम्मेदार हैं जो इंसान को उसकी मेहनत, काबीलियत और ईमानदारी से नहीं सिर्फ उसके धर्म से जानना पसंद करते हैं और समय आने पर दूसरे की पतंग काटना जिनका पसंदीदा खेल है। और इस खेल के सख्त नियम हैं क्रूरता और मनमाफिक बर्बरता, जिसमें दूसरे के लिए कोई रिआयत नहीं। शहर की घटना को जब इस सबसे जोड़कर देखता तो पाता ये चेहरे वहां भी इसी रूप में है- ‘ये खेल है कबसे जारी’।


 जवान बेटे की उदासी जब किसी भी तरह, कई दिन तक दूर नहीं हो सकी तो अम्मा को एक ही उपाय सूझा-उसकी शादी। शमशेर खालू ने पहले ही लड़की देख रखी थी और वो मां को पसंद भी थी।
‘‘ वैसे अभी तो नहीं पर जैसा तुम कहो अम्मा..आज नहीं तो कल करनी ही है शादी। ’’ जीवन का एक और बड़ा काम निबट जाए कुछ यही अंदाज था जमील का। और लो बात पक्की हो गई।

‘‘ बेटा तू ले जाना सोनी को अपने साथ शहर। यहां दिल न लगेगा उसका तेरे बिना। और वो यहां रही तो तू भी भगा-भगा आएगा हर दूसरे दिन।’’ शहर के लिए निकलने से पहले मां ने जमील से कहा।

‘‘ नहीं अम्मा वहां,कहां?...तेरे पास ही रहेगी।’’
जमील का गंभीर और निश्चयात्मक स्वर सुनकर रेशम भी सकते में आ गई। लड़के की आवाज में शादी को लेकर खुशी की एक धड़कन तक नहीं मिली उसे। चुप रहना ही उसे ठीक लगा इस वक्त। जमील के दिमाग में पहले भी काई उलझन नहीं थी अपनी होने वाली बीबी को लेकर। शहर की दमघोंटू,गंदी बस्ती उसे यों भी इंसानों के रहने लायक नहीं लगती थी। फिर काम पर जाने पर पीछे सताने वाली फिक्र के बारे में उसने पहले ही गौर कर लिया था। बाद मे थाने की घटना ने तो उसके निर्णय पर पक्की मोहर लगा दी । गांव में रहेगी तो सुरक्षित रहेेगी वहां के मुकाबले। जमील ने ठान लिया।

शहर आकर जमील ने दोबारा काम जमाया। रहा जमुनापुरी  में ही प्रकाश, अनोखे और सुनील के साथ पर काम का मोहल्ला बदल लिया। साथ रहने वाले अनोखे ने बड़ी मदद की। इस बीच जमील की  शादी हो गई और कुछ समय बाद वो एक बेटे का बाप बन गया। अब जीवन के सारे सुख उसके हिस्से में थे। बात-बात पर हंसता और बेबात पर भी उसकी हंसी न थमती। अब उसे दोगुनी ताकत से कमाना था। एक अच्छा जीवन, भाई-बहनों की जिम्मेदारी, बेटे की सही पढ़ाई-लिखाई और बहुत से अरमान थे उसके। सोनी ने उसकी जिंदगी में उमंगे भर दी थीं। शहर वापिस आकर जमील ने अनोखे की मदद से एक बड़ी सोसायटी का काम उठा लिया। अनोखे भी उसी सोसायटी में माली का काम करता था। नए काम की शुरूआत के साथ पिछले सारे अनुभवों को जमील ने सिरे से दरकिनार कर दिया था। बस अब उसे अपना काम पूरे ईमान से करना था। इधर उसने पाया कि राजधानी में चुनाव के बाद हवा कुछ बदल चली है।

‘‘ जय धरती मां जय गऊ माता’ के शब्दों पर हलचल सी मच जाती सोसायटी में-‘‘अरे गौ-ग्रास वाला आ गया। भाग के जा और वो रात की रोटी दे आ।’’

ऊपर के माले से तुरंत भागकर न आ पाने वाली थुलथुल काया बीबीजी महरी को तुरंत दौड़ाती। आस-पास कई लोग बड़े नियम से अपना धर्म निभाने लगे थे। जमील सोच में पड़ जाता- हमारे गांव में तो पहली-पहली, ताजी रोटी निकालकर लोग खुद गाय को खिला आते थे। बिना किसी गाड़ी और भोंपू के शोर-शराबे के। पर आज आने वाली ये गाड़ियां तो तेज गानों के साथ गाय का गुण गाती फिर रही हैं।  जमील को समझने में बड़ी दिक्कत होती कि गौ-ग्रास लेने का ये कैसा तरीका है। और अगर ऐसा करना ही है तो शांत तरीके से मांगा जाए यह दान। उसने आस-पास भी गौर किया तो पाया ये गाड़ियां तो अब हर सोसायटी-मोहल्ले में आ रही थीं। शुभ अभियान के नारों, भाषणों और गीतों के साथ। मंदिरनुमा शक्ल की गाड़ियों में मंदिर की तरह ही घंटी लगी थी। नीचे चमकदार स्टील के दो ड्रम सजे थे। एक बात और जो वो सोचता कि जो लोग रोटी और खाने की अन्य चीजें न भी दे पाते थे उन सबके दिमाग में अगले दिन दान के लिए तैयार रहने की घंटी तो बज ही जाती होगी। ये गाड़ियां कौन से मकसद से आ रही हैं जमील समझ नहीं पाता। वैसे भी इन गाड़ियों की ड्यूटी दिल्ली भर में लग रही थी। पिछली सरकार ने नगर-निगम की कूड़ा बटोरने वाली गाड़ी ‘आपके द्वार पर’ खड़ी करवाई थी जिसकी आवाज गली-मोहल्ले में रोज गूंजती थी।

सरकार बदलने के बाद से उत्साहित गौ रक्षक समिति ने उसी तर्ज पर गौ-ग्रास की रिक्शानुमा गाड़िया उतार दीं। जमील हर दिन हिसाब लगाता कि पूरे दिल्ली भर में ऐसी गाड़ियां बनाने-चलाने का कितना खर्च आता होगा और ऐसी ढेर सारी गायें कहां बंधी होती होंगी जो इस खाने को खाती होंगी? उसे तो आज भी अपनी बस्ती और आस-पास के इलाकों में घूमती-फिरती गायें कूूड़े के ढेर में मुंह मारती दयनीय और कुपोषित ही दिखाई देतीं।
सोसायटी में अधिकांश परिवार हिंदू थे । जहां तक संभव होता जमील अपना नाम, धरम बताए बिना ही काम चलाता।

 ‘‘राम-राम जी’’ जैसा उसका सम्बोधन जहां लोगों को जहनी तौर पर संशय की सीमाओं से मुक्त करता  वहीं उसके खुद के लिए जैसे ये राम-नाम एक ढाल बन गया था। अपने बचाव में एक हथियार सरीखा। जो लोग उसे नाम से जानते वो उसके इस सम्बोधन से खुश होते।
‘‘आया न सही राह पर। यहां रहना है तो हम रहते हैं वैसे ही रहना होगा। हमारी तरह राधे-राधे बोल या फिर जय राम जी की। ’’

शेष लोगों के लिए तो वह केवल कबाड़ीवाला ही था। उन्हें इतनी फुर्सत ही कहां थी जो उसका नाम जानते और उसके बारे में। अधिकतर घरों में तो वैसे भी ये काम  घरेलू नौकरों के ही जिम्मे थे। फिर तौल के पुराने तराजू भी अब अनुपयोगी होकर किसी कबाड़ का हिस्सा हो चुके थे। स्प्र्रिंग बैलेंस जैसे छोटे से औजार की बदोैलत अब जल्दी से कबाड़ को बोरी में भरकर उसमें हुक फंसाकर बोरे को अपनी समूची ताकत से जमील उठा लेता। स्प्रिंग बैलेंस का कांटा किलो के निशान के आगे रूक जाता। जितने किलो के हिसाब से तय होता उतने पैसे जमील हिसाब लगाकर तुरंत चुकता कर देता।

 शुरू से ही घुलने-मिलने की आदत नहीं थी उसकी। शरीर से ताकतवर दिखता था पर इधर उसने अपनी खास भंगिमा से उसे भी कतरने की कोशिश की। दोनों हाथ पीछे की ओर बांधकर एक फर्माबरदार मुलाजिम की मुद्रा और ढीले-ढाले कंधों में गर्दन झुकाकर चलना। कमीज को पैंट के अंदर डालकर कभी चुस्त दिखने की कोशिश नहीं करता। शरीर की सारी मजबूती को इस भंगिमा ने जैसे उपेक्षणीय बना दिया था। काम बचा-बना रहे, जमील इसके लिए बड़े सचेत प्रयास करता। उसके ऐसा करने के पीछे वो चेहरे भी नुमायां थे जो उसे ऐसा करने पर बाध्य करते। एक कामवाले की औकात को अपनी बेबाक नजरों से हरदम तौलते।

काम से फारिग होते ही वह पार्काें में काम करने वाले अनोखे के संग बैठ जाता। अनोखे  यहां माली का काम करता था। कड़ी मेहनत और मजदूरी कम। वो तो ड्यूटी के बाद कुछ घरों में उसका अपना काम था गमलों के रख-रखाव का नहीं तो गुजारा मुश्किल था। बातून अनोखे समझदार था। जमील का गार्जियन बनकर रहता था सोसायटी में-‘‘क्यों फालतू काम करता रहता है बे तू इन लोगों के। जब देखो ऊपर सामान चढ़ाना है कबाड़ी वाले को भेज दो। अरे जरा ये कर दे और वो कर दे... किसी का टाईम खोटी हो इनकी बला से।’’ अनोखे की इस बात से जमील अपने आज में लौट आया।

‘‘कोई नहीं थोड़ी देर के कामों के लिए क्या घबराना। और कौन सी ये सरकारी नौकरी है हमारी? दो काम फालतू करेंगे तो कोई न निकालेगा और गलत भी न सोचेगा। क्यों? बात का सिरा पकड़कर जमील ने कहा।

‘‘इस फेर में न रहियो तू। जिस दिन निकालना होगा तेरा पिछला किया-कराया काम न आएगा देख लियो। तू किसलिए करता है, जानता हूं सब। पर अच्छाई का जमाना नहीं है। फिर हम जैसों की कोई यूनियन-वूनियन कहां जो बचा ले। हमसे सही तो ये माईयां हैं बर्तन-झाड़ू वालीं। पैसे बढ़वाने होते हैं तो सब जनी एक हो जाती हैं। पर हमारा....जानता है छत्तीस नम्बर वालों ने दशहरे के दिन कहा भई रावण बनवा दे बच्चों का। अब बता मैं क्या रावण का कारीगर हूं जो बनवा दूं? दो घड़ी हमारा सुस्ताना भी इन्हें बर्दाश्त नहीं। साफ मना कर दी मैंने। तू भी कर दिया कर।’’ कहने को कह दिया अनोखे ने पर जानता था जमील नहीं करेगा ये सब। अनोखे ने बात खत्म की ही थी कि जमील का फोन बजा।

‘‘ रौशन की तबीयत बड़ी खराब है। बस तुम आ जाओ किसी तरह। गर्दन एक तरफ लटक गई है और कुछ नहीं खा रहा कई दिन से।’’फोन पर सोनी ने बताया।
सोनी के सुबकते हुए शब्दों ने जमील का सारा चैन छीन लिया। रौशन की तबीयत और काम का हर्जा समेत तमाम चिंताएं उसके सर पर सवार हो गईं। बच्चे की तकलीफ सुनकर पहली फुर्सत में जमील गांव रवाना हो गया। अपनी पहचान के एक दूसरे कबाड़ी को काम पर लगा दिया उसने। सोसायटी ने जमील को काम पर रखने से पहले ही बता दिया था एक-दो दिन से ज्यादा की छुट्टी नहीं मिलेगी। गांव जाकर पाया तो वाकई बच्चे की तबीयत काफी खराब थी। पहले जब भी जमील लौटता था रौशन अपनी हंसी से उसका स्वागत किया करता था। छह-सात महीने के रौशन ने बोलना तो शुरू नहीं किया था पर उसके ‘बा बा’ जैसे शब्द जमील को अब्बा सुनाई दिया करते। हाथों में उछाल-उछालकर अपने बेटे से घंटों खेलता था जमील। पर आज उसके आने पर बच्चे में पहचान की एक भी हरकत नहीं दिखी उसे। उसके हंसते-खेलते बच्चे को क्या हो गया? दिल-दिमाग जैसे सुन्न पड़ रहे थे जमील के।

‘‘ अरे घबरा मत तू बच्चे दांत निकालते हैं तो ऐसी परेशानी आती ही है। पहली औलाद है न इससे ज्यादा परेशान हो रही है सोनी। वैसे मजार पे जाकर झाड़ा तो मैं लगवा आई हूं।’’ अम्मा चिंतित होते हुए भी उसका हौसला बढ़ा रही थी।

‘‘कल चलेंगे इसे बड़े अस्पताल लेकर।’’गांव के इलाज से कोई खास फायदा न देखकर उसने जल्दी से फैसला लिया।

अगले कई दिन अस्पताल में डाॅक्टर को दिखाने में बीते। लंबी लाइनों में लगना, टेस्ट के लिए भटकना, दवाइयों के लिए दौड़ना पड़ा उसे। रूपया खर्च हो रहा था पर बच्चा सही होने में नहीं आ रहा था। पता नहीं डाॅक्टर ढंग से देख भी रहा है या नहीं। आखिर डाॅक्टर ने बताया दिमाग से नीचे आने वाला कोई पानी शरीर में नहीं पहुॅच पा रहा है। कोई नली लगानी पड़ेगी चीरकर तब ठीक होगा बच्चा। घर में आॅपरेशन के नाम पर कोहराम मच गया। अम्मा-अब्बा मानने को तैयार ही नहीं थे कि ऐसी भी कोई बीमारी होती है-‘‘ठग रहा है डाॅक्टर। हमने तो अपने पूरी जिंदगी में ऐसी बीमारी न देखी किसी बच्चे की।’’ अम्मा बोली।
‘‘बेटा दिल्ली ले चल एक बार वहां ही दिखा लेते हैं।’’ अब्बा ने कहा।
दिल्ली के अस्पतालों के जनरल वार्डाें की असलियत जमील जानता था। लंबे इंतजार और मंहगे इलाज। कहने को तो सरकारी हैं पर टेस्ट के पैसे क्या कम हैं वहां? पर बेटे की हालत देखते हुए उसे  दिल्ली जाना ही ठीक लगा। अगले दिन जाने की तैयारी हो गई पर उसी रात रौशन चल बसा। सोनी के साथ जमील भी पगला गया। बच्चे के दुख ने तोड़ दिया उसे। वो सारे सपने, सारी उम्मीदें मिट्टी में लिपटी बेरौनक हो गईं जिस मिट्टी में रौशन खामोश लेटा था। बार-बार खुद से यही सवाल करता- ‘‘मैंने क्या बिगाड़ा था किसी का, जिसकी ये सजा मुझे मिली।’’ पर जवाब नदारद रहता। सारी दिशाएं अजीब से सन्नाटा में डूबी जान पड़तीं और इस सन्नाटे के बीच कभी-कभी लगता रौशन घर के किसी कोने में पहले की तरह हंस-खेल रहा है। जैसे अभी सोनी गोद में ले आएगी उसे और रौशन ‘बा बा’ करता लपकने लगेगा उसकी तरफ। पर उस सन्नाटे को केवल सोनी की सिसकियां और तेजी से उठने वाली चीखें ही तोड़ा करतीं और उसके बाद फिर से एक लंबा सन्नाटा घर भर में छा जाता।

जमील की जिंदगी का गिरता-उठता ग्राफ यों तो पहले भी उसे तोड़ता आया था पर फिर एक नई उम्मीद से खड़े हो उठना उसकी फितरत में था। चोट लगती थी, घायल भी होता था पर मरहम-पट्टी के बाद दुरूस्त और फिर पहले जैसा। पुराने रोग और गम पालने की फुर्सत भी अब कहां थी उसे। जिंदगी को बदलते देखता और खुद भी बदलने की कोशिश करता। पर इस बार संभलना मुश्किल हो रहा था।

‘‘ बेटा तू हिम्मत हारेगा तो सोनी कैसे जिएगी? मरद का काम है हौसला देना,औरत को संभालना। औलाद का दुख तो दोनों को एक जैसा है बेटा पर उसने जनम दिया था रौशन को। उसके दुख की तो सोच। जाने क्या-क्या सोचती होगी।... और ऊपर वाला है न भरोसा कर... जैसे लिया है वैसे दोबारा देगा भी।’’ मां ने इशारों में बता दिया कि बहू उम्मीद से है। उसके शब्दों में जाने कौन-सी मरहम थी कि दर्द हरे होने के बावजूद कम दुख रहे थे। जमील दर्द की तमाम हदों को पार कर फिर खड़ा हो गया।  कुछ दिन सोनी के साथ गुजारे। जिंदगी पूरी तरह नहीं अधूरी ही सही, पुरानी शक्ल में लौटने लगी। इधर जमील की बचाई रकम खर्च हो गयी थी। अब उसे दो-दो मोर्चे संभालने थे-घर और घर के लिए पैसा। उसे शहर आना ही था।

‘‘ नहीं साहब ऐसा कैसे हो सकता है? इतने बरस खिदमत की है आप लोगों की। मुसीबत के मारे को और न मारो साहब।’’ जमील को खुद पर यकीन नहीं था वो लगभग गिड़गिड़ा रहा था अपने काम के लिए।

‘‘देख भाई, तू इतने साल से है न यहां, कभी मांगा तुझसे कुछ? बोल? अब इतना कमाता है कि गांव जाकर ठाठ से रहता है तू । मकान-वकान भी बनाया ही होगा।  साल के बीस हजार ही तो देने हैं बस और कौन सा तुझ अकेले से मांग रहे हैं सबकी एंट्री का चार्ज है और हम कौन-सा अपनी जेब में रखेंगे। सोसायटी के कामों में लगेगा सारा पैसा।’’सोसायटी नए प्रधान ने बड़ी ही सहजता से कहा।

‘‘गरीब आदमी हूं साहब। साल में लाख रूपया कमा सकूंगा तभी तो दे पांउगा बीस हजार.. पर इतनी कमाई कहां है मेरी...।’’

‘‘ वो तू जान और फिर ये भी तो देख कितना सुरक्षित है तू यहां... हमारे पास...देख नहीं रहा इतने साल से...हैं जमील?’’ जमील शब्द पर सारा वजन डालते हुए प्रधान ने उसके हिस्से के सच को बयां कर दिया। कमीशन और जमील नाम के आदमी की प्रोटेक्शन मनी दोनों ही मुद्दे नए प्रधान की लिस्ट में थे।




 यहां आने पर जमील ने सारा माहौल बदला पाया। सोसायटी में काम करने आने वालों के लिए एंट्री फीस का नया फरमान जारी होने वाला था। कई दिन सब पर तलवार लटकती रही। जमील का मन किया भाग जाए किसी ऐसी जगह जहां कोई दिक्कत न हो परेशानी न हो पर जानता था कि ऐसी जगह न कहीं थी, न होगी। सोसायटी के कुछ लोगों के दखल और सदाशयता से कई दिन बाद समस्या हल हुई। एक बीच का रास्ता निकाला गया कि सोसायटी को पैसा देने में असमर्थ लेबर को अब हफ्ते में कुछ घंटे यहां के काम-धाम करना होगा बिना किसी आना-कानी के।

‘‘ देख लिया सब। करो अब जमींदार की बेगारी। इधर से न सही तो उधर से कान तो उमेठ ही लिया न।...और जमील तुझे बचाने कौन साला आएगा बताए जरा? याद नहीं है कैसे निकला था तू पुराने मोहल्ले से। किसी एक ने भी किया था तेरी नेकी का बखान? बड़े आए पैसा मांगने वाले।’’ अनोखे चुप न रहा।

बेटे के दुख और एक नया आसमान टूटने के बाद बहुत बड़ी राहत महसूस करके जमील ने कहा-‘‘ उसमें क्या है अनोखे, जहां एक घंटे बाद आते थे तो एक घंटा पहले आ जाएंगे। तू न घबरा...सोच कहां से लाते इतना रूपया और फिर निकाले जाकर कहां काम ढूंढते?’’

 बंधी-बंधाई नौकरी न होते हुए भी माली, कबाड़ी, गाड़ी धोने वाले, बिजली मरम्मत वाले और मिस्त्रियों के लिए ये सोसायटी ही कमाई का आधार थी। जैसे-तैसे सबने नयी स्थिति को स्वीकार कर लिया। काम की मारा-मारी के इन भयंकर दिनों में अधिकांश को इसमें किसी जुल्म की कोई गंध नहीं आई। मेहनत के कुछ घंटे और बढ़ गए थे पर पगार उतनी ही रही सबकी। दिन बीतने पर अनोखे जैसे कामगारों की ये खलिश भी दूर हो गई। गौ-ग्रास के रिक्शे से नियत समय पर तेज आवाज में रोज का गीत आज भी चल रहा था-‘‘हे धरती मां हे गऊ माता..गूंज रहा है मंत्र महान....पूर्ण सफल हो शुभ अभियान... जीवमात्र का हो कल्याण।’’

अब जमील और भी जिम्मेदारी से काम करने लगा । रद्दी के अपने काम से फुर्सत मिलते ही रोजाना उसे किसी न किसी काम से दौड़ना ही पड़ता। कभी किसी आॅफिस चेक जमा कराने तो कभी किसी के निजी काम से। शाम के समय भी कई बार मुसीबत पेश आ ही जाती जब उसे अपने कबाड़ को ठिकाने लगाना होता। पर जमील चूं नहीं करता। एक जमील ही क्या सभी मुलाजिम इन्हीं हालातों से गुजर रहे थे। कामों का तूफान जब गुजरता तब दो घड़ी की फुर्सत में नन्हें रौशन का चेहरा उसकी आंखों में घूम जाता। सोनी से भी लगभग रोज ही बात होती थी उसकी। उसे मोबाइल खरीदकर दे आया था इसलिए सोनी भी अक्सर बात-चीत कर लेती। उसकी जचकी के दिन भी पूरे होने वाले थे। जमील को चिंता सताती रहती। यों अम्मा पूरी देखभाल कर रही थी पर जमील हर बार उन्हें सोनी का ध्यान रखने, डाॅक्टर को दिखाने और ढंग की खुराक जैसे निर्देश देता रहता। सोनी से वादा किया था तो समय से पहले गांव पहुंच गया जमील।

‘‘हां भई हम पे भरोसा कहां था तुझे कि ख्याल रखेंगे तेरी बीवी का? अब संभाल ले तू।’’
बेटे का मजाक उड़ाते हुए अम्मा ने कहा तो जमील, अब्बा के सामने जरा शर्माया पर जबान तक आए उसके शब्द बेसाख्ता निकल पड़े-‘‘अम्मा जीवन भर का साथ है मेरा-इसका, निभाना तो पड़ेगा न।’’
और जमील-सोनी की गोद में फिर एक बच्चा था। स्वस्थ और सुंदर।
‘‘देख सोनी बिल्कुल रौशन पर गयी है न बिटिया?’’
सोनी हैरान रह गई। अक्सर बच्चे की शक्ल देखकर मां-बाप यही देखते हैं कि एक-दूसरे में से किस पर गया है या फिर ननिहाल-ददिहाल में किस के चेहरे-मोहरे से मिलता है पर जमील...वो तो अलग सी ही बात कर रहा था। उसकी खुशी थम नहीं रही थी।
‘‘इसका नाम रौशनी रखेंगे सोनी...रौशन जैसी रौशनी। तू देखना खूब जतन करूंगा इसका मैं। थोड़ी बड़ी हो लेने दे, तुझे और इसे शहर ले जाऊंगा। वहीं पढ़ाउंगा, किसी अच्छे सकूल में। मदरसे नहीं भेजूंगा शमशेर खालू की तरह।’’

‘‘जाओ रहने दो पूरे खानदान में कोई लड़की बड़े शहर के अच्छे सकूल में गई भी है कभी?’’ इठलाते हुए सोनी ताना जरूर मारती पर भीतर से जानती थी कि जमील बात का पक्का है। फिर अपने छोटे से घर की कल्पना उसके मन में नई चंचलता भर रही थी।
बिटिया को छोड़ आए जमील का मन गांव में ही अटका रह गया। जब भी मौका पाता अनोखे को या कमरे में लौटने पर प्रकाश और सुनील को उसके छवि का बखान करके सुनाता।
‘‘अबे पगला गया है। हम भी बाप बने हैं कि तू  निराला बना है?’’
सब उसे छेड़ते पर उस छेड़ में जमील को और आनंद आता।
जमुनापुरी की उस बस्ती में जमील ने ठीक-ठाक कमरा देखना भी शुरू कर दिया था। यों बस्ती कच्ची थी और गंदी भी पर काम के नजदीक तो थी। साइकिल से आने-जाने में ज्यादा समय नहीं लगता था उसे। आगे की योजना सोचकर अपने काम को भी उसने बढ़ा लिया। पुराना घरेलू सामान भी अब वह खरीदने और बेचने लगा। धंधे के कुछ लोगों से सही जान-पहचान हो गई थी तो उसकी हिम्मत बढ़ गई। पुराना फर्नीचर,कम्प्यूटर, टी.वी.,टेपरीकाॅर्डर वगैरहा बिजली का सामान सब लेने लगा कबाड़ में। यों घरों को समयानुसार नया बनवाने वाले लोग पुरानी चैखटें, ग्रिल, घुन खाए या पानी में फूल गए दरवाजे, जाली की बेकार हो चुकी खिड़कियां आदि बिकवाने के लिए उसे ही बुलाते। लोग पुराने हर सामान से उकताकर नए सामान की ओर दौड़ रहे थे। अब भारी और टिकाऊ का नहीं हल्का और टीम-टाम के फर्नीचर का चलन था। पुराना टिकाऊ सामान जिसे करीबी रिश्तेदार भी लेना नहीं चाहते थे जमील उस समस्या का जल्द समाधान कर डालता। इससे उसकी साख भी बन रही थी और पैसा भी। अखबार, लोहा-लक्कड़ और प्लास्टिक अब भी वह खरीदता था पर अब समय के अनुसार अपने को बदलकर धंधे का विस्तार उसने कर लिया था और खुश था। जब भी घर जाता रौशनी के लिए अच्छे-अच्छे खिलौने और कपड़ों की खरीदारी करके ही जाता। अम्मा-अब्बा भी खुश थे।

इस बार गांव से आया तो उसका पक्का इरादा था अब कोई कमरा ठीक करके सोनी और रौशनी को यहां ले आएगा। बच्ची की नींव सही पड़ गई तो ही अच्छी रहेगी जीवन भर उसने सोचा। और फिर कमरा अनोखे और प्रकाश के बगल में ही लेगा। हारी-बीमारी के साथी तो ये ही थे उसके शहर में। सब सोचते हुए दोस्तों से जरूर सारी बातें साझा करता था जमील। अनोखे के साथ तो आना-जाना और काम की समान जगह होने के कारण चैबीस घंटे का साथ था ही उसका।

‘‘इस बार तू चलना अनोखे ईद पे मेरे संग गांव। कसम से यार घर में घुसते बस नाम बता दियो अपना फिर देखना कैसी खातिर होगी तेरी। सब जानते हैं तुझे।’’ जमील बोला।
‘‘ तो तूने सब बक दई है वहां।’’ ठेठ अंदाज में अनोखे ने कहा।
दोनों ने तेज ठहाका लगाया । अगले ही पल अनोखे बोला-‘‘ कहां फुर्सत होगी मुझे दीवाली पर। सौ काम होते हैं । साल भर का त्यौहार थका मारता है। घर पहुंचते ही सारे घर की पुताई में लग जाता हूं। बैठने नहीं देती तेरी भाभी जरा सी देर को। फिर काम पर नहीं लौटना है कैसे आंउगा तू ही बता?’’
‘‘ अरे बरेली से खतौली जरा सी दूर है। तू मेरे घर ईद मनाकर अपने यहां दीवाली मना लेना या लौटती बार घर आ जाना दोनों संग लौट लेंगे।’’

थोड़ी आना-कानी के बाद अनोखे मान गया। जमील ने सोचा संग ही रौशनी और बेटी को भी लेता आंउगा एक साथी होगा तो बड़ी सुविधा रहेगी।

 सुबह काम पर जाते समय दोनों ने देखा रास्ते में बड़ी चहलपहल थी। पास जाने पर मालूम हुआ यहां माता की चैकी बिठाई जा रही है। कई उत्साही नौजवान माथे पर सुनहरी गोट की लाल चुन्नी बांधे टेंट वाले से काम करवाते हुए भागदौड़ में लगे थे। उनकी आवाजें खूब खुली हुईं थीं। पटरी और सड़क पर भी चैकी का सामान बिखरा पड़ा देखा उन्होंने। मुख्य सड़क से करीब होने के कारण ट्रैफिक वहां से तिरछा होकर गुजरने लगा। सबको खासी दिक्कत हो रही थी। पर धरम का काम था तो सबको असुविधा भी मंजूर। फिर लड़कों के हट्टे-कट्टे शरीर और गरजती आवाज ने किसी को शिकायत करने की कोई छूट भी नहीं दी थी।

शाम तक दोनों अपने उसी पुराने रास्ते से लौटे तब तक माता का भवन पूरा सजकर तैयार था। चार मेजों को जोड़कर माता का भवन सजाया गया था। बड़ी-सी, भड़कीले रंग वाली प्रतिमा के सामने माता का शेर भी विराजमान था। स्टीरियो पर तेज आवाज में भेंटे और भजन चल रहे थे। फिल्मी गीतों की चालू धुनों पर कुछ लड़के-बच्चे नाच रहे थे। उनका नाच भी फिल्मी ही था, जैसे वो बोल पर नहीं धुन पर ही थिरक रहे हों। अनोखे और जमील ने मां के अस्थाई मंदिर के आगे शीश नवाया पर साईकिल का हैंडिल नहीं छोड़ा। दिन भर के थके होने के बाद अभी खाना भी बनाना था और फिर अगले दिन काम पर जाने के लिए सोना जरूरी था उनका। वैसे भी चैकी, जागरण तो अब आए दिन की बात हो गई है। ‘रोज-रोज अगर इनमें जाने लगें तो काम क्या खाक करेंगे’- अनोखे नास्तिक नहीं था पर इस मामले में एकदम साफ था। चैकी से कमरा पास होने के बावजूद जमील के तीनों संगियों में से कोई भी वहां नहीं गया।
अगले दिन काम पर जाते हुए दोनोें ने देखा चैकी आज भी कल की तरह ही सजी है। हां झांकियां शायद और सजा दी गईं हैं। आज भीड़ कल से अधिक थी और स्टीरियो भी सप्तम सुर में बज रहा था। साथ में एक टेबल और लगा दी गई थी। नए देवताओं के रूप में गणेश, शिवजी के साथ विराजमान थे। दाएं-बाएं और सामने की छोटी सी जगह में भक्तों के लिए दरियां भी बिछा दी गई थीं। उन पर रखी चादरों से अंदाजा हो रहा था कि रात को कई लड़के यहीं सोए होंगे।

अब तो दोनों जने आते-जाते रोज ही माता के भवन में कोई न कोई नवीन परिवर्तन देखते। चैकी के भवन पर लगे बिजली के लट्टू खींचकर आगे बनी मस्जिद के करीब तक ले आए गए थे। पहले साधारण सा दिखने वाला भवन अब भव्य हो चला। रात में कई भजन-मंडलियां भी जुट जातीं ऐसा सुनील ने सबको बताया । सुनील तो चैकी की आरती में एक दिन शामिल भी हुआ। बस तभी से पड़ा था सबके पीछे-‘ देख लो रात को एक दिन आरती। इतने करीब में होने का कुछ तो फायदा उठा लो।’

 अनोखे ने सोचा एक दिन सभी चल पड़ेगें साथ, वैसे भी चैकी का प्रोग्राम कुछ दिन आगे खिसक चुका था इसकी सूचना उसे भी मिल गई थी। शनिवार को शुरू हुई चैकी को कल हफ्ता पूरा होने वाला था। सुबह वहां से गुजरते हुए अनोखे और जमील ने देखा कि आज बात कुछ और ही है। आटे-आलू की बोरियंा, तेल के कनस्तर, मसाले भी चैकी के घेरे में पड़े हैं। और दो हलवाई बड़े-बड़े पतीलों-कड़ाहों को धोते पीछे की तरफ भट्टी सुलगा रहे हैं।
‘‘ले भाई आज तो भंडारा होगा। दोपहर में पूरी-आलू की सब्जी मिलेगी। हो सकता है हलवा भी।’’ अनोखे ने हंसते हुए कहा।
‘‘तू जा नहीं रहा था न चैकी में, तो लड़कों ने आज तुझे बुलाने का पक्का इंतजाम कर दिया।’’ जमील ने चुटकी ली। दोनों ने तय किया कि आज खाने के समय यहीं आ जाएंगे।

भंडारे के समय पहुंचे तो माहौल में अजीब-सी तनातनी के संकेत मिले। लाइन काफी लंबी थी और लाइन में लगे लोगों से ही पता चला-
‘‘ दिन मे बड़ी पुलिस आई थी मस्जिद के पास। एक दिन की चैकी तय होने के बाद अब हफ्ते से ऊपर इक्कीस दिन की चैकी बिठा दी गई है।’’ किसी ने बताया।

‘‘ इन ठलुओं को कोई काम-धंधा नहीं है क्या? इक्कीस दिन जमे रहेंगे यहां?...हमें तो काम से मिनट भर फुर्सत नही।ं भगवान को हम भी मानते हैं पर हमें फुर्सत नहीं मिलती पूजा-पाठ की। आज भंडारा खाने आए हैं, खाकर निकलेंगे काम पर।’’ अनोखे चुप न रह सका।

‘‘ हम भी तुम जैसे हैं भाई। पर असल बात ये है मस्जिद के ठीक बगल में माता का मंदिर बनाया है। और धीरे-धीरे मस्जिद की तरफ सरकते आ रहे हैं। अरे कहीं और बना लेते। ऐसे में न उनके भजन सुनाई पड़ेगे न इनकी अजान। घाल-मेल से दोनों को परेशानी होगी, दोनों भड़केंगे।’’ कोई बोला।

‘‘ हां, मस्जिद तो पक्की है और कितनी पुरानी भी मंदिर कहीं और बना लेते न।’’ जमील का ये कहना था कि आग लग गई। पास से गुजरते किसी सेवक भक्त के कानों में पड़ते ही धमाका हो गया।

‘‘हमारा खाकर हमें गाली देने वाला तू कौन है बे ?...हम क्यों सरकाए मंदिर? इतनी परेशानी है तो ले जाएं वो अपनी मस्जिद कहीं और। हमारा मंदिर यहीं बनेगा और जितने दिन चाहेंगे रहेगा। इनके बाप की नहीं हमारे बाप की जमीन है। गाड़ दिया है हमने तंबू ,दिखाए कोई उखाड़कर।’’

भक्त ने तैश में गुस्से, नफरत और अपने अधिकार का इज़हार किया। उसके कई संगी भी नजदीक आ गए। अनोखे ने चुप रहने का इशारा किया जमील को। भला हुआ जो ये लड़के नहीं जानते थे कि जमील का धरम क्या है। जमील का मन रूकने का कतई न था पर अनोखे ने उसे रोके रखा। उधर मस्जिद के पास भी भीड़ जमा हो गई। कई लोग चैकी के शोर-शराबे और बदइंतजामी से गुस्साए हुए थे। दोनों तरफ तनातनी थी और बीच में भंडारे की भीड़। दोनों तरफ के लोग। मस्जिद के पास घिरे लोग अपने धर्म पर सीधे प्रहार के कारण तो आहत थे ही उन्हें आज की जुम्मे की नमाज की फिक्र भी थी। यहां भी नमाज के लिए भीड़ जुटनी शुरू हो रही थी। भंडारे की भीड़ से उन्हें नमाज अदा करने की जगह निकालने में मुश्किल आने लगी। बरसों से कभी ऐसा न हुआ था कि जुम्मे की नमाज में जगह कम पड़ी हो। पर लग रहा था आज ऐसा होगा। जमील ने सोचा आज खाने के बाद वो भी नमाज अदा कर लेगा पर माहौल की नब्ज़ तेज होती जा रही थी।

मस्जिद की तरफ से आए गुस्साए लोगों ने भंडारा जल्दी निबटाने की बात कही तो हवा में जहर फैल गया। बात भद्दी गालियों से होती हुई सीधे तौर पर साम्प्रदायिक रंग ले बैठी। अपने-अपने धरम की पैरवी में जिसके मन में जो आ रहा था वह बके जा रहा था। ‘हमारी मस्जिद पुरानी है... हमारा मंदिर यहीं रहेगा’- जैसे जुमले हवा में तैरने लगे। उत्तेजना के माहौल को भांपकर जमील ने वहां से निकल चलने के लिए अनोखे का हाथ दबाया। पर अनोखे नहीं हिला। थोड़ी देर में आग ठंडी पड़ी पर उसे सामान्य नहीं कहा जा सकता था। मस्जिद से आई भीड़ अभी वापिस लौटी ही थी कि माता के भवन के पास मांस का लोथड़ा फंेके जाने का शोर मच गया। पर अबकी बार ये शोर यों ही न थमा। चैकी के भ्रष्ट होने के साथ भक्तों का अहंकार आहत हुआ था। न किसी ने लोथड़े को देखा न तफ्तीश की और सैलाब मस्जिद की ओर बढ़ चला। इससे पहले कि लोग कुछ समझ पाते या सुरक्षित स्थान पर पहुंचते पत्थरबाजी शुरू हो गई। मामूली पत्थर नहीं भारी-भरकम ईंटंे। भंडारे की जगह लगी भीड़ में भगदड़ मच गई। कई बच्चे, आदमी और औरतें रौंदे चले जा रहे थे। लोग बेतहाशा भाग रहे थे...लोग बेमकसद मर रहे थे। धरम के नाम पर सब जायज था जैसे।
पत्थरबाजी जारी थी। भीड़ अंधी हो चली थी, मंदिर-मस्जिद भी दिख नहीं रहे थे बस भीड़ के दो चेहरे थे जो एक-दूसरे को बर्दाश्त नहीं कर पा रहे थे। पहले मारकर कौन जीतता है इसीकी सारी लड़ाई थी। दल-बल समेत पुलिस भी आ गई तब तक। माता अब भी संहार देखकर प्रसन्न मुद्रा में थीं। स्पीकर कहीं टूटा पड़ा था। मस्जिद के आगे क्रोशिए की टोपियां छितरी थीं, वजू के लिए पानी के जग दबी-दुचकी हालत में जहां-तहां पड़े थे।  और कई शरीर कभी न उठ पाने की हालत र्में इंटों की गिरफ्त में़े थे। सड़क का सारा ट्रैफिक भयभीत दर्शकों की तरह सिमटा और सन्न था। सड़क के दूसरी तरफ भीड़ से बचकर भागे लोगों का जमावड़ा तमाशबीनों के साथ खड़ा था। सब अपनी जान बचने का शुक्र मना रहे थे और कई अपनों को ढूंढ पाने में असमर्थ होकर भय सेे चीख रहे थे। सड़क लहूलुहान थी। पत्तलें, पूरियां, सड़क पर धूल फांक रही थीं। सड़क पर पलट गए सब्जी के पतीलों से बही सब्जी खून की रंगत में तर थी। कितने ही लोग घायल, बेहोश पड़े थे। कफ्र्यू लगा दिया गया। पुलिस ने घटनास्थल की छान-बीन की। देर तक जारी इस तहकीकात का सच काफी दिन बाद सामने आया। कुछ बाहरी लोगों ने इस  काम को अंजाम दिया था। जमुनापुरी का यह पहला दंगा था। टीवी चैनलों पर साम्प्रदायिकता की समस्या पर कुछ चर्चा हुई। नेताओं ने शंाति बनाए रखने की अपील की। ग्यारह लोग मारे गए थे। मारे गए और घायल लोगों को मुआवजे की रकम सरकार से मिलना तय हो गया था। मरे हुए और घायलों की लिस्ट बनाई जा चुकी थी...  मुआवजा मृत व्यक्ति तीन लाख रूपये और घायल पचास हजार प्रति व्यक्ति।
सोसायटी में उस दिन कपूर साहब के घर सुबह से ही जमील की जरूरत आन पड़ी थी। एकदम अर्जेंट काम था। उसके आने के समय का हिसाब लगाकर मिस्टर कपूर ने गार्ड रूम में फोन लगाया-
‘‘  गार्ड , सुनो एक सौ दो नम्बर से बोल रहा हूं, जमील आए तो फौरन भेजना...सबसे पहले मेरे घर। समझे?’’
‘समझे’ शब्द की सख्ती समझकर गार्ड तुरंत बोला -‘‘सर जी, जमील और अनोखे का कुछ पता नहीं। कई दिनों से गायब हैं दोनों।’’
गौ-ग्रास लेने के लिए आने वाली गाड़ी टाइम से सोसायटी में घुस रही थी। तेज संगीत में गीत बज रहा था-‘‘ जय धरती मां... जय गऊ माता.... जय गऊ माता-जय गऊ माता।’’
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प्रज्ञा
ई-112, आस्था कुंज, सेक्टर-18 रोहिणी, दिल्ली-89
दूरभाष-9811585399
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Friday, March 18, 2016

आज मंच पर प्रस्तुत है अंतोन चेखव की कहानी ' नींद '।  कहानी  का अनुवाद तरुशिखा सुरजन ने किया है ।
कृपया  सभी पढ़े  और सम्बव हो तो अपनी महत्वपूर्ण  प्रतिक्रिया से मंच को अवगत कराये । सोमवार  से पुनः  हम अपने सदस्य  रचनाकारों की कहानियों पर  क्रमशः चर्चा करेंगे ।

।। राजेश  झरपुरे ।।

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कहानी


नींद 

( रूसी कहानी: अंतोन चेखव)


अनुवाद:तरुशिखा सुरजन
206, हाईलैंड अपार्टमेंट्स
वसुन्धरा एनक्लेव,
दिल्ली-96
मो.9868064895


रात, आया वार्का, एक तेरह वर्षीय बालिका, पालना झुला रही है जिसमें बच्चा लेटा हुआ है और बुदबुदाते हुए लोरी गा रही है-  सो जा बच्चा सो जा,
मैं लोरी गाती हूँ.....
कमरे के बाहर एक हरा बल्ब जल रहा है; कमरे में एक कोने से दूसरे कोने तक रस्सी बंधी है जिस पर पोतड़े और बड़ी काली पतलूनें टंगी हैं। बल्ब की रौशनी से कमरे की छत पर बड़ा सा हरा धब्बा दिख रहा है और पोतड़ों-पतलूनों की लम्बी परछाइयाँ तंदूर पर, पालने पर और वार्का पर पड़ रही हैं। जब बल्ब की रौशनी झिलमिलाती है तो धब्बा और परछाइयाँ मानो जिन्दा हो जाते हैं और हिलने लगते हैं, जैसे हवा से हिल रहे हों। उमस है। पत्तागोभी के शोरबे और जूतों की गंध महक रही है।
      बच्चा रो रहा है। बहुत देर से रोते-रोते वह थक गया है और उसका रोना कर्कश हो गया है पर फिर भी रोता जा रहा है। पता नहीं कब चुप होगा। और वार्का को नींद आ रही है। उसकी आँखें नींद से भरी हैं, सिर एक ओर झुका जा रहा है और गर्दन दुखने लगी है। वह न अपनी पलकें हिला पा रही है न ही होंठ। उसे लग रहा है कि उसका चेहरा सूख कर काठ का हो गया है और सिर इतना छोटा हो गया है मानो पिन का सिरा।
      - सो जा बच्चा सो जा- वार्का बुदबुदाती है.. तेरे लिए खीर बनाउंगी....
      तंदूर में झींगुर आवाज़ कर रहा है। बगल के कमरे में, दरवाजे के पार मालिक और उससे काम सीख रहा लड़का अफानासी खर्राटे भर रहे हैं। ...पालना शोकपूर्ण ढंग से आवाजें कर रहा है, वार्का लोरी बुदबुदा रही है -- सब मिलकर रात्रि संगीत बना रहे हैं, जो यदि बिस्तर पर लेट कर सुनो तो बहुत मधुर लगता है। अभी यह संगीत वार्का को झुंझला रहा है, परेशान कर रहा है क्योंकि उसे सुनकर नींद आ रही है और सोना मना है। भगवान न करे; यदि वार्का सो जाती है तो मालिकों की पिटाई खानी पड़ेगी।
      बल्ब की रौशनी झिलमिलाती है। हरा धब्बा और परछाइयाँ हिलने लगती हैं और वार्का की अधखुली, थकी आँखों में घुसने लगती हैं, उसके नींद से अधसोये दिमाग में धुंधले सपने उभरने लगते हैं। उसे काले बादल दिखाई देते हैं जो आसमान में एक दूसरे का पीछा कर रहे हैं और चीख रहे हैं मानो बच्चे हों। लो, हवा चल पड़ी, बादल गायब हो गए, अब वार्का को एक चौड़ा रास्ता नजऱ आ रहा है जो कीचड़ से सना है। रास्ते पर मालगाडिय़ों की आवाजाही है, लोग अपनी पीठ पर बोझा उठाये जा रहे हैं, कुछ परछाइयाँ आगे-पीछे हो रही हैं; रास्ते के दोनों ओर ठन्डे धुंधलके के पार जंगल दिख रहे हैं। अचानक बोझ उठाये लोग और परछाइयाँ कीचड़ में गिर जाते हैं। ऐसा क्यों हुआ? - वार्का सवाल करती है। उसे जवाब मिलता है - सोने के लिए, सोने के लिए, और वे गहरी नींद में चले जाते हैं, खूब अच्छी तरह सोते हैं। टेलीग्राम के तारों पर बैठे कौवे और नीलकंठ बच्चे की तरह चीख-चीख कर उन्हें उठाने की कोशिश करते हैं।
      .......सो जा बच्चा सो जा, मैं लोरी गाती हूँ.... वार्का बुदबुदाती है और स्वयं को एक अँधेरे, सीलन से भरे झोपड़े में देखती है।
      जमीन पर लेटा हुआ उसका पिता ऐफीम स्तेपानव करवटें बदल रहा है। वह उसे देख नहीं रही पर सुन रही है कि किस तरह वो दर्द से कराह रहा है और जमीन पर छटपटा रहा है। उसका हार्निया का दर्द बढ़ता जा रहा है।
दर्द इतना ज्यादा है कि वह एक भी शब्द बोल नहीं पा रहा, बस साँसें भर कर, दांतों को पीसकर ... बू-बू-बू-बू ......की आवाज़ें निकाल रहा है।
     उसकी माँ पिलागेया जागीरदार के पास दौड़ी-दौड़ी बताने गयी है कि ऐफीम मर रहा है। उसे गए हुए बहुत देर हो गयी है, उसे अब लौटना चाहिए। वार्का तंदूर पर लेटी हुई है, सो नहीं पा रही, बस पिता की दर्दनाक ...बू बू बू बू.. आवाज़ें सुन रही है। बाहर से आवाज़ आ रही है, झोपड़े के पास कोई तो आ रहा है।  जागीरदार ने  नौजवान डॉक्टर को भेजा है जो उनके यहाँ मेहमान बनकर शहर से आया है। डॉक्टर झोपड़े में घुसा, दिख तो नहीं रहा पर उसकी खँखारने और दरवाजे के चरमराने की आवाज़ सुनाई पड़ी।
...... आग जलाइए,..... वो कहता है.
...... बू-बू-बू-बू... जवाब में ऐफीम कहता है।
     पिलागेया तंदूर के पास आकर माचिस की तीली ढूंढती है। एक मिनट सन्नाटे में गुजर जाता है। डॉक्टर अपनी जेब टटोलकर माचिस निकालता है और जलाता है।
..... अभी, मालिक, अभी, .... कहती हुई पिलागेया झोपड़े के बाहर जाती है और मोमबत्ती का जलता टुकड़ा लेकर लौटती है।
    ऐफीम के गाल गुलाबी हैं, आँखें चमक रही हैं और नजरों में एक तीखापन है, जैसे डॉक्टर और झोपड़े के पार कुछ दिख रहा हो।
....तो, क्या हुआ है? तुमने क्या कर डाला है?- डॉक्टर बोलता है, उसके ऊपर थोड़ा झुकते हुए पूछता है, - तुमको ये तकलीफ बहुत दिनों से है?
....क्या बताऊँ? सरकार, मेरा समय आ गया है... मैं नहीं बचूंगा.....
.... बकवास बंद  करो .... इलाज करेंगे, ठीक हो जाओगे?
..... आप चाहे जो कहें सरकार, आपको धन्यवाद पर हम जानते हैं..... जब मौत आ जाये तो कोई कुछ नहीं कर सकता।
    डॉक्टर 15 मिनट तक ऐफीम को देख-परख कर उठ जाता है और कहता है -
 ....मैं कुछ नहीं कर पाउँगा... तुम्हें अस्पताल जाना चाहिए, वहां तुम्हारा ऑपरेशन करेंगे। तुरंत जाना होगा...अभी के अभी! थोड़ी देर और हो जाएगी तो अस्पताल में सब सो जायेंगे, पर चिंता मत करो, मैं तुम्हें चि_ी देता हूँ। सुन रहे हो?
....मालिक, ये कैसे जायेगा? हमारे पास तो घोड़ा भी नहीं है -  पिलागेया बोलती है।
...कोई बात नहीं, मैं जागीरदार साहब से बोल देता हूँ, वो घोड़ा भेज देंगे।
    डॉक्टर चला जाता है, मोमबत्ती बुझ जाती है और फिर बू बू बू...की आवाजें सुनाई देने लगती हैं। आधे घंटे बाद झोपड़े के पास कोई आकर रुकता है। जागीरदार ने एक ठेला भेजा है। ऐफीम उठता है और अस्पताल जाने की तैयारी करता है।
    सुबह हो जाती है - साफ़, स्वच्छ सुबह। पिलागेया घर पर नहीं है, ऐफीम का हाल जानने अस्पताल गयी है। कहीं बच्चा रो रहा है और वार्का को अपनी ही आवाज़ में लोरी सुनाई दे रही है-
     सो जा बच्चा सो जा, मैं लोरी गाती हूँ....
     पिलागेया लौट कर आ चुकी है, वो छाती पर सलीब का निशान बनाती है और कहती है-
-- रात को तो वो ठीक हो रहा था, पर सुबह भगवान के पास चला गया.... स्वर्ग में उसे शांति मिले....कह रहे थे, देर कर दी ....यदि थोड़ा जल्दी ले आते तो .....
     वार्का जंगल में जाकर रोती है, पर अचानक उसके सिर पर पीछे से कोई इतने जोर से मारता है कि उसका माथा पेड़ से टकरा जाता है। आँखें खोलकर ऊपर उठाती है, उसका मालिक सामने खड़ा है।
... क्या कर रही है, जाहिल लड़की ?...बच्चा रो रहा है और तू सो रही है?
    वो जोर से उसका कान उमेठता है, दर्द से वार्का अपने सिर को झटका देती है, पालना झुलाती है और लोरी बुदबुदाने लगती है। हरा धब्बा और पोतड़ों-पतलूनों की परछाइयाँ हिलती हैं, उसे आँख मारती हैं और फिर उसके दिमाग पर कब्ज़ा कर लेती हैं। उसे दुबारा कीचड़ से सना रास्ता नजऱ आता है। बोझ उठाये लोग और परछाइयाँ लेटे हुए हैं और गहरी नींद में हैं। उन्हें देखकर वार्का को सोने की बहुत इच्छा होती है। वो तो आराम से लेट जाती पर माँ पिलागेया पास में चल रही है और जल्दी मचा रही है। दोनों काम ढूंढने शहर जा रहे है।
....भगवान के नाम पर कुछ दे दो! .. माँ राह चलते लोगों से भीख मांग रही है... भगवान आपका भला करें, दयालु लोगों!
...बच्चे को यहाँ दो!...  उसे जानी-पहचानी आवाज़ सुनाई देती है।
.... बच्चे को यहाँ दे! ...वही आवाज़ दोहराती है, पर अबकी बार गुस्से में और तीखी है। ...सो रही है, नालायक?
    वार्का उछल कर उठती है और देखती है कि बात क्या है।  उसे समझ में आ जाता है कि कोई रास्ता नहीं है, पिलागेया नहीं है, राह चलते लोग नहीं हंै, बल्कि कमरे के बीच में मालकिन खड़ी है, जो बच्चे को दूध पिलाने आई है। जब तक मोटी-चौड़ी मालकिन बच्चे को दूध पिलाती है तब तक वार्का खड़ी रह कर उसे देखती रहती है और इंतज़ार करती है कि कब ख़त्म करेगी। खिड़की पर नीली धुंध आ चुकी है, परछाइयाँ और धब्बा धीरे-धीरे हलके पड़ रहे हैं, जल्द ही सुबह होने वाली है।
... ले! ... मालकिन अपना ब्लाउज़ ठीक करते हुए बोलती है।
 ...रो रहा है, ज़रूर किसी की नजऱ लगी है।
    वार्का बच्चे को लेती है, पालने में डालती है और फिर झुलाने लगती है। हरा धब्बा और परछाइयाँ धीरे-धीरे गायब हो रहे हैं, अब कोई उसके दिमाग में घुसेगा नहीं और बहकायेगा नहीं। पर नींद पहले जैसी ही आ रही है, खूब आ रही है। वार्का पालने के सिरे पर अपना सिर टिका देती है और पूरा जोर लगाकर पालने को झुलाती है ताकि नींद को भगा सके पर आँखें उनींदी ही हो रही हैं और सिर भारी हो रहा है।
...वार्का, तंदूर जला! .. दरवाजे के पार से मालिक की आवाज आती है।
    यानी कि उठने का समय हो गया और अब घर के कामकाज करने होंगे। वार्का पालना छोड़कर सराय की ओर लकडिय़ाँ लेने भागती है। वो खुश है, जब दौड़ो और चलो तो उतनी नींद नहीं आती, जितना कि बैठे-बैठे। वो लकड़ी लेकर आती है, तंदूर जलाती है और महसूस करती है कि उसका काठ हुआ जा रहा चेहरा ठीक हो रहा है और विचार स्पष्ट हो रहे हैं।
...वार्का, समावार लगा! (चाय के लिए रुसी पारम्परिक बर्तन) ...मालकिन चिल्लाती है।
    वार्का कुछ तीलियाँ लेकर उन्हें जलाकर समावार में लगाने जा रही होती है कि एक नया आर्डर सुनाई देता है-
.. वार्का, मालिक के जूते साफ़ कर!
    वो जमीन पर बैठकर जूते साफ़ करती है और सोचती है कि इन बड़े, गहरे जूतों में अपना सिर घुसाकर थोड़ी देर के लिए सो जाये... अचानक जूता बढऩे लगता है, फूलने लगता है, पूरा कमरा उससे भर जाता है। वार्का की पलके मुंदने लगती हैं। तभी वो अपने सिर को झटका देती है, आँखें मसलती है और ध्यान लगाती है ताकि चीजें बड़ी न होने लगे और उसकी आँखों के सामने हिलने न लगे।
....वार्का, सामने की सीढिय़ां धो दे, नहीं तो ग्राहकों के सामने शर्म आती है!
    वार्का सीढिय़ां धोती है, कमरे साफ़ करती है, फिर दूसरा तंदूर जलाती है, स्टोर में भागती है। बहुत काम है, एक मिनट भी खाली नहीं है।
    पर कोई भी काम इतना मुश्किल नहीं है जितना कि रसोई में मेज के सामने एक जगह खड़े होकर आलू छीलना। सिर एक ओर गिरने लगता है, आलू आँखों के सामने तैरने लगते हैं, चाकू हाथ से छूटने लगता है, और पीछे से मोटी, गुस्सैल मालकिन अपनी बाहें चढ़ाये चलती रहती है, ऊपर से इतना ऊँचा बोलती है कि कान बजने लगते हैं। इसी तरह एक जगह खड़े होकर खाना परोसना, कपड़े धोना और सिलाई करना भी मुश्किल होता है। ऐसे पल आते हैं कि लगता है कि कुछ नहीं देखो, बस जमीन पर लेटकर सो जाओ।
   दिन गुजर जाता है। खिड़की के बाहर अँधेरा देखकर वार्का अपनी कनपटियां दबाती है और मुस्कुराती है। उसे खुद पता नहीं कि क्यों खुश है। शाम का धुंधलका उसकी उनींदी आँखों को सहलाता है और जल्द ही गहरी नींद का वादा करता है। शाम को मालिक के मेहमान आ जाते हैं।
....वार्का, समावार लगा! ... मालकिन चिल्लाती है।
   समावार छोटा है, सब लोगों के चाय पीने तक उसे पांच बार लगाना पड़ता है। चाय के बाद मेहमानों की फरमाइशें सुनने और पूरा करने के लिए एक ही जगह एक घंटे तक खड़े रहना पड़ता है।
... वार्का, दौड़कर तीन बोतल बीयर खरीद कर ला!
   वो दौड़कर जाती है, और तेज दौडऩे की कोशिश करती है ताकि नींद भाग जाये।
....वार्का, दौड़कर वोद्का लेकर आ! वार्का, ओपनर कहाँ है? वार्का,  ये दाग साफ़ कर।
   आखिऱकार मेहमान चले गए; रौशनी बुझा दी गयी, मालिक-मालकिन सोने चले गए।
....वार्का, बच्चे को झुलाती रहना!... आखिरी आर्डर मिलता है।
   तंदूर में झींगुर आवाज़ करता है; हरा धब्बा और पोतड़ों-पतलूनों की परछाइयाँ फिर से वार्का की आँखों में घुसती हैं और उसके दिमाग को धुंधलके से भर देती हैं।
... सो जा बच्चा सो जा,... वार्का बुदबुदाती है --  मैं लोरी गाती हूँ.....।
    बच्चा चीखता है, चीख-चीख कर थक जाता है। वार्का को फिर से गन्दा रास्ता, बोझ उठाये लोग, पिलागेया, पिता ऐफीम नजऱ आते हैं। वो सब समझती है, सबको पहचानती है पर आधी नींद में उसे यह बिलकुल समझ में नहीं आता कि वो कौन सी शक्ति है जो उसके हाथ-पैर बांधकर नीचे गिरा रही है और जीने नहीं दे रही। वो अपने आसपास देखती है, उस शक्ति को ढूंढती है ताकि उससे छुटकारा पा सके, पर नहीं ढूंढ पाती। अंतत: थककर वह अपनी सारी ताकत और नजर लगाकर ऊपर हिलता हुआ हरा धब्बा देखती है, इतने में बच्चे का रोना सुनती है और अपने दुश्मन को ढूंढ लेती है, जो उसे जीने नहीं दे रहा।
   वो दुश्मन ...बच्चा है।
वो मुस्कुराती है। उसे आश्चर्य होता है, इतनी सी बात वो अब तक क्यों नहीं समझ पाई? हरा धब्बा, परछाइयाँ और झींगुर भी मानो मुस्कुराते है और आश्चर्य जताते है।
   भ्रम वार्का को अपनी गिरफ्त में ले लेता है। वो अपने स्टूल से उठती है, खूब मुस्कुराती है, आँखें मिचकाए बिना कमरे में टहलती है। उसे यह ख्याल बहुत भाता है कि वो अब बच्चे से छुटकारा पा लेगी, जो उसके हाथ-पैर बांधकर नीचे गिरा रहा था.. बच्चे को मार डालेगी और फिर खूब सोयेगी, सिर्फ सोयेगी..।
   हँसते हुए, हरे धब्बे को आँख मारते हुए और उसे उंगली से इशारा करते हुए वार्का चुपके से पालने के पास जाती है और बच्चे के ऊपर झुक जाती है। उसका गला दबाकर वो जल्दी से जमीन पर लेट जाती है, ख़ुशी से मुस्कुराती है कि अब उसे सोने मिलेगा, और एक मिनट बाद इतनी गहरी नींद में सो जाती है, मानो मर चुकी हो...।

प्रतिक्रियाएँ
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[18/03 05:14] ‪+91 99588 37156‬: पुलिस टॉर्चर में सोने नही देना भी एक टॉर्चर पद्धति है जो बिना मार पीट के अपराधी से सारे राज़ उगलवा लेती है। इस कहानी को पढ़कर नींद के आभाव की भयावहता का अहसास होता है और साथ ही क्रूर स्वामियों का भी जिनके लिए नौकर एक रोबोट का पर्याय है  । कहानी देर तक  स्मृति में टँगी रहेगी।
[18/03 11:14] Kavita Varma: दुनिया की आखरी रात बहुत अच्छी कहानी है । नीेंद ना होने पर भ्रम का होना और दिमाग का भयावह सोच लेना डरा गया । सामंतवादी प्रवात्ति किस कदर इंसान को गुलाम समझने लगती है उसका सटीक और कंपा देने वाला वर्णन है । आभार राजेश जी अच्छी कहानी पढ़वाने के लिये।
[18/03 12:17] ‪+91 94249 90643‬: कहानी का अंत भय उत्पन्न करता है ,लेकिन एक सच यह भी कि नींद हर जीव की आधार भूत आवश्यकता है ,उसे वह गुलाम लड़की कब तक झुठलाती ....अंततोगत्वा वह मुक्ति की चाह में गुनाह कर बैठी ..इंसान को इंसान ना समझ जानवर का सा बरताव मिले तो उसका हठात विध्वंसक हो उठना स्वाभाविक न भी हो तो   उसे   दया का पात्र बनाता है .
[18/03 13:59] shivani sharma Ajmer: आज बहुत दिनों बाद मच पर आना हो पाया है। काम की अधिकता थी और सचमुच नींद के लिए बहुत तराई थी।
कहानी पढ़कर मन न जाने कैसा-कैसा हो आया....
इतने अमानवीय और ह्रदयहीन व्यवहार कोई कैसे कर सकता है!!
बहुत मार्मिक कहानी । एडमिन पैनल का आभार
😊 😊
[18/03 14:26] Manish Vaidhy: नींद कहानी आसपास के परिवेश के विवरण के साथ धीरे -धीरे पसरती हुई आगे जिस रोचक अंदाज़ में बढ़ती है। वह चेखव का कमाल है पर यहाँ मैं इसके सटीक अनुवाद की बात करना चाहता हूँ। तरुशिखा जी ने जिस बारीकी और शिद्दत से यह अनुवाद हमारे बीच रखा है, जबर्दस्त कहना होगा। हमें लगता है कि हम रुसी नहीं कोई हिंदी कहानी ही पढ़ रहे हैं। यही अनुवाद की सार्थकता ही है कि कहानी हमें अपने से जोड़ ले, उसकी संवेदना हमारी होने लगे और यहाँ ऐसा हुआ भी है। समावार  से ही इसके रुसी होने का अहसास मिलता है, नहीं तो हिंदी ही लगती है। अच्छे अनुवाद के लिए तरुशिखा जी का शुक्रिया।
[18/03 16:31] Saksena Madhu: बेहतरीन कहानी  ' नींद ' अन्तोन चेखव की कहानी .......नींद मनुष्य की आवशयक आवश्यकता है .....गुलामो पर होती अमानवीयता को रेखांकित करती है ये कहानी ...दृश्य भरता जाता  है आखों में ..पाठक को भी नींद के सारे लम्हे याद आने लगते हैं ... तेरह वर्षीय बालिका पर काम के बोझ और सो न पाने की वजह उससे ये अपराध करवा लेती है ।अन्याय ही अपराध को जन्म देता है .....नींद के मनोविज्ञान को खूब उकेरा लेखक ने .. सपनों के माघ्यम से बालिका का मनोविज्ञान समझ आता है ।एक बोझ लिए घूमती रहती है वो ....बढ़िया कहानी के लिए प्रवेश और राजेश जी को धन्यवाद ।
[18/03 17:59] Pravesh soni: मालिक का सामन्ती व्यवहार और भयातीत तेरह वर्षीय नौकर के रूप में अबोध बालिका ।जो अपनी नींद उड़ाने के लिए सभी जतन करती है ,लेकिन नींद तो स्वभाविक क्रिया होती है मानवीय शरीर  की ,कहाँ तक रोक पाएगी ।बहुत ही मार्मिक चित्रण किया अनुवाद में भी ।कहानी कही रूकती नही ,पाठक के अंतर्मन में समावित होकर विचलित करती है , विशेषकर कहानी का अंत ।
जो एक नींद के लिए अबोध लड़की से गुनाह करवा देता है ।
[18/03 18:56] Padma Ji: मनोभावों को अभिव्यक्त करती सार्थक और अच्छी कहानी। भाषा और शैली कहानी को उच्च शिखर पर पहुंचती है। बाधाई
[18/03 21:37] ‪+91 94116 56956‬: चेखव की एकदम क्लासिक टाइप की कहानी जिसको आप विजुअलाइज कर सकते है । एक दृश्य जो पाठक के मन में दर्ज होता जाता है एंगिल बाई एंगिल और उसकी दृष्टि का विहान कब संवर्धित हो जाता है उसे पता ही नहीं चलता ।  आभार प्रवेश जी क्लासिक पढ़वाने के लिए ।
[18/03 22:03] Rajesh Jharpare: रोटी छीना, कपड़े छीने, आलय बनने न दिया। इससे भी सामंतवादिता क्रुरता तुष्ट नहीं हुई तो तेरह वर्षीय आयावार्का की नींद भी छीन ली।
वह जो नींद में भी अपना घर, पिता-ऐफीम स्तेपानव और माँ- पिलागेय को स्पष्ट रूप् से महसूस कर पाती है पर अपनी नींद के दुश्मन को नही जानती । इसका आभास उसे बहुत बाद में होता हैं। चेखक को यह निर्णय लेने में बहुत कठिनाईयों का सामना करना पड़ा होगा। 13 वर्षीय आयावार्मा की नींद और एक नवजात शिशु का जीवन...। किसे बचाया जाये...? हालाँकि दोनों ही ज़रूरी और महत्वपूर्ण हैं।

इस दुविधा का निवारण चेखव  के शब्दों में  ढूंढे तो आपने लिखा था ‘‘ मेरा अनुभव है कि जीवन में दर्द और पीड़ा का अहसास ही सबसे अधिक महत्तवपूर्ण हैं। मनुष्य  के दर्द और वेदना भरे जीवन में कलात्मक सत्य या लय के स्वर ढूंढ पाना एक मुश्किल काम हैं। कथाकार की खूबी यही है कि वह पृष्ठभूमि, अमूर्त और अस्पष्ट राग-विरागों में से, रूप,रंग,ताल और लय का वातावरण उपस्थित कर सके। सफलता तो तभी हैं जब यह चित्रण पढ़ने वालों के दिल को सहज ही छू जाये।‘‘ इस कहानी के साथ भी यही होता हैं। यह हमें शुरू से अपने साथ जोड़े चलती हैं। अन्त  13 वर्षीय आयावार्मा  को भय और निर्दयता से आक्रांत पलों से मुक्त कराता हैं।
 मंच पर आई बेहतरीन कहानी और अनुवाद की श्रेणी में यह भी एक कहानी ।

आज की कहानी के सभी पाठक मित्रों का शुक्रिया।  जो मित्र अपनी व्यस्तता के कारण कहानी नहीं पढ़ पाये हैं वे इसे कचहानी के ब्लाॅग मंच पर अवश्य पढ़े।
शनिवार और रविवार दो दिनों के अवकाश के बाद पुनः भेट होगी।

शुभरात्रि मित्रो।

।। राजेश झरपुरे ।।

Monday, March 14, 2016




"साहब, दीदी और गुलाम " 
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मूल मराठी कहानी – दया पवार
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अनुवाद – डॉ. विजय शिंदे
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उदासी की हालत में सड़क से चल रहा था। कलम घिसाई करते पीठ में दर्द होने लगा था। सोच रहा था कि कब घर पहुंच जाऊंगा। इतने में एक टैक्सी मेरे सामने आकर हठात् रुक गई। पिछली सीट से आवाज आई, "हाय, अबे वामन, कितने बरसों बाद मिल रहा है रे तू!"

मैंने पीछे मुड़कर देखा। मोहन था। इतना बदल गया था कि पहचानना मुश्किल हो रहा था। उसकी आवाज से ही मैं उसे पहचान सका। वह पहले छरहरा था अब कबूतर जैसे फुल गया था। चेहरे पर से मानो ताजगी टपक रही थी। सुंदर रोबदार पोषाक में आकर्षक दीख रहा था। उसने टैक्सी का दरवाजा झट से खोल दिया और मुझे बैठने का अनुरोध करने लगा। मैं भूल गया था कि मुझे घर लौटना है। किसी कठपुतली की तरह मैं उसके पास सिट पर जाकर बैठ गया। टैक्सी सरपट दौड़ने लगी। मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए उसने कहा, "अबे वामन, अच्छा हो गया कि तू मिल गया। मुझे भी कंपनी की जरूरत थी।"

"तुम्हारा बिझनेस कैसे चल रहा है।" मैंने ऐसे ही कुछ पूछना चाहिए इसलिए पूछ लिया।

अब उसने सिगरेट सुलगा दी। धुआं छोड़ते हुए बोला, "इमरजंसी में डाऊन हो गया था, अब तेजी है। नई मुंबई में दूसरी फैक्ट्री लगा रहा हूं।" अपने कारोबार के बारे में वह काफी उत्तेजना के साथ बताते जा रहा था। सरकारी टेंडर, रॉ मटेरिअल ऐसे कई शब्द उसके होठों से झर रहे थे। टैक्सी ने अब रफ्तार पकड़ी थी। इमारतें, लोग पीछे छूटते जा रहे थे। और मेरे दिमाग में कॉलेज के दिनों के मोहन की याद ताजा हो रही थी। अमीर बाप की इकलौती औलाद। कॉलेज आता था तो बिल्कुल साफ-सुथरा, टकाटक। उसके सामने हम बड़े भौंड़े और गंवार लगते थे। लेकिन उसने हमारे सामने कभी अमीर होने की शेखी दिखाई नहीं। हमारे साथ वह काफी घुलमिल गया था। वैसे हमारी हालत हमेशा खस्ता रही थी। लेकिन मोहन को रोज उसके घर से पांच-दस रुपए पॉकेटमनी के तौर पर मिला करते थे और इन्हीं रुपयों को वह खुले दिल से हम पर खर्च करता था।

उसके मन में हमारे प्रति कभी एहसान या उपकार का भाव नहीं रहता था। मुझ पर उसकी अन्यों की अपेक्षा ज्यादा मर्जी रहा करती थी। कॉलेज के दिनों में एक-दो बार पिकनिक के लिए मेरे पास पैसे नहीं थे, मोहन ने दिए और बड़े प्यार के साथ मुझे अपने साथ लेकर गया था। फिर हम राष्ट्र सेवा दल में जाने लगे। हममें से कई तो इस आशा से बढ़-चढ़कर हिस्सेदारी लेते थे कि किसी ब्राह्मण लड़की को पटाने का आसान मौका मिल जाएगा। मोहन भी हमारे साथ रहता था। राष्ट्र सेवा दल के गीतों की धून उसके सर पर चढ़कर बोल रही थी। वह बहुत अच्छा गा लेता था। राष्ट्र सेवा दल में बौद्धिक पाठ हुआ करते थे। नई चेतना मिल रही थी। शायद, यहीं वजह थी कि मोहन में धीरे-धीरे परिवर्तन हो रहा था। ठाटबाट वाले कपड़े पहनना उसने छोड़ दिए। वह खादी के कपड़े पहनने लगा। हाथ में झाडू लेने लगा। अपने बेटे की भिकारियों जैसी हरकतों को देखकर उसके पिता जी नाराज हो गए। बातों-बातों में जब उसके पिता का जिक्र होता तो मोहन चिढ़ जाता था। "साला, अपना बाप तो महाचोर है। मजदूरों के साथ ऐसे पेश आता है जैसे मुर्गी को दाने डाल रहा हो। उन्हें आपस में लड़वाता है। इसलिए टेंपररी और परमानेंट मजदूरों की कभी पटती नहीं है। दस-पंद्रह बरस नौकरी करने के बावजूद भी टेंपररी रखा गया मजदूर चूं नहीं कर सकता।" बाप की यह तोड़-फोड़ की नीति मोहन को पसंद नहीं थी। बाप के प्रति उसका यह विद्रोह देखकर हम चकित होते थे।

इन सारी बातों की याद आने पर मैंने उसे पूछ लिया, "क्यों रे, तेरा सोशल वर्क कैसे चल रहा है?"

मोहन ने जोश के साथ कहा, "मैं रोटरी कल्ब का मेंबर हूं। पिछले हप्ते हमने वरली के मामानगर झोपड़पट्टी वालों को लाश ढोने की एक गाड़ी दी है। डॉक्टर का एक घुमंतू दल बना लिया है। पंद्रह अगस्त को रक्तदान शिबिर का आयोजन किया था।" सोशल वर्क की बातें करते-करते वह फिर बिजनेस की बातें करने लगा, "अब महाराष्ट्रीयन लोगों को बिजनेस करना चाहिए। कलमघिसाई के दिन अब लद गए हैं।"

इन सारी बातों को सुनते वक्त मेरे मन को अंदर से कुछ कुरेदते जा रहा था।

मैंने बाहर झांककर देखा। अलेकजंड्रा सिनेमा के कोने से होते हुए टैक्सी फरोस रोड की दिशा में जा रही थी। मैं सहसा सहम गया। मैंने उसे पूछा, "क्यों रे, हम लोग कहां जा रहे हैं? यह कोई अच्छी बस्ती तो है नहीं।" वह खिलखिलाकर हंसते जा रहा था। उसकी हंसी मेरे लिए अजनबी थी।

"डरो मत! दीदी के पास जा रहे हैं।"

"कौन-सी दीदी।" मेरा दमघोंटू सवाल।

"कोठे वाली है। कमाल का गाती है। ठगे से रह जाओगे। मराठी रंगमंच के कुछ मशहूर अभिनेता भी दीदी के यहां आते हैं।"

मुझसे रहा नहीं गया तो पूछ लिया, "कोठे के गाने सुनने का शौक तू कब से पालने लगा?"

"हमारी सत्रह पीढ़ियों के खून में गाना रच-बस गया है।" उसकी बातों में परंपरा का अभिमान झांक रहा था। मुझे अचरज था कि राष्ट्र सेवा दल के गानों में रममान होने वाली उसकी रुचि में अचानक बदलाव कैसे आ गया?

फरोस रोड के माहौल से मैं पहले से ही परिचित था। मेरा बचपन इसी इलाके में गुजरा था। पूरे दस-पंद्रह बरस के बाद मैं इस तरफ आ रहा था। ऊपर की मंजिलों पर टंगे हुए कई नंबर वाले कमरे थें। नीचे वेश्याओं के लोहे के पिंजड़े। उनकी भूखी नजरें। पुलिस की नजरों से बचकर फुटपाथ के पास, बिखरे चेहरे को रंगों में छिपाकर खड़ी औरतें। सब वैसा ही था। दस-पंद्रह बरसों में कोई खास बदलाव नहीं हुआ था। अपवाद थी आस-पास उठी कुछ ऊंची इमारतें और उसके नीचे मारवाड़ी दुकान जो नई लग रह थी। मैं जब यहां के स्कूल में पढ़ता था तब मेरे कुछ दोस्त मुझे इस गली मे घुमाने ले आते थे। उन दिनों मैं उन पर बहुत नाराज होकर गुस्सा करता था। कहता था, "मेरे दोस्तों, ताड़ी के पेड़ के नीचे बैठकर छाछ भी पिओ तो लोग कहेंगी कि ताड़ी ही पी रहे हो।" मेरी इन सीधी बातों का वे मजाक उड़ाते थें। मैं चिढ़ जाता था, इसीलिए जानबूझकर वे इन्हीं रास्तों से हमेशा जाया करते थें। यह यादें ताजा होते ही मैं हंस पड़ा। दस-पंद्रह बरसों में मैं भी कितना बदल गया था।

"क्यों हंस रहे हो?" मुझे सहसा हंसते हुए देखकर मोहन ने पूछ लिया।

"मैं इसलिए हंस रहा हूं कि तू कोठे वाली बाई को दीदी कह रहा है।" यह कहते हुए मैं मेरे मन में उठी बातों को छिपाने की कोशिश कर रहा था।

टैक्सी फुटपाथ के पास एक इमारत के सामने खड़ी हो गई। हमारी बातचीत बीच में ही थम गई। मोहन के साथ मैं भी नीचे उतर गया। मोहन ने टैक्सी वाले को रुकने के लिए कह दिया। मोहन की शिकायत थी कि वापसी के दौरान इस गली में टैक्सी नहीं मिलती है। मैं टैक्सी के बढ़ रहे बिल के लिए चिंतित था।

सामने देखा! इमारत की सूरत बेहाल थी। नजदीकी होटलों से फिल्मी गानों की चीख सुनाई पड़ रही थी, शोरगुल इतना था कि पता ही नहीं चल रहा था कि कौन-सा गाना बज रहा है? मोहन के पीछे-पीछे मैं भी एक गलियारे से होकर अंदर चला गया। शींककबाब की भुनी हुई खुशबू आ रही थी। मैं खुशबू को भूल गया था, दूबारा वह ताजा हो गई। मैंने देखा कि सीढ़ियों के नीचे जलते हुए अंगारों पर लोहे की छड़े सेंकी जा रही थी। सीढ़ी के लकड़ी वाले तख्त टूटी-फूटी हालत में थे। ऊपर चढ़ते वक्त पैर फिसलने का भय था। हम पहले माले पर पहुंच गए। वहां एक से एक जुड़कर गाने वाली औरतों की कोठियां थीं। कुछ कोठियां बहुत छोटी थी। आठ बाई बारह की। साजिंदे, बाजे वाले कोने में सहमकर बैठे थे। उनके सामने कुछ औरतें बैठकर मेकअप कर रही थी, तो कुछ पान के बीड़े लगा रही थी। उनमें से एक चेहरा अच्छे से याद है; उसने एक तरफ से मेकअप किया था, दूसरी तरफ आंखों के आसपास काले धब्बे जमा हो गए थें। एक घनी काली दाढ़ी वाला फकीर अपने हाथ में अंगारे से भरा बर्तन संभालता हुआ उसमें लोबान डालते हुए कोठी-दर-कोठी घूम रहा था। उसके उग्र दर्प से माहौल भरा हुआ था। कहीं से गाने की कोई दर्दभरी तान सुनाई पड़ रही थी। साथ में घुंघरुओं की आवाजें। मोहन शायद हमेशा यहां आता होगा। किसी न किसी कोठी के सामने रुक जाता था, थोड़ी बात करते आगे बढ़ जाता था। मैं भी उसके पीछे-पीछे घसिटते जा रहा था। कुछ मदहोश जवान गदराई हई लड़कियां हंसकर उसे आदाब फर्मा रही थी, ‘साब, गाना सुनके जाना!’ अनुरोध कर रही थी। उनके अनुरोध में मुझे विवशता का भाव दिखाई पड़ रहा था।

ऊपरी मंजिल पर आ गए। मोहन ने रेशमी पर्दे को हटाया। मैंने अंदर झांका, लंबा-चौड़ा हॉल था। दूसरे कोठियों की अपेक्षा यह कोठी बेहतर सजी थी। दीवारों पर हरा रंग था। दीवारों से सटकर भारी कोच लगे थे। बीच में बेहद लाल रंग की कालीन बिछी थी। कोने में साजिंदे अपने साज-सूरों को मिला रहे थे। हमें देखकर तीस-चालीस साल की औरत सामने आ गई। मोहन को देखकर उसके चेहरे पर मुस्कान छाई। हमें कोच पर बैठने के लिए उसने इशारा किया। कोच पर बैठते ही मोहन ने बड़े लाड़ से कहा, "दीदी हम आ गए हैं।"

उसने शरारत भरे लहजे में कहा, "साब, बहुत दिनों बाद आ गए। मैं तो सोच रही थी कि दीवाली पर आ जाएंगे।"

"हम दीवाली भूले नहीं है।" कहते हुए मोहन ने एक ब्रीफकेस खोली और उसमें से एक बक्सा दीदी के हाथ पर रख दिया। बक्सा मिठाई का था। दीदी को दिली खुशी हो गई

उसने बैठे-बैठे बक्सा पास में बैठी बुढ़िया को दे दिया। बुढ़िया काफी गोरे रंग की थी। बुढ़ापे की वजह से चेहरे पर झुर्रियां थी। उसके बाल मेहंदी से रंगे हुए थे। उनमें से कुछ सफेद बाल झांक रह थे। इस उम्र में भी बुढ़िया ने आंखों में काजल लगाया था। उसके सामने पान का डिब्बा था। वह नाखून से पत्तों को साफ कर रही थी। उसकी तुलना में दीदी बहुत सीधी-सादी लग रही है। कुछ सावली-सी भी। मेकअप भी नहीं था। सुंदर भी नहीं थी। बुढ़िया के साथ उसका रिश्ता कौन-सा है पता नहीं चल रहा था! सहसा मेरा ध्यान सामने वाले कोच के नीचे चला गया। वहां किसी छोटे बच्चे के स्कूल का बस्ता पड़ा था। पास में फिरकी और पतंग भी था। मैं अकारण ही अनमना हो गया। माहौल असहनीय लगने लगा।

दीदी बाजे वाले के सामने बैठ गई। सारंगी और तबले की जुगलबंदी शुरू हो गई। अभी तक लोग नहीं आए थे। गाना सुनने के लिए हॉल में बस हम दो ही थे। दीदी ने गाना शुरू कर दिया। दीदी की आवाज बेहद दर्दभरी, कलेजे को चीरने वाली थी –

"हर एक बात पे कहते हो कि तू क्या है।

तुम ही कहो कि ये अंदाजे गुफ्तगू क्या है?"

मोहन ने मुझे धीरे से बताया कि यह गालिब की गजल है। शायद यह उसकी पसंदीदा गजल हो। अगला अंतरा सुनकर मेरा कलेजा भर आया।

"रंगों में दौड़ने फिरने के हम नहीं कायल।

जब आंख ही से न टपका तो लहू क्या है?"

दीदी बार-बार इन पंक्तियों को जी जान से गा रही थी। मैं पल भर के लिए गाना भूल गया। लग रहा था बरसात हो रही है। जंगल में शिकारियों की पुकारे सुनाई पड़ रही है। उन आवाजों में सहसा एक चीत्कार उस हीरनी की जो जान बचाने के लिए भागी जा रही है। मैंने मोहन की ओर देखा। उसके चेहरे पर खुशी दौड़ रही थी। वह गाने के रंग में रंग गया था। पीकदान संभाले हुए खड़ी औरत को उसने इशारा किया। दस-दस के नोट तश्तरी में रखे गए। अब मोहन साजिंदों की जुगलबंदी में खो गया। जब अच्छी तोड़ हो जाती थी तब दस के नोट को कागज की तरह गोल–गोल मोड़कर कभी सारंगी वाले को, कभी हारमोनियम वाले को तो कभी तबलची के पास फेंकने लगा। बाजा बजाते हुए वे भी नोट पकड़ रहे थें। दीदी का गाना खत्म हो गया। उसके माथे पर पसीने की बूंदे चमक रही थी। दीदी की सांस फूली हुई थी। वह अपने पल्लू से पसीना पोंछने लगी।

यह सब हो ही रहा था कि कहीं से पांच-छः लड़कियों का एक झुंड़ आ गया। सारी लड़कियां बेहद सुंदर, हसीन और कमसीन थी! गोरा-मुलायम बदन। जरूरत से ज्यादा सजी-संवरी। ऊंची और मंहगी साड़ियां पहने हुई! बाहर सड़कों पर चलें तो लगे कि बड़े-कुलीन घर की लड़कियां जा रही हो। नजरें शोख चंचल। उनमें से एक लड़की ने मेरी नजरों को बांधे रखा था। उम्र होगी कोई सोलह-सत्रह साल की। उसकी और टकटकी लगाए देखते हुए मैं जो सोचे जा रहा था वह ध्यान आते ही मानो झटका लग जाता है। वह लड़की हुबहू मेरे बेटी जैसे दिखाई दे रही थी। चेहरे का रखरखाव, मुस्कुराने की अदा, सारा कुछ उसके जैसा ही। वहां बैठना मुश्किल हो गया। मोहन को अपने मन की बात कैसे बता सकता था? वह तो मुझे मुर्ख और पागल करार देता! मैं बड़ी बेसब्री और व्याकुलता से चाहने लगा कि यह धरती फट जाए और मैं उसमें समा जाऊं!

नए गाने का आरंभ होते ही मेरा ध्यान टूट गया। लड़कियां अपने धून में नाचने लगी थी। उनमें से कुछ ने तालियों से ठेका पकड़ा था। हल्का फिल्मी गाना था –

"आएगीS आएगीS आएगीSS

तुमको हमारी याद आएगी।"

गाने के टुकड़े फेंकती हुए वे मोहन के सामने अदाएं कर रही थी। उनकी नजरों में मैं नाचीज था। मोहन दूसरा नोट निकालता तब तक उनमें से एक मोहन के सामने आकर बैठ गई। आंखों से इशारे करते हुए तालियों का संगीत बजाती रही और मोहन ने उसके हाथ में दस का नोट दे दिया। बहुत देर तक इस तरीके से ठुमके लगाए गए। मैंने नोटों को गिनना बंद कर दिया। सहसा मोहन का ध्यान दरवाजे के पास बैठे गजरे वाले की ओर चला गया। उसने गजरे खरीद लिए। लड़कियों की कलाई में बांधे। नाचते-नाचते एक गदराई बदन वाली लड़की का पल्लू पेट से नीचे खिसक गया। मैंने जैसे ही देखा, दंग रह गया। वह लड़की पेट से थी। उसका गोरा पेट मकई की कलगी जैसा फूला हुआ था। शायद पांचवा या छठा महिना चल रहा होगा। मैं मोहन के कान में फुसफुसाया। वह भी सहम गया। उसने उस लड़की को नाचने से मना किया और कोच पर बैठने के लिए कहा। उसको पता नहीं चला कि उसकी क्या गलती हो गई। अतः वह मायूस होकर कोच पर बैठ गई।

फिल्मी गानों के कारण लोग थोड़ी देर के लिए रुक जाते थे, पलभर के लिए बैठ जाते थे और फिर चले जाते थे। एक आदमी के कारण तो वहां का पूरा माहौल ही बदल गया। उसके आते ही लड़कियों ने नाचना बंद कर दिया। उसकी ओर देखकर लड़कियां मुस्कुराई और फिर नाचने लगी। वह आदमी हमारे सामने ही आकर बैठा था। उसने लखनवी कुर्ता पहन रखा था। बुजुर्ग था। तोंद चढ़ी हुई थी, कोयले के समान काला रंग था। हंसते ही उसके दांत जरूरत से ज्यादा चमक उठते थे। शायद कोई बड़ा रईस आदमी था। उसके एक हाथ की उंगलियों में हीरे की तीन-चार अंगूठियां झलक रही थी।

उसने आते ही नाचने वाली लड़की में से एक को इशारे से बुलाया। उसके हाथ में नोट रख दिए। बहुत देर से जो गाना चल रहा था वह तार की तरह टूट गया और उससे मुखातिब होकर लड़कियों ने एक सूर में नया गाना शुरू किया –

"हमें तो लूट लिया मिल के हुस्न वालों ने।

गोरे-गोरे गालों ने काले-काले बालों ने।"

मोहन को अब सचमुच गुस्सा आ गया था। गुस्से से उसका चेहरा तन गया। अब तक हम जो पैसे लूटा रहे थे उसकी कोई कीमत नहीं और अब यह कौन न जाने कहां से चला आया है, चंद रुपए देकर हमारा गाना तोड़ रहा है। इन्हीं भावों के साथ उसका चेहरा तमतमाया था। मोहन बहुत गुस्से में था। क्रोध से उसने दीदी की ओर देखा। कहा, "दीदी हमारा गाना पूरा होना चाहिए।" यह वाक्य सुनते ही उस आदमी ने हमारी ओर ठंड़ी नजर से देखा; जैसे कुछ हुआ ही नहीं। दीदी ने भी मोहन की ओर ध्यान दिया नहीं। गाना बड़े जोश के साथ चलता रहा। ‘हमे तो लूट लिया...’ मोहन अब गैरजरूरी हो गया था। उसका आहत चेहरा मैं ज्यादा देर तक देख नहीं सका।

गाना खत्म होते ही वह उठ गया। पीकदानी संभालने वाली औरत के सामने कुछ फुसफुसाया और चल पड़ा। मैंने खिड़की के बाहर झांककर देखा। कोठे के किनारे एक घोड़ागाड़ी खड़ी थी। मैंने फिर हॉल में देखा। वह सोलह-सत्रह साल की लड़की जिसकी तरफ मैं कब से देख रहा था, झूंड़ में नहीं थी। मेरे मन में अनचाहे संदेह पैदा होने लगे। मेरा मन जैसे सड़ गया हो।

उस आदमी के चले जाने के बाद मोहन दीदी के साथ लगभग झगड़े पर उतर आया। शायद उसे किसी हिंदी फिल्म का सीन याद आया हो। आखिरकार उसने कह ही दिया, "मैं आपको दीदी कहता हूं, हमें क्या आपके यहां ऐसा ही सम्मान मिलेगा?"

दीदी की आवाज भी ऊंची हो गई। "देखिए साब, दीदी का रिश्ता तो घर में होता है। दीदी कहते हो और बाजार में आते हो? यह तो बाजार है। अगर यहां कोई भी अठन्नी फेंकेगा तो हमें इज्जत करनी पड़ती है। पेट के खातिर यह सब करना ही होता है।" एक सांस में दीदी बोले जा रही थी। बोलते हुए लग रहा था उसके होंठ कांप रहे हैं।

मोहन गुस्से से बाहर निकल पड़ा। अपने अपमान को वह सहन नहीं कर सका।

हम सीढ़ियों से होकर नीचे चले गए। टैक्सी वाला सो गया था। दरवाजे के खुलने की आवाज से वह हड़बड़ाकर उठा। मोहन का और मेरा वापस जाने का रास्ता अलग-अलग था। उसने मुझे नजदीकी स्टेशन के पास छोड़ दिया।

अब मुझे होश आया कि रात बहुत हो चुकी है। मैं दौड़ते-भागते स्टेशन पर चला गया। स्टेशन की सीढ़ियों से उतर ही रहा था कि लोकल रेलगाड़ी मेरे आंखों के सामने से गति पकड़कर चली गई। सुनसान प्लेटफॉर्म पर मैं खड़ा था। वह आखिरी लोकल थी। अब तड़के तक कोई गाड़ी नहीं थी। मैंने बेंच पर अपना शरीर फैला दिया। प्लेटफॉर्म की धीमी रोशनी के बावजूद आस-पास का अंधेरा अजगर के भांति निगलते जा रहा था। उस अंधेरे में भी थोड़ी देर पहले देखी लड़की का चेहरा दिख रहा था और मेरी लड़की के चेहरे के साथ घुलमिल रहा था।

अनुवादक – डॉ. विजय शिंदे
देवगिरी महाविद्यालय, औरंगाबाद - 431005 (महाराष्ट्र)
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(मूल कहानी मराठी के प्रसिद्ध दलित साहित्यकार दया पवार की है। इनका पूरा नाम दगडू मारुती पवार है, साहित्यिक जगत् में दया पवार के नाम से इनकी पहचान बनी हैं। इनका जन्म अहमदनगर जिले के धामणगांव में इ. स. 1935 में हुआ। दलित जाति के भीतर जन्म पाने के कारण बचपन से दलितों के साथ होने वाले अन्याय-अत्याचार से भलिभांति वाकिफ थे। इनके ‘बलुतं’ नामक पहली आत्मकथात्मक साहित्य कृति के कारण मराठी साहित्य एवं दलित साहित्य में नया मोड आ गया। लेखक ने प्रस्तुत कृति में अपने आपको केंद्र में रखा और सारे दलितों के जीवन को वाणी देने का प्रयास किया है। इनकी इस कृति से प्रेरणा पाकर मराठी साहित्य में दलित लेखकों की एक बडी फौज निर्माण हो गई। ‘बलुतं’ आत्मकथन के बाद कहानीसंग्रह - ‘जागल्या’, ‘पासंग’, कवितासंग्रह – ‘कोंडवाडा’ ‘धम्मपद’, अन्य - ‘पाणी कुठंवर आलं गं बाई’, ‘विटाळ’ आदि भी इनकी रचनाएं काफी चर्चित रही है।)


प्रतिक्रियाएँ

[14/03 17:09] jitendra visariya: मराठी दलित साहित्य में दया पवार का नाम है। उनकी आत्मकथा बलूत में भी इस तरह का प्रसङ्ग है। जिसमें वो बताते हैं कि एक बार भद्र सफेदपोश लेखकों के साथ उधर से गुजर रहे थे तो पुलपर उन्हें बचपन में तमाम तरह की मदद करने वाली मुँह बोली मौसी दिखी जो अन्य बाजारू महिलाओं के साथ कहीं जा रही थीं और अब बहुत बूढ़ी हो चुकी थी पर वे  चाहकर भी उसे पुकार न सके थे....इस कहानी में। अपनी बेटी की शक्ल की लड़की का होना और उसके   प्रति असहाय स्तिथि का वर्णन उसी दशा से मेल खाता है। इस कहानी में एक लड़की का गर्भ से होते हुए नाचने की बेवसी गुरुदत्त की सर्वकालिक फ़िल्म प्यासा का स्मरण कराती है,जिसमें बच्चा भीतर रो रहा है और माँ मुज़रा करने को विवश है!!!  बेहद मार्मिक ।
[14/03 17:15] Rajesh Jharpare: धन्यवाद जितेन्द्र भाई ।

"साहब, दीदी और गुलाम " दया पवार की कहानी अब तक आप सभी मित्रो ने पढ़ लिया होगा । सम्भव हो तो अपनी प्रतिक्रिया से अवगत कराये । हालाँकि यह बाध्यता नहीं है । निरंक टिप्पणी भी कहानी पर महत्वपूर्ण टिप्पणी होती है ।

।।राजेश झरपुरे ।।
[14/03 17:19] Alka Trivedi: कहानी हिन्दी क्लासिक मूवी की तरह लगी
[14/03 19:03] ‪+91 97799 02911‬: दया पवार जी इस मर्मान्तक कहानी को पढ़ना बेहद पीड़ादायक और अवसदजन्य है। सच अपने नंगेपन में इतना भयावह और वीभत्स होता है। सच जो हम कालीन के नीचे दबा कर ढक देना चाहते है। मुम्बई, ग्रांट रोड, फरोस रोड एक ऐसी विकट सच्चाई के संज्ञानात्मज बोध है, जो सभ्यता के पीकदान से नवाजे जाते हैँ। अधिकांश नगर वधुएँ (वेश्या शब्द अश्लील मालूम होता है) जबरदस्ती इस पेशे में धकेली जाती है। कहानीकार अत्यंत निरपेक्षता से कहानी में लपेट लेता है और अंत में एक गहरी करुणा और व्यवस्था से गहनतम घृणा के बोध से भर देता है। इस कहानी को पढ़ते वक्त धीरेन्द्र अस्थाना की "उस रात की गन्ध" अनायास याद आती है। सफल कहानी के लिये अनेक बधाईया। 👍
[14/03 20:04] प्रज्ञा रोहिणी: मोहन भले ही जन समिति का हिस्सा हो अंततः उसकी साहबी मानसिकता उभरकर आ ही जाती है। दीदी भले ही कहे पर उस नरक के भीतर क्या वाकई धँसकर देखा उसने? और दीदी से उसका  अपनी फरमाइश पर अड़ना कहानी में वह स्वर पैदा करता है जो सतही तौर पर बाज़ारू व्यावसायिक लगे पर है तो सच जिसके पीछे पीड़ा की अनेक परतें हैं। कितनी स्त्रियों की विडम्बना के चेहरे सामने आ जाते हैं। और साहब दीदी और गुलाम खुलकर सामने आते है। अंत में बिटिया के चेहरे को उन चेहरों में घुलाकर कथाकार ने कहानी को व्यापकता दी है।
मंच का आभार।
[14/03 20:05] प्रज्ञा रोहिणी: दीदी का खण्डन-- बाज़ारू लगे।
सुधार🙏🙏
[14/03 20:15] Sandhya: समाज के दोहरे रूप को दिखाती है कहानी ।पैसे और वृतियों के मद में चूर
व्यक्ति एक और सम्बोधन में शुचिता रखना चाहता है और दूसरी और आनंद का भी वरण करता है मामला केवल मजबूरी और मजदूरी से ही जुड़ा नहीं है बहुत बारीकी से मनुष्य की मनोवैज्ञानिक पड़ताल कर रही है कहानी
अंत में एक पीड़ा से साक्षात्कार कराती है 💥
[14/03 20:56] Rajesh Jharpare: "साहब, दीदी और गुलाम "
बेहद मार्मिक कहानी । एक पिता के सामनै अपनी हमउम्र बेटी का कोठे में नाच देखना और एक गर्भ वती लड़की का नृत्य में साथ होना  गहरी पीड़ा और अवसाद से भर देता है । दीदी औल कोठे में कोई सम्बन्ध नहीं होता । मोहन की चवन्नी पर जब अठन्नी भारी पड़ती है तो पेट बोल उठता है " दीदी का रिश्ता घर में होति है । बाजार में थो बस पैसों से रिश्तेदारी निभाई जाती है । राष्ट्र सेवा दल में अपनी सक्रियता दिखाने के बाद अंततः मोहन का सामन्ती चेहरा सामने आ ही जाता है । पेट से शुरू होकर पेट पर ही आ कर एक  वीभत्स सच्चाई से अवगत कराती कहानी को पढ़ना
आपनी पाठकीयता को समृध्द करना है ।
[14/03 20:56] Hanumant Ji: दगडू मारुति पवार यानी दया पवार नाम ही काफी है
ई पत्रिका रचनाकार मे यह कहानीपहले पढ़ी थी
फ़िर आज पढ़ी
पहली बार मे जितनी समझ आयी थी उतनी ही इस बार भी आयी
दीदी के आवरण के नीचे एक देह का भोक्ता  छिपा है
जो पुरुष lवर्चस्व वादी है
जिसे देह पर सिर्फ अपना अधिकार चाहिये
वहीं  देह की मंडी का अपना अर्थशास्त्र है
जो अठन्नी के इर्द गिर्द घूमता है
दीदी रिश्ते की चालाकी पुरुष से ज्यादा समझती है
और देह की सम्बन्ध निरपेक्षता का निर्वहन करती है
दया पवार का अछूत भी आत्मकथत्म्क था
यह कहानी भ वैसी है
पाखंड को वे सीधे उजागर करते हैं
और अपनी सम्वेदना को भावुकता से बचाते है लेकिन सम्वेदना को दमित भी नही करते
यहाँ भी कहानी मे अंत मे  यही दिखता है
ब्लॉग से ही कहानी का चुनाव करने मे बासी माल का खतरा भी बना रहता है
[14/03 21:22] प्रज्ञा रोहिणी: बिलकुल सही राजेश जी। पहले का साहब जितना अमानवीय था दीखता था पर नया बहुत पर्दे में है। अतिघातक
[14/03 21:54] ‪+91 94251 01644‬: कहानी अपने परिवेश की विद्रूपता को उघाड़ती हुई अंत में मानवीय विवशता   पर आकर अपना गहरा असर छोड़ती है।
[14/03 22:16] ‪+91 98263 27733‬: अनैतिक वृत्तियों की पर्दादारी के लिए नैतिक संबोधनों का पर्दा कितना कितना चीकट अहसास देता है , दोगली मनोवृत्तियों को दर्शाती बेहतरीन कहानी
[14/03 22:34] Pravesh soni: मज़बूरी की मजदूरी ... कितने शब्द दिए गए इसे ,नगर वधु ,वेश्या ,और भी न जाने क्या क्या |कितनी मजबूर होती होगी एक स्त्री देह ,जब वह व्यवसायिक रूप लेती है |पीड़ा ,अवसाद  का गरल  पीकर यह मुस्कराहट का मुखोटा ओढ़े रहती है |आज की कहानी में दीदी की विवशता पर हावी होता साहिब का दोगला चेहरा आखिर मुह की खा ही जाता है |
बेटी की उम्र की लडकियों को देख कर आहत होती पिता की भावनाए गहरा असर छोडती  है |एक मार्मिक कहानी आज आप सबने पढ़ी ,और अपनी महत्वपूर्ण प्रतिक्रियाये दी

आप सभी का हार्दिक आभार
कल मिलते है एक और अनुवादित कहानी के साथ ,तब तक विदा
शुभ रात्रि
🙏
[14/03 22:48] ‪+91 94116 56956‬: बेहतरीन कहानी ।

Sunday, March 13, 2016






⬛  टुकडे – टुकडे धूप  

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➖  मनीष वैद्य
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                  खपरैलों वाले इस घर में आसमान से धूप के कई टुकड़े उतर आते. समय के साथ – साथ धूप के इन टुकड़ों की जगहें बदलती रहतीं. सुबह से शाम तक धूप के ये टुकडे पूरे घर में चहलकदमी करते रहते. खपरैलों के सुराखों से धूप के छोटे –छोटे हिस्से यहाँ –वहाँ से झांकते रहते. इन टुकड़ों का आकार छोटी रोटी की तरह गोल होता. मानो किसी ने कोशिश कर चाँद की तरह इन्हें गोल –गोल बना दिया है. खपरैलों के सुराख़ से दाखिल होते हुए नीचे घर के कच्चे फर्श पर आते –आते धूप के इन टुकड़ों में बहुत छोटे धूल के कणों की तरह कुछ होता. अणु और परमाणुओं की तरह. ये कण इतने छोटे और महीन होते कि इन्हें गौर से देखे जाने पर ही देखा जा सकता. धूप के इन टुकड़ों को घर में आवाजाही की पूरी छुट होती. ये कहीं भी जा सकते और कहीं से भी लौट सकते. ये उछल कूद कर घर के सामानों पर चढ़ जाते. धूप के ये टुकडे कभी पीतल के हंडे पर पड़ते तो पूरा घर सोने की दमक से भर उठता. ये टुकडे जब बरतन में भरे पानी पर पड़ते तो पूरा घर चाँदी की चमक से भर उठता. सुबह के साथ धूप के टुकडे घर में निकल आते और दिन भर की चहलकदमी के बाद शाम के धुंधलके में कहीं खो जाते. अगली सुबह वे फिर लौट आते मानों रात उन्हें यहीं झपकी लग गई हो और आँखे मलते हुए वे फिर जाग  गए हों. इस तरह वे घर की रोजमर्रा में शामिल हो चुके थे.  .

        रात के अंधेरें में खपरैलों के बीच न कोई सुराख़ नजर आता और न धूप के टुकडे. हाँ, चांदनी रातों में जरुर आसमान का चाँद इन सुराखों से घर में झांकता सा नजर आता. अँधेरी रातों में शायद अंधेरें के टुकडे भी इन सुराखों से आते रहे हों. अंधेरों के बीच अन्धेरें के टुकडे पहचाने नहीं जाते, लिहाजा यह मन लिया गया कि धूप के टुकड़ों का तरह अंधेरों के टुकडे नहीं होते. रात में खपरैलों के बीच की जिन जगहों से घर में जलती चिमनी की पिलपिली रोशनी बाहर के घुप्प अँधेरे के बीच टिमटिमाती रहती, गोया किसी पहाड़ी के नीचे से बस्ती की बत्तियां नजर आ रही हों. रोशनी पूरी तरह अनगढ़ होती. न कभी उनके बीच कोई निश्चित अनुपात और न ही कोई निश्चित दूरी. ठीक उसी तरह जैसे किसी बच्चे ने सफ़ेद कागज पर रंग के कुछ छींटे डाल दिए हों. कहीं ज्यादा तो कहीं कम. खपरैलों के बीच की जगहों से आती हुई रोशनी की हलकी परछाइयों से अँधेरे को कोई फर्क नहीं पड़ता. अँधेरा खासा बना रहता और दूर तक पसरा हुआ. रोशनी की यह झिलमिल परछाई अगले सात जनम तक उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकती थी लिहाजा अंधेरा अपने पूरे आलसीपन के साथ पसरा रहता.

        खपरैलों के बीच की जगहों से इस घर का पुराना नाता था. शायद तब से जब यह घर बना होगा या उससे भी पहले जब घर बनना शुरू हुए होंगे. घर होते तो खपरैलों के बीच जगह जरुर होती. खपरैलों के बीच की जगह का भर जाना शायद घर के न होने की तरह था. घर की अन्य अनिवार्य शर्तों में अघोषित रूप से एक यह भी शर्त थी. खपरैलों के बीच की जगह ही शायद खपरैलों को जोड़े रखती. यदि जगह नहीं बचती तो लोग धूप की उजास और अँधेरे को ही भूल जाते या यह भी होता कि शायद उन्हें समय का ही भान नहीं रहता. धूप के टुकड़ों से दिन का समय और सुराखों से झांकते आसमान के तारों से वे रात के पहर बताते.

        धूप के टुकडे लगातार अपनी जगह बदलते रहते. कभी रोटी की तरह थाली में नजर आते लेकिन थोड़ी ही देर में थाली से छिटक जाते. भूख बाकी रह जाती पर धूप के टुकडे थाली से बाहर हो चुके होते. माँ के साथ अक्सर ही ऐसा होता. सबको खिलाने के बाद जब वह अपनी थाली परोसती तो जल्दी ही धूप का टुकड़ा थाली से छिटककर खाली परात में दौड़ने लगता जहाँ अब रोटियां नहीं, पपड़ाये हुए आटे की परत चिपकी रहती.

                धूप के टुकड़े कभी छुट्टी पर नहीं जाते. वे कभी नागा नहीं करते.मानो सूरज के साथ उनका आना जरुरी ही हो. घर में चहलकदमी करते धूप के टुकडे सदियों से इसी तरह आते रहे. बिना अपने आने की मुनादी पीटते हुए. मौसम आये और चले गए, त्यौहार आये और चले गए, शादी –ब्याव, जनम –मरण सब कुछ चलता रहा. लेकिन धूप के टुकड़ों का लगातार आना जारी रहा, सदियों से इसी तरह. आज भी वे आ राहे होंगे और शायद सदियों तक आते रहेंगे. यूँ ही बिना नागा किये.

         साल –दर- साल खपरैलों को आल –चाल कर दिया जाता लेकिन धूप के टुकडे अपने लिए जगह निकाल ही लेते. हर साल आषाढ़ के महीने में पिता निसरनी लगा कर खपरैलों की छत पर चढ़ जाते. माँ उन्हें नए खपरैलों का टोपला दे आती. पिता एक सिरे से खपरैल हटाना शुरू करते. मानो घर की छत उघड रहे हों. फिर टूटे खपरैलों के टुकडे, तुअर संटी के टुकड़े और धूल- धक्कड़ को खोडियेकी बुहारी से झाड़ते. फिर साबूत खपरैलों से नयी छत बनाने लगते वे जिस हिस्से की खपरैल हटाते वहां का आसमान घर में उतर जाता, धूप के साथ. खपरैल हटाने के बाद कंकाल की तरह निकल आई बल्लियों और सांकटियों पर फिर से खपरैलों का काम घंटो तक चलता. खपरैलों के टुकड़ों, संटी के टुकड़ों और धूल- धक्कड़ से पूरा घर भर जाता. बल्लियों और सांकटियों के बीच से सारा कचरा पूरे घर में छा जाता. बरतनों, बिस्तरों, टिन के डिब्बों, पिता की किताबों, हंडे – मटके, माँ के सिंगारदान –सब कुछ धूल –धक्कड़ से पट जाता. घर का कोई कोना साबूत नहीं बचता. यहाँ तक कि भगवान भी. घर के एक कोने में लकड़ी का छोटा सा पाटिया था, जिस पर तमाम भगवान मौजूद रहते थे. राम, हनुमान, कृष्ण, दुर्गामाता, शंकर, गणेश, विष्णु,लक्ष्मी और गरुड़. यानी पूरा देव परिवार. पिता इसे पाटिया नहीं सिंहासन कहते. वे अपनी पूरी उम्र इसे सिंहासन ही  कहते और शायद मानते भी रहे. उनके लिए शायद जरुरी भी था ऐसा मानना कि इतने महान भगवान अपना देवलोक छोड़कर जब इस छोटे से कच्चे मकान में आयेंगे तो लकड़ी के पटिये पर नहीं बल्कि सिंहासन पर ही बिराजेंगे. तो खपरैलों की आल –चाल के दौरान तमाम धूल –धक्कड़ में अन्य सामानों की तरह देव परिवार भी दब जाया करता. पिता जब खपरैलों की पूरी आल –चाल के बाद छत से नीचे लौटते तो उनकी हालत भी उन्ही सामानों की तरह हो जाती जो घर में धूल –धक्कड़ से सने रहते.वे इस तरह धूल –धक्कड़ से सने हुए लौटते मानो अभी किसी युद्ध में गुत्थमगुत्था होकर आ रहे हों. कभी लगता कि वे एक आदिम लड़ाई के सिपाही हैं जो सदियों से इसी तरह लड़ी जा रही है.

       बहरहाल, माँ बुहारी से एक –एक सामान देर तक साफ करती. कुछ घंटों की मेहनत के बाद घर पहले की तरह दिखने लगता. पहले की तरह नहीं, पहले से ज्यादा हल्का और साफ- सुथरा. पिता गरम पानी और उबटन –तेल के जरिये धूल – धक्कड़ से निजत पाने की कोशिश करते. माँ खपरैलों के टुकड़ों को अलग कर लेती. बाद में इन्हें पत्थर से बारीक़ पीसकर माँ खोर बनाती. यह खोर लीपन के साथ मिलाकर कच्चे फर्श पर लीपी जाती. इससे फर्श सीमेंट की तरह मजबूत हो जाता. पिता नहा –धोकर अपने भगवान से माफ़ी मांगते, देर तक मंत्र बुदबुदाते हुए. पिता कहते –

यदक्षर पथभ्रष्टम मात्रहिनम च यद्भवेत
तत्सर्वम क्षम्यताम देव प्रसीद परमेश्वरम

उन्ही भगवानों से जो थोड़ी देर पहले तक उन्ही की तरह धूल –धक्कड़ से सने हुए थे.
        पिता जब खपरैलों की आल – चाल करने चढ़ते तो लगता कि इस बार न तो कोई सुराख़ बचेंगे और न ही धूप का कोई टुकड़ा घर में दाखिल हो सकेगा. लेकिन पिता की तमाम कोशिशों के बावजूद साल- दर –साल सुराख़ बच ही जाते. खपरैलों के बीच की जगह से अगली सुबह फिर धूप के टुकडे उतरने लगते. यह धूप के टुकड़ों की जीत थी या पिता की कोशिशों की हार. हालाँकि ऐसी लडाइयों में हार –जीत तय कर पाना मुमकिन भी नहीं होता. ये लड़ाईयां ही ऐसी होती हैं, निरंतर चलने वाली, बिना हार  –जीत की परवाह किए, शायद कभी न ख़त्म होने के लिए, अनिर्णीत ही रह जाने के लिए, खपरैलों के बीच सुराखों और पिता की कोशिशों के बीच भी ऐसी ही लड़ाई थी जो बरसों से इसी तरह जारी थी.

        भादौ के महीने में जब जोरदार बारिश होती तो पिता की तमाम कोशिशों के बावजूद खपरैलों के बीच की इन्ही जगहों से बारिश का पानी घर में चूने लगता. पानी चूने   की वजह से  घर –गृहस्थी का अधिकांश सामान भींग जाता. कभी –कभी तो साबूत बिस्तर लगा पाने लायक जगह भी नहीं बचती. तब पिता सारी रात सो नहीं पाते. तेज बारिश की रातों में वे चूने वाली जगहों पर बरतन रखते. बाल्टी, तगारी, तपेला, परात यहाँ तक कि लोटे और गिलास भी. फिर इनके भरते जाने और खालीकर इनका पानी फेंके जाने के काम में माँ और पिता देर तक भिड़े रहते. इस मुसीबत से बचने का कोई विकल्प नहीं होता. विकल्प था लेकिन वह उनके बस में नहीं था. जिस घर में रोटियों की कीमत भारी लगे वहां अंगरेजी कवेलू का खर्चा कैसे उठाया जा सकता था. खैर, माँ और पिता ने इसे विकल्पहीन करार दे दिया था. फ़िलहाल इसका कोई हल उनके पास नहीं था. सिवाय बरतनों में जमा पानी को उलीचते जाने के. पिता सोचते कि सारी बातें वैसी ही हों, जैसी चाही जाएँ, यह तो मुमकिन नहीं हो सकता. इच्छाएँ तो बहुत होती हैं. लेकिन सारी इच्छाएँ पूरी भी तो नहीं हो सकती. वे कहते – जिन्दगी के कई रंग होते हैं. जिन्दगी के रंग भी तो धूप के टुकड़ों की तरह आते जाते रहते हैं.

      माँ –पिता की जिन्दगी भी तो धूप के टुकड़ों की ही तरह जगहें बदलती रही बार – बार. नाना के यहाँ से माँ धूप के टुकड़ों की तरह उजास बिखेरती यहाँ पहली बार आई थी. माँ और पिता ने साथ –साथ मेहनत की तो पुश्तैनी उसर जमीन भी ऐसी लहलहाने लगी कि उसकी उजास से गाँवभर में रोशनी के सोते फूटने लगे. कहते हैं कि सुख के दिन ज्यादा दिनों के नहीं रहते. यहाँ भी नहीं रहे. माँ –पिता ने सुनहरे सपने देखना शुरू ही किया था कि तभी उन्हें किसी की नजर लग गयी. आस- पास के दो कस्बों को जोड़ने वाली सड़क यहीं से निकली, ठीक उनके ही खेत की छाती पर से. खेत का जो थोडा मुआवजा मिला उससे दूसरी जमीन खरीदने के लिए पिता ने बहुत कोशिश की लेकिन इतने से पैसों में कहीं जमीन नहीं मिली. इधर पैसा लगातार खर्च होता रहा. और आखिर में न जमीन बची न पैसा. बची थी तो  पिता के बाजुओं में इतनी ताकत कि कभी भूखे सोने की नौबत नहीं आई.          

      बारिश जैसे –जैसे तेज होने लगती, घर में साबूत जगहें कम होने लगती. माँ कभी बारिश को दोष देती तो कभी पिता की कोशिशों को. माँ का आरोप होता कि पिता ने खपरैलों की आल- चाल के दौरान छेद रख दिए. माँ ऐसे आरोप बरसों से लगाती थी इसलिए पिता अपने बचाव में केवल चुप हो जाया करते. माँ और पिता कई बार ऐसे वाकियों पर एक –दूसरे के लिए आरोप मढ़ते यह बात जानते हुए कि आरोप सही नहीं है. माँ और पिता के बीच इस तरह की तकरार कोई नयी बात नहीं थी. आमतौर पर जब –तब होती रहती थी. दोनों ही इसे गंभीरता से नहीं लेते थे. चुप होकर छोड़ दिया करते. पिता मन में सोचते कि अब इसे कौन समझाये, कोई आदमी भला अपने ही घर की खपरैलों की आल –चाल में छेद क्यों रखेगा. क्या उन्हें पता नहीं कि उनकी एक गलती से पूरा घर गीला हो जायेगा. माँ अक्सर ऐसे मौकों पर अपने गोरधन नाथ को याद करती जिन्होंने अपनी चींटी ऊँगली पर गोवर्धन पहाड़ उठाकर वृन्दावन के अपने लोगों की घनघोर बारिश से हिफाजत की थी. माँ की बात पर न पिता ध्यान देते और न गोरधन नाथ. पर माँ को इसका कोई मलाल नहीं रहता. माँ उस वाकिये को याद कर अब भी सिहर उठती है जब एक घनघोर बारिश की पूरी रात उसने दरवाजे में खड़े –खड़े  गुजारी थी,अपने दो बच्चों के साथ . उस रात माँ ने जिन्दगी और मौत के बीच एक महीन रेखा पहचानी थी.यह वाकिया पिता कभी याद नहीं करते. उनका मानना है कि कडवी यादों को सीने से चिपकाये नहीं फिरना चाहिए. ऐसे पल तो आते ही रहते हैं. इन्हें यद् कर अपना जी क्यों छोटा करना ... आगे बढ़ना है तो अच्छी बातें याद रखो और सब के साथ अच्छा करो तो तुम्हारा भी अच्छा ही होगा.

      वह जन्माष्टमी की एक खौफनाक काली अँधेरी रात थी. शाम से ही रह –रह कर बारिश हो रही थी. रात का दूसरा पहर बीतते –बीतते तो मानो बादल ही फट गए. पिता पहले ही रिश्तेदारी के काम से बाहर गाँव गए हुए थे. पिता साथ होते तो माँ उन्हें ही भला – बुरा कहकर हिम्मत भर लेती. पूरा घर बारिश के पानी में चपड –चपड कर रहा था. घर की कच्ची दीवारों से पानी रिस रहा था. चारों तरफ पानी ही पानी. बादल गडगडाते तो दिल बैठने लगता. मन में तरह –तरह की चिंताएं और आशंकाएं उठ रही थी. दोनों छोटे                  

बच्चे डर रहे थे. आसमान में बिजली दमकती तो खपरैलों के सुराख़ से होती हुई उसकी चमक फैलकर माँ की डरी- सहमी आँखों में कौंध जाती. इस रात बारिश का सामना करते हुए उसे पिता बहुत याद आ रहे थे. आज माँ हमेशा की तरह न तो गोरधन नाथ को याद कर रही थी और न ही पिता को भला –बुरा कह रही थी. माँ आज पिता की तरह चुप थी.      

शायद चुप्पी के बीच कहीं भीतर की ताकत को इकट्ठा कर रही थी. आज तो मईपला (प्रलय) ही होने को था. बारिश कुछ पल के लिए थमती और फिर शुरू हो जाती. तीसरा पहर बीतते –बीतते घर का पूरा कच्चा फर्श भींग चुका था. पूरा सामान और बिस्तर पहले ही भींग चुका था. जिस जगह माँ अपने छोटे –छोटे बच्चों के साथ बैठी थी वहां भी पानी आने लगा था. बौछारों से पूरा बदन भींग रहा था. वह ठण्ड से कंपकंपा रही थी. जैसे –तैसे बच्चों को बौछारों से बचाने की कोशिश कर रही थी.

       इधर बारिश के साथ ओले भी शुरू हो गए. पहले मक्का के दानों की तरह और फिर छोटे नींबू के आकर के ओले. तेजी से गिरते ओले जब खपरैलों से टकराते तो खपरैल टूट जाते. जब खपरैल भी टूट –टूट कर गिरने लगे तो घर में पानी की रेलमपेल मच गई. घर का कोई सामान साबूत नहीं बचा. माँ को समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें और क्या न करें. पड़ोस वाली रामकन्या पड़ते पानी में माँ को अपने अंग्रेजी कवेलू की छत वाले मकान में चलने के लिए बुलाने आई थी लेकिन माँ ने मना कर दिया. दिन का समय होता तो और भी ... रात में दुसरे के घर अकेली औरत दो बच्चों के साथ, पिता होते तो उनके साथ जरूर चली जाती लेकिन आज नहीं.....नहीं गई माँ, वहीँ डटी रही.

       माँ ने सोच लिया था कि जो होगा यहीं होगा इसी खपरैलों वाले घर में. खपरैल छार –छार होते रहे. गृहस्थी का सामान तबाह होता रहा. खपरैलों के टुकडे बम की सी गति से यहाँ –वहां उड़ते रहे और माँ ने अपने अंदर की सारी ताकत को इकट्ठा कर लिया. वह दरवाजे की उस छोटी सी जगह में घंटों तक खड़ी रही बुत की तरह अपने दोनों बच्चों को भींचे हुए. दरवाजे के ठीक ऊपर लकड़ी के दो छोटे पटियों को जोडा हुआ था. इससे न तो सीधे पानी टपकता था और न ही खपरैल के टुकड़े सिर में लगने का डर था. बच्ची माँ के सीने से चिपटी थी और बच्चे को उसने अपने पैरों के बीच भींच लिया था. समय गुजरता रहा. चौथे पहर में बारिश कुछ कम होने लगी. पौ फटते ही उजाला टूटे हुए खपरैलों के बीच से घर में आने लगा था. बस्ती के लोगों ने देखा तो हैरत में पड़ गये. इतनी तबाही के बाद भी ये औरत और इसके बच्चे साबूत कैसे बच गए. यह तबाही की रात कई लोगों ने दूसरों के पक्के मकानों में बितायी थी. बस्ती के आधा दर्जन बच्चे, बूढ़े और औरतें मर चुकी थी.

       उस दिन घर में चूल्हा नहीं जला. चूल्हे पर चढाने लायक कोई सामान साबूत नहीं बचा था. ओलों और बारिश ने सब कुछ ख़त्म कर दिया था. सब कुछ. पिता लौट आये थे बाहर गाँव से. माँ पिता को उस रात का हाल सुनाती रही और पिता चुप से सुनते रहे. पिता ने कहा- ख़त्म होने की कोशिशों से ख़त्म नहीं होना और तमाम साजिशों और मंसूबों को नकारते हुए फिर –फिर उठ खड़े होना, फिर –फिर साबूत रह जाना ही तू जिन्दगी है. धूप के टुकड़ों की तरह ।
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प्रतिक्रियाएँ
[11/03 08:09] Rajnarayan Bohare: अदभुत कहानी।खूब किस्सागोई। भाषा और कहन शानदार।बहुअर्थी वाक्य।
[11/03 09:38] प्रज्ञा रोहिणी: बेहद अच्छी कहानी। मन में धूप के साथ कविता, घर, संघर्ष, जिजीविषा, उम्मीद सब टुकड़ा टुकड़ा उतर आये। बधाई मनीष जी।
[11/03 10:07] प्रज्ञा रोहिणी: खपरैलों से छनती आती धूप से निर्मित अनेक बिम्बों ने कहानी को आरम्भ में कविता की शक्ल दी । धूप के साथ कहानीकार ने घर रच दिया। सुबह दोपहर साँझ रात रच दीं। फिर बस्ती रच दी। और बस्ती से चुनकर एक  संघर्षशील परिवार रच डाला जिसे रोज़ कमाना है इसलिये कभी कोई नागा नहीं उनके खाने में
 कहानी यहाँ आकर घर के भीतर प्रवेश करती है। जबकि मुझे लगा था कि इस कहानी में नागार्जुन की अकाल और उसके बाद कविता की तरह ही घर रहेगा जीवित मनुष्य पार्श्व में होंगे। पर कहानी धूप के संसार के साथ परिवार का संसार भी रचती है। कतरों में बिखरी धूप घर के हर कोने को सुंदरता से भर देती है। धूप और बारिश ज्यों ज़िन्दगी का ज्वार-भाटा। संगीत का तार और मन्द्र स्वर और इनके बीच दम्पत्ति के सुख दुःख के राग। इस राग में माँ की आस्तिकता और पिता की सामर्थ्य और फिर संघर्ष की उस रात में माँ का पिता हो जाना। यथार्थ से मुठभेड़ के समय तनाव के चरम क्षणों में अलोक से नहीं लोक के तनावों से शक्ति अर्जित करती स्त्री धूप से भी बड़ी हो जाती है या कहें बारिश के प्रतिपक्ष में धूप रच देती है। और तब माँ पिता दो इकाई नहीं रहते वे एकसे हो जाते हैं और संघर्ष से सृजित होता है ज़िन्दगी का फलसफा। मनुष्य का संघर्ष, उम्मीद की किरण और हर स्याह से लड़ने की जिद्द।
दरअसल यही है ज़िन्दगी जीने का हुनर। ज़िन्दगी जीने की कला शिविरों में बैठकर नहीं सीखी जा सकती जीवन में गहरे धँसकर ये कला राह बनाती है।
[11/03 20:44] Alka Trivedi: कभी कभी जो कहानी मन को बहुत भा जाती है  मन पूरे समय उसकी जुगाली सा करता रहता है।किसी घटना की साम्यता किसी  अन्य पढी या देखी घटना से, और ऐसे ही वो उससे संबद्ध सा हो जाता है। आज यह कहानी मेरी तरफ से उसी श्रेणी की है।मुझे बहुत पसंद आयी ।धन्यवाद दीदी एक ऑर अच्छी रचना से परिचित कराने के लिए। मनीष जी बधाई एक उम्दा सृजन के लिए
[11/03 21:21] Amitabh Mishra मंच: जीवन सुख दुःख आशा निराशा के महीन धागों से ही तो बुना हैं l जब तक साँस हैं तब तक आस हैं को चरितार्थ करती कहानी बधाई मनीष जी       अमिताभ मिश्र
[11/03 22:06] ‪+91 89596 87445‬: इतनी मोटी कहानी को गूंथकर एक पतली कविता बनायी जा सकती थी
इसमे कहानी को जबरिया गूंथा गया है
हालाँकि बिम्ब योजना शुरुआती पैरा मे चमत्कृत करती है
बाद मे उन्ही बिम्बों की पुनरावृति और विस्तार  है
और यदि यहाँ तक भी  कहानीकार ने लोभ स्म्वरण कर लिया होता तो भी निर्मल वर्मा की याद दिलाती एक रचना बन जाती
लेकिन निर्मल वर्मा से
निकलकर अमरकांत होने के चक्कर मे कहानी द्वीमुखी हो गयी
लेकिन फ़िर भी पठनीय बन पड़ी है.
इस हेतु उन्हे बधाई साधुवाद 🙏🏾
[11/03 22:14] ‪+91 94116 56956‬: इस कहानी में लेखक कहानी विधा का अतिक्रमण कर कविता करने लगता है ,बिम्ब रचने लगता है । ये विधा का  अतिक्रमण लेखक की स्वयं को किसी भी हद तक एक्सप्रेस करने की दीवानगी का परचम है ,जो पाठक के मन पर भी लहराता है । ऊपर प्रज्ञाजी ने अच्छे से व्याख्यायित किया है । उनकी टिप्पणी से इत्तिफ़ाक़ रखने में ये तो है की मुझे कम शब्दों को ही टाइप करना पड़ रहा है । मनीष जी की इस कहानी के लिए प्रवेश जी का शुक्रिया ।
[11/03 22:22] ‪+91 94116 56956‬: हनुमंत जी की टिप्पणी पर एक जिज्ञासा उत्पन्न हुई की निर्मल वर्मा की याद किस तरह आ रही है । कृ उदहारण भी दे क्योंकि मैंने जितना भी पढ़ा है निर्मल को ,उनकी पंक्तियाँ या दृष्टान्त जहन में नहीं चमक रहे  है इसे पढ़ कर । कृ बताये तो अभिवृद्धि हो सके मेरी और शायद बाकियों की भी ।
[11/03 22:28] ‪+91 89596 87445‬: सुरेन्द्रजी
मैने बात कहानी मे आये बिम्बों और भाषा
के संदर्भ मे की थी
जो इम्प्रेशन मेरे जेहन मे उन्हे पढ़कर कभी बनाथा
[11/03 22:29] ‪+91 89596 87445‬: स्मृति के प्रति कुछ ऐसा ही लालित्य भरा मोह
[11/03 22:44] ‪+91 94116 56956‬: यदि यहाँ तक भी कहानीकार ने लोभ संवरण कर लिया होता तो भी निर्मल वर्मा की याद दिलाती एक रचना बन जाती । आपकी इस पंक्ति ने मुझसे ऊपर का वक्तव्य लिखवाया । निर्मल वर्मा की तीन पुस्तकों का जिक्र करना चाहूँगा जो मुझे अछि या प्रतिनिधि लगती है  , एक चित्र सुख ,वे दिन और कव्वे और काला पानी  इन तीनो रचनाओं में एक्का दुक्का  उदाहरण मुझे  अभी याद आ रहे है । एक चिथड़ा सुख में जब नायिका पूछती है सुख क्या है  तो जवाब में  आता है  की भरी ठण्ड में जो चिथड़ा लिपटता है टसन से वो सुख है । या कव्वे और कला पानी का अकेलापन जो व्यक्तिगत होल्कर भी समष्टिगत हो जाता है । हाँ जब आप संजीव की कहानी आरोहण पढ़ते है तो कई जगह निर्मल याद आते है । वो भी जब परिद्रश्य रचा जा रहा हो   , ट्रीटमेंट  और मोटिव में नहीं ।
[11/03 22:45] Padma Ji: मनीष वैद्य जी की कहानी "टुकड़े-टुकड़े धूप" बहुत ग्राम्य जीवन को चित्रित करती बहुत अच्छी कहानी है। भाषा में कलात्मकता और शैली में प्रवाह है। कहानी में रोचकता और प्रभावोत्पादकता भी है। ऐसी कहानियां बार बार पढने को मन लालायित रहता है। मनीष जी को बधाई। मंच के त्रयी एडमिन को धन्यवाद।
[11/03 22:48] Jaishree Rai: अच्छी कहानी! मन को छूती। बधाई!
[11/03 23:10] Kavita Varma: मनीष जी की कहानी पहले भी पढ़ी थी टुकड़ा टुकड़ा धूप मन के अंदर उतरती गई । सुंदर कहानी बधाई मनीष जी ।
[11/03 23:13] ‪+91 98260 13806‬: सभी रचनाकार साथियों का शुक्रिया, जिन्होंने समय निकाल कर इतनी शिद्दत से कहानी को पढ़ा और इस पर अपनी बेशकीमती टिप्पणियाँ भी की। एक कहानीकार के नाते यह मेरे लिए बड़ी बात है कि आप सबने इसे पढ़ा और परखा। यहाँ कई मेरे अग्रज भी हैं।
[11/03 23:13] ‪+91 89596 87445‬: सुरेन्द्र जी
निर्मल वर्मा से मेरा परिचय आप जितना गहरा नही है
अंतिम उपन्यास आज भी याद है अंतिम अरण्य
यहाँ दादी की तबीयत बहुत खराब है तो उस उपन्यास कीयाद स्वाभाविक है
पहला परिचय क्व्वे और काला पानी से  ही हुआ था
दिनेश खन्ना नेप्ले निर्देशित किया था जिसमे मेरा एक किरदार था
बाद मे हमने पिक्चर और पोस्ट कार्ड् भी खेला
खैर
जब मैने आज की कहानी टूकड़ा टूकडा धूप को पढ़कर उनका नाम लिया तो उसी फार्म की वजह से
यानी नास्तेल्जीक मोनोलॉग
निर्मल वर्मा के तीन एकांत मे एक कहानी है
धूप का टुकडा
उसका फार्म यही है
बस ऐसा ही कुछ था
कि कह गया
[11/03 23:17] ‪+91 89596 87445‬: मनीष जी 👍🏾🙏🏾

वैसे भी रचना कार की रचना ही उसका स्टेटमेंट है.
यदि इसके बाद भी कुछ कहने की ज़रूरत रह जाये
तो वो रचना की असफलता है
[11/03 23:22] ‪+91 98260 13806‬: मैं शुक्रगुजार हूँ राज बोहरे जी, प्रज्ञा रोहिणी जी, प्रवेश जी, ललिता जी, संध्या जी, प्रतिभा जी, विजय भाई, अलका जी, अमिताभ जी, लीना जी, सुरेन्द्र जी, हनुमन्त भाई, ब्रज भाई, पद्मा जी, कविता जी और जयश्री जी आप सभी का
[12/03 00:14] ‪+91 94116 56956‬: जी हनुमंत जी शुक्रिया , अंतिम अरण्य नहीं पढ़ पाया चाह कर भी ,केवल उसके क्रिटिक्स पढ़े थे ।आपने जो टर्म कहा नॉस्टेल्जिक मोनोलॉग वह एक दम उपयुक्त है । क्योंकि पूरा उपन्यास देश और काल के एक दुसरे में घुलने पर निकली भारतीय प्रज्ञा के  उसी पारलौकिक मोक्ष सरीखे ठौर में अपनि सार्थकता ढूंढना है । इस तरह का मंतव्य उन क्रिटिक्स का मुझे याद पड़ता है । आलोचय कहानी में ऐसा  तत्व  मैं नहीं ढून्ढ पा  रहा । आपने चर्चा को आगे बढ़ाया , इसके लिए शुक्रिया ।
[12/03 06:09] Rekha pancholi: बहुत अच्छी कहानी 'फिर उठ खड़े होना, फिर साबुत रह जाना ही तो जिन्दगी है, धूप के टुकड़ों की तरह ।' कहानी का यह आदर्श वाक्य सम्पूर्ण कहानी का सार है । शब्द चित्रण और शैली प्रभावशाली है ।

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