Monday, October 3, 2016

सुमित्रानंदन पन्त ने कहा था 
वियोगी होगा पहला कवि 
आह से उपजा होगा गान

उमड़कर आँखों से चुपचाप
वही होगी कविता अनजान

साहित्य संवेदना की आधारशिला पर अपना भवन निर्माण करता है। काव्य का प्रथम गुण ही संवेदनशील होना है। यही संवेदना साधारणीकरण को पूर्णता प्रदान कर उच्चतम शिखर तक प्रेषित करती है।

आज काव्य-बगिया में से कुछ पुष्प चुने हैं। ये पुष्प मधु की भीनी खुश्बू से युक्त हैं।
 मधु सक्सेना की कवितायेँ हृदयंगम होने के लिए प्रस्तुत हैं।



वाट्सअप  समूह  "साहित्य की बात "पर ,जिसके संचालक है श्री ब्रज श्री वास्तव और इन कविताओं को प्रस्तुत किया है सह संचालक सुश्री डॉ पदमा शर्मा ने |इनके सोजन्य से यह कविताये और इन पर हुई समीक्षक प्रतिक्रियाये रचना प्रवेश पर प्रस्तुत है 

♻ कविता  ♻
 *आ ही जाना *


मत आना.....
मेरे हाथों में मेहँदी का रंग बनकर
कितना भी पिसु ...भीगूँ ..
कुछ भी रचाऊं ~
देसी ,अरेबियन .
बतासा ..सिंघाड़ा या मुठिया बनूं
चले ही जाओगे उसके रंग की तरह ...

तुम आना ......
हाथों की रेखाएं बनकर
कभी हृदय ,कभी मस्तिष्क
कभी भाग्य या कभी जीवन रेखा बन कर

बन जाना कभी पर्वत
वहीं से चमकना मंगल बन कर
बुध की हंसी या गुरु का गुरुर बन कर
या शनि की तरह घेर लेना
बन जाना साढेसाती का अढ़ैया
या शुक्र की तरह
प्रेम के बीज रोपना ....

उँगलियों के पौर पर उकरे
शंख और पदम थाम कर
निकल पड़ना  दूर यात्रा पर
सागर से सीपियाँ उठा कर
बो देगें पहाड़ों पर

आ जाना ...
बस आ ही जाना
न जाने के लिए ....
         

         
♻कविता ♻
*उम्र का हिसाब *

कोई क्यों काटने लगता है
पल -पल , क्षण क्षण
ये ज़िस्म उधार का लगता है
बन गया चिन्दी चिन्दी ये मन
आत्मा क्या होती है ..?
उम्र अपने गुज़रने का हिसाब मांगती है

ये उम्र का गणित कैसे पढूं
कैसे समझूँ ..
कोई गुरु ,कोई किताब हो
सब कुछ रचना होगा
नए सिरे से ...
खुद को समिधा बना
अपनी ही आग में स्वाहा का
लयबद्ध उच्चारण
और नए वेदों का सृजन ...

बैठाने होंगे नए समीकरण
अहसासों के शून्य से शुरू कर
'पाई के मान 'के बीच से गुज़र कर
प्रमेय के अंतिम सिद्धांत तक ....

 कोष्ठक से कोष्ठक तक
डायरी के अंतिम पन्ने तक
शायद ये उम्र हिसाब पा जाए
और उत्तर पृष्ठ पर आकर
ठहर जाए ......नए सवालों के साथ ....


                      
 ♻ कविता ♻
*मौन  की आवाज़ *


कहाँ से आ रही बांसुरी की धुन
कोयल की कूक ,पपीहे की हूक
लहरों का गान ,मोती की मुस्कान
गूंजने लगी डमरू की घोषणा
और शंखनाद का आरोह ...

ये कौन है
जो मेरी गीली मिट्टी सी छाती को
घुंघरू बंधे पैरों से पार कर गया
सहेज लिए गीली मिट्टी में
पावों के निशान ..सूरज की तपिश बन कर
पौर पौर से ये कौन सा संगीत फूटा
की आसमान में टँग गई
नई जोगिया सुनहरी चादर ...

धरती ठिठकी ,पर रुकी नहीं
धूमती रही ..घूमती रही ...
प्रेम परिभाषित नहीं हुआ
बस , आ गया यूँही ..
एक कठोरता भरी भावुकता
सहलाती रही रात भर
मेरी मौन की आवाज़ को ..
           

   
♻ कविता-♻
* स्मृतियों के पन्ने *


सारी स्मृतियों को रात के हाथों सौंप कर
मुस्कारा देती हूँ सूरज के सामने
धूप और हवा  को गले लगाकर गुनगुनाती हूँ
सूरज खुश हो जाता
समझ ही नहीं पाता
इस गुनगुनाहट में छुपे
विरह गीत  के अक्षर
स्मृतियों के पन्नों से ही तो चुने हैं ।

       

♻ कविता ♻
 * बेढब रात *


ये रात भी अजीब है
मेरे बिस्तर में जाने के पहले ही
बेतरतीब से बिखेर देती है स्मर्तियों के पन्ने
बेढब रात ........
कब सीखेगी सुघड़ता
इतनी तो जगह दे कि
एक नींद ले सकूँ .......  


                   
♻कविता- ♻
*वजह -बेवज़ह *


कोई वजह नहीं होती खुश होने की
जैसे की कोई वजह नहीं होती दुखी होने की
बस, बेवज़ह जिए जाता है आदमी
वजह ढूंढते हुए .....
वजह को बेवज़ह बनाते हुए
और बेवज़ह को वजह बनाते हुए ।


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✴कवयित्री का
 आत्म कथ्य ........✴

मन की गीली धरती पर सम्वेदनाओं के बीज  गिरे,  जो अंकुरण हुआ वो आपके सामने है ।ये  कविता है या नहीं ये भी नहीं बता सकती ...कोई गूंज सुनाई देती है... कुछ शब्द बहते हुए महसूस करती हूँ कभी थाम पाती हूँ तो समेट के रख लेती हूँ कई बह जाते  कितना भी पुकारो नहीं आते ....ब्रह्माण्ड के हर  ग्रह नक्षत्र की तरह चलायमान हवा की तरह बहते शब्द और भाव  कई बार आकर हमे खुद चुन लेते है ..अपने आने जरिया बनाते है । कविता खुद उतनी ही नहीं जितनी दिखती है ज्यादा तो छुपा ही है ....जो भी है .. आपकी आलोचना और प्रशंसा दौनों प्रिय रहेगी ...

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☸परिचय☸


नाम - श्रीमती मधु सक्सेना

जन्म -24 अगस्त
जन्म स्थान  -खांचरोद जिला उज्जैन (mp)
शिक्षा - कला , विधि और पत्रकारिता में स्नातक ।हिंदी साहित्य में विशारद ।
प्रकाशन - ' मन माटी के अंकुर ' (काव्य सन्ग्रह ).....विभीन्न पत्र पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन ।
सम्मान ~( 1) नव लेखन ( 2)शब्द माधुरी (3) रंजन कलश शिव सम्मान।
अन्य - आकाशवाणी से रचनाओं का प्रसारण , बस्तर और सरगुजा में साहित्यिक संस्थाओं की स्थापना ।
कई हिंदी सम्मेलनों में भागीदारी ।
मोबाइल- 9425513161
पता - सचिन सक्सेना
H-3,   व्ही .आई .पी.  सिटी
उरकुरा रोड - सड्डू
रायपुर ( छत्तीसगढ़ )
पिन ..492 001
मेल- ..saxenamadhu24gmail.com


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प्रतिक्रियायें

सुधीर देश पांडे ..
आज मधुजीजी को पटल पर देखकर अच्छा लगा। साहित्य की बात के कवियों के बारे में एक लाइन तो बनती है कि वे दुरूह कवियों में शामिल नही है। अपने मन की बात बेलाग और अपनी बोली बानी में अपने प्रतीकों और शिल्प के साथ करते हैं। यह लोकाभिमुख दृष्टिकोण है। अब मधुजीजी की कविताओं पर।
आ ही जाना प्रेम की पराकाष्ठा है, समर्पण का भाव इतना कि शनि की अढैया तक की स्थिति भी हो तो मान्य है। अच्छा भाव। कविता तो खैर।
उम्र का हिसाब में दर्शन की शक्ल में है वे सवाल जिनसे हम दो चार होते ही रहते है। ये तो गणित की कविता भी है। 😊
मौन की आवाज में प्रेम की कोमलता अपनी पूरी उदात्तता से परिभाषित हुई है।  
स्मृतियों के पन्ने बडी कोमलकांत अनुभूति है। बेढब रात भी स्मृतियों की अव्यवस्थित आवाजाही पर मन के नियंत्रण न होने का चित्रण बखूबी प्रस्तुत करती है। जब वजहें खोजी जा रही हो हर बात की तब बेवजह कोई कैसे जी सकता है। सच है हम बेवजह को वजह बना कर ही तो जी रहे हैं।
कवियत्री की कविताओं का गठन प्रवाहमय है। अच्छी कविताएं। बधाई जीजी, आभार पद्माजी।

 Avinash Tivari: 
आज साकीबा में पद्मा जी ने कई समूहों में हरदिल अज़ीज मधु सक्सेना जी की कविताओं का उपहार दिया है।मधु न केवल बेहतरीन साहित्यकार हैं बल्कि एक अच्छी टीकाकार भी हैं।सभी रचनाओं को पढ़ा।
कविता 1 ..बस आ ही जाना न जाने के लिये मेंहदी हसन की गज़ल रंजिश ही सही की याद दिलाती है इस कविता मेें मधु ने प्रेम को ज्योतिषीय झरोखे से.देखा है।प्रेम कभी भाग्य रेखा तो कभी साढ़ेसाती बन कर आता है साढ़ेसाती भले ही जीवन में दुख देती है परन्तु अपने किसी एक चरण में भरपूर सुख भी देती है। मेंहदी  भी शीतलता रंग और प्रेम की सुगंध का अहसास देती है जो रंग उतरने के बाद भी स्मृति में बना रहता है। ऐसे प्रतीकों का प्रयोग मधु बखूबी करतीं हैं।
उम्र का हिसाब अच्छी कविता है।खाली समय में अपने आपको देखना बातें करना क्या खोया क्या पाया और बाकी क्या रहा है।ज्यामितीय प्रमेयों से जीवन के गणित को हल करने का बहुत अच्छा प्रयास किया है मधुजीने।अगली कविता मौन की आवाज--                         
 मौन की आवाज ..ये कौन है जो मेरी गीली मिट्टी----मन को छूने वाली अभिव्यक्ति है। मौन की आवाज तन्हाई में बजता जैसे एक साज है।बेढब रात पहले भी पढी हैबहुत प्रभावित करती है।। स्मृतियों के पन्नों का बिस्तर पर इस तरह बिखरना कि नींद के लिये कोई जगह न बचे करवटें स्मृति के पन्नों सी बदलती रहती है और रात भीगती गठरी सी भारी होती जाती है।
बहुत अच्छी कविताऐं हैं सभी मधुजी हमेशा की तरह बधाई आभार शुभकामनाऐ ।

पद्माजी ब्रज जी आभार बहुत बधाई।।

प्रवेश सोनी 
आ ही जाना ,न जाने के लिए ...प्रेम को बना कर हाथ की रेखायें और ग्रहों की चाल में पुकारना कभी न जाने के लिए ।
बहुत खूब प्रतिक लिए इस कविता में मधु ने ।वो जानती है मेंहन्दी कितनी भी गाढी रचे लेकिन उसके रंग सा पिया एक दिन जरूर  छोड़ देगा साथ जैसे छूट ही जाता है मेंहदी का रंग ।वो तो हथेली और पाँव की रेखाओं की मानिंद चाहती है प्रिय का साथ जो कभी जुदा होये ही नही ।गज़ब अभिव्यक्ति है ।
मधु की कविताओं के कोमल अहसासों को जब भी छूती हूँ एक अजब ही सुगंध भर जाती है ।
लेकिन जब जीवन की गणित को समझने की कोशिश में रखती हूँ पाई का मान तब वैचारिकता के मापदंड   परिचय देते है जीवन  को समझने की परिपक्वता का ।
मौन  की आवाज़ तो गज़ब की अभिव्यक्ति है 
इस कविता के बिम्ब जैसे प्रेम रस से भरे हो ....टपक रहा है मधु ,मधुर मधुरतम 
बेढब रात से एक नींद की गुहार 
वजह और बेवजह की जद्दोजहद को भी खूब उकेरा ।
यही कहूँगी कुछ कवितायेँ हमेशा के लिए मन से बस जाती है मधु की कलम  ऐसी ही कवितायेँ  रचती है ।


शुभकामनाएं मधु और आज की प्रस्तोता डॉ पदमा को दिन भर साथ रहने के लिए धन्यवाद ,मुबारकवाद एक सफल दिन साकीबा को देने के लिए ।


 राजेन्द्र श्रीवास्तव 
  मधु जी की गुनगुनाती कविताएँ हृदय स्पर्शी हैं। अलग अलग रंगो को उकेरती हैं। नेह ,अपनत्व,वेदना-संवेदना सब कुछ अपने अंदाज में व्यक्त करती हुई।बिम्बों का अनूठापन कविता को आयाम देते हुये। कुछ कहा-कुछ अनकहा जैसा ।मधु जीआपकी रचना धर्मिता को प्रणाम व आपको बधाई ।

मधु जी की कविताओं से सा की बा को सुवासित किया ,पद्मा जी बहुत धन्यवाद ।


+91 96876 94020‬: मधु सक्सेना जी की 'आ ही जाना' जैसी कविताएं स्थायी सौन्दर्य व जिजीविषा की बोली बोलती कविताएं है ।वो क्षणिक सौन्दर्य की हामी नही है चाहे वो मेंहदी के रंग जैसा अतिलुभावन ही क्यों न हो । मेंहदी प्रेम का प्रतीक तो है पर वह प्रेम में संतुलन का प्रतीक नही है वह स्मृति मे बसे, स्वपन मे बसे  या फिर एक तरफा प्रेम के भावनाओं का वाहक हो सकती है पर उनकी स्त्री चेतना मे यह प्रेम स्वीकार्य नही है वो प्रेम के साकार रूप की जो स्वपन मे नही साक्षात् साथ रहकर वास्तविक जीवन की
कठिन दिनो मे जरूरत पडने पर पत्थर तोडने का सामर्थ्य दिखाने वाले हाथो मे लकीर बन रहने वाली प्रेम की प्रतीक्षा मे है ।
यह प्रेम के आभासी या प्रेम मे स्त्री के

अकेले रह जाने के प्रति सचेत करती कविताएं है यह रचने के लिए उन्हें बधाई ।

आरती तिवारी 
 मधु जी की कविताओं में शब्द शब्द स्त्रीत्व है एक नाजुक एहसास लिए हुए ये कवितायेँ बरबस बाँध लेती हैं। किसी भी बौद्धिक चमत्कार का गणित बिठाये बिना कवितायेँ बो दी हैं एक नम ज़मीन की सुखद हरियाली के लिए मुझे उनकी एक और कविता याद आ रही है शायद अ से ज्ञ वाली बहुत सहज सरल तरल अभिव्यक्ति एक व्यक्ति और एक स्त्री के तौर भी एक कवियत्री से अलग होकर भी उनका व्यक्तित्व गरिमामय है।
समूह में उनकी सक्रियता,सहभागिता और साथी सदस्यों की रचनाओं पर उनकी आत्मीय और त्वरित टिप्पणियाँ हर बात मुझे उनका प्रशंसक बनाती है।

मैंने इन कविताओं में ह्रदय देखा सहज ह्रदय और इन्हें पढ़ना सफल रहा। हालांकि बहुत देर से पोस्ट पर आ पाई🙏

मुकेश सिन्हा 
दिल्ली: मधु जी के लिए क्या कहीं, टीचर जैसी दोस्त हैं, मेरी बहुत से कविताओं की पहली पाठिका !! जिन्होंने आपको सराहा, उनको उलट कर कहो, बेहतरीन लिखते हो, तो बात बनती नहीं है ! हाँ ये सच है, एक बेहद संवेदनशील शख्सियत हैं, और मुझे फख्र है, इन्होने  मुझे हर समय एक बेहतरीन मित्र के तरह मान दिया, तभी तो इनके माध्यम से ही अपने हलके फुल्के कविताओं के साथ साकीबा  जैसे मंच पर पहुँच पाया ! मधु जी की कविताओं में खुबसूरत भाव हैं, शिल्प है, बेहद सुन्दर गठी हुई है, और चाहिए क्या ! अलग अलग बिम्बों का प्रयोग कर ये भी बता पाने में सक्षम हैं कि इनके तरकस में कितने तरह के तीर हैं !! प्यारे से मनुहार के साथ पहली कविता में कहती हैं - तुम आना .........हाथो की रखायें बन कर !!

अनुमा आचार्य 
आ ही जाना" प्रेम के क्षणिक भाव से परे (धुल जाने वाली मेंहदी आदि) प्रेम के स्थायित्व के भाव और अविरलता (निरंतरता) की बात लगती है. स्टेबिलिटी प्रभावित करती है 

अनीता मंडा
 गहन अनुभतियों की महक़ समाहित किये मधु दी की कविताएँ देर तक मन में चलती रहती हैं, लगता है अरे ये तो हमारे मन की ही बात है, जिस तरह बीज का विस्तार पेड़ है उसी तरह इन कविताओं में भी सीमित शब्दो में कही बात बहुत गहन अर्थ, भाव संवेदना रखती है, अपनी अनुभूती को पूर्णता से अभिव्यक्त करना हो तो ये कविताएं आदर्श हैं, मधु दी से बहुत सीखना है, उनकी रचनाएँ आगे भी मिलती रहेंगी इस आशा के साथ बहुत बहुत शुभकामनाएँ , बधाई🙏

दिनेश मिश्र 

सारी कविताएँ अहसास से ताल्लुक़ रखती हैं , यादों की कितनी दखलंदाज़ी हमारी ज़िन्दगी से लेकर हमारी नींदों तक में है, ये हम सब महसूसते हैं, पर असरदार ढंग से मधु जी की कविताएं इसे व्यक्त करती हैं, बधाई मधु जी।


मीना शर्मा 
: मधुजी की संवेदना से लबालब कविताएँ.किसी प्रिय गीत की तरह हृदय को स्पर्श कर धीमें से रस घोलती प्रेम का ,और मन केभाव भरे आँगन में आ ठहरती काग़ज़
पर.. ...!
आ ही जानाउस रूप में ही सही,शनि की साढ़ेसाती बनकर....क्या बात है ! प्रेम का ऐसा बिरवा मैंने नहीं देखा !  
उम्र के गुज़रने का हिसाब,नये समीकरण के साथ  ,बहुत खूबसूरत !
मौन की आवाज़ !  ये कौन है,जो 
मेरी गीली मिट्टी सी छाती को,
घुँघरू बँधे पाँवों से पार कर गया...गीत की लय लेकर प्रेम का साज़ बजाती मौन की आवाज ,सीधे दिल में उतरने का हुनर जानती है. 
स्मृतियों के पन्ने , मासूमियत के आवरण में विरह का गीत गुनगुना लेनीा आसान नहीं है. 
बेढब रात , वजह-बेवजह  ....बेवजह जिये जाता है आदमी
वजह ढूढते हुए..एक -कविता 
शीर्षक सी ,जो अनेक पंक्तियाँ रचे  और फिर लम्बी कविताओं का रूप ले.
सीधी सरल भाषा ,संवेदना में ढले शब्द,निरंतर प्रवाह,संयोग वियोग 
और प्रेम की भाषा से सभी कविताएँ रागात्मक संवेदना का इंद्रधनुष लेकर मन मोहती हैं ! 
बधाई मधु बेहतरीन कविताओं के लिये !

चयन और प्रस्तुतिकरण बहुत सुंदर, डॉ. पद्मा जी आभार !

उदय ढोली 
 "वाक्यं रसात्मकं काव्यं"

 कसौटी पर खरी कविताएँ इनकी संप्रेषणीयता ही इन्हें विशिष्ट बनाती है ।


मुक्ता श्रीवास्तव: 
कविता का मतलब होता है रसयुक्त वाक्य ,कविता का मतलब होता है अपने मन के साथ साथ कुछ औरों के मन की भी बात.कविता का मतलब यह भी होता है कि निर्बाध संप्रेषण.ये सभी चीजें तो हैं मधु जी की कविताओं में.कहाँ थीं अब तक ये कविताएँ..एसी खोज का श्रेय पदमा जी को जाता है,जिन्हें इस बात का भी श्रेय जाता है कि उन्होंने साकीबा को साकीबा नाम दिया.

अर्चना नायडू
 मधु दीदी की कविताओं से आज पटल गुलजार हो रहा है। मुद्दत से इंतजार था,  उनकी परिपक्व सोच और    गहन मनन से उपजी  हर कविता बेमिसाल है।   कवि मन से तरल और  अपने अंतर्मन सकितना  संवेदनशील है यह उनके   शब्दों से बयाँ हो जाता है। ।  मुझे हर कविता  मे गहराई  नजर आई। दीदी,    आप लिखते रहिये,  हम सीखते रहेंगे 😊🤗👏


आभा बोधित्सव 
 कविताएँ मधु जी के सहज सोच  को व्यक्त करती हुई आगे बढ़ती गईं  हैं । 'स्मृतियों के पन्ने' मुझे ज्यादा पसंद आई । साधुवाद मधु जी ।

भावना सिन्हा 
 संवेदना से परिपूर्ण सुखद  कविताएँ । आ ही जाना और स्मृतियों के पन्ने इतनी आत्मीय  हैं जैसे अपने मन की ही बात सुन रही हूं ।  कुछ बिंब  बहुत ही अच्छे  लगे। 

पदमा जी का आभार उन्होंने इन कविताओं को  साझा किया । मधु जी को  बहुत बधाई ।

ब्रजेश कानूनगो 
 मधु जी की कविताएं,स्त्री संवेदनाओं से भरी हैं।कविता में कवि स्वयं से वार्तालाप करता है।इस बातचीत के मर्म तक वे पाठक बहुत सहजता से पहुँच जाते हैं जो अपने भीतर थोड़ा अधिक कोमल मन लिए होते हैं।कवितायेँ स्त्री जीवन की अनुभूतियों और संस्कारों से रंगी हुई पाठक तक पहुंचने में बहुत हद तक सफल होती हैं। 
बहुत बधाई और शुभकामनाएं,इससे आगे के सृजन के लिए।💐💐


अनुमा आचार्य 
 जैसे स्वयं पर बीता हुआ, और उससे प्रेरित विचार.....विन्यास....न कि भुगता हुआ.....

अलकनन्दा साने 
: मधु जी की कविताएं संभवत:पहली बार पढ़ रही हूँ.पहली ही कविता हाथ पकड़कर रोक लेती है.अपने प्रिय केलिए अलग अलग प्रतिमान देकर , बुलाने और रोके रखने का जतन एकदम नया है.'' *उम्र का हिसाब '' कविता की अंतिम पंक्ति बेहद सकारात्मक है.हर उम्र की अपनी चुनौतियाँ होती हैं और कवयित्री उन्हें स्वीकार करती हैं.'पाई के मान 'के बीच से और 'कोष्ठक से कोष्ठक तक' जैसे नए बिम्ब कविता को एक नया आयाम देते हैं.तीसरी कविता ''मौन  की आवाज़'' में गीली मिट्टी सी छाती समझ में नहीं आया.यदि ये पुरुष से सम्बंधित है तो पुरुष की छाती वज्र की , लौह की मानी जाती है और यदि यह स्त्री की है तो वह गीली मिटटी की तरह अपने वक्ष से कोई सृजन नहीं करती, बल्कि जो सृजित है उसका पोषण करती है.घुंघरू बंधे पैर भी अर्थ स्पष्ट नहीं कर पा रहे हैं.''स्मृतियों के पन्ने'' बढ़िया है. सचमुच दिनभर हम जो मुखौटा लगे घूमते हैं, वह रात को अपने असली रूप में आ जाता है और सूरज के साथ साथ दिन के उजाले में कोई भी हमारी असलियत नहीं जान पाता है.शेष दो ने ज्यादा प्रभावित नहीं किया.


एक लम्बे समय के बाद पूरे मनोयोग से  मैंने आज इतनी विस्तृत  टिप्पणी लिखी है.मधु जी शुभकामनाएं..


दीप्ती कुशवाह 
 मृदु भावनाओं की तरंगें जो हृदय तक पैठ बनाती हैं... मधु जी की चित्तहरिणी कविताओं में अविस्मरणीय सुधियाँ हैं, मनोरम भोर है, दारुण विरह है, धैर्या धरा है, भीगी माटी है, प्रेम का अनुभूति है, बाँसुरी... पपीहे की कूक...घुंघरुओं की खनक है...शंख...सीपियाँ हैं....
सुख के लिए भला और क्या चाहिए !!
रविन्द्र स्वप्निल 
 ऐसी कवितायेँ कोई नहीं लिख सकता जबतक विदग्धता न हो। बहुत ही छु लेने वाली कवितायेँ। बधाई हो।
 ये कवितायेँ 3 से चार हजार की संख्या में हों तो यानि इतने भाव हो तो ये प्रेम का एक नया युग रच क्र विश्व साहित्य की थाती बन सकती हैं।
जतिन 
 वजह बेवजह हर जिंदगी का हिस्सा है .मालूम ही नहीं चलता कब वजह बेवजह में घुल जाती है जिंदगी ..

रात नहीं सुधरने वाली...एक ही पल में बरसों के चिट्ठे
खोल देती है..नींद में घुसपैठ करती है..

हर आम की कविताएं है...हर साँस से जुड़ी....मैं तो रोज गुजरता हूँ ...रोज रोज की पीड़ा को  सुंदर शब्दों में पिरोने के लिए धन्यवाद पद्मा जी.




ब्रज श्रीवास्तव 
 सबसे पहले तो पदमा जी को धन्यवाद, कि उन्होंने हमारी सह एडमिन मधु जी की कविताओं को पोस्ट किया, दरअसल मधु जी कोमल और भाव भरी कविताएं लिखने में सिद्धहस्त हैं |उनकी संवेदनाएं जैसे दिन रात जागती रहती हैं |उनका बायोडाटा बताता है कि वह अपने रोजमर्रा मे`भी साहित्य के लिए जगह बना लेती है और वह जगह भी सामान्य नहीं होती भले ही उनकी कविताएं नितांत समकालीन शैली को पूरी तरह से नहीं अपनाती, लेकिन उनकी शैली अपने आप में पर्याप्त है, यह शैली भी पाठकों तक अपनी मन की बात कविता के लहजे में पहुंचाने में कामयाब होती है,, हम जब उनकी पहली   कविता यहां पढ़ते हैं तो देखते हैं कि कैसे वह एक ही प्रिय को अलग-अलग तरह की मनुहार से पुकारती हैं, उम्र का हिसाब तो गजब की कविता है हम देखते हैं कि वहां गणित के शब्दों के द्वारा जीवन की अन्य अन्य बातें बहुत प्रभावशील तरीके से व्यक्त की गई हैं उसी तरह से, मौन की आवाजकविता में जब वह कहती हैं, कहां से आ रही है बांसुरी की धुनयहीं से ही हमारी जो पाठकीय समझ है उसे पंख मिलते हैं और हम कवि की कल्पना की क्षमता पर चकित होने लगते हैं हालांकि यह एक छायावाद के जैसी आशावादी कविता है लेकिन यह उन कविताओं को जवाब भी है जो बौद्धिक होते हुए कहीं भी नहीं पहुंच पातीं मैं देखता हूं की इन कविताओं में कोई बहुत बड़ा वैचारिक दोष भी नहीं है उसकी वजह है कि ये सभी कविताएं हमारी अपनी कविताएं हैं, अपने अंतः करण की कविताएं हैं, इन सारी कविताओं के लिए मैं मधु जी को बधाई और शुभकामनाएं देता हूं और मित्रों से आग्रह करता हूं इन पर जी भर कर चर्चा करें.. |
|सादर||>ब्रज श्रीवास्तव




मणि मोहन मेहता 
: स्मृति और सम्वेदनाओं की तनी हुई रस्सी पर नृत्य करती ये बहुत आत्मीय कविताएं हैं । कुछ नए प्रतीक भी मन को भाये .. मधु जी बधाई ।पदमा जी ने बहुत उम्दा से इन्हें प्रस्तुत किया ।उन्हें भी बधाई ।

नरेश अग्रवाल 
: मधुजी का गहन अनुभव और किसी भी तरह का जीवन अविचलित होते हुए जीने का साहस उनकी कविता "आ ही जाना में झलकता है"।  इतना अधिक साहस की साढ़ेसाती को भी आकर   ना जाने को कह डालती हैं । वे जीवन की जटिलता से घबराती नहीं है बल्कि उसे कच्चे माल की तरह अपनी रचनाओं में ढाल लेना चाहती हैं।

 वे महसूस करती हैं यह शरीर उधार का है इसे किस तरह से जिया है, इसका हिसाब उन्हें अपने अंतकरण को देना होगा,  इसलिए दुविधा में हैं  और साथ ही चिंता में कि किस तरह से नित प्रतिदिन जीवन को सुधारा जाए ताकि मन में कोई दुख न रहे और डायरी के अंतिम पन्नों में लिख सकें कि "जीवन सर्वश्रेष्ठ रहा"।

 उनकी संवेदना इतनी अत्यधिक है कि वे मिट्टी से भी मन की आवाज सुन लेती हैं और मोती की मुस्कान को अपने कानों से सुनती हैं बजाया आंखों से देखने के। वे एक योगी की तरह संसार की प्रत्येक चीज से संवेदित है, हर चीज में उन्हें दिव्य्  ध्वनियाँ, प्रेम, नृत्य और लय नजर आती है । प्रेम के लिए उनके द्वारा सदैव खुले हैं चाहे वह आए या नहीं,  उसके स्वागत के लिए वे सदैव आतुर हैं। 

सच है कि किसी की भी स्मृतियों के पन्ने अबूझ होते हैं, आदमी उन्हें खुद ही नहीं समझ पाता तो भला सूरज क्या समझेगा इस गाथा को। वह तो बस देखता रहता है कि कोई प्रेमी उसकी धूप को गले लगा कर, हवा के सहारे उड़ उड़ कर द्वार द्वार विरह के गीत गाता हुआ अपनी स्मृतियों के पन्ने बांट रहा होता है अपने दुख हल्का करता  हुआ। 

 बेढब रात से सभी परेशान रहते हैं जो केवल थकान को जगह देना जानती है। लेकिन थकान के साथ चिंता हो तो उसे नकार देती है। लेकिन लेखक के लिए नींद से अधिक महत्वपूर्ण तो उसके विचार हैं, वह उनके बिना सोये कैसे? फिर इस बेवकूफ़ रात को  यह समझाएगा कौन ?यह एक बड़ा प्रश्न उभरकर सामने आता है इस कविता में ।

मधु जी की अंतिम कविता में यह संदेश बेहद महत्वपूर्ण है कि जीना है  "वजह को बेवजह बनाते हुए और बेवजह को वजह  बनाते हुए।" 


अंत में मधु जी को बहुत-बहुत बधाई बहुत सारी अच्छी अच्छी कविताएं लिखने के लिए।



Saturday, September 24, 2016

कविता क्या है, इस सवाल के उतने ही उत्तर हैं, जितने मनो मष्तिष्क हैं, इसकी परिभाषा सब के लिए अलग ही हैं। यह केवल आनंद की अनुभूति की अभिव्यक्ति ही नहीं, हर संवेद की बयानी है,

यह सुरेन जी की कविताएँ पेश करते हुए इसलिये लिखा जा रहा है कि सुरेन जी अपने अनुभव जनित विचारों की कोमलता को कविता में ढालने में सिद्ध हैं। एक बारीक से एहसास को ठीक ठीक शाब्दिक जामा पहना पाना मुश्किल तो होता है, पर सुरेन  जी इन अभिव्यक्तियों के ज़रिए पाठकों तक पहुंच पाते हैं।

आइये पढ़ते हैं यहाँ उनकी कुछ छोटी कविताएँ जिन्हें हमने टिप्पणी सहित लिया है, वाटस एप समूह साहित्य की बात से। जिसके संस्थापक एडमिन हैं ब्रज श्रीवास्तव।

सुरेन्द्र सिंह ,(सुरेन ) निवासी मथुरा
 जन्म 16 फरवरी 1973 
 1994 में बी०एस०सी० और 1996 में दर्शन शास्त्र में एम०ए० 
 1998 के उ०प्र० लोकसेवा आयोग के बैच से सलेक्ट होकर वर्तमान में बरेली के निकट श्रम अधिकारी के पद पर कार्यरत



नमस्कार दोस्तो. 
आज गुरुवार को हम समूह के सदस्य की कविताएँ प्रस्तुत करते हैं, इस क्रम में आज प्रस्तुत हैं ऐसे कवि की कविताएँ जो अवचेतन के धुंधले चित्रों की साज सज्जा कर कविता की चौखट में जमाने की  कोशिश में अक्सर सफल होता है, जिसकी कल्पना का वितान आकर्षक है, 
वहाँ, स्वप्न, प्रेम, मौसम, संबंध, संशय, अधीरता, और न जाने क्या क्या, कवि की दुनिया का अक्स दिखाते हैं, जिनके बारे में, अब आप लोग ही टिप्पणी कर परस्पर अर्थ अन्वय करेंगे. 





1⃣➖

सपना चलता है,

रात भर

मैंने कहा...

चला आऊंगा तुम्हारे अवचेतन में,

जो यूँ रात में उनींदे बात करोगे,

मुझसे, मैं जानता हूँ,

तुम्हारे चेतन मैं कोई जगह नहीं शायद मेरे लिए

तुम्हारी तस्वीर एक छोटा-सा बिंदु है, मन में कही छिपा,

जहाँ से मैंने कई त्रिज्याए नापी है

अपने होने में एक सार्थकता की तलाश में।




2⃣➖

प्रिय, जैसा कि तुम जानते हो

मौसमजिसे फागुन कहते है

तुमने साल भर जो चोटियाँ

बाँधी है, वे एक साथ खुल-खुल जाती है

यूँ रह -रह कर खुलते केशों से

किसी भी पत्ते का पर्ण हरित

लह लहा के मेरी ओर

ध्यानाकर्षण प्रस्ताव पेश करता है

ऐसे में तुम्हे प्यार ना करने की जिद

और तुम्हे जहन से हटाने की सारी कोशिशे

तुमसे कहना नहीं चाहता

और न ही जताना।



3⃣➖

तुम्हे यूँ बार बार लिखना

फिर बार बार मिटाना।

कभी, यूँही रात में

आकाश ताकना तुम

एक इबारत जो —

केवल तुम पढ़ सकते हो

को कभी देख पाओ

तो बस मुस्कुराना भर

क्योंकि कुछ भी - कह देना

दरअसल दरक जाना है

उस हवा का जो

तुम तक पहुंचती है

मेरे चश्मे पर चढ़े

नम धुंधलके को लेकर।


4⃣➖

सब छूट जाता है...धीरे धीरे...

जो जिज्ञासाएं हम बढ़ाते आ रहे थे अभी तक

और जो हमारी जिजीविषा को गति देती थी

एक दिन पता चलता है कि

हम एक खाली बक्सा ढो रहे है

वो कब रीत गया पता ही न चला

लेकिन फिर भी...

जिजीविषा जाने कहाँ से अपना सूत्र पकडती है

चीज़े यूँही बेलौस-सी दूरियां तय करती रहती है।



5⃣➖

सलाहकारी पिता को...

बदलते देखना।

और केवल आँखों से सब कुछ कहते...

ये अनुभव जाने क्यों

हर उस लड़के को छू जाता है

जो अभी कुछ दिन पहले तक,

निर्भरता की सीढ़ी उन पर टिका कर,

आखिरी सोपान पर पहुंचा है।

जहाँ पड़ती तेज रौशनी से...

बचने को उनकी छाया

बस तीन -चार सोपान नीचे दिखती है।




6⃣➖

मैं..., जो संगतराश ना हो सका

तुम्हे गढ़ने की चाहत

फिर भी मरती नहीं...



7⃣➖

किन्ही पलों में तुम्हारा होना और उन्ही जैसे पलों में तुम्हारा न होना

यूँ तो जन्म से मृत्यु का सफर पूरा हो ही जायेगा

पर बीच -बीच के पड़ावो पर तेरा होना और फिर न होना

यही सौगात लिए फिरते है और सम्हाले हुए कागजो पर

फिर फिर लिखते है तेरा होना और न होना

पीले पड़ चुके कागजो की एक एक सलवटों पर

उँगलियों की हरकत ठहर ठहर जाती है

कि टपकी हुई बूंदों से धुन्धलाये हुए हर्फ़

तेरे होने और न होने पर कसमसाते हुए तैरते है



8⃣➖

तुम्हे माफ करने की कोशिश कभी मन से नहीं कर पाता

जी भर के जीना चाहता हूँ तुम्हे, खुद से सुलह ना करके



9⃣➖

कि यादों के इस बियावान में

तुम एक हरी घास की चादर-सी बिछी

मेरे पाँव रखते ही

सिमट जाने के उपक्रम में

सब नमी उलीच जाती हो।


10⃣➖

छले जाने के पड़ाव...

हर पड़ाव पर...

यूँ, ठिठकना...

और उत्सुक मन में...

गाढ़ी होती अधीरता से...

टपकती बूंदों के निशाँ पर

पॉव रख चलना...

और पीछे मुड मुड...निहारना...

क्या अदभुत संयोजन है...

ठहरे पानी में...लहर पैदा करने का।



11⃣➖

एक शहर...

जो मेरे कंधे पर बैठा रहता है

एक तितली की तरह नहीं

ना ही किसी चमकते तमगे की तरह

झिलमिलाता है

स्पोन्डलीटिस के शुरूआती दर्द सा

जो हरकत करने पर

कबूतर बन जाता है।

फुर्र...होने के लिए

और जरा-सा आराम पाकर

टीसने लगता है।



12⃣➖

तुम्हारे बिल्कुल करीब आके

बीच की गुजरती हवा में भी

साँसों को ठेलती गर्मी

सिर्फ हथेलियों को पसीजती है

लेकिन मन पसीज कर भी

नम और मुलायम होकर भी

मुझे सांत्वना नहीं देता।



___________________________________________________________


प्रतिक्रियायें

Ravindra Swapnil: बहुत सुंदर कवितायेँ है, भाव और अर्थ के स्तर पर, भाषा में भी काव्य है, कंधे पर शहर का बेठना, आदि।
सपने का चलना लेकिन निबंधित नहीं हो रही कवितायेँ। अभिवियक्ति को साधना, उसे परिवेश देना और अंत की और ले जाना बड़ी प्रोसेस का हिस्सा है।

 इस स्तर पर ये अ ज्ञात कवि को सुझाव दिया जा सकता है।

 Mani Mohan Ji: उम्दा कविताएं हैं, खासकर पिता को लेकर जो रची गई है।तनिक आमूर्तन से बचा जाए तो सोने पर सुहागा।

 Anita Karnetkar: सापॅनडिलाइसिस के दर्द की तरह, सर्वथा नई उपमा है, ऐसे प्रयोग न केवल अभिव्यक्ति को विशेष बनाते है बल्कि भाषा की अभिव्यक्ति को भी संपन्न करते हैं।

Avinash Tivari: बहुत खूबसूरत क्षणिकाऐ आसपास के परिवेश से आत्मीय रिश्तों को चित्रित करतीं॥


 Dipti Kushwaha: उम्दा कविताएँ!

भाव, मन को छूते हैं और बिम्ब भी आकर्षक।

फिर भी,

कहीं कुछ है, छूटता सा...इन कविताओं में।

मुझे यह (...) अर्थात् बिन्दुओं के अत्यधिक प्रयोग का औचित्य समझ नहीं आता!

कवि से माफ़ी!

‪+91 80850 96010‬: पिता और शहर कविता को छोड़कर बाक़ी सभी कविताएँ लगभग एक ही भाव की हैं। बिना शक ये भावनाप्रधान कविताएँ हैं। इनमे कुछ है जो मन को छू रहा है। पर एक बात जो मुझे खटकी वह ये कि जिस नर्म, नफासत की भाषा का प्रयोग कविताओं में किया है उसी में पढ़ते हुए अचानक (साँसों में ठेलती गर्मी) जैसा प्रयोग कुछ कंकर जैसा लगा। वैसे कवि कुछ सोच के ही लिखे होंगे। अंतिम राय कि कविताएँ सुन्दर और सराहनीय हैं। बधाई कवि को।

+91 96876 94020‬: प्रथम कविता टीप मारने की सामर्थ्य रखती हैं सपना में आना औऱ जाग्रत में आऊगां का भरोसा दिलाना पूरे काल चक्र में जुड़े होने का अप्रतिम आशा देती है जो लीन हो जाने का संकेत हैं।कवि प्रेम कर सकने में सक्षम हुआ है पर फिर भी प्रेम की पराकाष्ठा पाने की चेष्टा उसने नहीं कि है अवचेतन में आने का वादा इस प्रेम की रूई वाली भाषा को यथार्थ का छल देता है यही पर यह कविता प्रेम के समकालीन संकलन से जुडती है औऱ अति नहीं लगती।

कविता बेहतरीन है पर भुला दी जायेगी कयोकी इस लघु में भी कम से कम तीन पंक्तियाँ औऱ वांछित थी जिससे इस कविता का रूझान साफ हो पाता औऱ यह विमर्श संदर्भ में उदाहरण बन पाती।

एक अच्छी कविता पढवाने के लिए धन्यवाद।

बाकी कविता पर बाद मे।

 Dushynt Tiwari: कविताओ के विषय बहुत अलग नहीं हैं मगर मुझे इनमे metaphors और denotations का उपयोग बहुत अच्छा लगा जिसके कारण आम से विषय भी रोचक लग रहे हैं।निर्भरता की सीढ़ी, पीले पड़े कागज़, लिखने वाले की भाषा पर बहुत अच्छी पकड़ है॥ बढ़िया कविताएँ॥

Sazid Premi Ji: बहुत खूबसूरत कविताएँ। 💐💐💐

+91 96876 94020‬: दसवीं कविता अद्भुत प्रेम रेशो से बुनी है औऱ इतनी मजबूत है कि प्रेम पर हाहाकार मचाते किसी भी कविता को सोटा लगा सकती है।
 पिता पर लिखी कविता सुंदर है एक दोहा याद आ गया।
पिता पुत्र के रिश्ते में जंगल का संवेग।
वृद्ध चक्षु धरती धसे, शावक चक्षु आवेग॥

 ‪+91 98272 49964‬: माँ पर तो बहुत लिखा गया है। पिता जैसे अछूते व्यक्तित्व पर काव्य में अपनी भावना लिखना... वास्तव में जय हो

 Arunesh Shukla: विरह की कविताएँ।पर प्रेम में मिलन-सा रोमांस लिए.अच्छी हैं।सघन हैं।प्रेम कविता य कहानी लिखना लेखक का लिटमस टेस्ट है।बधाई.

Abha Bodhisatva: अपने जीवन के अलग -अलग अनुभवों को सरल भाषा में कवि ने सहजता से व्यक्त किया जहाँ उसे बहुत भारी भरकम बिम्ब विधान ढूँढने और बैचेन होने की ज़रूरत नहीं महसूस हुई. यही खूबी है कवि की ककविताओं में। सुंदर -सहज।

 Arunesh Shukla: भाषा पर थोड़ा और काम की ज़रूरत इस क्रम में अगर कविता लंबी भी हो जाये थोड़ा तो चलता है।दूसरी बात प्रेम एक highly पॉलिटिकल चीज़ भी।उसको समसामयिक चीजों से जोड़ना भी ज़रूरी होता।दस में एकाध तो हों ऐसी.बाकी पिता पर ageya जी याद आते।बहुत दूर जाना होता पिता से पिता जैसा बनने के लिए.मैं क्या कहु।अच्छी कविता है।बस कविताओं में कई का वाक्य विन्यास खटकता।

 Arti Tivari: छोटी सुंदर कवितायेँ, ।जैसे कवि ने अपने अंदर का सत्व उड़ेल दिया हो इनके ज़रिये, ...वेदनात्मक चेतना काव्य का केन्द्रबिन्दु है, ।जो उद्वेलित करता है। क्रमांक 6 8 9 10 11 मुझे ऐसी ही लगीं।
सबसे अच्छी तीसरी कविता लगी।
अभिव्यक्ति को साधना जैसे ऊपर स्वप्निल जी ने कहा, ।कुछ पंक्तियाँ को और जोड़कर मुझे अच्छी लगीं कवितायेँ, ।👍🏼🍀🌹

अनाम कवि को बधाई साकीबा का आभार 🙏1⃣➖


 Sandhya Kulkarni: पहली कविता में कवि प्रेमिका के अवचेतन में जाना चाहता है चेतन अवचेतन का द्वंद्व उसे बेचैन करता है,और अपने होने की  सार्थकता तलाश रहा है कवि मनोविज्ञान का माहिर ज्ञाता भी है ।
बहुत सुन्दर कविता 🌻 

दूसरी कविता में कवि अपने अबोलेपन में भी प्रेमिका को फागुन के विभिन्न रंगों से जोड़ कर खुली लटों से स्वयं को आबद्ध कर लेना चाहता है और एक इंटेंस भाव प्रकट करता है ।
बहुत उत्कट रचना 🌻

तीसरी कविता में अपनी प्रेमिका की स्मृति से आप्लावित कवि इतना भाव विभोर हो गया है कि उसका नाम लिखता है मिटाता है और इसकी पीछे यहाँ भी उसका मनोवैज्ञानिक द्वंद्व द्रष्टव्य हो रहा है वो वह चाहता भी है कि प्रेमिका जिसे वो इबारत कह रहा है स्वयं को पढ़े और वो इसी बहाने स्वयं को भी पढ़वाना चाहता है।
थोड़ी सी अस्पष्ट लेकिन अपने गंतव्य में सहल कविता 🌻

चौथी कविता में कवि अपने दर्शन को लिख रहा है दार्शनिक अंदाज़ में साक्षी भाव् से स्वयं का दृष्टा बना है ,कवि अपने जीवन की मीमांसा करता हुआ अपनी जिज्ञासाएँ जो दर्शन से जुडी है जो एक जीजिविषा से जोड़ती हैं उसे उस पर बात कर रहा है वो शुरू से जानता है "सब कुछ छूट जाता है "इसकी संतृप्ता और निर्लिपता को पा जाता हैऔर पुन: अपनी जीजिविषा को पकड़ लेता है सकारात्मकता इनका ख़ास भाव है कवि दर्शन का भी ख़ास ज्ञाता है ।
कविता पाठ को संलग्नता से जोड़ती है 
सुन्दर कुछ जल्दबाज़ कविता🌻

पांचवी कविता पितृ पक्ष में एक कृतज्ञ भाव से भर देती है ,माँ के लिए तो सभी भावुक दिखते हैं पिता के लिए कवि का भावुक होना ह्रदय को छू जाता है ।
हृदयस्पर्शी कविता🌻

छटवीं कविता में कवि की इच्छा पूरी हो ये सदा अपने "डॉ हिंगिस" के स्वरुप को बनाये रखें 
खूबसूरत कविता🌻

कवि अपनी सातवीं कविता में अपने भावों को चरम पर अनुभूत कर रहा 
है ,वो जहाँ एक और वृथा जीवन और जीजिविषा से जुड़ा है वहीं दूसरी ओर 
स्मृतियों का अभेद्य कवच लिए भी घूम रहा है और इतना भावुक हो उठा है कि,अपनी कविताओं की सौगात में ढूंढ कर टपकी हुईं अश्रु बूंदों में होने और न होने को निहारता है 
कवि का अतिभावुक होना आशा जगाता है ।
सुन्दर भावुक रचना 🌻

आठवी कविता में कवि अपनी नामाफी टाँक देना चाहता है,और स्वयं को भी बरी नहीं होने देना चाहता ,इस तरह जीने की उत्कट इच्छा से भर जाता है जिजीविषा यहाँ जीवंत होकर दिखाई देती है ।
जीवंत कविता🌻

नोउवीं कविता में कवि फिर से प्रेमिका की स्मृति में प्रविष्ट हो जाते हैं उसे हरी घाँस सा याद करते है ये इसमे भी इतनी नाज़ुक चाल से प्रविष्ट होते हैं कि, उसके सिमटने और स्वयं के उलीचने को बड़े ही कलात्मक तरीके से व्यक्त करते हैं यहाँ कवि "अशोक वाजपेयी"प्रभाव से स्वयं को बचा नहीं पाते ।
मनभावन कविता 🌻

दसवीं कविता में कवि अपने चलने रुकने और अपने उद्वेग को स्पष्ट करना चाहता है,बूंदों  और लहरों के माध्यम से वह यहां अपने शिल्प में अपनी चिर परिचित सांकेतिक शैली का उपयोग करता है और स्वयं के उद्वेलन से चकित भी ।
अद्भुत कविता 🌻

कवि ग्यारहवीं कविता में अपनी सम्बद्धता जो इनके शहर के प्रति है उसे बता रहा है लेकिन स्वयं को बिना जोड़े इसे भी व्यक्त नहीं कर पाता ,इसे ये स्पांडेलाइटिस के ठहरे दर्द सा पाते हैं, हरकत होते ही एक्टिव हो उठता
 है उसे ये तितली या तमगे से भी परिभाषित नहीं करना चाहते,साथ ही इसे एक कभी आराम न पाने वाले दर्द से घिरा पाते हैं ।

बेहतरीन कविता 🌻


बारवीं और अंतिम कविता में कवि सम्भवत: ग्रीष्म ऋतु में प्रेमिका से अपने मिलन की असंतृप्तता और असंतुष्ट होने की पीड़ा बयान कर रहा है, कुछ और विस्तार मांगती है ।

लाजवाब कविता 🌻

कवि एक अनंत संभावनाओं के स्वामी हैं मनोविज्ञान और दर्शन पर इनकी विशद पकड़ इनकी कविताओं में परिलक्षित है ,कहीं कहीं अपने प्रिय कवियों के प्रभाव से भरे हुए प्रतीत होते हैं ,जिनमे अशोक वाजपेयी और गीत चतुर्वेदी का प्रभाव स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है इन पर लेकिन बावजूद इसके ये स्वयं को अलग रखने में सफल रहे हैं ।
प्रेम कविताओं के सिद्धहस्त कवि हैं 
इन्हें अन्य विषय भी छूना चाहिए इनकी अन्य कविताओं का इंतज़ार रहेगा ,कवि की कविताओं में प्रेम की बेचैनी और दर्शन और मनोवैज्ञानिक विषय की विशेषज्ञता सुस्पष्ट है जिन में ये निष्णात हैं इन विषयों पर लिखी गयी कविताये अपेक्षित हैं ।
इनके काव्य की उज्जवल भविष्य की शुभकामनाओं के साथ 🌻🌻
 Meena Sharma: सार्थकता की तलाश में त्रिज्याएं नापते कवि कीका प्रेम दूसरी कविता में
में अंतर से छलकता जान पड़ता 
है !कहना और अनकहा रहना .दोनों चित्र साकार हैं ! तुम्हें बार-
बार लिखना , फिर-फिर मिटान

                 .
एक शहर / जो मेरे कंधे पर  बैठा रहता है ...में स्पोंडिलाइटिस
के दर्द के लिये कबूतर का प्रयेग
नयापन लिये हुये है, सुनदर भाव भरी कविताएँ, सुन्दर अभिव्यक्ति हैं !
छोटी कविताएँ.अपनी सीमा में बहुत कछ कह गईं,किन्तु कुछ खोया-खोया सा रहा,क्या ..यह कवि ही
कह सकेंगे. ! 
सुन्दर काव्यात्मक लय है !
बधाई कुछ परिचित से कवि को !
नाम आने पर शायद लगे कि मैने भी  अँदाज में यही नाम रखा था !
शुभकामनाएँ ..
आभार ब्रज जी अनाम कवि से मिलवाने के लिये  !                ा...
मन की इबारत को ,नई दृष्टि देने का प्रयत्न है !
HarGovind Maithil देखने में छोटी - छोटी  किन्तु बहुत सुंदर भाव और संवेदनाओ से परिपूर्ण कवितायें ।
अ नाम कवि को बधाई और एडमिन जी का आभार ।

अपर्णा: इन कविताओं को पढ़कर स्पष्ट है कि इनका स्वर आत्मिय है। इतना कि संभवतः ये स्वंय के लिए लिखी गई हैं। ये स्वंय को कुरेदती, प्रश्न करती, उत्तर देती और सहलाती हैं। 'मैं' हर कविता का केंद्र है। 

लगभग सभी प्रेम कविताएँ हैं। पर यहाँ प्रेम को बड़ी परिपक्वता से बरता गया है। जैसे कि स्वंय को ही एक दूरी से देख रहा हो कोई। प्रेम वर्तमान हो या भूत, कवि एकदम से snap नहीं कर पाता है जुड़ाव। स्मृति और 'काश' का भाव बार बार उभरता है जिसे वो पड़ाव कह रहा है। 

पिता और शहर की कविताएँ ही संभवतः प्रेम से इतर हैं इस काव्य गुच्छ में। और दोनों को एक यूनीक ट्रीटमेंट से नवाज़ा है। यहाँ अति संवेदनशीलता से लबरेज़ अभिव्यक्ति न होकर एक बार फिर वही परिपक्वता दिखती है। दोंनो ही कविताएँ बहुत अच्छी लगीं। 

मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक भाव के कारण विषय पर लिखते हुए भी एक डिटैच्मेंट एक दूरी दिखती है। 

बिंब प्रकृति से हों या आस पास के बहुत सटीक और नए हैं अपने संदर्भों में। 

भाषा कहीं कहीं बिखरती दिखती है। कहीं कहीं बस। बोलचाल की भाषा है। सहज और सरल। कोई साहित्यिक कलाबाजी नहीं दिखती। 

प्रथम कुछ पाठ में कविताएँ किंचित अमूर्त और दुरूह लगीं। स्वर गंभीर है तो ये प्रभाव और सघन हुआ है। फिर अपनी समझ भर खोल लीं मैंने। नहीं पता कितनी सफल रही। 

और ये भी लगा कि कभी कभी ये नियंत्रित अमूर्तता भी एक काव्य सौंदर्य बन कर उभरती है। 

ये मेरा नितांत निजी मत और पाठकीय प्रतिक्रिया मात्र है। 



 Aanand Krishn: भाव की दृष्टि से समृद्ध कवितायें, शिल्प पर अधिक ध्यान देने की ज़रुरत है । 

"सार्थकता की तलाश में त्रिज्याएं नापते कवि…......"
मीना जी की अद्भुत टिप्पणी, जिसमें समग्र रचनाकर्म की सार्थकता जीवंत हो उठी है ।
Aalknanda Sane: अच्छी कविताएं हैं, पर यकायक वाह नहीं निकला , लेकिन इन्हें खारिज भी नहीं किया जा सकता । कवि/यत्री विज्ञान के छात्र/त्रा रहे हैं, इतना समझ में आता है । बाकी बहुत सारा लिखा जा चुका है और मेहनत तो हमेशा करना ही पड़ती है, यदि इन कविताओं पर दोबारा की जाय तो बेहतरीन कविताएं निकलकर आ सकती हैं । कुछ तो है जो ठीक ठीक बाहर नहीं आ पाया है । शुभकामनाएं ।
Hanumant Ji: ये कवितायें सम्वेदनाएँ और स्मॄति के बुलबुलों की तरह है....क्षुद्र कहे अविशेष क्षणों की भी यहाँ विशेष प्रतिष्ठा है गोया वे लघुता का गौरव गान हों 
लहरों के साथ बुलबुलों का भी अपना सौंदर्य है....एक कविता मे कवि स्वयम बूँद और लहर के बिंब मे बात करता है ...मै इन कविताओं को जब तक चीन्ह पाता हूँ वे समाप्त हो जाती है...
वे मानो अपनी मर्जी से अधूरा रहना चाहती हो...उन्हे पूर्ण होने से ही वैराग्य हो मानो....हालाँकि अपनी अपूर्णता मे भी वे अनुभूति की पूर्णता को जन्म दे जाती है जैसे दूसरी कविता मे फागुन को चोटीयों की तरह खुलते देखना या हर्फ़ के धुंधलके और  टपकती बूँदों को साथ रखकर याद करना...कई स्थलों पर ऐसी चमकदार बिम्ब रश्मि बिखरी है...यहाँ वे उस तरह से ही है  जैसे छोटा बच्चा चमकदार कंचे बहूमूल्य समझकर जेब मे भर लेता है

11 वी कविता बहुत कुछ पूर्ण है और मेरे करीब भी इस कविता मे मै स्वयम को और अपने को पाता हूँ....
मै चाहता हूँ कि आगे वो और उस तरह से लिखे जो मुझे दुख मे मुसीबत मे याद आये 
कविता की संगत के बाद अब दुर्दिन और दुख मे मुझे कविता ही याद आती है.....
 Dr Dipti Johri: भावपूर्ण कविताओं पर कविताओं से भी खूबसूरत भावपूर्ण टिप्पड़ियाँ.. 

खूबसूरती एक प्राथमिक भाव है ,फिर चाहें तार्किकता पीछे छुटे, कवितायेँ मन को नम तो कर ही जाती हैं ,    

फिर भी मेरे तार्किक मन को जो सबसे ज्यादा भायी वो है " मैं जो संगतराश न हो सका ...."   कम शब्दो में गहरी बात कह जाने की सलाहियत जो कमोबेश हर छोटी कविता में परिलक्षित हो रही है , कहना होगा ये उसमे सबसे उम्दा है।
        हर मनुष्य की एक अनचीन्ही और अमर्त्य चाहत अपने साथी को अपने अनुसार ढालने की रहती ही है। कभी कभी जिंदगी तमाम हो जाती है ,और संगतराश होने का भ्रम लिए ही जीवन का सफर तमाम हो जाता है ।

 वैसे भी सभी कवितायेँ अपने कहन में मनोवैज्ञानिक है भ्रमों,संभ्रमो,चेतन ,अवचेतन , चोटियां(गुत्थियाँ) आदि आदि में ।जिनके पाठक अपनी अपनी दृष्टि से पाठ कर सकते है जैसे साल भर की चोटियों का खुलना किसी एक मौसम के इंतज़ार में या कहें एक विशिष्ट समय में गुथियों का खुलना और जीवन की जीवंतता का क्लोरोफिल जब अनायास ही अपनी गिरफ्त में लेता है तो कवि मन अपने साथ साथ पाठक को भी मदनोत्सव में डुबो देता है।
     पिता के साए/सरंक्षण/सुरक्षा/सरपरस्ती आदि से अभी अभी निकला ,एक नौजवान उस दहलीज पर कैसा महसूस करता होगा जहाँ से उसे दो दृश्य एक साथ दीखते है  ..एक जिसमे वो गा रहा होता है 'तू (पिता)मेरा सरमाया है '  और दूसरे दृश्य में वह खुद इस सरमायेदारी के आसन पे बैठने का उपक्रम करता दीखता है ...तो उस दहलीज या थ्रेशहोल्ड को काव्य में जिस तरह उतारा गया है वह उस मनःस्थिति को बखूबी बयां करता है।
Dr Mohan Nagar: सुबह से चार पांच बार पढ़ने की कोशिश की पर एक आपरेशन और मरीजों के बीच व्यस्तता ज्यादा ही रही और ये कविताएँ ठहर कर पढ़े जाने का आग्रह कर रही हैं  । कविताओं में प्रतीक और बिंबो का प्रयोग लगभग हर कविता में है और एक टिप्पणी से सहमत भी कि ये अशोक बाजपेयी जी के लेखन की झलक देती हैं .. पर मेरा सोचना है कि उनसे बेहतर .. क्योंकि अशोक बाजपेयी जी का ज्यादातर लिखा मेरे तो सिर के ऊपर ही गया है आज तक माफ करें .. ये कविताएँ उस केडर की भी हैं तो उनसे बेहतर क्योंकि विषयवस्तु अबूझ नहीं  । शेष .. और इत्मीनान से पाठन के बाद
 Dr Mohan Nagar: शहर ने तो चमत्क्रत ही कर दिया। सुरेन जी यहाँ शब्द संशोधित करें बस .. सही शब्द है। - स्पॅान्डिलाइटिस .. हिन्दी उच्चारण में भी  ।
: वैसे बस यही कविता है जिससे संतुष्ट नहीं .. स्पॅान्डिलाइटिस का दर्द .. आराम करने पर ठीक रहता है / दबा रहता है .. और हरकत पर उभरता है .. यदि इसे प्रतीक लिया है आपने तो इस पर इस लिहाज से सोचें जरुर  👏
Suren: मोहन जी ,यह स्पोन्डलायटिस के शुरूआती लक्षण मेरे स्वयं के है 8 ,10 वर्ष पूर्व के । जब तक चलता फिरता रहता था ,किसी मुवेबिल काम में लगा रहता था तो कुछ पता नही चलता था पर जब आराम की मुद्रा में आता था तो हल्का हल्का टीसता था । तो उसी को यहाँ उपयोगित किया है ।
पाठ कर चुका .. अभी भी पढ़ ही रहा था
 काम करते समय दर्द का पता न चलना .. ध्यान हटना है
 उसे समग्रता में नहीं लिया जा सकता
मैंने तो सर अपना भोगा हुआ ही लिखा इसमें ,ये ठीक बात है कि संज्ञान का स्तर काम के समय डाइवर्ट ही जाता होगा ।
 Dr Mohan Nagar: दरअसल इसमें दोनों बातें .. हरकत पर फुर्र होना और आराम पर टीसना .. एक ही बात कह रहे हैं और कविता का प्रतीक भी बिगड़ रहा है .. यहाँ मुझे यह लग रहा है कि आप लिखना चाहते थे कि शहर एक आदमी को धमकाता सा है कि चुपचाप जियो .. हरकत की तो तकलीफ में जाओगे
प्रतीक भी अद्भुत लिया आपने बिला शक .. इसलिए जता बैठा कि वैज्ञानिकता के लिहाज से सोचें या प्रतीक के लिहाज से .. ये दोनों चीजें थोड़े से संशोधन से लाई जा सकती है
 कुछ ऐसा कि .. चुपचाप बिना हिले पड़ा रहूँ तो  दबा रहता है पर जरा सी हरकत पर ही उभर आता है 👏  मेरा सोचना है ये .. जरुरी नहीं सही ही हो .. न हो तो क्रपया खारिज करें 👏
 Suren: नही मोहन सर , मैं एक साधारण सी बात को काव्य में कहना चाहता था कि हम अपने ,अपने शहर के ,अपने अपने नॉस्टेल्जिया के कई सारे बिंदु जहन में लिए फिरते है । जिनसे हमारी आत्मीयता और एक अजीब सा बाँडेज होता है ,जिसे हमारी प्रवृत्तियों की पुनरावृत्तिया और उसकी बायप्रोडक्ट के रूप में काम करती कंडीशनिंग के गहराने से उपजे भाव जब हम दुनियादारी में सलग्न रहते है तो तलछट में बैठे रहते है और जरा फुर्सत पाते है तो कंधे पर सवार हो टीसने लगते है । 

हाँ , ये  संभव है कि जो कहना चाह रहा हूँ वो उभर कर  काव्य में न आ पाया हो ।
 Dr Mohan Nagar: आपने जो कहा मैंने उसे पूरी तरह समझा सुरेन जी यकीन मानिए .. मैं बस इतना ही चाहता हूँ कि हम घर के सदस्यों की तरह हैं .. यहाँ कोई भी बात / सुझाव बेहतरी के लिए हमें एक दूसरे को इसलिए देना चाहिए कि हम बेहतर से सर्वश्रेष्ठ की ओर जाऐं .. ये न हो कि बाहर की दुनिया में जब हमारा लिखा जाए और कोई सच्चा आलोचक / समीक्षक हमारी रचना की कमतरियों पर बात करे तो हम निशब्द रह जाऐं .. बस इसलिए 👏
 Madhu Saksena: हाँ सन्ध्या ....आज सबकी प्रतिक्रिया का आनन्द ले रही थी ।बहुत ही बढ़िया सबकी ।तुमने भी बड़े मनोयोग से सब कविताओ को स्पष्ट किया ।
कुछ कविताएँ यूँ धस जाती है दिल दिमाग में की मौन कर देती है ।उनमे विचरण करके उसके सारतत्व की खोज चलती रहती है ।और हर खोज के बाद लगता है अभी भी छूटा छूटा  सा है तो फिर वही प्रक्रिया ।सोच में उनमे डूब जाते है ।पढ़ते ही सनझ गई थी मेरे प्रिय कवि की कविताएँ है ये मुझे डुबा कर ही मानेगी ।फिर समझ नहीं आता क्या लिखूं ?
आप सबकी प्रतिक्रियाएं पढ़ कर सीख रही थी की ऐसा भी लिखा जा सकता है ।
बधाई सुरेन ।
आभार एडमिन जी ।
Dr Mohan Nagar: ये बहुत बहुत अद्भुत कविता है .. इसलिए तो वार्ता में है .. हमें प्रतीकों में लिखने की छूट है .. लिखना चाहिए .. पर अवैज्ञानिकता से बचते हुए  । और बहुत गहराई से पाठ कर लगा कि ये बेहतरीन है पर इसका सर्वश्रेष्ठ होना शेष है अभी
 Rajendr Shivastav Ji: मेरी ओर से भी  बधाई स्वीकारें सुरेन जी।
पहली बार आपकी कविताएँ पढ़ने का अवसर पाया है।
मेरी समझ और सोच की पहुँच से तीन पायदान ऊपर।
किंतु कुछ कविता से कुछ प्रतिक्रियाओं से भाव समझने में सफल सा हुआ।
निसंदेह बिम्ब अनोखे अनछुए और कविता को पूर्णता दे रहे हैं। 
'समझदार को इशारा काफी '
जैसा कुछ कहती, भावपूर्ण कविताएँ ।
ब्रज आज के लिये धन्यवाद ।
Manjusha Man: बहुत सुंदर छोटी छोटी कविताएं। कवी ने इन कविताओं में भावों का पूरा सागर उड़ेल दिया लगता है।
जीवन का हर रंग देखने मिला इन कविताओं में, हर एहसास है इन में।भाषा सरल सहज है। 

कवि को शुभकामनाएं एवं बधाई
Dinesh Mishra Ji: बहुत अच्छी भावपूर्ण कविताएं
सिर्फ़ वही कहा गया
जो ज़रूरी था।
 Naresh Agrawal Sakiba: माफ कीजिएगा मुझे यह सारी कविताएं प्रयोगवाद   से  प्रेरित लगी और अभी  प्रयोग की सफलता की ओर बढ़ती हुई। हलांकि यह दूरी अभी लंबी है। 

 मैं सदैव प्रयोगवाद का पक्षधर रहा हूं और यही प्रयास लोगों के सामने कुछ नया ला सकता है ।

 महाकवि को बधाई नये प्रयोग करने के  लिए, साथ ही शुभकामनाएं भी।

भाई मैं कोई  समीक्षक तो नहीं  हूँ लेकिन जो समझ आया वही लिखा और है वह भी बार बार पढ़ने के बाद।
 Jyotsana Pradeep: आद. सुरेन जी ..आपकी रचनाये पढ़ी, बहुत  अच्छी लगी ,सहज और सरल भाषा में गंभीर भावों को समेंटे है । पिता पर लिखी कविता बहुत बढ़िया लगी साथ ही 10 वी कविता 
छले जाने का के पड़ाव..........

अनोखी!!!

शुभकामनाओं के साथ🙏

 Chandrashekhar Ji: सुने-पढ़े विषयों पर मौलिक शैली की होने से विशिष्ट कवितायेँ हैं सुरेन जी की। उनकी विश्लेषण क्षमता से समूह परिचित है ही, कुछ संकेत कविताओं में हैं जो कवि को इंगित कर रहे थे, कवि का नाम पता चलने के मुझे ऐसा लगा। सुरेन जी बधाई🌷





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Friday, September 23, 2016

प्रेम का बीज जब मन में अंखुआता है, भाव शब्द के छौने कुलांचे भरने लगते हैं।हृदय के तारों का स्पंदन प्रेमगीत अलापने लगता है।प्रकृति जन्य मौसमो से भिन्न होता है प्रेम का मौसम।

प्रेम के मौसम से ही बहार मांगता है बसंत।शिशिर लरजता है प्रेम की शीतल बयार से और बरसता है प्रेम बादलों से जब धरती और आकाश बंध जाते हैं प्रेम के बंधन में।ग्रीष्म की तपन दहकती है जब प्रेम यज्ञ में देहों की समिधा होम होती है।

अभिमंत्रित प्रेम कविता का होता है तब सृजन।

सभ्यता के उद्गम से भी पूर्व स्थापित था प्रेम।ताम्रपत्रों में गढ़ी गई थी इसकी इबारत और चकमक पत्थर की खोज का आधार बना था प्रेम।शताब्दियों के गुजरने के क्रम में कभी नहीं गुजरा प्रेम, वह दो हृदयों की थिरकती साँसों की लय पर, देह के छोड़ जाने पर भी रहा सदा सदा रूह में अहर्निश...

कुछ ऐसी ही प्रेम पगी कविताओं की धड़कन का दस्तावेज है डॉ राकेश पाठक का कविता संग्रह बसंत के पहले दिन से पहले कविताओं में प्रेम तो रचा बसा है ही इनसे स्मृतियो का उपवन भी शब्द दर शब्द महक रहा है।भाषा कोमल भावों को उकेर रही है।

कठिन समय में अपने प्रेमिल स्पर्श से दुलारती कविताएं बरबस कह उठती है अभी संवेदनाएं जीवित है।जबकि समय की क्रूरता खाप बन कर फ़ुफ़कार रही है।आदिम संस्कारों की बलि देकर हवस नंगा नर्तन कर रही है।ऐसे समय में सांसरिक उद्यमों और विकृत समय में कवि का प्रेम कविता को बचा लेना, प्रेम को जीवन दान देना सम है।

आश्चर्यचकित कर देने वाले प्रतीक और वाक्य विन्यास से सजी कविताएं स्मृति में बार-बार दस्तक देती है।ईमेल 1, 2, 3 प्रेम की मासूमियत का कच्चा चिट्ठा है। कितना ही वयस्क क्यों ना हो जाए प्रेम उसकी मासूमियत चिरस्थाई होती है। जैसे सूखे फूलों को अंगुलिया सहलाती है किताबों में, अंगुली के स्पर्श से मन के कोने कोने महक जाते हैं।प्रेम में जहां मिलन की उत्कट अभिलाषा होती है विदा के पल भी साथ साथ चलते हैं।विदा के गीत में दर्द, प्रेम का ही प्रतिरूप होता है।

 हाशिए में सिमट कर रह गई जिंदगी ,
एक ढलती शाम बन कर रह गई जिंदगी
शब्द तो तुम साथ ले  गई हो साथ अपने ही सभी 
इक अधूरा गीत बनकर रह गई जिंदगी


डॉ राकेश पाठक के कविता संग्रह बसंत के पहले  दिन से पहले 
से कुछ कवितायेँ है आज रचना प्रवेश में 
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परिचय

डॉ. राकेश पाठक
प्रधान संपादक ,डेटलाइन इंडिया
# जन्म: 1 अक्टूबर 1964 
गोरमी  जिला भिण्ड मप्र  में।
# शिक्षा:
 एम ए (सैन्य विज्ञान)
 एम ए (इतिहास) 
 पीएच.डी.(सैन्य विज्ञान)
# ग्वालियर में कुछ वर्ष शासकीय प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक ।
# सन् 1989 से सक्रिय पत्रकार
#अनुभव:

संपादक  नईदुनिया ग्वालियर 
संपादक नवभारत ग्वालियर 
संपादक नवप्रभात  ग्वालियर
संपादक  प्रदेश टुडे ग्वालियर ।
सांध्य समाचार, स्वदेश,  आचरण और लोकगाथा  आदि समाचार पत्रों में महत्वपूर्ण दायित्व का निर्वाह।

# पुरस्कार-सम्मान
 * सत्यनारायण श्रीवास्तव स्मृति पत्रकारिता पुरस्कार,
* जगदीश प्रसाद चतुर्वेदी  पत्रकारिता पुरस्कार
* राज भारद्वाज सम्मान 

# विशेष:
 * न्यूयॉर्क में आयोजित विश्व हिन्दी सम्मेलन
    में भागीदारी,
* राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटिल की लाओस एवं कंबोडिया की आधिकारिक यात्रा का कवरेज
* कोसोवो (पूर्व यूगोस्लाविया) में संयुक्त राष्ट्र शांति    मिशन की रिर्पोटिंग । 
# प्रकाशित पुस्तकें:
 * यूरोप का यात्रा वृतांत
   ‘काली चिड़ियों के देश में' मेधा बुक्स दिल्ली 
    से प्रकाशित
* कविता संग्रह
  "बसंत के पहले दिन से पहले " दखल प्रकाशन दिल्ली से प्रकाशित।
*शोध पुस्तक
 'हिन्दी पत्रकारिता का इतिहास- मध्यप्रदेश'       छत्तीसगढ़ हिंदी ग्रन्थ अकादमी से प्रकाशित
आने वाली पुस्तक:
"परमाणु बम के मुहाने पर"
सम्प्रति : प्रधान संपादक  
           डेटलाइन इंडिया 
संपर्क :     शिव प्रसाद 
एम-157 ए, माधव नगर, ग्वालियर - 474002 म.प्र.
फोन : 0751-2627700, 
मोबाइल : 098260-63700,

    ई-मेल : rakesh pathak0077@gmail.com







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 हम दोनों .

सभ्यता के प्रारम्भ में
चकमक पत्थर से
आग खोज कर लाये थे
हम दोनों

सिंधु घाटी की वीथिकाओं में
हमने ही तो रखे थे पहले कदम
ताड़ पत्रों पर लिखे थे
मनुष्यता के पहले प्रेम पत्र

शैलाश्रयों में सहस्त्राब्दियों पहले
हम दोनों ने ही बनाये थे भित्ति चित्र

महाप्रलय के बाद
सिर्फ हम दोनों ही तो बचे थे
पिरामिडों की दीवारों पर
पीठ लगाकर हम ही तो बैठते थे

बेबीलोन के झूलते बगीचों में
 सबसे पहले भरीं थीं पीगें

अगले महा विस्फोट के बाद भी
हम दोनों ही बचे रहेंगे

प्रेम करने के लिए
अहर्निश।


दुःख
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रात के अँधेरे में
दबे पाँव निकलूंगा घर से

पथरीले किनारों वाली नदी के पास बैठूंगा
उदास बहते पानी के कान में
धीरे से बताऊंगा अपना दुःख
नदी मेरा दुःख सहेजेगी
बहा ले जायेगी दूर बहुत दूर

किसी निर्जन पहाड़ पर जाऊँगा
और बूढ़े बरगद के सीने पर
सिर रखकर सुबक लूँगा थोड़ी देर
बरगद अपनी जड़ों में सोख लेगा मेरा दुःख

शहर से दूर प्राचीन खँडहर में
भटकता रहूंगा सारी दोपहर
वहीँ कहीं किसी कोने में चुपचाप
छोड़ आऊंगा अपनी व्यथा

किसी को नहीं बताऊंगा अपना दुःख
और उसकी वजह
तुम्हें तो कतई नहीं
कभी नहीं।



मैंने प्रेम किया

मैंने प्रेम किया
आखेटक की तरह

तैयार किए अस्त्र-शस्त्र
मेहनत से बांधा मचान
ठीक किए सब कील काँटे
पैने किए तीर और
खींचकर परखी कमान

रेशम के महीन धागे से बुना जाल
और बिछा दिया उसके रास्ते में
भरमाया उसे प्रेम के 'मृग जल' से
अंतत: किया उसकी देह का संधान

मैंने प्रेम किया
प्रेम का अभिनय करते हुए।




2. उसने प्रेम किया

उसने प्रेम किया
आलता घोल कर
पैरों में रचाया
हवन के लिए वेदी सजाई
आटे से चौक पूरा
और नवग्रह बनाए

रोली, चावल और थोड़ा सा कपूर रखा
पालथी मारकर बैठी
सिर पर जरा-सा आगे किया पल्लू
हथेली पर गंगाजल लेकर किया आचमन
‘आवाहनम् न जानामि’ कहते हुए
किया देवताओं का आह्वान

प्रेम हवन में खुद को करती रही स्वाहा
‘पूजाम् चैव न जानामि’ कहते हुए
उसने प्रेम किया
पूजा की तरह।



लौट आना

लौट आना इस बार भी
जैसे लौटती रही हो अब तक

लेकिन लौट आना
बसंत के पहले दिन से पहले

लौट आना
सावन की पहली बारिश  में
मिटटी की सौंधी गंध से पहले

पूस के महीने में
जब आसमान से रुई की तरह
झरने वाली हो ओस
ठीक उससे पहले लौट आना

जेठ में सूरज से
बरसने लगे आग
और सुलगने लगे धरती
कुछ भी हो जाये
उससे पहले तुम लौट ही आना

हमें साथ साथ ही तो चुनने हैं
बसंत में पहली बार खिले फूल
पहली बारिश के बाद
गीली मिट्टी पर बनाने हैं
दो जोड़ी पाँव के निशान

ठिठुरती सर्दी में
बरोसी के पास बैठ
करनी हैं ढेर सारी कनबतियां
और जेठ की तपती दुपहरी में
तुम्हारे सुलगते होठों पर
रखनी हैं गुलाब की पंखुड़ियां

जीवन की वही आस
और चेहरे पर हास लिए
मेरे विश्वास की तरह
तुम ज़रूर लौट आना।



 विदा से पहले

एक दिन
सिर्फ एक बार मिलना

आखिरी बार ही सही
मिलना ज़रूर
विदा से पहले

पानी पोता से पोंछ डालना
मन की स्लेट पर लिखी
हमारी प्रेम कथा

बस छोड़ देना
अपने अपने नाम का पहला अक्षर

दुबारा कभी मिले तो
उसी पहले अक्षर से
शुरू करेंगे फिर एक बार
अपनी प्रेम कथा।



विदा के बाद

हो सके तो रखना
थोड़ी सी जगह मेरे लिए
विदा के बाद भी

ज्वार उतरने के बाद
मन के किनारों की रेत पर
बचा कर रखना थोड़ा सा गीलापन
जैसे अलगनी पर छोड़ कर रखती हो
हमेशा एक रूमाल की जगह

जैसे बची ही रहती है
तुम्हारे बेतरतीब पर्स में
बिंदी के पत्ते के लिए गुंजाईश।






तुम्हारा पता

देश देशान्तरों को
पार करके पहुंचा मैं
मीलों पसरे मैदानों में
पीले सोने जैसी सरसों से
पूछा तुम्हारा पता

ऊंचे पहाड़ों पर
आसमान से बातें करते
देवदार के पास ठहरा
झुक कर उसने कान में
बताया रास्ता

महासागरों के किनारों पर
ठहरा रहा सदियों
तब लहरों ने आगे बढ़ कर
मेरा हाथ थामा

न जाने कितने प्रकाश वर्ष
लम्बा सफर तय करते करते
निविड़ अंधकार के बीच
जुगनुओं ने दिखाई राह
घनघोर सन्नाटे को चीर कर
झूंगुर बढ़ाते रहे मेरा हौसला

अबूझ जंगलों को पार करते समय
परिंदों ने सुनायीं परी कथाएं
सर्द रातों में
पुच्छल तारों ने की रौशनी
कि भटक न जाऊं

दिन की तेज़ रौशनी में
सूरज ने अपने घोड़े दे दिए
कि जल्द से जल्द पा सकूं
तुम्हारा पता

तब मिलीं तुम
घर की देहरी पर खड़ी
पैर के अंगूठे से
धरती को कुरेदती हुयी
मेरे लिए
अनंतकाल से प्रतीक्षारत।


  डॉ राकेश पाठक

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Wednesday, September 21, 2016

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आज हम भारतीय साहित्य के आधुनिक युग में है ।
सोशल मीडिया ने इसे एक अलग ऊंचाई दी है ।
facebook ,whatsapp के सूक्ष्म पटल पर साहित्य ने अद्भुत विस्तार पाया है। बातचीत का माध्यम बनी संचार सुविधा ने चेट तक ही सीमित न रह कर सामाजिक, राजनीतिक ,सामायिक विषयों पर भी चर्चा के नए आयाम स्थापित किए हैं। इन सबसे हटकर जो काम हुआ है ,वह है मेल मिलाप व साहित्यिक चर्चा हेतु सम्मेलनों का आयोजन। हाल ही में *साहित्य की बात* समूह का औपचारिक सम्मेलन 18 सितंबर ऐतिहासिक बौद्ध नगरी साँची में संपन्न हुआ ।इस सम्मेलन की विशेष बात यह रही कि इस आयोजन में हर सदस्य ने अपनी जिम्मेदारी समझकर मन से भागीदारी निभाई ।कोई विशेष नहीं कोई सामान्य नहीं सब अपने को अभिव्यक्त करने में मुक्त थे ।आभासी दुनिया से शुरू हुए आभासी अपनेपन में हकीकत में गहरे अपनत्व की मिसाल कायम की। पटल पर चर्चा के दौरान हुए मतभेद की खलिश किसी के चेहरे पर छाया मात्र भी नहीं नजर आई। साहित्य सेवा भाव के साथ माननीय संबंधों की प्रगाढ़ता ने यह सिद्ध कर दिया कि आभासी दुनिया में अब संवेदनाएं सकारात्मक रूप से मुखर हो रही है ।नकारात्मक पहलुओं को विस्मृत कर दें तो whatsapp साहित्य विमर्श का ठोस पायदान साबित हो  चुका है ।जैसा कि सम्मेलन में दस्तक समूह के एडमिन श्री अनिल करमेले ने अपने वक्तव्य में कहा कि यह whatsapp का 10% उपयोग है सोचिए यह प्रतिशत बढ़ेगा तब क्या होगा।



साहित्य की बात समूह के साँची समारोह पर सदस्यों के विचार .... क्या सोचते है वो इस समारोह के बारे में






⚫🔴1 -  साँची सम्मिलन की विशिष्टता एवं उपलब्धि  आप की दृष्टि में क्या रही ।

⚫🔴2 -  इस आयोजन से आपसी दूरियां किस सीमा तक निकट आ पायी ।

⚫🔴3 - आयोजन में कौन से पल ऐसे रहे जिन्होंने आपको भावविभोर कर दिया ।

⚫🔴4 - आयोजन को और प्रगाढ़ एवं उत्कृष्ट बनाने के लिए आपके क्या सुझाव है ।

⚫🔴5 - आपकी आयोजकों/आयोजन  से क्या क्या अपेक्षा थी और वह किस सीमा तक पूरी हुई ।

कृ0 सहभागी साथी  प्रत्येक बिंदु पर बिंदुवार लिखेंगे तो अच्छा लगेगा ।



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*Aalknanda Sane*

1 -  साँची सम्मिलन की विशिष्टता एवं उपलब्धि  आप की दृष्टि में क्या रही ?

साँची सम्मिलन की सर्वाधिक महत्वपूर्ण  विशिष्टता उसका अनौपचारिक होना है. बिना किसी बहुत औपचारिकता के आयोजन की शुरुआत हुई. समूह के बाहर का कोई मुख्य अतिथि,विशेष अतिथि या अध्यक्ष वगैरा न होने से एक मुक्त भाव सबके मन में था.  सभीने निर्धारित अनुशासन का पालन  किया, बावजूद इसके सब स्वतंत्रता का अनुभव कर रहे थे, उसी भावना से अभिव्यक्त हो रहे थे.

2 -  इस आयोजन से आपसी दूरियां किस सीमा तक निकट आ पायी ?

जिनके मोबाईल नम्बर हम रोज देखते हैं, उनसे प्रत्यक्ष भेट सबसे बड़ी उपलब्धि थी,साथ ही एक पारिवारिक अनुभूति भी हुई  जो हमारी भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग है.समागम साहित्य के लिए था , पर उसमें पारस्परिक दूरी कम हुई और यह एक अंतरंग साहित्य  समागम की तरह संपन्न हुआ.

3 - आयोजन में कौन से पल ऐसे रहे जिन्होंने आपको भावविभोर कर दिया ?

एक तो जब मैं आयोजन स्थल पहुँची , तब वहाँ उपस्थित सभी साथी सदस्य मेरे स्वागतार्थ स्वस्फूर्ति से शामियाने के बाहर तक आ गए और ''ताई, ताई'' कहकर लगभग सभीने मेरे पैर छुए. दूसरे मेरे परिचय के दौरान ब्रज जी ने मेरे प्रति एक विश्वास व्यक्त किया कि मैं जब जब   समूह से बाहर हुई, तब तब मेरे द्वारा बताए गए कारण सही और समर्थनीय थे.

4 - आयोजन को और प्रगाढ़ एवं उत्कृष्ट बनाने के लिए आपके क्या सुझाव है ?

प्रगाढ़ता तो इतनी ही काफी है, क्योंकि अधिक प्रगाढ़ता भी कभी कभी बिगाड़ पैदा करती है.बार बार सम्मिलन होगा तो कुछ सदस्यों के बीच प्रगाढ़ता स्वाभाविक रूप से बढ़ेगी.

यह सम्मिलन उत्कृष्ट ही था , उसे और अधिक उत्कृष्ट बनाना एक निरन्तर चलनेवाली प्रक्रिया है.कुछ सुझाव हैं  :--

 कुछ प्रमुख कवियों और समूह सदस्यों की कविताओं पर तथा कुछ प्रसिद्द कविताओं पर आधारित एकाधिक कार्यक्रम तैयार किए जा सकते हैं, जिन्हें अलग अलग उप समूह क्रियान्वित करें. यदि अगले सम्मिलन में यह तय होता है तो उसको विस्तार से मैं बता सकती हूँ.

जिन साथियों की पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, उनके लिए एक मेज पर इंतजाम किया जा सकता है, ताकि वे किताबें बाकी साथी खरीद सकें.मुफ्त में किताब बाँटने का चलन समाप्त करने की दिशा में  कम से कम हम एक सार्थक कदम उठाएं.

जिन साथियों की पुस्तकें प्रकाशित नहीं हुईं हैं या किसी भी कारण से नहीं हो पा रही हैं , उनकी मदद भी बाकायदा एक समिति बनाकर  इस आयोजन के जरिए की जा सकती है. किताबों का अपना महत्व है और वह आज भी कायम है.

5 - आपकी आयोजकों/आयोजन  से क्या क्या अपेक्षा थी और वह किस सीमा तक पूरी हुई ?

कोई अपेक्षा नहीं थी, क्योंकि मूलतः: मैं यह मानती हूँ कि यह आयोजन सामूहिक था, सबका था. विदिशा के साथी आयोजक नहीं, संयोजक थे. ना वे मेजबान थे और ना ही हम बाहर से पहुँचे सदस्य  उनके मेहमान थे.

वैसे भी सब कुछ बेहद व्यवस्थित था.  स्थान,कार्यक्रम संयोजन, संचालन,माइक,नाश्ता, खाना सब.जरा सी गड़बड़ तब हुई जब वनिता जी को माइक थमा दिया गया.उनके पास सदस्यों की सूची होती तो और बढ़िया रहता.यह किसी को भी नहीं सूझा, मुझे भी नहीं कि अपने मोबाईल पर  साकीबा सम्मिलन समूह खोलकर उनके सामने सूची रख दें. खैर , यह बहुत मामूली बात थी और इतनी  छोटी  मोटी भूलें तो होती रहती हैं.

यशस्वी सम्मिलन  के लिए बधाई और भविष्य के लिए शुभकामनाएं.
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Braj Shivastv

विदिशा के साकीबा ने
किया साहित्यकार सम्मेलन.

*सोशल मीडिया का एक सकारात्मक पहलू यह भी हो सकता है कि जिन लोगों को कभी, देखा नहीं,जिनसे कभी मिले नहीं, वो जब  आमने सामने हो जायें, और ऐसे मिलें जैसे बरसों की पहचान हो . तो आश्चर्य तो होता ही है*
विगत शनिवार और रविवार को कुछ ऐस ही मंजर हुआ, जब  आभासी दुनिया के कलाकारों के आने पर विदिशा के मित्र अपने घरों में आत्मीयता से स्वागत करते रहे.
साकीबा सम्मेलन का आयोजन किया, हमारे नगर के चर्चित युवा कवि, और वाटस एप समूह "साहित्य  की बात" समूह के संचालक ब्रज श्रीवास्तव ने विदिशा के साथी साहित्यकारों, श्री दिनेश मिश्र, सुदिन श्रीवास्तव, अविनाश तिवारी, वनिता वाजपेयी, राजेंद्र श्रीवास्तव, उपेन्द्र कालुस्कर, जीवन रजक आदि मित्रों के सहयोग से. संयोजक थे प्रोफेसर संजीव जैन.

साकीबा (साहित्य की बात) समूह की दूसरी वर्षगाँठ का यह सदस्य सम्मेलन विदिशा बासौदा के कवियों की मेजबानी में *साँची स्थित संबोधि होटल में विगत रविवार को संपन्न हुआ, जिसमें कई  राज्यों से नामचीन,गंभीर साहित्यकार सम्मिलित हुए. शरद कोकास(दुर्ग) देवीलाल पाटीदार,(भोपाल) अलकनंदा साने(इंदौर) रवीन्द्र प्रजापति मणिमोहन मेहता, डा. पदमा शर्मा(शिवपुरी ) ,चंद्रशेखर श्रीवास्तव,डा. मोहन नागर, दुष्यंत तिवारी(मुंबई) , प्रवेश सोनी(कोटा) , हरिओम राजौरिया, सीमा राजौरिया (अशोकनगर) , मनोज जैन, (भोपाल) अरूणेश  शुक्ल,( भोपाल) , सईद अय्यूब ( नई दिल्ली) , अनिल करमेले(भोपाल) , मीना शर्मा (दुर्ग) , सुधीर देशपांडे,(खंडवा) सहित ५० साहित्यकार सम्मिलित हुए. आरंभ में सुदिन श्रीवास्तव के निर्देशन में कुमारी  प्रतिष्ठा, ममता, उदित, वैशाली ने, निराला की, और साहिर लुधियानवी की रचना गाकर सांगीतिक प्रस्तुति दी. समस्त सदस्यों ने आत्मीय माहौल में समूह के संस्थापक एडमिन *ब्रज श्रीवास्तव*का राजस्थानी पगड़ी बाँधकर सम्मान किया. इसके बाद
 कवि *जीवन रजक* के कविता संग्रह *अहसास*" का लोकार्पण भी हुआ,और सम्मान भी किया गया. ||

तत्पश्चात आयोजित गोष्ठी में
साहित्य के दृश्य पर, चर्चा में, दिनेश मिश्र, उदय ढोली, सुरेन्द्र कुशवाहा, सहित आगंतुकों ने विचार व्यक्त करते हुए विमर्श में समकालीन चिंताओं के साथ रचनात्मकता की ज़रूरत पर जोर दिया गया. तत्पश्चात सभी सदस्य बौद्ध स्मारक के लिए विश्व प्रसिद्ध सांची के स्तूप के दर्शन और भ्रमण के लिए गये.समूचे कार्यक्रम का संचालन कवि मणिमोहन मेहता और साकीबा के  प्रमुख एडमिन ब्रज श्रीवास्तव ने किया, ||स्तूप पर ही आभार प्रदर्शन शरद कोकास ने किया...


रपट: ब्रज श्रीवास्तव. विदिशा
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Sudhir Deshpande

आभासी दुनिया का अपना एक संसार तो है। बातचीत है। चर्चा है। अभिनय है। रूठना मनाना है। ज्ञान है, हंसी है, ठठ्टा है। कई. बार ये भी सोचा जाता रहा कि क्या अब जीवन इसी आभासी दौर का ही होकर रह जाएगा। क्या इसी तरह अपने सुख दुख बांटे जाएंगे। क्या केवल लिख भर देने से किसी का जन्मदिन शुभ होगा। या मृत्यु पर श्रद्धांजलि कह भर देने से संवेदना व्यक्त होगी। क्या इसे ही सच्चे दुख या सुख की अनुभूति का पर्याय माना जाए। क्या यह जीवन की वास्तविकता नही होने जा रहा। हम अपने कमेण्ट्स पर लाइक्स गिने या कमेण्ट्स की संख्या को अपनी ख्याति का आधार माने। क्या साक्षात मिलने पर भी हम इतने ही नकली नही बनते। मनुष्य का आचरण जितना आभासी है शायद उतना आभासी कम से कम आभासी कही जाने वाली वेबसाइट तो नही है। संचालन अंततः मनुष्य के हाथों में ही है। वही इसे आभासी या वास्तविक बना सकता है। यह उसके आचरण पर ही तो निर्भर है। सगों को मिलते सालों बीत गए पर अंततः वाट्स एप मे जोड दिया। किसी ने आभासी सम्बन्ध बनाए और वास्तविक स्नेह की अद्भुत मिसाल कायम कर दी। कई मित्र अपने विभिन्न वैशिष्ट्यों के साथ एक जगह एकत्र हो गये। अपरिचित होने का भाव नही। मिले तो खुलकर। हंसे तो खुलकर। साहित्य का यह प्रताप था कि और दिनों मे अपने रचनाकर्म और उस पर चर्चा मे तत्व रहने वाले रचनाकार एक दिन यों ही मिले बतियाए चहिए खिलखिलाए। समय दिया। फिर नामवंत ही क्यों न हो। एक परंपरा का उदय है यह। हमारी यात्रा पुनः जडों की ओर लौटने की है। वास्तविक जगत से आभासी जगत को पाना और आभासी  जगत से पुनः वास्तविकता को पाना एक बडा परिवर्तन है। साहित्यकारों से ही यह अपेक्षा हो सकती थी। अब यह परिपाटी चल पडी है। आशा है यह यात्रा क्षणिक नही अपने उच्चतर स्तर को प्राप्त करेगी। और यह शुरुआत सृजनपक्ष और साहित्य की बात से हुई यह और भी सुखद है।

आपका
सुधीर देशपांडे
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Saiyad Ayyub Delhi:

 1 -  साँची सम्मिलन की विशिष्टता एवं उपलब्धि आप की दृष्टि में क्या रही ।

पूरा साँची सम्मेलन ही विशिष्ट था। इन अर्थो में विशिष्ट कि मुझे साकीबा से जुड़े छः महीने भी नहीं हुये और एक पल के लिये भी नहीं लगा कि मैं किसी नये परिवार में हूँ। विदिशा और भोपाल के ख़ूबसूरत दिल वाले फ़रिश्तों और मल्लिकाओं से मिलना एक विशिष्टता रही। बाहर से आये कई सारे सदस्यों से मिलना एक विशिष्टता रही। यह अफ़सोस भी एक विशिष्टता ही रही कि बहुत से लोग जो वहाँ नहीं आ सके उनसे मिलना नहीं हो सका। मिलने के साथ-साथ लोगों को जानना-समझना, उदयगिरी व साँची का भ्रमण एक विशिष्टता रही इस आयोजन की।

2 -  इस आयोजन से आपसी दूरियां किस सीमा तक निकट आ पायी।

मेरे लिये आपसी दूरी जैसी कोई चीज़ नहीं थी। आपसी निकटता ही थी जो और घनी हुई।

3 - आयोजन में कौन से पल ऐसे रहे जिन्होंने आपको भावविभोर कर दिया?

यह मुश्किल प्रश्न है। कई सारे अवसरों में से एक को चुनना पड़ेगा। मेरे विस्तृत लेख में वे पल आ जायेंगे।

4 - आयोजन को और प्रगाढ़ एवं उत्कृष्ट बनाने के लिए आपके क्या सुझाव है?

संचालन शुरु से अंत तक किसी एक व्यक्ति के हाथ में रहे। स्वागत और सम्मान के समय को सीमित किया जाये। कम से कम एक परिचर्चा का सत्र अवश्य हो। मंच पर सबको समान अवसर मिले चाहे बाहर से आया कोई सदस्य हो या स्थानीय। बाहर से आये सदस्य भी स्थानीय लोगों को सुनना-गुनना चाहते हैं।

5 - आपकी आयोजकों/आयोजन से क्या क्या अपेक्षा थी और वह किस सीमा तक पूरी हुई?

अपेक्षा यह थी कि वे मुझे खर्च बराबर-बराबर बाँटने देंगे पर उन्होंने लगभग सारा ख़र्च उठाया। सारे विदिशा और भोपाल वाले इतने 'ख़राब' थे कि मैं दुआ करता हूँ कि सारे लोग ही इतने ख़राब हो जायें ताकि दुनिया में कुछ और शांति आये। वे इतने केयरिंग थे कि उतना केयरिंग नहीं हुआ ।

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Braj Shivastav:

1 -  साँची सम्मिलन की विशिष्टता एवं उपलब्धि  आप की दृष्टि में क्या रही ।
मेरी नजर में तो इस की विशेष बात यह है कि विचारधारा में अलग अलग होते हुए, भी किसी ने किसी को नकारा नहीं,छोटे(हम), मंझले, बड़े साहित्यकार शामिल थे,
उनको जोड़ कर मुझे लगा कि मैं किसी का दुश्मन नहीं हूँ. दूसरी बात प्रबंधन के लिए कुछ मित्रों का उत्साह से सहयोग करने की पहल करना याद रहेगा.
2 -  इस आयोजन से आपसी दूरियां किस सीमा तक निकट आ पायी ।⬛
मेरी तो सबसे नजदीकी सी ही थी, तो यह कहूंगा कि और और नजदीकी हुई.इतने दूर से लोग आखिर दूरियाँ कम करने के लिए ही तो आये थे.
3 - आयोजन में कौन से पल ऐसे रहे जिन्होंने आपको भावविभोर कर दिया ।⬛
वैसे तो ज्ञान प्राप्त कर चुके लोगों को भाव विभोर होते कभी देखा नहीं, पर मैं दो बार बेखुदी में हुआ, 17 की शाम जब मेरे निवास पर शरद जी, सईद जी, पदमा जी, मृगांक जी, मीना जी, प्रवेश जी, और अविनाश तिवारी सहित विदिशा के आत्मीय लोग, गा रहे थे, गपशप कर रहे थे, मिल जुलकर खाना,परोसना, हंसी, ठहाके, ये सब कब कहां हो पाता है,
दूसरी बार पगड़ी /टोपी के पहले सईद भाई का मेरे लिए प्यार से भरे शब्द बोलना, विभोर कर गया.
4 - आयोजन को और प्रगाढ़ एवं उत्कृष्ट बनाने के लिए आपके क्या सुझाव है ।
बस यही है कि जो लोग इसे व्यर्थ समझते हैं वो इसके महत्व को कम न समझें, जो लोग इसे कर रहे हैं वो भी कमतर साहित्यकार नहीं हैं, जो जो वहाँ असाहित्यिक वातावरण रहा, वह नियोजित ही था और यही जरूरी भी था.
5 - आपकी आयोजकों/आयोजन  से क्या क्या अपेक्षा थी. 🔷
बहुत सारी थीं, अधिकतर तो पूरी हो गईं, इस बार विदिशा में सुदिन जी और उनकी पत्नी सुषमा जी ने गजब का सहयोग किया, बल्कि खुद ही सब किया. संजीव जी ने भी खूब वक्त दिया, अविनाश तिवारी और दिनेश मिश्र जी का साथ मिला तो विदिशा के हिस्से का काम पूरा हुआ. जीवन रजक, सबसे पहली ही बार मिल रहे थे, फिर भी असहज नहीं रहे. सब लोग बहुत अच्छे हैं मेरे समूह में, जो आ नहीं सके, तो कुछ कुछ अनमनापन रहा मेरे ह्रदय में. काश कम से कम सब सक्रिय साथी आ पाते, सुरेन, मधु, संध्या, शाहनाज़, दीप्ति कुशवाह की बहुत कमी लगती रही,

इस सबके बावजूद मैं अति आनंदित, नहीं  होश में हूँ,मैं लिख,पढ़ रहा हूँ, मुझे पता है कि हमारी रचनात्मकता पहले जरूरी है, आखिर हम उसी की वजह से तो संग में हैं इसी के लिये तो साहित्य की बात है.
फिर भी कहूंगा कि
आपका साथ साथ फूलों का..🔷🔷🔷🔷

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Mani Mohan Ji:

साकीबा ऐसा तीसरा समूह है जिससे मैं सबसे पहले जुड़ा / जोड़ा गया।इससे पूर्व बिजूका और काव्यार्थ में था ...तो दो साल से ऊपर हुआ इस समूह में रहते हुए ...अपनी तमाम जेन्युइन व्यस्तताओं और ओढ़ी हुई व्यस्तताओं के बावजूद यह समूह भी मेरे दिल के बहुत करीब है । साकीबा का यह दूसरा सम्मेलन था जो  साँची में सम्पन्न हुआ ।गत वर्ष यह विदिशा में हुआ था पर बहुत गिने चुने सदस्य ही मौजूद थे , थोड़ी निराशा भी हुई थी पर साँची के आयोजन की सफलता ने उत्साह से भर दिया ।

तमाम साथियों से रूबरू मिलना जिनमे शरद जी , अय्यूब जी , ताई , प्रवेश जी , मीना जी आदि से पहली ही मुलाकात थी । बाकी से तो कई बार मिलना हुआ ।तो यह उपलब्धि रही । जहां तक इस सम्मेलन से अपेक्षा की बात है तो यह अकादमिक अर्थ में कुछ थी ही नहीं , जब जब ब्रज भाई से बात हुई तो यही था कि एक दिन का आयोजन है इसलिए उसे अकादमिक रूप से भारी न बनाया जाए और मेल मुलाकात और मस्ती तक ही रखा जाए । अगले आयोजनों में जरूर पूरे कार्यक्रम को सत्रों के हिसाब से बाँट कर तथा अलग अलग लोगों को जिम्मेदारी देकर काम करेंगे । साकीबा के ही सभी सदस्यों की रचनाएं भी यदि अगले आयोजन तक किताब रूप में ( सहकारिता के आधार पर ) यदि प्रकाशित हो जाती है और उसका विमोचन इस आयोजन में करते हैं तो यह और आनंद की बात होगी। शरद भाई , संजीव जी यदि इसमें रूचि लें तो यह कोई बड़ी बात भी नहीं 😊
 पूरा आयोजन ही मुझे अभिभूत कर गया ।सभी मित्रों के स्नेह के आगे विनत हूँ । साथ ही क्षमा भी कि इस आयोजन की व्यवस्था आदि में अपनी मजबूरियों के चलते जरा भी योगदान न दे पाया ।सम्भव हुआ तो अगले आयोजन में repentance  करूँगा 😀🙏🏻
 बस एक ही निवेदन है कि आत्मीयता अपनी जगह है पर रचनाओं के मामले में सभी रचनाकार मित्र और आलोचक ..संजीव भाई , अरुणेश , रविन्दर , मोहन नागर , अपनी बात उसी तरह  रखते रहें जैसा अब तक करते आये हैं ।
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Sudin Shrivastv 

 साकीबाइयों का एक सम्मेलन यहाँ हो ये तय होते ही सरगर्मियां तेज़ हो गयीं । समूह में इस विचार को रखा गया । धीरे धीरे सदस्यों की स्वीकृतियां आना शुरू हुयी । स्वीकृतियों के साथ साथ जनाबे ऐड़मिन की ओर से चिंतायें करने का सिलसिला बढ़ चला । अपने अपने स्तर पर स्थान तलाशने का काम शुरू हुआ ।आगंतुक सदस्यों की विशेष इच्छा सांची भ्रमण की थी इसलिए भोजन और आवागमन की सुविधाओं को देखते हुये संबोधि में कार्यक्रम तय हुआ । उधर अतिथियों की सूची हर दिन
अपडेट होती । संजीव जी,प्रवेश जी,और ब्रज भाई के खाते पैसेवाले होने लगे । ब्रज भाई की चिंतायें उजागर होने लगीं । रजक जी,चंद्र जी,तिवारी जी की सक्रिय भूमिका में आने लगे । आयोजन संबंधी बैठकों में सलाह मशविरों का दौर आरंभ हुआ ।प्रवेश जी द्वारा दिये गये फोटो को फ्लेक्स का रूप दिया गया । मुक्ता भाभी का मजाक़ कि"अब इन्हें टेंशन होने लगा "। अतिथियों को कहां रूकना है । इसपर बात होने लगी ।

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*संजीव जैन* 

क्या सकीबा सम्मेलन सार्थक हुआ ? हंसना मिलना जुलना दुराव छिपाव यह सब तो जीवन में होता ही रहती है. क्या यही इस सम्मेलन की सार्थकता है? संभवत: नहीं . हमें इससे आगे कुछ नए संदर्भों में इस सम्मेलन की सार्थकता के सूत्र खोजने होंगे.
बहुत गहराई में जाकर मंथन करने पर महसूस हुआ कि यह सम्मेलन हमारे चेहरों की पर्तों को धीरे धीरे खुलते जाने की प्रक्रिया का आरंभ हो सकता है.
प्रत्येक सदस्य अपने अंदर कई तरह के इंसानों को जिंदा रखे हुये होता है, कुछ एेसे भी इंसान हमारे अंदर जिंदा होते हैं जिन्हें हम कतई अपने साथ नहीं चाहते.
हमारी चेतना में बहुत से ज्वालामुखी पलते रहते हैं. वे बाहर आना चाहते हैं पर बहुत तरह के दबाव और अन्य कारक उन्हें बाहर नहीं आने देते. इस तरह के सम्मेलनों में यह संभव होता है. मैंने महसूस किया है कि बहुत से साथी बहुत कुछ अंदर का लावा बाहर निकालकर हल्के होने का प्रयास कर रहे थे और कुछ हद तक संभव भी हुआ.
हमारी चेतना एक धरती की तरह होती है जिसमें निरंतर हलचलें होती रहती हैं. ये हलचलें भूकम्पीय हलचलें भी पैदा करती हैं. इस तरह के प्लेटफार्म इन हलचलों को सतह पर लाने में सहयोग करते हैं. कुछ लोग इन्हें महसूस कर पाते हैं कुछ नहीं यह अलग बात है.
पृथ्वी की सतह की तरह ही हमार व्यक्तित्व होता है. कई परतों से बना रचा हुआ. यह निरंतर निर्मित होता है बाहरी आघातों से और अंदर की     हलचलों से. हमें कई बार जमीन के नीचे के जल-जीवन के स्रोत को खोजने के लिए ऊपरी पर्त को कुल्हाडी से खोदकर हटाना पडती है. मुझे लगा कि कुछ साथी इस प्रयास में लगे थे.

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Rajendr Shivastav Ji: 

1--साँची सम्मिलन की विशिष्टता व उपलब्धि :--
यह सम्मिलन इस माने में विशिष्ट कि आभासी दुनिया के ऐसे सहभागीयों का आत्मीय समागम जिनमें से अधिकांश पहिले एक दूसरे से कदाचित  ही कहीं मिले हों।
स्वस्फूर्त व साझा सहयोग से परस्पर परिचय व साहित्यिक उपलब्धियों पर चर्चा और "समूह की बर्षगाँठ -सबके साथ" मनाने की मंशा लिये हुये।व्हाट्स एप ग्रुप में अभी बहुत कम देखा-सुना गया आयोजन ।
साहित्य जगत की जानी-मानी विभूतियों से साक्षात् होना ,उनके विचार व्यवहार से सीख लेना व सबकी आत्मीयता पा लेना   नि:संदेह मेरे लिये बङी उपलब्धि है ,जिसका लाभ मुझे साहित्य सृजन में मिलेगा।
2--इस आयोजन से दूरियाँ कम हुई हैं।
औपचारिकता न के बराबर शेष रह गई।
बैचारिक मत एक होते दिखे। पारस्परिक संवाद परस्पर लगातार होते रहे ।सब ओर केवल और केवल नेह वअपनापन छलक रहा था।मेरी झिझक भी  नहीं रोक सकी मुझे सबसे घुलने-मिलने से।
3--मंच पर जब प्रवेश जी द्वारा लाई गई पगड़ी से एडमिन को सम्मानित किया गया ,और देवीलाल जी ने पगङी की गुरुता को इंगित करते हुये पगङी ससम्मान अपने सिर पर धारण की उस समय के उन भावों को स्मरण कर मन आज भी भाव विभोर हो जाता है।
4--एक स्पष्ट रूपरेखा व निश्चित एजेंडा
किसी भी आयोजन की सफलता निश्चित करता है। सहभागीयों के बीच कार्यविभाजन ,यद्यपि यहाँ था और सुगम बनाया जा सकता है।
विदा -वेला में कोई नव संकल्प के साथ आयोजन का समापन ।
5- किसी शायर का एक शेर याद आ रहा है--
  उसको क्या हक है कि कतरे से समंदर माँगे,
जिसने सिखलाया नहीं कतरे को दरिया होना ।
मेरी अपेक्षा अनुकूल आयोजन सफल रहा।
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Dinesh Mishra

साकीबा का ये आयोजन एक खुशबु की तरह था, जो अब भी मौज़ूद है, हमारी बातों में और हमारी यादों में। ये एक ऐसा ख़ास कार्यक्रम था जो इब्तदा से लेकर इन्तहा तक कुछ फ़ीसदी वर्कशॉप की मानिंद था, जिसमे सिर्फ़ कविता कहानी और कला पर ही बात नहीं हुई, बल्कि बहुत कुछ ऐसा सीखने मिला, जो किसी ख़ास विषय पर केंद्रित आयोजनों में आमतौर पर नहीं मिलता, जैसे बातचीत का तौर तरीक़ा, व्यवहार और एक बात और की जहां आयोजन में महिलायें और परिवारजन हों , वहां अपने बर्ताब को संतुलित रखने की ऐसी तालीम जो माहौल देखकर बग़ैर दिए ही मिल जाती है।
इस आयोजन ने जिसकी बुनियाद का पहला पत्थर व्हाट्सअप समूह
साकीबा पर सदस्यों की बातचीत से रखा गया हो, व्हाट्सअप यानि वो माध्यम जिसे आभासी और सतही कहकर बदनाम किया जाता रहा है, इस मिथ्या धारणा को दूर करने में सकारात्मक पहल की है।क्योकि सिर्फ़ chating के बाद हुई पहली मुलाक़ात ने ये साबित कर दिया की  मिलते ही लगने वाले ठहाके और गर्मजोशी सिर्फ़ सतही नहीं, इसमें हम सबके दिल भी शामिल थे, शायद इसीलिए ये अतिथि साहित्यकार हमारे घर पर आते ही परिवार के सदस्यों में तब्दील हो गए, यही वज़ह है की पत्नी नेहा और बिटिया मीठी कभी शरद भाई की बात करते हैं तो कभी अयूब की याद। ताई का स्नेह भुलाए नहीं भूलता है, तो प्रवेश जी ने मेरी आड़ी तिरछी रेखाओं को चित्र बताकर मुझे आगे कुछ करने के लिए प्रोत्साहित किया। मुझे ख़ुशी है की fb और whatsap की दुनिया ने मेरे और क़लम के बीच फासले बना दिए थे वो कम होना शुरू हो गए हैं, और फिर कविताएं लिखने लगा हूँ। इस आयोजन की सबसे बड़ी ख़ासियत इसका अनौपचारिक होना भी हैं।
अब बारी है उन भावुक लम्हों की,  जिन्हें भुलाना मुश्किल नहीं नामुमकिन भी है, जब सब लोग घर आये तो उनके जाने के बाद बिटिया मीठी ने कहा की पापा आपको इतना खुश इससे पहले कभी नहीं देखा, पदमा जी का साँची में शरद जी से कहना की दिनेश जी की कविताओं का संकलन निकालने के लिए प्रयास करना है। शरद भाई का मीठी से कहना की बेटा मुझे चाचा कहिए, मुझे अंदर तक भिगो गया, क्योंकि मेरे छोटे भाई का नाम भी शरद था, जिसे मैं खो चुका हूँ। ब्रज जी, शरद भाई और मणि जी बार बार मुझसे संकलन निकालने का इसरार कर ही रहे हैं। यहां मैं मोहन नागर जी का ज़िक़्र भी करूँगा, जो मेरी कविताओ को तरज़ीह देते हैं, और लम्बी चर्चा भी करते हैं।
कुल मिलाकर साकीबा आयोजन ने अपनों को अपनों से मिला दिया है, जो बड़ा काम है।
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 Meena Sharma: 

शब्द दर शब्द ....कैसे कोई उन पलों को लिख सकेगा.
एक-एक व्यक्ति का इंतजार,
देर होने पर कुशल पूछना..लम्बे
समय तक स्टेशन पर इंतजार, मिलने पर दौड़कर गले लगना.
देर तक सिर्फ तस्वीर से साकार रूप

में उतरना...सारे अजनबियों का
सिर्फ सा की बा का परिवार हो जाना.
विदिशा का हर घर हमारा घर हो गया
था.... साहित्य का कार्यक्रम
किसी निजी आयोजन की तरह हो गया था...हर एक को मंच ने सम्मानित किया.हर किसी की सुविधा असुविधा का ख्याल ..
माँ सरस्वती की वँदना से प्रारंभ
होकर ..साकीबा के स्थापना और प्रगति का विवरण...
परिचय ..वक्तव्य..गीत.और आगे के कार्यक्रम की रूपरेखा, साँची भ्रमण में आपस की सबकी
मुलाकात नेह बँधन बाँध गई.
उम्मीद है इस तरह के आयोजन से लेखक को नये विचार, नया लेखन रचने का नजरिया मिलेगा.
साकीबा परिवार को बधाई.
आयोजन का प्रथम चरण सफल रहा. भविष्य के लिये शुभ कामनाएँ.
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 साहित्य सम्मेलन,"साहित्य की बात" 17-18 september 2022 साकिबा  साकीबा रचना धर्मिता का जन मंच है -लीलाधर मंडलोई। यह कहा श्री लीलाधर...

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