Friday, September 9, 2016

कुछ कविताएँ ऐसी होती हैं जो कल्पना की क्षमता को तो बताती ही हैं, साथ में किसी परंपरा के सौन्दर्य तत्व को भी चतुराई से आगे बढ़ा देती हैं, और किसी नियम पर एसा सवाल खड़ा करती हैं कि नियम बनाने वाले और चलाने वाले बौखला जायें. दरअसल ऐसी कविताएँ ही बदलाव के लिए ज़मीन तैयार करती हैं. आज यहाँ हम ऐसी ही कविताएँ पेश कर रहे हैं जिनको रचा है मंदसौर में रहने वाली चर्चित कवि आरती तिवारी ने. 

इन कविताओं पर जबरदस्त बहस हुई, वाटस एप समूह साहित्य की बात में. जिसके संचालक हैं ब्रज श्रीवास्तव. 

पेश है समूची चर्चा. 





नाम--आरती तिवारी

पति--रवीन्द्र तिवारी
जन्म-- 08 january
जन्म स्थान--पचमढ़ी
शिक्षा--बीएससी एम ए बी-एड
अध्यापन अनुभव--लगभग 15 वर्ष
                          पूर्व शिक्षिका
प्रकाशन---विगत कुछ वर्षों से मध्य-प्रदेश के प्रमुख समाचार पत्रों में विभिन्न विधाओं पे रचनाएँ प्रकाशित
नई दुनिया,दैनिक भास्कर,राज एक्सप्रेस,नवभारत व् सरस्वती साहित्य,शब्द-प्रवाह,सृजन की आँच, अक्सर,निकट,नेपाल की पत्रिका संयोजन व् अन्य प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में निरन्तर प्रकाशन
सम्मान __2014 में नागदा की साहित्यिक ,सामाजिक,सांस्कृतिक संस्था "अभिव्यक्ति विचार मंच"द्वारा प्रदत्त
              राष्ट्रीय विष्णु जोशी(अंशु) सम्मान से सम्मानित
वनारस के कैथी फेस्टिवल में जनवादी कवि गौरख पाण्डेय सम्मान 2015
पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में विशेष सक्रिय संस्था__"अनुराग" से जुड़ाव व् मन्दसौर विकास समिति से संलग्न
मुख्य विधा-नई कविता
आकाशवाणी इंदौर से कविताओं का प्रसारण
संबंधित संस्थायें-प्रगतिशील लेखक संघ,म प्र हिन्दी साहित्य सम्मेलन व् अन्य सांस्कृतिक सामाजिक संस्थायें
संप्रति-स्वतन्त्र लेखन
वर्तमान पता-आरती तिवारी
               dd/05 चम्बल कॉलोनी मन्दसौर 458001 म प्र
              मोबाइल--09407451563
         ईमेल--atti.twr@gmail.com



🔴 1 *कई बार पढ़ी गई किताब*

तुम फिर मुझे पढ़ रही हो
और बिल्कुल वैसे ही
  जैसे पहली बार

जब तुम्हारी नाज़ुक गुलाबी उँगलियाँ
पलटती थीं मेरा एक पन्ना
और नशीली आँखें
गड़ी रहतीं थीं मुझ पर
मैं सिहर-सिहर जाती थी

जब कहानी की एक नायिका
प्रताड़ित होती
और तुम तड़प उठतीं
भींच लेती मुट्ठियाँ
और तुम्हारी आँखों के सैलाब
बेताब हो जाते
ये दुनिया बदल डालने को

तुम वो पृष्ठ बार बार पढ़तीं
जहाँ इनकार कर देती है नायिका
बिस्तर पे बिछी,एक बासी चादर बनने को

चौंक गईं न
ये वही मोरपंख है
हाँ तुम्हारा बुकमार्क
और ये धूसर धब्बे
तुम्हारे सूखे हुए आँसू
जो नायिका के मार दिए जाने के दुःख में इस पृष्ठ पर
एक भावांजलि में
चस्पां हुए आज भी
अपनी नमी दर्ज़ करा रहे हैं
इतिहास में

तुम्हे याद है न
जब तुमने मन ही मन खाई थी ये कसम
तुम नहीं मानोगी हार
ज़ुल्म से,ज़ोर से या छल से

और आज मैं तुम्हारे हाथों में हूँ
हूबहू वही हो
वे ही गुलाबी उँगलियाँ
हाँ बालों में हल्की सफेदी और पतलापन
छरहरी काया,बदल गई गदराये जिस्म में
पर आँखों में वही आग
और चेहरे पे वही मासूमियत
हाँ जब मेरे प्रकाशन का
पहला वर्ष था
तुम्हारी उम्र का उन्नीसवां
हाँ हम दोनों युवा थे
भरपूर अंदर से और बाहर से भी

और आज मैं भी आ गई हूँ
कुछ चर्चित किताबों के बीच
और तुम भी जी रही हो
अपनी दूसरी पारी को सफल होके

मैं कई कई बार पढ़ी गई
कई कई चाहने वालों द्वारा
सुनो,पर वैसे नही
जैसे तुमने पढ़ा था मुझे
और जी ली एक उम्र
मुझे ही पढ़ते हुए



     ( 2 ) *घडी*

वो पिता की घड़ी थी
चांदी सी चमकती चेन में मढ़ी थी
घड़ी की भी एक कहानी थी
सुनी पिता की ही जुबानी थी

वे कहते
कभी दो सेकंड भी
आगे पीछे नही हुई
जबसे खरीदी है
सदा नई है

उनकी घडी का ये फलसफा था

घड़ी वो
जो बीस रूपये में ली हो
टाइम ठीक बताती हो
बिना रसीद की हो
हम विभोर हो सुनते
घड़ी को छूकर गौरान्वित होते
पिता चौबीस घण्टे में
एक बार चाबी भरते
और घड़ी सदा टिकटिक करती रहती
मुस्तैदी से

घड़ी ने निकाल दी
एक पूरी उम्र
बिना नागा,सुबह चार बजे जगा देती
उसकी सुइयों पर
दौड़ता था वक़्त
पिता कभी नही हुए किसी काम में लेट
वे अपनी घड़ी के
घण्टे वाले कांटे को अतीत कहते
जो मिनटों पर थिरकता
वही उनका वर्तमान था
और साइड बार के छोटे से कांटे को
वे बड़ी आशान्वित निगाहों से देखते
और उनके सपनों में
वो बड़ा हो जाता

उन्होंने नही की कोई शिकायत
कभी घण्टे वाले कांटे से
जिसकी चाह थी
क्यों नही मिला वो
वे साइड बार को भी साइड में ही रखते
कहते अपेक्षा मत करो
और भागते हुए मिनट वाले कांटे को
जीते रहे हर पल

उनकी घड़ी बड़ी विश्वसनिय थी


  3 *स्त्री से पुरुष*

ऋतु-स्नान के पश्चात्
लहरा रहे थे उसके चमकीले रेशमी केश
उसका सद्य स्नात सौंदर्य
भोर की प्रथम रश्मि सा
फूट कर प्रविष्ट हो रहा था
सृष्टि के सूक्ष्म कण में

तुम बढ़े आगे
तुम मुग्ध हुए
वो भी खिंची
तुम्हारी मर्दानी गन्ध के भरोसे में
एकाकार हुए दो स्वप्न
तुम रिक्त हुए
भर भर गई वो

तुम्हारा बीज धारण कर
धरती हो गई वो
उसके रज से
देह में पनपा एक और जीवन
उसके गर्भाशय का कोटर
तुम्हारे बीज का अभेद कवच था
नौ महीने अंकुरण से भ्रूण् यात्रा में
उसके रक्त से पोषित
एक और पुरुष
बढ़ते और बनते रहे तुम
खिलते रहे चंद्रकलाओं से

वाद्य-यंत्र सी
बजती रही उसकी कोंख
गर्भनाल से तुम्हे चुगाती रही चुग्गा
तुम्हे पोषने तुम्हारे लिए ही
खाती रही पौष्टिक आहार
चाहे मन कभी कुछ न खाना चाहे तो भी

तुम भी जन्मे थे
जैसे सहस्त्राब्दियों से जन्मता आ रहा था तुम्हारा पितृ-पुरुष
हाँ सुनो तुम भी एक योनिजा हो
रुधिर और श्वेत स्राव में लिपटे
क्षत-विक्षत करते हुए उसके कोमलांग
भूमि पर आये थे

वात्सल्य के झरने में नहला
ममत्व की चिकनाई से
मलकर पुष्ट करती वो
तुम्हारा शैशव
अपने स्तनों से उड़ेलती अमृत धार
तुम्हारे छोटे से मुँह में
और झाँकती तुम्हारी झपझप करती आँखों में
पढ़ लेती तुम्हारी तुष्टि
तुम्हारी किश्तों में पूरी होती नींद
घटा देती उसकी नींद
घण्टों से मिन्टो में

और आज तुम एक पूर्ण पुरुष हो
अपने पिता की तरह

तुमने निषिद्ध कर दिए है
उसके प्रवेश किन्ही विशिष्ट मन्दिरों में
गर्भगृहों में

उसकी देह एक मन्दिर है
जिसकी अंतर्यात्रा तय करके
बाह्य-जगत में आये हो तुम

जिसके लिए अस्पृश्य घोषित किया उसे
उसी संसर्ग उसी रज उसी रक्त से निर्मित तुम
उसी गर्भगृह में पड़े रहे नौ माह
शुचितवादियो सुनो,
जिस मार्ग से आये बाहर
वो अपवित्र ?

उस मन्दिर में जिस दिन हो जायेगा
तुम्हारा प्रवेश वर्जित
रह पायेगी क्या दुनिया
और तुम्हारे बनाये नियम भी?

🔴 ||  हमारे डर  ||

घर से निकलते ही
भीड़ में खो जाने के डर
अच्छे कपड़ों में
नज़र लग जाने के डर
सादे कपड़ों में
आम नज़र आने के डर

अव्वल आने पर
साथियों की ईर्ष्या के डर
औसत रहने पर
पिछड़ जाने के डर
प्रेम की अभिव्यक्ति पर
ठुकराये जाने के डर


ब्रांडेड माल से ठगे जाने के डर
सस्ते में घटिया उत्पाद के डर
दस्तावेजों के नकली पाये जाने के डर


बाढ़ और सूखे से
बाज़ार बैठ जाने का डर
मन्दी में, बेरोज़गार हो जाने के डर

हमारे छरहरे डर
अब भीमकाय हो चले हैं
हमारे डर करने लगे है
दबाव का विस्फ़ोट

हमे ज़रूरत है, एक मसीहा की
बदल डाले जो दुनिया
बना दे जन्नत ऊगा के खुशियों की फसल
मिल जाये कोई जादुई चिराग
और पल भर में,हो जाएँ
सारे रास्ते आसान

मिट जाएँ हमारे  डर

हम नही करते कोशिशें
बदलने की खुद को
और स्वयं को छलकर
डरते रहते हैं


© आरती तिवारी

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प्रतिक्रियाएँ

[09/09 10:15] Sandhya: *डर*कविता की हर पंक्ति एक अलग विस्तार लिए है खुद को नहीं बदल पाने से उपजी यथास्तिथि को बता रही हैं कवयित्री
[09/09 10:19] Sandhya: *कई बार पढी गयी किताब*में बहुत खूबसूरती से संप्रेषित किया है अपनी बात को ।
[09/09 10:21] Sandhya: *घड़ी*कविता में समय को भी लिखते हुए पिता को भी शब्द दे दिए खूब ।
[09/09 10:21] Sudhir Deshpande Ji: आरती तिवारी की कविताएं अपने आसपास पैनी नजर रखती है। वे भीतर भी उतनी ही शिद्दत से झांकती है। पाठक उनकी कविताओं मे बहने लगता है और उन्हें अपना मान लेता है। संवेदना से भरपूर कविताएं और कवि आरती तिवारी अभिनंदन।
[09/09 10:30] Sandhya: *स्त्री से पुरुष* कविता में
पितृ सत्ता को यथावत उकेरने में सफल रही कवयित्री ,लेकिन पितृसत्ता का आदिम भय स्त्री की शक्ति है जिसे बनाये रखकर ही पितृसत्ता कायम रखी जाती रही है इसके प्रति एक व्यामोह ही दृष्टित होता है इसका पुष्ट विरोध का अभाव सा लगा जो स्वयं स्त्री के हाथों में है 💥
[09/09 12:02] Aalknanda Sane: आरती की ये  कविताएं  पढ़ी हुई हैं , लेकिन आज फिर ख़ासा प्रभाव छोड़ रही हैं. चाहे वह ''हमारे डर'' हो या ''कई बार पढ़ी गई किताब'' हो. ''घडी'' मुझे हमारे समय की याद दिलाती है, जब वह न सिर्फ समय देखने के काम आती थी, बल्कि अनुशासन में भी बांधकर रखती थी. ''स्त्री से पुरुष'' स्त्री विमर्श की एक अनोखी कविता है. वह पुरूष के लिए लगभग चेतावनी की तरह है.अनेक चीजों को संयत शब्दों में स्पष्ट करती ऐसी कविता लिखने के लिए हिम्मत की जरूरत होती है. आरती , एक बार फिर बधाई.
[09/09 12:13] ‪+91 98939 44294‬: आरती ने अपनी इन कविताओं में स्त्री और जीवन से जुड़े बहुत संवेदनशील मुद्दों पर अपनी कलम चलाई है।उनकी अनुभूतियों को बहुत खूबसूरती से यहां स्थान मिलता है जिन पर बहुत से कोणों से विमर्श सम्भव होता है।यही इन कविताओं की ताकत भी है। आरती बहुत मेहनती रचनाकार हैं,निश्चित ही इन कविताओं के शिल्प और संपादन पर वे और काम अभी करेंगीं,उन्हें यादगार बनाने में सफल भी होंगीं।बधाई और शुभकामनाएं।💐💐
[09/09 12:30] Dinesh Mishra Ji: आरती जी
सारी कवितायेँ बहुत अच्छी हैं
और आपकी पैनी नज़र और नज़रिये को उद्घाटित करती हैं, छोटी छोटी चीज़ों को इतनी संवेदनशीलता के साथ महसूस कर उपजी ये कवितायेँ अपने कथ्य को लेकर बहुत निश्चल और निष्पाप लगीं, बधाइयाँ।
[09/09 12:59] Meena Sharma Sakiba: आरती जी की कविताएँ, उनके अन्तर की सिहरन को कविताओं के रूप में प्रस्तुत करती हैँ.कई बार पढी गई किताब, घड़ी,जैसेस्मृति के पृष्ठ पलटकर डूबी हों उनमें,सुन्दर शब्द...भावों के सिरे पकड़कर, और जी ली एक उम्र कविता के साथ...स्त्री से पुरुष कविता का एक-एक शब्द वाक्य का हाथ पकड़ कर एक लम्बी कविता कह रहा है.उत्कृष्ट रचना है यह !  दुरूहता से दूर सहज अभिव्यक्ति जीवन मूल्य ों केप्ति संवेदना से भरी हुई कविताएँ.
[09/09 13:02] Meena Sharma Sakiba: बध्ई आरती जी ,फिर फिर चिन्तन के लिये आवाज देती कविताओं की सुन्दर प्रस्तुति के लिए ब्रज जी का आभार, बधाई आरती जी श्रेष्ठ रचनाओं  से परिचय कराने के लिये !
[09/09 13:04] Chandrashekhar Ji: घड़ी के माध्यम से पिता पर बहुत ही प्रभावी और स्पर्शी आख्यान...
वर्तमान समय में पसरी हुयी विसंगतियों का सामना करने का उपाय "हमारे डर " में है।
स्त्री से पुरुष निश्चिति ही साहसिक प्रयास है लेखन के दृष्टिकोण से।
भरपूर मेहनत के उपरांत पटल पर रखी गयी कविताओं के लिए आरती जी को बधाई।
[09/09 13:14] Saksena Madhu: आरती की कविताएँ ..उनके काव्यकर्म को सार्थक कर रही हैं ।भाषा विम्ब कसावट सब है ।कहीं कोई झोल नहीं ।लगता है खुद ही खुद की समीक्षक है ।

कई बार पढ़ी गई किताब में एक बात और लिखना था कुछ ख़ास पढ़कर कितनी रातों को सो नहीं पाई थी ।मेरे साथ हुआ यही ....स्पार्टकस पढ़ कर हफ्ता भर  ठीक से सो नहीं पाई थी ।आप बीती सी लगी कविता ।

 घड़ी पर बहुत कविताएँ लिखी गई है फिर भी आरती कविता सबसे अलग और ताजगी लिए हुए है । जीवन की सीख देती ये कविता...समय का महत्व बताती हैं ।

स्त्री से पुरुष कविता ने विस्तार जयदा ले लिया पर उबाऊ होने से बची रही ।यही इसकी सबसे बड़ी सफलता है ।
बात कुंती से शुरू होकर पुरे समाज पर चली गई ...

अच्छी कविताओं के लिए बधाई आरती ।
आभार एडमिन जी ।
[09/09 13:42] Bhavna Sinha Sakiba: पहले भी पढ़ी हूँ  और आज फिर से पढते हुए मुझे "घड़ी "कविता  सबसे अच्छी लगी ।  सचमुच चीजों से हमारी संवेदनाएं  जुड़ी होती है। "डर" कविता  भी  बहुत प्रभावित करती है--
स्वयं को छलकर डरते रहते हैं।
"स्त्री से पुरुष "कविता का  विषय हालाँकि पुराना लेकिन कवयित्री ने इसे जिस तरह निभाया है वह तारीफ के कबिल है। बहुत ही नपे तुले शब्दों में  कही गई संतुलित कविताएँ, ,,,,,,,
बधाई आरती जी।
[09/09 13:48] Rajendr Shivastav Ji: आरती जी की अच्छी कविताएँ ।
"हमारे डर " अपने मनोविज्ञान को उकेरती कविता ।
....हम नहीं करते कोशिशें बदलने की खुद को....।
कईबार पढ़ी गई किताब अंतर्यात्रा जैसी कविता ,गुजर गई जो एक उम्र याद दिलाती हुई।
घङी- वक्त का पर्याय,भूत वर्तमान भविष्य के अच्छे प्रतीक  ।बहुत विश्वास से लिखी गई कविता ,"जो भी  है बस यही एक पल है..."
स्त्री से पुरुष -स्त्रीविमर्श की प्रभावी कविता ,ऐसे ही भावार्थ  लिये एक कविता इसी पटल पर पहिले भी पढ़ने का अवसर मिला है ।नाम भूल रहा हूँ।
सभी  कविताएँ भाषाई दुरूहता से परे हटकर सरलत व सहज अभिव्यक्ति के साथ पाठक को प्रभावित करती लगी।
बहुत बधाई आरती जी ।
[09/09 13:59] Ghanshym Das Ji Sakiba: आरती जी सभी कवितायेँ बहुत ही गहन अर्थ समाये हुये है । हमारे डर  कविता के माध्यम से हमारी उस मानसिकता की और इंगित किया है जिसके कारण सदियों से हम अपनी मुसीबतो / अत्याचारों से संघर्ष करने के स्थान पर हमेशा किसी तारणहार का इंतजार करते उनको सहते रहते हैं , घड़ी कविता अपने पिता की अच्छाईयों को बहुत खूबसूरती से बयां करती है । स्त्री से पुरुष तो बहुत ही अद्भुत ही रचना है जिसमे पुरुष का अहं नारी पर तरह तरह के बंधन आरोपित करता है । कितनी बड़ी बात कहती हैं ये पंक्तियाँ "शुचितावादियो सुनो ........और तुम्हारे बनाये नियम भी ?" अच्छी रचनाओं के लिये बधाई
[09/09 14:02] Dipti Kushwaha: आरती समय और परिस्थतियों से सार्थक संवाद करती हैं और काव्यगत अनुकूलताओं को और प्रिय बनाती हैं ।
स्त्री से पुरुष के बारे में मधु जी ने जो कहा है, उस पर अंगुलि धरती हूँ ।
मुझे लगता है, उम्दा प्रतीकों के माध्यम से आगे बढ़ती प्रभावी कविता 'घड़ी' की अंतिम पंक्ति कुछ और बात...पंच सी पंक्ति माँगती है।
प्यारी सखी है, आरती मेरी ! कोशिश की है तटस्थ पाठक की दृष्टि से उसकी कविताएँ देखूँ ।

बहुत बधाई आरती, बहुत अच्छा कर रही हो !
[09/09 14:03] Pravesh soni: आरती की कवितायेँ  एक लम्बे इन्तजार के बाद पटल पर आई है ,इसके लिए एडमिन जी से थोड़ी शिकायत है ।
स्त्री विषयक कवितायेँ लिखने में आरती की कलम को प्रणाम करती हूँ ।बेजोड़ विषय लेकर कवित्व रचती है ।डर का भीमकाय हो जाना ,और खुद को न बदल कर मसीहा की दरकार रखना ... इन्सान की आश्रित होने की प्रवर्ति को दर्शाता है।

किताब के माध्यम से बहुत ही अच्छी कविता लिखी है ।इस कविता में विचारों को खूब संजोया है ,संवेदना भी पुस्तक के चरित्र के साथ साथ बहती गई ,मन को उद्वेलित भी किया ।इस कविता  में स्त्री विषयक का छौंक   ने पाठक को लज्ज़त दी है ।

घड़ी अपने आपमें अनूठी कविता लगी ।समय के साथ साथ जीवन का संतुलन बनाती हुई अच्छी कविता ।
स्त्री से पुरुष में पितृसत्ता को ललकारती एक आदिम सत्य से रूबरू करवाती शानदार कविता लिखी गई
एक बार नहीं तुम्हे बार बार बधाई आरती ।
तुम्हारे कवि मन  से स्नेह है ।
💐💐💐💐
[09/09 14:17] Komal Somrwaal: आरती जी की रचनाएँ प्रथम बार पढ़ी। इन्हें दूसरी बार पढने से स्वयं को नहीं रोक पायी। उत्कृष्ट लेखन में बेहतरीन भावों से लबरेज कवितायें। हर पंक्ति एक गूढ़ सन्देश लिए हुए है।
'डर'कविता वर्तमान समय में सभी मनुष्यों के मन में पल रही किंचित असुरक्षा को दर्शाती है। इस डर के साथ आज लगभग हर व्यक्ति न चाहते हुए भी जीने को विवश है क्योंकि आस पास का वातावरण ऐसे सैंकड़ों डर उपजा देता है।
'कई बार पढ़ी गयी किताब' हर पाठक को उसकी सबसे पसंदीदा किताब की याद दिला ही देती है। पाठक कविता पढ़ते समय खुद को इससे जोड़ने से नहीं रोक पाता और इसे खुद के द्वारा सबसे अधिक पढ़ी गयी किताब से तुलना कर ही बैठता है।
"घड़ी" कविता में वर्तमान,भूत और भविष्य का सामंजस्य घड़ी के कांटों द्वारा दिखाया रचनाकार ने। तर्कसंगतता का सुंदर उपयोग।
'स्त्री से पुरुष' कविता पौरुष मानसकिता पर कठोर प्रहार करने में सफल।
सभी कवितायें शानदार लगी।👏🏼👏🏼
[09/09 15:59] Shaahnaaz: बहुत सुंदर संवेदनशील और प्रभावशाली कविताएँ जो अपने कथ्य में बहुत महत्वपूर्ण हैं । बढ़िया कविताओं के लिए बधाई आरती जी को 💐
[09/09 17:48] HarGovind Maithil Ji Sakiba: सभी कवितायें बहुत ही संवेदनशील और संप्रेषणीय है ।जो पाठक के मन तक पैठ बनाने में सफल होती है ।सुन्दर रचनाओं के लिए आरती जी को बधाई और एडमिन जी का आभार 🙏
[09/09 18:14] Braj Ji: *डर* कविता अदभुत काव्य विधान लिए है. किताब में भी नया कहन है और यह एक आयामी नहीं है. पिता की घड़ी के लिए कविता कहना कोई आरती से सीख सकता है, आखरी कविता पर तो बोलने को हजार बातें हैं. वाह वाह वाह. |
[09/09 18:32] Arti Tivari: साहित्य की बात पर मेरी कविताओं को स्थान देने का आभार ब्रज जी,.ये एक साहित्यिक समूह ही नही वरन एक ऐसा संयुक्त परिवार है,.जहाँ सब सहज ,सुखी और खुशहाल लोग रहते हैं,.मित्रों ने मेरी कविताओं पर लिखा मैं शुक्रगुज़ार हूँ,.समय निकाल कर कवितायेँ पढ़ना और उन पर लिखना एक अतिरिक्त बौद्धिक श्रम मांगता है,.फिर भी मित्रों के इसी श्रम से समूह में जीवन्तता बनी रहती है। जिन्होंने कवितायेँ पढ़ीं पर लिख नही सके वे अधिक व्यस्त होंगे,.उनका भी आभार,.जिन्होंने नही पढ़ीं,.वे किसी अधिक ज़रूरी काम में व्यस्त होंगे ,कोई बात नही😊 जब कभी मुमकिन हो पढ़ें🙏🙏 साहित्य की बात समूह के सभी एडमिनो का आभार🌹🍀
[09/09 18:37] Aanand Krishn: हमारे छरहरे डर
अब भीमकाय हो चले हैं ।

समकालीन आतंक की सरलतम शब्दों में अभिव्यक्ति ।
[09/09 19:01] Padma Ji: आज पटल पर आरती जी कवितायेँ नवीन उद्भावनाएँ लिए सहज सरल शैली में उपस्थित हैं।

  कई बार पढ़ी गयी किताब

में किताब का मानवीकरण कर सुन्दर अभिव्यक्ति की है।


स्त्री से पुरुष कई प्रश्नों को उपस्थित करती है।
 पर शीर्षक सही नही लगा।
कवयित्री का अपना निर्णय है।

कवितायेँ प्रभावपूर्ण और प्रवाहपूर्ण हैं।

बधाई आरती जी
💐
धन्यवाद एडमिन जी
🌹
[09/09 19:03] Sanjiv. sahity Ki Baat: आरती जी की कवितायें पढी । बढिया हैं। स्त्री से पुरुष लिखने के लिए बधाई। यह कविता अपने अंतर्पाठ के दौरान कई रिक्त जगह छोडती है। इन रिक्तियों को पकडने के लिए स्त्री विमर्श के कई अन्य आयामों पर बहस करने की आवश्यकता है। स्त्री की गरिमा सबसे अधिक यौनिकता के संबंध में प्रश्नांकित की जाती है न कि मातृत्व के संबंध में। पितृ सत्ता ने मातृत्व को यौनिकता से अलग रखा है।
[09/09 19:35] ‪+91 74703 34648‬: Bahut shaandaar kavitayen hain. Stree se  purush kavita to master peace hai.pitrrasatta pr  sawal khade krti yah kavita darasl pitrrasatta ki seema  ko bhi batati.yah kavita yah batati ki nafrat ka jabab nafrat ni..lekin  ek soft chetavni hai pitrrasatta ko.yah artistic visheshta ise  narivaad ke prachlit loud kavitaon se  alag kr  k poori  shrishti khaskr prem wa srijan ke paksh me sochne wali kavita banati hai.kavita yah ishara karti ki prem wa daihik samarpan stree  ki kamjori nahi...WO mamtva samjhti hai ...
[09/09 19:36] ‪+91 74703 34648‬: Yah kavita us social construction ko chinhit krti Jo janm ke baad hi shuru ho jata hai.basicly garbh se  hi
[09/09 19:37] ‪+91 74703 34648‬: Sirf  stree hi nahi banayi jati purush bhi banaya jata hai.social valueloadings  ke dwara
[09/09 19:40] ‪+91 74703 34648‬: Dar kavita par kya kahu.raam manohar lohia ne  kaha tha  ki agar apko lagta hai ki kahi kuch  galat hai to aap jaha  khade hain  pahla kadam  wahi se  uthaiye.kisi kalpit kranti ki kalpana me hath pr  haath dhare  na baithe rahiye.ya ki Gandhi ne  kha tha  ki koi kisi ko swaraj lakar  ni dega sbko Apna swaraj khud praapt krna hoga.ya appa deep bhav Buddha ka
[09/09 19:40] ‪+91 74703 34648‬: In sbka poetic transformation hai Jo bahut sundar hai
[09/09 20:31] Anil Analhatu: 'स्त्री से पुरुष'  अद्भुत रूप से स्पष्टवादी और  पितृसत्ता को खुली चुनौती देती हुई एक बोल्ड कविता है जो गर्हित पितृसत्ता के छद्म और हिपोक्रिसी को तार तार कर देता है। कवयित्री यह बिल्कुल सही प्रश्न उठाती है कि जिस देह रूपी मंदिर की अन्तर्यात्रा करके वाह्य जगत में तुम आये हो, उसी  देह के प्रवेश को किन्हीं विशिष्ट मंदिरों के गर्भ गृहों में तुमने निषिद्ध कर दिया है? क्या यह पुरुषों का  पाखण्ड नहीं है?  नासिक के त्र्यम्बकेश्वर मंदिर के गर्भ गृह में अभी हाल हाल तक स्त्रियों का प्रवेश निषिद्ध था , क्या यह ढोंग और पाखण्ड नहीं है कि जिस गर्भ गृह में नौ महीने रहकर पुरुष बाहर आता है, जिस गर्भ गृह में पुरुष अपने देवताओं की स्थापना करता है ( यह भी जानने की जरूरत है कि देवताओं की प्रतिमा मंदिर के गर्भ गृह में ही क्यों होती है ?क्या इसका साम्य स्त्री की देह नहीं है , इसीलिए कवयित्री ने स्त्री देह को मन्दिर कहा है और उसका गर्भ गृह उसकी कोख है जहां वह एक नया सृजन करती है , शायद इसी साम्य पर पुरातन काल से देव प्रतिमाएं मंदिर के गर्भ गृहों में रखी जाती हैं।)उसी गर्भ गृह को स्त्रियों के लिए निषिद्ध कर देता है क्योंकि उठाके देवगण अपवित्र हो जाएंगे।कवयित्री इसका भी जवाब देती है कि 'जिसके लिए अस्पृश्य घोषित किया तुमने स्त्री को ,उसी संसर्ग,उसी रज और उसी रक्त से निर्मित गर्भ गृह में नौ महीने पड़े रहे ' वह कबीर की भांति पितृसत्ता के छद्म को ललकारते हुए कहती है कि जिस मार्ग से तुम बाहर आए, दुनिया मव कदम रखा ,तुम्हें एक नया जीवन मिला ,वह मार्ग अपवित्र हो गया।
कवयित्री चेतावनी देते हुए कहती है कि हे पुरुषों !जिस दिन स्त्री के देह रूपी मंदिर में तुम्हारा प्रवेश वर्जित हो जाएगा ,रह पाएगी क्या यह दुनिया? और तुम्हारे बनाए नियम भी ?
साधु साधु आरती जी , इस जबरदस्त साहस और दो टूक कहने की हिम्मत पर। और सबसे बड़ी बात की कविता के कहन और कथन को पवित्र के शिल्प में निभा ले जाना। यह संतुलन साधना बड़ा कठिन होता है जिसका बड़ा सार्थक निर्वहन आपने किया है। बधाई और शुभकामनाएं।
[09/09 20:40] Dr Mohan Nagar Sakiba: आरती जी की कविताओं पर बात करने का मतलब है कि तारीफ तारीफ और केवल तारीफ .. इन कविताओं में तो कम अज कम । नये शब्द हैं नहीं इसलिए सभी गुणीजनों के वक्तव्यों से पूर्ण सहमति  । स्त्री से पुरुष कविता में सबसे खास बात मुझे ये लगी कि इस तरह की कविताएँ अमूनन आग उगलते शब्दों की दरकार रखती हैं .. बहुत बार अतिरेक में तक चली जाती हैं ..  आग यहाँ भी है .. पर अद्भुत कविताई के शब्दों में .. जहीन भाषा में .. यूं कि जैसे अंगारे हैं .. और राख के साथ .. ऐसे अंगरे मगर देर तक संरक्षित भी रहते हैं  ! बहुत सुकून मिला आज इस पाठक को .. व्यक्तिगत आभार लेखिका को इस दौर में भी ऐसा कुछ लिखने को जो मन हहरा दे 👏
[09/09 20:51] Dr Mohan Nagar Sakiba: मैं सबसे बेहतरीन कविता उसे मानता हूँ जो सब कुछ न लिखे .. कुछ पाठकों के लिए भी छोड़ दे जिसे पाठक खुद सोचें और कविता से जुड़ जाए .. अनिल जी का वक्तव्य अद्भुत .. इस कविता पर आज अनिल जी सहित लगभग सभी पाठक जुड़े .. लिखा जा सकता है अब भी ऐसा कुछ इस तरह की रचनाओं में .. पता नहीं क्यों इस दौर में लोग इस तरह के विषय को गलीचपन में ले जाते हैं  👏
[09/09 21:03] Naresh Agrawal Sakiba: डर अच्छी कविता बनते बनते अंत में बिगड़ गई। जैसे नदी के तेज प्रवाह को बीच में बांध दिया गया हो। आरती जी ने अगर अंतिम 10 12 पंक्तियों में और भी मेहनत की होती  तो यह कविता और अधिक सशक्त हो पाती। कविता  की अंतिम पंक्तियां एक सामान्य तरह का उपदेश देती हुई प्रतीत होती है ।

इनकी दूसरी कविता कई बार पढ़ी गई किताब बिल्कुल नए ढंग की कल्पना है जिसे महसूस करना और कागज पर व्यक्त करना इतना आसान नहीं है, कविता को छोटा करके और अधिक कसाव पैदा किया जा सकता था, जिससे यह और अधिक भाव पूर्ण होती । कविता की अंतिम 6 पंक्तियों में तो अद्भुत सौंदर्य है साथ ही इन से बने अनेक बिंब आपको स्वप्नलोक की सैर करा देते हैं, जैसे आप किताब और आरती जी लेखिका।

घड़ी एक सामान्य कविता है और इस विषय पर अनगिनत बार लिखा जा चुका है, इसलिए यह कोई घिसा-पिटा विषय ही लगता है।

 उनकी अंतिम कविता स्त्री से पुरुष बहुत अच्छी कविता बनते बनते अंत में भटक जाती है। यह अपने बाणों से लक्ष्य भेद तो करती है लेकिन सिर के बजाए पैर में । इस कविता में भी उन उनकी प्रखर कल्पना शक्ति मुखरित होती है और सुंदर सुंदर बिंबों को रच पाने की उनकी कला पर आश्चर्य भी होता है।

 आरती जी निसंदेह  ही एक सशक्त कवित्री हैं जिनका लेखन  दिन पर दिन जरूर  निखरेगा। आज उनकी कविताओं को पढ़कर जो सुख की अनुभूति हुई उसके लिए उन्हें बहुत-बहुत धन्यवाद।

[09/09 21:49] Dr Dipti Johri Sakiba: आरती जी की कवितायेँ खूबसूरत हैं और सुंदरता से काव्य को निरूपित करती है।
   तीनो कविताओं पर काफी कुछ कहा गया ,इनमे से तीसरी कविता को इसके निहितार्थों के सन्दर्भ में व्याख्यायित करना मुझे आवश्यक लगा क्योंकि एक स्त्री कैसे स्वतः पित्रसत्ता की वाहक बन जाती है इसको गौर से अंडरलाइन किये जाने की जरुरत है ।


जैसा कि संजीव जी जिन रिक्तियों की बात कर रहे है वही से ये कविता एक तरह से पित्रसत्ता के मातृत्व को glorify करने की प्रवृति को पोषित करके , स्त्री को एक मातृत्व धारण करने वाली देह में रिड्यूस कर देने की वकालत करती प्रतीत होने लगती है इन अर्थों में यह पित्रसत्ता के support में जाती है जहाँ स्त्री की sexuality को मातृत्व के माध्यम से mitigate करने का पित्रसत्ता पूरा प्रयास करती है ।।                     
         स्त्री का सम्मान पुरुषों को इसलिए करना चाहिए क्योंकि वह उन्हें जन्म देती है न की वह एक स्वतंत्र सत्ता है ऐसे में उन स्त्रियों को क्या पूजनीय नही माना जायेगा जो मातृत्व नही धारण करती या पुत्रियों को जन्म देती है । यहाँ पुरुषो को स्त्री की मातृत्व की वास्तविकता द्वारा उनकी सीमाओं का ज्ञान कराया जा रहा है न की एक इंसान के रूप में सहअस्तित्व के लिए समान अधिकारों की मांग की जा रही है । 

    ये कुछ बिंदु है जो इस कविता के अन्तर्पाठ में पित्रसत्ता के पाले में जाते दिखाये देते है जिससे ये पता चलता है कि पित्रसत्ता की कितनी गहरी conditioning है कि स्त्री कब पित्रसत्ता की वाहक बन जाती है उसे पता ही नहीं चलता । और मातृत्व तो हमेशा से ही स्त्री यौनिकता को नष्ट कर देने का पुरुषों का  हथियार रहा है ।

[09/09 21:52] ‪+91 74703 34648‬: Naarivad ki ek dhaara maatratva ko kamjori ni power manti.radical feminism se baat kafi aage  badh chuki hai.maatratva ki shakti ko rekhankit karna pitrrasatta ke paale me Jana nahi varan apne vaishistya ko rekhankit karna hai
[09/09 22:01] Dr Mohan Nagar Sakiba: मैं आज बहुत से अद्भुत वक्तव्यों की थाह में जाने के प्रयास में हूं जो कविता के नयी द्रष्टि से पाठ का आग्रह कर रहे हैं .. किया .. फिर भी अन्यथा न लें .. सहमत नहीं  । शायद ये की इसपर वे तस्लीमा से लेकर शुभम श्री जैसी भाषा चाहते थे  ( अन्यथा न लें  ) या फिर ये की .. वे रचना से इतना जुड़े की उन्हें लगा कि ये .. वे लिखते तो इससे बेहतर लिखते  ( ये भी एक जुड़ाव ही है हकीकतन जिसका मैंने जिक्र किया था )
[09/09 22:03] Dr Dipti Johri Sakiba: Now feminism has travelled long since Germaine grears " respect the difference" and ecofeminist' s views of femininity supremacy over masculinity to  structuralist and deconstructivists
[09/09 22:04] ‪+91 74703 34648‬: Ab yah apni soch ki aap kisi dhaara ko maante
[09/09 22:04] ‪+91 74703 34648‬: Gaarda lernor ko maanenge.ki firestone ko
[09/09 22:05] ‪+91 74703 34648‬: Radical or liberal.so kavita me liberal aaya hai.haan WO kahin bhi pitrrasatta ke paale me nahi jaati
[09/09 22:06] Sanjiv. sahity Ki Baat: दीप्ती जी ने मेरी रिक्तयों को बखूबी स्पष्ट किया है। कविता की भव्यता उसके पितृसत्ता की धारा मे "पीयूष" स्रोत सी बह जाने में ही प्रतीत हो रही है। पितृसत्ता के बरक्स विरोध या विद्रोह के स्वर यहां नहीं है।
[09/09 22:08] ‪+91 74703 34648‬: Warning bhi pratirodh hai.hamesa loud hi ho pratirodh yah jruri ni.khaskr kavita me
[09/09 22:10] Anil Analhatu: मातृत्व से इतर स्त्री यौनिकता की स्वच्छंदता स्त्रियों को फिर से पुरुषों की सत्ता यानी पितृ सत्ता को ही पोषित करती है।
[09/09 22:12] Rajendra Gupta Ji Babuji: स्त्री से पुरुष। अद्भुत है। एक यथार्थ, जो इस पूरे सामाजिक ढांचे पर एक ज़रूरी प्रश्न खड़ा करता है। बहुत सीधा और सटीक प्रश्न। आरती जी को सलाम।आपके विचारों, आपकी साफगोई, आपकी कविता को सलाम।🌻🙏🏽🌻
[09/09 22:16] Anil Analhatu: पुरुषों द्वारा या पितृसत्ता द्वारा मन्दिरों के गर्भ गृह में स्त्रियों का प्रवेश निषेध ही इसलिए किया गया था कि उनको उनके कमतर होने का एहसास कराया जा सके , उन्हें यह बताया जा सके कि वे पुरुषों से एक पायदान नीचे हैं , कुछ यही खेल दलितों और अंत्यजों के साथ भी इसी कारण किया गया। यहां कवयित्री ने पितृसत्ता की इसी मानसिकता को अपने धारदार तर्कों से खुली चेतावनी दी है।
[09/09 22:17] Dr Mohan Nagar Sakiba: क्योंकि आप एक बहुत बहुत बेहतरीन कविता लिखेंगे शायद .. जो ये कविता नहीं ककह पाई और आपने नोट किया .. या फिर जब प्रयास करेंगे आप .. तब समझें की .. कितना साधना पड़ा होगा इस कविता को लेखिका को 👏
[09/09 22:21] Dr Mohan Nagar Sakiba: अनिल जी .. इस कविता से मैं कुछ कविताएँ निकलते देख रहा हूँ .. क्योंकि ये महज आगाज है .. काफी कुछ छूटा है जो किसी की कलम से जरुर निकल सकता है .. मैं बस जता रहा हूँ .. मैं खुद भी तैयार कर रहा हूँ शायद खुद को
[09/09 22:22] Sharad Kokas Ji: आरती की यह कविताएं पहले भी पढी हैं । यहअच्छी कविताए हैं । किताब पर लिखी कविता अपने आप में एक अलग तरह की कविता है । यह ऐसे विषय हैं जिन पर बहुत कुछ लिखा जा सकता है फिर भी आरती ने अपनी क्षमता और अपने अनुभव के आधार पर इन्हें एक संपूर्ण कविता का रुप दिया है ।
डर कविता मनुष्य के मनोविज्ञान की कविता है। मनुष्य धीरे-धीरे अपने विकास में सुविधा भोगी होता जा रहा है और यह सुविधाएं उसके विचार कई तरह के फ़ोबिया पैदा कर रही हैं । कुछ डर वास्तविक होते हैं कुछ अवास्तविक लेकिन मनुष्य का अवास्तविक भय को भी इतना बड़ा लेता है कि वह असुरक्षा की स्थिति में आ जाता है ।
डर मूलतः एक असुरक्षा का भाव है और जैसे ही सुरक्षा का चक्र टूटता है मनुष्य भय ग्रस्त  हो जाता है ।आरती ने अंतिम बहुत अच्छी कही  है कि हम भय से मुक्ति पाने के लिए किसी मसीहा किसी अवतार की बाट जोहते  हैं लेकिन वास्तव में हमें अपने आप को बदलने की जरूरत है अपने आप को बदलना दरअसल हमारे अपने अवचेतन को समझना है । चेतन से असुरक्षा के भाव को दूर करना है यह काम बहुत कठिन है लेकिन कविता इसी बात का आव्हान  करती है
[09/09 22:30] Dr Dipti Johri Sakiba: Deconstructionist opines that to understand a women' subordination and patriarchal conditioning              " language plays the most imp role " and in order to situate a women' position in society  all prose and poetry should be re understood and re analyzed  in terms of language .

  यहाँ पर इस कविता की भाषा को समझना आवश्यक है की वह अपनी अन्तर्निहित अर्थों में पित्रसत्ता को पोषित ही करती है और सरसरी तौर पर देखने पर जबकि वह पित्रसत्ता के विरोध में दिखती है ।

यही भाषा का सूक्ष्म है जो पितृसत्तात्मक गौरव गाथा का परचम लहराता है और मातृत्व को एक मूल्य की तरह स्थापित करता है एवं स्त्री की यौनिकता का निषेध करता है  चूँकि स्त्री पुरुष की जन्मदात्री है इसलिए वह पूजनीय और गौरवशाली है यह जो अनिवार्यता का तर्क है जो मत्तरत्व के साथ स्त्रीत्व की सार्थकता को जोड़ता है,इस तर्क का निषेध पुरजोर तरीके से होना चाहिए ।
[09/09 22:34] ‪+91 74703 34648‬: Patriarchal conditioning to thik  par yah Jo antim lines hain  WO kaha pitrrasatta ko poshit krti
[09/09 22:35] ‪+91 74703 34648‬: Kavita ki bhasha kahi aisi nahi hai.haan yah jrur krti ki stree jise prem samjhti baad me wahi uski gulaami ka karan  banta.isko rekhankit krti
[09/09 22:36] Dr Mohan Nagar Sakiba: दीप्ति जी यदि पुरुष ने महज उसकी ताकत ज्यादा है .. वो सबल है .. संरक्षण दे सकता है के नाम पर तमाम धर्मग्रंथ ही अपनी सत्ता को स्थापित करने रच दिए .. तो क्या एक स्त्री को ये अधिकार नहीं की वो अपनी सबसे बड़ी मात्रत्व की ईश्वर प्रदत्त नैमत को सामने रख कर ही इसका प्रतिकार करे ?
[09/09 22:37] Anil Analhatu: अगर  स्त्री यौनिकता का उत्सव ही स्त्री मुक्ति का चरम ध्येय है तो फिर बात ही खत्म। लेकिन तब भी स्त्री मुक्त नहीं होती उत्तर औपनिवेशिक पूंजीवादी बाजार व्यवस्था यही चाहती भी है कि स्त्रियों को मातृत्व बोझ से मुक्त कर पुरुषों के अबाध भोग के लिए स्वतन्त्र कराया जाए। दुर्भाग्य से कुछ फेमिनिस्ट इसे ही अपनी आज़ादी समझती हैं।
[09/09 22:39] Anil Analhatu: मोहन ही आपकी बात से सहमत।
[09/09 22:43] Anil Analhatu: स्त्रियों की जिस यौनिक आज़ादी की वे बात करते हैं ,उसकी चरम परिणति अन्ना कारेनिना और मदाम बावेरियों के रूप में कथा संसार को मिल चूका है।
[09/09 22:43] Dr Mohan Nagar Sakiba: अनिल जी और सभी मित्र माफ करें पर अनिल जी, अरुणेश जी, मुझ सहित पाठक मात्रत्व की शक्ति को ( कविता के इतर भी) बड़ा मानते हैं और वहाँ हमें इसे नकारने का आग्रह मिलता है .. आग्रह क्या  ? कठोर आग्रह .. दीप्ति जी के वक्तव्य में ... मैं कोशिश कर रहा हूँ समझने की .. पर पुरुष होकर भी नहीं समझ पा रहा
[09/09 22:46] Dr Mohan Nagar Sakiba: अनिल जी .. सभी मित्र माफ करें पर अनिल जी, अरुणेश जी, मुझ सहित पाठक मात्रत्व की शक्ति को ( कविता के इतर भी) बड़ा मानते हैं औरनकारने का आग्रह मिलता है  आग्रह क्या  ? कठोर आग्रह .. दीप्ति जी के वक्तव्य में ... मैं कोशिश कर रहा हूँ समझने की .. पर पुरुष होकर भी नहीं समझ पा रहा
[09/09 22:46] ‪+91 74703 34648‬: Aagrah is baat ka hona chahiye ki stree ki apni deh hai.us par uska niyantran ho.WO jise  chahe use apni deh de.nirnaya uska ho.
[09/09 22:47] Dr Mohan Nagar Sakiba: अनिल जी .. सभी मित्र माफ करें पर अनिल जी, अरुणेश जी, मुझ सहित पाठक मात्रत्व की शक्ति को ( कविता के इतर भी) बड़ा मानते हैं और वहाँ हमें इसे नकारने का आग्रह मिलता है .. आग्रह क्या  ? कठोर आग्रह .. दीप्ति जी के वक्तव्य में ... मैं कोशिश कर रहा हूँ समझने की .. पर पुरुष होकर भी नहीं समझ पा रहा
[09/09 22:48] Anil Analhatu: बिल्कुल सही मोहन जी। अगर पुरे विश्व की स्त्रियां अपने मातृत्व से इंकार कर दें ,की वे सिर्फ सेक्स करेंगी। माँ नहीं बनेंगी तब तो यह सृष्टि ही समाप्त हो जायेगी , दीप्ति जी क्या कहना चाह रही हैं,मुझे भी स्पष्ट नहीं हो रहा।
[09/09 23:01] Arti Tivari: अनिल जी,..पूरी टिप्पणियाँ तो पढ़ नही सकी अभी घर आई हूँ किन्तु मुझे फख्र है कि जिन मूल्यों और और अस्मिता को लेकर मैंने ये कविता लिखी थी,.आपके अंदर हूबहू वैसी ही प्रविष्ट हुई है,..अपने लेखन की इस यात्रा में आज जिस भावना ने मुझे स्पर्श किया है,.मैं इतनी द्रवित और चकित हूँ कि आपने इसे बिलकुल वैसे ही महसूस किया है,.बौद्धिकता के तमाम आडम्बरों से मुक्त होकर विभिन्न कोणों के विमर्श की किसी भी सीमा के परे जाकर,..🙏🙏
[09/09 23:05] Dr Dipti Johri Sakiba: जूलिया क्रिस्टेयवा कहती है कि विमर्श को ऐसा बनाया जाना चाहिए जो लगातार मुठभेड़ की स्थिति में रहे और भाषा के गतिरोधों को तोड़ सके।देह के विमर्श को केंद्र में लाने का अर्थ है स्त्री की दुनिया को रेखांकित करना। कारन यह है कि देह को हमेशा कमजोर,अपवित्र अनैतिक माना गया है ।पितृसत्तात्मक सारे रूपों और लिंग भेद पर आधारित शक्ति संरचनाओं को नष्ट करने के लिए ही deconstructivist दृष्टि की आवश्यकता है 

 और अंत में .....मातृत्व को glorify करने और उसको  matter ऑफ़ चॉइस कहने में ही भाषा का सूक्ष्म निहित है इसे समझने और पढ़ने में जो सार निहित है उसे स्त्री या पुरुष हो कर समझने की नही , महज एक मनुष्य हो कर भी समझा जा सकता है ।
[09/09 23:09] ‪+91 74703 34648‬: Ji to deh ko kendra me lane ka Matlab yah ki social value loading to toda  jaye.Jo gender oriented hain..jaise  stree ke lips sexuality ka symbol ho gye
[09/09 23:09] ‪+91 74703 34648‬: Purush ke ni.deh ko kendra me laana is satta sanrachna ko todna hai ..moolbhoot cheezon ka nakar nhi
[09/09 23:12] Mukta Shreewastav: आरती जी,कमाल करती हैं आप.डर कविता पढ़कर हमारा डर खत्म सा हो गया.घड़ी ने भी ताज्जुब दिया.आखिरी कविता तो है ही विचारों को उकसाने वाली .चिंता की बात यह कि ये विचार क्या धर्म के ठेकेदारों तक पहुँच पाएगा.
[09/09 23:15] Anil Analhatu: देह के विमर्श को केंद्र में लाना अंततः स्त्री को एक इंसान रहने न देकर मात्र शरीर , शरीर ही नहीं उसके यौनांगों में रिड्यूस कर देना है। जहां स्त्री बाजार के एक उत्पाद में रिड्यूस हो जाती है और उसे इसकी पूरी आज़ादी होती है कि वह अपना मूल्य तय करे ,यद्यपि वह भी बाजार ही तय करता है यानी स्त्री की यह तथाकथित विखंडनवादी आज़ादी भी बाजार के द्वारा ही तय होती है। अस्तु।
[09/09 23:15] Sandhya: मैं दीप्ति की बात से पूर्णत:सहमत हूँ और यह बात जो स्त्री होने की सार्थकता मात्र उसके मातृत्व से जुड़े होने के तर्क से पाबस्ता है का विरोध करती हूँ मातृत्व यदि एक मूल्य है तो पितृत्व क्यों नहीं ?उसका पूज्यनीय होना मात्र उसके मातृत्व से नहीं जुड़ा होता और ।और मातृत्व ही मात्र ईश्वर प्रदत्त नेमत नहीं है मोहन जी पितृत्व भी उसी स्थान पर है ।मातृत्व की गौरव गाथा गा गा कर स्त्री को बांधे रखने का पितृसत्ता का विधान है ।और उसे स्त्री यौनिकता का उत्सव जैसे शब्दों से उसे न नवाज़ें कृपया माँ बनना या न बनना ये उसका स्वतंत्र निर्णय है इसमें सिर्फ स्वतंत्रता का सवाल है ।और जिस और मोहन जी इशारा कर रहे हैं उसका मातृत्व से कोई सम्बन्ध नहीं है ये सिर्फ एकतरफा दृष्टिकोण है 💥
[09/09 23:23] Dr Mohan Nagar Sakiba: आप मुझे फिलवक्त उसी पित्रसत्ता की वाहक दिख रही हैं इस लिहाज से तो माफ करें .. क्योंकि उन तमाम धर्मग्रंथों की वाणी हकीकतन पित्रसत्ता को ही महिमा मंडित करती है .. बहुत हल्की सी रेखा है जो आप उधर से देख रही हैं स्त्री होकर .. मैं इधर से .. पुरुष के नाते
[09/09 23:23] Arti Tivari: माँ  बनना या न बनना स्त्री को पूर्ण नही करता वरन उससे पूर्ण होता है संध्या जी,.मेरी कविता में ये कहीं नही लिखा कि स्त्री माँ बनकर ही पूर्ण है,.मातृत्व सृष्टि को निर्बाध गति देता है जिसमे स्त्री की महत्वपूर्ण भूमिका है,.जिसका वो निर्वाह करती है किन्तु उसी स्त्री से जन्मा पुरुष उसे उसके रजोधर्म की वजह से अस्पृश्य घोषित करता है क्यों??
[09/09 23:23] ‪+91 74703 34648‬: Maatratva ko nahi mahimamandit kiya.Putra prapti ko mahima  mandit  kiya.stree ki dhanyata ek laal ki maai hone me hi rhi
[09/09 23:24] ‪+91 74703 34648‬: Maatratva aur  Putra prapti ka maatratva se judna do alag alag cheezen hain.
[09/09 23:30] Dr Dipti Johri Sakiba: शुक्रिया संध्या जी ,  ये जो चयन की स्वतंत्रता है  इसी में अस्तित्व की सारता निहित है । और कविता की भाषा में यह चयन की स्वतंत्रता और आत्मगौरव न दिखाई देकर , धर्म के ठेकेदारों से अपने मातृत्व की दुहाई देकर मंदिर प्रवेश का औचित्य सिद्ध करने का प्रयास है । 

   इस औचित्य- साधन में मनुष्य की गरिमा न दिखकर स्त्री की करुण कातरता दिख रही है।यही भाषाई चिह्न और संकेत समझना अनिवार्य है।

[09/09 23:30] ‪+91 74703 34648‬: Yah sandarbh apki kavita ka nahi samajik hai.samaaj me Putra ka mahima mandan kiya gya hai

Wednesday, September 7, 2016

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सच भी कितने  कड़वे होते है जिन्हें जान कर मन कसैला हो जाता है कुच सच तो नंगे होते है जिनको जान कर लज्जा ही नही घृणा से मन भर जाता है ...आखिर क्यों होता है ऐसा ।
सईद अय्यूब जी की कहानी "पुरे पुरे आधे अधूरे" एक ऐसे ही सच को बयाँ करती है ।
साहित्य की बात समूह में ,जिसके एडमिन श्री ब्रज श्रीवास्तव है  ,पर प्रस्तुत की गई ।वहाँ सदस्यों ने इस पर निष्पक्ष भाव से चर्चा की ....कुछ सवाल भी उठे जिनका निराकरण कथाकार ने किया ।सईद अय्यूब जी एक प्रतिभाशाली कवि और कथाकार है ।इनके कथ्य और लेखन के विषय अलग हटकर होते है ,शिल्प कसावट पाठक को आकर्षित करती है ।एक बार पढ़ना शुरू करते है तो पाठक  इनके लेखन के साथ ही विचरण करने लग जाता है ...अंत होने पर अपने को आश्चर्य से भरा पाता है। ऐसे   लेखक कम होते है जो सधे हुयें शिल्प से सरल भाषा में पाठकों तक अपनी बात पहुँचाने की क्षमता रखते है ,सईद अय्यूब उनमे से एक है ।

रचना प्रवेश में प्रस्तुत है  उपयुक्त कहानी साथ में पाठको की त्वरित प्रतिक्रियाएँ 



✳कहानी

पूरे-पूरे आधे अधूरे 

मैं उनकी हरकतें देखकर दरवाजे पर ही ठिठक कर रुक गया था. कमरे में कोई कश्मीरी लोक गीत गूँज रहा था जिसके बोल समझना मेरे लिए मुश्किल था पर गायिका शमीमा आज़ाद की आवाज़ मैं पहचान सकता था जो इतनी मधुर थी कि किसी कबाड़ से खरीद कर और मरम्मत करवा कर इस्तेमाल किये जा रहे टेपरिकार्डर की खर-खर के बावजूद अपने में डुबो रही थी. सामने की दीवार पर एक पेंटिंग टंगी हुई थी जिसमें सर-शब्ज पहाड़ियों में चरती हुई भेड़ों के झुण्ड, गड़रिये को पानी पिलाती हुई एक महिला और एक शिशु को अपने वक्ष से दूध पिलाती एक दूसरी महिला दिखाई दे रही थीं. फर्श पर एक पुराना, सस्ता कश्मीरी कालीन, किनारे पर करीने से समेट कर रखे गए चाय के कुछ बर्तन और उनके पीछे कुछ छोटे-मोटे गट्ठर. “उनमें ज़रूर कबाड़ भरा होगा”- मैंने सोचा और अपने में मस्त दोनों भाइयों की ओर देखने लगा. दोनों एक-दूसरे से इस तरह चिपके हुए थे कि अगर कोई अनजाना व्यक्ति देखता तो यही समझता कि एक जिस्म है, जिसके दो सर हो गए हैं. दोनों सरों के नीचे एक-एक चेहरा, कुल जमा चार जोड़ी आँखें, दो नाक, दो मुँह, दोनों ही चेहरों पर हलकी दाढ़ी, बस फ़र्क इतना कि एक दाढ़ी मेंहदी में रँगी हुई और एक काली. दोनों एक-दूसरे से लिपटे हुए, गाने की धुन पर नाचने के प्रयास में मगन थे. दोनों की बैसाखियाँ उनके दाएँ और बाएँ झूल रही थीं. परवेज़ रसूल को तो बैसाखियों की मश्क थी पर ग़ुलाम रसूल को अभी आदत नहीं पड़ी थी. वह बीच-बीच में लड़खड़ा जा रहा था. मैंने अपना कैमरा हाथ में ले लिया और अगली बार ग़ुलाम जैसे ही लड़खड़ाया कि ‘क्लिक’....
कैमरे की क्लिक और फ्लैश ने उन्हें वापस इस दुनिया में पहुँचा दिया. मुझे कैमरे से लैस देख वे इस कदर बदहवास हुए कि दोनों की बैसाखियाँ उनके कंधों से अलग हो गयीं और दोनों एक साथ धड़ाम से ज़मीन पर आ रहे. शुक्र था, कालीन कुछ मोटा था और शायद उन्हें ऐसे गिरने की आदत थी, कोई अप्रिय दृश्य पैदा नहीं हुआ. मैं हँसते हुए कमरे में दाखिल हुआ और सामने पड़ी तीन टांग की एक पुरानी कुर्सी पर बैठ गया. मैंने उन्हें उठाने की कोई कोशिश नहीं की क्योंकि गिरने के बाद दोनों हँसी से लोट-पोट हो रहे थे. उनके इस मज़ाकिया स्वभाव से मैं परिचित था. वे ऐसे ही थे, एकदम मस्त. हँसी खत्म कर वे एक-दूसरे का सहारा लेकर उठे. परवेज़ कमरे के एक किनारे स्थित छोटे से किचन की ओर बढ़ गया. मैं उसका इरादा समझ चुका था. वह मेरे लिए नून चाय बनाने जा रहा था. ग़ुलाम, कालीन के कोनों को, जो उनके नाचने की वजह से थोड़े थोड़े मुड़ गए थे, ठीक करने लगा. मैं उन दोनों को मना नहीं कर सकता था क्योंकि दोनों को ही मेरी इस तरह की कोई दखलंदाज़ी पसंद नहीं थी और वे इसे अपनी मेहमाननवाज़ी के खिलाफ़ भी मानते थे.
अजीब मज़ाक हुआ था उनके साथ. एक का कमर के नीचे का पूरा दायाँ हिस्सा बेकार था तो दूसरे का पूरा बायाँ. जबसे मैं उनसे मिला था उनकी कहानी जानने की हज़ार कोशिश कर चुका था. वे बहुत खुश अस्लूबी से पेश आते. बढ़िया नून चाय पिलाते, कभी-कभी खुद की बनाई हुई कश्मीरी गोश्त खिलाते पर जैसे ही मैं उनकी ज़िंदगी के बारे में कोई सवाल करता, वे मुझे ऐसी डरी और निश्छल निगाह से देखते कि उसके आगे के सारे प्रश्न मेरे दिमाग में ही कहीं उलझ कर रह जाते. पिछले लगभग दो सालों की अपनी मुलाक़ात में मैंने उनके दिलों में कुछ जगह बना ली थी और इसलिए आज फ़ैसला करके आया था कि बिना उनकी ज़िंदगी के बारे में जाने मैं यहाँ से नहीं जाऊँगा.
“परवेज़...” मैंने नून चाय की तैयारी कर रहे परवेज़ को बहुत आहिस्ते से आवाज़ दी.
“जी भाईजान” पता नहीं दोनों भाई मुझे भाईजान क्यों कहते थे जबकि मैं उनसे उम्र में छोटा था.
“आज मैं तुम्हारी बनाई हुई चाय नहीं पियूँगा.”
“क्यों? बंदे से क्या गुस्ताखी हो गयी? मैंने अपना यह हाथ ठीक से धो लिया है.” उसने मुस्कराते हुए अपना दायाँ हाथ दिखाया.
“मुझे इससे कोई मतलब नहीं कि तुमने हाथ धोया है या नहीं?”
“फिर?”
“बस कह दिया ना कि नहीं पीनी.” मैंने अपनी योजना पर अमल करते हुए कुछ गुस्से से कहा.
“चलो कोई बात नहीं.” उसने ग़ुलाम को आवाज़ देते हुए कहा- “ओए गुलामे, तू बना दे. मेरे हाथ की चाय न पीने की कसम खा रखी है भाईजान ने.”
उसके लहजे में इतना भोलापन और नाटकीयता थी कि मैं और ग़ुलाम हँसे बिना न रह सके.
“देखो, चाय चाहे तुम बनाओ या ग़ुलाम , मैंने फ़ैसला किया है कि मैं अब तुम दोनों के यहाँ कुछ भी नहीं खाऊं-पियूँगा क्योंकि...” मैंने जानबूझकर अपनी बात अधूरी छोड़ दी.
“क्यों?” दोनों भाइयों ने बेक वक़्त सवाल किया था.
“क्योंकि तुम दोनों मुझे अपना तो मानते नहीं हो?” मैंने पासा फेंका यद्यपि मैं डर भी रहा था कि शायद वे मेरे पासे में न आएँ. कश्मीरियों के बारे में आम राय तो यही है कि वे जितने भोले दिखते हैं उतने होते नहीं.
“ऐसा आपको क्यों लगता है भाईजान?” ग़ुलाम ने पूछा.
“क्योंकि मैं जब भी तुमसे कोई सवाल पूछता हूँ तुम दोनों चुप हो जाते हो?”
“आप यही जानना चाहते हो न कि हम दोनों की यह हालत कैसे हुई?”
“यही नहीं बल्कि तुम्हारी पूरी ज़िंदगी की दास्तान सुनना चाहता हूँ.”
“ज़िंदगी की दास्तान तो बहुत छोटी सी है भाईजान पर यह जो हमारी हालत हुई है, इसकी दास्तान बहुत बड़ी है. इतनी बड़ी और इतनी दर्दनाक कि कई ज़िंदगियाँ खतम हो जाएँगी पर न यह दास्तान मुकम्मल होगी, न वह दर्द खत्म होगा.”
परवेज़ की आवाज़ कहीं बहुत दूर से आती लग रही थी.
“आपको लगता होगा कि हम अपनी कहानी आपको नहीं बताना चाहते पर असल में हम उस दर्द से फिर से गुज़रना नहीं चाहते. हम दोनों ने फ़ैसला किया है कि हम अपनी बाक़ी ज़िंदगी हँसते-गाते ही बिताएँगे. माज़ी का कोई मातम नहीं, किसी दर्द को फिर से दुहराना नहीं, सिर्फ़ मुस्तक़बिल को किसी तरह से काट देना है.”
“परवेज़, दर्द को बाँटना और दर्द को याद करना दो अलग-अलग चीज़ें होती हैं. मैं तुम लोगों से दर्द बाँटने के लिए कह रहा हूँ, दर्द को याद करने के लिए नहीं.”
“आप नहीं भी कहते तो भी हम महसूस कर रहे हैं कि किसी न किसी दिन यह दर्द आपसे बाँटना ही पड़ेगा. तो आज ही सही. पर पहले आपको हमारी चाय पीनी पड़ेगी.” पता नहीं परवेज़ की मुस्कुराहट में क्या था? मैं अंदर तक लरज गया.


कश्मीर की खूबसूरत वादियों में बारामूला के नज़दीक एक छोटा सा, खूबसूरत सा गाँव. साधारण से लोग. अपने में मस्त. दुनिया से कटे हुए पर दीन से नहीं. अपनी खेतों और बगीचों में काम करते हैं, जंगल से लकड़ियाँ लाते हैं, छोटी सी, बे-छत की मस्जिद में नमाज़ पढ़ते हैं और जब दुआ के लिए हाथ उठाते हैं तो सीधे अल्लाह मियाँ से जुड़ जाते हैं क्योंकि मस्जिद की छत तो है नहीं.  ज़मीन से आसमान तक कोई रोक-टोक नहीं. औरतें और लड़कियाँ अपने-अपने घरों और घर के मर्दों का ख्याल रखती हैं, खेतों और बगीचों में उन्हें खाना पहुँचाती हैं, गाँव की तलहटी में जाकर वहाँ बहने वाले ताज़े पानी के नाले से पानी भर कर लाती हैं, मवेशियों को दाना-पानी देती हैं और जब ज़्यादा खुश होती हैं तो आपस में मिलकर नाचती-गाती हैं. कुल मिलाकर एक खुशहाल ज़िंदगी है पर इंसानों की खुशहाली उसके खुदा को कब मंज़ूर होने लगी? और जब खुदा को मंज़ूर नहीं तो ज़मीनों पर उसकी नुमाइंदगी कर रही सरकारों और दूसरे लोगों को कैसे मंज़ूर होगी? खुदा तो कहता है कि मैं तुम्हें मुसीबतों में इसलिए डालता हूँ कि तुम्हारा इम्तेहान ले सकूँ. और ये तो खुदा के नुमाइंदे हैं. इम्तेहान लेने का तो उनको हक़ है ही.
तो कई बातों की एक बात यह है कि इस खुशहाल गाँव में एक खुशहाल परिवार रहता था. पेशे से किसान और पैसे से गरीब इस परिवार को जी तोड़ मेहनत के बाद जो भी मिलता उसे अल्लाह का शुक्र अदा कर खाते, पहनते और खा-पहन कर मर्द बिना छत वाली मस्जिद में नमाज़ अदा करता, औरत घर के अंदर मुसल्ला बिछा कर अपने रब का शुक्र अदा करती और बच्चे घर से मस्जिद तक अपने खेल में मस्त रहते. मर्द का नाम था मुश्ताक़ मुहम्मद, औरत थी इसरा और तीनों बच्चे, सबसे बड़ी रुकैय्या, फिर जुड़वाँ ग़ुलाम रसूल और परवेज़ रसूल. जुड़वा होने के बावजूद ग़ुलाम परवेज़ से पंद्रह मिनट बड़ा था. तो बात तबकी है जबकि रुकैय्या आठ साल की थी और ग़ुलाम और परवेज़ पाँच-पाँच साल के.
सर्दियों के बाद का मौसम-ए-बहार था. बादाम के पेड़ जामुनी और किरमिजी रंग के फूलों से लद चुके थे और चारों ओर जन्नत का नज़ारा पेश कर रहे थे. घाटियों को रंग-बिरंगे फूलों ने अपने रंगों से ढक लिया था. पूरे कश्मीर में सैलानी इस तरह से फैले हुए थे जैसे वही यहाँ के मूल निवासी हों. ऐसे में एक दिन का सूरज न सिर्फ़ इस परिवार के लिए, बल्कि पूरे गाँव के लिए आफ़त की तरह नमूदार हुआ.  
जब बूटों की आवाज़ घाटी से ऊपर आकर गाँव के चारों ओर फैलने लगी, उस वक्त दूसरे गाँव वालों की तरह मुश्ताक़ अपने बगीचे में जाने की तैय्यारी कर रहा था. इसरा घर के अंदर, दो दिन बाद आने वाले अपने भाई और भाभी से मिलने की खुशी में कोई गीत गा रही थी और घर की साफ़-सफ़ाई में जुटी हुई थी. स्कूल बंद था सो तीनों बच्चे अपने-अपने खेलों में मस्त थे. बूटों से उठने वाली आवाज़ ने अचानक ही पूरे गाँव को चारों तरफ़ से घेर लिया. गाँव वालों के लिए यह कोई अप्रत्याशित घटना नहीं थी. वे इसके आदी थे. ये बूट  दुश्मनों की टोह लेने के बहाने गाहे-बगाहे गाँव में घुस ही आते थे और जब दुश्मन के नाम पर कुछ नहीं मिलता था तो गाँव के कुछ लोगों के यहाँ दावत-वावत करके चले जाते थे. कभी-कभी किसी को पकड़ कर भी ले जाते और अक्सर तो वे दो-चार दिन में लौट ही आते थे पर एक-दो बार ऐसा भी हुआ कि गया हुआ व्यक्ति कभी वापस नहीं आया. ये बूट जब भी गाँव में आते गाँव वालों की साँसे अधर में टंग जाती कि न जाने कब किसकी शामत आ जाए. पर इस बार के बूटों को देखकर गाँव वाले सिहर उठे थे. उनकी थप-थप बता रही थी कि आज कुछ अनहोनी होगी. ये बूट इस से पहले इतनी संख्या में कभी नहीं आए थे. बूटों की कारवाई शुरू हुई. एक-एक को घर से बाहर निकाल कर एक गोल घेरे में संगीनों के साए में इकठ्ठा कर दिया गया. संगीने तनी हुई थीं, लोग सिकुड़े हुए थे. एक-एक घर की पूरी तसल्ली से तलाशी ली गयी और फिर मर्दों और छोटे बच्चों को घेरे से निकाल कुछ बूटों के साथ नीचे सड़क पर और फिर वहाँ से एक ट्रक में भरकर छावनी के अंदर पहुँचा दिया गया. मर्द चिल्लाते रहे, बच्चे बिलकते रहे, औरतें दुहाई देती रहीं पर सब बे-असर. ले जाते वक्त रुकैया किसी तरह से एक बूट के हाथों से छूट कर इसरा से लिपट गयी थी. वह बूट उसको पकड़ने के लिए जब दुबारा उसकी ओर लपका तो एक ऑफिसर से लगने वाले बूट ने उसे मना कर दिया. उस ऑफिसरनुमा बूट की आँखों में रुकैय्या को देखकर कुछ अजीब सा उभर आया था और फिर...
...और फिर तीन दिन बाद जब मर्द और बच्चे भूखे-प्यासे अपने-अपने घरों को लौटे तो सब कुछ लुट चका था. घरों का सारा सामान बिखरा पड़ा था. औरतें जहाँ-तहाँ निढ़ाल पड़ी हुई थीं, चुप...बिल्कुल चुप.
 ग़ुलाम और परवेज़ ने जब मुश्ताक़ के साथ घर में प्रवेश किया तो दौड़ कर अपनी माँ से लिपट नहीं सके. वे अपनी बहन रुकैया को भी आवाज़ नहीं दे सके. वे बस चुप-चाप अपनी माँ को देखे जा रहे थे. मुश्ताक़ भी चुपचाप बस अपने घर की दीवारों को घूर रहा था. इसरा लगभग अधनंगी हालत में, एक टूटी हुई चारपाई पर लेटी हुई थी और चुपचाप खला में घूरे जा रही थी. उसके कपड़े जगह-जगह से फटे हुए थे. हाथ और पैरों पर खरोंच के निशान साफ़ दिखाई पड़ रहे थे जिनसे खून बह-बह कर काले निशान के रूप में जमा हो गया था. अचानक वह उठी और ग़ुलाम और परवेज़ को लगभग भींचते हुए ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी. और ठीक उसी वक़्त, सारे गावँ की औरतों ने, जैसे वे इसरा के रोने का इंतेज़ार कर रही हों, एक साथ अपने-अपने बच्चों, पतियों और घर के दूसरे मर्दों से लिपट कर रोना शुरू कर दिया. उनके रोने की आवाज़ ने पूरे गाँव को शोक की एक चादर से ढक दिया. बादाम के पेड़ों से सारे जामुनी और किरमजी रंगों के फूल झर गए और उदासी रंग के फूलों ने उनकी जगह ले ली. गिलहरियाँ जो पेड़ों पर बादाम की फ़सलों का इंतेज़ार करते हुए खुशी से नाच रही थीं, न जाने कहाँ छुप गयीं.
कुछ देर बाद इसरा का रोना जब सुबकियों में बदल गया तो मुश्ताक़ को रुकैया का ख्याल आया. वह पिछले तीन दिनों से सबसे ज़्यादा रुकैया के बारे में सोच रहा था. घाटियों में उगने वाले फूलों से भी कोमल, अपनी बेटी रुकैया के बारे में. गाँव के और मर्दों के साथ उसको भी अंदाज़ा हो चुका था कि ये बूट अब क्या करने वाले हैं. पर वह मजबूर था. वह मर का भी अपने गाँव नहीं पहुँच सकता था. चाहकर भी रुकैया और इसरा को उन ज़ालिमों के चंगुल से नहीं बचा सकता था. वह खुद उन ज़ालिम बूटों के सख्त पहरे में था. उसने अपने बे-छत वाले अल्लाह को याद किया और मन ही मन मन्नत भी माँगी कि उसके रुकैया और इसरा को कुछ न हो. वह वापस जाकर चाहे जैसे भी हो, मस्जिद की छत तैयार कराएगा. पर न जाने क्यों, उसको अपनी ही मन्नत पर यक़ीन नहीं हो रहा था. उसे न जाने क्यों ऐसा लगने लगा था कि उसने अल्लाह को उन बूटों के साथ ही देखा था और जब वह ऑफिसरनुमा बूट उसकी बेटी को घूर रहा था तो अल्लाह कहीं आस-पास ही मुस्कुरा रहा था.
और तीन दिनों के बाद जब बूटों ने उनको घर जाने की आज़ादी दी थी, गाँव के सब मर्दों के साथ-साथ मुश्ताक़ भी तीर की तरह अपने गाँव की ओर भागा, गरचे ग़ुलाम और परवेज़ की उँगलियाँ पकड़े होने और तीन दिन से लगभग कुछ न खा पाने की वजह से वह दौड़ नहीं सकता था. और वही क्या, सारे गाँव वालों की हालत ऐसी ही थी. फिर भी जितनी तेज़ी से हो सका, वे पहाड़ों पर चढ़े, तंग घाटियों में उतरे, पत्थरों से टकराये, झाड़ियों में उलझे और अपने गाँव की सीमा पर आकर चुप-चाप खड़े हो गए. सामने गाँव की एक दूसरे से दूर खड़े हुए मकान दिखायी दे रहे थे. बादाम के पेड़ भी दिख रहे थे. घरों के सामने फूलों की क्यारियाँ भी दिख रही थीं. मकानों से लगी हुई वे सीढियाँ भी दिख रही थीं जिनपर जब वे अपने खेतों और बगीचों से लौटते थे तो उनकी औरतें उनका इंतेज़ार करते हुए खड़ी रहती थीं. पर अब सब के सब उसी गाँव की सीमा पर खड़े थे...चुपचाप. गाँव का उजाड़पन और ख़ामोशी उन्हें डरा रही थी. वे गाँव में जाने की हिम्मत नहीं कर पा रहे थे. ऐसे में मुश्ताक़ को बे-छत वाली मस्जिद की सफ़ेद दीवार दिखाई दी और साथ ही अल्लाह का मुस्कुराता हुआ चेहरा भी याद आया. उसने तेज़ आवाज़ में न जाने किसे एक गंदी गाली दी और ग़ुलाम और परवेज़ का हाथ पकड़े तेज़ी से अपने घर की ओर दौड़ पड़ा.    
घर और इसरा की हालत और फिर इसरा के रोने ने उसे और बदहवास कर दिया था पर जब इसरा की हिचकियाँ सुबकियों में बदल गयीं तो उसे रुकैया का ख्याल फिर से आया.
“रुकैया...?” वह ठीक से बोल भी नहीं पा रहा था.
इसरा अब भी अपने दोनों बच्चों को अपने से चिमटाये हुए रोये जा रही थी. उसने बहुत मुश्किल से सामने वाले कमरे की तरफ़ इशारा किया. मुश्ताक़ तड़प कर सामने वाले कमरे की ओर बढ़ा. रुकैया ज़मीन पर पड़ी हुई थी. जिस्म पर कपड़े का एक छोटा सा टुकड़ा भी नहीं था. पूरे जिस्म पर जगह-जगह लगी हुई मिट्टी पर खून बह-बह कर जम गया था. आँखे दर्द और खौफ़ से बाहर की तरफ़ फटी पड़ी थीं. ज़मीन की पोली मिटटी कई जगह से उखड़ गयी थी. कई सालों बाद, एक दिन रोते हुए इसरा ने बताया था कि वह मरने से पहले बहुत तड़पी थी. इसरा ने जब उसको गोद में उठाने की कोशिश की थी तो वह तड़प कर गोद से बाहर चली गयी थी. उसके तड़पने से ही ज़मीन की मिट्टी अपनी जगह से उखड़-उखड़ गयी थी.
मुश्ताक़ ने कुछ नहीं किया. न रोया, न चिल्लाया. उसने एक नज़र रुकैया के बेजान जिस्म पर डाली, घर के कोने में रखा अपना बेलचा और कुदाल उठाया और बे-छत वाली मस्जिद के आँगन में पहुँच उसे खोदने लगा. गाँव के कुछ लोगों ने उसे ऐसा करते हुए देखा पर किसी ने उसे रोकने की कोशिश नहीं की. गाँव के पाँच घरों में मौत हुई थी. उसमें आठ साल की रुकैया से लेकर साठ साल की आमिना बी तक थीं और पाँचों को गाँव वालों ने उस बे-छत की मस्जिद में दफ़न कर दिया. न कोई नमाज़-ए-जनाज़ा पढ़ी गयी, न कोई फातेहा. मुश्ताक़ को लगा था कि उसने रुकैया को नहीं बल्कि मुस्कुराते हुए अल्लाह को उस बे-छत वाली मस्जिद में हमेशा-हमेशा के लिए दफ़न कर दिया है.


“अब भी रुक्का याद आती है कभी-कभी. हम दोनों को गोद में बैठा कहानियाँ सुनाती हुई पर अब उसका चेहरा याद नहीं आता.” परवेज़ की आँखों के आँसू ने पूरे कमरे को नम कर दिया था. उसने जल्दी से अपनी आँखें दूसरी तरफ़ कर ली थी और हम सबके कपों में चाय डालने लगा था.
“वह ज़रूर माँ की तरह रही होगी.” ग़ुलाम की आवाज़ किसी दूसरी दुनिया से आती लग रही थी.
मैंने अपना एक हाथ ग़ुलाम के कंधे पर रख दिया. एक शर्मिदंगी से भरा हाथ. यह कहानी सुनने के बाद भी ज़िंदा रह जाने की शर्मिंदगी से भरा हाथ. मुझमें आगे सुनने की हिम्मत नहीं थी पर यह डर भी था कि अगर आज नहीं सुन सका तो शायद फिर कभी नहीं सुन पाऊँगा. दोंनो भाइयों को यादों की इस भयानक कोठरी में धकेलने के लिए बार-बार हिम्मत भी नहीं कर सकता. पर अब बात को आगे बढ़ाने के लिए कहने की हिम्मत भी नहीं हो रही थी. लगा, ग़ुलाम ने मेरे मन की बात पढ़ ली थी. वह बोला,
“भाईजान, चाय खतम कीजिए तो हम आगे बढ़ें. अब बात निकल आयी है तो आप सुन ही लीजिए. यूँ आधा दर्द बाँट कर क्या होगा?.”
और हम कपों में बची हुई आधी चाय खतम करने लगे.


उस भयानक घटना की लोकल राजनीति में क्या प्रतिक्रिया हुई, यह दोनों भाइयों को नहीं मालूम. पाँच साल की मासूम उम्र. वे तो ठीक से समझ भी नहीं पाए थे कि आखिर हुआ क्या था? रुकैया को दफ़ना कर जब मुश्ताक़ वापस आया तो दोनों ने बेक वक़्त पूछा था,
“रुक्का कहाँ है अब्बा?”
और तब पहली बार मुश्ताक़ रोया था. दोनों को अपने अगल-बगल में समेट कर और इसरा के कंधे पर अपना सर रख कर मुश्ताक़ ‘रुक्का, मेरी रुक्का’ कहकर और फूट-फूट कर रोता रहा. यहाँ तक कि उसके रोने की ताब न लाकर सूरज ढल गया और आसमान पर सितारे उग-उग कर उसके शोक में शामिल होने लगे. पर उसको दिलासा देने वाला भी कौन था? जो थे, उन सबके लिए उस रात आसमान में बहुत तारे उगे.
और ठीक तीसरे दिन, कुछ सामानों की पोटली बना मुश्ताक़, इसरा और दोनों बच्चे उस गाँव से निकल आए थे. कई दिनों के सफ़र के बाद वे श्रीनगर पहुँचे थे. इसरा के कुछ रिश्तेदार वहाँ थे. उनकी मदद से मुश्ताक़ को एक जगह खलासी की नौकरी मिल गयी. मुश्ताक़ और इसरा जब तक जीते रहे, अपनी फूल सी नाज़ुक रुक्का को याद कर रोते रहे और दोनों बच्चों के बेहतर मुस्तक़बिल के सपने देखते रहे. पर मुश्ताक़ उसके बाद किसी मस्जिद में नहीं गया. यहाँ तक कि ईद-बकरीद के दिन भी नहीं.
दोनों बच्चे होनहार थे. बड़ा ग़ुलाम दस साल का होते न होते कालीन बनाने की कारीगरी में माहिर होने लगा था और उसकी महारत को देखकर कालीनों के एक ताजिर ने उसे अपनी फैक्ट्री में जगह दे दी थी जहाँ वह नए-नए डिजाइन बनाना सीखता भी था और खुद नए-नए डिजाईन बनाता भी था. पंद्रह का होते न होते वह इस काम में अच्छा-खासा मशहूर हो गया था और हालत यह हो गई कि बाहर से उसके काम की डिमांड होने लगी. ग़ुलाम सिर्फ़ अपने काम में ही माहिर नहीं था, बिजनेस में भी होशियार था और उसकी इसी होशियारी और कारीगरी को देखकर और इस डर से कि ग़ुलाम कहीं और न चला जाए, फैक्ट्री मालिक ने उसे अपना पार्टनर भी बना लिया था. दिन बीतते रहे, ग़ुलाम मेहनत से अपना काम करता रहा, फैक्ट्री दिन ब दिन तरक्की करती रही और मुश्ताक़ और इसरा अपने ग़म भूल कर उसकी शादी के मंसूबे बनाने लगे. दोनों को रुकैया अब बेहद याद आने लगी थी और दोनों को लगता था कि शायद बहू की शक्ल में उन्हें रुकैया वापस मिल जाए.
छोटे परवेज़ को महीन कामों से कोई दिलचस्पी नहीं थी. उसको पढ़ने का शौक़ था और एक प्रोफ़ेसर के बेटे से उसकी दोस्ती हो गई थी, जिसके ज़रिये वह अपने शौक़ को परवान चढ़ा रहा था. उसको अपने दोस्त से तालीम हासिल करने के नए-नए ज़रिये पता चल रहे थे और एक सबसे खूबसूरत ज़रिये का नाम था दिल्ली. वह दिल्ली आकर खूब पढ़ना चाहता था और पढ़-लिख कर अपने दोस्त के अब्बू की तरह एक बड़ा प्रोफ़ेसर बनना चाहता था. वह अपनी क्लास में हमेशा अव्वल आता था और उसकी कामयाबी को देखकर मुश्ताक़, इसरा और ग़ुलाम फूले नहीं समाते थे. और परवेज़ भी ग़ुलाम की कामयाबी को देखकर खुश होता रहता और मन ही मन दुआ करता कि गुलामे को खूब अच्छी दुलहन मिले जो उसे प्यार से खूब सारा खाना खिलाये. बेचारा, दिन भर खटता रहता है और सूखकर काँटा हुआ जा रहा है. ज़िंदगी ठीक-ठाक गुजरने लगी थी, दुःख कुछ कम होने लगे थे. मुश्ताक़ और इसरा अपने पुराने ग़म भूल फिर से खुश होने लगे थे और बहुत दिनों के बाद मुश्ताक़ फिर से ठहाके लगा कर हँसने लगा था.
फिर वही मौसम-ए-बहार के दिन थे. घाटियाँ फूलों से गुलरंग हो चुकी थी. बादाम के पेड़ों पर जामुनी और किरमजी रंग के फूल निकल आए थे, गिलहरियाँ बादाम की नई फ़सल का इंतेज़ार करते हुए खुशी से फुदक रही थीं कि अचानक बूटों की आवाज़ ने फिर से उनके घर को घेर लिया. पर इस बार के बूटों के रंग और आवाज़ में फ़र्क था. मुश्ताक़ अपनी नौकरी पर, ग़ुलाम अपनी फैक्ट्री और परवेज़ अपने दोस्त के प्रोफ़ेसर बाप से मिलने जाने की तैयारी में थे. इसरा दो दिन बाद अपने घर आने वाले एक मेहमान जिनकी बेटी के बारे में उसे पता चला था कि वह बला की खूबसूरत है और शादी की उम्र की है, की खुशी में घर की साफ़-सफ़ाई कर रही थी और साथ ही बहुत दिनों के बाद एक गीत गुनगुना रही थी. बूटों की आवाज़ से चारों सिहर उठे. इससे पहले कि मुश्ताक़ उन बूटों से कुछ कह पाता, इससे पहले कि ग़ुलाम बेहोश होकर गिरती हुई इसरा को संभाल पाता, इससे पहले कि परवेज़ कुछ समझ पाता, बूटों ने परवेज़ को पकड़ा और बाहर खड़ी जीप में डाल कर वहाँ से किसी जिन्न की तरह गायब हो गए.
ग़ुलाम को समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे. अपनी बेहोश होकर गिरती हुई माँ को संभाले, जीप के पीछे बदहवाश होकर भागते अपने बाप को पुकारे, परवेज़ को कौन लोग कहाँ ले गए, यह पता करे या और क्या करे? थोड़ी देर में उसे होश आया. उसने अपनी माँ को नीचे लिटाया. बाहर भीड़ इकट्ठी हो चुकी थी और उसमें से कुछ औरतें निकल कर इसरा के पास आ चुकी थीं. ग़ुलाम ने इसरा को उनके हवाले किया और बाप के पीछे तेज़ी से भागा.
इसरा तो उसी दिन दिल के दौरे में खतम हो गई. मुश्ताक़ को जैसे लकवा मार गया था. पर गुलाम ने किसी तरह से अपनी हिम्मत बचाए रखी और आखिर एक महीने की दौड़-धूप के बाद उसे पता चला कि परवेज़ पुलिस की क़ैद में है. परवेज़ के दोस्त के प्रोफ़ेसर बाप को भी पुलिस उठा ले गयी थी. उसके घर से कुछ संदिग्ध लिटरेचर मिला था और पुलिस को यक़ीन था कि उस प्रोफ़ेसर के घर से मुल्क के खिलाफ़ एक बड़ी साजिश रची जा रही थी जिसमें उस प्रोफ़ेसर के कुछ छात्र भी शामिल थे.
गुलाम अपनी सारी हिम्मत यकजा करके परवेज़ को पुलिस की गिरफ़्त से बाहर निकालने के जुगत में लगा हुआ था पर लगभग तीन महीनों तक जब वह परवेज़ से मिल भी नहीं सका तो उसकी हिम्मत टूटने लगी. वह कभी अपने गुमसुम बाप को देखता और  कभी चूड़ियों के उन टुकड़ों को जो हार्ट अटैक से गिरते वक़्त इसरा के हाथों से टूट कर बिखर गए थे और जिन्हें गुलाम ने फेंकने के बजाए, सामने एक तिपाई पर रख छोड़ा था. उन टुकड़ों को देखते-देखते उसे रुक्का की याद आने लगती और कुछ देर बाद माँ और रुक्का के चेहरे आपस में गडमड्ड होने लगते और थोड़ी देर बाद वे लंबे-लंबे बूटों में बदल जाते और तब वह बेहद डर जाता और ‘परवेज़-परवेज़’ चिल्ला कर रोने लगता और तब उसका गुमसुम बाप एक नज़र उठा कर उसकी ओर देखता और फिर आसमान की ओर मुँह उठाकर गाली जैसा कुछ बुदबुदाने लगता.
लेकिन परवेज़ को पुलिस से छुड़ाने के लिए गुलाम को ज़्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी. एक सुबह, जब उसने अपने फैक्ट्री मालिक से इस सिलसिले में बात करने जाने के लिए दरवाज़ा खोला तो एक गठरी जैसी चीज़ को अपने घर के सामने पाकर वह सन्न रह गया. शहर में होने वाली इस तरह की तमाम घटनाओं ने उसे बता दिया था कि वह गठरी नुमा चीज़ क्या हो सकती है पर फिर भी, वह मन ही मन यह बुदबुदाते हुए उस गठरी तक पहुँचा कि ‘वह न हो...वह न हो’... पर वही था. परवेज़ एक ज़िंदा लाश की तरह सामने पड़ा हुआ था. वह बेहोश था. इस क़दर बेहोश कि दर्द से कराह भी नहीं सकता था. गुलाम ने बेहोश पड़े हुए परवेज़ को अपने दामन में धीरे से उठाया जैसे वह उसकी माँ हो और परवेज़ कोई नवजात बच्चा और फिर वह जितनी तेज़ी से हो सकता था, लोकल अस्पताल की ओर दौड़ पड़ा.


“मैं कुछ और चाय बनाता हूँ.” गुलाम बहुत मुश्किल से बोला. गीली हो चुकी उसकी आँखों में कोई चीज़ तैर रही थी-बेबसी, गुस्सा या कोई और चीज़, अंदाज़ा लगाना मुश्किल  था. शायद वह आगे की उस दास्तान को दुहराना नहीं चाहता था कि कैसे उसने परवेज़ की ज़िंदगी बचायी और इसके लिए उसे क्या-क्या सहन करना पड़ा.
कमरे में एक नमी सी फ़ैल गयी थी. कोई बोलना नहीं चाहता था. मैंने सर की जुंबिश से चाय के लिए हामी भर दी.
गुलाम चाय बनाने लगा. परवेज़ इस बीच चुपचाप बैठा, खला में घूरता रहा जैसे अपनी माँ और रुक्का को वहाँ देख रहा हो. इस बीच में मुझे मुश्ताक़ की याद आयी.
‘और तुम्हारे अब्बू परवेज़...?” मैंने बहुत धीरे से पूछा.
“अब्बू...वे अब वहाँ हैं.” परवेज़ ने खला में घूरते हुए ही ऊपर की तरफ़ इशारा किया.
“ओह...”
“मुझे तो पता भी नहीं चला. नमाज़-ए-जनाजा भी मुझे नसीब नहीं हुई. मैं तो तब अस्पताल में बेहोश पड़ा था. सब कुछ गुलामे को ही झेलना पड़ा था.” उसकी आवाज़ उसी खला से आती लग रही थी.
“उनके साथ कुछ हुआ था क्या?”
“क्यों, अब तक जो हुआ था वह कम था क्या भाईजान?” यह चाय बनाते हुए गुलाम की आवाज़ थी.
मैं शर्म से कट सा गया.
“रुक्का की मौत ने ही उन्हें मार दिया था पर मेरे और परवेज़ की वजह से वे ज़िंदा बने हुए थे. जब ज़िंदगी ढंग की होने लगी थी, उनके अंदर फिर से जीने की ख्वाहिश भी जागने लगी थी. पर परवेज़ की गिरफ़्तारी और फिर अम्मी की मौत ने उन्हें बदहवास कर दिया. फिर भी किसी तरह वे ज़िंदा रहे लेकिन परवेज़ की हालत ने उन्हें एकदम से खत्म कर दिया.” वह साँस लेने के लिए रुका.
“मैं परवेज़ को लेकर सीधे अस्पताल भागा था. उन्हें खबर नहीं दी थी. होश भी कहाँ था. न जाने उन्हें कैसे खबर हुई? न जाने वे कैसे अस्पताल पहुँचे? बस मैंने उन्हें वहाँ देखा. उन्होंने एक नज़र मेरी ओर देखा और उनकी दूसरी नज़र परवेज़ पर पड़ी और वही उनकी आखिरी नज़र थी.”
मेरी नज़रें गुलाम के हाथों में थमे हुए कप पर जम सी गयी थीं. मैं कोशिश करके भी उसकी तरफ़ नहीं देख सका. हम तीनों धीरे-धीरे नून-चाय सुड़कने लगे. मैंने परवेज़ की आँखों से कुछ बहकर उसके कप में मिलते हुए देखा. मैंने मन ही मन न जाने किसको एक गाली दी. एक भयंकर गाली.


परवेज़ को ठीक होने में सात महीने लग गए. पूछताछ के दौरान उसके जिस्म पर जिस तरह से जुल्म हुए थे उसके बदले में कमर के नीचे का उसका पूरा बायाँ हिस्सा बेकार हो गया था. डाक्टरों का कहना था कि वह बच गया है यही बहुत बड़ा करिश्मा है. इस बीच, हालाँकि डाक्टर्स और गुलाम ने बहुत छुपाने की कोशिश की थी, फिर भी न जाने कैसे उसे अपनी माँ और बाप के मौत की खबर मिल चुकी थी. पर उसने देखा कि गुलामे किस तरह, सिर्फ़ उसे सदमा न पहुँचे इस बात को ध्यान में रख कर, माँ-बाप के मौत की खबर उससे छुपाने की कोशिश कर रहा था. उसने अपने आंसुओं को अंदर ही अंदर रोक लिया और गुलाम को यह एहसास नहीं होने दिया कि उसे माँ-बाप की मौत की मनहूस खबर मिल चुकी है. उसे जल्द ही यह भी पता चल गया कि उसके कमर के नीचे का पूरा बाँया हिस्सा अब काम नहीं करेगा. उसने तब भी अपने आँसुओं को बहुत ज़ब्त करके रोक लिया था पर ठीक सात महीने तीन दिन बाद, जब उसको पहली बार बेड से नीचे उतारा गया और डॉक्टर और नर्सों ने उसे बैसाखी के सहारे चलाने की कोशिश की तो वह गुलाम के कंधे पर सर रख कर  फूट-फूट कर रो पड़ा और तब गुलाम भी अपने आँसुओं पर लगाम नहीं सका. दोनों भाई एक-दूसरे से बहुत देर तक लिपटे रहे और ग़मों का एक सैलाब उनकी आँखों से निकल-निकल वहाँ मौजूद सभी गैर-मुर्दा और मुर्दा चीज़ों को अपनी आगोश में लेता रहा.  
अब गुलाम का मन कारीगरी और व्यापार में नहीं लग रहा था. उसे हर पल परवेज़ की फ़िक्र खाए जा रही थी. परवेज़ को हर वक़्त उसकी ज़रूरत थी. घर में कोई और था नहीं. बिजनेस से कमाया हुआ जो कुछ भी गुलाम के पास बचा था, उससे कहीं ज़्यादा परवेज़ के इलाज पर खर्च हो चुका था और गुलाम को परवेज़ की पढ़ाई की भी फ़िक्र थी. उसे पता था कि परवेज़ दिल्ली जाकर खूब ऊँची पढ़ाई करना चाहता था इलसिए एक दिन गुलाम ने चुप-चाप एक फ़ैसला कर लिया. परवेज़ को जब बैसाखियों की कुछ मश्क हो गयी और वह कुछ और ठीक हो गया, उसने उसे अपने फ़ैसले के बारे में बताया और बिना उसके जवाब का इंतेज़ार किए, अपना घर जिसे इसरा ने बहुत मेहनत से सजाया-संवारा था, अपने फैक्ट्री मालिक को सौंप, कुछ ज़रुरी सामान और परवेज़ को लेकर दिल्ली के लिए रवाना हो गया.

 
अस्पताल में दाखिल होते ही मैंने एक स्ट्रेचर देखा जिस पर एक दुबला-पतला नौजवान पड़ा हुआ था. खून से लथपथ, लगभग अचेत. कपड़ों के चिथड़े उड़े हुए, लंबे-लंबे बिखरे हुए बाल. पर सबसे पहले जिस चीज़ ने मेरा ध्यान खींचा, वह थी उसकी खून से सनी दाढ़ी.
“...दाढ़ी???” मैं धीरे से बुदबुदाया था.
“तो क्या मुसलमान भी...? पर मुसलमान कैसे घायल...?”
“देखने में तो कश्मीरी लगता है. कहीं यह बम तो नहीं फिट कर रहा था?” एक ख़ास तरह से ट्रेंड मेरे दिमाग ने काम करना शुरू कर दिया था.
मैंने कैमरा टीम को इशारा किया और स्ट्रेचर की ओर दौड़ पड़ा. बाईट शुरू हो चुकी थी. मेरे दिमाग में और चैनलों से आगे रहने की एक पूरी कहानी आकार ले चुकी थी और थोड़ी ही देर में पूरा देश सुन और देख रहा था कि राजधानी में हुए बम ब्लास्ट में एक कश्मीरी युवक घायल हुआ है और पुलिस उसे संदिग्ध आतंकवादी मान कर अपनी जाँच आगे बढ़ा रही है.
पर कुछ दिनों में यह स्पष्ट हो गया कि वह युवक आतंकवादी नहीं था. पुलिस से पता चला कि उसका नाम गुलाम रसूल है और वह दिल्ली में अपने भाई के साथ रहकर कबाड़ी का काम करता है और बम-विस्फोट वाली जगह पर वह किसी से कबाड़ के बारे में कुछ बात करने के लिए आया था.
मैंने कई बार झूठ को सच और सच को झूठ बना कर दिखाया था और कभी पछतावा नहीं हुआ था पर पहली बार न जाने क्यों, अपनी गलत रिपोर्टिंग पर पछतावा हो रहा था. मैं कई बार अस्पताल गया पर हर बार उस नौजवान के मासूम चेहरे पर नज़र पड़ते ही, एक अजीब से एहसास और डर से भर कर मैं वापस आ जाता. एक हफ़्ते हो चुके थे. वह अब ठीक होने लगा था और उसे जनरल वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया था. जनरल वार्ड में शिफ्ट होने के बाद मैंने एक लड़के को देखा जो बैसाखियों के सहारे चल रहा था और उस घायल लड़के की तीमारदारी में लगा हुआ था. पता चला कि उसका नाम परवेज़ रसूल है और वह उसका छोटा भाई है. मैं एक अजीब सी आत्म-ग्लानि से भरा हुआ था जिसे परवेज़ की बैसाखियाँ और गुलाम के मासूम चेहरे और मेंहदी रंग की दाढ़ी और घनीभूत कर रही थीं. मैंने कोशिश की पर अपने चैनल पर यह खबर चलवा पाने में असमर्थ रहा कि जिस कश्मीरी युवक के बारे में खबर चलाई गयी थी कि वह संदिग्ध आतंकवादी है, वास्तव में वह आतंकवादी नहीं बल्कि एक भोला-भाला कश्मीरी युवक है जिसकी दाढ़ी मेंहदी से रँगी हुई है और जिसका एक भाई है जिसके कमर के नीचे का पूरा बायाँ हिस्सा बेकार है और जो बैसाखियों के सहारे चल कर बम-ब्लास्ट में घायल अपने बड़े भाई की हिम्मत बढ़ाता रहता है और अकेले में न जाने किसे एक भयानक गाली देता रहता है और जिसकी बैसाखियाँ बम ब्लास्ट की शिकार एक ईमारत की खिड़कियों के बिखरे हुए शीशों की शक्ल अख्तियार कर लगातार मेरी आँखों में चुभती रहती हैं.
और तब मैंने परवेज़ से दोस्ती करने का और दोनों भाइयों के बारे में ठीक से जानने का फ़ैसला किया. परवेज़ की तरफ़ बढ़ाया गया दोस्ती का हाथ तो आसानी से थाम लिया गया पर उनकी कहानी जानने के लिए मुझे महीनों इंतेज़ार करना पड़ा.
परवेज़ को अपने पैरों पर खड़ा होने में सात महीने तीन दिन लगे थे, गुलामे ने एक महीने कम वक़्त लिया. इस दौरान वह लगातार अपने बिस्तर पर मौजूद, अपने छोटे भाई को बैसाखियों के सहारे दौड़-भाग कर अपनी खिदमत करते हुए देखता रहा. बार-बार उसकी आँखों में आँसू आते, पर वह उन्हें बहुत मुश्किल से ज़ब्त कर लेता. इस बीच उसे और परवेज़ को पता चल गया था कि उसके कमर के नीचे का पूरा दायाँ हिस्सा अब बेकार हो चुका है और परवेज़ की ही तरह उसे भी अपनी बाक़ी ज़िंदगी बैसाखियों के सहारे गुज़ारनी होगी. परवेज़ यह खबर सुनकर शून्य सा हो गया था पर गुलाम ने यह खबर बड़ी हिम्मत के साथ सुनी और खबर सुनाने वाले डॉक्टर की तरफ़ देखकर हौले से मुस्कुरा दिया पर ठीक छः महीने तीन दिन बाद जब डॉक्टर और नर्सों ने उसे बैसाखी के सहारे चलाने की कोशिश की तो वह परवेज़ के कंधे पर सर रख कर फूट-फूट कर रो पड़ा और तब परवेज़ भी अपने आँसुओं पर लगाम नहीं सका. दोनों भाई एक-दूसरे से बहुत देर तक लिपटे रहे और ग़मों का एक सैलाब उनकी आँखों से निकल-निकल वहाँ मौजूद सभी गैर-मुर्दा और मुर्दा चीज़ों को अपनी आगोश में लेता रहा.
मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मेरा पूरा वजूद ही नकारा हो गया हो. मैं बस चुपचाप उन्हें रोते हुए देखता रहा. मेरे अंदर इतनी हिम्मत भी नहीं बची थी कि उनमें से किसी एक के भी कंधे पर हाथ रखकर थोड़ी सी दिलासा दे दूँ.

गुलाम ने जब टेपरिकार्डर की आवाज़ बहुत तेज़ कर दी और शमीमा आज़ाद की आवाज़ घर्र-घर्र करते हुए अचानक ही बहुत तेज़ हो गयी तो मैंने चौंक कर देखा. परवेज़ मेरी तरफ़ देखकर मुस्कुरा रहा था. एक भीगी हुई मुस्कुराहट.
“लगता है आप कहीं दूर जाकर खो गए थे.” उसकी आवाज़ अब भी नम थी.
मैंने उसे बताना चाहा कि मैं कहाँ खो गया था पर कुछ कह नहीं पाया. मैं देख रहा था कि मेरे चैनल ने मुझे राजधानी में होने वाले गणतंत्र दिवस परेड के कवरेज की ज़िम्मेदारी सौंपी है. मैं अपनी कमेंट्री तिरंगे को कैमरे में फोकस करवाते हुए शुरू करता हूँ. लहराता हुआ तिरंगा कभी पूरी तरह कैमरे की गिरफ़्त में आ जाता है और कभी आधा-अधूरा ही. फिर कैमरा भारत के मानचित्र को दिखाता है. पर अजीब बात है. मानचित्र भी कभी पूरी तरह कैमरे के फोकस में होता है और कभी आधा-अधूरा ही. अब कैमरा भारत के अलग-अलग राज्यों से होता हुआ कश्मीर तक पहुँच चुका है. पर कश्मीर भी कभी पूरा दिखता है और कभी आधा-अधूरा. उस कभी-कभी पूरा और कभी-कभी आधे-अधूरे दिखते कश्मीर के पीछे सेना और पुलिस के जवान अपने-अपने करतब दिखाते चले जा रहे हैं...एक बच्ची कश्मीर के मानचित्र से बाहर निकल आयी है...उसके हाथों में कई तरह के साज़ हैं जिन्हें वह बहुत ही जोश व खरोश के साथ बजा रही है और उसके होंठों से एक सुरीला नगमा फूटकर फज़ा में मुन्तसर हो रहा है...रुकैय्या...नहीं...हाँ...शायद...उसके पीछे-पीछे कुछ अजीब से लोग हैं...उनके हाथों में एक फ़तवा है...साज़ हराम हैं, मौसिक़ी हराम है, रक्श हराम है... टेपरिकार्डर से निकलने वाली मौसिक़ी तेज़ हो गयी है....गुलाम और परवेज़ उठकर नाचने लगे हैं...नाचते-नाचते वे एक दूसरे से लिपट जाते हैं...मैं उनकी ओर देखता हूँ...वे कभी पूरे-पूरे दिखाई देते हैं, कभी आधे-अधूरे.

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प्रतिक्रियाएँ

[07/09 08:10] Sandhya: कहानी पढ़ कर तुरंत प्रतिक्रिया देने की स्तिथि में नहीं रही ।एक हँसता खेलता परिवार किस तरह बर्बाद हो जाता है इसका दर्दनाक चित्रण किया है अयूब जी ने ,बहुत अच्छी कहानी ।कश्मीर की खूबसूरत वादियां और वहां के खूबसूरत लोग उनका समृद्ध कल्चर सभी कुछ साथ साथ बयां किया है अयूब जी ने ख़ूबसूरती के साथ साथ वहां के हौलनाक मंज़र भी दिखाने में सफल रहे हैं अयूब जी ।
मुझे मनीष कुलश्रेष्ठ की 'शिगाफ'याद आई उसका फलक बड़ा है, उपन्यास है ।अयूब जी गागर में सागर भरने में सफल रहे ।बहुत अच्छे से वहां की स्तिथि के बारे में भी बताया ।
अच्छी कहानी की बधाई 💐
शुक्रिया प्रवेश 💥
[07/09 10:08] Chandrashekhar Ji: अयूब जी की कहानी सत्यकथा सी लगी,जैसे की देखा हुआ लिखा हो.... कश्मीर के सुन्दर चित्रण के साथ वहां के दर्दनाक हालात का प्रभावी चित्रण...!
बधाई।
[07/09 10:12] अपर्णा: सईद भाई की ये कहानी मेरी पढ़ी  उनकी पहली कहानी है। इसे शेयर भी किया था।
ये कहानी इतने कड़वे सच की बात करने में पूरी तरह सफल है जिसे राजनीति, धर्म, सत्ता और इन सब में लिप्त अनगिनत स्टेकहोल्डर्स के चालों के नीचे दबी मरणासन्न है बस प्राण नहीं निकले हैं उसके।
विषय को बेहद संवेदनशील तरीके से बरता गया है। झकझोर देती है ये कथा। हम से आम पाठकों को ये सोचने पर मजबूर करती है कि हमारा सेलेक्टिव साइलेंस और स्टैंड हमारे ख़ुद के बारे में क्या कहता है। क्या हम स्वंय से आँख मिला सकते हैं?
तथाकथित सभ्य समाज के मुँह पर एक तमाचा है ये कहानी क्योंकि दुर्भाग्य से ये सिर्फ़ एक कहानी नहीं है।
सा की बा और प्रवेश जी को आभार।
सईद भाई, हैट्स ऑफ़!
[07/09 10:36] ‪+91 94243 08505‬: अय्यूब जी की कहानी दो बार पढा शुरूवात ही बहुत रोचक लगी कहानी पूरी पढने की इच्छा  बलवती होती है और कहानी का अंत जानने की जिज्ञासा बढती ही जा रही है ऐसा लगा कि काश्मीर घूमने निकल गये बहरहाल कहानी आकर्षक और पठनीय है  । साकीबा सुप्रभातम्🌅
[07/09 12:04] Ajay Shreevstav: अयूब जी

आपकी कहानी में प्रवाह है , जो पाठक को भी कहानी के साथ साथ लेते चलता है ....
कुछ जगह ,फ़्लैश बेक में थोडा व्यवधान सा लगता है , कनेक्ट होने में ....

कुल मिलाकर कहानी बहुत सधी हुई है और पुनः सोचने पर बाध्य करती है कि निरीह लोगों के साथ अन्याय क्यों होता है , करता कोई और है, भुगतता कोई और है...

जब भी ऐसा होता है , तब मानव जीवन के अस्तित्व व् इंसानों के द्वारा बनाये गए नियमों के बीच तुलना करने को मन करने लगता है ....


बधाई व् शुभकामना

✍अजय


[07/09 13:08] Rajendr Shivastav Ji: आज की कहानी ने मन गीला कर दिया ।विचलित कर दिया
ईश्वर करे यह मात्र कहानी ही हो,सच न हो।
पर कहानी भी  तो सच का साथ लेकर चलती है।आज के दौर व कश्मीर के हालात में यह सब भी मुमकिन है।
कहानी अपनी बुनावट व कहन के दम पर पाठक की संवेदनाओं  को झकझोरती हुई
गहन पीढ़ा की अनुभूति कराती हुई दोनो भाईयों के बीच किंकर्तव्यविमूढ़ छोड़ जाती है।
शीर्षक सार्थक है।पात्रों व घटनओं का प्रभावी चित्रण पाठक के मनोमष्तिस्क पर स्थाई प्रभाव छोङता  है
सईद अयूब जी इस पाठक की ओर से बहुत बधाई स्वीकार करें।
प्रवेश जी बहुत धन्यवाद ।
[07/09 13:35] Ghanshym Das Ji Sakiba: आनंदकृष्ण जी को जन्मदिन की बहुत बहुत शुभकामनायें । मित्रों एक सामान्य नागरिक / पाठक होने के नाते मेरा मानस  अपनी फ़ौज/ पुलिस का इतना क्रूर चेहरा मानने को तैयार नहीं होता । एक सामान्य नागरिक की तरह हो सकता है मैं मीडिया/ शासन के प्रचारतंत्र से प्रभावित हूँ लेकिन मेरी सोच हमेशा यही रहेगी कि इस प्रकार की कवितायेँ/ कहानियां उग्रवादियों / दुश्मनों को देश की फ़ौज/ पुलिस को बदनाम करने के हथियार बनते है , कुछ दोष हर संस्था में होते हैं और वे फ़ौज/ पुलिस में भी होंगे लेकिन वो किसी के लिये भी देश के रक्षा करने अपनी जान देने वाले सारे जवानों को दुनियां में एक बर्बर /घिनौना चेहरा दिखाने का आधार नहीं हो सकते । आज भी जबकि वहाँ के बच्चे , महिलाये आगे बढ़ कर फ़ौज/ पुलिस पर हमला करते हैं घायल होने/मारे जाने पर उनकी झूठी सच्ची कहानी बनाई जाती है । अब कहानी के विषय के समर्थक मुझे चाहे झूठे राष्ट्रवाद/पार्टी विशेष /धर्म विशेष से प्रभावित माने , लेकिन एक सामान्य पाठक/ नागरिक के नाते मेरे यही विचार हैं । मित्रो यदि बुरा लगे तो मैं क्षमा माँगता हूँ , लेकिन इस तरह के कुप्रचार का कभी समर्थन नहीं कर सकता 🙏🙏🙏
[07/09 13:47] Pravesh soni: कहानी निश्चित ही मनमे हाहाकार  करती है ।काश यह कहानी ही हो ......कहाँ होती है ऐसी कहानियां यह तो सच के गर्भ से जन्म लेती हुई कड़वी सच्चाइयाँ है जिन्हें हम पढ़ कर भूलने में कभी सफल नही होते ।बार बार हमारे जहन में उगाती है सवाल की क्यों होता है ऐसा
।इस कड़वे सच को किसी धर्म विशेष  के विजय रथ के तले न कुचल कर मानवता की मौत का कुछ पल के लिए शोक अवश्य करना चाहिए ।

कहानी पर  समीक्षा का   इन्तजार   है ।  सभी पक्ष पर निरपेक्ष बात हो तो अच्छा लगे ।
[07/09 13:59] Raja Awasthi: सच! कहानी पढ़ कर मन सन्न होकर रह गया । कहानी में जिस सचाई को उकेरा गया है, वह पता नहीं कितनी कितनी बार और कितनों कितनों के साथ दोहराया गया होगा । जिस तरह पत्रकार एक भ्रम का शिकार होता है और गुलाम को ही आतंकवादी समझ लेता है, किन्तु सच जान लेने के बाद भी उसका खुलासा नहीं करता, क्या पुलिस भी यही करती है!! मुझे लगता है बात इससे भी दूर तक जाती है । यह तो एक हृदय विदारक घटना का किस्सा है किन्तु इन घटनाओं के पीछे केवल और केवल ताकतवर बने रहने की चाहत रखने वाले तो अब भी पूरी तरह बेनकाब नहीं हुए । जनता तो गुलाम और परवेज ही. है । समझती भी है, पर अंत में उन्हें ही ताकत सौंप देती है । यही हो रहा है सब जगह ।
कहानी इतनी मार्मिक है कि गला भर आता है, किन्तु कहानी में ऐसा लगता है बहुत कुछ छूट गया है । वह क्या है यह तो कहानीकार ही सोचे । पीड़ा का एक घना और बरसता हुआ बादल रचती है कहानी, लेकिन इसे और भी कई प्रश्नों की रोशनी में आए जवाबों पर बात करनी थी ।
सारी बातों के बाद भी सईद अयूब जी को बहुत बधाई । बहुत प्रभावित करती है यह कहानी । हाँ कहानी का उत्तरार्ध उतना प्रभावी नहीं बन पाया, शायद उत्तरार्ध खो और विस्तार की जरूरत है ।
पुन: बधाई ।
राजा अवस्थी, कटनी
[07/09 14:15] ‪+91 94243 08505‬: प्रवेश जी ने ये कहानी पटल पर रखकर सभी को एक खुली चर्चा का मौका दिया है आज की चर्चा में शुक्रिया की हकदार प्रवेश जी भी है अब दूसरी किश्त का इंतजार मन में उत्सुकता कुछ ज्यादा ही संचारित कर रहा है प्रवेश जी धन्यवाद ।
[07/09 15:40] Saksena Madhu: पुलिस और फ़ौज की अपनी मजबूरिया भी होती है ।शक हरेक पर करना होता है ।सच जानने का कोई बेरोमीटर नहीं होता ।प्रोफेसर के साथ उस पर शक करना गलत नहीं ।हम उनकी जगह होते तो शायद यही करते । अपराध, ऊपरी दबाव और खीज अन्याय करवा देती है ।
[07/09 15:47] Meena Sharma Sakiba: पुलिस , फौज, प्रशासन ये नाम जेहन में हमेशा क्रुरता का चित्र
बनायें, ये आवश्यक नहीं है !
कहानी को अगर सिर्फ कहानी की तरह पढ़ें तो आतंकित होने की कोई आवश्यकता नहीं,किरदार हैं जो लेखक की कलम के साथ अपना
रोल प्ले कर रहे हैं, कहानी निस्संदेह
घटनाओं के कारण,भय का वातावरण निर्मित करती है. घटनाओं का वर्णन जिस विस्तार से किया गया है
वह दिमॉग में सारे चित्र किसी फिल्म की तरह खींचने में कामयाब है.
कहानी के माध्यम से कहानीकार
हृदय विदारक घट ाओं को कहने मे सफल है !  इस दौर में जहाँ हिंसा का बोलबा ा है,यह कहानी सच के बेहद करीब जान पड़ती है !गहन पीड़ा के स्वर मुखर हैं.!
सईद जी ,संवदनशील हृदय को झकझोरने में आपकी कहानी कामयाब रही है.! कहानी के आस-पास के माहौल एवं घट ाओं का विस्तृत विवरण, कहानी को अधिक विस्त्र के साथ पाठक को प्रेषित करने में कामयाब रहे हें !उस माहौल की नमी पाठक क् मन पर भी असर करती है !
बधाई सईद अयूब जी ,कामयाबी आपके साथ सदैव रहे,शुभकामनाएँ !
प्रवेश जी इस प्रसतुति के लियेआभार !
[07/09 16:11] Avinash Tivari Sir: आधे अधूरे कहानी के लिहाज से अच्छी कहानी है किन्तु मेरी नजर मे यह नकारात्मक संदेश देती है आम भारतीय और सैनिकों का गलत चित्र पेश करती है इतने जल्लाद भी नहीं होते है भारतीय । आतंक वादियों के जुल्म तो सारा विश्व झेल रहा है । कहानी अच्छी बनक की होने के बावजूद मिथ्या आरोप की पीड़ा देती है।इस देश का नागरिक होने के नाते कमसेकम.मै तो दुखी हूँ।
[07/09 16:31] Vinita Vajpai Sakiba: उफ़ , कहानी पढ़कर स्तब्ध हूँ, अक्सर समाचार पत्रों और अन्य सूचना माध्यमों से काश्मीर के हालात पढ़ती हूँ , विभाजन के वक्त भी कुछ ऐसे ही हालात रहे , आम आदमी कैसे शिकार होता है और किन शर्तों पर बड़ी बातें की जाती हैं
लेखक अपने भाव और शिल्प में पूरी तरह सफल है
अंतिम दृश्य और तो बेहद मार्मिक है
[07/09 16:33] Saksena Madhu: सियासत की चालों  से जनता  बर्बाद होती है ....ये तो एक कहानी है हमारे सामने जाने कितनी कहानियाँ तो  अन कही और अनसुनी रह गई हैं ।दिल को दहला देने वाली पर हौसले का दन ना छोड़ने वाले पात्र कहानी को ऊंचाइयों पर ले जाते हैं ।कहानी मे उत्सुकता बनी रहती है और पूरी पढ़ने पर मज़बूर करती है ।भाषा ,भाव, शिल्प सब यथास्थान और यथोचित मात्रा में है जो कहानी को दृढ़ता प्रदान करते हैं ।बधाई अयूब जी ।ये कहानी सदा याद रहेगी ।
आभार प्रवेश बढ़िया चयन के लिए ।
[07/09 18:07] Aalknanda Sane: कहानी मार्मिक है और पुलिस तथा सेना द्वारा ऐसा व्यवहार भी आम है. कहानी कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं छोड़ती, बल्कि असलियत उजागर करती है. जो एक पत्रकार, जो कहानी का सूत्रधार है, की जिम्मेदारी है. मुझे इस कहानी में एक बात और सकारात्मक दिखाई दी कि इन सारे हालातों में भी दोनों भाई पूरी जिजीविषा से जी रहे हैं और कश्मीर की यही सच्चाई है.  कश्मीर के हालात तो बहुत ज्यादा ख़राब है, लेकिन मैं इस सन्दर्भ में एक उल्लेख करना चाहूंगी कि मालेगांव बम ब्लास्ट के आरोपी के रूप में साध्वी प्रज्ञा, कर्नल पुरोहित के साथ ही ए टी एस   इंदौर से दिलीप पाटीदार को उठा ले गई थी, जिसका आज तक कोई पता नहीं चल पाया है.
[07/09 18:22] HarGovind Maithil Ji Sakiba: वाकई कहानी बहुत ही मार्मिक और हृदय विदारक है ।पाठक को अंत तक बाँध कर रखती है ।सूत्रधार की ही तरह पाठक के मन में भी गुलाम और परवेज की निजी जिंदगी में झाँकने की जिज्ञासा पैदा करती है । सेना का इतना बर्बर व्यवहार वह भी एक साथ पूरे गाँव के साथ अकल्पनीय है ।काश ये महज कहानी की बात हो ।
बधाई सईद अयूब जी ।
आभार प्रवेश जी ।
[07/09 19:31] Braj Ji: कहानी का कथ्य नया है. कश्मीर की स्थिति को इसी तरह से बयान करना मुश्किल काम रहा होगा. मुझे तो आपकी भाषा और बुनावट बहुत पसंद आई.
[07/09 20:07] ‪+91 74703 34648‬: Vishaya achha hai par kahani ka yathartha kafi ekhara.intellectual duniya me bhi kashmeer ko lekar ya fauj ko lekar itna ekhara narrative ni hai.afspa baad me laga.kashmeer me hinsa aatankvaad pandito ka palayan  algaavvaad aur fauj ki jyaadti in sbka bahut complex narrative banta hai.nation state ka critic hota ya afspa ka to jyada behtar banti ya us maansikta ka Jo jameen ke ek chote se tukde ke liye na Jane kitna khoon bahane  pr amaada hai.mukhya paatro ki peeda tab jyada vishwasniye banti jab yah aata ki aatankvaad se aam aadmi ka koi Lena dena ni.khaskr kashmeeri algaavvad ke sandarbh me.BT ye poora narrative goal hai kahani me.
[07/09 20:12] ‪+91 74703 34648‬: Doosra aurton pr hinsa sirf fauz  hi nahi krti aatankvadi  bhi krte.yah ek maansikta hai Jo militarisation of women body krti.yani stree ki deh ko raundkr vijay ko poorn mahsoos krti.sandarbh alag hote  pr maansikta wahi hoti.fauz  ho aatankvadi  ho ya koi aur.ekhara narration aur reality kahani ko kamjor karti.isiliye sanrachna bhi kahani ki kafi saral wa ekraikhik hai.yadi yathartha ko poori jatilta me liya jata  to sanrachna bhi alag hoti.baharhaal lekhak ki pahli kahani hai so WO badhai ke paatra hain ki sensitive issue pr likha.aage aur behtar likhenge aisi kaamna  hai
[07/09 20:21] Suren: सईद भाई की कथा पढ़ी । कथा पढ़कर बहुत सारी बाते जो कश्मीर से जुडी हुई है वो सब आपस में गडमड होने लगी ।


सबसे पहली बात ये कि लेखक के कथा नैरेट करने की सलाहियत का पाठक मुरीद हुए बिना नही रह सकता । जब प्राथमिक रूप से  कथा  अपने साथ पाठक को बहाने का जज़्बा  रखती है उसी के बाद पाठक कथा के अन्य पहलुओं पर विचार करता है ।


इस कहानी की पृष्ठभूमि में कश्मीर के हालात है और उन हालातो के कई पहलू  है  । कश्मीर से युवाओं के लापता होने के आंकड़े , 1989  से अब तक................  सरकार , विदेशीतत्व ,  घुसपैठिये , बाहरी और अंदरुनी आतंकवादी ,हिन्दू पलायन ,लोकल पॉलिटिक्स , ऐतिहासिक सन्दर्भ और सेना  जो मिलाजुला कोलाज बनाते है उस परिदृश्य में इन लापता लोगो  का पुनः पता मिलना और ऐसा मिलना की आदमी टूट जाये उस पते को देखकर ....


इस एक पहलू  को लेखक ने अपनी कथा के माध्यम से बखूबी उभारा है । ये कहना की उस विशेष पहलू को ही लेखक क्यों उभार रहा है तो ये थोड़ी ज्यादती लगती है, लेखक के प्रति । गुलज़ार साहब माचिस फिल्म बनाते है और  तत्कालीन पंजाब के एक पहलु को बेहतरीन तरह से दृश्य माध्यम में प्रस्तुत करते है  .... तो  यह एक  मीडियम  का  और  एक  दृश्य/घटना को एक जगह खड़े होकर अंकित करने का और उसमें देखे/भोगे  हुए सच को लेखकीय अभीष्ट के साथ प्रस्तुत करने का कलावादी प्रयत्न है । पूरे कोलाज़ को लेकर तो इतिहासवृत्त ही लिखा जा सकता है ,कथा नही ।


ये कथाये या इस तरह के अन्य वृतांत चाहे वे किसी भी माध्यम से आये ,यह विचार प्रक्षेपित करने में सफल रहेंगे कि नीति निर्धारकों  का , जनमानस की चेतना और उसके विमर्श को उपेक्षित कर कुछ भी भावनात्मक रौ में चीज़ों को लाकर,  लादना  उतना आसान नही होगा ।


लेखक की कथा पर पकड़ उसकी भाषा बनाती है जोकि यहाँ बहुत ही तरल है । लेखक पात्रों के साथ एक सम्यक दूरी को निभाता है, जिससे कथा के  मोटिव को भी पोषित होने का अवसर मिलता है और कथा के पात्रों से पत्रकारिता वाली तटस्थता भी नही आने पाती ।।

सईद भाई को एक बेहतरीन कथा के लिए शुभकामनाएं और प्रवेश जी को उसे हमे सुलभ कराने के लिए शुक्रिया 💐💐
[07/09 20:49] अपर्णा: बढ़िया टिप्पणी!
इस बिंदु पर भी सहमत हूँ कि ये अपने आप में एक संपूर्ण कथा है जहाँ कथाकार ये निर्धारित करने को पूर्णतः स्वतंत्र है कि उसके चरित्र कौन और कैसे होंगे?
किसी भी दूसरे बिंदु को दिखाना यदि कथा के प्रवाह में बाधक है तो उसके जोड़ना जबर्दस्ती ही होगा जो कृत्रिम लगेगा।
उस बिंदु से लिखी गई कोई भी कथा नितांत अलग और दूसरी कथा होगी। अपने स्वतंत्र और पृथक चरित्रों और कथाक्रम के साथ।
[07/09 21:51] Saiyad Ayyub Delhi: अजय जी, बेहद शुक्रिया आपके तारीफ़ी शब्दों के लिये। 🙏🙏🏻🙏🙏🏻 आप जिस व्यवधान की बात कर रहे हैं वे मुझे मालूम हैं। एक लेखक के तौर पर मैं उनसे जूझ रहा हूँ। पर मुझे लगता है कि जब मैं कहानी लिख रहा होता हूँ तो असल में मैं मन ही मन पाठकों को कहानी सुना रहा होता हूँ। तो सुनाने की प्रक्रिया जब लेखन में आ जाती है तो कहीं-कहीं कुछ अटकता  सा लगता है। इसी कहानी का अगर मैं पाठ करूँ तो शायद यह व्यवधान न महसूस हो। फिर भी, इस समस्या पर मुझे काम करना है।
[07/09 22:07] Naresh Agrawal Sakiba: मैं  अय्यूब  जी के लिए इतना ही कह सकता हूं कि वे एक बेहद प्रतिभाशाली साहित्यकार  हैं और आने वाले दिनों में लोग  महसूस करेंगे कि वे अगेय जी  का ही कोई आधुनिक अवतार हैं।

 उनकी साहित्य के प्रति जिज्ञासा बेहद सराहनीय है तथा किसी भी साहित्यक कार्यक्रम में वे बढ़ - चढ़ कर हिस्सा लेते हैं । उनकी रचनाधर्मिता बिल्कुल आधुनिक है साथ ही समकालीन भी।

 ऐसे अच्छे इंसान के सहारे ही साहित्य अधिक गतिशील हो सकता है। उनके बहुत अच्छे साहित्यिक  भविष्य के लिए मैं अग्रिम बधाई देता हूं।
[07/09 22:32] Mukta Shreewastav: कश्मीर की समस्या को इगिंत करती हुईं बेहतरीन कहानी।मासूम बच्चों पर अत्याचार करने की वास्तविकता भी कहानी में बताई गई है.अय्यूब जी इतनी अच्छी कहानी पढ़वाने के लिए धन्यवाद।
[07/09 23:12] Lakshmikant Kaluskar Ji: सईद अय्यूब जी कहानी के माध्यम से आपने कश्मीरी लोगों की समस्याओं का जो चित्रण किया है वह जितना भयावह है हकीकत कहीं उससे बढ़कर ही होगी.पिछले अनेक वर्षों से सुरक्षा बलों द्वारा वहां की आम जनता के साथ जो सलूक किया जाता रहा है वह किसी से छुपा नहीं है.तथाकथित राष्ट्रवाद के खिलाफ़ न जाए यह सोच कर सभी दल सुरक्षा बलों की इन अवैध और आपत्तिजनक कार्यवाहियों का विरोध भी नहीं कर पाते.बहरहाल कहानी का शिल्प और भाषा बाहुत ही सधी हुई और प्रवाहमयी है.
सरकार भले ही बदलती रहे,सुरक्षा बल तो वही है जिनके बूट तले कश्मीर घाटी कराहती र
[07/09 23:55] Saiyad Ayyub Delhi: घनश्याम जी, पहली बात, किसी को भी अपनी बात रखने के लिये क्षमा माँगने की आवश्यकता नहीं है। यह एक खुला मंच है और सार्थक बहस के लिये एक उपयुक्त स्थल। जहाँ तक फौज और पुलिस का सवाल है, पूरी फौज या समूची पुलिस बर्बर और अत्याचारी है, यह मैं नहीं मानता लेकिन फौज या पुलिस में सबकुछ 'महान' ही है यह भी मैं नहीं मानता और इस न मानने के पीछे फौज व पुलिस के वे तमाम अत्याचार हैं जो समय-समय पर हमारे सामने आते रहते हैं। उनके प्रति आँखें मूँद कर नहीं रहा जा सकता। एक लेखक का कर्तव्य है कि वह उन नंगी सच्चाइयों को लोगों के सामने रखे जो बहुत सारी धारणाओं के बीच कहीं छिप जाती हैं या छिपा दी जाती हैं। दूसरी बात, जो ऊपर सुरेन भाई ने अपनी टिप्पणी में बहुत स्पष्ट तरीके से कह दी है कि बहुत सारी चीज़ों पर एक साथ कहानी नहीं लिखी जा सकती। इस कहानी में दो भाई दो अलग-अलग घटनाओं में अपंग होते हैं। एक पुलिस के अत्याचार से और दूसरा आतंकवादियों द्वारा बम ब्लास्ट में। उनकी बहन और माँ फौज के अत्याचार का शिकार होती हैं। यह एक ऐसे देश में होता है जिसे दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहा जाता है। यह कैसा लोकतंत्र है? कश्मीर हमारा है के नारों के बीच, कश्मीरियों पर (चाहे वे कश्मीरी पंडित हों या मुसलमान) जो जुल्म हुये हैं, उन्हें विकास से कोसो दूर, अधिकांश समय पूरी दुनिया से काट कर, कभी घोषित कभी अघोषित कर्फ्यू में जिस तरह रखा गया है, वह सब दिल दहलाने वाला है। यह अभी की कश्मीर के हालात की बात नहीं कर रहा हूँ। दशकों से उनके साथ जो सुलूक हुआ है, उसकी बात कर रहा हूँ। और रही सेना की बात, सिर्फ कश्मीर नहीं, छत्तीस गढ़, झारखण्ड, पूर्वोत्तर के राज्यों में सेना ने सामूहिक रूप से जो कुकृत्य किये हैं, उसकी फेहरिस्त बहुत लंबी है। यह सिर्फ भारतीय सेना की बात है। दुनिया भर में सेनाओं ने जिस तरह के कुकृत्यों को अंजाम दिया है वह इंसानियत के मुँह पर कालिख पोतने से भी बड़ा है। सेना हमारी सीमाओं पर लड़ती है, अपनी जान गँवा कर हमारे सैनिक हमारी सीमाओं की रक्षा करते हैं, इन तर्कों से सेना जो कुकृत्य करती है उसे झुठलाया नहीं जा सकता। कहानी को लेकर, मेरी ओर से सुरेन भाई और अपर्णा दी ने अपनी बातें रख दी हैं। वे भी पढ़ लें प्लीज।
[08/09 00:06] Saiyad Ayyub Delhi: राजा अवस्थी सर, आपकी टिप्पणी मेरे लिये बहुत मायने रखती है। शुक्रिया! कहानी में कुछ छूटा हो, ऐसा तो मुझे नहीं लगता पर हाँ, कहानी के पाठ में कहीं-कहीं व्यवधान आता है या महसूस होता है। उसका कारण शायद यह है कि जब मैं कहानियाँ लिखता हूँ तो मन ही मन लोगों को कहानी सुनाता चलता हूँ। यानी किस्सागोई की तरह। वह जब लिखित में आता है तो कहीं-कहीं प्रवाह बाधित सा लगता है।
[08/09 00:18] Saiyad Ayyub Delhi: आपने कहानी पढ़ी यह मेरे लिये बड़ी बात है। मैं या शायद कोई भी लेखक, पाठक को लक्ष्य कर के नहीं लिखता। वह लिखता है और उसे पाठकों के सामने रख देता है। फिर पाठक के विवेक और मनोदशा पर उस रचना का मूल्याँकन होता है। मैं अपनी तुलना इन विभूतियों से नहीं कर रहा पर मुझे बहुत से लोग ऐसे मिले हैं जिन्हें प्रेमचंद का गोदान, श्रीलाल शुक्ल का रागदरबारी और विजयदान देथा की कहानियाँ उबाऊ, बोझिल और बकवास लगी हैं।

मैं प्रवेश जी से आग्रह करूँगा कि वे आपको इस पटल पर रखी जा चुकी मेरी दो अन्य कहानियाँ 'जिन्नात' और 'शबेबारात का हलवा' भेज दें और साथ ही मेरी एक और कहानी 'सिरफ़िरे ख़्याल' भी। उम्मीद है वे कहानियाँ आपको रोचक लगेंगी ख़ास तौर से 'सिरफ़िरे ख्याल'। 😊
[08/09 00:24] Saiyad Ayyub Delhi: इस कहानी में भारतीयों को जल्लाद कहाँ कहा गया है। बल्कि यह कहानी भारत के ही एक नागरिक द्वारा भारत के दो नागरिकों के जीवन को सामने लाती है। क्या आप कश्मीरियों को भारत का नागरिक नहीं मानते। रही बात सेना की तो उसके बारे में ऊपर मेरी टिप्पणियाँ देख सकते हैं और यह लिंक भी देख सकते हैं-
https://en.m.wikipedia.org/wiki/Kunan_Poshpora_incident
[08/09 00:27] Avinash Tivari Sir: वे परिस्थितियां कौन पैदा करता है जिसके कारण पुलिस मिलेट्री तैनात करना पड़ती है।उपद्रवी लोग कहाँ शरण लेते हैं।उनकी जानकारियां क्यों छुपाई जातीं है? ये प्रश्न भी जबाब चाहते हैं ।अलगावाद आतंकवाद और फौजी कार्यवाही को एक चश्मे से देखना न्यायोचित नहीं होगा। दोनों में से किसी एक को चुनना होगा।
[08/09 00:31] Saiyad Ayyub Delhi: ताई, कहानी के मर्म तक पहुँचने के लिये आपके प्रति आभार किन शब्दों में व्यक्त करूँ, यह समझ में नहीं आ रहा। 🙏🙏🏻🙏🙏🏻 चाहे वह पाटीदार हों या कोई और, पुलिस की कारवाई ऐसी ही होती है। इस कहानी में तो पुलिस परवेज को अधमरा करके फेंक गयी पर बहुत से लोगों के घर वाले आज भी अपनों का इंतज़ार कर रहे हैं जिन्हें पुलिस कभी ले गयी थी। 😞😥
[08/09 00:33] Saiyad Ayyub Delhi: हरगोविंद जी, बहुत-बहुत शुक्रिया आपके बेशकीमती लफ्जों के लिये। एक लिंक दे रहा हूँ। उसके बाद सेना द्वारा एक ही गाँव पर किया गया यह अत्याचार अकल्पनीय नहीं लगेगा।

https://en.m.wikipedia.org/wiki/Kunan_Poshpora_incident
[08/09 01:58] Saiyad Ayyub Delhi: अरूणेश जी, शुक्रिया की आपने कहानी पढ़ी और टिप्पणी दी। आपकी बहुत सारी आपत्तियों का जवाब सुरेन भाई की टिप्पणी में निहित है और कुछ ऊपर जो मैंने टिप्पणियाँ की हैं उनमें मिल जायेंगी। बाक़ी एक वाक्य में कहूँ तो आपकी आपत्तियों के निराकरण के लिये मुझे एक उपन्यास लिखना पड़ेगा। दस-बारह पेज की एक कहानी में इतने सारे कोलाॅज नहीं बनाये जा सकते। कहानियाँ जीवन-जगत के किसी एक छोटे हिस्से का बयान होती हैं। बड़ी से बड़ी कहानियाँ भी कई घटनाओं, जीवन स्थितियों का कोलाॅज बनाने में बिखर जाती हैं।

दूसरी बात, जैसा प्रवेश जी स्पष्ट कर चुकी हैं, यह मेरी पहली कहानी नहीं है। मेरी कई कहानियाँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। इस पटल पर भी इससे पहले 'जिन्नात' और 'शबेबारात का हलवा' शीर्षक दो कहानियाँ मौजूद हैं। मैं प्रवेश जी से आग्रह करूँगा कि वे दोनों कहानियाँ आपको भेज दें।
[08/09 02:00] Saiyad Ayyub Delhi: नरेश जी, आपके इन हौसला देने वाले तारीफ़ी शब्दों के लिये आपका बेहद-बेहद शुक्रिया! बस एक निवेदन है। अज्ञेय जैसे साहित्यकार से किसी भी प्रकार की तुलना लायक़ नहीं हूँ। अज्ञेय ने जितना लिखा है और जिस उच्च कोटि का लेखन किया है, मैं उसका एक अंश भी लिख सका तो अपने को सौभाग्यशाली समझूँगा।

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Thursday, September 1, 2016

रचना प्रवेश पर प्रस्तुत है साहित्य की बात समूह से अलकनंदा साने की कविताये |आज की कविताओं के प्रस्तोता है समूह के सह एडमिन श्री शरद कोकास |मुख्य एडमिन श्री ब्रज श्रीवास्तव |कविताओं पर समूह में  पाठको की त्वरित प्रतिक्रियाए भी यहाँ  सलग्न है |


 🔴🔴🔴परिचय 

🔷साकीबा के मित्रों के लिए आज प्रस्तुत कर रहे हैं सुप्रसिद्ध कवयित्री अलकनंदा साने  की कविताएँ 
🔷अलकनंदा जी दो विषयों में स्नातकोत्तर हैं सम्प्रति भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत हैं तथा इंदौर में निवास करती हैं . वे हिंदी - मराठी में समान रूप से लेखन एवं इस क्षेत्र में लगभग ४५ वर्षों से सक्रीय हैं 
🔷हिंदी मराठी की अनेक पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ ,रिपोतार्ज,आलेख, महत्वपूर्ण व्यक्तियों से लिए साक्षात्कार प्रकाशित हैं 
तथा भारतीय स्टेट बैंक, इंदौर  के मुखपत्र ''आकलन'' का सम्पादन उन्होंने किया है .
🔷प्रसिद्द सामाजिक संस्था ''एकलव्य''की भोपाल से प्रकाशित बालपत्रिका ''चकमक'' के लिए,एक लम्बे समय तक  नियमित मराठी से हिंदी अनुवाद कार्य भी किया है साथ ही पुणे के समकालीन प्रकाशन के लिए , एक निश्चित अवधि हेतु सम्पादन का कार्य किया है 
🔷 वे एक अच्छी अनुवादक भी हैं तथा उन्होंने मराठी के नामचीन कवियों की कविताओं का हिंदी अनुवाद किया है जो  गगनांचल,साक्षात्कार , अक्षर शिल्पी जैसी पत्रिकाओं में प्रकाशित हुआ है 
🔷 उनके स्वयं के दो मराठी एवं एक हिंदी काव्य संकलन प्रकाशित हैं 
🔷अ.भा.मराठी साहित्य सम्मलेन सहित मराठी के अनेक महत्वपूर्ण मंचों से उन्होंने कविता पाठ भी किया है . 
🔷उन्हें विकलांग सेवा हेतु राज्य स्तरीय सम्मान भी प्राप्त  हुआ है तथा मध्यप्रदेश की पहली मैदानी महिला पत्रकार होने का गौरव उन्हें प्राप्त है ।.                      
: 🔵🔵🔵

अलकनंदा साने की चार कविताएँ


1⃣

यूँ तो अपराधी कई थे,
पर हमेशा और बड़ी तादाद में 
चींटियाँ ही मारी गईं

वे रात के अँधेरे में चुपचाप 
करते थे हमला 
चींटियाँ घूमती थी 
दिन के उजाले में 
झुण्ड की झुण्ड बेख़ौफ़

अपराध करते हुए देखी गईं चींटियाँ
और सजा उन्हें ही मिली 
बाकी निर्दोष छूट गए 
संदेह का लाभ लेकर....!!!

🔹🔹🔹🔹

2⃣

भले चूल्हे की तेज आंच पर
मैं उबलती रहूँ दाल की तरह
या बिलकुल मद्धिम आंच पर
बार-बार हिलाई जाती रहूँ
कुरकुरे करेले या भिन्डी की तरह 
मुझे मंजूर है !!!

पर मुझे माइक्रोवेव में पकते पकवान - सा मत समझो
कि सेट कर दिया टायमर 
और देखते रहे 
मेरा पकना
निर्लिप्त भाव-से
दूर खड़े होकर
किसी पंचतारांकित होटल के शेफ की तरह !!!

🔹🔹🔹🔹🔹

3⃣

धीरे-धीरे मैं उम्र-दराज हो गई
कांच की चूड़ियों के टुकड़े,इमली के बीज
उठकर दौड़ पड़ने का माद्दा
बेवजह खिलखिलाना,रूठना और मनवाना
कितनी सारी थी पूँजी चुक गई

कीमती जेवर-कपड़ों से भरी अलमारियां,
सेफ की चाबियाँ और जमीनों के पंजीयन ने 
बदल दिए आल्हाद के आयाम

हँसी, अब आने के पहले वजह पूछती है
टप-टप बहने को आतुर आंसू,
सूख जाते हैं अन्दर ही अन्दर

मैं कहीं खो गई,सिर्फ छाया रह गई
धीरे-धीरे मैं उम्र-दराज हो गई

🔹🔹🔹🔹🔹

4⃣

हाथों में मुंह छिपाकर 
खिल-खिलाकर हँसनेवाली लड़कियां कहाँ गईं  ?

अब लड़कियां खूब जोर से हँसती है 
गर्दन ऊँची कर, एक दूसरे के हाथ पर 
ताली मारकर हँसती हैं 
जो बाहर नहीं आ पाई 
वो थीं क्या खिल-खिलाकर हँसनेवाली लड़कियां ?
या उनकी हँसी  को दबा दिया गया , बहुत दिनों तक 
इसलिए अब उत्सव  मनाती-सी हँसती हैं लड़कियां ?

अब लड़कियां रम जाती हैं कहीं भी
सहज दिखाई देती हैं वे कहीं भी 
किसी की ओर देखकर लजानेवाली लड़कियां कहाँ गईं  ?
यूँ ही अपने आँचल को सम्हालनेवाली लड़कियां कहाँ गईं  ?
पैरों से जमीन को कुरेदनेवाली लड़कियां कहाँ गईं  ?

या उनको जोर देकर  बताया गया 
कि मौसम चाहे कैसा भी हो 
पल्लू लिपटा होना चाहिए पूरी देह पर 
और सिर भी रखना है ढांपकर 
इसलिए उन्होंने छोड़ दिया 
बात-बेबात लजाना ,
आँचल को उंगली पर लपेटना और 
बार-बार संभालना  ?

शाम को मां के साथ रसोई में 
इधर का बर्तन उधर करती 
लड़कियां गईं कहाँ ?
मां से लड़ियाती, 
मां की साड़ी पहनकर पूरे घर में इतराती 
लड़कियां गईं कहाँ ?

चौराहे पर मोमबत्ती जलाती लडकी का चेहरा 
तुलसी चौरे पर दीपक रखती लडकी-सा मासूम नहीं दिखता 
भोली लडकी जैसी मासूम दिखनेवाली लड़कियां गईं कहाँ ?

▪कविता: अलकनंदा साने ▪

🔸 प्रस्तुति: शरद कोकास  🔸                      

============================================================                    
प्रतिक्रियायें                                                                          

 Padma Ji: ताई की कवितायेँ कविता नही नश्तर की तरह मन में चुभती हुई उतरती चली जाती हैं। नारी के मनोभावों का प्रतीक और बिम्बात्मक वर्णन बहुत प्रभावी है।

चीटियाँ घूमती थीं
 दिन के उजाले में
झुण्ड की झुण्ड बेख़ौफ़


इन पंक्तियों के माध्यम ई समाज के बदलाव को इंगित करती हैं तो नारी सशक्तिकरण को अभिव्यक्त करती उनकी पंक्तियाँ मन में उबाल ले आती हैं


मुझे माइक्रोवेव में पकते
पकवान सा मत समझो

कहकर नारी का शोषण करने वालों को सावधान भी कर देती हैं


समाज में हुए परिवर्तन के साथ लड़कियों में भी आये स्वाभाविक परिवर्तन को भी बताया है।


अर्थवत्ता और गुणवत्ता से भरपूर अच्छी कविताओं के लिए ताई को बधाइयाँ
💐

शरद जी को धन्यवाद                      
Braj Ji: कब से मन रहा ताई की कविताएँ पढ़ने का. सीखा बहुत कुछ आज. ये कविताएँ भेदक हैं और अनोखे शिल्प में ढली.                      
अपर्णा: परिपक्व गंभीर कविताएँ अलकनंदा मैम की। एक ठहराव और गहराई से रचे जीवन दर्शन की कविताएँ  हैं ये।
शुक्रिया शरद जी 🙏🏽      

 Chandrashekhar Ji: अलकनंदा जी की कवितायेँ....
"ना कहीं से कम,ना कहीं से ज्यादा... लबालब हैं अपने में"
उन्हें प्रणाम और बधाई।                      
           

Anita Karnetkar: भोली लड़की  जैसी मासूम दिखने वाली लडकियां गई  कहाॅ?  बेहद सामयिक और विचारणीय प्रश्न, जो पिछले दो दशकों  से संपूर्ण समाज की चिंता का विषय बना हुआ है ।पैर से जमीन कुदेरना,यूँ हीअपने ऑंचलको सम्हालना,माँ की साड़ी पहनकर पूरे घर में घूमने जैसी कियाओं को रचनाकार ने बड़ी सूक्ष्मता से पकडा है।  सच तो यह है कि  हमारे संस्कार पोषक  पारिवारिक वातावरण में किशोरी से युवती बनती लड़की के बहुत ही  स                      
 Anita Karnetkar: सुंदर भाव पूरी कविता को अद्भुत  सौंदर्य प्रदान करते है। बदलाव एवं समय की मांग के नाम पर आज की युवतियों  का पहनावे मे परिवर्तन   जायज मान भी  लिया जाएपर विद्रोह के नाम पर स्त्री सुलभ लज्जा का त्याग एक अपूरणीय सामाजिक क्षति है ।                      
अपर्णा: वो स्वभाविक ही नहीं मेरी समझ से। आप उन्हें जूडो सिखाओ और उम्मीद करो कि उनकी बॉडी लैंग्वेज नहीं बदलेगी.. असंभव है। भारत और ऐसे ही अन्य पारंपरिक सोच वाले देशों में तो फिर भी लड़कियाँ एक संतुलन साध लेती हैं।                      


 Rajendr Shivastav Ji: अलकनंदा जी की कविताएँ उनके स्वभाव अनुरूप सहज व  मुखर लगती हैं ।कहीं कोई दुराव-भटकाव नहीं।शब्द जाल से मुक्त,सीधे हृदयंगम होती है।
मन की बात करती कविताओं को हम तक पहुँचाने के लिये शरद जी धन्यवाद ।
ताई ,बहुत बहुत बधाई व धन्यवाद ।                      
प्रवेश सोनी :धन्यवाद शरद जी
आज ताई की कविताओं से  साकीबा  गुलजार है ।
मुझे ताई की कविताओं  का इन्तजार रहता है । इनके प्रतिक ,बिम्ब सरल होते हुए भी भाषाई शिल्प के साथ विशेष बन जाते है ।मारी जाती है चींटिया ...जो दिन में निकलती है ।अपने कर्म से प्रतिबद्ध चींटिया दिन में निकलती है बेख़ौफ़ और मारी जाती है ।अपराधी अँधेरे के संदेह के लाभ में आज़ाद है हमेशा ।अँधेरे और उजाले का प्रतिक गढ़ कर बड़ी सुंदर सी कविता ,जिसमें कोई विस्तृत वर्णन नही फिर भी गहन विस्तार समेटे हुए है ।यही तो कमाल है ताई की कलम का ।
पंचतारांकित होटल ...ताई शब्दों का उपयोग आपकी पारखी नज़र से कई बार गुजरता होगा ,तभी आप ऐसे शब्द उपयोग करती है ।साधारण कवि तो सीधे से  इंग्लिश हिंदी खिचड़ी बना कर फाइव स्टार होटल लिख देता ।सलाम
उम्र दराज होना ,जिम्मेदारियो को वहां करना ।काँच कीचुड़ियों के टुकड़े इमली के बीज कब उम्र का दामन छोड़ कर पकड़  लेते है जेवर, कपड़ो की अलमारियों की चाबियाँ ।
क्या इनमे ख़ुशी नही होती ,होती है पर  बदली बदली ।
हंसी बेवजह नही आती क्योंकि उम्रदराज़ हो जाती है वो भी ।
लड़कियों के जीवन का बदलाव बहुत सुहाया हालाँकि कविता बार बार उस लड़की को तलाश रही है जो दबी दबी हंसी से शर्म का आँचल ओढ़े अकेली अपने सपनो से बतियाती रहती थी ।वो लड़की अब अंतरिक्ष में उड़ रही है अपने सपनों के साथ ।

 शुभकामनाएं ताई
🙏💐💐💐💐                      
                   
Meena Sharma Sakiba: अलकनन्दा साने ,यानि कि ताई की कविताएँ कविताओं के गढ़ में किसी खूबसूरत इमारत की तरह ..गम्भीर किन्तु सरल भाषा के साथ कविता का हाथ कलम के साथ लिये  बढ़ती चींटियों को डर नहीं कि वे निर्दोष हैं ,किन्यु छल प्रपंच भरी दुनियाँ में मक्कारी की जीत और बेकसूर का सजा पाना आज के समय का बेबाक चित्र !
छोटी -छोटी कविताएँ और बड़े साल कि,मुझे माइक्रोवेव में पकते पकवान सा मत समझो/कि देखते रहे मेरा पकना,निर्लिप्त भाव से.......
( बिना दो-दो हाथ किये परास्त नहीं कर सकते )
बढ़ती उम्र की सीमाओं के घेरेकैसा बदलाव ले आते हैं,
,,मैं कहीं खो गई,सिर्फ छाया रह गई
धीरे-धीरे मैं उम्र दराज हो गई.
पीड़ा के स्वर मुखर हैं !
आधुनिकता के साथ आये बदलाव को इंगित करती कविता सहज ही आकर्षित करती उन लड़कियों को याद करती हैं और उस स्वप्न की तरह वर्णन ...उन लड़कियों के रूप-रंग आचरण का.जो मोहित करता है आज भी कवियत्री का मन.....उनकी सुधियों के झरोखे मन मोहते हैं !
सरल ,सुन्दर कथ्य के साथ कसा हुआ शिल्प प्रतीकों के माध्यम से खूब निखरा है...बधाई ताई एक सुन्दर वातावरण जेहन में उतारने के लिये. उत्तम प्रस्तुति हेतु शरद जी का आभार 🙏

 Sanjiv. sahity Ki Baat: ताई जी कविताएं अपनी बनक में बहुत खूबसूरत हैं । सधी हुई भाषा, मंजा हुआ शिल्प, गढी गई कविता परन्तु कुछ है जो न होने का अहसास करा रहा है।                      
                   
Manjusha Man: बहुत बहुत सुन्दर कविताएं हैं अलकनन्दा ताई की। सीधे मन को छूती हुई कविताओं को पढ़कर बहुत अच्छा लगा।                      
Aanand Krishn Ji: आप पूरा नाम आचार्य दिनेश नंदन तिवारी लिखते हैं न ? ऐसा याद आता है कि आपसे मिला हूँ ।                      
 Bhavna Sinha Sakiba: ताई को जन्म दिन  की  ढेरों बधाईयां/ शुभकामनाएँ।     🎂 🎈 आपकी सभी कविताएँ अद्भुत ,अनुपम है
और बेहद मुखर भी।
कहां गई  हाथों में  मुंह छिपा कर हंसने वाली लड़कियाँ  तो  बेमिसाल है।  सभी कविताएँ सामयिक और विचारणीय ।                      
 Saksena Madhu: ताई को जन्मदिन की पुनः बधाई
ताई मेरी प्रिय कवयित्री हैं ।उन्ही कीकई कविताएँ हूबहू याद नहीं पर भाव बहुत सारे याद हैं ।
उनकी कविताएँ घर से निकल कर समाज देश और दुनिया से जुड़ जाती है ।चींटी से बात शुरू करके एक बड़े वर्ग का प्रतिनिधित्व करती ये कविता सूक्ष्म से विराट की और ले जाती हैं ।कटाक्ष करती ये कविता सोच की दिशा को मोड़ देती है।
 ।दूसरी कविता ..... संघर्ष की बात करती है पर कठपुतली बन कर नहीं ।अपने अस्तित्व को बनाये रखकर जीवन के हर संघर्ष में साथ की बात करती है ।
तीसरी कविता .".मैं कही खो गई सिर्फ छाया रह गई " कह कर पूरे जीवन की पीड़ा ,संधर्ष ,सोच और समझ रख दी हो मानो ....जीवन के परिवर्तन को जीवन्त कर दिया ..
भोली जैसी मासूम लडकिया इसलिए नहीं की उनके भोलेपन ने ही छला है ।अपने भोलेपन का चोला उतार कर फेंकने का वक़्त आ गया ...अब वो भी जियेगीं बिंदास ...और मैं इसके  समर्थ में हूँ ।

ताई की कविताएँ सरल बातो से गूढ़ बात तक पहुंच कर चमत्कार करती है ।
उनकी दो कविताये " ठीक हूँ मैं "
और "बेटा धीरे " मेरी प्रिय कविताएँ है ।
बधाई और शुभकामनाएं ।
आभार शरद जी ।                      
   
             
 Mani Mohan Ji: ताई की कविताई पर क्या लिखुँ ..पहले भी पढ़ा है उन्हें , हर बार उनकी कविता चौंकाती है - अपने कथ्य , नए नए प्रतीक और भाषिक ताजगी से ...पुनः बधाई ।                      

💐                      
 Dinesh Mishra Ji: आदरणीय ताई
जन्मदिन की एक बार और मुबारकबाद, आप जैसी पारंपरिक और विदुषी महिला को जितनी बार मुबारकबाद दी जाए कम है।
आपकी कवितायें तीनों अच्छी लगीं, पहली कविता हमे जैसे हाथ पकड़कर सोच की नई दिशा की और ले जाने का अहसास कराती है, दूसरी कविता यक़ीनन अनूठी है, जिसमे स्त्री अपने प्रति होने वाले चतुराई से भरे शोषण और दुर्व्यवहार करने वाले और इसके मज़े लेने वालों लोगों के ख़िलाफ़ एक परचम है, एक प्रतिशोध है जो आवश्यक है।
तीसरी कविता एक पारंपरिक महिला के आज के प्रदर्शन और दिखावे का पर्दाफ़ाश करती हुई कवितायें हैं, जो अपने उस गुज़रे कल को याद करती हैं, जो निश्छल और निष्पाप थे।
कुल मिलाकर अच्छी सोच से भरपूर कविताएं आज पढ़ने मिली।                      
                 
 Ravindra Swapnil: साने में आपकी कवियन अच्छी लगीं। बेहद मार्मिक। अपने आसपास को ईमानदारी से लिखा। लेकिन पंचतरंकित होटल थोड़ा भरी है।                      
 HarGovind Maithil Ji Sakiba: ताई की कविताओं पर टिप्पणी करना मेरे लिए सूरज को दिया दिखाने के समान है ।यह तो ताई के शिल्प कौशल का कमाल है कि जो उनकी कविताओं के अर्थ, भाव और संवेदना को सघन, संप्रेषणीय और प्रभावी बनाता है ।
आ. ताई और शरद जी का आभार ।

डॉ दिनेश जी  ताई को जन्म दिन  की  बहुत बहुत शुभकामनाएं और  बधाईयांएँ   💐🎂 🎈 आपकी सभी कविताएँ सामयिक और विचरणीय हैं । कोई भी कह सकता है ये शिल्पगत  अद्भुत ,अनुपम
और कथ्यगत बेहद मुखर कविताएँ हैं ।
कहां गई  हाथों में  मुंह छिपा कर हंसने वाली लड़कियाँ  और  धीरे धीरे मैं उम्रदराज हो गई  बेमिसाल है।  वैसे सभी कविताएँ अच्छी लगीं । ताई का अनुभव उनके लेखन में साफ झलकता है ।                      
                       
Komal Somrwaal: ताई की कवितायें अद्भुत.. ऐसा लगा मानो समकालीन श्रेष्ठ्म कवियों में से एक की रचनाएँ पढ़ रही हूँ। शब्द सीमित है मेरे शब्दकोश में प्रशंसा के किन्तु पाठक के ह्रदय से सीधा संवाद करती कवितायें👌🏻👌🏻👌🏻                      
 Suren: अंतिम कविता (चौथी)अलकनंदा जी की पर एक पाठकीय प्रतिक्रिया दर्ज करना  चाहूंगा कि इस कविता का मोटिव पाठक के समक्ष किस भांति उतरेगा ..


*  क्या वह (मोटिव) उस लड़की की स्मृति का नोस्टाल्जिया होगा  जो तुलसी चौरा पर दीपक  रखती हुई मासूम दिखती है । ऐसी  ही लड़की संभवतः  सती माता के चौरे पर भी अर्चना करती हुई मासूमियत प्रक्षेपित  करेगी ।


*   इस नोस्टाल्जिया की वर्थ क्या होनी चाहिए या क्या है ...इसका परिशीलन आवश्यक प्रतीत होता  है क्योंकि कविता के अंत तक आते आते कवि उस मासूमियत पर फ़िदा प्रतीत होता है


*  अगर ये मासूमियत के प्रति ये आग्रह  पित्रसत्तात्मक नही है तो कविता के पुनर्पाठ में क्यों उभर रहा है ।


*  कवि अपने मोटिव में हो सकता है स्पष्ट हो पर पाठक तक न पहुँच पा रहा हो ,क्या ये मसला सिर्फ संप्रेषणीयता का ही है या कवि की विचारधारा का या कुछ और ?



अलकनंदा जी के उत्तर की प्रतीक्षा रहेगी । 💐💐                      
 Aalknanda Sane Tai: धन्यवाद संजीव जी, वह "कुछ" पाठक को ढूंढना है ।

धन्यवाद मंजूषा ,भावना, मधु जी

धन्यवाद मणि जी, इन दिनों आप दुर्लभ हो गए हैं ।

दिनेश जी आपने बहुत विस्तार से लिखा, अच्छा लगा, लेकिन आज मेरी 4 कविताएं हैं ।

धन्यवाद, रविन्द्र जी ! हिंदी के शब्द अक्सर हम कठिन या भारी कहकर प्रयोग में नहीं लाते और इसी वजह से वे प्रचलित नहीं हो पाते ।

हरगोंविद जी, धन्यवाद । मैं आप सभी की तरह हूं, आप ही के बीच की हूं । सूरज तो बहुत दूर होता है ।

धन्यवाद ,आभा जी ! कम शब्दों में आपने बहुत कुछ कह दिया है ।

सभी का एक बार फिर धन्यवाद, आभार । 🙏
अपर्णा, सुरेन जी, मोहन जी, पीयूष से निष्पक्ष प्रतिक्रिया की उम्मीद थी ।

आजकल डॉक्टर को कुछ कहती हूं तो वह हर बार एक ही बात कहते हैं -- अब उम्र के हिसाब से यह तो होगा । सबके द्वारा सिर्फ तारीफ की वजह भी मैं यही मानती हूं वर्ना कुछ कमी तो निकलती ।                      


Anita manda :ताई की सभी कविताएँ बेहद अच्छी लगी, पर उम्रदराज वाली बेहद बेहद अच्छी लगी

                       
अपर्णा: पहली नज़र में चारों कविताओं के बारे में एक कॉमन बात जो उभरती है वह है इनका हाशिए के स्वर की कविता होना। चाहे चींटी के प्रतीक में आम इन्सान हो, आम घरेलु महिला हो, उम्रदराज़ होने की अनुभूति हो या स्मृति की यवनिका से झांकती लजालू मासूम कन्या हो।
इन सभी कविताओं का स्वर कवि की सिग्नेचर शैली में ही है। निःसंकोच और स्पष्ट रूप से अपनी बात कहती हुई।

पहली कविता एक तंज़ मिश्रित व्यथा पर ख़त्म होती है जब शक्ति रसूख के बल पर बड़े अपराधी बच निकलते हैं और एक आम इंसान के लिए वही कानून बेड़ियाँ ले आती है। संदेह का लाभ उठाकर... बहुत सही चोट है लचर व्यवस्था पर।

दूसरी कविता के तेवर बहुत अलग से हैं। यहाँ दोहरा विमर्श है। इसकी स्त्री साफ जानती है कि वो मैनिप्यूलेट हो रही है। ये awareness भी पहली सीढ़ी बन सकती है उसके evolution में। पर यहाँ भी वह चाह रही है संलग्नता, जुड़ाव। ये बहुत रोचक चरित्र या दशा है। यहाँ तनिक सा स्टॉकहोम सिंड्रोम तनिक सा क्रोध तनिक सी खीज भी है जो इसे एक वास्तविक चरित्र बना रही। ये अक्सर कथा में होता है। कविता अधिकतर एक आदर्श स्थिती के आस-पास रहना चाहती है। this woman is clearly a work in progress..

तीसरी कविता विशिष्ट है अपने विषय के लिए। इस थमते, रुकते, चुप पड़ते स्वर को कविताओं का विषय बनते कम देखा है। बहुत ग्रेसफुली इसे निभाया है आपने। बस एक पाठक का आग्रह समझें कि अंतिम पंक्तियों की निराशा तोड़ एक ओजस्वी स्वर उभरे। जहाँ जीवन उम्र की सीमाओं को नई परिभाषा दे।

चौथी कविता नॉस्टैलजिया का उत्सव मना रही। अब न वो लड़कियाँ रहीं न वैसी लाज से दोहरी पड़ती दुल्हनें। वो सौंदर्य अनूठा था। पर उस में उनकी जीवन भर का marginalisation छुपा था। कविता निश्पक्छता से ये संतुलन बनाए चलती है जो एकदम से अंतिम पंक्तियों में बिखर सा जाता है। यहाँ नॉस्टैलजिया भारी पड़ती सी दिखती है।

आपकी साफ़गोई को सलाम मैम। रचनाकर्म के लिए मेरी शुभकामनाएँ। प्रणाम। 🙏🏽                      
 Dr Dipti Johri Sakiba: अलकनंदा जी की अच्छी कवितायेँ  जैसा की ब्रज जी ने कहा कि कवितायेँ भेदक है और अनोखे शिल्प में ढली हैं एक ऐसा शिल्प जो पाठकीयता का मित्र है ।

चौथी कविता ....कहाँ गयी वो लड़कियां!

ये प्रश्न है या एक उच्छ्वास ....इसी में समस्त स्त्री अस्मिता के संघर्ष गुंथे हुए है । इस छुई मुई सी लड़की का स्वप्न बनाये रखने बल्कि उसको एक सामाजिक आदर्श का व्यामोह बनाये रखने  में समस्त पितृसत्तात्मकता प्रारम्भ से जुटी है।

यदि ये नास्टेल्जिया भी हो तो ये आग्रह स्त्री छवि के  अधीनता के मानकीकरण की दिशा में है .....इस कविता में उस नास्टेल्जिया के प्रति झुकाव तो स्पष्ट दृष्टिगोचर  हो ही रहा है। ये मुझे एक पाठक के तौर पर अपने पाठ में प्रतीत हुआ ।

अलकनंदा जी को शुभकानाएं 🙏🏼                      
 Aalknanda Sane Tai: सुरेन जी आपकी पाठकीय उत्सुकता का क्रमवार परिशीलन ---

१.  क्या वह (मोटिव) उस लड़की की स्मृति का नोस्टाल्जिया होगा  जो तुलसी चौरा पर दीपक  रखती हुई मासूम दिखती है । ऐसी  ही लड़की संभवतः  सती माता के चौरे पर भी अर्चना करती हुई मासूमियत प्रक्षेपित  करेगी ।

मैं किसी परम्परा या रूढ़ी का समर्थन नहीं कर रही हूँ.इसे नोस्ल्टेजिया कहा जा सकता है, लेकिन कुल कविता में मैं यह कहना चाहती हूँ कि लड़कियां आगे बढ़ रही हैं, बढ़ गईं हैं. अच्छा ही लगता है,लेकिन उनकी मासूमियत कहीं खो गईं है.एक रूक्षता, कठोरता उनके चेहरे पर दिखाई देती है.जो  उनको आधुनिक समाज की देन है.

२.इस नोस्टाल्जिया की वर्थ क्या होनी चाहिए या क्या है ...इसका परिशीलन आवश्यक प्रतीत होता  है क्योंकि कविता के अंत तक आते आते कवि उस मासूमियत पर फ़िदा प्रतीत होता है

बिलकुल होना चाहिए. इस कविता के परे न सिर्फ लड़कियों में बल्कि हरेक में मासूमियत होना चाहिए.उसीसे व्यक्तित्व में सरलता, निच्छलता आती है.ऐसा मेरा दॄढ विश्वास है.

३ अगर ये मासूमियत के प्रति ये आग्रह  पित्रसत्तात्मक नही है तो कविता के पुनर्पाठ में क्यों उभर रहा है ।

ये पितृसत्ता के विरोध में ही है.पुरूष सत्ता और पुरूष तथा पुरूष के समर्थन की मानसिकता ने उनकी मासूमियत छीन ली है.

४.कवि अपने मोटिव में हो सकता है स्पष्ट हो पर पाठक तक न पहुँच पा रहा हो ,क्या ये मसला सिर्फ संप्रेषणीयता का ही है या कवि की विचारधारा का या कुछ और ?

विचारधारा तो मेरी जो है , सो है.कोई उससे सहमत हो सकता है अन्य कोई नहीं भी हो सकता.पाठक तक न पहुँच पाने के कई कारण हो सकते हैं, उनमें से एक स्वयं उसकी समझ भी हो सकती है.                      
Suren: अच्छी टीप ..   मार्जिनेलाईजेशन का और स्टॉकहोम सिंड्रोम को युक्तियुक्त तरह से  उपयोग किया ,..

 Suren: जी अलकनंदा जी , सतीमाता के चौरे पर भी वही मासूमियत प्रक्षेपित  होती हो जैसा की तुलसी चौरे वाली मासूमियत से अपेक्षित है तो वह भी उसी नॉस्टेलजिया के तहत संरक्षित किये जाने योग्य पाएंगे क्या हम


मासूमियत होनी चाहिए या बची रहनी चाहिए ,ये अच्छी बात है पर किस कीमत पर ? या यूँ कह किे उन्ही प्रतीकों से जो अपनी संरचना में पितृसत्ता वादी है ?

पित्रसत्ता के विरोध में है या हो सकती है  ..ये प्रकट भी या परिलक्षित भी होना चाहिए और संप्रेषित भी .... यहाँ नही हो रहा क्योंकि जो प्रतीक कविता में लिए गए वे अपनी संरचना या क्रोड में पित्रसत्ता वादि है ।                      
Aalknanda Sane Tai: अपर्णा, चौथी कविता के बारे में तो मैंने  सुरेन जी के लिए जो लिखा है, वही जवाब है. तीसरी कविता की थोड़ी पृष्ठभूमि बताती हूँ. हँसी तो मुझे अब भी बहुत आती है,पर पहले मेरा  गुस्सा भी तेज था.वह अब कम हो गया है.इस पर एक बार परिवार में बात चली. क्योंकि उम्र के लिहाज से हँसी तो कई बार दबाना ही पड़ती है,पर गुस्सा भी कम हुआ तो सब कहने लगे --तू बहुत बदल गई.कुनबे की बहुओं को तो विश्वास ही नहीं होता कि मेरा गुस्सा कभी तेज हुआ करता था. अत: अंतिम पंक्ति उसीका प्रतिबिम्ब है.बदलने की कोशिश करुँगी. विस्तृत टिप्पणी के लिए धन्यवाद.                      
                       
Aalknanda Sane Tai: मैं सामान्यतया मराठी कविताएं अलग और हिंदी अलग लिखती हूँ.क्योंकि दोनों भाषाओँ में विचार आते हैं.लेकिन ये कविता मेरी मूल मराठी कविता का अनुवाद है.मराठी कविता न केवल बेहद पसंद की जाती है, बल्कि इसी वर्ष पुणे में हुए अ. भा. मराठी साहित्य सम्मेलन में करीब ५० हजार लोगों ने खड़े होकर इस कविता को सलामी दी और लगभग हर कवि सम्मेलन में इसकी फरमाइश होती है.यह सब जाननेवाले एक कवि मित्र ने हिंदी अनुवाद की सलाह दी . हो सकता है अनुवाद की वजह से कुछ गड़बड़ी हो और हिंदी पाठक तक वह सम्प्रेषित नहीं हो पा रही हो.                      
                 
 Ajay Shreevstav Ji Sakiba: अलकनंदा जी
आप की उम्दा कविताओं के लिए हार्दिक बधाई ..



एक गीत है योगेश का ...

रजनीगंधा फूल तुम्हारे ...

इस गीत में एक लाइन है

कितना सुख है बंधन में ...

ये है सिंड्रोम

अर्थात जब शोषित , शोषक से अपना सम्बन्धीकरण कर ले या कहे वो उस शोषण को भी   एन्जॉय करने लगे या कहे उस शोषण से स्वयं का तदात्मिकरन कर ले  या उस में ही अपना हेडोनिजम  ढूंढ ले या अपने मूल्यों को उसी दिशा में प्रतिस्थापित कर दे                      
                   
 अपर्णा: Stockholm syndrome एक घटना की वजह से गढ़ी गई जब एक लड़की को अपने ही अपहरणकर्ता से सम्मोहन के हद तक प्रेम हो गया था और वो  अपने परिजनों के विरुद्ध उसका साथ दे रही थी। उसकी उस मानसिकता को ये नाम दिया गया।                      


 साहित्य सम्मेलन,"साहित्य की बात" 17-18 september 2022 साकिबा  साकीबा रचना धर्मिता का जन मंच है -लीलाधर मंडलोई। यह कहा श्री लीलाधर...

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