Wednesday, May 11, 2016


कहानी :---ठंडा गोष्त
लेखक :--- सआदत हसन मंटो 




आज ११ मई को प्रख्यात उर्दू के लेखक ,श्रेष्ठ कथाओं खोल दो ,काली  सलवार ,बू ,तोबा टेकसिंह आदि के रचियता के जन्म दिन पर उनकी एक प्रसिद्द कहानी "ठंडा गोष्ट " आपके लिए 




ईश्वरसिंह ज्यों ही होटल के कमरे में दांखिला हुआकुलवन्त कौर पलंग पर से उठी। अपनी तेज-तेज आँखों से उसकी तरफ घूरकर देखा और दरवाजे की चिटखनी बन्द कर दी। रात के बारह बज चुके थे। शहर का वातावरण एक अजीब रहस्यमयी खामोशी में गर्क था।
कुलवन्त कौर पलंग पर आलथी-पालथी मारकर बैठ गयी। ईशरसिंहजो शायद अपने समस्यापूर्ण विचारों के उलझे हुए धागे खोल रहा थाहाथ में किरपान लेकर उस कोने में खड़ा था। कुछ क्षण इसी तरह खामोशी में बीत गये। कुलवन्त कौर को थोड़ी देर के बाद अपना आसन पसन्द न आया और दोनों टाँगें पलंग के नीचे लटकाकर उन्हें हिलाने लगी। ईशरसिंह फिर भी कुछ न बोला।
कुलवन्त कौर भरे-भरे हाथ-पैरों वाली औरत थी। चौड़े-चकले कूल्हे थुल-थुल करने वाले गोश्त से भरपूर। कुछ बहुत ही ज्यादा ऊपर को उठा हुआ सीनातेज आँखेंऊपरी होंठ पर सुरमई गुबारठोड़ी की बनावट से पता चलता था कि बड़े धड़ल्ले की औरत है।
ईशरसिंह सिर नीचा किये एक कोने में चुपचाप खड़ा था। सिर पर उसके कसकर बाँधी हुई पगड़ी ढीली हो रही थी। उसने हाथ में जो किरपान थामी हुई थी,उसमें थोड़ी-थोड़ी कम्पन थीउसके आकार-प्रकार और डील-डौल से पता चलता था कि वह कुलवन्त कौर जैसी औरत के लिए सबसे उपयुक्त मर्द है।
कुछ क्षण जब इसी तरह खामोशी में बीत गये तो कुलवन्त कौर छलक पड़ीलेकिन तेज-तेज आँखों को नचाकर वह सिर्फ इस कदर कह सकी''ईशरसियाँ!''
ईशरसिंह ने गर्दन उठाकर कुलवन्त कौर की तरफ देखामगर उसकी निगाहों की गोलियों की ताब न लाकर मुँह दूसरी तरफ मोड लिया।
कुलवन्त कौर चिल्लायी''ईशरसिंह!'' लेकिन फौरन ही आवांज भींच लीपलंग पर से उठकर उसकी तरफ होती हुई बोली''कहाँ गायब रहे तुम इतने दिन?''
ईशरसिंह ने खुश्क होठों पर जबान फेरी, ''मुझे मालूम नहीं।''
कुलवन्त कौर भन्ना गयी, ''यह भी कोई माइयावाँ जवाब है!''
ईशरसिंह ने किरपान एक तरफ फेंक दी और पलंग पर लेट गया। ऐसा मालूम होता थावह कई दिनों का बीमार है। कुलवन्त कौर ने पलंग की तरफ देखा,जो अब ईशरसिंह से लबालब भरा था और उसके दिल में हमदर्दी की भावना पैदा हो गयी। चुनांचे उसके माथे पर हाथ रखकर उसने बड़े प्यार से पूछा''जानीक्या हुआ तुम्हें?''
ईशरसिंह छत की तरफ देख रहा था। उससे निगाहें हटाकर उसने कुलवन्त कौर ने परिचित चेहरे की टटोलना शुरू किया''कुलवन्त।''
आवांज में दर्द था। कुलवन्त कौर सारी-की-सारी सिमटकर अपने ऊपरी होंठ में आ गयी, ''हाँजानी।'' कहकर वह उसको दाँतों से काटने लगी।
ईशरसिंह ने पगड़ी उतार दी। कुलवन्त कौर की तरफ सहारा लेनेवाली निगाहों से देखा। उसके गोश्त भरे कुल्हे पर जोर से थप्पा मारा और सिर को झटका देकर अपने-आपसे कहा, ''इस कुड़ी दा दिमांग ही खराब है।''
झटके देने से उसके केश खुल गये। कुलवन्त अँगुलियों से उनमें कंघी करने लगी। ऐसा करते हुए उसने बड़े प्यार से पूछा, ''ईशरसियाँकहाँ रहे तुम इतने दिन?''
''बुरे की मां के घर।'' ईशरसिंह ने कुलवन्त कौर को घूरकर देखा और फौरन दोनों हाथों से उसके उभरे हुए सीने को मसलने लगा''कसम वाहे गुरु कीबड़ी जानदार औरत हो!''
कुलवन्त कौर ने एक अदा के साथ ईशरसिंह के हाथ एक तरफ झटक दिये और पूछा, ''तुम्हें मेरी कसमबताओ कहाँ रहे?शहर गये थे?''
ईशरसिंह ने एक ही लपेट में अपने बालों का जूड़ा बनाते हुए जवाब दिया, ''नहीं।''
कुलवन्त कौर चिढ़ गयी, ''नहींतुम जरूर शहर गये थेऔर तुमने बहुत-सा रुपया लूटा हैजो मुझसे छुपा रहे हो।''
''वह अपने बाप का तुख्म न होजो तुमसे झूठ बोले।''
कुलवन्त कौर थोड़ी देर के लिए खामोश हो गयीलेकिन फौरन ही भड़क उठी, ''लेकिन मेरी समझ में नहीं आता उस रात तुम्हें हुआ क्या?अच्छे-भले मेरे साथ लेटे थे। मुझे तुमने वे तमाम गहने पहना रखे थेजो तुम शहर से लूटकर लाए थे। मेरी पप्पियाँ ले रहे थे। पर जाने एकदम तुम्हें क्या हुआउठे और कपड़े पहनकर बाहर निकल गये।''
ईशरसिंह का रंग जर्द हो गया। कुलवन्त ने यह तबदीली देखते ही कहा, ''देखाकैसे रंग पीला पड़ गया ईशरसियाँकसम वाहे गुरु कीजरूर कुछ दाल में काला है।''
''तेरी जान कसमकुछ भी नहीं!''
ईशरसिंह की आवांज बेजान थी। कुलवन्ता कौर का शुबहा और ज्यादा मजबूत हो गया। ऊपरी होंठ भींचकर उसने एक-एक शब्द पर जोर देते हुए कहा, ''ईशरसियाँक्या बात हैतुम वह नहीं होजो आज से आठ रोज पहले थे।''
ईशरसिंह एकदम उठ बैठाजैसे किसी ने उस पर हमला किया था। कुलवन्त कौर को अपने मजबूत बाजुओं में समेटकर उसने पूरी ताकत के साथ झ्रझोड़ना शुरू कर दिया, ''जानीमैं वहीं हूंघुट-घुट कर पा जफ्फियाँतेरी निकले हड्डाँ दी गर्मी।''
कुलवन्त कौर ने कोई बाधा न दीलेकिन वह शिकायत करती रही, ''तुम्हें उस रात या हो गया था?''
''बुरे की मां का वह हो गया था!''
''बताओगे नहीं?''
''कोई बात हो तो बताऊँ।''
''मुझे अपने हाथों से जलाओअगर झूठ बोलो।''
ईशरसिंह ने अपने बाजू उसकी गर्दन में डाल दिये और होंठ उसके होंठ पर गड़ा दिए। मूँछों के बाल कुलवन्त कौर के नथूनों में घुसेतो उसे छींक आ गयी। ईशरसिंह ने अपनी सरदी उतार दी और कुलवन्त कौर को वासनामयी नंजरों से देखकर कहा, ''आओ जानीएक बाजी ताश की हो जाए।''
कुलवन्त कौर के ऊपरी होंठ पर पसीने की नन्ही-नन्ही बूंदें फूट आयीं। एक अदा के साथ उसने अपनी आँखों की पुतलियाँ घुमायीं और कहा, ''चलदफा हो।''
ईशरसिंह ने उसके भरे हुए कूल्हे पर जोर से चुटकी भरी। कुलवन्त कौर तड़पकर एक तरफ हट गयी, ''न कर ईशरसियाँमेरे दर्द होता है!''
ईशरसिंह ने आगे बढ़कर कुलवन्त कौर की ऊपरी होंठ अपने दाँतों तले दबा लिया और कचकचाने लगा। कुलवन्त कौर बिलकुल पिघल गयी। ईशरसिंह ने अपना कुर्ता उतारकर फेंक दिया और कहा, ''तो फिर हो जाए तुरप चाल।''
कुलवन्त कौर का ऊपरी होंठ कँपकँपाने लगा। ईशरसिंह ने दोनों हाथों से कुलवन्त कौर की कमींज का बेरा पकड़ा और जिस तरह बकरे की खाल उतारते हैं,उसी तरह उसको उतारकर एक तरफ रख दिया। फिर उसने घूरकर उसके नंगे बदन को देखा और जोर से उसके बाजू पर चुटकी भरते हुए कहा''कुलवन्त,कसम वाहे गुरु की! बड़ी करारी औरत हो तुम।''
कुलवन्त कौर अपने बाजू पर उभरते हुए धŽबे को देखने लगी। ''बड़ा जालिम है तू ईशरसियाँ।''
ईशरसिंह अपनी घनी काली मूँछों में मुस्काया, ''होने दे आज जालिम।'' और यह कहकर उसने और जुल्म ढाने शुरू किये। कुलवन्त कौन का ऊपरी होंठ दाँतों तले किचकिचायाकान की लवों को काटाउभरे हुए सीने को भँभोडाभरे हुए कूल्हों पर आवांज पैदा करने वाले चाँटे मारेगालों के मुंह भर-भरकर बोसे लियेचूस-चूसकर उसका सीना थूकों से लथेड़ दिया। कुलवन्त कौर तेंज आँच पर चढ़ी हुई हांड़ी की तरह उबलने लगी। लेकिन ईशरसिंह उन तमाम हीलों के बावजूद खुद में हरकत पैदा न कर सका। जितने गुर और जितने दाँव उसे याद थेसबके-सब उसने पिट जाने वाले पहलवान की तरह इस्तेमाल कर दिये,परन्तु कोई कारगर न हुआ। कुलवन्त कौर के सारे बदन के तार तनकर खुद-ब-खुद बज रहे थे, गैरजरूरी छेड़-छाड़ से तंग आकर कहा, ''ईश्वरसियाँकाफी फेंट चुका हैअब पत्ता फेंक !''
यह सुनते ही ईशरसिंह के हाथ से जैसे ताश की सारी गड्डी नीचे फिसल गयी। हाँफता हुआ वह कुलवन्त के पहलू में लेट गया और उसके माथे पर सर्द पसीने के लेप होने लगे।
कुलवन्त कौर ने उसे गरमाने की बहुत कोशिश कीमगर नाकाम रही। अब तक सब कुछ मुंह से कहे बगैर होता रहा थालेकिन जब कुलवन्त कौर के क्रियापेक्षी अंगों को सख्त निराशा हुई तो वह झल्लाकर पलंग से उतर गयी। सामने खूँटी पर चादर पड़ी थीउसे उतारकर उसने जल्दी-जल्दी ओढ़कर और नथुने फुलाकर बिफरे हुए लहजे में कहा, ''ईशरसियाँवह कौन हरामजादी हैजिसके पास तू इतने दिन रहकर आया है और जिसने तुझे निचोड़ डाला है?''
कुलवन्त कौर गुस्से से उबलने लगी, ''मैं पूछती हूंकौन है वह चड्डोहै वह उल्फतीकौन है वह चोर-पत्ता?''
ईशरसिंह ने थके हुए लहजे में कहा, ''कोई भी नहीं कुलवन्तकोई भी नहीं।''
कुलवन्त कौर ने अपने उभरे हुए कूल्हों पर हाथ रखकर एक दृढ़ता के साथ कहा''ईशरसियाँ! मैं आज झूठ-सच जानकर रहूँगीखा वाहे गुरु जी की कसमइसकी तह में कोई औरत नहीं?''
ईशरसिंह ने कुछ कहना चाहामगर कुलवन्त कौर ने इसकी इजाजत न दी,
''कसम खाने से पहले सोच ले कि मैं भी सरदार निहालसिंह की बेटी हूं तक्का-बोटी कर दूँगी अगर तूने झूठ बोलालेअब खा वाहे गुरु जी की कसमइसकी तह में कोई औरत नहीं?''
ईशरसिंह ने बड़े दु:ख के साथ हाँ में सिर हिलाया। कुलवन्त कौर बिलकुल दीवानी हो गयी। लपककर कोने में से किरपान उठायी। म्यान को केले के छिलके की तरह उतारकर एक तरफ फेंका और ईशरसिंह पर वार कर दिया।
आन-की-आन में लहू के फव्वारे छूट पड़े। कुलवन्त कौर को इससे भी तसल्ली न हुई तो उसने वहशी बिल्लियों की तरह ईशरसिंह के केश नोचने शुरू कर दिये। साथ-ही-साथ वह अपनी नामालूम सौत को मोटी-मोटी गालियाँ देती रही। ईशरसिंह ने थोड़ी देर बाद दुबली आवांज में विनती की, ''जाने दे अब कुलवन्तजाने दे।''
आवांज में बला का दर्द था। कुलवन्त कौर पीछे हट गयी।
खून ईशरसिंह के गले में उड़-उड़ कर उसकी मूँछों पर गिर रहा था। उसने अपने काँपते होंठ खोले और कुलवन्त कौर की तरफ शुक्रियों और शिकायतों की मिली-जुली निगाहों से देखा।
''मेरी जानतुमने बहुत जल्दी कीलेकिन जो हुआठीक है।''
कुलवन्त कौर कीर् ईष्या फिर भड़की, ''मगर वह कौन हैतेरी मां?''
लहू ईशरसिंह की जबान तक पहुँच गया। जब उसने उसका स्वाद चखा तो उसके बदले में झुरझुरी-सी दौड़ गयी।
''और मैं...और मैं भेनी या छ: आदमियों को कत्ल कर चुका हूंइसी किरपान से।''
कुलवन्त कौर के दिमाग में दूसरी औरत थी''मैं पूछती हूं कौन है वह हरामजादी?''
ईशरसिंह की आँखें धुँधला रही थीं। एक हल्की-सी चमक उनमें पैदा हुई और उसने कुलवन्त कौर से कहा, ''गाली न दे उस भड़वी को।''
कुलवन्त कौर चिल्लायी, ''मैं पूछती हूंवह कौन?''
ईशरसिंह के गले में आवांज रुँध गयी''बताता हूं,'' कहकर उसने अपनी गर्दन पर हाथ फेरा और उस पर अपनी जीता-जीता खून देखकर मुस्कराया, ''इनसान माइयाँ भी एक अजीब चीज है।''
कुलवन्त कौर उसके जवाब का इन्तजार कर रही थी, ''ईशरसिंहतू मतलब की बात कर।''
ईशरसिंह की मुस्कराहट उसकी लहू भरी मूँछों में और ज्यादा फैल गयी, ''मतलब ही की बात कर रहा हूंगला चिरा हुआ है माइयाँ मेराअब धीरे-धीरे ही सारी बात बताऊँगा।''
और जब वह बताने लगा तो उसके माथे पर ठंडे पसीने के लेप होने लगे, ''कुलवन्त ! मेरी जानमैं तुम्हें नहीं बता सकतामेरे साथ क्या हुआ?इनसान कुड़िया भी एक अजीब चीज हैशहर में लूट मची तो सबकी तरह मैंने भी इसमें हिस्सा लियागहने-पाते और रुपये-पैसे जो भी हाथ लगेवे मैंने तुम्हें दे दियेलेकिन एक बात तुम्हें न बतायी?''
ईशरसिंह ने घाव में दर्द महसूस किया और कराहने लगा। कुलवन्त कौन ने उसकी तरफ तवज्जह न दी और बड़ी बेरहमी से पूछा, ''कौन-सी बात?'' ईशरसिंह ने मूँछों पर जमे हुए जरिए उड़ाते हुए कहा, ''जिस मकान पर...मैंने धावा बोला था...उसमें सात...उसमें सात आदमी थेछ: मैंने कत्ल कर दिये...इसी किरपान सेजिससे तूने मुझे...छोड़ इसे...सुन...एक लड़की थीबहुत ही सुन्दरउसको उठाकर मैं अपने साथ ले आया।''
कुलवन्त कौर खामोश सुनती रही। ईशरसिंह ने एक बार फिर फूँक मारकर मूँछों पर से लहू उड़ायाकुलवन्ती जानीमैं तुमसे क्या कहूँकितनी सुन्दर थीमैं उसे भी मार डालतापर मैंने कहा, ''नहीं ईशरसियाँकुलवन्त कौर ते हर रोज मजे लेता हैयह मेवा भी चखकर देख!''
कुलवन्त कौर ने सिर्फ इस कदर कहा, ''हूं।''
''और मैं उसे कन्धे पर डालकर चला दिया...रास्ते में...क़्या कह रहा था मैं...हाँरास्ते में...नहर की पटरी के पासथूहड़ की झाड़ियों तले मैंने उसे लिटा दियापहले सोचा कि फेंटूँफिर खयाल आया कि नहीं...'' यह कहते-कहते ईशरसिंह की जबान सूख गयी।
कुलवन्त ने थूक निकलकर हलक तर किया और पूछा, ''फिर क्या हुआ?''
ईशरसिंह के हलक से मुश्किल से ये शब्द निकले, ''मैंने...मैंने पत्ता फेंका...लेकिन...लेकिन...।''
उसकी आवांज डूब गयी।
कुलवन्त कौर ने उसे झिंझोड़ा, ''फिर क्या हुआ?''
ईशरसिंह ने अपनी बन्द होती आँखें खोलीं और कुलवन्त कौर के जिस्म की तरफ देखाजिसकी बोटी-बोटी थिरक रही थी''वह...वह मरी हुई थी...लाश थी...बिलकुल ठंडा गोश्त...जानीमुझे अपना हाथ दे...!''
कुलवन्त कौर ने अपना हाथ ईशरसिंह के हाथ पर रखा जो बर्फ से भी ज्यादा ठंडा था।

Thursday, May 5, 2016



आज वाटसअप  के "साहित्य की बात समूह"मुख्य एडमिन श्री ब्रज श्रीवास्तव  से , सुरेन्द्र रघुवंशी जी की कविताये ली  गई| जिनकी विशद चर्चा यहाँ प्रस्तुत है |









 पिरामिड में हम


पिरामिड के आधार पर हम हैं
अधिसंख्य कीड़े मकोड़ों की तरह लावारिश
रेंगते और टकराते हुए परस्पर अर्धमूर्छित से

दिशाहीन और कानों के कच्चे  सीधे- सच्चे
भूमि पुत्र हम धूल धूसरित अर्धनग्न तन
और महोदय आप हवा के पैरोकार हो
पिरामिड के शीर्ष पर गिने चुने
साफ़ सुथरे , उजले चिकने धुले पुछे

देश की बैंकों को लूटकर दिन दहाड़े
 नौं हज़ार करोड़ के डाके की रकम लेकर
हवाई जहाज में बैठकर भाग जाते हो विदेश
और हम घर और खेत की बिजली का बिल भी
न भर पायें तो जेल जाएँ अपराधी बनकर

हवा से तुम्हारा पुराना रिश्ता है
तुम आसमान में उड़ने वाले हवापुत्र हो
तुम सम्मानित और समरथ हो
दोषरहित तुम हम ही दोषी
जय हो जय हो जय हो

व्यवस्था के गठजोड़ से आनन्द विभोर हो
तुम मूतते हो पिरामिड के शीर्ष से
और खारेपन के उन छींटों को
ज़रूरी बताया जाता है हमारे उद्धार के लिए



                 बरगद आदमी

कहानी  बीजांकुरण से शुरू होती है
और इसे शुरूआत इसलिए कहेंगे
कि अपने अंकुरण के लिए बीज ने  वर्षों तक
तपती धूल में दबे रहकर भी
हारकर मरे बिना बरसात की प्रतीक्षा की है

फिर  संकल्प की धरती पर
बारिश को तो  होनी ही होती है देर सवेर
बीजांकुरण पौधे से मज़बूत पेड़ तक का
सफर  तय  करता है

आदमी बरगद है
जो दुनिया की धरती पर निरंतर फैलता है
समय के आकाश के नीचे
पल्लवित ,शाखाओं में विभक्त और विशाल

जर्जर होकर कहीं से ख़त्म होता है बरगद
पर ठीक उसी वक़्त होता है पुनर्जीवित भी
अपने तनों की लड़ियों को
पत्तियों के संसार से धरती की यात्रा कराता है
फिर समानांतर  कई तने विकसित करता है
यही स्वनिर्मित दुनियावी सहारे हैं
और अन्ततः यही हमें बचाते हैं

आदमी बरगद है
न रोपा जाता किसी बगीचे में
न सम्हाला जाता मालियों द्वारा
और न ही सुरक्षित रखने के लिए
किसी सुनियोजित  और चर्चित जल तंत्र  द्वारा
सींचा जाता उसे

पर वह स्थानांतरित होता है
एक तने से दूसरे तने में
एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में
और तना रूपांतरित होता है जड़ों में

यह ख़ुशी का चमकदार विषय है
कि आदमी बरगद है
बरगद है बिल्कुल आम और साधारण आदमी
इस हद तक बरगद
कि व्यवस्था की  तूफानों से
 गठबंधन कर चुकी षड्यंत्रकारी आँधी भी
उसको ध्वस्त नहीं कर सकती।


                 🅾 जब हिलते हैं पेड़


एक पैर पर खड़े होकर दिन- रात जागते हैं पेड़
वे रेंगते हैं धरती के भीतर अपनी जड़ों से
दौड़ते हैं बूँद-बूँद पानी  के पीछे
और ऊपर  आकाश से थमे रहने की अपील करते हैं

सोते नहीं हैं पेड़ कभी
कि हारे-थके पंक्षी लौट रहे हैं उड़ान से
जिनके लिए पेड़ों के पास मज़बूत कंधे हैं

पेड़ अनगिनित आँखों से देखते समय की क्रूरता
और धिक्कार में झरा देते हैं पीली पत्तियां

वे अपने फूल, फलों और छँव तक
सबको पहुंचने की आज़ादी देते हैं
और इसीलिए खड़े हैं खुले आसमान के नीचे

पतझड़ में खड़े रहते हैं दिगम्बर और  सूखे
पर समन्दर से पानी मांगने नहीं जाते
हाँ अपने स्वाभाविक हक़ के लिए
वे निसंकोच ललकारते हैं बादलों को

जब हिलती है धरती
तो सबसे पहले काँपकर आगाह कर देते हैं पेड़
और जब हिलते हुए झुकते हैं पेड़ एक कोंण से ज्यादा
तब आ जाता है भूकम्प
             

           

            🍀 शहर से बहिष्कृत


मेरा आगमन शहर की छाती पर
अतिक्रमण के पॉव थे
शहर की अनिच्छा जिसे असंगत बताती रही

काँच सी चिकनी सड़कें
मुझे इन्द्रपुरी की कथा की याद दिलाती थीं यहीं आकर सार्थक हो रहे थे
सफाई के विविध  नारे

मेरी मन की निर्मल झील को अनदेखा कर
फटी पुरानी कमीज़ को इंगित कर
लोग मुझे गन्दा कहे जा रहे थे

आँखों के द्रव्य को देखने वाली  दृष्टि
मर गई थी अल्पायु में ही
और लोग दृष्टि सम्पन्नता का पुरस्कार पा रहे थे

मैं शहर के स्वप्न लोक के
आकर्षक किस्से सुनकर
अपने खेत छोड़कर चला आया शहर मे
पर शहर खड़ा था तराजू लेकर
और मेरे पास कोई बजनी बाँट नहीं था

शहर मुझे धकिया रहा था
गरिया रहा था नाक भौहें सिकोड़कर
मैं भी शहर  से बाहर निकलने का रास्ता
तलाश रहा था  चौन्धयायी आँखों से
पर वह मुझे मिल नहीं पा रहा था|
               


🔴 तुमसे मिलते हुए


तुम्हें देखकर लगता है
कि दुनिया की चमक अभी कम नहीं हुई है
घिसे नहीँ हैं अभी भी विश्वास के सभी वर्तन
कि ख़ुशी होती है पर्वतों से भी ऊँची

हर बार तुम्हारी आँखों में उगते दिखाई देते हैं
उम्मीदों के अनन्त सूरज
जिनके साथ विचारों के सिन्दूरी आसमान में
तुम्हारी मुस्कुराहट का विस्तार है

तुम्हारे आगमन की खबर
खुशियों की नदी में बदल जाती है
तुमसे मिलना किसी साम्राज्य को प्राप्त कर लेना है

तुम्हारे मुलायम सुन्दर हाथों के स्पर्श से
हजारों अश्व शक्ति की ऊर्जा का संचार होता है
आभाव के गड्ढों को कौन देखता है
प्रेम में दौड़ते हुए लक्ष्य विहीन

विभाजन की दीवारों को ढहाते हुए
तुम गाती हो समता और सरसता के गीत
इस कोलाहल भरे विरुद्ध समय में
कानों को जिनकी सबसे ज्यादा ज़रूरत है
                     - सुरेन्द्र रघुवंशी



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प्रतिक्रियाये ::

[09:10, 5/5/2016] Aanand Krishn Ji: सुरेन्द्र जी की कविताएँ समय के साथ संवाद करती मुखर कवितायेँ हैं । पहली कविता पिरामिड में हम समकालीन घटनाओं के माध्यम से सर्वहारा की सर्वकालिक स्थितियों का ईमानदारी से चित्रण करती है । इस तरह यह कविता अपने समय का इतिहास भी है । 

दूसरी कविता "बरगद आदमी" चमत्कारी कविता है । ये कविता, कविता की अनंत संभावनाओं का क्षितिज खोलती है । आशा और अस्तित्व को नया बिम्ब देने में कवि सफल रहे हैं, "यह ख़ुशी का समझदार विषय है ।"

तीसरी कविता "जब हिलते हैं पेड़" पेड़ों के लिए एक जीवंत मन का अभिनन्दन पत्र है । ये कविता तो पाठ्यक्रम में होना चाहिए ।
[09:10, 5/5/2016] Aanand Krishn Ji: चौथी कविता एक धोखा खाये हुए सरल आदमी की पीड़ा है । इसे पढ़ते हुए एक शेर याद आया :

अब मैं राशन की दूकानों में नज़र आता हूँ ।
अपने खेतों से बिछड़ने की सज़ा पाता हूँ । 

पांचवीं कविता "तुमसे मिलते हुए" एक बेहतरीन प्रेम कविता है जिसमें नए प्रतीकों और रूपकों का सफलता पूर्वक प्रयोग हुआ है । बार बार पढ़ने योग्य कविता । 

सुरेन्द्र जी को बधाई । एडमिन जी के प्रति आभार ।



शरद कोकास
सुप्रभात मित्रों , आज कार्ल मार्क्स की जन्मजयन्ती पर आप सबको क्रन्तिकारी सलाम . संजीव ने बहुत अच्छे उद्धरणों से आज के दिन की शुरुआत की और रवीन्द्र ने बात आगे बढ़ाई , जैसा कि एडमिन महोदय ने कहा है हम इन पर रविवार को चर्चा करेंगे . आज साप्ताहिकी के अंतर्गत कॉमरेड सुरेन्द्र रघुवंशी की कविताओं पर बात की जाए . 

सुरेन्द्र की कविताओं में मनुष्य की चिंता के साथ परिवर्तन की चाह उभरकर आती है ,कला पक्ष गौण होने के बावजूद इनमे विचार अपनी पूरी ताकत के साथ आते हैं . बरगद का बिम्ब जिसे वर्ग विभाजन के अंतर्गत अब तक समर्थ और समृद्ध के सन्दर्भ में इस्तेमाल किया जाता था वे आम आदमी के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं . इस बात में विरोधाभास हो सकते हैं लेकिन बिम्बों को नए अर्थों में प्रस्तुत करना भी एक काव्यकला है . 
जब हिलते हैं पेड़ में उन्होंने पेड़ों को सजीव की तरह ही देखा है और इनमे भी नए बिम्ब इस्तेमाल करते है . गति सजीव का लक्षण है लेकिन दर्शन में इसे सजीव और निर्जीव की तरह समाज के सन्दर्भ में भी  परिभाषित किया गया है. कविता की अंतिम पंक्तियों में फिर विरोधाभास है .



[17:32, 5/5/2016] Saksena Madhu: पिरामिड में हम ..... कुछ दिन पहले हुई एक घटना को लेकर उसके मूल में पहुंच कर सियासी वरदहस्त पाये लोगों की खुल कर बात करती है ये कविता ....यही इसकी खासियत है ।अपने पुरे तल्खी पन  के साथ उन पर थप्पड़ मारती है जो इसमें शामिल हैं ..
. बरगद ... साधारण और आम आदमी की शक्ति का बयान करती है .बरगद और आम आदमी की तुलना बहुत बढ़िया तरीके से की ।
जब हिलते हैं  पेड़ .... पेड़ कवि का महत्वपूर्ण विषय है ..कई कविताएँ है उनकी ..प्रकृति प्रेम स्पष्ट है और उनके किसान परिवार का होने का सबूत भी ।हर कविता में वे उपमा उपमान और उपमेय के आधार पर आम आदमी की आवाज़ बन कर उभरते है ।
शहर से बहिष्कृत ..गांव से शहर की और पलायन और फिर पछतावा ... पर फिर भी जारी है पलायन ।वहां के आकर्षण से कोई बरी नहीं ।एक किसान की व्यथा ।
तुमसे मिलते हुए .... ऊपर की कठोर कविताओं के विपरीत प्रेम कविता  .. असल में तीखी कविताओं के मूल में भी प्रेम ही होता है और उसकी ऊर्जा भी ।
 सुरेन्द्र की कविताएँ विशवास और साहस से अपनी बात कहती है ।समग्र का विकास और गलत को गलत कहने के साहस के साथ मज़बूती से विरोध को स्वर देती है  । बधाई सुरेन्द्र ।
आभार एडमिन जी ।

[18:41, 5/5/2016] Chandrashekhar Ji: सुरेन्द्र जी की कविताओं में एक एक्टिविस्ट का  चिंतन स्पष्ट रूप से नज़र आता है। जब हिलते हैं पेड़ कमाल की कविता है।पिरामिड में खारे छींटे बहुत कड़वा सच है।सुरेन्द्र भाई को बहुत बधाई।

[18:58, 5/5/2016] +91 94240 74638: टुकडों में पढ़ पायी आज की कविताएँ ।पर अब बार बार पढ़ने को जी चाह रहा है । पहली कविता तो हाल ही में लिखी लगती है ,आज मार्क्स के जन्मदिन पर और सामयिक लगती है। दूसरी कविता आशावादी कविता है जो विश्वास को और मजबूत करती है , पेड़ पर लिखी कविता में बड़े ही खूबसूरत बिम्ब हैं साथ ही तंज भी ,अगली कविता आबदाना ढूंढते हर आम आदमी का सच है अंतिम कविता बहुत अच्छी है जो प्रेम की ताकत और उसकी महक को बखूबी पेश करती है।इस कविता को सहेज कर रखूंगी । वाह

[19:11, 5/5/2016] Archana Naidu: हर कविता अपना आसमान खुद ही बना लेता है,  सुरेश जी की रचनाओं ने   पेड़, पिरामिड, आदमी, तुमसे मिलते हुए,  जैसे आलंबनो  से  कविताओं की  आत्मा को रचा है,  सार्थक  प्रयास हेतु साधुवाद 😊

[20:31, 5/5/2016] +91 97820 45060: सुरेन्द्र जी की कवितायेँ एक आग्रह है बदलाव का ,वो ललकार भी बन जाती हैपेड़ के हिलने मात्र से । चेताती है की जब  तक पेड़ है धरा भी स्थिर है , प्रकृति के प्रेम को दर्शाती खूबसूरत कवितायेँ ।
शहर में बहिष्कृत है आज  धरती पुत्र क्या कुसूर उसका ,यही न की उसने अपने खेत  बिसराये और शहरी शिकंजे में फस गया ।बहुत ही मार्मिक विवेचन है इस कविता में गाँव और शहर की व्यवस्था का ।
बरगद है आदमी ,गहरे अर्थ है इसमें ,कविता वह लेजाती है जहाँ जाकर आदमी  अपने  यथार्थ से परिचय पाता है ,अद्भुद बिम्ब है इस कविता में ।
तुमसे मिलते हुए ,..कवि अपने प्रेमिल मन  के भावों को इस तरह की सरसता देता है की लगता ही नही की यही कवि पिरामिड जेसी कविता लिखकर आहत है ।
कवि का मन भावों का समन्दर होता है ,कब कोनसी लहर आकर उसे तट पर पछिट देती है की लो यह भाव साथ बहा लाइ अपने गहरे तल से  ,अब लिखों इस पर अपनी कविता ।
हमारे आज के कवि महोदय ऐसे ही सागर को समेटे रहते है अपने मन में ।और ऊपर से सहज,सरल व्यक्तित्व की आभा लिए हुए ।
शुभकामनाएं सुरेन्द्र जी 
🙏🌷
[20:41, 5/5/2016] Premchand Gandhi: सुरेन्द्र जी की प्रतिबद्धता जगज़ाहिर है और वह इन कविताओं में पूरी तरह से मुखरित हो रही है। बधाई।

[20:46, 5/5/2016] +91 97085 19884: आम आदमी , प्रकृति ,  प्रेम जैसे विषयों पर लिखी कविताएँ सामयिक  होने के साथ  इस निराश समय में आशावादी  कविता हैं।  सभी कविताएंड अपने आप मे  व्यापक अर्थ लिए है।  ऊर्जा और उम्मीद से लबरेज कविताओं के लिए सुरेन्द्र जी को बधाई  ।
साकीबा का आभार ।

[21:02, 5/5/2016] Suren: सुरेन्द्र जी की कवितायेँ  आग्रह की कवितायेँ है । इन कविताओं में कवि की जन पक्षधरता का आग्रह स्पष्ट है । कविताओ में एक विचारधारा विशेष का  वर्चस्व बढ़ चढ़ कर बोलता है ।  इस वैचारिक आग्रह के लिए कवि काव्य की तरलता और लोच को तिलांजलि देने के लिए भी तत्परता से प्रस्तुत रहता प्रतीत रहता है और सपाट बयानी से स्वयम को बवह नहीं पाता और ऐसा कोई प्रयास करने को भी उद्धत  होता प्रतीत नहीं होता ।   ....एक दो बात और , बरगद कविता में जब आदमी बरगद है तो वह अन्य बरगदो को अंततः कैसे बचाते है ,स्पष्ट नहीं हुआ । पेड़ कविता का अंतिम पैरा , क्या बाकि कविता के मोटिव से रेसेम्बलेंस करता है ? ये स्पष्ट नहीं हो पा रहा  । ओवरऑल अच्छी है कविताये  । बधाई सुरेन्द्र जी ,शुक्रिया ब्रज सर

[21:05, 5/5/2016] Suren: *प्रतीत होता है  । #स्वयं को बचा नहीं



Tuesday, May 3, 2016


कहानी ; बुआ  माँ 

प्रवेश सोनी 




प्रस्तुत कहानी" सहित्य् की बात " से ली गई है ।




निशा जरा जल्दी करो भाई ,मनोज ने मोज़े पहनते हुए किचन की और देखते हुए  कहा |मनोज की आवाज़ सुन कर अनमनी  निशा ने  हाथो को गति दी और ,टिफिन पेक करने लगी | मनोज किचन में आया और निशा के दोनों कंधो पर हाथ रख कर बोला “मेरे चाँद पर उदासी के बादल अच्छे नहीं लगते ,तुम चहकती गुनगुनाती हुई खाना बनाती हो तो सच बताऊ अगुलिया भी खाने का मन कर जाता है| “सुबह से वो कोशिश में लगा हुआ था की किसी तरह से निशा  नार्मल हो जाए | 

“अरे बाबा मुझे अभी तीन ट्रेफिक लाईटो को लाल से हरा होने की प्रक्रिया से गुजरना है |गाडियों की लम्बी लाइन मैराथन  करती हुई मिलती है ,जिसमे मुझे भी अपनी बाइक को हिस्सा बनाने की मस्सकत करनी पढ़ती है “|यह कहते हुए मनोज  ने निशा  का चेहरा अपनी और किया ,और उसकी नीली  गहरी आँखों में प्यार से देखा |आज आँखों की नीली झील में उदासी का  कंकर बार –बार गिर  कर गोल वृत बना रहा था |निशा उन वृत में आवृत हुई चुपचाप काम में जुटी हुई थी |उसने मनोज की और एक निस्पृह सी निगाह डाली और मुह फेर लिया |मनोज निशा को और परेशान नहीं करना चाहता था |उसने प्यार से निशा का ललाट चूमा और कहा “सब ठीक हो जाएगा ,हम  कल ही बुआ माँ  के पास चलेंगे |यह सुन कर निशा  के होंट तनिक से मुस्कराहट के आकार में फेल गए जिन्हें देख कर मनोज को कुछ राहत महसूस हुई ,और वो निशा से विदा लेकर आफिस रवाना हो गया | 

मनोज जानता है की निशा अपनी बुआ माँ को कितना प्यार करती  है |जब सुबह माँ का फोन आया तब से रोये जा रही है |इतना लगाव हो क्यों न ,बुआ माँ है ही ऐसी |शादी के वक्त जब कन्या दान के लिए माँ पिता जी  के साथ बुआ माँ ने भी निशा के हाथ के नीचे अपना हाथ रखा तो पंडित जी ने टोक दिया |कन्या दान की रस्म सिर्फ लड़की के माता पिता या उसके बड़े भाई भाभी ही निभा सकते है |यह सुन कर निशा ने बुआ माँ का हाथ कस के पकड़ लिया ,जिसे वो पंडित जी के कहने पर पीछे खीच रही थी |तब निशा के पिताजी  ने ही कहा की पंडित जी यह निशा की बुआ माँ है |इनकी ही बेटी की शादी है यह |तब पंडित जी ने मंत्रोचार करके कन्यादान की विधि पूरी की ,और निशा का हाथ  हमेशा के लिए मनोज के हाथ में दे दिया | 

दो साल हुए  शादी को ,इस अवधि में निशा ने बुआ माँ को अपनी बातो से मनोज के दिल और दिमाग में अच्छे से उतार दिया था |निशा और बुआ माँ के आपसी रिश्ते की डोर इतनी संवेदन शील थी की जिस रात जयपुर में बुआ माँ की तबियत ख़राब हुई उई रात  दिल्ली में निशा  ३ बजे गहरी नींद से जागकर अचानक सिसकने लगी |उसके सिसकने की आवाज़ सुन कर मनोज की नींद खुली तो उसने घबरा कर पूछा की क्या हुआ ? तुम्हारी तबियत तो ठीक है न ?बहुत पूछने पर निशा ने बताया की सपने में बुआ माँ उसका हाथ छोड़ कर दूर जा रही है |उसके पुकारने पर पीछे देख भी नहीं रही |मनोज ने अपना सर पकड लिया |किसी तरह समझाया की यह सपना है और सपने सच नही होते |तुम ऐसा करना कुछ दिन बुआ माँ के पास हो आना ताकि तुम्हारा मन ठीक हो  जाए |आधी रात को मनोज और कर भी क्या सकता था |वो कभी कभी निशा और बुआ माँ की बात को लेकर उकता जाता पर निशा का मन दुखी  न हो जाए यह सोच  कर उसकी बात को धीरज से सुन लेता | जेसे तेसे उसने निशा को सुलाया ,उसे भी जल्दी उठ कर  आफिस भागना होता है इस लिए नींद समय नुसार पूरी हो जाए तो ठीक रहेगा |सुबह वो उठे भी नहीं थे की निशा का  मोबाईल बज गया |उसने आँखे मलते हुए देखा तो माँ का फोन था |इतनी सुबह माँ कभी फोन करती ही नहीं ,क्या हुआ की आज  माँ को ....|हेल्लो हां माँ क्या हुआ ,नींद से  अपनी आँखों को आज़ाद करते हुए निशा ने माँ से पूछा | 

वो बेटा बुआ माँ को तेज चक्कर आये और गिर गई | हॉस्पिटल  में है वो ,|और अर्ध बेहोशी में तुझे पुकार रही है | यह सुनना था  की निशा सिसक पढ़ी और मनोज से कहने लगी ,देखो मेरा सपना सच हो गया मनोज  बुआ माँ हॉस्पिटल में एडमिट है ,पता नहीं क्या हो गया उन्हें | मनोज के पास क्या बचा अब कहने को |वो निशा को समझाता भी तो क्या |भगवान् ने उनके बीच सम्प्रेष्ण के तार बहुत तीव्र गति के रखे थे |” मै छुट्टी की बात करता  हू आज और हम  जल्दी से जल्दी बुआ माँ के पास चलते है |” यह कह कर मनोज  टावेल लेकर बाथरूम की और चल दिया | 

बुआ माँ बाल विधवा थी , अपना कहने के नाम पर एक छोटी बहिन थी जिसे उन्होंने पढ़ा लिखा कर शादी कर दी थी |शादी के बाद वो अपनी दुनिया में इस कदर मस्त हो गई की उन्हें बुआ माँ के अकेलेपन का कभी ख्याल ही नहीं आया |आता भी कैसे सुख की आँख को दुःख कब नज़र आया |बालिका स्कुल में एक पियोन की नौकरी करके अपना जीवन गुजारने वाली बुआ माँ अब उसे दे भी क्या सकती थी |कभी कभी वो अपने जीवन की वैभवता बताने कार से गावं आती भी तो जितने घंटे नहीं रूकती उससे ज्यादा  बाते तो बुआ माँ को सुना जाती | बुआ माँ उनके ठहरने की यथा संभव सुविधा करती पर उनके पास कमिया निकालने के  अलावा कुछ नहीं होता |  
बुआ माँ से  निशा के  पिता  का  दूर के  रिश्ते की बहन  का नाता  था  | लेकिन जब दिलो में अपना पन  और नजदीकियों का परिमाप सघन हो तो रिश्ते दूर के हो यह मायने नहीं रखता  | बुआ माँ उम्र में निशा के पिता जी से बहुत बड़ी थी ,माँ और पिताजी उन्हें  माँ समान आदर देते थे |निशा के जन्म के समय माँ  की देखभाल उन्होंने सगी बेटी की तरह की , और निशा तो उनके नीरस  जीवन में खुशियों और हर्षौल्लास  का बहार लेकर आई  |माँ से ज्यादा वो बुआ माँ के पास रहती उनसे खाना खाती ,खेलती और फिर कई बार कहानी सुनती सुनती उनके घर पर ही सो जाती |बुआ माँ का घर निशा के घर की बगल में ही था |बीच में एक दीवार भर का फासला जिसे निशा ने कभी फासला नहीं समझा | 3साल बाद निशा के छोटा भाई आया ,तब तक  निशा बुआ माँ की जान बन गई थी |वो स्कूल भी बुआ माँ  गोद में  जाती और सारे दिन स्कूल में ऐसे घूमती  रहती जेसे उसे कोई रोकने टोकने वाला नहीं हो |कोई  अध्यापिका भूल से उसे क्लास में बठने को कह भी देती तो वो दोड कर बुआ माँ के पीछे छुप जाती |टीचर कुछ नहीं कहती सिर्फ मुस्करा कर झूठी डाट का डर बताती ,जिसका असर तो कदापि नहीं होता |बुआ माँ भी कहती अभी बच्ची है पढ़ लेगी |स्कूल में भी बुआ माँ को सब सम्मान देते थे |उनकी पोस्ट उनके सम्मान में कभी आढे नहीं आई  | 

बुआ माँ के सीधे सरल जीवन में एक  मोड़ था ....रफीक  चाचा ,जो उनके घर के बाहर कपडे की दूकान लगाते थे |शुरुवाती 3०रुपये किराये में यह दुकान ली थी ,बुआ माँ के माता पिता ने सौदा किया हो शायद रफीक चाचा के पिता से |वो सौदा आज भी बरक़रार था |रफीक चाचा और बुआ माँ हम उम्र होने से बचपन में साथ साथ रहे |बुआ माँ पर 10 वर्ष की उम्र में ही शादी के तुरंत बाद वैधव्य का फाजिल गिर गया था |जिसे वो ठीक से समझ भी नहीं पाई |रूढिगत  माता पिता  को  भगवान् ने दुबारा सोचने का अवसर भी नहीं दिया और एक दुर्घटना में दोनी को अपने पास बुला लिया |तब बुआ माँ ने उम्र के १८ वे वर्ष पर कदम रखा था |कैसे संभली वो और कैसे सरकारी नौकरी तक पहुची इसमें रफीक चाचा का  ही सहयोग रहा |इस साथ -सहयोग में रूमानियत की धुप के कतरे गिर रहे थे ,लेकिन समाज जाति और धर्म की दिवार ने सारी धुप रोक ली |चाचा की शादी हुई पर वो  निसंतान  ही रहे |चाची  भी जैसे अनचाही सवारी की तरह उनके जीवन सफ़र में शामिल हुई और कुछ वर्षो बाद ही जन्नतनशीं  हो गई | 

समय की रफ़्तार रूकती नहीं ,बुआ माँ और रफीक चाचा भी समय के साथ चलते रहे |दोनों के जीवन में थोड़ी मिश्री निशा के आगमन से ही घुली थी | बाज़ार बंद हो जाने पर भी चाचा को घर जाने का कोई प्रयोजन नहीं दिखता |वो अपनी दुकान बंद करके बाहर बैठे  रहते और बुआ माँ घर की देहरी पर |दोनों कभी कभी देर तक बात करते रहते  या कभी मूक होकर  उम्र की घडिया गिनते रहते | दोनों के पास समय को काटने के लिए  बे सबब बातो की छुरी ही थी | इसमें न रफीक चाचा  बुआ माँ के घर की  देहरी लांघते और न बुआ माँ  मर्यादा की सीमा रेखा पार करती |इस देहरी और दूकान पर ही रफीक चाचा  बुआ माँ के लिए दिवाली के दियो की  बाती बना देते और बुआ माँ चाचा के लिए ईद पर सिवइए बना कर सुखा देती |जब उनके बीच नीरव क्षण गुजरते तब रफीक चाचा  बैठे बठे बीडी सुलगा ते रहते |बीडी की आग उनके अन्दर भी कही सुलगती रहती ,जिसका ताप कभी कभी उनके चहरे पर आ जाता |फिर उठ कर थके कदमो से घर की और चल पढ़ते |बुआ माँ भी उठ कर चूल्हा सुलगाती या कभी चना चबेना खा कर सो  जाती |निशा जब उनके पास होती तब उसके लिए वो उससे पूछ  -पूछ कर नई नई  खाने की चीजे बनाती  |जब निशा मन भर खा लेती तो बचे हुए के दो हिस्से करके बुआ माँ एक अपने लिए और दूसरा रफीक चाचा को दे आती |देखने वाले सब अपनी सोच से अर्थ निकालते ,लेकिन कोई कुछ कहता नहीं |निशा के पिता भी कभी कभी माँ से  रफीक चाचा का नाम लेकर बात शुरू करते फिर बीच में ही चुप होकर बात ख़त्म कर देते  | 
समय अबाध गति से बहता रहा निशा की कालेज की  पढाई  की वजह से जयपुर आना पढ़ा और गाव की गलियों के साथ बुआ माँ भी गावं में ही रह गई |महीने में एक दो बार शहर आ जाती थी निशा का प्यार उन्हें खीच लाता | शादी के एक साल बाद ही तो बुआ माँ का रिटायर मेंट हुआ था | तब छोटा सा आयोजन किया था पिताजी ने शहर में और बुआ माँ को कहा की अब वो यही रहे सबके साथ |यह उम्र अकेले रहने की नहीं है | 

बुआ माँ भी क्या कहती मौन स्वीकृति दे दी थी | उम्र की सांझ ने स्वीकार लिया था की अब निलय होने तक कोई साथ जरुरी है |गिरता हुआ स्वास्थ्य भी कह देता है की अब उसे देख भाल चाहिए |लेकिन शहर बुआ माँ को रास नहीं आया | कुछ दिनों से वो खाने पीने में अरुचि  दिखा रही थी |और कई बार सर दर्द की बात कह कर घंटो सोई रहती |कई बार माँ से कह चुकी की  उनकी आत्मा उनके साथ नहीं है | पिछली बार जब उनका चेक उप करवाया था तब तो ऐसा कुछ सामने नहीं आया की बुआ माँ को बड़ी बीमारी हो सकती है ,फिर यह एक दम से क्या हो गया | 
निशा और मनोज दुसरे दिन पहली गाडी से जयपुर आ गए थे |निशा को देख कर बुआ माँ के चहरे पर मुस्कराहट आई ,और मुस्कराने से उनके पीले पड़े चेहरे पर थोड़ी सी गुलाबी आभा |निशा उनका हाथ पकड़ कर उनके सिरहाने ऐसे बेठी जेसे कभी छोड़ेगी नही |पिताजी ने रफीक चाचा को भी खबर कर दी थी की  जीजी हॉस्पिटल मै एडमिट है |खबर सुनते ही चाचा गाव से तुरंत आ गए थे |हॉस्पिटल आकर  बुआ माँ  की  नज़रो से नज़र मिली ,उस मूक संवाद ने वर्षो की पीड़ा एक दुसरे से  कह दी |उसके बाद से  कमरे के बाहर कुर्सी पर ऐसे बैठे  जेसे उनहे  कुर्सी से जोड़ दिया हो |निशा  के पास एक बार आये और उसके सर पर हाथ फेर कर इतना कहा “तेरी बुआ माँ को न जाने देना “|और बाहर आकर बैठ गए | 
जाचे हुई ,रिपोर्ट आई ...सब सन्न रह गए |बुआ माँ को ब्रेन टयूमर  हो गया था  और फुट जाने की वजह से उसका जहर शरीर में फेल गया है  |कोई सर्जरी नहीं हो सकती |किसी के मुह से कोई आवाज़ नहीं आई |निशा बुआ माँ का हाथ पकडे बैठी थी और धीरे धीरे उस पर कसाव बढ़ता जा रहा था | 
पिताजी ने डॉ से पूछा कब तक ? 
डॉ ने कुछ नहीं कहा ,... 
रात भर निशा हाथ में हाथ लिए बैठी रही और चाचा बाहर कुर्सी पर जड़ हो कर |पिता जी के बहुत कहने पर भी उन्होंने वहा से हिलना पसंद नहीं किया | कब निशा की  पानी भरी आँखों  में नींद समां गईऔर सर हाथ पर आ गया  ,कुछ पता नहीं चला   जब  उसने नींद में अपने सर पर सिहरन महसूस की तो अचकचाकर जाग गई |उसने देखा बुआ माँ का हाथ उसके सर पर था और वो एक दम शांत पड़ी थी | 
अंतिम क्रिया क्रम पिताजी ने ही किये |मुखाग्नि देते वक़्त वो भी बिलख पड़े |रफीक चाचा  रीत गए थे ,कोई भाव नहीं था उनके चेहरे पर |एक दम खामोश ..तीसरे  दिन  पिताजी जब अस्थिया चुन कर लाये तो  चाचा उनके निकट हाथ फेलाकर खड़े हो गए |और एक वाक्य कहा “मुन्ना (पिताजी के घर का नाम ) मुझे हरिद्वार जाने का हक दे दे |सुन कर पिता जी स्तब्ध रह गए |उनके हाथ में अस्तियो का कलश कापने लग गया | 
निशा से रहा न गया ,वो अपनी जगह से उठी और उसने पिताजी के हाथ  का कलश रफीक चाचा के  हाथ में पकड़ा दिया |रफीक चाचा वही पिताजी के पैरो  में बैठ गए और कलश को  सीने से लगा कर  फूट फूट कर रो पड़े |निशा ने मनोज  के काँधे पर सर टिका कर कहा बुआ माँ अब अकेली नहीं रही |....... 

        प्रतिक्रियाये 
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[12/3, 09:35] Lakshmikant Kaluskar Ji: प्रवेश बहुत अच्छी कहानी. ऐसी कहानियां पढ़ कर आंखों की कोरे भीग जाती है. ऐसा ही हुआ. खून के रिश्तों से बढ कर मन और आत्मा का   जुड़ाव होता है. व्यक्ति दुनिया में भले ही एकाकी दिखे पर उसका मन कभी खालीपन या एकांत स्वीकार नहीं कर पाताएक पौधा रोपा ही जाता है वहां, अंदर ही अंदर पल्लवित भी होता रहता है, पुष्पित होता है और सुवासित होता है. इसकी सीमाएं नहीं होती. 
कहानी के लिये बधाई.
[12/3, 09:40] Pravesh: बहुत बहुत आभार आपका कालुस्कर जी
कहानियॉ की श्रृंखला में मेरी यह तीसरी कहानी है ।पहला ड्राफ्ट है ,सुधार की काफी गुंजाइस है इसमें ।
मेरा सभी से  विनम्र निवेदन है की इस कहानी के कच्चे पन को सुधारने में मेरी मदद करे ।
🙏🙏🙏🙏
[12/3, 11:16] Saksena Madhu: प्रेम का अपना अलग धर्म होता है वो किसी अन्य  धर्म का मोहताज़ नहीं । प्रेम तो अपनी पूरी ताकत से स्थापित होता है । इस कहानी ने कई भूले बिसरे चेहरे याद दिला दिए ।मन भावुक हो गया । प्रेम में जितने ज़िंदा हुए उतने ही मारे गए ।बहुत अच्छी कहानी ।बधाई प्रवेश ।आभार ब्रज जी ।
[12/3, 11:39] Aalknanda Sane Tai: वाह ! एक चुलबुली सखी की संजीदा रचना. हमारे यहाँ स्त्री-पुरुष संबंधों को देखने की दृष्टी में अब काफी बदलाव आया है, पर यह कहानी जिस पीढ़ी की है, उस दौर में ऐसा ही होता था.टाइप की गलतियां हैं और इस वजह से विलय,निलय हो गया है, जिससे उसका अर्थ बदल गया है.वर्णन बहुत ज्यादा है,उस अनुपात में घटनाक्रम छोटा है. पहला ड्राफ्ट इस समूह में साझा करना अच्छी बात है, लेकिन यहाँ समालोचनात्मक वातावरण की कमी है. ज्यादातर वाहवाही करते हैं.......
[12/3, 11:44] +919981058773: कहानीकार अपने उद्देश्य में सफल हैं जिस बात को पाठकों तक लहुँचाने का प्रयास लेखिका ने किया वो बात पूरी शिद्दत से पाठकों तक पहुँची प्रेम और लगाव को केंद्र में रखकर जो ताना बाना बुना गया वह अद्भुत है शिल्पगत थोड़ी कमी ज़रूर समझ में आई लेकिन भावना प्रधान होने से वह कमी भी नही लगती कई स्थानों पर आँसू भी आने को बेताब हुए ।
[12/3, 14:05] ‪+91 95463 33084‬: प्रवेश जी लम्बे दिनों के बाद इतनी अच्छी कहानी पढ़ी ।शुक्रिया ।बुआ माँ और रफीक चाचा के बीच का अनकहा प्यार अद्भुत है ।आपकी किस्सागोई को सलाम👌👌👌🙏🙏🙏👍
[12/3, 14:24] Sudhir Deshpande Ji: प्रवेश, चित्रकार, कवि, कहानीकार, अन्नपूर्णा, प्रवेश नाटककार, और न जाने क्या। पर संवेदना का पूरा सागर है। बुआ और रफीकचाचा की रिक्तता और भावनात्मक जुडाव की मार्मिक कथा है। बुआ की पीडाओं को गहनता और घनीभूत हुई वही रफीक की तरल होकर बह निकली। बधाई बहुत अच्छे चित्रण के लिए
[12/3, 14:25] Arti Tivari: प्रवेश सच्चा प्यार तो यही है। जो दिलोदिमाग पर छाया रहता है। जिससे प्यार हो जाये उसे दुःख और परेशानी में देख कर बैचेन हो उठता है,और कर गुज़रना चाहता है वो सब कुछ जिससे प्रेमपात्र को ख़ुशी मिले। सुकून मिले बिना किसी प्रतिदान की चाहना के प्यार न उम्र देखता है,न वक़्त और न ही मज़हब से कोई वास्ता होता है प्यार का प्यार तो बस प्यार है। एक जूनून भी एक ख़ामोशी भी और एक बलिदान भी प्यार में पाना कहाँ होता है।
प्यार में तो सिर्फ और सिर्फ देना होता है। चाहे वो ख़ुशी हो चाहे जान हो।🙏🙏🍀🍀
[12/3, 14:27] Arti Tivari: ये सब तुमने सहजता से बयान कर दिया यहाँ बधाई प्रवेश👍🏼👍🏼😊
[12/3, 14:28] Rajnarayan Bohare: बहुत उम्दा। मीठी ।किस्सा गोई से भरी।प्रेम से लबरेज़ । शुरूआत में प्रेम।अंत में भी। चाचा कहानी के बीच में आये पर केंद्र बन गए।वाह प्रवेश जी अच्छी कहानी।और क्या चाहिए ऐसी कहानी मेँ
[12/3, 14:40] Mani Mohan Ji: अच्छी कहानी प्रवेश जी ।पठनीय।
[12/3, 14:50] ‪+91 87932 85368‬: प्रवेश जी, आप अच्छी कहानीकार बनेंगी। जारी रखिए। बधाई।
[12/3, 14:56] Padma Ji: प्रवेश की अच्छी कहानी। रांगेय राघव की गदल कहानी में ऐसा ही अव्यक्त प्रेम था। बधाई
[12/3, 15:30] ‪+91 89592 88001‬: प्रवेश जी प्रेम की टीस लिए एक भावपूर्ण कहानी शुभम्
[12/3, 15:35] ‪+91 99269 07401‬: प्रवेश जी बहूत ही मीठी कहानी प्रेम से पगी.आप अच्छी कहानीकार है
[12/3, 15:47] ‪+91 98270 96767‬: प्रवेश की ये कहानी पहले भी पढ़ी है मॅन प्रेम को शब्द देती खूबसूरत कहानी ।
[12/3, 16:25] Chandrashekhar Ji: प्रवेश जी कहानी वस्तुतः बालविधवा के उस मन को सामने लाती है,जिसे नियति और उससे ज्यादा समाज ने अपने दायरे में सीमित कर दिया। अवस्था के अपने प्राकृतिक आकर्षण और स्वभाव होते हैं जो कितने भी सीमित भले कर दिए जाएँ लेकिन उन्हें पैदा होने से रोका नहीं जा सकता। कहानी का कथ्य बहुत अच्छा है।बधाई प्रवेश जी।🍁
ब्रज जी आभार।
[12/3, 16:48] Devilal Patidar Ji Artist: लाजबाब कहानी
सच क्या नीभाया हे सब ने सब कुछ .
बधाइ प्रवेश जी .
[12/3, 18:14] Pravesh: सभी को धन्यवाद ,आभार ,शुक्रिया
🙏🌹🙏
ताई आपका स्नेह मुझे हमेशा  उत्साहित करता है । आपने सही कहा यहाँ समालोचनात्मक वातावरण की कमी है । लेकिन यहाँ के समालोचक श्रेष्ठ नही श्रेष्ठतम है ।अब उनकी इच्छा पर निर्भर करता है की वो प्राइमरी क्लास की कापी चेक करे या न करे ।
वेसे मैं जानती हूँ की यहाँ  सब मुझे बहुत स्नेह करते है ,शायद वो यह सोचते हो की मुझे उनके कठोर शब्द से चोट पहुच सकती है ,लेकिन ऐसा कतई नही है ।मेरा लेखन   उन सबकी सूक्ष्म समीक्षात्मक दृष्टि में निखरना चाहता है ।
अतः निवेदन है यदि आज की क्लास में पोस्टमार्टम टेबल पर  मेरी कहानी रहे तो में कुछ अच्छा करपाऊँगी ।
🙏🙏🙏🙏🙏
कालुस्कर जी ,मधु ,ताई ,उदय जी ,आरती ,भावना जी ,सुधीर जी,बोहरे जी ,मणि जी ,दीप्ती जी पदमा जी ,डॉ वनिता जी ,रेखा दुबे जी ,नयना जी ,कविता जी ,चंद्र जी ,देवी सर
और ब्रज जी आप सभी को बहुत बहुत धन्यवाद
🙏🙏🙏
[12/3, 18:36] ‪+91 95756 75193‬: Praveshji, aapki sashakt lekhan ko salaam🙏
[12/3, 18:58] ‪+91 94793 75622‬: प्रवेश की मर्मस्पर्शी ईमानदार कहानी, बधाई स्वीकारें... 🌿🌿🌿
[12/3, 21:20] Surendra Raghuwanshi: रिश्तों की गर्मी की अपेक्षाओं को सुरक्षित रखने का आव्हान करती प्रवेश सोनी की अच्छी कहानी।
वधाई प्रवेश।
[12/3, 21:45] Sandhya: बहुत ही बढ़िया कहानी एक बार पढी है फिर से पढ़ना आनंद दे गया 
सच है,प्रवेश बहुगुणी है रे 
बहुत बधाई  💥
[12/3, 22:18] ‪+91 98262 43337‬: पहली ही पंक्ति से चित्त को बांधती कहानी के लिये प्रवेश जी आपको बहुत बहुत बधाई औरआगे के लिये शुभ कामनायें | कहानी में उल्लेखित हर पीढ़ी जाति धर्मऔर अन्य मान्यताओं से ऊपर उठकर प्रेम को ही सर्वोपरि स्वीकार करती है , पूरी कहानी में प्यार के प्रति कोई सामाजिक विसंगति नज़र नहीं आयी , यह कहानी उसी कल्पना लोक में ले जाती है |प्रवेश जी आपकी कहानी हमारे जीवन ,हमारे सामाजिक नैतिक मूल्यों में व्यवहारिक रूप ले सके  इसी दोआ के साथ आपको पुनः बहुत बहपत बधाई

Monday, April 4, 2016





⬜  राजेश झरपुरे




सपने में मकान
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      सम्पतराव और उनका पाँच सदस्यी परिवार जीने की बेहतरीन कला से वाक़िफ़ था। हर स्थिति में मुस्कुराते रहना और विषम से विषमतम परिस्थिति में अविचल बने रहना उनकी सबसे बड़ी विशेषता थी। गरमी की चिलचिलाती दोपहरी में जब कोई पड़ोसी बिना पंखे और खिड़की वाले, उनके किराये के मकान का दरवाज़ा खटखटाता तो घर का सदस्य ”अतिथि देवो भयः“ की मुद्रा में उसका स्वागत करता। चिड़चिड़ाना, मुँह बनाना, मुँह फुलाना जैसी स्थिति कभी देखने को नहीं मिली। मोहल्ले में कहीं शादी-ब्याह हो, सम्पतराव का परिवार दरी बिछाने से लेकर चौका-बासन तक हाथ बंटाते मिल जाता।
दुःख और गमी के समय में वे पीड़ित परिवार के इतने करीब और गहरे तक जुड़े होते कि कहना मुश्किल हो जाता कि वे घर वाले है या बाहर वाले। पूरे मोहल्ले में एक वही परिवार था जो सब घरों से जुड़ा हुआ था और सब उनसे। वरन् मोहल्ले में कितनेक घर ऐसे थे, जिनमें वर्षों से बोलचाल बन्द थी।

        पेशे से सम्पतराव स्कूल में षिक्षक थे। जोड़तोड़ का जीवन था। तीन बेटियाँ में से दो विवाह योग्य हो चुकी थी। एक बेटा और बेटी अगले दो सालों में स्नातकोत्तर हो जाने वाले थे। उस वक्त सबसे छोटे बेटे को एक अच्छी सी नौकरी की ज़रूरत होगी। छोटी एक साल बाद विवाह की सही सौपान पर होगी। उस वक्त बड़ी दो बहनें विवाह हेतु छोटी के सामने असुविधाजनक स्थिति में आ सकती हैं फिर भी  दुश्चिन्ताएँ उन्हें या उनके परिवार को घेर नहीं पाती थी।

      उनकी पत्नी उन्हें मास्साब कहकर पुकारती। वह घर में ट्यूशन पढ़ाते थे। ट्यूशन पढ़ाते समय वह अन्य बच्चों के साथ अपने बच्चों को भी बिठा  लिया करते। बच्चे उन्हें मास्साब कहकर पुकारते। उनके बच्चे भी अन्य की तरह  मास्साब पुकारने लगे। पिता या पिताजी का सम्बोधन उनके घर में कभी सुनायी नहीं पड़ा ।  उन्होंने कभी अन्यथा नहीं सोचा। सदैव मुस्कुराते रहते। मास्साब शब्द के भीतर पिताजी होने की सार्थकता को वह पूरी गम्भीरता से महसूस कर लेते ।


         पिछले पैंतालीस वर्षेां से किराये के मकान में रह रहे माससब का एक सपना था ... ख़ुद का मकान हो । बरसों से किराये के मकान में रहते, दूसरों के सुख-दुःख बांटते हुए, उनके सुख कहीं दूर तक बिखर कर रह गये थे। ख़याल सबसे पहले उनकी पत्नी को आया था... तब उन्होंने महसूस किया... अपना एक मकान होने का सुख और न होने की पीड़ा। इस बेहद व्यक्तिगत सुख और पीड़ा के बीच शहर के बीचेां-बीच ज़मीन का एक छोटा सा टुकड़ा उनके हाथ लग गया। मास्साब के पास तो रजिस्ट्री कराने के लिए भी पैसे नहीं थे पर बेहद उत्साहित मास्साब बयाना दे बैठे। पत्नी ने कुछ जमा राशि, कुछ गहने तथा ससुराल वालों ने बचा भारी भार उठाया तो ज़मीन मास्साब की सम्पत्ति हो गयी।

         ज़मीन आ जाने पर मास्साब और उनके परिवार ने उसमें खेती करना आरम्भ कर दिया। 20 बाई 40 वर्गफ़िट के प्लाट पर खेती। खेती सपनों की, खेती भविष्य की, खेती योजना की, खेती अपना एक मकान होने की। उनका बचपन, जवानी और आता हुआ बुढ़ापा किराये के मकान में व्यतीत हुआ। वह किराये के मकान में जन्में, पले बढ़े और पढ़े। पढ़-लिखकर रोते-धोते आदिवासी अंचल में नौकरी मिली, जहाँ कोई जाना नहीं चाहता था, वह गये, किराये के मकान में रहे और डरते-सहमते, पढ़ाते रहे। उनका डरना और सहमना गाँववालों को भा गया। वह मास्साब से मास्साबजी हो गये। वह बताते है... आदिवासी अंचल में बहुत जल्दी किसी शहरी व्यक्ति को स्वीकार नहीं किया जाता। समय साक्षी था... उनकी सादगी,सरलता और गरीबी का हर स्तर पर  शहरियों ने खुलकर शोषण किया। सूबेदार हो, पटवारी, मास्साब या वनोपज का व्यापारी या सरमायेदार... सब उनके लिए अविश्वसनीय हो चुके थे। नौकरी के आरम्भिक दिनों में  गाँववालों के असहयोग के चलते उन्हें बेहद परेशानी का सामना करना पडा। पर अपने व्यवहार, पेशे के प्रति ईमानदारी और सादगी के कारण, वह मास्साब से मास्साबजी हो गये... यह भाना इन्हीं अर्थों में था। किराये के मकान से ही उनकी  शादी हुई। किराये के मकान में ही उनकी सुहागरात हुई। उन्हीं की तरह उनके बच्चे भी किराये के मकान में जन्में और बड़े हुए। इसीलिए स्वाभाविक था ...सबका खेती करना। खेती मकान की, फ़सल निर्माण की और अभिलाषा अपनी ज़मीन पर चार दीवार और छत के नीच़े होने के स्वाभिमान की।

        बेटी ब्याहना  और मकान बनाना दोनों ही कार्य बराबर थे। दोनों में ही लगभग एक ही तरह से पैसा उँड़ेले जाते हैं। मास्साब के पास विकल्प नहीं था। उन्हें  सपनों को भी सींचना था और बेटी भी ब्याहना था। खुली ज़मीन और बड़ी उम्र की कुँवारी बेटी पर दस-दस नज़र होती हैं। ऊपर से किराये का मकान इन खतरों को और बढ़ा देता । इसके बावजूद परिवार का हर सदस्य मकान के लिए हर तरह की परेशानी और त्याग करने के लिये तैयार बैठा था। दस-पाँच रूपयों से जुड़कर पच्चीस वर्षों में पोस्ट आफ़िस में पच्चयासी हज़ार हुए थे। बीमा और बैंक से पच्चीस-तीस हजार मिल सकने की गुंजाइश थी और भविष्य निधि से 50 हजार तक उठा लेने की योनजा के साथ मास्साब अपने सपने का नक्शा बनवा लाये। 15-20 दिन की भाग दौड़ और जान-पहचान के कराण, कम औपचारिकता, कम चढ़ावे में नगरपालिका से नक्शा भी पास करवा लिया। नक्शा पास होते ही परिवार के सभी सदस्यों के सपने में एक ही आकार का मकान आता। मकान के सारे दरवाज़े और खिड़कियाँ एक ही दिशा में खुलते-बन्द होते। मास्साब अकसर अपने को मकान के सामने के कमरे में बैठे या लेटे हुए पाते। पत्नी बहुत कम समय के लिए रसोई से बाहर दिखती। रोड़ की तरफ़ खुलने वाली तीन खिड़कियाँ तीनों बेटी ने आपस में बाँट ली थी और बेटा अकसर घर की छत पर खड़ा दिखाई देता। सपनों की विविधता लगभग समाप्त हो चुकी थी। एक से सपने ने पूरे परिवार के सदस्यों की नींद में एक तम्बू लगा रखा था।

          सब खुश । सब उत्साहित थे। भूमिपूजन की शुभ घड़ी नज़दीक आती जा रही थी पर आयी नहीं। बुआ आ गयी पहले । मुहर्त के पहले बुआ के आने से सभी खुश हुए। बुआ आयी पर अकेली नहीं थी, उनके साथ एक रिश्ता आया , जो सबको असमंजस्य में डाल रहा था।

          ”भैया! वे लोग दान-दहेज कुछ नहीं माँगते। लड़का बड़ी उम्र का है। पहले अपनी दो बहनों की शादी निपटाने की व्यस्तता में शादी नहीं किया। सरकारी नौकर है। आराम है। फिर अपनी बेटी भी तो बड़ी उम्र की हैं। अच्छी जोड़ी रहेगी। उन्हें तो बस! अच्छे संस्कारों वाली लड़की चाहिए।“  बुआ ने अपनी बात कहकर एक दीर्ध साँस ली और मास्साब के चेहरे पर नज़र गढ़ा दी। मास्साब ने पत्नी की ओर देखा। पत्नी ने असमंजस्य से बड़ी बेटी की तरफ़। बेटी का चेहरा सोने की तरह दमक उठा। उसके चेहरे का रंग लगातार बदलते हुये और प्रखर होता जा रहा था।

         रंग न  निवेदन करते है न ही कुछ माँगते हैं। बस! आभास कराते हैं। पर उनकी बेटी के चेहरे के रंग प्रखर होते हुए भी विवश थे। वह चुपचाप उठकर बुआ के पास से अन्दर रसोई में चल दी। एक निस्तब्धता छा गई कमरे में, जहाँ सारा परिवार जुटा हुआ था। छोटी दो बहनों के चेहरे के रंग भी बन-बिगड़ रहे थे। उन्हें लगा यह अवसर माँ-पिता के पास बैठने का नहीं, बड़ी बहन के साथ होने का हैं। वह भी उठकर अन्दर रसोई में चल दी। मास्साब और उनकी पत्नी अवाक से बुआ की तरफ़ देख रहे थे।

         ”भैया! मामला चट मँगनी पट ब्याह का है। मैं तो चाहती हूँ तुम एक बार देख आओ। तुम्हें भी आश्वस्ति हो जायेगी।“
         ” हूँ।“  एक दीर्ध उसाँस के बाद उन्होंने कहा।
           पत्नी चुप थी।
         ”भाभी! अब बेटी जन्मी हो तो ब्याहना भी पड़ेगा न। फ़िर रिश्ते से रिश्ते जुड़ते हैं। इसके बाद दो लड़कियाँ और ब्याहना हैं। उनके बारे में भी तो सोचना हैं।“ बुआ ने कटाक्ष किया। पत्नी चुप रही। वर्षों पुराना विनम्रता का साथ उसने नहीं छोड़ा था।

          मास्साब को लगा... अपने बच्चों के मुख से पिताजी के स्थान पर मास्साब शब्द का सम्बोधन पाकर वह अपने पिता होने का मूल धर्म भूल रहें है। मकान के सामने वह अपनी बेटियों के प्रति दायित्व को कैसे विस्मृत कर गये। उन्हें आघात लगा।

         ”बहनजी! आप सही कह रही हैं। घर-परिवार आपका देखा हुआ हैं। आप उन्हें हमारी ओर से आमंत्रण दे दो।“ मास्साब असमंजस्य और दुविधा की स्थिति से बाहर आये। अपना निर्णय सुनाकर उन्हें लगा... वह ज़िम्मेदारी से मुक्त हो गये। पत्नी को लगा मास्साब ने उनके मन की बात कह दी। घर परिवार की खुशियों से बनता हैं। खुशियों को दफ़न कर दीवार पर छत डालने से मकान नहीं कैदखाने बनते हैं। वह फिर के सपने में शरीक हो गयी। सपनों में अभी भी मकान था पर पति का नहीं बेटी का।

         पैसा था ही। रिश्ता घर चलकर आया था। सम्बन्ध जुड़ गये। बीस-पच्चीस दिन की तैयारी में बड़ी बेटी किराये के मकान से विदा हो गयी। मास्साब के घर पहली खुशी का अवसर था। रिश्तेदार और मोहल्ले वालों ने बढ़-चढ़कर सहयोग किया। मास्साब ने खुले हाथ से खर्च किया। किराये के मकान का कोना-कोना खुशियों से झूम उठा और अपना एक मकान होने का सपना उनकी नींद से कोसों दूर खड़ा मुस्कुराता रहा।



बेटी विदा हो गई। रिश्तेदार जा चुके थे। घर में लम्बी यात्रा से थककर चूर बैठे यात्रियों की तरह सुस्ती और शान्ति पसरी हुई थी। एक तरफ़ खालीपन था तो दूसरी तरफ उत्सव उल्लास के रंग दीवार और आँगन में बिखरे पड़े थे।

मास्साब की पत्नी उनसे कह रही थी...
”देखो जी! अगले साल दोनों बेटी के हाथ पीले करना है। आप अच्छा सा कोई ग्राहक देखकर प्लाट निकाल दो। पैसा हाथ में होगा तो बल मिलेगा।“

मास्साब ने गर्व से पत्नी की तरफ़ देखा और आश्वस्त करने की मुद्रा में मुस्कुरा उठे। उसी समय किसी ने दरवाज़े  पर दस्तक दी। यह दस्तक उनके लिए जानी-पहचानी थी। मास्साब ने मुस्कुराते हुए दरवाज़े की कुंड़ी खोली। सामने मकान मालिक खड़ा था और किराये का एक महीना और पूरा हो चुका था।
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(कहानी लेखन तारीख-जून2006)
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(समाकालीन भारतीय साहित्य से साभार)
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प्रस्तुत  चित्र :- प्रवेश सोनी

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