Wednesday, March 22, 2017

क़दम इंसान का राह-ए-दहर में थर्रा ही जाता है
चले कितना ही कोई बच के ठोकर खा ही जाता है
.
जोश मलीहाबादी ने क़दमों की आज़माइश की बात कही है वहीं मुक्तिबोध ने भी क़दमों के सामने आ खड़ी चुनौतियों को अपनी पंक्तियों में उठाया है। वो कहते हैं:
मुझे क़दम-क़दम पर
चौराहे मिलते हैं
बाँहे फैलाए!!

कविता लिखो की यात्रा में एक पग और धरते हैं। आइए आज क़दम/पग पर कविता लिखते हैं।
अपर्णा अनेकवर्णा

साहित्य की बात  समूह में कविता की कार्यशाला के अंतर्गत आज कदम शब्द पर बिखरे कविताओं के कई नए स्वर |सृजन में अभिव्यक्त हुई  नए व् स्थापित कवियों की कदम दर कदम नई कविताएं |यह भी एक एतिहासिक कदम है की यूँ लिखी जा रही है कविताएं |


1...
ढाई कदम की
इस दुनिया में
दो कदम दूर
हो तुम
एक कदम तुम चलो
एक कदम मैं चलूं
तो दुनिया हमारे कदमों के नीचे हो..?

संजीव जैन

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2.....“कदम”
कदम दर कदम
आगे बढ़ते चले गए तुम
मेरी एहसासों की किरचें झाड़ते हुए
एक बार
काश! एक बार तो पीछे मुड़कर देखा होता
तो मैं शायद
तुम्हारे क़दमों के निशाँ
न ढूंढ रही होती
कहाँ कहाँ नहीं ढूंढा
घर की देहरी पर,
आँगन में,
सड़कों, गलियों, चौराहों पर
मगर वक़्त की रफ़्तार ने
मिटा दिया था उसे
रह गई थी तो तुम्हारी यादें शेष
काश!
जाते-जाते तुम अपने क़दमों के निशाँ छोड़ जाते
तो जड़ लेती मैं उसे
अपने एहसासों के फ्रेम में
और ताका करती
यूँ धरती न खुरचती
यूँ वीराँ न भटकती
तुम्हारे लिए                                                                                                                                                  कदम दर कदम |


शकुंतला तरार

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3.....चाँद और झील
||||||||||||||||||

मन से क़रीब है
पर क़दमों का फासला बना रहा
झील और चाँद में ....
फिसलते समय की देहरी को पार कर
कब आ पाये क़रीब  ....?

कोई किवाड़ नही
फिर भी बंध जाता है जीवन
खुले हुए हैं रास्ते
चल नही पाते उन पर .....

पता नही कौन बांधता
क्यों बंध जाता कोई
झील, नही बन पाती नदी
दायरे से बाहर होते ही
फिर कस दिए जाते मुहाने

चाँद का अक्स तैरता रात भर
झील में
पर सूरज  बन्धन सा फ़ैल जाता
अपना रंग लिए ..

यही तो हुआ
अब भी यही तो होगा

झील के हिस्से  में सिर्फ
परछाई है  चाँद  की
मिलन की आस लिए .....

.               |||| मधु सक्सेना ||||

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४.....क़दम
***
क़दम उठते नहीं जंजीर सी
झंकार करती है
ये पायल पाँव की बेड़ी बनी
इंकार करती है
बहुत मुश्किल है अपनी राह चुनना और बढ़ जाना
कहाँ दुनिया किसी की हर खुशी स्वीकार करती है !!
              मीना.

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5.....||कदम पड़ने लगे हैं ||

आखिरी दिन इस तरह आएगा
उसे बर्दाश्त करना
ना काबिले बर्दाश्त होगा

प्रलय सा आएगा
आएगा पहले भूकंप,
बाढ़ आएगी, या
पहले सूरज छोड़ेगा
आग की मिसाइलें


कदमपड़ने लगे हैं यहां
उन घटनाओं के अब
जो दो प्रेमियों को जुदा करने के लिए आया करती हैं

खुद को मिटते हुए  पूरी तरह देखने का दिन होगा वह
अपना बयान देने का समय भी

भीड़ की बात न मानने की एवज़ में
हमें सुनाई गई सजा होगी यह


ब्रज श्रीवास्तव
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6........तुम चलती हो तो
साथ तुम्हारे मेरी निगाहें चलती हैं,
साया बन कर,
निगहबां बन कर,
मीत बन कर,
सहारा बन कर,
सांसे बनकर,
धड़कने बन कर,
तुम चलती हो तो
अकेली कहाँ चलती हो।
तुम चलती हो
तो एक कारवां चलता है।

- संतोष तिवारी
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7......क़दम
.
लो एक क़दम आगे
ले लो अब दो पीछे
यह ही तय पायी गयी है
सबसे मुफ़ीद चाल तुम्हारी
यूँ भरम बना रहेगा
कि चल रहे हो
और बड़े ही आराम से
तुम कभी भी
कहीं नहीं पहुंचोगे..

तुम्हारी सहूलियतें, ज़िंदाबाद!
...............................
अनेकवर्णा
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8.......कुछ कदम

देखो मैं  तो बीन लाई हूँ किरचे
उस टूटे आइने के
जो झेल न सका
हमारे शब्दों के प्रहार
और हो गया चूर -चूर
क्या ! शक है तुम्हें ?
देखो मेरी लहुलुहान उंगलियों की ओर
ये जख्म दिये हैं
उसी टूटे आइने की किरचों ने
जिन्हें सहेजा मैंने बरसों
किंतु नहीं है पीङा
है यकीन
भर जायेंगे जख्म, गर
लगा दो तुम मरहम
उस विश्वास का
जो शायद रह गया शून्य मात्र
हम दोनों के बीच
और टूट गया वह आईना
जिसमें नज़र आते थे तुम और हम
साथ-साथ
आओ न
कुछ कदम चलते हैं हम
फिर से साथ
शायद तुम्हारी भी एक कोशिश
जोङ दे उन टूटी किरचों को
जो भर लाई हूँ मैं
अपने आस के दामन में
और ले-ले फिर नयी आकृति
वह आईना
जिसमें हों तुम और मैं
साथ-साथ

रोचिका शर्मा , चेनै

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9.....क़दम
बढ़ते रहे हम
सधे क़दमों से
मिलती रहीं मंजिलें
मुकाम नहीं आसान
कि  झुक आए आसमान
सजा दे तारे आँचल में
खुशनसीबी
मिलते रहें हम कदम
हर मोड़ पर
जन्नत की चाहत
कब रही ....
बस एक ,फिर एक
 उठता हुआ क़दम
 ले आएगा पास और पास
क्षितिज
लगता है, मिल गया
आसमान जमीं से
तभी तो मौसम
बदल रहा है यहाँ
दो पल की
जन्नत लिए आँचल में ।।
            मीना.
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10.....कमान संभाले मेरा सैनिक
कदम कदम बढ़ाए जा
कहकर
बढ़ाता हौसला
और हम सब लिए
नया हौसला
कूद पड़े
मैदान में ,खुशियाँ लिए
मुस्कुराहटों के
तीर लिए ।
           मीना.
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11........
संस्कारों की दीवार,चरमराने लगी,
 शालीनता के दरख़्त, गिराने लगी,

इज्जत शर्म से,जल मग्न हो गई,
मान,मर्यादा की धज्जियां,उड़ गईं,

अपने बच्चे ही स्वप्न में,डराने लगे,
छोटे बड़ों को,आँख दिखाने लगे,

दुल्हन बिन व्याहे,घर आने लगी,
बूढ़ी माँ वृद्धा आश्रम,जाने लगी,
आधुनिकता सब को,भाने लगी,
तब यह बात,समझ आने लगी,

कुटिल कलयुग ने,अपने कुत्सित,
कदमों के प्रहार से ,कर दिया कलुषित
और हमारे ह्रदय को बना दिया बज्र ,

रेखा दुबे
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12,,,,                        बचपन
   जब पहली बार                                    
   अपने पिता की उंगली पकड़कर
   चला था चंद कदम
    तब जैसे नाप ही ली थी
    मैंने पृथ्वी की दूरी
    पृथ्वी अब भी वही है
     लेकिन ,
     जितना चलता हूँ आगे
     बढ़ते जाते है फासले ......
     थक ही जाते हैकदम

       हरगोविंद मैंथिल
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13....कोई  नहीं देखता
उसकी मजबूरियाँ

 लोग समझते हैं
उसके पांव में जादू है


बजाते हैं  तालियाँ
फेंककर अठन्नी -चवन्नी
एक - दो  रुपिया
देखते  तमाशे

न एक इंच इधर
न एक इंच उधर
कदम
दर
कदम
जिंदगी और मौत के
बीच झुलती है नटिनी

एवज में
जुटा पाती मात्र रूपए  साठ ।



भावना सिन्हा।
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१४.....कदम

काँटों भरी थी राहें
नँगे पांव लिए थे हम..
सफर भी ज़रूरी था
आखिर जीना तो था ही...

खूब जुटाया साहस
मन को बार बार समझाया,
मंजिल का लालच देकर खूब बहलाया,
डांटा-डपटा, पुचकारा..
ये डरा बैठा था काँटों की चुभन से...

रात रात हिम्मत जुटाता
पर हर सुबह फिर घबरा जाता,

मेरी भी जिद थी
मंजिल पाने की,
कुछ कर दिखाने की,
दूर तक जाने की,

साहस चाहिए था मन को
बस पहले कदम के लिए
देर थी तो बस
पहला कदम उठाने की...

मैंने धकेल दिया मन को
इस जीवन की कंटीली राहों पर
अब बरबस चलना था
ये चला
जा पहुंचा अपनी मंजिल तक
उस एक पहले कदम के सहारे।

मंजूषा मन
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१५....
संकोच उगता है
चंपा का फूल बन
महकता है सिरहाने रात भर

दरख़्त पर बंधी हवा में
पत्तियां नींद में झूमती हैं
जाने किस तारे को लुभाने के लिए
कर गलबहियां ठिठोली करती हैं

एक कुत्ता जागता है सोता है
कभी उनींदा, मुंह को खोल
उकता कर पत्तियों की ठिठोली से
दो कदम आगे बढ़
एक सुर निकालता है
शायद उसी तारे को देख
वो सुर पत्तियों को बेसुरा
और उचटाने को काफी है
पत्तियों की ठिठोली एकाएक बन्द देख
कुत्ता दो कदम फिर पीछे जा
चंपा को निहार, लोट लगा
मुंह ज़मीं पर टिका,
आँख बंद कर लेता है

चंपा और तेज़ महकती है

   ...  सुरेन ( 20 / 3 / 17 )
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16.....दबे पाँव पँजों के बल
कल रात उलटे कदम चल
अतीत में देखा था मैंने तुम्हें
मेरी स्याह रात के कैनवास पर
इन्द्रधनुष की परिकल्पना कर
वाटर कलर से सात रंगों को भरते

कच्ची पेन्सिल से बनाये गए
वीरान रेगिस्तान के स्केचों में

वो तुम ही तो थे जो चुपके से
छोड़ आते थे उनमें मुँह अँधेरे
सफ़ेद खरगोश, लाल गाजरें पकड़े

बरसाती शाम को
खिड़की से सर टिका
रो रही थी जिस दिन मैं
अधूरे सपने को थामे
तुम नजर आये मुझे आसमां में
बिजलियों की सीढ़ियाँ चढ़ते
और झटका के अपनी तर्जनी
तोड़ा डाला था तुमने
मेरी मन्नत मुकम्मल करने वाला
वो चमचमाता तारा

भयावह सपने जो कर देते थे
तरबतर पसीने से अक्सर
आधी रात को मुझे
मैंने देखा है तुम्हें
चाँदनी को कागज में तान
और उसके हवाई जहाज को
मेरे सपनों में उड़ाते हुए

सर्द शामों को मेरे ठिठुरते कन्धों पे
ओढ़ाया था तुमने अपनी यादों का ब्लेज़र
वो अब चिथड़े-चिथड़े हो चुका है
बिखरे है जिसके टुकड़े यहाँ वहाँ
अतीत से वर्तमान के रास्ते पर

ठोकर से पाँवों में जन्मे जख्म
अब झाँकने लगे है मोजों से
छोटे छोटे छेद कर के
देख रहे है वो इसमें से
जीवन में फैले अन्धकार को
दो तारों को टकराकर
जलाते है फ़्लैशलाइट

इस रोशनी में भी पढ़ लेती हूँ
धुँधले पीले पन्ने वसीयत के
जो तुम मेरे नाम छोड़ गये हो
दो गज़ यादों की ज़मीं
मुट्ठी भर सपनों की राख
और कुछ किरचे टूटे वायदों केे..

-कोमल सोमरवाल
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17.....मेरी कविता
****
उत्तराखण्ड की
खूबसूरत वादियां
जहाँ गुनगुनाती हैं
खामोशियाँ
हरे भरे पर्वतों के मध्य
बने हैं रहस्यमय पथ
जिन पर चले जा रहे हैं
हम अनवरत
कदम दर कदम रखते हुए

ये वही रास्ते हैं
जिन पर चलकर
पांडवों ने किया था
जीवन का अंतिम सफ़र

आदि गुरु शंकराचार्य के
पदचिह्न भी तो
यहीं हैं अंकित
जो स्वयं थे
शिव के साक्षात अवतार
आज भी गूंजती है
उनकी वेदांत दुन्दुभि की
झंकार

इसी पथ के
धूलकणों और
पत्थरों ने
चट्टानों और लताओं ने
इन सब के वार्तालाप के
आनन्द और क्लान्ति की
निश्वासों को
न सिर्फ़ सुना था
बल्कि जिया भी था

तभी इन पर चलते चलते
जय केदारनाथ
जय बद्री विशाल
कहने भर से
हो जाता है कायम
आत्मीयता का
एक अटूट रिश्ता

सफ़र की कड़ी धूप
भले ही हम पर करे आघात
या दिल दहला दे
घनघोर बरसात
पर यही जयघोष
इन दुर्गम रास्तों को
फतह करने का
बन जाता है संकल्प
और सहारा

और हमारा आसपास
देता है हमे एक
ऐसा विश्वास और
हमारे क़दमों को एक ताक़त
जिससे हमारे संस्कारों को
मिलती है नई ऊर्जा
आस्थाओं को मिलता है
एक मजबूत आधार

तभी होता है ये अहसास
की ऊँची नीची ढलानों
और उबड़ खाबड़ रास्तों से
गुजरने वाली ये यात्रा
लंबी हो या छोटी
पर अकेले होकर भी
हम नहीं होते हैं अकेले

कोई तो है
जो हर पल संभालता है हमे
दुलारता है और ले आता है
हमे अपने घर
तब लेते हैं हम सुखद विराम
हमारे इसी विश्वास
इसी शक्ति को
प्रणाम प्रणाम प्रणाम।

*दिनेश मिश्र
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१८.......गृहप्रवेश

मुझे याद है
गृहप्रवेश की रस्म में
कुमकुम
में डुबाकर
लिए गए थे
मेरे..
सात कदमों
के निशां….
गर्व से दीप्त
हो उठी थी
उस क्षण.…
बरसों बीत गए
कदमों में
मोटी बेड़ियाँ
लग गईं….
लेकिन,
गृहलक्ष्मी
होने का
एहसास…
अब भी
बन्द है
तुम्हारी
तिजोरी में..…

वर्षा…..
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१९......मुहिम
एक नई मुहिम पर है
वो ,
बड़ी बड़ी गाड़ियां
आगे पीछे
हाथ में झाड़ू लिए
कैमरे के फ्लैश चमक रहे है
उनकी ही और
नारे भी गुंजित है
उनके नाम से
कुछ साथियों का हुजूम भी
हर समय  साथ
सत्तासीन योग्य घोषित हुए है अब
छवि उनकी  बनी है अभी अभी
स्वच्छ
क्या हुआँ जो पहले
कीच लिथड़ा था उनके कदमो से
अब तो तन और मन से
जुटे है वो
स्वच्छता अभियान में ।

प्रवेश सोनी
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20...........
मन की रेत पर

ये जो निशान बने हैं ताजे
कोई गुजरा है अभी
रेत से होकर

इंद्रधनुष उड़ा मन के आकाश में  
लहरें पीछा करती लपकीं हमारी ओर  
तो दूर तक बनते गए
स्मृतियों के सुंदर फूल

लौटते जल से डब-डबाए
कदमों के निशान
जैसे आंसू खिलखिलाती आँखों में

फिर गीली होने लगी है  मिठ्ठी निशानों को भरने लगा है मीठा समुद्र।
ब्रजेश कानूनगो 

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21........कदमों में हैं...

खिल अनार कहा मैंने
जब एक सिंहासन ने सुनी 
घुँघरू की आवाज़

जिसे आदत थी
ज़िल्ले इलाही, बादशाह-ए-हिंद सुनने की 
वो नहीं झेल पाया एक कनीज़ की अदा
चट् से चटक गया उसका पहला पाया 

वो चीन्हता था तलवारों की खनक
भाँप लेता था  सारे षड्यंत्र 
देख लेता था संधियों में छिपी टूट 

रानियाँ जीत में मिली थाल थी 
हारे हुए हाथियों की पीठ पर बैठ कर आती थी
और अपनी आँचल धर देती थी मूंठ पर 
उनके जिम्मे था सत्ता के सीने पर उगे
बाल सहलाने का काम 
एक दासी की पलकें सत्ता के सीने पर उगे
बालों से कई गुना ज्यादा शक्तिशाली थी 
और उसकी चुनरी उड़ने के लिए ज्यादा
स्वतंत्र थी रानियों के हिज़ाब से

ठुमरी लड़ी तलवारों से 
कथक ने मात दी भालों को 
ता था थैंया, ता था थैंया
भारी पड़ गया 
आगे बढ़ो और अल्लाह हो अकबर के उद्घोष पर

अनारकली के अलाप में
ज्यादा इतिहास है तबकात-ए-अकबरी से

एक दीवार के भीतर से आते
इस अलाप को सुनो
दीने-ए-इलाही की क़ब्र
इस दीवार के क़दमों में है

अखिलेश    
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22.....पहला क़दम

उबड़-खाबड़ काँटों भरे रास्ते
मीलों दूरियाँ
पहाड़ों की चोटियाँ
गहरी नदियाँ
विराट समुंदर
कुछ भी न रोकेगा तुम्हें
मुझ तक आने में
बस एक पहला क़दम उठाना होगा
पूरे मन से

जैसे उठाया था
घुटनों चलते हुए
अनायास ही एक दिन
काँपते हुए
रोमांच से भर
और जीत लिया था डर

जैसे आशिक उठाता है
महबूब की गली के लिए
बेसाख़्ता क़दम
जैसे दुल्हन आती है
आलता लगे पैरों से
कामनाओं की झाँझर बाँधे
दहलीज़ के भीतर

जैसे माँएँ चलती हैं
बच्चों की हर पुकार पर

फूलों पर ठहरी ओस में
मेरे आँसुओं की नमी
हवाओं में घुली 
साँसों की रागिनी
सब तो बुला रहे हैं तुम्हें
फिर तुम क्यों नहीं उठाते-
पहला क़दम।

अनिता 
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23...✍ख्वाब


अच्छा सुनो
एक एक कर खोलना
सारे तोहफ़े
सबसे पहले छोटे वाला
फिर उससे बड़ा

अच्छा सुनो
वो गोल सबसे अखीर में
तुम्हे कसम मेरी

सबसे छोटे में क्या निकला
अच्छा सुनो
तुम खुद ही बताते रहो

इत्ती देर 
इतने में तो मैं सारे तोहफ़े खोल देती
बताओ न क्या निकला
बताओ न...
बताओ भी...
कुछ बोलो ...
कहाँ गए...
बस यही बात मुझे नहीं सुहाती मुझसे बात मत करियो
....
अचानक कदमों की आहट में टूट गई नींद
खाली बिस्तर पर थी किताब
उसमें कुछ सूखे फूल
हां...यह ख्वाब ही था
हां...यह ख्वाब ही रहा

✍ जतिन  
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24....
धरती की कोख मे,
हुई आहट ,
उस वक्त .............,
होलै से ममता नेे दी किवाड़ पर दस्तक
नव सृजन ने  रूप धरा,
नौ माह की यात्रा कर 
इठलाये आँचल तले नन्हे कदम
पल पल सुख संघर्ष के साक्षी रहे कदम.........,

पर ये क्या?
विधाता ने लिखा भाग्य  कुछ और 
काल का कहर टूटेगा 
असमय चारो और 
छूटा साथ बिसूरती रही धरा 

पर........
बचाई उम्मीद की नमी
और 
स्मृतियों में सहेजे चेहरें में 
पा लिया  सूरज का उजास 

राखी तिवारी 
=======================================
सुबह

आज एक असीम सुखद अहसास 
की अनुभूति हो रही थी उसे ।

पहले भी जंगले में से छनकर 
आती हुई स्वच्छ 
वायु से साँस लेती थी वह 
मगर खुले आसमान में बहती 
त्रिविध वयार में  साँस लेने की 
बात ही कुछ और थी ।

उसे इससे पहले भी 
नरम - नरम घास और पत्तियाँ 
मिलती थी खाने को 
चहारदीवारी के भीतर 

लेकिन, स्वयं तोड़कर खाना 
घास - पत्तियाँ
देता था 
अपना एक अलग ही आनंद

इस सुखद अहसास में 
पता ही नहीं चला 
शाम होने का 

जब लौटने लगे 
दूसरे पशु पक्षी 
अपने -अपने बसेरों में 

तब तय किया उसने 
पीछे न हटाने का 
अपने बढ़े हुए कदम 

यद्यपि 
इधर वापस बुला रही थी 
अब्बू की बिगुल और 
सीटी की आवाज 

और उधर अँधेरे में सामने ही
दिखाई दे रहा था भेड़िया 
अपने लाल -लाल होंठो पर फेरते हुए 
नीली -नीली जीभ 
फंसा हुआ देखकर शिकार 

रात गहरा चुकी थी और
वापस लौट चुके थे 
 अब्बू होकर निराश 

लेकिन ,भेड़िया अब 
तैयार हो चुका था पूरी तरह 
हमले के लिए अपने शिकार पर

यह अच्छी तरह जानते हुए भी 
कि अभी तक कोई बकरी
 जीत नहीं सकी किसी भेड़िये से 

लेकिन, 
यह मुकाबला जरूरी है सोचकर 
पैंतरा बदलते हुए उसने अचानक 
हमला बोल दिया अपने 
दुश्मन पर ।

चकरा गया भेड़िया 
अचानक हुए इस हमले से 

बावजूद अपना पूरा जोर लगाकर 
करते हुए मुकाबला रात भर 
जब उसे लगने लगा मुश्किल पार पाना 
बकरी से तब
वह भाग खड़ा हुआ छोड़कर मैदान 
देखकर बकरी के बुलंद हौसले

पास ही पेड़ पर बैठी 
एक चिड़िया ,जो 
देख रही थी रात भर से 
इस पूरी लड़ाई को 
बोली अब सुबह होने वाली है 

तब कलरव करने लगी 
मिलकर सभी चिड़ये खुशी से 
मानो गा कर यशोगान 
मना रहीं हों जश्न 
बकरी के इस अदम्य साहस  का ।।

हरगोविंद मैंथिल 
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Friday, March 17, 2017

‘स्त्री  विमर्श’ शब्द हिन्दी साहित्य के केन्द्र में पर्याप्त रूप से चर्चित रहा है, इसकी अभिव्यक्ति का मूल स्वर नारियों की आत्मनिर्भरता एवं नारी-पुरूष की समानता के आस-पास घूमता हुआ दिखाई देता है  |रचनाओं में नारी स्वर स्व की मुक्ति के लिए मुखर  हुआ है तो कही उनका भोगा हुआ शोषण का सच भी उजागर हुआ |अंजू शर्मा ने अपनी कविताओं में स्त्री के लिए अलग ही आकाश की संरचना की |वो देह की कैद से परे आत्मा की अनंत उड़ान को भाषित करती है |एक अलग ही मुहावरा गढ़ा है स्त्री केन्द्रित रचनाओं का| कुछ अरसे पहले इनकी बेहद चर्चित  चालीस साला औरते  ने फेसबुक पर गज़ब का शौर मचाया था |वुमन्स डे पर वाट्स अप के विश्व मैत्री मंच पर इनकी कविताओं को पढ़ा गया |रचना प्रवेश पर अंजू शर्मा की कविताये सदस्य पाठको की प्रतिक्रियाओं के साथ प्रस्तुत है |



परिचय 
नाम : अंजू शर्मा
पता : 41-A, आनंद नगर,
इंद्रलोक मेट्रो स्टेशन के सामने 
दिल्ली 110035 विभिन्न साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं और ब्लोगस में कवितायें, कहानियां, लेख, रिपोर्ट्स, फिल्म समीक्षा और पुस्तक समीक्षाएं प्रकाशित!    उर्दू, पंजाबी, मराठी, गुजराती, राजस्थानी, उड़िया और नेपाली में कवितायें अनूदित!  कई साझा संकलनों में कवितायें प्रकाशित!  हिंदी समय, कविता कोश आदि अनेक साइट्स पर कवितायेँ प्रकाशित!  

परिकथा में प्रकाशित  कहानी 'आज शाम है बहुत उदास'  पंजाबी और उर्दू में अनूदित हुई!  जनसत्ता में प्रकाशित कहानी 'पत्ता टूटा डाल से' का अनुवाद हो रहा है। कहानी 'गली नंबर दो' का norwich writers centre में अनुवाद लेखकों के लिए अंग्रेजी में अनूदित अंश का शोकेस बुकलेट के तौर पर प्रस्तुतिकरण। 
2014 में कविता-संग्रह "कल्पनाओं से परे  का समय" बोधि प्रकाशन जयपुर  से प्रकाशित!   देश के कई प्रतिष्ठित मंचों सहित आकाशवाणी से कई बार कविता पाठ!  

कविता 'बेटी के लिए' चीन के 'क्वांगचो हिंदी विश्वविद्यालय, क्वांगचो, चीन'  में स्नातक स्तर के पाठकों के लिए पाठ्यक्रम में पढाई जा रही है!
 
पुरस्कार                     

*'इला त्रिवेणी सम्मान 2012' से सम्मानित।
*'राजीव गाँधी एक्सीलेंस अवार्ड 2013' से सम्मानित
*स्त्री शक्ति सम्मान 2014 से सम्मानित
*कविता संग्रह 'कल्पनाओं से परे का समय' के लिए 2015 में 'राजेन्द्र बोहरा कविता पुरस्कार 2014' द्वारा जयपुर में सम्मानित
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 आत्मा 
मैं सिर्फ 
एक देह नहीं हूँ,
देह के पिंजरे में कैद
एक मुक्ति की कामना में लीन
आत्मा हूँ,
नृत्यरत हूँ निरंतर,
बांधे हुए सलीके के घुँघरू,
लौटा सकती हूँ मैं अब देवदूत को भी 
मेरे स्वर्ग की रचना 
मैं खुद करुँगी,

मैं बेअसर हूँ
किसी भी परिवर्तन से,
उम्र के साथ कल
पिंजरा तब्दील हो जायेगा झुर्रियों से भरे एक जर्जर खंडहर में, पर मैं उतार कर, समय की केंचुली, बन जाऊँगी चिर-यौवना, मैं बेअसर हूँ उन बाजुओं में उभरी नसों की आकर्षण से, जो पिंजरे के मोह में बंधी घेरती हैं उसे, मैं अछूती हूँ, श्वांसों के उस स्पंदन से जो सम्मोहित कर मुझे कैद करना चाहता है अपने मोहपाश में, मैंने बांध लिया है चाँद और सूरज को अपने बैंगनी स्कार्फ में, जो अब नियत नहीं करेंगे मेरी दिनचर्या, और आसमान के सिरे खोल दिए हैं मैंने, अब मेरी उड़ान में कोई सीमा की बाधा नहीं है, विचरती हूँ मैं निरंतर ब्रह्माण्ड में ओढ़े हुए मुक्ति का लबादा, क्योंकि नियमों और अपेक्षाओं के आवरण टांग दिए हैं मैंने कल्पवृक्ष पर......
फोन की कांटेक्ट लिस्ट कितना अजीब है न, वह सोच रहा था, हरेक नंबर केवल कुछ अंकों का समूह भर नहीं न ही केवल इसे कहा जा सकता है महज एक संख्या हर फोन नंबर के साथ जुड़ी होती है स्मृतियों की जाने कितनी ही अलग-अलग शक्लें कुछ नम्बरों का अर्थ मिठास है , कुछ घोलते हैं जेहन में कड़वाहट, कुछ स्रोत हैं अंतहीन आत्मीयता के, और कुछ बिन बुलाये अतिथि से अजनबी जाने कब सेव कर लिए गए फोन में जैसे यह नंबर सामने आते ही, मानो बदल जाता है मन का मौसम भीने वसंत में एक मुक्त हंसी की खनखनाहट एक उत्तेजक देह-गंध के साथ रफ्ता-रफ्ता वजूद को घेर लेती है और यह नंबर जिसके सामने आते ही भूलकर सारी आपाधापी वह नन्हें शिशु में बदल जाता है, छुप जाना चाहता है माँ के आंचल में मानों ये अंक नहीं माँ का आशीष हों इस एक नंबर को भूल जाने या डिलीट करने का साहस तो वह शायद ही कभी कर पाए गो कि वह जानता है डिलीट करने से नंबर भर डिलीट होता है स्मृतियाँ नहीं तो ये लिस्ट महज एक लिस्ट नहीं बटनों की एक जुम्बिश या ऊँगली के अग्रभाग का स्पर्श खोल देता है द्वार एक भरी-पूरी दुनिया का जो धीमे-धीमे आन बसी है आपके मोबाइल फ़ोन में ..... *धर्म* जानवर दीन से नावाकिफ़ थे किसी ने सिखाया ही नहीं न भौंकने की कोई बोली हुई न मिमियाने का कोई धर्म कूँकने, चहचहाने, हिनहिनाने तक की भाषा अनजान रही धर्म की पाबंदी से प्रकृति मज़हब नहीं जानती किसी ने बताया ही नहीं चमकते चाँद की शीतलता को कि वह हिन्दू है या मुसलमान सूरज की तपिश ने कभी तवज्जो ही नहीं दी किसी खास धर्म को मचलकर झमाझम बरसती मूसलाधार बारिशें तय नही करना सीखी थीं कि बूंदों पर किस धर्म का हक़ ज्यादा है
मौसम भी बिंदास से चले आते रहे एक के बाद एक बिना जाने कि ये ईद का वक़्त है या ये दिवाली की रुत है या समय है बड़े दिन का न ज़मीन को मालूम था न ही जानता था आसमां कि किस धर्म की वजह से हरिया जाती थी जमीन और भगवा हो जाता था सुनहरा आसमान सनसनाती हवा सब के पसीने से तर जिस्मों को अब भी एक सी तासीर से सहलाती बस जानने लगे थे अभी तक साथ खेलते आये कुछ बच्चे कि वे ख़ुदा के बंदे हैं या भगवान के अनुयायी कि उन्हें याद करनी हैं क़ुरान की आयतें या कण्ठस्थ करने हैं श्लोक और मंत्र कि वे इंसान से बढ़कर अगर कुछ हैं तो हैं एक हिन्दू और दूसरा मुसलमान......





*माएं कभी नहीं मरा करतीं*
जाने कौन सा अमरफल खा
पैदा होती हैं ये माएं
जाने चख लेतीं हैं कहाँ से अमृतकलश से
छलकती बूंदे 
कि माएं अमर हो जाती हैं
उनके लिए भी नहीं, जिनके लिए
माँ और मृत्यु समानार्थी शब्द होते हैं

वे जिन्दा रहती हैं तो प्रेत बनी रहती हैं
और मरती हैं तो सदा के लिए जिन्दा हो जाती हैं
शापती हैं बुरे वक्त को
भिड जाती हैं मृत्यु से
हर तूफान में पतवार हो जाती हैं माएं

जादूगरनी होती हैं माएं
धर लेती हैं कोई भी रूप
पल में उदास धूसर से चटख लाल हो जाती हैं
चुपके से आले में धरकर सारे संताप
बटोरती हैं सन्तान के लिए झोली भर खुशियाँ
पलाश के फूल हो जाती हैं माएं

सहेजती हैं आंसुओं से चुटकी-चुटकी नमक
उँगलियों पर नाख़ून-सी जड़ी
जानती हैं झट से मौसम को बदलने का हुनर
बिछ जाती हैं कुसमय के कदमों में
दुर्दिनों में भी उत्सव हो जाती हैं माएं

जन्म और मृत्यु के सारे रहस्य जानती हैं वे
एक दिन जन्म और मृत्यु की दीवार तोड़
काल की छाती पर पांव धर
कालजयी हो जाती हैं
लौटती हैं बार-बार बिना पुकारे
भूत, वर्तमान और भविष्य की
देहरियों पर अनवरत घूमती
एक दिन कागज पर कविता बन सो जाती हैं माएं.........






चालीस साला औरतें 
इन अलसाई आँखों ने
रात भर जाग कर खरीदे हैं
कुछ बंजारा सपने
सालों से पोस्टपोन की गई
उम्मीदें उफान पर हैं
कि पूरे होने का यही वक्त
तय हुआ होगा शायद

अभी नन्हीं उँगलियों से जरा ढीली ही हुई है
इन हाथों की पकड़
कि थिरक रहे हैं वे कीबोर्ड पर
उड़ाने लगे हैं उमंगों की पतंगे
लिखने लगे हैं बगावतों की नित नई दास्तान,
सँभालो उन्हे कि घी-तेल लगा आँचल
अब बनने को ही है परचम

कंधों को छूने लगी नौनिहालों की लंबाई
और साथ बढ़ने लगा है सुसुप्त उम्मीदों का भी कद
और जिनके जूतों में समाने लगे है नन्हें नन्हें पाँव
वे पाँव नापने को तैयार हैं यथार्थ के धरातल का नया सफर बेफिक्र हैं कलमों में घुलती चाँदी से चश्मे के बदलते नंबर से हार्मोन्स के असंतुलन से अवसाद से अक्सर बदलते मूड से मीनोपाज की आहट के साइड एफेक्ट्स से किसे परवाह है, ये मस्ती, ये बेपरवाही, गवाह है कि बदलने लगी है ख्वाबों की लिपि वे उठा चुकी हैं दबी हँसी से पहरे वे मुक्त हैं अब प्रसूतिगृहों से, मुक्त हैं जागकर कटी नेपी बदलती रातों से, मुक्त हैं पति और बच्चों की व्यस्तताओं की चिंता से, ये जो फैली हुई कमर का घेरा है न ये दरअसल अनुभवों के वलयों का स्थायी पता है और ये आँखों के इर्द गिर्द लकीरों का जाल है वह हिसाब है उन सालों का जो अनाज बन समाते रहे गृहस्थी की चक्की में ये चर्बी नहीं ये सेलुलाइड नहीं ये स्ट्रेच मार्क्स नहीं ये दरअसल छुपी, दमित इच्छाओं की पोटलियाँ हैं जिनकी पदचापें अब नई दुनिया का द्वार ठकठकाने लगीं हैं ये अलमारी के भीतर के चोर-खाने में छुपे प्रेमपत्र हैं जिसकी तहों में असफल प्रेम की आहें हैं ये किसी कोने में चुपके से चखी गई शराब की घूँटें है जिसके कड़वेपन से बँधी हैं कई अकेली रातें, ये उपवास के दिनों का वक्त गिनता सलाद है जिसकी निगाहें सिर्फ अब चाँद नहीं सितारों पर है, ये अंगवस्त्रों की उधड़ी सीवनें हैं जिनके पास कई खामोश किस्से हैं ये भगोने में अंत में बची तरकारी है जिसने मैगी के साथ रतजगा काटा है अपनी पूर्ववर्तियों से ठीक अलग वे नहीं ढूँढ़ती हैं देवालयों में देह की अनसुनी पुकार का समाधान अपनी कामनाओं के ज्वार पर अब वे हँस देती हैं ठठाकर, भूल जाती हैं जिंदगी की आपाधापी कर देती शेयर एक रोमांटिक सा गाना, मशगूल हो जाती हैं लिखने में एक प्रेम कविता, पढ़ पाओ तो पढ़ो उन्हें कि वे औरतें इतनी बार दोहराई गई कहानियाँ हैं कि उनके चेहरों पर लिखा है उनका सारांश भी, उनके प्रोफाइल पिक सा रंगीन न भी हो उनका जीवन तो भी वे भरने को प्रतिबद्ध हैं अपने आभासी जीवन में इंद्रधनुष के सातों रंग, जी हाँ, वे फेसबुक पर मौजूद चालीस साला औरतें हैं... ---अंजू शर्मा

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प्रतिक्रियायें

विजय राठौर 
अंजू शर्मा को पहली बार पढ़ रहा हूँ।बहुत परिपक्व रचनायें हैं।आत्मा में स्त्री की अस्मिता की अच्छी पड़ताल की गई है।बहुत अच्छी भाषा ,शिल्प और कहन की नई शैली पाठक को चमत्कृत करती है।स्त्री की नियति और सामर्थ्य दोनों का शानदार चित्रण।एक दम नये विषय फोन की काँटेक्ट लिस्ट पर नये रिश्तों की खोज अद्भुत है।
धर्म एक नये दृष्टिकोण सुझाती है।इसमें भी कहन की ताजगी है।इनकी कवितायें पाठक पर असर करती है।शिल्प का नयापन और भाषा की बुनावट उन्हें नये कवियों से अलग करती है।
पलाश के फूल हो जाती हैं माएँ
वाह।क्या उपमा है।ऐसी कई नई उपमाओं,प्रतीकों और नये बिंबों की बहुतायत उनकी कविताओं में हैं जो सहसा बाँध लेती हैं पाठकों को।
एक दिन कागज पर कविता बन सो जाती हैं माएँ
वाह अद्भुत।
अंजु शर्मा को पढ़ कर आज का दिन अच्छा गुजरेगा।उन्हें बहुत बहुत बधाई।विश्व मैत्री मंच की जितनी तारीफ की जाय कम है।
विजय राठौर
 ‪+91 96620 95464‬: आत्मा,बेहद प्रभावशाली  कविता ,ऐसा लगा जैसे विशाल समुद्र में से अनगिनत रत्न प्राप्त कर लिये हों.अपेक्षाओं और नियमों को  कल्पवृक्ष पर टाँग कर मुक्त विचरने वाली कवियित्री को मेरा साधुवाद .
धर्म कविता भी बहुत सुन्दरता के साथ अभिव्यक्त की गयी है इन्सानियत के कैनवास पर बडी भावपूर्ण व्यंजना.प्रतिकों और बिंम्बो के माध्यम से बहुत प्रभावशाली ढंग से कविता रूपी चित्र उकेरे हैं.अंजू जी इसके लिए बधाई की पात्र हैं .
सुरेन्द्र कुमार सिंह चांस  आज पटल पर अंजू जी है उनकी कवितायेँ उस एहसास का प्रतिनधत्व कर रही है जिसे हम महसूस करते हैं।हम कल महिला दिवस की बातो से कितना दूर है आज ये दुरी होनी नही चाहिए।यहां जहां हम है आज इन कविताओ में अगर अगर हम इनसे इत्तिफ़ाक रखते है तो हमे यहीं से आगे चलना है आगे चलने का आसय इतना सा है कि इस एहसास के साथ जीना है अपने लिए परिवार के लिए समाज के लिए और पूरी दुनिया के लिए।
बहुत बहुत अंजू  जी
का और धन्यबाद पटल का इस एहसास से हमे रूबरू कराने के लिए।
सुरेन्द्र कुमार सिंह चांस

‪+91 81099 90582‬: बधाई अंजू बेहतरीन कविताओं के लिए।
माँ, आत्मा और धर्म तीनों हमारे जीवन के यथार्थ से जुड़ी रचनाएँ।
आत्मा के रहस्यमयी अस्तित्व को आकार देती रचना आत्मा
जादूगरनी होती हैं माँएँ। तभी तो अपने बच्चों के मन की जानकर फौरन जवाब देती हैं।
सत्य कहा अंजू जो धर्म नहीं जानते वे ही जानवर होते हैं।

डॉ.लता 
 अंजू शर्मा जी कविताओं पर 
1 आत्मा
नारी की आत्मा का मुक्त स्वर मुखर करती कविता 
* मेरे स्वर्ग की रचना मैं खुद करूंगी।
स्वाभिमान के साथ आत्मबल को प्रस्तुत करती पंक्ति।
* उम्र के साथ पिंजरा तब्दील हो जायेगा।
रूढ़ि के बंधन की छटपटाहट दर्शाती पंक्ति।
*आसमान के सिरे खोल दिए हैं मैंने।
स्वयम के बूते अपना अस्तित्व तलाशती नारी ।
2 फोन की कांटेस्ट लिस्ट 
फोन नम्बर बिम्ब बनाते मानस पर तभी तो फोन नंबर देखते ही मुखाकृति लेने लगती है भिन्न आकार सुन्दर अभिव्यक्ति।
 हर फोन नम्बर के साथ जुड़ी होती हैं स्मृतियां।
 नम्बर सामने आते ही बदल जाता है मन का मौसम।
3 धर्म
वास्तविक धर्म से एकाकार करती कविता
* चाँद और सूरज , बूंदों का धर्म निरपेक्ष होना।
सीख है धर्म के नाम पर वैमनस्यता फ़ैलाने वालीं के लिए।
वे इंसानियत से बढकर अगर कुछ हैं तो एक हिन्दू दूसरा मुसलमान।
व्यंग्य है उक्त पंक्तियों में ।
4 माँ कभी मर नहीं करती
* माँ  और मृत्यु में भेद, माँ की कभी मृत्यु नहीं होती। बच्चों की चिंता देह मिटने पर भी उसे मिटने नहीं देती। यही कारण है माँ
* तूफान में पतवार, जादूगरनी है माँ, दुर्दिन में उत्सव माँ,कालजयी है माँ। 
सभी कविताएँ बहुत ही सुंदर, जीवन से ज्यादे सन्देश देती ।
बधाई अंजू जी🌹
डॉ लता
 ‪+91 70326 13786‬: अंजू शर्मा की की कविताएं प्रभवशाली और दिल तक उतरने वाली है ,खास तौर पर धर्म के ऊपर उनकी कविता सच्चाई को आइना दिखाती है,चाँद की शीतलता और बारिश की बूदें कभी इंसानो में फर्क नही करती,,और माँ की जीवटता उन्हें मरने नही देती,,,अच्छी कविताएं ,,,बधाई हो अंजू जी
- ‪+91 94258 43940‬: मैने बाॅध लिया है चाॅद और सूरज को अपने बैगनी स्कार्फ में.....बहुत अच्छी रचना ।इसके अलावा फोन के अंकों संबंधी रचना में छुपी हुई अनुभूतियाॅ और यादें वाह बधाई
- ‪+91 97129 21614‬: सुप्रभात vmm🌄🙏 आज विभिन्न विषयों पर अंजू जी की मुक्त छंद में भी लय में बहती बेहतरीन कवितायेँ और उतना ही अदभुत निदा जी की पंक्ति!
मैं सिर्फ 
एक देह नहीं हूँ,
देह के पिंजरे में कैद
एक मुक्ति की कामना में लीन
आत्मा हूँ, मैं बेअसर हूँ
किसी भी परिवर्तन से..
और आसमान के सिरे खोल
दिए हैं मैंने,
अब मेरी उड़ान में कोई 
सीमा की बाधा नहीं है। अमर्त्य आत्मा की सही परिभाषा।
'फोन की कांटेक्ट लिस्ट' में एक ऐसा विषय छू लिया जो सभी का है। हर फोन नंबर के साथ जुड़ी होती है
स्मृतियों की जाने कितनी ही अलग-अलग शक्लें! कितना सही!
ऊँगली के अग्रभाग का स्पर्श
खोल देता है द्वार 
एक भरी-पूरी दुनिया का
जो धीमे-धीमे 
आन बसी है आपके मोबाइल फ़ोन में .....सही बात बिलकुल सही अंदाज में कही गई।
'धर्म' कविता में समाहित सांप्रदायिक सदभाव के विचार मन मस्तिस्क पर गहरा प्रभाव छोडते हैं। पशु पंखियों का कोई धर्म
नहीं होता।प्रकृति मज़हब नहीं जानती, पर मानव ने
धर्म को इजाद किया कुछ मानव से बढ़कर बन गए हिन्दू या मुसलमान......इस कविता में हर पंक्ति के मध्य एक छुपी पंक्ति है जो पठन के वक्त दिख जाती है। मानव ही एक ऐसा प्राणी है जो प्रकृति के विनाश के साथ अपना विनाश करने पर तुला है।

‪+91 97129 21614‬: 'माँ' समस्त ब्रह्माण्ड को हिला देने वाला एक ही शब्द है।
'वे जिन्दा रहती हैं तो प्रेत बनी रहती हैं
और मरती हैं तो सदा के लिए जिन्दा हो जाती हैं' इस पंक्ति में एक दर्द भी छिपा है कहीं। 
कविता के माध्यम से इतनी सुन्दर मन के भावों को उकेरा है। 💐💐💐💐
Saras Darbaari:
 वाह ...वाह ....वाह ...!... हर कविता जोरदार ..
आत्मा की कितनी सुंदर व्याख्या ...
उम्र के साथ कल
पिंजरा तब्दील हो जायेगा
झुर्रियों से भरे
एक जर्जर खंडहर में,
पर मैं उतार कर,
समय की केंचुली,
बन जाऊँगी 
चिर-यौवना....बेहतरीन ...!
फोन की कांटैक्ट लिस्ट ....गजब की रचना ...!
कितना खूबसूरत खयाल ...!! वाकई हर नंबर के साथ एक स्मृति, एक चेहरा , और कुछ एहसास जुड़े रहते हैं जो अनायास ही वह नंबर देखकर चेहरे पर उभर आते हैं । कितना सुंदर अवलोकन ....!
तो ये लिस्ट महज एक लिस्ट नहीं
बटनों की एक जुम्बिश या
ऊँगली के अग्रभाग का स्पर्श
खोल देता है द्वार 
एक भरी-पूरी दुनिया का
जो धीमे-धीमे 
आन बसी है आपके मोबाइल फ़ोन में .....कितनी प्यारी बात ...!!
एक प्रकृति ही तो है जिसने कभी भेद भाव नहीं किया ....सबको एकसा ...'बाँटा' है ....
और धर्म ने भी  'बाँटा' है ...इंसान को ....मजहबों में ....!
माएँ कभी मारा नहीं करतीं ....एक अल्टिमेट कविता ...माँ पर इतनी सुंदर कविता नहीं पढ़ी 
जादूगरनी होती हैं माएं
धर लेती हैं कोई भी रूप....वाह !
जानती हैं झट से मौसम को बदलने का हुनर....अद्भुत !
एक दिन कागज पर कविता बन सो जाती हैं माएं....जो गुद जाती है दिल पर ...!!!
अंजु जी हम तो आजसे आपके ज़बरदस्त फ़ैन हो गए ....सच ....!
शुक्रिया संतोष दी , अंजु से मिलाने के लिए 

91 94310 94596‬: अंजू शर्मा की कहानियों से पहले वाकिफ हुआ । बाद में कविताओं से । वह कहानी, कविता दोनो विधाओं में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करती हैं। यहां प्रस्तुत तमाम कविताएं अपने कहन के टटकेपन से नये आस्वाद का असर पैदा करती हैं। पहली कविता ' आत्मा' को पढ़ते हुए मेरी आंखों में इजोरा डंकन की नृत्यरत छवि, उसकी मुक्ति की कामना की बेलौस अभिव्यक्ति घूम गई। अगर इस कविता को स्त्री की मुक्ति की कामना में रूपायित करके देखें तो पूरी कविता न सिर्फ खुल जाती है अपने कहन में भी विस्तार पा जाती है। ' और आसमान के सिरे खोल / दिये हैं मैंने / अब मेरी उड़ान में कोई/ सीमा बाधा नहीं है। ' यह आसमान का सिरा खोल लेने , नियमों और अपेक्षाओं के आवरण कल्पवृक्ष पर टांग देने नये संयोजन अद्भुत हैं। दूसरी कविता ' फोन की कांटेक्ट लिस्ट ' अपने विषय की नवीनता और कहन की सघनता से हमारे समय की आधुनिकताबोध को डिपिक्ट करती हे। यह मोबाइल के बहाने हर आधुनिकता पर स्यापा के बजाय ,उसके होने को नई अर्थ छवियों से भरती है। ' धर्म' कविता में धर्म को लेकर किसी यूटोपिया को रचने के बजाय अंजू शर्मा ने कहीं ज्यादा हकीकी बात कही है। यह कविता  प्रकृति के तमाम उपादानो के जरिये धर्म के अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह खड़े  करती है और प्रकारांतर से इंसानी फितरत पर गहरे तंज भी करती है। ' माएं कभी नहीं मरा करतीं' भी एक महत्वपूर्ण कविता है। हिन्दी में मां को लेकर बहुत सारी कविताएं लिखी गई हैं। यह कविता अपने कहन की ताजगी से और नये बिंबों से संवेदित करती है, ',सहेजती हैं आंसुओं से चुटकी- चुटकी नमक / उंगलियों पर नाख़ून सी जड़ी।'
इन कविता में जो अंतर्लय है, वह पाठक को बांधती है और सप्रयास की गई कसीदाकारी नहीं होने से इसकी संप्रेषणीयता सहज बन पड़ी है। 
इन बेहतरीन कविताओं के लिए अंजू शर्मा को बधाई । विमैमं को धन्यवाद ।
 - ‪+91 76919 85478‬: सभी को सादर अभिवादन ।  आज पटल पर अंजू शर्मा जी की रचनाएँ पढ़ने का सुअवसर है। ऐसे -ऐसे तो रत्न छिपे हैं हमारे इस मंच में और इनको हमारे समक्ष लाने का श्रेय और साधुवाद हमारी प्रिय संतोष जी को। 
आदरणीया अंजू की सभी रचनाएँ बहुत ही भावप्रवण और सशक्त हैं । माँ, धर्म,  फोन कांटेक्ट लिस्ट,  आत्मा सभी विषयों पर इनकी लेखनी प्रखर और प्रभावी बन पड़ी है। बहुत ही सुंदर बिंबों के साथ सहज प्रवाह सभी कविताओं में परिलक्षित है। आपको बहुत -बहुत बधाई और शुभकामनाएँ ।🙏😊🌹🌹🌹
आदरणीया और प्रिय सखी रत्ना जी का उजास बिखेरता संचालन और मुझे इस बात की उत्सुकता है कि आज कौन सा नवीन शब्द शब्दावली में जोड़़ने वाली हैं हमारी "रत्नावली" ।🌹🌹🌹😊
इस मंच पर इतनी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ना,  अपनी लेखनी को परिमार्जित करने के लिये प्रेरणा देता और उत्साहित करता है।
91 84005 45999‬: आत्मा
एक सुंदर कविता है और ये आत्मा अगर शरीर धारण करे तो वो होगी एक स्त्री।
सचमुच दुनिया की सबसे सुंदर और शक्तिशाली स्त्री।
ऐसा न हो पाने में किसी का दोष नही है ये तो उस पर निर्भर करता है कि उसे देह पसन्द है या नही।अगर पसन्द है तो वो है जिदगी नही पसन्द है तो बस आत्मा और आत्मा बिना देह के कुछ करने की स्थिति में नही है इस दुनिया में।है भी तो बहुत सीमित।
सुरेंद्र कुमार सिंह चांस
- ‪+91 89895 45762‬: पिंजरे में फङफङाते परिंदों की बेचैनी से हमारे इस समय के दुंरगे व्यवहार को उघाङती काव्यचिंताऔ ने महिलाऔ के नाम पर दर्ज इस दिन को सार्थकता ,पदान की.अंजू शर्मा जी को हार्दिक बधाई

91 94222 02645‬: आत्मा- 
"मेरे स्वर्ग की रचना मैं ख़ुद करूँगी"
इन पंक्तियों में स्त्री स्वर्ग की कामना तो कर रही है लेकिन स्वर्ग की संरचना नितांत अपनी रखने की तमन्ना लिये।
उसकी यही ज़िद मुझे भा गयी
जहाँ उसका स्व अनमोल है।
धर्म 
सच में यही आस्थाएँ हमारी भी क्यों नहीं हो सकतीं।
मॉंएं......,
माएँ कालजयी होती हैं। वाह क्या सोच 👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻

सतीश कुमार सिंह 
अंजू शर्मा की कविताएं अभी चल रहे स्त्री लेखन से इतर अपनी विशिष्ट मौलिक छवि उकेरने में समर्थ हैं । इन कविताओं की खासियत यह है कि यहाँ शिल्प ,कथ्य और संवेदना को लेकर किसी टेक्निक का सहारा नहीं लिया गया है । जो विचार और भाव गुम्फित हुए हैं उसने कविता के रूप में बाहर आने का रास्ता खुद तलाश लिया है । अच्छी बात यह है कि कहीं पर भी इन कविताओं पर कोई आक्षेप नहीं है बस सहज सरल और तरल विचार भावबोध बनकर रूपायित हो उठा है । आत्मा कविता में भारतीय वांगमय के चिरंतन दर्शन का उद्घोष है और नए मनुष्य की अनुभूति और उसे आत्मिक स्वतंत्रता के साथ समझने का इशारा भी है । फोन की कांटेक्ट लिस्ट के साथ मनुष्य के संबंधो का मनोविज्ञान उसकी सोच के साथ खुलता प्रतीत होता है वहीं धर्म पर जो प्रकृति और पशु पक्षियों के माध्यम से जो बात कही है वह नया नहीं है बल्कि कहने का शिल्प बिल्कुल अलहदा है जो प्रभावित करती हैं । माँ को लेकर सभी भाषा साहित्य में ढेर सारे रूपक हैं । उसमें ममत्व का प्राधान्य है किंतु अंजू शर्मा ने अपने जायों के लिए मृत्यु से भी होड़ लेकर अमरता पद की अधिकारिणी जिस माँ का चित्र इस कविता में खींचा है वह अद्भुत है । संभवतः अंजू शर्मा के काव्य लेखन से मैं भी पहली बार गुजर रहा हूँ । इन दिनों कविता के क्षेत्र में महिला लेखन में रेखा चमोली की रचनाओं से मैं आश्वस्त रहा आज अंजू शर्मा ने भी आश्वस्त किया कि समकालीन कविता में नई कवयित्रियों की एक नई काव्य भूमि हिंदी में तैयार हो रही है । बधाई  अंजू जी । पटल का आभार इन कविताओं से रूबरू कराने के लिए ।
सतीश कुमार सिंह

 ‪+91 98108 38832‬: अंजु शर्माजी की सभी कविताएँ सम्वेदना के धरातल पर गहरा स्पर्श करने वाली और रचाव के स्पर्श पर परिपक्व कवयित्री की रचनाएँ हैं।उनकी पहली कविता पढ़कर ऋग्वेद की ऋषिका वागाम्भृणी की याद आ गई जो महत्वपूर्ण 8 ऋचाएँ रचकर भी चर्चा और उल्लेख के परे है।ये ऋचाएं देवीसूक्त के नाम से प्रचलित हैं।वही प्रखर और ओजपूर्ण स्वर।यह स्वर अब खोए नहीं,यह ज़रूरी है।

 ‪+91 97140 17001‬: 🙏🏻सादर नमन VMM अंजू शर्मा जी की चार कविताओं को मैंने कई बार पढ़ा। बेहद उम्दा कवयित्री है वो यह कहने की जरूरत नहीं। शब्दों का चयन औऱ भावनाओं की अभिव्यक्ति बेहतरीन है। बधाईयाँ औऱ शुभकामनाएं अंजू जी 🙏🏻💐
 ‪+91 97537 48806‬: अंजू शर्मा जी की कविताएँ अनूठी हैं।'आत्मा'स्त्री की अस्मिता को इंगित करती शास्वत सत्य का नाद करती हुई सी।जिसने टाँग दिये नियमों और अपेक्षाओं के आवरण किसी सामान्य वृक्ष पर नहीं अपितु कल्पवृक्ष पर।
फोन की कांटेक्ट लिस्ट एक अभिनव प्रयोग ,कांटेक्ट नंबर मात्र से उपजते मनोभाव ।
धर्म' कहन का अलग अंदाज।
काल जयी माँएं कविता बन सो जाती हैं ।बहुत खूब।
बिम्ब नये टटके पन सहज कथ्य व सरल कहन की प्रवाहमयी प्रभावी कविताओं के लिये, अंजू जी बधाई स्वीकारें।
91 98204 43014‬: अंजू शर्मा  जी आपने सच ही कहा है, कुदरत धर्मनिरपेक्षता सीखाती है। बादल मंदिर पे बरसता है और मस्जिद पर भी गिरता है।पानी इमाम की प्यास बुझाता है और पूजारी की तृष्णा। फूल मुर्तीयों पे चढ़ाये जाते हैं और मज़ारों की शान बढ़ाते हैं।
सभी रचनाएँ दिल को छू गई। 
मेरी शुभकामनाएँ।
Pravesh Soni: मैंने बांध लिया है 
चाँद और सूरज को
अपने बैंगनी स्कार्फ में,
जो अब नियत नहीं करेंगे
मेरी दिनचर्या,......यही तो कविता की ताकत है ,बेचारगी ,दयता से भरी स्त्रियाँ अब नहीं ,कभी नहीं |लाजवाब हु इस कविता को पढ़ कर ......लीक से हटकर अपनी अलग ही आभा से रोशन है यह कविता ...देह के पिंजरे से मुक्त नियमों और अपेक्षाओं के आवरण टांग दिए कल्पवृक्ष पर ....वाह ,यह कविता हौसले का दिव्यास्त्र है |
 फोन की कान्टेक्ट लिस्ट ...सच में एक दुनियां है ,भिन्न भिन्न नम्बरों में ,अलग अलग चेहरों और उनसे जुड़े भाव को सहेजे हुए ...यथार्थ आज का |
धर्म ....बहुत सही लिखा ,कौन बांटता है रंगों को धर्मो में और इंसान को इंसानियत से |इस कविता के भाव को आज  सबको समझने की जरुरत है |एक बात खटकी कि इंसान से बढ़कर अगर कुछ है .......यहाँ इंसान से बढ़कर कुछ होता ही नहीं |हिन्दू और मुसल्मा  इंसान के फितूर ने बनाए है |
माँ की कविता अद्दभूद ,नए बिम्ब सच में माये कभी नहीं मरती ..मरना भी नहीं चाहिए 
अंजू तुम्हारा लेखन लाजवाब कर देता है ...लिखती रहो और खूब सम्मान पाओ ,अनंत शुभकामनाएं 
🌹🌹🌹🌹

- Rupendra raj: अंजू जी की कविताएँ बेबाकी की रचनाएँ हैं,महिला सशक्तता का उदाहरण पहली कविता में प्रखर हो कर मुखर हुआ है।शिल्प में प्रतीकों का समावेश इसे विशेष बना रहा है।
फोन की कल्पना उसके नम्बरों की संख्या में भावनात्मकता का जुड़ाव ,अच्छी रचना अपनी मौलिकता के साथ।
धर्म के प्रारुप कटाक्ष करती रचना विचारों की बोधगम्यता को दर्शाती है।
माऐ कभी नहीं मरा करती सुंदर कालजयी चित्र खींचा है कविता में।
सभी कविताएँ चिरपरिचित विषय पर होते हुए भी कहन की मौलिकता रखती हैं।
मंच को इन कविताओं सुशोभित किया संतोष दी ने ,हर बार रचनाकारों को मंच दिलाने का संकल्प गंभीरता से पूर्ण करती हैं आप।
निदा जी का शेर बेहतरीन।अमर जी की टिप्पणी से इत्तेफ़ाक़ रखतीं हूँ।👍😊

अल्का अग्रवाल  अंजू जी आज अभी आपकी सारी कवितायें पढी 
पढ कर लगा जैसे हर कविता में तुम समायी हो
आत्मा को सुनकर 
आत्मा से परे हो जाना 
और तन मन को एकाकार करती आपकी कविता सीधे हृदय पर अंकित होती प्रतीत लगती है
फोन जो आज परिवार को contact list में सहेजे तो है पर हकीकत में इस फोन की वजह से ही अपने दूर हो रहे हैं 
धर्म सिर्फ इंसान की जायदाद है 
प्रकृति तो परे है इस धर्म से दूर दूर तक
यही कहती आपकी कविता इंसानी रिश्ते को मजबूती प्रदान करती है
मां शब्द अपने में ही पूरा महाग्रंथ है इसकी विवेचना काव्य में कर पाना 
शायद इसी का नाम अंजू है
आपका बहुत आभार जो पटल पर ये कवितायें देकर मानव मन को सहेज रूप से टटोल पायीं आप
आपका लेखन यूं ही अनवरत चलता रहे 
 इन्ही शुभकामनाओं के साथ
अलका अग्रवाल
आगरा

दिनेश गौतम  बहुत दिनों के बाद मंच के पटल पर फिर एक चमत्कृत कर देनेवाली प्रतिभा के दर्शन हुए। अंजू शर्मा सचमुच बहुत संवेदनशील और  सजग कवयित्री हैं । पटल पर आज प्रस्तुत उनकी कविताएँ अपनी श्रेष्ठता का उद्घोष कर अपना लोहा  मनवा ही लेती हैं। 
अंजू की पहली कविता 'आत्मा' आज की मुक्तिकामी नारी की आकांक्षाओं का स्वर है।  बहुत आत्मविश्वास से भरी आज की नारी की सोच की प्रतिनिधि यह  कविता  पुरुषवादी वर्चस्व को चुनौती देती, ताल ठोंकती सी लगती है। कविता में साफ़ दिखती है परावलम्बन को ठोकर मारती स्त्री, जिसे किसी भी बाधा की परवाह नहीं क्योंकि अब  वह अपना स्वर्ग स्वयं रचने का साहस  रखती है। किसी भरी नदी के उद्दाम वेग की तरह सब कुछ बहा देने का सामर्थ्य उसके पास आ गया है। कवयित्री का आत्मविश्वास अपने शिखर पर दिखता है जब वह कहती है -
" लौटा सकती हूँ अब देवदूत को भी
मेरे स्वर्ग की रचना मैं ख़ुद करूँगी।"
और - 
"मैंने बाँध लिया है
चाँद और सूरज को
अपने बैंगनी स्कॉर्फ में
जो अब नियत नहीं करेंगे
 मेरी दिनचर्या ।"
इस स्वतंत्रचेता नारी को अब किसी प्रलोभन में बंधने का भी भय नहीं।  अब वह नियमों और अपेक्षाओं के दायरे में बांध दी गई पहले की औरत नहीं रही। 
दूसरी कविता -' फ़ोन की कांटेक्ट लिस्ट' नई कथन भंगिमा से युक्त एकदम ताज़े कहन की कविता है। लिस्ट के प्रत्येक फ़ोन नंबर के साथ जुड़ा होता है उस व्यक्ति का चेहरा, जिसकी एक छवि हमारी स्मृतियों में भी होती है ,खट्टी या मीठी, कटु या तिक्त। सचमुच नंबरों पर उँगलियों की छुअन मात्र से उस व्यक्ति से जुडी स्मृतियों की पूरी दुनिया ही खुल जाती है। कविता का नयापन बहुत प्रभावित करता है। किसी  आप्त वाक्य की तरह ये अनमोल और सत्य कथन भी इस कविता में हमारे हाथ लगता है -
" डिलीट करने से नंबर भर डिलीट होता है, स्मृतियाँ नहीं।"
'धर्म' शीर्षक कविता आज की फिरकापरस्ती और धर्म के नाम पर आदमी को आदमी से बाँटती संकीर्ण विचारधारा को एक उदात्तमना कवयित्री का करारा जवाब है । कविता का समूचा कथ्य हिन्दू,  मुसलमान या ईसाई के रूप में बँट चुके लोगों को यह बताने की कोशिश है कि प्रकृति के उपादान भी मानव को सिर्फ़ मानव के रूप में देखते हैं।
"न ज़मीन को मालूम था
न ही जानता था आसमान
कि किस धर्म की वजह से
हरिया जाती थी ज़मीन
और भगवा हो जाता था 
सुनहरा आसमान। "
'माँएँ कभी नहीं मरा करती' मन को छू लेने वाली कविता है। माँ पर लिखी गई कोई भी कविता मुझे रुला जाती है। दरअसल इसलिए कि हम सब की माँएँ एक जैसी होती हैं। बहुत खूबसूरत शिल्प है इस कविता का । कविता में कथ्य के नएपन के साथ ही बहुत नर्म संवेदनाएं हैं जो अंतर्मन को गहराई तक भिगो जाती हैं।
अंजू शर्मा की कविताएँ बहुत प्रभावी हैं। सटीक और भावानुरूप शब्दों से सजी इन कविताओं को पढ़ना सचमुच एक सुखद अनुभव है। कथ्य के दुहराव से अटी पड़ी आज की हिंदी कविताओं की उमस में अंजू शर्मा की कविताएँ किसी सुखद ठंडी फुहार की तरह महसूस होती हैं। मैं इन कविताओं से बहुत प्रभावित हुआ ,या यूँ कहूँ कि उनकी दमदार लेखनी ने मुझे प्रभावित होने पर विवश कर दिया। विश्व मैत्री मंच के कुछ एकदम अलग चमक बिखेरने वाले सितारों की पंक्ति का एक नायाब सितारा हैं अंजू शर्मा। उन्हें तथा उनसे परिचित कराने वाली संतोष जी को मेरी ढेरों बधाइयाँ।
                    - दिनेश गौतम

 Anju Sharma: क्या लिखूं और कैसे आभार व्यक्त करूँ यदि कोई पूछे तो यही कहूँगी कि लिखकर यदि कोशिश भी करूँगी तो नाकाम रहूँगी क्योंकि शब्द भावों को, आभार को, खुशी को और संतुष्टि को पूरा पूरा कहाँ बयां कर पाते हैं।  🙏🏼🙏🏼
संतोष जी, बहुत आभारी हूँ आपकी कि आपने कविताओं को यहां प्रस्तुति के योग्य समझा।  चयन का श्रेय भी आपको ही देना चाहूंगी और यहां आनेवाली हर प्रतिक्रिया में थोड़ा थोड़ा आपको देखती महसूस करती रही। हृदय से धन्यवाद 🙏🏼🙏🏼
मैं कुछ अरसे से कविताएँ कम लिख रही थी। ज्यादा समय और तवज्जो कहानियों को ही देती रही पर इस माध्यम की सबसे बड़ी सार्थकता यही है कि यह आपको सतत लिखने के लिए प्रेरित करता है।  आज वाली कविताओं में आत्मा को छोड़कर बाकी पिछली छमाही में लिखी कविताएँ हैं क्योंकि मैंने पिछले एक साल कविता और कहानी दोनों को समय दिया है।  कविताएँ आपकी कसौटी पर खरी उतरीं तो लगा लेखन सार्थक हो गया।  आप सभी को बहुत बहुत धन्यवाद, शुक्रिया, मेहरबानी 🙏🏼🙏🏼🍁🍁

91 99878 60479‬: अंजू शर्मा जी आज आपकी कवितायें पटल पर दिल खोलकर रख दिया है आपने, सचमुच वी.एम.एम.की आभारी हूँ, वह वहीं होता तो हम इतने अच्छे लेखन से महरूम रह जाते
आत्मा कविता ने स्त्री की शक्ति को साबित कर दिया है कि अब उसे अपना स्वर्ग स्थापित करने के लिये किसी देवदूत की आवश्यकता नहीं, समय को बस में कर लिया है उसने, नियमों और अपेक्षाओं के आवरणों को भी दूर कर दिया है,
फोन की कांटेक्ट लिस्ट भी रिश्तों और स्मृतियों का अंबार होती हैं, इस विषय पर भी कविता लिखी जा सकती है ,यह तो हमने सोचा भी न था,
धर्म का तंग लिबास सिर्फ इंसान ही पहनते हैं,सृष्टि के किसी भी जीव को इसकी जरूरत नहीं,
माँ सचमुच कभी मरा नहीं करती,संतान के हर दुख में किसी न किसी रुप में खड़ी रहती हैं, कालजयी हो जाती हैं, मृत्यु से भी भिड़ जाती हैं
अंजू जी बड़ी संजीदगी से आपने अंतर्मन की पीड़ा शब्दों में ढाली है,
बहुत शुभकामनायें और बधाई
रत्ना जी कल आपने महिला लेखनी पर बहुत अच्छा लिखा,धन्यवाद
संतोष जी आभार
 ‪+91 84005 45999‬: फोन की कॉन्टेक्ट लिस्ट
नम्बर हैं
जो इंसान का पता देते है
उनके जैसा पर्भाव पड़ता है
और जिसमे एक नम्बर स्थायी है
वो जो भी नम्बर हो
उसकी पहचान है माँ
चलो कितना सुंदर सन्देश है
माँ का
उसके होने का
उसके प्रेम का हिदायतों का।
धन्यबाद अंजू जी इस एहसास के लिए और उसके स्थान्तरित करने की कोशिश के लिए।
सुरेन्द्र कुमार सिंह चांस
 Madhu Saksena: अंजू जी की कविताएँ विचारों के नए प्रतिमान गढ़ती मजबूती से अपनी बात रखती है की पाठक सहमत हो जाता है ।
स्त्री विमर्श की रोने धोने और पितृ सत्ता के दोषों से अटी पढ़ी कविताओं के बीच अपनी स्वतन्त्रता और स्वाभिमान की ये कविताएँ नई खुशबु बिखेर रही हैं ।अपने आपको मुक्त घोषित कर के ही मुक्त हुआ जा सकता है ।
फोन की कांटेक्ट लिस्ट कविता नम्बर से भावों को जोड़ने की कला है ।एक एज बात अपने वज़न के साथ जेहन में उतरती है और हम अपने स्मृति लोक में जा पहुंचते हैं ।बहुत खूब ।
धर्म निरपेक्षता पर कई कविताएँ लिखी गई है ।विषय पुराना होने पर भी नए तरीके से कही गई ये कविता मर्म पर चोट भी करती है और सहलाती भी है ।बढ़िया ।
माँ कभी नही मरती ..ज़िंदा रहती है मोहब्बत की तरह ।सबका पहला प्यार माँ ही तो होती है ....बात बात में रात बिरात  में ..कभी भी ,कहीं भी माँ बेरोक टोक आती हैं ।माँ और कविता अलग नही ।
अंजू शर्मा की कविताएँ अपने कोमल क़दमो को कठोरता और दृढ़ता आगे बढ़ती है और  से अपने होने का अहसास करती हैं ।

 91 84005 45999‬: माएं कभी नही मरती
अपना भी यह एक एहसास है और यकीन भी दुनिया।की सबसे सुंदर और शक्तिशाली स्त्री हमारे अंदर है।
माँ ही हैँ और कितना एक्टिवेट करती है हमे हमारे लिए एक इंसान की तरह।वरना ये दुनिया और इसको चलाने वाली और हांकने वाली शक्तिया खिलौने सी है उनके लिए।
आप ने माँ की याद दिला दी उसी रूप में।जिस रूप में है वो
आभार अंजू जी
Anju Sharma: माँ वाली कविता के विषय में कुछ कहना चाहूंगी। मेरी माँ नहीं रहीं जब मैं करीब 3 वर्ष की थी। पर माँ किसी न किसी रूप में अप्रत्यक्षतः जीवन में विद्यमान रहीं। उनकी मौजूदगी सदा बनी रही।  फिर जब मैं माँ बनी तो अहसास हुआ कि माँ होना क्या होता है।  ये कविता उसी अहसास की बानगी भर है।  यह अप्रकाशित कविता है।  शायद पहली बार vmm पर ही साझा की गई है। कोशिश आप सभी को पसंद आई।  शुक्रिया 🙏🏼🙏🏼😊

 ‪+91 76919 85478‬: गजब की भावाभिव्यक्ति है। बहुत धन्यवाद आदरणीया अंजू जी कि आपने हमें इस अप्रतिम रचना के पाठन का अवसर दिया । क्या तो बाँध लेती है यह कविता कि प्रारंभ से अंत तक एक साँस में पढ़ते जाते हैं । बहुत -बहुत बधाई और आपकी लेखनी ऐसे ही मनके रचती रहे , असीम शुभकामनाएँ 🙏😊🌹🌹🌹💕
91 94256 06033‬: स्त्री के मन की उड़ान और बंधन को समूल नष्ट करने की दृढ़ता का संदे
श देती कविता प्रभावी हैं 
फोन नम्बर पर केंद्रित अलग व्याख्या और सम्बन्धों की पड़ताल करती सुन्दर कविता 
प्रकृति की समदर्शी सोच और मानव द्वारा दीवार खड़ी करने की व्रत्ति पर करारा व्यंग्य 
माँ के विरोधाभासी जीवन की पीडा दर्शाती किंतु बच्चो को प्यार लुटाती माँ का मार्मिक चित्र 
शिल्प की कसावट हैं कुछ आंतरिक लय की कमी खटकती हैं उत्तम रचनायें
 Santosh Shreewastav: आज मंच पर अंजू शर्मा की कविताएं आप सबने पढ़ी और उन्हें बेहद पसंद भी किया। कविताओं की सराहना की और उस पर खुलकर लिखा भी ।मुझे सबसे ज्यादा पसंद आत्मा कविता आई।यह स्त्री की मुक्ति की कामना की कविता है।सभ्यता के विकास के साथ ही स्त्री की परतंत्रता बढ़ती गई। सामंती और पूंजीवादी व्यवस्था में स्त्री सिर्फ देह बनकर रह गयी है। अब स्त्रियां इस चाल को समझ रही है। मुक्ति का संधर्ष जारी है। स्त्रियां अपना स्वर्ग खुद गढ़ना चाहती है।  
अंजू जी ने जब 2014 में मुझे अपना कविता संग्रह भेजा था और फोन पर मुझसे बातचीत की थी तभी मुझे उनमें संभावनाएं नजर आई थी। इसमें कोई दो राय नहीं कि आज वे विशिष्ट कवियों की पंक्ति में है। मैं अंजू जी के उज्जवल भविष्य की कामना करती हूं।
 आज आपके साथ दिन भर रत्ना पांडे अपने चुलबुले संचालन के साथ रही।यही उनके संचालन की खासियत है कि समा बांध देती है। बहुत बहुत आभार रत्ना जी ।
 ‪+91 93295 09050‬:*** माएं कभी नही मरा करतीं ***
अंजू मेरे आंसू नही रुक रहे ।
** धर्म ** कविता एक बेहतर कविता है जिसे पढ़ते हुए नरेश सक्सेना याद आये ।
** फोन के कॉन्टेक्ट लिस्ट **
अंजू मैंने fb पर भी कहा था कि इस बिषय पर भी क्या कविता लिखी जा सकती है । अनूठा विषय 👌
91 93004 14813‬: आद०अंजू जी आज पटल पर आपकी रचनाये पढ़ने का मौका मिला आपकी सभी रचनाये एक से बढ़कर एक माये कभी नही मरती मर्म स्पर्शी कविता मुझे अच्छी लगी सभी कविता सहज वसुन्दर शैली में लिखी गई मानव को चिन्तन के लिये प्रेरित करती आपको हार्दिक बधाई वाशु हकामनाये
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Sunday, February 12, 2017

अपारे काव्य संसारे कविर्एका:प्रजापति  के आलोक में कहें तो यह कि ईश्वर के बाद अगर कोई सर्जक है तो वह है कवि, पर कवि केवल भावोच्छवास करने वाला, शब्द क्रीड़ा करने वाला कोई व्यक्ति नहीं होता, बल्कि वह एक स्वप्नदृष्टा होता है, जो दुनिया को और बेहतर, और बेहतर होते देखने के वास्ते तड़पता है, विचार करता है, और अपने परिवेश में दखल देता है |और समर्थ यत्न अपनी तरफ से भी करता है ताकि सूरत बदले. सूरत बदलने के अहद के संग अभी एक कवि दिन रात दीपक के मानिंद जल रहा है, उसका नाम है निलय उपाध्याय, साहित्य की बात समूह में आज उनके रचना और मोर्चा पर चर्चा के लिए प्रस्तावना और संचालन युवा कवि और विचारक अखिलेश कर रहे हैं..." साहित्य की बात " समूह  संचालक  ब्रज श्रीवास्तव 


मित्रों, आज मै एक पूर्ण कवि की अवधारणा को अपने कृतित्व व व्यक्तित्व से यथार्थ में बदल देने वाले समकालीन कविता के उस महत्वपूर्ण हस्ताक्षर को आपसे सामने रखता हूँ जिसके बिना गांव,किसान और गंगा की बहुत सी चिंताओ को स्वर नहीं मिल सकता था उसके सिसकियो को चीख और ललकार में बदल देने के लिए जिस कंठ की आवश्यकता थी वह सिर्फ निलय के पास है । कविता को अभियान बना देना उसे नारा बना देने से आगे की चीज है ।
निलय उपाध्याय नवे दशक से आरम्भ हुई हिंदी कविता के उस पीढी का प्रतिनिधित्व करते है जिसने अपने स्वत्व व अस्मिता की लड़ाई लड़ी है कविता कैसे कवि के आत्म का बोध होता है और कैसे वह उसके अंधेरे कोने में फैला उजास है यह देखना हो तो निलय की कविताएँ देखी जा सकती है ।भोजपुरी अंचल का वृहदतर क्षेत्र अपनी सांस्कृतिकता, अनन्यता,संघर्ष शीलता और स्वप्नशीलता के साथ साथ बेपनाह वेदना के जिन आयामो के साथ निलय की कविताओ में व्यक्त होता है उतना किसी और समकालीन कवि की कविता में नहीं ।ठेठ देशी मुहावरो में जीवन के संघर्षो से सिरजे बिम्ब जब कवि के अन्तर्मथन को स्वर देते है तो यह कविता एक जीवन राग में बदल जाती है ।जय पराजय के भाव से अलग यह कविता हिंदी जनता के जागरण की कविता है जिसमें पराजय की क्षणिक आवेग है तो जय उसकी संकल्प चेतना का प्रबल भाव ।
निलय मुंबई मे जब रेखाकिंत किये जाने तक की हद तक स्थापित थे तब वह फिल्मी दुनिया का वैभव त्याग साइकिल से गंग्रोती से गंगा सागर तक की यात्रा पर निकल पड़े,गंगोत्री से गंगा सागर तक यात्रा वृतांत लिखा जो एक प्रामाणिक ग्रंथ जैसा बन गया है। यात्रा के वर्तमान चरण मे वो घर परिवार का त्याग कर गंगा के लिए जीवन समर्पण का व्रत ले चुके है ।बनारस के घाटो पर महीनो गोष्ठियो व साहित्य सृजन से लोग जुटे है जिसमें आम जन से लेकर देशभर के पर्यावरण विद, लेखक शामिल है,नहीं शामिल है तो विदेशी कंपनियां, सत्ता तंत्र व सरकार ।
तो आइये आज एक कवि के संघर्षो का उत्सव मनाते है वो हमारे कुल के है हम सब का साथ उन्हें संबल देगा ।
..अखिलेश श्रीवास्तव 


कवि परिचय : 
जन्म : 28 जनवरी 1963 
स्थान : दुल्हन पुर,बक्सर बिहार ।
कृतिया : 
कविता संग्रह : अकेला घर हुसैन का , कटौती ,जिबह बेला 
 उपन्यास : अभियान वैतरणी और पहाड़
यात्रा वृतांत : गंगोत्री से गंगा सागर तक 
नाटक : पापकार्न विद परसाई 
इसकू अलावा निलय ने टीवी सीरियल देवो के देव महादेव आदि का भी लेखन किया है ।

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1. मैं गाँव से जा रहा हूँ

कुछ चीज़ें लेकर जा रहा हूँ
कुछ चीज़ें छोड़कर जा रहा हूँ

मैं गाँव से जा रहा हूँ

किसी सूतक का वस्त्र पहने
पाँच पोर की लग्गी काँख में दबाए

मैं गाँव से जा रहा हूँ

अपना युद्ध हार चुका हूँ मैं
विजेता से पनाह माँगने जा रहा हूँ

मैं गाँव से जा रहा हूँ

खेत चुप हैं
हवा ख़ामोश, धरती से आसमान तक
तना है मौन, मौन के भीतर हाँक लगा रहे हैं
मेरे पुरखे... मेरे पित्तर, उन्हें मिल गई है
मेरी पराजय, मेरे जाने की ख़बर

मुझे याद रखना
मैं गाँव से जा रहा हूँ ।


2.जिबह बेला 

मेरे मुँह मे ठुँसा है कपड़ा
ऐंठ कर पीछे बँधे हैं हाथ

कोई कलगी नोचता हॆ
कोई पाख
कोई गर्दन काटता हॆ
कोई टाँग
हलक मे सूख गई हॆ
मेरी चीख़

मारने से पहले जैसे बिल्ली
चूहे से खेलती है
कोई
खेल रहा है हमसे 

लो 
फिर आ गए
फिर आ गए सात समन्दर पार से
कसाई...

गंडासा है दिल्ली के हाथ ।

3. शबरी के पिता: 

पिता के आने की खबर सुनकर 
कुछ कह नहीं पाई 
शबरी
और आंख भर आई 

लोटा में पानी ले आई
मल मल कर धोया गिलास
पीतल के थाल में धोयेगी पांव ..उतार देगी

छह कोस पैदल की थकान
यह क्या कम है कि 
इस उम्र में चलकर आये पिता 
जूते के आहट से जान लेती थी शबरी 
कि पिता आ रहे है ..
आज भी जान लेगी कि पार 
कर गये है घर का चौखट
बरामदा
इस घर में उनकी बेटी है 
परदे पर कढ़े फूल से समझ जायेंगे ।

देर हुई तो थाल में पानी बदल दिया 
ग्लास में लगी थी मिट्टी जरा सी कहीं
मल मल कर साफ किया 
बिस्तर झाड़ा
बक्सा पर कपड़ा डाला
और कुछ न बचा करने को तो रो पड़ी

कैसी हो बेटी 
कैसे कट रहे है दिन 
कहने को कह ही देगी शबरी 
ठीक ..बिलकुल ठीक..कौन बेटी चाहेगी
कि बेटी का हाल जान 
दुखी हो पिता 

लोटा फुटहा है 
बूंद बूंद कर रिस गई शबरी
झन्न से बजी पीतल की थाल 
चकरधिन्नी कीतरह घूम गया आकाश
और बचपन से जवान होने तक की 
तमाम यादो को
एक मोटर साइकिल रौंदती हूई चली गई
जिसे नहीं दे सके थे पिता 
तत्र करने के बाद भी 

जरूर कांप रहे होंगे 
जाते हुए 
पिता के गठिया वाले पांव ।

4. और गोली चलती है 

आखिर क्या चला जायेगा 
एक रंडी का 
नंगा होकर नाचने में 

उसकी कीमत हम चुकायेगें

खत्म हो जायेगा 
शादी का उत्सव 
खत्म हो जायेगी शादी की रौनक 
उतर जायेंगे लाल पीले रंग 
बची रहेगी शान नंगा नचाने की 

एक औरत को नंगा नचाने की शान

किसी कौरव की सभा नही है यह 
उत्सव है शादी का 
ध्वनि और प्रकाश की जगर -मगर 
लोगों से खचाखच भरा बावन चोभ का शामियाना 
और कांप रही है एक औरत 
दो दिलो के मिलन में 
खुशियो का सट्टा है जिसका
वे जरूर नचायेगें 
उसे नंगा 

छोड़ जायेंगे 
गंगा के पवित्र मैदानी इलाके में 
शराब की खाली बोतलें और 
एक औरत को नंगा नचाने की शान 

अगर इंकार करेगी
तो चलेगी गोली...

और गोली चलती है ...

5. बेदखल 

मैं एक किसान हूँ
अपनी रोजी नहीं कमा सकता इस गाँव में
मुझे देख बिसूरने लगते हैं मेरे खेत

मेरा हँसुआ 
मेरी खुरपी
मेरी कुदाल और मेरी,
जरूरत नहीं रही
अंगरेज़ी जाने बगैर सम्भव नहीं होगा अब
खेत में उतरना

संसद भवन और विधान सभा में बैठकर
हँसते हैं
मुझ पर व्यंग्य कसते हैं
मेरे ही चुने हुए प्रतिनिधि

मैं जानता हूँ
बेदख़ल किए जाने के बाद
चौड़े डील और ऊँची सींग वाले हमारे बैल
सबसे पहले कसाइयों द्वारा ख़रीदे गये

कोई कसाई...
कर रहा है मेरी बेदख़ली का इंतजार

घर के छप्पर पर
मैंने तो चढ़ाई थी लौकी की लतर -
यह क्या फल रहा है?
मैने तो डाला था अदहन में चावल 
यह क्या पक रहा है?

मैंने तो उड़ाये थे आसमान में कबूतर
ये कौन छा रहा है?

मुझे कहाँ जाना है-
किस दिशा में?

बरगद की छाँव के मेरे दिन कहाँ गये
नदी की धार के मेरे दिन कहाँ गये
माँ के आँचल-सी छाँव और दुलार के मेरे दिन कहाँ गये
सरसों के फूलों और तारों से भरा आसमान
मेरा नहीं रहा

धूप से
मेरी मुलाकात होगी धमन-भट्ठियों में
हवा से कोलतार की सड़कों पर
और मेरा गाँव?

मेरा गाँव बसेगा
दिल्ली मुम्बई जैसे महानगरों की कीचड़-पट्टी में .      
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गत वर्ष नवम्बर में निलय भैया विशेष रूप से साबरमती नदी के किनारे बसे अहमदाबाद शहर की मल जल निकास परियोजना देखने के उद्देश्य से आये थे।परंतु इस यात्रा के दौरान निलय भैया ने  साबरमती नदी का अनकहा एवं अनदेखा स्वरुप दिखाया वह मेरे जैसे वर्षो से अहमदाबाद में रहने वाले लोगो के लिए हैरान कर देने वाला था। उस अनकहे सत्य को निलय भैया ने मरी हुई नदी का मुकुट नाम दिया था, जिसे हम सभी साबरमती रिवेरफ़्रॉन्ट कहते आये है। 
उस यात्रा की निलय भैया के साथ की कुछ तस्वीरें साझा कर रहा हूँ
सभी तस्वीरें जितेन्द्र राजपूत जी के सोजन्य से 
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निलय जी की कविताओं के  सापेक्ष समूह के  कुछ सदस्यों ने भी  सूखती नदियों के दर्द को अपनी रचनाओं में व्यक्त किया 
गंगा- दोहे
करती विष का आचमन, गंगा की हर धार।
भागीरथ अब अवतरे, करने बेड़ा पार।।

आँचल मैला हो गया, काया पल-पल क्षीण।
गंगा हँसती खेलती, क्यों है अब ग़मगीन।।

गंगा में मुख देखता, चाँद हुआ बेहाल।
मैली छवि को पोंछने,  बादल हुआ रुमाल।।

शुभ्र धवल आँचल कहाँ, मैली गंगा देह।

बिसरा बैठे लाल ही, माँ से अपना  नेह।।
अनीता मंडा 
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और कुछ दिन देखता जा देखता रह जाएगा
सूख जाएगी नदी ये पुल खड़ा रह जाएगा।

एक प्यासा दूसरे से प्यास का मांगेगा हल
आसमानों की तरफ हर सर उठा रह जाएगा।

गर्म आंखें सुलगी सांसें और दहकता हर बदन
रहमतों की बारिशों को ही खोजता रह जाएगा।

गोलमेज़ें जब उठेंगी बात करके प्यास पर
बिसलरी की बोतलों का मुंह खुला रह जाएगा।

हादसे की चाप है दिलशाद साहिब ये ग़ज़ल
जो समझ लेगा वो शायद कुछ बचा रह जाएगा।
- भवेश दिलशाद

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गंगा का पुत्र संवाद :
कल गुजरा 
चांद के करीब से 
साफ दिखाई पड रही थी 
चेहरे की झुर्रिया
मुक्तिबोध ने कहा
और बूढा हो गया चांद 

यूं ही गंगा भी 
सुनती है निलय की बात 
उनके बलिया आने की खबर 
हवाओ ने दी चीतल को 
कछार पर पानी पीते चीतल ने 
बताया डाल्फिन को 
और फिर उसी ने कहा होगा गंगा से 
कि तेरा बेटा आ रहा है बलिया 
बचा खुचा पानी समेट
बुढापे में बंधा तोड
बढियाई गंगा पहुच गई गांव के मुहाने
पुत्र के पांव पखारे घुटने तक 
प्यासे पूत ने मांगा जल 
पर मां जानती है 
अब जल, जहर है सो
गंगा ने आंखो के नीर से भरा 
उसका कासा ,कंमडल
पहले फफकी
फिर दहाड मार लिपट गई गले से
बुदबुदाई कान मे 

अब इहे कंमडल टांग ल कांधे
ले चलअ गंगा सागर 
लेटा द चंदन लकडी पे
फोड द मटका 
कई द दाहा तापी 
जटा से बा उद्गम
तोहरे कमंडल मे हो जाई मुक्ति 

आ तबले कही द तनि हाकिम से
बडकी दतवा वाला मशीनवा हटा ले
छतिया से
कोडे ले बाबू लोग
त बहुत पिराला ।
अखिलेश
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हर शहर और गाँव में 
रोज ही
मर रही है एक नदी
मेरे कस्बे में परासरी पूरी मर चुकी है
बेतवा मरने की कगार पर है
पास में नेवन सिर्फ दिखती है
बरसात में
और फिर 
उज्जैन में क्षिप्रा भी तो
नर्मदा के पानी से जिंदा है.......!!!!
सब कोई देख रहा है अपने जीवन में
मरती हुई नदियों को.........
गंगा अकेली नहीं है
देश में 
दिल्ली में यमुना और
नासिक में गोदावरी भी तो मर चुकी हैं 
पूरी की पूरी.........
नदियों का मरना
सभ्यताओं के खात्मे का संकेत है
जैसे नदियों के होने से बनी-बसीं थीं सभ्यतायें
नगरों के प्रति हमारा मोह
विकास के प्रति हमारा दुराग्रह
मार रहा है नदियों को................
कोई नहीं बचा सकता
इस तरह मरती हुई सभ्यताओं
जैसे नदी के मरने पर रह जाती है गंदगी
वैसे ही सभ्यताओं के मरने से
नगरों में जिंदा लाशें चलती फिरती
दिखाई देंगी.........
सभ्यताओं के बिना मनुष्य

जिंदा लाश ही तो रह जायेगा एक दिन.......।
संजीव जैन 
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कविताओं पर प्रतिक्रियायें 

ब्रज श्रीवास्तव ....अग्रज मित्र कवि की कविताओं को साकीबा में, देखकर विभोर हूँ, यहां कविता के बहाने, कुछ यथार्थ तैर रहे हैं, कुछ विवश सत्य गांव से शहर की ओर बढ़ते ही जा रहे हैं. अपने ही प्रतिद्वंद्वी से पनाह मांगने के दिनों में कुछ शख्स कविता में सच को स्थापित करते हुए, समझौतों को स्थगित करते जा रहे हैं, उनमें से एक हैं निलयऐसे कवि प्रलयके बाद तक रहे आने की संभावना को स्थापित करते हैं. धन्यवाद अखिलेश जी, दोस्तो, आज न चूकिये, आपके शब्दों का गुच्छा न केवल कवि और कविता की महत्ता बढ़ायेगा, बल्कि साहित्य जगत की सत्ता के पथ में एक फूल बिछाकर कवि को हौसला देगा...    

सईद अय्यूब ....ये जो कविताएँ प्रस्तुत की गयी हैं, वे निलय के कवि और कविपन को पूरी तरह प्रतिनिधित्व नहीं दे पातीं। कम से कम उनकी दस कविताएँ देनी चाहिये थी। इन कविताओं से जैसा प्रतीत होता है, निलय जी उससे बड़े, बहुत बड़े कवि हैं। बड़े कवि होने के साथ ही साथ वे बड़े इंसान भी हैं। मैं व्यक्तिगत रूप से उन्हें बहुत नहीं जानता। बस एक बार मुलाक़ात हुई है। पिछले साल के विश्व पुस्तक मेले में। पर जितना जानता हूँ उसके आधार पल उपरोक्त बातें कह रहा हूँ। अखिलेश भाई, शुक्रिया उन्हें यहाँ प्रस्तुत करने के लिये।    


 दिनेश मिश्रा .....निलय जी की कविता सीधे सीधे दिल को छू लेने वाली कविताएँ हैं, सीधे सच्चे तरीके से गाँव और उससे जुड़े अहसास को असरदार तरीके से बयान करती हुई, कविता कभी खुश करती हैं, तो कभी पलकें भिगो देती हैं, खुरपी कुदाल से लेकर शबरी की फ़िक़्र हमे भी फ़िक़्रों में डुबो देती हैं।
प्रस्तुति के लिये धन्यवाद     


 सुमन सिंह ....."मौन के भीतर हाँक लगा रहे हैं मेरे पुरखे...।कितनी गहरी अभिव्यक्ति, कितना गहरा दर्द।,
जिबह के माध्यम से समाज मे मचे घमासान पर बहुत सटीक टिप्पणी। "लोटा फुटहा है,बूँद बूँद रिस गयी शबरी....चकरघिन्नी की तरह घूम गया आकाश.....जरूर काँप रहे होंगे जाते हुए पिता के गठिया वाले पाँव... कितने ही भाव , कितनी ही शबरीयों का दर्द पिरोये पंक्तियाँ। निलय जी को बहुत बधाई। अखिलेश जी को इतनी सुन्दर कवितायें पढ़वाने के लिये बहुत धन्यवाद🙏   


हरमिंदर सिंह :...अखिलेश जी बहुत बहुत आभार निलय जी से रूबरू करवाने के लिये..निलय जी के शब्द बोलते हैं और वे गूंजते हैं बार-बार..                        
 किसान और गांव की बात जमीन से जुड़े मन की बात है..                        
 Akhilesh Shreewastav: हरमिन्दर भाई, आप उपन्यासकार हो  । आपने बहुराष्ट्रीय कंपनियों व जन और उसके लेखन का संघर्ष भी कमोवेश देखा है निलय की चिंताये भी वही है उनकी दृष्टि बड़ी है ।          
 और गोली चलती  है : निलय उपाध्याय
प्रस्तुत कविताओं में चौथी कविता स्त्री विमर्श की नहीं उसके सशक्तिकरण की कविता है ।स्त्रीयो में भी एक उपेक्षित वर्ग है जिन्हें हम सिर्फ जीवन के विलास में शामिल करना चाहते है उनके लिए हमारे पास कुछ नियत घंटे है ,कुछ अंधेरा है, रात है पर दिन नही है वो हमारे लिये जिंदा कबाब है वो हमसे दो घूंट आब चाहती है पर हमारे पास उनके लिये सिर्फ शराब है ।
स्त्री विमर्श क्या मध्यम वर्ग की स्त्रीयो तक सिमट गया है यह विमर्श अपना दायरा क्यो नहीं बढ़ाता और इन स्त्रीयो को शामिल क्यों नहीं करता । वह इन्हे स्त्री मानता भी या नहीं या फिर निलय की पहली कविता पंक्ति जैसे युद्ध हार चुका है और विजेता से पनाह मांग रहा है ।
इस कविता का पूरा कविता तत्व इसकी अंतिम पंक्ति में है कि और गोली चलती है ... 
यह कितना बड़ा इंकार है यह ऐसा है जैसे वहशी भेडि़यो के बीच फंसी एक हिरनी अचानक कंठ से शेरनी की आवाज निकालने लगे जबकि उसे पता है कि दांत गले पर गड़ने वाले है ।
अगर इंकार करेगी
तो चलेगी गोली...
और गोली चलती है ...
स्त्रीयो को बहुराष्ट्रीय माँल्स में खरीदारी करने को महिला सशक्तिकरण बताने वाला साहित्य व सरकार जुगलबंदी कर रही है जबकि असली लड़ाई ये स्त्रीया लड रही है इन स्त्रीयो के साहस पर कोई थपरी नही पीटता, निलय सुनते है और देखते है उनका संघर्ष ।
यही निलय का साहित्य, उनका विमर्श है जो उन चिंताओं को साहित्य मे शामिल करता है जिस पर दिल्ली मौन है इन पर लिखने के लिये कवियो को अंधेरो की, गंगा के किनारों पर फेकी शराब  की बोतलो तक पहुँचना पड़ेगा तब उस नीरव में वह सशक्त इंकार सुनाई पड़ेगी,तब वह पुरूषिया ग्रंथि और उससे उपजा अट्टहास सुनाई पड़ेगा जिसमे स्त्री को नंगा नचा देना पुरूष होने की शर्त है ।

                       
भवेश दिलशाद...  निलय की कविताई एक आवाज़ है
लम्बे समय से मेरे मन में उहापोह चल रही है कि साहित्य या तो केवल साहित्यकारों के लिए लिखा जा रहा है या फिर साहित्य के विद्यार्थियों के लिए। लोक के लिए साहित्य का सृजन हाशिये पर है। खास तौर से कविता में यह हादसा बहुत गंभीर दिखता है। ऐसा है भी कि मैं किसी अनुचित विचार की गिरफ्त में हूं? ऐसा है तो क्यों है? क्या यह अकादमिकता का कोई षडयंत्र है? आदि-आदि प्रश्नों से जूझता हुआ मैं कभी-कभाी उस कविताई से भी रूबरू हुआ जो कश्मकश के इस अंधकार में पौ पफटती सी लगी। इसी आलोक में आज अग्रज निलय की पांच कविताएं बाध्य कर रही हैं, कुछ कहने के लिए, कुछ विचार के लिए और कुछ समझने के लिए भी।
बड़ी कविता पाठक से किसी किस्म की तैयारी की अपेक्षा नहीं करतीं, बल्कि पाठक को उद्वेलित कर और उठने के लिए तैयार करती हैं। बड़ी कविताएं चुंबकीय आकर्षण के साथ खींचती हैं अपनी ओर, न कि पाठक को नीचा दिखाते हुए आमंत्रित करने का ढोंग करती हैं। निलय की कविताएं बड़ी कविताएं हैं। अपने कथ्य में बख़ूबी गठी हुई ये कविताएं उन परदों को फाड़ती हैं जिनके पीछे छुपा समाज इस हकीकत को भूल गया है कि वह कितना नंगा है।
अगर मैं इस तरह कहूं कि पहली कविता औद्योगिकीकरण की कुरूपता, दूसरी कविता बाज़ारवाद की साज़िश और चौथी कविता पूंजीवाद व समाज की मानसिक विकृति आदि आदि को बयान करती है तो यह उथली समीक्षा होगी। यह सब है तो सही केंद्र में लेकिन बावजूद इसके इन कविताओं में इसके अलावा जो तत्व हैं, वाकई वह कविता को कविता और बड़ी कविता बनाते हैं। संवेदना का धरातल, विमर्श छेड़ने का माद्दा, सवालों के आईने में समाज को निरुत्तर कर देने की सलाहियत, तमाचा जड़ने जैसा प्रहार, एक साथ कई आंतरिक स्तरों को झकझोरने की क्षमता और शर्मसार या दुखी कर देने की तीव्रता जैसे अनेक तत्व इन कविताओं की कविताई के मरकज़ में हैं।
व्यंग्य तो आजकल ललित व सीधा भी होता है इसलिए व्यंग्य को इन कविताओं के संदर्भ में एक तीक्ष्ण विशेषण या किसी और बेहतर पर्याय की आवश्यकता पड़ती है। एक व्यंग्य वह होता है जो ताने जैसा चुभता है लेकिन यहां व्यंग्य तमाचे और मुक्के जैसा पड़ता है। लेकिन आभासी है। कुछ साहित्य की पुरोहिती सोच वाले कह सकते हैं कि ऐसा व्यंग्य, व्यंग्य की श्रेणी में नहीं आता लेकिन यहां तो आ रहा है। एक रंडी का नंगा होकर नाचना, बची रहेगी शान नंगा नचाने की, फिर आ गये कसाई... गंडासा दिल्ली के हाथ में है, गांव बसेगा महानगरों की कीचड़ पट्टी में... ये पंक्तियां पारंपरिक व्यंग्य की श्रेणी में नहीं हैं, इन्हें आंका जाना चाहिए। समर्थ आलोचक विचार करें।
निलय की कविताएं वास्तव में लोक की बात करती हैं, लोक के लिए सिरजी गयी हैं और लोक के हित के प्रश्नों की आवाज़ हैं। ये किसी साहित्यिक विमर्श को आमंत्रित करें या न करें, साहित्यकारों को जंचे या न जंचे, परन्तु लोक विमर्श का पटल प्रस्तुत करती हैं, लोक में पहुंचती ही नहीं, उसे उद्दीप्त करने की सामर्थ्य भी प्रदर्शित करती हैं। ये कविताएं आवाज़, एक बुलंद और बाग़ी आवाज़ की तरह हवाओं में गूंजने की सिफ़त रखती हैं और जो कविता आवाज़ बन सकती है, उसे न तो रोका जा सकता है, न नकारा जा सकता है और न ही क़ैद किया जा सकता है।
अग्रज निलय जी को साधुवाद और उम्मीदों व अपेक्षाओं से सिक्त शुभकामनाएं। अखिलेश को बधाई कि एक महत्वपूर्ण पोस्ट के ज़रिये चैतन्यता को सुषुप्तावस्था से निकाला और ब्रज भाई को भी एक गुलदस्ता कि मंच को ऐसे अवसरों के लिए ओपन रखा है।                        
 Akhilesh Shreewastav: प्रमोद भाई 
भवेश ने मान रख लिया यह पोस्ट देकर ।आपने जिन कविता तत्वो के आधार पर कवि व उसके साहित्य को समझने हेतु इंगित किया था भवेश भाई ने उन पर वह दृष्टि डाली है जो एक रचनाकार अपने साहित्यिक जीवन में निरंतर रच कर विकसित करता है । 
भवेश की एक गज़ल जल विमर्श का उन्वान रचती है पढ़वाऊंगा शाम को ।उसके दो शे़र तब तक रहेगे जब तक धरती पर जल है ।
भवेश को धन्यवाद नहीं कहूँगा, तुम्हें गले लगाये बिना यह शब्द बेमानी है ।   
                     
राकेश पाठक ..... आज साकिबा में जानदार प्रस्तुति...निलय जी के बारे में जानकार बेहद अच्छा लगा...
टटका बिम्बों और देशज शब्दों से भरी अपनी कवितायेँ लग रही है..यथार्थ को जमींदोज किये जा रहे उस घट की उत्तरकथा है इन कविताओं में । जो सर्वहारा और सर्वस्व हारा जन की दुर्दशा के इर्द गिर्द की जिंदगी में देखी है कवि ने..कवि की इन कविताओं और भाषा से ज्यादा कवि के उस मनोदशा को समझने की जरुरत है जो रची जा रही कविताओं के मूलस्वर का वायस बनी है...कवि की भाषा में समाज की चिंता है..देश के सपने है..और उन सपनों में हाड तोड़ रहे उस जन की बातें है जो इंडिया और भारत के दोआब में धंसे, दरकिनार कर दिए गए है.. 
कविताओं में जनवाद कवि की मौलिकता नहीं विवशता है बल्कि विचार के स्तर पर उस उद्वेलन की परिणीति है जो किसी आंदोलन का कारण बनने की उम्मीद लिए लिखी गयी है...
निलय जी मौन के कवि है, स्वाधीनता के कवि हैं, राही नहीं, राहों के अन्वेषी हैं, वे काल चिंतन के कवि हैं, वे आत्मान्वेषण के कवि है, यायावर हैं, वे नई भाषा संवेदना और शिल्प के चाकचिक्य के कवि हैं, वे अकेलेपन के अनुगायक हैं। आज की प्रस्तुत उनकी कवितायेँ जन और वाद के प्रतिमान की तरह है। 
लोक-शिल्प,स्थानीये रंगों और अनुभूतियों को बड़े ही खूबसूरती से इसे शब्दों में ढ़ाला गया है कवि निलय ने। 
दरअसल इस कविता की मनोदशा विवशता की बर्बरता की दास्तां की तरह है जो पूरी कविता में ही व्यक्त हुआ है... व्यथा की कविता संवेदना का जटिल शास्त्र लिखता है..और तब कविता, भाषा की बर्बरता के साथ ही पटल पर आ पाती है...पर यहाँ कविता का मूल जिस सरलता और तरलता के साथ व्यक्त हुआ है वह काबिलेगौर है। 
कविता की शाश्वतता कवि मन की जटिलता का परत दर परत का अक्षुण्ण विवेचन है... पहली कविता "मैं गावँ से जा रहा हूँ" तथा "जिबहबेला" जिस भावप्रणित्ता के साथ लिखी गयी है वह देशज और खांटीपने के साथ शहर के जीवन से परपस्पर सवांद करती है। इस कविता में मार्क्सवादी विचार का बुनियाद छुपा है तो साथ ही व्यथापूर्ण कंटकीय जीवन का विवरण भी है....समाज का दोहरा चरित्र पर कटाक्ष और जातीय वर्गीकरण के उत्पीड़न का इतिहास भी.... जिबहबेला कविता की अंतिम पंक्ति...गड़ासा है दिल्ली के हाथ पढ़ते ही राजनीति, राजनीतिज्ञ और सत्ता के बीच क्षुद्र लालच के लिए रचा जा रहा पूरा परिदृश्य और गाँव की मुश्किल हालात सामने आ जाते है।
इसी तरह सबरी के पिता कविता भी संवेदना से घनीभूत है। इसमें वेदना भी है तो दुर्दुम्भ तल्ख़ सच्चाई से पिता और पुत्री के अदृश्य नयन संवाद से नम आँखों की विवशता भी। भावनाओं के ज्वार से भरी बड़ी मार्मिक कविता है जिसमें संवेदना का उत्कर्ष आँखों के कोर गीले कर देता है। 
निलय जी जन जन के कवि यायावर है। इनका लिखा पढ़ने से यह सुकूँ मिलता है कि कोई फक्कड़ कवि शहरों में गावँ लिए चल रहा है...
अखिलेश भाई इस शानदार प्रस्तुति के लिए बहुत बहुत आभार मित्र..इनकी फ़क्कड़ी की डायरी पढ़ाइये.. आधुनिक सांकृत्यायन सरीखा यह व्यक्तित्व विश्व पटल पर ज़ल्द गावँ गंगा का आवाज बनेगा....
सादर

Anita Manda: अखिलेश जी के ज़रिये निलय जी की कविताओं से रूबरू होने का अवसर मिला, इन पर आई टिप्पणियों ने उन्हें और अधिक गहनता से आत्मसात करने में सहायक की भूमिका निभाई।
राजनितिक विद्रूपता के विरुद्ध हथियार सरीखी धार कविताओं में मौज़ूद है। उपेक्षित वर्ग की पीड़ा, हाशिये के लोगों की कराह और दुनिया की आधी आबादी का संघर्ष उनके लेखन में परिलक्षित होता है।
मौन के भीतर हाँक लगा रहे हैं
मेरे पुरखे... मेरे पित्तर, उन्हें मिल गई है
मेरी पराजय, मेरे जाने की ख़बर
मुझे याद रखना
मैं गाँव से जा रहा हूँ ।
निलय की कविताएँ पाठक से संवाद करती हैं। उसके आँसू पोंछती हैं,  वे आत्ममुग्धता की शिकार नहीं बल्कि कवि और समाज के बीच का पुल हैं।
समाज के अंतहीन ज़ख्मों के गहरे निशानों की अंतहीन चित्रावली इनमें मौजूद है जो कभी भूमिहीन किसान का दर्द दिखाती है, कभी मजबूर औरत की तस्वीर
किसी कौरव की सभा नही है यह 
उत्सव है शादी का 
ध्वनि और प्रकाश की जगर -मगर 
लोगों से खचाखच भरा बावन चोभ का
 शामियाना 
और कांप रही है एक औरत 
दो दिलो के मिलन में 
खुशियो का सट्टा है जिसका
वे जरूर नचायेगें 
उसे नंगा 
अपसंस्कृतियों से निजात पाने व मूल्यों को स्थापित करने के मार्ग में निलय का रचनाकर्म गंगा की माफ़िक है।
                    
जतिन अरोरा .... इन्हें बस कुछ कविताएँ कह लेना ज़्यादती  होगा..... ये जीवन दर्शन है .....ये जीवन संघर्ष है ......बरसों से चल रहे गोरखधंधे की दुकान पर ताले की गुंजाइश है....एक एक शब्द के नीचे लंबी लड़ाई और तपस्या की नींव है। एक एक शब्द सूखती नदियों की रेत से सना है...एक एक शब्द में मरते परिंदों का रूदन है...कटते गिरते दरख्तों की आह है। सीमेंट तले चरमराते झोपड़ें हैं। हर शब्द गंगा के आँसू लिए हुए है।
इन कविताओं  लिखा नहीं गया है जिया गया है. पल पल ज़हर की मानिंद निगला गया है। 
स्त्री के मान की और झूठी शान की आवाज.
गाँवों में घुसते शहर..साथ में घुसती तबाही का आलम....
आम आदमी के दर्द को लेकर चलती और सूखती गंगा....निलय जी को सिर्फ साहित्यकार के ताैर पर देखना संभव नही....मेरे लिए वह इतर हैं। कलम लेकर निकले इन्कलाबी हैं....एक आंदोलन हैं,... 
अखिलेश जी बहुत बहुत शुक्रिया... निलय जी को आपसे सुना था...जाना नहीं था...परसों ही आप ने कहा था परिचय करवाएंगे.. धन्य हूँ कि जान पाया....चाहे अंशमात्र  ही सही 🙏   
                     
 Madhu Saksena: अखिलेश ये कैसी कविताएँ पोस्ट की आज ?
नही ,ये कविताएँ नही है ।ये तो जर्जर होती संस्कृति और और मानसिकता की कहानियाँ है ।ये शांत होकर कहती है और हम आग हो जाते है ।
मैं गांव से जा रहा हूँ ....बात इतनी सी ही नही ....भूत वर्तमान और भविष्य को धार पर रख देती है ।एक मुठ्ठी दर्द पक कर दर्द का ज़खीरा बन जाता है ।छतीसगढ़ में हूँ .. ये कहानी यहां भी कही जाती है ।कोई एक बात सब  देश की सीमा तोड़ जाती है और पूरी धरती को समेत लेने की योग्यता रखती है ।
गंडासा है दिल्ली के हाथ में .....बस यही तो कहा निलय जी ने और सारे गंडासे चमक गए ।आँख नही खुल पा रही इनकी चमक से ।चमक से या भर भर आने से ...समझ ही नही पा रही ।
शबरी के पिता ... ये कविता अगर निलय जी की नही बताई जाती तो निश्चित ही अखिलेश की समझती ।अब समझ गई ।निलय जी की अगली पीढ़ी तैयार हो रही ...उनके विजय पथ की पताका थामे
 । शुभकमनाएं अखिलेश ।शबरियों की आँख सपने देखने लगी होगी ।'पाश' भी खुश हो लेगें ।
और गोली चलती है ...आज भी चल रही ।कभी उत्सव कभी धर्म का बहाना पहन कर ।कई मन्दिर सिद्ध कर रहे की वहां सिर्फ पत्थर हैं ।पत्थर ही तो है कभी राह में ,कभी जीवन पर और सबसे ज्यादा अक्ल पर ।
मैं किसान हूँ .....कभी धीरे धीरे तो कभी झन्न से गिर ही गए सब सपने ।छोटे छोटे ही तो थे ..बखरे तो समेट ही नही पाये हाथ ।वे कठोर मेहनतकश हाथ भी मज़बूर .....
निलय जी की कविताएँ ... हथियार लेकर खड़ी है और मानो हम खुद उनसे खुद को घायल किये जा रहे ।उनके मौन में इतना शोर भरा है विचारों के अंधड़ में  कांपती है मानवता ....
बहुत बधाई निलय जी को ।
आभार अखिलेश ।       

 कोमल सोमरवाल :...समकालीन कवियों को पढना बेहद रुचिकर लगता है।
जब ईमानदारी बेमानी लगने लगती है और सत्ता छलावे की सीमाएँ लाँघ जाती है, जब आम आदमी की कठिनाइयां विद्रोह में तब्दील होने लगती है तब उठती है परिवर्तन की माँग..  निलय जी की कविताओं में ऐसे ही परिवर्तन की माँग स्पष्टत: परिलक्षित होती है।
निलय जी की "और गोली चलती है" कविता विडंबनात्मक यथार्थ की इस तरह की सपाट अभिव्यक्ति दुर्लभ नहीं सहज उपलब्धि है। T.S. Eliot की "The Preludes" में नारी की इस दशा को लेकर इस्तेमाल किये कुछ पंक्तियाँ याद आती है जिसका अनुवाद करने की कोशिश की है:-
सड़क महिला के समान
लेटती है पीठ के बल
वो झेलती है पुरुषों के दबाव
जो गुजरते है उस पर से
और रौंद देते है उसकी आत्मा
कई हजारों बार
मैं गाँव से जा रहा हूँ कविता पलायन की मनोस्थिति दर्शाती है। प्रवास हमेशा संवेदनाओं से जुड़ाव रखता है। 
"अपना युद्ध हार चुका हूँ मैं
विजेता से पनाह मांगने जा रहा हूँ"
गहरी संवेदनाएँ.. बेदखल में नगरीकरण पर निलय जी ने उम्दा कटाक्ष किया। 
मानस पटल को झकझोर देने वाली प्रस्तुति के लिए अखिलेश जी को बधाई.. और पटल को आभार💐💐💐  

प्रवेश सोनी ....अखिलेश जी आज आपको पुनः धन्यवाद दे रही हूँ ,यह कविताएं मात्र पढ़ने के लिए नही है इनके विद्रोह को ,विवशता को ,बैचनी को ,अपने भीतर महसूस करने की जरूरत है ।यह कवितायेँ सकीबा के लिए एक दिन का उत्स नही है हमेशा याद रखी जाने वाली कविताएं है ।निलय जी का रचना कर्म जन के बेबस मन की आवाज़ है ।
गाँव से जा रहा हूं …...पनाह मांगने जा रहा हूं  ,
इस कविता में  गाँव से बिछुड़ने का दुःख गर्दन झुका कर रोम रोम से बिसूर रहा है ।किसी सूतक का वस्त्र पहने........दीनता के भाव में बेबसी 
गंडासा है दिल्ली के हाथ , राजनीती के छल प्रपंच ,समझते है फिर भी जिबह हो रहे है कवि ने आगाह किया फिर आगये ....
यह सच कहा है कि एक कवी की कलम ही हमें ऐसी विद्रूपताओं से बचा सकती है ।
शबरी और पिता की आँखों का संवाद एक बार फिर  आँखों को नमी दे गया ।झन्न से बजी पीतल की थाल ,चक्करधिन्नी की तरह घूम गया आकाश ....आह ,शब्द नही कह पाते ऐसे दुखों का मर्म 
और गोली चल गई ....अखिलेश जी आपकी बात से सहमत हूं क्यों यह स्त्री वर्ग स्त्री विमर्श की श्रेणी में नहीं आ पाता ।लेकिन एक सत्य से भी वाकिफ़ हूं स्त्री विमर्श कैसा ....इस कविता का इन्कार दहला तो देता है पर इन्कार शब्द को नवाज़ देता है ।
बेदखल ,सर्वहारा वर्ग की बेबसी अपनी जड़ों से छूट कर कोन हरा रह पाया है ।कसाई कर रहा है मेरी बेदखली का इन्तजार ,....इस कलम के आगे नत हूं ।

बोधिसत्व जी ....निलय जी की कविताओं का प्रभाव असीम है, वे हिंदी की एक अमिट वाणी हैं
ये अमर कविताएँ हैं
कालिदास बाल्मीकि भास तुलसी के स्तर की लेखनी है निलय की 
उनको अनेक साधुवाद    

मीना शर्मा ...घर परिवार के सुख त्यागकर ,गंगोत्री से गंगासागर तक की कठिन यात्रा का अमृत बन कर छलकना "निलय" जी के कठोर तप का फल है ।
,कविता या पूरा खंडकाव्य ,दो ही पंक्तियाँ काफी हैं....
किसी सूतक का वस्त्र पहने
पाँच पोर की लग्गी काँख में दबाए
मैं गाँव से जा रहा हूँ ।
हर कविता गहन ,गंभीर अर्थ 
लेकर साहितय की जड़ों को सींचती ।
निलय जी की कविता की गूँज ज्यों गंगा के तट पर शंखनाद !!
बधाई निलय जी !
आभार अखिलेश जी काल चिंतन की कविताओं से रू ब रू 
कराने के लिए ।
💐💐💐💐💐💐💐   

अबीर आनंद ......ग्रामीण परिवेश की कविता आज पढ़ने को मिली तो लगा मानो बाल पकड़ कर निलय जी ने झकझोर दिया हो। शहर के छलावे में एक अरसे से रहते हुए विचार आता था कि राजनैतिक नारों की बुलंदियों में शायद कुछ बदल गया हो पर ऐसा कुछ भी हुआ लगता तो नहीं है। कविता में यदि एक आध पंक्ति भी जीवन भर याद रहे तो कविता सार्थक हो जाती है। निलय जी की कविता आज कल के राजनीति को तटस्थ रखकर भी, बिना कोई पक्ष लिए देहाती पिछड़ेपन को रेखांकित करती है और एक जनजागरण का अलख जगाती है। मैं एक शिक्षक की भाँति विवेचना करने से बचता हूँ क्योंकि शिक्षक विवेचना मन में बहुत देर तक नहीं गूँजती। निलय जी की कविता सीधे सपाट शब्दों में समझें तो देर तक झकझोरती रहती है, कौंधती रहती है।     

प्रमोद कुमार तिवारी ...आज जबकि जीवन और कृतित्‍व में दूरी बढ़ती जा रही है और अनेक मोर्चों पर अलग अलग रूपों में रह कर चालाकी से काम को साध लेना एक सफलता की तरह देखा जा रहा हो। निलय जी जैसे लोग एक भरोसे की तरह नजर आ रहे हैं। कि सबकुछ बाजार नहीं तय करेगा, सब कुछ भौतिक सुविधाओं के तर्क से नहीं चलेगा ‍कि हमारा होना केवल शरीर और मजे का होना नहीं है। और घर परिवार के बाहर भी हमारा अस्तित्व है। सुख शब्‍द जिसके मूल में ही (सु-ख-- सुंदर विस्‍तार या आकाश) विस्‍तार निहित है वह कितना संकुचित होता जा रहा है। इतना कि पड़ोसी तक के ‍लिए या अपने ही परिवार के बुजुर्ग तक के जगह नहीं अंटती उसमें। ऐसे समय में प्रकृति और पानी के हक में खड़ा होना एक बड़ा काम है। सवाल यह नहीं है कि इससे समाज को या गंगा को या सरकार को ‍कितना फर्क पड़ेगा। मेरे लिए कम से कम यह महत्‍वपूर्ण है कि मुझे कितना फर्क पड़ रहा है। एक व्‍यक्ति के भीतर कुछ बदल रहा है या नहीं। गंगा बहुत बड़ी हैं और सरकार का भी अपना ढंग है परंतु इससे किसी व्‍यक्ति का काम छोटा नहीं हो जाता और इस बात को राम के सेतु निर्माण के समय गिलहरी के माध्‍यम से बहुत पहले दिखाया जा चुका है। जानता हूँ कि कुछ लोग इसे निलय जी की बड़ी महत्वाकांक्षा से भी जोड़ेंगे पर कुछ समय बाद ये बातें महत्व नहीं रखतीं। आज निलय जी की कविताओं पर सुखद चर्चा हो रही है। कविता और जीवन के साथ की जरूरत दिन प्रति दिन बढ़ती जा रही हैै। कच्‍चे अनुभवों की मात्रा कम कवियों में दिखती है। निश्चित रूप से कुछ कवि कम अनुभवों से भी शानदार ईमारत बनाने में सिद्धहस्‍त हैं परंतु अनुभव अपनी बात अलग से कहते हैं। निलय जी क‍ी कविताओं में कलात्‍मक उत्‍कृष्‍टता से कहीं अधिक वैयक्तिक ईमानदारी नजर आती है जिसे उनकी विशिष्‍टता के रूप में देखा जा सकता है। 

 साहित्य सम्मेलन,"साहित्य की बात" 17-18 september 2022 साकिबा  साकीबा रचना धर्मिता का जन मंच है -लीलाधर मंडलोई। यह कहा श्री लीलाधर...

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