Tuesday, January 10, 2017

 
अँधेरा ,जिससे सब डरते है ,दूर भागते है ...दोड़ते है प्रकाश की ओर |यदि अंधकार रात बन कर  न आया  होता तो सूरज का अस्तित्व क्या होता ,सोचने वाली बात है | जब भी इंसान प्रकाश में चला अंधकार उसके साये के रूप में साथ चला |जब दीपक ने उजास किया ,अंधकार उसके तल में जा बैठा |खुशियों के उजास में भी कभी कभी उदासी का अँधेरा मन में आकर बैठ जाता है |किसी न किसी रूप में अंधकार हमारे आस -पास ही रहा |अंधकार को सबसे धिक्कार मिला ,प्रतिक बनाया उसे बुराई का |
क्या वाकई अँधेरा इतना बुरा  है, इसमें कोई गुण ही  नहीं है ,क्या इसे समाप्त करना ही एक मात्र  ध्येय  होना चाहिए .....
यही विचार लेकर साहित्य की बात समूह पर ,समुहधिकारी श्री ब्रज श्रीवास्तव जी ने कविता लिखने को प्रेरित किया |त्वरित लिखी गई कविताओं में कवियों ने अँधेरे को भिन्न-भिन्न  द्रष्टि देखा और काव्य संरचना की |
रचना प्रवेश पर प्रस्तुत है अँधेरे पर लिखी गई कविताएं ....

अँधेरे पर विशेष नोट समूह के सदस्य श्री ब्रजेश कानूनगो जी द्वारा 
अंधेरों के खिलाफ

आज अपनी बात विख्यात शायर जनाब राहत इंदौरी जी के एक शेर से कर  रहा हूँ।

जुगनुओं को साथ लेकर रात रोशन कीजिये
रास्ता सूरज का देखा तो सहर हो जायेगी।।

अन्धकार है तो कहीं न कहीं जरूर रात घिर आई होती है। अन्धेरा क्या सचमुच इतना बुरा है? उजाले क्या हमेशा अच्छे ही होते हैं।अँधेरे के भी कुछ उजले पक्ष होते हैं,तो उजाला भी कई अंधेरों को लेकर आता है।

अँधेरा,उजाला व्यक्ति सापेक्ष भी हो सकता है और समय सापेक्ष भी।तुम्हारा उजाला मेरा अँधेरा बन सकता है।उसका अंधेरा तुम्हारे लिये रौशनी लेकर आ सकता है।

कितने हैं जो दूसरों के अंधेरों में मोमबत्तियां लेकर पहुँचते है? ज्यादातर लोग किसी अन्य के इन्तजार में अपने उजालों की अय्याशी में मस्त रहते है।कोई सूरज निकलेगा और सुबह होगी तो उजियारा बिखरेगा।
अंधियारा मिटाना किसी और की जिम्मेदारी समझ हर कोई हाथ बांधे खड़ा रहता है।

राहत इंदौरी जी का शेर दिशा देता है।जुगनुओं को साथ लेकर अँधेरे की दीवार को भेदना चाहता है। इसमें सामूहिकता और कमजोर की एकजुटता की ताकत को रेखांकित किया गया है।

ये अँधेरा क्यों समाप्त करना चाहता है कवि? कहीं न कहीं इसके पीछे अँधेरे के खिलाफ प्रतिरोध की भावना समाहित है।प्रतिबद्धता और उसकी पक्षधरता के दर्शन का पता चलता है।

कवि के शब्द वे अश्म बन जाते हैं जो कविता में रगड़  से छोटी सी चिंगारी का सबब बनते हैं। समाज में उजाले के संचार का वातावरण निर्मित करते हैं।

आज 'अंधियारा' शीर्षक से यहां लिखी गईं कुछ कविताओं में थोड़ी सी ऐसी चमक दिखाई देती  है,लेकिन तिमिर की मजबूत दीवार भेदने के लिए ये कोशिशें नाकाफी ही है।
कुछ और गंभीर प्रयास अभी किये जाने शायद बाकी हैं।
इस टिप्पणी के उजाले में साथी अपनी कविताओं के अंधेरे तलाशने की कोशिश स्वयं करेंगें तो वह कवि को बेहतर बनाने का निश्चित ही एक सार्थक उपक्रम होगा।
जरूरी नहीं कि मैं सब कुछ ठीक ही कह रहा। अपने अंधेरों से खुद भी लड़ना होता है,मैं भी संघर्षरत ही हूँ।

शुभकामनाओं सहित।

ब्रजेश कानूनगो
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समूह के सदस्य श्री सुरेन  सिंह  द्वारा  प्रस्तुत की गई दो कविताये कवि लीलाधर जगूड़ी  जी की 
*अँधेरा-उजाला-१*
➖➖➖➖➖➖ 

अँधेरे के भी किसी गुण की तारीफ़ क्यों न की जाए
उजाला होते ही, बिना नष्ट हुए भी
तत्काल अपने नष्ट होने से हिचकिचाता नहीं
और पक्का इतना कि उजाला बुझते ही, तुरंत जन्म ले लेता है

अँधेरे की प्रशंसा को ग़ाली मानते हैं लोग
ढेर सारा अँधेर और अँधेरा फैलाए हुए लोग
वे अँधेरी और हवाओं से जूझते हुए
अकेले जलते दिये की प्रशंसा करते हैं
जबकि अँधेरे का ईंधन भी तेल-बाती के साथ
चुप-चाप जलता रहता है

यह अँधेरे की सिफ़त है कि वह कभी ख़त्म नहीं होता
पर कभी भी उजाले का गला नहीं घोंटता
और अंत में अँधेरा ही मित्रवत् उसे
अपनी काली आभा के कफ़न से ढक देता है

*अँधेरा-उजाला-2*
➖➖➖➖➖➖ 

छोटे दीयों की तरह चाँद-तारों को निस्तेज करते हुए
सुनहरी हवा से उस काले कफ़न को उठा देता है सूर्य
अँधेरों की छायाएँ दिन भर के लिए जी उठती हैं

सब छायाएँ मिलकर फैला देती हैं
पहाड़ों और समुद्रों तक फैली एक विशाल रात

मेरी ही परछाई में दुबका हुआ है सृष्टि का सारा अँधेरा
अपनी अनुपस्थिति का नाम उजाला सुनने के लिए

न कोई कोशिश न कोई सफलता-असफलता
बस उजाले की कमी इतना बड़ा अँधेरा बना लेती है ख़ुद को।
        
       ➖➖ *लीलाधर जगूड़ी*


1.. अंधकार
अंधेरा नहीं रोशनी है
साफ झकास रोशनी
यह वह रोशनी है 
जिसमें आँखे भटकती नहीं है
यही वह रोशनी है जिसके.बिना
सूरज का कोई अस्तित्व.नहीं हो.सकता
यही वह रोशनी है जिसमें
जीवन आकार लेता है
यही है जिसमें 
हम सपने देखते हैं
सपनों के बिना जीवन की.कल्पना नहीं .....
आँखें अपनी.थकान इसी.रोशनी में
उतारती हैं
करती हैं तैयार
सूरज की तपिश.को.सहने के.लिये
अंधकार ठंडक है
रोशनी तपिश है
यह वह रोशनी है जिसके लिये
न सूरज की जरूरत है
न चाँद तारों.की
अंधकार निर्हेतुक रोशनी है...
इसे अपने होने में दीपक की भी
जरुरत नहीं..
यह स्वयंभू शाश्वत रोशनी है
इसे बंद आँखों से भी देख सकते हैं
यह संसार का हेतू है
जीवन का सृजन है.....
अंधकार..।

संजीव जैन 
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2....
सर्बिया की तरह भावनाओं की तहों के तले
बहती थी मुझमें जुनून की खौलती नदी
जहाँ अब सूखा पड़ा है और अवसाद के
अम्ल से झुलसा गयी है मछलियाँ सारी जिजीविषा की..

आधी रात को सहमे बच्चे की तरह
नफरत की खरखराहट सुन
पलंग के नीचे घुटने मोड़े मेरे ख्वाब
अपने ख़्वाबों के ख्वाब में रोते रोते खो जाते है..

वो पारस सी छुअन जो मेरी ऊँगलियों में डूबी रहती थी
अब बेरुखी से ख़ुश्क  होकर चट्टानी कंकड़ के आकार में
अक्सर लहूलुहान कर देता है सैंकड़ों टुकड़ों में हर मुझे छूने वाले को..

मेरी खुशमिजाजी की चमक जो गारे में घुलकर
इमारत के कंगूरे से लोगों की आँखें चौंधिया रही थी

अनजाने अँधेरों के डर से 
सिमट गयी है फिर से औकात में अपनी.. 

वो नदी,वो ख्वाब,वो छुअन, वो खुशमिजाजी और वो अस्तित्व अपना
मैंने शायद खो दिया है खुद को भी तेरे साथ साथ..

-कोमल सोमरवाल
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3- Devilal Patidar Ji 
 हर एक अपने को रोशन दिमाग यहा  बताता हे
अंधकार फिर क्यो हर जगह नजर आता हे .

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4... मेरे अँधेरे 

तुम मेरे अंधरे देखना सीख लो मेरी सुबह
तुम्हारा उजाला और मेरा अँधेरा दोनो कायनात का हिस्सा हैं

मैं तुमको प्यार करूँगा तो दिन बन जायूँगा
मेरा अंधेरा कही दूर किसी गर्त में पड़ा होगा
तुम पूरी दुनिया को खुली आँखों से देखती हो
तुम जानती हो हर चीज की काली परछाई 
ओ मेरी प्यार
मुझसे क्यों कहती हो में अपना अंधियारा छोड़ कर आऊँ
कितना सुन्दर है ये अँधियारा जो तुम छुपाए हो 
रौशनी के स्कार्फ में काले बालों की तरह
तुम्हारे बालों के अंधियारे में ही रखता हूँ मैं तुम में सृजन के बीज
 
ओ मेरी सुबह तुमको प्यार करूँगा
अपने अंधियारों से बनाऊंगा सितारों से भरी विशाल रजाई तुमको सुला लूँगा और 
दिप दिपते तुम्हारे सोंदर्य को सहेज लूँगा 

ओ मेरी सुबह 
अब में तुममें जन्म लूँगा तुम मुझ में जन्म लोगी
आज में तुममें से गुजर रहा हूँ 
शाम् को तुम मुझ में से गुजर जाना|

रविन्द्र स्वप्निल 
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जिसकी तमाम उम्र अंधेरा निगल गया
उसकी चिता जली तो बहुत रोशनी हुई।
- महेश अनघ
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5....
इस अँधियारे में
डुबोकर कलम
कोई लिखता है 
सुबह 
सुबह
सुबह
तो कोई डुबोता है अपना ब्रश
और कैनवास पर 
उभर आता है
सूरज 
यह और बात 
कि थोड़ा सा अँधेरा
चिपका रहता है
उनकी उँगलियों से 
ताउम्र ... 
#मणि मोहन
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6...अनायास नहीं होता


अनायास नहीं होता कि 
टकराते हैं अश्म और   
ध्वस्त हो जाती है 
तिमिर की दीवार
 
खंडित हो जाती है 
जंगल की खामोशी 
रगड़ के मद्दिम स्वरों से

विचारों के बियाबान में
एक अकेला कवि 
जब सुनना चाहता है 
निविड अन्धकार में
रोशनी की कतरा आवाज   

चकमक 
बन जाते हैं अक्षर  
फूट पड़ती है चिंगारी   
कविता के भीतर से

अनायास 
नहीं जला करती
प्रतिरोध की मशालें.  

ब्रजेश कानूनगो जी 
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7....
ओ! मन के चकमक पत्थर
क्यों पड़े हो अँधेरे कोने में
अपना ही मोल नहीं जानते

जागो! उठो!
पहचानो स्वयं को
तुम में है शक्ति
आग पैदा करने की,
तपन जाने की
तुम जगमगा सकते हो सारी दुनिया...

तब कहो तो ज़रा
क्या डरा सकता है तुम्हें
की अँधियारा...

अरे बात मानो..
ये अँधियारा खुद ही डरता है
तुम्हारे जाग जाने से...

तभी तो यह अँधियारा 
चाहता है तुम्हारा भूले रहना
तुम्हारा खोये रहना...

ओ! मन के चकमक पत्थर
जागो! जागो! जागो!

मंजूषा मन

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8.. अंधियारा

पाटी और खड़िया से 
लिखना शुरू किया 
'अ' से अनार ,लिखे अक्षर
'अ 'से अपने पाये भी 
'अ 'से अंकुरण में देखा सृजन
और 
'अ 'से अन्धकार भी देखा  प्रतिदिन 
सूरज के ढल जाने पर 

सजग हुए दीपक 
सूरज के बन साथी 
चाँद तारे भी हुए शामिल
अक्षेम से बचाने सबको 

मन में जाने कब और कहाँ से 
जमा हो गए 
सबक,
बन अन्धकार के प्रहरी || 

प्रवेश सोनी 
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9... || अँधियारा ||

निरापद नहीं है
अपने होने में पूरा है
जैसे साँस में प्राण
और जीवन में एक ज़रूरी पड़ाव


आवाहन करता है सूरज का
और उसी की प्रतीक्षा में
डटा रहता है,अपना साम्राज्य फैलाये
तान देता है एक चादर नींद की
कि उसके साये में,दुबके रहते हैं
कितने ही ग़म,आँसू और निराशाएं
दिन की मथानी में बिलोया दुःख
छाछ बनके नीचे पड़ा हो जैसे
और उस पर तैरते हैं मक्खन से सपने

एक जैविक क्रिया है अँधियारा
कैसे पायेंगे हम इसके बिना
जीवन की खिचड़ी को स्वादिष्ट बनाने को जरूरी 
मक्खन का सत्व

आरती तिवारी
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10... ।। होना था ।।

यहां वह कंधा होना था
जहां मेरा हाथ खाली
झूल गया है हवा में

कि जिस पर रखता सर
और आंखें बंद कर लेता
मुझे राहत चाहिए
ऐसी कि भूल जाऊं
लौटने के लिए मैं दूर जाऊं हर बार

मुझे आंखों से देखो पूरा
कि रह न जाऊं
मुझे ऐसे भूलो
कि मैं याद करता रहूं

मेरे लिए दरवाज़ा खोलो
मेरी दस्तक से पहले

मुझे पहचानो
कि शीशे में अभी मेरा चेहरा नहीं उभरा
कि मैं अभी
तुम्हारे सपनों के बाहर
टहलता हूं सड़क पर अकेला

यहां वह कंधा होना था
जहां अंधकार की पीठ पर मेरा हाथ
कांपता है बेपनाह !

कोई जन्म होगा कभी
मैं जब
तुमसे कहूंगा
तुम्हारे वृत्त में नाचूंगा
रहूंगा।

     - नवीन सागर

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11...
 हर मौसम में 
साथ मेरे अंधेरा होता है 
औढ लेती हूं इसे 
कभी ज्जबातों की रजाई बनाकर 
सर्द मौसम में

उस वक्त......
रस ,गंध, स्पर्श के न होते हुए भी
एक ऐसी सच्चाई होती है 
जो सारे आवरण को हटा देती है

उस वक्त ….
मुझे सिर्फ और सिर्फ
अपनी कमियों के अंधियारे  ही नजर आते  है 
भीड़ से अलग ,खुद को पहचानती हूं इनमें 

उस वक्त 
इन्हें स्वीकार करने का साहस होता है 
जिंदगी की सच्ची इबारत लिखते हुये ,
अँधेरे में ,
खुद से मिलना सुहाता है ।

राखी तिवारी
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12... || अँधियारा ||

अजीब दहशत सी है जब
अपने शहर के आने पर झाँकता हूँ बाहर ट्रेन से
वहाँ घुप्प अँधेरा है भय का उदगम है ये अँधकार न जाने क्या चीज़ किस चीज़ से टकरा जाए बुरी तरह यह वह अँधियारा है जिसे सूरज छोड़ गया अपने आने तक जो घर की छत से चिपका है नदी किनारे रेत के कणों के बीच में और गहरा गया है ये दुनिया के बनने के पहले दिन से है अस्तित्व में इसका होना देर तक, अखरता है हमें हम डरे हुए हैं दरअसल अपनी बनाई चीज़ के मौजूद न होने पर अँधियारा इसीलिए हुआ है भयानक आज क्योंकि हमने कल तक इसे अलग करके नहीं देखा रोशनी से.... *ब्रज श्रीवास्तव*
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13... दीपशिखा 
लेकर नन्ही दीपशिखा 
मैं तम हरण चली थी,
आलोकित हो मन अंधियारा
मैं बाती बन जली थी। 

देकर दर्प का आत्मोतसरग,
मैं कणकण बिखर गई थी,
नीरवता को बना संगिनी,
आत्मवेदन से निखर गई थी।

दिव्य दरस के अभिसार संग
अनंत प्रेम मे लीन थी,
बन पाती मै जोगन तेरी 
बजी रागिनी बिन बीन थी। 

न जान सकी न पा  सकी
मैं चिर विरहन अधीर थी,
व्यर्थ रहा, मेरा विषपान
मै बिन बदरी की नीर थी। 

छूने चली नभ के तेज को
अंतर तक बावरी थी,
 बस जली अंत तक 
मैं राख ही राख धरी थी।. 

ई. अर्चना नायडू 😊
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14... अंधेरा
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अंधेरा कभी भी
अपने अंधकार से
नष्ट नहीं करता
कुछ भी

बीजों का अंकुरण अंधेरे में होता है

अंधेरे में
एक बूंद चुपके से
पंखुड़ियों पर आ बैठती है
अंधेरा चांद तारों को अस्तित्व देता है दिन के उजाले में खो चुकी बहुत सी आवाजों का पता है अंधेरा अंधकार की भी अपनी नैतिकता होती है । ।। भावना सिन्हा ।।
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15...
 अंधेरा रोज होता है , 
सवेरा रोज होता है , 
अंधेरा डराया करता है , 
सबेरा उसे हराया करता है , 
अक्सर महसूस किया है मैंने , 
किंतु जबसे माँ , पिता को खोया है , 
अंधेरा खूब समझ पाया है , 
जीवन में सिर्फ अंधेरा ही नजर आया है ...

पीयूष तिवारी 
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16... दो किनारे....
दो किनारे थे हम,मैंइधर तुम उधर 
लहर आती रही,दिल मिलाती रही
छिपके"अँधियारा"नज़रें चुराता रहा
चाँदनी एक मधुर गीत गाती रही !

जो सुनाए मुझे,वे नवल छंद थे
जिनमें भँवरे छिपे वे कँवल बंद थे
फिर महक रातरानी लुटाती रही
कोई धुन दिल की धड़कन सुनाती रही !

मधुमयी रात में खुशबुओं के तले
कँपकँपाते अधर अब मिले,अब मिले
साँस की लय उमंगें बढ़ाती रही
गूँज शहनाइयों की लुभाती रही !!
              मीना शर्मा 
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17...
रोशनी के साथ 
जन्मा था
एक टुकड़ा 
अँधेरे का !

उजाले का साया 
बन चलता
धीरे धीरे लील गया
उजाले को ही।

- अनिता मंडा 
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18...
 ये नींद 
कभी चाँदनी
तो कभी
अँधेरी रात की ही है सौगात 
पर ....
सबको सुलानें वाली क्यों
जागी है रात ???

ज्योत्स्ना प्रदीप
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19... अंधियारा : 

ईश्वर के सिरहाने उजास रहता है
दिप्त वलय के रूप में ।
पा जाता है अक्षौणिक सेना 
गज,रथ ,अश्व सब ।
बस अकेले निहत्थे ईश्वर 
उजियार के विरुद्ध है 

वो प्रकाश का हिंसा प्रेम समझते है 
अंधियारा शांति का दूत है
उसके आते ही गांडीव तक कमान
ढीली कर देता है 
अश्व अस्तबल में लौट जाते है ।

कुरुक्षेत्र में प्रकाश की पहली किरण 
मौत के लाखो लिफाफे बाटती है। 
अंधियार के पास शुभकामना पत्र है 
जयद्रथ का दिया हुआ ।

अंधियार है तो
चांद है उसकी पूर्णिमा है
झिलमिल सितारो के आंगन तले
विश्राम की उत्कट इच्छा है ।

मानव सबसे सुन्दर व मौलिक रचना है 
इस रचना के सृजन हेतु
ईश्वर ने अंधकार को चुना 
प्रकाश में वह सिर्फ अनुवाद करता है ।

अखिलेश
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20...
अँधेरे की खामोशी बीती रात
मेरे दिल से करती रही बातें
अंधेरा समृद्ध शाली हो गया
उजाले ने अपने पैर सुकोड़े
मैं उस अँधेरे में ही जीती रही
उजाले की कशिश बकरार रही
बहु मंजिला इमारतों के बीच
खामोशियों के बाजार में
लोगों को जानना मुश्किल था
मुस्कराहटों पर पाबन्दियाँ
गले लगा 
गुबार निकलना मुश्किल था
सो सलाखों के महल मैं
अँधेरे संग बातें करती रही

रेखा दुबे 
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सभी कविताओ पर समूह की सह एडमिन सुश्री मधु सक्सेना का  समीक्षक प्रतिक्रियात्मक नोट 

 सबकी कविताओं पर क्या लिखू ।बड़ा कठिन काम सौंप दिया ब्रज जी ने ।फिर भी कोशिश करती हूँ ।
अँधेरे पर लिखना याने रौशनी के साथ होना ...
अँधेरा शाश्वत सत्य और रौशनी अल्प समय की ....
बहुत बढ़िया विषय दिया ....

बृजेश जी की कविता की शुरुआत आखिरी पंक्ति से शुरू होती है ...जब वो कहते है कि ' अनायास नही जला करती 
प्रतिशोध की मशालें ' 
इन पंक्तियों में दुःख ,त्रासदी और तिल तिल जलने की कहानी छुपी हुई है ।कविता ही है जो रौशनी को खोजती है और दिशा देती है ।अक्षर का प्रकाश ही 
चेतना को जागृत करता है ।
बहुत सुंदर बात और सुंदर तरीके से रखी बृजेश जी ने ।भाषा सहज है और  पाठक को अपने साथ ले चलती है ।
बधाई बृजेश जी ....

मञ्जूषा ने भी चकमक पत्थर की बात की ।अँधेरे के खिलाफ साथ देने वाला पहला हथियार है ये ।वीर रस की ये कविता ललकारती है पुकारती है और साहस जगाती है ।चट्टान पर मानों कोंपल उग आई हो ।अपने छोटे से वजूद को विशालता में परिवर्तित करने की शक्ति का आह्वान करती है । " ओ ! मन के चकमक पत्थर ..,जागो " कह कर मञ्जूषा आत्म बल की शक्ति को उजागर करती है ।
सहज भाषा इतनी की बच्चा भी समझ जाए ।कहीं कोई दुविधा नही, सीधी बात की मञ्जूषा ने ।
बधाई मञ्जूषा ..

प्रवेश की कविता पढ़ कर एक गजल की पंक्तियाँ याद आ गई ..'सुर्खरू होता है इंसान ठोकरे खाने के बाद , रंग लाती है हिना पत्थर पे पीस जाने के बाद '
संधर्ष ही इंसान को शक्ति देता है ।अन्याय ही विरोध का स्वर मुखर करता है ।
प्रवेश की आशावादी कविता उसकी मेहनत और लगन को दर्शा रही है ।आत्मा की आवाज़ होती है कविता और शब्द जिजीविषा । मन के उजाले को जो पायेगा उसका सारा अन्धकार मिट जाएगा ।
कविता की शुरुआत बहुत अच्छी है ।बचपन से शुरू होकर आज तक की बात करती है ।अन्धेरा होगा तभी तो रौशनी की चाह होगी ।जीवन का सन्देश करती बढ़िया कविता के लिए बधाई प्रवेश ।

आरती ने  अन्धकार  को जरूरी बताया ।
जीवन का फलसफा सुख और दुःख का मिश्रण है ..पूरक है अँधेरे उजाले की तरह ।जीवन को पूर्णतः स्वीकारोक्ति आरती को सहज बनाती है ।प्रतीक और विम्ब का प्रयोग बढ़िया किया ...अंतिम पंक्तियों में पूरी कविता का मन मुखरित होता है ।कविता की गम्भीरता प्रभावित करती है ।बधाई आरती ।


राखी की कविता अँधेरे की सार्थकता बयान करती है ।'खुद से मिलना सुहाता है ' कह कर खुद को उसी तरह स्वीकार करती हैं जैसी वो हैं ।खुद से प्यार और स्वीकारोक्ति जीवन जीने की कला है ।
छोटी सी कविता में बड़ी सी बात ।बधाई ।

ब्रज जी अपनी बात भय से शुरू करते है जो अन्धकार से उपजा है ।नदी आशा है पर किनारे की रेत निराशा है बस उसे पार करने की बात है ...नदी को पाने रेत को पार करना ही होगा ।
अंतिम पंक्तियों में मूल बात पर आते है ।अन्धेरा उजाले से अलग नही ..उसकी जरूरत है । अंधकार ही रौशनी देगा ।यानी अँधेरे के कारण ही रौशनी का निर्माण हुआ और हम रौशनी के बिना रहने की सोच भी नहीं पाते ।
बहुत बढ़िया ब्रज जी ।बधाई ।

सभी कविताओं में अँधेरे की सार्थकता की बात आई है किसी न किसी रूप में ।ये सत्य स्वीकाने का साहस है ।बधाई सभी को ।
आभार ब्रज जी ।
मैं आप सबकी कविताओँ की तह में जा पाई या नही या सही कह पाई या नही मैं नही जानती ।आप सब बताये मैं कितनी सफल हुई ।
धन्यवाद और आभार ब्रज जी ।



प्रयुक्त फ़ोटो ,सोजन्य से  श्री शरद कोकास 
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Saturday, December 17, 2016


डायरी अंग्रेजी भाषा से लिया गया शब्द है |प्राचीन भारत साहित्य में इसे लिखने की प्रथा दिखाई नहीं देती |हमारी सभ्यता में भी इसका कोई साक्ष्य नहीं है |क्योंकि गंगा-जमुना संस्कृति में इसका चलन नहीं था। और अगर किसी लेखक ने स्वयं के साथ-साथ तत्कालीन समाज पर कुछ लिखा भी है तो उसका रूप, स्वरूप व विधा भिन्न थी।
लेकिन आज डायरी लेखन को  भी एक साहित्यिक विधा के रूप में स्वीकार किया जा चूका है |
कहा जाता है कि जो बात किसी से भी नहीं कही जा सकती वो डायरी में लिखी जा सकती है। डायरी अंतरंग, विशिष्ट व भरोसे का मित्र है। यह अंतर्मन की अभिव्यक्ति है।स्वयं से साक्षात्कार है ,एक सच्चे मित्र की तरह है जो गलत काम करने पर आत्मग्लानिरूपी दण्डऔर अच्छा काम करने पर आत्मसम्मान रूपी पुरस्कार देती है |
डायरी लेखन का मूल स्वभाव गोपनीयता है  इसलिए इसमें मन की कोमल भावनाओं को उंडेला जा सकता है। अपनी बेबाक टिप्पणी, राय व विचार बेधड़क होकर लिखे जा सकते हैं। यह तभी तक सत्य व संभव है जब तक इसे बिना किसी उद्देश्य के लिखा जाए। प्रकाशित करने के लिए लिखे जाने पर इसकी सत्यता, मौलिकता व पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न लग सकता है। क्योंकि डायरी लेखक संभावित प्रतिक्रिया के डर से या किसी मोह में फंसकर उसमें आवश्यकतानुसार उलट-फेर जरूर करता है। बस यहीं से शुरू होती है मिलावट। दिल की जगह दिमाग का खेल प्रारंभ हो जाता है। 

ओम नागर ---------------------- जन्म: 20 नवम्बर, 1980, अन्ताना, तह. अटरु, जि. बाँरा (राज.) शिक्षा: एम. ए. (हिन्दी एवं राजस्थानी) पीएचडी, बी.जे.एम.सी. प्रकाशन: 1. ‘‘छियांपताई’’, 2. ‘‘प्रीत’’, 3. ‘‘जद बी मांडबा बैठूं छूँ कविता’’ (राजस्थानी काव्य संग्रह), 4. ‘‘देखना एक दिन’’ (हिन्दी कविता संग्रह) 5 . "विज्ञप्ति भर बारिश "(हिंदी कविता संग्रह ) 6."निब के चीरे से" ( कथेत्तर गद्य-डायरी) राजस्थानी अनुवाद - ‘‘जनता बावळी हो’गी’’ (रंगकर्मी व लेखक शिवराम के जननाटक), ‘‘कोई ऐक जीवतो छै’’ कवि श्री लीलाधर जगूड़ी के कविता संग्रह ‘‘अनुभव के आकाश में चांद’’ और ‘‘दो ओळ्यां बीचै’’ श्री राजेश जोशी के कविता संग्रह ‘‘दो पंक्तियों के बीच’’ साहित्य अकादमी द्वारा अनुवाद योजना के अन्तर्गत प्रकाशित। प्रकाशन व प्रसारण: देश की प्रमुख हिन्दी व राजस्थानी पत्र पत्रिकाओं में रचनाएॅ प्रकाशित। आकाशवाणी कोटा, जयपुर और जयपुर दूरदर्शन से समय-समय पर प्रसारण। रचना अनुदित: पंजाबी, गुजराती, नेपाली, संस्कृत और कोंकणी। वागर्थ, परिकथा, संवदिया के युवा कविता विशेषांक व राजस्थानी युवा कविता संग्रह ‘मंडाण’ में कविताओं का अनुवाद। संपादन: राजस्थानी-गंगा (हाड़ौती अंचल विशेषांक) पुरस्कार व सम्मान: 01 . कथेतर गद्य की पांडुलिपी "निब के चीरे से " के लिए भारतीय ज्ञानपीठ का नवलेखन पुरस्कार -2015 02 . केन्द्रीय साहित्य अकादमी नई दिल्ली द्वारा राजस्थानी कविता संग्रह ‘‘जद बी मांडबा बैठू छूँ कविता’’ पर ‘‘युवा पुरस्कार-2012’’ 03 . राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर द्वारा हिन्दी कविता संग्रह ‘देखना, एक दिन’ पर सुमनेश जोशी पुरस्कार, 2010-11 04 . राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर द्वारा शिवराम के जननाटक ‘‘जनता पागल हो गई है’’ के राजस्थानी अनुवाद ‘‘जनता बावळी होगी’’ पर ‘‘बावजी चतरसिंह’’ अनुवाद पुरस्कार- 2011-12 05 . प्रतिष्ठित साहित्य पत्रिका "पाखी " द्वारा "गांव में दंगा " कविता के लिए "शब्द साधक युवा सम्मान 06 . राजस्थान सरकार जिला प्रशासन बारां व कोटा, काव्य मधुबन, साहित्य परिषद, आर्यवर्त साहित्य समिति, शिक्षक रचनाकार मंच, धाकड़ समाज पंचायत सहित कई साहित्यिक एवं स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा सम्मानित। सदस्य: राजस्थानी भाषा परामर्श मण्डल, केन्द्रीय साहित्य अकादमी, नई दिल्ली। संप्रति: लेखन एवं पत्रकारिता पता: 3-ए-26, महावीर नगर तृतीय, कोटा - 324005(राज.) मोबाइल-9460677638 -- ओम नागर मोबा: 09460677638 ई-मेल: omnagaretv@gmail.com

निब के चीरे से ...संग्रह जिसके लेखक ओम नागर और प्रकाशन भारतीय ज्ञानपीठ है ,जिसे ज्ञानपीठ से २०१५ का नवलेखन  पुरस्कार भी मिला है ..डायरी की शक्ल में आत्मकथ्य है |गद्य और पद्य का समुहचीत संग्रह ।
कड़ाके की ठण्ड में नव वर्ष के आगमन की ख़ुशी और हर्ष के बीच बरसती मावठ लेखक को शहर के अभिजात्य  उल्लास से निकाल कर ,गाँव  में खेतों की चिंता में डुबो देता है ।
जमीं से जुड़ा लेखक जिसकी कलम में खेतों और गावों की मिठ्ठी की  खुशबु महकती है ,वो उनके सुख दुख को अपने सिरहाने रख कर सोता और जागता है । इस संग्रह में  लेखक की कविताओं के साथ उन कवियों की कविताओं की पंक्तिया भी सुशोभित है ,जिनका कवित्व और व्यक्तित्व लेखक की प्रेरणा रही है ।
हाडौती की आँचलिक बोली में लेखक का अपने मित्रों ,परिचितों से संवाद करना अपनी माँ बोली के रस में डुबो देता है ।आज की पीढ़ी जिस भाषा के अमृत से अनभिज्ञ है ,उस अमृत का रसपान  कर पाठक  तृप्त सा होता है ।संग्रह में अधिकांश विवरण गांव की जीवनशैली का मिलता है जहाँ लेखक शहर में रहते हुए भी ,फिर फिर लौटता है ।प्रकृति के मौसमों  का चित्रण इस तरह से किया है कि प्रतिक बने शब्द  लेखन कौशल को सुगन्धित कर देते है ।"आकाश हँसता है बारिश की हँसी"  जिसके साथ संपूर्ण वातावरण मुस्करा उठता है ,हां कभी यह हँसी धरती पुत्र के लिए सहज सुलभ होकर जीवन दान दे देती है और कभी दुर्लभ होकर उसके प्राण भी हर लेती है ।कृषि जीवन पूर्णता वर्षा पर ही निर्भर है ।
"डरी हुई रात की हँसती हुई सुबह "  भय जो अफवाहों के पैर से चलकर एक मुहँ से सहस मुखं पर स्थापित हो जाता है ,इसी भय की कहानी लिखी लेखक ने ।आधुनिक युग में भी मृत्यु का भय  या अनहोनी घटित हो जाने का पूर्वानुमान देती अफवाएं क्या नही करवा लेती है इंसान से ।बड़ा रोचक लगा इसे पढ़ना ।
जुलेहा ,टर्की की मित्र  कला साहित्य प्रेमी .. एक समान रूचियां हमें कहाँ ज़े कहाँ ले जाती है और किस किस से जुड़ जाती है रिश्तों की डोरी ,जुलेहा  से मिलना और पुनः सारोला हॉउस में मिलना अच्छा लगा ।
विद्धार्थी जीवन में गुरूजनों का सम्मान और उनका स्मृति में बने रहना ,लेखक का आज की शिक्षा नीति और अपने काल के  शिक्षक और विद्धार्थी के रिश्तों  की तुलना पाठक को भी सोचने पर मजबूर करती है ।आज की शिक्षा   बच्चों को तकनीकी ज्ञान की अधिकता से मशीनी बना रही है ,नैतिक शिक्षा की अभिवृद्धि करने वाले किस्से सुनाने वाले अध्यापक अब कहाँ ।
संग्रह में डूब कर पाठक अपने उस जीवन की झलक पाता है जिसका जिक्र उसके सपनो में कही न कही तो अवश्य था ।
प्रवेश सोनी


रचना प्रक्रिया को किसी भी परिभाषा की परिधि में बाँध देना आसान नहीं होता |भीतर की कोई आग जिसे निरंतर जलते रहना है ,भीतर का कोई तरल जिसे इंसान की आँख की नमी बनाए रखनी है ,भीतर का कोई ठोस जिसे इस्पात होने तक तपते रहना है |यह कहना है  संग्रह के लेखक का |

लेखन का आगाज़  1 जनवरी २०१५ से किया 
जिसमे लेखक की आसपास की दुनिया के रंग बिखरे है |लेकिन इसमें कवि व्यष्टि से समष्टि की यात्रा करता दिखता है |उसमे संतोषी नगर चौराहे पर सैलून चलाने वाले कविमित्र मनोज मोरवाल और पान की दूकान वाले के फक्कड़पनकी चर्चा है तो तेजाजी गायन को रेखांकित करते हुए जीवन शैली में आये बदलाव भी उनकी सोच के विषय है ,वहीँ कवि ने इस बात को भी महीन उदासी के साथ रेखांकित किया है कि शहरो में नयी पीढ़ी का मायड भाषा से जुड़ाव कम होता जा रहा है 
यह डायरी कोटा शहर के अतरंग जीवन समाज का कोलाज है |जिसमे साधारण ,अतिसाधारण अपरिचित ,अल्पपरिचित लोगों की व्यथा पर रौशनी है लेखक की निगाह उधर अधिक गई है जहां शोषित ,प्रवंचित के जीवन में अँधेरा है |अंधेरेमे बारीक़ प्रकाश रेखा के उल्लास को भी उनकी नज़र अचूक ढंग से पकडती है 
यह डायरी अपने शहर और शहर के लोगों के कारण अपना मकाम बनाती है ,जिसमे अपने परिवार से अधिक  किसान ,मजदुर और साधारण जन की व्यथा अभिव्यक्त होती है |
                                                                       अतुल कनक 


कुछ पंक्तियाँ संग्रह की 

दुःख ही तो है जो स्रष्टि को अपूर्ण रखता है |

किसान की मौत अंतहीन बहस छोड़ जाती है |

मौसम में ठहराव की कमी खलती है ,और मन की भी |

किसी की खींची गई लकीर को मिटाने के कौतुक रचने की बजाय ,हमें उस लकीर के बगल में लम्बी लकीर खीचने की कोशिश करनी चाहिए |

गावं में भले ही सुख का परिचय कम होता हो लेकिन दुःख का प्रसार अधिक होता है |गाँव की यह सनातन संवेदनशीलता होती है |



ओम नागर की कुछ कवितायें

पिता की वर्णमाला
--- ---  ---------///--                           
पिता के लिए
काला अक्षर भैंस बराबर।
पिता नहीं गए कभी स्कूल
जो सीख पाते दुनिया की वर्णमाला
पिता ने कभी नहीं किया
काली स्लेट पर
जोड़-बाकी, गुणा-भाग
पिता आज भी नहीं उलझना चाहते
किसी भी गणितीय आंकड़े में।
किसी भी वर्णमाला का कोई अक्षर कभी
घर बैठे परेशान करने नहीं आया
पिता को।
पिता
बचपन से बोते आ रहे हैं
हल चलाते हुए
स्याह धरती की कोख में शब्द बीज
जीवन में कई बार देखी है पिता ने
खेत में उगती हुई पंक्तिबद्ध वर्णमाला।
पिता की बारखड़ी
आषाढ़ के आगमन से होती है शुरू
चैत्र के चुकतारे के बाद
चंद बोरियों या बंडे में भरी पड़ी रहती है
शेष बची हुई वर्णमाला
साल भर इसी वर्णमाला के शब्दबीज
भरते आ रहे है हमारा पेट।
पिता ने कभी नहीं बोई गणित
वरना हर साल यूं ही
आखा-तीज के आस-पास
साहूकार की बही पर अंगूठा चस्पा कर
अनमने से कभी घर नहीं लौटते पिता।
आज भी पिता के लिए
काला अक्षर भैंस बराबर ही है
मेरी सारी कविताओं के शब्दयुग्म
नहीं बांध सकतें पिता की सादगी।
पिता आज भी बो रहे है शब्दबीज
पिता आज भी काट रहे है वर्णमाला
बारखड़ी आज भी खड़ी है
हाथ बांधे
पिता के समक्ष।



भूख का अधिनियम: तीन कविताएं
 -------------------///------ --------                                  
                             (एक)                
शायद किसी भी भाषा के शब्द कोश में
अपनी पूरी भयावहता के साथ
मौजूद रहने वाला शब्द है भूख
जीवन में कई-कई बार
पूर्ण विराम की तलाश में
कौमाओं के अवरोध नही फलांग पाती भूख।
पूरे विस्मय के साथ
समय के कंठ में
अर्द्धचन्द्राकार झूलती रहती है
कभी न उतारे जा सकने वाले गहनों की तरह।
छोटी-बड़ी मात्राओं से उकताई
भूख की बारहखड़ी


हर पल गढ़ती है जीवन का व्याकरण।

आखिरी सांस तक फड़फड़ातें है
भूख के पंख
कठफोड़े की लहूलुहान सख्त चांेच
अनथक टीचती रहती है
समय का काठ।
भूख के पंजों में जकड़ी यह पृथ्वी
अपनी ही परिधि में
सरकती हुई 

लौट आती है आरंभ पर
जहां भूख की बदौलत
बह रही होती है
एक नदी।
(दो)

एक दिन
भूख के भूकंप से
थरथरा उठेंगी धरा
इस थरथराहट में
तुम्हारी कंपकंपाहट का
कितना योगदान
यह शायद तुम भी नहीं जानते
तनें के वजूद को कायम रखने के लिए
पत्त्तियों की मौजूदगी की
दरकार का रहस्य
जंगलों ने भरा है अग्नि का पेट।
भूख ने हमेशा से बनायें रखा
पेट और पीठ के दरमियां
एक फासला


पेट के लिए पीठ ने ढोया
दुनिया भर का बोझा
पेट की तलवार का हर वार सहा
पीठ की ढाल ने।

भूख के विलोम की तलाश में निकले लोग
आज तलक नही तलाश सकें
प्रर्याय के भंवर में डूबती रही
भूख का समाधान।
(तीन)
इन दिनों
जितनी लंबी फेहरिस्त है
भूख को
भूखों मारने वालों की
उससे कई गुना भूखे पेट
फुटपाथ पर बदल रहें होते है करवटें।
इसी दरमियां
भूख से बेकल एक कुतिया
निगल चुकी होती है अपनी ही संतानें
घीसू बेच चुका होता है कफन
काल कोठरी से निकल आती है बूढ़ी काकी
इरोम शर्मिला चानू पूरा कर चुकी होती है
भूख का एक दशक।
यहां हजारों लोग भूख काटकर
देह की ज्यामिति को साधने में जुटें रहते हैं अठोपहर
वहां लाखों लोग पेट काटकर
नीड़ों में सहमें चूजों के हलक में
डाल रहे होते है दाना।
एक दिन भूख का बवंडर उड़ा ले जायेगा अपने साथ
तुम्हारें चमचमातें नीड़
अट्टालिकाओं पर फड़फड़ाती झंडियाँ
हो जायेगी लीर-लीर
फिर भूख स्वयं गढ़ेगी अपना अधिनियम।



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Thursday, December 15, 2016


एक ज़माना था, जब कवि खुद संपादक होते थे, और ख़ुद ही प्रकाशक होते थे, |तब लेखकों में संपादक का और प्रकाशक का किरदार भी गुंथा होता था, उस ज़माने में साहित्य विशुद्ध व्यवसाय न होकर साहित्य की स्थापना के लिए होता था, पर आज ऐसा कोई ही प्रकाशक होगा जो स्वयं रचनाकार भी हो, माया मृग के बारे में यह कहा जा सकता है कि वह ऐसे ही रचनाकार हैं, कहना न होगा कि माया मृग की कविताएँ, आमद की ज़्यादा  लगती हैं, सायास कम लगती हैं| वह जैसे कविता की ऐसी नदी बहा पाते हैं जिसमें भाषा - पानी, धार - कथ्य, संदेश-, रंगों की तरह होता है और पाठक किनारे पर खड़ा हुआ कविता की इन गहराईयों को समझ संवेदित होता हुआ नज़र आता है| आज वाटस एप समूह साहित्य की बात यानि साकीबा में, बोधि प्रकाशन के संचालक, और सुकवि, माया मृग की कविताएँ प्रस्तुत हुईं थीं , जिन पर जानदार चर्चा हुई| साथ ही मधु सक्सेना, एवं प्रवेश सोनी के साथ साकीबा के संचालक ब्रज श्रीवास्तव ने बातचीत की. 
*ब्रज श्रीवास्तव *
प्रस्तुत है यह सब, आपके प्रिय इस रचना प्रवेश ब्लॉग में...



"कविता में जरा सी कविता जरूर हो। वट का पेड़ न सही बीज भर तो हो"
यह कहना है  कवि ,सम्पादक  ,प्रकाशक श्री माया मृग  जी का ,जिन्होंने साहित्य की बात समूह में दिए सदस्य मित्रो के सवालों के जवाब ......



❇साक्षात्कार ❇
प्र0:1  आपका सृजन कब और कैसे शुरू हुआँ,लेखन की प्रेरणा कहाँ से मिली ?

उ0:   ठीक से कहना मुश्किल है पर लिख्‍ाित रुप में मेरी पहली डायरी में पहली कविता 25 जनवरी 1980 को दर्ज है। उससे पहले कुछ कुछ इधर उधर कागजों पर ीिखा होगा या स्‍कूल की कापियों के पिछले पन्‍नों पर--- जिनका अब कुछ अता पता नहीं।
घर में लिखने पढ़ने का माहौल था, पिताजी की अच्‍छी खासी घरेलू लाइब्रेरी थी--- जिनकी ि‍कताबों की धूल झाड़ने का काम अक्‍सर मेरे हिस्‍से अाता था घर में सबसे छोटा होनेके कारण---। किताबों से प्रेम शायद वहीं से शुुरु हुआ होगा। गीताप्रेस गोरखपुर की किताबों से शुरु हुुआ और हिन्‍द पाकेट बुक्‍स की किताबों के जरिये साहित्‍य से जुड़ाव---। इसी के बीच कहीं ीिलखना भी शुरु होगया---


प्र0:2  बोधि प्रकाशन आज शीर्ष पर है ,सफ़र  की शुरूवात से इस मक़ाम तक पहुँचने में कोई बड़ी कठिनाई?

उ0:  सबसे पहले तो यहां संशोधन जरुरी। शीर्ष जैसा कुछ नहीं है, बोधि प्रकाशन केवल अपनी ओर से प्रयास कर रहा है और उसमें व्‍यवसाय भी शामिल है। मुकाम तक पहुंचने की कठिनाई तो हर कदम है ही-- किताबों के हमारे जीवन की प्राथमिकताओं में जगह ना मिलने या कि क्रम में नीचे जगह मिलने से। यात्रा है, जारी है, कोई बड़ा पड़ाव अभी नहीं आया इसलिए यह कहना मुश्किल है कि सफल होने का रास्‍ता कया है--। एक रास्‍ता जो समझ आया, उस पर चल पड़े हैं--- कहीं तो पहुंचेंगे--- इस यकीन के साथ।


प्र0:3  कवि होते हुए प्रकाशक होना, कुछ विरोधाभासी नहीं लगता आपको...?


उ0: कविता लिखना पहले शुरु हुआ 1980 से ही मान लूं तो-- प्रकाशन शुरु किया 1995 में। इस तरह कविता से प्रेम पहला प्रेम है-- प्रकाशन उसी प्रेम का विस्‍तार भर है। इसमें विरोधाभासी तो कुछ है ही नहीं-- पूरक जैसा ही भले हो कुछ। प्रकाशक होकर हर समय कविताएं पढ़ने सुनने का अवसर मिलता है, खुद को भी बेहतर करने का मौका मिलता है, अच्‍छा ही है यह। व्‍यावसायिक रुप ेस कभी कभी कविसुलभ संवेदनाएं आड़े आ जाती हैं तो आर्थिक रुप ेस नुकसान के काम भी कर बैठते हैं--- पर चलता है इतना तो---। दिया भी तो प्रकाशन ने ही है, जरा सा इसमें लग जाए तो क्‍या दिक्‍कत।


प्र0:4  आपकी कविताओ में प्रेम और दर्शन का मिश्रण है तो कविता लिखते समय कैसा महसूस करते है ? क्या कोई ध्यान की अवस्था होती है वो ...?

उ0:  कविता हर स्थिति में एक ध्‍यान की ही अवस्‍था है। ध्‍यान का अर्थ आध्‍यात्मिक भी हो सकता है और केन्द्रित होे जाना भी। कविता सघन संवेदनाओं की अभिव्‍यक्ति ही है, ऐसे में ध्‍यान के बिना कविता होगी भी कैसे। प्रेम हम सबके जीवन में है, होता ही है, होना भी चाहिए। यह संवेनदना की सबसे सुखद परिणति है। दर्शन परंपरागत अर्थ में बहुत गूढ़ रहस्‍यों को जानने के लिए की गई परख है, वह सहज रुप में हम सबके जीवन का ि‍हस्‍सा है। इसलिए  कुछ भी अजीब नहीं लगता कि कविता में भी यही सब आए।

प्र0:5  आपकी नज़रों में कविता क्या है?
प्रेम कविता में स्वानुभूति कितनी होती है ?कोई प्रेरणा 😊?

उ0:  कविता की काव्‍य्‍शास्‍त्रीय परिभाषा में नहीं जाउंगा- बस इतना कह सकता हूं कि कविता मेरे तईं संवेदनाओं का सुविचारित प्रवाह है जो पाठक तक जाकर पूरा होता है-- । केवल संवेदना या केवल अभिव्‍यक्ति का कौशल कविता का अधूरा होना है--। पाठक तक ना पहुंच पाना भी कविता मे एक कमी छोड़ देता है-- उसे जरा सा अौर पूरा होना चाहिए। 
कविता का लक्ष्‍य इन्‍सान को बेहतर बनाना है, सब इस पर एकमतहैं। भिन्‍नता यह कि कोई इसे कविता में घुले विचार के माध्‍यम से कोई संवेदना जगाकर तो कोई अन्‍य तरीके से इस बेहतरी के लिए कविता रचता हैं। 
कविता स्‍वानुभूति ही है।जिसे अन्‍यानुभूति कहेंगे वह भी तभी कविता में आ पाती है जब वह आत्‍मसात कर ली जाए--- यानी आत्‍मसात करने के बाद तो वह भी स्‍वानुभूति ही हो गई--।


प्र0:6  एक चुप्पे शख्स की डायरी की भूमिका कैसे बनी ...?चुप्पा शख्स है कौन ?

उ0:  एक चुप्‍पे शख्‍स की डायरी में वह आ सका जो कविताओं से छूट गया। यह डायरी जैसी डायरी नहीं है,  इसमें दिनचर्या भी नहीं बल्कि दिनचर्या के साथ जो भीतर चलता रहता है वह है। हम सबके भीतर एक चुप्‍पा शख्‍स होता है जो कहना चाहता है पर कहता नहीं, सामाजिकता का दबाव कह लो या अभिव्‍यक्ति की सीमा--। वे बेवजह से ख्‍यालात इसमें हैं, कुछ आत्‍म प्रलाप जैसा भी कहीं कहीं।

प्र0:7   आपके संकलन 
शब्द बोलते है ,कि जीवन ठहर न जाए,जमा हुआ हरापन ,कात रे मन...कात, चुप्पे शख्स की डायरी .....
के बाद नए की किस तरह की भूमिका तैयार हो रही है ,गद्य या पद्य ?


उ0: रचना सतत प्रक्रिया है, चलती रहती है। मूल बात है जो उथल पुथल भीतर है, वह कही जा सके। गद्य या पद्य माध्‍यम हैं बस, माध्‍यम का चुनाव संवेदनाएं स्‍वयं कर लेती हैं। पूर्वानुमान कुछ नहीं, क्‍या लिखा जाएगा, क्‍या नहीं। हां कविताएं काफी हैं, एक किताब से अधिक लेकिन अभी किसी किताब की जल्‍दी नहीं-- ।


प्र08  वॉट्सएप के साहित्यिक समूहों के बारे में आपके विचार और साकीबा के नए कवियों और सदस्यों 
को क्या कहना  चाहेंगे ?

उ0:  व्‍हासप समूहों की अपनी शक्ति है और अपनी सीमा भी। तकनीक के साथ एक सीमा तक सहयोग संभव है उसके बाद थकान होने लगती है। समूह जिस मकसद से शुरु होते हें उनसे भटकने में भी देर नहीं लगती, अग्रेषित किए जाने वाले रेडिमेड मेसेज से भरने लगते हैं समूह। कुछ समूह अनुशासित हैं जिनमें साकीबा भी है, दस्‍तक, सृजनपक्ष भी। सार्थक चर्चाएं होती हैं बहुधा। कभी कभी अति अनुशासन भी दिखता है, जिससे इस माध्‍यम की सीमा उजागर होती है लेकिन मोटेतौर पर इन तीन चार समूहों से बहुतकुछ सीखने को मिलता है मुझे। साकीबा गंभीर प्रयास है, नए जुड़ने वाले मित्र इसकी गंभीरता को समझकर ही शामिल होते हैं इसलिए अपनी ओर से कुछ कहने की जरुरत मुझे नहीं लग रही। 
अपनी रचना सबको प्रिय होती है, यह हम सब जानते हैं । ऐसे में कभी कभी किसी साथी की आलोचना अखर भी सकती है लेकिन इसे दृष्टि की भिन्‍नता और अनुभव के आधार पर ही स्‍वीकार करना उचित है। अपनी ओर से सफाई देने की बजाय हम अपनी रचना का स्‍वयं पुनर्पाठ करें-- जरुरी लगे तो बदलाव भी करें। बस इतनी सी बात। समूह हमें जोड़ने के लिए हैं--- यह हमेशा ध्‍यान में रहे तो अप्रिय स्थितियों से बचा जा सकता है जो कि कभी कभी नजर आ जाती हैं।


प्र ०...अखिलेश ,
कविता के पाठक लगातार कम हुये है आप किसे दोषी मानते है कवि की, प्रकाशक/संपादक की या स्वयं अकविता की ?
उ ० ...कोई एक तो नही हो सकता। और इनके अलावा भी कारण मौजूद हैं। समय जितना तेजी से बदला है कविता उतनी तेज नही बदल सकती। जीने की लड़ाइयां अधिक हो गई पूरा साहित्य ही प्राथमिकता क्रम में नीचे चला गया है।
प्र०..अखिलेश ,
कविता को पाठकीय दृष्टि से एक मरती विधा मान भी लिया जाये तो भी क्या संपादको की कोई नैतिक जिम्मेदारी नही होनी चाहिए, इंडिया टुडे में समीक्षा हेतु पृष्ठ है पर कविता हेतु नही है ?
उ०,..कविता मरती विधा नही रूप बदलती विधा है। पत्रिकाओं का अपना गणित और नज़रिया है|
प्र०..,Braj Shivastav: एक आसान सा सवाल मेरा भी अपना कवि नाम माया मृग रखने की क्या कहानी है?
उ०... एक आकर्षण था कुछ भिन्न साहित्यिक सा नाम रखने का। 1985 के आस पास। मायामृग इसलिए कि हम सब जो बाहर सोने के हैं, भीतर मारीच से। मारीच रामकथा में सबसे इंसानी पात्र लगा। विवश भी और नैतिक-अनैतिक के द्वद्व में उलझा भी।
प्र०...Jatin: माया जी...कोई रचना एक अर्थ व भाव लेकर लिखी गई पर पाठक तक पहुँचते पहुँचते कई अर्थ व भाव में बंट गई.क्या लेखन सफल रहा?
उ०...कविता में अगर संप्रेषणीयता है तो इतना अधिक पाठान्तर नही होगा। पाठक अपने जीवनानुभव और संवेदना से उसे अपने अर्थ में ग्रहण करे तो रचना का विस्तार ही मानें
प्र०...Suren: मायाजी ,हम कब  कहते है कि कविता सायास हो गयी है ? जबकि हर कविता का सूत्र या विचार हमारे अवलोकन की प्रक्रिया में अनायास ही आता है और उसको प्रेसेंटेबल हम सायास ही कर पाते है ?
उ०....कविता का पहला ड्राफ्ट सहज प्रवाह में होता है। सुधार निखार अनुभव से। 🙏🏼
प्र०...Madhu Saksena: माया जी कविताओं का वर्गीकरण जरूरी है क्या ..जनवादी , मार्क्सवादी प्रगतिशील या कोई और ..?
उ०,.. ये वर्गीकरण केवल कविता को समझने के लिए हैं। समग्र रूप से कविता इंसानियत के हक़ में ही है। विचार की अभिव्यक्ति के आधार पर ये धाराएं प्रवाहित हैं|
Jatin: माया जी....सोशल मीडिया का जमाना है.किंडल हैं..पेपरलैस दुनिया...आने वाले दस साल में क्या किताबें होंगी?
उ०,,किताबें हमेशा रहेंगी। जिन देशों में डिजिटल क्रांति बहुत पहले हो गई वहां आज भी किताब की अपनी जगह बनी हुई है  रूप प्रकार बदलते रहेंगे छपी किताब की अपनी जगह बनी रहेगी। ऐसा विश्वास है
प्र०,,.Sayeed Ayub Delhi: एक आख़िरी सवाल मेरा- नोटबंदी का आपके प्रकाशन पर क्या प्रभाव पड़ा है? 😊 और आपके कवि पर भी?
उ०...डिस्पेच का काम बुरी तरह प्रभावित हुआ। नकदी नही रही तो डाक नही भेज पाये। सरकार सबको सलाह दे रही पर अपने विभाग ही कैशलेस पेमेंट लेने की हालत में नही। 
कवि भी इंसान है और इसी देश का वासी तो प्रभावित हुए बिना कैसे रहता। 


🅾🅾🅾🅾🅾🅾🅾🅾🅾

*कविताएं *


 पूछते रहना
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कहा था फकीर ने
मेरे पीछे मत आना
मेरे पीछे रास्‍ता मुझ तक नहीं अाता
ना ही मैं चला जाता हूं रास्‍तों के साथ कहीं
चलते रहने से बदलते रहते हैं रास्‍ते----।

किसी के पीछे नहीं रहता कोई रास्‍ता
आगे हो ना हो, होना वहीं होता है रास्‍ते को
कदमों के निशान पर नहीं बनते नए निशान
फकीरों की बनाई लकीरें नहीं समझ्  सकते लकीर के फकीर्----।

मत पूछना कि कहां गया फकीर
पूछना कि किधर जाती है यह राह
टोके जाने का बुरा मत मानना
रोके जाने का बुरा मानना---।

मसखरों के लिए नहीं होती कोई नसीहत
इसलिए संकोच मत करना
हर साथ चलते रहने वाले से पूछने में
किधर जाता है यह रास्‍ता, किधर जा रहे हो---।

पूछते रहना कभी कभी खुद से भी
यह रास्‍ता किधर जाता है, किधर जा रहे हो--- ?


                    
 नीले स्‍वेटर पर चिडि़या
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कितने सारे फंदे, कितने सारे घर
इनसे क्‍या बुनेगी स्‍त्री
क्‍या क्‍या बुनेगी स्‍त्री
कि बुनते बुनते बुना जाएगा स्‍वेटर भर एक...।

घर में फंदे हैं, फंदों में घर
एक फंदे से निकलती सलाई
दूसरे घर को ले आती है अपने साथ
और स्‍त्री बुनती है वह सब,
जो उधेड़ दिया गया है कितनी ही बार....।

नहीं भूली अभी भी
नीले स्‍वेटर के बीचों बीच बुनना चिडि़या
सुनहरी ऊन से
उड़ान न बुनी जा सके भले, बुनी जा सकती है
एक चिडि़या...जो भूली ना हो पंख फड़फड़ाना...।

स्‍त्री घरों के बीच में है
स्‍त्री फंदों के बीच में है
उसकी उंगुलियों को आंख खोलकर देखने की जरुरत नहीं होती
ना फंदे छूटते हैं, ना घर
फंदे घर बन जाते हैं....घर फंदे
बुनना चलता रहता है हर हाल में
सलाइयां रुक जाने के बाद भी...।

उसकी उंगुलियों में बसी है नाप
कितना खुल सकता है गला
और कितने चौड़े हो सकते हैं कन्‍धे
सीवन के टांके बाहर से ना दिखें
इतनी सफाई तो उसने बचपन से सीख ली....।

उसे नहीं पता कि तुम पहन सकोगे कि नहीं नीला रंग
तुम्‍हें पसंद आएगी कि नहीं चिडि़या...सुनहरी पंख वाली
बेमेल रंगों से चिढ़ सकते हो तुम
स्‍त्री नहीं चिढ़ती तुम्‍हारी चिढ़ से
जानती है, जो पसंद ना हो
उसे उधेड़कर बुना जा सकता है दुबारा....कितनी भी बार

(लो इसे पहन लो तुम....उसने शुरु कर दिया है नया कुछ बुनना....)                      


 पीपल के नीचे एक दीया
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इसी अंधेरे रास्‍ते से गुज़रा था फ़कीर
पत्‍थरों पर निशान नहीं हैं भले ही चलने के
पर पैरों पर निशान हैं पत्‍थरों के
तुम पत्‍थर क्‍यूं देखते हो, पैर क्‍यूं नहीं देखते--।

इससे फर्क नहीं पड़ता कि रास्‍ता दिखता है कि नहीं दिखता
फर्क इससे पडता है कि रास्‍ता है, बस है अपनी जगह
ठोकर लगने पर कराहता नहीं है फ़कीर
हर बार कहता है - वाह, सब तेरी मरज़ी---।

जो नहीं दिखता वह भी होता है अपनी जगह
होने पर नहीं असर होता तुम्‍हारे देख सकने का
तुम आंख भर मापते रहोगे दृश्‍य को
तुम्‍हारी परीक्षा अंधेरे और उजाले से आगे क्‍यूं नहीं जाती---।

दूरियों को नजदीकियों से पाटता चलता है फ़कीर
फ़कीरी नहीं मानती दूरी को
जानता है वह, पास आने के रास्‍ते में दूरियां में नहीं होती
तुम दूरियां ही क्‍यूं देखते हो हमेशा इतने पास से---।

अंधेरा भय नहीं है, भय है अंधेरे पर संदेह का होना
जो ढंका है वह उघड़े से अलग नहीं है कुछ
ये जानने के लिए तुम ठहरकर इंतजार करते हो
फ़कीर का इंतजार चलता है उसके कदमों के साथ---।

चले अाओ कि देखे जाने को बहुत कुछ आएगा आगे
चले जाने का रास्‍ता इतना ही है
जितना कट जाएगा चलने से
भला हो फ़कीर का कि उसने निशानदेही कर दी है
यहीं से कटना शुरु होगा अंधेरा
पीपल के नीचे जलाकर रख गया है एक दीया, माया मृ
                    
 उस ईश्‍वर का पता
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जब जब लड़खड़ाया
मंदिर की सीढि़यों पर आकर गिरा
विश्‍वास का बोझ अपने सिर से उतार
तुम्‍हारे कन्‍धे पर रख दिया
यह जाने बिना कि तुम उठाओगे कि नहीं.....।

अपने ही भय से भयभीत
बुदबुदाए तुम्‍हारे मंत्र
वे कि जिनका अर्थ कभी न जाना
न जानना चाहा....बताने वालों ने जरुरी भी नहीं समझा.....।

भले ही सिखाया जाता रहा
सिर उठाकर जीना,
पर तुमने सिर झुकाए को ही देखा
मेरी पराजय के क्षणों में मुस्‍कुराए तुम
यह कुटिलता थी कि करुणा, निर्णय न कर सका.....।

रोया तो आंसुओं में तुम्‍हारी छवि देखी
जरा सी मुस्‍कुराहट से
ओझल हो गए तुम
निर्भय हंसी को राक्षस कहती हैं तुम्‍हारी किताबें
सिखाती हैं मौन रहना समाधियों में
अधनींद में जब भी बोला, उच्‍चरित किया तुम्‍हारा नाम.....।

भूख से पराजित भीड़ में सदियों से खड़ा
जयकार करता, प्रयास में रहा कि
तुम भी मुझे भीड़ में एक नजर ही सही, देख तो सको
तुम्‍हें लगा मैं तुम्‍हारा प्रसाद पाकर संतुष्‍ट हूं.......।

तुम मेरे लड़खड़ाने की प्रतीक्षा करते हो
तुम मेरी पराजय में मुस्‍कुराते हो
तुम मेरी भूख पर पिघलते हो
सिर झुकाने पर ही देखते हो मुझे......।

सिर उठाकर भी देख सकूं जिसे....उस ईश्‍वर का पता चाहिए....।

माया मृग
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सुरेन सिंह 
माया जी की कविताओं से फेसबुक के माध्यम से कई वर्षों से परिचित हूँ और आज लगी कविताओं को देखकर कविता पढ़ने का सुकून मिला ।


आज प्रस्तुत कविताओं का स्वर मद्धम है और अपने कहन में कवि के आध्यात्मिक मूल्यों से परिचित कराती हुई पाठक को अपने प्रेममय संसार में इस भांति ले जाती है कि पाठक कविता को घूंट घूंट आस्वादित करते हुए पढता है ,रुकता है ,सोचता है ,मुस्कुराता है और ठंडी सी सांस छोड़ते हुए विचार मग्न हो जाता है ।


पहली कविता  , पूछते रहना और तीसरी कविता , पीपल के नीचे एक दिया  , एक ही जोनर की कविताये है ।इन कविताओं में  कवि  सम्भवतः नीत्शे के दस स्पोक जरथुस्त्र और खलील जिब्रान के प्रॉफेट से प्रभावित होकर फ़क़ीर के माध्यम से पाठक के समक्ष नीति सूत्र को काव्य में उतारना चाह रहा है । इस चाह में वह शब्द के चमत्कारिक उपयोग को साधन बनाता है पर मुझे इन शब्दिक चमत्कारों से वैसी लाक्षणिकता उत्पन्न होती नही प्रतीत होती जैसे की विनोद शुक्ल जी सरलता से कर जाते है ।

दूसरी कविता ,नीले स्वेटर ..  एक सहजता से कही गयी सुन्दर कविता है । यहाँ भी शब्द से कवि के खेलने को पाठक पढ़ मुस्कुराता भर है और कविता के अंत तक आते आते ... स्त्री नही चिढ़ती तुम्हारी चिढ से / जानती है ,जो पसंद न हो /उसे उधेड़कर बुना जा सकता है /दुबारा ...कितनी भी बार
इन पंक्तियों से पूरी कविता का काव्य पाठक के दिलोदिमाग पर छा जाता है । इन चार पंक्तियों में कवि क्या क्या नही समेट देता । सुन्दर कविता ।

चौथी कविता , जब दुबारा पढ़ रहा था तो अनायास ही सर्वेश्वर की प्रार्थना सीरीज की कविताये याद आयी,  नही नही प्रभु शक्ति नही मागूँगा ... यहाँ कवि उस ईश्वर को ढूँढना चाह रहा है जो , दीन दयाल.....  टाइप का न हो । ये कविता की रेशनालिटी को आकाशकुसुम सा कर देता है । मतलब पाठक सोचता है कि ईश्वर हो भी और अपने गुणधर्मो से भिन्न भी हो ,तो वह थोड़ा कंफ्यूज सा हो फिर कविता पढता है पर ...


यह मेरे पाठ की पाठकीय टिप्पणी है जिससे असहमति की पूरी गुंजाइश है । माया जी को उनके काव्य कर्म के लिए शुभकामनाये 💐💐

सईद अय्यूब 
आज पटल पर माया जी की कविताएँ पाना सुखद आश्चर्य की तरह है। इनमें से अधिकांश कविताएँ स्वयं माया जी से सुनने का अवसर मिला है। अभी लगभग तीन महीने पूर्व माया जी के जन्मदिन पर हमने ग़ाज़ियाबाद में एक गोष्ठी आयोजित की जिसमें माया जी का एकल काव्य पाठ हुआ। माया जी ने छोटी-मँझली-बड़ी कुल मिला कर 62 कविताओं का पाठ किया और श्रोता थे कि और सुनने को उत्सुक थे। फ़क़ीर सीरीज की कविताएँ, नदी सीरीज़ की कविताएँ और ताजमहल सीरीज की कविताएँ तो ग़जब थीं/हैं।

फेसबुक पर माया जी से बहुत पहले से जुड़ाव था पर पहली व्यक्तिगत मुलाक़ात 2012 में जयपुर साहित्य महोत्सव में हुई और वहीं से मित्रता और मिलने मिलाने का वह क्रम शुरु हुआ जो आजतक ज़ारी है। अभी पिछले रविवार को दिल्ली के नेशनल म्यूजियम में आयोजित कैलिफोर्निया निवासी कवि-चित्रकार दर्शवीर संधु के प्रथम काव्य संग्रह 'पोरों पे जमे सच' के लोकार्पण कार्यक्रम में मंच से लेकर घर के रास्ते तक हमने कई घण्टे साथ गुज़ारे। तो माया जी की नज़दीक़ी ने माया जी को, उनकी कविताओं को और उनके पूरे व्यक्तित्व को समझने के कई अवसर दिये हैं। जयपुर में उनके ऑफ़िस में, अपने मित्रों के घरों पर, जवाहर कला केन्द्र में, दिल्ली एनसीआर की बहुत सारी महफ़िलों में, दूसरों के आयोजनों से लगायत ख़ुद के आयोजनों में माया जी की न केवल कविताएँ सुनने को मिली हैं बल्कि कविता पर आपके अद्भुत ज्ञान व बातों से कविता की समझ विकसित करने में भी सहायता मिली है।

माया जी के व्यक्तित्व का खुलापन उनकी कविताओं के फलक को विस्तृत करता है तो हर वस्तु पर, हर जगह, कभी भी कविता न लिख देने की उनकी तीव्र इच्छा शक्ति उनकी कविताओं की सान्द्रता को अत्यंत तीक्ष्ण बनाती है। जहाँ उनकी संवेदनायें देश-जीवन-जगत की छोटी से छोटी घटना, लघु से लघु वस्तुओं और हाशिये पर पड़े या डाल दिये गये मनुष्यों तक पहुँचती हैं वहीं उनकी भाषा भी उसी के अनुरूप चलती है। वे बिम्ब रचते नहीं हैं बल्कि समाज में मौजूद उन बिम्बों की पहचान करते हैं जहाँ हम-आप की नज़र भी नहीं जाती।

आज प्रस्तुत सभी कविताओं के प्रति यह मेरी समेकित प्रतिक्रिया है। एक बात और कहना चाहूँगा कि माया जी की कविताओं को उनके गद्य के साथ पढ़ना चाहिये। उनका गद्य उनकी कविताओ को समझने में बड़ी भूमिका निभाता है।

और सबसे अंत में आजके प्रस्तुतकर्ता ब्रज जी का शुक्रिया!


अपर्णा 
माया मृग जी से कई बार मिलना हुआ है। दो बार उनका काव्यपाठ सुना है और एक बार अपनी कविताएँ सुनाने का, उनकी टिप्पणी सुनने का सुअवसर भी मिला है। नए स्वर को हमेशा प्रोत्साहन देते देखा है सर को।
चार वर्ष पूर्व हिंदी कविताओं को पढ़ना शुरु किया था तब माया मृग की डायरी पढ़ी। तब से फेसबुक पर कविताएँ पढ़ती रहती हूँ। प्रीता व्यास जी के स्वर में सुनती भी रहती हूँ।

पहली कविता में फ़कीर का, राह का और मंज़िल का ज़िक्र में सावधान करता स्वर है। बिना सोचे समझे अंधअनुसरण किसी काम की नहीं। किसी का भी हित नहीं साधती। स्वंय को सजग रखते आगे बढ़ने की बात करती है ये।

दूसरी कविता में शब्दों का खेल है। घर, फंदा, बुनना, उधेड़ना, नीला विस्तार और सुनहली चिड़िया, सीवन, टांके, सफाई, पसंद, नापसंद और फिर से उधेड़बुन की वही अनवरत कवायद। सब गहरे बिंब हैं। और सबके बीच में है स्त्री। बहुत अच्छी लगी यह कविता।

पहली कविता का विस्तार तीसरी कविता में प्रतिध्वनित है। सुंदर, दिखते से  बिंब हैं। आध्यात्मिकता और यथार्थ के बीच की राह दिखाती कविता है।

चौथी कविता 'ईश्वर' से संवाद होते हुए भी ईश्वर की अवधारणा पर प्रश्नचिन्ह लगाती है। भय, अभाव और लालसा के बीच खड़ा है ये संबंध।

मेरी पाठकीय प्रतिक्रिया मात्र। संभव है ये सही न हो। माया सर को नमस्कार। शुभकामनाएँ। 🙏🏽

आभार ब्रज जी। 🙏🏽


 Ghanshym Das Ji: 
आज प्रस्तुत सभी रचनायें बहुत ही शानदार व उच्च स्तरीय हें lस्वेटर बुनने के माध्यम से कवि स्त्री स्वयं को बार बार आपके अनुरूप ढालने के प्रयास करती है तथा कवि उसके त्याग व धैर्य को दर्शा रहा है l पूछते रहना में बहुत ही शानदार शब्दों में उन बातो को बता रहा है जो सभी महापुरुषों ने कहीं हें कि अपना रास्ता खुद बनाओ दूसरों के पद चिन्हों पर मत चलों l आजकल हम लोगों की सबसे बड़ी बिडम्बना ये है कि हमने अलग क्या हमने तो महापुरुषों रास्ते पर चलने के स्थान पर मात्र उनके स्वरुप/ मूर्ति/चित्र को पूजना ही उनका रास्ता मान लिया है l उस ईश्वर का पता मुझे ईश्वर के प्रति विद्रोह की रचना प्रतीत होती है l क्या ये हम,हमारा ही स्वार्थ नहीं की हम अपने अपनी पराजय / दुःख के समय ही उसके सामने पहुचें यानि हमारे अंतर्मन में एक यकीन है जब कोई सहारा नहीं तो उसका सहारा मिलेगा ही ये बात अलग है कि हमको ऐसा नहीं लगता कि तत्काल राहत दी हो और फलस्वरूप हम उसके प्रति विद्रोह दिखाने लगते हें ,पर उसकी मुस्कराहट व्यंग नहीं है l मायामृग जी व ब्रज जी का आभार बहुत ही स्तरीय रचनाओं की प्रस्तुति के लिये l                      

Mani Mohan Ji:
माया जी की बेहतरीन कविताएं ।
बड़े फलक की कविताएं हैं इस मायने में कि यहां न तो किसी विचारधारा का बोझ है और न ही भाषा का बोझ इन कविताओं पर है । बहुत सहजता से इन कविताओं में स्वप्न , यथार्थ , मिथक , बिम्ब सब घुले मिले से जान पड़ते हैं ।बधाई माया जी ।


प्रवेश सोनी 
फकीरों की बनाई लकीरें नही समझ सकते लकीर के फ़कीर
शब्दों की जादूगिरी ...और हर शब्द गूँथ कर  बन जाता हैएक वाक्य जो किसी पाठ से कम नही होता ।
माया मृग जी की कवितायेँ सघन संवेदनाओ  की अभिव्यक्ति है ।
स्त्री नही चिढ़ती तुम्हारी चिढसे ,.... हर फंदे में घर और घर एक फंदा......स्त्री मन की गहरी परत जिसे शब्दबद्ध  करने में महारत हासिल है माया जी को ।एक पुरुष का चिंतन जब स्त्री मन की सम्वेदनाओं तक पहुँचता है तब सृजन होता है ऐसी ही अद्भद कविताओं का ।
दर्शन का अद्भद दर्शन
बोधमयी कवितायेँ
शुभकामनाएं


अखिलेश श्रीवास्तव
माया मृग जी की एकाध कविताओं से मुलाकात पहले भी है पर खजाना यूं हाथ नही लगा था ।इन कविताओं को पढते हुए जड़ खोदने की आवश्यकता ही नहीं, सहज भाषा विन्यास से ये सीधे पाठक से जुडती हैं इन कविताओं की पृष्ठभूमि जल जैसी तरल है जिस पर पाठक मन दूर तक तैर तो सकता ही है, तृप्ति भी होती है
कुछ भवरे है जो समीक्षा की सम्भावना को नकारती नही, पर अक्सर सीधा संवाद करती है ये यात्रा कराती कविताएं है एक फकीर के जैसी ।

भाषा के स्तर पर कविता अनायास चमत्कारो से पाटी नही गई है उन्हे ठहरने को कह, सिर्फ अद्भुत भाव का कलेवर ले ये कविताएं सार में बतियाती है व्यथा का अतिशय प्रलाप भी नही है उतना ही कहा है जितना कवि का सच है । अज्ञेय की बात पर हुहंकारी भरते माया मृग शब्दो से कविता का आखेट नही करते बल्कि उसे निषेध करने की चेतावनी देते है ।

अकविता मे छंद सा प्रवाह देखना हो तो इन कविताओं के तट पर पहुंचे, हाथ अनजाने में ही कागज की कश्ती न बनाने लगे,तो कहियेगा ।

अखिलेश

अनीता मंडा 
पूछते रहना
पंथवाद पर कटाक्ष -लकीर के फकीर।
यही सच है, जिन कुरीतियों से लड़ने को फकीर बने, लकीरवादियों ने उन्हें उसी में कैद कर दिया,  मूर्ति पूजा के धुर्र विरोधी रहे बुद्ध को आखिर मूर्ति बना कर रख दिया, ताउम्र हिन्दू मुस्लिमो को एक करने की जद्दोजहद में लगे कबीर के शव तक भी वो झगड़ा नही मिटा तो नही ही मिटा।
स्व के भीतर की यात्रा को चेताती पंक्ति-
पूछते रहना कभी कभी खुद से भी
यह रास्‍ता किधर जाता है,
बाहर की भटकन पर तो दूसरे भी टोक देते हैं।
भीतर के लिए सावधानी की जिम्मेदारी खुद की ही है।
बहुत अच्छी लगी कविता।  

अर्चना नायडू 
मुददत से मायामृग सर की कविताओं का इंतजार था। अचानक ऐसा सरप्राइज पाकर बहुत अच्छा लगा।
सारी की सारी कविताएँ   मन की गहराइयों में डूब जाती है।  कहा जाता है कि गुरुजनों से जहाँ भी, जैसे भी सीखा जा सकता है।   और सर को तो फेसबुक के जरिये मै बहुत पहले से गुन रही हूँ।
  बृजजी ऐसी बेहतरीन कवितायें भेजने का आपका आभार। 🙏    


रेखा दुबे 
मायामृग जी की,मन को छू जाने वाली कविताएं एक बार पढ़ कर मन भरता ही नहीं है बार-बार पढ़ना और मनन करते हुए लगना इनकी गहराई में पहुँचने में हमारी पकड़ अभी अधूरी है और खोजी निगाहों का एक बार फिर कविता पढ़ने के लिए बेचैन हो जाना ही मायामृग जी की कविताओं की गहराई को दर्शाता है।
इतनी सहज और उच्चस्तरीय कवितायेँ पढ़ाने के लिए ब्रज जी का शुक्रिया  

ज्योत्सना प्रदीप 
उस ईश्वर का पता
एक उच्चस्तरीय कविता...परम  सत्ता को पूर्ण समर्पित रचना..
वो मुझे देख ले  'भीड़ में एक नज़र' या फिर मै  उसे देख सकूं " सिर उठाकर" हर दशा में मिलनें की तड़प है उस परम सत्ता से।
आसक्ति  में या फिर विरक्ति में..चाह उसी की है क्योंकि 'उसका 'सुख में ओझल होना भी  तो ठीक नहीं...मिलना है ...पर सुख में भी..एक विश्वास के साथ ।
बहुत सुन्दर...बहुत गहरी  रचना
माया मृग जी की लेखनी को नमन🙏
आभार बृज जी🙏      


आरती तिवारी 
माया मृग सर की कविताओं को पढ़ना खुद को समृद्ध करना है। हर बार अपनी नई कविता में वे चकित कर देते हैं। उनकी कवितायेँ मैं फेसबुक पर पढ़ती हूँ। बेटे और पिता के द्वंदात्मक अन्तर्सम्बंधों पर उनकी एक कविता मैंने फेसबुक पर ही पढ़ी थी और उसी दिन एक स्थानीय काव्यगोष्ठी में उसका पाठ किया था। मैं प्रायः ऐसे स्थानीय कार्यक्रमों में समूह के साथियों की अच्छी कवितायेँ या आर्टिकल ही पढ़ती हूँ बजाए अपनी कवितायेँ पढ़ने के,और जो भी कवितायेँ अच्छी लगती हैं उन्हें अन्य समूहों पर साझा भी करती हूँ। शरद सर की मस्तिष्क की सत्ता की पिछली बार पोस्ट की सभी कड़ियाँ मैंने मन्दसौर के समूहों में लगाई थीं और वहाँ की टिप्पणियॉ भी साझा की थीं
साहित्य की बात समूह में सभी साथियों का परस्पर अपनत्व इसे पारिवारिक वातावरण देता है।
प्रवेश ने आज बहुत अच्छे से साक्षात्कार के प्रश्न रखे। साकीबा का आभार इतनी सुंदर कवितायेँ पढ़वाने के लिए👍🏼👍🏼👏🏼👏🏼🙏

 साहित्य सम्मेलन,"साहित्य की बात" 17-18 september 2022 साकिबा  साकीबा रचना धर्मिता का जन मंच है -लीलाधर मंडलोई। यह कहा श्री लीलाधर...

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