Monday, March 7, 2016




🎭गिल्‍टीमिथ

✒प्रेमचंद गांधी
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नींद के साथ उसका बदन भी टूटता जा रहा था। आंखें खोलकर देखा तो खिड़की में तेज़ धूप का उजाला था। वह बिस्‍तर पर ही लेटा रहा। फिर से आंखें बंद कर लीं और सिलसिलेवार ढंग से याद करने की कोशिश करने लगा कि वह इस अजनबी कमरे में कैसे और कब पहुंचा? वह दो दिन से अपने फ्लैट से  ग़ायब है। एक दिन पहले वह सुशील के यहां था और कल रात प्रीति के यहां। दीवार पर घड़ी में 11 बजकर 35 मिनट हुए थे। इतनी देर तक तो वह कभी नहीं सोता। उसने उठने की कोशिश की तो घुटने मोड़ने में दर्द हुआ। उफ्फ... इतना दर्द क्‍यों है? उसने मोबाइल उठाने के लिए तकिए के नीचे हाथ दिया तो मोबाइल की जगह कागज़ का एक पुरज़ा उसके हाथ में था। उसने खिड़की से आती धूप की रोशनी में देखा, प्रीति की ही लिखावट थी।

‘डियर सनी, मैं ऑफिस जा रही हूं। मेरी मोर्निंग शिफ्ट है। तुम बहुत थके हुए लग रहे थे, इसलिए मैंने तुम्‍हें जगाया नहीं। फ्रिज के ऊपर मेरा एटीएम कार्ड रखा है। उसमें लास्‍ट के दो और शुरु के दो डिजिट से पिन नंबर है यानी तुम्‍हारी बर्थ डेट शुरु में आएगी। इस कार्ड से तुम अपनी ज़रूरत के मुताबिक पैसा निकाल सकते हो, एक दिन की लिमिट पचास हज़ार है। एक बार में बीस हजार ही निकलवाना और जितने रुपये चाहिए तीन बार में निकाल लेना। नाश्‍ता और खाना सेंटर टेबल पर है, गर्म करके खा लेना। और हां मैंने तुम्‍हारे मोबाइल को चार्जिंग पर लगा दिया है। पैसे निकालते ही रिचार्ज भी करवा लेना। ... तुम रियली बहुत प्‍यारे हो सनी... अब उठो और नई ऊर्जा से भर जाओ। मैं तुम्‍हारे जैसे दोस्‍त को यूं परेशान नहीं देखना चाहती। कम ऑन एण्‍ड गेटअप फॉर न्‍यू लाइफ।... एण्‍ड वन लास्‍ट थिंग, डोंट फील गिल्‍टी अबाउट एनीथिंग.. तुम्‍हारी दोस्‍त, प्रीति।‘

उसने उठने की कोशिश की और कमर सीधी करते ही देखा, उसके बदन पर प्रीति का बर्मूडा है। एकबारगी तो वह ख़ुद से ही झेंप गया। उसकी जींस सामने कुर्सी पर पसरी हुई थी। उसी कुर्सी पर प्रीति के भी कपड़े रखे हुए थे। उसने बदन को लय में लाने के लिए बांहें फैलाकर अंगड़ाई लेनी चाही तो कुहनियां दुखने लगीं। उसे समझ नहीं आया कि ऐसा क्‍यों हो रहा है? वह उठा और सीधे बाथरूम में चला गया। मुंह धोकर आईने में देखा तो वह अपना ही बेतरतीब दाढ़ी वाला चेहरा देख सकपका गया। कमोड पर बैठने के बाद धीरे-धीरे उसे कल की घटनाएं सिलसिलेवार ढंग से याद आने लगीं।

वह कई दिन से यही कर रहा था। रोज़ सुबह जल्‍दी उठकर अपने फ्लैट से निकल लेता और कनॉट प्‍लेस, आईआईएमसी, कॉफी हाउस या अपने दोस्‍तों से मिलने चला जाता। परसों सुबह जब मकान मालिक छह बजे ही आ धमका तो वह कुछ नहीं कर सका। उसे आजकल में ही तीन महीने का बाकी किराया देने का वादा कर डाला। फिर निकल पड़ा किराये का इंतज़ाम करने के लिए। उसके दोस्‍त ज्‍़यादातर तो उस जैसे ही संघर्षशील थे, लेकिन कुछ अच्‍छे-ख़ासे समृद्ध भी थे। उसने पहले ऐसे लोगों से ही संपर्क किया, लेकिन वे सब तो अपनी ही कहानियां लेकर पहले से तैयार बैठे थे। उसे लगा दिल्‍ली ने इन सबको बहुत स्‍मार्ट बना दिया है। वैसे भी कोई ऐसे दोस्‍त को एकदम से कैसे पचास हज़ार दे सकता है,  जिसके भविष्‍य का कोई ठिकाना ही न हो। वह पिछले सात महीने से बेरोज़गार है और अगर मीडिया में काम करने वाले किसी क़ाबिल इंसान को इतने दिन में भी काम नहीं मिले तो यह माना जाता है कि यह तो गया अब काम से।

मीडिया में ये दिन मालिकों के ही नहीं, पत्रकारों तक के रीढ़विहीन होने के दिन थे। हर कोई बिकने को बेताब था जैसे। और सबकी कीमतें तय करने का काम राजनीति और कार्पोरेट घराने कर रहे थे। ऐसे दिनों में सनी यानी शैलेश नीलम जैसे प्रखर युवा पत्रकार को दिल्‍ली में दर-दर की ठोकरें खानी तय थीं। बहरहाल वह हर संभव जगह जब कोशिश करके हार गया तो मोहनसिंह प्‍लेस के कॉफी हाउस से निकलकर पालिका बाज़ार की ओर चल दिया। वह रेड लाइट पर खड़ा सड़क पार करने के इंतज़ार में था कि उसे अचानक उस चैनल की ओबी वैन गुज़रती दिखाई दी, जिसमें प्रीति काम करती है। प्रीति आईआईएमसी में उससे एक साल सीनियर थी और उसने प्रीति के अंडर में एक बार कुछ दिन के लिए ही सही काम भी किया था। उसे प्रीति का सेल्‍फमेड स्‍टाइल बहुत भाता था। वह दिखने में ही नहीं बात करने में भी बहुत बिंदास और बोल्‍ड लड़की थी। किस्‍मत से वह देश के महत्‍वपूर्ण मीडिया ग्रुप में अच्‍छी पोस्‍ट पर थी। सनी को उम्‍मीद तो नहीं थी कि उसे वहां नौकरी मिलेगी, लेकिन प्रीति से मदद मांगने के बारे में सोचता हुआ वह उसका फोन नंबर तलाश करने लगा। उन दोनों के बीच बात-मुलाकात हुए करीब एक साल हो चुका था। सनी ने सोचा, एक बार बातचीत की कोशिश करने में कहां नुकसान है? और उसने प्रीति को फोन लगा दिया।
‘हलो प्रीति मैम, मैं सनी बोल रहा हूं।‘
‘हां सनी, कैसे हो यार कितने दिन हुए तुम दिखे ही नहीं कहां हो?’
‘यहीं दिल्‍ली में ही हूं मैम, लेकिन...’
‘लेकिन क्‍या...’
‘बहुत मुसीबत में हूं, और आपकी मदद की ज़रूरत है, आप कहां मिल सकेंगी?‘
‘अरे मुसीबत के मारे तुम ख़ुद कहां हो इस वक्‍़त?’
‘मैं इस समय सीपी में हूं मैम।‘
‘ओके, क्‍या तुम आधा घंटे बाद प्रेस क्‍लब में मिल सकते हो?’
‘यस मैम।‘
‘तो ठीक है, मैं वहीं आ रही हूं, लंच साथ में करेंगे।‘
‘ओके मैम।‘

फोन काटने के बाद उसने स्विच ऑफ कर दिया, यह सोच कर कि कहीं मकान मालिक का फिर से फोन नहीं आ जाए। कनॉट प्‍लेस से कॉफी हाउस की दूरी वह पैदल ही तय करता चला गया।

आईआईएमसी में एक डिबेट कंपीटिशन में प्रीति से उसकी पहली मुलाकात हुई थी। दलित, आदिवासी महिलाओं पर केंद्रित विषय पर प्रीति ने अपनी फर्राटेदार अंग्रेजी में जिस तरह से दस मिनट में अपने तर्क पेश किए थे, सनी उसका कायल हो गया था। उसी डिबेट में सनी को ‘हिंदी पत्रकारिता पर राजनीति के प्रभाव’ विषय पर हिंदी में बोलना था। दोनों ही उस डिबेट में अपने विषय और वर्ग में पहले नंबर पर थे। वहीं उनकी पहली मुलाकात हुई जो धीरे-धीरे अच्‍छी दोस्‍ती में बदल गई। वे अक्‍सर लाईब्रेरी या कैंटीन में मिलते और अपनी पढ़ाई को लेकर चर्चा करते। प्रीति सीनियर होने के नाते उसे अपने अनुभव से टिप्‍स देती और उसे गाइड करती। प्रीति ने अपने बैच में टॉप किया था और वह पासआउट होते ही कहीं नौकरी करने लगी थी। सनी ने भी अपने बैच में टॉप किया था। इस बीच प्रीति से उसकी मुलाकातें कम हो गई थीं। वे कभी-कभार ही मिल पाते थे। पासआउट होने के बाद सनी प्रिंट मीडिया में पहले तीन-चार अखबारों में और बाद में एक मासिक पत्रिका में गया तो वहां प्रीति उसकी कॉपी एडिटर थी। सनी उस मैगजीन में तीन महीने काम करने के बाद एक बड़े अखबार में चीफ रिपोर्टर होकर चला गया और प्रीति प्रिंट से एक टीवी चैनल में चली गई। सनी उसी अखबार में चीफ रिपोर्टर से संपादक बन गया। सात महीने पहले उसने अखबार छोड़ दिया। प्रीति से पुरानी मुलाकातों को याद करता हुआ वह प्रेस क्‍लब तक आ गया था।

आखि़री बार वह प्रेस क्‍लब में कब आया था, यह सोचने में ही उसे कई मिनट लग गए। बाहर से कोई पत्रकार दोस्‍त आया था शायद, हां शरद, उससे मिलने ही वह इधर आया था। ऐसी भीड़भाड़ वाली और शोरगुल से भरी जगहों पर बैठने में उसे तकलीफ़ होती है। वैसे भी वह शराब का आदी नहीं है और उसे इस सामाजिक किस्‍म के मेलजोल से अपनी ग्रामीण पृष्‍ठभूमि के कारण कुछ अजीब भी लगता है। वह कम ही अवसरों पर यहां आया होगा। और दिन में तो वह पहली बार आ रहा था। वह प्रेस क्‍लब के बाहर पहुंचा तो उसने अनुमान लगाया कि अभी भी प्रीति के हिसाब से वह दस मिनट पहले चला आया है। सनी बाहर ही रुक गया और इंतज़ार करने लगा कि प्रीति मैम आएंगी तो वह उनके साथ ही क्‍लब में जाएगा।

वह एक पेड़ से पीठ टिकाए खड़ा देख रहा था, दिन में क्‍लब में बहुत आवाजाही नहीं होती। सफेद झक्‍क कुरता-पायजामा पहने इक्‍का-दुक्‍का लोग क्‍लब के बाहर-भीतर आते-जाते रहे। उसने सोचा कि ये नेता टाइप लोग ही तो हैं, जिनसे कई पत्रकारों का कारोबार चलता है। सनी के लिए वे सब पत्रकार दल्‍ले थे, जो अपना निजी हित-लाभ देखकर पत्रकारिता के नाम पर चाटुकारिता करते थे। वह जानता था कि लोग उसे बेवकूफ, अहमक़ और असामाजिक तक कहने से नहीं हिचकते थे। लेकिन वह अपनी ही दुनिया में रहता था। अपने भयानक संकट के दौर में भी वह ऐसी जगह काम मांगने नहीं गया, जहां उसे बेईमानी की थोड़ी भी बू आती हो। उसने देखा क्‍लब से साढ़े छह फीट लंबा वो हरियाणवी नेता निकल रहा था, जिसने उसके मालिक को फरीदाबाद में तीन एकड़ ज़मीन सरकारी रेट पर दिलाई थी। मालिक ने ज़मीन पत्रकारिता प्रशिक्षण संस्‍थान खोलने के लिए ली थी, लेकिन असल में उसने वहां फार्म हाउस बना लिया था। वहां पत्रकारिता के अलावा, शादी-ब्‍याह और प्राईवेट पार्टियों तक सब कुछ होता था। उसने मुंह मोड़ लिया। मालिक ने सनी से कहा था कि इस नेता को एक इंटरव्‍यू के माध्‍यम से जनहितैषी नेता के रूप में प्रचारित करना है और सनी ने मना कर दिया था। वह नेता अपनी ऑडी में बैठकर निकला तो सनी ने उसकी तरफ़ देखकर थूक दिया।

उसने अपना मोबाइल ऑन किया तो देखा कि प्रीति मैम के आने का टाइम हो रहा था। उसने झट से मोबाइल वापस स्विच ऑफ कर दिया और इंतज़ार करने लगा। ज्‍़यादा देर नहीं हुई थी कि सलेटी रंग की फोर्ड फिगो कार में उसे प्रीति आती हुई दिखाई दी। दोनों ने एक दूसरे को देखा और इशारे से हलो का आदान-प्रदान हुआ। वह दौड़ता हुआ-सा गाड़ी तक पहुंचा तो दरवाज़ा खोलकर प्रीति बाहर आई।
‘सॉरी सनी, ज़रा देर हो गई। तुम कब से इंतज़ार कर रहे हो?’
‘मैम, मैं तो जस्‍ट पहुंचा ही हूं।‘ उसने झूठ बोला।
‘ये मैम-मैम क्‍या लगा रखा है यार सनी, मेरा नाम बोलने में कोई तकलीफ़ होती है क्‍या?’
‘सॉरी प्रीति जी।‘
‘अब ये जी कहां से आ गया यार कम ऑन। हम दोस्‍त हैं यार।‘
‘जी।‘
‘तो कहां हो आजकल तुम?’
‘कहीं नहीं मैम, बेरोज़गार हूं।‘
‘तभी मैं कहूं कि तुम्‍हारे अखबार का भट्टा क्‍यों बैठता जा रहा है? तुम्‍हारे बिना अब उस अख़बार में कुछ बचा ही नहीं पढ़ने को। तुमने कहीं और कोशिश की काम तलाश करने की?‘
‘नहीं।‘
‘तो माई डियर सनी, इस दिल्‍ली में बिना मांगे कुछ भी नहीं मिलता। समझे कि नहीं?’

वे दोनों बातें करते हुए क्‍लब के भीतर पहुंच गए थे। पहले हॉल में कुछ लोग बैठे थे और दूसरे में भी, लेकिन दूसरा हॉल बड़ा था और यहां एक कोना लगभग खाली था। प्रीति ने वही कोना चुना और अपना बैग रख वहीं बैठ गई। सनी भी उसके सामने बैठ गया। प्रीति ने ही बात शुरु की।
‘यहां हम आसानी से बात कर सकते हैं, अगर तुम्‍हें ठीक नहीं लगे तो हम कहीं और भी चल सकते हैं।‘
‘नहीं, यहीं ठीक है।‘
‘ओके तो पहले ये बताओ कि तुम क्‍या लोगे? मैं तो दिन में व्‍हाइट वाइन ही पसंद करती हूं। तुम बीयर लोगे या कोई और ड्रिंक? जो भी पसंद हो बता दो।‘
‘कुछ नहीं, मैं वैसे भी पीता नहीं।‘
‘नो उल्‍लू बनाविंग सनी, मुझे पता है तुम लेते हो, बताओ। जल्‍दी करो वेटर आने वाला है और हां, मेरी हां में हां मिलाने की कोशिश मत करना बच्‍चू, अपनी पसंद ही बताना।‘
‘ओके मैं बीयर ले लूंगा।‘
इसके तुरंत बाद वेटर आ गया तो प्रीति ने एक ग्‍लास वाइन और एक बीयर का ऑर्डर दे दिया।
‘तो तुम्‍हारे जैसा क़ाबिल पत्रकार भी बेरोज़गार घूम रहा है सनी, सो सैड फॉर इंडियन जर्नलिज्‍़म। और मैं जानती हूं कि कंपनी ने तुम्‍हें नहीं निकाला होगा, तुम ख़ुद ही छोड़कर आए होंगे।‘
‘जी।‘
‘एक लाइन में वजह जान सकती हूं मैं?’
‘मैं पत्रकार हूं, दलाली नहीं कर सकता और ना ही अपने पेशे के साथ धोखा कर सकता हूं।‘
वाइन और बीयर की चुस्कियों के बीच उनका संवाद चलता रहा।
‘देखो सनी, मैं जानती हूं कि तुम जैसा ग़ैरत से भरा पत्रकार समझौते नहीं कर सकता, लेकिन अपनी अर्जित साख से तुम्‍हें काम नहीं मिल सके, यह नहीं मानती। मेरे ख़याल से तुमने अपनी नैतिकता भरी मान्‍यताओं के चलते कहीं कोशिश ही नहीं की होगी। क्‍या मैं ग़लत कह रही हूं?’
‘नहीं।‘
‘मतलब, तुमने कहीं काम की तलाश ही नहीं की। सनी इस दिल्‍ली में कंबख्‍त प्रधानमंत्री भी ख़ुद को बेचकर बनना पड़ता है और तुम हो कि मीडिया में रहकर ख़ुद के हुनर को माक़ूल जगह तक नहीं पहुंचा सके। वैरी बैड।‘
सनी कुछ नहीं बोल सका। वह बहुत धीरे-धीरे बीयर सिप कर रहा था।
‘ऐसे तो तुम यह बीयर शाम के सात बजे तक भी नहीं पी सकोगे। हम लंच पर आए हैं यार डिनर के लिए नहीं। तीन बजने वाले हैं। जल्‍दी करो।‘
और सनी ने बीयर का एक लंबा घूंट भरा।
‘तुमने कब रिज़ाइन किया था?’
‘सात महीने हो गए अब तो।‘
‘सात महीनों से बेरोज़गार आदमी दिल्‍ली में जिंदा कैसे है यार?’
‘कुछ जमापूंजी थी, पहले उससे काम चलाया और फिर...’
‘और फिर चीज़ें बेचकर... ठीक कह रही हूं ना?’
‘जी।‘
‘बुरा ना मानो तो एक बात कहूं?’
‘और अब तुम्‍हारे पास बेचने के लिए कुछ नहीं बचा।‘
‘जी।‘
‘फिर क्‍यों अपना आत्‍मसम्‍मान बेच रहे हो?’
‘नहीं, वो मैंने कभी नहीं बेचा मैम।‘
‘सुनो सनी, तुम जिस तरह मेरे सामने बैठे हो, पिछले सात महीनों में पता नहीं कितने दोस्‍तों के सामने इस पोश्‍चर में बैठे होंगे, लेकिन तुम्‍हारी यह हालत मुझे क़तई पसंद नहीं डियर।‘
सनी की बीयर और प्रीति की वाइन दोनों ख़त्‍म हो चुकी थी। प्रीति ने पूछा, ‘और लोगे?’
वह चुप बैठा रहा। प्रीति ने वेटर को देखकर कहा ‘रिपीट प्‍लीज।‘

फिर से बीयर और वाइन आई, दोनों पीते रहे। इस बीच प्रीति ने खाने का ऑर्डर दे दिया। खाने के साथ ड्रिंक्‍स चलते रहे। उन दोनों के बीच पत्रकारिता और नैतिकता के संकटों के बीच लगातार चर्चा चलती रही। सनी कहता रहा कि मैं इस तरह मालिकों के आदेश पर घुटनों के बल नहीं चल सकता और प्रीति उसे समझाती रही कि मत चलो, लेकिन अपनी राह के पथिकों से तो मेलजोल रखो। सनी ने कहा कि ‘घुटरुन चलत’ कविता में ही ठीक लगता है पत्रकारिता में नहीं तो प्रीति ने कहा, घुटनों के बल वो चलते हैं जिनके पांवों में दम नहीं होता, तुम्‍हारे पांवों में अभी बहुत दम है यार, उठो और चलो। यह देश अभी इतना ख़राब नहीं हुआ कि तुम्‍हारे जैसे पत्रकार के घुटने एक मीडिया हाउस के सामने छिल जाएं।

खाने-पीने में ही उन दोनों को करीब 4 बज गए थे। प्रीति ने पूछा कि अब कहां जाने का इरादा है? सनी ने बताया कि आज उसका कहीं जाने का कोई इरादा नहीं। मकान मालिक के डर से उसने फोन भी बंद कर रखा है। प्रीति ने उसे कहा तो फिर चलो आज मेरे घर। और वे दोनों प्रीति की कार में बैठ चल पड़े। एक साथ दो बीयर पीने के कारण सनी को कार में बैठने के बाद नींद आ गई तो वह सो गया। प्रीति कार चलाकर उसे अपने घर तक ले गई।

‘उठो महान पत्रकार महोदय।‘
वह हड़बड़ाकर उठा और प्रीति के इशारे पर उसके पीछे-पीछे उसके फ्लैट में दाखि़ल हो गया। एक कमरे का यह छोटा-सा फ्लैट था, जिसमें बाहर दो सोफे लगे थे, जिन पर अख़बार और मैग्‍जींस का ढेर फैला पड़ा था। सनी ने अपने लिए जगह बनाई और वहीं ढेर हो गया।

बहुत देर बाद उसकी आंखें खुलीं तो देखा कि वह किसी नई जगह पर है। दीवार पर लगी एक तस्‍वीर से याद आया कि वह प्रीति के साथ उसके घर चला आया है। प्रीति शायद अंदर कमरे में सो रही थी। सामने दीवार पर लगी घड़ी बता रही थी कि रात के साढ़े नौ बजने वाले हैं। वह उठा और सामने का एक छोटा दरवाज़ा खोला, ग़नीमत थी कि यही बाथरूम था, वरना प्रीति के कमरे में जाना होता। शायद इस बाथरूम का इस्‍तेमाल कम होता है। उसने भीतर की व्‍यवस्‍थाओं को देखते हुए सोचा। वापस आकर वह सोफे पर पसर गया। टीवी का रिमोट लेकर वह चैनल बदलने में लग गया। आवाज़ से प्रीति की नींद ना खुल जाए कहीं, इसलिए म्‍यूट कर दिया।

पूरे घर में लगभग अंधेरा छाया था। बस खिड़कियों से आता बाहरी प्रकाश था जो घर को रोशन करता था या था टीवी का उजाला। चैनल पर चैनल बदलते हुए ख़याल आया कि क्‍यों न प्रीति वाला चैनल देखा जाए, जिसमें वह काम करती है। वहां अभी प्राइम टाइम न्‍यूज़ चल रही थी। उसे ख़बरों में कोई दिलचस्‍पी नहीं थी, इसलिए ऐसे ही मन बहलाने के लिए फै़शन टीवी लगा लिया। कैटवाक करती सुंदरियां और उनके अजीबो-ग़रीब परिधान देख उसे कोफ्त होने लगी तो उसने टीवी ही बंद कर दिया। अब पूरे घर में फिर से अंधेरा छा गया, रोशनी के कुछ धब्‍बे बाहर खिड़की से आ रहे थे। वह आंखें बंद कर मौन हो गया। कितने दिन से वह नए जॉब के बारे में सोचता चला आ रहा था, लेकिन कोई राह नहीं सूझ रही थी। फ्रीलांसिंग करना उसके बूते की बात नहीं थी, बस लेख लिख सकता था, लेकिन उसे यह भी पसंद नहीं था कि संपादकों की चिरौरी कर वह अपने लेख छपवाता फिरे। हां, बीच में एक दोस्‍त ने उसे अनुवाद का काम दिलाया था, लेकिन अनुवाद से इतने पैसे नहीं मिलते कि ठीक से गुज़ारा हो सके। वह कई बार सोचता कि दिल्‍ली छोड़कर किसी छोटे शहर में चला जाए, लेकिन वहां के पत्रकार बताते कि दिल्‍ली के मुक़ाबले वहां सैलरी एक तिहाई भी नहीं है। कहां पचास हजार और कहां पंद्रह हजार। इतना तो वह अपने फ्लैट का किराया देता है।

कमरे में रोशनी हुई तो छोटा-सा ड्राइंग रूम भी रोशन हो उठा। प्रीति ने आवाज़ लगाई, ‘सो रहे हो क्‍या सनी?‘
‘नहीं मैम।‘
‘फिर वही मैम। बंद करो इस तरह पुकारना यार।‘
प्रीति बाहर आई और लाइट जला दी तो पूरा कमरा उजाले से खिल गया। सनी ने देखा गहरे कत्‍थई-बैंगनी गाउन में प्रीति का गोरा रंग और दमक रहा था। उसने पहली बार प्रीति को इस रूप में देखा तो वह बेवजह ही मुस्‍कुरा उठा।
‘क्‍या हुआ?’ प्रीति ने पूछा तो वह सकुचाते हुए बोला।
‘बहुत अच्‍छी लग रही हो दोस्‍त।‘
‘ओह थैंक्‍यू। अच्‍छा बताओ खाना लगा दूं?‘
‘फिर से खाना, अभी तो खाया था?’
‘अभी? जनाब वो लंच था तीन बजे और अब बज रहे हैं दस।‘
‘तो अब खाना बनाओगी?’
‘नहीं, मैं रास्‍ते से पैक करवा कर लाई थी दाल-सब्‍जी। अब सिर्फ़ चावल उबालने हैं, अगर तुम्‍हें रोटी खानी है तो रोटी बना दूंगी।‘
‘नहीं चावल ले लूंगा।‘
‘ठीक है, अब उठो और हाथ मुंह धो लो या नहाना चाहो तो नहा लो। लग रहा है तुम अपने घर से निकलने के बाद नहाए ही नहीं। अब उठो और चलो अंदर वाले बाथरूम में,  सब कुछ है।‘
‘लेकिन मैं कपड़े तो लाया नहीं।‘
‘कोई बात नहीं, नहाकर तुम ये ही कपड़े पहन लेना।‘ प्रीति की बात को आदेश की तरह मानते हुए वह चुपचाप उठा और भीतर चला गया। यह कमरा ख़ासा बड़ा था। यहां एक सिंगल बेड, अलमारी और मेज कुर्सी के अलावा एक बड़ी-सी ड्रेसिंग टेबल भी थी। उसने बाथरूम के बाहर रखी चप्‍पलें पहनीं और अंदर दाखि़ल हो गया। बाथरूम भी बड़ा था। इतनी बड़ी तो उसकी किचन है। एक कोने में वाशिंग मशीन रखी थी। सनी ने शर्ट उतारी तो याद आया कि तौलिया कहां होगा। वाशिंग मंशीन के ऊपर एक छोटा कपबोर्ड था, उसे खोलने पर उसमें तह किए कई तौलिए थे। सनी ने एक तौलिया निकाल लिया।

नहाकर जब वह बाहर आया तो प्रीति ने किचन से आवाज़ दी, ‘सनी कमरे की अलमारी से मेरी शर्ट ले लो।‘ अलमारी कपड़ों से भरी हुई थी। उसने हैंगर में टंगी खादी की एक एक पीली शर्ट निकाल कर पहन ली। बहुत ढीली लग रही थी, लेकिन उसने पहन ही ली। वह बालों में कंघी कर बाहर आया तो प्रीति ने उसे देखकर कहा, ‘वाह सनी, अब लग रहे हो तुम एक प्रखर पत्रकार। ये शर्ट तुम पर अच्‍छी लग रही है।‘ वह झेंप गया। प्रीति ने मुस्‍कुराकर कहा, ‘पीने में क्‍या लोगे? मेरे पास वोदका और वाइन है।‘
फिर से शराब के ख़याल से ही उसे तकलीफ़ होने लगी और वह जवाब देने से पहले सोचने लगा। प्रीति ने ही कहा, ‘अगर मन नहीं है तो छोड़ो, लेकिन मैं तो थोड़ी वाइन लूंगी।‘ उसने कहा, ‘ठीक है, मैं वोदका ले लूंगा।‘
‘तो उठो और फ्रिज में से निकाल कर दोनों के लिए बनाओ। ठण्‍डा पानी और बर्फ भी ले लेना।‘

वह उठा और फ्रिज में से वाइन और वोदका की बोतलें निकाल लीं। प्रीति ने उसे दो गिलास थमा दिए। वह सोफे पर बैठ सेंटर टेबल पर पैग बनाने लगा। नहाने के बाद उसके जिस्‍म में स्‍फूर्ति आ गई थी। उसे लगा प्रीति ने नहाने के लिए कहकर अच्‍छा ही किया, वरना वह बीयर के नशे में ही झूलता रहता। इधर पैग तैयार हुए और उधर तौलिए से हाथ पोंछ प्रीति किचन से आ गई। सनी ने सोफे पर उसके लिए जगह बनाई तो प्रीति ने अपना पैग उठाते हुए कहा, ‘खड़े हो यार, जाम तो टकरा लो।‘ दोनों ने टोस्‍ट किया और प्रीति ने उसे गले लगा लिया, ‘मेरे प्‍यारे दोस्‍त सनी के नाम आज की शाम,  चीयर्स।‘ सनी ने भी मुस्‍कुराते हुए चीयर्स कहा और पता नहीं किस बेख़याली में प्रीति की गर्दन पर हल्‍के-से चूम लिया। प्रीति ने उसे जिन निगाहों से देखा तो वो सकपका गया और बोल पड़ा ’सॉरी।‘
‘अब ये सॉरी किसलिए... किस के लिए?’
सनी ने स्‍वीकार में सिर हिलाया तो प्रीति ने कहा, ‘यार मैंने तुम्‍हें गले लगाया और तुमने मुझे किस किया, हिसाब बराबर।‘ दोनों बैठ गए तो प्रीति ने उसके कंधों पर हाथ डाल दिया और उसे थपथपाते हुए कहने लगी, ‘अब तुम बेफि़क्र हो जाओ और यूं गुमसुम-चुप-चुप रहना छोड़ दो।‘
‘मैं कहां गुमसुम हूं प्रीति? तुम जैसी दोस्‍त पाकर कौन ख़ुश नहीं होगा?’
‘दैट साउण्‍ड्स वैरी गुड। मैं तुम्‍हारी और तुम्‍हारे हुनर की बहुत इज्‍ज़त करती हूं दोस्‍त।‘
‘सो नाइस ऑफ यू।‘
‘अरे मैं स्‍नैक्‍स तो लाना ही भूल गई।‘
प्रीति उठकर किचन में गई और एक प्‍लेट में नमकीन लेकर आ गई। उनकी बातों का सिलसिला चल पड़ा और एक के बाद एक पैग ख़त्‍म होते गए। तीसरे पैग के बाद प्रीति ने कहा, ‘अब मैं खाना लगाती हूं, तुम्‍हें और पीनी हो तो ले लो।‘   वह उठकर गई तो सनी ने एक छोटा पैग और बना लिया। जितनी देर में प्रीति खाना लेकर आई, वह अपना पैग ले चुका था। उठकर सामने वाले बाथरूम में गया और हल्‍का होकर आ गया। खाने के दौरान ही उसने प्रीति से उसके परिवार आदि के बारे में पूछा। प्रीति के पिता इंजीनियर हैं और मां स्‍कूल टीचर। वे चंडीगढ़ रहते हैं। प्रीति जब आईआईएमसी करने दिल्‍ली आई थी, तभी उसके पिता ने यह फ्लैट खरीद लिया था। एक भाई है जो कैनेडा में रहता है। खाना ख़त्‍म होने के बाद प्रीति ने कहा, ‘सनी तुम अंदर बैड पर सो जाओ, मैं यहां सोफे पर सो जाउंगी।‘
‘नहीं, सोफे पर मैं सो जाउंगा, तुम ही सोओ अंदर।‘
‘अरे यार तुम मेरे मेहमान हो, मेरी तो इस घर में कहीं भी सोने की आदत पड़ चुकी है।‘
‘तो क्‍या हुआ, मुझे तो बरसों से आदत है यार।‘ उसे लगा वह बहकने लगा है अब।
प्रीति किचन से ही बोली, ‘अगर चाहो तो हम एक ही बिस्‍तर पर सो सकते हैं हम। ना तुम तकलीफ़ पाओ और ना मैं। चलेगा?‘
‘ओके, मुझे कोई आपत्ति नहीं है।‘
‘हां, आपत्ति तो मुझे होनी चाहिए, आखि़र घर मेरा है।‘
‘ओके फिर मैं बाहर ही सो जाता हूं।‘
‘अरे नहीं यार, मजाक को भी समझा करो ना। तुम अंदर जाकर सोओ मैं किचन का काम निपटाकर आती हूं।‘
वह बहुत ना-नुकर करता रहा, लेकिन प्रीति के आग्रह पर उठा और कमरे में जाकर लेट गया। बीयर के बाद वोदका का नशा उस पर तारी हो रहा था। वह पहले ही सो चुका था, इसलिए अब नींद कहां आने वाली थी। फिर भी आंखें बंद कर सोने का उपक्रम करने लगा, यह सोचकर कि नशे से नींद आ जाएगी। वह प्रीति के बगल में सोने की कल्‍पना से ही उत्‍तेजना महसूस कर रहा था। उसे लगा कि कहीं वह कुछ कर ना बैठे। नशा कुछ भी करवा सकता है। उसने अपने आपको नियति के हवाले कर दिया। आखि़र वह जानबूझकर तो कुछ करेगा नहीं। किस मोड़ पर ले आई है उसे जि़ंदगी।

उसे याद आया कि जीवन में पहली बार उसने एक साल पहले अपनी बैचमेट जूही के साथ सेक्‍स किया था, जब वह कानपुर से आकर उसके यहां रुकी थी। उस दिन तो उसने शराब भी नहीं पी थी। और कमाल यह कि उस दिन भी पहल उसकी नहीं थी, जूही ने ही उसके साथ सोने की जि़द की थी, जबकि वह उसे दूसरे कमरे में सोने के लिए कह रहा था। जूही ने ही उसे यौनिक नैतिकताओं पर लंबा प्रवचन दिया था। उसके बाद उसने यौन विषयक कई किताबें पढ़ीं तो उसे महसूस हुआ कि यह सब उसकी गंवई मानसिकता की नैतिकता थी, जबकि पूरी दुनिया सेक्‍स को बहुत सामान्‍य भाव से लेती है। यह एक शारीरिक ज़रूरत से अधिक कुछ नहीं।

उसे किचन का दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ आई तो वह विचारों के संजाल से बाहर निकला। प्रीति ने आते ही कहा, ‘अरे तुम यूं गर्मी में सो रहे हो। एसी तो ऑन कर लेते।‘
‘मैं ऐसे ही ठीक हूं।‘
‘अरे क्‍या ख़ाक ठीक हो? मैं इतनी गर्मी में नहीं सो सकती यार।‘
प्रीति ने एसी ऑन किया और बाथरूम में चली गई। थोड़ी देर में वह आई और उसके बगल में लेट गई।
‘तुम्‍हें नींद नहीं आ रही ना सनी?’
‘हां।‘
‘ऐसा ही होता है।‘
‘मतलब?’
‘मतलब यह कि इंसान जब एक्‍साइटेड होता है तो नींद उड़ जाती है... हाहाहा।‘
प्रीति के ठहाकों से वह चौंक गया। उसने कोई सवाल-जवाब करने में रूचि नहीं दिखाई।
‘क्‍या मैं ग़लत कह रही हूं सनी?’
‘नहीं।‘
‘तो फिर यूं मुंह फेर कर क्‍यों पड़े हो बच्‍चू?’
प्रीति हंस रही थी और वह आंखें बंद किए लेटा रहा।
‘ओके चलो सो जाओ, गुड नाइट।‘
‘गुड नाइट।‘

पता नहीं रात का वह कौनसा वक्‍़त था जब उसका हाथ नींद में प्रीति की छातियों पर चला गया? कब प्रीति ने उसे बांहों में लिया और कब वह उसके भरे-भरे स्‍तनों को चूमता चला गया? कब प्रीति ने उसके इस मोहक अंदाज़ पर रीझकर उसे ओरल प्‍लेज़र के लिए कहा और वह उसमें डूबता चला गया? अपनी जींस में घुटने मोड़े कुहनियां टिकाए सनी ने रात से लेकर सुबह तक अलग-अलग पारी में पांच बार प्रीति को असीम सुख से भर दिया था। उसने जींस इसलिए नहीं उतारी कि कहीं वह ख़ुद और ना बहक जाए? लेकिन आखि़री बार मज़बूरी में उसने जींस उतार दी, लेकिन अपनी हद में ही रहा।

लेकिन जींस की वजह से ही उसके घुटने छिल गए हैं और खादी की मोटी शर्ट के कारण कुहनियां। वह बाथरूम से निकला और बाहर ड्राइंग रूम में आ गया। सोफे पर अख़बार फैले हुए थे। उसने अख़बारों को करीने से लपेटा और सेंटर टेबल पर रखने के बाद सामने वाशबेसिन पर देखा कि पेस्‍ट रखा है। उसने अंगुली से पेस्‍ट किया और सोफे पर बैठ नाश्‍ता करने लगा। परांठे अभी गर्म ही थे, और सब्‍जी भी उसे कोई ठण्‍डी नहीं लगी। नाश्‍ता लेकर उसने अपना मोबाइल ऑन किया। सबसे पहले मकान मालिक को फोन किया और उससे उसका बैंक और खाता नंबर पूछकर कहा कि आधा घण्‍टे बाद पूरा किराया वह खाते में जमा कर देगा। प्रीति के घर से निकल कर वह सबसे पहले नज़दीकी एटीएम तलाश किया तो देखा कि एटीएम के पास ही वह बैंक है, जिसमें उसे मकान मालिक का किराया जमा करना है। उसने एटीएम से तीन बार में पूरे पचास हजार निकाले और किराया बैंक में जमा करा दिया।

एक दुकान पर मोबाइल रिर्चाज कराया और फिर से प्रीति के घर आया और बाथरूम में नहाने चला गया। वहीं उसने अपनी बनियान और शर्ट धो डाली और सूखने के लिए बाहर बालकनी में डाल दी। प्रीति को फोन लगाया।
‘हलो प्रीति। मैंने पैसे निकाल लिए हैं।‘
‘हां पता लग गया, बैंक का एसएमएस आ गया है। और पैसों की ज़रूरत हो तो अलमारी में दस हज़ार के करीब रखे हैं, ले लेना।‘
‘नहीं, और ज़रूरत नहीं है।‘
‘तुम्‍हारी तबियत कैसी है?’
‘बदन टूट रहा है और...’
‘और क्‍या...’
‘घुटने और कुहनियों में पेन है।‘
‘हाहाहा...’
बड़ी देर तक प्रीति की हंसी गूंजती रही और वो ख़ुद भी हंसने लगा।‘
‘सुनो सनी, मेरे कमरे में ड्रेसिंग टेबल की ड्राअर में कई हर्बल क्रीम हैं, उनकी मालिश कर लेना। शाम तक ठीक हो जाआगे।‘
‘ओके।‘
‘और सुनो, तुम्‍हारे लिए गुड न्‍यूज़ है।‘
‘क्‍या?’
‘हां, मैंने क्रॉनिकल वालों से बात कर ली है। वे तुम्‍हें जानते हैं और तुम्‍हारे काम के प्रशंसक भी हैं। तुम्‍हें वे साठ हज़ार दे सकते हैं। अंग्रेज़ी के साथ वे जल्‍द ही हिंदी में भी अख़बार शुरु करने जा रहे हैं। तुम्‍हें फुल फ्लैज्‍ड संपादक बनाने की बात हुई है। बोलो मंज़ूर है कि नहीं?’
‘लेकिन मुझे सोचने तो दो।‘
‘इसमें सोचने की बात क्‍या है यार...क्रॉनिकल एक ट्रस्‍ट का अखबार है। वे सरकार या नेताओं की परवाह नहीं करते। वहां पत्रकारों को पूरी आज़ादी है अपने काम की। अब बताओ तुम्‍हें और क्‍या चाहिए?’
‘कुछ नहीं।‘
‘तो बताओ मंजूर है कि नहीं... ?’
‘नेक़ी और पूछ-पूछ।‘
‘ओके तो आज की पार्टी तुम्‍हारी तरफ़ से होगी। जाकर बाहर से शैंपेन ले आओ।‘
‘लेकिन पैसे?’
‘अरे पांच हज़ार हैं ना तुम्‍हारे पास?’
‘हां, लेकिन वो तो तुम्‍हारे ही हैं।‘
‘अब ये हमारे-तुम्‍हारे मत करो। आज पार्टी करनी है। कल सुबह तुम्‍हें क्रॉनिकल वालों के यहां मैं ले चलूंगी, आज उनके चीफ ट्रस्‍टी बाहर हैं, कल उनके सामने कांट्रेक्‍ट साइन हो जाएगा। ओके?’
‘सो नाइस ऑफ यू प्रीति।‘
‘सुनो बाहर जाओ तो अपने लिए कुछ ढंग के कपड़े ले आना। इन्‍हीं कपड़ों में थोड़े ही चलोगे वहां?’
‘ओके, ले लूंगा। लेकिन...‘
‘लेकिन क्‍या?’
‘आज मैं घर जाने की सोच रहा था रात में।‘
‘नहीं, आज की पार्टी मेरे घर ही होगी। घर जाकर कहीं तुम्‍हारा मूड बदल जाए तो?’
‘नहीं, वो बात नहीं है।‘
प्रीति ने फुसफुसाते हुए धीरे से कहा, ‘अब सुन लो आज तुम्‍हारे घुटने और कोहनियां नहीं छिलेंगे। तुम आराम से बाहर सोफे पर सो जाना।‘
‘हाहाहा...’
दोनों और देर तक ठहाके गूंजते रहे।
प्रीति से बात ख़त्‍म होने पर वह उसके बताए अनुसार बाहर गया। अपने लिए कपड़े खरीदे। एक सैलून में जाकर दाढ़ी को ट्रिम करवाया। वापस आकर उसने ड्रेसिंग में से एक आयुर्वेदिक क्रीम ली और अपने घुटनों और कोहनियों पर लगाई तो उसे राहत महसूस हुई। वह कमरे में बैड पर ही लेट गया और कल से आज तक की घटनाओं पर फिर से सोचने लगा। अपने आप पर उसे तरस आने लगा। सनी को लगा कि क्रॉनिकल की नौकरी उसे एक स्‍थायी रोज़गार दे सकेगी और उसके बुरे दिन ख़त्‍म हो जाएंगे। लेकिन अब उसके सामने एक नया नैतिक संकट खड़ा हो गया। वह सोचने लगा कि प्रीति अपने चैनल की छवि के कारण क्रॉनिकल वालों को उसके बारे में आश्‍वस्‍त कर पाई होगी। लेकिन सनी के लिए प्रीति अचानक एक बड़े चैनल की प्रभावशाली स्‍टार पत्रकार हो गई, जिसके सामने उसे न केवल अपने ख़राब हालात का दुखड़ा रोना पड़ा, बल्कि उसके सामने उसने अपने घुटने और कोहनियां भी छिलवा लीं। उसे अपने आप से नफ़रत हुई। लेकिन दूसरे ही क्षण डोरबेल बजी और वह उठकर दरवाज़ा खोलने गया तो देखा प्रीति आ गई थी। उसके खिलखिलाते चेहरे को देखकर उसके विचारों में उथल-पुथल होने लगी। उसकी अन्‍यमनस्‍कता देखकर प्रीति ने कहा, ‘तो जनाब चिंतन कर रहे हैं... अरे यार मैं दोस्‍त हूं तुम्‍हारी। ज्‍़यादा नैतिकता के चक्‍कर में पड़ोगे तो कहीं भी नौकरी नहीं कर पाओगे, समझे।‘
कहकर प्रीति सीधे अपने कमरे में गई और बाथरूम का दरवाज़ा बंद कर लिया। सनी का मोबाइल बजा। मकान मालिक की आवाज़ थी, ‘क्‍या नई नौकरी मिल गई है, जो सारा किराया एक साथ चुका दिया?’
‘जी हां।‘
‘ओके गुडलक।‘

सनी ने देखा कि उसके मोबाइल पर एक मैसेज आया हुआ है प्रीति का। उसने मैसेज बॉक्‍स खोलकर देखा अंग्रेजी में लिखा था, जिसका हिंदी अनुवाद उसने कुछ इस प्रकार किया।
‘यौन संबंधों में नैतिकता का मतलब शादी के बाद अपने साथी के प्रति समर्पण से जुड़ा है। और विवाहेतर संबंध भी कोई अनैतिक नहीं होते, क्‍योंकि नैतिकता दो किस्‍मों की होती है। एक होती है व्‍यक्तिगत और दूसरी सामाजिक। व्‍यक्तिगत नैतिकता से मनुष्‍य जीवन चलता है और सामाजिक नैतिकता से समाज। हम सामाजिक नैतिकता से व्‍यक्तिगत जीवन नहीं चला सकते और न ही व्‍यक्तिगत नैतिकता से समाज। इसलिए ज्‍़यादा मत सोचो दोस्‍त। मेरे आने तक कहीं मत जाना। क्‍योंकि कहीं तुम्‍हारा मन बदल गया तो... और... हां, मैं एक अच्‍छे दोस्‍त को फिर से मुसीबतों में घिरा हुआ नहीं देखना चाहती।‘

:: प्रेमचंद गांधी,
220, रामा हैरिटेज, सेंट्रल स्‍पाइन विद्याधर नगर, जयपुर-302 023 मो.09829190626

ईमेल prempoet@gmail.com




प्रतिक्रियाएँ

[07/03 07:13] राजेश झरपुरे जी: यौन संबंधों में नैतिकता का मतलब शादी के बाद अपने साथी के प्रति समर्पण से जुड़ा है। और विवाहेतर संबंध भी कोई अनैतिक नहीं होते, क्‍योंकि नैतिकता दो किस्‍मों की होती है। एक होती है व्‍यक्तिगत और दूसरी सामाजिक। व्‍यक्तिगत नैतिकता से मनुष्‍य जीवन चलता है और सामाजिक नैतिकता से समाज। हम सामाजिक नैतिकता से व्‍यक्तिगत जीवन नहीं चला सकते और न ही व्‍यक्तिगत नैतिकता से समाज,,,,

प्रेमचन्द गाँधी  की कहानी "गिल्‍टी मिथ " हमें एक ऐसे दोराहे पर लाकर खड़ा कर देती है कि हम अवाक रह  जाते है । क्या सही और क्या नैतिक,,, और निर्णय लेना मुश्किल?

कहानी  में  हमारे समय और समाज की साफ़ साफ़ छवि झलकती है । डायरी शैली में  लिखी इस कहानी  में जीवन और जगत अपनी सम्पूर्णता के साथ मौजूद है। जर्नलिज्म आज एक बड़े  उद्योग में  परिवर्तित हो चुका है। उद्योग में  पत्रकार,  संपादक व लेखक को अपनी रोजगारी को बनाये रखने के लिए न केवल सूचना  को बढिया उत्पाद  बनाना पड़ता  है बल्कि विक्रय की ऊंची कीमत से भी नियोक्ता को आश्वस्त कराना होता है । उसे सामाजिक मान्यताओं और धारणाओ को तोड़ते हुए अपनी प्रगति और समृद्धि  के लिए नैतिकता  के कुछ अलग मापदंड  भी तय करना होता है,,, जिसे प्रीति के दृष्टिकोण  से यहाँ देखा जा सकता है । समाज जैसा होगा; साहित्य  में वह उसी तरह परिलक्षित होगा । इसके लिए साहित्य या लेखक को तो जवाबदार नहीं  ठहराया जा सकता ।
अच्छी कहानी ।
लेखक को बधाई ।
[07/03 13:27] ‪+91 97799 02911‬: प्रेमचंद गांधी हमारे समय के महत्वपूर्ण कहानीकार हैं। इस उत्तर आधुनिक समय में जब चीजे एकबारगी से अपना मूल स्वभाव खो रही हों और इंसान अपने वजूद का सम्भवतः अनंतिम युद्ध लड़ रहा हो, यह कहानी इस समय के सच को इतनी शिद्दत और खूबसूरती से रखती है जो अतिशय श्लाघनीय है। ईमानदार होना इस समय की सबसे बड़ी मूर्खता है और नैतिक होना प्रागैतिहासिक। ईमानदारी और साफगोई से दो वक्त की रोटी और एक डिसेंट जीवनस्तर की परिकल्पना बिल्कुल  अशम्भाव्य है। नायक बंधी बंधाई लीक पर नही चलना चाहता, अपनी गैरत को बेगैरत नही करना चाहता, नतीजन सर पर छत को भी मुहताज है। इस पूरे मीडिया और उसके चरित्र पर गहरा तंज है यह कहानी। हालांकि मीडिया का असली चेहरा आ गया है खुला खेल फरुखाबादी की तरह। कहानी में एक रवानगी है और एक ही सीटिंग में पढ़ा ले जाती है। लेकिन इतने बख़ुद्दार सनी का प्रीती के सामने पूरा सरेंडर इस कहानी की दुखती नब्ज है, जो सहज नही है। प्रीती एकबारगी इतना मेहरबान क्यूकर है, यह भी तार्किक नही लगता। अस्तु एक विचारोतेजक और समसामयिक उम्दा कहानी के लिये बधाईया।
[07/03 14:15] Manoj Jain Madhur: मंच की प्रस्तुति तो अद्भुत होती ही है
आज प्रेमचन्द गांधी के नज़रिये से समाज में घट रही घटनाओं को साहित्य के दर्पण में देखा
मूल्यों के पतन की अच्छी कहानी
[07/03 14:28] Pravesh: दीपक जी स्वागत
🙏
धन्यवाद आपने कहानी की तात्विक समीक्षा की ।नैतिकता के स्तर पर कुछ सवाल तो छोड़ती है यह कहानी ।
प्रीति का सहज सरेंडर किस प्रकार की  नैतिकता का दर्शन है ।निजी नैतिकता को  पकड़ते है तो सामाजिक मूल्य का पतन होता है ।सामाजिक नैतिकता का चोला निजी नैतिकता का हनन करता है ।
कहाँ ,और किस राह के मुसाफिर है फिर ?

विद्जनों की चर्चा अपेक्षित है
🙏
[07/03 15:36] Rachana Groaver: कहानी में नैतिकता है ही नही
आधुनिकीकरण और पाशच त्यिकरण दर्शाती कहानी
[07/03 17:08] Archana Mishra: व्यक्तिगत नैतिकता और सामाजिक नैतिकता की बात एक ही बात के दो छोर के जैसी है जब जो मन करे वो छोर पकड़ लो।यह बात समझ से परे है ।इसमें नैतिकता कहाँ है???

 हाँ लेखक ने मीडिया का एक दूसरा घिनौना चेहरा दिखाया है पर यहाँ भी एक प्रश्न है कि उसी मीडिया से प्रीति भी है तो वो तन के साथ  धन भी सनी पर क्यों निछावर कर रही है कुछ स्पष्ट कारण नहीं दिखता।
आधुनिकता के नाम पर हमारा साहित्य और समाज हमे कहाँ ले जाना चाहते हैं उन ऊंचाइयों का अंदाज़ा नहीं।
आभार राजेश जी।
[07/03 17:20] Pravesh: अर्चना  जी धन्यवाद ,
आपने अपने विचार रखे ।
सवाल भी सही है ,तन और धन निछावर करने का क्या  सही कारण है ।एक साधारण मित्र जिससे एक वर्ष तक कोई संपर्क नही ,एक रात में  इतना अपनापन की क्रेडिट कार्ड के पिन भी शेयर कर दिए गए ।

लेखन में आये बदलाव  से क्या नैतिक मूल्यों का ह्रास  हो रहा है ? इसे आप किस रूप में लेंगी ।
[07/03 17:28] ‪+91 98974 10300‬: माफी के साथ कह ही डालूँ-
तन निछावर कहाँ हुआ?

स्वाभिमानी पत्रकार महोदय क्रीत दास की भूमिका में हैं।
[07/03 17:32] Mukesh Kumar Sinha: सच कहूँ तो आज की कॉमर्शियल मूवी  के  तरह प्रेम सर की कहानी में सब कुछ था , हाँ ये सच है शब्दों के जादूगर ने जो भी डाला है, वो ठूंसा हुआ  नहीं लग रहा, पर एक कहानी  को  हिट करने  के उद्देश्य से सेक्स का छौंक कुछ ज्यादा दे दिया गया .........वर्ना एक बेहतरीन कहानी ही कहूँगा मैं !!
[07/03 17:39] Aasha Pande Manch: ये कहानी हमें कहां ले जाती है?क्या प्रीति की स्वछंदता उचित है?ऊपर से उसके तर्क भी!!ये तो अपने किये को उचित ठहराने की दिमागी चाल है.वैसे भाषा रोचक है .
[07/03 17:40] Pravesh: ललिता जी क्रीत दास

यह भी एक दृष्टि है
🙏
[07/03 18:10] Manoj Jain Madhur: कहानी के अंत में कहानीकार ने जो सन्देश छोड़ा है उसे नैतिकता का नाम कभी नहीं दिया जा सकता और न ही नैतिकता का परिभाषा बदली जा सकती है ।
[07/03 18:12] Rachana Groaver: इस कहानी में आरम्भ ज़मीर से जुड़ा है।
फिर उसके बाद प्रीति से मिलना
फिर उसके घर रहना
प्रत्येक वस्तु का इस्तेमाल करना।
फिर प्रीति द्वारा नौकरी दिलवाना
फिर नैतिकता से मुक्त करना।
अब साफ़ है
आरम्भ और अंत नैतिकता के दो छोर हैं।
[07/03 18:31] Saksena Madhu: कहानी में मिडिया के बाज़ारवाद को उजागर किया ..जैसा कि tcm 1960 जी ने कहा ..कहानी दरअसल  विडम्बनाओं को रेखांकित करने की कला है ।यही बात इस कहानी पर लागू होती है ।सनी और प्रीति का मिलना और प्रीति का सनी की परेशानी को तुरन्त समझ जाना पुरानी दोस्ती को दर्शाती है ।कई बार हम जिसका सम्मान करते है वो खुश है जानकर निश्चित रहते है ...वो मुश्किल में है ये जानते ही उसकी पूरी मदद करने दौड़ पड़ते है ।यही प्रीति के साथ हुआ ।मन के कोमल तन्तु कहीं न कहीं से जुड़े थे ...जो उभर कर आ गए और जहाँ तक नैतिकता की बात .....लेखक ने प्रीति के लिखे पर्चे से स्पष्ट कर दी ।
 कहानी काल्पनिक तो बिलकुल नहीं लगती ....सच कहानी का मूल है ।आवश्यकता प्रीति और सनी दोनो की थी ....सनी का कई महीनो से बेरोजगार रहना और मकानमालिक से बच ना पाना उसके स्वाभिमान को आहत करने के लिए काफी था उसी मज़बूरी ने प्रिति से मदद लेना स्वीकार किया ।प्रीति के व्यवहार में यदि अहसान होता तो सनी मदद नहीं लेता ।प्रीति का दोस्ताना व्यवहार की अवहेलना नहीं कर पाया सनी ...
स्त्री पुरुष के सम्बन्धो की बात है तो वर्जनाएं टूट रही हैं . ... आत्मनिर्भरता ने अपने तरीके से निर्णय लेने की क्षमता प्रदान की है  । योग्यता को मापने के तरीके बदल गए हैं ।
 कुल मिलाकर प्रेमचन्द जी ने मिडिया के खोल के अंदर की सच्चाई ब्यान की और स्वाभिमान को सराहा ।दुनिया में अच्छे और बुरे दौनों तरह के लोग है ।कहानी ने वही दिखाया जो सच है तो कही कही कड़वा हो गया ... ....कही कही कहानी थोड़ी कमज़ोर हो जाती है पर फिर सम्हल जाती है । अच्छी कहानी के लिए लेखक को बधाई ।....
[07/03 18:38] Pravesh: मधु वर्जनायें टूट रही है ,क्यों ?
स्त्री ,पुरुष के सम्बन्धो को विवाह पूर्व और विवाहत्तर किस तरह की नैतिकता का आधार माना जाय ।यदि  सन्नी और प्रीटी के बीच दोस्ताना अहसास थे तो  दैहिक जुड़ाव का क्या औचित्य है ।
कोरी आधुनिकता का प्रदर्शन मात्र या कुछ और ।
[07/03 18:40] Kavita Varma: जमीर की बात करने वाला पुरुष एक रात के लिये प्रीति को खुश करने की कीमत के रूप में पचास हजार रुपये और नौकरी ले रहा है और फिर भी इसे अनैतिक नहीं मान रहा बल्कि व्यक्तिगत और सामाजिक नैतिकता के वर्गीकरण से संतुष्ट हो रहा है । तो क्या उसके उच्च आदर्शों की बात उसके नौकरी ना मिलने से होने वाली परेशानी की बात इस सेक्स को जायज ठहराने के लिये की गई थी ।
[07/03 19:34] Kavita Varma: प्रीति की नैतिकता भी देखिये उसकी शुचिता बरकरार है क्योंकि सेक्स ओरल हुआ । क्या कहा जा रहा है क्या कहने की कोशिश है आज के आधुनिक समय में नैतिकता और उससे परे की सच्चाई क्या है सब गड्डमग हैं । हॉ समझना चाहती हूॅ ।
[07/03 19:50] Premchand Gandhi: कहानी दोनों पात्रों की विडम्बनाओं को लेकर है। मैं खुद कुछ नहीं कहूँगा। सनी जिस ऊहापोह के बीच झूल रहा है, उससे निकालने की कोशिश प्रीति करती है। नैतिकता के मापदंड समय के साथ बदलते रहते हैं, विश्व साहित्य में इसके बहुत उदाहरण मिलते हैं। मोपासां की कई कहानियाँ कोट की जा सकती हैं।
मोपासां एक कहानी में बताते हैं कि कैसे एक दादी अम्‍मा अपनी पोती को प्रेम के बारे में समझा रही है। ‘तुम लोग पागल हो! ईश्वर ने जीवन के लिए सबसे बड़ा वरदान इंसान को प्रेम के रूप में दिया है। मनुष्य ने इसमें शिष्टता और रसिकता जोड़ी है। हमारे नीरस क्षणों को आल्हादित करने वाली चीज है प्रेम, जिसे तुम्हारी पीढ़ी के लोग तेजाब और बंदूकों से ऐसे खराब कर रहे हैं, जैसे उम्दा शराब में मिट्टी डाल दी जाए।... दुनिया हमें मजबूर करती है इसलिए हम एक बार शादी करते हैं, लेकिन जिंदगी में हम बीसियों बार प्रेम कर सकते हैं क्योंकि कुदरत ने हमें ऐसा ही बनाया है।... दुनिया ने कानून इसलिए बनाए हैं कि इनसे इंसान की मूल प्रवृत्तियों को काबू में किया जा सके। ऐसा करना जरूरी भी था, लेकिन हमारी मूल प्रवृत्तियां ज्यादा शक्तिशाली हैं, हमें इनका विरोध नहीं करना चाहिए क्योंकि ये हमें ईश्वर ने दी हैं जबकि कानून इंसान ने बनाए हैं। अगर हम जीवन में प्यार की खुशबू नहीं भरेंगे तो जिंदगी बेकार हो जाएगी। यह ऐसा ही है जैसे बच्चे की दवा में चीनी मिलाकर देना।‘
[07/03 20:53] ‪+91 99588 37156‬: नौकरी के लिए समझौता करना और सेक्स के प्रति इतना चलताऊ व्यवहार जैसे कि कुछ हुआ ही न हो प्रीती को एक ऐसे चरित्र के रूप में उबारता है जिसके लिए वह सब मान्य है जो वह उचित समझे किन्तु नायक? वह तो उसूल पसन्द चारित्रिक दृढ़ता वाला पुरुष है और ऐसे सम्बंधों के लिए सहज भी नही। तभी गंवई शब्द उसके लिए प्रयुक्त भी किया गया। वह न केवल नायिका को दैहिक सुख बल्कि धड़ल्ले से उसके 50000 भी निकाल लेता है । चरित्र की बुनावट  में यह अंतर्विरोध उसे एक कमज़ोर पात्र बनाता है पाठक के मन में उसकी दुःख सहकर भी नौकरी को लात मारने के साहस के लिए आदर नही उपजता ।
[07/03 22:02] ‪+91 94257 11784‬: श्री प्रेमचंद गान्धी की कहानी , गिल्टी मिथ , श्री झरपुरे जी के शब्दों में, हमारे समय और समाज की साफ छवि प्रस्तुत करती है ।किंतु यदि हमारे समय और समाज की यही छवि है तो कहना होगा कि भारतीय समाज से या कम से कम पत्रकारों,  कलाकारों के समुदाय से नैतिक मूल्यों की  विदाई का समय आ गया है ।कहानी की नायिका प्रीति का तथाकथित बिन्दास आचरण इसकी घोषणा करता प्रतीत होता है । वह सनी याने श्री शैलेन्द्र नीलम की  सहायता अवश्य करती है किन्तु अपनी वासना पूर्ति के लिए सनी का पूरा पूरा इस्तेमाल करती है ।और फिर उसे किसी क्रॉनिकल  में नियुक्ति भी दिलाती है जहां कोई आवश्यक नहीं कि स्वाभिमानी सनी को  समझौते न करना पडें,।वस्तुतः जहां संयम के स्थान पर भोग प्रमुख है वहां नैतिक मूल्य तो रह ही नहीं सकते, व्यक्ति का स्वाभिमान भी सुरक्षित नहीं रह पाता ।
व्यक्तिगत नैतिकता और समाजगत नैतिकता अन्योन्याश्रित है ।एक की आड लेकर दूसरे को उपेक्षित कर हम पाखण्ड ही जन्मायेगे । परिणाणतः व्यक्ति तथा समाज दोनों ही पतनोन्मुखी होगे ।
   आज के  माहौल में, जिसका कहानी में चित्रण हुआ है , यदि कहीं तिलक जी , गणेश शंकर विद्यार्थी जी  आदि के र्जीवनादर्शो को हमने  अप्रासंगिक  होने दिया और पश्चिम की तर्ज पर भोगवादी दर्शन जीना शुरू कर दिया  तो नैतिक मूल्यों का अवमूल्यन निश्चित है ।
  गिल्टी मिथ के द्वारा हम नैतिकता की बेढंगे दुर्गो भले ही ढहा दे, जैसा डॉ अनुराग पाठक जी ने कहा है, किंतु इस प्रक्रिया में बेढंगे दुर्ग में सुरक्षित कोई मूल्यवान वस्तु भी ढह गई तो फिर उसका बचाव शायद ही संभव हो पाए ।
   वैसे गिल्टी मिथ की बुनावट बहुत अद्भुत है।मसाला फिल्म का अक्श भी  उउसमें  है।बहुत लंबी कहानी होकर भी उसे पूरा पढकर ही पाठक विश्राम पाता है ऐसे  कौशल और नये विचारों के लिए श्री प्रेमचन्द जी गान्धी का हार्दिक अभिनन्दन ।मंच को बहुत बहुत साधुवाद ।
[07/03 22:15] राजेश झरपुरे जी: आज आप सभी ने  श्री प्रेमचन्द गाँधी  की कहानी "गिल्‍टी मिथ " पढ़ा और अपनी बहुमूल्य प्रतिक्रिया से अवगत कराया । कहानी  पर नैतिकता को लेकर जो प्रश्न मंच पर उठाया गया उस पर सहमति और असहमति दोनों ही दर्ज की गई । मैंने  पहले ही अपनी टिप्पणी में  लिखा था कि ",,,, समाज जैसा होगा; साहित्य  में वह उसी तरह परिलक्षित होगा । इसके लिए साहित्य या लेखक को तो जवाबदार नहीं  ठहराया जा सकता ।"  यहाँ बहुत से मित्रों को प्रीति के व्यवहार में असमान्यता नजर आई । व्यवहार या समाज में  इस तरह के किरदार नहीं होते जैसी सम्भावना से एकदम इंकार नहीं  किया जा सकता । स्त्री जब पाना चाहती है तो वह हर वह चीज खो देने को आतुर रहती है जिसे मान मर्यादा और बैंक में  जमा धन जैसा कुछ कहा जा सकता है,,, इससे भला कौन असहमत होगा ।हालाँकि यह कहानी  किसी तरह की नैतिकता के मापदंड  स्थापित नही करती  न ही इसे मानने के लिए बाध्य करती है । बस! सूचनातंत्र के उद्योग का एक सच सामने लाती है, जहां प्रीति और सनी जैसे किरदार का पाया जाना मुझे  तो अचरज में  नहीं डालता ।
पुनः आप सभी मित्रों का आभार और शुक्रिया ।
सहमति  और असहमति तो प्राय: हर रचना के साथ जुड़ी  होती ही है ।कल फिर मंच के ही सदस्य रचनाकार की कहानी के साथ पुनः  भेट होगी तब तक के लिए शुभरात्रि ।

Sunday, March 6, 2016


पदमा शर्मा


 फीनिक्स

शेफाली ने शादी डॉट कॉम पर अपनी प्रोफाइल बनाने के लिये नेट खोला । शादी डॉट कॉम को सिलेक्ट करने के बाद रजिस्ट्रेशन के कॉलम पर क्लिक किया। कई सारे प्रतिपूर्ति कॉलम स्क्रीन पर उभरे जिन्हें वह पूरा करती गयी।
मेल / फीमेल...... फीमेल
नेम..........शेफाली शर्मा
डेट आफ बर्थ................. सात जुलाई उन्नीस सौ अठहत्तर
रिलीजन.................... हिन्दु ब्राह्मण
लिविंग इन................... शिवपुरी म प्र
हाइट........................... 5‘2
कलर.....................फेयर
ई मेल आदि लिखा और टपके हुए कोड को बॉक्स में लिखकर ओके कर दिया।
शारीरिक सुख मानसिक सुख पर ही आधारित होता है । ऐसा हाईफाई तो उसने कुछ  सोच नहीं रखा...एनआरआई बगैरह ...। बस ऐसा कि -उसके आगे पन्द्रह ना हो ? अठारह उन्नीस तो चल जायेगा। पर कोई अच्छा ऑप्शन पापा या घरवालों ने लाकर ही नहीं दिया। कभी कोई पूछता - ‘‘बेटी की शादी कब कर रहे हो’’ तो उत्तर यही होता - हाँ ! ढूंढ रहे हैं... अच्छा लड़का मिले तब ...। लड़कियाँ पढ़ लिख जाती हैं तो लड़का भी अच्छा देखना पड़ता है।’’
उनके इस उत्तर से सब यही समझते शेफाली को लड़का पसन्द नहीं आता।

दस दिन बाद शेफाली ने अपने ई मेल की साइट खोली और इनबॉक्स चैक किया। पन्द्रह मेल पड़े थे। मेल को सिलेक्ट करने के लिये माउस को गतिमान किया और पहले मेल पर कर्सर लाकर दाएं हाथ की तर्जनी को बांयी ओर प्रेस किया । धड़धड़ाकर पिटारा स्क्रीन पर खुल गया। लड़कों के फोटो और संबंधित का पूरा विवरण मेल पर पड़े थे। पहला मेल ... फोटो कोई खास नहीं था। दिल्ली में सर्विस थी । आय 15000 रुपये मासिक ।
उसने सभी लड़कों के नाम, आय का ब्यौरा तथा पसन्द नापसन्द के साथ-साथ हाइट और सम्पर्क नम्बर आदि कॉपी में नोट कर लिये। साइबर कैफे मालिक को पेमेन्ट कर वह बाहर आ गयी।
अब यह उसका साप्ताहिक क्रम बन गया। हर शनिवार को वह साइबर कैफे आती और मेल बॉक्स चैक करती... उनमें से जिनका विवरण उसे अच्छा लगता उन लड़कों का ब्यौरा नोट करके घर ले आती। पापा उनमें से तीन-चार लोगों का चयन करते... जिसका वेतन आकर्षक होता उसे फोन करते। फोन पर बात करते समय भी उनका पहला प्रश्न होता- ‘‘आपकी डिमांड क्या है ?’’
उसकी शादी सात फेरे के वैवाहिक बंधन में न बँधकर डिमांड के घेरे में जकड़ी थी।
    ऐसा नहीं कि पापा के पास पैसा नहीं था ! पर वे लड़की की शादी में उसे लुटाना नहीं चाहते थे।
पिछले सात-आठ वर्षों से वह  में कॉलेज टेम्परेरी जॉब कर रही थी... लगभग तीन-साढ़े तीन लाख तो उसने ही जोड़ लिये थे। उसके अन्दर एक साथ कई सवाल पैदा हो जाते...पापा ने फोटो नहीं देखा, लड़का कैसा है ? नेचर कैसा होगा ? घर कैसा होगा ? परिवार वाले कैसे हैं... कुछ भी तलाश नहीं , बस एक प्राथमिकता- ‘‘लड़के की डिमांड न हो’’ । यदि किसी की मांग न हो, पर दिखने एवं व्यवहार में भी अच्छा न हो तब ... तब भी क्या पापा मेरी शादी उससे करने को तैयार हो जायेंगे ? जैसे वह उन सब पर बोझ हो।
कई सारे तर्कों-कुतर्कों से घिरी वह चलती जा रही थी ...वहाँ, जो उसका घर होते हुए भी उसका नहीं था । सदियों की परम्परा... वही पुरानी लीक ... परायेपन का भाव, दूसरे के घर जाना है... यही सोच।
पापा कहते ...
क्या देखना घर और वर को ? आर्थिक रूप से सशक्त होना चाहिये, उसकी सेलरी अच्छी होगी तो सारी खुशियाँ घर के द्वार खड़ी नजर आयेंगी। शादी तो समझौता है, लड़की वालों को समझौता करना ही पड़ता हैं... कितना भी पढ़ा लो या नौकरी करा लो... सारे फैसले तो लड़के वालों के हिसाब से ही होने है।
शेफाली के घर में पापा राजबिहारी और मम्मी मधुमालती के अलावा एक छोटा भाई श्रीकांत है, जो दिल्ली में सॉफ्टवेयर इंजीनियर है। पापा बैंक से रिटायर हो चुके हैं, मम्मी मिडिल स्कूल में एच.एम. हैं। शेफाली ने अंग्रेजी में एम ए करने के बाद पीएच डी कर लिया था शेक्सपीयर की कविताओं पर। आजकल कॉलेज में टेम्परेरी पढ़ा रही है। जब तक पीएच डी नहीं हुयी थी तब तक लोगों के प्रश्नों का उत्तर उसके घरवालों के पास था, उसकी पढ़ाई पूरी हो जाये फिर शादी करेगी। वह कहती है शादी के बाद पढ़ना नहीं हो पाता...
 यह आड़ वर्षों तक घरवालों की ढाल बनी रही। पिछले पाँच वर्षों से न तो उसके पास ही कोई लक्ष्य था न ही कोई ऐसा कारण जो शादी होने के बीच अरावली की तरह खड़ा हो या अटक रहा हो।
शेफाली दो वर्षों से महसूस कर रही थी कि पापा की रुचि उसके विवाह में कतई नहीं रह गयी थी। वह जो पैसा कमाती उसका खर्च अपने हिसाब से नहीं कर पाती। पापा की हिदायत के अनुसार बैंक में जमा कर दिया जाता। धीरे-धीरे उसके द्वारा जमा की राशि में इजाफा हो रहा था जो राशि उसके विवाह के लिये संकल्पित रखी थी वह पापा भूलते जा रहे थे। पापा ऐसे रिश्ते पसन्द करने लगे, जो दहेज न मांगे ! उनके हिसाब से शेफाली की जमापूंजी में ही शादी निबट जाये ...ऐसे डिमाण्डलैस रिश्ते आते, उनमें लड़का न तो शक्ल में और न ही अक्ल में अच्छा होता , न अच्छी नौकरी और न ही अच्छा घर - परिवार। समझौते का कोई आधार तो बने।
अखबार में विज्ञप्ति क्या निकली, जैसे वह सरकारी सम्पत्ति हो गयी। एम. ए. पीएच. डी. लड़की के लिये आठवीं पास लड़के भी पत्र  भेजने लगे। कुछ पत्र तो ऐसे उम्मीदवारों के भी आये जिनके दो-दो , तीन - तीन बच्चे थे।
 बढ़ती उम्र देख पापा कहते अब तो दूजा वर ही देखना पड़ेगा।
गोया जानबूझकर उसके सामने ऐसा प्रस्ताव लाया ही नहीं गया जो अच्छा हो और जिसके लिये वह स्वीकृति दे पाए !  किन-किन बातों में वह समझौता करे... पढ़ाई में, नौकरी में , रंग-रूप में या उसकी कमजोर आर्थिक स्थिति में...। यदि इन सबसे ही उसे समझौता करना है तो फिर कुँवारी ही भली। कम से कम अपनी जिन्दगी अपने हिसाब से तो जी लेगी। घर बैठे तो कोई हाथ मांगने आयेगा नहीं। पापा की बढ़ती उम्र उनकी बीमारी बनती जा रही थी। उनकी अदद सेवा में वही लगी हुयी थी। मन में द्वन्द्व चलने लगता ... कोई अच्छा लड़का मिल जाये तो वह भाग जाये और शादी का किस्सा खत्म कर दे...। साथ की और बाद की भी सभी लड़कियों की शादियाँ कब की हो चुकी...। उनके किस्से, टी व्ही के सीरियल... सब मन पर , शरीर पर दस्तक दे रहे थे। वह सोच रही थी कैफे तो खुद ही जाती हूँ - क्यों न कोई अच्छा लड़का देख खुद ही बात शुरू कर दूँ...।

नितिन की प्रोफाइल उसे ठीक लगी। इस बार उसने कैफे में डरते सहमते नितिन को ई मेल किया। उसने अपना मोबाइल नम्बर लिख दिया था। उस रात ही नितिन का कॉल आया - ‘‘हलो मैं नितिन भारद्वाज गाजियाबाद से बोल रहा हूँ । ’’
‘‘...ज....जी ....’’
‘‘ आप शेफाली जी बोल रही हैं ?’’ चहकता हुआ स्वर
‘‘जी ... हाँ’’
‘‘आपका मेल मिला था’’
बातों का सिलसिला शुरू हो गया ....।
फिक्सड टाईम... नाइट कॉलिंग
घंटों बातें होतीं। और मोबाइल पर एसएमएस होते। यों एक दूसरे की पसन्द-नापसन्द सबसे परिचित हो चुके । जब पन्द्रह-बीस दिन गुजर गये ,वह कैफे नहीं गयी तो राजबिहारी जी ने टोका, ‘‘ शेफाली मेल चेक कर आना।’’
वह मजबूरी में गयी और आठ दस मेल में से चार ऐसे लड़को के विवरण लिख लिये जिनकी सेलरी कम थी। नितिन के कहे मुताबिक शेफाली ने उसे मैसेज भेजा वह कैफे में है। नितिन भी आॅन लाइन हो गया ।
दोनों 45 मिनट चैट करते रहे।...
 नितिन ने अपने कई फोटोज मेल कर रखे थे।
रोज की आत्मीय, चुहलभरी बातचीत ने दोनों के हृदय में एक-दूसरे के लिए सुनिश्चित स्थान बना लिया था।
पापा का कहना था कि-  लड़का यदि पसन्द करता हो और दिलोजान से चाहता हो तो किसी भी कीमत पर शादी के लिये तैयार हो जायेगा।
दो माह बाद जब उन्हें लगा कि वे जीवनसाथी बन सकते हैं... नितिन ने मिलने की इच्छा प्रकट की।उस दिन ही शेफाली ने मम्मी को बताया था नितिन के बारे में। घर में जैसे ही पता चला सन्नाटा छा गया। मम्मी अधिक परेशान थीं पापा ने ही उन्हें समझाया ...विवाह उसकी मर्जी से हो तो और भी अच्छा है कभी कुछ कहने सुनने को नहीं बचेगा। बस उन लोगों की डिमांड न हो।
अगले रविवार को नितिन आया । नितिन ने शेफाली से कह दिया था मैं तुम्हें देखकर अपने बालों पर हाथ फेरूँ तो समझना तुम मुझे पसन्द हो। हुआ भी यही जब सुबह वह नाश्ता कर रहा था तब एक हाथ में समौसा लेकर दूसरा हाथ सिर पर फेरते हुए वह बोला, ‘‘ मुझे पसन्द है।’’ सब समझे वह समौसे के लिये कह रहा है।  शेफाली समझ गयी ,उसके गालों पर लाज की रेख खिंच गयी।  नितिन ने तो एकांत पाते ही अपनी मौखिक स्वीकृति भी दे दी। बदले में शेफाली ने मुग्ध भाव से गर्दन हिला दी। पापा की राय जानना जरूरी है कहकर उसने नितिन की खुशियों पर ब्रेक लगा दिया।
सभी लोग छत्री घूमने गये। मौसम देख दोनों के मन में जलतरंग बज उठां। नितिन के आग्रह पर शेफाली ने गाना सुनाया...
चलते चलते मेरे ये गीत याद रखना कभी अलविदा न कहना....
सेलिंग क्लब, भदैया कुण्ड जैसे दर्शनीय स्थल देखे । चांद पाठा में बोटिंग करते लहरों की तरंगें दिल की ध्वनि तरंगों का साम्य बनने लगीं। साहचर्य और नजदीकी उनके रिश्ते को प्रगाढ़ बना रहे थे। बोटिंग करते-करते शेफाली ने उसे ‘जॉन डन’ की पोयम ‘‘द कैननाइजेशन’’ की पंक्तियाँ सुनायीं -
The Phoenix ridle hath more wit
By us, we two being one, are it,
So, to one neutrall thing both sexes fit
Wee dye and rise the same, and prove
Mysterious by this love

 (फीनिक्स पक्षी की पहेली हमारे प्रेम की समझ को और अधिक सार्थक तथा प्रगाढ़ करती है, हम दो होते हुए भी एक हैं। इसलिये हमारे दो सेक्स इतनी पूर्णता से परस्पर फिट होते हैं और सेक्सरहित एक व्यक्ति बन जाते है। यह प्रेम सेक्स भावना से कहीं ऊपर हैं । मृत्यु के पश्चात् हम पुनः जीवित होकर वही बन जाते हैं जो पहले थे ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार फीनिक्स पक्षी अपनी ही भस्म से पुनः जीवित हो जाता है  और यह प्रेम हमें एक रहस्य देता है जो आदर योग्य होता है। )
और प्रश्न करते हुए नितिन की आँखों मे झांका-‘‘क्या हमारा प्रेम भी यही है ?’’
       प्रश्न ने नितिन को थोड़ा सोच में डाल दिया। कुछ ठहरकर वह बोला-‘‘हमारा प्रेम, प्रेम है-सच्चा प्रेम ,पर रहस्यमय नहीं है और न ही काम भाव से परे। फिर नितिन ने शेक्सपीयर की ‘‘The phoenix and the turtle” की कुछ पंक्तियाँ शेफाली  को सुनायीं-
           Here the anthem doth commence
Love and constancy is dead
          Phoenix and the Turtle fled
In a mutual flame from hence

(यहाँ से एन्थम (गीत) की शुःरुआत होती है। प्रेम और निरंतरता अब मर चुके है। फीनिक्स और टर्टल अब उड़ चुके है यहाँ से, एक ही ज्वाला बन कर।)
शेफाली ने अपनी उत्सुकता जाहिर करते हुए कहा-‘‘फीनिक्स पक्षी एक मिथक है ?’’
‘‘ एक काल्पनिक पक्षी जो अरब के रेगिस्तान में सैकड़ों वर्षों तक जीवित रहता है , तब स्वयं को जला डालता है फिर अपनी ही भस्म से पुनः युवा के  रूप में जीवित होकर वही चक्र दोहराता है।’’
थोड़ा रुककर नितिन ने कहा -‘‘फीनिक्स अपने आप में पूर्ण नहीं है। उसका पूरक टर्टल (सुंदरता की देवी वीनस का फाख़्ता) है। इसमें रहस्य नहीं है । तुम मेरा और मैं तुम्हारा पूरक हूँ।’’
  शेफाली ने गहरी साँस लेकर कहा-‘‘लेकिन शेक्सपीयर ने ये भी तो कहा है-
So they lov’d as love in twain
Had the essences but in one:
       ‘‘हाँ बिल्कुल,’’ कहकर नितिन ने स्टैंजा को पूरा करने के लिये आगे की पंक्तियाँ सुनायीं-
 Two distincts, division none:
  Number there in love was slain.
(प्रेम अपने आप में इतना व्यापक है कि वहाँ संख्या का कोई अस्तित्व नहीं है। दो अलग -अलग जीवों की तरह उन्होंने (फीनिक्स और टर्टल ने ) प्रेम किया लेकिन उनका(उनके प्रेम का) सार एक होने में ही है। दो अलग-अलग शरीर होते हुए भी कोई विभाजन नहीं है क्योंकि संख्या का प्रेम में कोई अस्तित्व नहीं हो सकता।)
अब शेफाली ने कुछ हल्कापन महसूस किया और नितिन का हाथ पकड़कर बोली-‘‘हाँ बाबा ये सब तो ठीक है, आइ एग्री बट टैल मी(मै सहमत हूँ लेकिन ये बताओ) कि हमारा प्यार फीनिक्स और टर्टल, प्रकृति और पुरुष के प्रेम की ही तरह है ना...अमर...निरंतर...प्रगाढ़....?’’
 नितिन  ने शेफाली का हाथ अपने हाथ में लेते हुए उसके कान के पास मुँह ले जाकर धीरे से फुसफुसाया-‘‘हूँ’’।
जाते समय उसने शेफाली से कहा था मेरे पापा से बात कर लें तुम्हारे पापा। अन्तिम निर्णय उनका ही रहेगा। सुनकर शेफाली चोंक गयी थी।

नितिन को देखकर पापा-मम्मी को एक ठोस बहाना मिल गया था , लड़का बहुत सांवला हैं।
शेफाली किसी भी बहाने के कारण उसे ठुकराना नहीं चाहती थी। उसे भी अपनी कमियाँ मालूम थीं। पापा के सामने नितिन का रंग मूल कारण न था वल्कि उनकी देखभाल कौन करेगा ये सबसे ठोस कारण था।
‘‘वह दिल का बहुत अच्छा है माँ’’ उसने तर्क देते हुए कहा था।
’’लेकिन जोड़ी तो ठीक होना चाहिये ’’ माँ ने प्रतिवाद किया
‘‘मम्मी जब विवाह एक समझौता है तो ये समझौता मुझे पसन्द है’’
नितिन को उन लोगों के फैसले का इन्तजार था। उसने शेफाली के सेल पर मैसेज छोड़ रखे थे। दो दिन बाद शेफाली का कॉल देखते ही उसने धड़कते दिल से रिसीव किया। वह भी अपनी कमी से अनभिज्ञ न था। एक पढ़ी-लिखी ,सुसंस्कृत लड़की जीवनसाथी के रूप में पाने की उसकी भी लालसा थी। अब तो वे एक दूसरे को दिलोजान से चाहते भी हैं।
बमुश्किल उसने पापा को मनाया और तय हुआ कि अगले सण्डे को गाजियाबाद जाकर नितिन के घरवालों से बात कर शादी को अरेंज किया जायेगा। शादी की तारीख भी निकलवा ली राजबिहारीजी न, बस नितिन के मम्मी-पापा से मिलना शेष था। राजबिहारी जी ने नितिन के पापा से मिलने के लिये समय मांगा तो उनका पहला  प्रश्न था, ‘‘ कितने की शादी करोगे ?’’
राजबिहारी चैंकते हुए बोले, ‘‘ पर... नितिन ने तो बताया था हमारी कोई डिमांड नहीं है तभी हम आगे बढ़े थे।’’
एक सख्त स्वर उभरा था फोन पर,‘‘उसके कहने से क्या होता है... लड़की पसन्द करना उसका काम है बाकी काम हमारा हैं ’’
राजबिहारी को नितिन वैसे भी पसन्द नहीं था उन्हें बहाना मिल गया।

शादी डॉट कॉम फेल होने की कगार पर आ गया। इसे यूँ भी कहा जा सकता है कि लड़का संस्कारी था जो माता-पिता को अलग कर नन्हे पाव चलते प्यार को आगे नहीं बढ़ा सका। वह अपने निर्णय पर अडिग नहीं रह पाया या निर्णय इतना कमजोर था कि अधिक समय तक खड़ा नहीं रह सका। सपनों का महल धड़धड़ाकर गिर गया। तीन माह का सम्पर्क तीन जन्मों का लगने लगा था। मनमुटाव, बातों में खटास आना शुरू हो गयी थी और नेट के सम्बन्ध बिखर रहे थे। पापा-मम्मी की अनुमति के बिना वह कुछ नहीं कर सकता था।
शेफाली के मन में द्वंद्व चलने लगता ...हमारा प्यार प्रथम दृष्टया प्यार तो था नहीं जो एक बार देख लेने भर से प्यार हो गया हो। ये तो सोचने समझने के बाद लिया गया फैसला था । क्या उसमें इतना पौरुष नहीं था ? जब माँ - बाप की मर्जी से ही विवाह करना था तो प्यार भी उनसे पूछकर , उनकी अनुमति से करना था। प्यार करते समय तो ऐसे दिखा रहा था कि पता नहीं कितना जज्बा है उसके अन्दर, पर मौका पड़ने पर मुँह छिपा लिया।
उसकी सोच निरंतर जारी थी... प्यार एक अहसास है, प्यार उमंग और उत्साह भर देता है जिन्दगी में, प्यार खुशी है... प्यार जिन्दगी है... तो क्या प्यार न रहे तो जिन्दगी भी न रहे ...ऐसा तो न होगा। वह प्यार के वियोग में आत्महन्ता नहीं बनेगी। वह जिएगी...प्यार के न रहने के अहसास के साथ ...वह उसे दिखा देगी कि वह उसके बिना भी जी सकती है... वह आत्मविश्वास से भर गयी। प्यार खुशी दे तो जिन्दगी है ...प्यार दुःख दे तो एक बीमारी। उस बीमारी को जड़ से उखाड़ने की आवश्यकता है। प्यार के वजूद को बनाये रखने के लिये ऐसे अनिश्चित, असफल प्रेम को जो अस्वास्थ्यकर बन चुका है ; मन से , दिलो-दिमाग से उखाड़ फेंकना ही होगा। ...
उस दिन वह जी भरकर रोयी थी, शायद ! विरेचन के लिये यह आवश्यक था। अरस्तु ने ‘‘Catharsis ’’ (विरेचन) शब्द का प्रयोग किया था। चिकित्सा शास्त्र मे इसका अर्थ है- रेचक औषधियों द्वारा शरीर के मल या अनावश्यक एवं अस्वास्थ्यप्रद पदार्थ को निकालना।
उसे याद आ रहा था अरस्तु का मत: ‘‘ त्रासदी करुणा तथा त्रास के कृत्रिम उद्रेक द्वारा मानव के वास्तविक जीवन की करुणा और त्रास-संबंधी भावनाओं का निष्कासन करती है, त्रासदी के पठन और प्रेक्षण से संयत रूप में करुणा और भय का जो संचार होता है, उससे व्यावहारिक जीवन में करुणा और भय के प्रचण्ड आवेगों को झेलने की शक्ति आ जाती है। ’’

लगभग तीन माह बाद शेफाली कैफे आयी थी। कई दिनों से उसने मेल चैक नहीं किया। उसने इनबॉक्स खोला , एक ही व्यक्ति के दस मेल चार पाँच दिन के अन्तराल से पड़े थे। श्रेयांश भार्गव कौन है यह जानने की जिज्ञासा उसे हुयी। दिल्ली में उसका आफिस , बनारस का रहने वाला... बी ई एम.बी.ए. सारी जानकारी के साथ फोटो भी था। अन्तिम मेल में उसने काॅन्टेक्ट नम्बर मांगा था। उसने अनमने भाव से कम्पोज मेल पर जाकर उसे अपना मोबाइल नम्बर सेन्ड कर दिया। उसने कैफे के काउन्टर पर  पेमेन्ट किया और घर की ओर चल दी।
उस रात ही श्रेयांश का फोन आया , शेफाली ने ज्यादा रूचि नहीं दिखायीं।
शेफाली उससे कुछ छुपाना नहीं चाहती थी । पन्द्रह दिन के वार्तालाप में उसने अपना सच उसे बता दिया। दोनों एक दूसरे की पसन्द-नापसन्द से परिचित हो गये। श्रेयांश उसकी स्पष्टवादिता से बेहद प्रभावित हुआ।
उसने फोन पर कहा- ‘‘मैं मिलना चाहता हूँ’’
‘‘मिल लेंगे... अभी एक-दूसरे को जान समझ तो लें’’
‘‘मैं जल्दी निर्णय लेना चाहता हूँ’’
‘‘मैं अभी पूरी तरह स्थिर नहीं हो पायी हूँ’’
‘‘इसीलिये तो जल्दी मिलना चाहता हूँ’’
‘‘पर मैं कैसे विश्वास कर लूँ’’ कहते-कहते वह रो पड़ी थी’’ इस बार वह जल्दबाजी करना नहीं चाहती थी।
‘‘सच मानो मेरी शादी में मेरा ही फैसला अंतिम होगा, यदि मम्मी-पापा नहीं मानेंगे तो भी मैं हर हालात में शादी करने को तैयार रहूँगा , बस एक बार मिल तो लो ...’’
............
‘‘और सुनो मेरे हाथ तुम्हारे आँसू पौंछ रहे हैं’’
........
‘‘एक के धोखा देने पर किसी पर विश्वास न करो ये गलत है। मैं खुद अभी तुमसे कोई वादा नहीं कर रहा और न ही तुम्हें मजबूर कर रहा। बस एक बार मिल लो...’’ वह समझा रहा था।
जाने क्या जादू था उसकी आवाज में वह मना नहीं कर पायी
‘‘...ठीक है...’’
‘‘पहले हम दोनों मिलेंगे यदि तुम्हें सब ठीक लगे तो पेरेन्ट्स से मिलवाना ओ के’’
‘‘ओ के’’ वह धीरे से बुदबुदायी ।

शहर के छोटे से होटल में शेफाली अपनी एक सहेली के साथ पहुँची। दोनों ने एक दूसरे को पसन्द कर लिया। दो घन्टे की बातचीत के बाद वह चला गया।
शेफाली को लगता कहीं ये भी नितिन की तरह अपने वादे पर अडिग न रहा तो... कहीं इसने भी अपने पेरेन्ट्स के कहने पर डिमांड पर जोर दिया तो... पापा-मम्मी पता नहीं कितना सुनायेंगे। पहले भी तो कितना कुछ सुनना पड़ा था- ...शादी की जल्दी हो रही है इसलिये बिना सोचे-समझे, जांचे-परखे उसे बुला लिया।... माँ-बाप बच्चों के दुश्मन नहीं होते यही हम देखते तो सब ठोक बजाकर देखते पहले।...
दिल्ली पहुँचकर वह आग्रह करने लगा अब मुझे तुम्हारे पापा-मम्मी से मिलना चाहिये। शेफाली ने थोड़ा और वक्त मांगा ।
‘‘...जब तक तुम खुद आने को नहीं कहोगी तब तक नहीं आऊँगा’’
‘‘आपके परिवार की कोई डिमांड तो नहीं है....’’ शेफाली घबराकर पूछती
‘‘तुम एक ही प्रश्न बार-बार क्यों करती हो ? ’’
‘‘मैं सन्तुष्ट होना चाहती हूँ’’
‘‘ठीक है ,!  सिर्फ एक डिमांड है ...’’
इस उत्तर ने उसे फिर चैंका दिया। वह चिन्तित होकर बोली, ‘‘क्या...डिमांड है ?’’
वह कहकहा लगाकर बोला, ’’प्यारी-प्यारी शेफाली... और कुछ नहीं , क्या हुआ चिन्ता में तो नहीं पड़ गयीं ’’
..........
‘‘चलो अपना गाल आगे करो , उसे थपथपाकर कहूँगा पगली ....’’
नेट पर फ्री में way 2 sms की सुविधा है
‘‘अच्छा एक काम करना , नेट पर अपने मोबाइल नंबर का way 2 sms पर खाता खोल लेना, फिर तुम्हारे मोबाइल पर उसका पासवर्ड आ जायेगा। उसके जरिये तुम मुझे मोबाइल पर मैसेज कर सकती हो।

श्रेयांश से चैटिंग करते समय दो-तीन बार नितिन का इनविटिशेन उसके स्क्रीन पर उभरा, उसने उससे बात नहीं कीं। थोड़े दिन बाद ही उसने अपना ई मेल आइ डी चेन्ज कर लिया और श्रेयांश को भी कारण बता दिया।

जबसे वह मिलकर गया है , हर बार बात करते समय उसका प्रश्न होता क्या पहना है ? किस कलर का ?
वह आश्चर्य करती तो कहता- ‘‘इससे इमेजिनेशन करने में परेशानी नहीं होती।’’
वह कैफे में होती उस समय यदि वह टूर पर होता तो कहता तुम नेट से वे टू एस एम एस से मेसेज मेरे मोबाइल पर करो। फिर वह ‘‘वे टू एस एम एस’’ करती और वह उसके मोबाइल पर मैसेज रिप्लाय कर देता।

कुछ दिन बाद वह आया ,शादी की डेट भी निकलवा लाया था। शेफाली के पापा-मम्मी भी तैयार हो गये ,वो चाहते थे ज्यादा खर्च न हो।
‘‘ऐसा करिये आप सब दिल्ली आ जाइये। जितने रिश्तेदारों को बुलाना है बुला लीजिये। शादी का अरेंजमेन्ट तो मुझे ही करना है।’’
‘‘आपके घरवाले...’’ पापा का स्वर उभरा
‘‘पापा-मम्मी तो तैयार नहीं हैं’’
सुनकर राजबिहारी जी परेशान हो गये
‘‘उनकी परेशानी समझ उसने आश्वासन दिया, घबराइये नहीं मैं हर स्थिति में शेफाली का साथ देने को तैयार हूँ ’’
   कमरे में सामान उठाने आया तो दरवाजे पर शेफाली को खड़ा पाया। उसने शेफाली के सर पर हाथ फेरा आश्वासन भरा, वह उससे लिपटकर रो पड़ी थी। उसने आँसू हथेलियों में समेटते हुए कहा ,‘‘ नहीं अब एक बूँद भी नहीं गिरने दूँगा । मुझे तुम्हारी कद्र है। मुझे पैसों की कोई कमी नहीं है। बस एक अच्छा और सच्चा जीवनसाथी चाहिये ।’’
‘‘.........’’
तर्जनी से उसकी ठोड़ी ऊपर करते हुए कहा, ‘‘...मुझे सफर करना है, उदास छोड़कर जाऊँगा तो मेरा मन नहीं लगेगा।....मुझे हँसती हुयी शेफाली चाहिये ।’’
   रोते-रोते मुस्करा दी वह । वह चला गया मन में आत्मीयता और दिल में प्यार के जज़्बे को छोड़ गया।
शेफाली को शेक्सपीयर की कविता ‘फीनिक्स एण्ड टर्टल’’ की कुछ पंक्तियाँ याद आ गयीं-
Leaving no posterity
“ITwas not their infirmity
            It was married chastity
 (कोई संतान या पीढ़ी नहीं छोड़कर जाना, यह उनकी कमजोरी नहीं, बंधन की पवित्रता है।)

     शेफाली को लग रहा है फीनिक्स जलकर भस्म होता है और अपनी ही राख से पुनः पैदा होता है ,युवा के रूप में जीवित होकर वही चक्र दोहराता है। उसे लग रहा है कि इस बार फीनिक्स और टर्टल मिलकर ही रहेंगे।

प्रतिक्रियाएँ
[04/03 07:42] Rajnarayan Bohare: मौसम के अनुकूल व टेक्नोलोजी और फीनिक्स के मिथ को समझने संझाने का प्रयास करती कहानी।
[04/03 11:01] shivani sharma Ajmer: आजकल समाज में ऐसे माता-पिता दिख ही जाते हैं जिनके बेटे विदेशों में हैं और बेटियों को वे दूर जाने नहीं देना चाहते! बड़ी विडम्बना है...
मनोभावों को खूबसूरती से उकेरती हुई कहानी । बहुत पसन्द आई। बधाई
[04/03 11:13] ‪+91 99313 45882‬: इस कहानी में बड़ी खूबसूरती के साथ लेखिका ने शेफाली के मनोविज्ञान को उकेरा है ! शेफाली के पिता के माध्यम से एक ऐसा कंजूस चरित्र सामने आया है जो पैसा रहने के बावजूद बेटी की शादी में खर्च नहीं करना चाहता और उसे यह चिंता भी है की बेटी के विदा होने के बाद उसकी सेवा कौन करेगा ! पिता के साथ माँ भी शेफाली की शादी में विलम्ब की जिम्मेदार है !
कुल मिलाकर कहानी का ताना-बाना अच्छे से बुना गया है !
जॉन डान , शेक्सपियर की कविता पंक्तियाँ और अरस्तू के विचार से कथाकार की विद्वता तो झलकती है लेकिन यह आम पाठकों की पाठकीयता में व्यवधान पैदा करनेवाली है !
फिर भी यह कहानी मुझे बहुत अच्छी लगी और इसके लिए मैं पद्मा जी को बधाई देता हूँ और मंच को धन्यवाद् !
[04/03 11:13] ‪+91 99313 45882‬: विवाह की देहरी पर खड़ी एक युवती शेफाली के कश्मकश की कहानी है फीनिक्स
[04/03 11:29] Kavita Varma: फीनिक्स कहानी की चर्चा पहले भी कई बार मंच पर हुई आज पढ़ने को मिली । कहानी का ताना बाना रोचकता से बुना गया है ।संस्कार किस तरह लड़कियों के पैर की बेड़ियॉ बन जाते हैे ये बात भी उभर कर आई । शेखर जी की बात से भी सहमत हूॅ । पद्मा जी तो बधाई अच्छी कहानी के लिये ।
[04/03 14:14] ‪+91 98260 44741‬: एक उच्च शिक्षित परिवार की उच्च शिक्षित लड़की को भी माता पिता के स्वार्थवश किन बेड़ियों में घुटकर रहना पड़ता है उसका संवेदनशील वर्णन। यह वास्तव में बहुत से घरों की सच्चाई है। लेखिका ने जिस तरह से इसे फीनिक्स के मिथक के साथ गुंथकर प्रस्तुत किया है उससे विषय एकदम ताज़ा और नवीनता लिए हो गया इसके लिए लेखिका बधाई की पात्र है। साथ ही अपने भविष्य की डोर भी अपने हाथ में रखते हुए अपने निर्णय की स्वतंत्रता हर लड़की को रखनी चाहिए । कहानी कई पहलुओं पर बहुत अच्छी सीख देती है।
[04/03 14:46] ‪+91 97690 23188‬: पदमा जी की कहानी नायिका प्रधान है।नायिका अविवाहित है और किस तरह वह परिवार की  और स्वयं की उलझनों मर में अपने को उलझा हुआ पाती है ।शादी के लिए मनःस्थिति बनाने के बावजूद जब उचित अवसर नहीं आता है तो वह किन परिस्थितियों से गुजरती हैं और फिर किस तरह है  अंत होता है आज आभासी दुनिया से रिश्तो को पाकर ।मिथक को दोहराते हुए कहानी ने एक नया मोड़ लिया है ।बधाई
[04/03 16:51] प्रज्ञा रोहिणी: स्वयं प्रकाश जी ने काफी पहले फीनिक्स नाटक में सर्वहारा के संदर्भ में इस मिथक का प्रयोग किया था। पद्मा जी की कहानी में इसके माध्यम से जीवन की जटिलता के बीच प्रेम की राह खोजने की कोशिश कहानी करती है। कथार्सिस आदि सिद्धांतों के वर्णन के बिना भी कहानी अपनी बात कहने में समर्थ थी।
[04/03 20:30] ‪+91 94257 11784‬: जी से अवश्य सहमत होना चाहूंगा ।अंग्रेजी कविता निश्चित ही कहानी की पठनीयता  को प्रभावित करती है ।पर उससे कहानी का महत्व  कम  नही होता ।   समाज जीवन में ऐसा सार्थक साहित्य सृजन वस्तुतः स्वागत योग्य है ।अतः पद्मा शर्मा जी को कहानी के लिए बहुत बहुत बधाई ।मंच को अनेकशः साधुवाद ।
[04/03 20:30] ‪+91 94257 11784‬: डॉ पद्मा शर्मा जी की कहानी,  फीनिक्स, मूलतः दहेज  से जुडी  बढिया कहानी है । नयापन भी है। विवाह संबंधों में सायबर कैफे की भूमिका भी रेखांकित हुई है । कहानी  के श्रेयांस भार्गव  नितिन जैसे कच्चे प्रेमियों के मन में किंचित साहसिकता का संचार  भी कर सकते हैं ।
    यूं  यह कहानी पर्याप्त रोचकता के साथ दहेज परंपरा  के समाधान का मार्ग प्रशस्त करती प्रतीत होती है ।
        यहां आदरणीय श्री शेखर
[04/03 21:32] Saksena Madhu: पद्मा जी की कहानी  आज के नेट युग की कहानी है  ।लड़कियों की अपनी जद्दोजहद हर युग में दिखाई देती है ..अपनी शादी में माता पिता की उदासीनता शेफाली को आहत तो करती है पर स्वयं उपाय भी कहोज लेती है ।आज की स्त्री प्रेम में मरना पसन्द नहीं करती वे जीना चाहती भी  है  और जानती भी हैं तभी तो नितिन से आहत होते हुए भी श्रेयांश भार्गव में रूचि लेती है ।अरस्तु के विरेचन को अपनाती हैं ।पूरी कहानी बाँध कर रखती है और दिशा देती है ।कहानी में मिथकों का प्रयोग   लेखिका के ज्ञान को तो दर्शाता है साथ ही कहानी को भी मज़बूती प्रदान करता है ।हमारा पढ़ा हुआ ही मुश्किल मार्ग को सहज बनाता है । " छोड़ दे सारी दुनिया किसी के लिए"  "या रात गई बात गई " जैसी रचनाएँ टूटे मन को सबल बनाती है ।
कुल मिला कर देशकाल, परिस्थिति भाषा और भाव सभी मिलकर कहानी को पठनीय और सन्देशात्मक बनाते हैं
अच्छी कहानी के लिए आभार पद्मा जी ।
[04/03 22:27] Padma Ji: प्रज्ञा जी धन्यवाद। एक ही मिथक का प्रयोग कई साहित्यकार अलग अलग विधाओं में अपने तरीके से करते हैं। स्वयंप्रकाश जी के उपन्यास की बात हो या अन्य साहित्य की। अच्छा लगा जानकर  कि पाखी मार्च के अंक में जयंत पवार जी की कहानी तो मेरी कहानी के कई वर्षों बाद आयी। अपने महत्वपूर्ण जानकरियों से अवगत कराया। धन्यवाद 🙏
[04/03 22:49] Varhsa Raval: पद्मा जी बहुत प्यारी कहानी, अभी वक़्त मिला पढ़ने का, अच्छा हुआ टाल नही दिया, वरना इतनी अच्छी कहानी से वंचित हो जाती.....बहुत 2 बधाई आपको🙏🙏🙏
[04/03 23:17] राजेश झरपुरे जी: आज आप सभी ने पद्माजी की कहानी,  फीनिक्स पढा और अपनी महत्वपूर्ण  प्रतिक्रिया से अवगत कराया । धन्यवाद  साथियों  । एक मध्यम वर्गीय परिवार  में माता-पिता का बेटे और बेटी के प्रति  सोच में तो  अन्तर होता  ही है ।  बेटे की उच्च शिक्षा  के दिए एज्यूकेशन लोन,  पी एफ से पार्ट फाइनल और अपने सारे सपने बेचकर भी उसे पढ़ाना लिखाना और बेटी के लिये हाथ खींच लेना क्योंकि वह पराये घर की मेहमान  है जैसी मानसिकता  से परिचय कराती कहानी । जॉन डान , शेक्सपियर की कविता  और अरस्तू के विचार जिसे लेखिका ने अपनी कहानी के कथ्य के सपोर्ट में  रखा है को हटा दिया जाये तो लेखक का अपना कहानी में  क्या है जैसा प्रश्न भी मुॅहबायें खड़ा हो जाता है ।क्या यह एक जानकारी या सूचना हैं?

प्रेम और समर्पण की साथर्कता?
मध्यमवर्गीय परिवार  में बेटी के विवाह को लेकर माता पिता की सोच?
विवाह सम्पर्क के आधुनिक  माध्यम?
दहेज प्रथा और मोलमाव जैसे कई मुद्दे  कहानी में उठाये गये पर किसी भी एक मुद्दे पर कहानी  खरी नहीं उतरती । शेक्सपीयर की कविता पंक्ति का हिन्दी अनुवाद  भी ठीक उसी तरह है जिस तरह है जिस तरह परीक्षा में पास होने के लिए रटा लगाने वाली रिफेसर । हालांकि इस तरह अंग्रेजी और हिन्दी अनुवाद का कहानी में कोई औचित्य नहीं था । इस प्रसंग  को लेखिका अपने शब्दों में भी कह सकती थी ।कुल मिलाकर एक औसत कहानी से भी कमतर ।
मंच को अभी  भी पद्माजी से एक  बेहतरीन कहानी की  प्रतीक्षा बनी हुई है । एक पाठक की प्रतिक्रिया है । कृपया अन्यथा न ले ।

शुभरात्रि मित्रो।

सोमवार  से नई कहानियों के साथ पुनः भेट होगी ।
[05/03 17:44] Manoj Jain Madhur: 【पाठकीय- प्रतिक्रिया】
____________________
मंच(कहानी)का
मैं एक अनियमित पाठक हूँ एडमिन राजेश झरपुरे जी और संचालन टीम के प्रेम ने मुझे बाँध रखा है
प्रस्तुत कहानी फीनिक्स ने प्रारम्भ से अंत तक बांधे रखा इसकी पृष्ठभूमि में और थीम में मेरे गृह जिले शिवपुरी के प्रसिद्ध ऐतिहासिक स्थलों का जिक्र है जो वहां से जुडी यादों को तरोताजा करती है।
कहानी में विभिन्न कोण हैं और लेखिका ने अपनी दृष्टि से समाज में व्याप्त ज्वलन्त समस्या को बखूबी उजागर किया है टाइटिल को जस्टीफाई करने के लिए
लेखिका ने पाठको पर अनावश्यक बौद्धिक व्यायाम थोपा भी है जिससे बचा जा सकता था
भाषा सुगठित प्रभावी बोधगम्य है पाठक को अंत तक बांधे रहने में पूरी तरह सफल है
कहानी समसामयिक है इसलिए रोचक भी
पद्माशर्मा जी को बहुत बहुत बधाई
राजेश झरपुरे सहित पूरी टीम को आभार एक अच्छी कहानी से जोड़ने के लिए

●
[05/03 18:14] Pravesh: फीनिक्स कहानी एक सबक और आत्मविश्वास बढ़ाने वाली कहानी लगी ।कहानी की पारिवारिक पृष्ठ भूमि में माता -पिता का बेटी की शादी के लिए उदासीन रहना और बेटी को स्वयं अपने जीवन साथी तलाशने को तत्पर होना ,नया तो नही है । प्यार अपनी पसन्द और शादी माता पिता की पसंद से करने वाले दिखावे के आज्ञाकारी ,संस्कारी  लड़को से प्यार का सम्मोहन बाँध लेना ,और बाद में  धोखा खाना ।
लेकिन चलने पर ठोकर खाकर बैठ जाना नही होता ।ठोकर से सबक लेकर पुनः चल निकलना ही इस कहानी का उद्देश्य है ,जिसे लेखिका ने फीनिक्स के मिथक को लेकर बताने की कोशिश की  है ।
रुकना नही तू थकहार के ,...
अच्छी कहानी के लिए पदमा जी को बधाई ।
🙏🌹🙏
[06/03 02:49] ‪+91 98116 64796‬: पद्मा जी 'फ़ीनिक्स' अभी पढ़ी। कुछ लोग भी ज़ेहन से गुज़रे इसे पढ़ते समय, नायिका के साथ होने वाला 'यह' व्यवहार कितना ओछा लगता है — शायद है भी और शायद नहीं भी , क्योंकि बहुत संभव है कि पिता का पुत्री के प्रति स्नेह ऐसा हो कि वह उसे दूर न कर पा रहा हो ...
अच्छी कहानी है — बस पिता का कई-बार 'डिमांड क्या है' कहना/पूछना अखरा — शायद सच्ची कहानी होने के कारण ऐसा हुआ हो।
बधाई आपको और मंच संचालक आपको भी !
सादर
भरत तिवारी
[06/03 09:07] Padma Ji: भरत जो बहुत बहुत धन्यवाद।🙏🏼
आजकल तो बेटी के विवाह के लिए लड़का  ढूंढने के दौरान हर मध्यवर्गीय पिता का पहला प्रश्न यही होता है कि डिमांड क्या है ?

जो सक्षम हैं वो भी बिचौनिये से यही कहते हैं हम शादी अच्छी कर देंगे।

अभी भी पढ़ी लिखी और नौकरी में लगी लड़कियों के लिए दहेज़ बंद नही हुआ है।


Thursday, March 3, 2016


 वसो तो कागा भला ...   
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राजेश झरपुरे 
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सुबह, सुबह जैसी सुबह उस नगरी के माईनर्स क्वार्टर नम्बर 318 में सात घंटे पहले हो चुकी थी. नौतपे की सूर्य किरणें खिड़की के झरोखें से निर्भय प्रवेश कर, मिठाईलाल के बिछौने पर पसरी हुई थीं. वह मुँह ढाँककर दाँई करवट सो रहा था. पत्नी, बच्चों की सुबह और दोपहर हो चुकी थीं. हो चुकी सुबह और दोपहर के बारे में उसे नहीं बताया गया, न जगाया गया. उसके लिए यह जानना ज़रूरी भी नहीं था. उसके जीवन में कई सप्ताह सुबह नहीं होती. कई सप्ताह दोपहर और कई सप्ताह शाम व कभी रात भी नहीं होती. वह क्रमशः तीन पालियों में 8-4, 4-12 एवम् 12-8 बजे की पालियों में कोयला खदान की लम्बी-अंधेरी सुरंग में पिछले 35 वर्षों से नौकरी कर रहा था. 12-8 यानि रात पाली से आकर बेसुध पड़ा था. देह से आठ घंटे पसीना चुहाने के बाद आई थकान से उसका सोया हुआ चेहरा कुन्दन की तरह दमक रहा था. इस चमक में कोयले की कालिमा भी थी जो उसके चेहरे को और अधिक सुन्दर बना रही थीं. वह नींद में भी थकाहारा लग रहा था. इस अवस्था में चार-पाँच घंटे और पड़ा रह सकता था. पर नींद उसके ऊपर चढ़ी पसीने की परत की गंध से उचटने लगी. वह कुनमुनाने लगा. उसकी कुनमुनाहट पर पत्नी संवाद का साहस जुटा पाती अन्यथा नहीं.
वह अपने पति का बेहद ख़्याल रखती। उसकी हर बात को गांठ बाँधकर रख लेेती. जब वह संवाद हेतु उचित अवसर पा जाती तो बड़े ही मनुहार से कहती ”...उठिएजी! 4-12 का टेम हो रहा हैं।“ पर इसकी ज़रूरत कभी-कभी ही पड़ती. वह ख़ुद ही जाग जाता. उसे नींद में भी अपनी पाली की फ़िकर रहती. पैंतीस बरस की भूमीगत नौकरी में उसने एक भी दिन नागा नहीं किया. बिना किसी उचित  कारण के छुट्टी  नहीं लिया. छुट्टियाँ उसके पास अर्जित अवकाश की थैली में गले तक भरी पड़ी थी. वह बैंक में जमा धन और जमा छुट्टियों में कोई अन्तर नहीं समझता. दोनों ही नगद राशि है. आड़े समय में सब साथ छोड़ जाते हैं तब यह नगदराम ही सच्चा साथी बनकर मदद करता हैं...ऐसा उसका मानना था और ऐसा उसने देखा,सुना और भोगा भी था.आखिर वह कबीर पंथी जो ठहरा।

झरोखों से आती किरणों ने उसेे बायें से दायें करवट बदलने पर मज़बूर कर दिया. लेकिन दांईं ओर भी सूरज के छोटे-बड़े गोले बिछौने पर उछल कूद कर रहे थे. बाएं से दाएं और दाएं से बाएं की मशक्कत के बाद उसके कबिरा मन ने इस सोच के साथ उठा दिया कि ‘‘... चलो! गुज़र गई, जो गुज़रना था. अब बचे दो साल और गुज़ार लेते है. गुज़ारना नियति हैं. बिना गुज़ारे काम  नहीं चल सकता. घर चलाना हैं, परिवार पालना हैं तो खपना पड़ेगा. जो खपेगा,वही भर पायेगा. यही दुःख हैं और सुख भी.

 “मैं रोऊँ सब जगत को, मोको रोवे न कोय ।
  मोको रोवे सोचना, जो शब्द बोय की होय।।“

जो गुज़ारा उनके कांधें पर गुज़रा, जो गुज़रेगा वह भी कांधें पर चढ़कर गुज़रेगा. गुज़र जाने दो इसे भी... सोचते हुए वह उठ बैठा. भरी दुपहरी में सुबह हुई. मुँह-हाथ धुले. तुरन्त हाथ में गरम चाय की प्याली आ गई. पत्नी ने बिछौना समेटकर रख दिया. वह चाय पीने के बाद पूरे मनोयोग से खैनी मलने लगा. मली हुई खैनी की पीट पर दो-चार थपक लगाकर चूना झड़ाया. एक चुटकी अपने तलबे में दबाकर, तहमत लगा ली. खोली (क्वार्टर) के सामने आकर खड़े हो गया. यह संकेत हैं...पड़ोसी सह-कामगारों के लिए। वह ड्यूटी जाने के लिए तैयार है. आवश्यक दिनचर्या से फ़ारिग होने ही वाले हैं. उनकी इस आदत से घर और मोहल्ले में आसपास के सभी लोग परिचित थे. खैनी का लस जब उनके दिल और दिमाग में एक तरह की झनझनाहट भर देता तो वह फ़ारिग होने के लिए चल देते। इसके बाद स्नान,ध्यान. वह वर्षों से एक अगरबत्ती वाली पूजा करते चले आ रहा थे. नियमित रूप से हनुमान चालीसा पाठ के बाद चन्द मिनट हाथ जोड़कर बुदबुदाने से उनकी पूजा सम्पन्न हो जाती. इसके बाद भोजन की थाली तैयार रहती.वह सीधे रसोई में चले जाते. इसी समय घर का हरेक सदस्य उनके आसपास होता. ड्यूटी के दौरान मोहल्ले के आस-पड़ोस और रिश्ते-नातेदारों से सम्बन्धित हालचाल और सूचनायें उन्हें दी जाती. वह भोजन करते हुए बीच-बीच में अपनी राय देते . पत्नी इसी समय घरेलू ज़रूरतों की बातें करतीं. बच्चे अपनी समस्या बतलाते. वह सारी इच्छा और ज़रूरतों को समझदारी से खींचकर चादर के अन्दर लाते. और आवश्यक रकम अलमारी से निकाल लेने की अनुमति दे देते. चादर के दायरे में बंधें बच्चे ना-ख़ुश रहते पर पत्नी स्थिति को सम्भाल लेती.

वह स्वयं पढ़े-लिखे नहीं थे पर बच्चों की परवरिश पर बड़े गर्व से पैसा खर्च करते. उनका सारा ज्ञान पिता द्वारा प्रदत्त संस्कार की पूंजी था. कबीर पंथियों के बीच पले बढ़े होने के कारण उनकी समझ आग में तपे सोने के आकर्षक गहने की तरह हो गई थी. उनकी इसी समझ और समझदारी के कारण घर-परिवार के लिए उन्हें एक अच्छे पिता, पास-पड़ौस में एक शुभचिंतक और कोयला खदान में एक आदर्श और मेहनती कामगार का दर्ज़ा प्राप्त था. लोग ध्यान से उनकी बातें सुनते और गुनते.

वह अपने बच्चों की पढ़ाई पर खुले हाथ से पैसा खर्च करते और कहते “...बस! इसी एक चीज़ की कमी रह गई मेरे जीवन में. यदि दस क्लास पढ़ा होता तो आज कोयला खदान में सब्बल और गैंती नहीं बल्कि छड़ी पकड़कर खदान चला रहा होता.“
भोजन के बाद वह टी.वी. का स्विच आॅन कर बैठ जाते. समाचार देखे-सुने बिना उनका दिन पूरा नहीं होता. चाहे कोई भी पाली रहे, वह आधा घंटा अनिवार्य रूप से टी वी के सामने बैठते. उनका मानना था... हम जिस समाज में रहते हैं, उसके आसपास के वातावरण और गतिविधियों पर सदैव गौर करते रहना चाहिए अन्यथा हम पिछड़ जायेंगे. उसकी स्मरण शक्ति तीक्ष्ण थीं. उन्हें एक बार पढ़ी,लिखी और सुनी बातें कंठस्थ हो जाती थी. बच्चे उनकी उपस्थिति में यंत्रवत पढ़ते रहते. पत्नी घर के कामों में उलझी रहती. एक बार सामान जहाँ रख दिया, दुबारा उठाकर कहीं ओर रख देती फिर वहां से उठाकर उसको वहीं रख देती जहाँ वह पहले था. वह जानते थे,..उसका स्वर्ग रसोई में हैं. वह बाहर की दुनियाँ से बहुत कम सरोकार रखती थी.

वह अपनी खदान के वरिष्ट कामगार हैं...
रूफ़ बोल्टर. भूगर्भ में सदैव ऊपर देखते रहना पड़ता हैं ... सुरंग की छत की तरफ़. उसकी मरम्मत करते रहना उनका मूल कार्य था. ताकि छत सह-कामगारों के लिए छत ही बनी रहे. खनिक उसके आश्रय में निर्भय होकर उत्पादन कर सके.

जब वह कनिष्ट थे, कोयले का उत्पादन कम होता था. लोगों को बुला-बुलाकर नौकरी दी जाती थी तब भी मैनपाॅवर पूरा नहीं पड़ता था. अब वरिष्ट हो चुके और रिटायरमेंट के बहुत करीब. उत्पादन पहले से कई गुणा अधिक बढ़ गया और लगातार बढ़ता जा रहा पर नौकरियाँ खत्म हो गई. कोयले के ढेर के सामने आदमी बहुत असहाय और बौने नज़र आने लगे. पहले देने पर लोग नौकरी नहीं करते थे अब करना चाहते हैं तो नौकरियाँ नहीं रहीं. ज़माना बदल गया. ठेकेदारी में लोग कोयला खदान में बिना शर्त और अनुबन्धों के चाकरी कर रहे हैं. हरेक काम फिर चाहे रूफ़ सपोर्ट का  हो या मलमा ढुलाई का, सिविल का या फिर वेलफेयर का, साइडिंग में कोयले के ढेर से सेल-पत्थर छांटने का हो या बैगन में कोयले के लदान का...सब काम ठेके पर, सब आउट सोर्सिंग के द्वारा. जहाँ ठेकेदारी मजदूरों से काम लिया जाना वार्जित हैं वहाँ भी. काम के दाम ठेकेदार तय करता... एक सौ,ढेड़ सौ. बहुत हुआ तो दो सौ रोज़...पर इससे ज़्यादा नहीं. वे कहते...एक बुलाओ तो दस आते. एक जाता तो बीस नए लाईन में लग जाते.ठेकेदार की एक दस्तख़्वत पर ख़ुद ही खदान में काम करने की ट्रेनिंग, प्रशिक्षण केन्द्रों से प्राप्त कर लेंगे. जाॅब ट्रेनिंग के नाम पर महिने भर खदान में बेगारी कर आएंगे और सर्टिफिकेट पकड़कर उनके पास आकर खड़े हो जाएंगे.

उनके देखते-देखते गाँव, नगर और फिर नगर से शहर जैसा लगने लगा. खदानों की कार्य प्रणाली बदलती रही. वे चिमनी युग में भर्ती हुए थे. विधुतीकरण से लेकर मशीनीकरण तक का समय उन्होंने तय किया. अब कम्प्यूटर युग में रिटायर होने को आए. चिमनी युग में श्रमिक नहीं मिलते थे और कम्प्यूटर युग में श्रम कौड़ियों के दाम बिक रहा हैं.

कम्पनी उनके साथ काम करने वाले ठेकेदारी मजदूरों को आउट सोर्सिंग लेबर कहती. इनके प्रति प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से कम्पनी की कोई ज़िम्मेदारी नही होतीं. वे ठेकेदार को पहचानते हैं,मजदूर को नहीं. उनके बारे में सोचना... ठेकेदार का हैटेक हैं, उनका नहीं. इस सोच का कोई विरोध नहीं करता. उनके मजदूर-भाई भी नहीं, संगठन भी नहीं. संगठन, परमानेन्ट एम्पलाई के लिए हैं. ठेकेदारी मजदूरों के लिए वे कभी-कभार प्रदर्शन अवश्य कर देते पर अपने कुछ निज स्वार्थ के लिए.

बाज़ार और बाज़ार के मज़बूत हाथ जिस ढंग से बढ़कर सामने आए थे, उसने विरोध करने की सारी ताकतों को छीन लिया था. यह बात वह अपने अल्पज्ञान से अच्छी तरह समझते थे. उनका कबीर मन सदैव विचलित और दुःखी रहता पर उनकी करूणा को कोई समझ नहीं पाता.

“सुखिया सब संसार है जो खावे और सोवै ।
दुखिया दास कबीर है,जो जागे अरू रोवै ।।“

वह जानते-समझते थे...बाज़ार जो चाहता है, वही होता हैं. दस से बारह घंटें इनसे आसानी से काम लिया जा सकता है. ये मेहनती होते हैं. स्थाई कामगार की अपेक्षा कई गुना अधिक काम करके देते. पक्की नौकरी पा जाना अब बड़ी बात हो गई. अनुकम्पा नियुक्ति से खान में नौकरी पाने के सिवाय और कोई रास्ता नहीं बचा. ठेकेदारी में काम मिलना भी अब टेडी खीर हो गई हैं. स्थानीय ठेकेदार का टेन्डर पास हुआ तो काम मिलेगा. नहीं मिला तो बेगारी. बड़े और बाहर के ठेकेदार तो अपने साथ काम करने की मशीन लेकर आते हैं.

अपनी बेगारी और अवदशाओं के लिए वे अपनी उत्तर  पीढ़ी को  उत्तरदायी मानते हैं. राष्ट्रीयकरण के बाद उनकी सोच में एक नकारात्मक परिवर्तन आया. उनकी धारणा बनी कि एक बार सार्विस रिकार्ड में नाम चढ़ जाए, परमानेंट वर्कर हो जाए फिर काम या कर्तव्य परमानेंट नहीं होता, नाम परमानेंट होता हैं. कामगारों की इसी तरह की मानसिकता ने शनैः शनैः राष्ट्रीयकरण को खो दिया, जिसका खामियाजा नई पीढ़ी को भुगतना पड़ रहा हैं.

वह इस तरह की सोच के सख़्त खिलाफ़ रहे। वह अपने साथी कामगारों से सदैव कहते “...राष्ट्रीयकरण को प्राप्त करने के लिए हमारे पूर्वजों को जितना कड़ा संघर्ष और बलिदान देना पड़ा, उससे कहीं अधिक मेहनत,समर्पण और सेवाभाव हमें उसे बचाने के लिए देना चाहिए था. पर हम नहीं दे पाए. आज भले ही हमारे हाथ से सरकारी नौकरी नहीं छूटी पर हमारी संतानों के हाथ से यह बहुत दूर हो गई. हमारी गंदी मानसिकता का परिणाम यह हुआ कि हम प्रतिस्पर्धा में पिछड़ गए. जिस सरमाएदारी व्यवस्था का विरोध कर हम आगे बढ़े, हमारी संतान उसी का शिकार होकर रह गई. आज पूरी समाजिक व्यवस्था बाज़ार के बढ़ते हुए क्षेत्रफल और ताकत के सामने कमजोर साबित हो रही हैं. ट्रेड् युनियनस् का अस्तित्व कार्यालयों तक ही सीमित होकर रह गया हैं. हमें दुःख हैं...हम अपनी संतानों के लिए खदानों में नौकरियाँ नहीं बचा पाए.‘‘

उनकी विचारतन्द्रा टी.वी. पर दिखाई जा रही देश की आर्थिक व्यवस्था से निकल कर फिर अपनी कोयला खदान की गुफाओं के भयावह अंधेरे में समा गई. वे और उनके साथी जो आउट सोर्सिंग लेबर के समानान्तर खड़े परमानेन्ट एम्पलाई थे को सब कम्पनी का दामाद कहते. पर उन लोगों की संख्या भी अब लाखों से घटकर हज़ारों में आ गई थी. जब वे नहीं रहेंगे, उनकी जगह और कोई नहीं होगा. जो रिटायर हो गए,उनकी जगह कोई नहीं आया. आया इसीलिए नहीं कि... जो चला गया दरअसल वह था ही नहीं. उसका नाम भर था. उस नाम के प्रति कम्पनी की ज़िम्मेदारी उसे हर माह वेतन देने की थी. उनके न होने पर, कम्पनी की ज़िम्मेदारी कम हुई, सैलरी इनपुट कम हुआ, प्रोफ़िट बढ़ा. वह था तो आउट सोर्सिंग लेबर से कार्य अवधि और वर्कलोड की तुलना में कई गुणा अधिक वेतन पाता था. आउट सोर्सिंग लेबर को जितना एक साल में नहीं मिल पाता, उससे कहीं अधिक उसे एक माह में देना पड़ता था... हज़ारों रूपए. हज़ारों में कुछ ओर अधिक हज़ार बढ़ाने के लिए वह अपने साथियों के साथ मिलकर हड़ताल करता और सफ़ल हो जाता. इस तरह हज़ार के आंकड़े बढ़ते गये पर ठेकेदारी मजदूरों की हालत एक सैकड़े के आसपास ही रह कर बद से बदतर होती चली गई.

“कबीर  सोई पीर  है  जो जाने  पर पीर।
जो पर पीर न जानिई, सो काफ़िर बे पीर।।”

वह अपने ठेकेदारी मजदूरों की पीर समझते थे. वह अच्छी तरह जानते थे कि... वह और वे सब जो उनके साथ हैं, खदान में काम करने वाले अंतिम होंगे. अब खदान में नौकरी पाना और आसमान के तारे तोड़ लाना जैसी बात हो गई हैं. वह स्वयं अपने घर आँगन के एक अकेले सितारे हैं और रिटायरमेन्ट के बहुत करीब. आने वाली बरसात में उनके सितारे ज़मीन पर होंगे और उनके बाद, परिवार का कोई सदस्य सितारा नहीं बन पाएगा.

उनके दो बेटे, दोनों पढ़े-लिखे पर बेरोज़गार. बेरोज़गारी की वय को पार कर विवश, किसी व्यवसाय को पकड़ पाने की अधीरता में पिता का मुँह ताकते लाचार नज़र आते, उनके कुछ साथी अपने घर के सामने दुकान खोलकर बैठ गए. कुछ बीमा कम्पनी की आती हुई बाढ़ में नैया खैने लगे. कुछ इस उम्मीद में ठेकेदार के पास काम कर रहे कि जब कभी खदानों में भर्ती होगी, उनका अनुभव काम आएगा. उन्हें प्राथमिकता दी जाएगी. पर यह सब सपना था...वह अच्छी तरह जानते थे. इस उम्मीद में विगत कई सालों से पिस रहे ठेकेदारी मजदूर लगभग अधेड़ हो चुके हैं,जिन्हें माह में मुश्किल से पन्द्रह-बीस दिन काम मिल पाता था. मज़दूरों की कमी न रहें... इसीलिए ठेकेदार तरह-तरह की अफ़वाहें उड़ाते रहते कि जल्द ही खदान में भर्ती होने वाली हैं और अनुभवी ठेकेदारी मजदूरों को प्राथमिकता दी जायेगी. इस तरह वह मजदूरों को पलायन करने से रोके रखते और जमकर शोषण करते.

उनकी रिटायरमेंट की तारीख़ तेजी से करीब आ रही थी फिर भी वह अपनी ड्यूटी पूरे उत्साह और उमंग से करते जैसे युवावस्था में. आज भी उसी तरह वह 4-12 की पाली के लिए निकल पड़े. जबकि अन्य कामगार अपने रिटायरमेन्ट के साल-छः महीने पहले ही काम से तौबा कर अपनी खारिज की जाने वाली केज्युल लीव और सिक लीव को समाप्त करने में लगे रहते. जब वह भी खत्म हो जाती तो समय पास करने के लिए टालमटोल करते. संगठन की ताकत उनके साथ होती.

अम्बुजा खदान उनके घर से आधा किलोमीटर दूर थी. वह हमेशा पैदल जाते. घर में मोटर-साइकिल थी पर उन्होंने चलाना नहीं सीखा. बेटे चलाते पर ज़रूरत भर. उनके दिमाग में तरह-तरह के विचार चल रहे थे. पढ़े-लिखे न होने के बावजूद अपनी बड़ी सी समझ से वह इस निर्णय पर पहुँचे थे कि बाज़ार की बढ़ती हुई ताकत में पूंजी का हाथ हैं और श्रम के घटते हुए मूल्य में उसी का षड्यंत्र. वह सिहर उठे... यह गलत है. इसका विरोध होना चाहिए..? इस तरह सोचते हुए वह चले जा रहे थे कि यकायक एक नई चमचमाती बाईक का ब्रेक, बहुत अधिक दवाब से ठीक उनके पास आकर लगा. बाईक उनसे चन्द कदम आगे जाकर रूकी.
”चाचा! नमस्कार.“
नमस्कार करने वाला कामगार उनके सह-कामगार रह चुके अनोखेलाल का बेटा था. उसे अनुकम्पा नियुक्ति प्राप्त हुई. तीन वर्ष पहले पिता खान दुर्घटना में परलोक सिधार गए थे।.
”नमस्ते बेटा!“
”चलिए!” शिवलाल ने उनसे बाईक पर बैठने का आग्रह किया.
“अरे! थोड़ा पैदल भी चलना चाहिए...”
कहते हुए वह बाईक पर सवार हो गए.
 शिवलाल न मुसकराते हुए बाईक आगे बढ़ा दी.
“चाचा! फस्र्ट शिफ्ट में फाॅल हुआ.
 कल जहाँ अपन ने सपोर्ट किया था...ठीक उससे आगे डीप साईट में.
”क्या...?“ उनके मुख से आश्चर्य, आक्रोश और संताप मिश्रित कंपकंपाता स्वर निकला. पर शीघ्र ही उन्होंने अपने आपे पर काबू पा लिया. विस्मय, भय और अफ़सोस में डूबे उन्होंने बड़ी ही मासूमियत से कहा “...यह नहीं हो सकता ? क्या तुम सही कह रहे हो... किसने बताया तुम्हें...?“ उन्हें इस अप्रत्याशित दुर्घटना की उम्मीद नहीं थी.
“रामदयाल और जगन को हलकी सी चोट आई है पर झुमकलाल को अभी तक होश नहीं आया. मैं उससे अस्पताल में मिला. बच गए दोनों. छानी का किनारा ही उनके हेलमेट पर आया. वे सतर्क थे... दौड़ पड़े. पर...’’ कहते-कहते वह रूक गया. सामने से एक बड़ी गाड़ी तेजी से उनकी ओर आ रही थी. उसने बाईक को झट किनारे कर लिया.
“पर क्या...?” सब कुछ एक साथ जान लेने की भयातुर अधीरता में वह चीख  पड़े. शिवलाल घबरा गया. उसने जो देखा सुना, जल्दी-जल्दी बताने लगा “...पर तीन ठेकेदारी मज़दूर पिसकर रह गए. पूरे चिपटा हो गए. फाॅल बहुत हुआ. पूरी छानी बैठ गई. रेस्क्यू आपरेशन चल रहा हैं. बाॅडी अभी बाहर नहीं आई. बहुत बुरा हुआ चाचा...!“ कहते हुए उसकी आँख की कोर आर्द्र हो उठी. उसे खान दुर्घटना में पिता का मुर्दा चेहरा याद आ गया. पिता, पिता नहीं लग रहे थे. क्षत-विक्षत माँस का लोंदा बन कर रह गए थे. उनका टोकन नम्बर, उनके पिता होने का दावा कर रहा था अन्यथा माँ ने तो रोते-बिलखते घर सिर पर उठा लिया था ”...यह नही हो सकता! यह शिवा के बापू हो ही नहीं सकते!“ बड़े-बूढ़ों ने मुश्किल से धैर्य बंधवाया. उस वक्त़ वह पिता की मृत्यु से दुःखी था या माँ के शोकाकुल विलाप से.. यह बात वह आज तक नहीं समझ पाया. पर यह बात वह बहुत अच्छी तरह समझ गया था ’’...एक खनिक की दुर्घटना में मृत्यु होने से उससे जुड़े परिवार के सभी सदस्य मर जाते है... पुनर्जन्म के लिए पर खनिक नहीं जन्मता फिर.... और जन्मा भी तो खनिक नहीं बनता।’’ उसने कई बार चाचा यानि मिठाईलालजी को गुनगुनाते सुना था.

“पानी  केरा  बुदबुदा,  इस मानुष की जात।
देखत ही छिप जाएगा, ज्यौं तारा परभात।।”

जीवन कभी रूकता नहीं. कुछ ही दिनों में सब कुछ सामान्य हो जाता हैं पर जाने वाला कभी नहीं लौटता. शिवलाल को अनुकम्पा नियुक्ति मिली. उसने खदान में पिता के होने के एहसास को माँ से छुपाकर रखा. प्रतिदिन कार्य के दौरान वह अपने आसपास, अपने सिर पर किन्हीं अज्ञात हाथ को प्यार और स्नेह से दुलारता महसूस करता. माँ को जब दुर्घटना के बारे में पता चला, वह बहुत रोई. उसका दुःख पीड़ित परिवार के सदस्यों के लिए खुलते दुर्गति के मार्ग को लेकर था या पिता के ना होने के पुराने घाव का हरहरा जाना... वह नहीं समझ पाया था.
उसने मिठाईलालजी से कहा...“चाचा! माँ मुझे ड्यूटी नहीं आने दे रही थी. बड़ी मुश्किल से समझा-बुझा कर आया हूँ.”
“हाँ! तुम्हें नहीं आना चाहिए था. माँ के पास रहते. उसे ढाँढ़स बंधाते.” उन्होंने  अभिभावक की तरह समझाते हुए कहा और एकदम चुप हो गए. उनका दिमाग भूगर्भ में दुर्घटना स्थल की ओर विचर रहा था. वह सोच रहे थे “...लगता है सुपरवाईज़र ने बिना सपोर्ट के ज़रूरत से ज़्यादा होल दगा दिए. घर भागने की जल्दी जो रहती हैं. कोई कुछ नहीं कहता. सब एक ही थैली के चट्टे-बट्टे. बस! मज़दूर पिस रहें हैं. राजनीति हो रही हैं पर उनका कुछ भला नहीं होता.’’ वे अपने और अपने सह-कामगारों के कत्र्तव्य और दायित्व के बारे में सोचते हुए दुःखी हो उठे.
‘‘चाचा! कुछ लफड़ा तो नहीं होगा...?‘‘
’’नहीं! ऐसा कुछ नहीं होगा...!
कद की लड़ाई है !
यूनियन अपना कद पीछे नहीं करना चाहती. कम्पनी अपने कद से बड़ा कद जो उस पर भारी पड़े, देखना पसंद नहीं करती. इस तरह संघर्ष निरन्तर बना रहता है. यूनियन होड़ में रहती, कम्पनी सतर्क.  हो सकता हैं... आज यूनियन भारी पड़ जाये. कम्पनी सुपरवाईज़र्स को फंसाने और अपने अधिकारी को उबारने की जुगत भिड़ा रही होगी।’’ वह वर्षों से देखते आ रहे हैं... अधिकारियों की ताकत हर स्थिति में अनुकूलता बना लेती हैं... हाथ बढ़ाकर, हाथ मिलाकर या सामने वाले के हाथ काट कर. पर हाथ और हाथ की उंगुली कभी अपने तरफ़ उठने नहीं देती.“ उन्होंने शिवलाल की पीठ पर हाथ रखते हुए समझाया “...तुम अभी छोटे हो. तुम्हें बहुत दिन काम करना हैं. समय आने पर सब समझ जाओगे.”
आश्चर्य और भय की लम्बी छाया उसके चेहरे पर सिमट गई. विस्मय से देह में कंपन हुआ और उसने धीरे से बाईक का ब्रेक लगा दिया. वे दोनों मेनगेट से अन्दर टोकन आॅफ़िस के पास पहुँच चुके थे.
  चारों तरफ़ गहरा सन्नाटा था. कामगार छोटे-बड़े समूह में खड़े थे और दबी जुबान में  चर्चा जारी थी. सभी डरे-सहमें. यूनियन आफ़िस के सामने अधिक भीड़ थी. टाईपराइटर की खट-खट एक ही धुन, एक ही लय में प्रवाहित हो रही थी. अधिकारियों के चेहरे पर तनाव स्पष्ट झलक रहा था. वे दौड़कर कभी टोकन आॅफ़िस में घुस जाते, कभी सर्वे, कभी पिट आफ़िस में... पर सब एक साथ, एक जगह, मैनेजर आफ़िस में ही इकट्ठे होते. वे निरीक्षण की तैयारी में जुटे थे. वे अपने बचाव में दस्तावेज़ों को प्रमाणिक और विश्वसनीय बनाने की कोशिशें कर रहे थे.
मिठाईलाल ने आफ़िस में टोकन जमा किया और टिम्बरमेन की जुट्टी की तरफ़ चल पड़े. शिवलाल ने भी बाईक स्टैन्ड किया और टोकन आफ़िस कि ओर बढ़ गया. मजदूर अन्डरग्राउन्ड जाने से डर रहे थे. वे सब मोहरे के आसपास, सतह पर ही घूम रहे थे.
खान प्रागंण में दो एम्ब्यूलंस खड़ी थी. डाक्टर्स और पैरा मेडिकल स्टाफ़ की टीम मुस्तैदी से डटी हुई थी. वे सतर्क थे. अन्डरग्राउन्ड में चल रहे रेस्क्यू आपरेशन के बाद दुर्घटनाग्रस्त खनिक के सतह पर आते ही उनका कार्य आरम्भ होना था. रेस्क्यू आपरेटर्स पिट आफ़िस के सम्पर्क में थे. जल्द ही डेड बाडी बाहर आने वाली थी.
टिम्बरमेन की जुट्टी कुछ ज़्यादा डरी सहमी थी. मिठाईलाल जुट्टी के वरीय और बुजुर्ग कामगार थे. सब उनकी बात सुनते और तहेदिल से सम्मान करते थें। इस तरह की कई दुर्घटनाएं उनके सेवावधि में घट चुकी थी. उन्होंने स्थिति की नाजुकता को भाँप लिया और अपने सह-कामगारों को ढाँढ़स बंधाते हुए कहा “... दोस्तों! यही कोयलाखान का जीवन हैं. प्रकृति के विरूद्ध आचरण, पदोन्नति के लिए प्रतिस्पर्धा, हमारी हेकडी, अपने ही बीच के कुछ कामगारों का चापलूसीपन, ईमानदारों की हाड़तोड़ पिसाई और इन सबसे ऊपर निरूद्देश्य नेतागिरी और कम्पनी की हेकटी ने हमारे मुख पर कालिक पोत दी हैं. आज कोयला धधकता नहीं... सिसकता हैं. उससे लपटें नहीं उठती, आँसूओं की धारा बहती हैं. कोयले की आग और आँच को प्रतिस्पर्धा की दौड़ ने बहुत तेज कर दिया हैं. हमीं कोयला खदानों से कोयला निकाल रहे हैं और हमीं झुलस रहे हैं।“ हल्की निःश्वास छोड़ते हुए उन्होंने पछतावे की मुद्रा में कहा... जैसे कुछ गलतियाँ उनसे हुई वैसे ही बहुत सारी हमसे भी. अपने आपको कोसते हुए वह पुनः कहने लगे “पर... पर इसके लिए काफ़ी हद तक हम सभी ज़िम्मेदार हैं. हमने, अपने छोटे-छोटे स्वार्थ के लिए अपनी सबसे बड़ी ताकत राष्ट्रीयकरण के उद्देश्य को नज़रअंदाज कर दिया. हमें फिर से एकबार सृजन की बुनियाद में जाकर अपनी ताकत को पहचानना होगा. अपनी सामाजिकता और राष्ट्रीयता के अनुसार नीति और निर्देश तय करना होगा तभी खनिक की मुक्ति सम्भव हैं अन्यथा ऐसे हादसे होते ही रहेंगे और हम मूक दर्शक बने देखते रह जाएंगे.“
उनके पास किसी स्कूल-काॅलेज की डिग्री नहीं थी. गिरते-सम्भलते, बनते-बिगड़ते, समय की पाठशाला ने उनके ज्ञान और चिन्तन को एक कामगार के कद से बहुत ऊँचा कर दिया था. उन्हें समय ने ही तराश और समय ही  उन्हें बुरे दिन दिखा रहा  पर वे टूटे नहीं थे.

“सोना, सज्जन  और  साधु  टूट जुड़े सौ बार।
कुम्भित कुम्भ कुम्हार के, एक ही धक्को दरार।।“
उनकी सोच किसी कुम्हार के घड़े की तरह कच्ची या कमजोर नहीं थी. वह कोयला खान की आँच में तपकर परिष्कृत हुए थे. उनके शब्दों में कोयले की आँच थी. शिवलाल और उनके कामगार सम्बल पाकर अपने आपको, अपने-अपने डर से मुक्त  महसूस कर रहे थे. जैसे उनके इर्द-गिर्द एक सुरक्षा कवच बन गया हो. .
एक कामगार दौड़कर उनके पास आया. चाचा! चाचा!! डेड बाडी बाहर आ गई. रेस्क्यू आपरेशन ख़त्म हुआ. सुपरवाईज़रबाबू सबको बुला रहें हैं. जुट्टी के साथ वे भी पिट आॅफ़िस की तरफ़ चल पड़े.
रेस्क्यू टीम स्ट्रेट्चर में लाई डेड बाडी को लेकर एम्ब्यूलंस में सवार हो गई. मेडिकल और पैरा मेडिकल स्टाफ़ की टीम जो मोहरे पर खड़े थी, बिना कुछ किए उसमें सवार होकर उनके पीछे  चल पड़ी. एम्ब्यूलंस अपने पीछे छोड़ गई भय और उत्तेजना की उड़ती हुई धूल. भय कामगारों में था और उत्तेजना श्रमिक संगठन के नेताओं में.
कुछेक नेता पिट आॅफ़िस में पहुँचे. वहाँ पहले से कामगार, सुपरवाईज़र्स और अधिकारी मौजूद थे. कामगारों के भूमिगत कार्यों को सुनिश्चित किया जा रहा था. इसी बीच यूनियन के नेता आक्रोश में आ गए और नारे लगाने लगे।
“ मजदूर एकता जिन्दाबाद!
“ जिन्दाबाद! “ जिन्दाबाद!!“
“ कम्पनी की तानाशाही नहीं चलेगी, नहीं चलेगी!“
“ नहीं चलेगी! नहीं चलेगी!!“
जितने आवेग में नारे लगाए जा रहे थे, उतने जोश में प्रतिवाद नहीं मिल रहा था. भय में उत्तेजना नहीं जन्मती और न विवेक काम करता. यह बात कम्पनी के अधिकारी अच्छी तरह जानते थे. इसी बात का फायदा उठाते हुए कोलियरी मैनेजर छिर्पाकर भीड़ के सामने निर्भय खड़े हो गए. धैर्य और आत्मविश्वास से भरे हुए लहज़े में उन्होंने सभी को सम्बोधित करते हुए कहा “...आज जो हुआ, बुरा हुआ. एक अकेला व्यक्ति इन दुुर्घटनाओं से नहीं लड़ सकता. आप सबका साथ चाहिए. मैं तो सदैव आपके साथ हूँ. मेरा हमेशा प्रयास रहा कि कामगारों को बाल बराबर भी खरोंच न आए पर होनी को कौन टाल सकता हैं. हम सब दुर्घटना की जाँच कर रहे हैं. निदेशक साहब की टीम स्वयं जाँच करने के लिए आ रही हैं. मृतकों के परिवार के साथ पूरा न्याय होगा. उन्हें नियमानुसार मुआवज़ा मिलेगा. आप सभी जाँच कार्यवाही में सहयोग करे. आज के समय में नौकरी पर होना जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि हैं. इसे सम्भालकर रखिए.“  संवेदना में लपेटकर उन्होंने कामगारों को एक तरह से स्पष्ट चेतावनी दे डाली और सीधे अपने आॅफ़िस में घुस गए. नेता नारे लगाते रहे. कुछ कामगार अपने डर के साथ घर लौट गए पर सभी नही.

“डर करनी, डर परम गुरू, डर पारस, डर सार।
डरत  रहै  सो  उबरे,  गाफ़िल  खावे  मार।।“

वह सोच रहे थे... मजदूर, मज़दूर में कितना अन्तर होता हैं. ठेकेदारी मजदूर खान दुर्घटना में मरा तो अफ़सोस, सिर्फ अफ़सोस. परमानेन्ट के साथ हादसा हो जाए तो वह “मरे हुए हाथी कि तरह लाखों का." कम्पनशेसन, लाईफ़ कवर, ग्रेज्युटी, पी.एफ. पेंशन और परिवार के किसी एक सदस्य को एम्प्लायमेन्ट टू डिपेन्डेन्ट के अन्तर्गत नौकरी की सुविधा, दुःख उसके परिवार को एक स्वर्णिम दुनियाँ में पहुँचा देता. दो हाथ कटने से उसके परिवार में कई सोने के हाथ लग जाते. पर ठेकेदारी मजदूर के साथ हादसा हो जाए तो परिवार के हाथ सदा-सदा के लिए कट जाते हैं...ऐसा क्यों..?
श्रमिक संगठन सार्वजनिक क्षेत्रों के मोटी तनख़्वाह पाने वाले कामगारों के बीच काम करना पसंद करते. ठेका मजदूर के पास पर्याप्त काम नहीं .काम मिला तो पर्याप्त वेतन नहीं. चन्दा वे दे नहीं सकते. बिना चंदें के यूनियन नहीं चलती. दुर्घटना को लेकर वे कितने संवेदनशील और सक्रिय हो सकते हैं...सब अच्छी तरह जानते-समझते थे. वे सब मिलकर मैनेजमेन्ट को हलाकान कर अपना उल्लू भर सीधा कलना जानते थे ...

“मन मैला, तन ऊजरा, बगुला कपटी अंग ।
वसों तो कागा भला, तन मन एकहिं रंग ।।

उजरे तन, बगुली मन और सब रंगों के झंड़ों के संगठन पर ऐसा कोई नहीं जो दुर्घटना में मरे ठेकेदारी मजदूर के परिवार को कोयला खदान में स्थाई अनुकम्पा नियुक्ति दिला सके. ग्रेज्युटी या पेंशन देने के लिए कम्पनी के खिलाफ़ लड़ सके ...फिर नारेबाज़ी करने से क्या होगा...! कागा और कोयले का रंग तो राष्ट्रीयकरण के पूर्व भी काला था और आज भी हैं. उसे क्या दोष देना. उनकी जुट्टी के सभी कामगारों के मन में कुछ इसी तरह के विचार घुमड़ रहे थे. वे सब मोहरे के पास खड़े रहे. बहुत देर तक उनके बीच एक गहरी चुप्पी पसरी रही.
खान सुरक्षा सप्ताह में कम्पनी ने नोटिस बोर्ड पर सुरक्षा से सम्बन्धित पोस्टर और खान दुर्घटना केे आंकड़े पोस्टर बना कर चस्पा किये थे. मिठाईलाल को सारे आंकड़े कंठस्थ थे. एक लम्बी निसाँस छोड़ते हुए उन्होंने अपने साथियों से एक प्रश्न किया ’’...1975 की चान्सनाला खदान दुर्घटना में 375 कामगार, इसी साल महाराष्ट्र की सिल्लेवाड़ा खदान में 10 कामगार, मध्यप्रदेश में 1923 में रावनवाड़ा कोलियरी में 16 कामगार, 1953 में माजरी कोलियरी में 11 कामगार, 1960 में दमुआ कोलियरी में 16 कामगार, 1954 में न्यूटनचिखली में 62 और 1976 सुदामाडीह कोलियरी में 43 कामगार, खान दुर्घटना का शिकार हुए थे. और आज भी सुरक्षा के नियमों की अवहेलना करने पर दुर्घटनाएं हो रही हैं. क्या खदानें बन्द हुई? लोगों ने खदान में काम करना छोड़ दिया. हमारे लिए बने और सजे रूलस् रेग्यूलेशन में समय और परिस्थिति के अनुसार कई संशोधन हुए. पर दुर्घटना नहीं रूकी..? और न रूक सकती हैं..? प्रकृति के विरूद्ध आचरण ही दुर्घटना हैं...यह हम सब अच्छी तरह जानते हैं. लेकिन हमारी लापरवाही और कत्र्तव्य के प्रति उपेक्षा भी इन दुर्घटनाओं का कारण हो सकती हैं. बदलना हैं या किसी को बदला जा सकता हैं तो सबसे पहले हमें अपने आपको बदलना होगा. बिना अपने आपको बदले नारे लगाने से क्या फायदा..? इसके बाव़जूद भी नारे लगाये जा रहे हैं.‘‘ एक लम्बी निसाँस छोड़ते हुए उन्होंने पुनः कहा ‘‘...जिस दिन हम अपने आपके के खिलाफ़ लड़ना सीख जायेंगे, व्यवस्था के खिलाफ़ अपने आप लड़ना आ जायेगा. पर हम लड़ना भूल गए हैं. हमने अपने आपको को पूरा का पूरा बाज़ार में गिरवी रख दिया. समय पर किस्त पटाने की विवशता ने हमें बेहद कमजोर कर दिया. हम पानी की तरह पैसा बहाकर अनफ़िट हाना चाहते हैं. अपने अयोग्य बच्चों को अनुकम्पा नियुक्ति दिलाने की होड़ में हम उसे नपुंसक बनाने में लगे हैं. पर इस सड़े-गले सिस्टम को बदलने के बारे में कभी नहीं सोचते. हमने इन चालीस वर्षों में कभी नहीं सोचा कि हमारे साथ काम कर रहे ठेकेदारी मजदूर का क्या होगा? हम सदैव अपने आज के बारे में सोचते रहे. यही हमारी सबसे बड़ी कमजोरी रही.‘‘ कहते-कहते वह हांफने लगे. कुछ देर वातावरण में चुप्पी छाई रही फिर उन्होंने एक दीर्घ उसाँस लेते हुए कहा...’’अंधेरा ही अंधेरा हैं...कामगारों के जीवन में. उनके हिस्से की सुबह रात में ही होती हैं। सुबह, सुबह जैसी सुबह हमारे जीवन में अवसरबाज़ों से नहीं होगी. हमें लड़ना सीखना होगा... अपनी खदान और अपने मजदूर भाईयों के लिए. तभी मजदूरों की मुक़्ित सम्भव हैं.“ एक गहरी निस्वाँस छोड़ते हुए उन्होंने अपने साथियों को आगाह कराया “...अब तुम सबको सोचना हैं, तुम्हें क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए?‘‘
समूह में गहरी निस्तब्धता छा गई. सब चुप खड़े उन्हें देखते रहे. वे समझ चुके थे. उन्होंने पुनः गहरी उसाँस लेते हुए कहा ‘‘...विरोध के लिए विरोध करने से बेहतर हैं ऐसे समय में चुप रह जाना। चुप्पी में ताकत होती हैं। मजदूरों की चुप्पी तो और अधिक ताकतवर होती हैं। ज्वालामुखी के लावे की तरह। लोग लगाते रहे कयास! हम किस ओर हैं..? मैनेजमेन्ट या यूनियन साइट..? हमें प्रतीक्षा करना चाहिए। धैर्यपूर्वक की गई प्रतीक्षा से ही सार्थक विरोध सम्भव हैं. बिना तैयारी के व्यवस्था के खिलाफ़ किया गया विरोध आत्मघाती हो सकता है...‘‘ कहते हुए वे गेट के बाहर चल पड़े। उनके पीछे कुछ मजदूर साथी भी थे. वे सब अंधेरे से उजाले की ओर बढ़ रहे थे.
🔹🔹🔹🔹🔹🔹🔹🔹🔹🔹🔹
                   
राजेश झरपुरे
सम्पर्कःनई पहाड़े काॅलोनी, जवाहर वार्ड, गुलाबरा, पो.एवम् जिला-छिन्दवाड़ा  (म.प्र.480001) मोबाइल 9425837377

प्रतिक्रियाएं
✳✳✳✳
[24/02 09:51] Pravesh: कोयला खदानों में निजीकरण से प्रभावित  मजदुर  जीवन  के शोषण का  मार्मिक चित्रण है इस कहानी में ।
 सरकारी खदानों में ठेकेदारी  द्वारा  मजदूरों की  अनियमित नियुक्ति सही है या शोषण

आप भी अपनी महत्वपूर्ण राय से अवगत कराये ।
[24/02 13:37] ‪+91 94257 11784‬: आदरणीय श्री राजेश झरपुरे जी की कहानी ,'वसो तो कागा भला' कोयला खदानों के मजदूरों के त्रासद जीवन को बयां करती लंबी किन्तु मार्मिक  कहानी है ।उसका मुख्य पात्र मिठाई लाल खदान का अनपढ किन्तु पुराना और अनुभवी कामगार है । वह खदान में घटित दुर्घटना में घायल एवं मृत मजदूरों के समाचार से दुखी और चिंतित होता है । वह सोच उठता है कि अस्थाई किस्म के ठेकेदारी मजदूरों का कोई भविष्य नहीं ।उनके मरते ही  उनका पूरा परिवार ही मर जाता है  जबकि राष्ट्रीयकरण के अन्तर्गत हुए स्थाई 'मजदूर के हाथ  कटने  से उसके परिवार  में कई सोने के हाथ लग जाते हैं ।
       प्रबंधन और व्यवस्था के इस द्वैत के प्रति मजदूर यूनियनों की निष्क्रियता एवं संवेदनहीनता से मिठाई लाल दुखी है । यूनियनें  दिखावे के लिए नारेबाजी करती हैं ।एक हादसे के संदर्भ में मजदूर अपने मुहबोले चाचा मिठाई लाल से मार्गदर्शन की मांग करते हैं और तब वह कहते हैं , ' विरोध के लिए विरोध  नहीं .......बिना तैयारी के व्यवस्था के खिलाफ किया  विरोध आत्मघाती होगा ।'
 अपढ होकर भी मिठाईलाल  एक गंभीर चिंतक हैं ।उनका सोच है कि श्रमिकों की सारी समस्याओं और दुख तकलीफों का कारण तो मूलतः वे स्वयं ही हैं ।राष्ट्रीयकरण से मिली सुरक्षा एवं स्थायित्व का गलत लाभ उठाते हुए वे एक प्रकार से प्रबंधन  के 'दामाद ' ही बन गए ।वह  सौ प्रतिशत कामचोर हो गए और ठेकेदारी मजदूर व्यवस्था आरंभ हो गई तथा ये नये प्रकार के मजदूर पिसने लगे ।
     इस तरह श्री झरपुरे जी की यह कहानी खदान मजदूरों की व्यथा कथा तो कहती ही है, श्रमिकों की समस्याओं के संदर्भ में एक व्यापक सोच भी प्रस्तुत करती है।उनकी कहानी का कथ्य एक प्रकार से अछूता ही है । हो सकता है कि कहानी को महज मनोरंजन के रूप में ग्रहण वाले पाठक उसमें बहुत रुचि न ले सकें ।किन्तु कहानी मात्र मनोरंजन  का विषय तो न ही  है ।  दुखद स्थितयो का रूपांतरण भी उसके सृजन में सन्निहित है ,।श्री राजेश झरपुरे जी कहानी उसी ओर उन्मुख है ।इस दृष्टि से और उनके रचनात्मक सौष्ठव के लिए उनका अनेकशःअभिनंदन ।आदरणीया मधुजी प्रवेश जी को प्रस्तुति के लिए धन्यवाद ।
[24/02 13:58] Braj Ji: पहले भी पढने का मौका मिला है इस कहानी को..अच्छी है
[24/02 13:59] ‪+91 99771 37809‬: कहानी नहीं यह घिनौना सच है
[24/02 14:09] Pravesh: आदरणीय जगदीश तोमर जी ,ब्रज जी ,रमाकान्त जी
आभार आपका ।
वाकई यह एक कटु और मार्मिक सच को बयां करती है । विचलित करती है यह कहानी ।


तोमर सर आप हमेशा कहानी  के  अंतस को खंगाल कर मीमांसा करते हो ।इससे कहानी का पुनः पाठ हो  जाता है ।आपके सूक्ष्म अवलोकन को प्रणाम करती हूँ ।

🙏🙏🙏
[24/02 14:17] ‪+91 86290 84484‬: बहुत ही मार्मिक और कोयला खदानों में कार्यरत खनिकों की दशा का चित्रण कहानी में बड़ी साफगोई से किया गया है। ऐक उम्दा कहानी देने के लिए आप सभी का बहुत-बहुत धन्यवाद।
[24/02 16:13] प्रज्ञा रोहिणी: पहले भी पढ़ी ये कहानी फिर से बधाई राजेश जी। कोयला खदानों के इस सच से नई आर्थिक परिस्थिति के अनेक सच उजागर होते हैं। मुझे लगता है आपका उपन्यास
कबीरा आप ठगाइयेगा को आपने इसके बाद ही रचा है।
मित्रो राजेश जी का एक सार्थक प्रयास है ये उपन्यास।
[24/02 18:47] ‪+91 98260 44741‬: बहुत अच्छी कहानी। कोयला खदान, खदान में काम करने वाले मजदूर, उनका जीवन, उनकी कठिनाइयां सब के बारे में पता चला। कहाँनी अंत तक बाँधे रखती है। आजकल ऐसी यथार्थवादी कहानी बहुत कम पढ़ने को मिलती हैं। मजदूरों के शोषण का मार्मिक चित्रण। समाज के एक वर्ग के जीवन के हर पहलु से परिचय कराती कथा। बहुत बहुत आभार मंच का।
[24/02 19:08] Pravesh: विनीता जी ,शिवानी धन्यवाद

 कहाँनी में मजदूरो काे मज़बूरी में  खदानों में काम करने का  बहुत ही बारीकी से वर्णन किया है लेखक ने ।या तो उनका इस क्षेत्र से बहुत करीबी सरोकार है या बहुत गहरी पड़ताल की है ।
जो मजदुर अपना सारा जीवन इन खदानों में झोंक देते है ,यदि किसी दुर्घटना में अपाहिज हो जाय या मृत्यु हो जाय तो अस्थायी नियुक्ति होने के कारण उनके परिवार को व्यवस्थापक से सिर्फ शब्दों की सहानुभूति ही मिलती है ।
घर के मुखिया के हताहत हो जाने के बाद कोई अनुकम्पा नहीं ,pf नही ।क्या हो फिर घर के सदस्यों का ।
बहुत ही साफ़ आइना रखा है कहानी में  सरकारी और गैरसरकारी तंत्र की मिली भगत का ।
[24/02 19:21] Kavita Varma: खदान का काला सच और सरकारी नौकरी की स्वार्थी मानसिकता दर्शाती अच्छी कहानी । ये मानसिकता कमोबेश हर सरकारी महकमे में है और इसीलिये वर्क कल्चर कमजोर है संविदा नियुक्ति के द्वारा सरकार भी शोषण पर उतर आई है पर स्थाई नियुक्ति प्राप्त लोग मैं से आगे सोचना ही नही चाहते । बधाई राजेश जी आईना दिखाती इस कहानी के लिये।
[24/02 19:58] Varhsa Raval: राजेश जी बेहतरीन कहानी,कोयला खदान के अंदर चलने वाली गतिविधियों को बहुत सूक्ष्म अध्धयन के बाद चित्रित किया गया है....आपको बधाइयाँ🙏
[24/02 20:07] Pravesh: कोयला खानों का राष्ट्रीयकरण समाज में व्याप्त असमानता और सरमायेदारी व्यवस्था के विरोध में किया गया था ।1 मई 1972 को  कोकिग कोल कम्पनियों और 1 मई  1973 को नाॅन कोल कम्पनियों का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया था । आज कम्पनी  महारत्न कम्पनी से अलंकृत है पर रोजगार नही । पिछले तीस साल से कोयला खदानों  में अकुशल और अर्ध्द कुशल कामगार की भर्ती नहीं हुई जबकि खान का सत्तर प्रतिशत से अधिक काम इसी तरह के कामगार करते है पर सब ठेकेदारी व्यवस्था के तहत ।

राष्ट्रीयकरण को पूरे पचास साल भी नहीं हुए और सरमायेदारी व्यवस्था  अपना रूप बदलकर   पुःन इसे अपने शिकंजे में जकड़ती जा रही है ।क्यो और कैसे जैसी परिस्थितियों से अवगत कराती कहानी हमें सोचने के लिए विवश कर देती ।
[24/02 20:35] Aasha Pande Manch: बहुत अच्छी कहानी.कोयला खदानों में मजदूर की दशा का सटीक चित्रण किया है राजेश जी ने.बधाई
[24/02 20:40] Rachana Groaver: आज के शोषण और कल के शोषण में कोई अंतर नहीं
[24/02 20:41] ‪+91 94249 90643‬: मन मैला ,तन ऊजरा ,बगुला कपटी अंग
वासों तो कागा भला ,तन -मन ऐकहि  रंग
कहानी का शीर्षक है वासो तो कागा भला .....कहानी सच मुच ऐसे बगुला देही संगठनो के असली चेहरे बेनकाब करती है जो दावा तो ठेके पर काम कर रहे मजदूरों के हित का करते हैं लेकिन उनका असली मकसद अपना उल्लू सीधा करना होता है .
कहानी कोयला खानों के कामगारों के जीवन की एकरसता और जुझारू पन सॆ भी पाठकों को रूबरू करवाती है कि उनका जीवन कितना श्रम साध्य है जिसमें दिन और रात ने अपने मानी खो दिये हैं ....फिर भी अपने हिस्से के एक मुट्ठी आसमान की तलाश में वो संघर्ष रत रहता हैअथक , अनवरत .....
[24/02 20:43] Padma Ji: मजदूरों की मनोदशा , उनकी व्यथा और मजदूरों के अधिकारों के प्रति यूनियन की निष्क्रियता आदि का बहुत सुन्दर चित्रण किया है। कोयला खादानो पर जो साहित्य लिखा गया है उनमे यह बेजोड़ कहानी है। भाषा ,कथ्य और शिल्प सभी दृष्टि से उत्कृष्ट कहानी है। बधाई राजेश जी ।धन्यवाद मधु
[24/02 21:24] ‪+91 99313 45882‬: मुझे तो राजेश जी की यह कहानी " वसो तो कागा भला " एक उच्च स्तरीय कहानी के साथ ही एक उच्च स्तरीय विमर्श लगा ! कोयला खदानों के मजदूरों के जीवन-वृत्त पर रची बसी यह कहानी खदानों के राष्ट्रीयकरण , फिर उसके ख़त्म होकर बाजार व्यवस्था के तहत ठेकेदारी मजदूरों के श्रम के शोषण की कथा-व्यथा है ! मिठाईलाल जी के माध्यम से कथाकार ने जिस विमर्श-मूलक कथा को बड़ी खुबसुरती से रचा है उसपर कबीर-दर्शन की छाया है !
आज जब बाज़ारवाद आवारा पूंजी के जरिए अपने ख़ूनी पंजे पसारता ही जा रहा है , राजेश जी की यह कहानी हमें बहुत कुछ सोचने समझने का सामर्थ देती है !
कथ्य और शिल्प के लिहाज से भी यह कहानी एक रोचक और पठनीय कहानी है !
राजेश जी को इस कहानी के लिए बहुत बहुत बधाई !
[24/02 21:34] ‪+91 94249 90643‬: मुझे भी ऐसा लगा सतही तौर पर कहानी जो कथा कह रही है ,वो  रुहानी तौर पर बड़े ही गूढ अर्थ लिये हुए है .
[24/02 21:44] ‪+91 94116 56956‬: संभवतः मेरे पाठ की सीमायें हो या अज्ञानता पर मुझे इस कहानी में कहानी के तत्व कम और निबंध के तत्व अधिक लगे । निसंदेह कहानी का विषय और कथ्य कई मुद्दों को समाहित करता है परंतु लेखक सपाट बयान जारी करने के मूड में दिखता प्रतीत होता है । शायद इतना वृहद् विषय और मुद्दे  और बड़े कैनवास की मांग रखते हो ।
[24/02 21:58] Pravesh: इस तरह के विषय की कहनियों के लिए. कहानी की सर्वमान्य सीमाओ का अतिक्रमण भी करना पड़े तो स्वीकार किया जा सकता है ।कम से कम  हम  उन परिस्थितियों को महसूस तो कर सकते है कि nationalizatii को पाने और लगातार खोते जाने के क्या परिणाम समाज में परिलक्षित हो रहे है ।

 बाकी मंच के सुधिजन अपनी राय दे ।
[24/02 22:06] Pravesh: Nationalization*
[24/02 22:08] ‪+91 94258 70973‬: सुरेन जी के विचार से पूरी तरह सहपत हू'
[24/02 22:09] Rakesh Bihari Ji: कोयला खदानों में नियमित कर्मचारी बनाम ठेका मजदूरों की भिन्न स्थितियों और उनकी त्रासदियों पर बात होनी चाहिए। यह एक जरूरी मुद्दा है। लेकिन एक कहानी पर बात करते हुए सिर्फ विषय तक सीमित नहीं हुआ जा सकता है। कहानी यथार्थ की विधा है, बिना यथार्थ की जमीन से जुड़े कहानियाँ नहीं लिखी जा सकतीं। यहाँ तक कि शुद्ध कलावादी कहानियाँ भी तभी सफल होती हैं जब उनकी नाल यथार्थ की जमीन में गड़ी हो। लेकिन क्या कहानी सिर्फ यथार्थ है?  नहीं। कहानी हकीकत और फ़साने  का एक संतुलित सम्मिश्रण होती है। यथार्थ को कहानी में बदलने के लिए एक ख़ास किस्म की कलात्मक कल्पनाशीलता की जरूरत होती है। मैं आप मित्रों से असहमत होते हुए यह कहने की इजाजत चाहता हूँ कि आज की कहानी में इस कलात्मक कल्पनाशीलता का घोर आभाव है। यथार्थ को जस का तस रख देने के कारण एक कहानी के रूप में आज की कहानी कोई ख़ास प्रभाव नहीं छोड़ती। एक मुद्दे के रूप में इस विषय की अनिवार्यता से भला किसे इंकार होगा लेकिन कहानी को कहानी तो होना ही चाहिए। यह कहानी न सिर्फ कहानी कला से बहुत दूर रह जाती है बल्कि कई बार एकालाप, भाषण या आलेख होने का अहसास भी देती है। कहानी अपने वर्तमान स्वरुप में कहानी कम एक अच्छी कहानी का कच्चा माल ज्यादा लगती है।
[24/02 22:19] राजेश झरपुरे जी: ।।।
सभी मित्रो का हार्दिक शुक्रिया । आप सभी ने बहुमूल्य समय कहानी को दिया और प्रतिक्रिया  से अवगत कराया । शुक्रिया आद0 तोमरजी, रमाकान्त श्रीवास्तव जी, मधु सक्सेना जी.प्रवेशजी.भुपेन्द्र कौरजी, ब्रजभाई, विनय उपाध्याय जी, प्रज्ञाजी. शिवानी शर्मा जी, विनिता राहुरीकरजी.कविता वर्माजी, वर्षा रावलजी,आशा पाण्येयजी; रचना ग्रोवरजी, पूर्णिमाजी, पद्मा शर्माजी, शेखर सावंतजी, सुरेन्द्रजी,  त्रिवेदीजी, राकेश बिहारी जी। आपकी टिप्पणी  से प्रोत्साहन मिला और मार्गदर्शन भी ।

यह कहानी पहली बार ही किसी  व्हाहट्स एप समूह में यहां लगी है । कोयला खान  की पृष्ठ भूमि पर अन्य कहानी अवश्य यहां लगी थी ।

आप सब का पुनः आभार  ।
[24/02 22:43] ‪+91 99313 45882‬: जिन मित्रों को इस कहानी में कहानी कम और निबंध ज्यादा नज़र आया उसका एक कारण है ! कारण ये है कि इस विषय पर निबंध ज्यादा लिखे गए हैं इसलिए कहानी पढ़ते वक़्त उन निबंधों की धूमिल यादें ताज़ा हो आती हैं ! दरअसल इस कहानी का कथ्य एक वृहत उपन्यास की मांग करता है !
लेकिन मुझे ऐसा प्रतीत नहीं हुआ कि इस कहानी में कहानीपन की कमी है !

इस कहानी के विषय-वस्तु को हम जीवनी के रूप में भी पढ़ सकते हैं--बुजुर्ग लेखिका रमणिका गुप्ता जी की चर्चित पुस्तक " हादसे " में ! द्रष्टव्य है कि रमणिका जी का आधा जीवन धनवाद के कोयला खदानों के इर्द-गिर्द बीता है और वे कोयला खदान मजदूर यूनियन की नेता भी रह चुकी हैं ! उन्होंने बड़ी खूबसूरती से खदान मजदूरों की जिंदगी और ट्रेड यूनियन की राजनीति पर हादसे में प्रकाश डाला है ! वैसे इस विषय पर फ़िल्म भी बन चुकी है !
[24/02 22:54] Rajnarayan Bohare: उपन्यास
वो भी
कबिरा... जैसा छोटा नही
बड़ा सा उपन्यास रचने का हौसला बांधिए राजेश जी

[24/02 22:57] ‪+91 94116 56956‬: जी सही कहा आपने , पर एक डॉक्यूमेंट्री को आप फीचर फ़िल्म नहीं कह सकते । कहानी में प्रायः पात्र और परिस्तिथियाँ अपने बयां जारी करते है  । यहां इसका आभाव दिखा । वही मैंने भी कहा कि बड़ा कैनवास मांगता है इतना बड़ा मुद्दा ।
[24/02 23:37] Mamta Bajpai: व्यवस्था के चक्रव्यूह में फंसे
श्रमिकों की अंतर्व्यथा को रेखांकित करती  सारगर्भित कहानी मनके गरे तक पहुची
बधाई आभार

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