Sunday, August 19, 2018

उपन्यासनामा:भाग पांच 
कागज़ की नाव 
नासिरा  शर्मा 



नासिरा शर्मा 


रिश्तों की आंतरिक बुनावट और काग़ज़ की नाव

नासिरा जी का नया उपन्यास ‘कागज की नाव’ मानवीय जीवन की आंतरिक बुनावट के सूत्रों को बखूबी पकड़ता है, न केवल पकड़ता है बल्कि उन्हें भरपूर जीने की कोशिश भी करता है। वर्तमान मानवीय जीवन जिस तरह से खांचाबद्ध होता जा रहा है, बावजूद इसके ‘काग़ज़ की नाव’ जीवन को रिश्तों और संबंधों की आंतरिक लय में प्रस्तुत करता है। नासिरा जी अपने लेखन के आरंभ से ही भारतीय जीवन को उसकी संपूर्णता में, संबंधों की जटिल बुनावट में, रिश्तों की कड़वाहट के साथ उनकी अनिवार्यता में और यह दिखाते हुए कि रिश्तों की इस संरचना के बिना जीवन संभव नहीं है, प्रस्तुत करती रहीं हैं। वे महरूख जैसा चरित्र ‘ठीकरे की मंगनी’ में रच चुकी हैं, शाल्मली अंत तक रिश्ते को जीने और बनाये रखने के लिये प्रयत्नशील रहती है। ‘जीरो रोड’ जिस तरह से मानवीय रिश्तों को ‘तेल के कुयें की तरह ड्रिल किये जाने’ के बीच बुनता है वह बेमिसाल है। जीरो रोड में जिस तरह अरब देशों में रोजगार की तलाश में भारतीय युवा जाते हैं, और वहाँ जो नारकीय जीवन जीते हैं, ‘डॉ. जिवागो’ देखते हैं और मानवीय रिश्तों की अहमियत को पहचानते हैं उसी तरह इस उपन्यास में भी अरब देशों में पैसा कमाने गये युवा अपने परिवार को यहाँ तमाम जिम्मेदारियाँ उठाने छोड़ जाते हैं, और जीवन को विघटित होते जाने से बचाने के प्रयास में उनके बूढे़ माँ-बाप संघर्ष करते हैं वह देखने लायक है।

काग़ज़ की नाव की कहानी अमजद और महजबीं के परिवार और रिश्तों-नातों के बीच बुनी गई है। सामान्य भारतीय परिवार की यह कहानी ‘परिवार’ का केन्द्र ‘स्त्री’ के सामाजिक जीवन से अनुकूलित ‘चरित्र’ और ‘सोच’ के बीच परिवारों के बनने और बनते हुए बिगड़ने या टूटने की कगार तक पहुँचने की स्थितियों को बहुत ही सामान्य सी दिखने वाली, परन्तु महत्वपूर्ण गतिविधियों के माध्यम से उकेरती है। ‘महजबीं’ अमजद की पत्नी हैं, उसके दो बेटियाँ हैं, महलका और माजदा। अमजद का एक परिवार था जिसमें उसके माता पिता और बड़े भाई भी साथ थे पर महजबीं की मानसिक बुनावट में विघटन रचा बसा था, जिसके चलते उनका परिवार टूट गया और बड़े भाई और माता पिता विदेश में बस जाते हैं। इसी सोच के कारण महजबीं अपनी बेटियों के घर भी इसी तरह तोड़ने के लिये प्रयासरत रहती है, मगर उसकी बेटियाँ ऐसा नहीं होनें देतीं।

महजबीं एक परंपरागत अंधविश्वासी और ढेरों गलतफहमियों को शिकार है, उसने मान रखा है कि उसके निजी जीवन में अपने पति और बच्चों के अलावा किसी का हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। यही वह करती भी है। अमजद अपने घर में आये दिन के झगड़ों के कारण घर का बंटवारा स्वीकार कर लेते हैं और अपनी पत्नी और बेटियों के साथ अलग रहने लगते हैं। पर महजबीं को अपने पति की मानसिक पीड़ा और तकलीफ का अहसास नहीं होता। वह तो अपनी मर्जी और संपत्ति की मालिक बनकर रहने का ख्वाब पाले हुई थीे जो वह पूरा करती है। परंतु बाद में उसे अहसास हो जाता है कि वह गलत थी। यह अहसास कोई सामान्य सी हृृदय परिवर्तन की घटना नहीं है। नासिरा जी ने जीवन को इस तरह रचा बुना है कि अमजद की खामोशी और छोटी बेटी माजदा के सकारात्मक प्रयास महजबीं को अपनी विघटनकारी सोच के प्रति पश्चाताप और प्रयाश्चित की आग में जलने को विवश कर देती हैं।

महजबीं अंधविश्वास की गिरफ्त में है। जादू-टोने, मूठ मारने और गंडा-तावीज के द्वारा पुरुष को अपने बस में रखना, सास ससूर को बीमार करना, परेशान करना, बेटी की ससुराल में भी यह सब करने के लिये वह ओझा-आमिलों के चक्कर लगाया करती है। जैसा कि नासिरा जी ने लिखा है कि शहर की अधिकांश औरतें इनके चक्करों में फंसी हुईं हैं। - ‘‘महजबीं इस शहर की अकेली औरत थोड़ी थी जो जादू टोने से अपने हालात सुधारने की कोशिश में जुटी थी। पूरा शहर न सही मगर आधे शहर की औरतें खुदा और ईश्वर से ज्यादा आमिलों और ओझाओं के रिश्में और जादू टोने पर यकींन रखने लगीं थीं क्योंकि उन्हें मियां के दिल पर हुक्मरानी और ससुराल वालों के दिल जीतने की जगह मियां की कमाई पर कब्जा करने की तमन्ना थी ताकि वह खुलकर अपनी मर्जी से जी सकें। इस सोच में अनपढ़ से ज्यादा पढ़ी लिखी महिलायें शामिल थीं। जो अब किसी प्रकार का अत्याचार, अंकुश और जकड़न सहन करने की क़ायल नहीं रह गईं थीं।’’1  








मानवीय रिश्तों की द्वंद्वात्मकता को और अन्तर्विरोधों को बखूबी उभारा है नासिरा जी ने। महजबीं और अमजद के बीच छोटी बेटी माजदा के विवाह को लेकर जो बहस होती है उसमें इन दोनों के रूप दिख जाते हैं। महजबीं अपनी बेटी के ससुराल में गंडा तावीज के माध्यम से उसका वर्चस्व स्थापित करने के लिये उसे उकसाती है, परन्तु माजदा जब इससे इंकार कर देती है तो अमजद को भी अपने पति और पति होने का अहसास जागता है और वे माजदा को अपने विचारों का प्रतिनिधि कहते हुए उसे बेटे के बराबर होने का दर्जा देते हैं। वे अपनी पत्नी को अहसास दिलाते हैं कि तुम अपनी बेटी का घर बरबाद करने पर तुली हो। इस बहस में जो बात साफ उभरती है, वह यह कि महजबीं अपनी बेटी को सुखी देखना चाहती है, इसके लिये वह ससुराल के लोगों पर जादू टोने से उसका अधिकार करवाने का रास्ता अख्तियार करना चाहती है। उधर अमजद भी बेटी को सुखी देखना चाहते हैं, परन्तु इसके लिये वे रिश्तों की साफ और खुली समझ को पेश करते हैं, और इसके लिये वे बेटी के विचारों से सहमत हैं। यही द्वंद्वात्मकता है कि दोनों ही बेटी को खुश देखने के लिये प्रयत्नशील है, परन्तु अन्तर्विरोध यह है कि दोनों ही अलग रास्ते अपनाते हैं। पूरी कहानी में इसी तरह रिश्तों के बीच के अन्तर्विरोध और द्वंद्वात्मकता उभरती है। अमजद मियां रिश्तों को मानवीय संवेदना और स्थितियों में देखने और जीने के विचारों के प्रतिनिधि है और उनकी तरह ही उनकी छोटी बेटी माजदा उनके विचारों को अपनाती है। दूसरी ओर रिश्तों पर अधिकार और वर्चस्व की सोच से बंधी हुई महजबीं है जो अपने और अपनी बेटी के अधिकारां और परिवार पर पूर्ण अधिकार के लिये अंधविश्वास और टोने टोटकों की शरण में जाती है।
स्त्रियों के मन की अस्थिरता और अधिकारहीनता की स्थिति का फायदा समाज में अंधविश्वास फैलाने वाले उठाते हैं और उनके परिवार तोड़ने के लिये किये गये प्रयासों से आर्थिक लाभ भी कमाते हैं और उनके प्रभुत्व में वृद्धि भी होती है। हमारे समाज की यह सबसे खतरनाक बुराई है जिसके कारण मानवीय रिश्ते और मानवीय गरिमा को निरंतर विखंडित होना पड़ता है। अंधविश्वास और जादू टोने मानवीय जीवन और रिश्तों का तार तार किये हैं। इनकी गिरफ्त में स्त्रियाँ अधिक आसानी से आ जाती हैं। स्त्रियाँ अपने जीवन से और अपनी छोटी सी दुनिया से बहुत गहरे तक प्यार करती हैं, वे किसी भी कीमत पर उसे खोना नहीं चाहतीं हैं। यही कारण है उसकी सुरक्षा और सुख के लिये वे गलत रास्तों पर चलने लगती हैं। महजबीं भी अपने बच्चों और पति से बहुत प्यार करती है और स्वयं अपने से भी। इस छोटी सी दुनिया को सुखी बनाये रखने के लिये उसे लगता है कि उसके ससुराल के अन्य सदस्य और उसकी बेटियों के परिवार के अन्य सदस्य उनके सुख और स्वतंत्रता में सबसे बड़े बाधक हैं। महजबीं इन बाधाओं का हटाने के लिये जिन रास्तों पर चलती है, नासिरा जी ने उन्हें इस उपन्यास में प्रस्तुत किया है। इस तरह की वैयक्तिक सुखों की तलाश में रिश्तों को तहस नहस करने के प्रयत्न मानवीय जीवन में बुरी तरह व्याप्त हैं।

महजबीं की चेतना का जो आंतरिक विघटन होता हुआ दिखाया गया है उसके मूल में उसका जीवन के प्रति बेइंतेहा प्यार है। यह प्यार ही है जो वे अपने पति की आत्महत्या की धमकी के बाद पिघल जाती हैं और अपनी बेटी माजदा को उसके अपने तरीके से जीने की आजादी दे देती हैं। वे पश्चाताप में भर कर कहतीं हैं - ‘‘तेरी माँ, तेरी दुश्मन नहीं है, ममता में  अंधी होकर मैं गलत तौर तरीक़ा अपना बैठी थी। खुदा की बारगाह में गिरकर उनसे अपने गुनाहों की माफी मांगूंगी मगर पहले, हाँ पहले मैं तेरा शुक्र अदा कर दूं जो तूने दोजख की आग में जलने से बचा लिया। सही कहते थे अब्बा मरहूम कि बचपन में जिस तरह जवान माँ-बाप बच्चों को चलना, बोलना सिखाते हैं, सही और गलत की समझ देते हैं, ठीक उसी तरह जवान होकर बच्चे बूढे़ माँ-बाप की देखभाल कर उनको सेहतमंद सोच देते हैं।’’ इतना कहकर महजबीं ने माजदा का माथा चूमा।’’2 

महजबीं की ससुराल के प्रति जो सोच बनी उसका भी ठोस कारण है। यद्यपिज  वह अपने घर से ससुराल के लिये बिदा ले रही थी तो उसकी माँ ने उसे जो सलाह दी थी, वह इंसानी रिश्तों को निभाने और बनाये रखने की थी। उसकी माँ ने कहा था कि - ‘‘उन्हें याद आया ज बवह विदा हो रही थी भय और सवालों में उलझी हुई थी, उन्हें माँ की सीख सुनाई पड़ी थी, महजबीं, ससुराल में सबकी खिदमत करना, सास ससुर को माँ बाप समझना और कड़वे घूंट को शरबत की तरह पीना..........’’3
इस सीख पर महजबीं ने माँ को शिकायती नजरों से देखा था और मन नही मन कसम खाई थी - ‘‘हरगिज नहीं.....कभी नहीं।’’4
.ऐसा क्यों हुआ? महजबीं अपने माँ की सीख के उलट क्यों चली? इसकी वजह थी उसकी बुआ की ससुराल में दुर्दशा और जहर खा कर आत्महत्या करना। इस घटना ने उसके अंदर ससुराल के प्रति जहर भर दिया और उसकी चेतना में यह बात बैठ गई थी कि ससुराल और ससुराल वाले बहुओं के दुश्मन होते हैं तो उसे भी दुश्मनों की तरह उनके साथ व्यवहार करना है। इस घटना से नासिरा जी ने एक मानवीय अवचेतन के मनोविज्ञान को उकेरा है कि किस तरह एक नकारात्मक घटना बच्चों के मन के अंदर से रिश्तों की कागज की नाव को धुंआ की घुटन से भर देती है। इस एक घटना ने महजबीं के पूरे जीवन को तहस नहस कर दिया - ‘‘उन्हें माँ और बाप से शिकायत थी कि उनके न चाहने पर भी उनकी शादी कर दी और अब उसे दकियानूसी सोच दे रहे हैं। फूफी का बदला लेना है। इन ससुराल नाम के इंस्टीटयूशंस से बगावत करनी है। जहर खाकर फूफी की तरह मरना नहीं.....मरना नहीं। तब उनके आंसू अचानक रूक गये थे। उनके अंदर के भय की जगह एक तरह का विश्वास उभरा था।’’5 







उसने न केवल अपने परिवार को विखरने पर मजबूर कर दिया बल्कि अपनी बड़ी बेटी महलका को भी यही सब सिखाया। इसके बाद अपने छोटी बेटी माजदा को भी वह यही सिखाने जा रही थी, पर माजदा ने इसे अपनाने से इंकार किया और उसके इंकार में उसके पिता अमजद भी शामिल हुऐ तब कहीं महजबीं की चेतना में रिश्तों की अहमियत जागी। महलका महजबीं की बड़ी बेटी का पति विदेश में कमाने गया हुआ है, घर में उसके ससुर, एक नौकर गोलू, दो बेटे और बेटी हैं। पर महलका ने भी अपने ससुर के साथ गैर इंसानों जैसा व्यवहार अपना रखा है। उनकी पत्नी और जवान बेटी अल्लाह को प्यारी हो चुकीं है, बेटा बाहर है तो ज़हूर मियां एक दम अकेले और महलका की महरबानियों पर जिंदा हैं। उनके जीने का मकसद ही जैसे खत्म हो चुका है। इस स्थिति में जब महलका के माँ-बाप उसके घर आते हैं और सबसे पहले ज़हूर मियां से मिलने जाते हैं तो उनकी दुर्दशा देख अमजद मियां तरस खा जाते हैं। उनके अंदर ज़हूर मियां की दशा देख जो एक इंसानी लगाव उभरा था वह नासिरा जी की रिश्तों की कहानी को बयां करता है।

अमजद उनके कमरे के घुटन भरे माहौल से उनको बाहर निकालने के लिये कहते हैं कि कुछ देर बाहर दालान में बैठा जाये तो नासिरा जी ने ज़हूर मियां की जो प्रतिक्रिया दी है वह कैदी होने के बोध को हमारे सामने व्यक्त करती है, अमजद मियां कहते हैं कि -
‘‘अगर आप पसंद करे तो कुछ देर के लिये बाहर दालान में चलकर बैठते हैं।’’ अमजद ने ज़हूर मियां से आग्रह भरे लहजे में कहा।
‘‘अम्मा मना करेली।’’ गोलू झट से बोल उठा।
ज़हूर मियां का सिर इतना झुका कि सीने से आ लगा।’’6 

इस वाक्य में एक बूढे़ पिता, एक ससुर, एक दादा की वास्तविक स्थिति को उकेरा गया है। उनकी मानसिक स्थिति यह थी कि जैसे वे स्वयं ही अपने प्रति अपराधी हैं। जबकि वे शिकार थे, उनका बेटा लाखों रुपया कमा कर भेजता था, पर उनकी दशा विचित्र थी। अपनी लड़की के ससुराल में महजबीं की मानसिक स्थिति का जो परिवर्तन दिखाया है, वह रिश्तों के प्रति सकारात्मक सोच का प्रगट करता है। महजबीं ने महलका के ससुर का कमरा साफ किया उसे इंसानों के रहने लायक बनाया और अमल की पुड़िया और पानी को पेड़ों की जड़ों में डाल कर अपनी बेटी से कहा कि - ‘‘अब अमल की चीजों की नहीं आमाल ठीक करने का वक्त है।’’ यह परिवर्तन हम पूरी कहानी में देखते हैं।
महलका अकेली है, उसका पति विदेश में है, यहाँ वह राशिद नामक युवक से नये रिश्ते में जुड़ गई है और वह उसके पैसे के पीछे उससे संबंध बनाये रखता है। ज़हूर मियां इसके संबंधों का जानते हैं, पर मन मसोस कर रह जाते हैं, उसके इन संबंधों की खबर उसकी माँ को भी है जो बाद में उसको समझाती है कि तीन बच्चों की माँ से कोई युवक प्रेम नहीं करेगा, सिर्फ इस्तेमाल करने के लिये तुम से संबंध बनायेगा - ‘‘तेरी अक्ल घास चरने गई है? एक कुंवारा जवान एक ब्याहता, वह भी जीन बच्चों की माँ से मुहब्बत नहीं करता, फायदा उठाता है। अपना मतलब और आराम तलाश करता है। इतनी भी समझ तुममें नहीं रही महलका?’’7
इस तरह महजबीं उसे सही रास्ते पर लाती है। कागज की नाव के केन्द्र में महजबीं है। चारों तरफ के रिश्तों और कहानियाँ के सूत्र महजबीं से आकर जुड़ते रहते हैं। इस तरह रिश्तों का एक पूरा महाकाव्य रच दिया है नासिरा जी ने।
महजबीं का पश्चाताप दूसरी बार, पहली बार माजदा को लेकर अमजद और उसके बीच हुई बातचीत में खुला था, महलका के सामने इस तरह खुलता है, - ‘‘मैंने तुम्हें कई बातों में गलत मशविरे दिए, वह मेरी ममता की खुदगर्ज़ी थी। अब मेरी आंखें खुल चुकी हैं। जैसे मैंने अपनी गलती मान ली है, अब तुम भी मान लो और तौबा करो। तौबा का दरवाजा हमेशा खुला रहता है। उस नेक बंदे को जो तुम्हारे शौहर का बाप है उसकी खिदमत कर अपना कफ़फ़ारा अदा करो वरना मैं तुम्हें दूध बख़्शने वाली नहीं हूँ, यह मेरा आखि़री फै़सला है।’’8

महजबीं के परिवार की कहानी के साथ कुछ अन्य रिश्तों और मानवीय संदर्भों की कहानी भी इस उपन्यास में चलती हैं। महलका की ननद की उसके सुसराल में मौत हो जाती है। शगुफ़्ता पर उसकी सास के द्वारा अपने ही बेटे के लिये अमल करवाया जाता है। शगुफ़्ता की ननद और सास मिलकर उसकी मौत या आत्महत्या की वजह बनतीं हैं। उन्हें जेल भी होती है पर चूंकि शगुफ़्ता का भाई यानि महलका का शौहर विदेश में है तो कोई केस लड़ने वाला नहीं होता है, वे छूट जाते हैं। उसके बाद उनका बेटा भी मृत्यु को प्राप्त हो जाता है। इधर उसके छोटे भाई की बीबी शीरीं पर प्रतिबंध लगा दिये जाते हैं कि वह मायके नहीं जायेगी और घर में कोई उससे मिलने नहीं आयेगा। शीरीं घुटन भरी जिंदगी जीने को विवश है। अंत में वह अपने शौहर के पास मुंबई चली जाती है। उसकी ससुराल में जो मानसिक स्थिति थी उसे लेखिका ने इन शब्दों में उकेरा है - ‘‘यह कैसी जिंदगी है? उसे अपनी माँ पर भी गुस्सा आ रहा था कि ऐसे घर में उसे जलती आग में झौंक दिया, वह भी गीली लकड़ियों के साथ जो न पूरी तरह सुलगती है और न ही उसे पूरी तरह जलाकर राख करती हैं। इस अधजली कैफ़ियत से उसे दूर भागना है.....दूर चाहे जैसे भी हो।’’9
इस तरह एक लड़की अपने ही घर में जिस तरह घुटन और जलन महसूस करती है, उसे बड़ी ही खूबी से चित्रित किया है नासिरा जी ने रिश्तों की अजीब सी स्थितियाँ पैदा होती हैं। हम देखते हैं कि हर घर में, प्रत्येक परिवार में आग लगी है। कहीं बहू जल रही है, सास ससुर, ननद उसे जला रहा है, तिल तिल कर मरने पर मजबूर कर रहे हैं, तो कहीं बहुयें सास ससुर को उसी तरह मरने को विवश कर रहीं हैं। सुख चैन की जिंदगी तो जैसे दुनिया में है ही नहीं। इस सबके पीछे रिश्तों में प्यार की जगह पैसा, अघिकार, वर्चस्व जैसे मूल्यों को बैठ जाना है। धन-पैसों पर वर्चस्व बनाये रखने के लिये इंसान अपने दूसरों का जीवन तबाह करता है और साथ स्वयं का अमन-चैन भी छिन जाता है।
नासिरा जी ने बहुत खूबी से पुरुष चरित्रों को कुछ अधिक मानवीय और इंसानी रिश्तों को गहराई से समझने और अनुभव करने वाला दिखाया है। इसके नायक अमजद, ज़हूर मियां और क्रांति झा जैसे पुरुषों के जीवन में देख सकते हैं। अमजद मियां का चरित्र अनौखा है। वे अपनी बीबी महजबीं की तमाम ज्यादतियाँ सहन करते हैं। यहाँ तक उनकी परिवार टूट जाता है, बड़े भाई और उनका परिवार तथा माँ-बाप सब विदेश जा कर बसने को मजबूर हो जाते हैं, यह सब महजबीं के व्यवहार के कारण होता है। परन्तु अमजद मियां अंत तक महजबीं का साथ नहीं छोड़ते और अन्ततः हम देखते हैं, उनके सहनशील व्यक्तित्व की जीत होती है। महजबीं के जीवन और जीवन के प्रति उसकी गलत-नकारात्मक सोच में परिवर्तन होता है।
 वह न केवल स्वयं की जिंदगी को सवांरती है बल्कि अपनी बेटी महलका और माजदा के जीवन को भी सही दिशा और राह दिखाती है। महलका को राशिद जैसे इंसान के साथ संबंधों की सच्चाई का अनुभव कराती है। उसके ससुर के साथ उसके शौहर को भी प्यार करना सिखाती है। जीवन को रिश्तों के प्रति भरोसे मंद बनाने में और अंत में अपने मियां को उनके परिवार से मिलने जाने के लिये की स्वीकृति भी देतीं हैं। महजबीं स्वयं अपने शौहर के बारे में सोचती हैं -
‘‘यह शख्स अपनी बनावट से मजबूर है। अपना हो या ग़ैर हर एक के साथ नेकी भरा बर्ताव करता है। बदले और गुस्से के पागलपन से कोसों दूर और एक मैं हुँ, जरा सी बात नागवार गुजरी नहीं कि फ़लीते की तरह सुलग उठती हूँ। सामने वाले को नेस्तनाबूद करने पर तुल जाती हूँ। कितना भी जब्त से काम लूं मगर आतिश फिशां को फटने से रोक नहीं पाती हूँ।’’10

फिर वे आत्मालोचन करती हैं, यह आत्मालोचन इंसानी रिश्तों की खुशबू से पैदा होता है। वे सोचती हैं - ‘‘यह असद और जलन का जज़्बा कब मेरे अंदर सूखेगा और मैं बिना किसी तकलीफ के जी सकूंगी। अपनी बेटी खुश है ससुराल में तो बुरा लग रहा है। सास सुसर उसे इज्जत दे रहे हैं, तो कोफ्त हो रही है। अरे डायन भी सात घर छोड़ देती है और मैं डायन से भी सौ कदम आगे अपनी बेटी का घर जलाकर राख कर देने की सोच रही हूँ। सिर्फ इतनी सी बात पर वह मेरा फोन नहीं उठाती। मुझ से खुलकर बात नहीं करती है। या खुदा, मुझे तूने औरत क्यों बनाया। अगर यूं मेरी बनावट में ज़हर मिलाना था तो बना देता बिच्छु या सांप।’’11

मानवीय रिश्तों की विवधिता और उनके बनने बिगड़ने के कारणों के प्रति पूरा उपन्यास सचेत करता है। जीवन बहुत बारीक धागों से बुना हुआ होता है। जरा सी लापरवाही में वे उलझ जाते हैं, और कई जिंदगियाँ तबाह हो जाती हैं। जीवन के इन बनते बिगड़ते संबंधों के पीछे धन एक बहुत महत्वपूर्ण कारण है। पैसा है तो भी रिश्ते टूटते हैं, और नहीं है तो भी टूटते हैं, या बन ही नहीं पाते। नासिरा कई स्थलों पर इस बात को विवेचित करती हैं कि पैसा कमाना अलग बात है, गरीबी तो अभिशाप है ही पैसा होना भी जीवन को मनहूस बना देता है। हमारे समाज में अतिरिक्त समृद्धि और अतिरिक्त गरीबी दोनों ने जीवन को विखंडित किया है। पूरा बाजार विदेशी वस्तुओ और विदेशी पैसे के कारण अलग ही राह पर चल रहा है। इससे रिश्ते भी बदल रहे हैं और मानवीय संबंध भी। पूरा देश इस स्थिति से तबाह हो रहा है। लेखिका चिंता जाहिर करती हैं -

‘‘इस शहर को बाज़ार ने बिगाड़ा है और बाज़ार आया कहाँ से? बात सिर्फ पैसे की है। हमारा यह इलाका पैसे का लालची हो चुका है। बाहर का आया पैसा जो हमारे मर्दों के खून-पसीने की कमाई है, उनकी कुर्बानी और तन्हाई का निचोड़ है। वह अपनी जगह से चल हमारे बैंकों में जब पहुँचता है तो कभी दु    गुना तो कभी चौगुना हो जाता है। उस मेहनतकश इंसान के कुनबे वाले उससे सिर्फ पेट नहीं भरते हैं बल्कि अय्याशी में लग गये हैं। गुलछर्रे उड़ाते हैं। इस पैसे ने हमारे रिश्तों में दरारें डाल दी हैं। माँ हो या बाप, भाई हो या बहन, सास हो या ससुर, नंद हो या फूफी, सब सोने के अंडे देने वाली मुर्गी को अपना बनाकर रखना चाहते हैं, कोई लुतरेपन से तो कोई भुस में चिंगी डालकर तो कोई शैतानी अमल करवाकर। और मारा जाता है वह इंसान जो रात दिन मेहनत करता है अपने ख़ानदान के लिये ताकि सारे लोग घर के पढ़ सकें, साफ सुथरे घर में रह सकें। माँ का इलाज हो सके, बाप की आंख खुल सके, बहन की डोली उठ सके और रहन पड़ी जमीन छूट सके.........’ अमजद के दिमाग के सारे दरवाजे खुल चुके थे। वह चुपचाप जाकर कुर्सी पर बैठ गये।’’12

 नासिरा जी ने इस विदेश से आये पैसे के प्रति जो रुख प्रस्तुत किया है वह आज की भारतीय राजनीति और अर्थनीति की समीक्षा भी मानी जा सकती है। हमारा पूरा ध्यान पैसे के आने पर है, परन्तु यह पैसा जब आता है तो उसके साथ उसकी बुराइयाँ और विघटन भी आता है। कमाने वाले इंसान के प्रति वे लिखती हैं - ‘‘वही आदमी एक तरफ घरवालों से गन्ने की तरह चूसा जाता है तो दूसरी तरफ अपने मालिकों से .....पूँजीपतियों को मुनाफा चाहिये और.....।’’13 
जीरो रोड में भी उन्होंने इसी तरह की बात कही थी कि ‘विदेश में अरब देशों में इंसान रेत के कुयें की तरह ड्रिल किये जाते हैं और तेल निकलना बंद हो जाये तो रेत से भर दिये जाते हैं।’’ यह एक महत्वपूर्ण अध्ययन है नासिरा जी का। पैसे के प्रति हमारी हवस और महत्व ने इंसान को रेत की तरह रूखा बना दिया है। इंसानी संवेदनशीलता, रिश्तों की गर्माहट और संबंधों की उष्मा को समाप्त कर दिया है।

इंसानी रिश्तों का दूसरा पहलू इस उपन्यास में हमें माजदा के ससुराल में देखने को मिलता है। माजदा इंसानी रिश्तों को जीना जानती है और उन्हें समझना भी। उसमें अपने पिता की छाप है। रिश्तों को निभाना और सम्हालना उसे आता है। उसकी सास और सुसराल एक मानवीय संबंधों की सकारात्मक बुनावट को दिखाते हैं। नासिरा जी ने यह बताया है कि जीवन में अभाव और गरीबी हमें ज्यादा इंसानियत देती है। माजदा की सास उसे अपने परिवार के संबंध में बताते हुए कहती है कि वह जब विवाह करके यहाँ आयी थी तो घर परिवार की हालत बदतर थे, पर वे सब एक गरीबी और अभाव के धागे से बंधे थे। उनमें प्यार और दुश्मनी के लिये समय ही नहीं था। वे अपनी परिस्थितियों में अपने अस्तित्व की लड़ाई को जीतने में इतने मश्गूल थे कि इन बेकार की बातों के लिये किसी के पास समय नहीं था।







‘‘प्यार और दुश्मनी के लिये इस घर में तब किसी को फुरसत न थी। हम साथ-साथ मेहनत करते और थककर सो जाते थे। भूखे पेट को भरने के लिये हमें एक दूसरे पर भरोसा करना पड़ता था। एक दूसरे का सहारा बनना पड़ता था। ऐसे मौकों पर लोगों के दिलांे में एक दूसरे के लिये दर्द उभरता था। इसे लगाव कहो या भरोसा, हमारे बीच बहुत गहरा था।’’ इतना कह सास चाय का घूंट भरने लगीे।’’14

माजदा और सास के संबंधों के माध्यम से नासिरा जी ने रिश्तों की नई संभावनाओं को तलाशा है और परिवार के बीच की नई इबारत को लिखा है। यदि जीवन में अभावों को साथ साथ जिया गया हो और भरोसे के साथ रिश्तों को देखा गया हो तो जीवन स्वर्ग बन जाता है। माजदा की सास उससे कहती है - ‘‘चाहती हूँ तुम इस घर को बड़े चाव से संवारो। जो चारों तरफ हो रहा उसकी नकल न करना। ये सब बड़ी ओछी हरकतें हैं। यहाँ का सब कुछ तुम्हारा है, मैं भी और बेटा भी। छीना-झपटी का कोई मतलब नहीं है। जीतोगी तो अकेली हो जाओगी। हारोगी तो हम सबकी बनकर रहोगी और वही तुम्हारी असली जीत होगी।’’15 

माजदा की सास और उनकी जीवन के प्रति सोच इस समाज के लिये बहुत आवश्यक है, अनिवार्य है। वे माजदा को जीवन के विविध तरह के लोगों और उनके घर तोड़ने वाली साजिशों के प्रति आगाह करती हैं। वे कहती हैं उनके ससुर ने उन्हें तालीम देना आरंभ किया उस वक्त जब परिवार की स्थिति सुधरने लगी थी। वे कहती हैं कि परिवार कैसे बनता है? यह जानना माजदा को जरूरी है ताकि परिवार की नींव के प्रति गहरी निष्ठा पैदा हो और दूसरों के बहकावे में ना आये वह।

माजदा की सास कहतीं हैं - ‘‘यह सब बताना तुम्हें जरुरी था ताकि तुम जान सको के इस घर की बुनियाद तुम्हारे बुजुर्गों ने अपने खून पसीने से डाली है, जिसमें मुहब्बत और रिश्तों की कसावट का हमेशा ध्यान रखा गया। इसलिये उस घर की नींव को खोदना मुनासिब नहीं है। इस घर को हमें एक मिसाली घर बनाना है ताकि चारों तरफ फैली जिहालत, तंगनज़री, जलन, हसद के अलावा भी हमारे आस-पास वालों को कुछ दिख सके कि अरे इस रास्ते पर चलकर भी आदमी कामयाब हो सकता है। याद रखो अकेला पैसा तहजीब नहीं लाता है, कलह लाता है। खुदग़र्ज़ी और दुश्मनी लाता है। आज हमारा शहर, हमारे लोग उसकी चपेट में आ गये हैं। पैसे के लालच ने उन्हें अंधा बना दिया है। अपने खून के रिश्तों के खि़लाफ़ खड़ा होना सीख गए हैं। तुम ऐसा हरगजि न करना। मुझे तुम पर पूरा भरोसा है। फिर भी तुमको ये बुनियादी बातें बताना और समझाना जरूरी समझती हूँ।’’16
परिवार और रिश्तों की आंतरिक बुनावट को उसकी वास्तविक और मजबूत नींव को इस एक पैराग्राफ में नासिरा जी ने व्याख्यायित कर दिया है। पूरे ‘कागज की नाव’ की जान है यह पैराग्राफ। बहुत गहरी मानवीय सोच और शिक्षा माजदा को मिलती है और माजदा के माध्यम से पूरा समाज इस शिक्षा का ग्रहण कर सकता है।
रिश्तों की खुशबू किस तरह फैलती है? और रिश्तों में पैदा की गई कड़वाहट और दुर्गंध भी कैसे फैलती है? इसके बहुत मार्मिक चित्रण उपन्यास में देखने को मिलते हैं। यही नासिरा जी की रिश्तों की बुनियादी समझ की विशेषता भी है। वे जानती हैं कि नफरत और दुर्गंध से भरे इस माहौल में एक फूल भी यदि सुगंध दे सकता है तो उसकी खुशबू पूरे जहाँ में फैलनी चाहिये। वे ऐसा करती भी हैं।
माजदा सास के साथ अपनी संवेदनशील मुलाकात के बाद अपनी माँ को फोन करती है और जो वह अपनी माँ महजबीं से कहती है, वह भी सोचने विचारने पर मजबूर करता है। वह कहती है कि - ‘‘यहाँ का माहौल बिलकुल अलग है मम्मी। सब मेरा बेहद खयाल रखते हैं। आज मैं देर तक सोती रही तो अम्मी ने नाश्ता नहीं किया। मेरे इंतजार में तब तक भूखीं रहीं जब तक मैं नींद से जागी नहीं। हमने साथ नाश्ता किया। उन्होंने मुझे अपने बारे में बताते हुये कुछ नसीहतें कीं जो मैं हमेशा याद रखूंगी। आपको कैसे और क्या बताऊँ, वे कितनी सुलझी और समझदार ख़ातून हैं।’’17

 एक बहु का अपनी सास के प्रति यह कथन रिश्तों के ऊपर भरोसा और संवेदनशीलता का सबक है। ‘कागज की नाव’ रिश्तों की बारीक बुनावट और इंसान के स्वभाव की रेखाओं के रचे जाने की कहानी है। इसमें एक परिवार के केंद्र के आसपास कई परिवार हैं, जो उससे जुड़ें हैं अपनी सामाजिक संरचना में, और कहानी उनके साथ साथ भी चलती है। कमोबेश परिवार के विघटन और जुड़ने के कई अवसर नासिरा जी प्रस्तुत करती हैं। यह व्यापक मानवीय जीवन के अलग अलग चित्र नहीं हैं। एक संपूर्ण मानवता की विवधता के दृश्य हैं, जो अपनी आंतरिक बुनावट में एक ही तरह की रेखाओं और परिस्थितियों से बनते बिगड़ते हैं। जीवन की विविधता को खंड खंड करके वैयक्तिकता में देखना विखंडनकारी है। तमाम संबंधों और व्यापक इंसानियत को एक अखंड चित्र के रूप में देखना और उनके प्रभावों तथा परिणामों को तमाम बारीकियों के साथ इस उपन्यास में प्रस्तुत करने में नासिरा जी सफल हुईं हैं।




डॉ संजीव जैन 


    डॉ. संजीव कुमार जैन
    सहायक प्राध्यापक हिन्दी
    शासकीय महाविद्यालय, गुलाबगंज
    विदिशा म.प्र.
    



                                      
संदर्भ सूची -
1.कागज की नाव, पृ. 20-21
2.वही पृ. 29
3.वही पृ. 32
4. वही पृ. 32
5. वही पृ. 32
6. वही, पृ, 36
7. वही पृ.49
8. वही पृ. 49
9. वही पृ. 59
10. वही पृ. 110
11. वही पृ. 110
12. वही पृ.66
13. वही पृ. 66
14. वही पृ. 102
15. वही पृ. 103
16. वही पृ. 103
17. वही पृ. 104

Monday, July 30, 2018

उपन्यासनामा:- भाग चार ,शेष यात्रा 
उषा प्रियम्वदा 

उषा प्रियम्वदा 






“वस्तु में बदली जाती स्त्री के प्रतिरोध की : शेष यात्रा”
               
उषा प्रियंवदा का यह उपन्यास स्त्री जीवन की अनोखी यात्रा का दस्तावेज है। ‘रुकोगी नहीं राधिका’ की राधिका जो विदेश से वापस आती है और अपने ‘होने’ को पूरी पितृसत्तात्मक व्यवस्था के बरक्स प्रूफ करती है। जबकि शेष यात्रा की अनुका एक सीधी-साधी परंपरागत स्त्री जो अपने ‘होने को’ व्यवस्था और पुरुष के संदर्भ में ही पाती है और खोती है। इस पाने खोने के साथ एक ऐसी यात्रा करती है जो स्त्री के भौतिक और बौद्धिक विकास की यात्रा बन जाती है। वह स्त्रीपन के ‘होने’ और अपने ‘होने को पति द्वारा नकार दिए जाने के बीच अपने होने का अर्थ और संदर्भ स्वयं अपने बूते पर न केवल अर्जित करती है, बल्कि पति और पितृसत्तात्मक व्यवस्था के अहं और अकड़ को धराशायी भी कर देती है।
‘‘पति द्वारा त्याग दिये जाने पर वह नारी की परंपरागत सामर्थ्यहीनता को अनुकरणीय रूप में तोड़ती है। वस्तुतः उच्चमध्यवर्गीय प्रवासी भारतीय समाज इस उपन्यास में अपने तमाम अंतर्विरोधों, व्यामाहों और कुठाओं सहित मौजूद है। अनु, प्रणव, दिव्या और दीपांकर जैसे पात्रों का लेखिका ने जिस अंतरंगता से चित्रण किया है, उससे वे पाठकीय अनुभव का अविस्मरणीय अंग बन जाते हैं।’’1
इस उपन्यास की कहानी का प्रारंभ अनुका के इस अन्तर्द्वंद्वपूर्ण कथन से होता है - ‘‘क्या किया जाए इस अनुका नाम की औरत का, जिसकी जिंदगी एक बेबुनियाद इमारत की तरह उसके अपने पैरों के पास ढही पड़ी है। जिसकी पूर्णता, जिसका पत्नीत्व, स्त्रीत्व, सबकुछ नकार दिया गया है, जिसकी पूरी आइडेंटिटी, पूरा अनु-पन एकदम झकझोर दिया गया है। लहरों ने उसे कूड़े की तरह रेत पर लाकर पटक दिया है और जैसे अनेक आवाजें उसे चिढ़ा-चिढ़ाकर कहती रहती हैं-तुम कुछ नहीं हो, तुम कुछ नहीं हो।’’2 

अनुका के इस द्वंद्व का कारण है उसके पति द्वारा उसे मझधार में छोड़ दिया जाना। प्रणव जो उसे विवाह करके अमेरिका ले गया था और उसे एक आरोपित जिंदगी दी थी। इस जिंदगी में प्रणव उसके जीवन को वस्तुओं से भर देता है और उसे वस्तु की तरह इस्तेमाल करता है। अनुका वस्तुओं के जंजाल में प्रणव के इंतजार में अपना  वक्त व्यतीत करती है। एक दिन उसे पता चलता है कि प्रणव किसी और से प्रेम करता है। इसके बाद अनुका की जिंदगी बदल जाती है और वह अपनी सहेली दिव्या के साथ रहने लगती है और अन्त में डॉक्टर बनकर दिपांकर के साथ सेटल हो जाती है।





अतः इस उपन्यास का अन्त होता है अनुका के द्वारा अपनी पूर्ण स्वतंत्रता पा लेने के बाद, पुरुष के रूप में दीपांकर है पर वह बराबरी का साथी है पितृसत्तात्मक व्यवस्था का प्रतीक नहीं - ‘‘इतने सालों की स्वतंत्रता, अनु सोच उठी। अपने निर्णय अपने आप लेने की जिम्मेदारी, अपनी कमाई का पैसा बचाया जाए या बहाया जाए, कहाँ रहे, कैसे रहे, वह सब अपनी मर्जी से करने का सुख, न किसी का दबाव, न जबावदेही। उसके साथ दीपांकर इस संबंध के लिए उत्सुक है तो वह भी निर्णय ले चुकी है, अब पीछे हटने का सवाल नहीं उठता। दीपांकर उसे हर तरह से सुखी रखने की कोशिश करेगा, वह यह जानती थी। वह अपने लिए महत्वाकांक्षी नहीं था, पर अनु को वह कभी कोई भी निर्णय लेने से नहीं रोकेगा। यह होगी बराबर की साझेदारी, न कोई बड़ा, न छोटा, न सुपीरियर, न इन्फीरियर।’’3 

अनुका की इस जीवन यात्रा के दौरान उसने जो अनुभव अर्जित किए, जो थपेड़े खाए, जिन परिस्थितियों की पीड़ा से गुजर कर उसने अपनी राह बनाई, उनका वर्णन उपन्यास में प्रामाणिकता के साथ किया है। इन्हीं परिस्थितियों से गुजर कर ही तो ‘अनु’ ने अपने आपको पाया है, अपने घर, परिवार की सुरक्षा कवच से परे विदेश में जिस पति (पुरुष) प्रणव के सहारे वह गई थी, उसके द्वारा ही त्याग दिए जाने पर ही उसने अपने ‘होने’ की अर्थवत्ता को पाया, जाना और अनुभव किया कि ‘अनु’ भी है और यह अनु वह अनु नहीं जिसे प्रणव विवाह करके अपने साथ अपने सहारे यहाँ लाया था - ‘‘किसी के प्यार में न होना, किसी में अपने को समाहित न करना, इसका भी एक पॉजिटिव पक्ष है। मैं हूँ, अनु, अपने में तुष्ट, अपने स्वत्व बोध में सुखी, अपने सुख-दुख में अकेली, अपने में स्वाधीन। उसे यह अनुभूति प्रिय लगती है। उसने अपने व्यक्तित्व और अस्तित्व का लक्ष्य पा लिया है। अब आगे जो भी समय और भाग्य दे, पूरे एहसास और जिम्मेदारी से स्वीकार करेगी। अगर कुछ न भी मिले तो भी कोई शिकायत नहीं होगी। अपनी डॉक्टरी की उपाधि तो होगी, सुख-चैन से तो रह सकेगी, काम करने का संतोष तो मिलेगा। स्थाई रूप से पुरुष जीवन में न हो, तो न हो। जरूरत भी किसे है!’’4

 दरअसल अनुका जिस परंपरागत परिवेश और परिवार से आयी है, उसमें स्त्री एक वस्तु की तरह ही इस्तेमाल होती रही। उसकी कोई व्यक्तिगत सत्ता नहीं है। कोई निजी पहचान नहीं है। उसका अपना कोई वजूद नहीं हैं। सज-धज कर बकरे की तरह विवाह वेदी पर हलाल होने के लिए तैयार की जाती रही है। घर की चाहरदीवारी ही उसकी दुनिया होती है। घर में चोके चूल्हे, खाना बनाना, बच्चों और बड़ों की सेवा शुश्रुषा करना, पुरुषों की शारीरिक और मानसिक जरूरतों को पूरा करना, बस इतना ही उनका संसार है  - ‘‘अनु ने बचपन से बही पुराने ढंग का घर देखा और जाना था। उसमें ड्योढ़ी थी, मेहराबदार दालान, मुजरेवाली कोठी, चौकोर कमरे, घुटी-घुटी बंद कोठरियाँ, तहखाने, दुछत्तियाँ, संडास, कहारिन, नाई, बूढ़ी महराजिन। उस घर की एक अपनी गति थी, हर प्राणी उसी गति में अपने को ढाल लेता था, नई-ब्याही बहुएँ, आते-जाते मेहमान। बड़ी मामी घर की मालकिन थीं, छोटी मामी सबकी लाड़ली, सबसे सुन्दर, नखरीली, पढ़ी लिखी अनु की दोस्त। बड़ी मामी दूध और धोबी का हिसाब रखतीं, घर की खाने-पीने की जिम्मेदारी भी उन पर ही थी। छोटी मामी सज-संवरकर बैठी रहतीं, उपन्यास पढ़तीं, जेठ जेठानी को अपने हाथ से पान बनाकर देती; लिपिस्टक लगाकर रात के शो में सिनेमा जातीं। अनु को छोटी मामी बड़ी ग्लैमरस लगतीं - बंबई, कलकत्ता, कहाँ-कहाँ घूमी हुई। अनु के स्कूल में ऊँची-ऊँची चहारदीवारी थी, घर में भी सिर्फ त्योहार या शादी पर ही स्त्रियों का बाहर निकलना होता था।’’5 





इस दमघोंटू माहौल से निकली अनु जब अमेरिका के खुले और बिंदास परिवेश में पहुँचती है तो उसका एक दूसरी ही दुनिया से परिचय होता है। यहाँ यह भी देखने लायक है कि अमेरिका से आया प्रणव अनुका जैसी सीधी-सादी घरेलू गुड़िया को क्यों पसंद करता है?

यहाँ पितृसत्तात्मक व्यवस्था का वह चेहरा उभरकर सामने आता है जिसके तहत पुरुष एक निखालिस जिस्म में तब्दील चेतना वाली स्त्री को चुनना चाहता है ताकि उसकी देह की बर्बर आवश्यकताओं को घर में वह पूरी करती रहे और घर से बाहर की उसकी ऐयाशियों पर भी कोई रोक-टोक न लगे। अतः पढ़ा लिखा उच्चमध्यम वर्ग अपनी विशुद्ध शारीरिक भूख को अपने ज्ञान और विज्ञान की चेतना से विवेकपूर्ण नहीं बनाता बल्कि और अधिक बर्बररूप में उसे पूरी करना चाहता है। प्रणव अनु के जीवन में भौतिक पदार्थों की चकाचौंध को इस तरह भरता है ताकि उसकी चेतना उन भौतिक जड़ पदार्थों के उपभोग में उलझकर जड़ होती जाये और उसका उपभोग निर्बाध चलता रहे। प्रणव की घर के बाहर की ऐयाशियों की और उसका ध्यान ही न जाये।

उसका विवाह प्रणव के साथ तय कर दिया जाता है, पर उससे पूछने या उसे बताने तक की कोई जरूरत नहीं समझी जाती। जब वह प्रणव के साथ अमेरिका जाने के लिए एयरपोर्ट पर बेहोश सी हो जाती है तो प्रणव की पुरानी दोस्त रेखा कहती है ‘‘प्रणव, टेक केयर ऑफ हर; शी इज जस्ट अ किड।’’6

अनु एक बच्ची है, दरअसल बच्ची नहीं गुड़िया है जिसकी देखभाल करना ‘केयर करना’ आवश्यक है।
प्रणव एक सुंदर वस्तु की तरह उसकी देखभाल करता है और ढेर सारी वस्तुओं के बीच उसे भी एक वस्तु में तब्दील करता जाता है - ‘‘अनु खाना गरम करती है, दोनों साथ-साथ खाते हैं। एक सुखद चुप्पी में, सबकुछ साफ-सुथरा-एक अच्छी सी पार्सल की तरह बंधा जीवन। कभी मूड होने पर उसे बाहर ले जाता हैं। अनु जो कहती उसे तुरत खरीद देता। अनु के घर के एक कमरे में चीजों का ढेर लगना शुरू हो गया है। आलमारियों में चीजें सँजोते हुए अनु को अक्सर बेंत का अपना बक्स याद आता है।’’7

 इस वस्तुओं से भरे घर में अनु भी वस्तु में तब्दील होती जा रही थी। उसके आसपास जो अन्य स्त्री पात्र हैं और जो कि एक सखी सम्मेलन में संगठित हैं - ‘‘रूपल, कंचन, कीरत, रानी, विभा और मिनि। वैसे विभा को छोड़कर सभी गृहिणियाँ थीं।’’8 

ये सब की सब वस्तु की तरह व्यवहार करतीं हैं और वस्तुओं के घेरे में ही अपने होने को तलाशती रहती हैं। पश्चिम की औरत अपने होने के बोध को जल्दी महसूस कर लेती है अतः वह घर, पति, बच्चों के सुरक्षा चक्रव्यूह को तोड़कर अपने वजूद की तलाश में भाग जाती है। ‘‘अच्छे घर, मियाँ और बच्चों के बावजूद भी तो एक औरत को कुछ खाली-खाली लग सकता है।’’9





 विभा का यह कथन स्त्री की अस्मिता की तलाश और वजूद को बचाने का अहसास है। भारत जैसे परंपरागत समाजों में इस तरह की प्रवृत्ति को सिर्फ यौन संतुष्टि और असन्तुष्टि के रूप में देखकर स्त्री की चरित्रहीनता से जोड़ा जाता है।
अमेरिका की जीवनशैली में अपने खालीपन को भरने के लिए दावतें, पार्टी, और शॉपिंग, घर में वस्तुओं का अम्बार, शराब पीना, और अपने वजूद को पाने के लिए विवाहेतर सेक्स संबंध बनाना शामिल हैं।
अनु पूरी तरह इस तरह के माहौल में रम गई है। प्रणव की मर्जी और सोच ही उसके जीवन को संचालित करते हैं। वह जो कुछ भी करती है प्रणव के विचारों के अनुसार और अनुकूल ही करती है। वह पूरी तरह प्रणव पर निर्भर है। बिना प्रणव के वह अपाहिज है -‘‘प्रणव से मशविरा किए बिना वह कोई निर्णय नहीं ले पाती, ‘आज क्या खाओगे’ से लेकर मैं शाम को क्या पहनूँ’ सभी कुछ प्रणव की मर्जी से होता है। अनु प्रणव के मूड से चलती है। वैसे ही हँसती है, वैसे ही चुप हो जाती है।..........उसकी दुनिया में किसी चीज की कमी नहीं है, न महँगाई है, न भूख, न अकाल। उनके चारों तरफ एक जुलूस है, बीच में वह दोनों हैं, नंबर वन जोड़ा।’’10 

स्त्री के जीवन की पूरी पटकथा दूसरे ही निर्धारित करते हैं। विवाह से पहले की पटकथा को पिता और चाचा, मामा और भाई तथा विवाह के बाद पति - ‘‘जिंदगी की यह पटकथा अनु को बचपन से ही मिली थी। वह किसी चीज के लिए जिम्मेदार नहीं है, उसकी सारी जिंदगी दूसरों ने निर्धारित की थी, साल में एक बार जब सारे घर के कपड़े सिलते थे, अनु के कपड़े भी बन जाते थे - पसंद नापसंद का सवाल ही नहीं उठता था। जो महराजिन परस देती थी, वह खा लेती थी। स्कूल जाती थी, कॉलेज जाने लगी, वह क्या पढ़े, क्या विषय ले; अनु के लिए कभी प्रश्न नहीं उठा। अनु ने कभी इस बारे में सोचा भी नहीं, जो सब लड़कियों ने लिए, उसने भी ले लिए। उसका भाग्य सराहते हुए जब बिरादरी की औरतों ने कहा - ‘लौंडिया के भाग जगा है। विलायत का डॉक्टर, इतना गहना-कपड़ा’, तब अनु को लगा, हाँ शायद भाग्योदय हुआ है। वह प्रणव के प्रति कृतज्ञ थी, इतना सबकुछ, सिर्फ एक छोटी सी आकस्मिक झलक पाने भर पर ही। दृश्य बदल गया था, पटकथा का रवैया वही था। जो जिम्मेदारी प्रणव ने पकड़ाई थी, जो भूमिका दी गई थी, वही निभा रही थी। खाना बनाना, घर साफ-सुथरा रखना, प्रणव की पोजीशन के अनुसार कपड़े पहनना, पार्टियों में चुपचाप मुस्कराते रहना।’’11

 आधुनिकता की जीवनशैली में बहुत कुछ ग्लैमरस और आकर्षक दिखाई देता है। दूर से। जब उसमें आप अन्दर घुसते हैं तो उसकी एकरसता और वही-वही-वही, दुहराव और एकसापन महसूस होने लगता है और उसमें कहीं भी विविधता नहीं होती। अनु को भी धीरे-धीरे इस एकरसता का बोध होने लगा और उसमें प्रणव के न होने पर बोरियत पैदा होने लगती थी। लेकिन वह सखी सम्मेलन की अन्य स्त्रियों की भांति दूसरे पुरुष के साथ सहवास करने की सोच भी नहीं सकती। यह उसके पितृसत्तात्मक व्यवस्था के दिए संस्कार हैं। उसके अंदर सेक्स और यौनिकता अपने पति तक ही सीमित है। जब वॉटरमैन उसके साथ एक रात सोने का प्रस्ताव करता है तो वह हक्की-बक्की रह जाती है और कहती है कि ‘‘मैं अपने पति के साथ बहुत सुखी हूँ। किसी दूसरे पुरुष का ध्यान भी मैं पाप समझती हूँ।’’12 






लेकिन दूसरी तरफ प्रणव कई अन्य स्त्रियों के साथ दैहिक संबंध रखता है और उसे कोई अपराधबोध नहीं होता। यह पितृसत्तात्मक व्यवस्था के दो मुहे संस्कार हैं जो पुरुष के अंदर उसी अपराध के लिए कोई नैतिकता से विचलन का बोध पैदा नहीं करता और एक स्त्री उसी कार्य के लिए सोचना भी पाप समझती है।

आधुनिक जीवन पद्धति और मूल्य व्यवस्था में नैतिक और मानवीय मूल्य से संचालित स्त्री बिल्कुल अनफिट महसूस करती है। वह इस व्यवस्था में अपने को असंगत महसूस करती है। अनु भी जब कीरत के यहाँ सुबह सुबह पहुँचती है, तो उसके घर का माहौल और उसकी लड़की गोगी का व्यवहार उसे अजनबी की तरह महसूस करता है। ‘‘उसे एकदम अपनी उपस्थिति उस कमरे में असंगत-सी लगने लगी।’’13

 कीरत जैसी स्त्रियाँ जो अपने आपको उस आधुनिकबोध की विडंबनात्मक व्यवस्था में ढालने की कोशिश कर रहीं हैं। निरंतर एक वस्तु में तब्दील होती जा रही हैं। बिना शराब के उनके चेहरे पर नॉर्मलटी नहीं आती। वे बिना शराब और मर्द जिस्म के बिल्कुल बेकार की वस्तु में तब्दील होने लगती हैं - ‘‘धनराज के जाने के बाद शाम बीतती ही नहीं, न रात को नींद आती है। मुझे अपने बगल में धनराज का शरीर रोज चाहिए। जब वह नहीं होता तो गोली खाकर सोना पड़ता है।’’14  


मातृत्व के संबंध में अनु का सोचना है कि इसका निर्णय भी प्रणव का ही होगा। उसे माँ बनने से कोई एतराज नहीं और इसकी जल्दी भी नहीं। मातृत्व स्त्री का अधिकार है, परन्तु पितृसत्तात्मक व्यवस्था ने उसके इस अधिकार को अपने अधीन कर लिया। वह कब माँ बने और कब नहीं इसका निर्णय पुरुष के पास है। वह तो एक उपकरण की तरह इस्तेमाल में लायी जाती है। अनु की यह मानसिकता सदियों से स्त्री के मानस को अनुकूलित करने का परिणाम है। बच्चे के संबंध में ‘‘निर्णय प्रणव का होगा और निश्चय ही प्रणव को कोई जल्दी नहीं थी।’’15

मर्द अपनी आकांक्षाओं और वासनाओं की पूर्ति के लिए घर से बाहर जाता है और पत्नी के शिकायत करने पर कि उसका बहुत देर तक घर से बाहर रहना उसे अच्छा नहीं लगता, तो वह उसे घर गृहस्थी के काम गिनाने लगता है। यह पितृसत्तात्मक व्यवस्था द्वार स्त्री को दी गई भूमिका है। ‘‘तुम्हें इससे समझौता करना पड़ेगा अनु। मेरा काम तो फैलता ही जा रहा है। तुम्हें भी तो कितने काम रहते हैं घर की देखभाल, कूकिंग,.... फिर उसने जोड़ा, यह एकाएक असंतोष क्यों?’’

अनु को धीरे-धीरे इस जीवन की एकरसता से बोरियत महसूस होने लगती है और फिर प्रणव का निरंतर बाहर रहना काम के बहाने उससे दूरी बनाना और उसके जीवन को घर की चाहरदीवारी तक सीमित करते जाना। उसे समझ में आने लगता है कि यह जिंदगी बहुत दिनों तक नहीं चल सकती। प्रणव भी अनु से ऊब गया और अपने होने की, ‘मर्द होने’ की सार्थकता कहीं और ढूंढने लगा। चूंकि अनु के पास प्रणव के इंतजार और घर की देखरेख के अलावा कोई दूसरा काम नहीं है। अतः उसके जीवन का विस्तार भारतीय परंपरागत घरों की तरह ही घर तक सीमित हैं। फिल्म डायरेक्टर चंद्रिका राणा जब उसे नाश्ता सर्व करते देख कहती है कि ‘‘आप सिर्फ यही करती हैं? उसका प्रश्न अचानक गोली की तरह निकलता है।’’16 







इस बात को प्रणव सम्हालने की कोशिश करता है और वही पितृसत्तात्मक व्यवस्था की भूमिका निभाने की बात कहता है। ‘‘यही अनु को बहुत व्यस्त रखता है। इतना बड़ा घर, फिर मेरी देखभाल, इतना ही इनके लिए काफी है।‘‘
‘‘आप नहीं चाहते कि यह कुछ करें?’’

मुझे कैरियर गर्ल नहीं चाहिए थी, प्रणव ने कहा, ‘‘मैं चाहता था सरल, स्नेहशील बीबी, जिसके साथ बैठकर मुझे सुख-चैन मिले।’’17 

इसका मतलब है कि जो स्त्री घर से बाहर काम करती है, वह स्नेहशील नहीं होती, सरल नहीं कुटिल होती है, उसके साथ बैठकर पुरुष को सुख-चैन नहीं दुख और बैचेनी मिलती है। चंद्रिका इस बात का विरोध भी करती है। परन्तु प्रणव उसकी बात को टाल देता है और उसे चुप रहने को विवश कर देता है।

इस घटना के बाद प्रणव की प्रतिक्रिया उसके पशुपन और अहं को लगी चोट को अभिव्यक्त करती है। वह अनुका के साथ जिस तरह से संभोग करता है, वह प्यार नहीं बलात्कार है और अनुका भी इस बलात्कार को महसूस करती है।
 ‘‘प्रणव के होंठ क्रूर थे, वह एक हिंसक आक्रोश में अनु को झकझोर रहा था, प्यार में नहीं। अनु ने उसे दूर ठेलना चाहा। वह प्रणव, जो देर तक उसे सहलाता, दुलारता रहता था, इस वक्त कहाँ खो गया था! रह गया था एक पुरुष मात्र, जिसका अव्यक्त रोष, और ऐंठती हुई ताकत वह महसूस कर रही थी, पर जिसका कारण जानने में वह असमर्थ थी। वह देर तक कुचली, टूटी, चुकी हुई पढ़ी रही।’’18

 यह पत्नी के बलात्कार का दृश्य है, इसलिए थोड़ी शालीन भाषा और संवेदनात्मक क्रूरता के साथ लिखा गया है। वरना बलात्कार की पूरी बर्बरता और एक स्त्री के स्त्रीत्व को सिरे से नकारने की, उसके वजूद को पूरी तरह कुचल देने की कार्यवाही है।
पुरुष को रोज रोज वही का अहसास खीझ से भर देता है, पर वह यह नहीं सोचता कि एक स्त्री वही..वही....रोज...रोज... बिना इच्छा-अनिच्छा के कैसे बर्दाश्त करती है? ‘‘रोज-रोज वही परस देती हो, वही दाल-रोटी, वही गोश्त.....’’19 

यहाँ उसकी वेदना रोटी-दाल की अपेक्षा अनु के जिस्म के गोश्त की पुनरावृत्ति की अधिक है और उसकी खीझ भी इसी को लेकर है।
प्रणव के कई स्त्रियों से संबंध हैं, विभा से, शिकागो में परमानेंट गर्ल फ्रेंड, चंद्रिका आदि। इन सबसे संबंधों के बारे में अनु को ज्योत्सना से पता चलता है। पश्चिम की स्त्री की नियति है कि ‘‘यहाँ की सभ्यता में पत्नी को सबसे बाद में पता चलता है, जबकि तरकश से तीर निकल चुका होता है।’’20 

अनुका की इस ‘शेष-यात्रा’ में उसका सामना जीवन के कटु यथार्थ से होता है - उसके ऊपर का साया, पितृसत्तात्मक व्यवस्था का सुरक्षा घेरा, जिसमें अब तक वह वस्तु, एक गुड़िया बन कर रहती आयी थी, अचानक हट जाता है और वह एकदम बिल्कुल अकेली हो जाती है, तब वह अपने आपको पहचानती है। वह स्वयं को, अपने चारों और की दुनिया-जहान को नई आंखों से देखती है, पितृसत्तात्मक व्यवस्था का परदा उसकी आंखों पर से हट जाता है, पुरुष की आंख से दुनिया को देखने की आदत ने उसे अपनी दृष्टि से ही अपरिचित बना दिया था। अब वह नई - अपनी, बिना किसी चश्मे के - आंखों से अन्दर-बाहर की दुनिया को देखने को लालायित है - ‘‘नई आंख से सब कुछ देखना होगा? सब कुछ का मतलब सब कुछ। अंदर, बाहर, अपने को, दूसरों को, प्रणव को। विशेष तौर से प्रणव को।
एक आदमी, एक औरत। प्रणव और अनु। औरत रोती है।






‘‘मैंने क्या कसूर किया है? चोरी की? झूठ बोला? क्या मैं दुश्चरित्र हूँ?’’

झर-झर आँसू। आँसू कि खत्म ही नहीं होंगे। आदमी का चेहरा कड़ा है, वह औरत की तरफ पीठ करके बाहर देखने लगता है।’’

‘‘नई आँख से सब कुछ देखना होगा। अंदर, बाहर अपने को, दूसरे को, प्रणव को। सबसे पहले बाहर, बाहर  से अंदर; फिल्मी कैमरे की आँख की तरह। पहले बाहर का दृश्य।’’21

अनु का यह जो तीसरा नेत्र खुला है, नई आंख और नई दृष्टि के रूप में, उससे अपने चारों और की दुनिया देखी, समझी और अपने वजूद को पहचाना। उसने पहचाना कि ‘वह है’।  उसका होना भी अपने आप में मायने रखता है। वह अब तक हमेशा ही दूसरों के संदर्भ में होती रही थी। अब वह सारे संदर्भों से मुक्त है और अपने आपका संदर्भ खुद स्वयं है।

अनुका को जब अपनी इस विचित्र स्थति का पता चलता है तो अनु के पैरों के नीचे से जमीन निकल चुकी होती है। वह विक्षिप्त सी हो जाती है। सारे घर में तोड़-फोड़ मचा देती है -
‘‘तो ऐसे टूटता है दिल। अनु जैसे सचमुच अपने दिल का टूटना सुन सकती है। उसके दिल को जैसे कोई पंजे में पकड़कर ऐंठ रहा है। वह मुट्ठियों से अपने बाल कसकर पकड़ लेती है। फिर चीख उठती है। उसके अंदर हजारों ज्वालामुखी फूट पड़ते हैं। सबसे पहले चाय का प्याला फेंका, जाकर खिड़की से टकराता है और खनखनाकर टूटता है। वह मेज से पूरी ट्रे उठाकर पूरे जोर से नीचे पटक देती है, फिर मेज कांच सहित, टेबल लैम्प, टेप रिकार्डर, प्रणव के यत्न से इकट्ठे किए रिकार्ड, उन्हें पैरों से रोंदते हुए उसे वहशियाना सुख मिलता है।
प्रणव की शराब की बोतलें, महँगी बोतलें रसोई में जहाँ तहाँ गिरती हैं। जिस चीज पर हाथ जाता है, उसी को बिना सोचे, तोड़-फोड़, फेंक-फांक, तहस-नहस करती जा रही है। एक बबंडर की तरह। आज कुछ नहीं बचेगा वह अपनी पहनी हुई साड़ी को नोचकर उसकी धज्जियाँ बिखेर देती है। प्रणव सामने पड़ता तो शायद उसका खून कर देती।
 नीरजा के बच्चे का गला दबा देगी। डॉक्टर विभा को गोली मार देगी, फिर खुद भी तर जायेगी। उसके बाल बिखर गए हैं, आँखें लाल हैं। वह दीवार से बार-बार सिर टकराती है। पूरा घर पागल चीखों से गूँज रहा है, चीखों पर चीखें। क्या यह उसकी ही आवाज है? उसे होश नहीं है।’’22  

अनु की यह प्रतिक्रिया इस बात के लिए महत्वपूर्ण है कि उसने उन सारी वस्तुओं को तहस-नहस किया है जिनके कारण उसे वस्तु में तब्दील क्या गया और घर की तरह उसे भी अकेला निर्जीव समझ कर छोड़ दिया गया। वह इन वस्तुओं के मायाजाल को तहस-नहस करके अपने स्वत्व को पाती है। विक्षिप्त अवस्था में ही अपने निज को पाती है। यह वस्तु से निज तक की यात्रा में वह अपने आप तक पहुँच जाती है।अनु की मैरिज टूट चुकी है। वह अकेली है बिल्कुल अकेली। ‘‘अब सिर्फ वह है, अकेली।’’23

विवाह टूटने की आवाज पश्चिम में बहुत तेज नहीं होती, पर अनुका पश्चिम में रहकर भी भारतीय संस्कारों के अधीन है और बार-बार प्रणव से साथ ले चलने की भीख के बाद भी जब वह नहीं पिघलता तो, वह प्रणव पर भूखी शेरनी की तरह आक्रमण कर देती है।
‘‘तुम? तुम खुद बदचलन हो, गुंडे हो, आवारा हो.... तभी तो रंडियों से फँसे हुए हो....’’ अनु के मूँह से शब्द नहीं निकल पा रहे थे, ‘‘ थूऽऽ तुम पर....’’24 
यह थूंकना पूरी पितृसत्ता पर थूंकना है। यह उस घृणा का प्रतीक है जो इस व्यवस्था ने उसे दी है।
अनु का इस तरह पागल की तरह व्यवहार करना दरअसल आधुनिक पितृसत्तात्मक व्यवस्था में स्त्री की बिडंबनात्मक व्यवस्था का प्रतिफल है। 

कीरत, विभा, नीरजा जैसी स्त्रियाँ इस व्यवस्था की विकृति में अपने को ढाल लेती हैं, अतः वे इस तरह का पागलपन प्रकट नहीं करतीं। वे अन्दर से खोखल मात्र हैं, उन्हें अपनी पहचान और वजूद को इसी तरह इस्तेमाल करना आता है। अनु इस व्यवस्था की विकृति को जीवन शैली बनाकर जी नहीं पाती इसीलिए वह पागल हो जाती है। इस पागल के अन्त में वह प्रणव का दिया घर और सामान वहीं छोड़कर अपनी पुरानी सहेली दिव्या के पास चली जाती है। यह उसके नए जीवन का प्रारंभ है।

अनुका प्रणव से अलग होने की पीड़ा और विक्षिप्त स्थिति को भोगने के बाद अपनी सहेली दिव्या के पास जाती है। दिव्या अपने पति के साथ रहती है। स्वाभिमानी और मेहनत-कस इंसान हैं दोनों। छिन्नमस्ता में प्रिया रिचर्ड और जैनी के साथ रहती है। उनकी दोस्ती और समझदारी उससे संबल देती है। ठीक इसी तरह अनुका की यह दोस्त है दिव्या। अनुका उसे बताती है कि प्रणव ने उसे छोड़ दिया है। कारण बताते हुए जो वह कहती है, वह आदर्श पत्नीत्व के मिथक को चकनाचूर कर देता है - ‘‘मैं तो अपने पत्नीत्व में डूबी थी, पर शायद प्रणव का एक ही स्त्री से काम नहीं चलता। शायद मैंने कभी प्रणव को समझा ही नहीं, जाना ही नहीं। कभी यह नहीं सोचा कि दाल-सब्जी और शरीर से परे भी कोई और चाह होती है। प्रणव की वह मानसिक प्यास मैं शायद नहीं बुझा सकी। मैं सहचरी, जीवनसंगिनी थी, मगर सोलमेट नहीं। मुझमें दोष ही दोष दीखने लगे।’’25

अनु सोचती है कि पति के सामने पूरी तरह समर्पित रहकर उनका प्रेम पा लूँगी। मगर यह मनोवृत्ति भी पितृसत्तात्मक व्यवस्था की ही देन है जो स्त्री को अपने स्वार्थ के लिए दी जाती है। इसका अर्थ इतना ही है कि स्त्री पति को न छोड़े, यदि पति छोड़ना चाहता है तो उसके यह आदर्श पत्नीत्व के गुण किसी काम के नहीं हैं -‘‘मैं समझती थी के पति-प्रेम एक ऐसी जादू की बूटी है, जिससे सारी आधियाँ-व्याधियाँ दूर हो जाती है। अगर मैं मनसा-वाचाकर्मणा समर्पित रहूँगी तो सबकुछ ठीक हो जायेगा। मेरा प्रेम उन्हें जीत लेगा।’’26 

‘‘तो वह सब झूठ था। झूठ था न दिवी? सारे व्रत, त्यौहार, जप तप, कथा कहानियाँ, सब झूठ थीं न। झूठ हैं। मेरा सारा डिवोशन, प्रणव के चरणों पर निछावर हो जाना, सब कुछ झूठा पड़ गया।’’27 

दिव्या उसे अपने आत्म सम्मान की याद दिलाती है, प्रेरित करती है कि वह प्रणव के आलाव भी कुछ है - ‘‘तुम्हारा आत्मसम्मान कहाँ है अनु? दिव्या का रोष अब छिपता नहीं, ‘‘तुम जिंदगी भर अपने को पायदान बनाए रखोगी कि प्रणव तुम्हें खूँदता रहे?’’28 

अनु अपने आपको इतना भूल चुकी है कि स्वयं को मंगतों की श्रेणी मे रखने लगी। यही दशा पितृसत्तात्मक व्यवस्था ने स्त्री के आत्मसम्मान की कर रखी है। इतनी बार इतने तरीके से उसका आत्मसम्मान कुचला गया है कि वह यह भूल ही गई कि वह भी एक स्त्री है, इंसान है, मानवीय गौरव और सम्मान पाने की अधिकारी है। वह कहती है - ‘‘मँगतों में आत्मसम्मान नहीं होता।’’29

 अनु दिव्या और उसके पति के साथ रेस्टौरेंट में काम करने लगती है। श्रम से जुड़कर, पैसा स्वयं कमाकर उसमें एक इंसान होने का गौरव जागता है। प्रणव का घर बिक जाने पर वह उसमें आधा हिस्सा ले लेती है। यहीं से उसका विवेक और आत्मसम्मान जाग जाता है। (यहाँ कठगुलाब की दर्जिन बीबी से तुलना करने पर फर्क समझ में आता है, उसका पति जब उसे छोड़ कर जाता है तो वह उससे पैसे नहीं लेती। उसका आत्मसम्मान पति के आगे झुकने नहीं देता।)

प्रणव से अलग होने पर ही अनु एक परंपरागत स्त्री से विचारशील, कर्मशील स्त्री में बदलती है - ‘‘पर यह सच है कि अगर परिस्थितियों ने मुझे ऐसे ढकेला न होता तो आज मैं भी वही परंपरागत स्क्रिप्ट जीती रहती - पूरी तरह से आप पर निर्भर, एक सफल डॉक्टर की निकम्मी बीबी की ..... जानते हैं, कचहरी में विदा लेते वक्त आपकी उस शार्क मछली-सी वकील ने मुझसे क्या कहा था?...‘आपके भविष्य के लिए शुभकामनायें, ‘तो मेरे मूँह से कड़वा वाक्य निकल गया-‘यह सहानुभूति आप अपने मुवक्किल को ही दीजिए’ - उस दिन के बाद में एक बार भी नहीं रोई। मालूम नहीं मेरे अंदर इतना तेज, इतना करेज कहाँ से आ गया। मुझे लगा, मैं कुछ भी बन सकती हूँ।’’30 
यह कुछ भी बन सकने की सामर्थ्य का बोध अनु जैसी स्त्री को नई स्त्री में बदल देता है। यही नई स्त्री स्वतंत्र और दायित्वपूर्ण जीवन को जी सकती है।

संदर्भ सूची

01. शेष यात्रा, उषा प्रियंवदा के पृष्ठभाग से उद्धृत
02. शेष यात्रा, (पेपर बेक) पृ. 09 
03. वही पृ. 128
04 वही पृ. 115
05. वही पृ. 11
06. वही पृ. 17 
07. वही पृ. 23
08. वही पृ. 23 
09. वही, पृ. 24 
10 वही पृ. 25
11. वही पृ. 25
12. वही पृ. 27
13. वही पृ. 30
14. वही पृ. 32 
15. वही पृ. 36
16. वही पृ. 41
17. वही पृ. 41 
18. वही पृ. 42
19. वही पृ. 42 
20. वही पृ. 55
21. वही पृ. 09-10
22. वही पृ. 55
23. वही पृ. 60 
24. वही पृ. 63 
25. वही, पृ. 69
26. वही, पृ. 70
27. वही, पृ. 70
28. वही, पृ. 77
29. वही, पृ. 77
30. वही, पृ. 11

०००
डॉ संजीव जैन 


डॉ. संजीव कुमार जैन
सहायक प्राध्यापक हिन्दी
शासकीय संजय गाँधी स्मृति स्नात्कोत्तर महाविद्यालय,
गुलाबगंज 
522 आधारशिला, बरखेड़ा
भोपाल, म.प्र.
मो. 09826458553



उपन्यासनामा भाग तीन 
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Sunday, July 29, 2018

राजेन्द्र श्रीवास्तव जी के गीत 



राजेन्द्र श्रीवास्तव 



 पसरे सन्नाटे


संवेदन से शून्य, हृदय पर
पसरे सन्नाटे।

जटिल बिषमताओं की खाई
 कौन यहाँ पाटे।
संवेदन से शून्य, हृदय पर
पसरे सन्नाटे।

सारा दिन ढोकर पराग कण
मधुमक्खी रोयी।
बूँद-बूँद घट भरी संपदा
क्षण भर में खोयी।

मीठी शहद, भरे छत्ते को
सबल रीछ चाटे।

छप्पन भोग कहीं पर लगते
कहीं सिर्फ फाँके।
लाठी जिसके हाथ रही है
भैंस वही हाँके।

दीनू ने बोये थे गेहूँ
समरथ ने काटे।

साठ बरस की कमला काकी
पूछ- पूछ  हारी।
कौन खा गया, उसके हक की
सुविधा सरकारी।

हीरोहोंडा मुखिया जी की
भरती फर्राटे।
   



 तुम नहीं निकले घरों से
➖➖➖➖➖➖➖➖
आबरू अपनी बचाने वह
 सड़क पर लड़ रही थी।
बहशियों के सामने बिलकुल
अकेली पड़ रही थी।
अंत तक लड़ती रही वह
देह-लोलुप  निश्चरों से।

चीखती ही रह गयी वह
तुम नहीं निकले घरों से

गाँव के ही श्वान अब तो
घेर लेते  कहीं    गैया।
जूझती है रोज अक्सर
बाज कौवों से चिरैया ।

नुच गये हैं पंख फिर भी
लड़ रही  टूटे परों से।

बिष भरे बिषदंत लेकर
दौड़ते हैं  नाग काले।
सपेरों ने बीन कर दी
नागराजों  के  हवाले।

गुप्त समझौता हुआ फिर
नेवलों  का  बिषधरों से।
   



 हम मानव है...
➖➖➖➖➖➖

हम मानव हैं, नहीं काठ की
 कोई कठपुतली।

 हम अपने मन के राजा हैं ,
 भू पर राज नहीं।
 कहीं नहीं जागीर हमारी,
 सिर पर ताज नहीं।
 आसमान है मुकुट हमारा,
 सिंहासन धरती।
 आठों पहर हवा तत्पर हो,
 स्वयं चँवर ढरती।
 महल मुबारक तुम्हे, हमे तो
 वट की छाँव भली।

 नहीं मिला भोजन दो दिन से,
 कोई बात नहीं।
 खोद निकालेंगे कुदाल से,
 सूखा भात कहीं।
 आज काम से लौटाया कल,
  वही बुलाएँगे ।
 श्रम के सरसिज, स्वेद-सरित में
 खिल ही जाएँगे ।
 खिल जायेंगी मुस्कानों की
 नन्ही कहीं कली।


 हाथ भला क्यों फैलाए हम,
 दुनिया के आगे।
 विपदाओं से हार मान कर,
 कभी नहीं भागे।
 हमे भरोसा अपने श्रम पर,
 साबित कर देंगे।
 अपने हाथों की रेखाएँ,
 स्वयं बदल लेंगे।
 विधि का लिखा बदल देने की
 इच्छा फिर मचली।

 सौंपें डोर भला क्यों तुमको
 अपने जीवन की।
 लेना चाहेंगे कुछ साँसे
 अब अपने मन की।
 'पराधीन-साँसों' की अब तक
 बहुत उमर जी ली।
 अब तुमको करनी ही होगी
 यह डोरी ढीली।
 जब-जब ठान लिया मन ने फिर,
 जग की नहीं चली।
               

   
चलो मौन के पट अब खोलें
➖➖➖➖➖➖➖➖➖
कुछ तुम बोलो, कुछ हम बोलें
चलो 'मौन के पट'-अब खोलें ।

रिश्तों को दें फिर गर्माहट,
खत्म करें थोथी कङवाहट।
कुछ भावों, कुछ व्यवहारों में-
बातों में मिठास कुछ घोलें। चलो मौन.....

शुरु करें जाना-पहिचाना,
बातों का सिलसिला पुराना।
किसका  कितना दोष रहा है-
न तुम मापो न हम तौलें। चलो मौन......

 यूँ छिप जाना और लजाना
निश्छल मन का यह मुस्काना
 साँसों की माला में हम-तुम
यह क्षण  यह मुस्कान पिरो लें। चलो मौन...

साझा कर लें सुख-दुख सारे,
एक - दूजे के   बनें  सहारे।
शेष रहे,  जीवन में  मिलकर-
कुछ पल हँस लें, कुछ पल रो लें। चलो मौन.....
           


                   
 तुम क्या जानो
➖➖➖➖➖➖
तुम क्या जानो....!
                         
कभी बाँस की फाँस धंसी न-
कभी पाँव न फटी बिबाईं।
तुम क्या जानो जानो पीर परायी।

तुम क्या जानो! क्या होता है-
राहों में अपनों को खोना।
पल-पल, फिर उनकी यादों में -
गरम आँसुओं से मुँह धोना।
आँखों ही आँखों में सारी-
रात गयी पर नींद न आई।  तुम क्या जानों.

तुम क्या जानो! सीढ़ी चढ़ना,
सिर पर रख कर भरी तगाड़ी।
हाड़ तोड़ महनत दिन भर की -
औनी-पौनी मिली दिहाड़ी।
पानी पीकर ही, धरती पर -
सो जाना, फिर बिछा चटाई।  तुम क्या जानो

तुम क्या जानो! आठ बरस के
बच्चे से बस्ता छिन जाना।
जूठे कप प्लेट, होटल में
धोकर पैसे चार कमाना
रोटी दोनों वक्त  मिल गयी-
मगर पेट भर कभी न खायी।  तुम क्या...

तुमने शायद ही देखा हो-
खेतों में बीजों का बोना।
और बाढ़, सूखा, ओलों से -
उन फसलों का चौपट होना। 
बोझ कर्ज का और बढ़ गया -
फिर बिटिया की रुकी सगाई। तुम क्या जानो..

तुम क्या जानो! कई घरों का-
झाड़ू-पौंछा,  बर्तन धोना।
और भूख से कहीं दुधमुँही-
बच्ची का सिसकी भर रोना।
ढली दोपहर लेकिन अब तक-
उसकी माँ वापस न आई। तुम क्या जानो...

तुम क्या जानो क्या होता है -
चुनरी दागदार हो जाना।
जाने-अनजाने हाथों से -
या फिर तार-तार हो जाना।
कौन मिटाए इन दागों को
कैसे कौन करे तुरपाई । तुम क्या जानो...
                         

➖ राजेंद्र श्रीवास्तव


परिचय:
राजेंद्र श्रीवास्तवजन्मतिथि -04.06.1954
जन्म स्थान  - विदिशा (म.प्र.)का एक छोटा सा गाँव काँकर 
एम.एस सी(प्राणिशास्त्र)
बी.एड.
1980 से बस्तर के लोहण्डीगुडा उ.मा.वि. से शिक्षक के पद से शासकीय सेवा का श्री गणेश ।
साहित्यिक रुझान व प्रेरणा अग्रज 'पुष्प जी 'से ।

आकाशवाणी जगदलपुर से (1982-1991)यदा-कदा चिंतन,बाल कविताएँ,नाटिका (युववाणी) कहानी व छात्रीय कार्यक्रम आदि के अवसर मिलते रहे । विज्ञान नाटिका का लेखन व निर्देशन ।


बाल कविता की एक पुस्तक 'मछली रानी'  प्रकाशित।                                   
आकाशवाणी इंदौर से भी (1992-1995)बाल कविताओं का प्रसारण ,30-6-16को प्राचार्य पद पर रहते हुये सेवा निवृत्त हुआ हूँ ।


                             
साहित्य की  बात वाट्सअप  समूह में चर्चा हेतु प्रस्तुत गीत /नवगीत ,प्रस्तुति सुरेन सिंह  ...रचना प्रवेश पर 
विशेष प्रतिक्रियाओं के साथ 




संवेदनाओं से ओतप्रोत ख़ूबसूरत गीत-नवगीत

गीता पंडित:
एक समय ऐसा भी आया कि गीत को आत्मालाप  कहकर नकार दिया गया। दुरूह साहित्यिक भाषा से ग्रसित कहा गया वही आज नवगीत के रूप मे जन  के लिये जन की भाषा में जन की बात करता है।

गीत को भुला देना आसान नहीं।  जन्म से मृत्यु तक हम गीत गाते और सुनते आ रहे हैं। फिर छायावादी कहकर गीत से पल्लू झाड़ने की बात क्या बेमानी नहीं लगती ?

सच कहूँ तो आज गीत-नवगीत लिखना बेहद दुष्कर कार्य है क्योंकि नवगीत के नाम पर सर्वत्र चुप्पी है । नयी कविता इतनी प्रचुर मात्रा में लिखी जा रही है कि गीत-नवगीत को हाशिये पर डाल दिया गया है। फिर भी धारा के विपरीत नवगीत खूब लिखा जा रहा है।
जो समकालीन समस्याओं से जुड़ा है।
आम बोलचाल की भाषा में अधिक से अघिक लोगों तक पहुँचता है
और नयी कहन व नये बिम्बों के साथ समकालीन साहित्य के समक्ष ऊँची ग्रीवा करके खड़ा होता है।
संक्षिप्तता इतनी कि केवल दो या तीन बंद मैं अपनी बात कहने की क्षमता रखता है।

आज अनेकानेक बेहतरीन व मंजे हुए वरिष्ठ और कनिष्ठ नवगीतकार हैं जो अपनी पूरी निष्ठा के साथ  नवगीत लिख रहे हैं।

हाथ कंगन को आरसी क्या।
आप स्वयं पढ़ें और देखें कि नवगीत आज की समस्याओं से जूझते हैं या नहीं ?
ये समय को गाती हुई रुदालियाँ हैं या नहीं ?
ये पूरी तरह से समकालीन हैं या नहीं ?

राजेंद्र श्रीवास्तव जी एक समर्थ नवगीतकार हैं | उनके पाँच गीत- नवगीत आज हमारे सामने हैं |

'संवेदन से शून्य, हृदय पर
पसरे सन्नाटे।'

प्रथम नवगीत ही उस संवेदना की बात करता है जो आज के समय से आँख-मिचौली खेलती हुई प्रतीत होती है | सर्वत्र भीड़-तंत्र का राज है लेकिन चारों तरफ व्याप्त सन्नाटा आदमी को लील रहा है | इसमें कई बिम्ब बहुत ख़ूबसूरत हैं और कहन मन को लुभाती है |

'आबरू अपनी बचाने वह
सड़क पर लड़ रही थी।
बहशियों के सामने बिलकुल
अकेली पड़ रही थी।
अंत तक लड़ती रही वह
देह-लोलुप  निश्चरों से।

चीखती ही रह गयी वह
तुम नहीं निकले घरों से'

दूसरा गीत सदियों से पीड़ित स्त्री की दशा का वर्णन करते हुए समय के चेहरे पर करारा तमाचा जड़ता है और हमारे सामने प्रश्न बनकर खड़ा हो जाता है कि आज आदमी को क्या हो गया है ? वह सब कुछ देखता है, सुनता है लेकिन सही के पक्ष में हस्ताक्षर नहीं करता | क्या समय माफ़ कर सकेगा |
'समय लिखेगा इनका भी इतिहास'  |'

संक्षेप में नीचे के तीनों गीत भी बहुत मुखर हैं जो अपने समय से न केवल संवाद करते हैं बल्कि आदमी को इंसान बनने की तरफ अग्रसर करते हैं | एक चुप्पी जो घर से बाहर तक फैल गयी है | एक मौन जो अपनों के होते हुए भी श्वासों की पीड़ा बनता जा रहा है, एक तनहाई जो धीरे-धीरे आदमी को लील रही है | किसान, कामगार, स्त्री, बच्चे सब उसकी पीड़ा और चिंता के विषय हैं |  गीतकार इस सबसे व्याकुल होता है और यही जन की पीड़ा उसके नवगीत की सेंटर थीम है , नींव है जिस पर रचे-बसे उनके गीत-नवगीत पूरी तरह सम्प्रेषित होते हैं और संवेदनाएं जाग्रत करने में पूरी तरह सफल भी |

राजेन्द्र श्रीवास्तव जी को बहुत-बहुत बधाई |

और अंत में कविता बनाने से नहीं बनती हाँ, बड़ी अवश्य दिखाई दे जाती है जो पुरस्कार तक कवि को खींचकर ले जाती है मगर पाठक के हृदय तक पहुँचने के लिये कविता को कवि के हृदय से अवतरित होना होता है।

नवगीत इसी तरह अवतरित हो  रहा है
जब यह कहा जा रहा है कि कविता अब शेष नहीं तब नवगीत और नवगीतकार का महत्व और दायित्व विशेष रूप से अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है।

आभार सा की बा और फिर से बधाई राजेन्द्र जी को |

इसे मेरी पाठकीय टिप्पणी समझी जाए |

➖ गीता पंडित




Saurabh Shandily: 
मीठी शहद भरे छत्ते को सबल रीछ चाटे
दीनू ने बोले थे गेहूं समरथ ने काटे

इन पंक्तियों की पृष्ठभूमि तैयार करने में आदरणीय राजेंद्र चाचा जी ने जो श्रम किया वह प्रणम्य है । आपके गीतों में जनवादी स्वर देखना आह्लादकारी है अन्यथा छंद में लिजलिजा प्रेम , भजन एवं आकाओं के लिए सिवाय प्रस्तुति गान के , प्रतिरोध के स्वर कम दिखते हैं ।

इस दिशा में न्यून गीतकार हैं जिन्होंने उल्लेखनीय काम किया है । छंदों में बंधी रचनाएं अक्सर एक खास दायरे में आ जाते हैं ।

आपका एक गीत हम मानव हैं से कुछ पंक्तियां -
नहीं मिला भोजन दो दिन से कोई बात नहीं
खुद निकाल लेंगे कुरान से सूखा भात कहीं

उपरोक्त पंक्तियाँ अलग से दिखने वाली पंक्तियां हैं । अगला गीत चलो मौन के पाट अब खोलें, संवाद की प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए किया गया एक सार्थक पहल है वहीं तुम क्या जानो शिर्षक से लिखा गया गीत शानदार है ।

तुम क्या जानो से
आठ बरस के बच्चे से बस्ता छिन जाना
झूठे कप प्लेट होटल में धोकर पैसे चार कमान

आक्रोश पैदा करने वाली पंक्तियां हैं । तमाम गीत अपनी बात कहने में सफल है एवं आप को हृदय से बधाई

 

 Vijay Panjwani: 
आज राजेन्द्र श्रीवास्तव जी के गीत सचमुच पटल को समृद्ध कर रहे हैं। सीधी
सरल सी भाषा में लिखे गए । हाशिए के लोगों के दर्द को बखूबी उजागर करते हैं।
जिन्हें पढ़ कर असहज सा लग रहा है  !
1 " पसरे  सन्नाटे "
दीनू ने बोए थे गेहूं
समरथ ने काटे
2 " तुम नहीं निकले घर से "
गुप्त समझौता  हुआ फिर
नेवलों का विषधरों से
5 " तुम क्या जानो "
कभी बांस की फांस धंसी न _
कभी पांव न फटी बिवाईं
तुम क्या जानो पीर पराई
भरी दोपहरी लेकिन अब तक
उसकी माँ वापस घर न आई
फिर बिटिया की रुकी सगाई  !
राजेंद्र जी को हार्दिक बधाई
ब्रज जी और सुरेन जी को धन्यवाद्

Sandhya Kulkarni: 
ये सत्य है कि , नई कविता में विचारों की इतनी सघनता है कि , रस कहीं छिंटक गया सा लगता है ऐसे में राजेन्द्र जी के गीत पढ़ना एक ताज़ा बयार की तरह महसूस करना है ।   संवेदन से शून्य /हृदय पर पसरे सन्नाटे  गीत नए बिम्बों से पूरित है ।    गुप्त समझोता हुआ फिर /  नेवलों का विषधरों से  गीत में जिस तरह अपनी बात रखी गयी है समाज की चिंता झलकती है   । तीसरा गीत श्रमजीवी वर्ग की गाथा कह रहा है और स्वाभिमान से रहने की बात कह रहा है । गीत जनवादी दृष्टिकोण लिए है , इस नवाचार को सलाम । कवि श्रृंगार से भी अछूते नहीं हैं , देखिये कितनी ख़ूबसूरती से कह रहे हैं  :-- सांसों की माला में हम तुम / यह क्षण यह मुस्कान पिरो लें  राजेन्द्र जी के गीत जहाँ  एक ऒर छंद की मर्यादा का निर्वाह करते चलते हैं , समय की पुकार को भी अपने नवाचार में पिरोते चलते हैं ।


 Braj Shreewastav: 
इन गीतों की विशेषताएं हैं इनमें वैचारिक परिपक्वता और समकालीन सरोकार।
जैसा कि कहा जाता है कि लय हर मन की पहली पसंद है, यहां लय अपने सौम्य में है,शोर में या मद में नहीं।लय एक बैशाखी होना चाहिए, मंजिल नहीं, यह बात इन गीतों में है। ऐसे गीत ही कविता प्रधान होते हैं, जैसे ये हैं।
सादर।

Anil Kumar Sharma: 
श्री राजेन्द्र जी के गीत समाज की विविध उलझनों की डगर से निकलते हुऐ ,व्यंग्य के सधे हुऐ तीर छोड़ते हुऐ एक लय ताल में सफ़र करते हुऐ अपनी प्रभावी यात्रा पर निकल पड़े हैं ।
पाठक को कुछ रुक कर ,सोचने पर मजबूर करते गीतों के लिये श्री राजेन्द्र जी को बधाई


Jyoti khare :
 एक समय था जब गीतों और गजलों को समकालीन कवियों या यूं कहें प्रगतिशील कवियों ने बहुत पीछे धकेलना शुरू किया था, गीत वाकई अपनी पहचान खोने लगे थे और गजल मुशायरों में समाहित होने लगी थी ऐसे समय में शम्भूनाथ नाथ जी ने नवगीत दशक के संपादन किया और देश के चर्चित गीतकारों को नया प्लेटफार्म दिया. माहेश्वर तिवारी, उमाकांत मालवीय, अनूप अशेष, भगवान स्वरूप सरस,दिनेश मिश्र,राम सेंगर, भदौरिया जी जैसे गीतकारों को नयी दिशा दी, बाद में अविनाश चौहान, पूर्णिमा वर्मन ने गीतों के लिए बहुत सार्थक कार्य किये. रहा सवाल गजल का तो जो लोग गजल को नकारते थे वही लोग दुष्यन्त की गजलों के गुणगान करने लगे.
गीता पंडित जी आज के गीतों के परिद्रश्य में अच्छी और सार्थक भूमिका लिखी है.
भाई राजेन्द्र श्रीवास्तव के गीत मन को छूते हैं , नवगीतों में जो गांव का बोध होता है, उससे अलग हटकर समकालीन प्रतीकों और बिम्बों को लेकर अपने गीत रचे हैं यह इन गीतों की विशेषता है , इन गीतों की एक और खास बात है कि शब्दों को सलीके से गीतों में पिरोया है कहीं भी इस नहीं लगा कि जबरन कठिन शब्दों को धरा गया हो, सुगमता, सहजता इन गीतों की जान है.
मध्यमवर्गीय मानसिकता के ताने बाने में बुने आज के गीत मन को मथते हैं और सराहने को मजबूर करते हैं.


Akhilesh Shreewastav:
 बहुत कम लोग है जो छंद मे लिख रहे है पढ़ें जा रहे है तर छप रहे है । लय कविता का अनिवार्य तत्व है अकविता में उसे बनाये रखने का शऊर मुश्किल से आता है छंद उस लय को नियम के तहत स्थापित करता है अकविता में लय साधना हो तो छंद में शुरुआत आवश्यक है मुक्तिबोध तक ने छंद लिखा । यह स्मृति का मंत्र है छापे खाने की मशीन न होती तो अकविता शायद ही पनप पाती ।विश्व की सबसे शानदार अकवितायें भी जन के स्मृति में नही रहती । अकादमीक व हिंदी में स्नातको को छोड़ दे तो आज भी कविता का मतलब छंद ही है । राजेंद्र जी को बहुत बधाई ।

Madhu Saksena: 
राजेन्द्र जी हर फन में माहिर है ।आज उनके नवगीत पटल पर है ।गीतों में लय रस के साथ आज की विसंगतियों पर भी बात की गई है ।सहज सरल और सुंदर शब्द गीत   जन जन तक पहुंच जाने के क़ाबिल हैं ।
सारा दिन ढोकर प्रयाग कण
मधुमक्खी रोयी
इस पूरे अन्तरे में व्यापकता है ।अलग अलग पाठ है और सब पाठक इसे अपने तरीके से अर्थ के साथ महसूस करेगें ।
लेखन की यही सफलता राजेन्द्र जी ने हासिल की है ।
चीखती रह गयी वह
तुम नही निकले घरों से

धिक्कार ,लताड़ ,चिंता ,आशंका  समझाइश सभी भाव शामिल है ।

Nilima Karaiya:
पहले सन्नाटे  कविता में  विषमता की पीड़ा है। संवेदनाओं  की शून्यता से मानवता  का अवमूल्यन द्रष्टव्य है। एक एक पंक्ति विवशता की स्याही  से रचित है।

तुम नहीं  निकले घरों  से-
यह कविता  अंदर तक झकझोर गई ।इंसानियत ने इस कदर दम तोड़ा है कि वही शर्मसार  हो रही है।
बेहद मार्मिक
हम मानव हैं
संभवत  यह मेहनतकश मजदूर की व्यथा  को दर्शाती उसके हौसले  और उत्साह  की कविता है।और बेहतरीन सोच की सकारात्मक  रचना है।
चलो मौन के पट हम खोलें-
यह टूटते बिखरते रिश्तों  को बचाने  की कवायद है।अपने  अहम् को त्याग  हम थोड़ा  विनम्र  बनें। छोटी  मोटी  गल्तियों को  नजरअंदाज करें। वाणी के संयम को मधुरता की लगाम संयमित  रखें। तो हमारे रिश्ते हमारे  हाथ में  हमारे  साथ रहेंगे।
तुम क्या  जानो
यह कविता  बहुत तकलीफदेह लगी।धीरे-धीरे  जो वर्ग भेद की या कहें  संपन्नता और विपन्नता की गहराती खाई के कारण दिहाड़ी मजदूर या समतुल्य लोग  कैसे  जीवन यापन  करते हैं  यह सिर्फ  वही  जान सकते  हैं।
सभी  नवगीत  समकालीन  परिस्थितियों का जीवित चित्र  प्रस्तुत  करते हैं। 










Wednesday, July 18, 2018


उपन्यासनामा: भाग तीन  ,रुकोगी नहीं राधिका 
उषा प्रियंवदा 


उषा प्रियंवदा 


 आधुनिक बोध की अग्रदूत "रुकोगी नहीं राधिका"

रुकोगी नहीं राधिका उषा प्रियंवदा का  दूसरा उपन्यास है। ‘राधिका’ जो कि आधुनिक बोध की प्रतीक है, इसकी नायिका है जो विदेश में कुछ समय रहने के बाद वापस भारत आयी है। यहाँ उसके पिता हैं, सौतेली माँ विद्या है। उसके भाई-भाभी हैं, कुछ मित्र हैं और सहेली हैं, नानी हैं,रज्जू मामा हैं, अक्षय, मनीश और डैन जैसे व्यक्ति मित्र हैं। राधिका के व्यक्तित्व की रेखाएं जिस परिवेश में खींची गईं हैं वह अपने समय से बहुत आगे की सोच के रंग है। वह सही अर्थों और संदर्भों में आधुनिक स्त्री है। वह पत्रकार डैन के साथ विदेश गई और वहाँ कुछ समय तक रहने के बाद वापस भारत आयी है। यहाँ उसके पिता हैं, जो कुछ असामान्य हैं, कम बोलते हैं, अपने काम में मस्त रहते हैं। उनकी दूसरी पत्नी विद्या है, उससे भी कोई खास आत्मीय संबंध नहीं है। यह एक नगरीय पारिवारिक परिवेश है जिसमें राधिका पली बढ़ी है।






राधिका के माध्यम से एक आधुनिक स्त्री की सोच, विचारधारा, दृष्टिकोण और जीवन तथा पुरुष के प्रति उसका अपना रवैया प्रस्तुत है। राधिका का चरित्र बहुत गहरे तक स्पष्ट है। वह जीवन से क्या चाहती है? पुरुष का साथ भी चाहिए मगर सिर्फ ‘प्ले बॉय’ की तरह नहीं। एक स्थायी जीवन साथी चाहिए। अक्षय के प्रति उसका झुकाव और आकर्षण इसी स्थायित्व को लेकर है। मनीश के स्वभाव में वह स्थायित्व नहीं है। मनीश विदेश में विश्वविद्यालय में उसके साथ था पर वह राधिका को उस रूप में प्रभावित नहीं कर सका यद्यपि - ‘‘कामना उसकी मनीश ने भी की थी, पर उसे राधिका ने दूर रखा था, उसकी ओर तीव्र आकर्षण अनुभव करते हुए भी वह संयत रही थी,  उसने अपने को बार-बार याद दिलाया था कि मनीश जल्दी ही स्त्रियों से थक जाता है।’’1

 डैन के साथ के गुजारे वक्त से मिले अनुभव  के बाद राधिका का जीवन दृष्टिकोण अलग तरह से निर्मित हुआ जैसा कि उषा जी ने लिखा - ‘‘और डेन के बाद, राधिका किसी पुरुष के लिए शृंखला में एक कड़ी नहीं रह जाना चाहती थी। वह तो एक छत्र साम्राज्ञी बनना चाहती थी, जैसाकि केवल अक्षय के साथ ही संभव था।’’2 

राधिका एक स्वतंत्र व्यक्तित्व की और देश दुनिया के अनुभवों से पकी स्त्री है। वह अपने निर्णय स्वयं साहसपूर्वक लेने की क्षमता रखती है और समय समय पर निर्णय लेती भी है। इस अर्थ में वह एक आधुनिकता बोध से संपन्न स्त्री है। स्त्री जब घर और पितृसत्तात्मक व्यवस्था के घेरे से बाहर निकल पाती है तो उसके अनुभव उसे मजबूत बनाते हैं, परिपक्व बनाते हैं और पुरुष पर निर्भरता कम होती जाती है। राधिका जीवन में पुरुष पर निर्भरता और पुरुष के नियंत्रण से स्वयं को मुक्त कर लेती है -

‘‘पापा को छोड़ डेन के संग रहते हुए उस एक वर्ष में राधिका में जैसे कई वर्षों का अनुभव, पकापन एकाएक आ गया था और तभी डैन से अलग होने का साहस उसमें जगाा था। अब मैं स्वतंत्र हूँ, परिपक्व भी और गढ़ सकती हूँ अपना जीवन, अपना भविष्य।’’3

इस तरह अपना जीवन गढ़ सकने का साहस और निर्णय आज भी कितनी पढ़ी-लिखी स्त्रियां ले पा रही हैं। यह देखने और समझने की बात है। राधिका अपने समय और समाज में स्त्रियों की पराधीनता और दोयम दर्जे के लिये सोचती है -‘‘राधिका ने कहा, तभी तो हमारे यहाँ कितनी लड़कियों का चरित्र पूर्णतः विकसित हो पाता है? माता-पिता अपने ही विचारों को उन पर थोपते रहते हैं। रहा मेरा सवाल, मैं स्वेच्छापूर्ण जीवन की इतनी आदी हो गई हूँ कि विघ्न सह नहीं पाती।’’4 यह अपना जीवन गढ़ने का संकल्प और साहस घर से बाहर निकलने से आया है।

 घर की चाहरदीवारी में कैद स्त्री अपना भविष्य गढ़ने के बारे में सोच भी नहीं पाती। वह स्वयं को वस्तु बनने से इंकार करने वाली है, वह दूसरों से इस्तेमाल की जाये यह भी वह नहीं होने देती तभी तो मनीश को रिजेक्ट करती रहती है। यद्यपि वह महसूस करती है कि पुरुष विहीन जीवन में एक बोरियत और ऊब है - ‘पुरुषहीन जीवन में एक उकताहट तो अवश्य होती है, पर साथ ही एक निश्चिन्तता भी, जो कि राधिका को काफी सुखद लगने लगी थी। अब मनीश उस संतुलन को फिर गड़बड़ कर देगा। वह चाहता क्या है? उसे न मित्रों की कमी है न लड़कियों की।’’5
राधिका मनीश से कहती है कि ‘‘हो सकता है कि मैं अक्षय से विवाह कर लूँ। मेरे जीवन में प्ले-ब्वॉय’ के लिए स्थान नहीं है। मैं संगी चाहती हूँ, जिसमें स्थिरता हो, औदार्य हो, जो मुझे मेरे सारे अवगुणों सहित स्वीकार कर ले। मेरे अतीत को झेल ले।’’6

 राधिका की स्वतंत्र चेतना को झेलना आधुनिक पुरुष के बस में नहीं है। वह घर से बाहर तो राधिका को जीना चाहता है पर घर में पत्नी के रूप में नहीं। अक्षय भी पितृसत्तात्मक मानसिकता वाला है तभी तो वह सोचता है - ‘‘ठीक है, उसने सोचा राधिका मुझे आकर्षित करती है - उन्हीं सब बातों के कारण, जिन्हें मैं पत्नी में नहीं देखना चाहता। पत्नी मेरे घर में रहेगी, मेरी और बच्चों की देखभाल करेगी और मेरे प्रकाश से आलोकित होगी। राधिका स्वेच्छाचारिणी है, राधिका में तेज है, और राधिका एक अर्थ में दूसरे की विवाहिता है...फिर भी अच्छी लगती है। इस बार वह अपने को दमित नहीं करेगा, अगर एक उमड़ती हुई लहर उसे बहा ले जायेगी, तो उससे उबरने के लिए हाथ-पैर नहीं मारेगा।’’7






यह पुरुष का दोहरा चरित्र हैं।
 राधिका यह सोचना भी कितना अलग  है कि जब उसके पापा ने अपनी राह अलग चुन ली तो वह भी अपनी राह स्वयं चुनेगी। ‘‘पापा ने जब अपने जीवन की राह चुन ली, तो वह क्यों नहीं स्वतंत्र, निर्मम हो अपने लिए राह खोज लेती।’’8
राधिका एक स्वतंत्र सोच वाली लड़की है। वह आत्मविश्वास से भरपूर और स्वयं निर्णय करने की क्षमता और साहस रखती है। तभी तो वह पिताजी और बड’दा के सामने विवाह न करने का फैसला सुना देती है और उनके हर निर्णय को मानने से इंकार करती है।

‘‘मैं अभी विवाह नहीं करना चाहती,’’ राधिका ने दृढ़ स्वर में कहा।....‘‘जो आप चाहते हैं वही हमेशा क्यों हो? क्या मेरी इच्छा कुछ भी नहीं है? मैं आपकी बेटी हूँ, यह ठीक है, पर अब मैं बड़ी हो चुकी हूँ और मैं जो चाहूँगी वही करूंगी।’’ इतना आत्मविश्वास और साहस मगर असंयतात्मना नहीं है राधिका। उसके चरित्र और सोच में एक अलग किस्म का गौरव है, विश्वास है, संयम है जिसके बल पर वह यह कहने का साहस कर सकी।
‘‘बस बहुत हो चुका। आपने अपनी इच्छाओं के सामने कभी मेरी खुशी का ख्याल नहीं किया। बस, अब आप लोग मुझे अकेला छोड़ दैं।’’9 कितना भरोसा है राधिका के इन शब्दों में। हिकारत नहीं है। पर दृढ़ता में कोई कमी नहीं है।

राधिका एक विशिष्ट चरित्र है

‘रुकोगी नहीं राधिका’ एक अलग मिजाज का उपन्यास है। इसमें आधुनिकताबोध बहुत स्पष्ट है। राधिका का जीवन और विचार सामाजिक बिंडबनाओं के बीच से अपनी राह तलाशने का कार्य करते हैं। राधिका पर पितृसत्तात्मक मूल्यों का कोई दबाव नहीं है। सुषमा की तरह पिता के दायित्वों को निभाने के लिए पिता बनकर रहने की विवशता उसके सामने नहीं है। वह इस बात को कहती है कि आपने अपनी राह चुन ली तो मैं क्यों नहीं चुन सकती। राधिका का चरित्र हिन्दी उपन्यास और भारतीय समाज के लिए ठीक उसी तरह चुनौतीपूर्ण और नया था जिस तरह कृष्णा सोबती की ‘मित्रो’। इन चरित्रों को झेलने का साहस और समझने की कला से अभी हमारा समाज परिचित नहीं था। इसलिये या तो इन पर आक्षेप लगाये गए या उनकी उपेक्षा की गई। ‘मित्रो’ की बोल्डनेस के कारण उस पर आक्षेप लगे, परन्तु राधिका ने जिस धीर गंभीर तरीके से पितृसत्ता की जड़ों में मट्ठा डालने का कार्य किया उसे न समझने के कारण उसकी उपेक्षा अधिक हुई।

‘रुकोगी नहीं राधिका’ की राधिका अमेरिका में तीन वर्ष रहकर वापस आती है। इस अर्थ में वह ‘शेष यात्रा’ और ‘अन्तर्वंशी’ की नायिका से अलग है। अनुका और वाना अमेरिका जाने के बाद वापस नहीं आतीं, वे विवाहित होकर वहाँ जाती हैं, जबकि राधिका घर से अपनी मर्जी से अपने पुरुष मित्र के साथ विदेश जाती है और अपनी मर्जी से वापस आती है। चूँकि वह विवाह के कारण वहाँ नहीं गई, वह अपनी मर्जी से अपने दोस्त के साथ गई थी, इसलिए वापस आ जाती है। शेष यात्रा की अनुका और अंतर्वंशी की वाना विवाह के बाद वहाँ गई, अतः वे वापस नहीं आतीं और जीवन की विसंगतियों का सामना करती हैं। राधिका अमेरिकी जीवन की चकाचौंध में नहीं फँसती जैसी की वाना फँस जाती है और न वह अनुका की तरह पति के द्वारा छोड़ दी गई स्त्री है, बल्कि वह स्वयं अपने दोस्त को छोड़कर वापस आती है।

तीन वर्ष बाद जब वह भारत के हवाई अड्डे से बाहर आई तो कोई भी उसे लेने नहीं आया। उसके पापा, भाई भाभी और उनके बच्चे। यह भारत में वापसी का पहला अनुभव है, जो उसे अपने विदेश जाने के निर्णय के फलस्वरूप हुआ है। अपने देश में अपने लोगों के बीच वापस आने के संबंध में शायद उसने सोचा भी नहीं था कि उसे दिल्ली में उतरने के बाद ‘कहाँ जाना है?’ इस बारे में सोचना पड़ेगा। राधिका के अंदर उपजा अकेलेपन का बोध आधुनिकताबोध का पहला चरण है।

‘‘साठ के दशक में ही उषा प्रियंवदा ने ‘रुकोगी नहीं राधिका’ उपन्यास के जरिए नारी-मुक्ति-प्रश्न को एक नए कोण से देखने की कोशिश की। हिन्दी जगत में राधिका का चरित्र जब सामने आया तो आम पाठक के लिए कुछ असामान्य और अपरिचित-सा था। उससे तादात्म्य स्थापित करने के लिए अधिक प्रौढ़ और खुले दिमाग की जरूरत थी। उच्च अभिजात परिवार की सुशिक्षित संभ्रांत युवती के इर्द-गिर्द केन्द्रित होते हुए भी इस उपन्यास ने भारतीय समाज के मूल्यगत संक्रमण की प्रक्रिया को प्रतिबिम्बित किया। पुराने समाज के परंपरागत मूल्यों, आस्थाओं को नये समाज के मूल्यों के टकरावों के बीच ‘राधिका’ अपने लिए उपयुक्त पुरुष की तलाश करती हुई, स्थापित सामाजिक मान्यताओं के एकदम आमने सामने आई होती है।

 पहली बार शायद नारी की अस्मिता-संहार करने वाली भारतीय विचार पद्धति पर मुखर होकर इस उपन्यास ने प्रश्नचिह्न खड़ा किया।’’10


राधिका डेने से अलग होने के बाद  यह निश्चित किया था कि वह ‘स्वयं के होने को’ प्रवाह में बहने नहीं देगी। अपने स्वत्व को समाप्त नहीं होने देगी, रेत बन कर बहने नहीं देगी चाहे पुरुष का साथ मिले या न मिले।
सच यही है कि पितृसत्तात्मक व्यवस्था में इस तरह की विचार और मूल्यवाली स्त्री अपने को आंट ही नहीं सकती। उसके स्वत्व और स्वतंत्र व्यक्तित्व को पचाने के लिए एक नई व्यवस्था और नए मूल्यों की दरकार है जिसमें पितृसत्तात्मक व्यवस्था का जरा भी अंश न हो। राधिका पितृसत्तात्मक व्यवस्था की उस दरार पर ऊँगली रखती है, जिसमें पुरुष को तो अपनी राह चुनने की आजादी है, मगर स्त्री को नहीं और ऐसा करनेवाली स्त्री को यह व्यवस्था अपने से बाहर रखती है, उसे अनफिट महसूस कराती है, बेगाना और अजनबी महसूस कराती है, ताकि घूम फिरकर वह उसकी शरण में आ जाए।







उषा जी के स्त्री चरित्रों में राधिका एक अकेला ऐसा चरित्र है जो पितृसत्ता से जमकर मुठभेड़ करता है। उसकी लड़ाई पितृसत्ता की विचारपद्धति से है। वह पुरुष से नफरत नहीं करती। पुरुष उसका दुश्मन भी नहीं है। वह पुरुष के रूप में पिता, भाई, दोस्त, प्रेमी सब को स्वीकार करती है। पर इन सबको अपने जीवन का कोई भी निर्णय करने का अधिकार नहीं देती। वह अपने संबंध में तमाम फैसले स्वयं लेती है। राधिका का यह सूक्ष्म विद्रोह है पितृसत्ता की तर्करचना के खिलाफ। वह अपने व्यक्तित्व, पहचान और अस्मिता को लेकर एकदम जागरूक और सतर्क है। अपने स्वत्व की शर्त पर वह कहीं भी किसी भी स्तर पर समझौता नहीं करती। उसने झुकना और झुकाना दोनों को ही अपने जीवन से बाहर कर रखा है। समझौते का कोई रास्ता  वह नहीं अपनाती। न देश में न विदेश में। उसके पास समाज क्या कहेगा? लोग क्या कहेंगे? परंपरा और सिद्धांत अनुमति देंगे या नहीं? इस तरह कोई तर्क शृंखला उसे विचलित नहीं करती, जैसा की सुषमा को विचलित किए हुए है। इस ‘राधिका’ का चरित्र कृष्णा सोबती के ‘मित्रो’ से ज्यादा विद्रोही और बोल्ड माना जा सकता है।

राधिका के पास अपनी सोच है, विचार हैं, अपनी भाषा और सिद्धांत हैं। वह बोलना जानती है, उसके पास हर तर्क का जबाव है और उस जबाव को प्रूफ भी करना जानती है। समाज और परिवार के तर्क और सीमायें उसे अपने तईं समर्पित नहीं करा पाते हैं। उसके अन्दर विवशता का कोई धागा नहीं है। वह आधुनिकताबोध को अपने जीवन में पूरी तरह उतार चुकी है। स्वच्छंदता और उन्मुक्तता को जीते हुए भी वह कहीं से भी नैतिक/अनैतिक और श्लील/अश्लील की परिभाषाओं से अपने को दूर रखती है। इस अर्थ में यह राधिका किसी के रोके रुकनेवाली नहीं है।

क्या राधिका जैसी आधुनिकबोध सम्पन्न अपने लिए परिवार और परिवेश से निर्मम होकर अपनी राह चुनने का साहस जुटा पायेंगी और क्या वे पुनः पितृसत्ता के आधुनिक संस्करण के जाल में नहीं फंसेंगी? सुषमा अपनी राह नहीं चुन सकी यह कहने की अपेक्षा यह कहना ज्यादा सही होगा कि उसने राह तो चुन ली थी, पर उस राह पर चलने का साहस वह नहीं जुटा पाई और विदेश यात्रा करने का मौका उसके पास से फिसल गया।

०००

डॉ संजीव जैन
 डॉ संजीव जैन 


संदर्भ सूची
1. रुकोगी नहीं राधिका, उषा पियंवदा पृ. 119 
2. वही, पृ. 119
3. वही, पृ. 122
4. वही, पृ. 64
5. वही, पृ. 126
6. वही पृ. 82
7. वही, पृ. 69
8. वही, पृ. 67
9. वही पृ. 52
10. कुछ जीवन्त कुछ ज्वलंत, कात्यायनी, पृ. 164

000
डॉ. संजीव कुमार जैन
सहायक प्राध्यापक हिन्दी
शासकीय संजय गाँधी स्मृति स्नात्कोत्तर महाविद्यालय,
गुलाबगंज 
522 आधारशिला, बरखेड़ा
भोपाल, म.प्र.
मो. 09826458553



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Wednesday, July 11, 2018

उपन्यासनामा: भाग दो ,कालापादरी 

मानवीय संदर्भों की कहानी: काला पादरी


तेजेंदर गगन:स्म्रतियां शेष 
10 मई 1951,..12 जुलाई 2018 



तेजिंदर गगन 




तेजिन्दर के उपन्यास के आरंभ में यह कविता अंश उद्धृत है

कौन हैं ये लोग?
घुटनों तक जमीन में धँसे हैं जिनके शरीर
कौन हैं ये लोग?
जिनकी आवाज खो गई है बियाबाँ में
परछाईं भी जिनकी छोड़ गई उनका साथ
अविश्वास पर से भी उठ गया जिनका विश्वास
कौन हैं ये लोग?
हाँ, ये वही लोग हैं
जिन्होंने तड़के उठकर चाँद को मरते देखा था
ठीक भोर के वक़्त जिन्होंने शंख का नाद सुना था
घन्टियों की आवाजें सुनीं थीं
परन्तु जिनकी अपनी कोई आवाज नहीं
बियाबों में खो बैठ हैं 
अपनी परछाईं....’’
                           -ग्याना (अफ्रीका) के कवि मार्टिन कार्टर की कविता 
                             ‘भूख का विश्वविद्यालय’ का एक अंश


‘‘मुझे लगा कि जिस कमरे में मैं फिलहाल बैठा हूँ उस की छत पर जाले ही जाले फैल आए हैं, आसपास सब कुछ निष्क्रिय है, सिर्फ मकड़ियाँ है जो सक्रिय हैं और बाकी सब कुछ ठहर गया है, कहीं कोई गतिविधि नहीं, जीवन का कोई स्पंदन नहीं, कुछ पुरानी तस्वीरें दीवारों पर टंगी हैं जिनके जिनके इर्द गिर्द धूल है और जाले हैं, कुछेक स्मृतियाँ हैं जालों से बुनी हुई, कुछ बूढ़े और उदास चेहरे हैं जिनकी आंखों में अभी भी रोशनी की औपचारिकता बाकी है। वे अभी भी इस उम्मीद में है कि अपना वजूद खत्म होने से पहले वे इस दुनिया को बदल कर जायेंगे। एक जिद है, जालों से घिरी हुई, छत की किसी मुंडेर पर कुछ पुस्तकें हैं, जिनमें इस दुनिया को बदल दिए जाने का घोषणा पत्र है और उसके आसपास भी जाते हैं।’’पृ16

‘‘मैं जब अपने इर्द गिर्द देखता तो मुझे लगता कि ये सारे लोग जिनमें मैं भी शामिल हूँ, उन्हीं लोगों से मान्यता प्राप्त करने की होड़ में लगे हैं, जिनका अपने अंतर्मन से विरोध करते हैं। हम उसी व्यवस्था का संरक्षण चाहते हैं, जिसके विरोध में बड़ी बड़ाी बातें करते हैं। ऐसा शायद हम इसलिए करते हैं कि हम अपना नैतिक साहस कहीं न कहीं खो चुके हैं।’’पृ16

‘‘कभी कभी हम समझते हैं कि जीवन के कुछ उलझे हुए सवालों  को स्थगित कर देने से वे स्वतः ही खत्म हो जाते हैं। अक्सर ही हम अपनी पीठ के पीछे बहुत कुछ इकट्ठा हो जाने देते हैं। कूड़े की तरह। जिसका सामना हमें कभी तो करना ही पड़ता है और एक दिन वह सड़ांध बन कर अपने ही जिस्म से आ चिपकता है। मैंने सोचा और डर गया।’’पृ 24

‘‘पहले दिन जब चावल का दाना मुहं  में नहीं जाता तो लगता है कि जैसे कुछ गुम हो गया हो, पर उम्मीद रहती है कि कल तक मिल जायेगा, अगले दिन भी जब चावल का दाना नहीं मिलता तो आस खत्म होने लगती है, पर लगता है कि चलो एक दिन और, पर तीसरे दिन के बाद सोचना पड़ता है कि चावल का स्वाद मूंह में घुलेगा भी या नहीं, आदमी उसकी गंध तक भूल जाता है, उसके बाद कुछ ऐसा होता है कि जिधर देखो चावल ही चावल बिखरे हुए नजर आने लगते हैं, पर आप उनका स्वाद मुंह में नहीं घोल पाते, चावल के लिए अपनीं अंदर की सारी संवेदना आदमी खो देता है, यहाँ तक कि वह चावल के दाने को अपने शरीर के रोएं रोएं में महसूस करता है। यह बहुत त्रासद अनुभव है होता है, क्योंकि आप महसूस तो करते हैं कि आपके जिस्म के रोएं रोएं में चावल भरा पड़ा है, लेकिन आप उसे पका नहीं सकते। उसको पकाने का अर्थ खुद को पकाने जैसा होता है। पहले देह की शक्कर सूखती है, फिर नमक, फिर पानी, फिर खून का बहना और आखिर आपकी सांस रुकने लगती है। आप आसमान की तरफ देखते हैं तो अंधेरा ही अंधेरा दिखायी देता है। कई बार तो लगता है कि जैसे पूरा आसमान सितारों से नहीं बल्कि चावल के दानों से भरा पड़ा है, जहाँ आप पहुँच नहीं सकते, जिसे सिर्फ आप देख भर सकते हैं, छू नहीं सकते, फिर खाने का सवाल ही पैदा नहीं होता और फिर अगर आप बिरई लकड़ा हैं और राज्य में पैलेस विरोधी सरकार है तो चर्च तो आपको पूछेगी नहीं, पर पैलेस को कोई आदमी आपको बीजाकुरा से उठायेगा और अंबिकापुर के जिला अस्पताल में ला कर भर्ती कर देगा। फिर अखबार वाले आयेंगे, टीवी और रेडियो वाले आयेंगे अपने बड़े बड़े कैमरों के साथ, पैलेस की महारानी खुद आयेंगी और आप से पूछेंगी, ‘कबसे चावल नहीं खाया?’’पृ.26-27

‘‘हम अपने चेहरों से भाग कर कहाँ चले जाते हैं? मैंने सोचा था। क्या यह हमारी पढायी लिखायी है या हमारा कथित पढ़ा लिखा समाज हो हमें अपने ही चेहरे से पलायन का रास्ता दिखाता है। वे कौन से मूल्य हैं जो हमारी जीवन की दृष्टि को ही बदल देते हैं।’’ पृ. 52



काला पादरी उपन्यास अपने सीधे सहज कथा प्रवाह में मानवीय संबंधों और संवेदना को उसके तमाम बहशीपन, क्रूरता और विसंगतियों के साथ उजागर करता है। मानवीय संदर्भ और संवेदना की जब बात की जाती है तो उसे अमूर्त मानववादी मूल्यों से संबद्ध नहीं करना चाहिए। मानवीय संदर्भ भौतिक जीवन से नाभिनालबद्ध होते हैं। ये संदर्भ मानवीय नियति को चुनौती देते हैं और व्यवस्था तथा संस्थागत धर्म और मानवीय रिश्तों की चीर-फाड़ भी करते हैं। हम अपने जीवन के विभिन्न संदर्भों मंे देखते हैं कि व्यवस्था और संस्थागत धर्म ने हमारे जीवन को कितने गहरे तक विचलित कर रखा है और हमारी चेतना को कितने रूपों में प्रभावित कर रखा है। इस उपन्यास के मानवीय संदर्भ विभक्त और विघटित मानवीय चेतना के विभिन्न रूपों को पूरी यथार्थता के साथ उद्घाटित करते हैं।

मानवीय चेतना जो भौतिक संबंधों की आध्यात्मिक अभिव्यक्ति है, को किसी धर्म, संस्था, संस्कृति, भाषा, स्थान या जाति के आधार पर शोषित या उत्पीड़ित नहीं किया जा सकता और ऐसा करना मानवीय संदर्भ को संस्थाबद्ध करना ही होगा जो कि मानवता के विकास के प्रति भयंकर अपराध माना जाना चाहिए।
काला पादरी उपन्यास में आदित्य और जेम्स खाखा के बीच जो दोस्ताना संबंध बनता है वह एक विशुद्ध मानवीय संदर्भ के दौरान उपजता है। यात्रा के दौरान मुसाफिर खाने में वे दोनों मिलते हैं और चूँकि वे एक सही स्थान पर जाने वाले यात्री थे इसलिए वे सहयात्री बन गए और जीवन की यात्रा के विभिन्न पढ़ावांे को साथ साथ तय करते गए। इस यात्रा में अनेक यात्री और विभिन्न मानवीय संदर्भ सहज ही आते चले जाते हैं।

आदित्य बैंक में तबादला होकर गया है और वहाँ जिस तरह से वह आदिवासियों का शोषण देखता है, वह पूरे देश की स्थिति को संकेतित करता है। पूरे देश में भ्रष्टाचार का जाल बैंकों के माध्यम से ही फैल रहा है। बैंक कर्ज देते हैं, पर इस कर्ज का लाभ बैंक कर्मचारियों के साथ स्थानीय राजनैतिक और सामंतवर्गीय लोग उठाते हैं। वहाँ का जीता जागता मनुष्य तो सिर्फ अंगूठा लगाने और कर्ज की किस्त चुकाने में अपनी जमीन और पैदावार को लुटाता भर है। इस स्थिति में आदित्य की जो स्थिति है वह किसी भी मानवीय संवेदना के प्रति जागरूक इंसान की होगी ही।

‘‘मुझे लगा कि जिस कमरे में मैं फिलहाल बैठा हूँ उस की छत पर जाले ही जाले फैल आए हैं, आसपास सब कुछ निष्क्रिय है, सिर्फ मकड़ियाँ है जो सक्रिय हैं और बाकी सब कुछ ठहर गया है, कहीं कोई गतिविधि नहीं, जीवन का कोई स्पंदन नहीं, कुछ पुरानी तस्वीरें दीवारों पर टंगी हैं जिनके जिनके इर्द गिर्द धूल है और जाले हैं, कुछेक स्मृतियाँ हैं जालों से बुनी हुई, कुछ बूढ़े और उदास चेहरे हैं जिनकी आंखों में अभी भी रोशनी की औपचारिकता बाकी है। वे अभी भी इस उम्मीद में है कि अपना वजूद खत्म होने से पहले वे इस दुनिया को बदल कर जायेंगे। एक जिद है, जालों से घिरी हुई, छत की किसी मुंडेर पर कुछ पुस्तकें हैं, जिनमें इस दुनिया को बदल दिए जाने का घोषणा पत्र है और उसके आसपास भी जाते हैं।’’1 






हम जिस युग में सांसे ले रहे हैं, उसमें मानवीय संदर्भों की कोई अहमियत नहीं है। मुनाफा और सुविधायें जुटाने की होड़ जिस समाज का चरित्र बन गया हो वहाँ भूख से मरने के प्रति कोई संवेदना नहीं उपजती है। मानवीय जीवन का सबसे महत्वपूर्ण संदर्भ है ‘‘भूख’’, यह एक भौतिक अस्तित्व की चेतना है जो मानवीय जीवन को न केवल अस्तित्व प्रदान करती है बल्कि उसमें जीवन के अन्य पक्षों के प्रति जागरूकता पैदा करती है। हमारी तमाम व्यवस्थायें -धर्म, समाज, राजनीति, उत्पादन के साधन और उन पर अधिकार का संघर्ष इस मानवीय भूख को ही नियंत्रित करने के माध्यम हैं।


इस उपन्यास का एक बहुत ही दर्दनाक मानवीय संदर्भ है भूख। भूख से होने वाली मौत और उसके साथ खेलने वाले धर्म और राजनीति के चरित्र को परत दर परत खोलता है यह उपन्यास। आजादी के साठ वर्ष बाद भी सरगुजा जैसे क्षेत्र -‘‘लोकतंत्र के सबसे सस्ते सामंतीय संस्करण हैं।’’2 '

यह लोकतंत्र का सबसे सस्ता सामंतीय संस्करण दरअसल पूरा देश ही है। जिस देश में आय और जीवन के साधनों का इतना असमान वितरण हो कि लोग भूख से मरें और कर्ज के कारण आत्महत्या करें, वह सामंतीय जीवन मूल्यों से भी गयाबीता संस्करण ही माना जायेगा। आदित्य समाचार पत्र में दो खबरें पढ़ता है कि सरगुजा के एक गाँव बीजाकुरा में एक आदिवासी औरत और उसके दो बच्चों की मौत भूख से हो गई। और दूसरा एक सत्तर साल के बूढ़े व्यक्ति को उसकी इच्छा के खिलाफ अंबिकापुर के जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया। बताया गया कि वह बूढ़ा मरने वाली औरत का श्वसुर था और उसका लड़का भी कुछ दिन पहले भूख से मर चुका था।’’3 

इस खबर पर लेखक की टिप्पणी है -‘‘खबर के दोनों चेहरे मेरे सामने थे। साथ-साथ। भूख का क्या कोई एक आकार होता है? मैं नहीं जानता था। मैंने भूख को कभी नहीं देखा था। भूख के बारे में सुना जरूर था, लेकिन वह भी इतना नहीं कि उसकी आवाज को अपनी अतंड़ियों तक महसूस कर सकूँ।
दरअसल, सच बात तो यह थी कि अपने जिस्म के बारे में सोचते हुए कभी शरीर की अंतड़ियों के बारे में नहीं सोचा था। मुझे लगता था कि अपनी देह के प्रति बहुत सतर्क लोग भी संभवतः इस बारे में कुछ नहीं सोचा करते।’’4 

एक तरफ भूख से मर चुका पूरा परिवार और दूसरी तरफ भूख के बारे में अनजान लोग। यह देश के विकास का गहरा अन्तर्विरोध है। भूख का कोई एक आकार होता है? यह सोचना भी मुश्किल है देश के मध्य और उच्च वर्ग के लिए। यहाँ एक ओर तो भूख महसूस ही नहीं होती लोग स्वाद और स्वास्थ्य के लिए तरह तरह के विटामिन और प्रोटीन वाले व्यंजन करते हैं और दूसरी ओर बिरई लकड़ा जैसे लोग हैं जो भूख से मर जाने के लिए तैयार हैं क्योंकि उसका पूरा परिवार भूख से मर चुका है मगर उसे जबरन अस्पताल में भर्ती करा दिया जाता है। इस पर डॉक्टर की टिप्पणी है कि उसकी किस्मत में राज योग लिखा था। यह शब्द सुनकर वह बिरई लकड़ा भी मर गया। इस मौत का व्यंग्य देखिए कि वह भूख के कारण मरना चाहता था पर उसे मरने नहीं दिया गया और अस्पताल में भर्ती करवादिया ताकि राज्य के लोककल्याणकारी चरित्र को प्रचारित किया जा सके और अखबार में यह समाचार परिवार के अन्य सदस्यों की मृत्यु के समाचार को ढंक ले। मगर असल व्यंग्य यहाँ है लेखक टिप्पणी करता है -

‘‘बहरहाल तुम्हें पता है न कि आज सुबह बिरई लकड़ा भी मर गया। हो सकता है कि वह भूख से न मरा हो, अस्पताल में किसी डॉक्टर के मूँह से ‘राजयोग’ शब्द सुनकर ही मर गया हो, यू नो, इफ यू आर पूअर, इट्स पार्ट ऑफ गेम फार देम।’’5 

वर्तमान पूँजीवादी लूट(लोक)तंत्र में भूख के प्रति हम और हमारी सरकार कितनी संवेदनशील है? सत्ता को पूँजीपतियों के मुनाफे की चिंता सर्वाधिक होती है। बजट के भीतरी तर्क जो आम जनता नहीं जानती उसमें आम जनता की रोज मर्रा के जीवन के लिए आवश्यक वस्तुओं पर से सब्सिडी कम करने के लिए मीडिया और नेता जितने तर्क विकास और ग्रोथ के रखते हैं, इन्हीं विकास और ग्रोथ के तर्क के आधार पर पूँजीपतियों को इन्सेटिव के नाम पर हजारों करोड़ की छूट दी जाती है ताकि देश की विकास दर कम न होने पाये। इस विकास दर का सबसे ज्यादा लाभ किसको मिलता है? पूँजीपतियों का मुनाफा हजारों करोड़ रुपयों में बढ़ता है और एक आम आदमी के जीवन के लिए गरीबी रेखा को महज 27 रुपये प्रतिदिन तक ले आया जाता है और मंहगाई बढ़ने के लिए तर्क दिया जाता है कि मध्यवर्ग और निम्नवर्ग की आय में वृद्धि होने से वह अधिक खाने लगा है इसलिए खाद्य वस्तुओं की कीमतें बढ़ रही हैं। इस व्यवस्था में भूख का कोई सवाल ही नहीं है। भूख से मरने वालों को सत्ता के नुमाइंदे आई.ए.एस अफसर किस दिशा में टर्न कर देते हैं इसका हवाला देखिए -






‘‘कुछ समाचार पत्रों में प्रकाशित, बीजाकुरा गांव में भूख से मृत्यु संबंधी समाचारों की विस्तृत जाँच की गई है। जांच से पता चला है कि इन क्षेत्रों में रहने वाले कई आदिवासी परंपरागत रूप से बंदरों और बिल्लयों का शिकार करते हैं और उनका मांस खाते हैं। बीजाकुरा में किसी भी व्यक्ति की मृत्यु भूख के कारण नहीं हुई है। तथा जिले के किसी भी क्षेत्र में ग्रामीणों के पलायन का समाचार जांच के बाद सही नहीं पाया गया है।’’6

यह खंडन सरगुजा के कलेक्टर का है। अमानवीय होती जा रही व्यवस्था के सबसे खतरनाक नुमाइंदे से और क्या अपेक्षा की जा सकती है कि वह अपना बयान उन मरने वाले आदिवासियों के पक्ष में देगा? क्या वे आदिवासी उसे कलेक्टरी की नौकरशाही के ठाटवाट प्रदान करते हैं। इस नौकरशाही की प्रतिबद्धता किसके प्रति है? जनता के प्रति या सत्तासीन नेताओं और पूँजीपतियों के प्रति? यह सवाल कोई मीडिया नहीं पूछता इन नौकरशाहों से की जांच का आधार क्या था? किसको जांच का अधिकार दिया गया? तुम जैसे किसी अन्य नौकरशाह ने ही तो जांच की होगी? वह क्यों अपने सुखों पर लात मारेगा? यदि वह यह रिपोर्ट दे देगा कि बिरई लकड़ा का परिवार कई दिनों से भूखा था और चावल का एक दाना भी उनके पेट में नहीं गया था तो आप नौकरशाहों को नैतिक रूप से और जनता के द्वारा जबरन आपके इस पद से हटा नहीं दिया जायेगा। इस देश में भूख से मौत तो लाखों होती हैं पर सरकारी आंकड़ों में शायद ही कोई भूख से मरता हो। नैतिक अधोपतन की अजीब दास्तां है हमारा लोकतंत्र। हम अपनी जिम्मेदारी निभाते तो हैं ही नहीं उसके प्रति जबावदेही को भी स्वीकार नहीं कर पाते निरंतर मरते मानवीय संदर्भों की कीमत पर भी।

रोज सत्ता और अधिकार का सुख भोगने वाले नौकरशाह, नेता और मीडिया जिसने भूख की जहालत और पीड़ा न देखी हो और न कभी उसका अनुभव किया हो वह यह स्वीकार कर ही नहीं सकता कि भूख से कोई मर सकता है - ‘‘भूख से कोई व्यक्ति मर सकता है, यह कल्पना दुनिया की भयानक कल्पना थी। जैसे हजारों सुईयाँ एक साथ किसी आदमी के शरीर में नोंच दी गईं हों या फिर किसी व्यक्ति का मुँह खुला हो और एकाएक उसके मुंह से उसकी जीभ गायब हो जाये।’’7 

सत्ता और वर्चस्व के हर घटक या संस्था भूख की तिजारत करती है। धर्म के नाम पर लोग भूख का मजाक उड़ाते हैं, उन्हें रोटी देकर, सत्ता उनके नाम पर सस्ते अनाज, की बिक्री करने का ढोंग करती है, बैंक कर्ज देकर उनकी रही सही जमीन और उत्पादन के साधनों को भी हड़प लेती है। स्थानीय जमींदार और प्रभावशाली वर्ग उनकी भूख के नाम पर बोट बटोरते हैं, कंट्रोल के राशन का स्टॉक उठाते हैं, एन.जी.ओ विदेशों से धन आयात करते हैं, पर भूख वहीं की वहीं बनी रहती है और भूख से मरने वालों की संख्या में निरंतर इजाफा होता जाता है। यह क्रूर मजाक है भूख और भूख से मरनेवालों के प्रति। यह मजाक हमस ब निरंतर करते हैं उनके साथ। देश में ही नहीं दुनिया में यदि कहीं भी कोई भूख से मृत्य होती है तो यह हम सबको चुल्लभर पानी में डूबकर मरने की बात है। लानत है हमारे विकास के मानकों पर और विकास दर के बढ़ने की प्रक्रिया की वकालत करने वालों की इंसानियत पर।

भूख का यह मानवीय संदर्भ इस उपन्यास के कथानक में अनुस्यूत है। भूख से मरना क्या होता है? इसका बहुत ही जीवंत चित्रण इसमें किया गया है। भूख के चारों ओर कथानक बुना गया है। धर्म, राजनीति, प्रशासन, समाजसेवा, धर्मांतरण इत्यादि सभी इस भूख के मखौल उड़ाते हैं। इस भूख पर राजनीति और धर्मनीति चलाते हैं। भूख का कोई आकार या मजहब नहीं होता, भूख की कोई नीति या समाज नहीं होता। भूख तो भूख है वह किसी भी आकार में इंसान के जीवन का अवसान कर सकती है।

ईसाई मिश्नरीज भारत के आदिवासियों को जहालत और भुखमरी की जिंदगी से बाहर निकालने का मुखौटा ओढ़कर कार्य करते हैं। यह मुखौटा भी राजनीति का ही एक रूप है। वे रोटी के बदले उनकी स्वतंत्रता और आत्मनिर्णय कर अधिकार छीन लेते हैं। प्रभु ईशु की प्रार्थना की बेगार कराते हैं। रोटी के बदले आदमी की अस्मिता का सौदा करना भी एक तरह की क्रूरता है। चर्च और मिशनरीज यही करते हैं। इसका मानवीय संदर्भ भी इस उपन्यास में शिद्दत से उठाया गया है।

‘‘वे हमें जीवन भर धूल का कीड़ा ही समझें, ही हैज टू रीकेग्नाईज़ अवर न्यू स्टेट्स’’, उसने कहा, ‘‘हम लोग जब पढ़ लिख गये हैं, प्रार्थना का काम करते हैं, पूरी चर्च सम्हालते हैं, तो वे बार-बार हमारी बेगार के दिनों की जुगाली क्यों करते हैं।’’8 

यह जेम्स खाखा की सोच है कि वे मानव सेवा की बात करते हैं तो फिर हमें अपनी पहचान और आजादी क्यों नहीं देते। रोटी दी है, जहालत की जिंदगी से बाहर निकाला है, पर दूसरी ओर एक नई जहालत और मानवीय गरिमा से रहित जिंदगी को क्यांे हम पर थोपा जा रहा है। वह कहता है कि -‘‘ माँ कहती है कि चूँकि चर्च ने तुम्हारे पिता और दादा को रोटी दी थी, काम दिया था और राजा की बेगार से मुक्ति दिलाई थी, इसलिए तुम्हें अपना पूरा जीवन चर्च की सेवा में बिताना है। क्या यह एक तरह का बंधुआ विचार नहीं है,’’ उसने मुझसे पूछा।’’9 एक चरित्र है लुइसा टोप्पो उसके पिता है माईकल टोप्पो। जब आदित्य उस लड़की से पूछता है कि तुम्हारे पिता क्या करते हैं तो वह कहती है ‘‘वे यीशू के मंदिर में प्रार्थना की बेगार करते हैं।’’10 

प्रार्थना की बेगार हो या राजनैतिक बेगार या बंधुआ मजदूरी या दास प्रथा। इस मानवीय संदर्भ में सब मानवीय गौरव और गरिमा के पतन और अवमानना की कहानी लिखते हैं। मानवीय जीवन स्वतंत्रता और गरिमापूर्ण अस्तित्व का भूखा होता है। उसे भूख से मरना मंजूर है पर भीख चाहे वह राजैनतिक हो या धार्मिक मंजुर नहीं होती। यही कारण था कि बिरई लकड़ा अस्पताल नहीं जाता चाहता था। राजयोग की भीेख की अपेक्षा भूख से मर जाना उसे स्वीकार था।

भूख से मरनेवालों के नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में दर्ज नहीं होते। कौन कितने दिन तक भूख को सहन कर सका। इसका कोई रिकार्ड दर्ज नहीं है किसी भी इतिहास या धर्म या राजनीति की किताब मैं। क्योंकि इसे किसी प्रतिष्ठित व्यक्ति या धनी व्यवसायी ने नहीं बनाया आज तक। गुमनाम लोगों की सहनशक्ति का कोई इतिहास नहीं होता।

‘‘एक आदमी भूखा है और भूख की वजह से बीमार है। भूख एक, भूख दो, भूख तीन, भूख चार, भूख पांच और भूख छह। उसने भूख छह तक का रिकार्ड बनाया है। एक ऐसा रिकार्ड जिसे दस्तावेजों में दर्ज करने वाला कोई नहीं है। कोई गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड नहीं, कोई लिम्का नहीं, कोई थम्स अप नहीं। इस तरह वह जब भूख छह तक पहुंच जाता है तो उसे लगता है कि बस अब इसके बाद और कुछ नहीं।’’11 

इस भूख का कोई मान नहीं और कोई सम्मान नहीं। भूख भी जहालत भरी हुई और उसकी मौत भी अनपहचानी ही रह जाती है। भूख से मरते आदमी को कोई ओझा, कोई डॉक्टर या दवाईया फिर ईश्वर नहीं बचा सकता उसे सिर्फ अनाज के दाने बचा सकते हैं, जो उसके पास नहीं है। दुनिया की तमाम चिकित्सा सुविधायें यहाँ लाचार हैं, बेमानी हैं, तमाम देवता नकारा और अस्तित्हीन हो जाते हैं, क्योंकि -‘‘इस आदमी को देवता नहीं चावल बचा सकते हैं।’’12

इस आदमी की मौत भूख छह के बाद की गिनती सहन न कर सकने के कारण हुई है। इसकी मौत का कारण उसकी भूख नहीं, प्रशासन की नजरों में सड़ा मांस खाना और धर्म की नजरों में दुष्टात्मा होना है। यह उसकी मौत और भूख का घोर अपमान है ‘‘यह आदमी जो अभी-अभी मरा गया, दुष्टात्मा था, इसने जीवन में घोर पाप किया था। वह घोर पाप क्या था, यह मैं तुम लोगों को अभी नहीं बता सकता क्योंकि धरमेस ने इसके लिए मना किया है।’’13 

भूख और हिंसा का संबंध बहुत गहरा है। मृत्यु दोनों ही स्थितियों में सच है। भूख से मरना एक अलग बात है, इससे हमारी राजनीति और धर्म नीति को कोई फर्क नहीं पढ़ता क्योंकि वह भाग्यवादी है कम से कम इस मामल में तो कि भूख से मरना मरने वालों की नियति थी। पर भूख से मरने वालों को रोटी दे दी जाये तो वे हिंसा से मरते हैं या जहालत से मरते हैं। जीते जी मरना या मर-मर कर जीना दोनों ही हिंसा की श्रेणी में आते हैं। जो लोग सत्ता से बाहर हैं, सत्ता का लाभ उठानें की हिंसा उनके अंदर नहीं है, उन सीधे-साधे आदिवासियों को हिंसा का शिकार तो होना ही पढ़ता है। सिस्टर अनास्तसिया कहती है कि -‘‘देखो पहले हम भूख का शिकार होते थे और जब चर्च ने हमें भोजन देना शुरू किया है तो हमें हिंसा का शिकार होना पड़ रहा है।’’14 

काला पादरी उपन्यास में कई मानवीय संवदेनात्मक संदर्भों को उठाया गया है। मैंने अपना ध्यान सिर्फ भूख के मानवीय संदर्भ पर केन्द्रित किया है। भूख का संदर्भ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाया जाना चाहिए। कई रिपोर्ट यह बताती हैं कि आज भी दुनिया में लगभग साठ करोड़ लोग हैं जो भुखमरी का शिकार हैं। यह भुखमरी खाद्य पदार्थों के कमी के कारण हो ऐसा नहीं है। विभिन्न तकनीक और साधनों ने मानव जनसंख्या के अनुपात से कहीं बहुत ज्यादा खाद्य पदार्थ पैदा किया है, पर व्यक्तिगत लाभ और मुनाफे की व्यवस्था ने इस तरह के अंतविर्रोध पैदा कर दिए है कि एक ओर हजारों टन अनाज सड़ जाता है, दूसरी तरफ लोग भूख से मरते हैं, या कर्ज के कारण आत्महत्यायें करते हैं। रोटी के संघर्ष में हत्यायें होती हैं और मानवीय जीवन आतंक और संत्रास का शिकार होता रहता है। भूख प्राणी जगत का सबसे भयानक सच है। इस सच को संतुलित और समादृत किया जाना चाहिए। राजव्यवस्थाओं का सबसे पहला और महत्वपूर्ण मुद्दा भूख के प्रति होना चाहिए। भूख से मरने की नौबत जिस किसी भी स्थिति में आये उसकी जिम्मेदारी तत्काल निश्चित होनी चाहिए और इसके लिए एक स्वायत्त तंत्र की स्थापना की जाये जिसमें राजनीति और प्रशासन का दखल न हो। जिला अधिकारी को सबसे पहले तत्काल प्रभाव से निलंबित किया जाना चाहिए। यह सिर्फ मृत्यु का सवाल नहीं है। यह उत्तरदायित्वहीनता के द्वारा की गई हत्या की श्रेणी में आना चाहिए।

हमारे विकास के तमाम कंगूरे को धराशायी कर देना चाहिए यदि हम भूख से मरने की स्थिति को नियंत्रित नहीं कर पा रहे हैं तो। देश की जनता को तमाम सत्ता प्रतिष्ठानों को इस बात के लिए जिम्मेदार ठहराने और उन्हें सत्ताच्यूत करने की बीड़ा उठाना चाहिए। मीडिया को कम से कम इस मुद्दे पर लाभ और टीआरपी बढ़ाने की चिंता न करते हुए एक मुहिम छेड़ना चाहिए कि यह स्थिति क्यों बनी। इस मानवीय दायित्व का वहन हर एक भरे पेट को उठाना ही चाहिए। जिससे मानवता पर कलंक का काला धब्बा न लगे।

डॉ संजीव जैन 


डॉ संजीव जैन 


संदर्भ -
काला पादरी, तेजिन्दर, नेशनल पेपरबैक्स दिल्ली, पृष्ठ संख्या 15-16 
वही पृ. 16 
वही पृ. 20-21
वही पृ. 21
वही पृ. 27
वही पृ. 21
वही पृ. 21-22 
वही पृ. 46 
वही पृ. 47
10. वही पृ. 53
11. वही पृ. 71 
12. वही पृ. 73
वही पृ. 73
वही पृ. 103




डॉ. संजीव कुमार जैन
सहायक प्राध्यापक हिन्दी
शासकीय संजय गाँधी स्मृति स्नात्कोत्तर महाविद्यालय,
गुलाबगंज 
522 आधारशिला, बरखेड़ा
भोपाल, म.प्र.
मो. 09826458553

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