Saturday, June 11, 2016

“हंस अकेला रोया “

सिनीवाली का कहानी संग्रह ,


 प्रकाशक... बोधि प्रकाशन
************************

आठ कहानियों का संग्रह ,जिसमे सभी कहानियां आंचलिक भाषा बोली और ग्रामीण परिवेश से सहज ही पाठकों को मोह लेती है |मूलतः बिहार की  ग्रामीण पृष्ठभूमि पर लिखी गई ये कहानियां वहाँ के सामान्य जनजीवन के मर्म अहसास का सटीक चित्रण है |
संग्रह की प्रतिनिधि कहानी “हंस अकेला रोया “ आर्थिक लाचारी से ग्रसित पुत्र का पिता के अंतिम संस्कार और श्राद्ध कर्म के लिए अपनी जमीं को बेच देना , लोकाचार और परिपाटियों के द्वन्द में विवशता का चरम है |
जमीं बेचना ,बेटी बेचना  ....दोनों बराबर ही तो होता है |
जमीं की मिटटी से आती जलती हुई लाश की बदबू ...जैसे विपिन के अरमानो की लाश उस मिटटी में जल रही हो | विपिन की  बेबस मनस्थिति का बखूबी चित्रण  किया लेखिका ने इस कहानी में |
इसी कहानी में  रिश्तेंदारो के  अहं के छल  -दल का भी खूब विवरण किया गया |सहानुभूति के चन्द आँसू देकर वो कैसे  सामने वाले का विवेक कब्ज़ा लेते है ,शायद यही पर उनके असली चरित्र का परिचय मिलता है |


' हंस अकेला रोया ' की समीक्षा शेखर सावंत जी के द्वारा 
Shekhar Sawant जी की नजर में ' हंस अकेला रोया '
जुलमिया काका , सगुनिया काकी और ढिबरिया जैसे लोकप्रिय व्यंग्य-पात्रोंके माध्यम से सामाजिक विद्रूपताओं की कलई खोलनेवाली तथा संवेदना के स्तर पर मनुष्यता की पड़ताल करनेवाली भावप्रवण आंचलिक कहानियों की कथाकार सिनीवाली अब किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं ।
कुछ ही दिनों पहले आया उनका कथा-संग्रह
" हंस अकेला रोया " अभी चर्चा में है । वर्तमान में जब अधिकांश कथाकारों की कहानियाँ शहरी पृष्टभूमि पर आधारित होती हैं सिनीवाली अपनी कहानियाँ ग्राम्य-जीवन के लोकमानस से उठाती हैं । इसलिए उनकी कहानियों में आंचलिक शब्दावली की भरमार है । यही आंचलिकता उनकी कहानियों को महत्वपूर्ण बनाती है । इस संग्रह में आठ कहानियाँ हैं जिन्हें पढ़ते हुए अनायास आंचलिक कथा-सम्राट रेणु याद आते हैं और साथ ही याद आते हैं खेतों-खलिहानों-किसानों पर कविताएँ लिखनेवाले महान कवि केदारनाथ अग्रवाल जी ।
संग्रह की पहली कहानी " उस पार " एक ऐसे मामूली किसान बदरी बाबू के घर की कहानी है जहाँ उनकी पतोहू पड़ोस की महिलाओं के चढ़ाने-बढ़ाने पर घर में कलह करते हुए घर के माहौल को विषाक्त कर देती है ।
दूसरी कहानी " सिकड़ी " स्त्री के और जेवर-प्रेम पर आधारित कहानी है जिसे बहुत ही कुशलता के साथ कथाकार सिनीवाली ने दर्शाया है । कहानी अंत तक उत्सुकता से भरी रहती है ।
तीसरी कहानी " हंस अकेला रोया " संग्रह की सबसे महत्वपूर्ण कहानी कही जा सकती है । ग्राम्य-परिवेश में रचित इस कहानी में कथाकार ने श्राद्ध-भोज जैसी खोखली परंपरा की विद्रूपताओं की कलई खोली है ।
एक तरफ कथाकार ने डोम , नाई , धोबिन , कुम्हार , पंडित , महापात्र आदि की अनुचित मांगों को दर्शाया है दूसरी तरफ गांववालों की शातिराना सलाहों की ओर भी इंगित किया है । यह कहानी अपनी कथावस्तु और संवेदनात्मक बुनावट के कारण हिंदी कथा-संसार में मील का पत्थर साबित होगी ।
चौथी कहानी " आँखों देखा हाल " क्रिकेट के खेल से पगलाए-बौराए देश में एक गांव के क्रिकेट प्रेमी किशोरों की कहानी है जो एक परती खेत को खेल का मैदान बनाते हैं । ईंट का विकेट , लकड़ी का बैट और मौजे को गोलिया कर बनाये गए गेंद से क्रिकेट खेला जाता है । पडोसी गांव से मैच के दौरान जमकर मारपीट होती है । इस कहानी में सिनीवाली का
' सेंस ऑफ ह्यूमर ' देखते ही बनता है ।
पांचवीं कहानी " नियति " एक भ्रष्ट और चरित्रहीन ससुर राधेश्याम पंडित की कहानी है जो अपनी बहु पर बुरी नज़र रखता है । एक रात ससुर के बलात्कार के कारण वह गर्भवती हो जाती है । सास को इस घटना का उतना दुःख नहीं है जितना यह जानकर कि बहु के गर्भ में पल रहा बच्चा लड़की है । सास को भी वंश चलाने के लिए एक लड़का चाहिए । सास बहु का पेट गिराना चाहती है लेकिन बहु पाप के इस फल को इसलिए जन्म देना चाहती है कि वह लड़की है ।
अजीब कश्मकश की कहानी है यह । कथाकार सिनीवाली ने इस कहानी का चित्रांकर बहुत ही सम्हलकर किया है और सफल रही हैं ।
छठी कहानी " घर एक आत्मकथा " घर की महत्ता दर्शाने वाली कहानी है ।
सातवीं कहानी " विसर्जन " ग्रामीण परिवेश में धार्मिक आयोजनों की आड़ में विभिन्न टोलों के बीच वर्चस्व की लड़ाई की कहानी है ।
आठवीं कहानी " चलिए अब " को कथावस्तु और चित्रांकन के आधार पर मैं संग्रह की दूसरी महत्वपूर्ण कहानी मानता हूँ । कहानी एक ऐसे सज्जन पुरुष परमानन्द बाबू की है जिनकी एकमात्र बेटी दुर्घटना में मर चुकी है तत्पश्चात पत्नी भी स्वर्ग सिधार गयी है । अब वे अकेले हैं और उनकी संपत्ति पर घर के अन्य सदस्यों की नज़र है जिनमें मुख्य रूप से उनकी शादीशुदा भतीजी जो मायके में ही रहती है तथा छोटे भाई की पत्नी शामिल है । दोनों संपत्ति के लोभ में उनकी सेवा करना चाहती है । एक किरदार उनका नौकर दामोदर है जो निःस्वार्थ भाव से उनकी सेवा करता आया है । लेकिन अब वह नौकरी छोड़ चुका है और यदा-कदा उनसे मिलने आता है । दामोदर उनकी दयनीय स्थिति देखकर उन्हें अपने घर लेकर चला जाता है । यह कहानी पढ़ते-पढ़ते गला रुंध जाता है । इस कहानी में कथाकार ने मनुष्य के अंतहीन लोभ-लालच को बहुत ही सफलतापूर्वक दर्शाया है ।
कथाकार सिनीवाली की कहानियाँ कथावस्तु , शिल्प और भाषिक-संरचना की दृष्टि से सर्वोत्कृष्ट कहानियाँ हैं । आशा है वे ऐसी ही उच्च कोटि की कहानियों से हम पाठक को रूबरू कराती रहेंगी ।
मैं सिनीवाली के उज्जवल साहित्यिक भविष्य की कामना करता हूँ और उनकी पुस्तक " हंस अकेला रोया " के लिए उन्हें बधाई देता हूँ ।

*****************************************************


उस पार ,सिकड़ी ,आँखों देखा हाल ,नियति ,घर : एक आत्म कथा ,विसर्जन ,चलिए अब ....
सभी कहानिया बिना रुके अपने को पढवाने की क्षमता रखती है ,यही कहानी की सफलता है |


संग्रह की एक कहानी यहाँ प्रस्तुत है ...
“विसर्जन “

***********

आज की रात -----आज की रात, बजरंग कला परिषद की ओर से एक महान सामाजिक नाटक का आयोजन होने जा रहा है। भाइयों और बहनों -----हजारों हजार की संख्या में आकर इस नाटक को सफल बनावें। आज की रात -----आज की रात------देखना न भूलें-----ये आवाज आज दोपहर से ही गाँव में लाउडस्पीकर से गूँज रही है। इस एनाउंसमेंट के साथ खूब धूम-धड़ाके वाला फिल्मी गाना बजने लगता है, जिससे गाँव का माहौल और भी मेलामय    हो गया है।
आज दीघापुर गाँव में दशहरा के नवमी के दिन मेला के साथ साथ नाटक हो रहा है।" कलयुग के देवता " की आवाज पूरे गाँव में गूँज रही है। हर गली, चौराहे से गुजरती हुई आवाज घर-घर तक जा रही है।
भाइयों और बहनों, आज की रात -----देखना न भूलें ------कलजुग का देवता -----। लाउडस्पीकर से और जोर जोर से एनाउंसमेंट होने लगा। मोहन दा------मोहन दा, आप जहाँ कहीं भी हों, जल्द से जल्द ग्रीन रुम में आने का कष्ट करें। फिर सलाम-ए-इश्क गाना बजने लगता। गाने की आवाज कम करके दूसरी घोषणा गूँजने लगती, राकेश, राकेश तुम जहाँ कहीं भी हो, जल्द से जल्द ग्रीन रुम में आने का कष्ट करो, अब नाटक कुछ ही देर में शुरू होने वाला है। पर सभी अंदाजा लगा रहे थे कि नाटक शुरू होने में अभी देरी है। ऐसा एनाउंसमेंट बहुत पहले से ही होने लगता है ताकि नाटक का माहौल बनाया जा सके।
स्टेज के आगे बड़े से मैदान में नाटक देखने वालों की भीड़ लग चुकी थी और मेले में मिठाइयों की दुकान, पान की दुकान, चाट-पकौड़ी, गुपचुप और मीना बाजार यानी श्रृंगार की दुकानों से भीड़ खिसक कर नाटक के स्टेज के पास जमा हो गई।
नाटक देखने वाले दर्शक भी तरह-तरह के होते हैं। कुछ लड़के जो नाटक देखने के बहाने केवल लड़कियां देखने आते हैं। उनकी नजर नाटक पर कम, इधर-उधर ज्यादा रहती है। कुछ लड़के सिर्फ हुड़दंग मचाने ही आते हैं। बहुत कम ही लोग केवल नाटक देखने आते हैं। कुछ लोग इसलिए भी आते हैं क्योंकि उनके यार दोस्त नाटक में पार्ट कर रहे होते हैं। बड़े बुजुर्ग तो खैर कम ही होते हैं नाटक देखने वालों में। और हाँ, महिलाएं भी नाटक देखने आती हैं पर उनकी रुचि नाटक में कम गप्प मारने में ज्यादा होती है। कुछ महिलाएं तो बजाप्ता अपनी आस पड़ोस के गाँव वाले  संबंधियों को बुलावा भेज कर इस अवसर का सदुपयोग मिलने जुलने और संबंधों को तरोताजा करने के लिए करती हैं। पर दर्शकों में अधिकांश लड़के लड़कियां ही होती हैं।
वो लड़कियां जो कॅालेज से नया नया फैशन सीखकर आई हैं, उन्हें आजमाने का अच्छा मौका मिल जाता है और जो लड़कियां गाँव में ही रह गई होती हैं वो उन्हें कोसती और भीतर ही भीतर उनसे ईर्ष्या करती हुई दुखी होती हैं कि शहर जाकर टटका फैशन नहीं सीख पाई।
सभी अपना जगह लेकर बैठ गए, तो बहुत लोग खड़े भी रह गए। जगह मिलना आसान नहीं होता, जरूरत पड़ने पर हील हुज्जत भी करना पड़ता है। कोई ईंट लेकर बैठा। कोई कई माथों के बीच से किसी तरह अपना माथा घुसा कर तो कई लोग एड़ियों पर ऊचक ऊचक कर तो कई ठेलमठेल करके भी नाटक देखने को तैयार हैं।
स्टेज रौशनी से जगमगाने लगा। नीले रंग के किनारे वाला लाल परदा स्टेज पर गिर गया है। परदे के पीछे से थोड़ी थोड़ी देर में नाटक के करता धरता बाहर निकल कर भीड़ देख लेते और माईक से इतना जरूर बोल देते, आप लोग शांति बनाए रखें-----नाटक बस शुरू ही होने वाला है। इसी बहाने ये लोग जता देते कि वे मामूली नहीं हैं, बल्कि संचालक मंडल के महत्वपूर्ण सदस्य हैं।
लाउडस्पीकर में रह रह कर कोई पुराना गाना बज रहा है। उसकी धुन पर कुछ दर्शक अपने माथे से तो कुछ सशरीर थिरक रहे हैं।
हेलोजन लाइट भी स्टेज के आगे ऐसे रखा गया है कि इसके लाइट से नाटक और प्रभावशाली हो जाए। लाइट में लाल, पीला, हरा, बुल्लू पन्नी लगा दिया गया है जो नाटक में तो काम करेगा ही पर डांस शुरू होते ही लाइट अपना असली काम करेगा।
नाटक अब बस शुरू ही होने वाला है। इसके पहले बस इतना बताना चाहेंगे कि ये नाटक पूर्वी टोला वाले करा रहे हैं। ये गाँव तीन टोले में बँटा है। पूर्वी टोला दशहरा में तीन दिन चलने वाले मेला और नाटक की जिम्मेदारी लेता है। पश्चिम टोला वाले दिवाली में लक्ष्मी जी की मूर्ति बैठाने की जिम्मेदारी लेता है और गद्दी टोला छठ पूजा में सूर्य भगवान की मूर्ति बैठाने के साथ घाटों के सजाने और व्यवस्था करने की।
ये पूर्वी टोला का आयोजन था। इस टोले वालों की छाती पहले से ही चौड़ी हुई जा रही थी कि इस बार नाटक के साथ ऐसा डांस होगा कि पूरा गाँव देखता रह जाएगा। पर संचालक लोग इस बात को लेकर भी सचेत थे कि पिछले साल की तरह इस बार भी कोई तमाशा न हो, किसी भी हाल में नाटक संपन्न हो जाए। इसलिए पिछली बार जिसने मंच संभाला था उसकी जगह दूसरे संचालक रखे गए जो अपनी बात सबके सामने अच्छे ढंग से रख सकें।
आखिर नाटक शुरू हो गया। सबसे पहले पात्र परिचय दिया गया फिर सीटी बजने के साथ ही परदा गिर गया। फिर नाटक का पहला सीन परदे के उठने के साथ ही शुरू हो गया। नाटक, देख तो सभी रहे थे पर सबको नाटक के बीच बीच में होने वाले डांस का इंतजार था। सुना है इस बार बहुत खरचा किया गया है डांस पर, बंगाल से डांसरों को लाया गया है। नाटक के दो दृश्य के बाद ही डांस शुरू हो गया, एकदम नयका गाने पर---चिकनी चमेली। लाल पीली हरी लाइट भी भुकभुकाने लगी--जगमगाने लगी, कभी रौशनी गोल गोल घूमती तो कभी पानी का भ्रम पैदा करती, कभी तेजी से तो कभी स्थिर हो अपना रुप बदल लेती। हल्ला होने लगा तालियां बजने लगी, सीटी बजने लगी, सब झूमने लगे।
कुछ कच्ची उम्र के लड़के खड़े होकर नाचने भी लगे। इस समय दर्शक थोड़ी देर के लिए अपने आप को हीरो और हीरोइन से कम नहीं समझते। डांस खूब जमा और उसके खत्म होते ही तालियों की गड़गड़ाहट ये बता रही थी कि दर्शकों को डांस का ये आइटम खूब पसंद आया।
संचालक महोदय ने सबका धन्यवाद किया और शांति बनाए रखने की अपील की। इस बीच उन्होंने शेरोशायरी का भी दर्शकों को रसास्वादन करवाया। भीड़ से फरमाइशी गाने पर डांस का चिट्ठा आया। संचालक महोदय ने चिट्ठे को गौर से देखा फिर डांस की अनुमति दे दी।
फिर तो जोर जोर से तालियां बजने लगी और लगातार दूसरे गाने पर डांस हुआ। गाना खत्म होते ही पश्चिमी टोले के एक लड़के ने भीड़ के बीच से उठकर फरमाइशी डांस का कागज दिया। संचालक महोदय ने इसे बड़े गौर से देखा। पर इस बार डांस के लिए हाँ नहीं कहा क्योंकि कागज में द्विअर्थी भोजपुरी गाने की फरमाइश थी। माँ बहनों के बीच इस तरह के गानों पर नाच करना उचित नहीं था और इससे नाटक मंडली का स्तर भी गिरता। इसलिए संचालक महोदय ने कहा, हम ये फरमाइश पूरी नहीं कर सकते हाँ कोई और गाना है तो -----।
बात पूरी होने के पहले ही भीड़ से उठकर पश्चिमी टोले के एक दूसरे लड़के ने गरजना शुरू कर दिया, अच्छा  तुम्हारे टोला वाला बोला तो तुरंत नचा दिया-----हम कह रहे हैं तो बहाने बना रहे हो। उसके पास बैठा रमेश भी ताव में आकर बोलने लगा, क्या हम किसी से कम चंदा देते हैं-----फिर हमारे साथ ऐसा क्यों-----क्या हमारा कोई भैलू नहीं है-----खाली तुम्हीं लोगों का भैलू है, काहे की तुम लोग नाटक करा रहे हो।
इस बीच एक तीसरे लड़के ने भी हल्ला करना शुरू कर दिया, साले, हमको इगनोर मारते हो----- बहुत भचर भचर करते हो-----इसीलिए तो पिछले साल नाटक पूरा नहीं कर पाए।
ये सब सुनकर पूर्वी टोला वाले लड़कों का खून गरम होने लगा। इनमें से एक ने  हल्ला करने वाले लोगों के पास जाकर बोला, साले देखना है तो मुँह बंद कर के देखो नहीं तो अभी बता देंगे।
पश्चिमी टोले वाले पूरे दल बल के साथ नाटक देखने आए थे। लंबे चौड़े कद काठी वाले कई लड़के थे। सब का खून खौलने लगा। दोनों के बीच गरमा गरमी बढ़ने लगी।
पूर्वी टोला वाले राकेश ने रमेश का कॅालर पकड़ कर कहा, क्या बोला रे-----क्या दिखा देगा-----लगता है मुझे पहचानते नहीं हो। रमेश अपना कॅालर छुड़ाते हुए बोला, हाँ-----हाँ-----खूब पहचानते हैं-----कितना दम है, ये भी जानते हैं। अपनी उंगली दिखाते हुए बोला, जो भी करना है कर लेना। इतना सुनते ही राकेश ने उसे दो चार तमाचे खींच दिया। फिर तो शुरू हो गया, ले लात कि दे लात, घुस्सा-मुक्का, उठा पटक और माय बहन, किसी भी गाली की कमी नहीं रही।
संचालक समिति के बात संभालने के पहले ही बात हाथ से निकल गई और नाट्य स्थल, युद्ध स्थल में बदल गया। लाउडस्पीकर से शांत रहने की अपील होती रही पर इस भगदड़ में कौन सुनता। लड़कियां और औरतें, बच्चे सभी इस अकस्मात घटना से घबड़ा कर  घर जाने लगे।
इधर नाटक मंडली ने आनन फानन में  अंतिम दृश्य की घोषणा कर दी क्योंकि उन्हें भी पता था कि अब कितने दर्शक बचे रहेंगे। बस नाटक के नाम पर खानापूर्ती हो जानी चाहिए।
इस तरह इस साल भी पिछले साल की तरह नाटक पूरा नहीं हो पाया।
पूर्वी टोला वालों का गर्व से माथा ऊँचा कर घूमने का मौका हाथ आते आते निकल गया, पिछले बरस की तरह।
सुबह होकर पूर्वी टोला वाले जो नाटक से जुड़े थे उनका मीटिंग हुआ, बंद कमरे में। जो कल रात ग्रीन रुम था आज मीटिंग रुम बन गया। जिन्होंने लगातार कई महीनों से रिहलसल किया था वो अपनी कला सबको नहीं दिखा पाए, अपने हुनर का लोहा नहीं मनवा पाए, तालियां बटोरने की आस अधूरी रह गई, वो भीतरे भीतर कितने गुस्से में फनफना रहे होंगे, इसका अंदाज पाठक आसानी से लगा सकते हैं।
जो तैयारी करवा रहे थे, कई महीनों से नाटक से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रुप से जुड़े थे, गुस्सा तो सबको था कि एक तो मेहनत गई और दूसरा पूरे गाँव में सालभर माथा ऊँचा करके चलने का मौका हाथ से चला गया।
राकेश सबके बीच से उठकर बोला, कुछ नहीं मोहन दा, ये सब साजिश है पश्चिम टोले वालों का-----नाटक के बीच में ही लड़ाई लाद देंगे ताकि नाटक पूरा ही नहीं हो और उनका लक्ष्मी पूजा वाला परोगराम हमसे अच्छा हो जाए।
कुर्सी पर बैठे बैठे बनवारी दा बोले, हाँ--जगहंसाई कराना ही इनका काम है, तभी तो भोजपुरी गानों की फरमाइश की जो हम नहीं बजा सकते। दर्शकों में बाल बच्चे, जनानी भी तो रहते हैं, उनका  ध्यान भी तो रखना पड़ता है। सभी अपने अपने विचार दे रहे थे। कम उमर वाले जो लड़के थे, उन लोगों का कहना था कि उन लोगों की ऐसी मरम्मत की जाए कि इ हरकत इस जन्म में तो क्या अगले जन्म में भी नहीं करेगा।
नया खून निर्णय लेने से पहले अधिक सोचता नहीं, वो बस किसी भी हाल में जल्दी से निर्णय कर देना चाहता है।
इस नाटक मंडली के सर्वेसर्वा त्रिलोचन बाबू अपनी सूझबूझ के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने सबको यह कहकर समझाया कि जब रास्ता दूसरा भी है सबक सिखाने का तो फिर अपने माथे पर कलंक क्यों लिया जाए। सब आश्चर्य से उनका मुँह ताकने लगे और सोचने लगे कि ये कैसे हो सकता है कि साँप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे। बबलू, जो नाटक में लड़की बनने वाला था, उसकी बदले की भावना और बलवती हो गई, बोला, काका, इनको लतियाने का और कौन सा तरीका है ?
त्रिलोचन बाबू इन सब बातों से असहमत होते हुए बोले, जब भगवान ही रास्ता बना रहे हैं तो फिर------
त्रिलोचन बाबू के आँखों की चमक और तिरछी मुस्कुराहट का अर्थ अब सब समझ रहे थे।

➕➕➕➕➕➕➕➕➕➕➕➕➕➕

दशहरा खत्म होने के कुछ दिन बाद ही दिवाली आ गई। अभी तक वातावरण में दुर्गा पाठ और रामायण पाठ का असर बचा ही था कि दीयों की जगमगाहट से घर द्वार गाँव झिलमिलाने के लिए तैयार हो गया।
प्रकाश और समृद्धि का पर्व दिवाली पश्चिमी टोला वाले खूब बढ़ चढ़ कर मनाते हैं। इस बार भी उन लोगों ने खूब हुमच कर चंदा किया। जो कमी रही अपनी जेब से भी लगाकर धूमधाम से लक्ष्मी जी और गणेश जी की मूर्ति बैठाई। एकदम बड़का पंडाल लगाया। गाँव घुसते ही दूर से ही सजावट दिखाई दे रही थी। सड़क के किनारे किनारे रंग बिरंगा जुगनू बल्ब, जो सांझ होते ही भुक भाक भुक करने लगता। लाउडस्पीकर पर भोर को भजन और उसके बाद दिन भर, आधी रात तक फिल्मी गाने, बज रहा था। सजावट में कहीं कोई कसर नहीं छोड़ी, क्योंकि पूरे गाँव में ये आयोजन इनके इज्जत की बात थी। महीनों तक कहा जाएगा कि मूर्ति बैठाया तो पश्चिम टोला वालों ने। इसके आगे सबका आयोजन फीका, ये सोच कर ही कितना अच्छा लगता है जब तुलना करते हुए विपक्षी उन्नीस और हम बीस साबित होने लगते हैं। बीस साबित होने के लिए लक्ष्मी पूजा समीति वालों ने लड्डू भी खुले हाथों से खूब बाँटा। जो भी मूर्ति के दर्शन करने आता, घूम घूम कर सजावट देखता और फिर खुले दिल से बड़ाई भी करता।
पंडाल के पास पूरा गाँव आ रहा था तो पूर्वी टोला वाले भी और नाटक मंडली के सदस्यों को भी आना ही था। राकेश भी अपने एक दोस्त के साथ गया। राकेश मन ही मन सोच रहा था कि यदि वह नहीं जाता तो लोग समझते कि डर के कारण वह नहीं आया। राकेश के आते ही लक्ष्मी पूजा समीति वाले लड़कों ने उसे बड़े प्यार से अपने साथ बैठा लिया।
सबके साथ बैठ कर राकेश धीरे धीरे सहज हो गया। बातों ही बातों में उसने मनोज से जो बहुत बढ़चढ़ कर लक्ष्मी पूजा में भाग ले रहा था, कहा, यार--बड़े धूमधाम से पूजा कर रहे हो-----लगता ही नहीं कि हम ये सब अपने गाँव में देख रहे हैं-----ये तो शहर को भी मात कर रहा है। ये सुन कर मनोज की छाती और चौड़ी हो गई। उसने राकेश को तिरछी नजर से देखते हुए बोला, क्या यार-----हम चंदा का पैसा नहीं मारते -----कम बेसी होने पर अपने घर से भी लगा देते हैं। कनखी मारते हुए फिर वो बोला, ये सबके बस की बात नहीं है। बोलते बोलते अंतिम शब्द को आधा मुँह के भीतर ही रख लिया। ऐसे शब्द और अधिक शक्तिशाली हो जाते हैं, द्विअर्थी, त्रिअर्थी, और न जाने कितने अर्थ हो जाते हैं।
राकेश तो ये कटाक्ष समझ गया। उसका खून खौलने लगा पर वह चुप रहा। मुँह तक गालियों की बौछार आई, नसें फड़फड़ाई, फिर भी इस हालत में उसकी चुप्पी ही अधिक बलवती निकली।
पूरे गाँव में चर्चा का विषय बन कर ये आयोजन पूरा हो गया। अब विसर्जन की तैयारी होने लगी। बहुत नामी आर्केस्ट्रा आ रहा है। यहाँ भी खूब जमकर डांस होगा। किस गाने पर कौन अच्छा नाचता है  ? बीच गाँव में जहाँ भीड़ अधिक रहती है वहाँ किस गाने पर नाचना है ? जहाँ भीड़ कम होती है वहाँ तो नागिन डांस से भी काम चल जाएगा। पर सबसे ज्यादा जरूरी बात, जिस घर में सुंदर और संख्या में लड़कियां हैं, वहाँ तो सबसे अच्छा डांस तो होना ही चाहिए। पर मंडली में इस बात की सभी को ताकीद कर दी गई कि दारु कोई भी नहीं पीयेगा, हाँ रात में जिसका जितना जी चाहे, अध्धा, पौआ सब मिलेगा पर दिन में नहीं। समिति की बदनामी का डर था। जब सब कुछ इतना अच्छा से हो रहा है तो अंत में गुड़ गोबर नहीं होना चाहिए न और सब ने अपनी हाँ में अपनी सहमति दे दी।
तैयारी पूरी हो गई जो एक गाँव में हो सकता था पर शनिचर आ जाने से विसर्जन टल गया।

➕➕➕➕➕➕➕➕➕➕➕➕➕➕

और उसी दिन छठ पूजा शुरू हो गई।
गद्दी टोला इस पूजा का सर्वेसर्वा था। उन्हीं के जिम्मे सूर्य भगवान की मूर्ति बैठाने की और चार दिनों के आयोजन का था। हर साल की तरह तैयारी तो इन्होंने भी की थी। सूर्य भगवान और सात घोड़ों की मूर्ति, लक्ष्मी जी और गणेश जी की मूर्ति से मुट्ठी भर बड़ा ही था क्योंकि देखने वाले मूर्ति की भी तुलना करते हैं। जितना संभव हुआ सजावट भी किया। पताका और चायनीज बल्ब से इन्होंने भी सजाया सड़क पर से ही।
पर समस्या ये थी कि लक्ष्मी पूजा वाला रौनक इनसे पार नहीं लग रहा था। एक कारण ये भी था कि दशहरा और दिवाली चंदा और पर्व त्योहार में खर्चा हो जाने से गाँव वालों का हाथ छठ पूजा  के चंदा में थोड़ा कसा गया और चंदा कम होने से आयोजन में तो असर पड़ता ही है।
छठ पूजा वाले मन ही मन लक्ष्मी पूजा वालों से अपनी तुलना कर रहे थे। हालांकि वो ये पता नहीं लगने दे रहे थे पर अपने आप को कमतर तो महसूस कर ही रहे थे।
इस भावना को त्रिलोचन बाबू अच्छी तरह से समझ रहे थे या इसी का इंतजार कर रहे थे, लेकिन वो भी पता नहीं लगने देना चाह रहे थे कि वो इस बात को भाँप रहे हैं।
आज छठ का पहला दिन था। त्रिलोचन बाबू नहा धोकर गद्दी टोला के सूर्य नारायण की मूर्ति के दर्शन करने के लिये आए।
चहलपहल थी, वहाँ लोग आ जा रहे थे। रास्ते में मिलने वाले उन्हें प्रणाम करते, वो भी प्रणाम करके सबका हालचाल पूछ लेते। मूर्ति से थोड़ा हटकर चन्दर बाबू भी घूम घूम कर व्यवस्था देख रहे थे कि सामने मिलते ही त्रिलोचन बाबू को उन्होंने प्रणाम किया। त्रिलोचन बाबू भी बड़ी आत्मीयता से मिले। हालचाल पूछा, कुछ इधर उधर की बातें की और बड़ी ही सावधानी से वो बात कह दी, जो कहने आए थे, कि हद हो गई-----अब पूजा पाठ लोग भगवान के लिए नहीं अपने लिए करते हैं और अपनी इज्जत प्रतिष्ठा से जोड़ देते हैं।
तुलना करते करते और अपने को कम आंकते आंकते चन्दर बाबू क्षुब्ध तो थे ही, आशंकित भी थे। त्रिलोचन बाबू के मुँह से ये सुनते ही उनकी आशंका तेजी के साथ बाहर झाँकने लगी और घबड़ा कर पूछने लगे, कुछ हुआ क्या  ? फिर अपनी हालत उनके सामने जाहिर न हो जाए इसलिए अपने को संभालते हुए बोले, हाँ भाई-----अब पहले वाला जमाना नहीं रहा-----थोड़ा सा----- लोग कुछ कर लेते हैं और देह ऐंठ कर चलने लगते हैं-----अपने आगे तो रत्तीभर भी किसी को कुछ नहीं समझते।
त्रिलोचन बाबू को भी लगा कि तीर ठीक निशाने पर लगा है तो वो भी हाँ में हाँ मिलाकर बोलने लगे, वही तो मैं कह रहा था। सुना है आज लक्ष्मी जी का विसर्जन वो लोग कर रहे हैं। अच्छी बात है पर-----कुछ क्षण चुप रह कर फिर बोले, शायद इसी रास्ते ले जाएंगे। अपनी छाती पर हाथ रखते हुए बोले, मैंने कहलवाया भी कि छठ पूजा का सजावट जो इतना भव्य हुआ है उससे डीजे या कुछ और टकरा कर सजावट खराब कर सकता है, पर अपने घमंड में चूर कोई सुने, तब ना-----। सजावट को  बड़े गौर से देखते हुए त्रिलोचन बाबू बोले, वैसे आपने भी कम खर्च नहीं किया है-----पिछले साल तो सड़क किनारे ही सजावट था पर इस बार तो ऊपर भी खूब सजाया है, बहुत सुंदर -----बहुत अच्छा। ऊपर की ओर थोड़ी देर हवा में हिलते डुलते पताका और बल्ब को वो देखते रहे।
कुछ देर तक विषय बदल कर कुछ और बातचीत हुई। फिर त्रिलोचन बाबू वहाँ से चले गए। पर असली बात जो चन्दर बाबू के दिमाग में देने आये थे, वो देकर गए। इस तरह चन्दर बाबू के साथ  समीति से जुड़े अन्य सदस्यों का ध्यान अपनी पूजा के आयोजन से हटकर लक्ष्मी जी के विसर्जन पर चला गया।
उधर राकेश को छोड़कर बजरंग कला परिषद के अन्य सदस्य विसर्जन से पहले अपनी अपनी भूमिका निभाने चले गये। राकेश को इसलिए बाहर रखा गया कि  बार बार राकेश के जाने से शक की संभावना थी, पर वो दूर से ही अपनी नजर रखे था।
विसर्जन के दिन त्रिलोचन बाबू के छठ पूजा  के पंडाल से लौटने के बाद निर्धारित योजना के अनुसार खंजन,  राजकुमार और दो लड़के लक्ष्मी पूजा के पंडाल की ओर चले गए। किशन, जो की लक्ष्मी पूजा समीति का सक्रिय सदस्य था, उम्र यही कोई २०-२२ बरस के आसपास होगी, वो जोर जोर से मोबाइल पर डीजे के आने का समय पता कर रहा था। ये भी कह रहा था कि किसी भी हाल में १ से २ बजे के बीच आ जाना चाहिए। पलट कर देखा तो खंजन, राजकुमार खड़े थे।
किशन ने भी मौके का फायदा उठाते हुए विसर्जन के समय होने वाली भव्य तैयारी की चर्चा शुरू कर दी, साथ ही अपने को खास दिखाने के लिए अपनी व्यस्तता भी दर्शाने लगा। यार, क्या बताऊँ-----दम मारने तक का टैम नहीं है-----व्यवस्था संभालना बच्चों का खेल नहीं है-----एक एक चीज का इंतजाम करना पड़ता है-----कितनी मुश्किल से ये डीजे मिला है। मुँह पर चमक लाते हुए, हाँ थोड़ा खर्चा अधिक करना पड़ा-----पर हम लक्ष्मी जी के नाम पर कोई कोर कसर नहीं छोड़ना चाहते।
किशन आगे कुछ और बोलने ही वाला था कि खंजन पंडाल के चारों ओर नजर घुमाते हुए बोला, ठीक कह रहे हो यार-----कसर तो कुछ भी नहीं छोड़ी-----विसर्जन भी धूमधाम से कर रहे हो-----देखने वाले तो आँखें फाड़कर देखते ही रह जाएंगे।
राजकुमार किशन के कंधे पर हाथ रखते हुए बोला, अरे कितने बजे चलना है-----बताना-----हम भी चलेंगे-----चलेंगे क्या-----हमारे घर के रास्ते से ही तो जाओगे-----वहीं साथ हो लेंगे।
खंजन ने सही समय पर बात छेड़ी, क्यों-----क्या हनुमान जी के मंदिर वाले रास्ते से नहीं जाओगे-----गंगा जी तो उधर से ही नजदीक हैं।
राजकुमार ने बात मरोड़ी, कैसे जाएगा उधर से-----छठ पूजा वालों ने मना जो कर दिया है। ऐलान कर रखा है उनलोगों ने कि अगर इस रास्ते से विसर्जन हुआ और सजावट में थोड़ा सा भी इधर-उधर हुआ तो छोड़ेंगे नहीं-----वहीं पर सबको गाड़ देंगे।
एक तो ऐलान शब्द अपने आप में ही युद्ध की घोषणा करने वाला शब्द है, ऊपर से वहीं गाड़ देंगे-----ये सुनकर तो किशन तमतमाने लगा। राजकुमार और खंजन ने बातों का पेट्रोल भी खूब अच्छी तरह से डाला और आग भभक पड़ी।
किशन को तमतमाया देख आसपास विसर्जन की तैयारी में लगे लोग सब काम छोड़कर इकट्ठे होने लगे। किशन गरज रहा था, क्या कर लेगा छठ पूजा वाला-----जान से मार देगा, अरे हम किशोरबा, नवीनमा सबको चीन्हते हैं-----एक एक को जानते हैं-----गीदड़भभकी, किसको दे रहा है-----हमको। फिर जमा भीड़ को देखकर बोला, हमसे भिड़ेगा-----हमसे-----साले पर सनीचर चढ़ गया है-----जानता नहीं है, हमारे ही मामू के साले यहाँ दरोगा हैं-----सबको भीतर करवा देंगे।
अब तो सबके अंदर क्रोध और लड़ाई की जो भी जरूरी भावनाएं होती हैं, सबके खून के अंदर जोर मारने लगी।
सबसे बड़ी बात थी कि पूरे गाँव में लक्ष्मी पूजा से जो इस टोला का शान बढ़ा था अगर गद्दी टोला वालों के सामने झुक गए तो सब गोबर में मिल जाता। तुरंत मीटिंग बुलाई गई और ये तय किया गया कि चाहे जो हो, मूर्ति उसी रास्ते जाएगी-----मार हो जाए तो हो जाए।
अब विसर्जन की तैयारी से अधिक लड़ाई की तैयारी होने लगी। सभी को कह दिया गया कि तैयारी का समय तो बहुत कम बचा है पर इंतजाम में कोई कमी नहीं रहनी चाहिए। जिसके घर लाठी पैना, हॅाकी स्टीक है तुरंत लाने को कहा गया। इन सबके अलावा ईंट पत्थर और हथियार ट्रैक्टर पर मूर्ति के पीछे रखा जाने लगा। सब सदस्य इस बीच लक्ष्मी जी की सौगंध खाकर एक दूसरे को उत्साहित कर रहे थे।
गद्दी टोला वालों को खबर मिल गई कि पश्चिमी टोला वाले इस बार लक्ष्मी पूजा में कुछ ज्यादा ही उमता गए हैं। इतना भी सोचने को तैयार नहीं हैं कि इस रास्ते से आऐंगे तो हमारा नुकसान हो सकता है। इसका तो साफ मतलब है कि जानबूझकर ही हमसे पंगा लेना चाहते हैं। सुरेश तैश में आते हुए बोला, हाँ सूरो, उ लोग चाहता है-----हमारे पूजा में विघ्न खड़ा करना-----एक पूजा क्या कर लिया, पूरे गाँव को अपना बपौती समझ लिया है। सूरो भी गरमाते हुए बोला, आने दो सालों को-----यहीं सबका विसर्जन कर देंगे-----परमानेंटे भूल जाएगा पूजा करना।
अरे मोतिया, दिनेशवा, हिरवा सबको तैयार करो। उन लोगों के आने से पहले लाठी, डंडा, स्टिक-----जो भी मिले-----जमा करके रखो-----आते ही सबका होश ठिकाने लगा देंगे।
तैयारी तो दोनों ओर से पूरी हो गई। विसर्जन में क्या होगा, इसका अनुमान तो पूर्वी टोला वाले भी लगा रहे थे। पर इतनी जल्दी कुरुक्षेत्र का मैदान तैयार हो जाएगा, इसका अंदाजा नहीं था। त्रिलोचन बाबू ने राकेश से कहा, कहीं बात बहुत बढ़ न जाए -----किसी की जान न चली जाए-----इसलिए पुलिस को खबर कर देते हैं-----वो संभाल लेगी। राकेश बोला, काका, अब कुछ नहीं हो सकता-----पुलिस को अभी खबर करियेगा तो वो सांझ तक आएगी -----पुलिस पर भरोसा करते हैं-----वो कब समय पर पहुँचती है-----तब तक तो जो होना है वो तो हो ही जाएगा।
पश्चिम टोला वाले बाजे गाजे और डीजे के साथ विसर्जन करने निकल गए। जो इन बातों से अनजान थे वो खूब नाच रहे थे, बच्चे भी देह धुनकर नाच में मगन थे। और जो लड़ाई की तैयारी में थे वो चौकन्ने थे पर बाहर वालों को ये बात पता नहीं लगने दे रहे थे।
नाचते नाचते लक्ष्मी पूजा वाले छठ पूजा के सड़क पर आ पहुँचे-----डीजे जोर जोर से गा रहा था, आ देखें जरा, किसमें कितना है दम ।
शेर की तरह वे छठ पूजा के सजावट वाले सड़क में जानबूझकर घुस गए। छठ पूजा वालों ने भी मोर्चा संभाल लिया कि जैसे ही कोई नुकसान हुआ कि ------
योजनानुसार लक्ष्मी पूजा वालों का डीजे लटक रहे झूमर से टकराया, उसके बाद लगातार सड़क के ऊपर में लटके बल्ब, तार, रोलेक्स सब को समेटने लगा। और सब टूट टूट कर गिरने लगा। लाइट टूटते तो सबने देखा पर गिरते बहुत कम ने। क्योंकि सबका ध्यान टूटने पर ही लगा था कि ऐसा कुछ भी होते ही मार शुरू कर दिया जाएगा।

फिर क्या था, छठ पूजा वालों की जोरदार आवाज आई, मारो सालों को। पर ये आवाज डीजे के शोर में कुछ दब सी गई।
नाचने वाले नाच रहे थे और मार शुरू हो गया। कुछ ट्रैक्टर पर उछल कर चढ़ गए। दोनों तरफ से मारामारी चालू हो गया। खींच कर, दौड़ कर, पटक कर, सब कुछ फिल्म के क्लाइमेक्स की तरह हो रहा था। अंत में भगदड़ मच गई। किसी का हाथ टूटा तो किसी का पैर तो किसी का माथा फूटा।
और अगले दिन अखबार में खबर छपी, दीघापुर में वर्चस्व की लड़ाई में ------
 *****************************************
लेखिका :- सिनीवाली शर्मा

परिचय :-

मनोविज्ञान से स्नातकोत्तर, इग्नू से रेडियो प्रसारण में पी जी डी आर पी कोर्स
बचपन से गाँव के साथ साथ विभिन्न शहरों में प्रवास
अभी अभी कहानी संग्रह ' हंस अकेला रोया ' प्रकाशित
परिकथा के 2016 के नवलेखन अंक के लिए चयनित
प्रतिलिपि कथा सम्मान से सम्मानित 
परिकथा, लमही, गाथांतर, दैनिक भास्कर, करुणावती, बिंदिया, आदि पत्र पत्रिकाओं में कहानियाँ प्रकाशित
स्त्रीकाल, लोकविमर्श, लिटरेचर प्वाइंट आदि ब्लॉग पर भी कहानियाँ प्रकाशित
सार्थक इ पत्रिका में कहानी प्रकाशित
अट्टहास एवं विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में व्यंग्य प्रकाशित
नोटनल पर इ बुक प्रकाशित, ' सगुनिया काकी की खरी खरी '
सगुनिया काकी नामक श्रृंखला फेसबुक पर लोकप्रिय 
कहानी संग्रह ' हंस अकेला रोया ' की कहानियों का देशी विदेशी भाषाओं में अनुवाद 
संपर्क सूत्र 
siniwalis@gmail.com
मोबाइल 08083790738

Tuesday, May 31, 2016



उपन्यास अंश 


जयश्री राय  के उपन्यास "दर्द्जा "के कुछ अंश ही दिल को दहलाने की काबिलियत रखते है | सम्पूर्ण उपन्यास एक दस्तावेज है  विशेष जातीय समुदाय में स्त्री पर हो रहे क्रूर  कृत्य का जिसे एक रस्म के नाम से नवाज़ा  गया है |जहां आज स्त्री के कदम अन्तरिक्ष में दस्तक दे चुके है ,वहाँ  स्त्री अभी भी अपने क़दमों  को अमानवीयता की जंजीर से छुड़ाने की जद्दोजहद में लगी हुई है |





दर्दजा
=========
- जयश्री रॉय 



जयश्री रॉय की कृति ‘दर्दजा’ के पृष्ठों पर एक ऐसे संघर्ष की ख़ून और तकलीफ़ में डूबी हुई गाथा दर्ज है जो अफ़्रीका के 28 देशों के साथ-साथ मध्य-पूर्व के कुछ देशों और मध्य व दक्षिण अमेरिका के कुछ जातीय समुदायों की करोड़ों स्त्रियों द्वारा फ़ीमेल जेनिटल म्यूटिलेशन (एफ़जीएम या औरतों की सुन्नत) की कुप्रथा के ख़िलाफ़ किया जा रहा है। स्त्री की सुन्नत का मतलब है उसके यौनांग के बाहरी हिस्से (भगनासा समेत उसके बाहरी ओष्ठ) को काट कर सिल देना, ताकि उसकी नैसर्गिक कामेच्छा को पूरी तरह से नियंत्रित करके उसे महज़ बच्चा पैदा करने वाली मशीन में बदला जा सके। धर्म, परम्परा और सेक्शुअलिटी के जटिल धरातल पर चल रही इस लड़ाई में विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूनेस्को जैसी विश्व-संस्थाओं की सक्रिय हिस्सेदारी तो है ही, सत्तर के दशक में प्रकाशित होस्किन रिपोर्ट के बाद से नारीवादी आंदोलन और उसके रैडिकल विमर्श ने भी इसमें अहम भूमिका निभाई है।
                                                                       अपनी समाज-वैज्ञानिक विषय-वस्तु के बावजूद प्रथम पुरुष में रची गयी जयश्री रॉय की कलात्मक आख्यानधर्मिता ने स्त्री की इस जद्दोजहद को प्रकृति के ऊपर किये जा रहे अत्याचार के विरुद्ध विद्रोह का रूप दे दिया है। सुन्नत की भीषण यातना से गुज़र चुकी माहरा अपनी बेटी मासा को उसी तरह की त्रासदी से बचाने के लिये पितृसत्ता द्वारा थोपी गयी सभी सीमाओं का उल्लंघन करती है। अफ़्रीका के जंगलों और रेगिस्तानों की बेरहम ज़मीन पर सदियों से दौड़ते हुए माहरा और मासा के अवज्ञाकारी क़दम अपने पीछे मुक्ति के निशान छोड़ते चले जाते हैं। माहरा की बग़ावती चीख़ एक बेलिबास रूह के क़लाम की तरह है। हमारे कानों में गूँजते हुए वह एक ऐसे समय तक पहुँचने का उपक्रम करती है जिसमें कैक्टस अपने खिलने के लिए माक़ूल मौसम का मोहताज़ नहीं रहता।


अभय कुमार दुबे
          निदेशक, भारतीय भाषा कार्यक्रम, विकासशील समाज अध्ययन पीठ (सीएसडीएस), दिल्ली
************************************************************



दूसरे दिन रात के अंतिम पहर मैं एक बार फिर अनगढ़ पत्थरों के उस स्याह टीले के पास अपनी मां के साथ खड़ी थी और वह कुरुप और डरावनी बंजारन अपनी कालीन के टुकड़ों की पैबंद लगी झोली से तरह-तरह के औज़ार और भोंथरे-नुकीले हथियार निकाल-निकालकर ज़मीन पर तरतीव से रख रही थी. आज हमारे साथ पड़ोस की सामोआ आपा भी थीं. आपा और मां ने मेरे दोनो हाथ दो तरफ से पकड़ रखे थे और मेरे घुटनों में धीरे-धीरे कंपन हो रहा था. पेट के नीचले हिस्से में कुछ घुलाता हुआ. मैं बड़ी मुश्क़िल से सीधी खड़ी रह पा रही थी.

तेज़ी से फैलती रोशनी में मैंने चाकुओं और दूसरे हथियारों पर जमे हुये काले खून के धब्बों को देखा था जिन्हें वह बंजारन औरत जिसे मां जाबरा कहकर सम्बोधित कर रही थीं, अपनी थूक से गीला कर लहंगे से पोंछ रही थी. उसके दोनों हाथ की बड़ी और बीचवाली उंगलियों के नाखून बहुत लंबे थे, मुर्गे के चंगुल की तरह आगे से झुके हुये. उन्हें देखकर मेरे पूरे शरीर में बार-बार झुरझुरी-सी दौड़ जा रही थी.

एक समय के बाद जाबरा ने अपना चेहरा उठा कर मां की ओर अजीब ढंग से देखा था, जैसे कुछ आंखों ही आंखों में कह रही हो और इससे पहले की मैं कुछ समझती या करती, मां और आपा ने मुझे जबरन खींच कर ज़मीन पर लिटा दिया था. मां ने बैठ कर मेरे सर को अपने सीने से लगा लिया था तथा आपा ने मेरे पैरों को दोनों तरफ फैला कर उनपर मां के पैर चढ़ा दिये थे. मां ने भी झट पूरी ताक़त से मेरे पांव अपनी हड़ियल जांघों से चांप दिये थे. इस बीच आपा ने पीठ की तरफ से मेरी दोनों बांहों को मोड़ कर सख़्ती से पीछे की तरफ से पकड़ लिया था. अब मां ने फिर कल जैसी ठंडी आवाज़ में कहा था- "माहरा! ज़रा बर्दास्त करना, सब जल्दी हो जायेगा!"

मैं बिना कुछ कहे अपनी विस्फारित आंखों से जाबरा को देखती रही थी जो मेरे फैली हुयी टांगों के बीच बैठी ठंडी आंखों से मेरा मुआयना कर रही थी. फिर मैंने देखा था उसके हाथ में ब्लेड का वह टुकड़ा जो दूसरे ही पल मेरी नर्म त्वचा में जाने कहां तक उतर गई थी. मेरी आंखों के आगे अचानक बिजली के नीले-पीले फूल-सा कुछ कौंधा था और मैं हलक फाड़ कर चिल्लाती चली गई थी! दर्द का ऐसा भीषण अनुभव मुझे पहले कभी नहीं हुआ था. मैं ईद-बकरीद के मौकों पर जानवरों को हलाल होते हुये देखती आई थी. अब्बू या कोई और जानवरों के मुंह काबा की तरफ करके उनके गले में ढाई दफा चाकू रेत कर छोड़ देते. उसके बाद वे जानवर देर तक तड़प-तड़प कर अपनी जान देते. उनकी उबली हुई आंखें, खुला हुआ मुंह, गले से भल-भल बहता खून, उनकी छटपटाह्ट के साथ चारों तरफ उड़ते खून के छींटे.... यह सब आमतौर पर हमारे लिये मनोरंजन के दृश्य हुआ करते थे, मगर आज एक तरह से मुझे भी ज़िन्दा ही जिबह किया जा रहा था. जाबरा के उठते-गिरते हाथ के साथ मेरे शरीर में तेज़ पीड़ा की लहरें उठ रही थीं, बिस्फोट-से हो रहे थे. कभी जाबरा के हाथ में चाकू होता, कभी पत्थर के टुकड़े तो कभी ब्लेड... भय, पीड़ा से अवश होते हुये मैंने देखा था, उसने अपने दोनों गंदे हाथों के लम्बे नाखूनों को मेरे भीतर खुबा दिये थे. दर्द के अथाह समुद्र में डूबते हुये मैंने महसूस किया था, वह अपने नाखूनों से मुझे नोंच-खसोट रही है, चीर-फाड़ रही है, कुतर रही है! उस समय आग़ की सलाइयां-सी मेरे जांघों के बीच चल रही थी. लग रहा था, ढेर सारी जंगली, विषैली चिंटियां मेरे अंदर घुस गई हैं और मुझे खोद-खोद कर खा रही हैं! या फिर कोई बिच्छु लगातर डंक मार रहा है. तेज़ जलन हो रही है. मेरे दोनों पैर बुरी तरह थरथरा रहे हैं, पूरा शरीर पसीने से भीग गया है. चिल्ला-चिल्ला कर गला फट गया है. मां का चेहरा मुझ पर झुका हुआ है और उन्होंने मुझे बुरी तरह जकड़ रखा है. उनकी आंखों में इस समय अजीब-सी चमक और मुग्धता हैं! जैसे कोई धार्मिक अनुष्ठान देखते हुये लोगों की आंखों में अक़्सर होती है. मेरे मुड़े हुये हाथ शायद टूट गये हैं और कमर से नीचे का शरीर शून्य पड़ गया है. मुझ से और चिल्लाया नहीं जाता... मेरे गले से घुटी-घुटी आवाज़ें निकल रही हैं. एक समय के बाद खून के बहाव को रोकने के लिये जाबरा मेरे जख़्म पर जानवरों की लीद और मिट्टी डालने लगती है. ऊपर आकाश फटकर धीरे-धीरे सफ़ेद पड़ रहा है... पास ही कहीं सियार हुंक रहा है, ताड़ के नंगे माथे पर एक गिद्ध बैठा है. उसकी नंगी, रोमहीन गर्दन, खून में डूबी पलकहीन आंखें, विशाल डैनों की झपट... सब धीरे-धीरे आपस में गडमड हो जाता है और फिर वह काली, बड़ी चादर आकाश के जिस्म से खिसक कर जाने कब मेरे ईर्द-गिर्द फैल जाती है और मैं उसके तरल, सुखद अंधकार में डूब जाती हूं... आह! मृत्यु... यह इस जघन्य पीड़ा, इस नरक से कहीं बेहतर है. उस क्षण मैं सचमुच मर जाना चाहती थी. यह एक बेहतर विकल्प था. उस ठंडी, काली, निविड़ शून्यता को मैंने किस आवेग से स्वयं में निर्बाध उतरने दिया था...


ना जाने कितनी देर बाद मेरी आंखें खुली थीं. मैं मरी नहीं थी, जिन्दा थी... ओह! यह प्रतीति कितनी भयावह थी मेरे लिये! जीवन यानी पीड़ा और... पीड़ा! मेरे कमर से नीचे का हिस्सा नरक बन गया है. एक धधकता हुआ कुंड! ऐसे जल रहा है कि जैसे किसी ने ताज़े ज़ख़्म पर नमक छिड़क दिया है. अंदर कुछ धप-धप कर रहा है. सारी शिरायें सुलग रही हैं. एक चीरता हुआ दर्द बिच्छु के डंक की तरह रह-रह्कर लहर उठता है...
मेरा चेहरा सूखे हुये आंसुओं से चिटचिटा रहा है, होंठों पर पपड़ियां जम गयी हैं. किसी तरह सर उठा कर मैं अपने आसपास देखने की क़ोशिश करती हूं. मां हाथ में एक सूखी लकड़ी लेकर आस पास झपटते हुये गिद्धों को भगाने की क़ोशिश कर रही हैं. गिद्ध हड़बड़ा कर थोड़ा उड़ते हैं, फिर वापस लौट आते हैं. चारों तरफ अजीब-सी बदबू है. दूर सूखे नाले के पास दो लकड़बग्घे अपनी लम्बी जीभ निकालकर हांफ रहे हैं... गिद्धों की कर्कश चीख, डैनों की झपट, साथ लकड़बग्घों की डरावनी आवाज़- जैसे कई चुड़ैलें नकिया कर एक साथ हंस रही हों!
मैंने सिहर कर उस तरफ से अपनी आंखें फेर ली थी और दायीं तरफ देखा था. सामने पत्थरों और झाडियों में मेरे शरीर के छोटे-छोटे टुकड़े- चमड़ी, बोटी- बिखरे पड़े थे! धूप में सूख कर काला पड़ते हुये... चारों तरफ खून के छींटे, धब्बे... जैसे अक़्सर किसी वध स्थल में होता है! मांस के कतलों पर नीली मक्खियां भिनभिना रही थीं. एक कौआ मेरे देखते ही देखते चमड़ी का एक टुकड़ा उठा कर टीले के ऊपर जा बैठा. देखकर मेरे अंदर घुलाने लगता है. मुंह में उल्टी से पहले जैसा पानी भर आता है. अपनी ऊबकाई रोकते हुये मैं देखती हूं, मेरे पैरों के पास जाबरा अपने सामने कैकसिया पेड़ के बड़े-बड़े कांटों की ढेर लगाये बैठी थी. उसके हाथ में सफ़ेद धागे का बंडल था. उसके इशारे पर मां और मौसी एक बार फिर मेरे आस पास घिर आई थीं.

इस बार मैंने कोई प्रतिरोध नहीं किया था. मुझ में कोई ताक़त भी नहीं बची थी इसके लिये. पूरा बदन अवश हो चुका था. सीने के दायीं तरफ असहनीय दर्द था, कलाइयां झनझना रही थीं. जांघ टूट-सी गयी थीं. मुझे पकड़ते हुये मौसी ने मां से फुसफुसा कर कहा था - "इसकी दायीं तरफ की दो पसलियां टूट गयी हैं... कलाई में भी मोच है!" सुनकर मां ने उसे चुप रहने का इशारा किया था. जाबरा मेरे कटे हुये जिस्म को कांटे और मोटे धागे से सी रही थी. ताज़े कटे हुये मांस में कांटे से छेदकर उसमे धागा डालती और उसे कसकर सी देती... मेरा गला पूरी तरह से बैठ चुका था. थोड़ी देर गोंगिया कर मैं फिर से अचेत हो गई थी. अचेत होते हुये मैंने प्रार्थना की थी कि इस बार मैं सचमुच मर जाऊं.



इसके बाद एक महीना मैंने उस वीरान जगह में एक घास-फुस की झोपड़ी में अपने दिन बिताये थे. यह छोटी-सी झोपड़ी मां ने मेरे लिये अपने हाथों से बनायी थी. सूखे पत्ते, घास, प्लास्टीक के टुकड़े और जाने क्या-क्या से. बचपन से मां को अकाल यानी घर बनाते हुये देखा है. जानवरों को लेकर हम घास और चारा की तलाश में एक जगह से दूसरी जगह भटकते रहते. साथ में ऊंट की पीठ पर दूसरे सामानों के साथ हमारा घर भी चलता जिसे बड़ी आसानी से तोड़ा और जोडा जा सकता है. बांस और लकड़ियों का एक छोटा-सा खांचा जिसपर घास-फुस, सूखे पत्ते और टीन या कपड़े के पैबंद लगाये जाते हैं. धूप और बारिश, हवा से ज़रा-सी आड़... बस यही होता है हमारे लिये घर का अर्थ!

इस छोटी झोपड़ी के फर्श में पड़ी-पड़ी मैं सियारों की हूक, उल्लू और अन्य रतजगे पंक्षियों की आवाज़, जंगली हाथियों की चिंघार सुनती रहती. मुझे कमर से लेकर टखने तक कस कर बांध दिया गया था ताकि जख़्म ठीक से भर सके. हिलना-डुलना तक संभव नहीं था. मां दलिया या कोई दूसरा नरम और गला हुआ खाना मेरे मुंह में डाल देतीं. टट्टी-पेशाब भी उसी अवस्था में. पहली बार जब अपने ताज़े घाव के साथ मैंने पेशाब किया था, लगा था किसी ने जख़्म में तेज़ाब डाल दिया है! तभी मुझे पहली बार पता चला था, मेरा गुप्तांग पूरी तरह से बंद कर दिया गया है. बस एक माचिश की तीली की नोंक बराबर छेद- पेशाब और माहवारी के रक्त श्राव के लिये. बड़ी दीदी ज़मीन पर एक छोटा गड्ढा बना देती जिसमें एक करवट लेटकर मुझे पेशाब करना पड़ता. एक-एक बूंद- 15-20 मिनट तक! अंत तक मैं इतनी निढाल हो जाती कि मेरी आंखों के आगे अंधेरा छाने लगता. इन दिनों मैं लगभग हर वक़्त रोती ही रहती थी.

अचानक से मेरी दुनिया कितनी बदल गई थी. बस दर्द, डर, उदासी और अकेलापन... क्या औरत होना इसी को कहते हैं? दर्द से पैदा होना और दर्द में मर जाना...! जिसदिन मेरे जनानंग को पूरी तरह से काटकर मुझे औरत बनाया गया था, उसी दिन दोपहर से मुझे बुखार चढ़ आया था. तेज़ बुखार में पड़ी-पड़ी मैं बड़बड़ाती रहती. मेरी आंखें बकौल दीदी के गुड़हल की तरह लाल हो गई थीं. मेरे घाव पक गये थे. जख़्म से मवाद बहता रहता, खून से कपड़े लिथरे रहते, चारों तरफ दुर्गंध के भभाके उड़ते रहते. भिनभिनाती हुई मक्खियों, मच्छरों के बीच असहाय पड़ी मैं या तो कराहते रहती या अचेत हो जाती. सन्निपात की अवस्था में मुझे कुछ भी साफ़-साफ़ समझ में नहीं आता. सबके चेहरे अजीब-से अजनबी-अजनबी लगते, आवाज़ें जैसे कहीं बहुत दूर से मक्खियों की भिनभिनाहट की तरह आतीं. किसी की चीख, किसी की पुकार, किसी की हंसी... सब मेरे भीतर गड्मड होते रहते. बेहोशी जैसी नींद में डरावने सपने आते, रात को छोटी-सी झोंपड़ी स्याह परछाइयों से भर जाती... मैं अपने सुलगते-धधकते शरीर की क़ैद में पड़ी रात दिन मृत्यु कामना करती रहती. अगर इस नरक को जीवन कहते हैं तो इससे मौत भली.

एक दिन जब मैं तेज़ बुखार में अचेत-सी पड़ी थी, अपनी बड़ी बहन की चीख सुनकर बड़ी मुश्क़िल से आंख खोल पाई थी और फिर गहरे आतंक में देखा था, मेरे शरीर के नीचले हिस्से में चिंटियां ही चींटियां बड़े-बड़े थक्कों में लगी हुई हैं- लाल, विषैली, गिजबिजाती हुईं... मेरे शरीर से खून बह रहा था, मगर मैं कुछ महसूस नहीं कर पा रही थी. मुझे अब दर्द नहीं होता था. सब कुछ जैसे शून्य हो गया था.

"ऐसे ऑपरेशन के बाद बहुत-सी लड़कियां इनफेक्शन, टेटनस, खून में ज़हर आदि फैल जाने से मर जाती है. पता नहीं ये कैसे जी गई! मैंने तो उम्मीद छोड़ दी थी..." एक महीने बाद जब मैं स्वस्थ होकर अपने घर लौट रही थी, आपा को मां से यह फुसफुसा कर कहते हुये सुना था. "हमारी ज़मीन की औरतों को ज़िंदगी शायद इसलिये मिलती है कि ये मौत से ज़्यादा मुश्क़िल होती है... हब्बा की जाइयों को अपने गुनाहों की सज़ा इसी दुनिया में भुगत कर जाना है. उनके लिये कोई अलग से दोज़ख नहीं है. जो है यही ज़िंदगी है...!" एक बार एक जादूगरनी ने कहा था. वह हमारे गांव कोई खेल दिखाने आई थी. हंसते-हंसते खेल दिखा रही थी मगर जाने क्यों फिर ये कह कर अन्त तक रोने लगी थी. मुझे याद है, उस समय उसके रोने पर भी हम बच्चों ने तालियां बजाई थी.

घर लौटकर भी मेरा जीवन सहज नहीं हो पाया था. धीरे-धीरे  समझ पाई थी, मैं सिरे से बदल दी गई हूं, शायद हमेशा के लिये ही. शरीर से भी और मन से भी. अपने विगत जीवन की निश्चिंतता, छोटी-छोटी खुशियां, निर्दोष सपने... सब मेरी देह के कोमल हिस्सों के साथ ही मुझसे अलग हो गये हैं. सब कहते हैं, अब मैं मुकम्मल औरत हो गई हूं, मेरा दर्ज़ा समाज और अपने लोगों में ऊपर उठ गया है. मगर मुझे ऐसा महसूस होता है कि जैसे मैं अधूरी हो गई हूं, अपंग हो गई हूं, कहीं से कम हो गई हूं! बहुत गहरे कहीं एक क्षोभ है, एक टीसता हुआ अपमानबोध. रह-रहकर ठगे जाने का अहसास होता है. लगता है, एक साजिश, एक छ्ल हुआ है मेरे साथ. विशेष कर मां के प्रति मन में शिकायत है. अब तक उनकी गोद, उनका आंचल ही दुनिया का सबसे निरापद, सबसे सुंदर आश्रय प्रतीत होता आया था. मगर इस घटना के बाद भीतर कुछ बहुत सुदृड़, बहुत पवित्र एकदम से टूट गया था. लगता था, मां ने इस अमानवीय कृत्य में दूसरों का साथ देकर अपमी ममता को, मुझे, मेरी अगाथ आस्था को नष्ट कर दिया है, छीन्न-भिन्न कर दिया है. अब शायद कभी मैं मां की गोद में निश्चिंत होकर पहले की तरह सो ना सकूंगी!

मां मेरी ख़ामोश आंखों में सवाल पढ़ती हैं. कभी उनसे नज़रें चुराती हैं तो कभी कुछ जवाब देने की भी क़ोशिश करती हैं - "एक नेक औरत का फर्ज़ बनता है कि वह दीन के बताये हुये रास्ते पर चले, अपनी औरत होने की जिम्मेदारी को समझे... ऊपर वाले ने हमें औरत बनाया है, इसलिये हमारे जिस्म में जो मर्दाना हिस्सा है, उससे हमें पूरी तरह से निज़ात पा लेना चाहिये, जैसे मर्द अपने जिस्म से ख़तना के ज़रिये औरत वाला नाज़ुक हिस्सा अलग करवा लेता है और मुकम्मल मर्द बन जाता है."
"मर्दोंवाला हिस्सा...! कौन-सा?" मुझे मां की बातें समझ नहीं आतीं. मुझे किसी तरह समझते ना देख आपा मां की मदद के लिये बातों का सिरा सम्हालतीं - "औरतों के जिस्म को नहीं समझती! अरे, गुप्तांग के जो बाहरी हिस्से हैं वे सब मर्दाना हिस्से हैं. जो अंदरुनी कोमल हिस्सा है वही जनाना हिस्सा है! वही ऊपरवाले ने औरत को मां बनने के लिये दिया है. हमें हमारे जिस्म का इस्तेमाल सिर्फ़ मां बनने के लिये करना चाहिये, ना कि यौन का विकृत आनन्द उठाने के लिये..."
"और नहीं तो क्या..." बीच में एक और प्राचीन महिला कूद पड़तीं - "छोरी! जाने किस गुनाह की वजह से क़ुदरत ने हमारे टांगों के बीच यह गंदी-सी चीज़ डाल दी है! जितनी भद्दी दिखती है उतनी खतरनाक भी है. औरत का शरीर ही उसका पाप. जाने कब आबरु में धब्बा लग जाय. ये दो अंगुल की चीज़ सारे ईमान पर भारी... जबतक देह से जुड़ी है, किसी को चैन नहीं. तो पाप को जड़ से ही ख़त्म कर दिया जाय! ना रहेगा बांस, ना बजेगी बांसुरी!
उनकी बातें जाने क्यों मुझे बहुत अपमान जनक लगतीं. औरत के शरीर को इस तरह जलील किया जाना, उसे शक और हिकारत से देखा जाना. जिसे क़ुदरत ने इस खूबी से रचा है, उसे नष्ट कर देने वाले हम कौन होते हैं? मेरा सर सुनते हुये भारी हो उठता. मगर मेरे ख़्यालों से अंजान औरतें आपस में बतियाती रहतीं - "फिर छोटी उमर में इससे छुटकारा पा लेना अच्छा... वर्ना जानती भी है क्या होता है? ये गंदा, बदबूदार मांस का लोथड़ा बढ़ते-बढ़ते घुटनों तक लटक आता है! फिर ज़रा सोचो क्या हालत होती होगी औरत की! मेरी दादी कहती थी कि एक लड़की ने इससे मना किया तो उसका यही हाल हुआ. आगे चलकर दो टांगों के बीच इतना बड़ा डेढ़ मन का झुलता अवयव लेकर ना चलते बने, ना बैठते बने. ऊपर से जग हंसाई अलग से."


सुन कर मेरा जी घिनाने लगता. पता नहीं ये कहानियां सच भी थीं या नहीं! मुझे मुंह बनाते देख मां के चेहरे पर गुस्सा तैर आता - "लड़की! हम अपने पवित्र पिता समाल की संताने हैं! तुम्हें याद है ना समाल कौन थे? खुद मुहम्मद साहब के अपने गांव और कुरैश जाति के व्यक्ति! ऐसे महान इंसान की संतानें हैं हम! हमें अपने खून की पवित्रता और जाति की पहचान बनाये रखनी है और हमारा जातीय परिचय हमारे रीति-रिवाज़ों और मज़हबी कायदे-कानूनों में है. इनका हम किसी भी तरह बेइज्ज़ती नहीं कर सकते. हमारी इज्ज़त, कायदे-कानून, मज़हब हमारी जान से भी ज़्यादा कीमती हैं. इसपर हम किसी भी तरह आंच आने नहीं दे सकते. जिस्म के इस गंदे हिस्से से निज़ात पाकर हम औरतें पाक और खूबसूरत हो जाती हैं, एक नेक बीवी और मां बनने के काबिल हो जाती हैं. ये तकलीफें नहीं, नियामतें हैं जो हम औरतों को अता की गई है!" कहते हुये भावावेश में आकर मां झर-झर रोने लगतीं. दूसरी औरतें भी अपनी गीली आंखें पोंछने लगतीं. ऐसे मौकों पर सबके चेहरों पर अजीब-सी दीप्ति और गरिमा के भाव होते. सब देख-सुन कर मैं अजीब दुविधा में पड़ जाती. एक तरफ मेरी अकल्पनीय तकलीफें थीं, मन का आक्रोश था और दूसरी तरफ घर की बड़ी-बूढ़ियों की ये आस्था और भक्ति की बातें. तय नहीं कर पाती थी क्या सही है और क्या ग़लत. इन सबके बीच मेरी पीड़ा मेरा सबसे बड़ा सच थी जो रात दिन मेरे जिस्म में सुलग-सुलग कर मुझे याद दिलाती थी कि मेरा आप कही बहुत पीछे छूट गया है, मैं आधी-अधूरी हो गई हूं...

मैंने देखा था, मेरे शरीर के निचले हिस्से को बाहर से बिल्कुल सपाट कर दिया गया था. अब बहां एक बड़े घाव के चिन्ह के सिवा कुछ नहीं था जिस पर धागे के आड़े-तिरछे दाग़ थे. जैसे बोरे के मुंह को मोटे धागे से सी दिया जाता है. हमारी संस्कृति के सौन्दर्य बोध में स्त्री के शरीर के इस हिस्से के लिये कोई स्थान नहीं. यह बस सूखा, सपाट और साफ़ होना चाहिये. बाकि चीज़ें गंदी और त्याज्य. मेरे लिये अपने शरीर की तरफ देखना ही अब मुश्क़िल हो गया था. साथ में दूसरी परेशानियां. माहवारी के दौरान मैं दर्द से नील पड़ जाती. मुझ से उठा-बैठा तक नहीं जाता. महीने के ये पांच दिन मृत्यु-यंत्रणा में बीतते. हर बार जी चाहता ऐसी तकलीफ झेलने से अच्छा मर जाऊं. फिर रोज़ की असुविधायें तो थीं ही. हर बार पेशाब करने के लिये मुझे देर तक बैठी रहना पड़ता. एक-एक बूंद टपकती और मेरे भीतर आग़-सी लग जाती!...................

**********************************************


चित्र गूगल से साभार 

 साहित्य सम्मेलन,"साहित्य की बात" 17-18 september 2022 साकिबा  साकीबा रचना धर्मिता का जन मंच है -लीलाधर मंडलोई। यह कहा श्री लीलाधर...

पिछले पन्ने