Thursday, June 8, 2017


कहानी: अधजली 
सिनीवाली शर्मा 
दुख के आरंभ से दुख के अंत तक की एक मरुभूमि में फैली यह कहानी, कहानीकार की उस दृष्टि और संवेदना का परिचय देती है जहाँ लगभग सपाट और कहानीविहीन दिख रहे जीवन से धारदार कहानियाँ छान लाने की क्षमता है। एक ही परिवेश में और एक ही परिवार में रह रही दो स्त्रियाँ वाह्य वास्तविकता के धरातल पर कितना अलग जीवन जी रही होती हैं पर संवेदना और दुख की घनीभूत होती जा रही पीड़ा के स्तर पर कितना समान जीवन जी रही होती हैं इस विरोधाभास को साफ़गोई से समेटने में कहानीकार की भाषा और अनुभव अपना महत्व दिखाते हैं। क्या कुमकुम और शांति की त्रासदी केवल उनकी त्रासदी है या उनके बहाने पूरे औरत समाज की त्रासदी है? क्या यह हमारे पूरे समाज की त्रासदी बयान नहीं कर रही कि हम लगातार सभ्य होने का, मनुष्य होने का दंभ भरते-भरते कहाँ आ गये हैं कि आज भी हमारे समाज में कुमकुम को न कुमकुम मिलता है और न शांति को शांति?






परिचय
मनोविज्ञान से स्नातकोत्तर, इग्नू से रेडियो प्रसारण में पी जी डी आर पी कोर्स
बचपन से गाँव के साथ साथ विभिन्न शहरों में प्रवास
पहली कहानी ' उस पार ' लमही, जुलाई-सितंबर २०१५ में प्रकाशित 
अभी अभी कहानी संग्रह ' हंस अकेला रोया ' प्रकाशित
परिकथा के 2016 के नवलेखन अंक के लिए चयनित
प्रतिलिपि कथा सम्मान 2015 से सम्मानित 
परिकथा, लमही, कथाक्रम, गाथांतर, दैनिक भास्कर, प्रभात खबर, दैनिक जागरण, करुणावती, बिंदिया, आदि पत्र पत्रिकाओं में कहानियाँ प्रकाशित
स्त्रीकाल, लोकविमर्श, लिटरेचर प्वाइंट, रचना प्रवेश, स्टोरी मिरर, शब्दांकन आदि ब्लॉग पर भी कहानियाँ प्रकाशित
सार्थक इ पत्रिका में कहानी प्रकाशित
अट्टहास एवं विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में व्यंग्य प्रकाशित
नोटनल पर इ बुक प्रकाशित, ' सगुनिया काकी की खरी खरी '
सगुनिया काकी नामक श्रृंखला फेसबुक पर लोकप्रिय 
कहानी संग्रह ' हंस अकेला रोया ' की कहानियों का देशी विदेशी भाषाओं में अनुवाद 
संपर्क सूत्र 
siniwalis@gmail.com
मोबाइल 08083790738
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वाटस अप पर साहित्यिक समूह "साहित्य की बात "पर प्रस्तुत सिनीवाली शर्मा की कहानी पाठकों की त्वरित प्रतिक्रियाओं सहित रचना प्रवेश पर ....

अधजली 
इस घर के पीछे ये नीम का पेड़ पचास सालों से खड़ा है। देख रहा है सब कुछ। चुप है कपर गवाही देता है बीते समय की। आज से तीस साल पहले, हाँ तीस साल पहले !
इस  पेड़ पर चिड़ियाँ  दिन भर फुदकती रहती, इस डाल से उस डाल। घर आँगन इनकी आवाज से गुलजार रहता। आज सुबह सुबह ही चिड़ियों के झुंड ने चहचहाना शुरू कर दिया था, चीं— चीं— चू— चू। बीच बीच में कोयल की कूहू की आवाज शांत वातावरण में संगीत भर रही थी कि तभी कई पत्थर के टुकड़े इस पेड़ पर बरसने लगे। चिड़ियों के साथ उनकी चहचहाहट भी उड़ गई, रह गई तो केवल पत्थरों के फेंकने की आवाज के साथ एक और आवाज, ” उड़, तू भी उड़—उड़ तू भी—सब उड़ गईं और तू—तू क्यों अकेली बैठी है—तू भी उड़ !”” क्या कर रही हो बबुनी ? यहाँ कोई चिड़िया नहीं है—एक भी नहीं, सब उड़ गईं, चलो भीतर चलो “, शांति कुमकुम का हाथ खींचती हुई बोली।

” नहीं, वो नहीं उड़ी—मेरे उड़ाने पर भी नहीं उड़ती। उससे कहो न उड़ जाए, नहीं तो—अकेली रह जाएगी बिल्कुल मेरी ही तरह !” बोलते हुए उसकी आवाज काँपने लगी, भँवें तनने लगीं और आँखें कड़ी होने लगीं। वो तेजी से भागती हुई बरामदे पर आई और बोलती रही, ” अकेली रह जाएगी, अकेली—उड़, तू भी उड़—उड़—!”
बोलते बोलते कुमकुम वहीं बरामदे पर गिर गई। सिंदूर के ठीक नीचे की नस ललाट पर जो है वो अक्सर बेहोश होने पर तन जाती है उसकी। हाथ पैर की उंगलियां अकड़ जाती हैं। कभी दाँत बैठ जाता है तो कभी बेहोशी में बड़बड़ाती रहती है।
शांति कुमकुम की ये हालत देखकर दरवाजे की ओर भागी और घबराती हुई बोली, ” सुनिएगा !”
ये शब्द महेंद्र न जाने कितनी बार सुन चुका है। शांति की घबराती आवाज ही बता देती है कि कुमकुम को फिर बेहोशी का दौरा आया है। कितने डॅाक्टर, वैध से इलाज करा चुका है, सभी एक ही बात कहते हैं, मन की बीमारी है।
” आ—आ—“
” तुम—तुम—मैं—मैं—!”
ये सब देखकर महेंद्र के भीतर दबी अपराध बोध की भावना सीना तानकर उसके सामने खड़ी हो जाती। कुमकुम की बंद आँखों से भी वो नजर नहीं मिला पाता। सिरहाने बैठकर वो उसके माथे को सहलाने लगता और शांति कुमकुम के हाथ पैर की अकड़ी हुई उंगलियों को दबा कर सीधा करने की कोशिश करने लगती।
महेन्द्र पानी का जोर जोर से छींटा तब तक उसके चेहरे पर मारता जब तक कुमकुम को होश नहीं आ जाता। होश आने के बाद कुछ देर तक कुमकुम की आँखों में अनजानापन रहता। वो चारों ओर ऐसे शून्य निगाहों से देखती जैसे यहाँ से उसका कोई नाता ही न हो। धीरे धीरे पहचान उसकी आँखों में उतरती।

कुमकुम धीरे से बुदबुदायी, ” दादा—दादा !”
महेंद्र के भीतर आँसुओं का अथाह समुद्र था पर आँखें सूखी थी। वो कुमकुम का माथा सहलाता रहा।
” दादा, क्या हुआ था मुझे ?” कुमकुम की आवाज कमजोर थी।
” कुछ नहीं—बस तुम्हें जरा सा चक्कर आ गया था—ये तो होता रहता है—अब तुम एकदम ठीक हो।”
” हाथ पैर में दर्द हो रहा है, लगता है देह में जान ही नहीं जैसे किसी ने पूरा खून चूस लिया हो।”
” तुम आराम करो, भौजी पैर दबा रही है।”
” पता नहीं क्यों,—मैं बराबर चक्कर खा कर गिर जाती हूँ !”
महेंद्र के पास इसका कोई जवाब नहीं था। ” इसका ध्यान रखना “, इतना बोलकर उसका माथा एक बार बहुत स्नेह से सहला कर वो बाहर चला गया।
महेंद्र के जाने के कुछ देर बाद तक कुमकुम, शांति को गौर से देखती रही।
” भौजी, दादा कुछ बताते नहीं, मुझे क्या हुआ है ! डॅाक्टर क्या कहता है मुझे बताओ तो !”
” तुम्हें आराम करने के लिए कहा है “, कुमकुम का हाथ सहलाती हुई शांति बोली।
” भौजी, क्या डॅाक्टर सब समझता है, मुझे क्या हुआ है ?”
” हाँ, बबुनी ! वो डॅाक्टर है न !”
” तुम तो ऐसे बोल रही हो जैसे वो डॅाक्टर नहीं भतार हो !”
शांति के चेहरे पर मुस्कुराहट की बड़ी महीन सी लकीर खिंच गई।
” जाओ भौजी, तुम्हें भी काम होगा—मैं भी थोड़ी देर में आती हूँ—अभी उठा नहीं जाता !”
” मैं तो कहती हूँ थोड़ी देर सो जाओ, रात में भी देर तक जगना होगा।”
” क्यों ?”
” याद नहीं कल सुषमा का ब्याह है और आज रात मड़वा ( मंडपाच्छादन ) है। मैं तो जा नहीं सकती, तुम्हें ही जाना पड़ेगा, नहीं तो कल कौन—“, बोलते बोलते शांति बिना बात पूरी किए तेजी से बाहर निकल गई। बेहोशी से आई कमजोरी के कारण कुमकुम की आँख लग गई।
सपने में कुमकुम ने देखा, नीले आकाश में उजले उजले बादल रुई की तरह तैर रहे हैं। दो उजले बादल आपस में टकराए और नीला आकाश सिंदूरी हो गया। जहाँ दोनों बादल टकराए थे, वहीं से एक सुंदर युवक निकल कर उसकी ओर बढ़ रहा है। उसकी माँग और वो भी सिंदूरी हो जाती है। युवक उसकी ओर मुस्कुराते हुए बढ़ता चला आ रहा है, आहिस्ता आहिस्ता। उसका सीना चौड़ा है और बाहें बलिष्ठ, होठों पर गुलाबी मुस्कान है और बाल काले  घुंघराले हैं। आँखें, उसकी आँखों को देखने से पहले ही कुमकुम की आँखें लाज से झुकी जा रही हैं और वो लाज से लाल हुई जा रही है। युवक उसके पास, बहुत पास आ जाता है, उसकी  सांसें तेज होने लगती हैं। उन दोनों की सांसें एक होतीं कि तभी बादलों का रंग अचानक काला हो गया और तभी, दो काले बादल आपस में टकराते हैं और भयंकर गर्जना होती है, आकाश में बिजली चमक जाती है। इस बिजली की चमक में उस युवक का चेहरा इतना डरावना और भयंकर दिखा कि कुमकुम डर से चीखने लगती है और  वह पसीने से नहा जाती है। तभी उसकी नींद टूट जाती है।
” वही, हाँ वही तो थे पर इतना डरावना चेहरा !—क्यों हो गया उनका ! पर कैसे कहूँ कि वही थे—उनका चेहरा आजतक तो ठीक से देखा भी नहीं है मैंने ! वर्षों बीत गए, ठंडी सांस लेकर कुमकुम बिछावन पर लेट गई। हमारा ऐसा ब्याह हुआ कि—माँग तो भरी मेरी पर जीवन सूना रह गया। बारह बरस बीत गए इसी चैत में। उसकी कानों में भी बात गई थी पर उसे किसी ने बताया नहीं था कि शादी कहाँ होगी, किससे होगी। उसे बस यही पता था कि घरवाले जहाँ कहेंगे, जब कहेंगे उसे तैयार रहना है। उसे कुछ पूछना नहीं है बस चुपचाप सब करते जाना है। बेटियों को ऐसा ही होना चाहिए, जिसके पास प्रश्न नहीं होते।
वो भी तैयार थी पर उसके कान में बात आई। भौजी ने दादा से कहा था, ” कर दो ब्याह, इतना अच्छा घर वर तो हम किसी जनम में नहीं कर पाएंगे। इस तरह का ब्याह तो होता रहता है। लड़का लड़की साथ रहते हैं तो सब ठीक हो जाता है और अपनी कुमकुम तो सुंदर भी है।” मेरी सुंदरता और मेरी देह !  सबके लिए एक आशा की किरण थी कि सब कुछ ठीक हो जाएगा। दादा कुछ नहीं बोले।
लड़का अच्छी नौकरी करता है। दादा के दोस्त सूरज दा हैं न, उन्हीं के ननीहाल का लड़का है। कल लड़का घर लाया जाएगा। कल बढ़िया मुहूर्त है। पता लगा लिया गया है। ऐसी शादी में जो तैयारी हो सकती है, कर दी गई है। पुआल के साथ कच्चा बाँस, बसबिट्टी से कटवा कर आँगन में एक किनारे रख दिया गया है। पीली धोती और लाल साड़ी पलंग पर रखा देखा था मैंने। दोनों कपड़े एक साथ देखकर मीठी सी सिहरन तो हुई पर उससे अधिक डर गई।
ब्याह के नाम पर सतरंगी सपने जो आँखें देखतीं, उनमें खुशी की जगह डर समा गया। क्या होगा ? कैसे होगा ? जबरदस्ती के ब्याह में अगर वो नहीं माने तो ! लेकिन मैं किससे कहती ! इस डर से तो लड़कियां गुजरती ही हैं। ये सोचकर अपने को समझा लिया। कहीं न कहीं अपने भीतर ये भरोसा भी था कि किसी भी तरह मैं उनका मन जीत लूंगी।
पर, कहाँ जीत पाई ! इतने बरस बीत गए, ब्याह करके जो गए फिर लौट कर नहीं आए। बाबू जी उनके आने का रास्ता देखते देखते दुनिया से चले गए और मैं—, रास्ता देखते देखते अहिल्या बन गई।
ब्याह के समय एक बार तुम्हारे चेहरे पर नजर गई थी। पंडी जी मंत्र पढ़ रहे थे। उसी पवित्र अग्नि में तुम्हारा चेहरा दिखा था। तुम  गुस्से से तमतमाए हुए थे। उस गुस्से में भी अपनापन दिखा, बस, तुम्हारी हो गई । पंडी जी ब्याह के बाद बोले कि सियाराम की जोड़ी है। सच में सियाराम की जोड़ी ही है हमारी कि आँखें कभी मेरी सूखती ही नहीं।
उसी समय मेरे जीवन में सूरज उगा था पर क्या पता था कि ये सूरज उगने के साथ ही डूब जाएगा। और बच जाएंगी काली अंधेरी रातें। कौन कौन सा पूजा पाठ न किया, किस मंदिर के द्वार पर माथा न रगड़ा। कई बार दादा तुम्हारे घर गए। तुम्हारे घर वालों ने उन्हें क्या नहीं कहा पर वो मुझे हर बार आकर यही कहते, घरवाले बहुत अच्छे हैं, लड़का नौकरी के काम से बाहर गया है, लौटते ही यहाँ आएगा। शुरु शुरु में तो वो यही कहते रहे फिर लौटते तो कुछ नहीं बोलते। लेकिन उनकी चुप्पी कहती, नहीं आने वाले, कभी नहीं आते।
आ जाते तुम एक बार, तो मैं तुम्हें बताती कैसे बीते हैं ये बारह साल। वनवास तो बारह बरस का था उनका पर मेरा तो पूरा जीवन ही वनवास बन गया। तुम्हारे मन में न बसी, तुम्हारे साथ घर न बसा सकी, तो—मैं वनवासी हुई न, अकेली जंगल में भटकती हुई। एक एक दिन ऐसे बीतता है जैसे हर दिन जहरीला काँटा बनकर मेरी देह में चुभता जाता है। इन बीते सालों में मेरी पूरी देह में काँटा ही काँटा भर गया है। छटपटाती हूँ दर्द से। इन काँटों का घाव भीतर तक होता है लेकिन इन घावों से सिर्फ आँसू निकलते हैं। इन बीते दिनों का दर्द मेरी हाथ की लकीरों में उतर आया है तभी तो सभी रेखाएँ एक दूसरे को काटती रहती हैं और मेरी भाग्य रेखा तुम्हारी भाग्य रेखा से नहीं मिल पाती है।
सोचती हूँ इस ब्याह से क्या मिला ? काँच की चूड़ियाँ और माँग में सिंदूर। कुमकुम नाम है मेरा पर काली स्याही पुती है मेरे जीवन में। तुमसे ब्याह होते ही जहर घुल गई जिंदगी में। तुम्हारा तो कुछ नहीं बदला पर मेरा शरीर छोड़ कर सब कुछ बदल गया। यहाँ तक की ये घर भी अब मेरा नहीं रहा। अब ये घर, घर नहीं नैहर हो गया। सब कहते हैं, बेटियाँ नैहर में अच्छी नहीं लगतीं। परगोत्री हो गई। दान होते ही बेटी दूसरे गोत्र, दूसरे घर की हो जाती है। जैसे मैं इंसान नहीं सामान हूँ। मेरी कोई इच्छा नहीं, कोई जरूरत नहीं। सामान हूँ, दान कर दी गई। सामान हूँ तुम चाहो तो ले जाओ नहीं चाहो तो—! कभी कभी सोचती हूँ मैं तुम्हारा नाम लेते लेते मर जाऊँ तो—तुम्हारे हाथ का आग भी मुझे नहीं मिलेगा, मुझे पैठ नहीं मिलेगा। मैं पूछती हूँ तुमसे, हमारे सारे धर्म ग्रंथ क्या पुरुषों ने ही बनाए हैं कि बिना पुगरुष के औरतों की कोई गति नहीं। धर्म कहता है, मेरी देह पर पहला अधिकार तुम्हारा है।
देह हाँ देह, न जाने क्या सोचकर ईश्वर ने बनाया इसे कि इसे भी भूख लगती है। उस समय डर जाती हूँ मैं। मेरे बिछावन पर साँप लोटने लगते हैं। हाँ, काला, सरसराता हुआ, रेंगता हुआ मेरी ओर आता है। मैं डर जाती हूँ पर मैं भाग नहीं पाती। मैं देखती रह जाती हूँ। सरसराता हुआ  साँप मेरी देह पर चढ़ता है, फिर रेंगता है हर अंग पर आहिस्ता आहिस्ता। उफ्फ, कैसे बताऊँ तुम्हें ये सिहरन ! फिर साँप मुझे डँसता है। पूरे शरीर में जहर चढ़ जाता है। जहर भरी देह में एक और जहर। कभी कभी ये मुझे बहुत डराता है तो कभी ये मुझे अच्छा लगने लगता है। उस जहर में भी प्रेम है।  लिपटी हूँ मैं उस साँप से ! देखो जरा भी लाज नहीं बची मुझमें ! हाँ नहीं बची क्योंकि लाज के परे भी तो कुछ होता है।
सब बेकार हो गया—मेरी देह, मेरा मन, मेरा जीवन, एक तुम्हारे बिना। तुम पर गुस्सा आता है। जब तुम आओगे तब मैं तुम्हें बताऊंगी, मैं चंदन की लकड़ी कितनी तपी कितनी जली, एक तुम्हारे बिना। फिर भी अपना स्वभाव नहीं छोड़ा, तुमसे प्रेम करना। सब कहते हैं तुम कभी नहीं आओगे पर मैं जानती हूँ कि तुम आओगे—और वो रात भी आएगी, जिसमें सांसें एक होती हैं।
तन और मन शांति का भी सूखा था। सब कहते हैं, उसकी कोख भी सूख गई। नहीं तो इतने बरस में इस सूने घर में बच्चों की किलकारी नहीं गूँजती। कहने वाले तो ये भी कहने लगे हैं कि अब इस घर का वंश ही खत्म हो गया। भौजाई को न सही ननद का ही होता तो भी कहने के लिए भी तो इस घर का कोई होता। कुमकुम ऐसी अभागिन निकली कि पति का दुहराकर मुँह नहीं देखा और शांति तो बांझ ही हो गई। बांझ शब्द शांति के कानों के भीतर ऐसे उतरता जैसे किसी ने जलता हुआ लाल दहकता कोयला डाल दिया हो और ये आग उसके कलेजे को धू धू कर जलाती है। पर वो किससे कहे, कैसे कहे कि वो वसंत तो आया ही नहीं कि उसकी कोख में कोंपल फूटता। उसका जीवन तपता रेगिस्तान बन गया जिसमें एक हरी दूब भी नहीं बची। दूर दूर तक बस तपता जलता बालू ही बालू।
पति महेंद्र को बस घर से खाने तक का ही मतलब रह गया था। दिनभर गाय और खेती के कामों में उलझे रहते। जो समय बचता भी उसे द्वार पर बैठ कर बिता देते। कभी दो चार लोगों के साथ तो कभी अकेले ही। रात भी उंगली पकड़ कर महेंद्र को शांति के कमरे तक नहीं पहुंचा पाती। इस घर के भाग्य में लगता है सूनी रातें ही लिखी हैं।
सब बातों से शांति समझौता कर लेती पर अपने भीतर की ममता को कैसे समझाती। अनजाने ही उसकी कोख में हलचल होने लगती। छाती फाड़कर भीतर से कुछ निकल जाना चाहता। उसका मन करता उसे भी कोई माँ कहे। कान कहते आज तक इतना कुछ तो सुना पर माँ न सुना। संसार का सबसे मीठा शब्द माँ होता है। इस सूने घर आँगन में वो डगमगाते हुए चले। जिसकी काजल भरी आँखें और तुतलाते हुए बोल माँ कहे और वो दूर से भी सुन ले। दौड़ती हुई आकर उसे उठाकर अपनी छाती से लगा ले। पर—पर नहीं ये छाती जलती रहेगी, इसमें कभी दूध न उतरेगा। कोई उसे माँ नहीं कहेगा। वो बांझ ही रहेगी। माँ न बनेगी कभी।
एक उसकी जिद ने उसके हँसते जीवन में आँसुओं की बाढ़ ला दी। उसने कहा था, ब्याह दो कुमकुम को उस नौकरिया लड़के से। किसी भी हाल में ऐसा लड़का नहीं उतार पाएंगे हम। और ऐसा तो उसने बहुत बार देखा था। शुरु शुरू में लड़के वाले नखरा करते हैं लेकिन लड़की के एक बार घर में घुसते ही अपनी सेवा के दम पर पूरे परिवार का मन जीत लेती है। फिर तो वही उस घर में पुजाने लगती है। कुमकुम भी जीत लेगी सब कुछ, वहाँ जाकर। लेकिन जीतती तो तब जब वो वहाँ जाती। कैसा कसाई परिवार है, एक बार भी नहीं ले गया कुमकुम को। हमलोग हर कोशिश कर के हार गए। उस परिवार से बेइज्जती के सिवाय कुछ नहीं मिला। लोगों ने कहा, देवस्थान जाकर धरणा दो। छ: महीने कुमकुम को लेकर वहाँ भी रही। सुबह शाम मंदिर में झाड़ू बुहारु, पूजा पाठ, व्रत उपवास सब कराया। ये करते हुए वर्षों बीत गए, भाग्य नहीं बदला। शायद विधाता के पास इस घर का भाग्य बदलने के लिए स्याही नहीं थी। अब तो ऊपर वाले से भी कोई आस नहीं रही।
कुमकुम बोलती कुछ नहीं, सब कुछ ऐसे पी जाती है जैसे पानी। लेकिन जब उसे दौरा आता है तो उसे भी पता नहीं चलता, वो क्या क्या बकती है। शुरु में तो मुझे लगा नाटक करती है। फिर लगा गेहूँ की तरह तपती उमर है, ऐसी उमर में भूत प्रेत पकड़ते हैं अकेली पाकर। जब बालियाँ कटने को तैयार हो जाती हैं, हवा के झोकों के साथ झन झन बजती हैं, न काटो तो उसी हवा के थपेड़ों से जमीन पर बिखरते हुए कितनी देर लगती है !
मुझे डर लगने लगा, उसका वो रुप देखकर। उसकी देह थरथराने लगती। आँखें लाल लाल जैसे चिता की आग हो। मुँह ऐसे खोलती जैसे सबको चबा जाएगी। फिर जोर जोर से रोने लगती, चिल्लाने लगती, जाने दो—चल चल—! फिर कहाँ कहाँ से भूत झाड़ने के लिए ओझा न आया। कितने कबूतर, दारु, पान, सुपारी, सिंदूर, बताशा और अड़हुल के फूल चढ़ाए गए। मंत्र पढ़ा गया। ओझा कहता, ये जिन्न है—ऐसे नहीं छोड़ेगा—अपने साथ लेकर जाएगा—कुंवारा जवान लड़का मरा है—वो प्यासा है। इसे अपने साथ लेकर जाएगा—नहीं मानेगा—किसी भी हाल में नहीं मानेगा। लेकिन वो नहीं आया जिसकी जरुरत थी। पान पर सिंदूर लगता रहा और कुमकुम अपने लिए रंगहीन हो चुके सिंदूर में कुमकुम सा लाल रंग खोजती रही। ओझा से ठीक न हुआ तो डॅाक्टर के पास गए। डॅाक्टर बोला कोई बीमारी नहीं है। केवल पति का साथ ही इसे ठीक कर सकता है।
एक गलती ने किस तरह बदल दिया सबका जीवन ! जबरदस्ती नहीं सहमति से साथ होता है। जीवन भर का साथ रंग रूप देह पर टिकता है लेकिन सबसे ज्यादा जरूरी मन का मिलना है, अब समझ में आ रहा है। इस गलती की कीमत कुमकुम ही नहीं, ये घर भी चुका रहा है। मैं माँ नहीं बन पाई, वो पति को तरसती है। सब उसका दुख समझते हैं, मैं तो पति के सामने रहते पति को तरसती हूँ, मेरा दुख कौन समझेगा !
कई साल हो गए, उस रात के बाद वो रात कभी नहीं आई। उसी रात से मेरा पलंग सूना हो गया और मैं भी। उस रात बाहर से ऐसे चीखने की आवाज आई जैसे किसी ने किसी का गला दबा दिया हो। उस रात को याद कर अभी भी सिहर उठती हूँ। मुझे लगा रात के इस पहर भूत की आवाज है। मैं डर कर उनके सीने से लिपट गई। उन्होंने कहा, डरो नहीं कुछ होगा। मैं उनके सीने से लगी उनकी धड़कन सुनकर हिम्मत बांध ही रही थी कि किवाड़ पीटने की आवाज आने लगी। अब तो मेरे प्राण सूख गए। दरवाजा पीटते पीटते, फूट फूट कर रोने की आवाज रही थी। रोते हुए बोलने लगी, तुमने ही मुझे उजाड़ा, तेरे ही कारण मेरी रातें सूनी रह गईं और तुम—-! ये कुमकुम की ही आवाज थी। उसे फिर दौरा आया था। आवाज डरावनी हो गई थी। उन्होंने उठकर किवाड़ खोला। सामने कुमकुम बेहोश पड़ी थी। उसी रात के अंधेरे में मेरी सारी रातें खो गईं।
शुरु शुरु में तो मुझे बहुत गुस्सा आता। बात बात पर लड़ लेती उससे। पर कुमकुम ऐसे सुनती जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो। आकाश की ओर न जाने क्या देखती रहती और चुपचाप मेरी बातें सुनती रहती। कभी कोई जवाब नहीं देती। आखिर थककर धीरे धीरे मैंने भी समझौता कर लिया। सारी इच्छाओं को मन में समेटे मैं सूखी नदी हो गई, दो नदियां पास पास पर दोनों सूखी और तपती हुई। जहाँ जीवन पलता वहाँ सन्नाटा भांय भांय करता।
कभी कभी कुमकुम बाल गोपाल का फोटो दिखाती हुई बोलती, ” भौजी, एक ऐसा ही गोलमटोल भतीजा मुझे चाहिए, मैं उसे नहलाउंगी, तेल लगाउंगी—और वो केवल गाय का दूध पीएगा, भैंस का एकदम नहीं क्योंकि भैंस का दूध पीने से बुद्धि मोटी हो जाती है।” कुमकुम की बातें सुनकर शांति न रो पाती न हँस पाती।
कबसे शांति ये बातें सोच रही थी। उसका ध्यान तब टूटा जब फंटूश की माँ ने हड़बड़ाते हुए आकर कहा, ” दुल्हिन, जब जानती हो कम्मो का आसन हल्का है तो अकेले क्यों जाने देती हो इधर उधर,  वो भी सांझ के इस पहर में। जाकर देखो बैर गाछ के नीचे बेहोश पड़ी है। गाँव भर जानता है उस गाछ पर भूत रहता है।”
” लेकिन !”, इतना ही बोलते हुए शांति दौड़ती हुई वहाँ पहुँच गई, देखा कुमकुम गाछ के नीचे बेहोश पड़ी है। वहीं उसके बगल में बच्चे का लाल लाल कपड़ा, हाथ पैर में बांधने वाला लाल काला फुदनी और कजरौटा बिखरा पड़ा है। कल ही कह रही थी, सुग्गी आई है ससुराल से अपने बेटे को लेकर—देखने जाएगी। अपने दादा से कहकर उसने बच्चे के लिए कपड़ा और फुदनी मंगवाया था। रात भर जगकर उसने काजल बनाया था। शांति को याद आया कि पूरी रात कुमकुम आँगन में बेचैन सी घूमती रही थी और अभी, कुमकुम और सबकुछ यहाँ बिखरा है।
आज शांति जिस गति से घर के भीतर गई, वो आज तक महेंद्र ने इतने सालों में नहीं देखा था। वह उसे जाते देखता रहा। उसका मन किसी आशंका से काँप गया। जब तक वह कुछ समझता, मिट्टी के तेल की तेज गंध आने लगी। वह तेजी से भागता हुआ घर कके भीतर गया। जो उसकी आँखें देख रही थी उसे देखकर वह कुछ पल के लिए जैसे ठिठक गया। शांति ऊपर से नीचे तक मिट्टी तेल से नहाई हुई थी। आँखें जल रही थी और गुस्से में उसकी देह थरथरा रही थी।

महेंद्र को जैसे अचानक होश आया, ” क्या कर रही हो ? एकाएक क्या हो गया ?”

” एकाएक कहते हो, मेरा तिल तिल कर मरना तुम्हें दिखाई नहीं देता—अपने खून का दर्द तुम्हें दिख जाता है। मेरे लिए सोचने वाला कौन है—न साँय न बच्चा ! बांझ हूँ मैं— बांझ ! वो भी तुम्हारे कारण !”
” किसी ने कुछ कहा—?”
” किसी ने नहीं—सब कहते हैं—बांझ हूँ मैं !”
” कितनी बार कहा है, कहीं मत जाया करो—लोग जीने नहीं देंगे।”
” मंदिर गई थी, तो क्या वहाँ भी नहीं जाऊँ ? इसी घर का सुख माँगने गई थी लेकिन जिसका सुहाग नहीं सुनता उसपर भगवान भी सहाय नहीं होता। लोग मुझे बांझ कहते हैं, अपनी बहू बेटियों को मेरी छाया से भी दूर रखते हैं। बताओ, क्या मैं बांझ हूँ ?”
महेंद्र की समझ में नहीं आया कि क्या जवाब दे। इधर शांति चिल्लाती रही।

” मैं दुनिया भर की बातें सुनूँ और तुम चुप रहो। तुम दोनों भाई बहन ने मिलकर मेरा सत्यानाश कर दिया। सबसे बड़ा सुख मुझसे छीन लिया। मुझसे तुम्हारा खाने तक का ही मतलब है। दिनरात मैं तुम्हारे घर की चाकरी करुँ पर मेरे मतलब का क्या !”
महेंद्र केवल शांति को देखता रहा और वो गुस्से में बकती रही। ” मैं मर भी जाऊँ तो तुम्हारा पेट और ये घर तुम्हारी बहन भी चला लेगी। उस कुलच्छिनी को तो यहीं रहना है जब तक कि सब की जान न चली जाए। न जाने किस नछत्तर में बियाह हुआ था इसका—!”
महेंद्र शांति के गुस्से की आँधी के आगे थरथराता दीया बनकर रह गया। उसने आसपास चुपचाप नजर घुमाकर देखा कि कहीं कुमकुम तो नहीं है पर वो कहीं नहीं दिखाई दी।
” बताओ, मैं क्यों जीऊँ ? तुम्हारा पेट और घर चलाने के लिए—न पति का सुख न बच्चे का ऊपर से लोगों की तरह तरह की बातें। इससे तो अच्छा मेरा मर जाना है। क्या यही सुख देने के लिए मुझे ब्याह कर लाए थे ?”
महेंद्र के पास कोई जवाब नहीं था। वह चुपचाप उसे देखता रहा फिर दो कदम आगे बढ़ कर महेंद्र ने कसकर उसे अपने सीने से लगा लिया। बहुत दिनों के बाद दोनों साथ मिलकर बहुत देर तक रोते रहे। एक गलती की सजा कितने लोगों को मिली। हाँ गलती ही थी एक बेरोजगार भाई ने अपनी बहन के लिए सुनहरे सपने देखे थे। उसने सोचा था कुमकुम बड़े घर जाएगी, सुख करेगी। समाज में प्रतिष्ठा बढ़ेगी पर इसके लिए उसके पास पैसा नहीं था।
महेश चाचा जो बैंक में किरानी हैं, बड़ा घर और इंजीनियर जमाई उतार लाए। खेत तो मुझसे भी कम है लेकिन दो नम्बर की नौकरी के दम पर बेटी को सुखी कर दिया और समाज में इज्जत भी बढ़ गई। मैं भी तो कुमकुम को वही जिंदगी देना चाहता था। बाबू जी से कहा भी था, खेत बेचकर दे देते हैं! कितना है जो बेच कर दे दोगे, फिर तुम्हारा क्या होगा ? खेत नहीं रहेगा तो कल खाओगे कैसे ? ‘ कैसे ‘ का जवाब हम जैसे किसानों के पास कहाँ होता है।

मेरे पास और क्या रास्ता था ! वही जो ऐसी हालत में लोग करते हैं। लड़का उठाकर ब्याह लेते हैं फिर समय के साथ नाव किनारे लगती है या फिर मंझदार में डूब जाती है ! मैंने भी जोखिम लिया। एक यही रास्ता बचा था। किसी गरीब के हाथ बहन देता तो बहन जिंदगी भर सिसकती हुई मर जाती। शुरु शुरु में परेशानी तो होगी, बहुत कुछ बरदाश्त करना होगा, कर लूंगा। पर ये न सोचा था जीवन मरण के बराबर हो जाएगा। बाबू जी कुमकुम को विदा करने की साध मन में लिए ही विदा हो गए। कुमकुम जीते जी लाश बन गई। उसकी इस हालत का जिम्मेदार तो मैं ही हूँ। उसकी लाश पर मैं अपनी दुनिया कैसे बसा लूँ ? कुमकुम, शांति और ये घर, सबका अपराधी तो मैं ही हूँ।

धीरे धीरे एक एक पत्ता झड़कर जैसे पेड़ को सूना कर जाता है उसी तरह इस घर की सभी खुशियाँ झड़ गई थी। घर, नंगे पेड़ की तरह हो गया था। नंगे पेड़ और जलते समय के साथ कुछ महीने बीत गए।

एक दिन कुमकुम बरामदे में बैठ कर कुछ कर रही थी कि देखा शांति आँगन में चक्कर खाकर गिर पड़ी। ” अरे ये क्या हो गया ?” बोलती हुई कुमकुम उसके पास दौड़ कर गई। देखा शांति का हाथ पैर ठंडा है। दादा दादा चिल्लाती हुई उसका पैर रगड़ने लगी।

महेंद्र ने पहली बार इस तरह शांति को अचेत देखा तो उसकी आँखें भर आईं। क्या इसी दिन के लिए वो इसे ब्याह कर लाया था ! आजतक कोई सुख नहीं दे पाया। वो चुपचाप तिल तिल कर मरती रही और वो—! अगर उसे कुछ हो गया तो कोई नहीं है इस घर को और उसे देखने वाला। गाँव के डॅाक्टर ने कहा, ” दुल्हिन को जनानी डॅाक्टर के पास शहर ले जाओ।”

महेंद्र ने परेशान हो कर पूछा, ” क्या हुआ है ?”

” जो तुमने सोचा भी नहीं होगा “, डॅाक्टर ने कहा।

” हे भगवान, ये क्या हो गया !”, कुमकुम का धीरज जवाब दे गया।

उसी समय महेंद्र और कुमकुम दोनों शांति को लेकर शहर गए। महिला डॅाक्टर ने जो कहा, सुनकर दोनों भाई बहन के चेहरे पर कमल खिल गए। तो क्या भगवान ने हमलोगों के ऊपर भी नजर फेरी है ! इस घर के भी दिन बदलेंगे।

फिर तो इस घर के दिन ही बदल गए। गुमसुम उदास सा घर गुनगुनाने लगा। फूलों के साथ खुशियाँ भी खिलने लगीं। कुमकुम धीरे धीरे सोहर गाती हुई देखती कि शांति के चेहरे का रंग बदल गया है। हमेशा मुरझाई रहने वाली भौजी अब खिली खिली रहती है। शांति को खुश देखकर उसे भी अच्छा लगता। वो अब शांति को अधिक काम नहीं करने देती। भौजी के खाने का वो खास खयाल रखती और उसके पसंद का खाना बनाकर खिलाती रहती।

शांति ने कुमकुम का ये रुप कभी नहीं देखा था। इतनी ममता है इसके भीतर। इसके पहले कभी कुमकुम इतनी खुश नजर नहीं आई थी। सचमुच एक बच्चे के आने की आहट मात्र से कितना कुछ बदल गया। कुमकुम इठलाती हुई कहती, ” भौजी, उसके आने के बाद मैं तुम्हारी खातिरदारी नहीं कर पाउंगी। मेरे पास समय कहाँ रहेगा, उसे नहलाना, खिलाना, सुलाना, घुमाना—सब मुझे ही तो करना है।” ये सब सुनकर शांति मन ही मन हँस देती।

छठा महीना शांति का लग गया। दिन जैसे जैसे करीब आता जाता, सबके चेहरे पर खुशियाँ बढ़ती जाती। आज सुबह ही महेंद्र किसी जरूरी काम से गाँव से बाहर गया था और रात तक लौटकर आएगा।

दोपहर होते होते शांति का मन भारी लगने लगा। वो आँगन में चटाई पर लेट गई। कुमकुम धीरे धीरे घर का काम निपटाती रही। गुनगुनी धूप में शांति की आँख लग गई।

” खा लो भौजी !”

” नहीं बबुनी, मन अच्छा नहीं लग रहा है, बाद में खा लूंगी।”

” भौजी खा लो—पकौड़ी भी बनाई है तुम्हारे लिए, मन की साध कोई मन में ही न रह जाए, कल बोल रही थी।”

” खाने का मन नहीं है—जी ठीक नहीं लग रहा।”

एक बार फिर कुमकुम ने खाने को कहा। शांति ने कहा, ” रख दो न बाद में खा लूंगी।”

मनुहार करके कुमकुम रोज शांति को खिलाती थी लेकिन आज धीरे धीरे कुमकुम जिद पर उतर आई।

” कहा न खा लो—नहीं सुनती !”

कुमकुम की आवाज बदलने लगी। शांति इस बदलाव को पहचानती थी। वो डर गई। उसने सहमते हुए कुमकुम की ओर देखा। कुमकुम की भँवें तनने लगी और आँखें लाल होने लगीं। उसका ये रुप देखकर शांति का खून सूख गया। घर में आज अकेली है वो भी इस हालत में। डरते डरते हिम्मत बांध कर इतना ही कह पाई, ” मैं, मैं खा लेती हूँ—मैं तो ऐसे ही कह रही थी—मुझे तो बहुत जोरों की भूख लगी है।”

” तुम्ही तो खा गई मेरा सब कुछ, और नखरा दिखाती है मुझे—मेरा जीवन तबाह करके अपना गोद भरने चली है और—तुम्हारे ही कारण मेरी सेज और गोद सूनी रही और तुम—!”

बोलते बोलते कुमकुम का चेहरा और विकराल होने लगा। भवें तनने लगीं, आँखें आग उगलने लगी। उसने झुककर खाना उठाया और जोर से पिछवाड़े की तरफ फेंक दिया जो नीम के पेड़ से टकरा कर वहीं बिखर गया। बिखर गया वहाँ इतनी साध से बनाया गया खाना और पकौड़ियाँ। वो पलट कर शांति को एक टक देखने लगी। शांति ने कई बार पहले भी देखा था, जब उसे दौरा आता है अगर वो होश में रह गई तो बहुत ताकत इसकी देह में न जाने कहाँ से आ जाती है। एक दो मर्दों को झटक कर ऐसे फेंक देती है जैसे तिनका। कुमकुम की आँखों में खून उतरने लगा और शांति के देह का खून जम गया। आज तो कोई है भी नहीं, वो क्या कर पाएगी। ” नहीं नहीं मैं तुम्हारे हाथ जोड़ती हूँ ” बोलती हुई शांति वहाँ से धीरे धीरे उठने की कोशिश करने लगी। जब तक शांति उठती, कुमकुम के दोनों हाथ उसकी गर्दन पर थे। इस बार शांति का हाथ पैर थरथरा रहा था, भवें तनी थी और आँखें—। कुमकुम के चेहरे पर अट्टहास था। शांति गिड़गिड़ाती हुई बेहोश हो गई। कुमकुम अट्टहास करते हुए शांति को वहीं छोड़ कर पूरे घर में दौड़ती रही।
पीछे खड़ा नीम का पेड़  जोर जोर से डोलता रहा।
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लेखिका का आत्मकथ्य 
हमारे समाज में कई ऐसी औरतें हैं जो परित्यक्ता हैं। इन्हीं औरतों में से एक से मैं मिली। जब उन्होंने जाना कि मैं लेखिका हूँ तो उन्होंने अपने बारे में मुझे विस्तार से बताया। संयोग से कुछ ही दिनों के बाद पिताजी ने इसी तरह की एक और महिला के बारे में बताया।
और चीजों के साथ साथ इस प्लाट में यौन अतृप्ति भी करीब से जुड़ा हुआ था। इस कारण मैं इस प्लाट पर नहीं लिखना चाहती थी। लेकिन इस दौरान मैंने महसूस किया कि कहानी आपको चुन लेती है तो फिर वहाँ आपका चाहना, न चाहना काम नहीं करता। इस प्लाट पर पिताजी से लंबी बातचीत हुई। फिर कहानी तैयार हुई।
ये कहानी कथादेश के मई अंक २०१७ में प्रकाशित हुई और चर्चा में रही। उसके बाद जानकीपुल पर आई। आशा है साकिबा के साथी ससदस्यों को भी ये कहानी पसंद आएगी। आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार है।

मनीष वैद्य 
स्त्री मनोविज्ञान की जटिल परतों की पड़ताल करती यह कहानी अधजली कथ्य और भाषा शिल्प दोनों ही रूपों में अच्छी बन पड़ी है।इसमें कहानी की सहज किस्सागोई है तो ट्रीटमेंट का निर्वाह भी बेशक किया गया है।इस कहानी ने हिंदी बेल्ट का ध्यान खिंचा है तो इसके अलहदा रूप ने। खासकर नए लेखकों में इसे बिरले ही देखा जाता है।सिनीवाली शर्मा में स्त्री के अन्तर्मन् की वेदना को तो मुखर अभिव्यक्ति मिली ही है, इसमें विवाह जैसी संस्था के नाकारा होते जाने तथा खासकर बिहार में जहाँ जबरन विवाह किए जाने की कुप्रथा है, वहां स्त्री जीवन की विसंगतियों को भी कहानी सटीक और मुक्कमिल तरीके से पेश करती है।किस्सागोई में नायिका के भावों की अभिव्यक्ति संकेतो और रूपकों से की गई है, जो इसकी खूबी बन पड़ी है। ऐसे चरित्र हमारे आसपास भरे पड़े हैं। इसलिए कहानी भी अविश्वसनिय नहीं लगती और इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है। हाँ, मुझे इसमें अंत को बेहद नाटकीय और रहस्यमयी बना देने पर जरुर ठीक नहीं लगा। कहानी अंत में आकर अचानक ठक्क करती हुई आपको अधर में छोड़ खत्म हो जाती है।इसके और भी कई अंत हो सकते थे लेकिन यह अधिकार मात्र कहानी लिखने वाले का ही होता है कि वह पाठकों को किधर और कैसे ले जाए।
बावजूद इसके कहानी अच्छी बनी है और कई कारणों से भली लगती है।
सिनीवाली जी को बधाई और असीम शुभकामनाएं।
कहानी पढ़वाने के लिए प्रवेश जी और साकीबा मंच का आभार।
अजय श्रीवास्तव 
सिनी वाली शर्मा जी की कहानी *अधजली* 
१ कहानी प्रथम पाठ में एकदम खुलती नही है ,द्वितीय पाठ में इसका सही आनद आता है और तभी आप कहानी के गुण-दोषों पर विचार कर सकते हैं ...प्रथम में तो पारस्परिक संबंधों को स्थापित करने में ज्यादा समय लगा।
२ ग्रामीण परिवेश में बुनी हुई अच्छी कहानी ,जो सामाजिक विषमताओं को हु ब हु रेखांकित करती है, जो शायद अभी भी समाज मे जड़ें जमाये हुए हैं।
३ स्त्री विमर्श की कहानी है , जिसका निर्णय कहानीकार ने अंततः पाठको पर छोड़ दिया है ।कि समस्या के उन्मूलन के लिए ,क्या किया जाए.. सके तरह से चक्षु खोलने का काम करती है।
४ कुमकुम का विवाह ,जिस तरह से किया गया ,उसका विद्रूप स्वरूप आज भी एक राज्य विशेष में है ,जंहा अविवाहित युवक को अगवाकर या यूं कहें ,इच्छा के विपरीत विवाह की वेदी पर बैठा दिया जाता है...कुछ मित्रों ने भी इसकी पुष्टि की थी पहले कभी ...लेकिन अंजाम ऐसे होते हैं बेमेल विवाह के ..कहानी को पढ़कर ज्यादा अच्छी तरह से समझा जा सकता है।
५ वंशावली विस्तार , अशिक्षा,दशेज प्रथा , पुनर्विवाह के प्रति जागरूकता न होना ...ये सब नारी स्थिति को जीते जी नरक बनाने के लिए पर्याप्त हैं ।
६ कुल मिलाकर कहानी पठनीय है ,सोचने पर बाध्य कर देती है..और कम से कम पाठक को सहमत करती है कि इसके विरुद्ध सोचा जाए व फालतू के सामाजिक प्रतिबंधों की अवहेलना की जाए।
७ कहानी में प्रवाह है किंतु , जासूसी कहानी की तरह पाठ करने की जरूरत है ,तभी सभी घटनाओं को आपस मे जोड़ने में सुविधा रहेगी।
८ अंतर्द्वंद का अच्छा प्रस्तुतिकरण है।
वर्षा रावल :सिनिवाली जी की पहली कहानी पढ़ रही हूँ ,कहानी मनोवैज्ञानिक है जिसमे भाषा, प्रवाह ,प्रस्तुतिकरण सब बेहतरीन .….स्त्री मनोभावों को यूँ कलम से उतार देना बड़ी बात है । मन से मन के द्वंद को बहुत सही उकेरा है लेखिका ने ...कहानी कहीं से बोझिल नही हुई प्रवाह बना रहा ,जबकि कहानी की शुरुआत लेखिका या सूत्रधार से हुआ ,फिर कुमकुम के ज़रिये फिर शांति भौजी और महेंद्र के जरिये आखिरी में पुनः शांति के द्वारा .....इन बदलते सूत्रधारों ने भी कथा के प्रवाह में कोई कमी नही की ....कहानी के अंत तक बनी टीस, बनी रहेगी और कहानी याद आती रहेगी ...बढिया कहानी के लिए बधाई सिनिवाली जी को🌹🌹
रोचिका :आज की कहानी ****अधजली 
के माहौल एवम जबरन विवाह वाली प्रथा से पीड़ित महिला जिसे पति द्वारा स्वीकार न किया गया पर आधारित है । 
सच ! विवाह तन और मन दोनों का मिलन होता है । इसमें ज़बरदस्ती कैसी ???
अपनी बहिन, बेटी के आजीवन सुख की चाह , दौलत की चाह , कुमकुम की स्थिति की ज़िम्मेदार हैं ।
सच ! स्त्री कोई सामान तो नहीं ।
लेकिन कहां समझता है हमारा समाज ??.
कुल मिला कर सामाजिक कुरीति पर प्रहार करती बहुत कसी हुई पाठक को बांधे रखे हुई कहानी है। 
अंत ज़रूर कुछ खटका , किंतु भारतीय परिवेश में स्त्री का विवाह उपरांत यही तो अंत है ।
कुल मिला कर बहुत ही सशक्त कहानी है ।
सिनीवाली जी आप को बहुत बहुत बधाई ।
राजेन्द्र श्रीवास्तव : सिनीवाली जी की कहानी पढ़कर मन विषाद से भर गया। बहुत संतुलित तरीके से बुनी सहज स्वाभाविक कहानी । कुमकुम,शांति और महेंन्द्र के परिस्थितिजन्य अंतरद्वन्द को ,और अवसाद से जूझ रही,हिस्टीरिया जैसे लक्षणों की शिकार कुमकुम के स्वभाव को बड़ी बारीकी से पाठकों के समक्ष रखा है।कहानी को दुरूह या बोझिल होने से बचाने में भी कथाकार सफल हुई हैं।   बेटियों के लिये घरऔर नैहर के बीच की लकीर कितनी सहजता से खींच दी।
"गेंहूँ की तरह तपती उमर"
अभिनव।
एक गलती की सजा भोग रहे पूरे परिवार की यथार्थ परक संदेशप्रद कहानी की कथाकार को बहुत बहुत बधाई ।💐

घनश्याम सोनी :आज प्रस्तुत कहानी एक निम्न मध्यम वर्गीय परिवार की सच्चाई को व्यक्त करती है ,कमजोर आर्थिक स्थिति के कारण मध्यम वर्गीय परिवार को अपने जीवन मे अनेक समझौते करने पड़ते हैं , उन समझौतों के परिणामों को ताजिंदगी भोगना पड़ता है।  ऐसी ही मजबूरी के कारण किये गये विवाह के दुष्परिणाम के फलस्वरूप एक परिवार की सारी खुशियों के तहस नहस होने के साथ परिवार के सदस्यों की सहज जिंदगी को नरकतुल्य बना देने को कहानी में बहुत ही स्वाभाविक तरीके से व्यक्त किया गया है । कहानी कहीं भी बोझिल नही लगती है अपनी सहज गति से बढ़ती हुई अपने अंत को पाठक पर छोड़ती है । पाठक के मनमस्तिष्क को बहुत ही गहराई तक प्रभावित करने वाली शानदार कहानी के लिये कहानीकार को बधाई , साकीबा व प्रस्तुतकर्ता का आभार शानदार कहानी को पढ़वाने के लिये ।💐💐💐
आशुतोष श्रीवास्तव :भूत और वर्तमान दोनों आज एकसाथ कटघरे में खड़े यही गवाही दे रहे की जब भी समाज से कोई ग़लती हुई और दोष किसी का भी रहा हो सज़ा हमेशा स्त्री को ही मिली है !
प्रकृति भी यह अत्याचार करने से नहीं बच सकी। स्नेह , समर्पण, त्याग ,क्षमा, मर्यादा, मातृत्य सभी दैवीय उपमाओं से उसे सज़ा तो दिया किंतु इन गुणों को पहचाननें समझने की शक्ति समाज को नहीं दी!
बलपूर्वक ज़बरन शादी तो लड़के की हुई लेकिन सज़ा मिली कुमकुम को। शादी के समय भले उसका चेहरा ग़ुस्से से लाल हो लेकिन उसके पास ये स्वतंत्रता रही की वो वापस लौट के ना आए ! बंधन से मुक्ति का समान अधिकार  कुमकुम को क्यूँ नहीं? 
शांति भी बाँझ कहे जाने का दुःख सहती है ,दुनिया भर जे ताने सुनती ,आत्मदाह तक करने को तैयार हो गयी। भले ही ग़लती इसके महेंद्र की ही हो।
ये कहानी इन्हीं विडंबनावों, स्त्री-अंतर्द्वंद एवं अंतर्मन की अधजली लाश को चिता से उठा हमारे सामने रख दी है !
एक प्रवाह में मैंने कहानी पढ़ डाली। आरम्भ से अंत तक कहानी बांधे रखती है ! मुझे कहानी के सुखद अंत की उम्मीद नहीं थी फिर भी ऐसा अंत अचम्भित करते हुए हृदय को एक आघात कर गया !
सईद अय्यूब :प्रवेश जी ने कहानी की एक संक्षिप्त परंतु बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका लिखी है। जैसा उन्होंने लिखा है यह कहानी दुख के आरंभ से दुख के अंत तक की एक मरुभूमि में फैली हुयी है। उस मरुभूमि में कुछ भी नहीं है सिवाय दुख के उजले रेत के। खुशी का एक छोटा सा नख़लिस्तान भी नहीं है। कोई कोंपल फूटने की आशा भी नहीं है। ग़लती से फूट गयी तो काल के क्रूर हाथ उसे नोंच कर फेंक देने को आतुर हैं। कहानी के अंत में वही हुआ।
मुझे अपने बचपन की याद है। एक ब्राह्माण परिवार जो हमारे घर के सामने रहता था, की एक लड़की बब्ली की याद है। उसका चेहरा अब भी नज़रों के सामने आ जाता है। मैं उस समय बहुत छोटा था। दुनिया को देखने-समझने की दृष्टि भी अपने बचपने में थी। उस लड़की पर महीने दो महीने पर पागलपन का दौरा पड़ता था (ऐसा कहा जाता था) और वह अपने घर के बाहर भाग जाती थी। खूब चीखती-चिल्लाती थी। थोड़ी दूर पर किताब और खिलौने की दुकान चलाने वाले उसके भाई और बूढ़े बाप ख़बर मिलते ही दौड़ कर आते थे और उसे पकड़ कर किसी तरह कंट्रोल करते थे। मुझे उससे डर नहीं लगता था। बस जब उस पर दौरा पड़ता था तो मुझे उसके पास जाने की इज़ाजत नहीं थी। हम छोटे भाई बहन खेलते खेलते उस परिवार के घर के हाते (उनका घर काफ़ी बड़ा था और सामने खूब लंबा-चौड़ा खुला अहाता जिसे दरवाज़ा कहा जाता था, उसमें खूब सारे फूल और पेड़ लगे थे) में चले जाते। उस समय वह भी हमारे पास आ जाती और खूब बातें करती। कभी-कभी हमारे घर भी आती और अम्मी के पास बैठकर खूब देर तक बातें करती रहती। अब सोचता हूँ तो लगता है कि शायद उसके पास उससे बात तक करने के लिये कोई नहीं रहा होगा। बड़ा होने के बाद, मुझे पता चला कि किसी कारण से उसकी शादी नहीं हो पा रही थी जिसके डिप्रेशन में उस पर ऐसा दौरा पड़ता था। मनोविज्ञान इसके बारे में बहुत कुछ कहता है लेकिन उस पर बात करना अभी मेरा अभीष्ट नहीं है।
बब्ली और कुमकुम जैसे पात्र हमारे जीवन में, समाज में यहाँ-वहाँ नज़र आ ही जाते हैं। पर नज़र आने के बाद भी हम उसको तब तक देख नहीं पाते जब तक कि एक संवेदनशील रचनाकार उसे अपनी रचना में ढाल कर हमारे सामने नहीं रख देता। यह कहानी सिनीवाली जी की संवेदनशीलता का भी परिचायक है कि वे वहाँ से कहानी लाती हैं जहाँ हम नज़र पड़ने के बावजूद रोज़मर्रा का ढर्रा समझ कर आँखें बंद कर लेते हैं।
तुलसीदास जी ने रामचरित मानस में जो कथा कही है वह आपको किसी भी अदालत में रोज़ाना दसियों की तादाद में मिल जायेगी। यानी एक व्यक्ति की पत्नी का अगवा उसके पड़ोसी या किसी अन्य ने कर लिया। वह व्यक्ति और उसके भाई ने उस अगवा करने वाले को खोजकर उसकी हत्या कर दी आदि-आदि। (तुलसीदास और रामचरित मानस का उदाहरण किसी की भावना आहत करने के उद्देश्य से नहीं दे रहा।) एक आम इंसान के तौर पर हम जब इस तरह की घटना को देखते हैं तो यह हमारे लिये महज़ एक घटना होती है। पर एक रचनाकार जब इस तरह की घटना देखता है तो उसे वहाँ कुछ ऐसा मिलता है जिसे वह अपनी रचना के माध्यम से समाज के सामने रख देना चाहता है ताकि समाज उस रचना के आइने में अपना चेहरा देख सके। वही घटना जब तुलसीदास जी जैसे सशक्त रचनाकार के सामने आती है तो रामचरित मानस जैसी कालजयी और शानदार कृति हमें मिलती है। तुलसीदास जी के बहाने मैं यह कहना चाहता हूँ कि कुमकुम और शांति के जीवन में अपनी गहन संवेदना के बूते सिनीवाली जी समाज को देने के लिये एक रचना तो देख लेती हैं, उसे वहाँ से निकाल भी लाती हैं पर कहानी के निर्वाह के स्तर पर थोड़ा सा चूक जाती हैं। 'अधजली' एक बहुत अच्छी कहानी बनते-बनते एक ठीकठाक कहानी में बदल जाती है।

सबसे बड़ी बात यह कि अगर किसी कहानी को बहुत मनोयोग से शुरु किया जाये और आरंभ इतना अच्छा हो कि बस पूरा पढ़े बिना न रुकने का मन हो, वही कहानी मध्य तक आते-आते पाठक को उसे किसी तरह पढ़ जाने के लिये विवश करने लगे तो कहीं न कहीं ऐसा लगता है कि कहानीकार का कंट्रोल कहानी पर से हट गया है। ऐसा इस कहानी के पाठ (मैंने दो बार पढ़ी) के साथ होता है। मध्य तक आते आते कहानी अनावश्यक विस्तार का शिकार होने लगी है। इस कहानी को कसने की आवश्यकता है।
यह कहानी अपने आप में बहुत सहज भी नहीं है। कहानी के कहानीपन तक पहुँचने के लिये कहानी को दुबारा पढ़ना पड़ा। इस कहानी का जो मूल कारण है वह इतने सूक्ष्म इशारे में वर्णित किया गया है कि पाठक अंत तक यह पता ही नहीं कर पाता कि कुमकुम को शादी के बाद उसके ससुराल वाले क्यों नहीं ले जाते? कहानी में वर्णन बहुत है, घटनायें कम हैं। तीन मुख्य घटनायें हैं। पहली कुमकुम का कहानी के आरंभ में ही पागलपन का शिकार होना। दूसरी शांति का अपने ऊपर केरोसिन डाल कर आत्महत्या का प्रयास और तीसरी कहानी का अंत। इनमें से दूसरी घटना बहुत अजीब तरीके से और अचानक घटती है कि पाठक चकरा ही जाता है कि यह क्या हो रहा है? शांति को कुमकुम के बेहोश होने की खबर मिलती है। वह जाती है तो कुमकुम को बेहोश पाती है और वापस आती है तो खुद पर किरोसिन डाल लेती है। बीच में क्या हुआ पाठक सोचता ही रह जाता है। यह इतना अचानक क्यों? 
भाषा इस कहानी की जान है। सिनीवाली जी के पास अभी वह भाषा और वे शब्द बचे हुये हैं जिनसे नयी पीढ़ी लगभग अंजान है। यह आश्वस्तिकारक है। इसके लिये सिनीवाली जी को बधाइयाँ। पर भाषा और व्याकरण संबंधी त्रुटियों से यह कहानी भी अछूती नहीं है। अगर उसे ठीक कर लिया जाये तो बहुत बेहतर होगा। 
अंत में कहानियों के एक पाठक के तौर पर सिनीवाली जी को बधाइयाँ देते हुये यही आग्रह करूँगा कि इस कहानी पर कुछ और श्रम करें। इसे थोड़ा और जाँचें-परखें और कसें। शुक्रिया!
आरती तिवारी :सिनीवाली की कहानी स्त्री की अंतर्वेदना उससे उपजी कुंठाओं का सजीव और मार्मिक चित्रण करने में सफल है। बिहार की इस विवाह पद्यति को गन्धर्व विवाह से भी जोड़कर देखा जा सकता है किन्तु इसमें वर और कन्या वर्तमान में स्त्री पुरुष दोनों की ही सहमति असहमति को दरकिनार कर परिवार जन बस एक रस्मी अदायगी कर रहे होते हैं,.जिनके परिणाम इस भयावह रूप में भी सामने आते रहते हैं।
कहानी का शिल्प गठन बहुत उम्दा है। सिनीवाली को बधाई👏🏼
जतिन अरोड़ा :सिनीवाली जी बधाई स्वीकार करें। कहानी की शुरुआत ने ही मन को छू लिया.बहुत ही मार्मिक और दयनीय भावों की बानगी में कहानी पहला कदम उठाती है। किरदार भी खुले खुले...और हालात का भी स्टीक विवरण.....कहन में और लफ्ज़ो के लिए यह कहानी बधाई की पात्र है।
हालाँकि
कहानी दो बार पढ़ना पड़ी समझने के लिए...
बीच में एक एेसा मूड भी बन पड़ा कि बस खत्म कब होगी..कसावट की दरकार है.कहानी का अंत पाठक के हवाले कर दिया गया है लेकिन यहाँ कुछ छूटा छूटा सा लगता है जिसे पकड़ पाना पाठक के बस में नहीं है।
बहुत बहुत बधाई सिनीवाली जी...💐🙏
विमल चंद्राकर :सबसे पहले तो सिनीवाली जी बहुत बधाई एक लम्बी कहानी लिखी जाने के लिये।
जैसा कि आज के दौर में यह प्रायः देखा जा रहा कि लेखक लम्बी कहानियां लिखने से परहेज़ कर रहे है।लेखक कहानी को कथ्य में सिमटाकर पात्र को बेहद संकुचित दायरे में रखकर लघुकथा ही लिख रहे।सिनेवाली यहां जो लम्बी कथानक व कहन को लिखने का जोख़िम उठाया गया है उसके लिये कहानीकार की सराहना करूंगा।
कहानी का शीर्षक अधचली कहीं ना कहीं कुछ सुलगाहट, टीस और त्रास की दास्तां बताता प्रतीत होता है।कहानी का कहन आरभं से ही ।कुमकुम के चरित्र, स्वाभाव को कुछ इस कदर प्रस्तुत करता है "फिट्स" दौरे जैसे बीमारी के लक्षण, कुमकुम की शरीर की ऐंठन को महसूस कर पाठक भी भीतर तक सिहर जाता है।और उसी समय से कुमकुम के वियोग, विक्षोभ पर संवेदनीय सहानुभूति रखने लगता है कुमकुम को बहुत साधकर कहानी की मुख्य किरदारा बना दिया है।कुमकुम के जीवन में पति के जाने का दुख कहानी में दुख है की अनुभूति कराता जाता है।भाई भावज जैसे आत्मीय रिश्ते बहुत सलीके से आगे आने वाले घटनाओं के सहायक सिद्ध हो।इस सत्य को सहेजने के बाबत कहानाकार ने जमकर मेहनत की है।
एक लम्बी कहानी को पुनः पढ़कर बहुत कुछ बेहतर लिखने की संभावना दीखती है।कहानी का अन्त और कुमकुम को पुनः ठीक ना होना सालता है।घटना संयोजन व प्रस्तुतिकरण कम से कम मुझे तो प्रभावित करता है।
एक अच्छी कहानी के लिये बधाई सिनिवाली जी।👏🏻👏🏻👏🏻👏🏻👏🏻---विमल चन्द्राकर
अंजू शर्मा :अच्छी कहानी के लिए बधाई सिनीवाली। मैं पहले भी कहानी की मार्मिकता पर टिप्पणी लिख चुकी हूँ।  पर हाँ सईद ने जो बिंदु सुझाए हैं यकीनन वे कहानी के लिए बेहद जरूरी हैं।  शायद इतनी बेबाकी और ईमानदारी से कोई और न बताए।  संजो लो इन्हें। बाकी छपने के बाद  ही बेहतर होने की गुंजाईश हर रचना में होती है, होनी ही चाहिए।  शुभकामनाएं कि स्त्री मन की अँधेरी सुरंगों की पड़ताल में तुम कामयाब रही।  बधाई 🌹
प्रवेश सोनी :*लकड़ी जल कोयला भई ,कोयला जल हुई राख* 
*मैं बिरहन ऐसी जली ,कोयला हुई न राख*
स्त्री के वियोग  में जलने की कहानी है *अधजली*
कहानी में दोनों स्त्रियां सुलग रही है ।एक तो इस कदर धुंधाने लगती है जिसका धुआं आंखों में किरचें बन कर चुभता है दूसरी धीमे धीमे सुलगती है भीतर ही भीतर ।यौन वितृष्णा ऐसी आग है जिसमें जलती हुई स्त्री सिर्फ स्त्री रहती है वो दूसरी स्त्री के सुख पर डाह बन जाती है ।कुमकुम से भाई भाभी का सुख नही सुहाया ,प्रत्यक्ष में वो सामान्य बनी रही लेकिन भीतर ही भीतर भाई भाभी को अपने जीवन के बिगड़े हालात का दोषी मानते हुए उनके वैवाहिक जीवन मे अवरोध पैदा करती रही ।कहानी में यह सब संकेतो में बताया गया और यही इस कहानी की खूबसूरती भी है।
यह कहानी हमारे आस पास हीकहीं छुपी दबी है ,जिसे सिनीवाली ने बड़ी नफ़ासत से शब्दों में  बांध कर हमारे सामने रखा ।
मैने इसे कथादेश में छपने की खबर से पढ़ा और कायल हो गई ,हालांकि मुझे भी इसकी तह तक पहुँचने में उलझन हुई पर मेहनत करने से हार नही होती ।कथानक यदि एक बार मन मे थाह पा लेता है तो  कहानी तक पहुँचना ही होता है ।
सबसे बड़ी खुशी की बात एक और है कि इस कहानी को वरिष्ठ साहित्यकार *मैत्रेयी पुष्पा* ने *इंद्रप्रस्थ भारती* के वार्षिक अंक के लिए चयन किया है ।
शुभकामनाये सिनीवाली 
अबीर आनंद :किसी भी कहानी को कहना कि थोङी लंबी है या खिंच रही है, मेरे हिसाब से थोङा न्यायसंगत नहीं होता जब तक ये इंगित न किया जाए कौन सा प्रसंग जबरन ठूँसा गया है। कथाकार कभी कभी भावनाओं में बहकर इमोशन को बयां करने में overdo कर देता है। चाय में दूध थोङा ज्यादा हो जाए चलेगा, पर कम नहीं पङना चाहिए। कथाकार इस बयानी में सुरक्षित होना चाहता है, बस। पाठक के नजरिए से सारे अव्यवों का समाहित हो जाना ज्यादा जरूरी है, बजाय इसके कि कोई अव्यव कहीं ज्यादा हो गया। पाठक की कसावट की अपेक्षा और लेखक की पूर्णता की अपेक्षा, इनका सही तालमेल बिठाना ही सबसे बङी चुनौती है। अधजली इस सामंजस्य को निभाने में काफी हद तक सफल रही है। थोङा सा खिंचाव ही कुमकुम के दर्द को पाठक के साथ एकीकृत कर पाता है। मेरे हिसाब से, कुमकुम के दर्द के खिंचाव के साथ कहानी का खिंचाव ही उसे पाठक के मन में घर करने को विवश करता है। लोग असहमत हो सकते हैं, पर ये खिंचाव कहानी का वजन कम नहीं करता। अच्छे पात्र गढ़े हैं। सिनीवाली जी बधाई की पात्र हैं। प्रवेश जी को बहुत धन्यवाद

आशुतोष श्रीवास्तव : सईद जी विगत कुछ दिनों से पटल पर आपकी टिप्पणियाँ पढ़ रहा । आपके लेखन का प्रशंसक होता जा रहा हूँ । 👏 
बड़े ही नपें तुले उपयुक्तशब्दों का यथोचित प्रयोग करना ही आपकी विशेषता है । मैं जबरा..हाए...जबरा फ़ैन हो गया।🕺
यद्यपि आपने एक कोष्टक में बँधे अपने उद्देश्य को भी व्यक्त किया है किंतु रामचरितमानस मानस की कथा की तुलना किसी अदालत में रोज़ाना दसियों की तादाद में मिलने वाली घटना से किया तो थोड़ा अचरज हुआ ! अगर कोई रामचरित मानस जी की कथा की तुलना एक व्यक्ति और उसके भाई द्वारा उसकी पत्नी के अगवा करने वाले की खोज, उसकी हत्या करने से करता है तो उसका अल्पज्ञान ही हो सकता है ! क्षमा चाहता हूँ किंतु एक सुलझे साहित्यकार से ऐसा अपेछित नहीं! एक साहित्यकार में हर प्रकार की सामाजिक और  धार्मिक बुराइयों पर प्रहार करने की हिम्मत होनी चाहिए। साहित्य की ज़िम्मेदारी बड़ी होती है ! लेखनी स्वतंत्र होनी चाहिए निरंकुश नहीं ! यहाँ आप सब बड़े हैं मुझसे कहीं ज़्यादा ज्ञान भी है ! मुझे जो अनुभव हुआ मैंने व्यक्त किया( अगर कुछ अनुचित कहा हो तो क्षमा प्रार्थी हूँ 🙏🙏)
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Tuesday, June 6, 2017


कार्ल हेनरिख मार्क्स (1818 - 1883) जर्मन दार्शनिक, अर्थशास्त्री और वैज्ञानिक समाजवाद का प्रणेता थे। इनका जन्म 5 मई 1818 को त्रेवेस (प्रशा) के एक यहूदी परिवार में हुआ। 


पूंजी मृत श्रम है जो पिशाच की तरह है जो केवल श्रम चूसकर ही जिन्दा रहता है और जितना अधिक जीता है उतना श्रम चूसता है.
कार्लमार्क्स 
ऐसी विचारधारा के प्रणेता के जन्मदिवस पर डॉ  संजीव जैन ने मार्क्स के विचारों को संग्रहित करके मार्क्सवाद और पूंजीवाद पर रोशनी डाली |






डॉ. संजीव कुमार जैन

सहायक प्राध्यापक हिन्दी
शासकीय महाविद्यालय
गुलाबगंज, म.प्र.











मार्क्सवाद क्या है
मार्क्सवाद क्या है? यह प्रश्न बार बार उठाया जाना चाहिए और एक समस्या के रूप में उठाया जाना चाहिए। मार्क्सवाद वह दर्शन है जिसने अब तक उपलब्ध दर्शनों को समस्यात्मक बना दिया। इतिहास के दर्शन और दर्शन के इतिहास को देखने और व्याख्यायित करने का ढंग बदल दिया, ‘मानव’ के भौतिक अस्तित्व को समस्याग्रस्त कर दिया। वस्तुओं और संबंधों के स्वतंत्र अस्तित्व के स्वीकार को नकार  में बदल दिया और उनके आन्तरिक संबंधों के अन्तर्द्वन्द्व, संघर्ष को उसके अस्तित्व के होने के रूप में पेश करके विश्व की रचना को पुनः व्याख्यायित करने की समस्या पैदा कर दी।

‘गति’ के उपलब्ध तमाम नियमों की धूरी को हाशिये पर डाल कर नया केन्द्र उपस्थित कर दिया और इस तरह ‘जीवन’ और ‘जगत’ की सीधी सरल रेखा को ‘वक्र रेखा’ और ‘कर्व रेखा’ में बदल दिया। हजारों वर्षों के ‘आधार’ ‘अधिरचना’ के संबंधों की संरचना को समस्याग्रस्त करके नये आधार और अधिरचना को उपस्थित करके दुनिया की संरचना को ही बदल दिया।

मार्क्सवाद क्या है? यह एक विश्व व्यवस्था है जो दुनिया को पुनः रचने और मानवीय बनाने के कार्यभार का वहन करती है -‘‘मार्क्स के लिए, समाजवाद एक विश्व व्यवस्था है जिसमें हमारे पास एक संघ होगा, जिसमें प्रत्येक का मुक्त विकास, सभी के मुक्त विकास की शर्त होगी। इस तरह का समाज लोकतांत्रिक और वर्गहीन होगा, और उत्पादन के साधन, चंद लोगों के लिए नहीं बल्कि कई लोगों के हाथों में होंगे। वस्तुओं और सेवाओं का निर्माण जरूरतों के लिए किया जाएगा, मुनाफे के लिए नहीं।’’ (माइक कोल, मार्क्सवाद और शैक्षिक सिद्धांत, गंथ शिल्पी, पृ. 61)

‘‘साम्यवादी समाज के उन्नत चरण में, जब किसी व्यक्ति की श्रम विभाजन से दासता की अधीनता, और इसके साथ इसकी विरोधाभासी पक्ष शारीरिक और मानसिक श्रम के बीच खत्म हो जायेगा; जब श्रम जीवन का साधन नहीं रह जायेगा बल्कि जीवन की मुख्य जरूरत बन जायेगा; जब उत्पादक ताकतें भी व्यक्ति के समग्र विकास के साथ बढेंगी। और सहकारी धन का प्रवाह सभी दिशाओं में समान रूप से होगा - तभी पूरी तरह यह संभव होगा कि दक्षिणपंथी बुर्जुआ वर्ग की संकीर्ण नजरिए को पार किया जा पाएगा, और प्रत्येक से उसकी योग्यता के अनुसार, प्रत्येक को उसकी जरूरत के अनुसार केवल तभी समाज अपने ध्वज पर यह लिखने के काबिल होगा।’’( माइक कोल, पृ. 61

‘‘कोई भी व्यक्ति स्वयं अपने में वैचारिक रूप से समाजवादी हो सकता है पर वह व्यवहार में जीवन में तब तक समाजवादी नहीं हो सकता जब तक पूरा मानव समूह जिसमें वह जीवन यापन करता है और एक विशिष्ट उत्पादन के संबंधों की संरचना में संरचित रहता है, समाजवाद को न अपना ले। यहीं से एक समस्या खड़ी होती है, वह यह कि ‘एक व्यक्ति का होना’ उसका अस्तित्व ‘एक विशिष्ट ऐतिहासिक सामाजिक संबंधों की संरचना के होने से है, न कि उसके भौतिक रूप से विद्यमान होने से। यह संबंधों की संरचना का तंत्र अपने भीतर रहने वाले व्यक्ति घटकों की वैयक्तिकता और अस्मिता की पहचान सुनिश्चित करता है। जब एक व्यक्ति संबंधों के विशिष्ट संरचना तंत्र को छोड़कर दूसरे तंत्र में प्रवेश करता है तो उसकी पहचान और वैयक्तिकता दोनों बदल जाते हैं। यह बदलाव स्थान या धर्म या संस्कृति के बतौर नहीं होता, यह व्यवस्था तंत्र के बदल जाने से ही संभव है।

एक समाजवादी तंत्र में कोई व्यक्ति अपने विचारों से घोर पूँजीवादी हो सकता है, पर यदि वह समाजवादी तंत्र के संबंधों की संरचना में स्थित रहता है तो उसके सामाजिक जीवन में व्यवहारतः समाजवादी उत्पादन और मूल्य संबंधों के तहत ही उसे जीवन का निर्वाह करना होगा न पूँजीवादी व्यवस्था के उत्पादन संबंधों और मूल्यों को व्यवहरित कर सकता है।

समाजवाद की राह में यह समस्या सबसे जटिल अवरोध पैदा करती है। इसी अवरोध को मिटाने के लिए समाजवादी तानाशाही का जन्म होता है। व्यक्ति का अनुकूलित चरित्र और स्वभाव इतनी आसानी से नए संबंधों को स्वीकार नहीं कर पाता है, यदि वह वैचारिक रूप से ओरियेन्टेड न हो तो, या वह पूर्व के व्यवस्था तंत्र से उत्पीड़ित हो तभी वह नए व्यवस्थातंत्र को स्वीकार कर पाता है। समाजवादी व्यवस्था के लिए मजदूर वर्ग को ही संघर्ष करने के लिए पहल करने पर मार्क्स का इतना अधिक वजन क्यों था? इसका जबाव इसी बात में निहित है कि वही वर्ग ऐसा वर्ग है जो पूँजीवादी तंत्र में सबसे अधिक उत्पीड़ित ‘था’, ‘है’, और ‘रहेगा’।

हम आज के पूँजीवादी तंत्र का विश्लेषण करें तो पायेंगे कि उसने मजदूर वर्ग को अनुकूलित करने की कोशिश नहीं कि बल्कि उसे ‘एक वर्ग के रूप’ में और ‘अपने आप में एक वर्ग के रूप’ में नेश्तेनाबूद करने का प्रयास किया है। समाज के शेष सभी वर्गों को उसने अनुकूलित कर लिया है। विशेषकर मध्यवर्ग और स्त्री वर्ग को सर्वाधिक सचेत तरीके से अनूकूलित करने का अभियान पिछले सौ वर्षों से निरंतर जारी है और आज भी चल रहा है यद्यपि भारत जैसे देश का तथाकथित शिक्षित मध्यवर्ग पूरी तरह पूँजीवादी तंत्र के मुनाफा कमाऊ अभियान का पालतू बैल बन चुका है, तथापि आने वाले लोग भी निरंतर अनुकूलित होते रहें उसके लिए ‘शिक्षा’ और ‘मीडिया’ के अश्वमेघ लगातार दौड़ रहे हैं।

शिक्षा और मीडिया के अलावा ‘‘निरंतर समयबद्ध युद्ध’’ और ‘‘राज्य द्वारा प्रायोजित ंिहंसा के विविध परिष्कृत रूप’’ अनुकूलन के ताकतवर हथियार हैं। इनको व्यवहरित करने के लिए राज्य के पास सेना, पुलिस, प्रशासन, आर्थिक प्रतिबंध, राजकीय सुविधाओं का रोका जाना, धार्मिक तत्वाद के माध्यम से प्रताड़ित किया जाना, साम्प्रदायिक और नस्लीय नीतियों को छिपे तरीके से अपनाया जाना इत्यादि कई तरीके होते हैं, क्योंकि वह सत्ता में है और राष्ट्र की तमाम कानूनी और आर्थिक नीतियों और साधनों पर उसका वर्चस्व होता है।

दरअसल एक बड़ा अन्तर्विरोध इस रूप में भी देखा जा सकता है कि पूँजीवादी तंत्र में उत्पीड़ित पूँजीवादी उत्पादन संबंधों की संरचना में मकड़ी के जाले में फंसी मक्खी की तरह जकड़ा रहता है, पर जाल रचने वाले मकड़ी इस तंत्र में रहते हुए भी उससे बाहर रहती है। पूँजीपति तमाम तरह के तंत्र के बाहर रहता है। पूँजीपति एक सामाजिक प्राणी है पर वह निरंतर समाजिक तंत्र के बाहर रहता है, इस अर्थ में वह असमाजिक प्राणी होता है, जो रहता तो स्वयं के द्वारा निर्मित और रचित तंत्र में है पर उसका आचरण पशुओं की तरह वैयक्तिक होता है। यही कारण है कि वह उत्पीड़ितों के साथ किसी तरह की सहानुभूति या संबंधों की गरमाहट को महसूस नहीं करता। वह अपने उत्पीड़क चरित्र के साथ एक ‘‘सुरक्षित दुनिया’’ में रहता है जिसमें शेष मानवीय गतिविधियों की कोई क्रिया प्रतिक्रिया या आवाज नहीं पहँुचती है।

यद्यपि उसे (पूँजीपति को) समाज की आवश्यकता होती है, इसलिए नहीं कि उससे कोई मानवीय संपर्क स्थापित करना है या उसके संबंधों का विस्तार वहाँ तक करना है, कदापि नहीं, पर इसलिए कि उसकी सामूहिक श्रम का शोषण करके वह अपने मुनाफे और ‘‘सुरक्षित दुनिया’’ को और अधिक सुदृढ़ बनाये रख सके। उत्पीड़ितों के बिना उत्पीड़क का अस्तित्व भी समाप्त हो जायेगा। शेष दुनिया जो अभावों में जी रही है और उसके लिए श्रम कर रही है, यदि स्वयं में सामूहिक रूप से आत्महत्या करले या आत्मविनाश करले तो उत्पीड़क वर्ग को भी आत्म हत्या करने पर विवश होना पड़ेगा। उसका जीवन उत्पीड़ित और उत्पीड़क के एक संबंधों की संरचना के तहत ही चल रहा है यदि यह संबंधों की संरचना मिट जायेगी तो वह निरा पशु की तरह फालतूपन और व्यर्थता बोध की अनुभूति के दुष्चक्र में घिर कर आत्मविनाश करने लगेगा। 

इस स्थिति में ही हम मार्क्सवादी कार्य योजना को समझ सकते हैं - ‘‘मार्क्स समाज के निर्माण पर जोर देता है जहाँ सामाजिक हितों को व्यक्तिगत फायदों के लिए परे नहीं धकेला जाता है, जहाँ मानसिक और शारीरिक श्रम के बीच और विचार और गतिविधि के बीच के अंतर को बंद किया जाता है और जहाँ मानवीय रचनात्मकता बढ़ाई जाती है।’’ माइक कोल, पृ. 15

हम वर्तमान शताब्दी से अब तक जिस व्यवस्था में रह रहे हैं उसमें निरंतर सामाजिक हितांे को व्यक्तिगत हितों के पक्ष में या तो स्थगति किया जाता रहा है या उसे निरस्त किया जाता रहा है। ‘मानवीय जीवन के लिए आवश्यक पर्यावरण’ के विनाश की ओर बढ़ने के लिए उत्तरदायी भूमंडलीकरण को तमाम देशों द्वारा निरंतर अपनाये जाने के रूप में इस बात को बहुत गहराई से समझा जा सकता है कि किस तरह कुछ ‘‘दैत्याकार निगमों’’ को लाभ पहुँचाने के लिए हम व्यापक मानवता के विनाश को स्वीकार करते जा रहे हैं। मार्क्सवाद इस स्थिति के बरक्स एक विशुद्ध मानवीय हितों के अुनकूल सामाजिक और प्राकृतिक पर्यावरण को बनाये जाने के लिए आवश्यक कार्यवाही और आचरण से युक्त कार्य योजना प्रस्तुत करने वाला दर्शन है।

मार्क्स के समाज में ‘व्यक्ति हित’ सामाजिक हितों के अनुपूरक और सहयोगितात्मक मूल्यों के आचरण वाले होंगे न कि सामाजिक विनाश की दिशा में वृद्धिंगत पूँजीपतियों के हितांे की तरह। मार्क्स की उत्पादन पद्धति और तकनीक व्यापक मानवीय हितों के अनुकूल पर्यावरण को सुरक्षित रखते हुए जरूरी उत्पादन ही करेगी। न कि एक ओर अति उत्पादन से पृथ्वी के मूल स्रोतों का नष्ट होते जाना और दूसरी ओर क्रय शक्ति के अभाव में एक बड़ी जनसंख्या को भूख और गरीबी से मरते जाने का संकट पैदा करने वाली स्थितियों को पैदा करना।

हमारी धरती पर मानव के उदय और विकास ने जीवन का दबाव कई गुना बड़ा दिया है। पशु और अन्य प्राणी धरती के पर्यावरण को उस तरह से प्रभावित नहीं करते जिससे वह विनाश को ओर बढ़ने लगे। वे एक दूसरे को अनुकूलित करते हैं और अनूकूलित होते हैं। पर मानव की सचेत गतिविधियों ने प्रकृति को असंतुलित करने की दिशा में प्रभावित किया है। औद्योगिकरण के साथ यह असंतुलन निरंतर बढ़ता जा रहा है। इस संबंध में डग लॉरिमर लिखते हैं - ‘‘धरती पर मानव का प्रभाव किसी भूगर्भीय ताकत से कम नहीं है। एक अनुमान के अनुसार मानव पिछली सदियों में धरती से कम से कम 50 अरब टन कार्बन, दो अरब टन लोहा, बीस अरब टन तांबा, बीस अरब टन सोना इत्यादि निकाल चुका है। मानव की उत्पादन गतिविघि प्रति वर्ष कम से कम पाँच घन किलोमीटर पत्थर धरती की सतह पर ला देती है। लोग महासागरों पर  नहरे खोद डालते हैं, और समुद्र से मिट्टी पत्थर निकाल लेते हैं। रेगिस्तान में सिंचाई करके, दलदलों को सुखाकर और नदियों के प्रवाह की दिशा बदलकर मानव मौसम में भी परविर्तन कर देते हैं। मौसम पर मानव गतिविधियों का अप्रत्यक्ष प्रभाव भी पड़ता है जैसे तेल, कोयला और पीट जालने से प्रति वर्ष एक अरब 50 करोड़ टन कार्बन वातावरण में फेंका जा रहा है। हवा में कार्बन की मात्रा धरती का तापक्रम नियंत्रित करने के कई कारकों में एक है।’’ (ऐतिहासिक भौतिकवाद के मूल सिद्धांत, पृ. 96)

वे आगे कहते हैं कि इसके लिए मानवता पर दोष नहीं लगाना चाहिए। क्योंकि इसके लिए जिम्मेदार है निजी मुनाफा कमाने के लिए उपयोग किये जा रहे मानव श्रम की विवशता। मार्क्सवाद इसी विवशता से मुक्ति का पथ प्रदर्शित करने वाला दर्शन है। जिसमें व्यक्ति या कोई समूह इस तरह पराधीन नहीं होगा कि वह अपनी इच्छा से स्वतंत्र और मानवीय हितों के प्रतिकूल अपने श्रम को बेचने को विवश हो। प्रत्येक मानव व्यापक मानवीय जीवन के सुरक्षा और उसके लिए आवश्यक पर्यावरण को बनाये रखने की दिशा में कार्य करने के लिए अपने श्रम का योगदान देने के लिए पूर्ण स्वतंत्र होगा। इसमें प्रतियोगिता और होड़ न होकर सहयोगिता और सामंजस्य होगा।

मिशेल परेंटी लिखती हैं - ‘‘पूँजीवाद आत्मा रहित, मानवता रहित एक व्यवस्था है। यह प्रत्येक मानवीय गतिविधि को बाजार के मुनाफे में बदलने की कोशिश करता है। लोकतंत्र पारिवारिक मूल्यों, संस्कृति, ज्यूदियों-क्रिश्चियन नीतिशास्त्र, सामान्य जनता या अन्यों में से कई इसके जनसंपर्क प्रतिनिधियों द्वारा समय समय पर दिए जाने वाले नारों के प्रति इसकी कोई जवाबदेही नहीं है। इसमें किसी भी राष्ट्र के प्रति जबावदेही नहीं है, इसकी वफादारी किसी के प्रति है तो वह पूँजी संचय की इसकी अपनी व्यवस्था के प्रति। यह केवल अपनी सेवा करता है, सभी से खींचकर।’’ (माइक कोल पृ. 19)

शिक्षा का मूलमंत्र है कि आप दूसरों से अलग कैसे हैं, कैसे बनें और कैसे दिखें? यह समूह से व्यक्ति को अलग करने के सिद्धांत पर आधारित है। यही पूँजीवाद का लक्ष्य है, क्योंकि इसी तरह से अलगावीकृत व्यक्ति समूह के साथ अपने भौतिक अस्तित्व को अनुभव नहीं करता और इसी स्थिति में वह पूँजीवाद के लिए उपयोगी होता है, उसके मुनाफा कमाने की मशीन कर तरह और एक उपभोक्ता के रूप में शोषित होने के लिए।

‘‘बायल्स और जिंटिस तर्क देते हैं कि शिक्षा तंत्र जनता को पढ़ाते हुए यह कोशिश करता है कि उनकी चेतना को पर्याप्त कुशलता से अलग-अलग करके वह योग्य अधीनस्थ बनें ताकि साथ मिलकर अपने भौतिक अस्तित्व को एक साथ प्रकट न कर सकें।’’ (माइक कोल,पृ. 71)

मार्क्सवाद क्या है? इस प्रश्न को समस्या की तरह उठाया जाना चाहिए कि दरअसल मार्क्सवाद दुनिया को तरह संयोजित और संरचित करने की योजना है? मार्क्सवाद निरतंर और भयावह रूप से असमान होती जा रही दुनिया को ‘समानता’ (यह समानता  फ्रांसीय क्रांति के नारे के अर्थ में नहीं है) अर्थात् जीवन के लिए आवश्यक तत्वों के उत्पादन के अधिकारों की समानता, प्रकृति में उपलब्घ और मानवीय श्रम से सृजित उत्पादित वस्तुओं पर सबका समान रूप से अधिकार और समान रूप से सबको उपलब्धता, पीने योग्य पानी, खाने योग्य खाना, पहनने योग्य कपड़े, करने योग्य काम, रहने योग्य आवास, जीने योग्य पर्यावरण, मानवीय विकास के लिए आवश्यक शिक्षा और कार्य करने की पूर्ण स्वतंत्रता के अर्थों में समानता को लागू करने की योजना है। 

इसकी आवश्यकता उस वक्त महसूस होगी जब हम यह जानेंगे कि आज कि दुनिया में असमानता कितनी भयावह स्थिति में मानवता का विनाश कर रही है। ‘‘दुनिया की पूरी आबादी की करीब आधी आबादी 1.40 डॉलर प्रतिदिन से भी कम आय पर बसर कर रही है और प्रत्येक एक डालर का सहयोग जो गरीब देशों में किया जा रहा है, बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ उससे 1.50 डॉलर का लाभ खींच रहीं हैं’’ (माइक कोल पृ. 109) 

‘‘बीसवीं सदी के आखिर में दुनिया के बड़े शहरों में लगभग 100 करोड़, प्रताड़ित और भूखे सड़क के बच्चे थे, दासत्व पुनः उभार पर है और लगभग 2 करोड़ (मिलियन) लड़कियाँ जिनकी उम्र 5 से 15 साल थी, वेश्यावृत्ति बाजार में लाई गईं थीं। लगभग सौ करोड़ लोगों के पास रहने के लिए उचित आवास नहीं थे, और 800 करोड़ लोगों के पास भोजन की सुनिश्चितता नहीं थी जो भूखे थे। छह हजार बच्चे अस्वच्छ पेयजल के कारण प्रतिदिन मरते हैं और 11 करोड़ बच्चे 2006 तक मर जायेंगे क्योंकि वे गरीब पैदा हुए थे।’’ (माइक कोल पृ. 110

‘‘वास्तव में दुनिया केन्द्र और परिधि में धु्रवीकृत होती जा रही है। अमीर और गरीब के बीच अंतर के साथ, शक्तिशाली और शक्तिहीन के बीच बड़े स्तर पर बढ़ रहा है है। 1990 के दशक के अंत तक दुनिया में 300 सबसे अमीर बड़े निगमों के पास 70 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और विश्विक पूँजी और संपत्ति का 25 प्रतिशत भाग था। इक्कीसवीं सदी की शुरूआत पर दुनिया के 225 धनाढ्यों की संयुक्त संपत्ति मोटे तौर पर द    ुनिया की 47 प्रतिशत आबादी के बराबर थी और 8 कंपनियाँ दुनिया की आधी आबादी से भी अधिक आय अर्जित करती हैं।’’ (माइक कोल पृ. 110)

आज 125 मिलियन बच्चे स्कूल नहीं जा सकते और 110 मिलियन बच्चे किशोरों और वयस्कों को पढ़ने-लिखने की जैसी बुनियादी कौशल सीख पाने से पहले ही स्कूल छोड़ देना पड़ता है। इसी समय विश्विक शिक्षा बाजार 3,000 अरब डॉलर (बिलियन) यूरो से ज्यादा मूल्यवान है।(माइक कोल पृ. 110)

असमानता और विसंगति की इस भयावह सच्चाई को पाओला आलमान इस तरह प्रस्तुत करती हैं - ‘‘अनुमानतः ऐसे बच्चों की संख्या जो सड़कों पर सो रहे हैं, लगभग दो करोड़ है। इनके लिए इनका आवास या शरण्य या तो गत्ते का कोई डिब्बा होता है या फिर किसी घर की देहरी, और करोड़ों और बच्चे ऐसे घरों में रह रहे हैं जहाँ न पानी मिलता है, न बिजली और न सफाई। विश्वभर के बाल श्रमिकों की विशाल फौज में बीस करोड़ बच्चे शामिल हैं। जिनमें से बहुत से बच्चे थोड़े से मेहनताने के लिए असुरक्षित, अस्वास्थ्यकर और प्रायः अवैध स्थितियों में घंटों-घंटों काम करते हैं। हम जानते हैं कि बहुत से बच्चे अनावश्यक रूप से कुपोषण का शिकार हो रहे हैं, यहाँ तक उन कुछ देशों में जिनकी आधी वार्षिक आय अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष और विश्वबैंक का कर्जा चुकाने में खर्च होती है, हर घंटे एक बच्चा कुपोषण की मौत मर रहा है। ‘अमरीका में हर पांच में से एक बच्चा गरीबी की रेखा से नीचे जी रहा है। ये और ऐसे बहुत से आंकड़े बताते हैं कि बहुत से बच्चों के लिए उनका पैदा होना ही भयावह अभिशाप है, और इन आंकड़ों का प्रत्युत्तर दानराशि से दिया जाता है।’’ (भूमंडलीय पूँजीवाद के विरुद्ध आलोचनात्मक शिक्षा, पी आलमान, पृ. 57 -58)

वे आगे लिखती हैं कि - ‘‘शायद समकालीन यथार्थ का सर्वाधिक चर्चित पहलू बहुत अमीर और बहुत गरीब के बीच बढ़ता हुआ अंतर है - समुद्धि और गरीबी का धु्रवीकरण। पूरी बीसवीं सदी के दौरान टिप्पणीकार दुनिया के विकसित और अल्पविकसित देशों के बीच के विभाजन- यानी केन्द्र और हाशिये के बीच के विभाजन-पर ध्यान केन्द्रित किए रहे हैं। यह उनकी केन्द्रीय चिंता का विषय रहा है, फिर भी देशों के भीतर और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमीर और गरीबों के लोगों के बीच धु्रवीकरण न केवल तेज हुआ है बल्कि प्रत्यक्षतः दिख भी रहा है। उदाहरण के लिए, इस तरह के आंकड़ों को बार-बार प्रस्तुत किया जाता है कि दुनिया में अब 350 ऐसे व्यक्ति हैं जिनकी कुल परिसंपत्तियाँ एक अरब या उससे अधिक अमरीकी डॉलर की हैं यानी विश्व के 45 प्रतिशत लोगों की संयुक्त परिसंपत्तियों से भी अधिक। मैकग्रेगर के अनुसार जिन्होंने अपने आंकड़े 1998 की संयुक्त राष्ट्र मानव विकास रिपोर्ट से लिए हैं, दुनिया के पन्द्रह सर्वाधिक समृद्ध लोगों की संपत्ति उप-सहारीय अफ्रीका की समग्र वार्षिक आय से अधिक है। यही रिपोर्ट यह भी दरशाती है कि आर्थिक सहयोग और विकास संगठन के किसी भी देश की तुलना में अमरीका की प्रति व्यक्ति आय सर्वाधिक है और गरीबी की दर भी यहीं सर्वार्धिक है।’’(पाओला आलमान, पृ. 58)

यह संक्षिप्त पर भयावह आंकड़े यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि दुनिया में विषमता कितनी भयावह स्थिति तक पहुँच गई है और अधिकांश आबादी भूखों मरने के लिए क्यों विवश है? शोषण और संचयन का इतना भयावह रूप पहले कभी नहीं था। यह स्थिति व्यक्तिगत योग्यता या श्रम का परिणाम नहीं है, यह व्यवस्था के द्वारा शोषण के तंत्र का विकास, उसकी सुरक्षा और उसके वृद्धि के लिए निरंतर किए गए राजकीय प्रयासों का प्रतिफल है।

मार्क्स का दर्शन इसी विषमता के बरक्स एक मानवीय समता मूलक समाज की स्थापना के लिए सैद्धांतिकी के साथ साथ रणनीतिक कार्यवाही को प्रतिपादित करता है। क्या हमें नहीं लगता कि यह विषमता राक्षसी प्रवृत्ति की द्योतक है और इसके खिलाफ आवश्यक कार्यवाही की जानी अब अनिवार्य हो गई है। क्या यह प्रथ्वी और इसके संसाधन सिर्फ 300 - 400 सौ लोगों के लिए हैं? क्या यह मानवीय है? यदि नहीं, तो क्यों नहीं कार्यवाही आरंभ की जाये। मार्क्स यही कार्ययोजना अपने स्तर से प्रस्तुत करते हैं। वे यह मानते हैं कि यह संभव होगा देर सवेर जब कभी उत्पीड़ित वर्ग एक वर्गीय चेतना में संयुक्त होकर अपने भौतिक अभावों की जिम्मेदारी तय करेगा तो यह विषमता रेत के ढेर की तरह ढह जायेगी।

मानवीय विषमता का यह नक्शा किसी एक देश या समाज का नहीं है। यह संपूर्ण विश्व की स्थिति है और इसीलिए उत्पीड़ितों को अपनी राष्ट्रीय और जातीय सीमाओं को तोड़कर पूँजी के प्रवाह की तरह का चरित्र अपनाना ही सार्थक कदम होगा। जिस तरह पूँजी मुनाफे के शोषण के लिए  भूमंडलीय हो गई है उसके लिए किसी राष्ट्र की किसी तरह की सीमा का कोई मायने नहीं है ठीक यही चरित्र उत्पीड़ितों को अपनाने की आवश्यकता है। आज विषमता का अर्थशास्त्र रचने वाली व्यवस्था विश्वव्यापी है तो हम क्यों अपनी जाति, धर्म और राष्ट्र की सीमाओं में बंधे रहें। यही विवशता तो हमें विश्वव्यापी प्रतिरोध की शक्तियों की एकजुटता के साथ प्रतिबद्ध नहीं होने देती और इसी कारण पूँजी अपने सीमाहीन प्रवाह में निरंतर शोषण को जारी रखे हुए है।

जब शोषण और उसकी तकनीक विश्वव्यापी है तो प्रतिरोध राष्ट्रीय और स्थानीय चरित्र में क्यों बंधा रहे? ‘दुनिया के मजदूरो एक हो जाओ’ का नारा प्रतिरोध के इसी विश्वव्यापी चरित्र का आह्वान करता है।

मार्क्स का दर्शन हमें यह बताता है कि यह दुनिया जो आज है और जिस रूप में भी इसने भौतिक उन्नति की है, भले ही उसका लाभ कुछ मुट्ठीभर लोग ही उठा रहे हों, यह  अब तक जन्में सभी मनुष्यों के लगातार किये गए सामूहिक श्रम का परिणाम है, यह किसी एक व्यक्ति या एक वर्ग के द्वारा किये गए श्रम का परिणाम नहीं है। अतः इस दुनिया में बराबरी से रहने और जीने का अधिकार सभी मनुष्यों को है। मनुष्यों के श्रम ने ही अभावों को मिटाने के लिए, असुविधाओं के प्रतिरोध के लिए, जीवन को आसान बनाने के लिए तमाम तरह की तकनीक और उत्पादन के साधन सृजित किए हैं, ये समाज की सामूहिक संपत्ति हैं, इन पर किसी एक का अधिकार सामान्य न्याय और प्रकृति के सिद्धांतों के खिलाफ है। यह अब तक किये गए मानवीय श्रम का अपमान भी और उसकी उपेक्षा भी है।

दुनिया को यहाँ तक पहुँचाने की ‘‘यह क्षमता उन लोगों ने विकसित नहीं की है जो आज अपने निजी सुरक्षा घेरों के बीच समृद्धि के महलों में रह रहे हैं, बल्कि यह आम मनुष्यों की सदियों की प्रवीणता और प्रयासों की परिणति है। यह क्षमता मनुष्य जाति ने विकसित की है, इसलिए इसका उपयोग सभी मनुष्यों की जरूरतों को पूरा करने के लिए किया जा सकता था और साथ ही इससे धरती के स्वास्थ्य को बनाए रखा जा सकता था और उसे सुधारा भी जा सकता था हालांकि जब तक हम पूँजी के आधिपत्य में रहेंगे तब तक मनुष्य की जरूरत और धरती के पर्यावरण को उपेक्षित किया जाता रहेगा।’’(आलमान, पृ. 38)

आज के जन माध्यम जो पूँजीवादी व्यवस्था के दलाल हैं, हमसे कहते हैं कि हमें विकास के रास्ते में बाधा नहीं बनना चाहिए और जब बाजार का विकास होगा तो उसका लाभ सबको मिलेगा। हमारी चेतना का कुंद करने के लि तमाम तरह की बहसें आयोजित की जाती हैं, और एक आम सहमति बन रही है यह जताने का प्रयास किया जाता है - ‘‘हमसे कहा जाता है कि हम ‘‘सूचना युग’’ और ‘‘उत्तर आधुनिक’’ युग के नए यथार्थ में प्रवेश कर रहे हैं, इसलिए हमें धैर्य रखना चाहिए और स्वयं को लचीला बनाना चाहिए। हमें भेड़ों के झुंड की तरह केवल एक अपरिहार्य निष्कर्ष की ओर धकेला जा रहा है कि हम यह निष्कर्ष निकाल लें कि पूँजीवाद का कोई विकल्प नहीं है। यह स्पष्ट करके कि पूँजीवाद कैसे काम करता है, कैसे यह बढ़ता और विकसित होता है, और अपनी वृद्धि और विकास को बनाए रखने के लिए किन तत्वांे की जरूरत होती है।’’ (आलमान पृ. 39)

मार्क्स का दर्शन इस विकल्पहीनता का विकल्प है जो आज भी जीवंत और सक्रिय है, हजारों प्रयासों के द्ववारा ग्रहण किया जा रहा है और मानवता की बेहतरी के लिए, इस दुनिया के रूपांतरण के लिए कटिबद्ध है।

Saturday, April 29, 2017

कविता की अनेक व्याख्यायें हैं, पर कई बार ऐसा होता है कविता पढ़कर हम कहने लगते हैं कि यह होना चाहिए कविता में, और कई बार हम सिर्फ वहां पहुंच जाते हैं जहां कविता ले जाती है, तब हमें ऐसा जरूरी नहीं लगता कि हम शब्दों से कविता को भी समझें या समझायें, वहां केवल संवेदना ही सफर करती है जो ह्रदय से ह्रदय तक का होता है, 
आज साहित्य की बात समूह में ऐसा ही हुआ, विस्थापन और विस्थापित का एक  दृश्य कविता के बहाने नजरों के सामने आता गया और पाठक बार बार डूबते रहे एक दुख भरी स्मृति में. जब प्रदीप मिश्र की हरसूद पर केंद्रित कविताएँ प्रस्तुत कीं गईं |
प्रस्तुत है साकीबा की समूची चर्चा. 
ब्रज श्रीवास्तव.
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प्रदीप मिश्र

जीवन वृत्त

जन्म - १ मार्च १९७०, गोरखपुर, उ. प्र. । विद्युत अभियन्त्रण में उपाधि, हिन्दी तथा ज्योतिर्विज्ञान में स्नात्कोत्तर। साहित्यिक पत्रिका भोर सृजन संवाद का अरूण आदित्य के साथ संपादन। कविता संग्रह “फिर कभी” (1995) तथा “उम्मीद” (2015), वैज्ञानिक उपन्यास “अन्तरिक्ष नगर” (2001) तथा बाल उपन्यास “मुट्ठी में किस्मत” (2009) प्रकाशित। साहित्यिक पत्रिकाओं, सामाचारपत्रों, आकाशवाणी, ज्ञानवाणी और दूरदर्शन से रचनाओं का प्रकाशन एवं प्रसारण । म.प्र साहित्य अकादमी का जहूर बक्स पुरस्कार, श्यामव्यास सम्मान, मलखान सिंह सिसौदिया कविता पुरस्कार 2016 तथा कुछ अन्य सम्मान । अखबारों में पत्रकारिता । फिलहाल परमाणु ऊर्जा विभाग के राजा रामान्ना प्रगत प्रौद्योगिकी केन्द्र, इन्दौर में वैज्ञानिक अधिकारी के पद पर कार्यरत। 

संपर्क -  प्रदीप मिश्र, दिव्याँश ७२ए, सुदर्शन नगर, अन्नपूर्णा रोड, डाक : सुदामानगर,  इन्दौर - ४५२००९, म.प्र.।

मो.न. : +९१९४२५३१४१२६, दूरभाष : ०९१-७३१-२४८५३२७, ईमेल – misra508@gmail.com.   

                     
डूबते हुए हरसूद पर पाँच कविताएं
( हरसूद म.प्र. का एक गाँव है, जहाँ के निवासियों को बाँध निर्माण के कारण विस्थापित कर दिया गया। )

एक - घर
जब भी कोई जाता
लम्बी यात्रा पर
घर उदास रहता
उसके लौटने तक

जब भी उठती घर से
बेटियों की डोली
वह घर की औरतों से
ज़्यादा विफरकर रोता

जब भी जन्मते घर में बच्चे
गर्व से फैलकर
अपने अन्दर ज़गह बनाता
उनके लिए भी
उत्सवों और सुअवसरों पर
इतना प्रसन्न होता कि
उसके साथ टोले-मुहल्ले भी
प्रसन्न हो जाते

इसी घर पर
आज बरस रहे हैं हथौड़े
वह मुँह भींचे पड़ा हुआ है
न आह, न कराह
चुपचाप भरभराते हुए
ढह रहा है घर

घर विस्थापित हो रहा है।


दो - छूटा हुआ जूता
सुनसान सडक़ पर छूटा हुआ है
एक पैर का जूता
उसे इन्तज़ार है
हमसफ़र पाँव का
जिसके साथ
टहलने जाना चाहता है
पान की दूक़ान तक

एक किनारे औंधा पड़ा हुक्का
सुगबुगा रहा है
कोई आकर उसे गुडग़ुड़ाए
तो वह फिर जी जाएगा
भर देगा रग-रग में तरंग

ठण्डा पड़ा चुल्हा
खेतों में खटकर लौटी भूख
को देखकर जल उठेगा
लपलपाते हुए

खूँटी पर टँगा हुआ बस्ता
अपने अन्दर की स्याही से
नीला पड़ रहा है
उसे लटकने के लिए
नाज़ुक कन्धा मिल जाए तो
उसे बना देगा कर्णधार

उजड़ती हुई खिड़कियों के झरोखों
और दरवाज़ों की ओट में पल्लवित प्रेम
विस्थापित हो रहा है
अभी भी मिल जाऐं आतुर निगाहें तो
वे फिर रच देंगे हीर-राँझां

नीम की छाँव में
धूप के चिलकों का आकार बढ़ता जा रहा है

खेतों के गर्भ में
बहुत सारी उर्वरा खदबदा रही है

आखिरी तारिख़ का ऐलान हो चुका है
एक दिन इन सब पर
फिर जाएगा पानी

इस पानी से बनेगी बिज़ली
जो दौड़ेगी
नगर-नगर, गाँव-गाँव
चारो तरफ विकास ही विकास होगा

एक दिन विकसित समाज में 
कोई दबाएगा बिज़ली का खटका तो
उसकी बत्ती से रोशनी की जगह
विस्थापितों के जूते बरसेंगे
जो पुलिस के डंडे की डर
से छुट गए थे सड़क पर

कोई टेबल लैम्प ज़लाएगा
पढ़ने के लिए
उसके सामने फ़ैल जाएगी
बस्ते की स्याही
जो खूँटी पर टँगा छूट गया था

कोई कम्प्यूटर का खटका दबाएगा
तो उसके कम्प्युटर के स्क्रीन पर
उभरेगा मरणासन्न हुक्का
पूछेगा कहाँ गए वो लोग
जो मुझे गुडग़ुड़ाते थे

कोई हीटर का खटका दबाएगा
चाय बनाने के लिए
तो हीटर पर रखी केतली में
उन चूल्हों के ख़ूनभरे आँसू उबलेंगे
जिनकी आग पानी में डूब गयी

खेतों के गर्भ में खदबदाने के लिए
कुछ भी नहीं बचेगा
सड़ रही होंगी जड़ें

फिर दबाते रहिए बिज़ली के खटके
गाड़ते जाएं विकास के झण्डे
वहाँ कुछ नहीं बचेगा
जीवन जैसा ।


तीन - डूबता पीपल, तिरती स्लेट
बढ़ रहा है नदी में पानी
चढ़ रहा है गाँव पर

कसमसा रहे है खेत
वर्षों पैदा किया अनाज
अब जम जाएगी उन पर काई

या उनके अंदर बची हुई जड़ें
सडक़र बदबू फैलाएंगी
हो जाएगा जीना मुहाल
मर जाऐंगे खेत
चिल्ला रहे हैं
अरे आओ रे आओ
बचाओ कोई

आधा डूब चुका है बूढ़ा पीपल
और पानी चढ़ रहा है लगातार
वह डूबते हुए आदमी की तरह
अपनी टहनियों को ऊपर उठाए
चिल्ला रहा है
अरे आओ रे आओ
बचाओ कोई

अभी मेरे जि़म्में बहुत सारी मन्नतें हैं
जिनको पूरा करना है
अपनी छाया में खेलते-कूदते बच्चों को
जवान होते देखना है
बहुत सारे तीज-त्यौहारों में शामिल होना है

एक घर जो बचा रह गया था
सरकारी बुल्डोजरों और हथौड़ों से
न रो रहा है
न बचाव के लिए चिल्ला रहा है

खुद के आँसुओं से
गल रहीं हैं उसकी दीवारें

चढ़ रहा है नदी का पानी
घर जल समाधि लगा रहा है

देखते ही दखते डूब गया हरसूद
हाथियों नीचे पानी में
और पानी की सतह पर
एक स्लेट तैर रही है
जिसपर लिखा है क ख ग।


चार - डूब गया एक गाँव हरसूद
एक बार फैली थी महामारी
दखेते-देखते
पूरा गाँव खाली हो गया था

यहाँ तक कि जानवर भी नहीं बच पाए थे
महामारी के प्रकोप से

एक बार आया था
बहुत भयानक भूकम्प
धरती ऐसी काँपी थी कि
नेस्तनाबुत हो गया था पूरा गाँव

एक बार गाँव के बीचो-बीच
फूट पड़ा था ज्वालामुखी
जलकर राख हो गए थे
गाँव के बाग-बगीचे तक


एक बार आया था प्रलय
ऐसा महाप्रलय कि
उसमें समा गया था पूरा गाँव

इसबार न फैली महामारी
न भूकम्प से थरथरायी धरती
न ज्वालामुखी से उमड़ा आग का दरिया
न ही हुआ प्रलय का महाविनाशक ताण्डव
फिर भी डूब गया एक गाँव हरसूद

हरसूद डूब गया
अपनी सभ्यता-परम्परा और
जीवन की कलाओं के साथ।


पाँच - छूटी गीतों की डायरी, रंगोली के रंग
 पकिस्तान से विस्थापित होकर
मैं आया था अपने देश में
अपने देश में भी विस्थापित
होता रहा बार-बार
हर बार तोड़ी एक गृहस्थी
हर बार जोड़ी एक गृहस्थी

नयी गृहस्थी हमेशा ही पुराने से
कमतर ही रही
अब फिर अस्सी वर्ष की उम्र में
उज़ड़ रहा हूँ हरसूद से
अस्सी वर्ष की उम्र में
उज़डऩा बहुत आसान होता है
बसना नामुमक़िन

मुझे सरकार ने दिया है
बहुत सारा मुवावज़ा

मैं आजकल रूपये
ओढ़-बिछा रहा हूँ
ख़ूब चबा-चबाकर खा रहा हूँ
सौ-सौ के नोट
लेकिन कम्बख़्त भूख़ है कि मिटती नहीं
नोटों के गद्दे पर वो नींद नहीं आती
जो कर्ज़ में गले तक डूबे रहने के बाद भी
अपनी झोपड़ी के ज़मीन पर आती थी
मैं हरसूद से विस्थापित हो गया
मेरा जीवन वहीं छूट गया
डूबकर मरने के लिए

मेरी सुहाग की चूडिय़ाँ
लोक गीतों की डायरी
रंगोली के रंग
चौक पूरने का सामान
तुलसी का चौरा
सखी -सहेलियाँ
सबकुछ छूट गया हरसूद में
हरसूद डूब गया

अब मैं डूबने से बच गयी
या मैं भी डूब गयी
हरसूद के साथ
कौन बताएगा मुझे

मास्टरजी ने कहा था
विकास मनुष्य को बेहतर जीवन देता है
विषय पर लेख लिखने के लिए
मैंने बहुत अच्छा लेख लिखा है

लेकिन मेरी पाठशाला और मास्टरजी
दोनों छूट गए हरसूद में
अब मैं क्या करूँ इस लेख का।

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हरसूद की बुड़ान और कवि प्रदीप मिश्र की संवेदना

बचपन का वह दृश्य याद कीजिए जब आपने भोजन की तलाश में भटकती चीटियों की किसी पांत  को अचानक पानी के किसी रेले के बहाव में आकर बहते देखा होगा या उनके बिल में अचानक पानी भर जाने के कारण उन्हें इधर-उधर जान बचाते हुए भागते हुए देखा होगा । आपके मन में शायद ही यह विचार आया हो कि अगर  चीटियों की जगह मनुष्य होते तो क्या होता ? चीटियां मूक प्राणी है और उनकी औकात ही क्या है मर गईं तो मर गईं । लेकिन सोचिए सचमुच यदि ऐसा मनुष्य के साथ होता तो क्या होता ।

पिछले वर्षों में ऐसा हुआ । मध्यप्रदेश में नर्मदा के किनारे बसे एक गांव हरसूद के निवासियों के साथ ऐसा ही हुआ । यहां यह अवश्य हुआ कि वे  इंसान थे चीटीं नहीं इसलिए उन्हें  जान बचाने का मौका दिया गया लेकिन जान के अलावा उनका सब कुछ बांध के उस पानी में डूब गया । पानी भरने से डूब गए उनके मकान खेत खलिहान और उसके साथ डूब गईं उनकी स्मृतियां भी । 

स्मृतियाँ मनुष्य के मस्तिष्क में संग्रहित होती हैं लेकिन उनके आलंबन होते हैं उनसे जुड़े स्मृति चिन्ह । सबसे भयावह होता है स्मृतियों से जुड़ी चीजों का खत्म हो जाना । हम आज गांधीजी, नेहरू जी, बाबा साहेब आंबेडकर और बड़े-बड़े नेताओं से जुड़े स्मृति चिन्हों को बरकरार रखने के लिए संग्रहालय बना रहे हैं , और तो और काल्पनिक चरित्रों के लिए भी संग्रहालय बनाये जा रहे हैं लेकिन हरसूद के उन निवासियों की स्मृतियां जानबूझकर सदा सदा के लिए समाप्त कर दी गईं । उन का कसूर इतना सा था कि वे  अत्यंत साधारण इंसान थे ।

हरसूद के उन  निष्पाप , निरपराध,  सीधे-साधे निवासियों की इसी वेदना को प्रदीप मिश्र अपनी इन कविताओं में स्वर देते हैं । यह सर्वविदित तथ्य है कि वहां के निवासियों के जीवन के छोटे छोटे सुख-दुःख  के अवसरों , शादी ब्याह ,जन्म ,शिक्षा आदि से जुड़े स्मृतिचिन्ह इस डूब में डूब गए । प्रदीप इतने छोटे-छोटे बिम्बों के माध्यम से  डूबे हुए उस हरसूद  के चित्र रचते हैं जो कभी खुशहाल था आबाद  था ।

शायद आप उनको हरसूद वासियों का दर्द नहीं समझ सकते इसलिए कि खोया तो उन्होंने है लेकिन कविता यही काम करती है , यह आपको हरसूद के विस्थापितों की संवेदना से जोड़ती है।  उन चौराहों, खेतों-खलिहानों ,शिक्षा संस्थानों , बाज़ारों , पनघट, और चौपालों की सैर कराती है जो कभी आबाद थे । पीपल और नीम के उन पेड़ों को दिखलाती है जिन्हें छू कर हवाएं कभी आती थी जो हरसूद के निवासियों के लिए प्राण वायु थी । 

प्रदीप की इन कविताओं में हरसूद वासियों के लिए सिर्फ संवेदना मात्र नहीं है वह एक सटायर के साथ तत्कालीन व्यवस्था और उसकी विकास की समझ पर भी प्रहार करते हैं ।

फिर दबाते रहिए बिजली के खटके 
कुछ भी नहीं बचेगा 
सड़ रही होंगी जड़ें 

नीतियां वातानुकूलित भवनों में बनती है और जमीन से उनका कोई सरोकार नहीं होता । सुविधाएं मनुष्य के लिए जरूरी हैं  लेकिन किस कीमत पर ? यह सवाल भी वे अपनी कविताओं में खड़ा करते हैं ।
चढ़ रहा है नदी का पानी 
घर जलसमाधि लगा रहा है 

यह घर ईंट पत्थरों का घर है लेकिन इस घर से संवेदनाएं जुड़ी है इस में रहने वालों की । यह आपदाएं भूकंप और महामारी की तरह प्राकृतिक आपदाएं नहीं है बल्कि यह कुछ मनुष्यों की सोची समझी चाल है जो कुछ लोगों के जीवन को अपने स्वार्थ  के लिए बढ़ाना चाहते हैं यद्यपि यहाँ उनका उद्देश्य विकास है जो कि एक छद्म आवरण में है ।

प्रदीप इस बात के लिए आगाह करते हैं कि मनुष्य और उसकी विरासत को पैसों से नहीं तौला जा सकता है ।यह  जीवन एक बार ही मिलता है और उसका कोई मोल नहीं होता । हरसूद के परिदृश्य पर बहुत सारे लेख लिखे गए हैं , पुस्तिकाएं आई हैं , रपट प्रकाशित हुई है हमारे एक दिवंगत मित्र पूरन हार्डी ने एक कहानी भी लिखी थी 'बुडान' जो काफी चर्चित हुई . लेकिन कविता इन सबसे अलग काम करती है यह पाठक को उन सरकारी गैर सरकारी रपटों से अलग वहाँ के विस्थापितों की संवेदना से जोड़ती है । एक कवि ही होता है जो संवेदना के स्तर पर अत्याचार और शोषण के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाता है और अपने साथ तमाम लोगों को शामिल करता है ।हरसूद और उसकी स्थितियों से इन कविताओं के माध्यम से पाठकों का साक्षात्कार करवाने के लिए प्रदीप मिश्र का बहुत-बहुत आभार ।

शरद कोकास    
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 प्रदीप मिश्र जी की पाँच कविताएँ दो दिन पहले ब्रज जी से प्राप्त हुईं और इन दो दिनों के अपनी सहूलियत से किए पाँच पहरों में कई बार इन कविताओं को पढ़ा. पढ़ा और हर बार बेचैन हुआ. बेचैन हुआ और कई बार अपनी यादों के हरसूद से मिल कर लौटा. ख़ाली-ख़ाली सा और भरा-भरा भी. खंडवा से भोपाल की रेल लाइन पहले हरसूद से होकर जाती थी और फिर मेरी माँ का ननिहाल हरसूद रहा तो एक ज़ाती रिश्ता हरसूद से रहा है. इसलिए लाग-लपेट के बग़ैर कहूँ तो इन कविताओं ने दिल ही दुखाया है. कहाँ फ़ुर्सत हमें अपनी आपाधापी में गुज़रे को याद करने की! पर जब इस तरह ठोकर लगती है तो मन वही सवाल करता है जो प्रदीप जी ने इन कविताओं में किए हैं. मैंने इस क़स्बे को देखा है फिर मुआवज़ा लेकर हरसूद से विस्थापित होकर आए परिवारों को अपने शहर खंडवा में बसते हुए भी. इसलिए इन कविताओं ने उन सब किरदारों और एक भरे पूरे जीवन के विलीन हो जाने से गुज़र जाने का अवसर ही दिया. शीर्षक 'डूबते हुए हरसूद पर पाँच कविताएँ' मुझे तब भी कुछ उम्मीद दे गया कि हरसूद अभी डूबा नहीं बस डूबने को है. अशोक वाजपेयी की कविता की  एक पंक्ति है 'इतिहास जिस काम को करने की अनुमति भी नहीं देता, कविता उसे आसानी से करने की छूट देती है'. मुझे शीर्षक पढ़ कर लगा कि हरसूद अभी डूबा नहीं और उसे बचाया जा सकता है. कम से कम इन कविताओं ने उस डूबे हुए हरसूद को थोड़ा-सा तो बचाया ही है. 
फिर एक-एक कर के मैं कविताओं के सिरे पकड़कर और थोड़ा अपनी याद के सहारे एक घर से मिला जो विस्थापित हो रहा है. फिर कुँवर नारायण याद आए 'घर रहेंगे, हमीं उनमें रह न पाएँगे. समय होगा हम अचानक बीत जाएँगे'. जैसे वह विस्थापित घर चीख-चीख कर कह रहा हो मैं अब भी हूँ और पानी के नीचे रहूँगा, तुम्हारी यादों को समेटे. आदमी ने फिर दग़ा किया. घर वहीं रहा और आदमी चल दिया. घर, बेघर हो रहा है. वही घर जिसने हर ग़म और हर ख़ुशी, हर हँसी और हर शर्म में सर छुपाने से लेकर गली-मोहल्लों तक को आबाद किया. 

चुपचाप भरभराते हुए
ढह रहा है घर

यह मार्मिक पंक्ति प्रदीप जी के भीतर किस ताप से गुज़री होगी उसका सही- सही आकलन नहीं कर सकता. उसका देशज शब्द प्रयोग 'भरभराना' अपने आप में सब कह रहा है. अगली कविता में एक और दृश्य 'छूटा हुआ जूता' है जो सबसे छोटी कहानी 'फ़ॉर सेल: बेबीज़ शूज़, नेवर वोर्न' की तरह ही दुखती रग को बार-बार छेड़ता है. कविता पढ़ने के बाद भी आप उससे बाहर निकलने में असमर्थ होते हैं. और उस छूटे हुए जूते के साथ ही छूट जाते हैं. उसी जूते के साथ विकास के सवाल भी हैं जैसे आप किसी और के हिस्से की रोटी छीनकर खा रहे हैं! 
...बस अब हरसूद डूब चुका है. इस तीसरी कविता में केवल घर, जूता और सांसारिक चीज़ें ही नहीं बल्कि एक पूरी सभ्यता और संस्कृति लेकर. 

आधा डूब चुका है बूढ़ा पीपल
और पानी चढ़ रहा है लगातार
वह डूबते हुए आदमी की तरह
अपनी टहनियों को ऊपर उठाए
चिल्ला रहा है
अरे आओ रे आओ
बचाओ कोई

अभी मेरे ज़िम्मे बहुत सारी मन्नतें हैं
जिनको पूरा करना है
अपनी छाया में खेलते-कूदते बच्चों को
जवान होते देखना है
बहुत सारे तीज-त्यौहारों में शामिल होना है

यही संस्कृति के डूब जाने का दर्द अगली कविता में विस्तारित होता है. अंतिम कविता 'छूटी गीतों की डायरी, रंगोली के रंग' मुआवज़े के नाम पर तोले गए इंसान के ईमान के साथ बातचीत करती है. 

प्रदीप मिश्र जी की इन कविताओं पर साहित्यिक कमी-पेशी, चर्चा/विमर्श होते रहेंगे. फ़ॉर्म, शब्द-चयन, वाक्य, भाषा आदि पर भी वरिष्ठ साथी कुछ कहेंगे ही. मुझे बस पहली कविता की अंतिम पंक्ति 'घर विस्थापित हो रहा है' खल रही है. शायद कविता इस पंक्ति के पहले मुकम्मल हो चुकी और बहुत वज़न के साथ अपनी बात रख चुकी है. ये केवल मेरी असहमति है और इस बाबत मैं प्रदीप जी से विनम्रतापूर्वक अपनी असहमति जता रहा हूँ. उम्मीद है आप अन्यथा न लेंगे. 

मुझे यह नहीं पता कि कवि का हरसूद से क्या रिश्ता है पर इन मुकम्मल तस्वीरों और जज़्बातों ने लगभग एक दशक पहले डूब चुके हरसूद के बहाने झकझोरा तो है ही. आगाह भी किया है कि क्या पता विकास (या विनाश) के नाम पर तबाह होने वाले अगले व्यक्ति, छूटे हुए जूते, पीपल के पेड़, शहर और छूटी हुई डायरी हमारी ही हो ?

(अपनी समझ से मैं बस इतना ही लिख पाया. पहली बार इस तरह कुछ कहने का प्रयास किया है. इसे बस मेरी टिप्पणी ही समझिएगा प्रदीप जी. शुक्रिया ब्रज जी इस अवसर के लिए
सुदीप सोहनी📕📕                                                
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श्रीकान्त सक्सेना :  हरसूद के ऊपर बहुत वर्ष पहले एक युवा पत्रकार.ने यात्रा वृतांत शैली में एक पुस्तक लिखी थी।बहुत पसंद आई थी।हरसूद जैसे विषय साझा पीड़ा को महसूस करने और साझा संघर्ष को ज़िन्दा रखने का हौसला देते हैं तो तथाकथित विकास के योजनाकारों की नीयत और प्राथमिकताओं को भी स्पष्ट कर देते हैं।
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प्रदीप मिश्र का कवि धर्म हैं  हरसूद श्रृंखला की कविताएं 
पोलिटिकली भले ही अब हमारा नेतृत्व इन दिनों  नदियों को मनुष्य का दर्जा देने का स्वांग करने का खूब प्रयास कर रहा हो,लेकिन हमारे समाज में न जाने कब से नदी,पहाड़,गांव,मुहल्लों,प्रकृति में प्राण होने की मान्यता और व्यवहार और आचरण रहे हैं।
संवेदनशील व्यक्ति इन सब पर आई विपदा पर दुखी हुए हैं। विशेषतः जब कवि इन क्षणों को देखता है अनुभूत करता है, अपनी संवेदनाओं को अभिव्यक्त करने को बेचैन हो उठता है। दरअसल कवि का ये अपना विशिष्ट धर्म भी होता है।
समर्थ और युवा कवि प्रदीप मिश्र ने हरसूद श्रृंखला की अपनी कविताओं में एक बस्ती के उजड़ जाने और एक गांव के साथ स्मृतियों और सुख दुख के पानी में समा जाने की पीड़ा और उससे पैदा हुई उखड़ी हुई साँसों को अभिव्यक्त करने का कवि धर्म निभाया है।
ये कविताएँ मैंने उनसे सुनी भी हैं,पढ़ी भी और उस कवि के  विकास का भी साक्षी रहा जब ये कविताएँ अवतरित हो रहीं थीं।
कहीं की संवेदनाओं की अभिव्यक्ति के लिए रचनाकार का वहां का होना या उन कष्टों को भोगना उतना ज्यादा जरूरी भी नही होता जितना कि उन अनुभूतियों को अपने हृदय में सीजने के लिए स्वीकार कर लेना। बावजूद कि कवि मूल उत्तरप्रदेश के रहे, हरसूद प्रसंग के समय इंदौर मालवा में होकर हरसूद के दर्द को उन्होंने महसूस किया,प्रत्यक्ष देखने की कोशिश की है।
अनेक संवेदनशील लोग हरसूद और वहां के निवासियों के जीवन को लेकर चिंतित हुए लेकिन कुछ ही प्रदीप मिश्र की तरह अपने को अभिव्यक्त करने में सफल हुए।
ये प्रदीप की प्रतिबद्धता और एक कवि की चिंता ही थी जिसके परिणाम स्वरूप हरसूद श्रृंखला की कविताएं साहित्य की धरोहर हो सकीं।
इन कविताओं के बाद भी प्रदीप मिश्र ने बहुत बेहतर सृजन किया है, लेकिन जब उनकी कविताओं पर बात होने लगती है। हरसूद नदी के तल से निकलकर सतह पर तैरने लगता है।
बहुत शुभकामनाएं उन्हें। एक बार पुनः सुंदर कविताओं को पढ़वाने के लिए समूह का आभार।

ब्रजेश कानूनगो      
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ज्योति खरे : हरसूद तो डूब गया है पर प्रदीप मिश्र की कविता पढ़ते समय लगा कि आज भी हरसूद जिन्दा है.
कविता लिखना और उसमें संवेदना भरना अलग बात है पर कविता की सवेंदना को जिन्दा रखे रहना अलग बात है, इसे तभी जिन्दा रखा जा सकता है,जब कवि की अनुभूति मन को मथती है,मन की परतों को गीली करती है, स्मृतियों का यही गीलापन प्रदीप की संवेदना है और उनकी अभिव्यक्ति है.
डूब रहे हरसूद और डूब गया हरसूद का मर्म वही समझेगा जिसके घर गाँव की चौखट उखाड़ दी जाती है .
विस्थापन की मन को छूती कवितायें.
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राखी तिवारी : विस्थापन पर लिखी प्रदीप जी की कविताओं ने झकझोर दिया।विकास की गांथाऐ.....एक गहरे रूदन से निकले क्या ये जरूरी है?
संवेदनाओं से ओतप्रोत कविताएं हरसूदमय है.....सच की सशक्त अभिव्यक्ति।
प्रदीप जी को बधाई.....
शरद दा एवं सुदीप जी को धन्यवाद।
शानदार टीप.......🙏🏻                        
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मणि मोहन मेहता: जैसे की वाद्य पर विस्थापन की एक उदास धुन बज रही हो , बेहतरीन कविताएं।बधाई प्रदीप भाई ।  
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घनश्याम सोनी : डूबे हुए हरसूद पर प्रदीप मिश्र जी की कवितायेँ विनाश पर विकास की सच्चाई का ऐसा यथार्थ प्रस्तुत करती हैं जिसे भुक्तभोगी ही गहराई से समझ सकता है l योजनाकारों की योजना में कुछ घर , झोपड़ी , सड़कें , खेत आदि डूब क्षेत्र में आयेंगे/ आते हैं लेकिन वे उन संवेदनाओं को कहाँ अनुभव कर सकते हैं जो उस क्षेत्र के रहवासियों की उस क्षेत्र विशेष से जुड़ी होती है l जिन्हें कवि ने सजीव निर्जीव सभी में बहुत ही गहराई से एक प्रत्यक्षदर्शी/ भुक्तभोगी की तरह अनुभव कर सहज सरल व दिल में गहरे पैठ कर जानेवाले शब्दों में अपनी रचनाओं के माध्यम से व्यक्त किया है l बहुत ही शानदार रचनाये पढवाने के लिए साकीबा व प्रस्तुतकर्ता का आभार l 
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मनीष वैद्य : मित्र प्रदीप मिश्र की कविताओं से गुजरते हुए पीड़ा और उदासी के भावों में जाना अवश्यम्भावी ही है।पाठक तक इस संवेदना को प्रेषित करने में ये कविताएँ स्वाभाविक अपना कर्म बखूबी करती है। हरसूद के बीस से ज्यादा साल गुजर जाने के बाद आज भी वह किसी लाइलाज नासूर की तरह जब तब हमें अपनी टीस से बिलबिला देता है।जब हमारी यह स्थिति है तो उन पर क्या गुजरती होगी जो इसकी वजह बेदखल होकर बेघर बार हो गए। उनकी स्मृतियों में वह कितनी भयावह पीड़ा होगी। बात यहीं नहीं रूकती। इससे बेदखल लोग आज भी विस्थापन की तमाम विसंगतियां झेल रहे हैं।फिर बात विकास की भी है। मनुष्य और मनुष्यता को उजाड़कर कैसा विकास। एक तरफ संस्कृति बचाने की बात तो दूसरी तरफ संस्कृति डुबोने का काम। ये रचनाएँ नॉस्टेलजिया ही नहीं जगाती हमें झकझोरती भी है।ये आगाह करती हैं कि कोई दूसरा हरसूद न बन सके। कविताएँ सहजता से संप्रेषित करती हैं अपनी बात को। प्रदीप लंबे वक्त से शब्दों की दुनिया में प्रतिबद्धता से काम कर रहे हैं। वे विचारों के साथ रचते हैं पर रचनाओं में सहज सरल होकर तरल हो जाते है।यहाँ विचारों की संश्लिष्टता नजर नहीं आती। आज की कविताओं पर खूब लिखा जा सकता है। पर फ़िलहाल इतना ही, प्रदीप को सर्जना के लिए अशेष शुभकामनाएं।    
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उदय ढोली :अपनी जडो़ं से मजबूरन दूर होने वाले विस्थापितों के दर्द कोा मार्मिक अंदाज़ में बयाँ  करती हैं प्रदीप जी की कविताएँ,पाठक के अंतर्मन को उद्वेलित करने वाली बेहतरीन कविताओं के लिए शुभकामनाएँ 💐          =================================================             
विनीता वाजपई  : प्रदीप मिश्र जी की कविताओं ने कई पन्ने पलट दिए 
आए दिन खबरें आती थीं कि हरसूद डूब जाएगा 
खंडवा में हमारी बहन रहती है सो आना जाना लगा रहता है 
रास्ते में हरसूद है जिसका नया नाम छनेरा है , मन हुआ और हम डूबा हरसूद देखने गये 
दूर दूर तक पानी और उसमें डूबती उतराती जाने कितनों की स्म्रतियां 
कैसे वहां के रहवासियों ने विस्थापन का दर्द सहा होगा , एक आह निकल कर रह गयी 
हम रीते मन से लौट आए 
आज प्रदीप जी की कविताओं ने उन्हें आवाज दी , बहुत अच्छी कविताएँ 
पांचवी कविता तो मन को छू गयी ,
उस पर सुदीप जी की टिप्पणी ने उसे और सदा दी , 
बहुत अच्छी प्रस्तुती
सुदीप सोहनी जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं , मैने उनकी कविता भी सुनी है और नाटक भी देखा है ,वो बहुत दूर तक जाएंगे 
शुभकामनाएँ      
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दीप्ती कुशवाह : हरसूद के लिए मेरा मन भी बहुत दुखता है। टिहरी और हरसूद.. एक सी नियति रही...! प्रदीप जी की कविताओं ने एक बार फिर मन गीला किया। उम्दा कविताएँ, प्रदीप जी !   
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डॉ पद्मा शर्मा  :विस्थापन की अद्भुत और भावपूर्ण कवितायेँ। सवेद्नात्मक धरातल पर मन को भिगो जाती हैं।
वीरेन्द्र जी का डूब उपन्यास भी विस्थापन समस्या पर है।
बेहतरीन कविताओं के लिए बधाई प्रदीप मिश्र जी।
धन्यवाद ब्रज जी   
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भावना सिन्हा  : बड़ी ही सूक्ष्मता से विस्थापन के दर्द  उकेरा गया है। कितनी बड़ी त्रासदी है यह  , कैसा विकास । कविताएँ मन  को भिगो गई ।सच को उजागर करती  सशक्त अभिव्यक्ति के लिए 
कवि को बहुत बहुत बधाई । 🌹🌹    
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हरगोविंद मैथिली: विस्थापित परिवारों के एक दर्द का नाम है हरसूद और उस दर्द को कवि ने एक भुक्तभोगी की तरह महसूस कर अपनी कविताओं के माध्यम से व्यक्त किया है जो बेहद मार्मिक, संवेदनशील और सहज संप्रेषणीय हैं।
प्रदीप मिश्र जी को बधाई और ब्रज जी का आभार🙏🙏💐💐    
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अखिलेश श्रीवास्तव 
 हरसूद श्रृंखला की कवितायें पढ़ते हुये कौन होगा जो इन कविताओं की छोर पकड़े हुये उस समय में न पहुँच जायेगा जब पानी हरसूद के कंठ के ऊपर पहुँच रहा होगा,अंजुर भर हम भी डूबते हैं, जब पानी से लगभग अफनाते हुये खेत पुकार लगाते हैं, बचाने की गुहार को अनसुना करना,उसे डूबते हुये छोडकर निकलने की बेबसी का शंताश तो हमें भी ये कविताएँ महसूस करा ही देती है भले ही हम उस दुख के साक्षी न रहे हो पर संवेदना से परिपूर्ण प्रदीप जी का कवि मन पाठक को उस हाहाकार की अनुभूति करा देता हैं ।
इन कविताओं पर बिम्बों की मार है न शिल्प की लदान, पर कवि में रस उपाजने की क्षमता है तो ज्यादा मेहनत की आवश्यक नहीं होती, ये कविताएं दुख की एक गठरी साथ लेके चलती है और डूब के बीच भी आपकी आंखो को पनियाती रहती हैं जैसे घर से विस्थापित कोई आदमी पनिआये आंखों से गृहस्थी की गठरी उठाकर कदम पानी में रखता हैं ।
प्रदीप जी ने सायास कुछ भी नहीं जोडा या घटाया हैं जिस तरल भाव से कविताएं आई है उसी तरह से पाठकों की ओर तैरा दिया हैं,पाठकों को भी कोई अतिरिक्त प्रयास नहीं करना है इन समझने में,सिर्फ भाव पक्ष को महसूस करते हुये एक दुख से गुजरा जा सकता है ।
प्रदीप जी अपनी कविताओं से उस दुख के साक्षी व हमसफ़र रहे है आज  हमें भी कुछ कदम चलने का मौका मिला ।
आभार प्रदीप भाई । 
                      
 आजकल प्रदीप जी को पढ़ रहा हूँ, हरसूद श्रृंखला में कविता अपने वास्तविक व सहज रूप में है पर प्रदीप जी के बिंब विधान को भी समझा जाना चाहिए, उनकी एक कविता रखता हूँ पटल पर ।                        
 फ़ाउण्टेन पेन की कविता / प्रदीप मिश्र

फाउण्टेन पेन को चलाते समय
बहुत ध्यान रखना पड़ता है
ठीक कोण पर टिका हो
अंगुलियों के बीच 
निब पर दबाव सही हो
ठीक हो स्याही का बहाव

अक्षर बनाने का एक निश्चित तरीका होता है
नहीं तो कागज,निब और अक्षर का
तालमेल बिगड़ जाता है
उंगलियों में लगनेवाली स्याही को
बार-बार पोंछना होता है सिर पर
अक्षर सुन्दर ही बनाने पड़ते हैं
जब लिखा जाता है फाउण्टेन पेन से

इतनी सारी पाबंदियाँ और सुन्दरता की शर्त
ऐसे में भला फाउण्टेन पेन से कोई
कैसे लिख सकता है कविता

कविता लिखते समय तो

एक मासूम सी बच्ची
अचानक गृहस्थी से जूझती औरत में बदल जाती है
                            
उछलते-खेलते नौजवान
कब शामिल हो गए बूढ़ों की जमात में
लिखने के बाद भी पता नहीं चलता

नदी अपने तटबंधों को तोड़कर
इस तरह फैलती है
जैसे उसके अन्दर भरता जा रहा हो समुन्द्र

अपनी धूरी पर घण्टों ठहर कर
सोचती रहती है पृथ्वी 
निरंतर घूमते रहने का कारण

इतनी गति
इतना उफान
इतना आक्रोश
इतना ठहराव
ऐसे में कोई कैसे रखेगा
सुन्दरता और पाबंदियों का ध्यान
जब तक हम पूरी करते हैं 
सुन्दरता की शर्त

एक मासूम सा खूबसूरत चेहरा
भयानक अठ्ठाहास करने लगता है

जब तक खोलते हैं पाबंदियों की गाँठ
आजादी का उत्सव मनाते लोग
गुलामों की तरह गिड़गिड़ाने लगते हैं

कविता लिखने के लिए
ऐसी कलम चाहिए
जिसमें पहली उड़ान पर पर निकले 
चिड़ियों का आकाश बहे 
स्याही की जगह

निब डाक्टर के आले की तरह टिकी हो
समय के छाती पर।                        

मेरे समय का फलसफा/ प्रदीप मिश्र

मेरे समय का फलसफा


इकट्ठे हुए थे सारे जीव एक जगह
फुनगी पर बैठी चिड़िया / गर्वोन्नत शेर
रेत में अलसाया मगरमच्छ
इधर-उधर रेंगते कीड़े-मकोड़े
हरी कालीन जैसी बिछी घास 
और टीले पर बैठा मनुष्य 

प्रकृति के सारे जाने-अनजाने जीव
इकट्ठे हुए थे एक जगह
सबकी समस्या थी जीवन की 
जीवित बचे रहने की 

इस विकट समस्या की बहस में उपस्थित
हर जीव 
दूसरे के लिए भोजन की थाली था
कोई भी एक नष्ट होता तो 
दूसरा स्वंय ही नष्ट हो जाता
फिर कैसे कोई किसी को खाता
और अगर खाता नहीं तो जीवित कैसे रहता

मनुष्य ही ऐसा था 
जो किसी का भोज्य नहीं था 
जानता था जीवन जीने की कला
बुरे दिनों में घास की रोटियाँ खाकर भी 
बचा सकता था अपने आपको
अच्छे दिनों में शेर का शिकार करता था
शगल की तरह 
इसलिए टीले पर बैठा
मुस्करा रहा था

नहीं सूझा किसी को भी 
इस विकट समस्या का हल
तब मनुष्य ने ही सुझाया
प्रेम में सबकुछ जायज होता है
प्रेम में कोई नष्ट नहीं होता
जितना व्यापक प्रेम उतना ही ज्यादा जीवन

इतना सुनते ही
सबको सूझ गया विकट समस्या का हल
बकरी को घास से प्रेम हो गया
और वह प्रेम से चरने लगी घास
शेर को बकरी से हो गया प्रेम
और वह प्रेम से बकरी को खा गया

तबसे प्रेम का सिलसिला खूब फलाफूला
अब कभी भी/कहीं भी/किसी को/किसी से
प्रेम हो जाता है।      
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प्रवेश सोनी : किसी का भी अस्तित्वहीन हो जाना अत्यंत पीड़ा दायक होता है ।इन कविताओं से गुजरते हुए लगा जैसे संवेदनाओं के अथाह सागर में डूब गए हो । 
विकास का पहिया इतनी क्रूर गति से चलता है ,रौंद देता है वो मासूम  गाँव की सभ्यता को ।
विस्थापित होने का दुःख जड़ो से अलग हुए पौधों की तरह होता है जिनके नसीब  में हरियाली नही होती है ।
अच्छा लगा इन कविताओं को पढ़कर ,साथ ही सभी की प्रतिक्रियाओं ने इन्हें और खोल दिया ।
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जतिन अरोड़ा : निलय जी का दर्द कुरेद गया. गंगा के आँसू पीकर चले निलय जी के आंदोलन की मानिंद ही यह रचनाएँ भी दर्द की पराकाष्ठा हैं। दिल दिमाग में गहरा के बैठे दर्द को शब्दों में पिरोने या बाँधने की कोशिश बिलकुल नहीं की गई है। यही वजह है कि  इन रचनाओं ने जुबान से दिल तक दस्तक दी.प्रदीप जी को सलाम💐===================================================                      
मधु सक्सेना : प्रदीप जी कविताएँ सुबह से कई बार पढ़ चुकी हूँ पर कुछ लिख नही पाई ।हरसूद की पीड़ा बार बार उभर कर आ रही है ।विस्थापन का दर्द पुरे बचे जीवन को प्रभावित करता है ।स्मृतियाँ टीसती है ।
अब सब कहा जा चुका है ।कवि को सुनना है अब ।

आभार ब्रज जी ।
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संतोष  तिवारी : प्रदीप जी की कविताएं, मोह की मार्मिक परिभाषाएं गढ़ती हैं। अब भले बड़े ज्ञानी महात्मा कुछ कहें मगर जिसे अपनी माटी से प्यार हो जाये उसे बड़ी बड़ी बातें उद्धव के निर्गुण प्रवचन सी लगती है। 
हरसूद से मेरा भी वास्ता है। हालांकि विस्थापन का दर्द मैंने नही  भोगा, मगर प्रदीप जी की कलम ने मन को ऐसा छुआ की दर्द के निशान उभर आये हैं।
कुछ हरसूदवासी साहित्यकार मित्रों को कविताएं प्रेषित की बगैर अनुमति। उम्मीद है माफी मिल जाएगी।
- संतोष तिवारी      
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जतिन अरोड़ा : हिमाचल में पौंग बांध बना तो करीब तेरह हजार परिवार बेघर हुए....कुछ को राजस्थान में मुरब्बे मिले ...पुरानी जमीन की कीमत उतनी नहीं थी लेकिन नई जमीन ने सोने के अंडे दिए...लोगों की जिंदगी बदल गई...बुजुर्ग और कुछ लोग जो मिट्टी से जुड़े थे आज तक कसमसाते हैं पर जो
पीढ़ी पंख लगाने की जुगत में थी वह खुश है कि उनकी जिंदगी बन गई। इतने सालों बाद भी पौंग बांध के समीप के इलाके विकास से महरूम हैं विस्थापित नए शहरों में नए तरक्की पसंद इलाके में मौज में है। कुछ विस्थापित एेसे भी हैं जो आज भी कहते हैं..मेकी अोही मिट्टी लियाई दैया...मेकी उत्थे चैण पौणा,.....     
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प्रदीप मिश्र : भाई बाँध तो बनना चाहिए। विकास होनी चाहिए। एक समाप्त होता तो दूसरा रचा जाता है। लेकिन अकाल मृत्यु और स्वाभाविक मृत्यु का अंतर तो है। यहाँ सवाल यह है कि दूसरे विकल्प को भी देखा जाना चाहिए जो कि उपस्थित हैं देखिए परिवर्तन प्रकृति का नियम है। लेकिन इसकी गति क्या है। अगर हमारा परिवर्तन प्रकृतिक गति के अनुरूप हैतो  यहउतना विध्वंस नहीं करेगा। हमारे समयका सबसे बड़ा संकट गति है। यह अंधाधुँध गति हमें कहाँ ले जा रही है? सब कुछ स्वाभाविक और प्रकृतिक हो जैसे पतझर और कोंपल होता है तो उसका स्वागत है।                        

अंजू शर्मा : प्रदीप जी हमारे समय के महत्वपूर्ण कवि हैं और पिछले कुछ समय से मैं उनकी कविताएँ लगातार पढ़ रही हूँ।  उनकी कविताओं की सबसे बड़ी विशेषता मुझे यही लगती है ये कविताएँ अपने समय के सजग दस्तावेज की तरह जरूरी और सामयिकता से भरपूर हैं।  हरसूद की त्रासदी के विषय में मैं बहुत नहीं जानती थी पर साहित्य में इसका दर्ज होना इसे कभी विस्मृत नहीं होने देता।  इससे पहले मनोज कुलकर्णी की एक संस्मरण विधा में लिखी कहानी ने मुझे हरसूद तक पहुंचाया था। आज प्रदीप जी की कविताओं में विस्थापन की पीड़ा साकार ही उठी है।  मुझे नहीं लगता कि उस त्रासदी का कोई पहलू भी कवि की नज़र से छूटा होगा।  डूबते हरसूद की ये कविताएँ गहरी ख़लिश पैदा करती हैं।  धीमे धीमे अवसाद मन पर हावी होने लगता है और यही कवि की सफलता है।  बधाई प्रदीप जी      
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सुरेन सिंह 
हरसूद ... एक डूबता हुआ गांव । इस डूब के साथ डूबते है वहां के निवासियों के अरमां और डूब जाता है बहुत कुछ । 
प्रदीप जी इस डूब को एक कवि के रिश्ते से महसूस करते  है  और एक नॉस्टेलजिया रचते है । सबसे बड़ा दर्द क्या है ?  कि मानवीय  विस्थापन का दर्द  प्रकृति से ,नियति से तय न होकर  शक्ति के खेल में नियंत्रक कुछ मानवों के  निर्णयों से ही आकार ग्रहण कर रहा है । 
कवि उस पीड़ा को आवाज देना चाहता है जो मानव द्वारा ही अन्य मानवों के लिए  निर्मित  की गई है । या यूं कहें कि एक मानवीय निर्णय की यहां बांध बनेगा या आज से यह तुम्हारा देश नही और संसार का सबसे बड़ा मानवीय विस्थापन होता है और कवि कहता है कि पाकिस्तान से विस्थापित होकर मैं आया था अपने देश ...
मतलब कितनी जल्दी एक झटके में उसने अपने पूर्व  स्थान को पराया मान लिया .... क्यों ,क्योंकि वहां उसे वह शक्ति का  निर्णय  कंविंसिंग  सा लगने लगा ... क्यों ,क्योंकि उसके पीछे एक  समुच्च्य की साइक काम कर रही है पर पुनः विस्थापन उसी अपने देश में ... जो निर्णय अपने  बस का लगता था पर वो वास्तव में बसका न रहा .... तो पीड़ा का स्वर  आर्तनाद में कन्वर्ट होने को आतुर हो जाता है । यह बिंदु पाठक को एक विचारतन्द्रा मे डुबोने को पर्याप्त लगता है ।
कविताओं का स्वर अपने लोकेल को उभारता तो है पर उसके नॉस्टेल्जिया में रोको ,जाने मत दो के साथ एक कवि का तथाकथित विकास और आधुनिकता से कोरिलेशन बनाने की भयावयता के बिंदु पर जोर देकर छोड़ देना .. मतलब पाठक को विचलित कर पाने की सफलता के श्रेय का आयाम तो स्थापित होता है पर एक सरल सा अर्थक्रियाकारित्व क्रिएट नही होता जैसा ....

जो मेरे घर कभी नहीं आएँगे

मैं उनसे मिलने

उनके पास चला जाऊँगा
 (विनोद शुक्ल )

एक चीज़ होती है यथार्थ जो दिखता है पर एक और चीज़ होती है फैंटेसी  । कोई यथार्थ वास्तव में यथार्थ तभी बनता है जब उसमे फैंटेसी भी घुल जाती है ,तभी काव्य भी जन्म ले लेता है जो डूब रहा है... बुरा होरहा है पर इस ने कितनो के मन मे और कैसी फैंटसी पैदा कर दी जिससे आने वाले समय का विचार ,रूप और पूरी साइक रीक्रेयेट होगी का आभास भी कवि उतार सकता है पन्नो पर ... ( हो सकता है विषयान्तर हो रहा हूँ पर इसमें सुदीप सोहनी का दोष है जिन्होंने विनोद शुक्ल जी का जिक्र कर मुझे बहका दिया 😊😊🌸)
बाकी अन्य बाते काव्य ,बिंम्ब , लोच ,भाषा की सहजता की ऊपर हो ही चुकी है ,जिन्हें दोहराने का मतलब नहीं ।अंततः प्रदीप जी को बहुत बधाई की वह निरन्तर गम्भीर काव्य रच रहे है और अपने पाठकों की अपेक्षाओं को बढ़ाते जा रहे है ।  निश्चित ही हरसूद पर लिखी यह कविताएं महत्वपूर्ण है और एक रोचक बात आपसे कहना चाहूंगा कि किसी समूह में  मैंने इसी प्रकार की डूब पर कविताएं पढ़ी थी वहां अन्य बातों के अलावा कवि से यही कहा था कि आप प्रदीप जी की हरसूद पर कविताएं पढ़े  .... ☺
तो प्रदीप जी एक पाठक के नाते यह सब जो भी कहा वो बढ़ती  पाठकीय अपेक्षाओं के तहत ही कहा । 
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 आशुतोष श्रीवास्तव :उजड़ने की व्यथा से भली भाँति परिचित हूँ! मेरा गाँव का पैतृक मकान भी बाढ़ में कट गया था ! आधा गाँव नदी में बह गया था ! जब मेरे बाबा जी को लग गया की अबकी बार नदी नहीं मानेगी ओर हमारी सारी ज़मीन का पता नदी के पूरब से नदी के पश्चिम में बदल के ही रहगी, तो घर तोड़ने का फ़ैसला लिया ! काफ़ी बड़ा मकान था ! जो गाँव वाले घर के डेहरी में सर झुकाये आते थे ! आज वो सब हाथ में हाथ में खनती भाला लिए छतों दीवारों पे चढ़े उसे गिरा रहे थे ! पुराने ज़माने का पुश्तैनी मकान मिट्टी की मोटी मोटी दीवारें, जिनसे पुरानी महुए की लकड़ी ओर मलबे सिवा कुछ निकल रहा था तो मेरे पापा की आँखों के आँसू थे ! जिस घर मकान में पैदा हए बड़े हुए उसी को तोड़ने में मदद कर रहे थे ! 

ओर शहर में आयीं तो ढेर सारी पुरानी लकड़ियाँ ! जलौनी से ज़्यादा क़ीमत नहीं थी बाज़ार में,लेकिन फिर भी ट्रक का किराया देकर ले आए थे गोरखपुर शहर तक ! क्यूँकि वही बस निशानी बची थी गाँव की !
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 ए असफ़ल :हरसूद पर बढ़िया कविताएं प्रदीप मिश्र की। साथ ही अखिलेश जी द्वारा साझा की गई अन्य कविताएं भी शानदार रहीं। मित्रों ने सुरेन जी आदि ने बहुत अच्छी समीक्षा की। साकिबा का यह दिन बेहद महत्वपूर्ण रहा जो अब तक के कई यादगार दिनों में शुमार हो गया।
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 साहित्य सम्मेलन,"साहित्य की बात" 17-18 september 2022 साकिबा  साकीबा रचना धर्मिता का जन मंच है -लीलाधर मंडलोई। यह कहा श्री लीलाधर...

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