Sunday, March 6, 2016


पदमा शर्मा


 फीनिक्स

शेफाली ने शादी डॉट कॉम पर अपनी प्रोफाइल बनाने के लिये नेट खोला । शादी डॉट कॉम को सिलेक्ट करने के बाद रजिस्ट्रेशन के कॉलम पर क्लिक किया। कई सारे प्रतिपूर्ति कॉलम स्क्रीन पर उभरे जिन्हें वह पूरा करती गयी।
मेल / फीमेल...... फीमेल
नेम..........शेफाली शर्मा
डेट आफ बर्थ................. सात जुलाई उन्नीस सौ अठहत्तर
रिलीजन.................... हिन्दु ब्राह्मण
लिविंग इन................... शिवपुरी म प्र
हाइट........................... 5‘2
कलर.....................फेयर
ई मेल आदि लिखा और टपके हुए कोड को बॉक्स में लिखकर ओके कर दिया।
शारीरिक सुख मानसिक सुख पर ही आधारित होता है । ऐसा हाईफाई तो उसने कुछ  सोच नहीं रखा...एनआरआई बगैरह ...। बस ऐसा कि -उसके आगे पन्द्रह ना हो ? अठारह उन्नीस तो चल जायेगा। पर कोई अच्छा ऑप्शन पापा या घरवालों ने लाकर ही नहीं दिया। कभी कोई पूछता - ‘‘बेटी की शादी कब कर रहे हो’’ तो उत्तर यही होता - हाँ ! ढूंढ रहे हैं... अच्छा लड़का मिले तब ...। लड़कियाँ पढ़ लिख जाती हैं तो लड़का भी अच्छा देखना पड़ता है।’’
उनके इस उत्तर से सब यही समझते शेफाली को लड़का पसन्द नहीं आता।

दस दिन बाद शेफाली ने अपने ई मेल की साइट खोली और इनबॉक्स चैक किया। पन्द्रह मेल पड़े थे। मेल को सिलेक्ट करने के लिये माउस को गतिमान किया और पहले मेल पर कर्सर लाकर दाएं हाथ की तर्जनी को बांयी ओर प्रेस किया । धड़धड़ाकर पिटारा स्क्रीन पर खुल गया। लड़कों के फोटो और संबंधित का पूरा विवरण मेल पर पड़े थे। पहला मेल ... फोटो कोई खास नहीं था। दिल्ली में सर्विस थी । आय 15000 रुपये मासिक ।
उसने सभी लड़कों के नाम, आय का ब्यौरा तथा पसन्द नापसन्द के साथ-साथ हाइट और सम्पर्क नम्बर आदि कॉपी में नोट कर लिये। साइबर कैफे मालिक को पेमेन्ट कर वह बाहर आ गयी।
अब यह उसका साप्ताहिक क्रम बन गया। हर शनिवार को वह साइबर कैफे आती और मेल बॉक्स चैक करती... उनमें से जिनका विवरण उसे अच्छा लगता उन लड़कों का ब्यौरा नोट करके घर ले आती। पापा उनमें से तीन-चार लोगों का चयन करते... जिसका वेतन आकर्षक होता उसे फोन करते। फोन पर बात करते समय भी उनका पहला प्रश्न होता- ‘‘आपकी डिमांड क्या है ?’’
उसकी शादी सात फेरे के वैवाहिक बंधन में न बँधकर डिमांड के घेरे में जकड़ी थी।
    ऐसा नहीं कि पापा के पास पैसा नहीं था ! पर वे लड़की की शादी में उसे लुटाना नहीं चाहते थे।
पिछले सात-आठ वर्षों से वह  में कॉलेज टेम्परेरी जॉब कर रही थी... लगभग तीन-साढ़े तीन लाख तो उसने ही जोड़ लिये थे। उसके अन्दर एक साथ कई सवाल पैदा हो जाते...पापा ने फोटो नहीं देखा, लड़का कैसा है ? नेचर कैसा होगा ? घर कैसा होगा ? परिवार वाले कैसे हैं... कुछ भी तलाश नहीं , बस एक प्राथमिकता- ‘‘लड़के की डिमांड न हो’’ । यदि किसी की मांग न हो, पर दिखने एवं व्यवहार में भी अच्छा न हो तब ... तब भी क्या पापा मेरी शादी उससे करने को तैयार हो जायेंगे ? जैसे वह उन सब पर बोझ हो।
कई सारे तर्कों-कुतर्कों से घिरी वह चलती जा रही थी ...वहाँ, जो उसका घर होते हुए भी उसका नहीं था । सदियों की परम्परा... वही पुरानी लीक ... परायेपन का भाव, दूसरे के घर जाना है... यही सोच।
पापा कहते ...
क्या देखना घर और वर को ? आर्थिक रूप से सशक्त होना चाहिये, उसकी सेलरी अच्छी होगी तो सारी खुशियाँ घर के द्वार खड़ी नजर आयेंगी। शादी तो समझौता है, लड़की वालों को समझौता करना ही पड़ता हैं... कितना भी पढ़ा लो या नौकरी करा लो... सारे फैसले तो लड़के वालों के हिसाब से ही होने है।
शेफाली के घर में पापा राजबिहारी और मम्मी मधुमालती के अलावा एक छोटा भाई श्रीकांत है, जो दिल्ली में सॉफ्टवेयर इंजीनियर है। पापा बैंक से रिटायर हो चुके हैं, मम्मी मिडिल स्कूल में एच.एम. हैं। शेफाली ने अंग्रेजी में एम ए करने के बाद पीएच डी कर लिया था शेक्सपीयर की कविताओं पर। आजकल कॉलेज में टेम्परेरी पढ़ा रही है। जब तक पीएच डी नहीं हुयी थी तब तक लोगों के प्रश्नों का उत्तर उसके घरवालों के पास था, उसकी पढ़ाई पूरी हो जाये फिर शादी करेगी। वह कहती है शादी के बाद पढ़ना नहीं हो पाता...
 यह आड़ वर्षों तक घरवालों की ढाल बनी रही। पिछले पाँच वर्षों से न तो उसके पास ही कोई लक्ष्य था न ही कोई ऐसा कारण जो शादी होने के बीच अरावली की तरह खड़ा हो या अटक रहा हो।
शेफाली दो वर्षों से महसूस कर रही थी कि पापा की रुचि उसके विवाह में कतई नहीं रह गयी थी। वह जो पैसा कमाती उसका खर्च अपने हिसाब से नहीं कर पाती। पापा की हिदायत के अनुसार बैंक में जमा कर दिया जाता। धीरे-धीरे उसके द्वारा जमा की राशि में इजाफा हो रहा था जो राशि उसके विवाह के लिये संकल्पित रखी थी वह पापा भूलते जा रहे थे। पापा ऐसे रिश्ते पसन्द करने लगे, जो दहेज न मांगे ! उनके हिसाब से शेफाली की जमापूंजी में ही शादी निबट जाये ...ऐसे डिमाण्डलैस रिश्ते आते, उनमें लड़का न तो शक्ल में और न ही अक्ल में अच्छा होता , न अच्छी नौकरी और न ही अच्छा घर - परिवार। समझौते का कोई आधार तो बने।
अखबार में विज्ञप्ति क्या निकली, जैसे वह सरकारी सम्पत्ति हो गयी। एम. ए. पीएच. डी. लड़की के लिये आठवीं पास लड़के भी पत्र  भेजने लगे। कुछ पत्र तो ऐसे उम्मीदवारों के भी आये जिनके दो-दो , तीन - तीन बच्चे थे।
 बढ़ती उम्र देख पापा कहते अब तो दूजा वर ही देखना पड़ेगा।
गोया जानबूझकर उसके सामने ऐसा प्रस्ताव लाया ही नहीं गया जो अच्छा हो और जिसके लिये वह स्वीकृति दे पाए !  किन-किन बातों में वह समझौता करे... पढ़ाई में, नौकरी में , रंग-रूप में या उसकी कमजोर आर्थिक स्थिति में...। यदि इन सबसे ही उसे समझौता करना है तो फिर कुँवारी ही भली। कम से कम अपनी जिन्दगी अपने हिसाब से तो जी लेगी। घर बैठे तो कोई हाथ मांगने आयेगा नहीं। पापा की बढ़ती उम्र उनकी बीमारी बनती जा रही थी। उनकी अदद सेवा में वही लगी हुयी थी। मन में द्वन्द्व चलने लगता ... कोई अच्छा लड़का मिल जाये तो वह भाग जाये और शादी का किस्सा खत्म कर दे...। साथ की और बाद की भी सभी लड़कियों की शादियाँ कब की हो चुकी...। उनके किस्से, टी व्ही के सीरियल... सब मन पर , शरीर पर दस्तक दे रहे थे। वह सोच रही थी कैफे तो खुद ही जाती हूँ - क्यों न कोई अच्छा लड़का देख खुद ही बात शुरू कर दूँ...।

नितिन की प्रोफाइल उसे ठीक लगी। इस बार उसने कैफे में डरते सहमते नितिन को ई मेल किया। उसने अपना मोबाइल नम्बर लिख दिया था। उस रात ही नितिन का कॉल आया - ‘‘हलो मैं नितिन भारद्वाज गाजियाबाद से बोल रहा हूँ । ’’
‘‘...ज....जी ....’’
‘‘ आप शेफाली जी बोल रही हैं ?’’ चहकता हुआ स्वर
‘‘जी ... हाँ’’
‘‘आपका मेल मिला था’’
बातों का सिलसिला शुरू हो गया ....।
फिक्सड टाईम... नाइट कॉलिंग
घंटों बातें होतीं। और मोबाइल पर एसएमएस होते। यों एक दूसरे की पसन्द-नापसन्द सबसे परिचित हो चुके । जब पन्द्रह-बीस दिन गुजर गये ,वह कैफे नहीं गयी तो राजबिहारी जी ने टोका, ‘‘ शेफाली मेल चेक कर आना।’’
वह मजबूरी में गयी और आठ दस मेल में से चार ऐसे लड़को के विवरण लिख लिये जिनकी सेलरी कम थी। नितिन के कहे मुताबिक शेफाली ने उसे मैसेज भेजा वह कैफे में है। नितिन भी आॅन लाइन हो गया ।
दोनों 45 मिनट चैट करते रहे।...
 नितिन ने अपने कई फोटोज मेल कर रखे थे।
रोज की आत्मीय, चुहलभरी बातचीत ने दोनों के हृदय में एक-दूसरे के लिए सुनिश्चित स्थान बना लिया था।
पापा का कहना था कि-  लड़का यदि पसन्द करता हो और दिलोजान से चाहता हो तो किसी भी कीमत पर शादी के लिये तैयार हो जायेगा।
दो माह बाद जब उन्हें लगा कि वे जीवनसाथी बन सकते हैं... नितिन ने मिलने की इच्छा प्रकट की।उस दिन ही शेफाली ने मम्मी को बताया था नितिन के बारे में। घर में जैसे ही पता चला सन्नाटा छा गया। मम्मी अधिक परेशान थीं पापा ने ही उन्हें समझाया ...विवाह उसकी मर्जी से हो तो और भी अच्छा है कभी कुछ कहने सुनने को नहीं बचेगा। बस उन लोगों की डिमांड न हो।
अगले रविवार को नितिन आया । नितिन ने शेफाली से कह दिया था मैं तुम्हें देखकर अपने बालों पर हाथ फेरूँ तो समझना तुम मुझे पसन्द हो। हुआ भी यही जब सुबह वह नाश्ता कर रहा था तब एक हाथ में समौसा लेकर दूसरा हाथ सिर पर फेरते हुए वह बोला, ‘‘ मुझे पसन्द है।’’ सब समझे वह समौसे के लिये कह रहा है।  शेफाली समझ गयी ,उसके गालों पर लाज की रेख खिंच गयी।  नितिन ने तो एकांत पाते ही अपनी मौखिक स्वीकृति भी दे दी। बदले में शेफाली ने मुग्ध भाव से गर्दन हिला दी। पापा की राय जानना जरूरी है कहकर उसने नितिन की खुशियों पर ब्रेक लगा दिया।
सभी लोग छत्री घूमने गये। मौसम देख दोनों के मन में जलतरंग बज उठां। नितिन के आग्रह पर शेफाली ने गाना सुनाया...
चलते चलते मेरे ये गीत याद रखना कभी अलविदा न कहना....
सेलिंग क्लब, भदैया कुण्ड जैसे दर्शनीय स्थल देखे । चांद पाठा में बोटिंग करते लहरों की तरंगें दिल की ध्वनि तरंगों का साम्य बनने लगीं। साहचर्य और नजदीकी उनके रिश्ते को प्रगाढ़ बना रहे थे। बोटिंग करते-करते शेफाली ने उसे ‘जॉन डन’ की पोयम ‘‘द कैननाइजेशन’’ की पंक्तियाँ सुनायीं -
The Phoenix ridle hath more wit
By us, we two being one, are it,
So, to one neutrall thing both sexes fit
Wee dye and rise the same, and prove
Mysterious by this love

 (फीनिक्स पक्षी की पहेली हमारे प्रेम की समझ को और अधिक सार्थक तथा प्रगाढ़ करती है, हम दो होते हुए भी एक हैं। इसलिये हमारे दो सेक्स इतनी पूर्णता से परस्पर फिट होते हैं और सेक्सरहित एक व्यक्ति बन जाते है। यह प्रेम सेक्स भावना से कहीं ऊपर हैं । मृत्यु के पश्चात् हम पुनः जीवित होकर वही बन जाते हैं जो पहले थे ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार फीनिक्स पक्षी अपनी ही भस्म से पुनः जीवित हो जाता है  और यह प्रेम हमें एक रहस्य देता है जो आदर योग्य होता है। )
और प्रश्न करते हुए नितिन की आँखों मे झांका-‘‘क्या हमारा प्रेम भी यही है ?’’
       प्रश्न ने नितिन को थोड़ा सोच में डाल दिया। कुछ ठहरकर वह बोला-‘‘हमारा प्रेम, प्रेम है-सच्चा प्रेम ,पर रहस्यमय नहीं है और न ही काम भाव से परे। फिर नितिन ने शेक्सपीयर की ‘‘The phoenix and the turtle” की कुछ पंक्तियाँ शेफाली  को सुनायीं-
           Here the anthem doth commence
Love and constancy is dead
          Phoenix and the Turtle fled
In a mutual flame from hence

(यहाँ से एन्थम (गीत) की शुःरुआत होती है। प्रेम और निरंतरता अब मर चुके है। फीनिक्स और टर्टल अब उड़ चुके है यहाँ से, एक ही ज्वाला बन कर।)
शेफाली ने अपनी उत्सुकता जाहिर करते हुए कहा-‘‘फीनिक्स पक्षी एक मिथक है ?’’
‘‘ एक काल्पनिक पक्षी जो अरब के रेगिस्तान में सैकड़ों वर्षों तक जीवित रहता है , तब स्वयं को जला डालता है फिर अपनी ही भस्म से पुनः युवा के  रूप में जीवित होकर वही चक्र दोहराता है।’’
थोड़ा रुककर नितिन ने कहा -‘‘फीनिक्स अपने आप में पूर्ण नहीं है। उसका पूरक टर्टल (सुंदरता की देवी वीनस का फाख़्ता) है। इसमें रहस्य नहीं है । तुम मेरा और मैं तुम्हारा पूरक हूँ।’’
  शेफाली ने गहरी साँस लेकर कहा-‘‘लेकिन शेक्सपीयर ने ये भी तो कहा है-
So they lov’d as love in twain
Had the essences but in one:
       ‘‘हाँ बिल्कुल,’’ कहकर नितिन ने स्टैंजा को पूरा करने के लिये आगे की पंक्तियाँ सुनायीं-
 Two distincts, division none:
  Number there in love was slain.
(प्रेम अपने आप में इतना व्यापक है कि वहाँ संख्या का कोई अस्तित्व नहीं है। दो अलग -अलग जीवों की तरह उन्होंने (फीनिक्स और टर्टल ने ) प्रेम किया लेकिन उनका(उनके प्रेम का) सार एक होने में ही है। दो अलग-अलग शरीर होते हुए भी कोई विभाजन नहीं है क्योंकि संख्या का प्रेम में कोई अस्तित्व नहीं हो सकता।)
अब शेफाली ने कुछ हल्कापन महसूस किया और नितिन का हाथ पकड़कर बोली-‘‘हाँ बाबा ये सब तो ठीक है, आइ एग्री बट टैल मी(मै सहमत हूँ लेकिन ये बताओ) कि हमारा प्यार फीनिक्स और टर्टल, प्रकृति और पुरुष के प्रेम की ही तरह है ना...अमर...निरंतर...प्रगाढ़....?’’
 नितिन  ने शेफाली का हाथ अपने हाथ में लेते हुए उसके कान के पास मुँह ले जाकर धीरे से फुसफुसाया-‘‘हूँ’’।
जाते समय उसने शेफाली से कहा था मेरे पापा से बात कर लें तुम्हारे पापा। अन्तिम निर्णय उनका ही रहेगा। सुनकर शेफाली चोंक गयी थी।

नितिन को देखकर पापा-मम्मी को एक ठोस बहाना मिल गया था , लड़का बहुत सांवला हैं।
शेफाली किसी भी बहाने के कारण उसे ठुकराना नहीं चाहती थी। उसे भी अपनी कमियाँ मालूम थीं। पापा के सामने नितिन का रंग मूल कारण न था वल्कि उनकी देखभाल कौन करेगा ये सबसे ठोस कारण था।
‘‘वह दिल का बहुत अच्छा है माँ’’ उसने तर्क देते हुए कहा था।
’’लेकिन जोड़ी तो ठीक होना चाहिये ’’ माँ ने प्रतिवाद किया
‘‘मम्मी जब विवाह एक समझौता है तो ये समझौता मुझे पसन्द है’’
नितिन को उन लोगों के फैसले का इन्तजार था। उसने शेफाली के सेल पर मैसेज छोड़ रखे थे। दो दिन बाद शेफाली का कॉल देखते ही उसने धड़कते दिल से रिसीव किया। वह भी अपनी कमी से अनभिज्ञ न था। एक पढ़ी-लिखी ,सुसंस्कृत लड़की जीवनसाथी के रूप में पाने की उसकी भी लालसा थी। अब तो वे एक दूसरे को दिलोजान से चाहते भी हैं।
बमुश्किल उसने पापा को मनाया और तय हुआ कि अगले सण्डे को गाजियाबाद जाकर नितिन के घरवालों से बात कर शादी को अरेंज किया जायेगा। शादी की तारीख भी निकलवा ली राजबिहारीजी न, बस नितिन के मम्मी-पापा से मिलना शेष था। राजबिहारी जी ने नितिन के पापा से मिलने के लिये समय मांगा तो उनका पहला  प्रश्न था, ‘‘ कितने की शादी करोगे ?’’
राजबिहारी चैंकते हुए बोले, ‘‘ पर... नितिन ने तो बताया था हमारी कोई डिमांड नहीं है तभी हम आगे बढ़े थे।’’
एक सख्त स्वर उभरा था फोन पर,‘‘उसके कहने से क्या होता है... लड़की पसन्द करना उसका काम है बाकी काम हमारा हैं ’’
राजबिहारी को नितिन वैसे भी पसन्द नहीं था उन्हें बहाना मिल गया।

शादी डॉट कॉम फेल होने की कगार पर आ गया। इसे यूँ भी कहा जा सकता है कि लड़का संस्कारी था जो माता-पिता को अलग कर नन्हे पाव चलते प्यार को आगे नहीं बढ़ा सका। वह अपने निर्णय पर अडिग नहीं रह पाया या निर्णय इतना कमजोर था कि अधिक समय तक खड़ा नहीं रह सका। सपनों का महल धड़धड़ाकर गिर गया। तीन माह का सम्पर्क तीन जन्मों का लगने लगा था। मनमुटाव, बातों में खटास आना शुरू हो गयी थी और नेट के सम्बन्ध बिखर रहे थे। पापा-मम्मी की अनुमति के बिना वह कुछ नहीं कर सकता था।
शेफाली के मन में द्वंद्व चलने लगता ...हमारा प्यार प्रथम दृष्टया प्यार तो था नहीं जो एक बार देख लेने भर से प्यार हो गया हो। ये तो सोचने समझने के बाद लिया गया फैसला था । क्या उसमें इतना पौरुष नहीं था ? जब माँ - बाप की मर्जी से ही विवाह करना था तो प्यार भी उनसे पूछकर , उनकी अनुमति से करना था। प्यार करते समय तो ऐसे दिखा रहा था कि पता नहीं कितना जज्बा है उसके अन्दर, पर मौका पड़ने पर मुँह छिपा लिया।
उसकी सोच निरंतर जारी थी... प्यार एक अहसास है, प्यार उमंग और उत्साह भर देता है जिन्दगी में, प्यार खुशी है... प्यार जिन्दगी है... तो क्या प्यार न रहे तो जिन्दगी भी न रहे ...ऐसा तो न होगा। वह प्यार के वियोग में आत्महन्ता नहीं बनेगी। वह जिएगी...प्यार के न रहने के अहसास के साथ ...वह उसे दिखा देगी कि वह उसके बिना भी जी सकती है... वह आत्मविश्वास से भर गयी। प्यार खुशी दे तो जिन्दगी है ...प्यार दुःख दे तो एक बीमारी। उस बीमारी को जड़ से उखाड़ने की आवश्यकता है। प्यार के वजूद को बनाये रखने के लिये ऐसे अनिश्चित, असफल प्रेम को जो अस्वास्थ्यकर बन चुका है ; मन से , दिलो-दिमाग से उखाड़ फेंकना ही होगा। ...
उस दिन वह जी भरकर रोयी थी, शायद ! विरेचन के लिये यह आवश्यक था। अरस्तु ने ‘‘Catharsis ’’ (विरेचन) शब्द का प्रयोग किया था। चिकित्सा शास्त्र मे इसका अर्थ है- रेचक औषधियों द्वारा शरीर के मल या अनावश्यक एवं अस्वास्थ्यप्रद पदार्थ को निकालना।
उसे याद आ रहा था अरस्तु का मत: ‘‘ त्रासदी करुणा तथा त्रास के कृत्रिम उद्रेक द्वारा मानव के वास्तविक जीवन की करुणा और त्रास-संबंधी भावनाओं का निष्कासन करती है, त्रासदी के पठन और प्रेक्षण से संयत रूप में करुणा और भय का जो संचार होता है, उससे व्यावहारिक जीवन में करुणा और भय के प्रचण्ड आवेगों को झेलने की शक्ति आ जाती है। ’’

लगभग तीन माह बाद शेफाली कैफे आयी थी। कई दिनों से उसने मेल चैक नहीं किया। उसने इनबॉक्स खोला , एक ही व्यक्ति के दस मेल चार पाँच दिन के अन्तराल से पड़े थे। श्रेयांश भार्गव कौन है यह जानने की जिज्ञासा उसे हुयी। दिल्ली में उसका आफिस , बनारस का रहने वाला... बी ई एम.बी.ए. सारी जानकारी के साथ फोटो भी था। अन्तिम मेल में उसने काॅन्टेक्ट नम्बर मांगा था। उसने अनमने भाव से कम्पोज मेल पर जाकर उसे अपना मोबाइल नम्बर सेन्ड कर दिया। उसने कैफे के काउन्टर पर  पेमेन्ट किया और घर की ओर चल दी।
उस रात ही श्रेयांश का फोन आया , शेफाली ने ज्यादा रूचि नहीं दिखायीं।
शेफाली उससे कुछ छुपाना नहीं चाहती थी । पन्द्रह दिन के वार्तालाप में उसने अपना सच उसे बता दिया। दोनों एक दूसरे की पसन्द-नापसन्द से परिचित हो गये। श्रेयांश उसकी स्पष्टवादिता से बेहद प्रभावित हुआ।
उसने फोन पर कहा- ‘‘मैं मिलना चाहता हूँ’’
‘‘मिल लेंगे... अभी एक-दूसरे को जान समझ तो लें’’
‘‘मैं जल्दी निर्णय लेना चाहता हूँ’’
‘‘मैं अभी पूरी तरह स्थिर नहीं हो पायी हूँ’’
‘‘इसीलिये तो जल्दी मिलना चाहता हूँ’’
‘‘पर मैं कैसे विश्वास कर लूँ’’ कहते-कहते वह रो पड़ी थी’’ इस बार वह जल्दबाजी करना नहीं चाहती थी।
‘‘सच मानो मेरी शादी में मेरा ही फैसला अंतिम होगा, यदि मम्मी-पापा नहीं मानेंगे तो भी मैं हर हालात में शादी करने को तैयार रहूँगा , बस एक बार मिल तो लो ...’’
............
‘‘और सुनो मेरे हाथ तुम्हारे आँसू पौंछ रहे हैं’’
........
‘‘एक के धोखा देने पर किसी पर विश्वास न करो ये गलत है। मैं खुद अभी तुमसे कोई वादा नहीं कर रहा और न ही तुम्हें मजबूर कर रहा। बस एक बार मिल लो...’’ वह समझा रहा था।
जाने क्या जादू था उसकी आवाज में वह मना नहीं कर पायी
‘‘...ठीक है...’’
‘‘पहले हम दोनों मिलेंगे यदि तुम्हें सब ठीक लगे तो पेरेन्ट्स से मिलवाना ओ के’’
‘‘ओ के’’ वह धीरे से बुदबुदायी ।

शहर के छोटे से होटल में शेफाली अपनी एक सहेली के साथ पहुँची। दोनों ने एक दूसरे को पसन्द कर लिया। दो घन्टे की बातचीत के बाद वह चला गया।
शेफाली को लगता कहीं ये भी नितिन की तरह अपने वादे पर अडिग न रहा तो... कहीं इसने भी अपने पेरेन्ट्स के कहने पर डिमांड पर जोर दिया तो... पापा-मम्मी पता नहीं कितना सुनायेंगे। पहले भी तो कितना कुछ सुनना पड़ा था- ...शादी की जल्दी हो रही है इसलिये बिना सोचे-समझे, जांचे-परखे उसे बुला लिया।... माँ-बाप बच्चों के दुश्मन नहीं होते यही हम देखते तो सब ठोक बजाकर देखते पहले।...
दिल्ली पहुँचकर वह आग्रह करने लगा अब मुझे तुम्हारे पापा-मम्मी से मिलना चाहिये। शेफाली ने थोड़ा और वक्त मांगा ।
‘‘...जब तक तुम खुद आने को नहीं कहोगी तब तक नहीं आऊँगा’’
‘‘आपके परिवार की कोई डिमांड तो नहीं है....’’ शेफाली घबराकर पूछती
‘‘तुम एक ही प्रश्न बार-बार क्यों करती हो ? ’’
‘‘मैं सन्तुष्ट होना चाहती हूँ’’
‘‘ठीक है ,!  सिर्फ एक डिमांड है ...’’
इस उत्तर ने उसे फिर चैंका दिया। वह चिन्तित होकर बोली, ‘‘क्या...डिमांड है ?’’
वह कहकहा लगाकर बोला, ’’प्यारी-प्यारी शेफाली... और कुछ नहीं , क्या हुआ चिन्ता में तो नहीं पड़ गयीं ’’
..........
‘‘चलो अपना गाल आगे करो , उसे थपथपाकर कहूँगा पगली ....’’
नेट पर फ्री में way 2 sms की सुविधा है
‘‘अच्छा एक काम करना , नेट पर अपने मोबाइल नंबर का way 2 sms पर खाता खोल लेना, फिर तुम्हारे मोबाइल पर उसका पासवर्ड आ जायेगा। उसके जरिये तुम मुझे मोबाइल पर मैसेज कर सकती हो।

श्रेयांश से चैटिंग करते समय दो-तीन बार नितिन का इनविटिशेन उसके स्क्रीन पर उभरा, उसने उससे बात नहीं कीं। थोड़े दिन बाद ही उसने अपना ई मेल आइ डी चेन्ज कर लिया और श्रेयांश को भी कारण बता दिया।

जबसे वह मिलकर गया है , हर बार बात करते समय उसका प्रश्न होता क्या पहना है ? किस कलर का ?
वह आश्चर्य करती तो कहता- ‘‘इससे इमेजिनेशन करने में परेशानी नहीं होती।’’
वह कैफे में होती उस समय यदि वह टूर पर होता तो कहता तुम नेट से वे टू एस एम एस से मेसेज मेरे मोबाइल पर करो। फिर वह ‘‘वे टू एस एम एस’’ करती और वह उसके मोबाइल पर मैसेज रिप्लाय कर देता।

कुछ दिन बाद वह आया ,शादी की डेट भी निकलवा लाया था। शेफाली के पापा-मम्मी भी तैयार हो गये ,वो चाहते थे ज्यादा खर्च न हो।
‘‘ऐसा करिये आप सब दिल्ली आ जाइये। जितने रिश्तेदारों को बुलाना है बुला लीजिये। शादी का अरेंजमेन्ट तो मुझे ही करना है।’’
‘‘आपके घरवाले...’’ पापा का स्वर उभरा
‘‘पापा-मम्मी तो तैयार नहीं हैं’’
सुनकर राजबिहारी जी परेशान हो गये
‘‘उनकी परेशानी समझ उसने आश्वासन दिया, घबराइये नहीं मैं हर स्थिति में शेफाली का साथ देने को तैयार हूँ ’’
   कमरे में सामान उठाने आया तो दरवाजे पर शेफाली को खड़ा पाया। उसने शेफाली के सर पर हाथ फेरा आश्वासन भरा, वह उससे लिपटकर रो पड़ी थी। उसने आँसू हथेलियों में समेटते हुए कहा ,‘‘ नहीं अब एक बूँद भी नहीं गिरने दूँगा । मुझे तुम्हारी कद्र है। मुझे पैसों की कोई कमी नहीं है। बस एक अच्छा और सच्चा जीवनसाथी चाहिये ।’’
‘‘.........’’
तर्जनी से उसकी ठोड़ी ऊपर करते हुए कहा, ‘‘...मुझे सफर करना है, उदास छोड़कर जाऊँगा तो मेरा मन नहीं लगेगा।....मुझे हँसती हुयी शेफाली चाहिये ।’’
   रोते-रोते मुस्करा दी वह । वह चला गया मन में आत्मीयता और दिल में प्यार के जज़्बे को छोड़ गया।
शेफाली को शेक्सपीयर की कविता ‘फीनिक्स एण्ड टर्टल’’ की कुछ पंक्तियाँ याद आ गयीं-
Leaving no posterity
“ITwas not their infirmity
            It was married chastity
 (कोई संतान या पीढ़ी नहीं छोड़कर जाना, यह उनकी कमजोरी नहीं, बंधन की पवित्रता है।)

     शेफाली को लग रहा है फीनिक्स जलकर भस्म होता है और अपनी ही राख से पुनः पैदा होता है ,युवा के रूप में जीवित होकर वही चक्र दोहराता है। उसे लग रहा है कि इस बार फीनिक्स और टर्टल मिलकर ही रहेंगे।

प्रतिक्रियाएँ
[04/03 07:42] Rajnarayan Bohare: मौसम के अनुकूल व टेक्नोलोजी और फीनिक्स के मिथ को समझने संझाने का प्रयास करती कहानी।
[04/03 11:01] shivani sharma Ajmer: आजकल समाज में ऐसे माता-पिता दिख ही जाते हैं जिनके बेटे विदेशों में हैं और बेटियों को वे दूर जाने नहीं देना चाहते! बड़ी विडम्बना है...
मनोभावों को खूबसूरती से उकेरती हुई कहानी । बहुत पसन्द आई। बधाई
[04/03 11:13] ‪+91 99313 45882‬: इस कहानी में बड़ी खूबसूरती के साथ लेखिका ने शेफाली के मनोविज्ञान को उकेरा है ! शेफाली के पिता के माध्यम से एक ऐसा कंजूस चरित्र सामने आया है जो पैसा रहने के बावजूद बेटी की शादी में खर्च नहीं करना चाहता और उसे यह चिंता भी है की बेटी के विदा होने के बाद उसकी सेवा कौन करेगा ! पिता के साथ माँ भी शेफाली की शादी में विलम्ब की जिम्मेदार है !
कुल मिलाकर कहानी का ताना-बाना अच्छे से बुना गया है !
जॉन डान , शेक्सपियर की कविता पंक्तियाँ और अरस्तू के विचार से कथाकार की विद्वता तो झलकती है लेकिन यह आम पाठकों की पाठकीयता में व्यवधान पैदा करनेवाली है !
फिर भी यह कहानी मुझे बहुत अच्छी लगी और इसके लिए मैं पद्मा जी को बधाई देता हूँ और मंच को धन्यवाद् !
[04/03 11:13] ‪+91 99313 45882‬: विवाह की देहरी पर खड़ी एक युवती शेफाली के कश्मकश की कहानी है फीनिक्स
[04/03 11:29] Kavita Varma: फीनिक्स कहानी की चर्चा पहले भी कई बार मंच पर हुई आज पढ़ने को मिली । कहानी का ताना बाना रोचकता से बुना गया है ।संस्कार किस तरह लड़कियों के पैर की बेड़ियॉ बन जाते हैे ये बात भी उभर कर आई । शेखर जी की बात से भी सहमत हूॅ । पद्मा जी तो बधाई अच्छी कहानी के लिये ।
[04/03 14:14] ‪+91 98260 44741‬: एक उच्च शिक्षित परिवार की उच्च शिक्षित लड़की को भी माता पिता के स्वार्थवश किन बेड़ियों में घुटकर रहना पड़ता है उसका संवेदनशील वर्णन। यह वास्तव में बहुत से घरों की सच्चाई है। लेखिका ने जिस तरह से इसे फीनिक्स के मिथक के साथ गुंथकर प्रस्तुत किया है उससे विषय एकदम ताज़ा और नवीनता लिए हो गया इसके लिए लेखिका बधाई की पात्र है। साथ ही अपने भविष्य की डोर भी अपने हाथ में रखते हुए अपने निर्णय की स्वतंत्रता हर लड़की को रखनी चाहिए । कहानी कई पहलुओं पर बहुत अच्छी सीख देती है।
[04/03 14:46] ‪+91 97690 23188‬: पदमा जी की कहानी नायिका प्रधान है।नायिका अविवाहित है और किस तरह वह परिवार की  और स्वयं की उलझनों मर में अपने को उलझा हुआ पाती है ।शादी के लिए मनःस्थिति बनाने के बावजूद जब उचित अवसर नहीं आता है तो वह किन परिस्थितियों से गुजरती हैं और फिर किस तरह है  अंत होता है आज आभासी दुनिया से रिश्तो को पाकर ।मिथक को दोहराते हुए कहानी ने एक नया मोड़ लिया है ।बधाई
[04/03 16:51] प्रज्ञा रोहिणी: स्वयं प्रकाश जी ने काफी पहले फीनिक्स नाटक में सर्वहारा के संदर्भ में इस मिथक का प्रयोग किया था। पद्मा जी की कहानी में इसके माध्यम से जीवन की जटिलता के बीच प्रेम की राह खोजने की कोशिश कहानी करती है। कथार्सिस आदि सिद्धांतों के वर्णन के बिना भी कहानी अपनी बात कहने में समर्थ थी।
[04/03 20:30] ‪+91 94257 11784‬: जी से अवश्य सहमत होना चाहूंगा ।अंग्रेजी कविता निश्चित ही कहानी की पठनीयता  को प्रभावित करती है ।पर उससे कहानी का महत्व  कम  नही होता ।   समाज जीवन में ऐसा सार्थक साहित्य सृजन वस्तुतः स्वागत योग्य है ।अतः पद्मा शर्मा जी को कहानी के लिए बहुत बहुत बधाई ।मंच को अनेकशः साधुवाद ।
[04/03 20:30] ‪+91 94257 11784‬: डॉ पद्मा शर्मा जी की कहानी,  फीनिक्स, मूलतः दहेज  से जुडी  बढिया कहानी है । नयापन भी है। विवाह संबंधों में सायबर कैफे की भूमिका भी रेखांकित हुई है । कहानी  के श्रेयांस भार्गव  नितिन जैसे कच्चे प्रेमियों के मन में किंचित साहसिकता का संचार  भी कर सकते हैं ।
    यूं  यह कहानी पर्याप्त रोचकता के साथ दहेज परंपरा  के समाधान का मार्ग प्रशस्त करती प्रतीत होती है ।
        यहां आदरणीय श्री शेखर
[04/03 21:32] Saksena Madhu: पद्मा जी की कहानी  आज के नेट युग की कहानी है  ।लड़कियों की अपनी जद्दोजहद हर युग में दिखाई देती है ..अपनी शादी में माता पिता की उदासीनता शेफाली को आहत तो करती है पर स्वयं उपाय भी कहोज लेती है ।आज की स्त्री प्रेम में मरना पसन्द नहीं करती वे जीना चाहती भी  है  और जानती भी हैं तभी तो नितिन से आहत होते हुए भी श्रेयांश भार्गव में रूचि लेती है ।अरस्तु के विरेचन को अपनाती हैं ।पूरी कहानी बाँध कर रखती है और दिशा देती है ।कहानी में मिथकों का प्रयोग   लेखिका के ज्ञान को तो दर्शाता है साथ ही कहानी को भी मज़बूती प्रदान करता है ।हमारा पढ़ा हुआ ही मुश्किल मार्ग को सहज बनाता है । " छोड़ दे सारी दुनिया किसी के लिए"  "या रात गई बात गई " जैसी रचनाएँ टूटे मन को सबल बनाती है ।
कुल मिला कर देशकाल, परिस्थिति भाषा और भाव सभी मिलकर कहानी को पठनीय और सन्देशात्मक बनाते हैं
अच्छी कहानी के लिए आभार पद्मा जी ।
[04/03 22:27] Padma Ji: प्रज्ञा जी धन्यवाद। एक ही मिथक का प्रयोग कई साहित्यकार अलग अलग विधाओं में अपने तरीके से करते हैं। स्वयंप्रकाश जी के उपन्यास की बात हो या अन्य साहित्य की। अच्छा लगा जानकर  कि पाखी मार्च के अंक में जयंत पवार जी की कहानी तो मेरी कहानी के कई वर्षों बाद आयी। अपने महत्वपूर्ण जानकरियों से अवगत कराया। धन्यवाद 🙏
[04/03 22:49] Varhsa Raval: पद्मा जी बहुत प्यारी कहानी, अभी वक़्त मिला पढ़ने का, अच्छा हुआ टाल नही दिया, वरना इतनी अच्छी कहानी से वंचित हो जाती.....बहुत 2 बधाई आपको🙏🙏🙏
[04/03 23:17] राजेश झरपुरे जी: आज आप सभी ने पद्माजी की कहानी,  फीनिक्स पढा और अपनी महत्वपूर्ण  प्रतिक्रिया से अवगत कराया । धन्यवाद  साथियों  । एक मध्यम वर्गीय परिवार  में माता-पिता का बेटे और बेटी के प्रति  सोच में तो  अन्तर होता  ही है ।  बेटे की उच्च शिक्षा  के दिए एज्यूकेशन लोन,  पी एफ से पार्ट फाइनल और अपने सारे सपने बेचकर भी उसे पढ़ाना लिखाना और बेटी के लिये हाथ खींच लेना क्योंकि वह पराये घर की मेहमान  है जैसी मानसिकता  से परिचय कराती कहानी । जॉन डान , शेक्सपियर की कविता  और अरस्तू के विचार जिसे लेखिका ने अपनी कहानी के कथ्य के सपोर्ट में  रखा है को हटा दिया जाये तो लेखक का अपना कहानी में  क्या है जैसा प्रश्न भी मुॅहबायें खड़ा हो जाता है ।क्या यह एक जानकारी या सूचना हैं?

प्रेम और समर्पण की साथर्कता?
मध्यमवर्गीय परिवार  में बेटी के विवाह को लेकर माता पिता की सोच?
विवाह सम्पर्क के आधुनिक  माध्यम?
दहेज प्रथा और मोलमाव जैसे कई मुद्दे  कहानी में उठाये गये पर किसी भी एक मुद्दे पर कहानी  खरी नहीं उतरती । शेक्सपीयर की कविता पंक्ति का हिन्दी अनुवाद  भी ठीक उसी तरह है जिस तरह है जिस तरह परीक्षा में पास होने के लिए रटा लगाने वाली रिफेसर । हालांकि इस तरह अंग्रेजी और हिन्दी अनुवाद का कहानी में कोई औचित्य नहीं था । इस प्रसंग  को लेखिका अपने शब्दों में भी कह सकती थी ।कुल मिलाकर एक औसत कहानी से भी कमतर ।
मंच को अभी  भी पद्माजी से एक  बेहतरीन कहानी की  प्रतीक्षा बनी हुई है । एक पाठक की प्रतिक्रिया है । कृपया अन्यथा न ले ।

शुभरात्रि मित्रो।

सोमवार  से नई कहानियों के साथ पुनः भेट होगी ।
[05/03 17:44] Manoj Jain Madhur: 【पाठकीय- प्रतिक्रिया】
____________________
मंच(कहानी)का
मैं एक अनियमित पाठक हूँ एडमिन राजेश झरपुरे जी और संचालन टीम के प्रेम ने मुझे बाँध रखा है
प्रस्तुत कहानी फीनिक्स ने प्रारम्भ से अंत तक बांधे रखा इसकी पृष्ठभूमि में और थीम में मेरे गृह जिले शिवपुरी के प्रसिद्ध ऐतिहासिक स्थलों का जिक्र है जो वहां से जुडी यादों को तरोताजा करती है।
कहानी में विभिन्न कोण हैं और लेखिका ने अपनी दृष्टि से समाज में व्याप्त ज्वलन्त समस्या को बखूबी उजागर किया है टाइटिल को जस्टीफाई करने के लिए
लेखिका ने पाठको पर अनावश्यक बौद्धिक व्यायाम थोपा भी है जिससे बचा जा सकता था
भाषा सुगठित प्रभावी बोधगम्य है पाठक को अंत तक बांधे रहने में पूरी तरह सफल है
कहानी समसामयिक है इसलिए रोचक भी
पद्माशर्मा जी को बहुत बहुत बधाई
राजेश झरपुरे सहित पूरी टीम को आभार एक अच्छी कहानी से जोड़ने के लिए


[05/03 18:14] Pravesh: फीनिक्स कहानी एक सबक और आत्मविश्वास बढ़ाने वाली कहानी लगी ।कहानी की पारिवारिक पृष्ठ भूमि में माता -पिता का बेटी की शादी के लिए उदासीन रहना और बेटी को स्वयं अपने जीवन साथी तलाशने को तत्पर होना ,नया तो नही है । प्यार अपनी पसन्द और शादी माता पिता की पसंद से करने वाले दिखावे के आज्ञाकारी ,संस्कारी  लड़को से प्यार का सम्मोहन बाँध लेना ,और बाद में  धोखा खाना ।
लेकिन चलने पर ठोकर खाकर बैठ जाना नही होता ।ठोकर से सबक लेकर पुनः चल निकलना ही इस कहानी का उद्देश्य है ,जिसे लेखिका ने फीनिक्स के मिथक को लेकर बताने की कोशिश की  है ।
रुकना नही तू थकहार के ,...
अच्छी कहानी के लिए पदमा जी को बधाई ।
🙏🌹🙏
[06/03 02:49] ‪+91 98116 64796‬: पद्मा जी 'फ़ीनिक्स' अभी पढ़ी। कुछ लोग भी ज़ेहन से गुज़रे इसे पढ़ते समय, नायिका के साथ होने वाला 'यह' व्यवहार कितना ओछा लगता है — शायद है भी और शायद नहीं भी , क्योंकि बहुत संभव है कि पिता का पुत्री के प्रति स्नेह ऐसा हो कि वह उसे दूर न कर पा रहा हो ...
अच्छी कहानी है — बस पिता का कई-बार 'डिमांड क्या है' कहना/पूछना अखरा — शायद सच्ची कहानी होने के कारण ऐसा हुआ हो।
बधाई आपको और मंच संचालक आपको भी !
सादर
भरत तिवारी
[06/03 09:07] Padma Ji: भरत जो बहुत बहुत धन्यवाद।🙏🏼
आजकल तो बेटी के विवाह के लिए लड़का  ढूंढने के दौरान हर मध्यवर्गीय पिता का पहला प्रश्न यही होता है कि डिमांड क्या है ?

जो सक्षम हैं वो भी बिचौनिये से यही कहते हैं हम शादी अच्छी कर देंगे।

अभी भी पढ़ी लिखी और नौकरी में लगी लड़कियों के लिए दहेज़ बंद नही हुआ है।


Thursday, March 3, 2016


 वसो तो कागा भला ...   
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राजेश झरपुरे 
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सुबह, सुबह जैसी सुबह उस नगरी के माईनर्स क्वार्टर नम्बर 318 में सात घंटे पहले हो चुकी थी. नौतपे की सूर्य किरणें खिड़की के झरोखें से निर्भय प्रवेश कर, मिठाईलाल के बिछौने पर पसरी हुई थीं. वह मुँह ढाँककर दाँई करवट सो रहा था. पत्नी, बच्चों की सुबह और दोपहर हो चुकी थीं. हो चुकी सुबह और दोपहर के बारे में उसे नहीं बताया गया, न जगाया गया. उसके लिए यह जानना ज़रूरी भी नहीं था. उसके जीवन में कई सप्ताह सुबह नहीं होती. कई सप्ताह दोपहर और कई सप्ताह शाम व कभी रात भी नहीं होती. वह क्रमशः तीन पालियों में 8-4, 4-12 एवम् 12-8 बजे की पालियों में कोयला खदान की लम्बी-अंधेरी सुरंग में पिछले 35 वर्षों से नौकरी कर रहा था. 12-8 यानि रात पाली से आकर बेसुध पड़ा था. देह से आठ घंटे पसीना चुहाने के बाद आई थकान से उसका सोया हुआ चेहरा कुन्दन की तरह दमक रहा था. इस चमक में कोयले की कालिमा भी थी जो उसके चेहरे को और अधिक सुन्दर बना रही थीं. वह नींद में भी थकाहारा लग रहा था. इस अवस्था में चार-पाँच घंटे और पड़ा रह सकता था. पर नींद उसके ऊपर चढ़ी पसीने की परत की गंध से उचटने लगी. वह कुनमुनाने लगा. उसकी कुनमुनाहट पर पत्नी संवाद का साहस जुटा पाती अन्यथा नहीं.
वह अपने पति का बेहद ख़्याल रखती। उसकी हर बात को गांठ बाँधकर रख लेेती. जब वह संवाद हेतु उचित अवसर पा जाती तो बड़े ही मनुहार से कहती ”...उठिएजी! 4-12 का टेम हो रहा हैं।“ पर इसकी ज़रूरत कभी-कभी ही पड़ती. वह ख़ुद ही जाग जाता. उसे नींद में भी अपनी पाली की फ़िकर रहती. पैंतीस बरस की भूमीगत नौकरी में उसने एक भी दिन नागा नहीं किया. बिना किसी उचित  कारण के छुट्टी  नहीं लिया. छुट्टियाँ उसके पास अर्जित अवकाश की थैली में गले तक भरी पड़ी थी. वह बैंक में जमा धन और जमा छुट्टियों में कोई अन्तर नहीं समझता. दोनों ही नगद राशि है. आड़े समय में सब साथ छोड़ जाते हैं तब यह नगदराम ही सच्चा साथी बनकर मदद करता हैं...ऐसा उसका मानना था और ऐसा उसने देखा,सुना और भोगा भी था.आखिर वह कबीर पंथी जो ठहरा।

झरोखों से आती किरणों ने उसेे बायें से दायें करवट बदलने पर मज़बूर कर दिया. लेकिन दांईं ओर भी सूरज के छोटे-बड़े गोले बिछौने पर उछल कूद कर रहे थे. बाएं से दाएं और दाएं से बाएं की मशक्कत के बाद उसके कबिरा मन ने इस सोच के साथ उठा दिया कि ‘‘... चलो! गुज़र गई, जो गुज़रना था. अब बचे दो साल और गुज़ार लेते है. गुज़ारना नियति हैं. बिना गुज़ारे काम  नहीं चल सकता. घर चलाना हैं, परिवार पालना हैं तो खपना पड़ेगा. जो खपेगा,वही भर पायेगा. यही दुःख हैं और सुख भी.

 “मैं रोऊँ सब जगत को, मोको रोवे न कोय ।
  मोको रोवे सोचना, जो शब्द बोय की होय।।“

जो गुज़ारा उनके कांधें पर गुज़रा, जो गुज़रेगा वह भी कांधें पर चढ़कर गुज़रेगा. गुज़र जाने दो इसे भी... सोचते हुए वह उठ बैठा. भरी दुपहरी में सुबह हुई. मुँह-हाथ धुले. तुरन्त हाथ में गरम चाय की प्याली आ गई. पत्नी ने बिछौना समेटकर रख दिया. वह चाय पीने के बाद पूरे मनोयोग से खैनी मलने लगा. मली हुई खैनी की पीट पर दो-चार थपक लगाकर चूना झड़ाया. एक चुटकी अपने तलबे में दबाकर, तहमत लगा ली. खोली (क्वार्टर) के सामने आकर खड़े हो गया. यह संकेत हैं...पड़ोसी सह-कामगारों के लिए। वह ड्यूटी जाने के लिए तैयार है. आवश्यक दिनचर्या से फ़ारिग होने ही वाले हैं. उनकी इस आदत से घर और मोहल्ले में आसपास के सभी लोग परिचित थे. खैनी का लस जब उनके दिल और दिमाग में एक तरह की झनझनाहट भर देता तो वह फ़ारिग होने के लिए चल देते। इसके बाद स्नान,ध्यान. वह वर्षों से एक अगरबत्ती वाली पूजा करते चले आ रहा थे. नियमित रूप से हनुमान चालीसा पाठ के बाद चन्द मिनट हाथ जोड़कर बुदबुदाने से उनकी पूजा सम्पन्न हो जाती. इसके बाद भोजन की थाली तैयार रहती.वह सीधे रसोई में चले जाते. इसी समय घर का हरेक सदस्य उनके आसपास होता. ड्यूटी के दौरान मोहल्ले के आस-पड़ोस और रिश्ते-नातेदारों से सम्बन्धित हालचाल और सूचनायें उन्हें दी जाती. वह भोजन करते हुए बीच-बीच में अपनी राय देते . पत्नी इसी समय घरेलू ज़रूरतों की बातें करतीं. बच्चे अपनी समस्या बतलाते. वह सारी इच्छा और ज़रूरतों को समझदारी से खींचकर चादर के अन्दर लाते. और आवश्यक रकम अलमारी से निकाल लेने की अनुमति दे देते. चादर के दायरे में बंधें बच्चे ना-ख़ुश रहते पर पत्नी स्थिति को सम्भाल लेती.

वह स्वयं पढ़े-लिखे नहीं थे पर बच्चों की परवरिश पर बड़े गर्व से पैसा खर्च करते. उनका सारा ज्ञान पिता द्वारा प्रदत्त संस्कार की पूंजी था. कबीर पंथियों के बीच पले बढ़े होने के कारण उनकी समझ आग में तपे सोने के आकर्षक गहने की तरह हो गई थी. उनकी इसी समझ और समझदारी के कारण घर-परिवार के लिए उन्हें एक अच्छे पिता, पास-पड़ौस में एक शुभचिंतक और कोयला खदान में एक आदर्श और मेहनती कामगार का दर्ज़ा प्राप्त था. लोग ध्यान से उनकी बातें सुनते और गुनते.

वह अपने बच्चों की पढ़ाई पर खुले हाथ से पैसा खर्च करते और कहते “...बस! इसी एक चीज़ की कमी रह गई मेरे जीवन में. यदि दस क्लास पढ़ा होता तो आज कोयला खदान में सब्बल और गैंती नहीं बल्कि छड़ी पकड़कर खदान चला रहा होता.“
भोजन के बाद वह टी.वी. का स्विच आॅन कर बैठ जाते. समाचार देखे-सुने बिना उनका दिन पूरा नहीं होता. चाहे कोई भी पाली रहे, वह आधा घंटा अनिवार्य रूप से टी वी के सामने बैठते. उनका मानना था... हम जिस समाज में रहते हैं, उसके आसपास के वातावरण और गतिविधियों पर सदैव गौर करते रहना चाहिए अन्यथा हम पिछड़ जायेंगे. उसकी स्मरण शक्ति तीक्ष्ण थीं. उन्हें एक बार पढ़ी,लिखी और सुनी बातें कंठस्थ हो जाती थी. बच्चे उनकी उपस्थिति में यंत्रवत पढ़ते रहते. पत्नी घर के कामों में उलझी रहती. एक बार सामान जहाँ रख दिया, दुबारा उठाकर कहीं ओर रख देती फिर वहां से उठाकर उसको वहीं रख देती जहाँ वह पहले था. वह जानते थे,..उसका स्वर्ग रसोई में हैं. वह बाहर की दुनियाँ से बहुत कम सरोकार रखती थी.

वह अपनी खदान के वरिष्ट कामगार हैं...
रूफ़ बोल्टर. भूगर्भ में सदैव ऊपर देखते रहना पड़ता हैं ... सुरंग की छत की तरफ़. उसकी मरम्मत करते रहना उनका मूल कार्य था. ताकि छत सह-कामगारों के लिए छत ही बनी रहे. खनिक उसके आश्रय में निर्भय होकर उत्पादन कर सके.

जब वह कनिष्ट थे, कोयले का उत्पादन कम होता था. लोगों को बुला-बुलाकर नौकरी दी जाती थी तब भी मैनपाॅवर पूरा नहीं पड़ता था. अब वरिष्ट हो चुके और रिटायरमेंट के बहुत करीब. उत्पादन पहले से कई गुणा अधिक बढ़ गया और लगातार बढ़ता जा रहा पर नौकरियाँ खत्म हो गई. कोयले के ढेर के सामने आदमी बहुत असहाय और बौने नज़र आने लगे. पहले देने पर लोग नौकरी नहीं करते थे अब करना चाहते हैं तो नौकरियाँ नहीं रहीं. ज़माना बदल गया. ठेकेदारी में लोग कोयला खदान में बिना शर्त और अनुबन्धों के चाकरी कर रहे हैं. हरेक काम फिर चाहे रूफ़ सपोर्ट का  हो या मलमा ढुलाई का, सिविल का या फिर वेलफेयर का, साइडिंग में कोयले के ढेर से सेल-पत्थर छांटने का हो या बैगन में कोयले के लदान का...सब काम ठेके पर, सब आउट सोर्सिंग के द्वारा. जहाँ ठेकेदारी मजदूरों से काम लिया जाना वार्जित हैं वहाँ भी. काम के दाम ठेकेदार तय करता... एक सौ,ढेड़ सौ. बहुत हुआ तो दो सौ रोज़...पर इससे ज़्यादा नहीं. वे कहते...एक बुलाओ तो दस आते. एक जाता तो बीस नए लाईन में लग जाते.ठेकेदार की एक दस्तख़्वत पर ख़ुद ही खदान में काम करने की ट्रेनिंग, प्रशिक्षण केन्द्रों से प्राप्त कर लेंगे. जाॅब ट्रेनिंग के नाम पर महिने भर खदान में बेगारी कर आएंगे और सर्टिफिकेट पकड़कर उनके पास आकर खड़े हो जाएंगे.

उनके देखते-देखते गाँव, नगर और फिर नगर से शहर जैसा लगने लगा. खदानों की कार्य प्रणाली बदलती रही. वे चिमनी युग में भर्ती हुए थे. विधुतीकरण से लेकर मशीनीकरण तक का समय उन्होंने तय किया. अब कम्प्यूटर युग में रिटायर होने को आए. चिमनी युग में श्रमिक नहीं मिलते थे और कम्प्यूटर युग में श्रम कौड़ियों के दाम बिक रहा हैं.

कम्पनी उनके साथ काम करने वाले ठेकेदारी मजदूरों को आउट सोर्सिंग लेबर कहती. इनके प्रति प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से कम्पनी की कोई ज़िम्मेदारी नही होतीं. वे ठेकेदार को पहचानते हैं,मजदूर को नहीं. उनके बारे में सोचना... ठेकेदार का हैटेक हैं, उनका नहीं. इस सोच का कोई विरोध नहीं करता. उनके मजदूर-भाई भी नहीं, संगठन भी नहीं. संगठन, परमानेन्ट एम्पलाई के लिए हैं. ठेकेदारी मजदूरों के लिए वे कभी-कभार प्रदर्शन अवश्य कर देते पर अपने कुछ निज स्वार्थ के लिए.

बाज़ार और बाज़ार के मज़बूत हाथ जिस ढंग से बढ़कर सामने आए थे, उसने विरोध करने की सारी ताकतों को छीन लिया था. यह बात वह अपने अल्पज्ञान से अच्छी तरह समझते थे. उनका कबीर मन सदैव विचलित और दुःखी रहता पर उनकी करूणा को कोई समझ नहीं पाता.

“सुखिया सब संसार है जो खावे और सोवै ।
दुखिया दास कबीर है,जो जागे अरू रोवै ।।“

वह जानते-समझते थे...बाज़ार जो चाहता है, वही होता हैं. दस से बारह घंटें इनसे आसानी से काम लिया जा सकता है. ये मेहनती होते हैं. स्थाई कामगार की अपेक्षा कई गुना अधिक काम करके देते. पक्की नौकरी पा जाना अब बड़ी बात हो गई. अनुकम्पा नियुक्ति से खान में नौकरी पाने के सिवाय और कोई रास्ता नहीं बचा. ठेकेदारी में काम मिलना भी अब टेडी खीर हो गई हैं. स्थानीय ठेकेदार का टेन्डर पास हुआ तो काम मिलेगा. नहीं मिला तो बेगारी. बड़े और बाहर के ठेकेदार तो अपने साथ काम करने की मशीन लेकर आते हैं.

अपनी बेगारी और अवदशाओं के लिए वे अपनी उत्तर  पीढ़ी को  उत्तरदायी मानते हैं. राष्ट्रीयकरण के बाद उनकी सोच में एक नकारात्मक परिवर्तन आया. उनकी धारणा बनी कि एक बार सार्विस रिकार्ड में नाम चढ़ जाए, परमानेंट वर्कर हो जाए फिर काम या कर्तव्य परमानेंट नहीं होता, नाम परमानेंट होता हैं. कामगारों की इसी तरह की मानसिकता ने शनैः शनैः राष्ट्रीयकरण को खो दिया, जिसका खामियाजा नई पीढ़ी को भुगतना पड़ रहा हैं.

वह इस तरह की सोच के सख़्त खिलाफ़ रहे। वह अपने साथी कामगारों से सदैव कहते “...राष्ट्रीयकरण को प्राप्त करने के लिए हमारे पूर्वजों को जितना कड़ा संघर्ष और बलिदान देना पड़ा, उससे कहीं अधिक मेहनत,समर्पण और सेवाभाव हमें उसे बचाने के लिए देना चाहिए था. पर हम नहीं दे पाए. आज भले ही हमारे हाथ से सरकारी नौकरी नहीं छूटी पर हमारी संतानों के हाथ से यह बहुत दूर हो गई. हमारी गंदी मानसिकता का परिणाम यह हुआ कि हम प्रतिस्पर्धा में पिछड़ गए. जिस सरमाएदारी व्यवस्था का विरोध कर हम आगे बढ़े, हमारी संतान उसी का शिकार होकर रह गई. आज पूरी समाजिक व्यवस्था बाज़ार के बढ़ते हुए क्षेत्रफल और ताकत के सामने कमजोर साबित हो रही हैं. ट्रेड् युनियनस् का अस्तित्व कार्यालयों तक ही सीमित होकर रह गया हैं. हमें दुःख हैं...हम अपनी संतानों के लिए खदानों में नौकरियाँ नहीं बचा पाए.‘‘

उनकी विचारतन्द्रा टी.वी. पर दिखाई जा रही देश की आर्थिक व्यवस्था से निकल कर फिर अपनी कोयला खदान की गुफाओं के भयावह अंधेरे में समा गई. वे और उनके साथी जो आउट सोर्सिंग लेबर के समानान्तर खड़े परमानेन्ट एम्पलाई थे को सब कम्पनी का दामाद कहते. पर उन लोगों की संख्या भी अब लाखों से घटकर हज़ारों में आ गई थी. जब वे नहीं रहेंगे, उनकी जगह और कोई नहीं होगा. जो रिटायर हो गए,उनकी जगह कोई नहीं आया. आया इसीलिए नहीं कि... जो चला गया दरअसल वह था ही नहीं. उसका नाम भर था. उस नाम के प्रति कम्पनी की ज़िम्मेदारी उसे हर माह वेतन देने की थी. उनके न होने पर, कम्पनी की ज़िम्मेदारी कम हुई, सैलरी इनपुट कम हुआ, प्रोफ़िट बढ़ा. वह था तो आउट सोर्सिंग लेबर से कार्य अवधि और वर्कलोड की तुलना में कई गुणा अधिक वेतन पाता था. आउट सोर्सिंग लेबर को जितना एक साल में नहीं मिल पाता, उससे कहीं अधिक उसे एक माह में देना पड़ता था... हज़ारों रूपए. हज़ारों में कुछ ओर अधिक हज़ार बढ़ाने के लिए वह अपने साथियों के साथ मिलकर हड़ताल करता और सफ़ल हो जाता. इस तरह हज़ार के आंकड़े बढ़ते गये पर ठेकेदारी मजदूरों की हालत एक सैकड़े के आसपास ही रह कर बद से बदतर होती चली गई.

“कबीर  सोई पीर  है  जो जाने  पर पीर।
जो पर पीर न जानिई, सो काफ़िर बे पीर।।”

वह अपने ठेकेदारी मजदूरों की पीर समझते थे. वह अच्छी तरह जानते थे कि... वह और वे सब जो उनके साथ हैं, खदान में काम करने वाले अंतिम होंगे. अब खदान में नौकरी पाना और आसमान के तारे तोड़ लाना जैसी बात हो गई हैं. वह स्वयं अपने घर आँगन के एक अकेले सितारे हैं और रिटायरमेन्ट के बहुत करीब. आने वाली बरसात में उनके सितारे ज़मीन पर होंगे और उनके बाद, परिवार का कोई सदस्य सितारा नहीं बन पाएगा.

उनके दो बेटे, दोनों पढ़े-लिखे पर बेरोज़गार. बेरोज़गारी की वय को पार कर विवश, किसी व्यवसाय को पकड़ पाने की अधीरता में पिता का मुँह ताकते लाचार नज़र आते, उनके कुछ साथी अपने घर के सामने दुकान खोलकर बैठ गए. कुछ बीमा कम्पनी की आती हुई बाढ़ में नैया खैने लगे. कुछ इस उम्मीद में ठेकेदार के पास काम कर रहे कि जब कभी खदानों में भर्ती होगी, उनका अनुभव काम आएगा. उन्हें प्राथमिकता दी जाएगी. पर यह सब सपना था...वह अच्छी तरह जानते थे. इस उम्मीद में विगत कई सालों से पिस रहे ठेकेदारी मजदूर लगभग अधेड़ हो चुके हैं,जिन्हें माह में मुश्किल से पन्द्रह-बीस दिन काम मिल पाता था. मज़दूरों की कमी न रहें... इसीलिए ठेकेदार तरह-तरह की अफ़वाहें उड़ाते रहते कि जल्द ही खदान में भर्ती होने वाली हैं और अनुभवी ठेकेदारी मजदूरों को प्राथमिकता दी जायेगी. इस तरह वह मजदूरों को पलायन करने से रोके रखते और जमकर शोषण करते.

उनकी रिटायरमेंट की तारीख़ तेजी से करीब आ रही थी फिर भी वह अपनी ड्यूटी पूरे उत्साह और उमंग से करते जैसे युवावस्था में. आज भी उसी तरह वह 4-12 की पाली के लिए निकल पड़े. जबकि अन्य कामगार अपने रिटायरमेन्ट के साल-छः महीने पहले ही काम से तौबा कर अपनी खारिज की जाने वाली केज्युल लीव और सिक लीव को समाप्त करने में लगे रहते. जब वह भी खत्म हो जाती तो समय पास करने के लिए टालमटोल करते. संगठन की ताकत उनके साथ होती.

अम्बुजा खदान उनके घर से आधा किलोमीटर दूर थी. वह हमेशा पैदल जाते. घर में मोटर-साइकिल थी पर उन्होंने चलाना नहीं सीखा. बेटे चलाते पर ज़रूरत भर. उनके दिमाग में तरह-तरह के विचार चल रहे थे. पढ़े-लिखे न होने के बावजूद अपनी बड़ी सी समझ से वह इस निर्णय पर पहुँचे थे कि बाज़ार की बढ़ती हुई ताकत में पूंजी का हाथ हैं और श्रम के घटते हुए मूल्य में उसी का षड्यंत्र. वह सिहर उठे... यह गलत है. इसका विरोध होना चाहिए..? इस तरह सोचते हुए वह चले जा रहे थे कि यकायक एक नई चमचमाती बाईक का ब्रेक, बहुत अधिक दवाब से ठीक उनके पास आकर लगा. बाईक उनसे चन्द कदम आगे जाकर रूकी.
”चाचा! नमस्कार.“
नमस्कार करने वाला कामगार उनके सह-कामगार रह चुके अनोखेलाल का बेटा था. उसे अनुकम्पा नियुक्ति प्राप्त हुई. तीन वर्ष पहले पिता खान दुर्घटना में परलोक सिधार गए थे।.
”नमस्ते बेटा!“
”चलिए!” शिवलाल ने उनसे बाईक पर बैठने का आग्रह किया.
“अरे! थोड़ा पैदल भी चलना चाहिए...”
कहते हुए वह बाईक पर सवार हो गए.
 शिवलाल न मुसकराते हुए बाईक आगे बढ़ा दी.
“चाचा! फस्र्ट शिफ्ट में फाॅल हुआ.
 कल जहाँ अपन ने सपोर्ट किया था...ठीक उससे आगे डीप साईट में.
”क्या...?“ उनके मुख से आश्चर्य, आक्रोश और संताप मिश्रित कंपकंपाता स्वर निकला. पर शीघ्र ही उन्होंने अपने आपे पर काबू पा लिया. विस्मय, भय और अफ़सोस में डूबे उन्होंने बड़ी ही मासूमियत से कहा “...यह नहीं हो सकता ? क्या तुम सही कह रहे हो... किसने बताया तुम्हें...?“ उन्हें इस अप्रत्याशित दुर्घटना की उम्मीद नहीं थी.
“रामदयाल और जगन को हलकी सी चोट आई है पर झुमकलाल को अभी तक होश नहीं आया. मैं उससे अस्पताल में मिला. बच गए दोनों. छानी का किनारा ही उनके हेलमेट पर आया. वे सतर्क थे... दौड़ पड़े. पर...’’ कहते-कहते वह रूक गया. सामने से एक बड़ी गाड़ी तेजी से उनकी ओर आ रही थी. उसने बाईक को झट किनारे कर लिया.
“पर क्या...?” सब कुछ एक साथ जान लेने की भयातुर अधीरता में वह चीख  पड़े. शिवलाल घबरा गया. उसने जो देखा सुना, जल्दी-जल्दी बताने लगा “...पर तीन ठेकेदारी मज़दूर पिसकर रह गए. पूरे चिपटा हो गए. फाॅल बहुत हुआ. पूरी छानी बैठ गई. रेस्क्यू आपरेशन चल रहा हैं. बाॅडी अभी बाहर नहीं आई. बहुत बुरा हुआ चाचा...!“ कहते हुए उसकी आँख की कोर आर्द्र हो उठी. उसे खान दुर्घटना में पिता का मुर्दा चेहरा याद आ गया. पिता, पिता नहीं लग रहे थे. क्षत-विक्षत माँस का लोंदा बन कर रह गए थे. उनका टोकन नम्बर, उनके पिता होने का दावा कर रहा था अन्यथा माँ ने तो रोते-बिलखते घर सिर पर उठा लिया था ”...यह नही हो सकता! यह शिवा के बापू हो ही नहीं सकते!“ बड़े-बूढ़ों ने मुश्किल से धैर्य बंधवाया. उस वक्त़ वह पिता की मृत्यु से दुःखी था या माँ के शोकाकुल विलाप से.. यह बात वह आज तक नहीं समझ पाया. पर यह बात वह बहुत अच्छी तरह समझ गया था ’’...एक खनिक की दुर्घटना में मृत्यु होने से उससे जुड़े परिवार के सभी सदस्य मर जाते है... पुनर्जन्म के लिए पर खनिक नहीं जन्मता फिर.... और जन्मा भी तो खनिक नहीं बनता।’’ उसने कई बार चाचा यानि मिठाईलालजी को गुनगुनाते सुना था.

“पानी  केरा  बुदबुदा,  इस मानुष की जात।
देखत ही छिप जाएगा, ज्यौं तारा परभात।।”

जीवन कभी रूकता नहीं. कुछ ही दिनों में सब कुछ सामान्य हो जाता हैं पर जाने वाला कभी नहीं लौटता. शिवलाल को अनुकम्पा नियुक्ति मिली. उसने खदान में पिता के होने के एहसास को माँ से छुपाकर रखा. प्रतिदिन कार्य के दौरान वह अपने आसपास, अपने सिर पर किन्हीं अज्ञात हाथ को प्यार और स्नेह से दुलारता महसूस करता. माँ को जब दुर्घटना के बारे में पता चला, वह बहुत रोई. उसका दुःख पीड़ित परिवार के सदस्यों के लिए खुलते दुर्गति के मार्ग को लेकर था या पिता के ना होने के पुराने घाव का हरहरा जाना... वह नहीं समझ पाया था.
उसने मिठाईलालजी से कहा...“चाचा! माँ मुझे ड्यूटी नहीं आने दे रही थी. बड़ी मुश्किल से समझा-बुझा कर आया हूँ.”
“हाँ! तुम्हें नहीं आना चाहिए था. माँ के पास रहते. उसे ढाँढ़स बंधाते.” उन्होंने  अभिभावक की तरह समझाते हुए कहा और एकदम चुप हो गए. उनका दिमाग भूगर्भ में दुर्घटना स्थल की ओर विचर रहा था. वह सोच रहे थे “...लगता है सुपरवाईज़र ने बिना सपोर्ट के ज़रूरत से ज़्यादा होल दगा दिए. घर भागने की जल्दी जो रहती हैं. कोई कुछ नहीं कहता. सब एक ही थैली के चट्टे-बट्टे. बस! मज़दूर पिस रहें हैं. राजनीति हो रही हैं पर उनका कुछ भला नहीं होता.’’ वे अपने और अपने सह-कामगारों के कत्र्तव्य और दायित्व के बारे में सोचते हुए दुःखी हो उठे.
‘‘चाचा! कुछ लफड़ा तो नहीं होगा...?‘‘
’’नहीं! ऐसा कुछ नहीं होगा...!
कद की लड़ाई है !
यूनियन अपना कद पीछे नहीं करना चाहती. कम्पनी अपने कद से बड़ा कद जो उस पर भारी पड़े, देखना पसंद नहीं करती. इस तरह संघर्ष निरन्तर बना रहता है. यूनियन होड़ में रहती, कम्पनी सतर्क.  हो सकता हैं... आज यूनियन भारी पड़ जाये. कम्पनी सुपरवाईज़र्स को फंसाने और अपने अधिकारी को उबारने की जुगत भिड़ा रही होगी।’’ वह वर्षों से देखते आ रहे हैं... अधिकारियों की ताकत हर स्थिति में अनुकूलता बना लेती हैं... हाथ बढ़ाकर, हाथ मिलाकर या सामने वाले के हाथ काट कर. पर हाथ और हाथ की उंगुली कभी अपने तरफ़ उठने नहीं देती.“ उन्होंने शिवलाल की पीठ पर हाथ रखते हुए समझाया “...तुम अभी छोटे हो. तुम्हें बहुत दिन काम करना हैं. समय आने पर सब समझ जाओगे.”
आश्चर्य और भय की लम्बी छाया उसके चेहरे पर सिमट गई. विस्मय से देह में कंपन हुआ और उसने धीरे से बाईक का ब्रेक लगा दिया. वे दोनों मेनगेट से अन्दर टोकन आॅफ़िस के पास पहुँच चुके थे.
  चारों तरफ़ गहरा सन्नाटा था. कामगार छोटे-बड़े समूह में खड़े थे और दबी जुबान में  चर्चा जारी थी. सभी डरे-सहमें. यूनियन आफ़िस के सामने अधिक भीड़ थी. टाईपराइटर की खट-खट एक ही धुन, एक ही लय में प्रवाहित हो रही थी. अधिकारियों के चेहरे पर तनाव स्पष्ट झलक रहा था. वे दौड़कर कभी टोकन आॅफ़िस में घुस जाते, कभी सर्वे, कभी पिट आफ़िस में... पर सब एक साथ, एक जगह, मैनेजर आफ़िस में ही इकट्ठे होते. वे निरीक्षण की तैयारी में जुटे थे. वे अपने बचाव में दस्तावेज़ों को प्रमाणिक और विश्वसनीय बनाने की कोशिशें कर रहे थे.
मिठाईलाल ने आफ़िस में टोकन जमा किया और टिम्बरमेन की जुट्टी की तरफ़ चल पड़े. शिवलाल ने भी बाईक स्टैन्ड किया और टोकन आफ़िस कि ओर बढ़ गया. मजदूर अन्डरग्राउन्ड जाने से डर रहे थे. वे सब मोहरे के आसपास, सतह पर ही घूम रहे थे.
खान प्रागंण में दो एम्ब्यूलंस खड़ी थी. डाक्टर्स और पैरा मेडिकल स्टाफ़ की टीम मुस्तैदी से डटी हुई थी. वे सतर्क थे. अन्डरग्राउन्ड में चल रहे रेस्क्यू आपरेशन के बाद दुर्घटनाग्रस्त खनिक के सतह पर आते ही उनका कार्य आरम्भ होना था. रेस्क्यू आपरेटर्स पिट आफ़िस के सम्पर्क में थे. जल्द ही डेड बाडी बाहर आने वाली थी.
टिम्बरमेन की जुट्टी कुछ ज़्यादा डरी सहमी थी. मिठाईलाल जुट्टी के वरीय और बुजुर्ग कामगार थे. सब उनकी बात सुनते और तहेदिल से सम्मान करते थें। इस तरह की कई दुर्घटनाएं उनके सेवावधि में घट चुकी थी. उन्होंने स्थिति की नाजुकता को भाँप लिया और अपने सह-कामगारों को ढाँढ़स बंधाते हुए कहा “... दोस्तों! यही कोयलाखान का जीवन हैं. प्रकृति के विरूद्ध आचरण, पदोन्नति के लिए प्रतिस्पर्धा, हमारी हेकडी, अपने ही बीच के कुछ कामगारों का चापलूसीपन, ईमानदारों की हाड़तोड़ पिसाई और इन सबसे ऊपर निरूद्देश्य नेतागिरी और कम्पनी की हेकटी ने हमारे मुख पर कालिक पोत दी हैं. आज कोयला धधकता नहीं... सिसकता हैं. उससे लपटें नहीं उठती, आँसूओं की धारा बहती हैं. कोयले की आग और आँच को प्रतिस्पर्धा की दौड़ ने बहुत तेज कर दिया हैं. हमीं कोयला खदानों से कोयला निकाल रहे हैं और हमीं झुलस रहे हैं।“ हल्की निःश्वास छोड़ते हुए उन्होंने पछतावे की मुद्रा में कहा... जैसे कुछ गलतियाँ उनसे हुई वैसे ही बहुत सारी हमसे भी. अपने आपको कोसते हुए वह पुनः कहने लगे “पर... पर इसके लिए काफ़ी हद तक हम सभी ज़िम्मेदार हैं. हमने, अपने छोटे-छोटे स्वार्थ के लिए अपनी सबसे बड़ी ताकत राष्ट्रीयकरण के उद्देश्य को नज़रअंदाज कर दिया. हमें फिर से एकबार सृजन की बुनियाद में जाकर अपनी ताकत को पहचानना होगा. अपनी सामाजिकता और राष्ट्रीयता के अनुसार नीति और निर्देश तय करना होगा तभी खनिक की मुक्ति सम्भव हैं अन्यथा ऐसे हादसे होते ही रहेंगे और हम मूक दर्शक बने देखते रह जाएंगे.“
उनके पास किसी स्कूल-काॅलेज की डिग्री नहीं थी. गिरते-सम्भलते, बनते-बिगड़ते, समय की पाठशाला ने उनके ज्ञान और चिन्तन को एक कामगार के कद से बहुत ऊँचा कर दिया था. उन्हें समय ने ही तराश और समय ही  उन्हें बुरे दिन दिखा रहा  पर वे टूटे नहीं थे.

“सोना, सज्जन  और  साधु  टूट जुड़े सौ बार।
कुम्भित कुम्भ कुम्हार के, एक ही धक्को दरार।।“
उनकी सोच किसी कुम्हार के घड़े की तरह कच्ची या कमजोर नहीं थी. वह कोयला खान की आँच में तपकर परिष्कृत हुए थे. उनके शब्दों में कोयले की आँच थी. शिवलाल और उनके कामगार सम्बल पाकर अपने आपको, अपने-अपने डर से मुक्त  महसूस कर रहे थे. जैसे उनके इर्द-गिर्द एक सुरक्षा कवच बन गया हो. .
एक कामगार दौड़कर उनके पास आया. चाचा! चाचा!! डेड बाडी बाहर आ गई. रेस्क्यू आपरेशन ख़त्म हुआ. सुपरवाईज़रबाबू सबको बुला रहें हैं. जुट्टी के साथ वे भी पिट आॅफ़िस की तरफ़ चल पड़े.
रेस्क्यू टीम स्ट्रेट्चर में लाई डेड बाडी को लेकर एम्ब्यूलंस में सवार हो गई. मेडिकल और पैरा मेडिकल स्टाफ़ की टीम जो मोहरे पर खड़े थी, बिना कुछ किए उसमें सवार होकर उनके पीछे  चल पड़ी. एम्ब्यूलंस अपने पीछे छोड़ गई भय और उत्तेजना की उड़ती हुई धूल. भय कामगारों में था और उत्तेजना श्रमिक संगठन के नेताओं में.
कुछेक नेता पिट आॅफ़िस में पहुँचे. वहाँ पहले से कामगार, सुपरवाईज़र्स और अधिकारी मौजूद थे. कामगारों के भूमिगत कार्यों को सुनिश्चित किया जा रहा था. इसी बीच यूनियन के नेता आक्रोश में आ गए और नारे लगाने लगे।
“ मजदूर एकता जिन्दाबाद!
“ जिन्दाबाद! “ जिन्दाबाद!!“
“ कम्पनी की तानाशाही नहीं चलेगी, नहीं चलेगी!“
“ नहीं चलेगी! नहीं चलेगी!!“
जितने आवेग में नारे लगाए जा रहे थे, उतने जोश में प्रतिवाद नहीं मिल रहा था. भय में उत्तेजना नहीं जन्मती और न विवेक काम करता. यह बात कम्पनी के अधिकारी अच्छी तरह जानते थे. इसी बात का फायदा उठाते हुए कोलियरी मैनेजर छिर्पाकर भीड़ के सामने निर्भय खड़े हो गए. धैर्य और आत्मविश्वास से भरे हुए लहज़े में उन्होंने सभी को सम्बोधित करते हुए कहा “...आज जो हुआ, बुरा हुआ. एक अकेला व्यक्ति इन दुुर्घटनाओं से नहीं लड़ सकता. आप सबका साथ चाहिए. मैं तो सदैव आपके साथ हूँ. मेरा हमेशा प्रयास रहा कि कामगारों को बाल बराबर भी खरोंच न आए पर होनी को कौन टाल सकता हैं. हम सब दुर्घटना की जाँच कर रहे हैं. निदेशक साहब की टीम स्वयं जाँच करने के लिए आ रही हैं. मृतकों के परिवार के साथ पूरा न्याय होगा. उन्हें नियमानुसार मुआवज़ा मिलेगा. आप सभी जाँच कार्यवाही में सहयोग करे. आज के समय में नौकरी पर होना जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि हैं. इसे सम्भालकर रखिए.“  संवेदना में लपेटकर उन्होंने कामगारों को एक तरह से स्पष्ट चेतावनी दे डाली और सीधे अपने आॅफ़िस में घुस गए. नेता नारे लगाते रहे. कुछ कामगार अपने डर के साथ घर लौट गए पर सभी नही.

“डर करनी, डर परम गुरू, डर पारस, डर सार।
डरत  रहै  सो  उबरे,  गाफ़िल  खावे  मार।।“

वह सोच रहे थे... मजदूर, मज़दूर में कितना अन्तर होता हैं. ठेकेदारी मजदूर खान दुर्घटना में मरा तो अफ़सोस, सिर्फ अफ़सोस. परमानेन्ट के साथ हादसा हो जाए तो वह “मरे हुए हाथी कि तरह लाखों का." कम्पनशेसन, लाईफ़ कवर, ग्रेज्युटी, पी.एफ. पेंशन और परिवार के किसी एक सदस्य को एम्प्लायमेन्ट टू डिपेन्डेन्ट के अन्तर्गत नौकरी की सुविधा, दुःख उसके परिवार को एक स्वर्णिम दुनियाँ में पहुँचा देता. दो हाथ कटने से उसके परिवार में कई सोने के हाथ लग जाते. पर ठेकेदारी मजदूर के साथ हादसा हो जाए तो परिवार के हाथ सदा-सदा के लिए कट जाते हैं...ऐसा क्यों..?
श्रमिक संगठन सार्वजनिक क्षेत्रों के मोटी तनख़्वाह पाने वाले कामगारों के बीच काम करना पसंद करते. ठेका मजदूर के पास पर्याप्त काम नहीं .काम मिला तो पर्याप्त वेतन नहीं. चन्दा वे दे नहीं सकते. बिना चंदें के यूनियन नहीं चलती. दुर्घटना को लेकर वे कितने संवेदनशील और सक्रिय हो सकते हैं...सब अच्छी तरह जानते-समझते थे. वे सब मिलकर मैनेजमेन्ट को हलाकान कर अपना उल्लू भर सीधा कलना जानते थे ...

“मन मैला, तन ऊजरा, बगुला कपटी अंग ।
वसों तो कागा भला, तन मन एकहिं रंग ।।

उजरे तन, बगुली मन और सब रंगों के झंड़ों के संगठन पर ऐसा कोई नहीं जो दुर्घटना में मरे ठेकेदारी मजदूर के परिवार को कोयला खदान में स्थाई अनुकम्पा नियुक्ति दिला सके. ग्रेज्युटी या पेंशन देने के लिए कम्पनी के खिलाफ़ लड़ सके ...फिर नारेबाज़ी करने से क्या होगा...! कागा और कोयले का रंग तो राष्ट्रीयकरण के पूर्व भी काला था और आज भी हैं. उसे क्या दोष देना. उनकी जुट्टी के सभी कामगारों के मन में कुछ इसी तरह के विचार घुमड़ रहे थे. वे सब मोहरे के पास खड़े रहे. बहुत देर तक उनके बीच एक गहरी चुप्पी पसरी रही.
खान सुरक्षा सप्ताह में कम्पनी ने नोटिस बोर्ड पर सुरक्षा से सम्बन्धित पोस्टर और खान दुर्घटना केे आंकड़े पोस्टर बना कर चस्पा किये थे. मिठाईलाल को सारे आंकड़े कंठस्थ थे. एक लम्बी निसाँस छोड़ते हुए उन्होंने अपने साथियों से एक प्रश्न किया ’’...1975 की चान्सनाला खदान दुर्घटना में 375 कामगार, इसी साल महाराष्ट्र की सिल्लेवाड़ा खदान में 10 कामगार, मध्यप्रदेश में 1923 में रावनवाड़ा कोलियरी में 16 कामगार, 1953 में माजरी कोलियरी में 11 कामगार, 1960 में दमुआ कोलियरी में 16 कामगार, 1954 में न्यूटनचिखली में 62 और 1976 सुदामाडीह कोलियरी में 43 कामगार, खान दुर्घटना का शिकार हुए थे. और आज भी सुरक्षा के नियमों की अवहेलना करने पर दुर्घटनाएं हो रही हैं. क्या खदानें बन्द हुई? लोगों ने खदान में काम करना छोड़ दिया. हमारे लिए बने और सजे रूलस् रेग्यूलेशन में समय और परिस्थिति के अनुसार कई संशोधन हुए. पर दुर्घटना नहीं रूकी..? और न रूक सकती हैं..? प्रकृति के विरूद्ध आचरण ही दुर्घटना हैं...यह हम सब अच्छी तरह जानते हैं. लेकिन हमारी लापरवाही और कत्र्तव्य के प्रति उपेक्षा भी इन दुर्घटनाओं का कारण हो सकती हैं. बदलना हैं या किसी को बदला जा सकता हैं तो सबसे पहले हमें अपने आपको बदलना होगा. बिना अपने आपको बदले नारे लगाने से क्या फायदा..? इसके बाव़जूद भी नारे लगाये जा रहे हैं.‘‘ एक लम्बी निसाँस छोड़ते हुए उन्होंने पुनः कहा ‘‘...जिस दिन हम अपने आपके के खिलाफ़ लड़ना सीख जायेंगे, व्यवस्था के खिलाफ़ अपने आप लड़ना आ जायेगा. पर हम लड़ना भूल गए हैं. हमने अपने आपको को पूरा का पूरा बाज़ार में गिरवी रख दिया. समय पर किस्त पटाने की विवशता ने हमें बेहद कमजोर कर दिया. हम पानी की तरह पैसा बहाकर अनफ़िट हाना चाहते हैं. अपने अयोग्य बच्चों को अनुकम्पा नियुक्ति दिलाने की होड़ में हम उसे नपुंसक बनाने में लगे हैं. पर इस सड़े-गले सिस्टम को बदलने के बारे में कभी नहीं सोचते. हमने इन चालीस वर्षों में कभी नहीं सोचा कि हमारे साथ काम कर रहे ठेकेदारी मजदूर का क्या होगा? हम सदैव अपने आज के बारे में सोचते रहे. यही हमारी सबसे बड़ी कमजोरी रही.‘‘ कहते-कहते वह हांफने लगे. कुछ देर वातावरण में चुप्पी छाई रही फिर उन्होंने एक दीर्घ उसाँस लेते हुए कहा...’’अंधेरा ही अंधेरा हैं...कामगारों के जीवन में. उनके हिस्से की सुबह रात में ही होती हैं। सुबह, सुबह जैसी सुबह हमारे जीवन में अवसरबाज़ों से नहीं होगी. हमें लड़ना सीखना होगा... अपनी खदान और अपने मजदूर भाईयों के लिए. तभी मजदूरों की मुक़्ित सम्भव हैं.“ एक गहरी निस्वाँस छोड़ते हुए उन्होंने अपने साथियों को आगाह कराया “...अब तुम सबको सोचना हैं, तुम्हें क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए?‘‘
समूह में गहरी निस्तब्धता छा गई. सब चुप खड़े उन्हें देखते रहे. वे समझ चुके थे. उन्होंने पुनः गहरी उसाँस लेते हुए कहा ‘‘...विरोध के लिए विरोध करने से बेहतर हैं ऐसे समय में चुप रह जाना। चुप्पी में ताकत होती हैं। मजदूरों की चुप्पी तो और अधिक ताकतवर होती हैं। ज्वालामुखी के लावे की तरह। लोग लगाते रहे कयास! हम किस ओर हैं..? मैनेजमेन्ट या यूनियन साइट..? हमें प्रतीक्षा करना चाहिए। धैर्यपूर्वक की गई प्रतीक्षा से ही सार्थक विरोध सम्भव हैं. बिना तैयारी के व्यवस्था के खिलाफ़ किया गया विरोध आत्मघाती हो सकता है...‘‘ कहते हुए वे गेट के बाहर चल पड़े। उनके पीछे कुछ मजदूर साथी भी थे. वे सब अंधेरे से उजाले की ओर बढ़ रहे थे.
🔹🔹🔹🔹🔹🔹🔹🔹🔹🔹🔹
                   
राजेश झरपुरे
सम्पर्कःनई पहाड़े काॅलोनी, जवाहर वार्ड, गुलाबरा, पो.एवम् जिला-छिन्दवाड़ा  (म.प्र.480001) मोबाइल 9425837377

प्रतिक्रियाएं
✳✳✳✳
[24/02 09:51] Pravesh: कोयला खदानों में निजीकरण से प्रभावित  मजदुर  जीवन  के शोषण का  मार्मिक चित्रण है इस कहानी में ।
 सरकारी खदानों में ठेकेदारी  द्वारा  मजदूरों की  अनियमित नियुक्ति सही है या शोषण

आप भी अपनी महत्वपूर्ण राय से अवगत कराये ।
[24/02 13:37] ‪+91 94257 11784‬: आदरणीय श्री राजेश झरपुरे जी की कहानी ,'वसो तो कागा भला' कोयला खदानों के मजदूरों के त्रासद जीवन को बयां करती लंबी किन्तु मार्मिक  कहानी है ।उसका मुख्य पात्र मिठाई लाल खदान का अनपढ किन्तु पुराना और अनुभवी कामगार है । वह खदान में घटित दुर्घटना में घायल एवं मृत मजदूरों के समाचार से दुखी और चिंतित होता है । वह सोच उठता है कि अस्थाई किस्म के ठेकेदारी मजदूरों का कोई भविष्य नहीं ।उनके मरते ही  उनका पूरा परिवार ही मर जाता है  जबकि राष्ट्रीयकरण के अन्तर्गत हुए स्थाई 'मजदूर के हाथ  कटने  से उसके परिवार  में कई सोने के हाथ लग जाते हैं ।
       प्रबंधन और व्यवस्था के इस द्वैत के प्रति मजदूर यूनियनों की निष्क्रियता एवं संवेदनहीनता से मिठाई लाल दुखी है । यूनियनें  दिखावे के लिए नारेबाजी करती हैं ।एक हादसे के संदर्भ में मजदूर अपने मुहबोले चाचा मिठाई लाल से मार्गदर्शन की मांग करते हैं और तब वह कहते हैं , ' विरोध के लिए विरोध  नहीं .......बिना तैयारी के व्यवस्था के खिलाफ किया  विरोध आत्मघाती होगा ।'
 अपढ होकर भी मिठाईलाल  एक गंभीर चिंतक हैं ।उनका सोच है कि श्रमिकों की सारी समस्याओं और दुख तकलीफों का कारण तो मूलतः वे स्वयं ही हैं ।राष्ट्रीयकरण से मिली सुरक्षा एवं स्थायित्व का गलत लाभ उठाते हुए वे एक प्रकार से प्रबंधन  के 'दामाद ' ही बन गए ।वह  सौ प्रतिशत कामचोर हो गए और ठेकेदारी मजदूर व्यवस्था आरंभ हो गई तथा ये नये प्रकार के मजदूर पिसने लगे ।
     इस तरह श्री झरपुरे जी की यह कहानी खदान मजदूरों की व्यथा कथा तो कहती ही है, श्रमिकों की समस्याओं के संदर्भ में एक व्यापक सोच भी प्रस्तुत करती है।उनकी कहानी का कथ्य एक प्रकार से अछूता ही है । हो सकता है कि कहानी को महज मनोरंजन के रूप में ग्रहण वाले पाठक उसमें बहुत रुचि न ले सकें ।किन्तु कहानी मात्र मनोरंजन  का विषय तो न ही  है ।  दुखद स्थितयो का रूपांतरण भी उसके सृजन में सन्निहित है ,।श्री राजेश झरपुरे जी कहानी उसी ओर उन्मुख है ।इस दृष्टि से और उनके रचनात्मक सौष्ठव के लिए उनका अनेकशःअभिनंदन ।आदरणीया मधुजी प्रवेश जी को प्रस्तुति के लिए धन्यवाद ।
[24/02 13:58] Braj Ji: पहले भी पढने का मौका मिला है इस कहानी को..अच्छी है
[24/02 13:59] ‪+91 99771 37809‬: कहानी नहीं यह घिनौना सच है
[24/02 14:09] Pravesh: आदरणीय जगदीश तोमर जी ,ब्रज जी ,रमाकान्त जी
आभार आपका ।
वाकई यह एक कटु और मार्मिक सच को बयां करती है । विचलित करती है यह कहानी ।


तोमर सर आप हमेशा कहानी  के  अंतस को खंगाल कर मीमांसा करते हो ।इससे कहानी का पुनः पाठ हो  जाता है ।आपके सूक्ष्म अवलोकन को प्रणाम करती हूँ ।

🙏🙏🙏
[24/02 14:17] ‪+91 86290 84484‬: बहुत ही मार्मिक और कोयला खदानों में कार्यरत खनिकों की दशा का चित्रण कहानी में बड़ी साफगोई से किया गया है। ऐक उम्दा कहानी देने के लिए आप सभी का बहुत-बहुत धन्यवाद।
[24/02 16:13] प्रज्ञा रोहिणी: पहले भी पढ़ी ये कहानी फिर से बधाई राजेश जी। कोयला खदानों के इस सच से नई आर्थिक परिस्थिति के अनेक सच उजागर होते हैं। मुझे लगता है आपका उपन्यास
कबीरा आप ठगाइयेगा को आपने इसके बाद ही रचा है।
मित्रो राजेश जी का एक सार्थक प्रयास है ये उपन्यास।
[24/02 18:47] ‪+91 98260 44741‬: बहुत अच्छी कहानी। कोयला खदान, खदान में काम करने वाले मजदूर, उनका जीवन, उनकी कठिनाइयां सब के बारे में पता चला। कहाँनी अंत तक बाँधे रखती है। आजकल ऐसी यथार्थवादी कहानी बहुत कम पढ़ने को मिलती हैं। मजदूरों के शोषण का मार्मिक चित्रण। समाज के एक वर्ग के जीवन के हर पहलु से परिचय कराती कथा। बहुत बहुत आभार मंच का।
[24/02 19:08] Pravesh: विनीता जी ,शिवानी धन्यवाद

 कहाँनी में मजदूरो काे मज़बूरी में  खदानों में काम करने का  बहुत ही बारीकी से वर्णन किया है लेखक ने ।या तो उनका इस क्षेत्र से बहुत करीबी सरोकार है या बहुत गहरी पड़ताल की है ।
जो मजदुर अपना सारा जीवन इन खदानों में झोंक देते है ,यदि किसी दुर्घटना में अपाहिज हो जाय या मृत्यु हो जाय तो अस्थायी नियुक्ति होने के कारण उनके परिवार को व्यवस्थापक से सिर्फ शब्दों की सहानुभूति ही मिलती है ।
घर के मुखिया के हताहत हो जाने के बाद कोई अनुकम्पा नहीं ,pf नही ।क्या हो फिर घर के सदस्यों का ।
बहुत ही साफ़ आइना रखा है कहानी में  सरकारी और गैरसरकारी तंत्र की मिली भगत का ।
[24/02 19:21] Kavita Varma: खदान का काला सच और सरकारी नौकरी की स्वार्थी मानसिकता दर्शाती अच्छी कहानी । ये मानसिकता कमोबेश हर सरकारी महकमे में है और इसीलिये वर्क कल्चर कमजोर है संविदा नियुक्ति के द्वारा सरकार भी शोषण पर उतर आई है पर स्थाई नियुक्ति प्राप्त लोग मैं से आगे सोचना ही नही चाहते । बधाई राजेश जी आईना दिखाती इस कहानी के लिये।
[24/02 19:58] Varhsa Raval: राजेश जी बेहतरीन कहानी,कोयला खदान के अंदर चलने वाली गतिविधियों को बहुत सूक्ष्म अध्धयन के बाद चित्रित किया गया है....आपको बधाइयाँ🙏
[24/02 20:07] Pravesh: कोयला खानों का राष्ट्रीयकरण समाज में व्याप्त असमानता और सरमायेदारी व्यवस्था के विरोध में किया गया था ।1 मई 1972 को  कोकिग कोल कम्पनियों और 1 मई  1973 को नाॅन कोल कम्पनियों का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया था । आज कम्पनी  महारत्न कम्पनी से अलंकृत है पर रोजगार नही । पिछले तीस साल से कोयला खदानों  में अकुशल और अर्ध्द कुशल कामगार की भर्ती नहीं हुई जबकि खान का सत्तर प्रतिशत से अधिक काम इसी तरह के कामगार करते है पर सब ठेकेदारी व्यवस्था के तहत ।

राष्ट्रीयकरण को पूरे पचास साल भी नहीं हुए और सरमायेदारी व्यवस्था  अपना रूप बदलकर   पुःन इसे अपने शिकंजे में जकड़ती जा रही है ।क्यो और कैसे जैसी परिस्थितियों से अवगत कराती कहानी हमें सोचने के लिए विवश कर देती ।
[24/02 20:35] Aasha Pande Manch: बहुत अच्छी कहानी.कोयला खदानों में मजदूर की दशा का सटीक चित्रण किया है राजेश जी ने.बधाई
[24/02 20:40] Rachana Groaver: आज के शोषण और कल के शोषण में कोई अंतर नहीं
[24/02 20:41] ‪+91 94249 90643‬: मन मैला ,तन ऊजरा ,बगुला कपटी अंग
वासों तो कागा भला ,तन -मन ऐकहि  रंग
कहानी का शीर्षक है वासो तो कागा भला .....कहानी सच मुच ऐसे बगुला देही संगठनो के असली चेहरे बेनकाब करती है जो दावा तो ठेके पर काम कर रहे मजदूरों के हित का करते हैं लेकिन उनका असली मकसद अपना उल्लू सीधा करना होता है .
कहानी कोयला खानों के कामगारों के जीवन की एकरसता और जुझारू पन सॆ भी पाठकों को रूबरू करवाती है कि उनका जीवन कितना श्रम साध्य है जिसमें दिन और रात ने अपने मानी खो दिये हैं ....फिर भी अपने हिस्से के एक मुट्ठी आसमान की तलाश में वो संघर्ष रत रहता हैअथक , अनवरत .....
[24/02 20:43] Padma Ji: मजदूरों की मनोदशा , उनकी व्यथा और मजदूरों के अधिकारों के प्रति यूनियन की निष्क्रियता आदि का बहुत सुन्दर चित्रण किया है। कोयला खादानो पर जो साहित्य लिखा गया है उनमे यह बेजोड़ कहानी है। भाषा ,कथ्य और शिल्प सभी दृष्टि से उत्कृष्ट कहानी है। बधाई राजेश जी ।धन्यवाद मधु
[24/02 21:24] ‪+91 99313 45882‬: मुझे तो राजेश जी की यह कहानी " वसो तो कागा भला " एक उच्च स्तरीय कहानी के साथ ही एक उच्च स्तरीय विमर्श लगा ! कोयला खदानों के मजदूरों के जीवन-वृत्त पर रची बसी यह कहानी खदानों के राष्ट्रीयकरण , फिर उसके ख़त्म होकर बाजार व्यवस्था के तहत ठेकेदारी मजदूरों के श्रम के शोषण की कथा-व्यथा है ! मिठाईलाल जी के माध्यम से कथाकार ने जिस विमर्श-मूलक कथा को बड़ी खुबसुरती से रचा है उसपर कबीर-दर्शन की छाया है !
आज जब बाज़ारवाद आवारा पूंजी के जरिए अपने ख़ूनी पंजे पसारता ही जा रहा है , राजेश जी की यह कहानी हमें बहुत कुछ सोचने समझने का सामर्थ देती है !
कथ्य और शिल्प के लिहाज से भी यह कहानी एक रोचक और पठनीय कहानी है !
राजेश जी को इस कहानी के लिए बहुत बहुत बधाई !
[24/02 21:34] ‪+91 94249 90643‬: मुझे भी ऐसा लगा सतही तौर पर कहानी जो कथा कह रही है ,वो  रुहानी तौर पर बड़े ही गूढ अर्थ लिये हुए है .
[24/02 21:44] ‪+91 94116 56956‬: संभवतः मेरे पाठ की सीमायें हो या अज्ञानता पर मुझे इस कहानी में कहानी के तत्व कम और निबंध के तत्व अधिक लगे । निसंदेह कहानी का विषय और कथ्य कई मुद्दों को समाहित करता है परंतु लेखक सपाट बयान जारी करने के मूड में दिखता प्रतीत होता है । शायद इतना वृहद् विषय और मुद्दे  और बड़े कैनवास की मांग रखते हो ।
[24/02 21:58] Pravesh: इस तरह के विषय की कहनियों के लिए. कहानी की सर्वमान्य सीमाओ का अतिक्रमण भी करना पड़े तो स्वीकार किया जा सकता है ।कम से कम  हम  उन परिस्थितियों को महसूस तो कर सकते है कि nationalizatii को पाने और लगातार खोते जाने के क्या परिणाम समाज में परिलक्षित हो रहे है ।

 बाकी मंच के सुधिजन अपनी राय दे ।
[24/02 22:06] Pravesh: Nationalization*
[24/02 22:08] ‪+91 94258 70973‬: सुरेन जी के विचार से पूरी तरह सहपत हू'
[24/02 22:09] Rakesh Bihari Ji: कोयला खदानों में नियमित कर्मचारी बनाम ठेका मजदूरों की भिन्न स्थितियों और उनकी त्रासदियों पर बात होनी चाहिए। यह एक जरूरी मुद्दा है। लेकिन एक कहानी पर बात करते हुए सिर्फ विषय तक सीमित नहीं हुआ जा सकता है। कहानी यथार्थ की विधा है, बिना यथार्थ की जमीन से जुड़े कहानियाँ नहीं लिखी जा सकतीं। यहाँ तक कि शुद्ध कलावादी कहानियाँ भी तभी सफल होती हैं जब उनकी नाल यथार्थ की जमीन में गड़ी हो। लेकिन क्या कहानी सिर्फ यथार्थ है?  नहीं। कहानी हकीकत और फ़साने  का एक संतुलित सम्मिश्रण होती है। यथार्थ को कहानी में बदलने के लिए एक ख़ास किस्म की कलात्मक कल्पनाशीलता की जरूरत होती है। मैं आप मित्रों से असहमत होते हुए यह कहने की इजाजत चाहता हूँ कि आज की कहानी में इस कलात्मक कल्पनाशीलता का घोर आभाव है। यथार्थ को जस का तस रख देने के कारण एक कहानी के रूप में आज की कहानी कोई ख़ास प्रभाव नहीं छोड़ती। एक मुद्दे के रूप में इस विषय की अनिवार्यता से भला किसे इंकार होगा लेकिन कहानी को कहानी तो होना ही चाहिए। यह कहानी न सिर्फ कहानी कला से बहुत दूर रह जाती है बल्कि कई बार एकालाप, भाषण या आलेख होने का अहसास भी देती है। कहानी अपने वर्तमान स्वरुप में कहानी कम एक अच्छी कहानी का कच्चा माल ज्यादा लगती है।
[24/02 22:19] राजेश झरपुरे जी: ।।।
सभी मित्रो का हार्दिक शुक्रिया । आप सभी ने बहुमूल्य समय कहानी को दिया और प्रतिक्रिया  से अवगत कराया । शुक्रिया आद0 तोमरजी, रमाकान्त श्रीवास्तव जी, मधु सक्सेना जी.प्रवेशजी.भुपेन्द्र कौरजी, ब्रजभाई, विनय उपाध्याय जी, प्रज्ञाजी. शिवानी शर्मा जी, विनिता राहुरीकरजी.कविता वर्माजी, वर्षा रावलजी,आशा पाण्येयजी; रचना ग्रोवरजी, पूर्णिमाजी, पद्मा शर्माजी, शेखर सावंतजी, सुरेन्द्रजी,  त्रिवेदीजी, राकेश बिहारी जी। आपकी टिप्पणी  से प्रोत्साहन मिला और मार्गदर्शन भी ।

यह कहानी पहली बार ही किसी  व्हाहट्स एप समूह में यहां लगी है । कोयला खान  की पृष्ठ भूमि पर अन्य कहानी अवश्य यहां लगी थी ।

आप सब का पुनः आभार  ।
[24/02 22:43] ‪+91 99313 45882‬: जिन मित्रों को इस कहानी में कहानी कम और निबंध ज्यादा नज़र आया उसका एक कारण है ! कारण ये है कि इस विषय पर निबंध ज्यादा लिखे गए हैं इसलिए कहानी पढ़ते वक़्त उन निबंधों की धूमिल यादें ताज़ा हो आती हैं ! दरअसल इस कहानी का कथ्य एक वृहत उपन्यास की मांग करता है !
लेकिन मुझे ऐसा प्रतीत नहीं हुआ कि इस कहानी में कहानीपन की कमी है !

इस कहानी के विषय-वस्तु को हम जीवनी के रूप में भी पढ़ सकते हैं--बुजुर्ग लेखिका रमणिका गुप्ता जी की चर्चित पुस्तक " हादसे " में ! द्रष्टव्य है कि रमणिका जी का आधा जीवन धनवाद के कोयला खदानों के इर्द-गिर्द बीता है और वे कोयला खदान मजदूर यूनियन की नेता भी रह चुकी हैं ! उन्होंने बड़ी खूबसूरती से खदान मजदूरों की जिंदगी और ट्रेड यूनियन की राजनीति पर हादसे में प्रकाश डाला है ! वैसे इस विषय पर फ़िल्म भी बन चुकी है !
[24/02 22:54] Rajnarayan Bohare: उपन्यास
वो भी
कबिरा... जैसा छोटा नही
बड़ा सा उपन्यास रचने का हौसला बांधिए राजेश जी

[24/02 22:57] ‪+91 94116 56956‬: जी सही कहा आपने , पर एक डॉक्यूमेंट्री को आप फीचर फ़िल्म नहीं कह सकते । कहानी में प्रायः पात्र और परिस्तिथियाँ अपने बयां जारी करते है  । यहां इसका आभाव दिखा । वही मैंने भी कहा कि बड़ा कैनवास मांगता है इतना बड़ा मुद्दा ।
[24/02 23:37] Mamta Bajpai: व्यवस्था के चक्रव्यूह में फंसे
श्रमिकों की अंतर्व्यथा को रेखांकित करती  सारगर्भित कहानी मनके गरे तक पहुची
बधाई आभार

Friday, February 26, 2016


 वह आखिरी चुबंन

संजीव चन्दन



इसे मौत कह कर उनके मरने की इस अदा का अपमान नहीं किया जा सकता.वे प्रस्थान कर गई एक दूसरीभूमिका की ओर.... महाप्रयाण.......! समय इतना लोकतान्त्रिक जरूर हो गया है कि शंकराचार्योंऔर अपने कर्मकांडों के मकडजाल में फंसे कुछ पुरोहितनुमा जीवों और उनके प्रति आस्थावान आस्तिकों,ढोंगियों को छोड़कर एक स्त्री की मौत को महाप्रयाण कहने पर कोई आपत्ति करने नहीं आएगा.वैसे भी महाप्रयाण है यह,पुरुष- आरक्षित मोक्ष नहीं.क्या कोई अपनीमौत को भी इतना उत्सवपूर्ण बना सकता है ! यह तो एक दूसरी यात्रा की शुरुआत के पूर्व का ही उत्सव हो सकता था !! वे महाप्रयाण कर गई.............आजीवन यात्री ही तो रहीं वे,एक पड़ाव से दूसरेपड़ाव तक,कहीं एक-दो पल की झपकी ली तो कहीं सालो साल स्थिर रहीं,लेकिन अगले पड़ाव पर पहुँच कर पीछे छूट गए का अफ़सोस नहीं करती,हाँपीछे छूट गए एक-एक लम्हे की कसीदाकारी उनकी स्मृतियों पर अंकित हैं- यादों के बेल-बूटे !! रात इस डाइनिंग टेबल पर अपना आखिरी तशरीफ रखनेके पहले एक- एक लम्हे में दर्ज होने की अपनी ख्वाहिश पूरी करती रहीं वे.सुबह तडके से ही रसोई मेंदेखकर मैंने आश्चर्य से उन्हें देखा,यह उनका काम नहीं था,मैं जब से उनके पास आई थी,यह काम प्रायः मालदह से साथ आई‘दुलारी’के जिम्मे था या कुछ अंतराल पर मेरे,जब दुलारी की तबियत ठीक नहीं होती या फिर जब मैं खुद ही अपना मनपसंद बनाना चाहती.‘तुम फटाफट तैयार हो लो,आज तफरी करते हैं,लोधीगार्डन में धूप सेकेंगे और वहीं लंच करेंगे,’उन्होंने मेरे आश्चर्य को भांपते हुए मुझसे कहा.हम दिन भर घूमते रहे,लोधी गार्डन में लंच,खान मार्केट में खरीददारी के नाम पर एक- दो किताबें और कुछ अन्तः वस्त्र.मंडी हाउस में कॉफी और रोहिताश्व के साथ नाटक,जिसने हमें अपने ऑफिस के बाद हमें ज्वाइन कर लिया था.“तुम दोनों घर चलो मैं एक-दो गप्पे मार कर आती हूँ,प्रेस क्लब भी जाउंगी,गलासूख रहा है,’श्री राम सेंटर में‘आषाढ़ का एक दिन‘देखने के बाद उन्होंने कहा.पता नहीं वे क्या चाह रही थी,हमें एकांत देना या फिर स्वयं के लिए एकांत.रोहित ने ऑटो रुकवायातो उसे उन्होंने अपने लिए रोकते हुए अपनी गाड़ी की चाभी हमें दे दी, ‘तुम दोनों इससे जाओ,’उनके आदेशात्मक स्वर से हम संचालित हो गए.उनके देर रात लौटने की आवाज तो हमने सुनी जरूर लेकिन अपने बेडरूम में अपने पहले अभिसार के आगोश से हममें से कोई नहीं उठा और शायद वे वहींडाइनिंग परबैठी-बैठी एक अंतहीन यात्रा पर निकल पड़ीं,उन्होंने कुछ खाया नहीं था,खाना वैसे ही पडा था.हाँ,व्हिस्की की बोतल,ग्लास,प्लेट में कुछ काजू जरूर थे वहाँ.हम यदि अपने प्रेम में खलल डाल कर उनकी खटपट की आवाज से बाहर आये होते तो शायद हम उनके महाप्रयाण के साक्षी होते.हमें यहाँ न होने का अफ़सोस तो जरुर है लेकिन वैसा दुःख नहीं जो‘मोहनदास’को अपने पिता की मृत्यु के समय अपनी पत्नी के पास होने का था.यह हमारी पहली मिलन थी और वे स्वयं भी हमारे इस अभिसार मे बाधा से दुखी होतीं,उनकी आत्मा को शांति नहीं मिलती या फिर वे महाप्रयाण को प्रस्थित नहीं होतीं,ऐसा मुझे ही नहीं आपको भी लगेगा,जब आप‘हमारी दीदी’की कहानी जानेंगे.फिलहाल मुझे रोना आ रहा है और मुझे‘निगमबोध घाट’भी जाना है,लोगों को सूचित करना है,लौट कर दीदी और अपनी कहानी आपको बताउंगी.70की हो रही अपनी दीदी को दुल्हन की तरह सजाया था मैंने.उन्हें नहलाते वक्त उनके रोमकूपों से निकलने वाली उर्जा से मैं संचारित होती रही.उनके स्तन.... मुझे रोना आ रहा था....काश मैं फिर से बच्ची हो जाती... उनसे लिपट पाती... उनसे उनके अमृत सोख पाती... किसी देव मूर्ति की तरह मैंने नहलाया उन्हें.दीदी कहीं भी निकलने से पहले अपने स्तनों पर कप्स डालकर उसे आकर्षक बनातीं, 70साल की अपनी दीदीकी इस रुमानियत को,खुद से उनके मुहब्बत को,मैंने आज भी यथावत रखा,अंतिम यात्रा की उनकी तैयारी ठीक वैसी ही की मैंने जैसा वे स्वयं करती.वे अपनीबहन,बेटी,दोस्त के इस सौंदर्यबोध पर जरूर प्रसन्न हुई होंगी अन्यथाजब तक वे मेरे साथ रहीं सौंदर्य के प्रति मेरी बेरुखी पर मुझे कोसती ही रही थीं.पर आज क्या मैंने उनसे सीखकर वह सब किया या स्त्रियों के भीतर सौंदर्य कोई जन्मजात प्रवृति होती है,जोमेरे भीतर मैंने दबा रखा था!‘निगमबोध घाट’पर मैं ज्यादा देर रुकी नहीं,रुक भी नहीं सकती थी.मैं दीदी को जलते देख नहीं सकती थी.मुखाग्नि मुझे ही देनी थी इसलिए मैं घाट तक गई भी अन्यथा मैंने घर से ही उन्हेंअलविदा कहा होता.उनका बेटा स्टेट्स में अपनी कारोबारी व्यस्तता के बीच आने में असमर्थता जाहिर कर गया,‘मैं बहुत दुखी हूँ,तुम नहीं समझसकती कि मैं मम्मी को कितना मिस करूँगा,आय विलट्राय टू रीच सून.परन्तु आप सारे रिचुअल्स में कोई कमी नहीं आने देना.आय विल डिपोजिट द अमाउंट.’वह हर महीने उनके लिए एक निश्चित राशिभेजा करता था.दैवो न जानाति कुतो मनुष्यः.!!मेरे दादा जी अक्सर कहा करते थे, ‘त्रिया चरित्रं पुरुषस्य भाग्यम दैवो न जानति कुतो मनुष्यः.’दीदी में मेरी रूचि उनके विरोधियों के द्वारा उनके लिए अक्सर दुहराए जाने वाले जुमले के कारण ही बनी थी,जो उनके बारे में बातें करते हुए‘त्रिया चरित्रं’पर खत्म होती.उनके कई प्रेम संबंधों की चर्चा तो मैं अपने घर पर अपने दादा जी के मित्र'पाठक दादा'से सुनरखी थी.दीदी की आशिकी के एक पात्रवे स्वयं भी थे.दीदी के दिल में उन्होंने एक नहीं पांच जोड़ बांसुरी तब बजाई थी जब दीदी श्रमिक आन्दोलनों की प्रखर नेता हुई करती थीं और वे उनके राज्य में एक बड़े श्रम अधिकारी.जब गीतकार दादा ने'स्त्रियों की यौनिकता और परम्परा'पर मेरे शोध के विषय में सुना तो उन्होंने दीदी के जीवन को एक केस स्टडी के रूप में पढ़ने के लिए प्रेरित किया और मैं उनकी सिफारिश पर ही अपने छात्रावास से दीदी के यहाँजाने लगी,कई-कई दिन तक उनकेसाथ रहने भी लगी.दादी की उम्र की मेरी दीदी सिर्फ दीदी हो सकती थीं या फिर छोटी बहन.सही मायनों में उनकी रुचियों और मेरी रूचि के हिसाब से वे मेरी छोटी बहन जैसी ही थीं.इससे पहले कि मैं दीदी की कहानी आपको सुनाऊं यह स्पष्ट कर दूं कि आपका कोई भी प्रयास उनकी पहचान करने का व्यर्थ जायेगा,आप उन्हें कहीं भी न तलाशें,कर्पूरी ठाकुर के मंत्रीमंडल,बिहार विधानसभा,लोकसभा,श्रमिक आन्दोलनों में,कहीं भी नहीं,जहाँ-जहाँ आपको उनके जीवन की कथा मेरी कहानी में मिलेगी,वहाँ वे नहीं मिलेंगी.आपकी उत्सुकता को थोडा शांत करने के लिए मैं अपना पता बता दूं,जहाँ से मैं आपको कहानी कह रही हूँ,जहाँ अभी- अभी दीदी को महाप्रयाण के लिए विदा कर लौटी हूँ और जहां से अगले चार दिनों में मैं अपने छात्रावास लौट जाउंगी.मैंअभी रायसीना हिल्स और अरावली हिल्स के बीच कहीं किसी घर में हूँ,वहीँ उसी डाइनिंग टेबल पर सर रख कर बैठी हूँ,जहाँ दीदी ने पिछली रात बिताई थी,रोहित हमारे लिए चाय बना रहा है,चाय के बाद वहअपने ऑफिस चला जायेगा,उसने आधे दिन की ही छुट्टी ले रखी थी.हाँ,एक बात और मेरे छात्रावास का पता आप जान कर भी क्या करेंगे,जब भी मिलना हो तो आ जाइये,गंगा ढाबे पर मैं इत्मीनान से मिल जाउंगी.मैं देख रहा हूँ कि आप मन ही मन मुस्कुरा रहे होंगे कि‘बच्चू अब बचेगी कहाँ‘गंगा ढाबे पर मिलती हो तो रहती होगी वहीँ,कहीं गंगा,गोदावरी,ताप्ती या बहुत से बहुत साबरमती छात्रावास में,कथावाचक का ठौर ठिकाना मिल गयातो कथा की पात्र को भी तलाश लेंगे.'मैं आपको अभी ही सचेत कर दूं कि मेरी कहानी को ठोस यथार्थ की कसौटी पर कसकर आपको कुछ भी हासिल नहीं होगा,आप क्या लैला का पता लगा पाए हैं,मजनू का ठौर जाना है क्या आपने,न सीरी के घर कापता होगा आपको न फरहाद का ठिकाना !लेकिन उनकी कहानी,कहानी तो इतिहास की इबारत सी मजबूत हमारी और आपकी पीढ़ियों से चली आ रही हकीकत है.ऐसी ही हकीकत है दीदी की कहानी,मेरे वजूद मेंदर्ज कहानी.....हाँ,इतना यथार्थ इस कथा में जरूर है जितनामेरे गंगा ढाबा पर होने,गंगा,गोदावरी,ताप्तीया साबरमती छात्रावास में कहीं रहने,रायसीना हिल्स और अरावली हिल्स के बीच कहीं किसी घर से मेरे कहानी कहने से या फिरदीदी के कर्पूरी ठाकुर के मंत्रीमंडल,बिहार विधानसभा,लोकसभा,श्रमिक आन्दोलन आदि किसी राजनीतिक-आराजनीतिक गतिविधि में शामिल होने से यथार्थ बनता है,या फिर......जितना यथार्थ लड़कियों के लिए समानता-स्वतंत्रता के साथ रहने और जीने के सबसे मुफीद सहशिक्षा केंद्र माने जाने वाले जे.एन.यू के पेरियार,कावेरी,झेलम,ब्रह्मपुत्र या ऐसे ही किसी छात्रावास में सहपाठी लड़की की ब्लू फिल्म बनने-बनानेकी घटना है .....उतना यथार्थ जितना जे.एन यू के खंड-खंड,शिला- शिला में,चेतन-अचेतन मेंरचे -बसे‘विद्रोही’के द्वारा आसमान मेंधान के रोपे गए पौधे.खूबसूरत यथार्थ, ‘मीन सी आँखों वाली’,गिलहरी की सी कोमलता वाली नन्ही लड़की का यथार्थ,जिसे उसके पिता ने पुकारा‘मीनाक्षी और माँ नेदुलार से जिसे‘रूही’बुलाया.उसी लड़की से,यानी दीदी से,यानी70साल की मेरी कथानायिका से,मेरे सवाल भी उतने ही बड़े यथार्थ के हिस्से हैं:‘दीदी आप इतनी कहानियों,इतनी फंतासियों,इतने गप्पों,इतने ठहाकों,इतनी फुसफुसाहटो में कैसे दर्ज होती चली गईं!’शीताक्षी-उन्हें मिनाक्षी से अलग करने वाला संबोधन! उनके व्यक्तित्व के अनूठेपन को गढ़नेके लिए मूर्तिकार का पहला छेनी–स्पर्श!! उनकेसपनो को अर्थ देने वाली पहली तरंगें!!! पहली बार अपने क्षेत्र और परिवेश से पहली ग्रेजुएट होती मीनाक्षी के कानों में आज भी उस वाक्य की गूंज अजीब सी फुसफुसाहटके साथ स्पर्श करती है, “तुम्हारी आँखों में बड़ी शीतलता है,तुम्हारा नाम इनकी बाह्यमीन-सुंदरता की जगह इनकी आतंरिक शीतलता को अभियक्त करना चाहिए था --मीनाक्षी से ज्यादा सटीक है शीताक्षी-क्वारकी पूर्णिमा सीठंढक वाली इन आँखों के लिए.’मीनक्षी- यानी शीताक्षी पहली बार आईने में अपनी आँखों में डूबती चली गई,पहली बार लड़की होने का अहसास पोर-पोर में थिरकने लगा.‘हाँ,इसके पहले तक तो मेरे पिता ने,माँ ने,भाइयों ने कभी यह अहसास होने ही नहीं दिया कि मैं लड़की होने या अपने महीने के खास दिनों के कारण लडको से अलहदा हूँ,या उनसे कमतर हूँ - उन दिनों लड़की को कालेज तक भेजना कोई अचानक से लिया गया निर्णय नहीं हो सकता था.मैं सुन्दर थी यह मुझे पता था,परन्तु उस संबोधन के पहले किसी ने मेरी सुंदरता को मेरे सामने आईने में उतार देने का काम नहीं किया था और मैं तब तक सौभाग्यशाली भी थी कि किसी ने,मेरे आस-पास से या मेरे घर के भीतर,कभी भी लड़की होने का बलात अहसास भी नहीं कराया था.’‘वह था कौन दीदी?'‘मेरे बड़े भाई का दोस्त! उस दिन के बाद मैं मीनाक्षी रह नहीं गई थी,मैं शीताक्षी हो गई थी.वह बहुत अच्छा वक्ता था- मेरे भाई के साथ उसकी बातें,जो अक्सर राजनीतिक होतीं,मैं मंत्रमुग्ध सी सुनती थी,उनके बीच घंटो बैठती--नेहरु की आलोचना करती हुई,समाजवाद केसपने देखते हुई,वर्ग संघर्ष में यकीन करती हुई और सर्वहारा की सत्ता कीयूटोपिया रचती मैं भी उनके साथ मजदूरों के संघर्ष में शामिल होने लगी.’‘यह तो विचित्र प्रतिक्रिया थी,आपको तो उस संबोधन के बाद सपनो के जिन रंगीन तरंगों में संचरित होना था उससे अलग आप यथार्थ के संघर्ष की और उन्मुख थी ...’‘हाँ.ऐसा था और ऐसा नहीं भी.मेरी आँखों की क्वार पूर्णिमा में शीतलता पाने वाला मेरा नायक दो समानांतर भूमिकाओंमें था,मुझे एक नई राह पर खींच रहा था और मेरे सपनो में,मेरे क्वारे अहसास पर दस्तक भी दे रहा था.फिर एक दिन,जब घर में,कमरे में,मैं और वह अकेले ही थे,वह भाई की प्रतीक्षा कर रहे थे और घर के लोग बाहर,मैंने कमरे की बत्ती बुझाई और उनके पांवों के पास बैठ कर मैंने उनके हाथों को अपने हाथ में लेकर कहना शुरू किया कि.... मैं पूरी रौशनी में,आँखों में आँखे डाल कर जो बात नहीं कह सकती,वह इस नीम अँधेरे में कहना चाहती हूँ कि मैं आपसे ......कि तभी मेरे हाथ को झटका लगा और कमरेमें बत्ती जल गई!’‘क्या भाई आ गए थे?’‘नहीं,उनके भीतर का भाई प्रबलहो गया था.  और उन्होंने मेरे गालों को अपनी दोनों हथेलियों में समेटकर मेरी आँखों में आँखे डालकर कहा कि वे मेरे भाई के दोस्त हैं,कि मुझे ऐसे ख्याल भी अपने मन में नहीं लाने चाहिए,कि आँखों में क्वार की पूर्णिमा से उनका मतलब वह सब नहीं था,जो मैं समझ बैठी,कि स्त्री पुरुष के आदिम रिश्तों को समाज ने जिन रिश्तों के भीतर सुरक्षित किया है उसे बनाये रखना हमारा कर्तव्य है और न जाने क्या,क्या.... हाँ यह भी कि वे नैतिक समाजवाद चाहते हैं,वैसा समाज नहीं,जहाँ स्त्री और पुरुष दो देह मात्र हों......’इसके बाद दीदी ने बताया कि उन्हें उस वक्त‘एक भयभीत,भीरु जिम्मेवारी से भागने वाला पुरुष सामने दिखा. लेकिन कामना,जिसका सोता तब फूटा था,उसे बहने से कौन रोकनेवाला था!’राजनीतिक गतिविधियों में उन दिनों शामिल महिलाएं शहर के खास लोगों में शामिल होतीं,गोष्ठियों में,बहसों में,आन्दोलनों में,महिला चेहरे कम ही थे,कुल तीन,जिनमें एक दीदी स्वयं थीं.मजदूरों के आन्दोलनों में शामिल मजदूर महिलाएं भी कुछ खास संख्या में नहीं होती.दीदी सबसे अलग थीं -सबसे अलहदा.कामनाओंके सोते ने उन्हें गढना शुरू किया था.अपनी पढ़ाई की व्यस्तता,बहसों,गोष्ठियों में भागीदारी,घर में गाँधीवादी पिता,मार्क्सवादी भाई के दोस्तों का ख्याल,इन सबकेबीच अपने लिए समय निकालती थीं वे.मुख्यमंत्रीकी ट्रेड युनिअन के नेताओं के साथ बैठक में भाग लेने का अवसर उन्हें महिला प्रतिनिधि के तौर पर मिला.मुख्यमंत्री ने नेताओं से कहा, ‘वहाँ संसद मेंतारकेश्वरी जी बैठती हैं तो संसद का सौंदर्य बढ़ जाता है वैसे सौंदर्य से हमारा विधान भवन ही क्यों महरूम हो,आप कहें तो इन्हें (दीदी को) विधान परिषद में बुला लिया जाए,’कहकर मुख्यमंत्री ने ठहाका लगया और उपस्थित नेताओंके ठहाके कोरस बन कर मुख्यमंत्री कक्ष में गूंज गए.दीदी घटनाओं का कोलाज बनाती चली गई थीं,उन्हें जब कोई संवेदित करता तो घटनाओं के कोलाज सामने होते.26मई1964को हुई थी मुलाकात मुख्यमंत्री से,जिसके बाद प्रतिनिधिमंडल को नेतृत्व दे रहे कॉमरेड के साथ दीदी रिक्शे पर निकली,वे मुलाकात की सफलता से उत्साहित थे,रिक्शे वाले को गाँधी मैदान चलनेको कहा.रास्ते में उन्होंने पूछा,‘तारकेश्वरी जी को देखा है कभी तुमने,सही फरमा रहे थे जनाब मुख्यमंत्री,नेहरु जैसे सौंदर्य और बुद्धिमता के पुजारी भी कायल हैं उनके.. दीदी तारकेश्वरी सिन्हा के शायराना फलसफे मेंजोशीले भाषणों के विषय में तब तक सुन चुकी थी और नेहरु के सौंदर्य प्रेम,मुग़ल गार्डन में लेडी माउंट बेटन के साथ उनकी मुलाकातें मिथकीय गल्पों के साथ प्रेमी युगलों में रोमांच पैदा करती रही थीं.‘तुम हमारे बीच वामपंथी तारकेश्वरी सिन्हा हो,’कामरेड ने दीदी की आँखों में अर्थपूर्ण दृष्टि डाली.वैसी किसी भी दृष्टि या कम्प्लीमेंट के प्रति अबतक (भाई की घटना के बाद से) वे सावधान रहने लगी थीं,लेकिन कामरेड की लरजती आवाज के साथ उनकी दृष्टि से‘शीताक्षी’ने उनके भीतर फिर करवट ली.गांधी मैदान में बातें करते हुए,अशोकराजपथ पर विचरते हुए वे नेहरु के बाद कौन,सी.पी.आई-सी.पी.आई (एम) के विवादों और नई वामपंथी पार्टी के जन्म,दांगे-नम्बूदरीपाद के विचारभेद,रुसी और चीनी मार्क्सवाद सहित कईपहलुओं पर बातें करते रहे,इन राजनीतिक वियाबानों से गुजरते हुए वे राजकपूर-नरगिस केअफसानों के तार भी छेड़ रहे थे.बातें तैर रही थीं,राजनीति,फिल्म,प्रेम,समाज,उसकी बंदिशें,और कालिदास.हाँ कामरेड इन दिनों कालिदास के अभिज्ञान शाकुंतलम को खत्म कर कुमारसंभवम पढ़ रहे थे.कामरेड के विचार‘भाई के दोस्त’से अलग थे,वे स्त्री-पुरुष के आदिम रिश्तों के हिमायती थे,सामजिक सम्बन्ध उन्हें कृत्रिम संजाल नजर आते थे.बातों का छोर पटना सिटी के उनके किराये के मकान में खत्म हुआ.दीदी जब उस मकान से बाहर निकलीं तो उनके साथ मीनाक्षी साथ निकली,उससे शीताक्षी भी घुलीमिली थी,मीनाक्षी और शीताक्षी के अंतरद्वंद्व आपस में गुथंगुथ थे.कामरेड उन्हें छोड़ने उनके घर तक गए,रिक्शे पर दोनों साथ रहे लेकिन इस बार कोई कोई भी प्रसंग छेड़ नहीं रहा था.दीदी अपने कमरे के आईने के सामने काफी देर तक खड़ी रहीं,एक नए अहसास से सराबोर, ‘स्त्री-पुरुष के आदिम आपसी गंध'से मदहोश ! माँ एक बार कमरे में आकर लौट गईं,उन्होंने अपनी रूहीको नींद से जगाना नहीं चाहा रूही नींद में थी,रूही रो रही थी,रूही केआसुओं के तासीर निश्चित नहीं थे,दुःख,अनजाना भय या सुख के आंसू.‘नेहरु नहीं रहे’,दोपहर तक आल इंडिया रेडियो ने खबर दी,जिस पर शाम को घर के लॉन में गमगीन चर्चा में शामिल हुए गांधीवादी पिता,मार्क्सवादी भाई,कमरेड और दीदी.नेहरु के प्रशंसक और विरोधियों,सबके लिए यह आघात था और एक सवाल भी, ’हू आफ्टर नेहरु?’दूसरे दिन पार्टी दफ्तर में शोक सभा हुई और दीदी लौटते वक्त अपने घर आने के पहले कामरेड के मकान पर रुकी,दीदी का यह पड़ाव10जनवरी1966तक बना रहा.लाल बहादुर शास्त्री की असामयिक निधन के6घंटे पहले तक.धोखा !साजिश !!विश्वासघात!!!पूरे देश की फिजां में यही माहौल था,लाल बहादुर शास्त्री की ताशकंद में मृत्यु को साजिश मान रहे थे लोग -वे लोग भी,जो एक दिन पहले तक ताशकंद समझौते के कारण शास्त्री जी के खिलाफ थे.11जनवरी की सुबह दीदी के अपने लोक में भी विश्वासघात और धोखा का घना कोहरा छाया था,जो राष्ट्रीय फिजां में व्याप्त विश्वासघात,धोखे और साजिश के माहौल से लिपट रहा था.दीदी अपनी बेचौनी की हालत या विचारों के द्वंद्व की स्थिति में पासके गंगा-घाट पर घंटों बैठी रहतीं.उस दिन भी वेनिकलीं तो पिता समझ गए थे कि शायद उदासी की स्थिति में वे गंगा की ओर जा रही हैं.वे मना करना चाह रहे थे,उस दिन भी ठंढक में कोई कमी नहीं थी,कोहरा यद्यपि पिछले दिनों की तुलना में कम था.भाई ने सदा की भांतिISE  ‘बुर्जुआ व्यवहार’की संज्ञा दी.हालाँकि दीदी अभी भी शास्त्री जी की मृत्यु परकोई राय नहीं बनाना चाह रही थीं,चाह भी नहीं सकती थीं.क्योंकि उनका समय तो कल ताशकंद की त्रासदी के छः घंटे पहले तक ही फ्रीज हो गया था,जब कामरेड ने उन्हें स्पष्ट मना कर दिया था.‘यह नहीं हो सकता’‘क्यों नहीं,क्या हमारे बीच प्रेम नहीं है?’‘हमारे बीच प्रेम कोई शर्त नहीं थी,हम विशुद्धदेह थे.‘मैं मानती हूं कि हमोर बीच सब कुछ देह से शुरूहुआ था,पूरे होश-हवाश में,वैचारिक तौर पर‘देह’की सत्ता को निर्विवाद और आवश्यक मानते हुए,लेकिन एक औरत के लिए देह से शुरू होकर देह तक टिके रहना संभव नहीं होता,मैं आपके साथ‘घर’और‘संसार दोनों के ख्वाब बुनने लगी थी.’‘वह ख्वाब एक तरफा था,जिसे बुनने के लिए तुम स्वतंत्र थी,परंतु मेरे‘घर’में कोई और भी है.’कामरेड की आवाज सख्त थी.'कोई और मतलब...!’‘मेरी पत्नी’‘क्या वह पहले नहीं थी,तब जब आपके‘घर’और‘संसार’में मैं-ही मैं थी.आप एक साथ दो लोगों से धोखा कर रहे थे.......'‘मैं तुम्हारा दिल नहीं दुखाना चाहता हूं,तब भी नहीं चाहता था.मेरीशादी लगभग बाल विवाह थी- दो बच्चे भी हैं.हां,तुम मुझ पर धोखे का आरोप भी तय नहीं कर सकती हो. हमारे तुम्हारे बीच पहली बार ही जो कुछ हुआ वह जरूरत हम दोनों की जरूरत जैसा था,अप्रत्याशित तो कतई नहीं.हमदोनों ही विधान भवन से‘सिटी’मेरे घर पर अनायास ही नहीं चले आए थे.’कामरेड तर्क कर रहे थे.'तो क्या वह सब पूर्व नियोजित था?....दीदी लगभगचीखने को आयी.‘मैं कुछ भी निश्चित तौर पर नहीं कह सकता उस दिन के बारे में,नियोजित था भी और नहीं भी.लेकिन अब,अब परिवार मेरी जिम्मेवारी है.’गंगा का दूसरा छोर घने कोहरे में छिपा था.कोहरे में कुछ ढूंढ़ती दीदी की आंखें उसी छोर पर लगी थीं या वे सूने में एकटक देखती कुछ सोच रही थीं......'नियोजन!'किसका व्यवहार नियोजित था.क्या वे कुछ सोच कर विधान भवन से टांगें पर बैठी थी पहले दिन!!! खूब याद करने के बाद भी वे तय नहीं कर पा रही थीं कि वे कामरेड के साथ मुख्यमंत्री के कक्ष से निकलकर क्यों चल पड़ी एक साथ.क्या मुख्यमंत्री की प्रशंसा से वे भाव विभोर थीं- आपा खो बैठी थीं.क्या उनका और कॉमरेड का घर पटना सिटी में था इसलिए वे एकसाथ निकलीं?क्याकॉमरेड के व्यक्तित्व ने और उनकी वक्तृता ने उन्हें सम्मोहित कर रखा था?क्या शीताक्षी के भावोद्रेक थे वेकदम?क्या ठेठ दैहिक जरूरतकी दिशा में प्रेरित थे उनके पांव?क्या नियोजित था- समय,भाव और नैरंतर्य में उपस्थितपरिस्थितियों का उद्दीपन याउनसे उम्र अनुभव और वैचारिकी में परिपक्व कॉमरेड का आलंबन......!!गंगा का पानी स्वच्छ था,शांत भी.ठंड के कारण एक दो श्रद्धालु ही स्नान कर रहे थे,दीदी के घाट से कई किलोमीटर दूर‘स्टीमरों’में भी कोई हलचल नहीं था.गंगा शांत बहरही थी,दीदी की आंखें भी अंतःसलीला थीं -शांत बहाव.‘कैसा नियोजन !स्त्रियां कब कर पायीं हैं,अपनी जिन्दगी का निर्णय या निर्धारण!सब कुछ परिवार तय करता है या पुरूष‘घर’संसार हर जगह:15अगस्त1947को नन्हीं मीनाक्षी के हाथों में तिरंगा थमा कर उसकी मां कहां कैद हो गयी थी,कहां सीमित हो गयी थी.गांधी जी के द्वारा आह्वान पर घर से बाहर कदम रखने वाली मां-स्त्रियां की कुशल संगठनकर्ता,अपने प्रिय आभूषणों को दान में दे देने वाली‘भामाशाह’,औरपिता के लिए15अगस्त1947के अलग-अलग मायने में-मां उस दिन के बाद से घर में ऐसे सीमित हो गयीं,जैसे पहले कभी निकली ही नहीं थी,नहींदेखा था उन्होंने असहयोग आंदोलन,नहींभाग लिया थानमक आंदोलन में या फिर1942में जेल भी नहीं गयीं थीं;पिता सक्रिय राजनीति में बने रहे.‘क्या होता है पूर्व नियोजन स्त्रियों की जिन्दगी में! कामरेड की चुप्पी,घर-परिवार के बारे में सायास निर्मित रहस्य यदि पूर्व नियोजित नहीं था तो क्या मेरा समर्पण या‘हम दोनों के सुख’पूर्व नियोजित थे.’घंटे भर गंगा की तरंगों में डूब-उतरकर दीदी घरके लिए लौट पडीं.मां की यादों के रास्ते तारीखों-तवारीख में उतरी दीदी को लगा कि10जनवरी1966इतिहास के एक युग के अंत की तारीख है- नेहरू युग का अंत,लाल गुलाबों का वास्तविक प्रस्थान.नेहरू नहीं रहे,लाल बहादुर शास्त्री का असमायिक निधन हो गया,लेडीमाउंट बेटन बहुत पहले ही इंगलैंड लौट चुकी थीं.कांग्रेस ने इंदिरा गांधी को गद्दी सौंप दी.कांग्रेसी नेताओं की एक ताकतवार जमात इसे‘गूंगी गुडिया’की ताजपोशी मानता था.जिन दिनों इंदिरा गांधी‘गूंगी गुडिया’से‘दुर्गा का अवतार’बनती गयीं,उन्हीं दिनों दीदी पटना से दिल्लीविश्वविद्यालय की अन्तेवासी हो गईं;वहां रहकर छात्र और ट्रेड युनियन की में सक्रिय रहने केपार्टी के निर्देश के साथ.उन्हीं दिनों दीदी की शादी कर दी गयी- पति भारतीय विदेश सेवा के अधिकारी थे.पति के आग्रह पर वे रूसभी रह आयीं-दीदी के सपनों का साम्यवादी देश,जहां बेटे के जन्म के बाद वापस लौट आयीं फिर से पटना,वे पति के पश्चिमी देशोंकी पोस्टिंग में साथ नहीं जा सकीं,वे विदेश सेवा के अधिकारी के रसाई और शयनकक्ष तक सीमित नहीं रह सकती थीं.जिस दिन,पाकिस्तान से अलग बंगला देश की घोषणा हुई,उस दिन वेपटना सिटी के अपने मकान के लॉन में अपने बेटे की ऊंगली थामे घूम रहीं थीं और उनकी निगाहें सड़क पर टिकी थीं- जहां इंदिरा गांधी के शौर्य और विजयके उल्लास से पूरा वातावरण सराबोर था.पति की चिट्ठियां धीरे-धीरे आनी कम हो गयीं,अब आने वाली हर चिट्ठी में बेटे कीपढ़ाई और उसके भविष्य की योजनाएं साथ आतीं- दीदी तय थी कि  उनका बेटा उनके पास अमानत है,जिसे पहले तो बोर्डिंग स्कूल जाना है,और फिर पिता के पास विदेश.वे अब पार्टी की गतिविधियों में ज्यादा शरीक होने लगीं.उनका सबसे प्रिय मोर्चा था कोयला खदानों के मजदूरों का मोर्चा.सीधे-सादे आदिवासियों की संपत्ति पर कब्जा था शेष बिहार के दबंगों का,जिनकी शासन और सत्ता में पहुंच थी.दीदी इस मोर्चे पर सक्रिय हुईं.‘सरकारें और उसके कारींदे- ठेकेदार,पुलिस और कारखानेदार,बंदूक की ही भाषा समझतेहैं.पूरे ग्रीन बेल्ट की नींद,भूख पर कब्जा करनेऔर उनकी सुकून पसंद जिंदगी पर तथाकथित सभ्यता का मुलम्मा डालने को उतारू सरकारों को उसके आदिवासियों की करूण आंखें और मूक वेदना समझ में नहीं आती.दीदी अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री के द्वारा‘नक्सलवाद’को देश का सबसे बड़ा शत्रु घोषित करने पर उबल पड़ती थी.कोयला खदानों के मजदूरों के साथ काम करते हुए ही मुलाकात हुई उनकी मेरे दादा जी की मित्र से वे धनबाद में श्रम अधिकारी थे,आकर्षक व्यक्तित्व के धनी ! उनकी धाक अधिकारियों के बीच कम साहित्यिक मंचों पर ज्यादा थी.मधुर कंठ और सुर साधनाके साथ वे अपने गीतोंकी‘माधुरी’सेमहफिल लूट ले जाते थे.मंचों पर उन दिनों गीत,अगीत,नवगीत,कविता-अकविता,छंद-मुक्तछंद की धूम थी.सरोकारी मुलाकातों और मंचों,महफ़िलोंबीच दीदी कीनयी दोस्ती पनपी-पास्क दादा के साथ:‘एक सुंदर स्त्री,उससे भी अधिक आकर्षक स्त्री यदि आपके सामने की कुर्सी पर बैठकर अपने तेज और अकाट्य तर्कों से आपको कायल कर रही हो तो कौन मूर्ख हथियार डाल देना पसंद नहीं करेगा.’वे अपने स्टाइल में बेवाक थे या फ्लर्ट रहे थे.‘तो मैं मान कर चलूं कि आप हमारी तरफ से सरकार के सामने हमारा प्रतिनिधित्व करेंगे.’दीदी लक्ष्य से भटकना नहीं चाहरही थीं.‘अपनी बंकिम भृकुटियों से कोई तार-तार कर रहा हो और अपने शब्दों से निरूत्तर तो कानूनी हरफों से ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है संवेदना.कानूनी हरफो को कई शुष्क हृदयों ने लिपिबद्ध किया है लेकिन पर- दुःख- कातर स्त्री कीउपस्थिति मात्र से उन हरफों कीशुष्कता गायब हो सकती थी’,वे प्रशंसा कर रहे थे,डोरे डाल रहे थे या फिर अपनी सहजता में थे.....दीदी ने बताया कि उनकी यह दोस्ती सबसे अधिक चली.वे घर में‘रूक्मणि’कॉलेज की दिनों में विरही बनीं‘राधा’और कोयला मजदूरों के बीच सक्रिय‘द्रौपदी’के साथ एक साथ सहजहो सकते थे और वे तीनों भीउनके साथ सहज हो सकती थीं.दीदी उनसे सबकुछ शेयर करतीं,व्यक्तिगत- राजनीतिक सबकुछ.उनकी सलाह मानतीं,उन्हें सलाह देतीं.1947में पार्टी से विलगाव,जयप्रकाश जी के आंदोलनों से रिश्ता और सक्रिय भूमिका, 1975में इंदिरा गांधी के द्वारा इमरजेंसी लागू होने पर पार्टी की खुली आलोचना और पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से भी इस्तीफा आदि दीदी केसारे निर्णयों में दादा जी केमित्र की सलाह और बहसकी भूमिका रही थी.उनके साथ प्लूटोनिक सुख पाती थी दीदी;इसीलिए वे अपने को रूक्मिणी,राधा और द्रौपदी की त्रयी में द्रौपदी जैसा अनुभव करती थी.उस दिन कोयला मजदूरों के मामलों को लेकर जब वेसूबे की बड़ी नेता से मिली,तो उसके द्वारा बलात् संबंध बनाने की घटना से आहत वेसीधे उनके कंधों पर गिरकर फूट-फूट कर रोयीं:‘क्या औरत देह मात्र होती है,मात्र मांस का लोथड़ा,उसने मुझे मात्र देह में तब्दील कर दिया था’ -वे काफी देर तक रोती रहीं.जी हल्का हुआ तो उन्होंने सुबकते हुए कहा, ‘मैं अपने भीतर ताकत भी महसूस कर रही हूं.इसी देह के आगे सूबे का सबसे बड़ा नेता नंग-धडंग लेटा था.सेक्स की भूख मिटनेके बाद उसके चेहरे पर बच्चों सा संतोष था- मैं भीतर से जल तोरही थी,लेकिन उस क्षण को मेरे भीतर उत्साह दौड़ गया था.’मैं आपकी उत्सुकता शांत करने वाली नहीं हूं कियह नेता था कौन : मुख्यमंत्री-राज्यपाल खानन मंत्री या फिर इन सब मंत्रियों को बनाने-बिगाड़ने वाला शक्तिशाली‘किंग मेकर’ .हां उस‘बलात संबंध’के बाद दीदी की फाइल रूकी नहीं,इतनी सूचना मैं दे सकती हूं.दीदी और गीतकार दादा का प्रेम‘प्लूटोनिक’मात्र नहीं था;दो शरीरों ने इस प्रेम को और अधिक गहन बनाया था.पहली बार दोनों करीब आए थे उनके ऑफिस के कमरे में.ऑफिस स्टॉफस की गैर मौजूदगी में.खूब तेज बारिश,हवा,घिर आयी रात तथापाठक जी केप्रति दीदी के मन के आकर्षण ने उद्दीपन का काम किया था- प्रयत्न या प्रयोजन कहीं नहीं था.वासना रहित आलिंगन...!!उन दोनों ने अंतिम बार जब एक दूसरे को समर्पित किया,उसके बाद‘प्लूटोनिकप्रेम (!) ही बचा-शरीर-संबंध जाता रहा.इसकेपहले वासना रहित प्रेम के बाद हर शरीर संबंध में वासना की अधिकता बढ़ती गयी,शारीरिक प्रेम  गहराता रहा;तब तक,जब यह सब अंतिम बार हुआ.उन्होंने उस दिन दीदी को आलिंगन मेंलिए उनके कानों में फुसफुसाहट डाली,रूक्मिणी से तुम बेहतर हो,राधा तुम से बेहतर.........'दीदी ने उसके बाद उन्हें आश्चर्य से देखा.ऑफिस की तेज बारिश को याद किया,हवा के तेज झोकों को याद किया और प्रत्युत्तर में कहा‘इतिश्री’.इसके बाद दोनों कभी आलिंगनबद्ध नहींहुए.गीतकार दादा ने भी‘इतिश्री’की गरिमा बनाए रखी.बोधि वृक्ष पर टंगा टुवार्डस इक्वलिटी रिपोर्ट‘मथुरा कहां होगी’‘कौन मथुरा,मथुरा आगरा के पास है.‘मैं मथुरा की बात कर रहा हूं,जिसके रेप के मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद पूरे देश मेंस्त्रीवादी आंदोलनों की दस्तक पड़ी थी.’‘तुम यह सब क्यों पूछ रहे हो’आज मेरी दीदी नहींरही,मैं उन्हें मिस कर रही हूं.‘इसलिए कि मैं वहीं से आ रहा हूं,जहां मथुरा अपने ऊपर राक्षसी बलात्कार के पहले,बाद में और  उसेकेन्द्रित स्त्रीवादी आंदोलनों के दौरान तथाउसके बाद तक पत्थर तोड़ती रही है-मथुरा यानी आदिवासी लड़की’ .उसकी पीड़ाओं की नींव पर ही बने‘कस्टोडियल रेपकानून और शिफ्ट हुआ आनेस ऑफ प्रूफ’.'तो तुम महाराष्ट्र से आ रहे हो’?'‘हां,उसके शहर चंद्रपुर से कोई सौ-एक सौ बीस किलोमीटर दूर आयोजित स्त्रीवादी जमघट से आ रहा हूं- देशभर से जमा सैकड़ोंस्त्रीवादीअकादमिशियन,कार्यकर्ताओं,विद्यार्थियों जमावडाथा वहां.’‘मथुरा भी आयी थी क्या वहां.’‘उसकी सुध लेने वाला कौन है?वहां तो टी.ए.,डी.ए. की मारामारी थी.स्त्रियों को गाली देने वाले,लेखिकाओं को‘छिनाल’संबोधित करने वाले एक पुलिस अधिकारी से संबंध बनाने का आलम यह था कि उसे स्त्री-पुरुष समानता के प्रतीक के तौर पर एक‘पीपल-वृक्ष’यानी'बोधि वृक्ष'समर्पित किया गया.’‘क्या कह रहे हो तुम,क्या किसी ने विरोध नहीं किया.’‘कौन करता विरोध,वह पुलिस अधिकारी सिर्फ पुलिस अधिकारी नहीं रहा वहां शिक्षा के नाम परएक बड़े कोषको कस्टोडियन है,उसकी कलम से ही वहां उपस्थित‘स्त्रीवादियों कोटी.ए.डी.ए मिलना था और भविष्य में अन्य उपकार सुनिश्चित थे ..’‘बोधि वृक्ष तो  दलित अस्मिता का प्रतीक है.’‘हां,इसीलिए कुछ दलित स्त्रीवादियों,ने दलित महिला संगठन के कुछ कार्यकर्ताओं ने इसका विरोध किया तो वहां बैठी संभ्रांत भृकुटियाँतन गयीं,नारा लगाती  कार्यकर्ताओं की जमात को विलेन मानती आंखों उन्हें दुत्काररही थीं,पुलिस ने उन्हें निकाल-बाहर किया.’‘फिर स्त्रीवादी सम्मेलनों का आडंबर क्यों?’‘वहां स्त्रीवादी आंदोलनों,अकादमिक गतिविधियों के संभ्रांत प्रतिनिधियों का पुलिस-अधिकारी के साथ कोरस सुनकर आया हूं.मथुरा की कौन याद करे.यह तो टी.ए. डी.ए की कस्टडी में कई-कई मथुराओं को पुनर्जीवित करनेकी घटना थी.’मेरा मन पहले से ही उदास था.मैं अपना मन बदलने के लिए ही गंगा ढाबा आ गयी थी,रोहिताश्व को भी यहीं बुला लिया था,गरम बहसों का केंद्र गंगा ढाबा. निरंजन ने ढाबे पर ही ज्वाइन कर कियाथा मुझे .‘तुम स्त्रीवादी आंदोलनों और विचारों पर पूर्वग्रही वातावरण निर्मित कर रहे हो  न.‘तो क्या करूं ! स्त्रियों को,विदूषी स्त्रियों को,सरेआम गाली देने वाले मर्दवादी अहंकार को तुष्ट करती स्त्रीवादियों को देखनेकी त्रासदी के बाद मैं क्या कर सकता हूं,यह पूर्वग्रह नहीं,तटस्थ आक्रोश है.’‘तुम्हारा आक्रोश स्त्रियों की टी.ए.डीए पर क्यों है?इसलिए की अब वे पुरुषों की बराबरी पर अकादमिक गतिविधियों में शामिल हैं.’‘जी नहीं,पुरुषों के साथ निर्लज्ज बराबरी पर मेरा आक्रोश है,स्त्रीवादी आंदोलन पितृसत्ताके संस्कारों के खिलाफ था,उसके अनुरूप हो जाने के लिए नहीं था.’मैंने बातचीत को वहीं खत्म कर वापस लौटना उचितसमझा.आपको भी लग रहा होगा कि कहानी के बीच यह अवांतर प्रसंग क्यों?लेकिन मैं ढाबे पर चलीआयी,तो उसकी प्रकृति के अनुरूप कुछ बातें आपको शेयर करनीजरूरी समझा मैंने.वैसे ऑटो सेरोहिताश्व के साथ दीदी के घर की ओर लौटते हुए मैं पूरी कहानी बता ही दूंगी आपको.हम घंटो चुप्प,हाथों में हाथ लेकर एक दूसरे को देखते हुए समय में डूबे रह सकते हैं.इस बीच रोहित को धोखा देकर मैं अपनी दीदी की कहानी पर लौट आती हूं:हां तो पार्टी की सदस्यता से इस्तीफा देकर दीदी जयप्रकाश जी के नेतृत्व में आंदोलनों में और अधिक सक्रिय हो गयी.1975में भारत के महिला प्रधानमंत्री ने इमरजेंसी थोपी,संयुक्त राष्ट्र संघ ने उस वर्ष को‘महिला वर्ष’के रूप में घोषित किया, 8मार्च को‘अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस’बनाने की औपचारिक नींव पड़ी और'टुवार्डस इक्वलिटी रिपोर्ट'के साथ भारतीय महिला आंदोलन ने अपना चार्टर पेश किया.दीदी छात्र-आंदोलन के दौरान नया जोश,नयी ताजगी से रू-ब-रू हो रही थीं.राजनीतिक लक्ष्य के साथ सामाजिक परिवर्तनों की भी हलचल थी.‘स्त्री-पुरुष संबंधों,अंतरजातीय,अंतर धार्मिक रिश्तों के नए-नए प्रयोग प्रोत्साहित हो रहे थे.दीदी को संबंधों के इन प्रयोगों को देखकर  सुकून महसूस होता- उनके बाद की पीढ़ी भी सक्रिय हो चुकी थी.समय के उसी टुकड़े पर एक जोड़ी नयी आंखों में दीदी को अपने लिए सरहाना के भाव दिखे.वे आंखेंउनकी आंखों में उतरने के लिए आतुर थीं.तेज-तर्रार कार्यकर्ता था वह,प्रखर वक्ता.दीदी के बाद की पीढीका नवयुवक.जे.पी. पर चली लाठियों के बीच-बचाव में कुछ नाम सुर्खियों में आ गए कुछ गुमनामरहे- वह भी उन गुमनाम नामों में से था.इमरजेंसी के बाद‘मीसा'के तहतदीदी  जिस जेल में रखी गयी थीं उसी के पुरुष कार्ड में उसे भी रखा गया था.इमरजेंसी के बाद केंद्र और राज्य,दोनों जगह की सरकारेंबदल गयी थीं.दीदी भी चुनकर बिहार विधानसभा पहुंची.बिहार विधानसभा की‘तार केश्वरी सिन्हा.’लेकिन नेहरू के साथ ही राजनीति का नेहरू युग समाप्त हो चुका था,नेहरू मॉडल का सौंदर्य बोध भी.उन्हीं दिनों मुख्यमंत्री पर किसी महिला नेताने बलात्कार के आरोप लगाए.दीदी ने भी अपने प्रति कई-कई निगाहों में आक्रामकता देखी थी.कई अप्रिय घटनाओं और संवादों से रू-ब-रू हुई थीं.युवा नेता से उनकी दोस्ती किस्से और अफवाहों की शक्ल में सत्ता की गलियों में घूमती.नेताओं केफिकरे हवा में तैरतें, 'जो बात जबान हड्डियों में है,उससे कम इन शुद्ध घीवाली बूढ़ी हड्डियों में नहीं है.'दीदी इन सारे संवादों का प्रत्युतर शालीन मुस्कान से देती.और जरूरत पड़ी तो कठोर दर्प से भी.एक मंत्री की लम्पटता की खबर आलाकमान तक पहुंची -मामला दबा दिया गया.उन दिनों किसी भी अप्रिय घटना के बाद संदेह की पहली सूई‘स्त्री’पर ही जाती थी और यदि स्त्री सार्वजनिक जीवन में हो,सुंदर हो,रिश्तों के प्रति सहज हो,कई-कई अफवाहों,किस्सों की नायिका हो तब तो लंपट पुरुषों कोक्लीन चिट मिलना हीथा,उसेप्रलोभन के बाद सामान्यउच्छृंखलताके खाते में डाल दिया जाना आम बात थी.उन दिनों दीदी को लगने लगा था कि क्यों नहीं  विदेशों में बसे पति से तलाक लेकर‘युवा मित्र से संबंधों को रिश्ते में बदल दिया जाए! लेकिन ऐसे विचार कुछ पल ही टिकते,किसी नई सीमा में बंधने की उनकी इच्छा नहीं थी- फिर बेटे का ख्याल भी उन्हें ऐसा करने से रोकता.नयी सरकार भी जाती रही,पुरानी नए अवतार में बहाल हुई- गरीबी हटाओ के बीस सूत्री कार्यक्रम के साथ.दीदी दुबारा चुनी हुई विधायक के तौर पर किसी राजनीतिक मसले पर मुलाकात के लिए रायसीना हिल्स पर कहीं किसी अतिथि कक्ष में तशरीफ ले गयीं.अतिथि कक्ष से उन्हें निजी कक्ष में चले आने का आमंत्रण मिला.उन्होंने अपने को खुशकिस्मत माना कि कई मुलाकातियों के बीच न मिलकर‘विशिष्ट’ने उन्हें‘अतिविशिष्ट’का दर्जा दिया.निजी कक्ष की कुर्सी पर बैठे बुजुर्ग ने उनका स्वागत किया.सुबह का समय और काफी...पल भर के लिए वह बुजुर्ग या उनकी छाया हिली.पलभर में ही निजी कक्ष का दरवाजा बंद हो गया.सब कुछ पल भर में घटा,दीदी कुर्सी से पलंग पर,बुजुर्ग की हॉफती-कॉपती छाया बगल में बुदबुदारहा था, ‘क्या यहसब पहले से तय नहीं था?’ ‘तुम्हें बताया नहीं गया था?’ 'मैने सुन रखा था कि तुम उन्मुक्त ख्यालों की आजाद स्त्री हो.'दीदी उस कॉपती बुदबुदाती छाया को वहीं छोड़कर बाहर आयीं- उन पलों को वे भुला देना चाहती थीं,सर्वोच्च के सम्माने में,अपने से भी छिपा लेना चाहती थीं.‘बिहार निवास’जैसे किसी निवास में युवा नेता उनका इंतजार कर रहा था.उन पलों को गहरे रहस्य लोक में डालकर दीदी सहज थीं.दोनों घूमने निकले.घंटो घूमते रहे-शॉपिंग करते रहे.लाल किला में लॉन पर बैठे-बैठे दीदी अचानक से सुबुकने लगीं.उसे कारण समझने में नहीं आया,शायद बेटे की याद,शायद पति की कोई तीखी बात शायद ..... उसके उनके चेहरे को हथलियों में भर लिया.दीदी उसके कंधे पर सिर रखकर फूट-फूट कर रोने लगी.जी हल्का हुआ,लाख पूछने पर भी रहस्य लोक का दरवाजा नहीं खुला.दीदी एक नए निश्चय पर पहुंच रहीं थीं,राजनीति से अलविदा करने के निश्चय पर कि एक और घटना घटी,वहीं उसी निवास में निजी क्षणों में.दीदी ने नए साथी,युवा मित्र कोभी राजनीति के साथ हीछोड़ने का निश्चय लिया.घटना केकेंद्र में एक वाक्य था,फुसफुसाहट में निकला वाक्य,जो दीदी के कानों,मन और पूरी चेतना पर गूंज गया.वह‘चरम क्षणों’के दौरान फुसफुसाया था....‘तुम्हारे स्तन थोड़े और बड़े होने चाहिए थे’कई वर्ष लगा दिए थे उसने उन्हें ऐसा कहने में.दीदी केकानों में वाक्य गूंजा,उनकी आंखें उसके चेहरे पर जम गयीं- दीदी के विचारों में कौंध गई‘देह’.‘स्त्री देह’.तब से दीदी ने अपना निजी संसार बना लिया और पीछे छूट गयीं अफवाहें...उनके साथ जुड़ी कहानियां.....सभाओं-गोष्ठियों-पार्टियों और‘रस रंजन’कार्यक्रमों में बुनी जाने वाली फंतासियां.वे अपनी शर्तों और विचारों के साथ समय के कई-कई टुकड़ों में उपस्थित रहने लगीं.31अक्टूबर1984के कुछ दिनों पहले से ही सक्रिय राजनीति छोड़ चुकी दीदी दिल्ली के इसी मकान में शिफ्ट हो गयी थीं,जहां डायनिंग टेबल पर उन्होंने अंतिम सांसें ली- महा प्रस्थान को प्रस्थित हुईं.दिल्ली के इसी घर में रहते हुए पेड़ के गिरने के बाद कांपती धरती उन्होंने देखी:हत्याएं,खून,पड़ोसियों में खौफ,अविश्वास यह सब क्रिया की प्रतिक्रिया वाले खौफ,अविश्वास कत्लेआम से लगभग दो दशक पूर्व की तस्वीर है.तब से दिल्ली और दिल्ली के बाहर राजनीतिक-अराजनीतिक आंदोलनों ने,साहित्यिक-सांस्कृतिक-गोष्ठियों-आयोजनों ने उनकी सक्रिय उपस्थिति देखीऔर असहमतियों के बाद उनका वहाँ सेरूखसकत होना महसूस किया है.दीदी केनए‘निजी संसार’में सौंदर्यबोध,सुरूचिता और विचारों के प्रति साफगोई थी.स्त्री होने का बोध कराती अनेक घटनाओं-दुर्घटनाओं को झेल चुकी दीदी तब भी पुरुषों के बीच ज्यादा सहज और उनकी अच्छी दोस्त थीं.स्त्री-आंदोलनों में पुरुषों की आक्रामकता,यौन-कुंठाओं पर तीखे प्रहार की भूमिकाओं में,पुरुष साथियों के साथ वैचारिक बहसों मेंऔर निजी संबंधों में भीवे एक समान सहज थीं.उन दिनों जब,स्त्री आंदोलनों में शिथिलता आनेलगी थी,अकादमिक संभ्रांतता हावी होने लगी थी,दीदी  स्त्री आंदोलनकारियों के जाति और वर्ग दंभ देखकर आश्चर्यचकित थीं,भयभीत थीं.दलित स्त्रियों के सवाल पर आंदोलनकारियों के बीच असहजता उत्पन्न होती,आपसी फुसफुसाहटें तेज हो जातीं,जोगांवों की ड्योढ़ियों में बैठी‘संभ्रांत स्त्रियों’से कतई भिन्न नहीं होती.आज मथुरा को खोजता महाराष्ट्र से वापस लौटे निरंजन नेजिन स्त्रीवादी समूहों को बोधि-वृक्ष के प्रतीक को एक ऐसे हाथ में सौंपते देखा था,जो सवर्ण मर्दवादी गर्व से चूर स्त्रियों को गाली दे रहा था,उनस्त्रीवादी समूहों की शिनाख्तदीदी ने तब कर ली थी.अपने महाप्रस्थान के पूर्व के कुछ वर्षों में उन्होंने एकांत स्वप्न संसार बना दिया था.उनके स्वप्न का प्रति संसार उनके अनुभवों,उनकी यात्राओं,उनकी सक्रियता से बनाप्रति संसार था.वहीं से प्रेरित होकर वे आजीवन सक्रिय थीं,बिना थके,बिना रूके...उनके स्वप्न संसार में अपनी कामनाओं,अपनी इच्छाओं को जीती सुंदर स्त्री का साम्राज्य था,जिसका पुरुष सहचर उसकी दैहिक उपस्थिति के प्रति अभिभूत और मानसिक लोक का हमसफर था.वे मुझे रोहित के प्रति प्रेरित करतीं :‘रोहित तुमसे प्रेम करताहै.तुम्हारे मानसिक,बौद्धिक अस्तित्व से प्रेम करता है,वरना तुमजैसी सौंदर्यबोध रहित स्त्री की ओर कोई क्यों देखें?’मैं उनके इस कटु चुहलबजी या सत्य पर कोई प्रत्युत्तर नहीं देती.‘तुम दोनों ने अब तक नहीं जाना है कि अभिसार क्या होता है.मैं तुम्हारी जगह होती तो रोहित के प्रति सर्वस्व समर्पित होती-‘सर्वस्व समर्पण ही तो अभिसार है- वरना दैहिक खेल,या देह-विनिमय..'‘पता नहीं तुम नई लड़कियों को क्या चाहिए! मैं आज भी अपने भाई के दोस्त,कॉमरेड,पति,पाठक जी,और‘युवा-साथी’-सबमें से थोड़ा-थोड़ हासिल कर अपने जीवन को एक पूर्ण पुरुष साथी के साथ समर्पित पाती हूं,तभी मुझे अपने ऊपर किसी बलात्कार,अफवाह या फिकरों का कोई अफसोस नहीं,बदलेकाभाव नहीं है.’तो कल  रोहित के साथ मुझे अपने घर भेजनेके पहले जब वे मेरे साथ मंडी हाउस में काफी पी रहीथीं,तभी हमारी टेबल के सामने बैठा एक युवक उन्हें लगातार देख रहा था, 30-35साल का फोटोग्राफर- मानो उनकी आंखों में उतरकर उनकी फोटोग्राफी करना चाह रहा था.हमने जब दूसरे कम कॉफी का ऑर्डर दिया तो वह हमारी टेबल पर‘एक रूप’और कहता हुआ आ धमका.‘मुझे माफ करेंगी मैं काफी देर से एक बात कहना चाह रहा था आपको.’दीदी ने मुसकुराकर उसका स्वागत किया.‘आप बहुत खूबसूरत है.’क्या मैं आपकी तस्वीर ले सकता हूं.दीदी फिर मुसकुराई.....‘आपकी आंखें लाजबाव है...वहां अपूर्व शीतलता है......सही,मैंने वहां पूरी तरह झांककर देखा.’दीदी उसकी आंखोंमेंउतर गईं,मैं अपने आपको उनके बीच से अनुपस्थित पा रही थी.‘क्या मैं आपकी बंद आंखों को चूम सकता हूं.’यह तो धृष्टता की हद थी.दीदी मुसकुरायी,उनकी आंखों में चमक और आत्मविश्वास तैर रहा था,तो क्या तुम तस्वीरेंभीलोगे और मेरी आंखों की शीतलता भी सोखना चाहोगे.’युवा फोटोग्राफर के चेहरे पर एक लालिमा दौड़ी,दीदी के चेहरे पर लज्जामिश्रित तृप्ति......और उस रात को महाप्रस्थान के पूर्व  उस युवा फोटोग्राफर के साथ मंडी हाउस में काफी देर तक घूमती रहीं वे,इंडिया गेट पर काफी देर बैठी रहीं,गप्पे करती रहीं,प्रेस क्लब जाने का ख्याल ही नहीं आया उन्हें.और हां,वहां अपने घर पर आने के लिए ऑटो लेने केपूर्व उन्होंने अपनी आंखें बंद की थी,जिस पर फोटोग्राफर का मीठा चुम्बन लेकर वे,यानी मीनाक्षी,यानी शीताक्षी,ऑटो पर बैठी,फिर डायनिंग टेबल पर और फिर............_


प्रतिक्रियाएँ
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[25/02 19:29] ‪+91 99313 45882‬: संजीव चन्दन जी की कहानी ' वो आखिरी चुम्बन ' बहुत धैर्यपूर्वक पढ़ा ! कहानी पढ़ते हुए लगा वरिष्ट लेखिका रमणिका गुप्ता जी की आत्मकथा " आपहुदरी " पढ़ रहा हूँ ! सारे घटनाक्रम मिलते-जुलते ! वही 1962 , वही मुख्यमंत्री के.बी सहाय , वही कमरे का दरवाजा बंद कर लेनेवाला नेता तत्कालीन कांग्रेस राज्याध्यक्ष राजा मिश्र , वही नायिका के सामने नंग-धरंग हो जाने वाला देश का भावी राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी , बिहार-भवन में नायिका से यौन-सुख पानेवाला युवा नेता , वही धनवाद का कोलियरी , खदान-मजदूरों और ट्रेड-यूनियनों की राजनीति , वही नायिका की राजनीति में सक्रियता , वही उनका विधायक बनना , वही धनबाद का नायिका पर फ़िदा होनेवाला कवि-अधिकारी और उससे नायिका की नजदीकी , वगैरह-वगैरह !
कुल मिलाकर एक सच्ची कहानी को बेहद खूबसूरती से शब्दों में पिरोया है संजीव जी ने ! एक खूबसूरत महिला राजनितिक कार्यकर्ता की कहानी है यह जो बताती है कि राजनीति में एक महिला को क्या-क्या झेलना पड़ता है ! और अगर वह महिला खुद पढ़ी-लिखी मनोविज्ञान की ज्ञाता हो और साथ ही अपना निर्णय खुद लेनेवाली हो , पति से खिची-खिंची रहती हो , दैहिक संबंधों के प्रति अपने हिसाब से थोड़ी उदार हो तो कहानी और भी रोचक हो जाती है !
एक अच्छी कहानी के लिए संजीव जी को बहुत बहुत बधाई और एडमिन को भी बधाई कहानी पढ़वाने के लिए !

🙏
आपने इस कहानी को अच्छी कहानी की श्रेणी में रखा ।कहानी के अंत में आखिरी चुम्बन को आप नायिका के अंतर्मन के भाव  को किस तरह लेते है ।

🙏
[25/02 21:20] Jaishree Rai: इस कहानी पर कोई प्रतिक्रिया देने की मुझमें योग्यता नहीँ। 🙏🏻😊🌹

[25/02 22:27] राजेश झरपुरे जी: सही कहा  जयश्रीजी । आपसे पूर्णतः सहमत हूं  । वास्तव में यह इतनी अद्भुत कहानी  हैं  कि मुझ जैसा  सामान्य  पाठक इस कहानी  की किसी भी तरह से कोई विवेचना नहीं  कर सकता । फिर भी जो समझ सका उसे साझा कर रहा हूँ,,,,
[25/02 22:27] राजेश झरपुरे जी: सब कुछ देह से शुरू हुआ था, पूरे होश-हवाश में, वैचारिक तौर पर ‘देह’ की सत्ता को निर्विवाद और आवश्यक मानते हुए, लेकिन एक औरत के लिए देह से शुरू होकर देह तक टिके रहना संभव नहीं होता,,,,
 यह कहानी  एक समय और  प्रान्त विशेष की एक  महिला  विशेष की सच्ची  कहानी  है । कथा में एक नाम का भी उल्लेख  है - तारकेश्वरी सिन्हा ।कोयला खान में  श्रमिकों का आन्दोलन हो या सत्ता के मंच के जन आंदोलन में सक्रिय रहने वाली महिलाओं की राजनैतिक यात्रा, देह से ही शुरू होती है और देह पर ही खत्म हो जाती है । इससे भला राजनीति  की सामान्य समझ रखने वाला भी इंकार नहीं कर पायेगा । हाँ! यदि वह बलात्कार का सामान करती है तो बलात्कार  करती भी है । ट्रेड यूनियन लीडर व्दारा किया गया बलात्कार और बलात भोगे जिस्म का  अपनी कम उम्र के युवा लीडर के साथ प्रेम प्रसंग उसके व्दारा युवा के साथ किया गया बलात्कार ही हो सकता है । राजनैतिक जीवन में पितृसतात्मक  मानसिकता स्त्री की उपस्थिति  को कहां स्वीकारती है।

भाई शेखर सामंत से सहमति के साथ यह अपने समय और समाज से रूबरू कराती एक सच्ची कहानी । जितना खूबसूरत  कहानी  का प्रारम्भ  है उतना ही अच्छा  अन्त भी ।

आरंभ

इसे मौत कह कर उनके मरने की इस अदा का अपमान नहीं किया जा सकता.वे प्रस्थान कर गई एक दूसरीभूमिका की ओर.... महाप्रयाण.......!
यह महाप्रयाण है,पुरुष- आरक्षित मोक्ष नहीं.
क्या कोई अपनीमौत को भी इतना उत्सवपूर्ण बना सकता है ! यह तो एक दूसरी यात्रा की शुरुआत के पूर्व का ही उत्सव हो सकता था !! वे महाप्रयाण कर गई.............

और अंत

अपने घर पर आने के लिए ऑटो लेने के पूर्व उन्होंने अपनी आंखें बंद की थी,जिस पर फोटोग्राफर का मीठा चुम्बन लेकर वे,यानी मीनाक्षी,यानी शीताक्षी,ऑटो पर बैठी,फिर डायनिंग टेबल पर और फिर.........

इस कहानी  पर मोक्ष,  विप्रयाण और महाप्रयाण जैसे मुद्दों पर भी चर्चा  हो सकती है,,,?

अद्भुत ।
 एक बेहतरीन  कहानी  मंच पर प्रस्तुत करने के लिए प्रवेशजी का शुक्रिया ।

[26/02 02:39] Sanjiv Chandan: आज दिन भर पत्रिका के काम में व्यस्त रहा और कल भी रहूंगा. ग्रूप के ऐडमिन को बहुत- बहुत धन्यवाद मेरी कहानी यहां लेने के लिए. प्रतिक्रियायें पढ़ रहा हूं, मैं अब कहानी कला की कक्षायें लेने से रहा भला.
कुछ ही घटिया- या बढ़िया कहानियां लिखी है मैंने. दो कहानियां ताजा घटनाओं और जीवित चरित्र पर लिखने की कोशिश भी. उनमें से एक कहानी है यह, जो न तो जीवनी है, न आत्मकथा, न संस्मरण. कहानी समय के जिस कैनवास पर लिखी गई है , वह भरपूर मौजूद है- चूकि सामाजिक- राजनीतिक सक्रियता की प्रोटोगनिस्ट है इसलिए तत्समय  समय की राजनीति कहानी की धूरि में है. यथार्थ उतना ही है, जितना रमणिका जी की आत्मकथा से उल्लिखित है, लेकिन सबकुछ न उनकी आत्मकथा में दर्ज है और न उनके जीवन में घटित. इसकी नायिका वही हैं, इसकी नायिका उनसे निकल कर अलग आकार भी लेती है.
शेष उन महान कथाकारों से माफी चाहूंगा, जिनके सामर्थ्य के बाहर चली गई है यह कहानी. वैसे मैं खुद भी इसके कहानी होने के प्रति सशंकित हू़ 😄
पता नहीं यह कहानी अश्लील कहां हो गई. मुझे फिर तो हिन्दी साहित्य की कई कहानियों को ' कोक शास्त्र' की तरह छिपाना पड़ जायेगा. अपनी कुछ कहानियों को भी, जिन्हें पाठकों ने सराहा है और आलोचकों ने भी .

[26/02 06:22] Sandhya: विशुद्ध राजनीति बरास्ता मीनाक्षी उर्फ़ शीताक्षी ...स्त्री राजनीति के केंद्र में लिखी गयी कहानी सिर्फ देह तक सीमित लगी मीनाक्षी का दुःख या सुख केवल आंसूओं के माध्यम से दिखा उसकी मानसिक रूप से समृद्धि समक्ष है फिर भी उसका ऊहापोह या द्वंद्व नज़र ना आया जो इस कहानी को  और समृद्ध बनाता राजनीती में स्त्री की स्तिथि को दिखाती कहानी 💥

[26/02 07:28] shivani sharma Ajmer: नमस्कार 🙏🏼 अश्लीलता शब्द पर आपत्ति हुई है ,मैं क्षमा चाहते हुए शब्द वापस लेती हूं। वयस्क कहानी कह सकती हूं?
पिछली कुछ कहानियां जो कि audio form में भी थीं ,मेरा बेटा जोकि अभी कक्षा 8वीं में है,मेरे साथ सुनता पढ़ता रहा है। तब से हर कहानी उसे पढ़कर सुनाती आ रही हूं। उस दृष्टि से मुझे कहानी वयस्क लगी बस। 😊 😊
[26/02 08:57] Saksena Madhu: सुप्रभात ... शेखर जी कहानी खतरनाक नहीं स्तब्ध करने वाली है ।राजनीति के खेल का एक हिस्सा ।बात करना तो ज़रूरी है ।
[26/02 09:21] ‪+91 99313 45882‬: मुझे तो यह कहानी बेहद सहज, सरल और कहानीपन से भरपूर लगती है ! न तो यह अश्लील है , न स्तब्ध करनेवाली और न ही खतरनाक ! लेकिन जिन मित्रों को लगती है उन्हें अपना तर्क रखना चाहिए !
तर्क-वितर्क से ही साहित्य का विकास होता है !
[26/02 11:46] Sandhya: कहानी अच्छी लगी  नायिका की छोटी बहन कह  रही है लेकिन उसके मन की थाह का पता नहीं चल रहा ।
[26/02 12:07] Sandhya: साथ ही नायिका का चरित्र इस हिसाब से दृढ़ है कि ,कहीं कोई अपराध बोध नहीं है । इसे दृढ़ता कहने से कुवृति को बढ़ावा नहीं है परिदृश्य राजनीति का है ।
[26/02 12:07] Sandhya: कहानी पूरी तरह पितृसत्तात्मक विचार को पोषित करती लगी ।
[26/02 12:11] Pravesh: जी संध्या ,कहानी के आधारित बिंदु ही यही है ।राजनीती जेसे विस्तृत पटल पर  भी एक स्त्री मात्र स्त्री देह ही  समझी जाती है ।
धन्यवाद
[26/02 12:52] ‪+91 99313 45882‬: यौन-विमर्श क्या सिर्फ पितृसत्ता का विमर्श है , मातृसत्ता का नहीं ?
और यौन-चाहना क्या सिर्फ पुरुष-वर्ग की चाहना है , स्त्री-वर्ग की नहीं ?

यह एक ऐसा सवाल है जिसका उत्तर दिया जाना चाहिए !
आदरणीय संध्या जी🙏🙏
[26/02 12:57] Saksena Madhu: शेखर जी  आपने सही कहा .. पर राजनीति और साजिश की बिछात पर परस्पर सहमति नहीं ... तो उत्पीड़न ही है ।
[26/02 13:08] ‪+91 99313 45882‬: उत्पीड़न तो वहाँ होगा जहाँ नायिका के साथ जोर-जबरदस्ती होगी !
लेकिन जहाँ नायिका की भी सहमति होगी , चाहे जिस रूप में , उसे उत्पीड़न कैसे कहा जा सकता है ?
इस कथा की नायिका के साथ यही बात है🙏🙏🙏

[26/02 14:40] ‪+91 94257 11784‬: श्री संजीव चंदन जी की कहानी,  वह आखिरी चुम्बन मीनाक्षी/शीताक्षी के अनेक प्रेम बासना प्रसंगों का खूबसूरत चित्रांकन है ।पंरी कहानी में अश्लीलता  की हल्की हल्की गंध व्याप्त है ।यदि उसे अश्लीलता न भी मानें तो भी उसे, शिवानी शर्मा जी के शब्दों में वयस्क कहानी तो कहा ही जा सकता है। उसमें जब कोई किशोर मीनाक्षी के यौन प्रसंगों से गुजरता हुआ उसके युवा प्रेमी के शब्दों को पढेगा--तुम्हारे स्तन थोडे और बडे होने चाहिए थे,  तब पता नहीं वह  कैसा अनुभव करे !
 मीनाक्षी मुक्त मन महिला हैं।वह इन सारे प्रसंगों के प्रति संतोष ही व्यक्त करती प्रतीत होती है ।जैसे वह कहती है , आज अपने भाई के दोस्त,कामरेड,, पति , पाठक जी, युवा साथी-साथी-सबमे' थोडा थोडा हासिलकर अपने जीवन को एक पूर्ण पुरुष साथी के साथ समर्पित पाती हूँ । उसका यह कथन एक प्रकार से मुक्त रौन संबंधों का समर्थन ही है ।
  कहानी में मीनाक्षी की सहेली उनके प्रति प्रशंसा भाव से भरी हुई है ।वह उसकी मृत्यु के लिये महाप्रायाण शब्द का प्रयोग करती है और आशा करती है कि शंकराचार्य,कर्मकांडों के मकडजाल में फंसे पुरोहितनुमा....आस्तिक ढोंगी को छोडकर सभी ऐसा ही मानेंगे ।इतना ही नहीं मीनाक्षी के अंतिम संस्कार के समय नीगमबोध पर वह चहती है ...देवमूर्ति की तरह नहलाया उन्हें ।
 इस प्रकार यह कहानी स्त्री विमर्श और नेरी देह की स्वायत्तता को  लेचर लिखी जाजानेवाली एक महत्वपूर्ण कहानी है ।उसमें कथाकार श्री संजीव चंदन के खुले सोच और उनकी अद्भुत सृजन प्रतिभा के दर्शन होते हैं ।एतदर्थ उनका अभिनंदन ।भाई राजेश झरपुरेजी, मधुजी एवं प्रवेश जी को बहुत बहुत धन्यवाद ।

[26/02 18:19] Niranjan Shotriy sir: कहानी के रूप में यह एक अच्छा कोलाज है। एक महत्वपूर्ण सम्मिश्र जो हमारे समय, समाज, राजनीति की जटिलताओं, मनुष्य के रूप में एक स्त्री के अंतर्द्वद्व को प्रभावी रूप से अभिव्यक्त करता है। लेखक की प्रतिभा असंदिग्ध है। उसने एक "प्रबुद्ध लेकिन तब भी केवल स्त्री" की अवधारणा को अद्भुत शैली में उठाया है। निश्चय ही जब मसला स्त्री देह का हो तो "तुम्हारे स्तन कुछ और बड़े..." जैसे वाक्य इस कहानी को एक कलात्मक क्लाइमेक्स तक ले जाते हैं। कई राजनीतिक घटनाओं का वर्णन तत्कालीन विसंगतियों को उजागर करने के लिए किया गया है। इसे पढ़ने के लिए कायांतरण के साथ समयान्तरण के बोध को भी जागृत करना होगा। दरअसल इस तरह की कहानियाँ हमारी रूढ़ और अभ्यस्त पाठकीय अभिरुचि के लिए भी चुनौती होती हैं। बहुत शानदार कहानी। बधाई संजीव जी। बधाई प्रवेश जी।

[26/02 18:41] ‪+91 94310 49640‬: श्री संजीव चंदन जी की कहानी आज पढ़ी मैंने। पहली बार में कुछ समझ नहीं आया। अपनी समझदानी पे तरस आया। दूसरी बार थोडा concentrate कर के पढ़ा। कुछ हिस्सा ही घुस पाया दिमाग में।हार कर तीसरी बार पढने की कोशिश की। पर इस बार भी वही हश्र। ये ऎसी कहानी है जिस में जैसे जैसे आगे पढ़ता गया पीछे का कुछ भी साथ नहीं चल पाया। जिस कहानी में तथ्य खुद ब खुद लिपटते हुए आगे आठ नहीं चलते वो धीरे धीरे उबाऊ होती जाती है। कुछ ऐसा ही इस कहानी के साथ है। आगे पढ़ते जाने की उत्सुकता कहीं भी उत्पन्न होती नहीं दिखी। जितना पढ़ा और समझा उस से इस निष्कर्ष पे पहुंचा कि अगर कहानियों को किसी सेंसरशिप से गुजरना पड़ता तो नि:संदेह इसे "A" सर्टिफिकेट से नवाजा जाता।न जाने किन तथ्यों पर इसे कहानी, अच्छी कहानी या बेहतरीन कहानी कहा जा रहा है। जिस कहानी में आगे पढ़ते जाने का कौतुहल न हो और अंत में जिस से कोई सन्देश न निकले तो वो और कुछ हो सकती है कहानी नहीं हो सकती। एडमिन त्रोय से विनम्र निवेदन है कि सोम से शुक्र के बीच कोई एक दिन निश्चित कर लें जिस दिन इस तरह की वयस्क कहानी या classic porn story की प्रस्तुति होने की पूर्व सूचना सब को हो और किसी का बेवजह वक्त न बर्बाद हो।

[26/02 18:49] Saksena Madhu: राज  रंजन .. राजनीति का काला पक्ष उजागर करती कहानी है हे ये .... यहां पर सब वयस्क हैं ।कुछ बातें पात्र के चरित्र को उकेरने के लिए उसके मुंह से कहलवाई  जाती है । मुझे भी लगा की कहानी कहीं कही टूटती है ।अचानक विषय परिवर्तन पाठक की एकाग्रता में विध्न डालता है फिर भी कहानी अपनी छाप छोड़ती है और यूं लगता है कहानी सच्ची है । आप  कहानी पर अपनी राय बेहिचक दें । आभार भाई
[26/02 19:35] Sandhya: केवल उम्र में पुरुष का छोटा होना और फिर दोनों की सहमति होने से सम्बन्ध बनाने पर इसे बलात्कार की श्रेणी में किस तरह रख सकते हैं राजेश जी ?नायिका कोइ बलप्रयोग नहीं कर रही है 💥

[26/02 19:52] Niranjan Shotriy sir: राज रंजन जी, जैसा कि मैंने अभी कहा यह हमारी अभ्यस्त पाठकीय रूचि को चुनौती देती कहानी है, तो हमें बार-बार,कई बार, भिन्न कोणों से, भिन्न दृष्टियों से किसी रचना के पास जाना होता है। यदि कोई व्यक्ति/पाठक वहाँ तक नहीं पहुँच पा रहा है तो यह पाठक की समस्या है, लेखक की नहीं। हर बार सम्प्रेषणीयता के नाम पर आपको गुलाब जामुन नहीं परोसे जायेंगे कि आप मुंह खोलें और निगल लें। एक बहुत बड़ा उत्तरदायित्व पाठक पर भी होता है। यहाँ हम जिसे "पाठक" कह कर संबोधित कर रहे हैं वह दरअसल "सहृदय पाठक" जिसके गुण-धर्मों की विवेचना यहाँ ज़रूरी नहीं क्योंकि सभी सहृदय और प्रबुद्ध हैं।

[26/02 20:01] Sandhya: शेखर जी पितृ सत्ता केवल इस दृष्टि से कहा कि ,वहां भी स्त्री द्वित्तीयक स्थान ही पा रही है ,यौन चाहना तो दोनों वर्ग की चाहना है  बेशक 💥

[26/02 20:35] Sanjiv Chandan: सच में व्यस्त हूं, मैगजीन प्रेस जा रही है और ऊपर से संसद में महिषासुर की बहस ,  दरअसल मैं जिस पत्रिका से जुड़ा हूं, उसी पत्रिका ने महिषासुर विमर्श को सेंटर में लाया था, इसलिए कुछ लोगों और प्रेस को रिसोर्स उपलब्ध करवाने में हम भी सक्रिय हैं . २०१४ में पत्रिका पर मुकदमा भी हुआ था, जिसमें मेरे एक लेख का भी हवाला है, इसलिए भी...
खैर , यहां टिप्पणियां देखकर मैं बस इतना ही जोड़ना चाहूंगा कि घटित और ज्ञात यथार्थ पर मैंने विधा के तौर पर कहानी ही चुनी थी, रिपोर्ताज, संस्मरण या लेख नहीं. सुधी पाठक फतवा देने की जगह कहानी के कुछ तत्व बता जाते , जो छूटे यहां . मेरा दावा महानतम कहानी का भी नहीं है, लेकिन यह जोखिम लिया है मैंने, एक और कहानी में भी लिया है, ज्ञात घटनायें, भंवरी देवी, मथुरा,  हरियाणा की भंवरी , खैरलांजी , जिसकी हर घटना रिपोर्ट के रूप में सामने है , सबको पता है, फिर  भी कहानी ... इस कहानी के प्रेम और कई घटनायें रमणिका जी के हादसे में व्यक्त हैं. हमारे समय की लिजेंड स्त्री का व्यक्त यथार्थ, लेकिन इन वर्षों में इस तरह सक्रिय स्त्री के और भी यथार्थ है, जिसे कहानी समझती- समझाती है, शेष , बलात्कार , न बलात्कार , सहमति , उत्पीड़न पर मैं कुछ नहीं कहूंगा , क्योंकि जो कहना था , कहानी में है ..... अच्छा लगा कि निरंजन श्रोत्रिय जी और अन्य लोगों को कहानी अच्छी लगी. पहली बार यहीं मुझे कहानी में अपाठकीयता की आलोचना झेलनी पड़ी है, अन्यथा समालोचन में और युद्धरत आम आदमी में प्रकाशन के बाद पाठकों को इसका कैनवास और घटते यथार्थ के प्रति उत्सुकता ही इसकी विशेष ता लगी थी.
यह भी कम हास्यास्पद नहीं है रि कहानीकार को पाठकों के न्यायालय में कहानी का वकील बनकर उपस्थित होना पड़ रहा है . इसलिए माननीय न्यायाधीशों से मैं अपनी कहानी वापस लेने की गुजारिश करता हूं . 😜

[26/02 20:49] Rajnarayan Bohare: संजीव जी सही कहा प्रवेश ने।
यार आप तो अपनी कहानी के खुद ही बाकायदा बिलकुल वकील बन गए।
सब सुनो।मज़ा लो।रैफरी बन के देखिये।
एक नया प्रयोग किया आपने। सचाई के ढांचे पर कल्पना की पर्त चढ़ाई है।दरअसल उपन्यास या लम्बी कहानी का कथ्य है ये तो संक्षिप्त करने में यह सब होगा ही।

[26/02 22:28] Rajesh Jharpare: विलम्ब से चर्चा में शामिल होने के लिए  खेद है मित्रो ।  संजीव चंदन की कहानी लम्बी होने के कारण कल विमर्श में सभी भाग नहीं ले सके थे । आज सभी ने अपनी बेबाक राय दी ।
 भाई राज रंजन जी मंच पर पाठकों की सहमति के साथ उनकी असहमति भी उतना ही महत्वपूर्ण रखती है जितना सहमति । मंच पर आपकी प्रतिक्रियायों का तो सदैव इंतजार रहता है ।


राजनैतिक परिपेक्ष में एक स्त्री के अन्तर्व्दन्व्द को जिस तरह कहानी में दिखाया गया है वास्तव  उसे महसूस करने के लिए कायांतरण के साथ समयान्तरण की समझ को विकसित किया जाना जरूरी है ।

रचना  ग्रोवरजी  वास्तव यह अद्भुत कथा है यह  मैंने अपनी पाठकीय समझ के अनुसार अपनी राय बनाई हैं। आप अपने पाठ और मंच पर विमर्श के अनुसार अपनी राय बना सकती है ।

भाई शेखर सामंतजी विमर्श के दौरान आपने एक अच्छा मुद्दा उठाया.....

" उत्पीड़न तो वहाँ होगा जहाँ नायिका के साथ जोर-जबरदस्ती होगी !
लेकिन जहाँ नायिका की भी सहमति होगी , चाहे जिस रूप में , उसे उत्पीड़न कैसे कहा जा सकता है ?" इस रूप में आगे मंच पर सदस्यों की सहमति से विमर्श रखा जा सकता है ।

उम्र में पुरूष  छोटा होने और स्त्री -पुरुष के बीच सहमति होने पर इसे बलात्कार की श्रेणी में कैसे रखा जा सकता है । संध्याजी ने एक सामान्य सा पर पेचीदा सवाल उठाया है। जिसका उत्तर वह मेरी टिप्पणी के प्रतिउत्तर में चाहती है । संध्या जी आपसे सहमत तो हुआ जा सकता है पर इस तरह के सम्बन्धों में भयादोहन, प्रतिष्ठा, राजनीति में सम्बन्ध को सीढ़ी बनाकर प्रयोग करना बल और कुकर्म की श्रेणी में आ सकते है। इसी तरह की समझ के साथ सारी अवदशाओ को मिलाकर हठात्कार की श्रेणी में रख दिया था । आप इसे कोई दूसरा अच्छा नाम दे सकती है ।

संजीव जी आपको अपनी कहानी पाठक मंच  से वापस लेने का सवाल ही नहीं उठता । अब यह कहानी आपकी कहां रही । यह ढेरों पाठक की पसंद-ना पसंद बन चुकी है ।

आज विमर्श में अपनी सक्रिय उपस्थित दर्ज कराने के लिए प्रवेशजी, निरंजनजी.राज नारायण बोहरेजी,विनयजी राज रंजनजी संध्याजी और अन्य सभी मित्रो का शुक्रिया।

इस बीच मंच पर आकाशवाणी से भी समाचार आये । पद्माजी को बधाई ।

कहानी पर पर्याप्त से अधिक चर्चा हुई ।
सभी का शुक्रिया ।



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