Tuesday, February 23, 2016




◻  उसे दूसरी दुनिया में भेज दिया गया है..।
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 📝 संध्या कुलकर्णी
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पी टी करते हुये तन्मय को अक्सर अपने सर में कुछ बहता हुआ महसूस  होता  है ।पी टी मिस अमिता जब वन टू  थ्री फोर बोलतीं तो उसे लगता ,जैसे सर से कुछ आवाज़ें आ रही हैं ।इसे वो धूप में बहुत देर से खडा होने के कारण होना ही समझता है ।फोर बोलने से पहले ही विश्राम की मुद्रा में आ जाता है ।हमेशा की तरह अमिता मिस चिलला पड़ती है  ..."मेहरबानी करके अपनी-अपनी पोजीशन ठीक रखिये आप लोग "बाज़ू की लाइन में खड़ा मनुहार बड़ बड़ा उठता है "इन पर कोइ पनिशमेंट नहीं है हिंदी बोलने पर ....अगर हमारे मुँह से निकल जाए तो जान ही ले लेते हैं ...हुंह !!"
जानता है तन्मय ,आज मनुहार को हिंदी में बात करने पर पनिशमेंट मिली है गले में एक मोटे गत्ते पर लिख कर टांग दिया है "आई विल नॉट स्पीक इन हिंदी"।
तन्मय को लगता है ये सज़ा भी ज़्यादा बड़ी नहीं है, वरना लिजी मिस तो फाइव हंड्रेड टाइम्स यही वाक्य लिखने की सजा देती हैं,रो दिया था विजय ये कहते हुए .......।
 पी टी हो चुकी है ,सब लाइन से क्लास में जा रहे हैं ,पीछे से राहुल बार-बार टिहुंका मारता है ,वो चिढ जाता है "अबे चुप कर यार "।लिजी मिस दो कदम पीछे चल रही थीं  ,कह उठीं "अगेन हिंदी ...!! तन्मय ...!!" ओह सजा सुना ही दी लिज़ी मिस ने !! अब फाइव हंड्रेड टाइम्स लिखना होगा तन्मय को भी "आई विल नॉट स्पीक इन हिंदी "उसे मतली सी हो आती है वो मुश्किल से नियंत्रित करता है ।उसे अमिता मिस की बड़ी होती हुई आँखें याद आ जाती हैं ,वो डर सा जाता है ।सायास आँखें खोल देखता है ,वो क्लास में है दूर -दूर तक अमीता मिस नहीं है ये सिर्फ डर है उसका .....।   "अरे , ये क्या लिख रहे हो ?होम वर्क ? ये कैसा होम वर्क है तनु ? " "माँ ,मैंने हिंदी में बात की थी न क्लास में तो उसका पनिशमेंट है "लाइनें गिन ली थीं उसने एक पेज पर दस लाइन्स है,पचास पेज लिखना होंगे उसे तब हो पाएंगे पांच सौ ।"बाप रे ...!!पांच सौ टाइम्स ...ये तुम्हारा स्कूल है या पागलखाना ?बात करना होगी तुम्हारी टीचर से "।"ना माँ कुछ बात नहीं करना वरना  स्कूल में सब मुंझसे नाराज़ हो जायेंगे ,प्लीज़ ...
 माँ चुप हो जाती हैं "तुम जानो ,पर बात तो करना ही होगी ये क्या बात हुई भला ...?अपनी भाषा में बोलने में भला क्या पनिशमेंट ?
  माँ को बताया नही है उसने ,माँ नाराज़ होती हैं न स्कूल में आये दिन ऐसी सज़ाएं मिलती रहती हैं ,कल संदीप दो अलग रंगों की जुराबें पहन आया था गलती से तो उसे जुराबें उतरवा कर नंगे पाँव धूप में खड़ा किया था दो घंटे तक ,तभी से ध्यान से जुराबें पहनता है तन्मय ।
तन्मय बैटिंग कर रहा है ....सर में एक बहाव सा महसूस करता है वो ,पर फिर भी बॉल को घुमा कर मार देता है ....सामने से आते सौरभ ने उचक कर कैच कर लिया है । सौरभ बाज़ू वाले अपार्टमेंट में रहता है कॉलेज में पढता है ।"अरे ,आपने क्यों कैच लिया "?झुंझला जाता है तन्मय ।"हटो तुम लोग अब हम खेलेंगे यहाँ
"बस छ सात बॉल हैं उसके बाद तुम लोग खेल लेना"
"अच्छा ,दादागिरी करेगा तू ?हटता है कि,नहीं "?
"नहीं हटूंगा ,क्या कर लोगे?
"अच्छा!!देखते हैं बेटा तुझे बहुत गर्मी चढी है ?"
 कहता हुआ सौरभ बाहर चला जाता है।
 बैट तन्मय के हाथ में है विकेट्स मोनू ने उठा रखी हैं वो लोग ग्राउंड से बाहर जा रहे थे ,सौरभ के हाथ में हॉकी स्टिक है ,और वो अपने चार पांच दोस्तों के साथ सामने खड़ा है ...तन्मय सुन्न हो चला है ,सर पर ,पीठ पर ,हाथों में जांघ पर चोट महसूस करता है लेकिन कुछ भी विरोध नही कर पा रहा है सारे दोस्त उसे पिटता देख रहे हैं .....कोइ कुछ नही बोल रहा है ....वो चिल्ला रहा है...अकेला हो गया है ...सौरभ की आँखे जैसे उबल कर बाहर आती लग रही हैं। सर में कुछ बहाव सा महसूस करता है तन्मय...टी वी स्क्रीन पर निगाहें जमी हैं  उसकी रितिक का गीत बज रहा है..... इक पल का जीना ,फिर तो है जाना ,कुछ पल को खो जाता है तन्मय ....
    "अरे ...तनु....सुन नही रहा ...ले दूध लेजा ..बस कर टी वी देखना ...आज होमवर्क नही करना है क्या ?"
सामने टी वी है माँ की आवाज़ है और वो घर में है ।कराह उठता है तन्मय सर पर माथे पर पीठ पर पैरों पर चोटें हैं उठ नहीं पा रहा है वो , "अरे ये सर पर कैसी चोट है ?तुझे तो चोटें आई हैं....क्या हुआ है लड़ कर आया है क्या ?"
"नहीं माँ ,गिर गया था पतथरो पर ,तो चोट आई है ""सच कह रहां है न ?किसी से मार तो नहीं खाई न"?
"ना माँ झूठ क्यों बोलूँगा भला "झूठ बोल गया था तन्मय ।सौरभ की धमकाती आँखे फिर एक बार कौंध गयी थी उसके आगे "खबरदार ...!अगर किसी से मार के बारे में कहा तो ....।नहीं जानता था तब ये चुप्पी का ज़हर उसके हार्मोन्स का संतुलन बिगाड़ देगा ।
 दबाव ....दबाव.....दबाव....बीस दिन से कमरे में कैद है तन्मय  बस बाथरूम जाता है , कुछ खा लेता है और फिर कमरे में , किताब हाथ में है , नोटबुक सामने है ,पिछले दो महीनों से नींद भी नही आ रही है एक बेचैनी ने उसे जकड रखा है ...उसके आत्मबल को पूरी तरह ख़त्म कर दिया है ।एक डर ने घेर रखा है उसे सोते जागते सौरभ का चेहरा उसे चौका जाता है ।उसे लगता है वो कभी आवाज़ नही लगा पायेगा ...किसी के लिए भी नहीं ...अपने लिए भी नहीं ......बंद कमरे की दीवारें उसे अपनी और खींचती सी लगती हैं ....वह चीखने की कोशिश करता है ,सब सो रहे हैं रात के तीन बजे हैं ....घिघ्घी बन्ध  जाती है उसकी ...पा की चिल्लाहट उसके कानो ने जैसे बजती सी है "इस बार अगर अच्छे नंबर नहीं लाया तो पी सी ऍम नहीं मिलेगा तुझे ज़िन्दगी बर्बाद हो जायेगी तेरी"
"ज़िंदगी..."?उसे रंग अच्छे लगते हैं ,उनसे खेलना भी अच्छा लगता है .....ख़ास तौर से पेड़ों पर चमकता हरा रंग ...संगीत जो निकलता है गिटार से ...जब वो बजाता है "राग काफी"तब खुद भी मगन हो जाता है भूल जाना चाहता है सारी दुनिया ....उसे खेल अच्छे लगते हैं ...क्रिकेट उसका प्रिय खेल है ....उसे फिर घबराहट हो जाती है ...नहीं नहीं ...क्रिकेट के बैट से तो ख़ौफ़ खाने लगा है वो ....क्रिकेट का बैट देखकर तो उसे जैसे  करंट लगने लगा है उसे ......उसका बस चले तो क्रिकेट बैट को अपार्टमेंट के कोने में बने कचरे के डब्बे में डाल आये वो .....मन करता है पा से पूछे ....".ज़िंदगी के क्या मानी है पा "?सर पर उठा शक्ति की ताकत बताता गूमड़ ...पैरों पर उग आये सिक्के से निशाँ ....सौरभ की डरावनी आँखे...लीज़ा मिस का पनिशमेंट ..या पी सी ऍम ...?क्या है पा "?या ये रुपहले से रंग ...या ये राग काफी .....या ये समय कुसमय सर पर बहता हुआ बहाव .....?
    अभिज्ञान के साथ कोचिंग जाता है तन्मय ..सुमित और उसके पांच छ: दोस्त झुण्ड बनाये  चाय की दुकान पर खड़े हैं ..एक डर उसके ऊपर तारी हो जाता है ..कदम वापस घर की और उठ जाना चाहते  हैं ..जेसे सौरभ और उसके दोस्तों का झुण्ड खड़ा हो ...उफ़ !!ये उसका पीछा क्यों नही छोड़ते  ?तन्मय कोचिंग जाना छोड़ देता है ..स्कूल भी जाना छोड़ देता है....उसका कमरा किताबें और नोटबुक...किसी से बात का मन नहीं रहता उसका..कहीं नहीं जाना चाहता ...भरी दुपहरिया में रज़ाई ओढे पड़ा रहता है वो....आवाज़ें आवाज़ें ...चारों और से उसे परेशान करती हैं.."पढ़ाई कर ""अच्छे नंबर लाना है न "",अरे सोता ही रहेगा क्या ""और सबको काटती एक आवाज़ "खबरदार !!जो किसी को बताया ......"।
     डर उसे घेरे रहता है ...दबाव ....दबाव ....दबाव कोचिंग नहीं जाना चाहता वो अभिज्ञान ने चलते हुए कुछ  मज़ाक किया है।अवश हो गया है तन्मय....उसे ज़ोर का थप्पड़  मार देता है ...उसे कुछ नही पता वो ऐसा नही करना चाहता था ....
कोचिंग क्लास में कुर्सी उठा कर फेक देता है ...अयूब सर नाराज़ हो जाते हैं"अरे कोइ इसके पेरेंट्स को बुलाओ पगला रिया है लड़का.....तन्मय होश खो चुका है ।
     
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अस्पताल का कमरा है माँ सिरहाने बैठी हैं
"कैसा लग रहा ही तनु "?
"ठीक हूँ माँ"
"अब कुछ टेंशन न ले पढ़ाई का समझा न"?
एग्जाम नही दे पाया है वो ....डर ने उसका आत्मबल छीन लिया है ।चार साल एग्जाम नही दे पाता है वो मुश्किल से घर पर रहकर ही हायर सेकंडरी पास कर पाया है उसके सपनों को नज़र लग गयी है ..बी कॉम किया है उसने ...अवसाद में सब रंग फीके लगते हैं उसे रंग जिनमे ज़िंदगी थी, रंग जो उसे पसंद थे  उसके भीतर उत्साह भरते थे अब दीवारें ही बातें करती है और ....एक डर की स्थाई ज़द के भीतर कैद हो जाता है वो ....रात को आसमान में तारों से बातें करता है वो सप्तऋषि कथाएं सुनाने लगते हैं उसे ,ठीक जैसे माँ सुनाया करती थीं बचपन में ...ऑफिस जाती हुई माँ का आँचल पकड़ कर अक्सर रोका  है उसने ..माँ नही रुक पाती थी , बस कारण कुछ अलग थे घर चलाना है दोनों पा और माँ मिलकर काम ना करें तो कैसे चलेगा ...वह कहना चाहता है माँ से बहुत डर लगता है माँ मत जाओ मुझे कुछ नहीं चाहिए ....लेकिन कुछ भी नहीं रुक पाता माँ के कहने में अब दवाओं का खर्च भी जुड़ गए हैं ...अपने दादू के दादी के ...खुद उनके और मेरे भी ...एक ब्लैक होल है जहां की और सारे रास्ते जाते हुए लगते हैं उसे आजकल...।सपनो की दुनिया में वो एक ऊंचाई पर खड़ा है ...सपने देखने होते हैं तभी तो उन्हें प्राप्त किया जा सकता है...लेकिन जैसे एक बड़ी सी खाई है जो पार नही हो पा रही है उससे ...कदम बढानेे की ताकत ही खो चुका है वो अब आवाज़ें हैं पर उनमे नई नई आवाज़ें शामिल हो गईं हैं...बाहर से गुज़रती ट्रक की आवाज़ें ,मोटर सायकल की आवाज़ें कोई फेरी वाला जेसे जान बूझ कर उसे ही परेशान करने को चिल्ला रहा हो ...दवाईया... दवाईयां ...वो नहीं लेना चाहता ,जागे रहना  चाहता है हमेशा ,जीवन सिमट गया है उसका ...सौरभ की आँखें जैसे हर और उग आईं हैं हज़ार हज़ार आँखों  में तब्दील हो गईं हैं... छुप जाना चाहता है वो ...दूर कहीं चले जाना चाहता है ..घर की दीवारें काट खाने दौड़ती हैं उसे...लिफ्ट में रहता है वो वहाँ उसे सुरक्षित लगता है ऊपर जाना नीचे आना ...वही उसके अस्तित्व  की पहचान बन गयी है ।
 अपार्टमेंट के लोग आदी हो गए हैं उसकी वहां खामोश उपस्थिति के,कोइ सर थपथपा देता है ,कोइ हैलो कहता है वो भी मुस्कुरा देता है ।वीणा ऑन्टी को देखकर घबरा जाता है वो ,अक्सर वो उसे लिफ्ट से बाहर निकालने की कवायद कर चुकी हैं ...उन्हें भी डर लगता है ....शायद मुझसे ,एक डरे हुए व्यक्ति से डर ....?वो हंस पड़ता है ,धीरे-धीरे वीणा ऑन्टी की आँखें लिज़ी मिस की आँखों में बदल जाती हैं...अब वो उस समय अक्सर लिफ्ट में नहीं रहना चाहता ।कॉलेज जाने वाले लड़कों का झुण्ड लिफ्ट में चढ़ता है ,उतरता है ,वो घुटनों में सर दे देता है पसीना पसीना हो जाता है...सौरभ की उबलती आँखें उसकी गर्दन में उतर जाती हैं ।

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अकेलेपन  में ही अच्छा लगता है उसे ...पेड़ पर टँगी फुनागियां उचक कर छु लेना चाहता है तन्मय अपनी इच्छाओ की बनाना चाहता है पतंग ...पतंग जो कहीं खो गयी है ,उसे ढूंढ कर लाना चाहता है वो ...ट्रेन की खिड़की में बैठ यात्रा पर जाना चाहता है ठीक ....
बाईस साल पहले जब आया था इस दुनियां में उस लम्हे में रुक जाना चाहता है ....वो जो उस एक लम्हे में आज तक अपनी ज़िन्दगी का सिरा ...जो ख़्वाबों के जंगल में कहीं उलझ कर छूट गया है, उसे दौड़ कर पकड़ लेना चाहता है तन्मय....रंगों की बौछार में बदल लेना चाहता है अपना चेहरा ...चेहरा जिसमे डर एक स्थाई भाव बन कर रुक गया है..बदल लेना चाहता है।
 "दादी मुझे आज नहीं जाना कोचिंग "
 "दादी ,एक कप दही दो न खाने को ,अच्छा रहने दो "
 "माँ,मत जाओ ना ऑफिस"
 "खबरदार ...!!जो किसी से कहा तो ..."
"पा,नाराज़ मत हो ,अच्छे नंबर लाऊंगा इस बार"
 "माँ,मेरी दवाईयां ख़त्म हो जाएंगी न ?
 "ऐ ,आवले के पेड़ मुझे मेरी शक्तियां लौटा दो न "
"माँ ,मैं सक्सेसफुल हो जाऊंगा न ?"
,तनु,तन्मय....तैनु......ssss ओ ..तन्मय.....
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 ⭐संध्या कुलकर्णी
 A 76 रजत विहार कॉलोनी
 होशंगाबाद रोड
भोपाल (म  प्र  )
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प्रतिक्रियाएं
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[19/02 09:17] Padma Ji: संध्या कुलकर्णी को अच्छी सामयिक के लिए बधाई। वर्तमान में बच्चों पर पढाई का बोझ तो है ही पर इंग्लिश मीडियम स्कूल में इंग्लिश में बात करने का अतिरिक्त बोझ भी है। अनुशासन के नाम पर बच्चों के मन में भय व्याप्त जाता है फिर वे अपने अध्ययन पर पूरा ध्यान नही दे पाते। बच्चे की मनः स्थिति का चित्रण और स्वप्न के समय के प्रतीक कहानी को उत्कृष्टता प्रदान करते हैं। एडमिन त्रयी को बधाई
[19/02 11:54] ‪+91 94257 11784‬: आदरणीया संध्या कुलकर्णी की कहानी , उसे दूसरी दुनिया में भेज दिया गया है , कथ्य एवं शिल्प दोनों ही द्रष्टियो' से अत्यन्त उत्कृष्ट कहानी है ।हमारे समय की बेहद जरूरी कहानी भी ।
   आज अंग्रेजी माध्यम वाले स्कूल हमारे बच्चों की रचनात्मक ऊर्जा पर तो  वज्राघात  कर ही रहे हैं,  वे हमारी भाषा और संस्कृति के संहार में भी संलग्न हैं । कैसा दुर्भाग्य है कि  इन स्कूलो मेकोमल मन तन्मय जैसे सहस्रों बलक बालिकाओं के लिए विद्यालय परिसर में मातृभाषा का प्रयोग पूर्णतः निषिद्ध रहता है और इस निषेधाज्ञा के तनिक उल्लंघन के परिणामस्वरूप उन्हें घनघोर उत्पीडन से गुजरना पडता है ।
     संध्या जी की यह कहानी वस्तुतः बालक के स्वाभाविक एवं मुक्त विकास में अवरोधक अनेक तत्वों की ओर बडी मार्मिकता से इंगित करती है । कहानी का तन्मय का बडे लडकों के आतंक के साये में रहना दूभर रहता  ।उसके माता पिता भी उसका कैरियर बनाने की धुन में उस पर अनेक आदेश,निर्देश,  चेतावनियां थोपकर उसका तनाव बढाते रहते हैं ।और इस तरह बेचारा बालक लगभग अर्द्ध विक्षेप की स्थिति में पहुंचने लग जाता है ।
  यह बडी भयंकर स्थिति है ।इससे  अपने देश और समाज को उबारना हमारी उच्च प्राथमिकता होना चाहिए । आदरणीया संध्या कुलकर्णी जी  की  कहानी हमारी इस बडी आवश्यकता को बहुत गहरे से रेखांकित करती है।
       अंत में इस अद्भुत और आवश्यक कथा के लिए कथाकार को बहुत बहुत बधाई  , अभिनंदन ।मंच के सुधी नियामकों, श्री राजेश झरपुरे जी , मधु जी , प्रवेश जी के प्रति हार्दिक आभार  ।
[19/02 12:36] Archana Mishra: बालमन पर लगी चोट ,किसी बात का  भय कब  धीरे-धीरे अंदर उथलपुथल कर मनोरोग से बच्चे को ग्रसित कर देता है और जब तक हमें पता चलता है तब तक  बहुत देर हो चुकी होती है।
बाल मन  के मनोविज्ञान पर आधारित, मन को विचलित करती कहानी।
बहुत बधाई संध्या।
[19/02 12:45] Niranjan Shotriy sir: संध्या जी की बहुत अच्छी कहानी।मासूम मन और बाहरी कर्कशता के द्वंद्व की कहानी। इस कहानी का शिल्प अद्भुत है गोया कोई फ़िल्म चल रही हो। Fractured narration के जरिये कहानी गहरे तक उद्वेलित करती है। कॉन्वेंटी संस्कृति पर भी सटीक वार। बधाई संध्या कुलकर्णी,बधाई मंच।
[19/02 13:28] Kavita Varma: युवा पीढ़ी कितने दबाव में जीती है ये आजकल कोई नही समझता । यही कहा जाता है हमारे समय मे    इन्हे तो सब सुलभ है   पर उसकी कीमत   ऐसी कहानियॉ लिखी जाना चाहिये जो मार्गदर्शक बनें । बधाई संध्या जी।
[19/02 13:37] Saksena Madhu: हाँ कविता .....मानसिक दबाव का क्रमबद्ध चित्रण किया लेखिका ने ..लिखी जानी चाहिए ऐसी कहानिया । आभार ।
[19/02 15:14] ‪+91 98260 44741‬: समसामयिक विषय पर लिखी गयी एक सशक्त कहानी। किशोर मन कितने तरह के डर और तनाव में रहता है और इन सबका उनके जीवन पर क्या प्रभाव हो सकता है इसका चित्रण बहुत ही सटीक और भावुकतापूर्ण किया है। स्कूल से लेकर घर, कोचिंग, खेल के मैदान तक रोज़ कितनी जगह कितने तरह के डर और तनाव हो सकते है यह बखूबी बताया है। ऐसी कहानिया किशोरों की मनोव्यथा को समझने में सहायक होती हैं। लेखिका संध्या जी को इसके लिए बहुत बहुत धन्यवाद एक जरुरी विषय पर उन्होंने संवेदनशील तरीके से ध्यान आकर्षित करवाया है। 🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼😊😊
[19/02 16:08] Pravesh: "तारे जमीन पे " पिच्चर याद आई आज इस कहानी को पढ़ते हुए ।किशोर से युवा होता मन भी इस तरह की दहशत से मुक्त नही हो पाता,जो अनायास ही उसके बाल मन को भयभीत कर चुकी होती है  ।  इस तरह के बच्चे विशेष योग्यता रखते है ,लेकिन वह योग्यता भय की बलि चढ़ जाती है ।बाल मनोविज्ञान की बेहतरीन कहानी लगी यह ।

शुभकामनाएं संध्या
🙏💐🙏
[19/02 17:31] Rachana Groaver: बहुत ध्यान से कहानी पढ़ी
1.ये कहानी उच्चमध्यमवर्गीय परिवार की कहानी है।
2.इस कहानी का मुख्य पात्र कान्वेंट स्कूल में पढता है।
3.जहाँ टीचर सीनियर सब्जेक्ट सबसेे भय हैं।
क्यों?
समस्या भाषा
हमारा इकलौता देश है जिसकी अपनी भाषा होते हुए भी वह दूसरी भाषा पर निर्भर करता आया है। कारण विवास्पद हैऔर लगातार वाद विवाद के पश्चात भी हम किसी नतीजे पर नहीं पहुंचेंगे।
subject PCM?????
क्योंकि हर माँ बाप को बीटा इंजीनियर चाहिए जो करोडो काम सके
और ये माँ बाप कौन हैं???
आप और हम
कसम खा कर बताइए कि आप में से कितनों ने अपने बच्चों को कान्वेंट में नहीं पढ़ाया है???
[19/02 19:32] shivani sharma Ajmer: कहानी भी पढ़ी और आप सब विद्वजन के विचार भी।
शिक्षण कार्य से जुड़े रहने के कारण मैने इसे और भी नज़दीक से देखा है।
अभिभावकों की अतिमहत्वाकांक्षा का फायदा स्कूल वाले उठाते हैं और उसकी कीमत न सिर्फ अभिभावक स्वयं बल्कि बच्चे भी चुकाते हैं । कभी मशीन बनकर कभी अर्द्ध विक्षिप्त बनकर तो कभी जान देकर...
[19/02 20:06] Amitabh Mishra मंच: दबाब बच्चों को कहाँ से कहाँ पहुँचा देता हैं ये कहानी उसका सठिक वर्णन करती हैं l समाज का मानवीय चेहरा कहीं खो सा गया हैं l स्कूल,घर का मानसिक दबाब और खेल के मैदान की पिटाई उसे मानसिक रुप से तोड़ देती हैं और एक सुखद संभावना का त्रासद अंत होता हैं l इसके जिम्मेदार हमारा समाज हैं l स्कूल से लेकर घर तक माहौल बदलना होगा l जिससे बच्चे असमय मुरझाने ना पायें l याद रखना होगा  आज के बच्चे ही कल के भविष्य हैं l                                      अमिताभ मिश्र
[19/02 21:46] Rajnarayan Bohare: हाँ बहुतेरे पक्ष है इसमें। बस्स ठीक से संवर जाये  तो यादगार कहानी होगी।
[19/02 21:51] shivani sharma Ajmer: सभी पक्ष आपस में मकड़जाल की तरह उलझे हुए हैं । सभी पक्षों को मिलकर ही हल निकालना होता है। शुरुआत अपने आप से, अपने घर से और अपने संस्थान से ही होती है
[19/02 22:20] Sandhya: रचना जी  ,राजनारायण जी प्रज्ञा रोहिणी जी ,पद्मा ,संतोष जी ,जगदीश तोमर जी ,अर्चना ,निरंजन जी ,कविता जी ,विनीता ,भूपेंद्र कौर जी ,शिवानी जी ,अमिताभ जी सभी का बहुत शुक्रिया सकारात्मक टिप्पणियों सेबहुत अच्छा लगा कुछ सलाह भीमिली जिसे मैंने ह्रदय से ग्राह्य किया ।बहुत जल्दी में लिखी गयी कहानी है ।और प्रवाह में ज़रूर ही कुछ कमियांभी रह गयी है जिसे निश्चित रूप से दूर करने की कोशिश करूंगी ।
सभी को एक बार फिर शुक्रिया
विशेष रूप से प्रवेश और मधु का शुक्रिया जिन्होंने कहानी पर सतत अपने विचार रखे ।
राजेश जी और मंच दोनों का शुक्रिया 🙏💥
[19/02 22:22] Rajesh Jharpare: आज आप सभी ने मंच पर संध्या कुलकर्णी जी की कहानी '   उसे दूसरी दुनिया में भेज दिया गया है...'  पढ़ा और  अपनी महत्वपूर्ण  प्रतिक्रिया से अवगत कराया । एक सामयिक विषय पर उनकी कहानी  को बेहतर प्रयास के रूप में देखा जा सकता है । इन दिनों हमारे समाज और परिवार में सबसे अधिक तनाव ग्रस्त अध्ययनरत युवा पीड़ी ही है । यह तनाव कौन केन्द्रित कर रहा जैसी समस्या से रूबरू कराती कहानी के लिए सुधा जी को बधाई और सभी मित्रों का शुक्रिया ।

शनिवार और रविवार को सम्पूर्ण अवकाश के पश्चात सोमवार को अपने सदस्य  मित्रो की कहानी के साथ हभ फिर मंच पर होंगे।

शुभरात्रि मित्रो
[20/02 09:31] Braj Ji: कहानी पढ़ी..उम्दा लगी.कहानी लिखना और उसे मनोविष्लेषण के साथ निबाहना..
[20/02 15:19] ‪+91 95337 18860‬: संध्या जी की कहानी आज पढ़ी , एक दम आज के स्कूलों और जीवनशैली को टक्कर देती कहानी ।
बधाई संध्या जी
[20/02 22:59] Rakesh Bihari Ji: संध्या कुलकर्णी की कहानी कथावस्तु की प्रासंगिकता और शिल्प की सहजता के कारण सहज ही हमारा ध्यान खींचती है। कैसे स्कूल की कुछ व्यवस्थाएं बच्चों से उसका बचपन छीन रही हैं और बच्चे भय से कहीं बहुत आगे एक ख़ास तरह की इमोशनल ब्लैकमिंग का शिकार हो रहे हैं, उसकी बहुत ही प्रमाणिक छवियाँ पेश करती है यह कहानी। पात्र के तनाव को पाठक के तनाव में बदल पाना इस कहानी की बड़ी ताकत है। युवा होने की दहलीज पर खड़े किशोरों के मनोविज्ञान को संध्या ने बखूबी पकड़ा है। मैंने आज उनकी पहली कहानी पढ़ी है, मुझे उनकी आगामी कहानियों का इंतज़ार है।  बधाई और शुभकामनायें!

Sunday, February 21, 2016


🔷 देह भर नहीं
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🔵नवनीत मिश्र
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‘ आज मन कैसा है? ’ पूछने के साथ ही इनका एक हाथ मेरी एक बांह पर आ जाता है,कुछ ऐसे कोण से कि मुझे लगे कि हाथ मेरी बांह पर रखा गया है,लेकिन तीन अंगुलियों के बाहरी पोर . . . .
मेरा ही शरीर और मेरे साथ ही धोखा- इनकी ‘चतुराई’ पर मन ही मन हंसी आती है।
बेटू ने पहली बार जब मेरी एक बांह के घेरे में मुझसे एकदम सट कर अपने गुलाबी और नरम होठों से छुआ था,उसी दिन से मेरे लिए अपने इन भंडारागारों की भूमिका जैसे बदल गई थी। पहले, इनको अपने मोह-पाश में बांधकर अवश करने के लिए,जिनको अस्त्र की तरह प्रयोग में लाती थी,उनके जरिए मैं बेटू की नस-नस में प्रवहित हो रही थी। मेरे प्राणों का एक हिस्सा बेटू के होठों के रास्ते उसके अंदर खिंच रहा था। जब बेटू एक पर अपना कब्जा जमाए रखते हुए दूसरे को भी अपने नन्हें हाथ से दबोचे रखता तो उसकी इस अधीरता को देख हुलास से भर कर सोचती कि लालच कैसे पैदा होते ही शुरू हो जाता है।
मेरा कद मेरी ही निगाहों में बढ़ गया था। मैं गर्व से छलकती रहती कि एक छोटे से संसार को जीवित रखने की जिम्मेदारी मेरे ऊपर है,कि यह काम मैं और सिर्फ मैं ही कर सकती हूं। और कैसी थी वह अनुभूति कि इतने वर्षों बाद भी वह ज्यों की त्यों ताजा है,मगर देखती हूं कि इनकी बौनी अंगुलियों के लिए जैसे कहीं कुछ बदला ही नहीं है।
‘ क्या?’ पूछकर मैं, ‘मन कैसा है ?’ का जवाब तय करने के लिए जरा देर की मोहलत ले लेती हूं।
यह तो अब हो रहा है कि ‘मन कैसा है’ के जवाब की प्रतीक्षा की जा रही है, नहीं तो कोई और समय होने पर अगर जवाब होता,‘ठीक है’, तब तो इनके लिए जैसे खुला आमंत्रण ही होता और अगर जवाब होता ‘ठीक नहीं है’ ,तो इनके हिसाब से सारी तकलीफों का बस एक ही कारगर इलाज होता है . . . .
अब तो बस जी करता हैकि घंटों चुपचाप बैठकर गुजार दूं। अगर हो सके तो इनका अपने पास होना कुछ उस तरह महसूस कर सकूं ,जैसा कि वास्तव में पास रहते हुए भी कभी महसूस नहीं कर सकती। मैं जहां आ गई हूं ,वहां पहुंचने के लिए मैं देह को सीढ़ी की तरह इस्तेमाल कर चुकी हूं। अब चाहती हूं कि इन्हें देह से परे करके भी देखूं-देह से परे होकर भी इनसे मिलूं। मगर पता नहीं ऐसा कभी होगा या नहीं,या होगा तो कब? ये कभी नहीं समझेंगे कि मेरे पास होने का हर समय सिर्फ एक ही प्रयोजन और एक ही अर्थ नहीे होता। ये कभी समझना ही नहीं चाहते कि मन के ऋतु-चक्र में मधुमास लौटकर नहीं आता,उसकी सुखद स्मृतियों से ही पतझड़ की पीली,सूखी पत्तियों को बुहार कर मन-आंगन चमचमाता हुआ रखना होता है।
पिछले कई अवसरों की तरह एक बार जब मैं मिनट-मिनट गिनकर उस समय के गुजर जाने की प्रतीक्षा कर रही थी,मेरा ठंडापन इनसे छिपा नहीं रह सका।
‘ प्यार में देह ही सब कुछ होती है ,बाकी सब झूठ और आत्मप्रंवचना है . . . शरीर न हो तो प्यार के लिए कुछ भी बचा नहीं रहता। तुम इतनी सी बात भी नहीं समझतीं? मैं तुम्हें जीवन भर इसी तरह प्यार करता रहूंगा,चाहे जितनी भी उम्र के हम क्यों न हो  जाएं . . . .मगर तुम्हारे पास आकर लगता है जैसे मैं कोई पूरंपूर पुरूष न होकर कोई बलात्कारी हूं ’ . . . ये उन्मादी की तरह कह रहे थे और मैं सोच रही थी कि हर समय अपनी ही इच्छाओं की सुगंध की गमक में बेसुध ये,क्यों नहीं सोचते कि देह का पेड़ अब हर रोज,हर समय वसंत से लदा नहीं मिल सकता। इनसे अपनी ययाति आकांक्षा से छुटकारा पाने की विनती करते हुए कहना चाहती थी कि मैं नारीत्व के जितने ऊंचे शिखर पर चढ़ना चाहती हूं ,तुम मुझे उतना ही मांस के पोखर में खीच ले जाना चाहते हो।
मैं जहां से खड़ी होकर इन्हें अपने साथ चलने के लिए आवाज लगाती हूं ,वहां तक पहुंचने का इनको बस एक ही रास्ता मालूम है। ये उसी रास्ते में भटक कर रह जाते हैं और मैं इनकी प्रतीक्षा करती फिर अकेली खड़ी रह जाती हूं। ये जितनी बार मुझ तक पहुंचने में असफल रहे हैं,उतनी बार मेरे हाथ से जैसे कुछ छूट-सा गया है। जब-जब इन्होंने अपने आपको मेरे ‘ निकट हो जाना ’ समझा है,दरअस्ल तब-तब मैं इनसे जरा-जरा दूर होती गई हूं।
बी0एससी के पहले साल मेें ही बेटू का दाखिला मेडिकल कालेज में हो गया था और पढ़ने के लिए उसे बाहर जाना था। उसके जाने के दिन जैसे-जैसे नजदीक आते जा रहे थे,मेरे अंदर से कोई चीज जैसे बाहर को खिंचती जा रही थी। मेरे दिमाग में जैसे  हिसाब-सा चलता रहता कि एम0डी0 या एम0एस0 करके एक सुयोग्य डाॅक्टर बनने में जो आठ-दस साल लगेंगे उनमें तो बेटू हमसे अलग रहेगा ही,फिर शादी हो जाने के बाद हमारे साथ रहा भी तो कितना हमारे साथ का रह जाएगा। मोह से मेरा वह सीधा परिचय हो रहा था। तभी तो कभी-कभी सोच बैठती थी कि इससे तो अच्छा होता अगर बेटू अभी बी0एससी या एम0एससी ही करता रहता। हाॅस्टल के लिए उसका सामान बांधते न जाने कितनी बार बिखरी थी। मेरी सारी दिनचर्या तो बेटू की दिनचर्या के हिसाब से ही निर्धारित हो गई थी। रात-रात भर पढ़ा करने वाले बेटू को चाय बना-बना कर देती,सवेरे उसके यूनिवर्सिटी चले जाने के बाद उसकी बिखरी किताबें और कापियां सहेजती और यहां तक कि दस बजे इनके आॅफिस के लिए निकल जाने के बाद किसी न किसी बहाने रूकी रहा करती थी कि पौने ग्यारह-ग्यारह बजे बेटू लौट आए तब नहाने के लिए गुसलखाने में घुसूं नहीं तो उसे बाहर खड़े रहना पड़ेगा।
बेटू के हाॅस्टल चले जाने के बाद मेरी तो जैसे सारी व्यस्तताएं ही खत्म हो गईं। जैसे करने को कुछ रह ही न गया हो। उसके कमरे में जाती तो डबडबाई आंखों में माइकल जैक्सन और सचिन तेंदुलकर के उतार लिए गए पास्टरों के पीछे दीवार पर छूट गईं आयताकार छायाएं गड्ड-मड्ड होती हुई मुझे याद दिलातीं कि बेटू अपना नया संसार हाॅस्टल के किसी कमरे में बसा रहा होगा। एक बेटू के सूने कमरे की वजह से पूरे घर में सन्नाटा टनकने लगा था। नहाते समय उसका जोर-जोर से गाना याद आने पर मैं विह्वल हो उठती।  छटपटाते मन को एक ही प्रतीक्षा थी कि ये बेटू को छोड़ कर लौटें और मैं उसके राजी-खुशी होने का समाचार सुनूं तो इस उदासी और अकेलेपन से शायद कुछ त्राण मिले।
ये चार दिन बाद लौटे। दरवाजा खोलते ही इनको सामने खड़ा देखा तो लगा जैसे श्रीराम को वन के कठिन रास्तों पर छोड़कर खाली रथ लिए सुमंत अयोध्या वापस लौटे हों। इन्होंने अपनी अटैची एक तरफ रखकर खोली और उसमें से तौलिया निकालकर गुसलखाने में घुस गए। मैंने अनुमान लगाया कि शायद बेटू को लेकर ये भी अंदर से भरभराए हुए हैं और ऐसे में अपने को हल्का करने के लिए बाथरूम से अच्छा स्थान और कौन सा हो सकता है। अब ऐसा भी क्या? आखिर पढ़ने ही तो गया है। क्या लोगों के बच्चे पढ़ने के लिए घर से बाहर नहीं जाते? मैं इनके लिए चाय बनाते हुए सोच रही थी कि इस समय इनको ऐसे ही किसी दिलासे की जरूरत होगी। ये गुसलखाने से बाहर निकले तो मैंने इनको चाय का मग थमा दिया। इन्होंने मग पास की तिपाई पर रख दिया और मुझे अपने से लिपटा लिया। मैं जान गई कि बेटू के विलगाव से अपने अंदर घुमड़ रहे दुःख को अब ये अकेले में बहा देना चाहते हैं।
और ठीक भी है,मैंने सोचा,पुरूष हैं ऐसे कैसे किसी के भी सामने रोने बैठ जाते? औरत का क्या,जहां चाहे टेसुए बहाकर अपने को हल्का कर ले। मैंने सोचा तो इनके ऊपर दया हो आई कि पुरूष बेचारे धैर्य धारण करने के सिवाय और कुछ नहीं कर पाते। कुछ देर पहले दिलासा के तौर पर जो कहने की सोच रही थी,उसे दबा गई। कभी कभी रो लेना भी दिलासा होता है। कई दिनों के गर्द-गुबार के बाद ऐसे ही खाली पानी से भिगो लेने के कारण चीकट से हो गए इनके बालों में अंगुलियां उलझाने-निकालने लगी। इनके दुःख को सहलाने के लिए इनका सिर अपने सीने में छिपा लिया।
तभी एकाएक मैंने जाना कि ये सुमंत  नहीं थे।
जाते समय जरूर ये रथ लेकर गए थे लेकिन लौटे थे एक जर्जर छकड़े पर जिसमें थरथराती टांगों वाले,कामनाओं के मरियल बैल जुते हुए थे। क्या पिछले चार दिनों तक बेटू की सारी व्यवस्था करते हुए इनका मन,यहां घर के अंदर सुलभ हो गए निर्विघ्न एकांत के अवसर को लार बहाता देखता रहा था? अचानक इन्होंने अपने चुंबनों के थूक से मेरी गरदन,मेरे कंधे और मेरे होठों को लसलसा दिया था।
मैं अवाक् रह गई।
‘ प्लीज,मुझे बेटू के बारे में बताओ न . . .’ मैंने इनको अपने पैरों पर सीधे खड़े रहने के लिए कंधों से पकड़कर थोड़ा पीछे किया और कुछ मचल कर कहा।
‘ बेटू के बारे में भी बताऊंगा . . .’ इन्होंने सूख रहे गले से कहा और बेसब्री से ब्लाउज के हुक खोलने लगे।    
‘ तुमको तो हर वक्त बस . . . दुनिया में इसके अलावा और भी बहुत कुछ होता है . . .’ मैंने अपनी उकताहट दबाते हुए कहा और धीरे से इनका हाथ हटा दिया।
‘ दुनिया में इसके अलावा भी कुछ होता है क्या? ’ इन्होंने फिक्क से हंसते हुए ढिठाई से कहा और मुझे अपने से जकड़ने लगे।
‘ मैं चार दिनों से अधमरी-सी घर के इस कोने से उस कोने तक घूम रही हूं कि तुम आओ तो . . छोड़ो मुझे. .’ मैंने विरक्ति से भर कर कहा और इनकी जकड़न से छूटने की कोशिश करने लगी।
‘ जाओ छोड़ दिया। अब छत पर जाकर खड़ी हो जाओ और सबको चीख-चीख कर बताओ कि मैं कितना नीच आदमी हूं जो अपनी बीवी को प्यार करना चाहता हूं। ’ इनका सारा उत्ताप खिसियाहट बनकर पिघल रहा था। इन्होंने नथुने फुलाकर चीखते हुए कहा और लगभग धक्का देकर मुझे अपने से दूर करके अपने कमरे में जाने के लिए मुड़े। मैं जान गई कि नाराज होकर अपने को कई घंटों के लिए कमरे में बंद कर लेने का सीन शुरू होने को है। अब तो बेटू भी नहीं था जिसे मध्यस्थ बना कर जरा देर में स्थिति सामान्य बना लिया करती थी।
‘ देखो नारान मत हो। मैं बेटू के बारे में एक-एक बात जानने के लिए कितनी बेचैन हूं तुम नहीं जानते . . .’ मैंने इनको कमरे में जाने से रोका और इनका एक हाथ अपने हाथ में ले लिया।
‘ तुमसे जरा भी सब्र नहीं होता। मैंने क्या कहा कि बेटू के बारे में नहीं बताऊंगा? ’ इन्होंने मान-सा करते हुए कहा जो उस समय मुझे एक आंख नहीं सुहाया।
‘ तुमको भी तो बिलकुल सब्र नहीं है . . .’ मैंने बात को संभालने के लिए हल्के-फुल्के ढंग से कहा।
‘ हां,नहीं है सब्र। अपनी चीज के लिए क्यों करूं सब्र? ’ इन्होंने मेरे कहने को अपने ढंग से लिया। अचानक इन्होंने मुझे गोद में उठा लिया और कमरे में ले जाकर बिस्तर पर गिरा दिया।
‘ ये समय जो जा रहा है,लौट कर नहीं आएगा। इसके एक-एक पल में भरे आनंद को निचोड़ लेंगे हम . .देखो तो,इतने बड़े सुख के लिए कितना कम समय मिला है हमें . . .’ मुझे पीसते हुए सन्निपात के किसी रोगी की तरह ये बोले जा रहे थे।
‘ मुझे अपने बेटू की याद आ रही थी कि यह समय उसके यूनिवर्सिटी से लौटने का हुआ करता था और मैं उसके आने तक नहाने के लिए रूकी रहा करती थी। ‘ अब तो बस घर में मैं हूं और तुम हो . .अब तो जब भी जी करे . . .’
मुझे ध्यान आ रहा था कि मेडिकल कालेजों में नये लड़कों की कभी-कभी ऐसी रैगिंग की जाती है कि कभी-कभी एकाध बच्चा तंग आकर आत्महत्या तक कर लेता है। बेटू की याद से पहले से ही बोझिल मैं,उसकी कुशल-कामना के लिए ईश्वर से भीख-सी मांगती हुई कातर ढंग से रो पड़ी।
‘ क्या इसी को कहते हैं रति-विलाप? ’ ये कह कर जरा सा हंसे।
 मैं बेटू के पास से एकाएक कमरे में लौट आई थी और इस बार इनके बोले शब्दों को स्पष्ट सुन सकी थी।
हां,यह भी रति-विलाप ही है। अंतर केवल इतना है कि रति के विलाप करने पर क्रुद्ध शिव ने अपने श्राप को कम करते हुए उसके पति काम को निराकार रूप में मन में जीवित रहने दिया था, पर बेटू की याद और उसकी चिंता के मेरे पवित्र अनुष्ठान को भंग करने के लिए काम को भेजकर तुमने उसके निराकार रूप को भी मेरी घृणा का शिकार बना दिया है। अब वह मेरे मन में भी जीवित नहीं है,जिसके साथ अभी मैं कई वर्षों तक और रहना चाहती थी- मैंने सोचा और सिसक कर रो पड़ी।
‘ आनंद के चरम क्षणों में कभी-कभी रोने का भी मन करता है . . .लेकिन औरत शुरू में इंकार करने के नखरे न करे तो आदमी को पागल कैसे बनाए? ’ इन्होंने किसी विशेषज्ञ की तरह कहा और मेरे गाल पर एक हल्की-सी चपत लगा कर उठ गए।
मैंने चपत वाली जगह पर गाल को हथेली से खूब रगड़ कर साफ किया। जरा-सी  देर में मैं सूखे कुएं जैसी हो गई थी जिसमें सारे अहसास छूंछे बर्तनों की तरह ठन्-ठन् बजने लगे थे। ये जैसे वेश्यागमन करकेे जा चुके थे और मैं इनके पसीने और अपनी देह पर छूट गई खट्टी गंध से पैदा हो रही तेज उबकाई से छुटकारा पाने के लिए वाॅश-बेसिन पर झुकी कै करने के लिए जोर लगाती रही।
‘ आदमी का दिन कैसा बीतेगा यह इस पर निर्भर करता है कि उसकी पिछली रात कैसी बीती। ’ एक दिन इन्होंने अपने मित्रों और उनकी पत्नियों के बीच तीर-सा छोड़ते हुए कहा। ये तीर उन रातों से पैदा हुए जहर से बुझा हुआ था,जो मैंने इनकी ओर पीठ फेरकर गुजारी थीं। निशाने पर मैं थी,यह बात सिर्फ मैं जान सकी थी क्योंकि बेटू को हाॅस्टल छोड़कर आने के बाद की घटना से मैं सचमुच ही जैसे बुढ़ा गई थी।
‘ हां भई, आप लोग ठहरे पुरूष-समाज के अमीर। आप लोगों के पास ले-देकर करने के लिए वही एक ‘श्रम’ बच रहता है और हम ठहरी स्त्रियां-समाज की गरीब,बेचारी स्त्रियां। हमारे जीवन में तो कहने को वही एकमात्र ‘मनोरंजन’ है। ’ मैंने उस दिन की घटना को याद कर-करके जो खौलता हुआ लावा अपने अंदर इकट्ठा कर लिया था,उसे हंसी में लपेटते हुए इनके चेहरे पर दे मारा।
तिलमिलाकर भी जब ये किसी बात का जवाब नहीं दे पाते हैं तो इनके दाहिने नथुने के किनारे ऊपरी होठ के ठीक ऊपर एक गड्ढा-सा बन जाता है और कनपटी की तरफ आंखों के कोनों पर कौए के पंजों की तरह की लकीरें खिंच जाती हैं।
मेरी बात सुनकर इनके नथुने के किनारे गड्ढा भी बना और आंखों के किनारे लकीरें भी खिंचीं,लेकिन बात को जब इनके मित्रों और खासकर उनकी पत्नियों ने हाथों-हाथ उठा लिया तो ये भी अपनी ‘खेल-भावना’ का परिचय देते हुए हो-हो करके हंसने लगे।
बेटू को हाॅस्टल छोड़कर लौटने के दिन की घटना के बाद कई हफ्ते बीत गए थे। ये देह के संधि-पत्र के नये-नये मसौदे लिए मेरे चक्कर लगाते रहे थे,लेकिन हस्ताक्षर करना तो दूर मैंने किसी प्रस्ताव की तरफ देखना भी मंजूर नहीं किया था। अपमान,दुःख और क्रोध का एक दावानल था जिसने मेरे अंदर की सारी हरीतिमा को जला डाला था।
वे दिन अब स्मृतियों में ही शेष थे जब आफिस जाने से इनको रोकने के लिए इनके सामने ठुनका करती थी। अब तो दिन-भर इनका आफिस में रहना एक छुटकारे जैसा लगने लगा है। पास-पड़ोस की औरतों से घनिष्ठता मजबूरी में ही बढ़ानी पड़ी क्योंकि इतवार और छुट्टियों के दिन सारी दोपहर घर में पंचायत जोड़कर ये पड़ोसिनें ही मुझे इनका चेहरा देखने से बचाती हैं। कैसा विचित्र था कि हम दोनों को संतुलित रूप से चलाए रखने के लिए जो जरूरी बीच की धुरी चिटक गई थी,उसके बारे में ये एकदम बेपरवाह थे तभी तो इनकी कोशिशों में कोई कमी नहीं आई थी। एक-दो बार इन्होंने मुझे ‘युद्ध’ के लिए उकसाया भी लेकिन एक ‘निहत्थी’ पर वार करने का साहस ये शायद खो चुके हैं। मैं देर रात या तो रसोई निपटाने मे ‘व्यस्त’ रहती और इनके सो जाने के बाद ही कमरे में जाती या इनसे पहले आ जाती तो सो जाने का ढोंग करती पड़ जाती। डबल-बेड के एक बेड की पाटी पर पड़ी इनकी एक-एक आहट लेती रहती। ये देर रात तक करवटें बदलते रहते और खांस-खखार कर अपने ‘जागे होने’ की सूचना देते रहते लेकिन मैं ‘जाग नहीं पाती’।
उस दिन ये आफिस जाने के लिए तैयार होकर कमरे से निकले तो मैं नहाने के बादआंगन में सिर आगे को झुकाए तौलिए से अपने बाल झाड़ रही थी। ये जाते-जाते रूक गए और मेरे झुके कंधों के नीचे अंदर की तरफ ललचाई निगाहों से देखने लगे। मैंने बाल झाड़ना बंद कर दिया और तौलिया अपने सामने डाल ली।
वे दिन अब स्मृतियों में ही शेष थे जब ये मुझे सिर्फ पेटीकोट और ब्लाउज में कमर हिलाने वाली काठ की गुड़िया बनाकर किसी बल्ब के सामने खड़ा कर दिया करते थे और इनको रिझाने के लिए मैं दीवार पर दीख पड़ती अपनी पतली-कमर  हिलाती रहती। ये मेरी दीवार पर पड़ती छाया को मंत्र-मुग्ध से न मालूम कितनी देर देखते रहते। उस दिन आंगन में ये मेरे सामने ठिठक कर रूके तो ऐसा लगा जैसे असावधानी में घर का दरवाजा बंद करना भूल गई हूं और कोई अजनबी बिना दस्तक दिए अंदर आ गया हो।
‘ तुम्हारी जैसी औरतों के पति ही घर से बाहर चले जाते हैं।’ मुझे तौलिए से अपने बदन को ढंकते हुए इन्होंने कड़वाहट के साथ कहा चले गए।
धड़ाम की एक तेज आवाज के साथ मेरी पीठ पीछे इन्होंने दरवाजा बंद किया था लेकिन मैं चैंकी अपने अंदर हुए धमाके से।
‘ क्या यह मुझे धमकी दी गई है?’ मैं अपने आप से पूछ रही थी।
किन औरतों के पति घर से बाहर चले जाते हैं ? उनके न जो रोज रात को गंदी होने के लिए सफेद चादर की तरह बिछने को तैयार नहीं होतीं ? या उनके जो इस सारे कार्य-व्यापार का चाहे हल्का-सा ही सही,एक सूत्र अपनी मरजी की अंगुली में फंसाए रखने की जिद किए रहती हैं? या उनके जो अपनी देह को पेड़ की किसी शाख की तरह प्रस्तुत नहीं करतीं जिस पर पति नाम का बंदर अपने नितंब उछाल-उछाल कर जब चाहे भोंडे ढंग से नाच सके?
‘ अगर मेरी जैसी औरतों के पति घर से बाहर चले जाते हैं तो वो घर से बाहर ही रहने के लायक होंगे। ’ मैंने अपने अंदर एक खौलन-सी महसूस की ,जो आंखों के रास्ते बह निकली थी।
जो एक कसैलापन ये मेरे कानों में उंड़ेलकर चले गए थे उसने जीवन के कई ऐसे बेस्वाद क्षणों को मेरे सामने फिर लाकर खड़ा कर दिया था जिनको मैं कुछ समय बाद यही सोच कर भूल गई थी कि पुरूष की अपनी बहुत सीमित सीमा होती है,वह कितना भी सोचे स्त्री तो वह हो नहीं सकता। लेकिन बेटू को छोड़कर आने वाले दिन मालूम हुआ कि वह मां तो नहीं ही हो सकता ,बाप भी पूरा नहीं बन सकता।
जिसे कभी शर्मिंदा होना तक नहीं आया उसे घर से बाहर चला जानेवाला पति बनना कितनी आसानी से आ गया . . .
वह विवाह के शुरू-शुरू के दिन थे। हम दोनों को उन दिनों देह के अलावा और कुछ सूझता ही नहीं था। नहीं जानती थी कि देह इतने रंगों में खिलती है। अपने अंदर छिपे संगीत को पहली बार सुन रही थी। ये मेरे अभिमान थे,जिन्होंने मेरे रंगों से,मेरे संगीत से और मेरे छिपे हुए नये रूप से मुझे परिचित कराया था। एक नयी-सी मैं थी,अपने ही सामने खड़ी जिसे मैं पहली बार जान रही थी। मैं इनके साथ मिलकर एक बिलकुल नई और अब तक अपरिचित रही आई भाषा गढ़ने में व्यस्त थी जैसे उस भाषा को जाने बिना हम एक-दूसरे को पढ़ ही नहीं सकेंगे।
उसी दौरान किसी दिन मैंने इनका दिया,उस भाषा का एक अक्षर-बीज अपने पास चुपके से रोक लिया था जो मेरे दिए अक्षरों से मिलकर एक नई इबारत बनने लगा था। वह थी प्यार की इबारत। भाषा की खोज का मेरा मकसद पूरा हो चुका था। एक कथा लिखी जा चुकी थी-बेटू शीर्षक की कथा- जिसका बस सबके सामने आना ही शेष रह गया था।
अक्सर जैसे नई खरीदी गई चप्पलों के दोष दूकान पर उन्हें नापते समय ध्यान में नहीं आते। उस समय तो उनकी चमक और उनका नयापन भरमाता है। दूकान की चिकनी फर्श पर कुछ कदम चलकर देख भर लेने पर वह बड़ी आरामदेह लगती है लेकिन जब उन्हें पहन कर ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर चलना होता है और पट्टियों से बंधा पैर अपनी मनचाही जगह बनाने की कोशिश करता है,तब पता लगता है कि वह पैर को कहां-कहां से दबा रही है जिसकी वजह से चाल में हल्की-सी लंगड़ाहट आने लगी है। हमारा नयापन भी जा रहा था और पहली बार मुझे एक हल्की-सी लंगड़ाहट की तरह का कुछ अनुभव हुआ था।
‘ नहीं अब नहीं। डाक्टर ने अब ऐसी हालत में मना किया है।’ इनकी मनुहार पर मुझे आश्चर्य हो रहा था।
क्या मेरे भीतर जो महागाथा अपने अंतिम अध्याय में है,उससे ज्यादा प्रीतिकर है यह? इनकी जिद मुझे जरा अच्छी नहीं लगी,लेकिन इनका मन रखने के लिए मुझे दिखाना पड़ा कि मैं इनके साथ शामिल हूं। लेकिन सच बात तो ये है कि उस दिन पहली बार ये मुझे बहुत भारी लगे।
विवाह के दो वर्षो बाद मैं पूर्ण हो रही थी। जीवन के उस पहले अनुभव को लेकर मैं मगन थी,चकित थी और आशंकित भी। मेरे दिन-रात रोज ही अपने अंदर कुछ नया होने की प्रतीक्षा में बीत रहे थे। सपनों की नन्हीं,गुलाबी हथेलियां मेरे गाल छूती रहतीं,घुटनों के बल खिसकती मेरी कल्पनाएं मेरी गोदी चढ़ने के लिए मचलती रहतीं,पक चुका कोई विचार जैसे कागज पर आने के लिए अंदर से पैर की ठोकरें मारता-सा लगता। उठने-बैठने से लाचार मैं हवा के परों पर सवार आगत वर्षों की मीलों लंबी दूरियां हर पल तय करती रहती। मैं चाहती थी कि ये कभी मुझसे पूछें कि मैंने अपने सपने को बसाने के लिए कौन-कौन सी बस्तियां देखी हैं। मैं अपने मन में एक मूर्तिकार थी,कलाकार थी एक भाषा की अनुवादक थी- लेकिन उस दिन की उनकी अश्लील मनुहार ने मुझे बताया कि वास्तव में मैं कुछ नहीं थी . . .
हर महीने तकलीफ के उन चार-पांच दिनों में,जब औरत को अपने ही शरीर से घिन छूटती है,उसका सारा आत्मबल,सारा आत्मविश्वास थक्के बन कर नाली में बह जाता है- ये कैसे उन दिनों में भी अपनी अघोरी इच्छा लिए सामने आ जाते थे, जो कह कर गए थे कि मेरी जैसी औरतों के पति ही घर से बाहर चले जाते हैं।
‘ सुनो प्लीज . . .। ’ मैं दिन में डाक्टर के पास गई थी और उन्हें बताया कि शुरू के एक-दो दिन मुझे बहुत दर्द रहता है। मैंने बताया कि दवा लेने से दिन में जरा देर आराम मिला था और इस समय फिर तेज दर्द उठ रहा है।
इन्होंने सुना नहीं क्योंकि इनके कानों में उस समय कोई और ही सनसनाहट बज रही थी।
वह एक प्राणांतक हमला था। आरी के तेज दांते एक के बाद एक दर्द की लकीरें छोड़ रहे थे। पीड़ा की ऊंची लहरों से शरीर कांप-कांप उठता। मैंने दर्द पर काबू पाने के लिए अपने दांत भींच लिए और आंखें बंद करके उस तूफान के जल्द-से-जल्द गुजर जाने की प्रतीक्षा करने लगी।
उस रात पहली बार मुझे अपने स्त्री होने और इनके पुरूष होने से घृणा हुई।
‘ कोई भी आनंद ऐसा नहीं है,जिसमें आंखें खुली रह सकें,ऐसा ही होता है न? ’ ये मेरे कानों में फुसफुसा कर पूछ रहे थे। मेरी चेतना लुप्त-सी हो रही थी,इनके हिसाब से मैं आनंद में थी। आनंद की इनकी अपनी परिभाषा है। रतिविलाप की तरह आनंद शब्द भी सुन लिया होगा कहीं से-क्या जवाब देती?
‘ मेरी जैसी औरतों के पति ही घर से बाहर चले जाते हैं ’-रसौली की तरह हमारे बीच आ गई थी और लगता था कि रोज उसका आकार कुछ बड़ा हो रहा था।
चुप्पी का एक प्रेत मेरे अंदर आकर बैठ गया था जो दिन-भर मुझसे बातें करता रहता,तब भी जब मैं पड़ोसिनों के साथ बैठ कर बातें कर रही होती। मैं उसी प्रेत से पूछती कि क्या बाहर चले जाने का विचार ही बाहर चले जाना नहीं है? मैं अपने हाथ से कोई चीज पटककर चकनाचूर करना चाहती थी ताकि हम दोनों का आपस में टूटना रूक सके। वह प्रेत जो दिन भर मुझसे बातें करते थकता नहीं था,इनके घर में घुसते ही चुप हो रहता और मुझे टहोके लगाता रहता कि मैं अपनी तरफ से कोई बात चलाऊं और तनाव को समाप्त कर लूं। लेकिन मैं अड़ी हुई थी कि अब तो इन्हें ही अपने आप समझना होगा कि इन्होंने क्या कहा और जो कुछ कहा उसका क्या मतलब होता है . . .
‘ आखिर तुमको हुआ क्या है ?’ महीना पूरा होते न होते आखिर एक रात इन्होंने कहा और मेरा हाथ अपने सीने पर रख लिया।
उन दिनों को गुजरे एक जमाना हो चुका था जब मैं इनके सीने के काले बालों पर अंगुलियां चलाती थी और इनके पूरे शरीर में जैसे किसी मादक संगीत की लहरें मचलने लगती थीं।
‘ मुझे क्या होगा ?’ मैंने अपना हाथ खींचते हुए कहा,जैसे कमरे के अंधेरे में भी इनके सीने के सफेद होने लगे बाल दीख गए हों।
‘ क्या तुम अब मुझे प्यार नहीं करतीं ?’ अंधेरे में इनका कातर सवाल मेरे कानों से टकराया।
कैसा करूण,भीख मांगता-सा स्वर। करूण, लेकिन उसमें मेरे मन के लिए कोई दर्द नहीं था। भीख,मेरे उस शरीर की जो इनकी भूख शांत करने की एक मशीन से ज्यादा कुछ नहीं।
मैं चुप रही।
‘तुमने जवाब नहीं दिया . . .’
इन्होंने बात का आगे की ओर ठेला।
‘ हां-हां करती हूं। सो जाओ अब . . .’
 मैंने कहा और बेड की पाटी के अंतिम सिरे तक खिसक गई।
‘ तो फिर हमारे बीच यह दूरी क्यों ?’
इन्होंने फिर उसी याचक स्वर में कहा जिसे सुन कर मेरा सर्वांग जल उठा।
आखिर आ गए न असली बात पर। यह एक शरीर ही तो है ,जिसके लिए तुम मरे जाते हो। कितने दीन-हीन-से हो गए हो कि मेरे इस तरह बोलने और झिड़कने पर भी तुम्हें जरा गुस्सा नहीं आता-जो घर से बाहर चले जाने वाले होते हैं,वह पति तुम्हारी ही तरह होते हैं? घिघियाने वाले?
मैं चुप रहीं।
‘ अब तुम पहले जैसी नहीं रहीं।’
 इन्होंने मेरा सबसे बड़ा अपराध गिनवाया।
‘ यानी मैं पहले कैसी थी,आपको पता है?’ मैं अपने वैवाहिक जीवन के पिछले पच्चीस वर्षों का हिसाब करने को तैयार थी।
‘ हां,अच्छी तरह पता है। पहले तुम्हारी एक-एक छुअन मुझे अंदर तक दहका देती थी,मगर अब . .’ इससे ज्यादा और ये कहते भी क्या।
‘ पच्चीस बरस तक साथ रहने के बाद तुम्हें मेरी छुअन के अलावा और कुछ याद नहीं और कहते हो कि तुम जानते हो कि मैं पहले कैसी थी? कभी तुमने जाना कि इस शरीर के अंदर एक मन भी होता है? देह का जो ललित प्रसंग संगीत की बढ़त की तरह आलाप से शुरू होता है और क्रमशः जोड़ और द्रुतलय से होता हुआ झाले के आंदोलन तक पहुंचता है,तुम्हारे साथ मुझे उस संगीत का सिर्फ विद्रूप ही देखने को मिला है जिससे मैं बेतरह ऊब चुकी हूं।’ मैंने जैसे सारा कुछ पहले से सोच रखा हो,इस तरह से कहा। नहीं जानती कि मेरी कही बात इनके पल्ले पड़ी या नहीं . . . इसके बाद कमरे में सन्नाटे की सत्ता फिर लौट आई।
पचास-पचपन की उम्र,जो कुछ मिल गया उसे देखने की नहीं ,जीवन में जो नहीं कर सके या जो नहीं हो सका उसके बारे में सोचने की होती है। ये जो बिना किसी विचलन के पीठ घुमा कर लेटे हुए हैं इन्हें अपने आप से कुछ नहीं पूछना,कोई जवाब नहीं देना-पर क्या कभी कुछ सोचना भी नहीं? ठीक भी है,सोचना हो तो क्यों ? इनके अपने खाते में तो फिर अपनी मजबूत पहचान के साथ  दो-दो प्रमोशन हैं,साधन चाहे जैसे रहे हों कहा तो यही जाएगा कि अपने बाहुबल से खड़ा किया गया छः कमरे का मकान और बेटे को डाक्टर बना ले जाने की उपलब्धियां चढ़ी हुई हैं। मगर मेरे खाते के पन्नों में क्या दर्ज है? रोटियां पकाने और पति के लिए ‘पेनकिलर’ बनने के अलावा और क्या लिखा जा सका उनमें ? यह इनकी चिंता के बाहर का विषय है कि एक पूरी उम्र के हिस्से में आया घर के एक-एक बेलन और दरवाजों की आहट याद रखना,सबकी रूचि-अरूचि और फरमाइशों के इशारों पर अपनी ताल और अपनी लय को मिलाए रखना और चावल-दाल की जलती पतीलियों को बर्नर पर से उतारते हुए भी अपनी अंगुलियों को जलने से बचाए रखने का हुनर . . .और ‘नखरे करके’ आदमी को पागल कर देने का कौशल . . .
मैं पहले जैसी नहीं रही। हां,नहीं रह गई। पहले जैसा मुझमें अब है क्या? जब मेरा अपना आप ही नहीं रह गया,तब पहले जैसा और क्या रहता? ये मेरे पति हैं इसलिए मेरी पहचान इनकी पत्नी की है। इनके बच्चे की मां हूं इसलिए बेटू की मां कहलाती हूं। और इन्हीं रिश्तों और संबोधनों के कारण स्वामिनी हूं इस घर की।
मगर इस सारे कुछ में मैं कहां हूं? हां मैं हूं,हर जगह हूं। उपलब्धियों की इनकी बड़बोली अट्टालिकाओं की नींव में झांकिए और मुझे निर्जीव पत्थर की शक्ल में देखिए, या अगर वहां नजर न आऊं तो घर-परिवार के इस महावृक्ष की जड़ों में खाद की तरह सड़ती हुई देखिए . . .
ये भला कब जान पाएंगे कि अपना सितार सीखना जारी रख पाती और एक दिन किसी खचाखच भरे हाॅल में मंच पर बैठी तालियां समेटती-तो वह मैं होती। ये भला क्यों जानना चाहेंगे कि किसी आर्ट गैलरी में अपनी पेंटिंग्स की प्रदर्शनी में दरवाजे पर खड़ी सबका स्वागत करती-तो हाथ जोड़े वह मैं होती। ये तो अब भूल भी चुके होंगे कि अगर, शादी के बाद नौकरी और परिवार चलाना मुश्किल होगा, कहकर नौकरी न छुड़वा दी गई होती- तो आज स्कूल के एक अलग कमरे में प्रिंसिपल बनकर जो बैठी होती-वह मैं होती . . .
‘ आज मन कैसा है ?’ कुछ दिनों की चुप्पी के बाद ये लगातार तीसरी रात है,जब मुझसे सहलाती-सी आवाज में पूछा जा रहा है।
अब ये सवाल मुझे अपने सामने अश्लील रूप में खड़ा दिखाई देता है। जैसे मुझे चिढ़ाते हुए,मेरा मजाक उड़ाते हुए कहा जा रहा है कि,तुम्हारी यही तो शर्त है न कि शरीर से पहले तुम्हारे मन के बारे में भी पूछ लिया जाए। तो लो बाबा,अब तो तुम्हारे मन के बारे में भी पूछ लिया, अब तो खुश?
एकाएक मेरे अंदर कोई तड़पकर उठ बैठी। उसी ने चुपके से मेरा हाथ दबाकर कुछ भी बोल देने से मुझे रोका कि ‘मन’ को लेकर किए गए इस क्रूर और भद्दे मजाक जैसे इनके सवाल के जवाब में कोई जलती हुई बात सोचने के लिए ‘क्या’ पूछ कर जरा-सी मोहलत ले लूं।    


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 नवनीत मिश्र मो0 94 500000 94
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प्रतिक्रियाएँ
[21/02 22:38] ‪+91 94500 00094‬: इसे कहते हैं कहानी। नवनीत मिश्र की लेखनी का मैं तब कायल हुआ था जब लगभग 30 वर्षों पूर्व 'सारिका' में उनकी अखिल भारतीय प्रथम पुरस्कार प्राप्त कहानी पढ़ी थी। नाम याद नहीं आ रहा लेकिन वह कहानी एक रंगकर्मी पर एकाग्र थी। इस कहानी में स्त्री के देह-विमर्श को इतने कलात्मक और महीन रेशों से बुना गया है कि अचम्भा होता है कि क्या पुरुष कथाकार भी ऐसी कहानी लिख सकता है ? वाह ! निःशब्द कर देने वाली कथा। हेड्स ऑफ़ राजेश द एडमिन।
[21/02 22:38] ‪+91 94500 00094‬: स्त्री देह के साथ स्त्री मन की परत दर परत खोलती कहानी। सेक्स भी रूटीन की तरह पुरुष  के तन की जरुरत होती है और स्त्री अपनी उम्र के साथ सभी रिश्तों को जीना चाहती है सिर्फ नारी देह तक सीमित नहीं होना चाहती।उसे एक उम्र में ये सब बेकार की बातें लगने लगती है और शायद पुरुष का भटकाव भी यहीं से शुरू होता  है।ज्यादातर घरों की यही कहानी है।
पुरुष होकर स्त्री मन को बखूबी जानना और उस पर लिखना आसान नहीं है लेकिन नवनीत जी ने इतनी बारीकी से वर्णन किया है कि मैं हतप्रभ हूँ।
और क्या लिखूं सूझ नहीं रहा।शब्द नहीं प्रशंसा के मेरे पास।
बेहतरीन कहानी नवनीत जी की।
बहुत बहुत बधाई।
[21/02 22:38] ‪+91 94500 00094‬: अर्चना जी स्त्री को एक उम्र  में बेकार की बातें लगने लगती है ,क्यों ।
वेसे इसका वैज्ञानिक आधार भी है ।लेकिन  यह कहानी पत्नी मन को पति के द्वारा समझने भर की सोच पर आधारित है ।
एक पत्नी माँ बन कर भी तृप्त हो जाती है ,यह बात इस कहानी में बहुत ही सौंदर्यतापूर्वक  से लिखी गई है ।लेकिन पति सिर्फ एक अतृप्त इच्छा को ही जीता आया है सदा ।
और अतृप्ति सदैव कुंठा को जन्म देती है ,जिससे वो अपनी भूख से इतर सोचने समझने में  असमर्थ रहता है ।
[21/02 22:38] ‪+91 94500 00094‬: ओह पच्चीस साल का एक एक पल इतनी बारीकी से गुंथा गया है हर पल सजीव हो गया ।आभार एक खूबसूरत कहानी  पढ़वाने के लिये।

[21/02 22:38] ‪+91 94500 00094‬: स्त्री की देह की परतों में उलझा रहने वाला पुरुष कभी समझ ही नहीं पाता है कि औरत कब अपने महत्तम अर्थों अर्थात माँ होने के अहसास में डूब उतरा रही है। औरत के मन की इतनी गहराई में उतर कर पड़ताल कि कब वह प्रेयसि है और कब देह से ऊपर उठकर मन को पाकर सम्पूर्ण होना चाहती है। एक स्त्री भी अगर यह कहानी लिखती तब भी नारी मन का इतनी गहनता और ईमानदारी से विश्लेषण नहीं कर पाती। इतनी सच्चाई से शायद नहीं लिख पाती। नवनीत जी का हार्दिक आभार। 🙏🙏🙏🙏
मंच का भी बहुत बहुत धन्यवाद एक बहुत ही अच्छी और गहरी कहानी यहाँ देने के लिए। 🙏🙏🙏🙏😊😊

[21/02 22:38] ‪+91 94500 00094‬: राजेश भाई.कहानी में यह खास बात होती है कि जब आप उसमें होते हो तो फिर कहीं और नहीं हो पाते.यह ऐसी ही कहानी है जिसमें से मैं अभी बाहर निकल सका और उस पर लिखते हुये प्रकारांतर से फिर उसी के अहाते में आ गया.
ये कहानी अब शायद ही पीछा छोड़े.दरअसल पति और पत्नी के बीच सैक्स का जो व्यवहार रहता है.वो या तो ऐसा होता है या कभी तो ऐसा होना चाहता है.पर पत्नी कब स्त्री की तरह सोच रही है.यह आवेग से ग्रस्त पति को पता न चल पाता है क्योंकि वो अपने विद्रूप पुरूष की गिरफ्त में जो होता है.

नवनीत जी ने मनोविग्यान का अचछा सहारा लिया.कई बार लगा कि कहानी को गरम रखना सायास तो नहीं.बेटू को केवल दृश्यांतर की तरह तो प्रयुक्त नहीं किया गया.फिर लगा कि कहानी में यह आवश्यक ही रहा.बहुत अच्छी योजना...बहुत अच्छा वाक्य संयोजन
और बहुत जरूरी साहस से बनी ये कहानी याद रह जायेगी.

नवनीत जी को बधाई और मंच के प्रशासकों का आभार.


ब्रज श्रीवास्तव.


विदिशा...म.प्र.

[21/02 22:38] ‪+91 94500 00094‬: निरंजन जी पढ़ते हुए मैने भी यही सोचा था कोई पुरुष स्त्री मन की इतनी सूक्ष्म परतों को इतनी सहजता से शब्द दे वह कितने संवेदनशील हैं ।
[21/02 22:38] ‪+91 94500 00094‬: सबसे बड़ी और चमत्कारिक बात यह लग रही है कि पुरुष लेखक ने स्त्री मन की इतनी महीन मनोदशा को चित्रित किया है जिसे वो जीती तो है लेकिन शायद  कह नही पाती ।
नवनीत जी ने तो उसके एक एक तार को उधेड़ कर रख दिया ,कमाल किया है । स्त्री मनोविज्ञान की कहानी है इसलिए ही नही ,बल्कि उनके लेखन की बुनावट की कायल होकर मेने इसे अभी तक की पढ़ी कहानियॉ में से श्रेष्ट कहानी की   श्रेणी में रख कर सहेज लिया है ।
ब्रज जी ने बहुत अच्छा लिखा ,आवेग ग्रस्त पति नही सोच पाता की पत्नी कब स्त्री की तरह सोच रही है ।
धन्यवाद ब्रज जी ।

निरंजन सर सहमत हूँ आपकी बात से ,वाकई अचंभित किया है इस कहानी ने ।देह से परे होकर स्त्री की सोच को शब्द शब्द पढ़ कर ।

पुनः प्रणाम नवनीत जी ,एक  उत्तम कहाँनी पढ़वाने के लिए ।

🙏
[21/02 22:38] ‪+91 94500 00094‬: दाम्पत्य के सभी दृश्यों को एक नारी के दृष्टिकोण और अनुभूत सत्य की तरह चित्रित किया है नवनीत जी ने ।
बहुत सुन्दर💥

[21/02 22:38] ‪+91 94500 00094‬: लाजवाब कहानी ,अभी तो डूब गई हूँ ,निकल पाई तो कुछ लिख सकुंगी ।
नवनीत मिश्र जी को प्रणाम करती हूँ ।
थैंक्स राजेशजी ,बेहतरीन चयन के लिए

[21/02 22:38] ‪+91 94500 00094‬: कल असफल जी की कहानी पढ़ी थी । दोनों कितने अलग अनुभव। दोनों आत्मीय। दोनों सच। एक में देह का स्पर्श दिव्या प्रेम की ओर ले जाता है सारी सीमॉओं के परे।  वही देह पर बलात् स्पर्श उसे घृणित और दयनीय बना देता है।
मन और तन - कितने पूरक हैं

[21/02 22:38] ‪+91 94500 00094‬: राजेश जी बधाई आपको एक से बढ़कर एक कहानियों के लिए🙏नवनीत जी आज की कहानी जिस स्त्री मनोदशा को समझकर लिखी गई है ,विश्वास नही होता कि अनुभव कर नही लिखी गई  । स्त्री का प्रेम मन से शुरू होकर तन तक पहुचता है ,पर मूल मन ही होता है । इसे जो समझ जाए निश्चित ही सच्चा प्रेम उसे मिलता है ताउम्र। बहुत सुंदर कहानी के लिए बधाई ...

[21/02 22:38] ‪+91 94500 00094‬: प्रेम पनपता भले ही देह की जमीन पर हो l पर परवान हमेशा मन की आकाश पर ही चढ़ता हैं l मन और देह के  द्वंद से दो चार होती हुई,बहुत ही बढ़िया कहानी l मिश्र जी  को बहुत बहुत बधाई l

[21/02 22:38] ‪+91 94500 00094‬: कहानी पर इतनी सारी और अभिभूत करने वाली प्रतिक्रियाएं मिलेंगी सोचा नहीं था। कुछ कहना आत्मश्लाघा लग सकता है इसलिए कुछ कहना नहीं चाहता लेकिन एक बात साझा करने का मन है कि स्त्री बन कर सोचना एक नये तरह का अनुभव था।

मैं सभी के प्रति जिन्होंने कहानी पर अपनी राय व्यक्त की हृदय से आभार प्रकट करता हूं।
बहुत बल प्रदान करने वाली थी आप सबकी राय।
धन्यवाद।

नवनीत मिश्र

[21/02 22:38] ‪+91 94500 00094‬: सच में प्रवेश जी ,बहुत अच्छी कहानी.नारी मन के रेशे रेश का बखूबी बयान करती इस कहानी के ले खक को मेरी बधाई.

[21/02 22:38] ‪+91 94500 00094‬: 00 आज आप सभी ने हमारे समय कूे महत्वपूर्ण रचनाकार आदरणीय नवनीत मिश्र की कहानी ‘ देह भर नहीं ‘ पढ़ा और अपनी महत्वपूर्ण प्रतिक्रिया से मंच को अवगत कराया। शुक्रिया मित्रो...

00 इसी के साथ मिश्रजी का विषेश आभार और शुक्रिया, जिन्होंने मंच के आग्रह पर इस कहानी को टाईप करा कर हमें भेजा। पहले यह कहानी हमें स्केन की हुई प्रति में प्राप्त हुई, जिसे मंच पर लगाना सम्भव नहीं था।

00 कल  तीन बजे जब यह कहानी टाईप होकर हमें मिली तो फौरन इसे यूनीकोड में बदलकर मंच पर लगाने का मोह  संवरण नहीं कर पाया।

00 देह की और देह से परे भी एक भाषा होती हैं लेकिन कितने पुरुष इसे पढ़ पाते हैं, समझ पाते हैं... जैसे सवालों से रूबरू कराती बेहतरीन कहानी के लिए लेखक को हार्दिक बधाई।
 लेखक ने अपने स्त्रैण पक्ष को कितनी मजबूती से थामा और संजोये रखा इसका पुख्ता प्रमाण है देह से परे भी।

पुनः सभी को धन्यवाद और शुभरात्रि ।

कल एक बेफ्रिक लड़की की प्रेम कहानी के साथ पुनः भेंट होगी।

राजेश झरपुरे

Wednesday, February 17, 2016

कहानी
कायांतर          

जयश्री रॉय

फूलमती को ललिता ने  पहली बार सिया सुंदरी के दक्खिन घाट पर देखा था. गौने के बाद बिगेसर के पीछे-पीछे बजरे से उतरते हुये- पीली साड़ी, सुर्ख लहठी और बड़ी-सी टिकुली में अरहर की पकी बाली-सी झमर-झमर करती. रुपा की बुंदकी सरीखी आंखों में झिलिर-मिलिर कौंध थी, जाने वह डरी हुई थी कि खुश...
जैसे पूरा गांव ही उतर आया था घाट पर नईकी दुलहिन को देखने. अवधूत की नानी इनमें सबसे आगे थी,  अपने पोते की पीठ पर बेताल की तरह सवार होकर टूटे ऐनक की कमान साधती हुई - "हाय दादा. दुलहिन त एकदम करियट्ठी हई. "
लहेरिन सास ने बहू-बेटे के सामने आरती की थाल फिरायी तो बहू खिस्स से हंस पड़ी. बिगेसर ने आंख गरम कर अपनी मेहरारु की ढलकती घूंघट छाती तक खींची तो गीतहरिन औरतों ने मंगल गीत गाते-गाते एक-दूसरे को टहोके लगाये. उसी दिन से गांव-जवार में मशहूर हो गया- बिगेसर-बो के लच्छन ठीक न है.
कुछ ही दिनों बाद छत पर दोपहर के घाम में बैठकर गीले बाल सुखाते हुये ललिता ने देखा था- बिगेसर अपनी झोपड़ी के आंगन में फूलमती को दौड़ा-दौड़ाकर बांस के फट्टे से पीट रहा है  "ललनवा के संग का कर रही थी रे खचरी, खेसारी के खेत में? जंगल में जिलेबी तोड़ने गई थी कि छिनरई करने?"  सरकंडे की टाटी धकेलकर फूलमती ’बाप रे बाप, माई गे माई’ करती हुई गोहाल के अंदर भाग गई थी. दूर से ही ललिता ने देखा था, उसका खूने-खून कपार. उधर नीम खैरे बिगेसर की महतारी अपना कपार पीटती हुई थहराकर बैठ गई थी - "अरे अभगला. अब मार-कुटम्मस से का होगा रे. हम त कहबे करते थे कि एकर लच्छन ठीक नहीं है. शहर के लरकी, ठेठर-बैसकोप देखती है, मूरी उघार के बीच बाजार चलती है बेलज्जी. मगर तब त मऊगी के परेम में उभचुभा रहा था. अब भुगतो. भंडुअई करे के लेल ई नगरनट्टिन का गौना करा के हमरा माथा पर धर दिया...."
बिगेसर के दरवाज़े पर एक छोटी-मोटी भीड़ जुट गई थी. सब उचक-उचककर अंदर झांक रहे थे. तमाशा देख रहे थे. सौ-पचास घरों के इस छोटे-से गांव में ऐसे दृश्य बहुत आम है. रोज़ ही कोई ना कोई अपनी बीवी-बहू की पिटाई करते हुये दिख जाता हैं. बिगेसर की दुलहिन नई है इस गांव में, इसलिये लोगों में उसको लेकर थोड़ी बहुत उत्सुकता है. वह भी इन्ही दो-चार दिनों के लिये.
मगर ऐसे दृश्य ललिता को आज भी उद्वेलित करते हैं. वह शहर की लड़की है- पढ़ी-लिखी. बी ए पास है. इस गांव के मिडल स्कूल में चौथी से लेकर सातवीं कक्षा के बच्चों को पढ़ाती है. उसका पति त्रिभुवन अदालत में क्लर्क है. रोज़ शहर आता-जाता है. ललिता इन दिनों उम्मीद से है. कुछ महीनों में उसे प्रसव के लिये मायके जाना है. इन दिनों वह बहुत भावुक रहती है. बात-बात पर रोना आता है. ऐसी बातें उसे परेशान कर देती हैं.
दूसरे दिन सुबह फूलमती उसके दालान में मसूर फैला रही थी. कल की मारपीट का उसके चेहरे पर कोई चिन्ह नहीं था. सुबह की धूप की तरह उजली, झकझक. ललिता के छोटे-मोटे काम वह कर दिया करती है. काम से ज़्यादा बात करती है. हाथ के साथ मुंह भी चलता रहता है उसका पटर-पटर. कितनी सारी बातें उसकी - "सुना आप इंगरेजी पढे हैं. आपको मोटर चलाना आता है? एक बार हमको भी सैर कराईएगा मोटर में?" ललिता स्वेटर बुनती हुई उसके चेहरे की कादो-सी रंगत पर धूप की झिलमिल देखती रही थी. जाने ग़रीब किस ख़ुशी में यूं छलकी पड़ रही थी.
"तुझे तेरे पति ने मारा ना कल?"  ललिता के सवाल पर फूलमती सकुचा कर सूप फटकने लगी थी - " वो जरा... का है ना, फलानाजी को गुस्सा बहुत आता है, हथछुट्टा है जरा..." उसका संकोच देख कर ललिता ने बात बदल दी थी.
फूलमती उनके घर रोज़ आती है काम के लिये. कभी ढेकी में धान-चावल कूटना तो कभी गोबर पाथना. धूप के आंगन छोड़ने तक काम करती है और जब अनाज की कोठरी का अनगढ़ साया आंगन के सहजन को धीरे-धीरे संवलाने लगता है, कुयें की जगत पर बैठकर अपना आंचल पसारकर वह ललिता की सास से रोटी, गुड़, सत्तू की लोई लोकती है. ललिता देखती है और आंखें फेर लेती है. ऐसे दृश्य देखकर जाने क्यों उसे ग्लानि होती है. आदमी आदमी को इतना बेइज्जत करे... उसको नहीं सुहाता. छाती में कुछ गड़ता है शूल की तरह. मायके में बिनोवा भावे के शिष्य रह चुके उनके बाबूजी तो हमेशा उसका साथ देते मगर मां उलाहने देती रहती थी उठते-बैठते - " तेरे दिमाग़ में किताबें ठुंस गयी हैं. कभी इन मरे काले अक्षरों से बाहर निकल कर भी देख, नून-तेल का भाव पता चले जरा. दुनियादारी भी कोई चीज़ होती है लल्ली." वह ’कन्फेशन ऑफ़ द क्वीन’ में फ्रांस की महारानी मारी एंटोनेट की कहानी पढ़ते हुये अपने कमरे की खिड़की से बाहर देखती - "इफ पियुपल डोंट गेट ब्रेड टू इट, लेट देम इट केक.." उसे गिलोटिन में कट कर इधर-उधर लुढ़कते हुये सैकड़ों नरमुंड दिखते. वह सिहर कर अपनी क़िताब बंद कर एक तरफ पटक देती. मगर उसके शब्द उसका पीछा नहीं छोड़ते - "जब लाखों-करोड़ों भूखे-नंगे लोग एक साथ उठ खड़े होंगे, अन्याय के ऊंचे महल-अटारी ध्वस्त हो जायेंगे...
विचारों का बोझ सबसे बड़ा बोझ होता है, इसलिये वह अपनी थकान को समझती है. लोग इसे उसके उम्मीद में होने के साथ जोड़ कर देखते हैं मगर वह इसे नाउम्मीदी का हश्र मानती है. मन का आकाश होना और देह का पिंजरा होना उसका असली संताप है. और ऊपर का बोझ यह कि उसे चीखना नहीं आता. जो रो-कोस कर अंदर का मैल धो-बुहार लेते हैं वे हल्के हो जाते हैं. मगर वो तो अपने ही जाल की मछली है, अपने ही कांटे में बिंधी है. उसकी मुक्ति कहां. लोग देह भर गहने में उसका मलिन, उदास रुप समझ नहीं पाते. मगर वह अपना असली रुप चीन्हती है. मन को सोने की आभा नहीं, भीतर की हुलास निखारती है. वह कहां से लाये यह सब. अपने सुख के छोटे-से नीड़ में सुरक्षित बैठ कर फूलमती जैसी औरतों के अपरिमित दुखों का साक्ष्य बनने के लिये वह अभिशप्त है. जब मन करता है सब तोड़-दल कर ढेला-ढेला कर दे, मौन का कुलुप मुंह में जड़ कर वह अपनी कोठरी की चारदीवारी की सुरक्षा में आ छिपती है.          
फूलमती अपढ़ है लेकिन कितनी जहीन है. आंख उठते ना उठते इशारा समझ जाती है, ज़मीन पर कोरी उंगली से घर-गृहस्थी का सारा हिसाब कर लेती है. उसे सोहर, कजरी, चैती के साथ फिल्मों के हज़ार गीत आते हैं. ललिता के आंगन में ट्युशन के लिये जमा हुये बच्चों से सुन-सुन कर उसे दो तक का पहाड़ा और ढेर सारी कवितायें जबानी याद हो गयी है. ललिता किसी बच्चे से सवाल करती है और अपनी उछाह में जवाब देती है फूलमती. इसके लिये ललिता उसे कितनी बार डांट चुकी है कि बीच में जादा बोला नहीं करते. मगर उस फुहड़िया पर इसका कोई असर नहीं होता. उस समय तो दांत चिंयार देती है मगर दूसरी बार फिर वही हरकत.
क्या उमर रही होगी उसकी. यही कोई चौदह-पन्द्रह साल. खिच्चा भुट्टे की तरह उसके भीतर से बचपन का दूध पूरी तरह सूखा नहीं था अभी. अक़्सर गोयठा डालना या ढेकी कूटना बीच में छोड़कर गांव के बच्चों के साथ जंगलों में भाग जाती. कभी हड्डा-बिढ़नी पकड़ कर उन्हें सुतली से बांध हवा में उड़ाती फिरती तो कभी किसी के धूप में डाले अचार-कसौंझी चुराकर खाती. एक बार जब उनकी बानर सेना ने काना चौबे के भदैया मक्के के खेत को जंगली सूअर के माफिक खोद कर रख दिया था, उसकी शिकायत पर बिगेसर ने बांस की करची से उसे धुनिया की तरह धुन दिया था- 'चोरी-छिनरपना त तुम्हारा बंदे नहीं होता है. भर दोपहर कट्ठा के कट्ठा खेत ताम के आते हैं. भूख, गर्मी, घाम से माथा गनगनाता रहता है, . ऊपर से रोज कोनो न कोनो से इसका झगरा फरियाना. पता नहीं दिमाग कब ठिकाना लगेगा."
मार खाकर फूलमती संझा-बाती तक सरकंडे की ढेर पर बैठी काना चौबे को कोसती-गरियाती रही थी – 'अरे मुदइया, खचरा, हरामी का जना. कोन खजाना खाली कर दिये उसका? दू गो  मकई तोड़ लिये त परान जाता है. एतना मार खिलाया भंडुवा. कोढ़ी फूटेगा साला को. गू गींज-गींज कर मरेगा..".
लहेरिन सास ने ही आकर फिर उसका कन्ना-रोहट बंद करवाया था- "बाभन को गाली देती है. गांव में रोटी-पानी बंद करवायेगी लबरी. चल अंगना के भीतर." चुप होने के बाद भी वह देर तक ढोर-डंगर की तरह सोसियाती रही थी.
मगर दूसरे दिन ललिता के पास गई तो फिर से तरोई का एकदम टटका पीला फूल. बनफूल तेल से चुपड़े बालों में लाल फीता और कपार जोड़कर सिक्का भर सेनूर का टीका. बहुत खुश. ललिता कभी कहती इतना बड़ा टीका. तो वह हंस पड़ती-  'ई तो जनाना सब का सिंगार है.' आज ललिता ने पहले दिन के बाबत पूछा तो हंस कर टाल गई- "जाने दो दीदी. जलनडाही सास... कुछ न कुछ करबे करेगी. मरद के साथ फाओ में मिली है तो सहना ही है."
ललिता ने उसके हाथ पर पड़ी नीली धारियों और घावों पर हल्दी-चूना लेपा था. थोड़ी देर चुप रहकर फूलमती रोने लगी थी. उसे इस तरह भरभरा कर रोते देख ललिता घबरा गयी थी- "अब रोती काहे को है? का कर दिये हम?"
बड़ी देर बाद नाक सिनकते हुये तलहथी से आंखें पोंछते वह किसी तरह बोली थी – "दीदी. अब ई प्यार-दुलार सहता नहीं. बस मार-दुत्कार का आदत हो गया है. बचपन में माय मर गई थी. बाप तीन महीने के भीतर सौतेली माय ले आया. समझो चुरईल का दुसरा रुप. ऊ हमको उठते-बैठते सताती और बाप भट्टी से दारु ढकोर कर पलानी में बेसुध पड़ा रहता. एक भाई, सो भी साहूकार का पतलचट्टा. ऊपर से गांजाखोर भी. बचपने से खराब संघत में पर गया था. दस साल के उमर में ही सौतेली माय ने रेजा-कामिन के काम में लगा दिया था. तो बस हाड़ तोड़ काम, मार आउर दुख. बस एही तो मिला है जिनगी भर... उहाँ चाहे इहाँ...
ललिता का मन गीला हो गया था उसकी कहानी सुन कर. ऐसी ही कितनी फूलमतियाँ इस जमीन पर आये दिन जीवन का आंख भर सपना लेकर हरियाती और धीरे-धीरे ऊसर होती जाती हैं... नयी उमर की उछाह में गुड्डी बनकर आकाश की ओर लपकती हैं और फिर सूत कट कर नीचे आ गिरती हैं. उसे अपनी सहेली मधुमिता याद आती है. कुछ-कुछ ऐसी ही- फूलमती जैसी- बुरे लक्षणों वाली. भर दुपहरी छत पर चढ़ कर गुड्डी लूटना, चबर-चबर बोलना, बतीसी निकाल कर हंसना. ऊपर से दो गरम बोरसी जैसी आंखें. तरेर कर देखती थी सीधे-सीधे सबकी आंखों में. हर बात का उल्टा जवाब. मां कहती थी उसके साथ नहीं रहना. ठीक नहीं वो. तुझे गलत-सलत बातें सिखायेगी. मगर ललिता को उसकी बातें अच्छी लगती थी. खास कर उसकी अंगीठी जैसी आंखें. वही आंखें शादी के बाद साल भर में ही जैसे बुझ गई थीं... सोचकर आज भी ललिता का मन बोझिल हो उठता है. मुंडेर की चंचल गौरैया किस तरह घर-गृहस्थी के पिंजरे में उड़ना तो दूर, चहकना तक भूल जाती है. गौने के बाद मधुमिता बार-बार भाग कर मायके आती रही, मां-बाप, भाई से आसरा मांगती रही, मगर सबने समझा-बुझा कर उसे हर बार ससुराल के नरक में दुबारा भेज दिया. ललिता को उसकी गोरी देह पर उसके बर्बर, विकृत पति के दांत-नाखूनों के साथ सास-ननद के द्वारा दागे गये जख्म के दाग याद आते. हर बार ससुराल लौटते हुये मधुमिता की मूक अनुनय से कातर आंखें, मुड़-मुड़ कर पीछे देखना- जाने किस आस से... ऐसे समय में ललिता को महसूस होता था वह कितनी असमर्थ, असहाय है. उसके जाने के बाद दिनों तक अपने कमरे में पड़ी वह रोती रहती थी. लगता था, हाथ-पांव में जंज़ीर पड़े हैं. जब भगवान ने पंख नहीं दिये तो मन को चिड़िया क्यों बनाया, क्यों छाती भर आकाश दिया...
इसी तरह शादी के बाद दो साल बीते थे और आखिर मधुमिता के ससुराल से वह चिट्ठी आई थी जिसका आना लगभग तय ही था- मधुमिता अपने ससुराल में खाना बनाते हुये स्टोव के फटने से जल कर मर गई. मधुमिता के मां-बाप को उसके अंतिम दर्शन तक नहीं करने दिया गया था. सब जानते थे, मधुमिता को मार दिया गया है मगर क्या हुआ? कुछ भी तो नहीं... बस एक और लड़की... लड़कियों की इस देश में कोई कमी थोड़े ना है. साल घूमते न घूमते मधुमिता के पति ने फिर शादी रचा ली थी. जाने उस दूसरी लड़की के साथ क्या हुआ. ललिता अक्सर सोचती थी, मधुमिता की मौत के जिम्मेदार क्या सिर्फ उसके ससुराल वाले ही थे? अन्याय दुनिया करती है और खुश रहती है, उस पर तो बस अपनी चुप्पी भारी पड़ती है.
फूलमती को उस दिन चुप कराकर ललिता ने इसके बाद उसे खाने के लिये छोवा गुड़ के साथ मूढ़ी दिया था. वह कुयें के जगत पर चुक्की-मुक्की बैठी मुंह भर-भर कर खाती रही थी. जैसे दिनों से कुछ खाया ना हो. ललिता के पूछने पर उसने कहा था सास ठीक से खाना नहीं देती. कल रात भी नहीं दिया. उसे गोहाल में सोना पड़ा नई वाली बछिया के पास. ललिता के कुरेद कर पूछने पर लज्जा से सर हिलायी थी- 'हां. फलानाजी प्यार करते हैं. कितना भी मारे-पीटे, रात को जरुर... ललिता समझी थी- वही मर्दों वाला प्यार जो अधिकतर औरतों के हिस्से आता है..."
इसके कुछ दिन बाद चूड़ियों का खांचा ले कर सुबह-सुबह गांव की फेरी पर निकलती हुई उसकी सास ने बताया था, फूलमती के पांव भारी हैं. सुनकर जाने क्यों ललिता खुश नहीं हो पाई थी. उसे फूलमती का साड़ी को धोती की तरह बांध कर तपती दुपहरी में गांव के बच्चों के साथ शीतला मैया के थान के पीछे गुल्ली-डंडा, कंचा खेलना या लट्टू नचाना याद आया था. उस दिन राम सिंघासन के खेत से बूँट झंगरी निकालकर खाते हुये फिर पकड़ी गई थी. अपनी इन हरकतों के कारण
कितनी बार पिट चुकी थी वह. अब क्या खेल पायेगी कभी इस तरह से. उसे बच्चे की नहीं, गुड़ियों की ज़रुरत है अभी. एक और कच्चा घड़ा टूटा, एक और बचपन गया...
ललिता ने अपने पति से रात को सोते समय यह बात कही तो वह टाल गया- इस में नई बात क्या है. होती रहती है. फिर हंस कर उसकी नाक दबाई थी- तुम भी तो मां बनोगी. ज़्यादा सोचा मत करो... ललिता ने प्रतिवाद करने की कोशिश की थी- दोनों एक ही बात है का. उसकी उमर भी तो देखिये... बच्ची है. सुन कर उसका पति करवट बदल कर सो गया था- 'इन गांव-जवार के अनपढ़ लोगों से क्या उम्मीद करती हो. ज़िन्दगी क़िताबी नहीं होती लाली. ज़मीन पर उतरो...' ललिता एकबार फिर चुप रह गई थी. क्या उसके जीवन में ये क़िताबें सिर्फ पढ़ कर रख देने के लिये हैं. अलमारी की शोभा बढ़ाने के लिये...
ज़्यादा शिकायत करती तो पति कहता खुद ही तो इस बज्जर गांव में रहने की ज़िद्द पर अड़ गई और अब परेशान होती हो. उसकी बात सुन कर ललिता को चुप हो जाना पड़ता है. बात सही है. शादी के बाद उसका पति शहर चला जाना चाहता था. उसे लगता था पटना शहर की लड़की होने के कारण ललिता को इस गांव में अच्छा नहीं लगेगा. मगर उसके पिता के मरने के बाद ललिता उनके स्कूल की जिम्मेदारी उठाने की जिद्द पर अड़ गई. ललिता के ससुर इस गांव में कई सालों से एक मीडिल स्कूल चला रहे थे.
शादी के बाद उनके जीवन के कुछ दिन बहुत सुंदर बीते थे. कहां-कहां घूमने गये थे दोनों. पति चाहता था कश्मीर जाना मगर वह पहले अपना बिहार ही अच्छी तरह घूम कर देखना चाहती थी. लोग दुनिया-जहान देख लेते हैं, बस अपनी जगह से अनजान रह जाते हैं. हाजीपुर जिले में उनका गांव पड़ता है. इसके उत्तर में मुज्जफ्फरपुर, दक्षिण में पटना, पूर्व में समस्तीपुर तो पश्चिम में सारन. इन इलाकों के सभी नामी जगह उन्होंने देखे थे. गणतन्त्र की धरती वैशाली के स्तूप, सीता मैया की जन्मभूमि और उससे लगा जनकपुर धाम जो नेपाल में पड़ता है. संयोग से जब वे वहाँ गए, विवाह पंचमी का मेला लगा था. राम-जानकी का वैसा विवाहोत्सव फिर उंसने कभी नहीं देखा... केला, लीची, आम के बाग, हेला बाज़ार के पास रामभद्र में रामचौरा मंदिर, गंगा-गंडक के संगम पर कोनहरा घाट... इस घाट पर होती पूजा के दृश्यों ने जहां मन को मोहा था वही जलती चिताओं ने भीतर विषाद भर दिया था. जीवन-मृत्यु के धूप-छांही रुप ने इस तीर्थ स्थान की स्मृति को अद्भुत बना दिया है उसके लिये. गंगा किनारे राजासन में स्थित महादेव मठ देखने के बाद वे हाजीपुर माहनार रोड पर पड़ने वाले जाधुआ में मामू-भानजा मज़ार पर भी गये थे. उस मज़ार पर बांधे गए धागे के साथ की गई मन्नत अब जाकर कबूल हुई थी... अपने भरते हुये जिस्म की तरफ देख कर ललिता अक्सर सोचती है. गंगा-गंडक के संगम पर पैगोडा स्टाईल में नक्काशीदार लकड़ी से बने नेपाली मंदिर की दीवार पर उकेरे गये प्रेमी युगल के केलिरत दृश्यों की छवि तो अब तक उसके मानस में खिंची हुई है. नई-नई दुल्हन के रुप में इन्हें देख वह अपने पति के सामने कितनी लजाई थी. पातालेश्वर मंदिर तथा बटेश्वरनाथ मठ जाना हो नहीं पाया था उस बार. बहुत प्राचीन शिव मंदिर. उसके पति ने कहा था वहां फरवरी-मार्च में मनाये जाने वाले बसंत पंचमी में उसे घूमने ले जायेंगे. महा शिवरात्रि का एक माह तक चलने वाला मेला भी दिखायेंगे. उस समय ससुरजी की अचानक से तबियत बिगड़ने से उन्हें यात्रा के बीच से ही गांव लौट आना पड़ा था. इसके कुछ दिन बाद ही उनका देहांत हो गया था.
दिन-दिन देह से भारी होते हुये उसने कभी अपनी छत से तो कभी खिड़की से फूलमती को गोबर पाथते, जंगल से लकड़ियां बीन कर लाते या अपनी सास, पति से पिटते-रोते, झगड़ते हुये देखा था. उसका उनके यहां आना भी इन दिनों बहुत कम हो गया था.
कार्तिक महीने में बारिश के थिराते-थिराते छठ की धूम मचने लगी. ललिता की सास व्रत रखती हैं. उसके पांव भारी होने से उसकी सास ने फूलमती को मदद के लिये बुला लिया था. गर्भ के शुरुआती दौर में वह अभी तक हल्की-फुल्की थी. झट से उनकी बात मान गई थी. 'नहाए-खाए' के दिन एकदम भोरे-भोर सिया सुंदरी में डुबकी लगा कर घर के काम-काज में हाथ बंटाने हाजिर हो गई थी. उसका उत्साह देखते बनता था. घर का भीतरी आंगन गोबर से लीपा था, पूरा इलाका झार-झूर कर साफ किया था. पूजा के हर काम में उसका यूं हाथ बंटा सकना ललिता को अच्छा लगा था. छठ सही मायने में लोक पर्व है, जिसमें सबका बराबरी का हिस्सा होता है. दूसरे त्योहारों की तरह ये बाभनों या ऊंची जात वालों की बपौती नहीं. इसमें उनकी धौंस नहीं चलती. दहलीज पर रंगोली डालती हुई फूलमती मुझे अपनी हुलस में समझाती रही थी- एक्को दिन सूरज देवता न उगे तो दुनिया जहान में अन्हार छा जायेगा. धरती से जीवन खतम हो जायेगा. देखा जाय तो उ सबसे बड़ा भगवान हुये, उनका पूजा खूब मन लगा के  करना चाहिए. तभिए दीन-दुनिया में तरक्की होगा."  ललिता कौतुक से भर कर उसकी बातें सुनती रही थी.. सच, हमारे देश के ये अद्भुत लोक पर्व अपने छोटे-छोटे नियमों और परम्परओं से एक साधरण से साधारण अपढ़ मनुष्य को भी जीवन-जगत की बडी-बड़ी गंभीर, गूढ़ बातें कितनी सहजता और आसानी से सिखा जाते हैं.
'खरना' के दिन मेरी सास ने सभी व्रतिनों की तरह सारे दिन का उपवास रखा था. शाम को पूजा के बाद खीर, रोटी और केले का नेओज काढ़ा गया था. फूलमती अपने हिस्से का प्रसाद  पोटली में बांध कर खुशी-खुशी घर ले गई थी.
छठ व्रत के कठिन नियमों और ढेर सारे कामों के बीच दूसरे दिन ना जाने क्यों फूलमती मदद के लिये नहीं आई थी. अपने छत्तीस घंटे के लंबे निर्जला उपवास के दौरान नहाते-धोते, पूजा-पाठ करते और रातों को फर्श पर कम्बल बिछा कर सोते हुये ललिता की सास बीच-बीच में बड़बड़ाती रही थी- 'इनके लिये जितना भी करो, ई छोटजतिया लोग कभी उपकार नहीं मानता.' एक-दो बार किसी को फूलमती की खबर लेने भेजा भी तो उसने आकर बताया मकान में ताला पड़ा है.
बहुत मुश्किल से सब ने मिलकर किसी तरह पूजा सम्पन्न करवाया. प्रसाद के लिये ठेकुआ बनाना, कसार बांधना... फिर सांझ को घाट जाकर अस्त होते सूर्य को अर्घ्य चढ़ाना... रंग-बिरंगे पताकाओं से सजे नदी के घाट, रोशनियां, बजते लाउड स्पीकर, लोगों की भीड़ और औरतों के सम्मिलित कंठ से गाये जाने वाले गीत- " ऊ जे केरवा जे फरले घवोद से... ओ पर सूगा मेरराए…"
ललिता काम करते, सजते-संवरते और सब के साथ मिल कर हंसते-गाते ही थक कर चूर हो गई थी. देर रात उसके पति और दोनों देवर जब घाट पर हाथी बैठाने के लिये जाने लगे तो वह चाह कर भी जा न सकी. ऐसा शायद पहली बार हुआ था वर्ना वह बचपन से इस त्योहार के हर काम में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेती रही थी. खास कर सुबह के अर्घ्य से पूर्व देर रात को घाट पर हाथी बैठाने को ले कर वह बहुत उत्साहित रहा करती था... कितना सुंदर और अद्भुत दृश्य होता है वह... पाँच पाँच गन्नों के सुरक्षा घेरे के बीच सिर पर मिट्टी के दो-दो कलश सम्हाले किसिम-किसिम के हाथी महाराज... हाथी और कलश के कांधे पर झिलमिलाते दीप... और इनके चारों तरफ सजे मिट्टी के प्यालों में छोटे-छोटे ठेकुए, नन्हे-नन्हे कसार, चीनिया केले, कागजी नींबू.... वातावरण में फैलता धूप और अगरबत्ती का पवित्र सुवास... रोशनी, खुश्बू और उत्साह का दूर-दूर तक फैला  एक अंतहीन साम्राज्य और गंगा के भाप उठते पावन जल में हिलकोरे लेती इस दृश्य की सुंदर छायाकृतियाँ... तीन दिन लबे इस पर्व का यह दृश्य उसे सबसे ज्यादा मनमोहक लगता है, लेकिन आज उसकी हिम्मत नहीं हुई... अब वह सीधे सुबह के अर्घ्य के समय ही जाएगी.
सूरज को अर्घ्य चढ़ा कर सुबह घाट से लौटते हुये फूलमती के घर के बाहर भीड़ देख कर ललिता अपनी सास के साथ रुक गई थी. उसने देखा- फूलमती आंगन में लोट-लोट कर विलाप कर रही थी. उसके जटा जैसे बाल धूल में लिथड़े हुए थे. बाद में पता चला था, राम सिंघासन के केले के बगान का काम छोड़कर बिगेसर दो पैसे ज़्यादा कमाने के लोभ में फतुहा की किसी दवा फैक्ट्री में काम करने लगा था. राम सिंघासन की पूछताछ के डर से फूलमती भी अपनी सास के साथ कई दिनों से गांव से भागी हुई थी. परसो सुबह-सुबह राम सिंघासन के लोगों ने बिगेसर को कहीं से ढूंढ़ कर बहुत बुरी तरह पीटा था. उसकी हालत खराब थी. किसी ने उसे हाजीपुर सदर अस्पताल पहुंचाया था मगर वहां उसकी हालत देखकर डॉक्टर ने उसे पी एम सी एच ले जाने के लिये कह दिया था. महात्मा गांधी सेतु पर अठारह  घंटे से जाम लगा था. एम्बुलेंस का सायरन भी कोई काम नहीं आ सका था. बीचे रास्ते बिगेसर मर गया. खून बहुत बह गया था उसका. लेकिन जाम ऐसा कि बिगेसर की लाश भी दूसरे ही दिन घर आई थी. लाश का चेहरा देख कर सब डर गये. काला बिगेसर एक दम फीका हो चला था, देह में एक बूंद खून नहीं. आंख भी जैसे उबला अंडा.
बिगेसर की मां छाती कूट-कूट कर कभी अपनी बहू को कोस रही थी तो कभी बैन लगा कर रो रही थी - "अभगला. दू पइसा जादा के लोभ में गांव छोड़ कर गया... केतना बार कहा अपना बूढ़ महतारी का कहना मानो, पर नही. राम सिंघासन के आदमी-जन से चोरा-नुका के केतना दिन रहता... ऊ का किया न किया इस बात में कुच्छों नहीं रखा है... जो दोस होता है गरीबे का होता है. दू रोटी सधाने के लिये जनम भर का जुआ गले में डालना पड़ता है. लो अब जिनगिए का जुआ कान्हा से उतर गया. एही लिए त कह रहे थे कि कहीं जाय से कुछ न होगा. बचना चाहता है तो चुपचाप जा कर ओकर गोड़ में नाक रगड़ कर थूक चाट ले...
दो दिन बाद शहर से लौटकर त्रिभुवन ने बताया था बिगेसर के काम छोड़ कर जाने से राम सिंघासन बहुत नाराज़ था. उसने थाना में उसके खिलाफ चोरी करके भागने का रिपोर्ट लिखवा दिया था और अफवाह भी फैला दी थी कि बिगेसर डाकू बन गया है और डाकुओं के आपस की लड़ाई में ही मारा गया. सुन कर ललिता दंग रह गई थी. खुले आम ऐसा अन्याय-अत्याचार और कहीं कोई सुगबुगाहट तक नहीं. पूरा गांव अनजान बना अपने-अपने घरों में दुबका हुआ था.
अब हर दो दिन में फूलमती के दुआर पर पुलिस की जीप आ कर रुक रही थी. देर-देर तक पूछताछ और राम सिंघासन की कोठी में थाना स्टाफ की दावत. कुछ ही दिनों में फूलमती के आंगन से उसके दो खस्सी और दस मुर्गे-मुरगियां गायब हो गयीं. एक दिन फूलमती की सास को अकेली देख कर ललिता ने फूलमती के बारे में पूछा तो उसने बताया- 'फूलमती को थानावाला सब पूछताछ के लिये सुबह-सुबह जीप में उठा ले गया है'. उस दिन फूलमती अपने घर नहीं लौटी थी. सारा गांव उसके नाम पर थू-थू कर रहा था. दूसरे दिन ललिता ने उसे अपने आंगन में चुपचाप बैठे हुये देखा था. उसके बार-बार बुलाने पर भी फूलमती ने कोई जवाब नहीं दिया था. उस समय फूलमती का चेहरा आषाढ़ के मेघ-सा काला दिख रहा था. देख कर ललिता का दिल बैठ गया.
इसके बाद फूलमती को जब-तब थाना बुलाया जाने लगा था. उसका बच्चा भी नुकसान हो गया. गांव के अधिकतर लोगों से उनकी बोलचाल बंद हो गयी थी. गांव वालों ने उन्हें एक घर करके रख दिया था. ललिता का सातवां महीना चल रहा था. उसकी सास उसे फूलमती से ज़्यादा मेल-जोल रखने से मना करती रहती थी. ललिता का वैसे भी कहीं आना-जाना बहुत कम हो गया था. किसी तरह अपना स्कूल चला रही थी.
फूलमती को लेकर आये दिन गांव में कोई ना कोई कहानी सुनने को मिलती. पनभरियां चटखारे ले-लेकर उसकी बातें एक-दूसरे से सांझा करतीं तो शाम को गांव के चौपाल में भी मर्दों के बीच उसी की कथा-कहानी गुलजार रहती. कोई कहता फूलमती डायन विद्या सीख रही है. रोज रात गांव के श्मशान में जा कर पूरी तरह नंगी होकर नर मुंडों की ढेर पर बैठ कर प्रेत साधना करती है, सर के बल उल्टी खड़ी हो कर पांव के दोनों तलवे में दीये बाल कर भोर रात तक नाचती है... जितने मुंह उतनी बातें.
एक दिन गौरी प्रसाद की बहू बीच पंचायत घूंघट काढ़ के आ खड़ी हुई कि फूलमतिया उसके दुआर पर रोज सुई से टांका हुआ नींबू, लत्ता का गुड़िया और सेनुर फेंक जाती है. इसीसे उसका बऊआ बीमार पड़ा है और ठीके नहीं हो रहा. दो और जनानियों ने भी यही शिकायत की. सरपंच ने फूलमती की सास को बुलाकर धमकाया. सास ने सब सुन घर जाकर फूलमती की रही-सही तोड़ कर मार-कुटम्मस की, पूरे गांव ने बड़े चाव से एक डायन को पिटते हुये देखा. उस दिन ललिता डॉक्टर को दिखाने शहर गई हुई थी. दूसरे दिन खबर सुनकर दोपहर के निर्जन में सबकी आंख बचाकर उसके घर जा कर देखा था, फूलमती एक कोने में गठरी बनी पड़ी हुई थी. बुखार से तमतमाता हुआ चेहरा, पूरी देह में लाल-नील धारियां... ललिता के बार-बार पुकारने पर भी आंख नहीं खोल पाई थी. पड़ी-पड़ी गोंगियाती रही थी. फूलमती की सास पलानी पर बैठ कर बड़बड़ा रही थी – 'ई भतरखऊकी, चुरईल हमरा बेटा के त खाईए गई, अब हमको भी खाईए के छोरेगी..." ललिता का जी कसैला हो आया था. पन्द्रह साल की एक बच्ची डायन, पतुरिआ, भतरखऊकी और जाने क्या-क्या... उजड़ी मांग, रूखे बाल, बिवाई पड़े पांव और सारे शरीर पर मार-पीट के निशान. एक बार ललिता ने उससे पूछा भी था कि वह अपने नैहर क्यों नहीं चली जाती. सवाल सुन कर फूलमती अजीब ढंग से मुस्कुराई थी- "कहां जाएँगे बहूजी. औरत जात का कही कोई घर नहीं होता, बस एक ठेकाना होता है, मिला तो मिला..."
ललिता अपने कमरे में बैठी-बैठी फूलमती की सास की गालियों का पथार बिछाना सुनती रहती- "रांड होकर भी इ खचरी का सौक कम नहीं होता. छापा का साड़ी चाहिये, केश में गमकौआ तेल चाहिये. चटोरिन का जीभ भी कम लम्मा नहीं है. पूरा डेढ़ गज का है. लपलपाता रहता है रात-दिन." पहले रात-दिन बोलने-झगड़ने वाली फूलमती इन दिनों एकदम चुप हो गई थी. सर झुकाकर या तो अपने पैर के अंगूठे से आंगन की मिट्टी खोदती रहती या काठी के झाड़ूं बांधती रहती. उसकी हरदम दिपदिपाने वाली आंखों के साथ जैसे उसकी जुबान भी गूंगी हो गई थी.
प्रसव से एक महीने पहले ललिता अपने मायके चली गई थी. इसके बाद उसे पता नहीं चला उसके पीछे कितनी बार कितनों ने फूलमती को भिनसार दिशा-मैदान जाते हुये या मवेशियों के लिये घास काटते हुये कभी नासनी के खेत में तो कभी तरोई के मचान के नीचे खींच लिया था; गांव वालों ने कभी गांव में बीमारी फैलने के कारण तो कभी किसी के बच्चे के बीमार पड़ जाने के कारण उसे डायन कह कर पीटा था, उसके बाल काट लिये थे या उसे पूरे गांव में मुंह काला करके घुमाया था. अपने मायके में प्यार-दुलार के बीच रहते हुये ललिता को रह-रह कर उसकी याद आती मगर वह करती भी तो क्या. बस अपना मन मसोस कर रह जाती.
एक सुंदर, तंदुरुस्त बच्चे को जन्म देने के छ्ह महीने बाद ललिता अपने ससुराल लौटी थी और लौट कर एक अजीब नज़ारा देखा था- फूलमती की झोपड़ी के भीतर-बाहर लोगों की उमड़ती हुई भीड़ और ’फूलमती मैया की जै’ का गगनभेदी उदघोष. सास ने बताया था, फूलमती पर देवी आने लगी है. दूर-दूर से लोग उसके दर्शन करने आते हैं. वह सबकी मन्नत पूरी करती है, हारी-बीमारी की अचूक औषध देती है. जो एक पांव पर आता है वह दो पांव पर लौटता है देवी के अस्थान से. उस दिन एक मुर्दे को जिन्दा कर दिया दो लात में. ललिता की सास ने बताया था फूलमती मैया के आशीर्वाद देने का ढंग भी निराला होता है. ना फल ना भभूत. बस लात और गालियां. ऐसी-ऐसी गंदी गालियां कि सुनने वालों के कान लाल हो जाते हैं. सबको माई के सामने जा कर साष्टांग लेटना पड़ता है. जिस पर माई प्रसन्न होती है उसके माथे, पीठ, कंधे पर धमाधम लात मारते हुये गाली-गलौज से उसके सात पुस्तों का श्राद्ध करती है फिर उसका झोंटा पकड़कर अपने आंगन से बाहर निकाल देती है. सिर्फ छोटे बच्चों को अपनी गोद में लेकर झुलाती है और लोरी गाती है. फूलमती मैया के लात का प्रसाद पाकर भक्त जन धन्य हो जाते हैं. मैया को चढ़ावे में सिर्फ लाल साड़ी, कुमकुम और बेला के फूल की वेणी चढ़ाई जा सकती है. मिठाई में गर्म बुंदिया और गुड़ की जलेबी. मैया रुपये-पैसे को हाथ भी नहीं लगाती. भक्त जन उनके दुआर के बाहर रेजगारी की ढेर लगा कर जाते हैं. सारी रात मैया की कोठरी से सिक्कों की खन-खन और खिल-खिल हंसी की आवाज़ सुनाई पड़ती है. फूलमती के इस नये अवतार की कथा सुन कर ललिता का चेहरा उजला हो उठा था- देवी के दर्शन उसे भी करना है.
दूसरे दिन गुरुवार था. यह देवी का दिन माना जाता है. नहा-धो कर लाल साड़ी, वेणी और सिन्दूर की डिब्बी ले कर ललिता अपने बच्चे के साथ फूलमती मैया के दर्शन करने सुबह-सुबह उसकी झोपड़ी गई थी. उस समय फूलमती का घर-आंगन दूर-दूर से आये हुये श्रद्धालुओं से खचाखच भरा हुआ था. जिस समय ललिता फूलमती की कोठरी में दाखिल हुई थी वह अपने पैरों के नीचे दंडवत पड़े हुये राम सिंघासन को लात से कोंचते हुये गंदी-गंदी गालियां बक रही थी. उस समय कितना भयंकर हो रहा था उसका रुप- जब फूल-सी चढ़ी हुईं लाल-लाल आंखें, सिंदूर से लिसरा हुआ कपाल और खुले हुये मेघ-से काले, घने बालों की जटा में गूंथी ताज़े बेला की महकती हुई वेणी. साड़ी भी टह-टह लाल. देख कर ललिता सिहर उठी थी. राम सिंघासन को कोढ़ फूटा था और उसी से निजात पाने की आशा लिये वह देवी के भीषण पदाघात सहता हुआ उनके श्री मुख से बरसने वाली भयंकर गालियों का भक्ति भाव से श्रवण करता हुआ दांत भींचे पड़ा हुआ था. भीषण प्रहार से अब तक उसका पूरा मुंह सूजकर कोहड़े की तरह दिख रहा था. दोनों आंखें मुंद कर प्राय: बंद हो गई थीं. सारे लोग जिनमें थाना दारोगा शंकर पासवान, नीलमणि पांडे, सरपंच की बहू सुमति और जाने कौन-कौन... हाथ में चढ़ावे की डलिया लिये इस अद्भुत दृश्य को चुपचाप भक्ति भाव से देख रहे थे.
राम सिंघासन को पीट-पीट कर बेहाल करने के बाद देवी फिर नकिया कर बोलते हुये झूमने लगी थी- मुझे सिन्दूर दे, वेणी दे, लाल साड़ी दे...
ललिता अपने नवजात बच्चे को लेकर आगे बढ़ी थी और उसे झूमती हुई फूलमती की गोद में डाल दिया था. ललिता पर दृष्टि पड़ते ही फूलमती अचानक से चुप हो गई थी. उसके चेहरे पर उस समय ना जाने कैसा भाव था. मानो देवी एकदम से मानवी हो कर ज़मीन पर उतर आई हो- वही पुरानी फूलमती- गरीब, दुखी, असहाय... ललिता ने उसकी मांग में खूब गाढ़ा करके सिन्दूर भरा था, उसके बालों में फूल की वेणी सजाई थी और लाल बनारसी खोल कर उसे ओढ़ा दिया था. सिन्दूर-कुमकुम से सजी फूलमती कितनी सुंदर लग रही थी उस समय. अंधियारी कोठरी में उसके रुप का टह-टह इंजोर. दोनों की आंखें मिली थी और एक साथ आंसुओं से भर आई थीं. उसी समय चारों ओर से ’रमरति मैया की जै’ का उद्घोष हुआ था. पीछे से ललिता की सास ने अधीर हो कर ललिता को टहोका लगाया था- जल्दी से मैया से वरदान मांग लो बहू- सुख, सम्पत्ति, आरोग्य... बच्चे को धीरे-धीरे झुलाती हुई फूलमती की ओर गीली, चमकती हुई आंखों से देख कर ललिता ने धीरे से कहा था- मुझे कुछ नहीं चाहिये, मैं अपनी देवी के लिए खुश हूँ.
ललिता की सास पीछे से ललिता के कंधे दबा कर उसे फूलमती के पैरों पर जबरन झुकाने लगी थी. मगर फूलमती ललिता को बीच में ही रोक कर उसके सीने से लग गई थी. उसे अपने अंकवार में लेती हुई ललिता जानती थी, फूलमती चुपचाप रो रही है. उसने उसे और कस कर अपनी बांहों में समेट लिया था. वह नहीं चाहती थी कि किसी को पता चले फूलमती रो रही है. रोती साधारण औरतें हैं, फूलमती की तरह देवियां नहीं.  

Monday, February 15, 2016




◻  मर्ज
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 📝 आशा पाण्येय
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.......तो मैं बात उस खंडहर की कर रहा था, जो मेरे गाँव के किनारे पर स्थित है और जिससे लग कर बरगद के चार विशाल पेड़ अपनी जटाओं को जमीन से लटकाये खडें हैं। यह खंडहर कई साल पुराना है और अब यह छोटे से टीले का आकार ले चुका है । पर, गाँव वाले इसे तूफानी का खंडहर ही कहते हैं। बरगद के ये चार विशाल पेड़ घने वन का आभास दिलाते हैं। मेरे गाँव को दो ओर से घेरती नदी बरगद के पेड़ों के बगल से होकर बहती है जो इस मैदानी गाँव को भी पहाड़ी गाँव जैसा सुरम्य बनाती है। मेरे गाँव की इसी सुन्दरता से मुग्ध होकर दो किलोमीटर दूर स्थित कोट (किला) के शहजादे जब दिल्ली से कोट में पधारते थे तो शाम की सैर में कभी-कभी दो चार लट्ठधारी सेवकों के साथ खंडहर पर खेलने आ जाते थे। मेरे गाँव के बच्चे, जिनमें मैं भी शामिल होता था, निहाल हो जाते थे और उनके पीछे-पीछे भागते हुए उनकी इच्छा से उनके खेल में शामिल हो जाते थे । शहजादे हमारी पीठ पर लपक कर चढ़ लेते और बरगद की डाल को छूने का प्रयास करते। हम उन्हें अपनी पीठ पर अच्छे से सम्भाले रहने में पूरी ताकत लगा देते। वे बरगद की लटकती जटाओं को पकड़ लेते और  पेंग बढ़ाने के लिए लात से हमारी छाती पर धक्का देकर झूलने लगते। दौड़कर खंडहर पर चढ़ जाते, उछलते-कूदते और अन्त में उसकी गन्दी मिट्टी से निजात पाने के लिए पास की नदी में छलाँग लगा देते। जब धुल पुँछ कर नदी से बाहर निकलते तो लट्ठधारी सेवकों के साथ कोट में चले जाते। जब कोट के शहजादे नदी में नहा रहे होते तो हम गाँव के बच्चों को नदी में उतरने की मनाही थी। लट्ठधारी सेवक घूर कर हमें भगा देते थे। हमारे गाँव के बडे-बुजुर्ग भी बच्चों को  बरज देते थे। शहजादे राजा-महाराजा थे। राजा-महाराजा और प्रजा एक ही नदी में, एक ही घाट पर, एक साथ कैसे नहा सकते हैं। उनके जाने के बाद इतनी देर से ललचाये हम बच्चे भी नदी में छलाँग लगा देते। जी-भरकर पानी में डूबते, उतराते, तैरते। खूब मजा आता। लेकिन दिक्कत तब हो जाती जब नहाने के बाद मैं लगातार छींकने लगता। माँ कहती-इतनी देर तक खंडहर की धूल में खेला, फिर नदी में नहाया इसलिए सर्दी हो गई। पर दो बाते थीं जो मुझे कभी समझ में न आईं। एक तो यह कि-खंडहर में खेलना तथा नदी में नहाना तो हम बच्चों का नित्य का खेल था पर सर्दी कोट के शहजादे के साथ खेलने से ही क्यों होती थी ? दूसरी बात यह कि गाँव के अन्य बच्चे भी तो शहजादे के साथ खंडहर की धूल में खेलते थे, नदी में नहाते थे, उन्हें क्यों नहीं होती थी सर्दी ? माँ कहतीं- तेरा शरीर नाजुक है। इस वर्षों पुराने खंडहर की जमीं हुई धूल-मिट्टी तुझे नुकसान करती है। धूल में खेल कर जब तू घंटो नहा लेता है तो छींकना शुरू कर देता है। मेरी माँ वैद्य की बेटी थी इसलिए मेरी सर्दी का यह कारण ही उसे सही लगता था। मेरे मन में एक सवाल और भी उठता था कि, कोट के शहजादे को भी तो सर्दी हो जाती होगी। वे तो और भी नाजुक रहे होंगे। दिल्ली में रहते थे। आजादी के तुरन्त बाद उनके पिता बाबूसाहब को दिल्ली से बुलावा आया था। जब वे दिल्ली से कोट में आते तो उनकी गाड़ी के आगे-पीछे कई-कई गाड़ियाँ होती। अगल-बगल के गाँवों के तमाम लोग उमड़ पडते थे बाबू साहब के दर्शन के लिए। तो ऐसे में मेरा यह सोचना कि शहजादे मुझसे अधिक नाजुक होंगे और नदी में नहाकर बीमार पड जाते होंगे। कतई गलत नहीं था। दिन बीतते गये पर दिमाग में प्रश्न कुलबुलाता ही रहा। मेरे पास इस प्रश्न के हल का कोई जरिया भी न था। खंडहर की धूल साल भर मेरे नथुनों में समाती रहती पर छींक शुरू होती शहजादे के आने के बाद ही। लो, मैं तब से खंडहर का ही जिक्र किये जा रहा हूँ। अरे भाई, जब तक मैं आपको ये न बता दूँ कि आखिर इसका रहस्य क्या है,  आप समझेंगे कैसे ?... नही जी, डरें नहीं, किसी भूत-प्रेत का निवास नही है यहाँ। बारह बजे रात में यहाँ भूतों की सभा नहीं लगती है और न ही घुँघुरुओं की रुन-झुन सुनाई पड़ती है। मुझे रात में सुनाई जाने वाली आजी की कहानियों ने टुकडों-टुकडों में इस खंडहर के रहस्य को तोड़ा था। आजी इस गाँव में तथा आस-पास के कई गाँवों में ऐसे कई खंडहर होने की बात करती थीं जो खुली आँखों से तो नहीं दिखते लेकिन मौजूद हैं आज भी। खैर... तो आजी बताती थीं कि, यह खंडहर हमारे गाँव के मातादीन उर्फ तूफानी का घर था।  दादा, बाबा के जमाने की दो खण्ड की बखरी थी उसकी। निरबसिया था मातादीन। उसके मरने के बाद घर की देख-भाल करने वाला कोई न बचा। कुछ दिन तक तो घर आँधी-तूफान से अकेले लड़ता रहा फिर भहरा के खंडहर बन गया। यह उन दिनों की बात थी जब राजे-रजवाड़ों का राज था। गाँवों में जमींदारों की तूती बोलती थी। मेरे गाँव से सिर्फ दो कि.मी. की दूरी पर स्थित इस कोट में जमींदार बाबू रायबहादुर साहब का राज था। बड़ा रुतबा था रायबहादुर साहब का। हाथी पर बैठ कर जब वे अपने इलाके में निकलते तो इलाके के लोग अपना सिर नीचे झुका कर उनके वहाँ से आगे चले जाने तक खड़े रहते थे । गाँव  की बहू-बेटियाँ अपना-अपना काम बीच में रोक कर घर के भीतर चली जातीं थीं। बाबू रायबहादुर की नजर जिधर घूम जाती थी वहाँ कहीं दया बरस पड़ती थी तो कहीं क्रोध उबल पड़ता था। मातादीन गाँव का गरीब किसान था। गरीब यूँ कि दादा-बाबा के जमाने से ही जमीन बँटते-बँटते उसके हिस्से में सिर्फ चार बिस्वा जमीन ही आई थी। बरसात के महीने में वह उसी जमीन में धान बो लेता था, ठण्डी में गेहूँ। कभी फसल अच्छी हो जाती थी, कभी खराब। जमींदार का लगान चुकाने के बाद उसके पास इतना अनाज नहीं बच पाता था कि वह साल भर अपना और अपनी पत्नी का पेट भर सके। चार बिस्वा जमीन होती ही कितनी है ! वैसे गाँव वालों का मत था कि मातादीन के घर में दरिद्दर समा गया है। बिना बाल बच्चों का, सिर्फ दो जन का परिवार, फिर भी आये दिन फाँका ही पड़ा रहता है। एक दिन मातादीन ‘कोट’ के बगल से निकल रहा था। ‘कोट’ के मुख्य दरवाजे पर दो हट्टे-कट्टे दरबान तेल पिलाई लाठी लिए खड़े थे। मातादीन कोट के नजदीक पहुँचने के कुछ पहले से ही अपना सिर नीचे झुकाकर चला आ रहा था। मुख्य दरवाजे तक आते-आते एक बार उसका सिर ऊपर उठ गया। लगान उगाही का समय था। मजदूर लगान में मिले अनाज को बोरों में भर कर अहाता की दीवाल से सटा कर रख रहे थे। बोरों को, एक के ऊपर एक लादते हुए अहाता की दीवाल की ऊँचाई के बराबर तक रखा गया था। मातादीन ने क्षण भर के लिए सिर ऊपर उठाया था, पर भूख की तीव्रता सीधे अनाज  के बोरों से जा टकराई। क्षण-भर में ही उसने बोरों के रख-रखाव की स्थिति का अन्दाज लगा लिया। अब उसके दिमाग में हलचल मची। तमाम तरह की योजनाएँ बनने बिगड़ने लगीं। अपने रास्ते पर चलते हुए वह कोट के पिछवाड़े तक आ पहुँचा। एक बार फिर उसने अपनी नजरें अहाते के दीवार की ओर गडा दी। क्षण भर ठिठक कर कोट की ओर देखा और अपने रास्ते पर आगे बढ़ गया। आधी रात बीत जाने के बाद एक धम्म-सी आवाज ने कोट के पहरेदारों को सचेत कर दिया। जिस ओर से आवाज आई थी पहरेदार उस ओर दौड़ पडे।  जब तक पहरेदार पिछवाड़े पहुँचते, मातादीन पीठ पर गेहूँ का बोरा लादकर भागने लगा था। पहरेदार मातादीन के पीछे दौड़े जरूर पर उसे पकड़ न पाये। अँधेरी रात का फायदा उठाकर मातादीन आम के घने बगीचे में घुस गया।  वहाँ से वह किस ओर भागा, पहरेदार समझ न पाये । कुछ देर खोज-बीन करके वापस लौट आये। सुबह होने पर डरते-डरते पहरेदारों ने बाबू साहब से रात की सम्पूर्ण घटना का बयान किया। चोर का साहस सुनकर, बाबू साहब अचम्भित हुए तथा अपने पहरेदारों की नाकामी पर क्रोध भी आया उन्हें। उन्होंने पहरेदारों को डपटा - ‘‘तुम दोनों के हाथ में सिर्फ लाठी थी और चोर के पीठ पर पचास किलो वजन का बोरा, फिर भी वह भाग निकला !  तुम लोग उसे पकड़ न पाये ! बस मुसडण्डों की तरह खा-खाकर फैल रहे हो... आज से तुम दोनों पहरेदारी नहीं करोगे... जाकर खेत में काम करो और हाँ, रसोइयें को कह दो कि इन दोनों को एक वक्त का भोजन बन्द कर दे... ससुरे भैंसे जैसे मोटाये जा रहे हैं ’’ बाबू साहब को क्रोध में देख कर कोट में सन्नाटा छा गया था। दोनों पहरेदार सिर झुकाये खड़े थे।  यह पहला अवसर था जब पहरेदारों को इतनी बडी गलती की सजा में सिर्फ एक वक्त का भोजन बन्द किया गया था, कोड़े नहीं बरसाये गये थे उन पर। बाबूसाहब का मन बिचलित था। वे उस व्यक्ति को देखना चाहते थे जो पीठ पर बोरा लाद कर भी इतनी तेज भागा कि उनके पहरेदारों की पकड़ में न आया। बाबू साहब ने हुक्म दिया कि आस-पास सभी गाँवों में डुग्गी पिटवा दी जाये कि कोट से गेहूँ का बोरा लेकर भागने वाले व्यक्ति के साहस से बाबूसाहब खुश हैं.... उसे वे अपने हाथों से इनाम देना चाहते हैं... आज दोपहर तक उस व्यक्ति को कोट में हाजिर होने  का हुक्म दिया जाता है।... यह फरमान सुन कर भी यदि वह व्यक्ति कोट में हाजिर न हुआ तो बाबूसाहब के जासूस उसे खोज निकालेंगे और उसकी चमडी उधेड ली जायेगी। डुग्गी की आवाज ने मातादीन की घरवाली को डरा दिया। काँपती आवाज में वह मातादीन पर बिफर पड़ी -- “लो और करो राजे-रजवाड़ों के यहाँ चोरी ... जल में रहे मगर से बैर। अब खाओ पेट भरकर। मति मारी गई थी तुम्हारी... तुम तो मरोगे ही मुझे भी मरवाओगे....।‘ ‘चुप कर, ध्यान से सुन तो। सुन, वो लोग क्या बोल रहे हैं... इनाम मिलेगा इनाम। पीठ पर पचास किलो अनाज का बोरा लादकर कोट के पहरेदारों से अधिक तेज भागने वाले पर बाबू साहब खुश हुए हैं। तब से बडबडाये ही जा रही है।‘ मातादीन तुनक कर घर से बाहर निकल गया। डुग्गी की आवाज पूरे गाँव में गूँज रही थी। गाँव के लोग गहरे आश्चर्य में थे। कोट से अनाज चुराने का साहस !  किसने किया होगा ! मातादीन तन कर डुग्गीवालों के पास चला गया। गाँव वाले चौंक गये। आँखें मल-मल कर सब मातादीन को देख रहे थे। जैसे, विश्वास करना चाह रहे हों कि हाँ, यही हकीकत है.. वो नींद में नहीं हैं। मातादीन गर्व से झूमते हुए डुग्गीवालों से कह रहा था-‘‘बन्द करो ये डुगडुगी... मैं ही हूँ तूफान मेल, कोट से बोरा लेकर भागने वाला... चलो, चलकर मेरे घर में बोरा देख कर विश्वास कर लो, फिर ले चलो मुझे बाबूसाहब के दरबार में.... बडे दिन बाद किस्मत बदली है।’’ मातादीन की मुरझाई आँखें चपल हो गई थीं। बस उस दिन से मातादीन गाँव में तूफान मेल के नाम से जाना जाने लगा। धीरे-धीरे तूफान मेल से कब तूफानी में बदल गया, पता ही न चला। अब गाँव वाले उसे तूफानी ही कहने लगे थे। नही जी, कहानी अभी खत्म नहीं हुई है। मैं भी तो देखो, कितना पागल हूँ ! उसके नाम पर अटक गया... अरे गाँववाले उसे किसी भी नाम से बुलाये जी, क्या फर्क पडता है ? तो चलिए मैं आगे की कहानी सुनाता हूँ। डुग्गी पीटने वालों को गेहूँ का बोरा दिखा कर मातादीन ने अलगनी से अँगोछा उठाया और कन्धे पर डाल कर कोट जाने के लिए तैयार हो गया। उसकी घरवाली डर के मारे काँप रही थी। हाथ जोड़ कर डुग्गी पीटनेवालों से ही विनती कर डाली, ‘‘दया करें हुजूर, भूख ने ये गलती करवाई है।’’ मातादीन अपनी घरवाली की बेवकूफी पर हँस पडा, ‘’औरत की जात... अकल तो एड़ी में रहती है। खुशी के मौके को भी रो-धोकर खराब कर रही है।.... बाबू साहब इनाम देने के लिए बुलाए हैं.... फाँसी चढ़ाने के लिए नहीं।’’ ‘’राजे-रजवाड़े की बात ! कब गुस्सा भड़क जाए, भगवान भी न समझ पायें... मैं तुमको वहाँ अकेले न जाने दूँगी...साथ चलूँगी तुम्हारे।’’ मातादीन की घरवाली अड़ गई थी। मातादीन इनाम मिलने की खुशी में डूबा था। घरवाली को कोट में साथ ले चलने की बात मान गया। किसी विजेता की भाँति सबसे आगे मातादीन उसके पीछे डरी-सहमी उसकी घरवाली, तथा सबसे पीछे डुग्गीवाले कोट की ओर बढ़े जा रहे थे। मातादीन की घरवाली का एक मन उखड़ता, डरता, काँपता तो दूसरा मन उसे थपथपा भी देता, क्या पता, मातादीन सच कह रहा हो... दिन फिरने वाले हों,  खुशी का क्षण आने वाला हो। कोट पहुँच कर मातादीन को बाबू रायबहादुर के सामने पेश किया गया। मातादीन की घरवाली भी उसके पीछे-पीछे बाबू साहब के सामने आ गई। बाबू साहब कुछ पूछते उसके पहले ही डुग्गीवालों ने बता दिया-इसकी घरवाली है हुजूर , मानी नही, जबरन इसके साथ यहाँ तक आ गई। ‘‘हूँ’’ बाबू साहब ने ऊपर से नीचे तक एक नजर उस पर डाली फिर मातादीन की ओर मुखातिब हुए- ‘’तो तुम हो हमारे कोट से अनाज चुराकर भागने वाले।’’ इनाम मिलने की खुशी में सराबोर तूफानी बाबू साहब की हुंकारती हुई रौबदार आवाज को सुन कर काँप गया। गर्दन नीची हो गई उसकी। ‘‘देखने में तो मरकट जैसे पिलपिले दिख रहे हो लेकिन, ताकत इतनी है तुममें ! वाह भाई वाह... कमाल है तुम्हारा। इनाम तो तुम्हें जरूर मिलेगा लेकिन, चोरी की सजा पहले मिलेगी... और सजा भी ऐसी मिलेगी कि फिर कोई दुबारा ऐसा दु:साहस न कर सके।’’ ‘‘.....अरे भाई ! सजा जरूरी है। कोट में चोरी की हिम्मत !’’ अपने एक-एक शब्द पर जोर देते हुए बड़ी धीर-गम्भीर आवाज में, किसी रहस्य का उद्घाटन करने जैसी मुद्रा में बाबू साहब बोले जा रहे थे। परिणाम की गम्भीरता का अन्दाज लगा कर मातादीन काँपे जा रहा था। अब तक सिकुड़ कर एक ओर खड़ी उसकी घरवाली आगे बढ़ कर बाबूसाहब के पैरों पर गिर पड़ी। ‘‘दुहाई हो सरकार की, दया करें माई-बाप, रहम करें... पेट की आग ने ढिठाई करवाई  हुजूर ! इसे बख्श दें... आगे से ऐसा नहीं होगा सरकार, ये कोट की तरफ आँख उठा कर देखेगा भी नहीं। एक बार सरकार, बस एक बार माफ कर दें। घबराहट में उसे ध्यान ही न रहा कि कब उसके चेहरे का घूँघट हटा और कब उसका आँचल सिर से भी फिसल गया। वह तो बस धार-धार रोये जा रही थी और माफ करने की विनती किये जा रही थी। बाबू साहब ने अनावृत हुए उसके चेहरे को नजर भर कर देखा, इतनी सुन्दर! इस मरकट की झोली में ! कुछ क्षण उसे देख लेने के बाद उन्होंने एक लम्बी साँस ली फिर मातादीन की ओर देख कर अपनी आवाज को भरसक मधुर बनाते हुए बोले ‘’चलो, तुम्हारी सजा माफ की.. और इनाम तुम्हारा यह है कि हर महीने एक दिन तुम कोट में आ जाया करो... अपनी पीठ पर गेहूँ का जितने किलो वजन  का बोरा लाद सको, लाद कर चले जाया करो।’’ यह सुन कर मातादीन खुशी और कृतज्ञता से बाबू साहब के कदमों पर लोट गया। बाबू साहब की बात अभी पूरी नहीं हुई थी उन्होंने आगे कहना शुरू किया- ‘‘हाँ भई , मेरी एक शर्त है, जब मैं तुम्हारे घर खबर भिजवाऊँ तब अपनी घरवाली को अनाज की साफ-सफाई के लिए कोट में भेज दिया करो। इसकी मजदूरी तुम्हें अलग से मिल जायेगी।... देख तो रहे हो यहाँ मजूरिनों की कितनी कमी है। अब अनाज को चालना, पछोरना महिलाएँ ही कर पाती हैं न। अब तुम अपना इनाम लेकर घर जाओ और इसे यहीं छोड जाओ। अनाज का जो ढेर लगा है ये उसे साफ कर देगी तो हमारे सेवक इसे तुम्हारे घर पहुँचा आयेंगे।’’ मातादीन जड़ हो गया। खुशी टूट कर धराशायी हो गई। सूखते गले और तालू से चिपकती जबान से शब्दों को ठेल कर इतना ही कह पाया कि ‘‘हुजूर, घर में भी बहुत काम रहता है.. इसका आना... पर मातादीन के लाख प्रयत्न के बाद भी उसके शब्द बाबूसाहब तक न पहुँच सके। उसका बोलना पूरा होता उससे पहले ही बाबूसाहब वहाँ से उठ कर चले गये। मातादीन अनाज चालने-पछोरने का मतलब समझता था। समझती उसकी घरवाली भी थी। किन्तु विरोध का साहस किसी में नहीं था। ये बाबू साहब  का हुक्म था। हुक्म का विरोध नहीं होता। क्या करे मातादीन ! किससे कहे। दोनों धम्म से वहीं जमीन पर बैठ गये। चुपचाप बैठे रहे। निःशब्द ,  भीतर सुलगते हुए, ऊपर से मौन। मौन का धुँआ उठता रहा जिससे दालान भर गया। धुँए से दोनों की साँस घुटने लगी पर कुछ अनहोनी नहीं हुई जैसे दोनों ने ही समझ लिया हो कि यही हमारी नियति है। धुएँ में जीना, जीवित दिखना। मातादीन के चेहरे पर शर्मिन्दिगी थी तो उसकी घरवाली के चेहरे पर अफसोस | क्यों आई थी कोट  में। ‘‘कब तक यहाँ बैठा रहेगा तू, बाबू साहब का हुक्म हुआ है कि अनाज लेकर तू गाँव जा, इसे यहीं छोड़ जा। इसको काम समझा दिया जायेगा।’’ किसी सेवक की कर्कश आवाज ने दोनों को चौंका दिया। मातादीन ने साहस किया, ‘‘मुझे अनाज नहीं चाहिए। कल रात में ही तो बोरा भर अनाज ले गया था।’’ धत्त ससुर, ले गया था कि चुराया था.... चल उठ यहाँ से, उठा बोरा और निकल जा। मातादीन की घरवाली पति के हाथ को पकड़ कर उसकी ओर आशा भरी निगाहों से देखने लगी फिर न जाने क्या सोच कर धीरे से अपना हाथ खीच ली तथा सेवकों के साथ मातादीन को जाता हुआ देखती रही। मातादीन जा नहीं रहा था। जमींदार के सेवक उसे धक्के देकर निकाल रहे थे। अब बाकी जिन्दगी उसे ऐसे ही धक्के खाने थे। पहले गरीबी थी। गरीबी के साथ मधुर गीत थे। इन्द्रधनुषी रंग थे। जिसमें दोनों डूबते उतराते और गरीबी को सोख जाते। पेट पिचकता पर होठों से हँसी झरती। पर अब गीत विस्मृत हो गये, इन्द्रधनुषी रंग पुछ गया । अब, जब-तब कोट से उसकी घरवाली के लिए बुलावा आने लगा। तूफानी ने विरोध किया भी किन्तु जमींदार बाबू साहब ने उसके आस-पास आतंक का ऐसा साम्राज्य फैलाया कि तूफानी उसमें घिरकर फँस गया। बोल ही न फूटे उसके। बाबूसाहब के हुक्म से तूफानी गेहूँ के बोरों को अपने घर लाता रहा पर उन्हें खोलता कभी न। फाँके पर फाँके पड़ते रहे, पर कोट का एक दाना भी दोनों न छूते। ऐसा करके उन्हें अपने स्वाभिमान को बचा ले जाने अथवा जमींदार से लड़ जाने का सन्तोष होता। जमींदार को क्या फर्क पड़ता है, न खुले बोरा। बोरा खोलना, न खोलना तूफानी की इच्छा है। जमींदार अपनी इच्छा का सोचता है। उसकी इच्छा पूरी हो रही है। यूँ तो अब विष निगलना सीख लिया था तूफानी ने पर क्या करे उस शरीर का जहाँ भीतर ही भीतर घुमड़-घुमड़ कर विष अपना प्रभाव दिखाने लगा था। यह विष उसकी घरवाली पर भी चढ़ रहा था। दिनों-दिन सूख रही थी वह। सुन्दरता जाती रही उसकी। कुछ सालों बाद कोट से उसका बुलावा बन्द हो गया पर दोनों के चेहरे पर खुशी न लौटी। दोनों के पेट और दिल में आग धधकती जिसमें वे झुलसते जा रहे थे। इस दाह को सहना उनके वश का नहीं रह गया था अब। कहते हैं गेहूँ के बोरों से अटा था उनका घर पर प्राण निकले उनके भूख से। कुछ दिनों के अन्तराल में बारी-बारी से बिदा हो गये दोनों। फिर कुछ दिनों बाद घर भी गिर भहरा गया। तो ये था उस खंडहर का इतिहास। आजी ने टुकड़ो-टुकड़ो में यही बताया था। अब आप भी सोच रहे होंगे कि इसमें ऐसा क्या था कि मुझे उबकाई-सी आती है इसको जोड़ते वक्त ! आजी ने और भी कई बातें बताई थी बाबू साहब की बहादुरी (!) की। हाँ जी, किसना, ननकू, सद्दीक... कई नाम थे, जो बाबू साहब के अलग-अलग खेल के अलग-अलग विदूषक थे। पर न जाने क्यों मेरा छींकना शुरू हुआ इसी खण्डहर की धूल से ! सुबह दरवाजा खुलते ही ताजी हवा के झोंको के साथ खंडहर की धूल मिट्टी भी समा जाती है मेरे नथुनों में। बस छींकना शुरु हो जाता है मेरा। ‘‘कोई इलाज नहीं है भाई, लाइलाज है यह बीमारी।’’ ‘‘........................................................................’’ ‘‘अरे नहीं, इलाज करवाया था। डाक्टर , वैद्य, हकीम सब के पास गया था पर धूल को पहचानते ही सब हाथ खींच लेते हैं।... अब तो इसमें दिल्ली की धूल भी समा गई है न।’’ लाल किला पर जब पहली बार तिरंगा लहराया था तो आजी समेत गाँव-जवार के तमाम लोगों को लगा था कि अब अपना राज आ गया है। फुर्सत मिली ठकुरसोहाती से। पर कहाँ ? बाबू साहब पहुँच गये दिल्ली और वहाँ से लद-लद कर आने लगी धूल जो मेरे गाँव के इस खण्डहर से चिपकती ही चली गई। पहली मर्तबा जब बाबूसाहब दिल्ली से कोट में आये थे, याद था आजी को, उनकी गाड़ी के आगे-पीछे गाड़ियों का रेला निकला था। तीन से चार दिन तक टोकरी भर-भर कर मिठाईयाँ बँटती रहीं थी गाँवों में। सब खुश थे। अपना राज।अपने राजा। जिस दिन राजा राजधानी को लौटे उससे एक दिन पहले की रात कोट के बायें स्थित गाँव की दो लड़कियां गायब हो गईं थीं। दबी जबान में आजी और गाँव की बहुत-सी महिलाओं  का मानना था कि गाड़ी में बैठाकर उन्हें दिल्ली ले जाया गया था, पर दूसरे यह बात मानने को तैयार नहीं थे। आखिर क्या  कमी है दिल्ली में लड़कियों की। एक से बढ़कर एक, परी जैसी लड़कियां लोंटती होंगी बाबू साहब के कदमों में। इन मैली कुचैली लड़कियों का क्या करेंगे वे। बाबूसाहब की ओर से बोलने वाले हजारों, लड़कियों को खोजने वाले सिर्फ उनके माँ-बाप, उनका परिवार। कहते हैं यह बात भी दब गई इसी खण्डहर के नीचे। जब देश में पहला चुनाव आया था तब तक मैं खासा समझदार हो गया था। शहजादा साहब जो बचपन में इसी टीले पर उछल-कूद कर अपना पैर मजबूत किये थे, अब चुनाव लड़ रहे थे। पूरी जवार धन्य-धन्य हो उठी थी। बाबू साहब के वारिस ! अपने राजा ! मैं गाँव-गाँव घूमता हुआ लोगों से कहता-  ‘सोचो भाई, कब तक चिपकती रहेगी खंडहर में मिट्टी।  पहले ये कोट में बैठकर अत्याचार करते थे अब दिल्ली में बैठकर कर रहे हैं । कहाँ मिली हमें स्वतन्त्रता ? बस रूप बदल गया है इनके शासन का। इनकी क्रूरता से खंडहर बढेगें गाँव में।‘ मेरी बात सुनकर सब हँस देते जैसे मैं पागलपन के दौरे में बोल रहा था। मैं, इस घर से उस घर, इस गाँव से उस गाँव चक्कर लगाता रहा। शहजादा साहब की गाड़ियाँ लोगों को बूथ तक पहुँचाती रही। लठैतों का ऐसा जमावड़ा कि विरोधी वोट ही न डाल पाये। एकाध जो पहुँच भी गये बूथ तक तो वे भी बदरंग ही लौटे। उनका वोट पहले ही डाला जा चुका था। भारी बहुमत से जीत गये शहजादा साहब। जीत का जश्न जब मना तो कुछेक के हाथ-पैर भी तोड़े गये जिसमें मैं भी शामिल था। ढोल-नगाडे, लाई बताशे, मिठाइयाँ, चीख पुकार सब एक में एक गड्ड-मड्ड। जीतकर मन्त्री बन गये शहजादा साहब । कोट तक पहुँचने के लिए सड़क बनी, जो चकरोट को छोड़ते हुए खेतों के बीच से होकर निकली। गरीबों के खेत गये तो क्या हुआ, मुख्य सड़क से कोट की दूरी तो एक किलोमीटर कम हो गई। सड़क पर डामर फैलाकर चमकाया गया । कोट चमका। सड़क चमकी। चमक का कुछ कतरा आस-पास के गाँव में भी छितराया। अधिक मुनाफे के नाम पर हरे आम के सघन बगीचे को काट कर उस जगह युकलिप्टिस लगाया गया। शहजादा साहब गरीबों के बारे में सोचते थे। दस-दस पैसे के पौधे मुफ्त में बँटवा दिये। खेतों में गेहूँ धान की जगह सफेदा लग गया। अब जब सफेदा बडा हो जायेगा तो बिजली के खंभो के लिए सरकार खरीद लेगी । शहजादा साहब ही बिकवा देंगे अच्छे दामों में। पैसा ही पैसा बरसेगा गाँव में। कुछ दिन गेहूँ धान नहीं बो पाये तो क्या ? आम गया तो क्या ? छाँव गई तो क्या ? सफेदा तो है। सफेदे पर  चढ़कर बिजली आयेगी गाँव में। कच्चे आम को खा-खा कर, पक्के आम को चूस-चूस कर जो अपना पेट भरते थे वे भी खुश थे। बटन दबाते ही लप्प से उजियारा फैल जायेगा। शहजादा साहब कहते हैं तो जरूर ऐसा होगा। धीरे-धीरे सफेदा की जड़ें जमीन में फैलने लगीं, गाँव-जवार के कुएँ सूखनें लगे। पानी के लिए गाँव की लडकियाँ गगरा, बाल्टी, मटका लेकर इधर-उधर भटकने लगीं। नदी भी बस, एक पतली धार के रूप में बची है । जमीन की उर्वराशक्ति बिला गई।चुनाव आता रहा, मैं छींकता रहा। लो, अब फिर से चुनाव आ गया । दिल्ली के एक युवा राजकुमार के आवाहन पर देश भर के तमाम राजा महाराजाओं के पुत्र पुत्रियों को टिकट दिया गया। हमारे क्षेत्र से शहजादा साहब के पुत्र को टिकट मिल गया। एक बार फिर मेरी दौड़ शुरू हुई गाँव जवार में। मैं कहता रहा कि किसी कर्मठ इंसान को चुन कर भेजो दिल्ली तब बदलेगा हमारा भाग। कोट को छोडो अब, नहीं तो वो बने रहेंगे हमारे राजा और हम उनकी प्रजा। बस प्रजा ही बने रहना हमारा भाग्य बन गया है। बदलो इसे। मैं नौजवानों को खंडहर से लेकर कोट तक की कहानी बताता रहा, पर उसी खंडहर को लतियाते, धकियाते लोग पहुँच गये  बूथ पर और जीत गये राजकुमार। प्रजा खुश। देश की जनता शासन की बागडोर युवा नेतृत्व को सौंपना चाहती है। अब होगा परिवर्तन ! अब आयेगा रामराज्य ! मैं छींक ही रहा हॅूं। गाँव वालों की तमाम अच्छी बातों पर मैं छींकता ही रहता हूँ। अशुभ का संकेत। बूढ़ा हो चला हूँ, सठिया गया हूँ। गाँव वाले मुझसे कतराते हैं, पर मैं क्या करूँ ? वे कहते हैं कि मैं अपना दरवाजा खंडहर की ओर से बन्द कर के पिछवाड़े की ओर से खोल लूँ । न रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी। पर मैं खंडहर से चिपका ही हूँ । गाँव वालों की बातों पर कान ही नहीं धरता। खंडहर की धूल मिट्टी फांकता जा रहा हूँ, छींकता जा रहा हूँ। ....मर्ज बढ़ता ही जा रहा है। छींक खरास, खाँसी तक तो ठीक था पर अब तो चौबीसों घंटे नाक के साथ-साथ आँख भी बह रही है । लोग कहते हैं कि रोग अब दिल तक पहुँच गया है।
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डॉ. आशा पाण्डेय ५, योगीराज शिल्प कैंप , अमरावती ४४४६०२ मो.9422917252


प्रतिक्रियाएँ
⭕⭕⭕⭕⭕⭕
[15/02 08:03] ‪+91 86290 84484‬: आज की सुबह इतनी सहज सटीक और विचारोत्तेजक कहानी से गुलजार करने के लिए मंच का आभार। यह मात्र ऐक कहानी नहीं कई कहानियां भीतर समेटे हुए है। कड़वी सच्चाई से रूबरू होती यह   कहानी पाठक को भीतर तक उद्वेलित करती है। लेखक और मंच का बहुत-बहुत आभार शुक्रिया।
[15/02 08:16] ‪+91 86290 84484‬: मधु जी लेखक ने बड़ी ही खूबसूरती से सत्ता हस्तांतरण की ओट से गुलामी के स्थायित्व की विवेचना की है।  यह सच है स्वतंत्रता मिली मगर उतनी नहीं। समर्थ का सिक्का तो पूर्ववत चल ही रहा है।
[15/02 08:28] Varhsa Raval: बहुत बढ़िया कहानी मर्ज़ । आशा जी को बधाई , गरीब अगर गुनहगार भी हो जाए तो उसके शोषण की गुंजाईश और बढ़ जाती है, यही हुआ भी कहानी में । कहानी का प्रवाह ,भाषा सब बढ़िया👍👍
[15/02 08:31] ‪+91 86290 84484‬: हां वरषा जी सही कहा आपने। गरीब का विरोध भी देखिये भूखे मर गए मगर ऐक दाना तक नहीं खाया।
[15/02 08:35] Niranjan Shotriy sir: विजय जी,वर्षा जी और मधु जी से सहमत। अच्छी कहानी। शोषण और उसके प्रतिरोध का उम्दा स्वर।
[15/02 10:02] Alka Trivedi: कभी कभी ऐसा होता है कि हम किसी कहानी को पढ कर बस बैठे रह जाते हैं डूब जाते हैं ।तो आज ऐसा ही कुछ है।बहुत अच्छी कहानी।विश्लेषण तो सभी करेंगे ही  हम तो आनंद ले रहे हैं
[15/02 12:48] ‪+91 86290 84484‬: भाषा की रवानगी देखिये

मौन का धुँआ उठता रहा जिससे दालान भर गया। धुँए से दोनों की साँस घुटने लगी पर कुछ अनहोनी नहीं हुई जैसे दोनों ने ही समझ लिया हो कि यही हमारी नियति है


 इन्द्रधनुषी रंग पुछ गया । अब, जब-तब कोट से उसकी घरवाली के लिए बुलावा आने लगा

दिनों-दिन सूख रही थी वह। सुन्दरता जाती रही उसकी कुछ दिनों बाद कोट से बुलावा आना बंद हो गया।

कहाँ मिली हमें स्वतन्त्रता ? बस रूप बदल गया है।

....मर्ज बढ़ता ही जा रहा है। छींक खरास, खाँसी तक तो ठीक था पर अब तो चौबीसों घंटे नाक के साथ-साथ आँख भी बह रही है । लोग कहते हैं कि रोग अब दिल तक पहुँच गया है।

इतनी सरल भाषा में कितनी गहरी संवेदना।

लाजवाब
[15/02 13:31] ‪+91 94257 11784‬: आदरणीया आशा पाण्डेय जी की कहानी , मर्ज में हमारे अपने समय के दुस्सह हालातों की व्यथा कथा व्यक्त हुई है ।आजादी के 60 (68)वर्ष  बाद भी शासन तंत्र पुराने राजे रजवाडो, उनके वारिसों या उन्हीं जैसी मानसिकता वाले विलासी एवं सुविधाभोगी लोगों के हाथों में है।शासकों की सुविधा के लिए गरीब किसान के खेत के बीच से सडक   का निकाला जाना, आमके पेडों को काटकर यूकेलिप्टस के पेडों  का लगाया जाना , लडकियों का गायब किया जाना,  लठैतो' की सहायता से चुनाव जीतना आदि आदि अनेकानेक  विसंगत और अन्यायपूर्ण स्थितियां  इस कहानी  में समाविष्ट हुई हैं ।
 वस्तुतः ऐसी उत्पीडक और शोषक स्थितियों के बदलाव के लिए मर्ज जैसी ककहानियों का लिखा जाना बहुत आवश्यक है ।परन्तु उनके सृजन  में यह सावधानी भी अत्यंत आवश्यक है कि  उनके कहानीत्व पर कोईआलेखी रुक्षता हावी न हो जाए ।
   वहरहाल यह कहानी सामान्य जन की  तकलीफों की ओर हमारा ध्यानआकर्षित करती है और इस तरह बुनियादी  लेखकीय धर्म सहज साधित  हो रहा है ।इस हेतु इस सोद्देश्य लेखन के लिए  आशा जी को बधाई ।मंच को साधुवाद ।
[15/02 16:03] Pravesh: आदरणीय जगदीश तोमर जी आपकी बात से सहमत हूँ ऐसी कहानियों में कहानीत्व बना रहना आवश्यक है ।आलेखीय रूक्षता हावी न हो ।बहुत बहुत आभार आपका सर ।
🙏

कहानी मर्ज मेंअन्यापूर्ण और  शोषक परिस्तिथियाँ आज भी  देखी  ,सुनी जा रही है ।कहानियां हमारे आस पास के परिदृश्य का  बिम्ब ही होती है । आज यह लिखा जा रहा है ,मतलब मर्ज अभी कायम है ।वर्तमान  में  शासन जैसे पुराने  रजवाड़ों के वारिसों के ही हाथ में है ।
कैसी स्वतंत्रता ? सवाल मुँह बाये खड़ा है ।शोषित वर्ग अपना स्वाभिमान बचाने के खातिर भूख से मरना स्वीकार कर रहा है ।मर्ज सड़ रहा है ,मवाद रिस रहा है ।बदबूदार वातावरण ,जिसमे एक वर्ग मुँह पर रुमाल लगाकर कहता है घृणित है यह ।पर करता कुछ नही ।
आज भी अस्मत विलासिता के कोट में जाने को मजबूर की जाती है ,और बेगुनाह इज़्ज़त शर्मसार होकर रह जाती है ।कुछ नही बदल सकता ।
बहुत ही सार्थक सोच से लिखी गई कहानी है मर्ज।
आशा जी बधाई आपको ।
🙏🌹🙏
[15/02 16:40] Rajesh Jharpare: आशा पाण्येयजी की कहानी मर्ज ने जिन तथाकथित राजनेताओं के चरित्र से रूबरू कराया  दरअसल वह हमारे समाज की ही राजनीति का एक सड़ा-गला हिस्सा है । भोलाभाला तुफानी नहीं जानता था कि चोरी में उच्च गुणवत्ता. कौशल और साहस से अचंभित तो हुआ जा सकता है पर पुरस्कृत नहीं किया जा सकता । पुरस्कार के लोभ में फंसे एक अकिंचन ग्रामीण के बरक्स लेखिका ने हमारे आसपास मौजूद राजनीति का जो चित्र उकेरा है वह बहुत जाना पहचाना और सच्चा लगता है ...इसमें कुछ और जोड़ा जाना आजी की तरह उबकाई  आने जैसा होगा ।
लेखिका को एक बेहतरीन कहानी के लिए बधाई ।
[15/02 17:14] प्रज्ञा रोहिणी: आज़ादी से पहले और उसके बाद के बड़े परिदृश्य को किस्सगोई में लपेटकर सामने लाने वाली कहानी। इसमें तूफानी नाम भी अपनी व्यंजना में खोखला साबित हो गया। राजा के चाबुक ने पुरस्कार की आड़ में हर साहस को कुचल दिया। शेष रहा तो मातादीन का नैतिक बल।
बधाई आशा जी।
[15/02 17:29] Alka Trivedi: शोषक और शोषित का चिर पुरातन संबंध  ।  फिर भी एक विद्रोह का स्वर  ।एक भोला भाला आम आदमी जो  नहीं जानता कुटिलता  मरना स्वीकार है पर जितना विद्रोह स्वयं के स्तर पर कर सकता है  कर रहा है ।  सरल  ,पर संवेदनाओं से भरपूर कथा।
[15/02 17:35] Alka Trivedi: वो रोटी चुरा कर चोर हो गया
लोग मुल्क खा गये कानून लिखते लिखते
[15/02 18:50] ‪+91 94257 11784‬: आदरणीया आशा जी,  मैंने आपकी कहानी , मर्ज हमारे अपने समय की बहुत आवश्यक कहानी कहा  है । वह आलेखी रुक्षता से ग्रसित भी नहीं है ।कहानी बडे स्वाभाविक  प्रवाह के साथ आगे बढी ।किन्तु जब उसके दूसरे भाग में प्रथम पुरुष ने आजादी के बाद भी देश और समाज को विसंगतियों से  भरभराता हुआ   देखा और उस समय उसने जो वक्तव्य दिया वह मेरी विनम्र  राय में  पर्याप्त विवरणात्मक-विवेचनात्मक    है।वह किसी चिंतक के आलेख का आभास देता प्रतीत हुआ  । बहुत संभव है यह मेरा निजी  अनुभव हो और सुधीजनो' को स्वीकार्य  भी  न  हो ।वैसे भी मेरी  संबंधित टिप्पणी जनरल प्रकार की है। उसके पीछे  मीन मेख  निकालने की कतई कोई इच्छा नहीं है ।
 मैंने आपकी एक कहानी संभवतः पांचवा स्तंभ में पढी थी  और उससे प्रभावित होकर आपसे बात भी की थीं। एक कथा लेखिका के रूप में मेरे लिए आदरणीय हैं ।
[15/02 19:17] Aasha Pande Manch: अरे नहीं ,आप पूरे हक से जो आपको कमी लगे बतायें.मीन मेख निकालने जैसी बात का तो प्रश्न ही नहीं उठता.पाठकीय आलोचना तो होनी ही चाहिये .इससे लेखक का हित हेता है.मैं बस आपसे यही जानना चाहती थी कि इस कहानी में आलेखीय रूखापन किस जगह पर आया है.आपकी इस टिप्पणी से मेरे प्रश्न का उत्तर मिल गया है.आपका बहुत बहुत आभार.आप मेरे प्रशन को अन्यथा ना लें .
[15/02 19:33] ‪+91 99313 45882‬: आशा जी की कहानी " मर्ज " दरअसल भारतीय लोकतंत्र का लाइलाज मर्ज है ! यह लाइलाज मर्ज आजादी के बाद से ही शुरू हुआ था और आज तक जारी है--थोड़ी सी तब्दीली के साथ और  वह लाइलाज मर्ज है---भारतीय लोकतंत्र पर ख़त्म होते राजतंत्र एवं जमींदारी प्रथा का कब्ज़ा और कालान्तर में पूंजीतंत्र या पूंजीवादियों का कब्ज़ा !
जब देश आजाद हुआ और धीरे-धीरे जमींदारी प्रथा को ख़त्म किया गया , जमीनों पर सीलिंग एक्ट लगाया गया , राजाओं के महल को ' हेरिटेज ' घोषित करके उसका मालिकाना हक़ उनसे छीना गया , उनकी बेचैनी बढ़ती गयी ! लेकिन उन्होंने बेहद चतुराई के साथ राजनीति का दामन थाम लिया जिससे उनका रुतवा पहले की तरह बरक़रार रहे !
आशा जी ने अपनी कहानी में जिस जमींदारी शोषण का दर्शन कराया है उससे हम कुछ कुछ रूबरू होते रहे है प्रेमचंद की कहानियों में ! कहानी अपने कथ्य और बुनावट के लिहाज़ से बहुत ही उत्तम है ! हाँ ! कहानी पढ़ते वक़्त लग रहा था कि कभी न कभी मातादीन शोषण के साम्राज्य का विरोध करेगा और विरोध करते हुए मारा जायेगा ! अगर सचमुच ऐसा होता तो यह कहानी एक अविस्मरणीय कहानी होती ! लेकिन कथा लिखते वक़्त कथाकार की मनःस्थिति क्या
है इसपर बहुत कुछ निर्भर करता है !
मुझे यह कहानी बहुत अच्छी लगी और इसके लिए मैं कथाकार आशा जी को बहुत बधाई देना चाहता हूँ ! साथ ही एडमिन राजेश जी को भी बधाई इतनी अच्छी कहानी पढ़वाने के लिए🙏🙏🙏
[15/02 22:40] shivani sharma Ajmer: देरी के लिए क्षमा ।
आज की कहानी पढ़ कर प्रेमचन्द जी की याद आई।
विरोध का अपना तरीका जो उस गरीब दम्पत्ति ने अपनाया वो गहरे तक बेध गया...
शोषण करने वाले  और शोषण को नियति मानकर जीने वाले दोनों का ही चित्रण किया गया! मंच से जुड़ कर ज्ञानवृद्धि हो रही है। आभार...🙏🏼😊😊

 साहित्य सम्मेलन,"साहित्य की बात" 17-18 september 2022 साकिबा  साकीबा रचना धर्मिता का जन मंच है -लीलाधर मंडलोई। यह कहा श्री लीलाधर...

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