Monday, July 30, 2018

उपन्यासनामा:- भाग चार ,शेष यात्रा 
उषा प्रियम्वदा 

उषा प्रियम्वदा 






“वस्तु में बदली जाती स्त्री के प्रतिरोध की : शेष यात्रा”
               
उषा प्रियंवदा का यह उपन्यास स्त्री जीवन की अनोखी यात्रा का दस्तावेज है। ‘रुकोगी नहीं राधिका’ की राधिका जो विदेश से वापस आती है और अपने ‘होने’ को पूरी पितृसत्तात्मक व्यवस्था के बरक्स प्रूफ करती है। जबकि शेष यात्रा की अनुका एक सीधी-साधी परंपरागत स्त्री जो अपने ‘होने को’ व्यवस्था और पुरुष के संदर्भ में ही पाती है और खोती है। इस पाने खोने के साथ एक ऐसी यात्रा करती है जो स्त्री के भौतिक और बौद्धिक विकास की यात्रा बन जाती है। वह स्त्रीपन के ‘होने’ और अपने ‘होने को पति द्वारा नकार दिए जाने के बीच अपने होने का अर्थ और संदर्भ स्वयं अपने बूते पर न केवल अर्जित करती है, बल्कि पति और पितृसत्तात्मक व्यवस्था के अहं और अकड़ को धराशायी भी कर देती है।
‘‘पति द्वारा त्याग दिये जाने पर वह नारी की परंपरागत सामर्थ्यहीनता को अनुकरणीय रूप में तोड़ती है। वस्तुतः उच्चमध्यवर्गीय प्रवासी भारतीय समाज इस उपन्यास में अपने तमाम अंतर्विरोधों, व्यामाहों और कुठाओं सहित मौजूद है। अनु, प्रणव, दिव्या और दीपांकर जैसे पात्रों का लेखिका ने जिस अंतरंगता से चित्रण किया है, उससे वे पाठकीय अनुभव का अविस्मरणीय अंग बन जाते हैं।’’1
इस उपन्यास की कहानी का प्रारंभ अनुका के इस अन्तर्द्वंद्वपूर्ण कथन से होता है - ‘‘क्या किया जाए इस अनुका नाम की औरत का, जिसकी जिंदगी एक बेबुनियाद इमारत की तरह उसके अपने पैरों के पास ढही पड़ी है। जिसकी पूर्णता, जिसका पत्नीत्व, स्त्रीत्व, सबकुछ नकार दिया गया है, जिसकी पूरी आइडेंटिटी, पूरा अनु-पन एकदम झकझोर दिया गया है। लहरों ने उसे कूड़े की तरह रेत पर लाकर पटक दिया है और जैसे अनेक आवाजें उसे चिढ़ा-चिढ़ाकर कहती रहती हैं-तुम कुछ नहीं हो, तुम कुछ नहीं हो।’’2 

अनुका के इस द्वंद्व का कारण है उसके पति द्वारा उसे मझधार में छोड़ दिया जाना। प्रणव जो उसे विवाह करके अमेरिका ले गया था और उसे एक आरोपित जिंदगी दी थी। इस जिंदगी में प्रणव उसके जीवन को वस्तुओं से भर देता है और उसे वस्तु की तरह इस्तेमाल करता है। अनुका वस्तुओं के जंजाल में प्रणव के इंतजार में अपना  वक्त व्यतीत करती है। एक दिन उसे पता चलता है कि प्रणव किसी और से प्रेम करता है। इसके बाद अनुका की जिंदगी बदल जाती है और वह अपनी सहेली दिव्या के साथ रहने लगती है और अन्त में डॉक्टर बनकर दिपांकर के साथ सेटल हो जाती है।





अतः इस उपन्यास का अन्त होता है अनुका के द्वारा अपनी पूर्ण स्वतंत्रता पा लेने के बाद, पुरुष के रूप में दीपांकर है पर वह बराबरी का साथी है पितृसत्तात्मक व्यवस्था का प्रतीक नहीं - ‘‘इतने सालों की स्वतंत्रता, अनु सोच उठी। अपने निर्णय अपने आप लेने की जिम्मेदारी, अपनी कमाई का पैसा बचाया जाए या बहाया जाए, कहाँ रहे, कैसे रहे, वह सब अपनी मर्जी से करने का सुख, न किसी का दबाव, न जबावदेही। उसके साथ दीपांकर इस संबंध के लिए उत्सुक है तो वह भी निर्णय ले चुकी है, अब पीछे हटने का सवाल नहीं उठता। दीपांकर उसे हर तरह से सुखी रखने की कोशिश करेगा, वह यह जानती थी। वह अपने लिए महत्वाकांक्षी नहीं था, पर अनु को वह कभी कोई भी निर्णय लेने से नहीं रोकेगा। यह होगी बराबर की साझेदारी, न कोई बड़ा, न छोटा, न सुपीरियर, न इन्फीरियर।’’3 

अनुका की इस जीवन यात्रा के दौरान उसने जो अनुभव अर्जित किए, जो थपेड़े खाए, जिन परिस्थितियों की पीड़ा से गुजर कर उसने अपनी राह बनाई, उनका वर्णन उपन्यास में प्रामाणिकता के साथ किया है। इन्हीं परिस्थितियों से गुजर कर ही तो ‘अनु’ ने अपने आपको पाया है, अपने घर, परिवार की सुरक्षा कवच से परे विदेश में जिस पति (पुरुष) प्रणव के सहारे वह गई थी, उसके द्वारा ही त्याग दिए जाने पर ही उसने अपने ‘होने’ की अर्थवत्ता को पाया, जाना और अनुभव किया कि ‘अनु’ भी है और यह अनु वह अनु नहीं जिसे प्रणव विवाह करके अपने साथ अपने सहारे यहाँ लाया था - ‘‘किसी के प्यार में न होना, किसी में अपने को समाहित न करना, इसका भी एक पॉजिटिव पक्ष है। मैं हूँ, अनु, अपने में तुष्ट, अपने स्वत्व बोध में सुखी, अपने सुख-दुख में अकेली, अपने में स्वाधीन। उसे यह अनुभूति प्रिय लगती है। उसने अपने व्यक्तित्व और अस्तित्व का लक्ष्य पा लिया है। अब आगे जो भी समय और भाग्य दे, पूरे एहसास और जिम्मेदारी से स्वीकार करेगी। अगर कुछ न भी मिले तो भी कोई शिकायत नहीं होगी। अपनी डॉक्टरी की उपाधि तो होगी, सुख-चैन से तो रह सकेगी, काम करने का संतोष तो मिलेगा। स्थाई रूप से पुरुष जीवन में न हो, तो न हो। जरूरत भी किसे है!’’4

 दरअसल अनुका जिस परंपरागत परिवेश और परिवार से आयी है, उसमें स्त्री एक वस्तु की तरह ही इस्तेमाल होती रही। उसकी कोई व्यक्तिगत सत्ता नहीं है। कोई निजी पहचान नहीं है। उसका अपना कोई वजूद नहीं हैं। सज-धज कर बकरे की तरह विवाह वेदी पर हलाल होने के लिए तैयार की जाती रही है। घर की चाहरदीवारी ही उसकी दुनिया होती है। घर में चोके चूल्हे, खाना बनाना, बच्चों और बड़ों की सेवा शुश्रुषा करना, पुरुषों की शारीरिक और मानसिक जरूरतों को पूरा करना, बस इतना ही उनका संसार है  - ‘‘अनु ने बचपन से बही पुराने ढंग का घर देखा और जाना था। उसमें ड्योढ़ी थी, मेहराबदार दालान, मुजरेवाली कोठी, चौकोर कमरे, घुटी-घुटी बंद कोठरियाँ, तहखाने, दुछत्तियाँ, संडास, कहारिन, नाई, बूढ़ी महराजिन। उस घर की एक अपनी गति थी, हर प्राणी उसी गति में अपने को ढाल लेता था, नई-ब्याही बहुएँ, आते-जाते मेहमान। बड़ी मामी घर की मालकिन थीं, छोटी मामी सबकी लाड़ली, सबसे सुन्दर, नखरीली, पढ़ी लिखी अनु की दोस्त। बड़ी मामी दूध और धोबी का हिसाब रखतीं, घर की खाने-पीने की जिम्मेदारी भी उन पर ही थी। छोटी मामी सज-संवरकर बैठी रहतीं, उपन्यास पढ़तीं, जेठ जेठानी को अपने हाथ से पान बनाकर देती; लिपिस्टक लगाकर रात के शो में सिनेमा जातीं। अनु को छोटी मामी बड़ी ग्लैमरस लगतीं - बंबई, कलकत्ता, कहाँ-कहाँ घूमी हुई। अनु के स्कूल में ऊँची-ऊँची चहारदीवारी थी, घर में भी सिर्फ त्योहार या शादी पर ही स्त्रियों का बाहर निकलना होता था।’’5 





इस दमघोंटू माहौल से निकली अनु जब अमेरिका के खुले और बिंदास परिवेश में पहुँचती है तो उसका एक दूसरी ही दुनिया से परिचय होता है। यहाँ यह भी देखने लायक है कि अमेरिका से आया प्रणव अनुका जैसी सीधी-सादी घरेलू गुड़िया को क्यों पसंद करता है?

यहाँ पितृसत्तात्मक व्यवस्था का वह चेहरा उभरकर सामने आता है जिसके तहत पुरुष एक निखालिस जिस्म में तब्दील चेतना वाली स्त्री को चुनना चाहता है ताकि उसकी देह की बर्बर आवश्यकताओं को घर में वह पूरी करती रहे और घर से बाहर की उसकी ऐयाशियों पर भी कोई रोक-टोक न लगे। अतः पढ़ा लिखा उच्चमध्यम वर्ग अपनी विशुद्ध शारीरिक भूख को अपने ज्ञान और विज्ञान की चेतना से विवेकपूर्ण नहीं बनाता बल्कि और अधिक बर्बररूप में उसे पूरी करना चाहता है। प्रणव अनु के जीवन में भौतिक पदार्थों की चकाचौंध को इस तरह भरता है ताकि उसकी चेतना उन भौतिक जड़ पदार्थों के उपभोग में उलझकर जड़ होती जाये और उसका उपभोग निर्बाध चलता रहे। प्रणव की घर के बाहर की ऐयाशियों की और उसका ध्यान ही न जाये।

उसका विवाह प्रणव के साथ तय कर दिया जाता है, पर उससे पूछने या उसे बताने तक की कोई जरूरत नहीं समझी जाती। जब वह प्रणव के साथ अमेरिका जाने के लिए एयरपोर्ट पर बेहोश सी हो जाती है तो प्रणव की पुरानी दोस्त रेखा कहती है ‘‘प्रणव, टेक केयर ऑफ हर; शी इज जस्ट अ किड।’’6

अनु एक बच्ची है, दरअसल बच्ची नहीं गुड़िया है जिसकी देखभाल करना ‘केयर करना’ आवश्यक है।
प्रणव एक सुंदर वस्तु की तरह उसकी देखभाल करता है और ढेर सारी वस्तुओं के बीच उसे भी एक वस्तु में तब्दील करता जाता है - ‘‘अनु खाना गरम करती है, दोनों साथ-साथ खाते हैं। एक सुखद चुप्पी में, सबकुछ साफ-सुथरा-एक अच्छी सी पार्सल की तरह बंधा जीवन। कभी मूड होने पर उसे बाहर ले जाता हैं। अनु जो कहती उसे तुरत खरीद देता। अनु के घर के एक कमरे में चीजों का ढेर लगना शुरू हो गया है। आलमारियों में चीजें सँजोते हुए अनु को अक्सर बेंत का अपना बक्स याद आता है।’’7

 इस वस्तुओं से भरे घर में अनु भी वस्तु में तब्दील होती जा रही थी। उसके आसपास जो अन्य स्त्री पात्र हैं और जो कि एक सखी सम्मेलन में संगठित हैं - ‘‘रूपल, कंचन, कीरत, रानी, विभा और मिनि। वैसे विभा को छोड़कर सभी गृहिणियाँ थीं।’’8 

ये सब की सब वस्तु की तरह व्यवहार करतीं हैं और वस्तुओं के घेरे में ही अपने होने को तलाशती रहती हैं। पश्चिम की औरत अपने होने के बोध को जल्दी महसूस कर लेती है अतः वह घर, पति, बच्चों के सुरक्षा चक्रव्यूह को तोड़कर अपने वजूद की तलाश में भाग जाती है। ‘‘अच्छे घर, मियाँ और बच्चों के बावजूद भी तो एक औरत को कुछ खाली-खाली लग सकता है।’’9





 विभा का यह कथन स्त्री की अस्मिता की तलाश और वजूद को बचाने का अहसास है। भारत जैसे परंपरागत समाजों में इस तरह की प्रवृत्ति को सिर्फ यौन संतुष्टि और असन्तुष्टि के रूप में देखकर स्त्री की चरित्रहीनता से जोड़ा जाता है।
अमेरिका की जीवनशैली में अपने खालीपन को भरने के लिए दावतें, पार्टी, और शॉपिंग, घर में वस्तुओं का अम्बार, शराब पीना, और अपने वजूद को पाने के लिए विवाहेतर सेक्स संबंध बनाना शामिल हैं।
अनु पूरी तरह इस तरह के माहौल में रम गई है। प्रणव की मर्जी और सोच ही उसके जीवन को संचालित करते हैं। वह जो कुछ भी करती है प्रणव के विचारों के अनुसार और अनुकूल ही करती है। वह पूरी तरह प्रणव पर निर्भर है। बिना प्रणव के वह अपाहिज है -‘‘प्रणव से मशविरा किए बिना वह कोई निर्णय नहीं ले पाती, ‘आज क्या खाओगे’ से लेकर मैं शाम को क्या पहनूँ’ सभी कुछ प्रणव की मर्जी से होता है। अनु प्रणव के मूड से चलती है। वैसे ही हँसती है, वैसे ही चुप हो जाती है।..........उसकी दुनिया में किसी चीज की कमी नहीं है, न महँगाई है, न भूख, न अकाल। उनके चारों तरफ एक जुलूस है, बीच में वह दोनों हैं, नंबर वन जोड़ा।’’10 

स्त्री के जीवन की पूरी पटकथा दूसरे ही निर्धारित करते हैं। विवाह से पहले की पटकथा को पिता और चाचा, मामा और भाई तथा विवाह के बाद पति - ‘‘जिंदगी की यह पटकथा अनु को बचपन से ही मिली थी। वह किसी चीज के लिए जिम्मेदार नहीं है, उसकी सारी जिंदगी दूसरों ने निर्धारित की थी, साल में एक बार जब सारे घर के कपड़े सिलते थे, अनु के कपड़े भी बन जाते थे - पसंद नापसंद का सवाल ही नहीं उठता था। जो महराजिन परस देती थी, वह खा लेती थी। स्कूल जाती थी, कॉलेज जाने लगी, वह क्या पढ़े, क्या विषय ले; अनु के लिए कभी प्रश्न नहीं उठा। अनु ने कभी इस बारे में सोचा भी नहीं, जो सब लड़कियों ने लिए, उसने भी ले लिए। उसका भाग्य सराहते हुए जब बिरादरी की औरतों ने कहा - ‘लौंडिया के भाग जगा है। विलायत का डॉक्टर, इतना गहना-कपड़ा’, तब अनु को लगा, हाँ शायद भाग्योदय हुआ है। वह प्रणव के प्रति कृतज्ञ थी, इतना सबकुछ, सिर्फ एक छोटी सी आकस्मिक झलक पाने भर पर ही। दृश्य बदल गया था, पटकथा का रवैया वही था। जो जिम्मेदारी प्रणव ने पकड़ाई थी, जो भूमिका दी गई थी, वही निभा रही थी। खाना बनाना, घर साफ-सुथरा रखना, प्रणव की पोजीशन के अनुसार कपड़े पहनना, पार्टियों में चुपचाप मुस्कराते रहना।’’11

 आधुनिकता की जीवनशैली में बहुत कुछ ग्लैमरस और आकर्षक दिखाई देता है। दूर से। जब उसमें आप अन्दर घुसते हैं तो उसकी एकरसता और वही-वही-वही, दुहराव और एकसापन महसूस होने लगता है और उसमें कहीं भी विविधता नहीं होती। अनु को भी धीरे-धीरे इस एकरसता का बोध होने लगा और उसमें प्रणव के न होने पर बोरियत पैदा होने लगती थी। लेकिन वह सखी सम्मेलन की अन्य स्त्रियों की भांति दूसरे पुरुष के साथ सहवास करने की सोच भी नहीं सकती। यह उसके पितृसत्तात्मक व्यवस्था के दिए संस्कार हैं। उसके अंदर सेक्स और यौनिकता अपने पति तक ही सीमित है। जब वॉटरमैन उसके साथ एक रात सोने का प्रस्ताव करता है तो वह हक्की-बक्की रह जाती है और कहती है कि ‘‘मैं अपने पति के साथ बहुत सुखी हूँ। किसी दूसरे पुरुष का ध्यान भी मैं पाप समझती हूँ।’’12 






लेकिन दूसरी तरफ प्रणव कई अन्य स्त्रियों के साथ दैहिक संबंध रखता है और उसे कोई अपराधबोध नहीं होता। यह पितृसत्तात्मक व्यवस्था के दो मुहे संस्कार हैं जो पुरुष के अंदर उसी अपराध के लिए कोई नैतिकता से विचलन का बोध पैदा नहीं करता और एक स्त्री उसी कार्य के लिए सोचना भी पाप समझती है।

आधुनिक जीवन पद्धति और मूल्य व्यवस्था में नैतिक और मानवीय मूल्य से संचालित स्त्री बिल्कुल अनफिट महसूस करती है। वह इस व्यवस्था में अपने को असंगत महसूस करती है। अनु भी जब कीरत के यहाँ सुबह सुबह पहुँचती है, तो उसके घर का माहौल और उसकी लड़की गोगी का व्यवहार उसे अजनबी की तरह महसूस करता है। ‘‘उसे एकदम अपनी उपस्थिति उस कमरे में असंगत-सी लगने लगी।’’13

 कीरत जैसी स्त्रियाँ जो अपने आपको उस आधुनिकबोध की विडंबनात्मक व्यवस्था में ढालने की कोशिश कर रहीं हैं। निरंतर एक वस्तु में तब्दील होती जा रही हैं। बिना शराब के उनके चेहरे पर नॉर्मलटी नहीं आती। वे बिना शराब और मर्द जिस्म के बिल्कुल बेकार की वस्तु में तब्दील होने लगती हैं - ‘‘धनराज के जाने के बाद शाम बीतती ही नहीं, न रात को नींद आती है। मुझे अपने बगल में धनराज का शरीर रोज चाहिए। जब वह नहीं होता तो गोली खाकर सोना पड़ता है।’’14  


मातृत्व के संबंध में अनु का सोचना है कि इसका निर्णय भी प्रणव का ही होगा। उसे माँ बनने से कोई एतराज नहीं और इसकी जल्दी भी नहीं। मातृत्व स्त्री का अधिकार है, परन्तु पितृसत्तात्मक व्यवस्था ने उसके इस अधिकार को अपने अधीन कर लिया। वह कब माँ बने और कब नहीं इसका निर्णय पुरुष के पास है। वह तो एक उपकरण की तरह इस्तेमाल में लायी जाती है। अनु की यह मानसिकता सदियों से स्त्री के मानस को अनुकूलित करने का परिणाम है। बच्चे के संबंध में ‘‘निर्णय प्रणव का होगा और निश्चय ही प्रणव को कोई जल्दी नहीं थी।’’15

मर्द अपनी आकांक्षाओं और वासनाओं की पूर्ति के लिए घर से बाहर जाता है और पत्नी के शिकायत करने पर कि उसका बहुत देर तक घर से बाहर रहना उसे अच्छा नहीं लगता, तो वह उसे घर गृहस्थी के काम गिनाने लगता है। यह पितृसत्तात्मक व्यवस्था द्वार स्त्री को दी गई भूमिका है। ‘‘तुम्हें इससे समझौता करना पड़ेगा अनु। मेरा काम तो फैलता ही जा रहा है। तुम्हें भी तो कितने काम रहते हैं घर की देखभाल, कूकिंग,.... फिर उसने जोड़ा, यह एकाएक असंतोष क्यों?’’

अनु को धीरे-धीरे इस जीवन की एकरसता से बोरियत महसूस होने लगती है और फिर प्रणव का निरंतर बाहर रहना काम के बहाने उससे दूरी बनाना और उसके जीवन को घर की चाहरदीवारी तक सीमित करते जाना। उसे समझ में आने लगता है कि यह जिंदगी बहुत दिनों तक नहीं चल सकती। प्रणव भी अनु से ऊब गया और अपने होने की, ‘मर्द होने’ की सार्थकता कहीं और ढूंढने लगा। चूंकि अनु के पास प्रणव के इंतजार और घर की देखरेख के अलावा कोई दूसरा काम नहीं है। अतः उसके जीवन का विस्तार भारतीय परंपरागत घरों की तरह ही घर तक सीमित हैं। फिल्म डायरेक्टर चंद्रिका राणा जब उसे नाश्ता सर्व करते देख कहती है कि ‘‘आप सिर्फ यही करती हैं? उसका प्रश्न अचानक गोली की तरह निकलता है।’’16 







इस बात को प्रणव सम्हालने की कोशिश करता है और वही पितृसत्तात्मक व्यवस्था की भूमिका निभाने की बात कहता है। ‘‘यही अनु को बहुत व्यस्त रखता है। इतना बड़ा घर, फिर मेरी देखभाल, इतना ही इनके लिए काफी है।‘‘
‘‘आप नहीं चाहते कि यह कुछ करें?’’

मुझे कैरियर गर्ल नहीं चाहिए थी, प्रणव ने कहा, ‘‘मैं चाहता था सरल, स्नेहशील बीबी, जिसके साथ बैठकर मुझे सुख-चैन मिले।’’17 

इसका मतलब है कि जो स्त्री घर से बाहर काम करती है, वह स्नेहशील नहीं होती, सरल नहीं कुटिल होती है, उसके साथ बैठकर पुरुष को सुख-चैन नहीं दुख और बैचेनी मिलती है। चंद्रिका इस बात का विरोध भी करती है। परन्तु प्रणव उसकी बात को टाल देता है और उसे चुप रहने को विवश कर देता है।

इस घटना के बाद प्रणव की प्रतिक्रिया उसके पशुपन और अहं को लगी चोट को अभिव्यक्त करती है। वह अनुका के साथ जिस तरह से संभोग करता है, वह प्यार नहीं बलात्कार है और अनुका भी इस बलात्कार को महसूस करती है।
 ‘‘प्रणव के होंठ क्रूर थे, वह एक हिंसक आक्रोश में अनु को झकझोर रहा था, प्यार में नहीं। अनु ने उसे दूर ठेलना चाहा। वह प्रणव, जो देर तक उसे सहलाता, दुलारता रहता था, इस वक्त कहाँ खो गया था! रह गया था एक पुरुष मात्र, जिसका अव्यक्त रोष, और ऐंठती हुई ताकत वह महसूस कर रही थी, पर जिसका कारण जानने में वह असमर्थ थी। वह देर तक कुचली, टूटी, चुकी हुई पढ़ी रही।’’18

 यह पत्नी के बलात्कार का दृश्य है, इसलिए थोड़ी शालीन भाषा और संवेदनात्मक क्रूरता के साथ लिखा गया है। वरना बलात्कार की पूरी बर्बरता और एक स्त्री के स्त्रीत्व को सिरे से नकारने की, उसके वजूद को पूरी तरह कुचल देने की कार्यवाही है।
पुरुष को रोज रोज वही का अहसास खीझ से भर देता है, पर वह यह नहीं सोचता कि एक स्त्री वही..वही....रोज...रोज... बिना इच्छा-अनिच्छा के कैसे बर्दाश्त करती है? ‘‘रोज-रोज वही परस देती हो, वही दाल-रोटी, वही गोश्त.....’’19 

यहाँ उसकी वेदना रोटी-दाल की अपेक्षा अनु के जिस्म के गोश्त की पुनरावृत्ति की अधिक है और उसकी खीझ भी इसी को लेकर है।
प्रणव के कई स्त्रियों से संबंध हैं, विभा से, शिकागो में परमानेंट गर्ल फ्रेंड, चंद्रिका आदि। इन सबसे संबंधों के बारे में अनु को ज्योत्सना से पता चलता है। पश्चिम की स्त्री की नियति है कि ‘‘यहाँ की सभ्यता में पत्नी को सबसे बाद में पता चलता है, जबकि तरकश से तीर निकल चुका होता है।’’20 

अनुका की इस ‘शेष-यात्रा’ में उसका सामना जीवन के कटु यथार्थ से होता है - उसके ऊपर का साया, पितृसत्तात्मक व्यवस्था का सुरक्षा घेरा, जिसमें अब तक वह वस्तु, एक गुड़िया बन कर रहती आयी थी, अचानक हट जाता है और वह एकदम बिल्कुल अकेली हो जाती है, तब वह अपने आपको पहचानती है। वह स्वयं को, अपने चारों और की दुनिया-जहान को नई आंखों से देखती है, पितृसत्तात्मक व्यवस्था का परदा उसकी आंखों पर से हट जाता है, पुरुष की आंख से दुनिया को देखने की आदत ने उसे अपनी दृष्टि से ही अपरिचित बना दिया था। अब वह नई - अपनी, बिना किसी चश्मे के - आंखों से अन्दर-बाहर की दुनिया को देखने को लालायित है - ‘‘नई आंख से सब कुछ देखना होगा? सब कुछ का मतलब सब कुछ। अंदर, बाहर, अपने को, दूसरों को, प्रणव को। विशेष तौर से प्रणव को।
एक आदमी, एक औरत। प्रणव और अनु। औरत रोती है।






‘‘मैंने क्या कसूर किया है? चोरी की? झूठ बोला? क्या मैं दुश्चरित्र हूँ?’’

झर-झर आँसू। आँसू कि खत्म ही नहीं होंगे। आदमी का चेहरा कड़ा है, वह औरत की तरफ पीठ करके बाहर देखने लगता है।’’

‘‘नई आँख से सब कुछ देखना होगा। अंदर, बाहर अपने को, दूसरे को, प्रणव को। सबसे पहले बाहर, बाहर  से अंदर; फिल्मी कैमरे की आँख की तरह। पहले बाहर का दृश्य।’’21

अनु का यह जो तीसरा नेत्र खुला है, नई आंख और नई दृष्टि के रूप में, उससे अपने चारों और की दुनिया देखी, समझी और अपने वजूद को पहचाना। उसने पहचाना कि ‘वह है’।  उसका होना भी अपने आप में मायने रखता है। वह अब तक हमेशा ही दूसरों के संदर्भ में होती रही थी। अब वह सारे संदर्भों से मुक्त है और अपने आपका संदर्भ खुद स्वयं है।

अनुका को जब अपनी इस विचित्र स्थति का पता चलता है तो अनु के पैरों के नीचे से जमीन निकल चुकी होती है। वह विक्षिप्त सी हो जाती है। सारे घर में तोड़-फोड़ मचा देती है -
‘‘तो ऐसे टूटता है दिल। अनु जैसे सचमुच अपने दिल का टूटना सुन सकती है। उसके दिल को जैसे कोई पंजे में पकड़कर ऐंठ रहा है। वह मुट्ठियों से अपने बाल कसकर पकड़ लेती है। फिर चीख उठती है। उसके अंदर हजारों ज्वालामुखी फूट पड़ते हैं। सबसे पहले चाय का प्याला फेंका, जाकर खिड़की से टकराता है और खनखनाकर टूटता है। वह मेज से पूरी ट्रे उठाकर पूरे जोर से नीचे पटक देती है, फिर मेज कांच सहित, टेबल लैम्प, टेप रिकार्डर, प्रणव के यत्न से इकट्ठे किए रिकार्ड, उन्हें पैरों से रोंदते हुए उसे वहशियाना सुख मिलता है।
प्रणव की शराब की बोतलें, महँगी बोतलें रसोई में जहाँ तहाँ गिरती हैं। जिस चीज पर हाथ जाता है, उसी को बिना सोचे, तोड़-फोड़, फेंक-फांक, तहस-नहस करती जा रही है। एक बबंडर की तरह। आज कुछ नहीं बचेगा वह अपनी पहनी हुई साड़ी को नोचकर उसकी धज्जियाँ बिखेर देती है। प्रणव सामने पड़ता तो शायद उसका खून कर देती।
 नीरजा के बच्चे का गला दबा देगी। डॉक्टर विभा को गोली मार देगी, फिर खुद भी तर जायेगी। उसके बाल बिखर गए हैं, आँखें लाल हैं। वह दीवार से बार-बार सिर टकराती है। पूरा घर पागल चीखों से गूँज रहा है, चीखों पर चीखें। क्या यह उसकी ही आवाज है? उसे होश नहीं है।’’22  

अनु की यह प्रतिक्रिया इस बात के लिए महत्वपूर्ण है कि उसने उन सारी वस्तुओं को तहस-नहस किया है जिनके कारण उसे वस्तु में तब्दील क्या गया और घर की तरह उसे भी अकेला निर्जीव समझ कर छोड़ दिया गया। वह इन वस्तुओं के मायाजाल को तहस-नहस करके अपने स्वत्व को पाती है। विक्षिप्त अवस्था में ही अपने निज को पाती है। यह वस्तु से निज तक की यात्रा में वह अपने आप तक पहुँच जाती है।अनु की मैरिज टूट चुकी है। वह अकेली है बिल्कुल अकेली। ‘‘अब सिर्फ वह है, अकेली।’’23

विवाह टूटने की आवाज पश्चिम में बहुत तेज नहीं होती, पर अनुका पश्चिम में रहकर भी भारतीय संस्कारों के अधीन है और बार-बार प्रणव से साथ ले चलने की भीख के बाद भी जब वह नहीं पिघलता तो, वह प्रणव पर भूखी शेरनी की तरह आक्रमण कर देती है।
‘‘तुम? तुम खुद बदचलन हो, गुंडे हो, आवारा हो.... तभी तो रंडियों से फँसे हुए हो....’’ अनु के मूँह से शब्द नहीं निकल पा रहे थे, ‘‘ थूऽऽ तुम पर....’’24 
यह थूंकना पूरी पितृसत्ता पर थूंकना है। यह उस घृणा का प्रतीक है जो इस व्यवस्था ने उसे दी है।
अनु का इस तरह पागल की तरह व्यवहार करना दरअसल आधुनिक पितृसत्तात्मक व्यवस्था में स्त्री की बिडंबनात्मक व्यवस्था का प्रतिफल है। 

कीरत, विभा, नीरजा जैसी स्त्रियाँ इस व्यवस्था की विकृति में अपने को ढाल लेती हैं, अतः वे इस तरह का पागलपन प्रकट नहीं करतीं। वे अन्दर से खोखल मात्र हैं, उन्हें अपनी पहचान और वजूद को इसी तरह इस्तेमाल करना आता है। अनु इस व्यवस्था की विकृति को जीवन शैली बनाकर जी नहीं पाती इसीलिए वह पागल हो जाती है। इस पागल के अन्त में वह प्रणव का दिया घर और सामान वहीं छोड़कर अपनी पुरानी सहेली दिव्या के पास चली जाती है। यह उसके नए जीवन का प्रारंभ है।

अनुका प्रणव से अलग होने की पीड़ा और विक्षिप्त स्थिति को भोगने के बाद अपनी सहेली दिव्या के पास जाती है। दिव्या अपने पति के साथ रहती है। स्वाभिमानी और मेहनत-कस इंसान हैं दोनों। छिन्नमस्ता में प्रिया रिचर्ड और जैनी के साथ रहती है। उनकी दोस्ती और समझदारी उससे संबल देती है। ठीक इसी तरह अनुका की यह दोस्त है दिव्या। अनुका उसे बताती है कि प्रणव ने उसे छोड़ दिया है। कारण बताते हुए जो वह कहती है, वह आदर्श पत्नीत्व के मिथक को चकनाचूर कर देता है - ‘‘मैं तो अपने पत्नीत्व में डूबी थी, पर शायद प्रणव का एक ही स्त्री से काम नहीं चलता। शायद मैंने कभी प्रणव को समझा ही नहीं, जाना ही नहीं। कभी यह नहीं सोचा कि दाल-सब्जी और शरीर से परे भी कोई और चाह होती है। प्रणव की वह मानसिक प्यास मैं शायद नहीं बुझा सकी। मैं सहचरी, जीवनसंगिनी थी, मगर सोलमेट नहीं। मुझमें दोष ही दोष दीखने लगे।’’25

अनु सोचती है कि पति के सामने पूरी तरह समर्पित रहकर उनका प्रेम पा लूँगी। मगर यह मनोवृत्ति भी पितृसत्तात्मक व्यवस्था की ही देन है जो स्त्री को अपने स्वार्थ के लिए दी जाती है। इसका अर्थ इतना ही है कि स्त्री पति को न छोड़े, यदि पति छोड़ना चाहता है तो उसके यह आदर्श पत्नीत्व के गुण किसी काम के नहीं हैं -‘‘मैं समझती थी के पति-प्रेम एक ऐसी जादू की बूटी है, जिससे सारी आधियाँ-व्याधियाँ दूर हो जाती है। अगर मैं मनसा-वाचाकर्मणा समर्पित रहूँगी तो सबकुछ ठीक हो जायेगा। मेरा प्रेम उन्हें जीत लेगा।’’26 

‘‘तो वह सब झूठ था। झूठ था न दिवी? सारे व्रत, त्यौहार, जप तप, कथा कहानियाँ, सब झूठ थीं न। झूठ हैं। मेरा सारा डिवोशन, प्रणव के चरणों पर निछावर हो जाना, सब कुछ झूठा पड़ गया।’’27 

दिव्या उसे अपने आत्म सम्मान की याद दिलाती है, प्रेरित करती है कि वह प्रणव के आलाव भी कुछ है - ‘‘तुम्हारा आत्मसम्मान कहाँ है अनु? दिव्या का रोष अब छिपता नहीं, ‘‘तुम जिंदगी भर अपने को पायदान बनाए रखोगी कि प्रणव तुम्हें खूँदता रहे?’’28 

अनु अपने आपको इतना भूल चुकी है कि स्वयं को मंगतों की श्रेणी मे रखने लगी। यही दशा पितृसत्तात्मक व्यवस्था ने स्त्री के आत्मसम्मान की कर रखी है। इतनी बार इतने तरीके से उसका आत्मसम्मान कुचला गया है कि वह यह भूल ही गई कि वह भी एक स्त्री है, इंसान है, मानवीय गौरव और सम्मान पाने की अधिकारी है। वह कहती है - ‘‘मँगतों में आत्मसम्मान नहीं होता।’’29

 अनु दिव्या और उसके पति के साथ रेस्टौरेंट में काम करने लगती है। श्रम से जुड़कर, पैसा स्वयं कमाकर उसमें एक इंसान होने का गौरव जागता है। प्रणव का घर बिक जाने पर वह उसमें आधा हिस्सा ले लेती है। यहीं से उसका विवेक और आत्मसम्मान जाग जाता है। (यहाँ कठगुलाब की दर्जिन बीबी से तुलना करने पर फर्क समझ में आता है, उसका पति जब उसे छोड़ कर जाता है तो वह उससे पैसे नहीं लेती। उसका आत्मसम्मान पति के आगे झुकने नहीं देता।)

प्रणव से अलग होने पर ही अनु एक परंपरागत स्त्री से विचारशील, कर्मशील स्त्री में बदलती है - ‘‘पर यह सच है कि अगर परिस्थितियों ने मुझे ऐसे ढकेला न होता तो आज मैं भी वही परंपरागत स्क्रिप्ट जीती रहती - पूरी तरह से आप पर निर्भर, एक सफल डॉक्टर की निकम्मी बीबी की ..... जानते हैं, कचहरी में विदा लेते वक्त आपकी उस शार्क मछली-सी वकील ने मुझसे क्या कहा था?...‘आपके भविष्य के लिए शुभकामनायें, ‘तो मेरे मूँह से कड़वा वाक्य निकल गया-‘यह सहानुभूति आप अपने मुवक्किल को ही दीजिए’ - उस दिन के बाद में एक बार भी नहीं रोई। मालूम नहीं मेरे अंदर इतना तेज, इतना करेज कहाँ से आ गया। मुझे लगा, मैं कुछ भी बन सकती हूँ।’’30 
यह कुछ भी बन सकने की सामर्थ्य का बोध अनु जैसी स्त्री को नई स्त्री में बदल देता है। यही नई स्त्री स्वतंत्र और दायित्वपूर्ण जीवन को जी सकती है।

संदर्भ सूची

01. शेष यात्रा, उषा प्रियंवदा के पृष्ठभाग से उद्धृत
02. शेष यात्रा, (पेपर बेक) पृ. 09 
03. वही पृ. 128
04 वही पृ. 115
05. वही पृ. 11
06. वही पृ. 17 
07. वही पृ. 23
08. वही पृ. 23 
09. वही, पृ. 24 
10 वही पृ. 25
11. वही पृ. 25
12. वही पृ. 27
13. वही पृ. 30
14. वही पृ. 32 
15. वही पृ. 36
16. वही पृ. 41
17. वही पृ. 41 
18. वही पृ. 42
19. वही पृ. 42 
20. वही पृ. 55
21. वही पृ. 09-10
22. वही पृ. 55
23. वही पृ. 60 
24. वही पृ. 63 
25. वही, पृ. 69
26. वही, पृ. 70
27. वही, पृ. 70
28. वही, पृ. 77
29. वही, पृ. 77
30. वही, पृ. 11

०००
डॉ संजीव जैन 


डॉ. संजीव कुमार जैन
सहायक प्राध्यापक हिन्दी
शासकीय संजय गाँधी स्मृति स्नात्कोत्तर महाविद्यालय,
गुलाबगंज 
522 आधारशिला, बरखेड़ा
भोपाल, म.प्र.
मो. 09826458553



उपन्यासनामा भाग तीन 
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Sunday, July 29, 2018

राजेन्द्र श्रीवास्तव जी के गीत 



राजेन्द्र श्रीवास्तव 



 पसरे सन्नाटे


संवेदन से शून्य, हृदय पर
पसरे सन्नाटे।

जटिल बिषमताओं की खाई
 कौन यहाँ पाटे।
संवेदन से शून्य, हृदय पर
पसरे सन्नाटे।

सारा दिन ढोकर पराग कण
मधुमक्खी रोयी।
बूँद-बूँद घट भरी संपदा
क्षण भर में खोयी।

मीठी शहद, भरे छत्ते को
सबल रीछ चाटे।

छप्पन भोग कहीं पर लगते
कहीं सिर्फ फाँके।
लाठी जिसके हाथ रही है
भैंस वही हाँके।

दीनू ने बोये थे गेहूँ
समरथ ने काटे।

साठ बरस की कमला काकी
पूछ- पूछ  हारी।
कौन खा गया, उसके हक की
सुविधा सरकारी।

हीरोहोंडा मुखिया जी की
भरती फर्राटे।
   



 तुम नहीं निकले घरों से
➖➖➖➖➖➖➖➖
आबरू अपनी बचाने वह
 सड़क पर लड़ रही थी।
बहशियों के सामने बिलकुल
अकेली पड़ रही थी।
अंत तक लड़ती रही वह
देह-लोलुप  निश्चरों से।

चीखती ही रह गयी वह
तुम नहीं निकले घरों से

गाँव के ही श्वान अब तो
घेर लेते  कहीं    गैया।
जूझती है रोज अक्सर
बाज कौवों से चिरैया ।

नुच गये हैं पंख फिर भी
लड़ रही  टूटे परों से।

बिष भरे बिषदंत लेकर
दौड़ते हैं  नाग काले।
सपेरों ने बीन कर दी
नागराजों  के  हवाले।

गुप्त समझौता हुआ फिर
नेवलों  का  बिषधरों से।
   



 हम मानव है...
➖➖➖➖➖➖

हम मानव हैं, नहीं काठ की
 कोई कठपुतली।

 हम अपने मन के राजा हैं ,
 भू पर राज नहीं।
 कहीं नहीं जागीर हमारी,
 सिर पर ताज नहीं।
 आसमान है मुकुट हमारा,
 सिंहासन धरती।
 आठों पहर हवा तत्पर हो,
 स्वयं चँवर ढरती।
 महल मुबारक तुम्हे, हमे तो
 वट की छाँव भली।

 नहीं मिला भोजन दो दिन से,
 कोई बात नहीं।
 खोद निकालेंगे कुदाल से,
 सूखा भात कहीं।
 आज काम से लौटाया कल,
  वही बुलाएँगे ।
 श्रम के सरसिज, स्वेद-सरित में
 खिल ही जाएँगे ।
 खिल जायेंगी मुस्कानों की
 नन्ही कहीं कली।


 हाथ भला क्यों फैलाए हम,
 दुनिया के आगे।
 विपदाओं से हार मान कर,
 कभी नहीं भागे।
 हमे भरोसा अपने श्रम पर,
 साबित कर देंगे।
 अपने हाथों की रेखाएँ,
 स्वयं बदल लेंगे।
 विधि का लिखा बदल देने की
 इच्छा फिर मचली।

 सौंपें डोर भला क्यों तुमको
 अपने जीवन की।
 लेना चाहेंगे कुछ साँसे
 अब अपने मन की।
 'पराधीन-साँसों' की अब तक
 बहुत उमर जी ली।
 अब तुमको करनी ही होगी
 यह डोरी ढीली।
 जब-जब ठान लिया मन ने फिर,
 जग की नहीं चली।
               

   
चलो मौन के पट अब खोलें
➖➖➖➖➖➖➖➖➖
कुछ तुम बोलो, कुछ हम बोलें
चलो 'मौन के पट'-अब खोलें ।

रिश्तों को दें फिर गर्माहट,
खत्म करें थोथी कङवाहट।
कुछ भावों, कुछ व्यवहारों में-
बातों में मिठास कुछ घोलें। चलो मौन.....

शुरु करें जाना-पहिचाना,
बातों का सिलसिला पुराना।
किसका  कितना दोष रहा है-
न तुम मापो न हम तौलें। चलो मौन......

 यूँ छिप जाना और लजाना
निश्छल मन का यह मुस्काना
 साँसों की माला में हम-तुम
यह क्षण  यह मुस्कान पिरो लें। चलो मौन...

साझा कर लें सुख-दुख सारे,
एक - दूजे के   बनें  सहारे।
शेष रहे,  जीवन में  मिलकर-
कुछ पल हँस लें, कुछ पल रो लें। चलो मौन.....
           


                   
 तुम क्या जानो
➖➖➖➖➖➖
तुम क्या जानो....!
                         
कभी बाँस की फाँस धंसी न-
कभी पाँव न फटी बिबाईं।
तुम क्या जानो जानो पीर परायी।

तुम क्या जानो! क्या होता है-
राहों में अपनों को खोना।
पल-पल, फिर उनकी यादों में -
गरम आँसुओं से मुँह धोना।
आँखों ही आँखों में सारी-
रात गयी पर नींद न आई।  तुम क्या जानों.

तुम क्या जानो! सीढ़ी चढ़ना,
सिर पर रख कर भरी तगाड़ी।
हाड़ तोड़ महनत दिन भर की -
औनी-पौनी मिली दिहाड़ी।
पानी पीकर ही, धरती पर -
सो जाना, फिर बिछा चटाई।  तुम क्या जानो

तुम क्या जानो! आठ बरस के
बच्चे से बस्ता छिन जाना।
जूठे कप प्लेट, होटल में
धोकर पैसे चार कमाना
रोटी दोनों वक्त  मिल गयी-
मगर पेट भर कभी न खायी।  तुम क्या...

तुमने शायद ही देखा हो-
खेतों में बीजों का बोना।
और बाढ़, सूखा, ओलों से -
उन फसलों का चौपट होना। 
बोझ कर्ज का और बढ़ गया -
फिर बिटिया की रुकी सगाई। तुम क्या जानो..

तुम क्या जानो! कई घरों का-
झाड़ू-पौंछा,  बर्तन धोना।
और भूख से कहीं दुधमुँही-
बच्ची का सिसकी भर रोना।
ढली दोपहर लेकिन अब तक-
उसकी माँ वापस न आई। तुम क्या जानो...

तुम क्या जानो क्या होता है -
चुनरी दागदार हो जाना।
जाने-अनजाने हाथों से -
या फिर तार-तार हो जाना।
कौन मिटाए इन दागों को
कैसे कौन करे तुरपाई । तुम क्या जानो...
                         

➖ राजेंद्र श्रीवास्तव


परिचय:
राजेंद्र श्रीवास्तवजन्मतिथि -04.06.1954
जन्म स्थान  - विदिशा (म.प्र.)का एक छोटा सा गाँव काँकर 
एम.एस सी(प्राणिशास्त्र)
बी.एड.
1980 से बस्तर के लोहण्डीगुडा उ.मा.वि. से शिक्षक के पद से शासकीय सेवा का श्री गणेश ।
साहित्यिक रुझान व प्रेरणा अग्रज 'पुष्प जी 'से ।

आकाशवाणी जगदलपुर से (1982-1991)यदा-कदा चिंतन,बाल कविताएँ,नाटिका (युववाणी) कहानी व छात्रीय कार्यक्रम आदि के अवसर मिलते रहे । विज्ञान नाटिका का लेखन व निर्देशन ।


बाल कविता की एक पुस्तक 'मछली रानी'  प्रकाशित।                                   
आकाशवाणी इंदौर से भी (1992-1995)बाल कविताओं का प्रसारण ,30-6-16को प्राचार्य पद पर रहते हुये सेवा निवृत्त हुआ हूँ ।


                             
साहित्य की  बात वाट्सअप  समूह में चर्चा हेतु प्रस्तुत गीत /नवगीत ,प्रस्तुति सुरेन सिंह  ...रचना प्रवेश पर 
विशेष प्रतिक्रियाओं के साथ 




संवेदनाओं से ओतप्रोत ख़ूबसूरत गीत-नवगीत

गीता पंडित:
एक समय ऐसा भी आया कि गीत को आत्मालाप  कहकर नकार दिया गया। दुरूह साहित्यिक भाषा से ग्रसित कहा गया वही आज नवगीत के रूप मे जन  के लिये जन की भाषा में जन की बात करता है।

गीत को भुला देना आसान नहीं।  जन्म से मृत्यु तक हम गीत गाते और सुनते आ रहे हैं। फिर छायावादी कहकर गीत से पल्लू झाड़ने की बात क्या बेमानी नहीं लगती ?

सच कहूँ तो आज गीत-नवगीत लिखना बेहद दुष्कर कार्य है क्योंकि नवगीत के नाम पर सर्वत्र चुप्पी है । नयी कविता इतनी प्रचुर मात्रा में लिखी जा रही है कि गीत-नवगीत को हाशिये पर डाल दिया गया है। फिर भी धारा के विपरीत नवगीत खूब लिखा जा रहा है।
जो समकालीन समस्याओं से जुड़ा है।
आम बोलचाल की भाषा में अधिक से अघिक लोगों तक पहुँचता है
और नयी कहन व नये बिम्बों के साथ समकालीन साहित्य के समक्ष ऊँची ग्रीवा करके खड़ा होता है।
संक्षिप्तता इतनी कि केवल दो या तीन बंद मैं अपनी बात कहने की क्षमता रखता है।

आज अनेकानेक बेहतरीन व मंजे हुए वरिष्ठ और कनिष्ठ नवगीतकार हैं जो अपनी पूरी निष्ठा के साथ  नवगीत लिख रहे हैं।

हाथ कंगन को आरसी क्या।
आप स्वयं पढ़ें और देखें कि नवगीत आज की समस्याओं से जूझते हैं या नहीं ?
ये समय को गाती हुई रुदालियाँ हैं या नहीं ?
ये पूरी तरह से समकालीन हैं या नहीं ?

राजेंद्र श्रीवास्तव जी एक समर्थ नवगीतकार हैं | उनके पाँच गीत- नवगीत आज हमारे सामने हैं |

'संवेदन से शून्य, हृदय पर
पसरे सन्नाटे।'

प्रथम नवगीत ही उस संवेदना की बात करता है जो आज के समय से आँख-मिचौली खेलती हुई प्रतीत होती है | सर्वत्र भीड़-तंत्र का राज है लेकिन चारों तरफ व्याप्त सन्नाटा आदमी को लील रहा है | इसमें कई बिम्ब बहुत ख़ूबसूरत हैं और कहन मन को लुभाती है |

'आबरू अपनी बचाने वह
सड़क पर लड़ रही थी।
बहशियों के सामने बिलकुल
अकेली पड़ रही थी।
अंत तक लड़ती रही वह
देह-लोलुप  निश्चरों से।

चीखती ही रह गयी वह
तुम नहीं निकले घरों से'

दूसरा गीत सदियों से पीड़ित स्त्री की दशा का वर्णन करते हुए समय के चेहरे पर करारा तमाचा जड़ता है और हमारे सामने प्रश्न बनकर खड़ा हो जाता है कि आज आदमी को क्या हो गया है ? वह सब कुछ देखता है, सुनता है लेकिन सही के पक्ष में हस्ताक्षर नहीं करता | क्या समय माफ़ कर सकेगा |
'समय लिखेगा इनका भी इतिहास'  |'

संक्षेप में नीचे के तीनों गीत भी बहुत मुखर हैं जो अपने समय से न केवल संवाद करते हैं बल्कि आदमी को इंसान बनने की तरफ अग्रसर करते हैं | एक चुप्पी जो घर से बाहर तक फैल गयी है | एक मौन जो अपनों के होते हुए भी श्वासों की पीड़ा बनता जा रहा है, एक तनहाई जो धीरे-धीरे आदमी को लील रही है | किसान, कामगार, स्त्री, बच्चे सब उसकी पीड़ा और चिंता के विषय हैं |  गीतकार इस सबसे व्याकुल होता है और यही जन की पीड़ा उसके नवगीत की सेंटर थीम है , नींव है जिस पर रचे-बसे उनके गीत-नवगीत पूरी तरह सम्प्रेषित होते हैं और संवेदनाएं जाग्रत करने में पूरी तरह सफल भी |

राजेन्द्र श्रीवास्तव जी को बहुत-बहुत बधाई |

और अंत में कविता बनाने से नहीं बनती हाँ, बड़ी अवश्य दिखाई दे जाती है जो पुरस्कार तक कवि को खींचकर ले जाती है मगर पाठक के हृदय तक पहुँचने के लिये कविता को कवि के हृदय से अवतरित होना होता है।

नवगीत इसी तरह अवतरित हो  रहा है
जब यह कहा जा रहा है कि कविता अब शेष नहीं तब नवगीत और नवगीतकार का महत्व और दायित्व विशेष रूप से अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है।

आभार सा की बा और फिर से बधाई राजेन्द्र जी को |

इसे मेरी पाठकीय टिप्पणी समझी जाए |

➖ गीता पंडित




Saurabh Shandily: 
मीठी शहद भरे छत्ते को सबल रीछ चाटे
दीनू ने बोले थे गेहूं समरथ ने काटे

इन पंक्तियों की पृष्ठभूमि तैयार करने में आदरणीय राजेंद्र चाचा जी ने जो श्रम किया वह प्रणम्य है । आपके गीतों में जनवादी स्वर देखना आह्लादकारी है अन्यथा छंद में लिजलिजा प्रेम , भजन एवं आकाओं के लिए सिवाय प्रस्तुति गान के , प्रतिरोध के स्वर कम दिखते हैं ।

इस दिशा में न्यून गीतकार हैं जिन्होंने उल्लेखनीय काम किया है । छंदों में बंधी रचनाएं अक्सर एक खास दायरे में आ जाते हैं ।

आपका एक गीत हम मानव हैं से कुछ पंक्तियां -
नहीं मिला भोजन दो दिन से कोई बात नहीं
खुद निकाल लेंगे कुरान से सूखा भात कहीं

उपरोक्त पंक्तियाँ अलग से दिखने वाली पंक्तियां हैं । अगला गीत चलो मौन के पाट अब खोलें, संवाद की प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए किया गया एक सार्थक पहल है वहीं तुम क्या जानो शिर्षक से लिखा गया गीत शानदार है ।

तुम क्या जानो से
आठ बरस के बच्चे से बस्ता छिन जाना
झूठे कप प्लेट होटल में धोकर पैसे चार कमान

आक्रोश पैदा करने वाली पंक्तियां हैं । तमाम गीत अपनी बात कहने में सफल है एवं आप को हृदय से बधाई

 

 Vijay Panjwani: 
आज राजेन्द्र श्रीवास्तव जी के गीत सचमुच पटल को समृद्ध कर रहे हैं। सीधी
सरल सी भाषा में लिखे गए । हाशिए के लोगों के दर्द को बखूबी उजागर करते हैं।
जिन्हें पढ़ कर असहज सा लग रहा है  !
1 " पसरे  सन्नाटे "
दीनू ने बोए थे गेहूं
समरथ ने काटे
2 " तुम नहीं निकले घर से "
गुप्त समझौता  हुआ फिर
नेवलों का विषधरों से
5 " तुम क्या जानो "
कभी बांस की फांस धंसी न _
कभी पांव न फटी बिवाईं
तुम क्या जानो पीर पराई
भरी दोपहरी लेकिन अब तक
उसकी माँ वापस घर न आई
फिर बिटिया की रुकी सगाई  !
राजेंद्र जी को हार्दिक बधाई
ब्रज जी और सुरेन जी को धन्यवाद्

Sandhya Kulkarni: 
ये सत्य है कि , नई कविता में विचारों की इतनी सघनता है कि , रस कहीं छिंटक गया सा लगता है ऐसे में राजेन्द्र जी के गीत पढ़ना एक ताज़ा बयार की तरह महसूस करना है ।   संवेदन से शून्य /हृदय पर पसरे सन्नाटे  गीत नए बिम्बों से पूरित है ।    गुप्त समझोता हुआ फिर /  नेवलों का विषधरों से  गीत में जिस तरह अपनी बात रखी गयी है समाज की चिंता झलकती है   । तीसरा गीत श्रमजीवी वर्ग की गाथा कह रहा है और स्वाभिमान से रहने की बात कह रहा है । गीत जनवादी दृष्टिकोण लिए है , इस नवाचार को सलाम । कवि श्रृंगार से भी अछूते नहीं हैं , देखिये कितनी ख़ूबसूरती से कह रहे हैं  :-- सांसों की माला में हम तुम / यह क्षण यह मुस्कान पिरो लें  राजेन्द्र जी के गीत जहाँ  एक ऒर छंद की मर्यादा का निर्वाह करते चलते हैं , समय की पुकार को भी अपने नवाचार में पिरोते चलते हैं ।


 Braj Shreewastav: 
इन गीतों की विशेषताएं हैं इनमें वैचारिक परिपक्वता और समकालीन सरोकार।
जैसा कि कहा जाता है कि लय हर मन की पहली पसंद है, यहां लय अपने सौम्य में है,शोर में या मद में नहीं।लय एक बैशाखी होना चाहिए, मंजिल नहीं, यह बात इन गीतों में है। ऐसे गीत ही कविता प्रधान होते हैं, जैसे ये हैं।
सादर।

Anil Kumar Sharma: 
श्री राजेन्द्र जी के गीत समाज की विविध उलझनों की डगर से निकलते हुऐ ,व्यंग्य के सधे हुऐ तीर छोड़ते हुऐ एक लय ताल में सफ़र करते हुऐ अपनी प्रभावी यात्रा पर निकल पड़े हैं ।
पाठक को कुछ रुक कर ,सोचने पर मजबूर करते गीतों के लिये श्री राजेन्द्र जी को बधाई


Jyoti khare :
 एक समय था जब गीतों और गजलों को समकालीन कवियों या यूं कहें प्रगतिशील कवियों ने बहुत पीछे धकेलना शुरू किया था, गीत वाकई अपनी पहचान खोने लगे थे और गजल मुशायरों में समाहित होने लगी थी ऐसे समय में शम्भूनाथ नाथ जी ने नवगीत दशक के संपादन किया और देश के चर्चित गीतकारों को नया प्लेटफार्म दिया. माहेश्वर तिवारी, उमाकांत मालवीय, अनूप अशेष, भगवान स्वरूप सरस,दिनेश मिश्र,राम सेंगर, भदौरिया जी जैसे गीतकारों को नयी दिशा दी, बाद में अविनाश चौहान, पूर्णिमा वर्मन ने गीतों के लिए बहुत सार्थक कार्य किये. रहा सवाल गजल का तो जो लोग गजल को नकारते थे वही लोग दुष्यन्त की गजलों के गुणगान करने लगे.
गीता पंडित जी आज के गीतों के परिद्रश्य में अच्छी और सार्थक भूमिका लिखी है.
भाई राजेन्द्र श्रीवास्तव के गीत मन को छूते हैं , नवगीतों में जो गांव का बोध होता है, उससे अलग हटकर समकालीन प्रतीकों और बिम्बों को लेकर अपने गीत रचे हैं यह इन गीतों की विशेषता है , इन गीतों की एक और खास बात है कि शब्दों को सलीके से गीतों में पिरोया है कहीं भी इस नहीं लगा कि जबरन कठिन शब्दों को धरा गया हो, सुगमता, सहजता इन गीतों की जान है.
मध्यमवर्गीय मानसिकता के ताने बाने में बुने आज के गीत मन को मथते हैं और सराहने को मजबूर करते हैं.


Akhilesh Shreewastav:
 बहुत कम लोग है जो छंद मे लिख रहे है पढ़ें जा रहे है तर छप रहे है । लय कविता का अनिवार्य तत्व है अकविता में उसे बनाये रखने का शऊर मुश्किल से आता है छंद उस लय को नियम के तहत स्थापित करता है अकविता में लय साधना हो तो छंद में शुरुआत आवश्यक है मुक्तिबोध तक ने छंद लिखा । यह स्मृति का मंत्र है छापे खाने की मशीन न होती तो अकविता शायद ही पनप पाती ।विश्व की सबसे शानदार अकवितायें भी जन के स्मृति में नही रहती । अकादमीक व हिंदी में स्नातको को छोड़ दे तो आज भी कविता का मतलब छंद ही है । राजेंद्र जी को बहुत बधाई ।

Madhu Saksena: 
राजेन्द्र जी हर फन में माहिर है ।आज उनके नवगीत पटल पर है ।गीतों में लय रस के साथ आज की विसंगतियों पर भी बात की गई है ।सहज सरल और सुंदर शब्द गीत   जन जन तक पहुंच जाने के क़ाबिल हैं ।
सारा दिन ढोकर प्रयाग कण
मधुमक्खी रोयी
इस पूरे अन्तरे में व्यापकता है ।अलग अलग पाठ है और सब पाठक इसे अपने तरीके से अर्थ के साथ महसूस करेगें ।
लेखन की यही सफलता राजेन्द्र जी ने हासिल की है ।
चीखती रह गयी वह
तुम नही निकले घरों से

धिक्कार ,लताड़ ,चिंता ,आशंका  समझाइश सभी भाव शामिल है ।

Nilima Karaiya:
पहले सन्नाटे  कविता में  विषमता की पीड़ा है। संवेदनाओं  की शून्यता से मानवता  का अवमूल्यन द्रष्टव्य है। एक एक पंक्ति विवशता की स्याही  से रचित है।

तुम नहीं  निकले घरों  से-
यह कविता  अंदर तक झकझोर गई ।इंसानियत ने इस कदर दम तोड़ा है कि वही शर्मसार  हो रही है।
बेहद मार्मिक
हम मानव हैं
संभवत  यह मेहनतकश मजदूर की व्यथा  को दर्शाती उसके हौसले  और उत्साह  की कविता है।और बेहतरीन सोच की सकारात्मक  रचना है।
चलो मौन के पट हम खोलें-
यह टूटते बिखरते रिश्तों  को बचाने  की कवायद है।अपने  अहम् को त्याग  हम थोड़ा  विनम्र  बनें। छोटी  मोटी  गल्तियों को  नजरअंदाज करें। वाणी के संयम को मधुरता की लगाम संयमित  रखें। तो हमारे रिश्ते हमारे  हाथ में  हमारे  साथ रहेंगे।
तुम क्या  जानो
यह कविता  बहुत तकलीफदेह लगी।धीरे-धीरे  जो वर्ग भेद की या कहें  संपन्नता और विपन्नता की गहराती खाई के कारण दिहाड़ी मजदूर या समतुल्य लोग  कैसे  जीवन यापन  करते हैं  यह सिर्फ  वही  जान सकते  हैं।
सभी  नवगीत  समकालीन  परिस्थितियों का जीवित चित्र  प्रस्तुत  करते हैं। 










Wednesday, July 18, 2018


उपन्यासनामा: भाग तीन  ,रुकोगी नहीं राधिका 
उषा प्रियंवदा 


उषा प्रियंवदा 


 आधुनिक बोध की अग्रदूत "रुकोगी नहीं राधिका"

रुकोगी नहीं राधिका उषा प्रियंवदा का  दूसरा उपन्यास है। ‘राधिका’ जो कि आधुनिक बोध की प्रतीक है, इसकी नायिका है जो विदेश में कुछ समय रहने के बाद वापस भारत आयी है। यहाँ उसके पिता हैं, सौतेली माँ विद्या है। उसके भाई-भाभी हैं, कुछ मित्र हैं और सहेली हैं, नानी हैं,रज्जू मामा हैं, अक्षय, मनीश और डैन जैसे व्यक्ति मित्र हैं। राधिका के व्यक्तित्व की रेखाएं जिस परिवेश में खींची गईं हैं वह अपने समय से बहुत आगे की सोच के रंग है। वह सही अर्थों और संदर्भों में आधुनिक स्त्री है। वह पत्रकार डैन के साथ विदेश गई और वहाँ कुछ समय तक रहने के बाद वापस भारत आयी है। यहाँ उसके पिता हैं, जो कुछ असामान्य हैं, कम बोलते हैं, अपने काम में मस्त रहते हैं। उनकी दूसरी पत्नी विद्या है, उससे भी कोई खास आत्मीय संबंध नहीं है। यह एक नगरीय पारिवारिक परिवेश है जिसमें राधिका पली बढ़ी है।






राधिका के माध्यम से एक आधुनिक स्त्री की सोच, विचारधारा, दृष्टिकोण और जीवन तथा पुरुष के प्रति उसका अपना रवैया प्रस्तुत है। राधिका का चरित्र बहुत गहरे तक स्पष्ट है। वह जीवन से क्या चाहती है? पुरुष का साथ भी चाहिए मगर सिर्फ ‘प्ले बॉय’ की तरह नहीं। एक स्थायी जीवन साथी चाहिए। अक्षय के प्रति उसका झुकाव और आकर्षण इसी स्थायित्व को लेकर है। मनीश के स्वभाव में वह स्थायित्व नहीं है। मनीश विदेश में विश्वविद्यालय में उसके साथ था पर वह राधिका को उस रूप में प्रभावित नहीं कर सका यद्यपि - ‘‘कामना उसकी मनीश ने भी की थी, पर उसे राधिका ने दूर रखा था, उसकी ओर तीव्र आकर्षण अनुभव करते हुए भी वह संयत रही थी,  उसने अपने को बार-बार याद दिलाया था कि मनीश जल्दी ही स्त्रियों से थक जाता है।’’1

 डैन के साथ के गुजारे वक्त से मिले अनुभव  के बाद राधिका का जीवन दृष्टिकोण अलग तरह से निर्मित हुआ जैसा कि उषा जी ने लिखा - ‘‘और डेन के बाद, राधिका किसी पुरुष के लिए शृंखला में एक कड़ी नहीं रह जाना चाहती थी। वह तो एक छत्र साम्राज्ञी बनना चाहती थी, जैसाकि केवल अक्षय के साथ ही संभव था।’’2 

राधिका एक स्वतंत्र व्यक्तित्व की और देश दुनिया के अनुभवों से पकी स्त्री है। वह अपने निर्णय स्वयं साहसपूर्वक लेने की क्षमता रखती है और समय समय पर निर्णय लेती भी है। इस अर्थ में वह एक आधुनिकता बोध से संपन्न स्त्री है। स्त्री जब घर और पितृसत्तात्मक व्यवस्था के घेरे से बाहर निकल पाती है तो उसके अनुभव उसे मजबूत बनाते हैं, परिपक्व बनाते हैं और पुरुष पर निर्भरता कम होती जाती है। राधिका जीवन में पुरुष पर निर्भरता और पुरुष के नियंत्रण से स्वयं को मुक्त कर लेती है -

‘‘पापा को छोड़ डेन के संग रहते हुए उस एक वर्ष में राधिका में जैसे कई वर्षों का अनुभव, पकापन एकाएक आ गया था और तभी डैन से अलग होने का साहस उसमें जगाा था। अब मैं स्वतंत्र हूँ, परिपक्व भी और गढ़ सकती हूँ अपना जीवन, अपना भविष्य।’’3

इस तरह अपना जीवन गढ़ सकने का साहस और निर्णय आज भी कितनी पढ़ी-लिखी स्त्रियां ले पा रही हैं। यह देखने और समझने की बात है। राधिका अपने समय और समाज में स्त्रियों की पराधीनता और दोयम दर्जे के लिये सोचती है -‘‘राधिका ने कहा, तभी तो हमारे यहाँ कितनी लड़कियों का चरित्र पूर्णतः विकसित हो पाता है? माता-पिता अपने ही विचारों को उन पर थोपते रहते हैं। रहा मेरा सवाल, मैं स्वेच्छापूर्ण जीवन की इतनी आदी हो गई हूँ कि विघ्न सह नहीं पाती।’’4 यह अपना जीवन गढ़ने का संकल्प और साहस घर से बाहर निकलने से आया है।

 घर की चाहरदीवारी में कैद स्त्री अपना भविष्य गढ़ने के बारे में सोच भी नहीं पाती। वह स्वयं को वस्तु बनने से इंकार करने वाली है, वह दूसरों से इस्तेमाल की जाये यह भी वह नहीं होने देती तभी तो मनीश को रिजेक्ट करती रहती है। यद्यपि वह महसूस करती है कि पुरुष विहीन जीवन में एक बोरियत और ऊब है - ‘पुरुषहीन जीवन में एक उकताहट तो अवश्य होती है, पर साथ ही एक निश्चिन्तता भी, जो कि राधिका को काफी सुखद लगने लगी थी। अब मनीश उस संतुलन को फिर गड़बड़ कर देगा। वह चाहता क्या है? उसे न मित्रों की कमी है न लड़कियों की।’’5
राधिका मनीश से कहती है कि ‘‘हो सकता है कि मैं अक्षय से विवाह कर लूँ। मेरे जीवन में प्ले-ब्वॉय’ के लिए स्थान नहीं है। मैं संगी चाहती हूँ, जिसमें स्थिरता हो, औदार्य हो, जो मुझे मेरे सारे अवगुणों सहित स्वीकार कर ले। मेरे अतीत को झेल ले।’’6

 राधिका की स्वतंत्र चेतना को झेलना आधुनिक पुरुष के बस में नहीं है। वह घर से बाहर तो राधिका को जीना चाहता है पर घर में पत्नी के रूप में नहीं। अक्षय भी पितृसत्तात्मक मानसिकता वाला है तभी तो वह सोचता है - ‘‘ठीक है, उसने सोचा राधिका मुझे आकर्षित करती है - उन्हीं सब बातों के कारण, जिन्हें मैं पत्नी में नहीं देखना चाहता। पत्नी मेरे घर में रहेगी, मेरी और बच्चों की देखभाल करेगी और मेरे प्रकाश से आलोकित होगी। राधिका स्वेच्छाचारिणी है, राधिका में तेज है, और राधिका एक अर्थ में दूसरे की विवाहिता है...फिर भी अच्छी लगती है। इस बार वह अपने को दमित नहीं करेगा, अगर एक उमड़ती हुई लहर उसे बहा ले जायेगी, तो उससे उबरने के लिए हाथ-पैर नहीं मारेगा।’’7






यह पुरुष का दोहरा चरित्र हैं।
 राधिका यह सोचना भी कितना अलग  है कि जब उसके पापा ने अपनी राह अलग चुन ली तो वह भी अपनी राह स्वयं चुनेगी। ‘‘पापा ने जब अपने जीवन की राह चुन ली, तो वह क्यों नहीं स्वतंत्र, निर्मम हो अपने लिए राह खोज लेती।’’8
राधिका एक स्वतंत्र सोच वाली लड़की है। वह आत्मविश्वास से भरपूर और स्वयं निर्णय करने की क्षमता और साहस रखती है। तभी तो वह पिताजी और बड’दा के सामने विवाह न करने का फैसला सुना देती है और उनके हर निर्णय को मानने से इंकार करती है।

‘‘मैं अभी विवाह नहीं करना चाहती,’’ राधिका ने दृढ़ स्वर में कहा।....‘‘जो आप चाहते हैं वही हमेशा क्यों हो? क्या मेरी इच्छा कुछ भी नहीं है? मैं आपकी बेटी हूँ, यह ठीक है, पर अब मैं बड़ी हो चुकी हूँ और मैं जो चाहूँगी वही करूंगी।’’ इतना आत्मविश्वास और साहस मगर असंयतात्मना नहीं है राधिका। उसके चरित्र और सोच में एक अलग किस्म का गौरव है, विश्वास है, संयम है जिसके बल पर वह यह कहने का साहस कर सकी।
‘‘बस बहुत हो चुका। आपने अपनी इच्छाओं के सामने कभी मेरी खुशी का ख्याल नहीं किया। बस, अब आप लोग मुझे अकेला छोड़ दैं।’’9 कितना भरोसा है राधिका के इन शब्दों में। हिकारत नहीं है। पर दृढ़ता में कोई कमी नहीं है।

राधिका एक विशिष्ट चरित्र है

‘रुकोगी नहीं राधिका’ एक अलग मिजाज का उपन्यास है। इसमें आधुनिकताबोध बहुत स्पष्ट है। राधिका का जीवन और विचार सामाजिक बिंडबनाओं के बीच से अपनी राह तलाशने का कार्य करते हैं। राधिका पर पितृसत्तात्मक मूल्यों का कोई दबाव नहीं है। सुषमा की तरह पिता के दायित्वों को निभाने के लिए पिता बनकर रहने की विवशता उसके सामने नहीं है। वह इस बात को कहती है कि आपने अपनी राह चुन ली तो मैं क्यों नहीं चुन सकती। राधिका का चरित्र हिन्दी उपन्यास और भारतीय समाज के लिए ठीक उसी तरह चुनौतीपूर्ण और नया था जिस तरह कृष्णा सोबती की ‘मित्रो’इन चरित्रों को झेलने का साहस और समझने की कला से अभी हमारा समाज परिचित नहीं था। इसलिये या तो इन पर आक्षेप लगाये गए या उनकी उपेक्षा की गई। ‘मित्रो’ की बोल्डनेस के कारण उस पर आक्षेप लगे, परन्तु राधिका ने जिस धीर गंभीर तरीके से पितृसत्ता की जड़ों में मट्ठा डालने का कार्य किया उसे न समझने के कारण उसकी उपेक्षा अधिक हुई।

‘रुकोगी नहीं राधिका’ की राधिका अमेरिका में तीन वर्ष रहकर वापस आती है। इस अर्थ में वह ‘शेष यात्रा’ और ‘अन्तर्वंशी’ की नायिका से अलग है। अनुका और वाना अमेरिका जाने के बाद वापस नहीं आतीं, वे विवाहित होकर वहाँ जाती हैं, जबकि राधिका घर से अपनी मर्जी से अपने पुरुष मित्र के साथ विदेश जाती है और अपनी मर्जी से वापस आती है। चूँकि वह विवाह के कारण वहाँ नहीं गई, वह अपनी मर्जी से अपने दोस्त के साथ गई थी, इसलिए वापस आ जाती है। शेष यात्रा की अनुका और अंतर्वंशी की वाना विवाह के बाद वहाँ गई, अतः वे वापस नहीं आतीं और जीवन की विसंगतियों का सामना करती हैं। राधिका अमेरिकी जीवन की चकाचौंध में नहीं फँसती जैसी की वाना फँस जाती है और न वह अनुका की तरह पति के द्वारा छोड़ दी गई स्त्री है, बल्कि वह स्वयं अपने दोस्त को छोड़कर वापस आती है।

तीन वर्ष बाद जब वह भारत के हवाई अड्डे से बाहर आई तो कोई भी उसे लेने नहीं आया। उसके पापा, भाई भाभी और उनके बच्चे। यह भारत में वापसी का पहला अनुभव है, जो उसे अपने विदेश जाने के निर्णय के फलस्वरूप हुआ है। अपने देश में अपने लोगों के बीच वापस आने के संबंध में शायद उसने सोचा भी नहीं था कि उसे दिल्ली में उतरने के बाद ‘कहाँ जाना है?’ इस बारे में सोचना पड़ेगा। राधिका के अंदर उपजा अकेलेपन का बोध आधुनिकताबोध का पहला चरण है।

‘‘साठ के दशक में ही उषा प्रियंवदा ने ‘रुकोगी नहीं राधिका’ उपन्यास के जरिए नारी-मुक्ति-प्रश्न को एक नए कोण से देखने की कोशिश की। हिन्दी जगत में राधिका का चरित्र जब सामने आया तो आम पाठक के लिए कुछ असामान्य और अपरिचित-सा था। उससे तादात्म्य स्थापित करने के लिए अधिक प्रौढ़ और खुले दिमाग की जरूरत थी। उच्च अभिजात परिवार की सुशिक्षित संभ्रांत युवती के इर्द-गिर्द केन्द्रित होते हुए भी इस उपन्यास ने भारतीय समाज के मूल्यगत संक्रमण की प्रक्रिया को प्रतिबिम्बित किया। पुराने समाज के परंपरागत मूल्यों, आस्थाओं को नये समाज के मूल्यों के टकरावों के बीच ‘राधिका’ अपने लिए उपयुक्त पुरुष की तलाश करती हुई, स्थापित सामाजिक मान्यताओं के एकदम आमने सामने आई होती है।

 पहली बार शायद नारी की अस्मिता-संहार करने वाली भारतीय विचार पद्धति पर मुखर होकर इस उपन्यास ने प्रश्नचिह्न खड़ा किया।’’10


राधिका डेने से अलग होने के बाद  यह निश्चित किया था कि वह ‘स्वयं के होने को’ प्रवाह में बहने नहीं देगी। अपने स्वत्व को समाप्त नहीं होने देगी, रेत बन कर बहने नहीं देगी चाहे पुरुष का साथ मिले या न मिले।
सच यही है कि पितृसत्तात्मक व्यवस्था में इस तरह की विचार और मूल्यवाली स्त्री अपने को आंट ही नहीं सकती। उसके स्वत्व और स्वतंत्र व्यक्तित्व को पचाने के लिए एक नई व्यवस्था और नए मूल्यों की दरकार है जिसमें पितृसत्तात्मक व्यवस्था का जरा भी अंश न हो। राधिका पितृसत्तात्मक व्यवस्था की उस दरार पर ऊँगली रखती है, जिसमें पुरुष को तो अपनी राह चुनने की आजादी है, मगर स्त्री को नहीं और ऐसा करनेवाली स्त्री को यह व्यवस्था अपने से बाहर रखती है, उसे अनफिट महसूस कराती है, बेगाना और अजनबी महसूस कराती है, ताकि घूम फिरकर वह उसकी शरण में आ जाए।







उषा जी के स्त्री चरित्रों में राधिका एक अकेला ऐसा चरित्र है जो पितृसत्ता से जमकर मुठभेड़ करता है। उसकी लड़ाई पितृसत्ता की विचारपद्धति से है। वह पुरुष से नफरत नहीं करती। पुरुष उसका दुश्मन भी नहीं है। वह पुरुष के रूप में पिता, भाई, दोस्त, प्रेमी सब को स्वीकार करती है। पर इन सबको अपने जीवन का कोई भी निर्णय करने का अधिकार नहीं देती। वह अपने संबंध में तमाम फैसले स्वयं लेती है। राधिका का यह सूक्ष्म विद्रोह है पितृसत्ता की तर्करचना के खिलाफ। वह अपने व्यक्तित्व, पहचान और अस्मिता को लेकर एकदम जागरूक और सतर्क है। अपने स्वत्व की शर्त पर वह कहीं भी किसी भी स्तर पर समझौता नहीं करती। उसने झुकना और झुकाना दोनों को ही अपने जीवन से बाहर कर रखा है। समझौते का कोई रास्ता  वह नहीं अपनाती। न देश में न विदेश में। उसके पास समाज क्या कहेगा? लोग क्या कहेंगे? परंपरा और सिद्धांत अनुमति देंगे या नहीं? इस तरह कोई तर्क शृंखला उसे विचलित नहीं करती, जैसा की सुषमा को विचलित किए हुए है। इस ‘राधिका’ का चरित्र कृष्णा सोबती के ‘मित्रो’ से ज्यादा विद्रोही और बोल्ड माना जा सकता है।

राधिका के पास अपनी सोच है, विचार हैं, अपनी भाषा और सिद्धांत हैं। वह बोलना जानती है, उसके पास हर तर्क का जबाव है और उस जबाव को प्रूफ भी करना जानती है। समाज और परिवार के तर्क और सीमायें उसे अपने तईं समर्पित नहीं करा पाते हैं। उसके अन्दर विवशता का कोई धागा नहीं है। वह आधुनिकताबोध को अपने जीवन में पूरी तरह उतार चुकी है। स्वच्छंदता और उन्मुक्तता को जीते हुए भी वह कहीं से भी नैतिक/अनैतिक और श्लील/अश्लील की परिभाषाओं से अपने को दूर रखती है। इस अर्थ में यह राधिका किसी के रोके रुकनेवाली नहीं है।

क्या राधिका जैसी आधुनिकबोध सम्पन्न अपने लिए परिवार और परिवेश से निर्मम होकर अपनी राह चुनने का साहस जुटा पायेंगी और क्या वे पुनः पितृसत्ता के आधुनिक संस्करण के जाल में नहीं फंसेंगी? सुषमा अपनी राह नहीं चुन सकी यह कहने की अपेक्षा यह कहना ज्यादा सही होगा कि उसने राह तो चुन ली थी, पर उस राह पर चलने का साहस वह नहीं जुटा पाई और विदेश यात्रा करने का मौका उसके पास से फिसल गया।

०००

डॉ संजीव जैन
 डॉ संजीव जैन 


संदर्भ सूची
1. रुकोगी नहीं राधिका, उषा पियंवदा पृ. 119 
2. वही, पृ. 119
3. वही, पृ. 122
4. वही, पृ. 64
5. वही, पृ. 126
6. वही पृ. 82
7. वही, पृ. 69
8. वही, पृ. 67
9. वही पृ. 52
10. कुछ जीवन्त कुछ ज्वलंत, कात्यायनी, पृ. 164

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डॉ. संजीव कुमार जैन
सहायक प्राध्यापक हिन्दी
शासकीय संजय गाँधी स्मृति स्नात्कोत्तर महाविद्यालय,
गुलाबगंज 
522 आधारशिला, बरखेड़ा
भोपाल, म.प्र.
मो. 09826458553



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Wednesday, July 11, 2018

उपन्यासनामा: भाग दो ,कालापादरी 

मानवीय संदर्भों की कहानी: काला पादरी


तेजेंदर गगन:स्म्रतियां शेष 
10 मई 1951,..12 जुलाई 2018 



तेजिंदर गगन 




तेजिन्दर के उपन्यास के आरंभ में यह कविता अंश उद्धृत है

कौन हैं ये लोग?
घुटनों तक जमीन में धँसे हैं जिनके शरीर
कौन हैं ये लोग?
जिनकी आवाज खो गई है बियाबाँ में
परछाईं भी जिनकी छोड़ गई उनका साथ
अविश्वास पर से भी उठ गया जिनका विश्वास
कौन हैं ये लोग?
हाँ, ये वही लोग हैं
जिन्होंने तड़के उठकर चाँद को मरते देखा था
ठीक भोर के वक़्त जिन्होंने शंख का नाद सुना था
घन्टियों की आवाजें सुनीं थीं
परन्तु जिनकी अपनी कोई आवाज नहीं
बियाबों में खो बैठ हैं 
अपनी परछाईं....’’
                           -ग्याना (अफ्रीका) के कवि मार्टिन कार्टर की कविता 
                             ‘भूख का विश्वविद्यालय’ का एक अंश


‘‘मुझे लगा कि जिस कमरे में मैं फिलहाल बैठा हूँ उस की छत पर जाले ही जाले फैल आए हैं, आसपास सब कुछ निष्क्रिय है, सिर्फ मकड़ियाँ है जो सक्रिय हैं और बाकी सब कुछ ठहर गया है, कहीं कोई गतिविधि नहीं, जीवन का कोई स्पंदन नहीं, कुछ पुरानी तस्वीरें दीवारों पर टंगी हैं जिनके जिनके इर्द गिर्द धूल है और जाले हैं, कुछेक स्मृतियाँ हैं जालों से बुनी हुई, कुछ बूढ़े और उदास चेहरे हैं जिनकी आंखों में अभी भी रोशनी की औपचारिकता बाकी है। वे अभी भी इस उम्मीद में है कि अपना वजूद खत्म होने से पहले वे इस दुनिया को बदल कर जायेंगे। एक जिद है, जालों से घिरी हुई, छत की किसी मुंडेर पर कुछ पुस्तकें हैं, जिनमें इस दुनिया को बदल दिए जाने का घोषणा पत्र है और उसके आसपास भी जाते हैं।’’पृ16

‘‘मैं जब अपने इर्द गिर्द देखता तो मुझे लगता कि ये सारे लोग जिनमें मैं भी शामिल हूँ, उन्हीं लोगों से मान्यता प्राप्त करने की होड़ में लगे हैं, जिनका अपने अंतर्मन से विरोध करते हैं। हम उसी व्यवस्था का संरक्षण चाहते हैं, जिसके विरोध में बड़ी बड़ाी बातें करते हैं। ऐसा शायद हम इसलिए करते हैं कि हम अपना नैतिक साहस कहीं न कहीं खो चुके हैं।’’पृ16

‘‘कभी कभी हम समझते हैं कि जीवन के कुछ उलझे हुए सवालों  को स्थगित कर देने से वे स्वतः ही खत्म हो जाते हैं। अक्सर ही हम अपनी पीठ के पीछे बहुत कुछ इकट्ठा हो जाने देते हैं। कूड़े की तरह। जिसका सामना हमें कभी तो करना ही पड़ता है और एक दिन वह सड़ांध बन कर अपने ही जिस्म से आ चिपकता है। मैंने सोचा और डर गया।’’पृ 24

‘‘पहले दिन जब चावल का दाना मुहं  में नहीं जाता तो लगता है कि जैसे कुछ गुम हो गया हो, पर उम्मीद रहती है कि कल तक मिल जायेगा, अगले दिन भी जब चावल का दाना नहीं मिलता तो आस खत्म होने लगती है, पर लगता है कि चलो एक दिन और, पर तीसरे दिन के बाद सोचना पड़ता है कि चावल का स्वाद मूंह में घुलेगा भी या नहीं, आदमी उसकी गंध तक भूल जाता है, उसके बाद कुछ ऐसा होता है कि जिधर देखो चावल ही चावल बिखरे हुए नजर आने लगते हैं, पर आप उनका स्वाद मुंह में नहीं घोल पाते, चावल के लिए अपनीं अंदर की सारी संवेदना आदमी खो देता है, यहाँ तक कि वह चावल के दाने को अपने शरीर के रोएं रोएं में महसूस करता है। यह बहुत त्रासद अनुभव है होता है, क्योंकि आप महसूस तो करते हैं कि आपके जिस्म के रोएं रोएं में चावल भरा पड़ा है, लेकिन आप उसे पका नहीं सकते। उसको पकाने का अर्थ खुद को पकाने जैसा होता है। पहले देह की शक्कर सूखती है, फिर नमक, फिर पानी, फिर खून का बहना और आखिर आपकी सांस रुकने लगती है। आप आसमान की तरफ देखते हैं तो अंधेरा ही अंधेरा दिखायी देता है। कई बार तो लगता है कि जैसे पूरा आसमान सितारों से नहीं बल्कि चावल के दानों से भरा पड़ा है, जहाँ आप पहुँच नहीं सकते, जिसे सिर्फ आप देख भर सकते हैं, छू नहीं सकते, फिर खाने का सवाल ही पैदा नहीं होता और फिर अगर आप बिरई लकड़ा हैं और राज्य में पैलेस विरोधी सरकार है तो चर्च तो आपको पूछेगी नहीं, पर पैलेस को कोई आदमी आपको बीजाकुरा से उठायेगा और अंबिकापुर के जिला अस्पताल में ला कर भर्ती कर देगा। फिर अखबार वाले आयेंगे, टीवी और रेडियो वाले आयेंगे अपने बड़े बड़े कैमरों के साथ, पैलेस की महारानी खुद आयेंगी और आप से पूछेंगी, ‘कबसे चावल नहीं खाया?’’पृ.26-27

‘‘हम अपने चेहरों से भाग कर कहाँ चले जाते हैं? मैंने सोचा था। क्या यह हमारी पढायी लिखायी है या हमारा कथित पढ़ा लिखा समाज हो हमें अपने ही चेहरे से पलायन का रास्ता दिखाता है। वे कौन से मूल्य हैं जो हमारी जीवन की दृष्टि को ही बदल देते हैं।’’ पृ. 52



काला पादरी उपन्यास अपने सीधे सहज कथा प्रवाह में मानवीय संबंधों और संवेदना को उसके तमाम बहशीपन, क्रूरता और विसंगतियों के साथ उजागर करता है। मानवीय संदर्भ और संवेदना की जब बात की जाती है तो उसे अमूर्त मानववादी मूल्यों से संबद्ध नहीं करना चाहिए। मानवीय संदर्भ भौतिक जीवन से नाभिनालबद्ध होते हैं। ये संदर्भ मानवीय नियति को चुनौती देते हैं और व्यवस्था तथा संस्थागत धर्म और मानवीय रिश्तों की चीर-फाड़ भी करते हैं। हम अपने जीवन के विभिन्न संदर्भों मंे देखते हैं कि व्यवस्था और संस्थागत धर्म ने हमारे जीवन को कितने गहरे तक विचलित कर रखा है और हमारी चेतना को कितने रूपों में प्रभावित कर रखा है। इस उपन्यास के मानवीय संदर्भ विभक्त और विघटित मानवीय चेतना के विभिन्न रूपों को पूरी यथार्थता के साथ उद्घाटित करते हैं।

मानवीय चेतना जो भौतिक संबंधों की आध्यात्मिक अभिव्यक्ति है, को किसी धर्म, संस्था, संस्कृति, भाषा, स्थान या जाति के आधार पर शोषित या उत्पीड़ित नहीं किया जा सकता और ऐसा करना मानवीय संदर्भ को संस्थाबद्ध करना ही होगा जो कि मानवता के विकास के प्रति भयंकर अपराध माना जाना चाहिए।
काला पादरी उपन्यास में आदित्य और जेम्स खाखा के बीच जो दोस्ताना संबंध बनता है वह एक विशुद्ध मानवीय संदर्भ के दौरान उपजता है। यात्रा के दौरान मुसाफिर खाने में वे दोनों मिलते हैं और चूँकि वे एक सही स्थान पर जाने वाले यात्री थे इसलिए वे सहयात्री बन गए और जीवन की यात्रा के विभिन्न पढ़ावांे को साथ साथ तय करते गए। इस यात्रा में अनेक यात्री और विभिन्न मानवीय संदर्भ सहज ही आते चले जाते हैं।

आदित्य बैंक में तबादला होकर गया है और वहाँ जिस तरह से वह आदिवासियों का शोषण देखता है, वह पूरे देश की स्थिति को संकेतित करता है। पूरे देश में भ्रष्टाचार का जाल बैंकों के माध्यम से ही फैल रहा है। बैंक कर्ज देते हैं, पर इस कर्ज का लाभ बैंक कर्मचारियों के साथ स्थानीय राजनैतिक और सामंतवर्गीय लोग उठाते हैं। वहाँ का जीता जागता मनुष्य तो सिर्फ अंगूठा लगाने और कर्ज की किस्त चुकाने में अपनी जमीन और पैदावार को लुटाता भर है। इस स्थिति में आदित्य की जो स्थिति है वह किसी भी मानवीय संवेदना के प्रति जागरूक इंसान की होगी ही।

‘‘मुझे लगा कि जिस कमरे में मैं फिलहाल बैठा हूँ उस की छत पर जाले ही जाले फैल आए हैं, आसपास सब कुछ निष्क्रिय है, सिर्फ मकड़ियाँ है जो सक्रिय हैं और बाकी सब कुछ ठहर गया है, कहीं कोई गतिविधि नहीं, जीवन का कोई स्पंदन नहीं, कुछ पुरानी तस्वीरें दीवारों पर टंगी हैं जिनके जिनके इर्द गिर्द धूल है और जाले हैं, कुछेक स्मृतियाँ हैं जालों से बुनी हुई, कुछ बूढ़े और उदास चेहरे हैं जिनकी आंखों में अभी भी रोशनी की औपचारिकता बाकी है। वे अभी भी इस उम्मीद में है कि अपना वजूद खत्म होने से पहले वे इस दुनिया को बदल कर जायेंगे। एक जिद है, जालों से घिरी हुई, छत की किसी मुंडेर पर कुछ पुस्तकें हैं, जिनमें इस दुनिया को बदल दिए जाने का घोषणा पत्र है और उसके आसपास भी जाते हैं।’’1 






हम जिस युग में सांसे ले रहे हैं, उसमें मानवीय संदर्भों की कोई अहमियत नहीं है। मुनाफा और सुविधायें जुटाने की होड़ जिस समाज का चरित्र बन गया हो वहाँ भूख से मरने के प्रति कोई संवेदना नहीं उपजती है। मानवीय जीवन का सबसे महत्वपूर्ण संदर्भ है ‘‘भूख’’, यह एक भौतिक अस्तित्व की चेतना है जो मानवीय जीवन को न केवल अस्तित्व प्रदान करती है बल्कि उसमें जीवन के अन्य पक्षों के प्रति जागरूकता पैदा करती है। हमारी तमाम व्यवस्थायें -धर्म, समाज, राजनीति, उत्पादन के साधन और उन पर अधिकार का संघर्ष इस मानवीय भूख को ही नियंत्रित करने के माध्यम हैं।


इस उपन्यास का एक बहुत ही दर्दनाक मानवीय संदर्भ है भूख। भूख से होने वाली मौत और उसके साथ खेलने वाले धर्म और राजनीति के चरित्र को परत दर परत खोलता है यह उपन्यास। आजादी के साठ वर्ष बाद भी सरगुजा जैसे क्षेत्र -‘‘लोकतंत्र के सबसे सस्ते सामंतीय संस्करण हैं।’’2 '

यह लोकतंत्र का सबसे सस्ता सामंतीय संस्करण दरअसल पूरा देश ही है। जिस देश में आय और जीवन के साधनों का इतना असमान वितरण हो कि लोग भूख से मरें और कर्ज के कारण आत्महत्या करें, वह सामंतीय जीवन मूल्यों से भी गयाबीता संस्करण ही माना जायेगा। आदित्य समाचार पत्र में दो खबरें पढ़ता है कि सरगुजा के एक गाँव बीजाकुरा में एक आदिवासी औरत और उसके दो बच्चों की मौत भूख से हो गई। और दूसरा एक सत्तर साल के बूढ़े व्यक्ति को उसकी इच्छा के खिलाफ अंबिकापुर के जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया। बताया गया कि वह बूढ़ा मरने वाली औरत का श्वसुर था और उसका लड़का भी कुछ दिन पहले भूख से मर चुका था।’’3 

इस खबर पर लेखक की टिप्पणी है -‘‘खबर के दोनों चेहरे मेरे सामने थे। साथ-साथ। भूख का क्या कोई एक आकार होता है? मैं नहीं जानता था। मैंने भूख को कभी नहीं देखा था। भूख के बारे में सुना जरूर था, लेकिन वह भी इतना नहीं कि उसकी आवाज को अपनी अतंड़ियों तक महसूस कर सकूँ।
दरअसल, सच बात तो यह थी कि अपने जिस्म के बारे में सोचते हुए कभी शरीर की अंतड़ियों के बारे में नहीं सोचा था। मुझे लगता था कि अपनी देह के प्रति बहुत सतर्क लोग भी संभवतः इस बारे में कुछ नहीं सोचा करते।’’4 

एक तरफ भूख से मर चुका पूरा परिवार और दूसरी तरफ भूख के बारे में अनजान लोग। यह देश के विकास का गहरा अन्तर्विरोध है। भूख का कोई एक आकार होता है? यह सोचना भी मुश्किल है देश के मध्य और उच्च वर्ग के लिए। यहाँ एक ओर तो भूख महसूस ही नहीं होती लोग स्वाद और स्वास्थ्य के लिए तरह तरह के विटामिन और प्रोटीन वाले व्यंजन करते हैं और दूसरी ओर बिरई लकड़ा जैसे लोग हैं जो भूख से मर जाने के लिए तैयार हैं क्योंकि उसका पूरा परिवार भूख से मर चुका है मगर उसे जबरन अस्पताल में भर्ती करा दिया जाता है। इस पर डॉक्टर की टिप्पणी है कि उसकी किस्मत में राज योग लिखा था। यह शब्द सुनकर वह बिरई लकड़ा भी मर गया। इस मौत का व्यंग्य देखिए कि वह भूख के कारण मरना चाहता था पर उसे मरने नहीं दिया गया और अस्पताल में भर्ती करवादिया ताकि राज्य के लोककल्याणकारी चरित्र को प्रचारित किया जा सके और अखबार में यह समाचार परिवार के अन्य सदस्यों की मृत्यु के समाचार को ढंक ले। मगर असल व्यंग्य यहाँ है लेखक टिप्पणी करता है -

‘‘बहरहाल तुम्हें पता है न कि आज सुबह बिरई लकड़ा भी मर गया। हो सकता है कि वह भूख से न मरा हो, अस्पताल में किसी डॉक्टर के मूँह से ‘राजयोग’ शब्द सुनकर ही मर गया हो, यू नो, इफ यू आर पूअर, इट्स पार्ट ऑफ गेम फार देम।’’

वर्तमान पूँजीवादी लूट(लोक)तंत्र में भूख के प्रति हम और हमारी सरकार कितनी संवेदनशील है? सत्ता को पूँजीपतियों के मुनाफे की चिंता सर्वाधिक होती है। बजट के भीतरी तर्क जो आम जनता नहीं जानती उसमें आम जनता की रोज मर्रा के जीवन के लिए आवश्यक वस्तुओं पर से सब्सिडी कम करने के लिए मीडिया और नेता जितने तर्क विकास और ग्रोथ के रखते हैं, इन्हीं विकास और ग्रोथ के तर्क के आधार पर पूँजीपतियों को इन्सेटिव के नाम पर हजारों करोड़ की छूट दी जाती है ताकि देश की विकास दर कम न होने पाये। इस विकास दर का सबसे ज्यादा लाभ किसको मिलता है? पूँजीपतियों का मुनाफा हजारों करोड़ रुपयों में बढ़ता है और एक आम आदमी के जीवन के लिए गरीबी रेखा को महज 27 रुपये प्रतिदिन तक ले आया जाता है और मंहगाई बढ़ने के लिए तर्क दिया जाता है कि मध्यवर्ग और निम्नवर्ग की आय में वृद्धि होने से वह अधिक खाने लगा है इसलिए खाद्य वस्तुओं की कीमतें बढ़ रही हैं। इस व्यवस्था में भूख का कोई सवाल ही नहीं है। भूख से मरने वालों को सत्ता के नुमाइंदे आई.ए.एस अफसर किस दिशा में टर्न कर देते हैं इसका हवाला देखिए -






‘‘कुछ समाचार पत्रों में प्रकाशित, बीजाकुरा गांव में भूख से मृत्यु संबंधी समाचारों की विस्तृत जाँच की गई है। जांच से पता चला है कि इन क्षेत्रों में रहने वाले कई आदिवासी परंपरागत रूप से बंदरों और बिल्लयों का शिकार करते हैं और उनका मांस खाते हैं। बीजाकुरा में किसी भी व्यक्ति की मृत्यु भूख के कारण नहीं हुई है। तथा जिले के किसी भी क्षेत्र में ग्रामीणों के पलायन का समाचार जांच के बाद सही नहीं पाया गया है।’’6

यह खंडन सरगुजा के कलेक्टर का है। अमानवीय होती जा रही व्यवस्था के सबसे खतरनाक नुमाइंदे से और क्या अपेक्षा की जा सकती है कि वह अपना बयान उन मरने वाले आदिवासियों के पक्ष में देगा? क्या वे आदिवासी उसे कलेक्टरी की नौकरशाही के ठाटवाट प्रदान करते हैं। इस नौकरशाही की प्रतिबद्धता किसके प्रति है? जनता के प्रति या सत्तासीन नेताओं और पूँजीपतियों के प्रति? यह सवाल कोई मीडिया नहीं पूछता इन नौकरशाहों से की जांच का आधार क्या था? किसको जांच का अधिकार दिया गया? तुम जैसे किसी अन्य नौकरशाह ने ही तो जांच की होगी? वह क्यों अपने सुखों पर लात मारेगा? यदि वह यह रिपोर्ट दे देगा कि बिरई लकड़ा का परिवार कई दिनों से भूखा था और चावल का एक दाना भी उनके पेट में नहीं गया था तो आप नौकरशाहों को नैतिक रूप से और जनता के द्वारा जबरन आपके इस पद से हटा नहीं दिया जायेगा। इस देश में भूख से मौत तो लाखों होती हैं पर सरकारी आंकड़ों में शायद ही कोई भूख से मरता हो। नैतिक अधोपतन की अजीब दास्तां है हमारा लोकतंत्र। हम अपनी जिम्मेदारी निभाते तो हैं ही नहीं उसके प्रति जबावदेही को भी स्वीकार नहीं कर पाते निरंतर मरते मानवीय संदर्भों की कीमत पर भी।

रोज सत्ता और अधिकार का सुख भोगने वाले नौकरशाह, नेता और मीडिया जिसने भूख की जहालत और पीड़ा न देखी हो और न कभी उसका अनुभव किया हो वह यह स्वीकार कर ही नहीं सकता कि भूख से कोई मर सकता है - ‘‘भूख से कोई व्यक्ति मर सकता है, यह कल्पना दुनिया की भयानक कल्पना थी। जैसे हजारों सुईयाँ एक साथ किसी आदमी के शरीर में नोंच दी गईं हों या फिर किसी व्यक्ति का मुँह खुला हो और एकाएक उसके मुंह से उसकी जीभ गायब हो जाये।’’7 

सत्ता और वर्चस्व के हर घटक या संस्था भूख की तिजारत करती है। धर्म के नाम पर लोग भूख का मजाक उड़ाते हैं, उन्हें रोटी देकर, सत्ता उनके नाम पर सस्ते अनाज, की बिक्री करने का ढोंग करती है, बैंक कर्ज देकर उनकी रही सही जमीन और उत्पादन के साधनों को भी हड़प लेती है। स्थानीय जमींदार और प्रभावशाली वर्ग उनकी भूख के नाम पर बोट बटोरते हैं, कंट्रोल के राशन का स्टॉक उठाते हैं, एन.जी.ओ विदेशों से धन आयात करते हैं, पर भूख वहीं की वहीं बनी रहती है और भूख से मरने वालों की संख्या में निरंतर इजाफा होता जाता है। यह क्रूर मजाक है भूख और भूख से मरनेवालों के प्रति। यह मजाक हमस ब निरंतर करते हैं उनके साथ। देश में ही नहीं दुनिया में यदि कहीं भी कोई भूख से मृत्य होती है तो यह हम सबको चुल्लभर पानी में डूबकर मरने की बात है। लानत है हमारे विकास के मानकों पर और विकास दर के बढ़ने की प्रक्रिया की वकालत करने वालों की इंसानियत पर।

भूख का यह मानवीय संदर्भ इस उपन्यास के कथानक में अनुस्यूत है। भूख से मरना क्या होता है? इसका बहुत ही जीवंत चित्रण इसमें किया गया है। भूख के चारों ओर कथानक बुना गया है। धर्म, राजनीति, प्रशासन, समाजसेवा, धर्मांतरण इत्यादि सभी इस भूख के मखौल उड़ाते हैं। इस भूख पर राजनीति और धर्मनीति चलाते हैं। भूख का कोई आकार या मजहब नहीं होता, भूख की कोई नीति या समाज नहीं होता। भूख तो भूख है वह किसी भी आकार में इंसान के जीवन का अवसान कर सकती है।

ईसाई मिश्नरीज भारत के आदिवासियों को जहालत और भुखमरी की जिंदगी से बाहर निकालने का मुखौटा ओढ़कर कार्य करते हैं। यह मुखौटा भी राजनीति का ही एक रूप है। वे रोटी के बदले उनकी स्वतंत्रता और आत्मनिर्णय कर अधिकार छीन लेते हैं। प्रभु ईशु की प्रार्थना की बेगार कराते हैं। रोटी के बदले आदमी की अस्मिता का सौदा करना भी एक तरह की क्रूरता है। चर्च और मिशनरीज यही करते हैं। इसका मानवीय संदर्भ भी इस उपन्यास में शिद्दत से उठाया गया है।

‘‘वे हमें जीवन भर धूल का कीड़ा ही समझें, ही हैज टू रीकेग्नाईज़ अवर न्यू स्टेट्स’’, उसने कहा, ‘‘हम लोग जब पढ़ लिख गये हैं, प्रार्थना का काम करते हैं, पूरी चर्च सम्हालते हैं, तो वे बार-बार हमारी बेगार के दिनों की जुगाली क्यों करते हैं।’’8 

यह जेम्स खाखा की सोच है कि वे मानव सेवा की बात करते हैं तो फिर हमें अपनी पहचान और आजादी क्यों नहीं देते। रोटी दी है, जहालत की जिंदगी से बाहर निकाला है, पर दूसरी ओर एक नई जहालत और मानवीय गरिमा से रहित जिंदगी को क्यांे हम पर थोपा जा रहा है। वह कहता है कि -‘‘ माँ कहती है कि चूँकि चर्च ने तुम्हारे पिता और दादा को रोटी दी थी, काम दिया था और राजा की बेगार से मुक्ति दिलाई थी, इसलिए तुम्हें अपना पूरा जीवन चर्च की सेवा में बिताना है। क्या यह एक तरह का बंधुआ विचार नहीं है,’’ उसने मुझसे पूछा।’’9 एक चरित्र है लुइसा टोप्पो उसके पिता है माईकल टोप्पो। जब आदित्य उस लड़की से पूछता है कि तुम्हारे पिता क्या करते हैं तो वह कहती है ‘‘वे यीशू के मंदिर में प्रार्थना की बेगार करते हैं।’’10 

प्रार्थना की बेगार हो या राजनैतिक बेगार या बंधुआ मजदूरी या दास प्रथा। इस मानवीय संदर्भ में सब मानवीय गौरव और गरिमा के पतन और अवमानना की कहानी लिखते हैं। मानवीय जीवन स्वतंत्रता और गरिमापूर्ण अस्तित्व का भूखा होता है। उसे भूख से मरना मंजूर है पर भीख चाहे वह राजैनतिक हो या धार्मिक मंजुर नहीं होती। यही कारण था कि बिरई लकड़ा अस्पताल नहीं जाता चाहता था। राजयोग की भीेख की अपेक्षा भूख से मर जाना उसे स्वीकार था।

भूख से मरनेवालों के नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में दर्ज नहीं होते। कौन कितने दिन तक भूख को सहन कर सका। इसका कोई रिकार्ड दर्ज नहीं है किसी भी इतिहास या धर्म या राजनीति की किताब मैं। क्योंकि इसे किसी प्रतिष्ठित व्यक्ति या धनी व्यवसायी ने नहीं बनाया आज तक। गुमनाम लोगों की सहनशक्ति का कोई इतिहास नहीं होता।

‘‘एक आदमी भूखा है और भूख की वजह से बीमार है। भूख एक, भूख दो, भूख तीन, भूख चार, भूख पांच और भूख छह। उसने भूख छह तक का रिकार्ड बनाया है। एक ऐसा रिकार्ड जिसे दस्तावेजों में दर्ज करने वाला कोई नहीं है। कोई गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड नहीं, कोई लिम्का नहीं, कोई थम्स अप नहीं। इस तरह वह जब भूख छह तक पहुंच जाता है तो उसे लगता है कि बस अब इसके बाद और कुछ नहीं।’’11 

इस भूख का कोई मान नहीं और कोई सम्मान नहीं। भूख भी जहालत भरी हुई और उसकी मौत भी अनपहचानी ही रह जाती है। भूख से मरते आदमी को कोई ओझा, कोई डॉक्टर या दवाईया फिर ईश्वर नहीं बचा सकता उसे सिर्फ अनाज के दाने बचा सकते हैं, जो उसके पास नहीं है। दुनिया की तमाम चिकित्सा सुविधायें यहाँ लाचार हैं, बेमानी हैं, तमाम देवता नकारा और अस्तित्हीन हो जाते हैं, क्योंकि -‘‘इस आदमी को देवता नहीं चावल बचा सकते हैं।’’12

इस आदमी की मौत भूख छह के बाद की गिनती सहन न कर सकने के कारण हुई है। इसकी मौत का कारण उसकी भूख नहीं, प्रशासन की नजरों में सड़ा मांस खाना और धर्म की नजरों में दुष्टात्मा होना है। यह उसकी मौत और भूख का घोर अपमान है ‘‘यह आदमी जो अभी-अभी मरा गया, दुष्टात्मा था, इसने जीवन में घोर पाप किया था। वह घोर पाप क्या था, यह मैं तुम लोगों को अभी नहीं बता सकता क्योंकि धरमेस ने इसके लिए मना किया है।’’13 

भूख और हिंसा का संबंध बहुत गहरा है। मृत्यु दोनों ही स्थितियों में सच है। भूख से मरना एक अलग बात है, इससे हमारी राजनीति और धर्म नीति को कोई फर्क नहीं पढ़ता क्योंकि वह भाग्यवादी है कम से कम इस मामल में तो कि भूख से मरना मरने वालों की नियति थी। पर भूख से मरने वालों को रोटी दे दी जाये तो वे हिंसा से मरते हैं या जहालत से मरते हैं। जीते जी मरना या मर-मर कर जीना दोनों ही हिंसा की श्रेणी में आते हैं। जो लोग सत्ता से बाहर हैं, सत्ता का लाभ उठानें की हिंसा उनके अंदर नहीं है, उन सीधे-साधे आदिवासियों को हिंसा का शिकार तो होना ही पढ़ता है। सिस्टर अनास्तसिया कहती है कि -‘‘देखो पहले हम भूख का शिकार होते थे और जब चर्च ने हमें भोजन देना शुरू किया है तो हमें हिंसा का शिकार होना पड़ रहा है।’’14 

काला पादरी उपन्यास में कई मानवीय संवदेनात्मक संदर्भों को उठाया गया है। मैंने अपना ध्यान सिर्फ भूख के मानवीय संदर्भ पर केन्द्रित किया है। भूख का संदर्भ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाया जाना चाहिए। कई रिपोर्ट यह बताती हैं कि आज भी दुनिया में लगभग साठ करोड़ लोग हैं जो भुखमरी का शिकार हैं। यह भुखमरी खाद्य पदार्थों के कमी के कारण हो ऐसा नहीं है। विभिन्न तकनीक और साधनों ने मानव जनसंख्या के अनुपात से कहीं बहुत ज्यादा खाद्य पदार्थ पैदा किया है, पर व्यक्तिगत लाभ और मुनाफे की व्यवस्था ने इस तरह के अंतविर्रोध पैदा कर दिए है कि एक ओर हजारों टन अनाज सड़ जाता है, दूसरी तरफ लोग भूख से मरते हैं, या कर्ज के कारण आत्महत्यायें करते हैं। रोटी के संघर्ष में हत्यायें होती हैं और मानवीय जीवन आतंक और संत्रास का शिकार होता रहता है। भूख प्राणी जगत का सबसे भयानक सच है। इस सच को संतुलित और समादृत किया जाना चाहिए। राजव्यवस्थाओं का सबसे पहला और महत्वपूर्ण मुद्दा भूख के प्रति होना चाहिए। भूख से मरने की नौबत जिस किसी भी स्थिति में आये उसकी जिम्मेदारी तत्काल निश्चित होनी चाहिए और इसके लिए एक स्वायत्त तंत्र की स्थापना की जाये जिसमें राजनीति और प्रशासन का दखल न हो। जिला अधिकारी को सबसे पहले तत्काल प्रभाव से निलंबित किया जाना चाहिए। यह सिर्फ मृत्यु का सवाल नहीं है। यह उत्तरदायित्वहीनता के द्वारा की गई हत्या की श्रेणी में आना चाहिए।

हमारे विकास के तमाम कंगूरे को धराशायी कर देना चाहिए यदि हम भूख से मरने की स्थिति को नियंत्रित नहीं कर पा रहे हैं तो। देश की जनता को तमाम सत्ता प्रतिष्ठानों को इस बात के लिए जिम्मेदार ठहराने और उन्हें सत्ताच्यूत करने की बीड़ा उठाना चाहिए। मीडिया को कम से कम इस मुद्दे पर लाभ और टीआरपी बढ़ाने की चिंता न करते हुए एक मुहिम छेड़ना चाहिए कि यह स्थिति क्यों बनी। इस मानवीय दायित्व का वहन हर एक भरे पेट को उठाना ही चाहिए। जिससे मानवता पर कलंक का काला धब्बा न लगे।

डॉ संजीव जैन 


डॉ संजीव जैन 


संदर्भ -
काला पादरी, तेजिन्दर, नेशनल पेपरबैक्स दिल्ली, पृष्ठ संख्या 15-16 
वही पृ. 16 
वही पृ. 20-21
वही पृ. 21
वही पृ. 27
वही पृ. 21
वही पृ. 21-22 
वही पृ. 46 
वही पृ. 47
10. वही पृ. 53
11. वही पृ. 71 
12. वही पृ. 73
वही पृ. 73
वही पृ. 103




डॉ. संजीव कुमार जैन
सहायक प्राध्यापक हिन्दी
शासकीय संजय गाँधी स्मृति स्नात्कोत्तर महाविद्यालय,
गुलाबगंज 
522 आधारशिला, बरखेड़ा
भोपाल, म.प्र.
मो. 09826458553

Tuesday, July 3, 2018

उपन्यासनामा 

पितृसत्तात्मक व्यवस्था और पचपन खंभे लाल दीवारें 
उषा प्रियंवदा 


उषा प्रियंवदा 


आधुनिकताबोध की सशक्त हस्ताक्षर के रूप में उषा प्रियंवदा के उपन्यासों को देखा जा सकता है। उषा जी ने नगरीयकरण, जो की आधुनिकता का पहला लक्षण है, को अपनी रचनात्मकता का क्षेत्र चुना। उनके उपन्यासों की विषय वस्तु भारत के महानगरों से लेकर अमेरिका के नगरों तक फैली हुई है। उनके उपन्यास हैं - ‘पचपन खंभे लाल दीवारें’, ‘रुकोगी नहीं राधिका’, ‘शेषयात्रा’, ‘अंतर्वंशी’, ‘भया कबीर उदास’ और ‘नदी’।

आपने मध्यवर्गीय जीवन की विषमताओं, विडंबनाओं, विद्रूपताओं को अपने उपन्यासों की अन्तर्वस्तु के रूप में चुना है। उनके सभी उपन्यास नायिका प्रधान हैं। ‘स्त्री’ आधुनिकताबोध और परंपरागत पितृसत्तात्मकता के बीच विद्रूपताओं और विडंबनाओं को जीती रहती है। आपने उपन्यासों में स्त्री-पुरुष के संबंधों के बीच आयी टूटन को, विखराव को बारीकी से देखा और अभिव्यक्त किया है। आपके नारी पात्र आधुनिक जीवन की छटपटाहट, ऊब, संत्रास, अजनबीपन, अकेलापन, बिडंबनाबोध इत्यादि स्थितियों का गहराई से अनुभव करते हैं। उषा जी जीवन को संपूर्णता में देखती और लिखती रहीं हैं। पुरुष के प्रति कोई दुराग्रह उनके लेखन में नहीं है।


पचपन खंभे लाल दीवारें  

कहा जाता है उषा जी के इस उपन्यास का शीर्षक उनके कालेज के वास्तुकला पर आधारित है। दिल्ली के जिस कालेज में वे जाब करतीं थीं उसके कारीडोर में पचपन खंभे हैं और उसकी दीवारें लाल हुआ करतीं थीं उस वक्त। उपन्यास का शीर्षक अपने परिवेश और उसके प्रति लेखिका के बोध को प्रतिध्वनित कर रहा है। आइये इसकी रचनात्मक संवेदना और भावबोध पर कुछ बात करें।

सबसे पहले उपन्यास पर कुछ बात-चीत और बाद में इसकी नायिका सुषमा के संदर्भ में पचपन खंभों के बीच घुटती जिंदगी की कहानी पर बात करेंगे।

उषा प्रियंवदा का यह उपन्यास मध्यवर्गीय परिवार के बीच कामकाजी स्त्री के जीवन की बिडंबना और विसंगतियों को रेखांकित करता है। स्त्री की मुक्ति का आख्यान रचने का भ्रम देने वाली आधुनिक पूँजीवादी व्यवस्था ने परंपरागत पारिवारिक ढाँचे को तोड़े बिना स्त्री को घर से बाहर जाने की आजादी का अवसर देकर उसके शोषण, उत्पीड़न और उसके साथ होने वाले अन्याय के नए आयामों को ही रचा है। आधुनिक हिन्दी में महिला लेखन का स्वर स्त्री पराधीनता की इन्हीं तकनीकों को बदलने के संघर्ष के रूप में पाया जा सकता है। उषा प्रियंवदा का उपन्यास ‘पचपन खंभे लाल दीवारें’ स्त्री के इसी संघर्ष और अन्तर्द्वंद्व की कथा है।

 यह उपन्यास विवाह और यौनिकता के आपसी संबंध को तार-तार करके रख देता है। इसमें सुषमा के माध्यम से जीवन को विवाह और आधुनिकता के मूल्य के बीच उपजेे द्वंद्व को उभारा गया है। स्त्री के जीवन की परंपरागत मर्यादाओं और भूमिकाओं को बदलते आर्थिक संबंधों के बीच चित्रित करने का प्रयास भी इसमें है। बिडंबना और द्वंद्व के बीच का अन्तर्द्वंद्व भी इसमें अभिव्यक्त होता हुआ दिखाई देता है। इसमें आधुनिकता के कारण परिवार के विखरने और टूटने की कगार पर पहुँचने के कारणों को भी रेखांकित किया गया है।

‘‘उषा प्रियंवदा का उपन्यास ‘पचपन खंभे लाल दीवारें’ एक ऐसी सुशिक्षित और आत्मनिर्भर स्त्री की मर्म कथा है जो पारिवारिक और आर्थिक कारणों से विवाह नहीं कर पाती और अंततः अविवाहित रहने का ही निर्णय लेती है। लेकिन सारी सीमाओं (को तोड़ने) के बावजूद व्यक्तिगत स्तर पर (चोरी-छिपे) ‘प्रेम’ भी करती है और देह-संबंध भी बनाती है। कहना मुश्किल है कि जान-बूझ और सोच-समझकर ऐसा करती है या किन्हीं दुर्बल क्षणों में। मगर विश्वास से कहा जा सकता है कि देह संबंधों को लेकर न तो उसे कोई अपराध-बोध है और न वैध-अवैध का अंतर्द्वंद्व। वह न मातृत्व में सार्थकता तलाशती है और न ‘संपूर्ण स्त्री’ होने का स्वप्न-दुस्वप्न पालती है। हाँ उसके व्यवहार के अंतर्विरोध और विसंगतियों का कारण समय, समाज और भौतिक स्थितियाँ ही हैं।’’1





इस उपन्यास का कथानक सुषमा के व्यक्तिगत जीवन और उसके द्वारा परिवार के दायित्वों को सम्हालने के बीच के द्वंद्व की रेखाओं से रचा गया है। एक और सुषमा दिल्ली के कॉलेज में प्रोफेसर है और जल्द ही वह गर्ल्स हॉस्टल की बार्डन भी बन जाती है। इसके बाद उसका सम्पर्क उसकी मौसी के रिश्तेदार नील से होता है। नील उम्र में उससे छोटा है, पर वह सुषमा की सुगठित देह और प्रौढ़ मानसिकता से आकर्षित होता है। उसका सुषमा से मिलना-जुलना बढ़ता जाता है। हॉस्टल में उसका यह संबंध चर्चा का विषय बन जाता है। उनका मेल-जोल प्रेम में बदल जाता है और अन्ततः उनका प्रेम भौतिक संबंधों में बदल जाता है। सुषमा स्वयं को नील के आगे समर्पित कर देती है। इस दैहिक समर्पण के प्रति उसके अन्दर कोई अपराधबोध नहीं है।

‘‘नील के साथ देह संबंधों को लेकर सुषमा के चेतन-अवचेतन में किसी प्रकार का कोई अपराध बोध नहीं है। नील से संबंध सुषमा का व्यक्तिगत निर्णय है और यह निर्णय वास्तव में उसका मूक विद्रोह भी है और यौन-नैतिकता के आदेशों-उपदेशों की अवज्ञा भी। यह उसके मानसिक विकास का मुक्त रूप भी हो सकता है और बदलते समय में टूटती यौन वर्जनाओं का परिणाम भी। गर्भ निरोधक गोलियों या उपकरणों ने भी यौन-वर्जनाएँ तोड़ने में निश्चय ही एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।’’2

‘पचपन खंभे लाल दीवारें’ कामकाजी, अविवाहित स्त्री के सामाजिक परिवेश और व्यक्तिगत आकांक्षाओं के बीच जटिल अंतर्संबंधों की मनोवैज्ञानिक स्तर पर सूक्ष्म जाँच पड़ताल और सामाजिक स्तर पर बेहतर विकल्प की खोज में संघर्षरत पहली महत्वपूर्ण अभिव्यक्ति है। विवाह संस्था की अनिवार्यता पर प्रश्न चिह्न लगाती नायिका का दृष्टिकोण न नितांत व्यक्तिवादी है और न ही पूर्ण रूप से परंपरावादी। इसलिए उसे हर बार व्यक्ति और समाज के बीच की संधि रेखा पर खड़े होकर सोचना और समझना पड़ता है। सबकी (समेत अपने) स्थितियों, क्षमताओं, अपेक्षाओं और सीमाओं को संवेदना और समग्रता में देखती-समझती नायिका को ‘पलायनवादी’ या ‘आत्मपीड़न’ की शिकार कहना उचित नहीं।

 सुषमा का कहना कि ‘‘पैंतालीस साल की आयु में मैं एक कुत्ता या बिल्ली पाल लूँगी-उसे सीने से लगाकर रखूँगी’’ या ‘‘और कुछ समय बाद यदि तुम मेरे लिए कोई धनी व्यवसायी जुटा सको, तो मैं शादी भी कर लूँगी’’, दरअसल क्षणिक आवेश, तनाव, हताशा, निराशा और असुरक्षा से हैरान-परेशान व्यक्ति की खीज, झुँझलाहट या छटपटाहट ही है।’’3

एक ओर सुषमा नील के साथ जिन्दगी की सार्थकता को पाने का प्रयास करती है तो दूसरी और उसे अपने पारिवारिक दायित्वों का बोध भी है। उसके पिता की पेंशन से घर का खर्च नहीं चलता। सुषमा के वेतन से ही घर का खर्च चलता है। छोटी बहनों को पढ़ाना है, भाई को पढ़ाना है उनकी शादी के लिए दहेज एकत्र करना है। उसकी माँ सुषमा से यही अपेक्षा करती है कि वह विवाह न करे और उसके पति की जिम्मेदारियों को निभाती रहे। यदि उसका विवाह हो जायेगा तो घर कैसे चलेगा? इस दबाव को सुषमा भी महसूस करती है और वह नील को भी यह बताती है। यद्यपि नील यह कहता है कि तुम्हारे परिवार वाले तुम्हारा बेजा फायदा उठा रहे हैं। तुम्हारे भाई-बहन तुम्हारी जिम्मेदारी नहीं हैं। पर सुषमा जानती है कि उसके भाई-बहन उसकी ही जिम्मेदारी हैं। यही द्वंद्व उसे नील से विवाह नहीं करने देता और अन्ततः वह अपने हॉस्टल के पचपन खंभों और लाल दीवारों में कैद होकर रह जाती है।

‘‘उपन्यास की नायिका सुषमा (उम्र 33 साल) शादी के सवाल पर अपनी एक सहेली से कहती है ....आप भी क्या यही मानती हैं कि विवाह होना चाहिए? मेरे पास तो सभी कुछ है, आर्थिक रूप से स्वतंत्र हूँ, जो चाहूँ, कर सकने में समर्थ हूँ। लेकिन विवाह न होने (हो पाने) की स्थितियों पर सोचते-सोचते उसके अंदर न जाने कितना ‘कडुवापन’ भर जाता है। सुषमा का फैसला अपना कहाँ है? परिवार की आर्थिक परिस्थितियों के कारण उसका विवाह नहीं हो पाया या अन्य कारणों से मगर वह अकसर खिन्न हो उठती और उसे अपने माता-पिता ही दोषी प्रतीत होते। दरअसल सुषमा न आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो पाती और न ही ‘जो चाहे कर सकने’ में समर्थ। परिवार के दायित्व और व्यक्तिगत आकांक्षाओं के अंतर्विरोधों में छटपटाती कडुवाहट और कुंठाएँ ही तो कहती हैं, ‘मैं कुआंरी रह गई तो कौन सा आसमान फट पड़ा। आर्थिक रूप से स्वतंत्र सुषमा जो चाहे कर सकने में समर्थ होती या हो सकती, तो इतनी अकेली अपने दुख, अपमान और लज्जा की गहराइयों में भटकती आर्तचीत्कार करती हुई दिखाई न पड़ती।’’

‘‘परिवार के लिए कमाऊ बेटी होने की वजह से उसके माता-पिता ने कभी ‘यह चाहा ही नहीं कि सुषमा की शादी हो, उनके अंतर्मन में यह बात अवश्य होगी की सुषमा से उन्हें सहारा मिलेगा। ‘दरअसल उसकी शादी करने से उनकी सारी आर्थिक व्यवस्था गड़बड़ हो जाती। भारतीय समाज में आज हजारों-हजार ऐसी सुषमाएँ हैं जो आजीवन कुँआरी रहने को विवश हैं। विवाह योग्य उम्र में आर्थिक समस्याओं और दहेज की माँग के कारण योग्य वर नहीं मिलता और अधिकांश एक उम्र के बाद स्वयं कुंठाओं, मानसिक असंतुलन और हीन भावना की शिकार हो जाती है। विवाह संस्था से बाहर हर संबंध को अनैतिक और प्रेम को रंगरेलियाँ कहकर कीचड़ उछालने वालों की कोई कमी नहीं। हर विकल्प ऐसी बंद गली है, जिससे निकलने की कोई राह नहीं। कहने को सही है कि किसी के ‘व्यक्तिगत जीवन में किसी को दखल देने का क्या हक है? लेकिन सामाजिक व्यवहार में इस सिद्धांत की धज्जियाँ उड़ाते हुए हम सब प्रायः रोज ही देखते हैं। कोई सुषमा ‘एक पुरुष मित्र बनाकर तो देखे’ कि परिवार, रिश्तेदार, सहेलियाँ, सहकर्मी, छात्राएँ और अन्य लोग क्या क्या आरोप नहीं लगाते! इसके बाद आत्मग्लानि, अपराध-बोध, मानसिक विक्षिप्तता और जटिल मनोग्रंथियाँ अकसर आत्मपीड़न से लेकर आत्महत्या तक ही ले जाती हैं, या फिर पलायन और स्थितियों से समझौता और संपूर्ण समपर्ण करवा देती है।’’5

सुषमा के बीच से गुजरते हुए पचपन खंभे लाल दीवारें  
को समझने के दौरान हम पाते हैं कि मनुवादी पितृसत्तात्मक व्यवस्था में स्त्री होने की सार्थकता विवाह और ‘पुत्र की माँ’ बनने में ही है। ‘विवाह’ स्त्री की यौनिकता को नियंत्रित करने की कारगर तकनीक थी जो हजारों वर्षों से सफल रही है। मातृत्व (वैध) को महिमामंडित और स्त्री की चरम सार्थकता में तब्दील करना भी पितृसत्ता द्वारा स्त्री को घर की चाहरदीवारी में कैद रखने के औचित्य साधन की सफल तकनीक रही है। आज का पूरा स्त्री विमर्श मूलतः इन्हीं दो बिन्दुओं से संघर्ष, मुक्ति और नए विकल्प तलाशने की प्रक्रिया के रूप में ही प्रस्तुत होता है। इसके साथ जो मूल एजेंड़ा था वह परिवार और संपत्ति वैध उत्तराधिकारी को हस्तांतरित किये जाने की निरंतरता को बनाए रखना।

‘‘उषा प्रियंवदा के अगले चर्चित उपन्यास ‘पचपन खंभे लाल दीवारें’’ की नायिका भी मूलतः राधिका की चेतना को ही अधिक परिपक्व और व्यावहारिक धरातल पर प्रकट करती है। साथ ही, यह पात्र राधिका से अधिक प्रतिनिधि भारतीय मध्यवर्गीय स्त्री चरित्र है।’’6

आधुनिक हिन्दी में महिला लेखन का स्वर स्त्री पराधीनता की इन्हीं तकनीकों को बदलने के संघर्ष के रूप में पाया जा सकता है। उषा प्रियंवदा का उपन्यास ‘पचपन खंभे लाल दीवारें’ स्त्री के इसी संघर्ष और अन्तर्द्वंद्व की कथा है।

‘‘उपन्यास की नायिका सुषमा (उम्र 33 साल) शादी के सवाल पर अपनी एक सहेली से कहती है ‘‘....आप भी क्या यही मानती हैं कि विवाह होना चाहिए? मेरे पास तो सभी कुछ है, आर्थिक रूप से स्वतंत्र हूँ, जो चाहूँ, कर सकने में समर्थ हूँ।’’7

 सुषमा एक परंपरागत जकड़न में जकड़ी स्त्री है। उसमें मुक्ति की छटपटाहट है, पर वह विवश महसूस करती है। उसके पास आर्थिक ताकत है, वह कमाती है, घर का खर्च चलाती है, छोटे भाई बहनों को पढाने दिखाने के सारे दायित्व पूरा करती है, परन्तु उसमें इतना साहस नहीं है कि वह अपनी जकड़न को तोड़ सके। इस विवशता को दिखाकर उषा जी ने भारतीय स्त्री की मुक्ति के रास्तों की अड़चनों को, पितृसत्तात्मक सामाजिक परिवेश में अकेली स्त्री आर्थिक रूप से स्वतंत्र होकर भी पितृसत्ता की जकड़न से मुक्त नहीं हो पाती। दरअसल सुषमा की बिडंबना उस स्त्री की बिडंबना बन जाती है जो पढ़-लिख गई है, आधुनिक जीवन मूल्यों को जीना चाहती है, आर्थिक रूप से पर निर्भर नहीं है, परन्तु सामाजिक और पारिवारिक परिवेश उसके इस बदलाव को पचाने और स्वीकार करने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं है।





हमारे सामाजिक और पारिवारिक संरचनागत ढाँचे में इस तरह की पितृसत्तात्मक व्यवस्था के द्वारा दी गई भूमिकाओं से बहार जाती हुई स्त्री को स्वीकार किए जाने की क्षमता तब भी नहीं थी और अब भी नहीं है। सुषमा के जीवन की विवशता सामाजिक और पारिवारिक ढाँचे की विशेषता के कारण हैं। सुषमा की जीवन विसंगतियाँ और बिडंबनायें हमें यह बताती हैं कि हमारी व्यवस्था और परिवेश अभी आधुनिकता की अधकचरी अवस्था से गुजर रहा है। पितृसत्तात्मक व्यवस्था आधुनिकता को अपने अनुकूल बनाने के कार्यों में जुटी है। वह स्त्री को उतनी ही आजादी देना जानती है जितने में उसके स्वार्थ सधते रहें। स्त्री की वास्तविक मुक्ति इस व्यवस्था में संभव नहीं। उसे जो भी जितनी भी आजादी मिलेगी वह पितृसत्ता की सीमाओं के दायरे में ही रहेगी और यही कारण है कि घर से बाहर निकलने का अर्थ घर की चाहर दीवारी से मुक्ति नहीं, बल्कि गले पड़ी रस्सी की लंबाई का बड़ जाना मात्र है। सुषमा इस बड़ी हुई लंबाई के कारण ही निरंतर स्वयं को बंधा हुआ महसूस करती है। यह मुक्ति का भ्रम मात्र है जिसे आधुनिकता के बहाने परोसा गया है।

‘‘सुषमा का बीच-बीच में यह कहना कि ’नील, अब तुम मझसे न मिला करो’’8
 सचमुच उस सामाजिक परिवेश का दबाव है, जिसमें उसे बार-बार यह समझाया-बताया गया है कि ‘‘कभी ऐसा कुछ न करना, जिससे किसी को कुछ कहने का अवसर मिले’’ या तुम्हारी बदनामी की वजह से परिवार की नाक कट जाए।’’ सहकर्मियों और छात्राओं द्वारा छींटाकशी से ही सुषमा को ‘चक्कर’ आने लगते हैं।’’9 

यहाँ सुषमा को इन स्थितियों का सामना करना चाहिए था साहस और हिम्मत से, जो कि वह नहीं कर पाती। यह स्त्री की कमजोरी है, जिसका सामना करना स्त्री को आना चाहिए। स्त्री को इन स्थितियों का सामना करने की हिम्मत क्यों नहीं होती? क्योंकि वह जानती है कि इस मामले में वह अकेली ही खड़ी है, उसके साथ रहने वाली स्त्रियाँ भी उसका साथ नहीं देंगी। यह जो सामाजिक परिवेश की पितृसत्तात्मक अनुकूल मानसिकता है, वह स्त्री की इस अर्जित आजादी को भी पराधीनता में बदल देती है।

‘‘भावना और कर्तव्य के बीच झूलती सुषमा अंततः ‘अच्छी लड़की’ बनने या बने रहने की ही कोशिश करती रहती है। त्याग, तपस्या, बलिदान के धार्मिक-सामाजिक पाठ पढ़ते-सुनते खुद सुषमा को लगने लगता है कि नील के साथ प्रेम संबंध एक पागलपन था, एक मैडनेस। हालाँकि वह अकसर यह भी सोचती रहती है, ‘नील के बगैर मैं कुछ भी नहीं हूँ, केवल एक छाया, एक खोए हुए स्वर की प्रतिध्वनि; और अब ऐसी ही रहूँगी, मन की वीरानियों में भटकती हुई, क्योंकि वह मानसिक रूप से जैसे नील की दासी हो गई थी। नील की किसी बात के लिए निषेध करना उसके वश में न रहा।’’10

सुषमा एक मध्यवर्गीय परिवार की लड़की है, उसमें वे तमाम मूल्य और नैतिकतायें हैं जिन्हें समाज और परिवार उससे अपेक्षा करता है। नील के साथ उसका संबंध इसी नैतिक मर्यादा भावना के कारण ही टूट जाता है। कोई भी पौधा अपने परिवेश से अनुकूलित होकर ही अपना अस्तित्व बनाए रख सकता है। स्त्री की मुक्ति नामक यह पौधा भी तब ही पल्लवित और पुष्पित हो सकता है जब परिवेश उसके अनुकल परिवर्तित हो जाऐ। अन्यथा यह पौधा यूं ही दम तोड़ता रहेगा, जैसे सुषमा का जीवन।

सुषमा नील से प्रथम समर्पण के बाद यह कहती है कि वह ‘‘तैंतीस साल बाद भी अछूती और बेदाग तुम्हारी बाँहों में कैसे आई?’’11 
यह कहना स्वयं को कौमार्य के मिथक को स्वीकारने के कारण है।
‘‘नील के साथ प्रेम या देह संबंध उसकी अपनी देह (दुर्बलताओं या स्वतंत्रताओं) की मानवीय अभिव्यक्ति है, जिसके लिए उसे कोई अपराध बोध नहीं। हालाँकि नील देह पर विजय के बाद सुषमा के प्रति एकदम तटस्थ हो जाता है।’’

सुषमा मध्यवर्गीय स्त्री चरित्र है, वह परिवार और परिवेश के दबावों को झेलती है। चूँकि मध्यवर्गीय चेतना की विशेषता है कि वह खुलकर परंपरागत मूल्यों के प्रति विद्रोह नहीं कर पाती और न खुलकर आधुनिक मूल्यों को स्वीकार पाती है। सुषमा एक ऐसी ही मध्यवर्गीय लड़की है। जो पढ़-लिखकर नौकरी करने लगती है और यही उसके व्यक्तिगत जीवन की विडंबना बन जाती है। चूँकि हमारा समाज और पितृसत्तात्मक व्यवस्था इस तरह की पढ़ीलिखी और स्वतंत्र विचारों की लड़की को उसके स्वतंत्र व्यक्तित्व के साथ पचा नहीं पाती और उसे अपने अन्य हितों के लिए इस्तेमाल करने लगता है। जैसा कि सुषमा की माँ कहती है -

‘‘अम्मा ने बड़े मजे से उत्तर दिया, ‘‘तुम जानो कृष्णा, सुषमा की शादी तो अब हमारे बस की बात रही नहीं। इतना पढ़-लिख गई, अच्छी नौकरी है और अब तो, क्या कहने हैं, होस्टल में वार्डन भी बननेवाली हैं। बंगला और चपरासी अलग से मिलेगा, बताओ, इसके जोड़ का लड़का मिलना तो मुश्किल ही है। तुम्हारे जीजा तो कहते हैं कि लड़की स्यानी है, जिससे मन मिले, उसी से कर ले। हम खुशी-खुशी शादी में शामिल हो जायेंगें’’12 

सुषमा की माँ यह मानकर चल रही है कि अब उसकी शादी नहीं होगी। जब हो सकती थी तब उसे मनमर्जी से लड़का चुनने की आजादी नहीं थी। आजादी तो अब भी नहीं है, सिर्फ बहाना है अपनी जिम्मेदारी से मुँह मोड़ने का। अम्मा द्वारा दी गई आजादी का सच यह है -‘‘तुम एक पुरुष मित्र बनाकर तो देखो, तुम्हारी अम्माँ सबसे पहले तुम्हारी खबर लेंगी। हमारा समाज किसी को जीने नहीं देता।’’13

 बावजूद इसके सुषमा पुरुष मित्र बनाती है। नील से उसके संबंध बनते हैं, वे दोनों साथ-साथ उठने बैठने और घूमने लगे हैं। मन ही मन एक दूसरे से प्रेम करते हैं, परन्तु सुषमा को बार-बार लगता है कि नील का इस तरह उससे मिलना, रात-बिरात उसे छोड़ने आना, बाहर घूमने जाना, सामाजिक मर्यादाओं के खिलाफ लगता है। उसमें सामाजिक नैतिकता का द्वंद्व है - ‘‘वह बेफ्रिक तरूणी तो नहीं है। उसकी हर क्रिया को सूक्ष्म दृष्टि से देखा जाता है। बेकार में ऐसी बातों को क्यों जन्म दिया जाए।’’14

 उसे सामाजिक सीमाओं का ख्याल है, यही उसकी बिडंबना है कि वह प्रेम जैसे उन्मुक्त अनुभव को जीना चाहती है, पर मर्यादाओं के बंधन उसे ऐसा करने से रोकते हैं - ‘‘पर वह कितनी अदृश मर्यादाओं में बँधी है, यह वह नील को कैसे समझाये?’’15

 नील का साथ उसे अच्छा लगता है। नील उसे पसंद करता है यह एहसास उसे अन्दर से भर देता है। नील से मिलने के बाद उसे लगा कि उसने जीवन के बहुत कीमती वर्ष यूँ ही गंवा दिए। ‘‘जीवन की भाग दौड़ और आजीविका के प्रश्नों में चुपचाप विलीन हो गए वे वर्ष और अब तो उसके चारों ओर दीवारें खींच गईं थीं, दायित्व की, कुंठाओं की, अपने पद की गरिमा और परिवार की।’’16




 सुषमा आधुनिक जीवन को परंपरागत परिवेश में जीने की विवशताओं से तंग आ जाती है और उसे एक साथी की आवश्यकता महसूस होती है। उसे पति और प्रेमी के विशेषणों की आवश्यकता नहीं थी, पर जब वह परिवार के दायित्वों को निभाते हुए थकान महसूस करने लगती है तो उसे साथी की जरूरत लगने लगती है। ‘‘सुषमा को प्रेमी नहीं चाहिए था। उसे पति की आकांक्षा भी न थी, पर कभी-कभी उसका मन न जाने क्यों डूबने लगता। अपने परिवार का सारा बोझ अपने ऊपर लिए, सुषमा काँपने लगती। तब वह चाह उठती कि दो बाँहें उसे भी सहारा देने को हों, इस नीरवता में कुछ अस्फुट शब्द उसे भी सम्बोधन करें।’’17

यह चाहना बंधनों और सीमाओं से परे समानता के स्तर पर जीने वाले साथी की है। पति और प्रेमी अन्ततः पुरुष ही होते हैं और प्रेमी भी जब पति का पद पाता है तो वह निखालिस पुरुष बन जाता है और नहीं पाता तो भी उस पर हक मर्दीय अहं के साथ जताता है। वह उसे उसके द्वंद्व और सामाजिक बिडंबना के साथ स्वीकार नहीं करता। जैसा की नील के साथ होता है। नील के लिए सुषमा अन्ततः एक सुगठित देह ही है, जिससे खेलने का पूर्ण अधिकार वह पाना चाहता है और सुषमा की सामाजिक जिम्मेदारी को स्वीकार नहीं करना चाहता।
सुषमा जिस परंपरागत परिवेश के बीच रहती है उसमें उसे निरंतर इस बात का एहसास कराया जाता है कि ‘‘सामाजिक मापदंड़ों का जो उल्लंघन करता है, उसे दंडित होना ही पड़ता है, सुषमा! मुझे स्वाति से बिल्कुल भी सहानुभूति नहीं है।’’18

  मिसेज पुरी का यह कथन हमारे पितृसत्तात्मक समाज की विचारधारा का प्रतिनिधित्व करता है, जो सुषमा और स्वाति जैसी स्त्रियों को न जीने देता है और न मरने देता है। ‘‘जिसके चारों और द्वार बन्द हों वह क्या करे? उसी कारागार में रहता रहे, सीखंचों से आती धूप और मद्धिम प्रकाश के बल पर साँसे लेता रहे।’’19 

सुषमा नील को अपने जीवन संघर्ष के संबंध में बताते हुए कहती है, जो एक आम मध्यवर्गीय स्त्री के जीवन की सच्चाई भी है - ‘‘नील, पिछले ग्यारह सालों से मैं जिन्दगी से निरन्तर लड़ रही हूँ। सुषमा ने एक आह भरी, फिर सामने शून्य की ओर ताकते हुए कहा, ‘‘तुम्हें विस्तार में नहीं बताऊँगी, पर मैं यह तुम्हें जताना चाहती थी कि यह नौकरी मेरे लिए बहुत कीमती है। निर्धन मैं भले ही रही होऊँ, पर स्वाभिमानी भी बहुत रही। जीवन में कभी-कभी ऐसे अवसर भी आए, जबकि मैं अपने शरीर के मोल से धन और आराम पा सकती थी। पर वह मैंने स्वीकार नहीं किया। एम. ए. करने के बाद मैंने एक प्राइवेट कॉलेज में नौकरी की। वहाँ के सेक्रेटरी नगर के पुराने रईसों में थे। उन्होंने किस वस्तु का प्रलोभन नहीं दिया मुझे, पर मैंने वह नौकरी छोड़ दी।’’

‘‘जब मैंने माँ को बताया कि मैंने नौकरी से इस्तीफा दे दिया है तो उन्होंने पूछा, ‘और इन बच्चों का क्या होगा? पिताजी साल भर से बीमार थे और बिना वेतन के छुट्टि पर थे। मुझे उस नौकरी की सख्त आवश्यकता थी। पर वह मोल चुकाना मुझे सह्य न था।’’20

 सुषमा का यह बयान दरअसल आत्मद्वंद्व की स्थिति है, नैतिकता और दायित्वबोध की सीमाओं का पता चलता है। देह समर्पित करना बिना अपनी मर्जी के यह उसे स्वीकार्य नहीं था। देह पर उसका अपना अधिकार है, जिसे वह अपनी मर्जी से समर्पित करेगी और उसने नील को अपनी देह समर्पित की। यह उसका निर्णय था, विवशता नहीं। यह सुषमा का नैतिकता का बंधन नहीं, बल्कि देह पर अपने अधिकार का बोध है।

सुषमा अपने परिवार के लिए अपना जीवन होम कर देती है, और अपने बारे में सोचते हुए भी कोई ऐसा निर्णय नहीं लेती जो उसके छोटे-भाई बहनों के जीवन को नरक बना देता। इसे भी हम उसका अपना निर्णय ही मानेंगे। पारिवारिक दायित्वबोध को विवशता के स्तर पर जीते हुए भी यह उसका अपना निर्णय था। यही उसके व्यक्त्वि को नया रूप देता है। वह अपने स्वत्व को कायम रखते हुए भी अपना जीवन होम करती है। ‘‘इसीलिए मैं तुमसे कह रही थी कि मेरी जिन्दगी खत्म हो चुकी है। मैं केवल साधन हूँ। मेरी भावना का कोई स्थान नहीं। विवाह करके परिवार को निराधार छोड़ देना मेरे लिए संभव नहीं। मैंने अपने को ऐसी जिन्दगी के लिए ढाल लिया है। तुम चले जाओगे तो मैं फिर अपने को उन्हीं प्राचीरों में बन्दी कर लूँगी।’’21  

इस स्थिति में व्यक्ति के अन्दर एक बेगानापन पैदा होता है। यह जो अपने को अपने किए से अलग होने का बोध है, यह व्यक्ति में अमानवीय स्थितियों को पैदा करता है। वह अपने बारे में नहीं सोचता, अपने को खपा देता है विवशता में। अजनबीपन, बेगानापन, अकेले होने का बोध, सुषमा अपने अन्दर अनुभव करती है। नील विदेश चला जाता है, सुषमा उससे मिलने हवाई अड्डा जाना चाहती है, टेक्सी भी बुला लेती है, पर वह जा नहीं पाती। वह प्रेम और दायित्व बोध के द्वंद्व में फंसी रहती है और अकेलेपन को स्वीकार कर लेती है।

इस तरह सुषमा का चरित्र आधुनिकताबोध के पितृसत्तात्मक संस्करण की मिली जुली अभिव्यक्ति है। उसमें मध्यवर्गीय स्त्री के परंपरागत मूल्यों के अवशेष भी हैं और आधुनिकताबोध की छटपटाहट भी। यह छटपटाहट और बैचेनी ही उषा जी की उपलब्धि है। यह उपलब्धि भी इसलिए मूल्यवान है, क्योंकि अब तक स्त्री में अपने होने की, स्वयं के मुक्त होने की छटपटाहट भी नहीं थी, उसने दी गई व्यवस्था को ही अपनी नियति मान रखा था। सुषमा जैसी नायिकायें समाज में स्त्री की मुक्ति और विवशता के बीच की छटपटाहट को अभिव्यक्ति कर रहीं हैं। यह भी परिवर्तन का संकेत है। ‘पचपन खंभे और लाल दीवारें’ सुषमा के जीवन की कैद की सीमायें बन जाती है और पितृसत्तात्मक व्यवस्था के आधुनिकबोध की प्रतीक। वह तमाम जीवन उनके दायरे से बाहर नहीं आ पाती।

00
संजीव जैन
भोपाल 

संदर्भ सूची
1. औरत अस्तित्व और अस्मिता, अरविन्द जैन पृ. 45-46
2. वही, पृ. 49
3.वही, पृ. 46
4. वही, पृ. 48
5 वही, पृ. 47-48
6. कुछ जीवन्त कुछ ज्वलंत, कात्यायनी, पृ. 165
7.पचपन खंभे लाल दीवारें, उषा प्रियंवदा, पेपरबेक, पृ. 82
8. पचपन खंभे लाल दीवारें, उषा प्रियंवदा, पेपरबेक, पृ. 72
9. औरत अस्तित्व और अस्मिता, अरविन्द जैन पृ. 49 
10 वही,पृ. 49
11पचपन खंभे लाल दीवारें, उषा प्रियंवदा, पेपरबेक, पृ. 72-73
12 वही, पृ. 13
13 वही, पृ. 14
14. वही, पृ. 30
15 वही, पृ. 30
16वही, पृ. 34
17 वही, पृ. 34
18. वही, पृ. 37
19.वही, पृ. 51
20.वही, पृ. 73
21.वही,पृ. 74



संजीव जैन 



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