Wednesday, June 15, 2016




प्रेम ,आकर्षण  कब अपने मोहपाश में बाँध ले ,कोई नही जानता ।इसके लिए किसी का खूबसूरत होना भी आवश्यक नही है ।दो नैना कब चार होकर बेकरारी अपने नाम कर लेते है ,यह कोई नहीं जानता |प्रेम की आहट नहीं होती वो बिना दस्तक दिए आपके दिल में अपना अस्तित्व बना लेता है | आँखे अपने प्रिय का इन्तजार करते करते कभी थकती नहीं ....प्यार की एक कशिश भरी कहानी 

"31 दिसंबर की रात .."
कहानी: प्रेमचंद गाँधी 









💢💢💢बाहर बारिश हो रही है। पड़ोस में कहीं तेज आवाज में डीजे बज रहा है। नया साल अब कुछ ही घंटों में आने वाला है। मद्धम बारिश में यह शोर किसी शोकगीत की तरह लगता है। इस बारिश भरी जाड़े की रात की कोख से जो दिन निकलेगा, वह नया साल लेकर आएगा। कुछ भी तो नहीं बदलेगा, सिवाय एक केलेण्डर के या कहें कि कुछ दिन हमें नया सन् लिखने की आदत डालनी पड़ेगी। जीवन वैसे ही चलता रहेगा। मैं अभी की तरह यूं ही बिस्तर में दुबका पड़ा रहूंगा। अपनी हालत पर खुद ही तरस खाता रहूंगा और उम्मीद करता रहूंगा कि वह आएगी और मुझे झिंझोड़कर कहेगी, 'चलो बहुत हुआ रोना धोना, उठो और तैयार हो जाओ।'

खुशफहमियों में जीना इंसान की फितरत है। मैं भी वही कर रहा हूं। खिड़की से बाहर देखता हूं तो स्ट्रीट लाइट का पीलिया के रोगी जैसा प्रकाश बारिश की बूंदों में यूं लग रहा है जैसे मेरे दिल के घावों पर कोई सुइयां चुभो रहा है और पीला जर्द मवाद बूंद बूंद कर बरस रहा है। पता नहीं वह कौनसी घड़ी थी, जब मैं उससे प्यार कर बैठा? क्या वह सचमुच प्यार करने के काबिल है? उसमें ऐसा कुछ भी तो नहीं।

लम्बा और अण्डाकार चेहरा, जिस पर बड़ी और चौड़ी चौड़ी आंखें। मर्दों की तरह भरी-भरी काली भवें। पतले होंठ, निचला होंठ थोड़ा सा बड़ा। जब वह चुप रहती तो लगता, निचला होंठ कहीं गिर न पड़े। ठुड्डी और होंठों के बीच का फासला काफी कम। मेरा मन करता कि कभी कहकर देखूं कि जरा अपनी जीभ से यह घुमावदार ठुड्डी छूकर देखो। वह सचमुच नाराज हो जाती। गाल हल्के से पिचके हुए और उन पर बहुत बारीक गेहुंए रंग के रोंये, उसके सांवले रंग को ये रोंये गेहुंआ रंग देते। लम्बी गर्दन पर उभरी हुई नीली नसें। मुझे बेसाख्‍ता पद्मिनी का खयाल आता और मैं सोचता कि कि अगर इसका रंग गोरा होता तो नीली नसों के भीतर बहता रक्त भी दिखाई देता। आम लड़कियों के मुकाबले वह थोड़ी लम्बी थी छह फीट के करीब यानी मुझसे बामुश्किल एक आध इंच कम। अगर वह हाई हील पहनती तो मुझसे लम्बी लगती। हालांकि उसे हाई हील पहनना पसंद नहीं। चुस्त सलवार कमीज में उसकी लम्बाई और रोबदार लगती। उसके लम्बे हाथों में आश्चर्यजनक रूप से बेहद छोटी और पतली अंगुलियां। वह पतली तो नहीं लेकिन देह इतनी भरी हुई भी नहीं कि गदराया हुआ जिस्म कहा जा सके। बड़ी सादगी पसन्द। आम तौर पर सलवार कमीज और कभी-कभी साड़ी पहनती। सादे ढंग से बाल बनाती और बालों में नारियल या सरसों का तेल लगाती। कहने का मतलब यह कि उसके व्यक्तित्व में ऐसा कुछ भी नहीं था जिससे तुरन्त आकर्षित हुआ जा सके। फिर भी मैं क्यों उसके लम्बे बालों वाली पतली सी चोटी के पीछे फुन्दे सा लटक गया। दरअसल इसकी भी एक कहानी है। उन दिनों मैं इसी शहर के एक मोहल्ले में अपनी मौसी के यहां रहता था। मेरी परीक्षाएं खत्म हो चुकी थीं और मैं रिसर्च की तैयारी में जुटा हुआ था। गर्मी के दिन थे। मैं छत पर बैठकर पढ़ता था। पूरी पूरी रात। सुबह नौ बजे के आस पास जब मैं अखबार पढ़ रहा होता तो उसे सड़क पर बस स्टॉप की ओर जाते हुए देखता। हरे रंग का एक बैग उसके कंधे पर होता। वह लम्बी टांगों से तेज-तेज चलती। एक सुबह वह सामने से गुजरी तो अचानक उसकी चप्पल जवाब दे गई। वह गिरते गिरते बची और सधे कदमों से चलती चली गई। मैं उसके इस आत्मविश्वास पर मुग्ध हुआ। लेकिन इसमें आकर्षण जैसा कुछ नहीं था। मैं वापस अखबार में डूब गया, जहां पुलिस के आपरेशन मजनूं की खबर थी। मैंने डर के मारे उसका खयाल ही दिमाग से निकाल दिया।

रविवार का दिन था। एक प्रतियोगी परीक्षा के लिए मैं जल्दी तैयार होकर बस स्टॉप पर बस की राह देख रहा था। मैं जब बस में घुसा तो देखा कि वह मेरे पीछे पीछे बस में चढ़ रही है। बस में दो ही सीटें खाली थीं। हम साथ-साथ बैठ गए। वह बैठते ही एक किताब में डूब गई और मैं बाहर देखने लगा। कण्डक्टर ने किराया मांगा तो उसने वही स्टाप बताया जहां मुझे भी जाना था। पैसे देने के बाद मैंने कनखियों से देखा वह उसी परीक्षा की तैयारी में डूबी थी जिसके लिए मैं खाली हाथ जा रहा था। गंतव्य आया तो हम एक ही दिशा में आगे बढ़ते रहे। अब इसे संयोग ही कहिए कि हम दोनों एक ही कमरे में बैठे थे। एक दूसरे को देखने लायक दूरी जरूर थी हमारे बीच। परीक्षा देकर बाहर की तरफ निकलते हएु मैंने यूं ही पूछ लिया, 'कैसा हुआ पेपर?' उसने कहा, 'अच्छा।' मेरी हिम्मत बढ़ी और अगला सवाल दाग दिया 'हम एक ही मोहल्ले में रहते हैं।' उसने बेरुखी से कहा, 'जानती हूं।'

वापसी के लम्बे सफर में थोड़ी बहुत बातचीत हुई। वह विधवा मां की इकलौती संतान है। पिता दुर्घटना में मारे गए। मां को पिता की जगह क्लर्क की नौकरी मिल गई। मां बेटी किराए के घर में रहते हैं। उसने भी मेरी तरह एम.ए. कर लिया है। वह मुझसे उदासीन रहकर बातें करती रही। मैंने भी पल्ला झाड़ लिया था। लेकिन उसकी दुखदायी अवस्था यानी कि विधवा मां और किराये का मकान, मुझे बेचैन करने के लिए काफी था। इस घटना के बाद हमारी मुलाकातें थोड़ी सी अनौपचारिक होने लगीं।

एक दिन मैंने तय किया कि इस चिल्ल पौं वाले मोहल्ले में रहकर में रिसर्च का काम आगे नहीं बढ़ सकता। यहां आए दिन जागरण होते रहते हैं। जन्म दिन हो या कोई मौका, लोग जोर से डेक बजाना अपना फर्ज समझने हैं। नाई से लेकर पंसारी तक सुबह शाम भजनों के कैसेट बजाते रहते हैं। मैंने एक संभ्रान्त कॉलोनी में खाली पड़े मकान का गैरेज पोर्शन किराए पर ले लिया। मौसी ने कुछ नहीं कहा। शिफ्टिंग वाले दिन मैं पता नहीं क्यों सुबह उठकर बस स्टॉप पर चल दिया। उसके आने तक किसी बस में नहीं बैठा और जब वह आई तो उसके साथ बस में चढ़ गया। आज भीड़ थी। कोई सीट नहीं मिली। एक कोने में हम दोनों खड़े हो गए। मैंने उसे बताया कि मैं यहां से जा रहा हूं। उसने सिर्फ इतना कहा, 'अच्छा।' पता नहीं क्यों मेरा मुंह लटक गया था। उसने कहा, 'शहर तो यही है। मौसी की याद आए तो कभी भी आ सकते हैं। दूर थोड़े ही है।'

वह अपने कॉलेज चली गई और मैं वही बस स्टॉप के आस पास तब तक भटकता रहा जब तक वह नहीं आई। पहली बार वह मुझे देखकर मुस्कराई। 'सुबह से यहीं हो?' मैं चुप रहा। उसने एक रिक्शा वाले को इशारा किया और बोली, 'चलो बैठो।' मैं रिक्शे में बैठ गया। उसने बैठते ही रिक्शे वाले से कहा, 'क्वीन्स पार्क।' फिर मुझसे बोली, 'उदासी छोड़ दीजिए, हम कॉफी पीने चल रहे हैं।' वह पहली बार खिलखिलाई तो उसके पतले होंठों के पीछे सफेद दांतों की पंक्तियां चमकीं। मैं मंत्रमुग्ध बैठा रहा।

कॉफी के दौरान वह मुझे किसी अभिभावक की तरह पढ़ाई का ध्यान देने और बाकी फालतू चीजों से बचने के लिए कहती रही। मैं बस हूं हां करता रहा। वापसी में मैंने उससे पूछा कि अब कैसे और कहां मिलेंगे हम। उसने कहा वह शनिवार को कमरे पर आएगी। मुझे आश्चर्य भी हुआ और खुशी भी। ...मैं शनिवार का इंतजार करने लगा। शनिवार आया और चला गया। वह नहीं आई। सोमवार मैं उसके कॉलेज के दरवाजे पर जा बैठा। शाम हो गई, वह नहीं दिखी। मैं मौसी के यहां पहुंचा। मोहल्ले के हाल-चाल पूछे। कोई खास खबर नहीं थी। रात खाना खाकर उसके घर के सामने दो चार चक्कर लगाए ओर कमरे पर लौट आया। कॉलेानी में सन्नाटा छाया था और मेरे मन पर भी। उसके खयालों में पता नहीं कब नींद आ गई। बुरे बुरे खयाल आते रहे और बेमन से पढ़ाई भी चलती रही। मैं कमरे में बन्द हो गया। फिर एक शनिवार आ गया। मैंने कमरे को व्यवस्थित किया और इन्तजार में कान लगाए पढऩे की कोशिश करता रहा। दोपहर के तीन बजे लोहे का गेट खुलने की आवाज आई। मैंने झटपट टी शर्ट पहनी और दरवाजा खोला तो वह मुस्कुराती चली आ रही थी। पीली कमीज और सफेद सलवार में वह पहली बार मुझे बेहद आकर्षक लगी। मैं 'पिछले शनिवार मां बीमार थीं। उन्हें दमे का दौर पड़ा और अस्पताल ले जाना पड़ा। अब ठीक है।'

मैं निरूत्तर मौन रह गया। वह कुर्सी पर बैठ गई और मुझे देखने लगी। मैं झेंप गया और उसके लिए मटके से पानी लेने लगा। 'मेरे पास एक ही गिलास है।' कहकर मैंने उसे पानी थमाया तो वह मुंह ऊपर कर हलक में पानी उंडेलने लगी। गिलास वापस रखकर हम दोनों मौन बैठे रहे। उसने अपना हैण्डबैग एक तरफ रखा और खड़ी हो गई। उसने मेरे कंधे पर हाथ रखा तो मैं ढेर होने लगा। वह हौले से मेरा कंधा थपथपाने लगी। मैंने उसके दूसरे हाथ को थामा और पता नहीं कैसे और क्यों हम एक दूसरे से लिपट से गए। हम बस एक दूसरे की धड़कनें सुनते रहे बिल्कुल चुपचाप। वह मेरे बालों में अंगुलियां फिराती रही और मैं उसके नथुनों की गरमाहट अपनी गर्दन पर महसूस करता रहा।... उसके आने का यह सिलसिला चलता रहा। लेकिन उस दिन के बाद हम कभी एक दूसरे से नहीं लिपटे। बस हाथ थामे बैठै रहते। घर परिवार और पढ़ाई की बातें होतीं। कभी कभी हम साथ फिल्म देखने जाते या खाना खाने। इस तरह महीने गुजरते रहे। दिसम्बर की एक दोपहर उसने आकर बताया कि उसे एक नौकरी मिल गई है वह भी सरकारी। केन्द्र सरकार के एक संस्थान में। वह अगले दिन मां के साथ ज्वाइन करने जाएगी और ३१ दिसम्बर को मेरे साथ नया साल मनाने वह सहेली का बहाना बनाकर मेरे कमरे पर आएगी। हम बाजार से खाने पीने का सामान खरीदेंगे और इस कमरे में कैण्डल लाइट डिनर करेंगे।

इस बात को ज्यादा वक्त नहीं बीता। सिर्फ एक साल गुजरा है। मैं बाजार से खाने पीने का सामान सुबह ही खरीद लाया हूं। ठीक पिछले साल की तरह। पिछले साल ३१ दिसम्बर की रात बारिश नहीं हुई थी, सिर्फ बूंदें पड़ी थी। यह कैसा शगुन है? आधा घंटे बाद यह साल भी चला जाएगा। लेकिन मैं सोचता हूं कि आने वाला साल उसे नहीं तो कम से कम उसकी कोई खैर खबर ही लेकर आएगा। पहली जनवरी को आने वाले सूरज, क्या तुम अपनी किरणों के साथ उसे भी लेकर आओगे? अगर हां, तो मैं तुम्हारा स्वागत करता हूं।


प्रेमचंद गांधी,
220, रामा हैरिटेज, सेंट्रल स्‍पाइन विद्याधर नगर, जयपुर-302 023 मो.09829190626


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आज यह कहानी whatsapp ग्रुप "साहित्य की बात "पर प्रस्तुत की गई ,जिसके एडमिन है  श्री ब्रज श्रीवास्तव ..
वहाँ हुई चर्चा के साथ   पाठकों की तत्क्षण प्रतिक्रियाये भी यहाँ प्रस्तुत है ........



प्रतिक्रियायें...
महजबीं  ...
साकीबा में पोस्ट की गई कहानी अच्छी है.... रोचक भी है... यंग ऐज़ के युवक युवती की दांसता ब्यान करती है... रहस्यमयी अंत है.. कहानी का अंत.... यानी कुछ भी सोच ले पाठक की, वो आएगी या नहीं आएगी... न आने के क्या कारण हैं? यह दोस्ती आगे बढ़ेगी नहीं बढ़ेगी... शादी तक बात पँहुचेगी नहीं पँहुचेगी.. यह पाठक तय कर ले.. लेखक ने अंत इसी तरह किया है, कहानी का... इस कहानी में नायक-नायिका के बीच दैहिक आकर्षण के साथ, थोड़ी संवेदना भी है.. कहानी में नायिका के बाहरी रूप - रंग का चित्रण भी किया है.. और नायक की मन:स्थित का चित्रण, वातावरण के बिंब के साथ किया गया है.... इस ऐज़ में होने वाले   लड़के लड़कियों में एक दूसरे के प्रति, होने वाले आकर्षण का वर्णन किया गया है.... इससे ज्यादा कहानी में ज्यादा कुछ नहीं है ... कहानी अच्छी है, छोटी है... भाषा भी सीधी सरल है, लेखक के लिए शुभकामनाएं... कहानी का शीर्षक... 'आशा' या 'संपना' हो सकता है....

मधु सक्सेना ..
कहानी का शीर्षक है ......*इंतज़ार*  
सरल भाषा में मन की बात कहती कहानी ..इस कहानी की भाषा और भाव की  सहजता ही लेखक का कोशल है .... सब कुछ सादगी से बयान किया ..कहीं कोई लॉग लपेट नहीं ..मुझे बहुत अच्छी लगी ये कहानी ... सागर के किनारे  हल्की हवाओं का आनन्द लेकर चहलकदमी की तरह ।फिलहाल अनाम लेखक को बधाई । प्रवेश तुम्हारे कहानी चयन को साधुवाद ।



रविन्द्र स्वप्निल ...

कहानी को मैं बहुत अच्छी कह सकता हूँ। पर इतनी अच्छी नहीं क़ि उसे अपने ग्रुप के आलावा पूरी दुनिया की या पुरे हिंदी साहित्य की सबसे अच्छी घोषित करूँ। लेकिन ये है की कहानी में शानदार शब्दिक  अरण्य का सृजन लेखक ने किया है और अंत को सशर्त बना कर कमजोर भी किया है। 
अब सवाल है कि कहानी कहती क्या है। दो नववर्ष के बिच ये घटित हो जाती है। पहले नव वर्ष में लेखक कहता है कि कुछ नहीं बदलेगा। आखिर में भी कुछ नहीं बदलता। 
कहानी के रमणीय अरण्य में गुजर जाना
न तेरा आना न तेरा जाना
भाई किसी भी कहानी को हमें पाठक की सोच से आगे ले जाना ही होगा।जन्मदिन, नवबर्ष, मेले, आयोजन आदि कुछ बदलते नहीं हैं पर हमारी मनस्विता को स्पंजी बना देते हैं।मानसिकता सरन्ध्री होना, स्पंजी होने से हम सार्थकता भरी उदारता हासिल करते है। ये सब मनो विन्यासों से लेखक का वाकिफ होना जरुरी है।
वर्ना चीजे जो जो कहानी में उठाई जाती है इकहरी होती जाती हैं। 
एक और गलती पकड़ में आई जो कि मेरी कहानी में भी थी, पाठको ने ध्यान दिलाया था कि वर्णन बहुत जल्दी चेंज होते हैं। इस कहानी में दृश्यों को स्क्रीन प्ले की तरह बदला गया है। बहरहाल। बधाई की इस कहानी के निचे अच्छा लेखक छुपा है।
~स्वप्निल

अलकनंदा साने ...
मुझे ये कहानी बहुत अच्छी नहीं लगी. प्रेम शाश्वत है, ठीक है , लेकिन उसे प्रस्तुत भी क्या एक ही तरीके से किया जाना चाहिए ? शैली अच्छी है, एक बार पढ़ी जाने लायक किन्तु वही कच्ची उम्र का आकर्षण, वही बिछोह, लड़के का चक़्कर लगाना, लड़की का सरल होना, विधवा माँ, उसको दमा , केंडल लाईट डिनर   और फिर निहायत नकली अंत. इतनी उम्र में मैंने कोई परिवार ऐसा नहीं देखा जहाँ विधवा माँ को सिर्फ दमे की बीमारी हो, किसी के घर मैंने केंडल लाईट डिनर न देखा, न उसकी चर्चा सुनी. लेकिन इस तरह के दृश्य पीढ़ी दर पीढ़ी चले आ रहे हैं. हो सकता है मेरा दायरा सिमटा हो, किसी ने देखा हो या अनुभव किया हो तो जरूर बताए. कहानी का शीर्षक ''पुनरावृत्ति''

[ Chandrashekhar Ji: रोचकता बनाये रखने में कहानी सफल है,लेकिन अंत को अनकहा क्यों रखा गया है??
"शनिवार सा साल" शीर्षक हो सकता है जो सुखद अंत को इंगित करेगा...


Sudin Ji: सबके कल्पना लोक में प्रेम है और कल्पनाओं लोक की कहानियाँ इतनी ही आदर्श हुआ करती हैं । संभव है ये कहानी ना हो लेखक के जीवन की सच्चाई हो तो उनके लिये कहानी ख़त्म कहां अभी चल रही है । सबका कल्पना लोक ऐसा ही सहज और सपाट प्रेम चाहता है जिसमें कोई पेंच ना हो 

Mani Mohan Ji: अधूरी लगी कहानी ।
शीर्षक भी यही हो सकता है । जिस प्रेम को केंद्र में रखकर यह रची गई है वह प्रेम भी तो ठीक से अभियक्त नही हुआ और न सम्प्रेषित ।


लक्ष्मीकांत कालूस्कर जी 
सीधी सपाट कहानी. आजकल कहां मिलती है ऐसी सहज प्रवाहित शैली में लिखी कहानी. जैसे अचानक गांव ठांव के मेले में झूले में झूलने का अल्हड आनंद मिल गया. इस शैली को भी बचा कर रखना है. 
शीर्षकःवह आएगी.

 Suren: हमारी अधूरी कहानी ..... शीर्षक शायद ठीक हो ।
   
       पहली बात ये ।मुझे कहानी का अभीष्ट क्या है ,ये समझ नही आया । किसी भी कथा की तरबियत जब होती है तब दो बाते प्रायः रहती है । एक है कि लेखक ने क्या भोगा या किस सच को अनुभूत किया और दूसरा है जब वो कथा को कागज पर उतार रहा हो उस वक़्त उसका मोटिव क्या है ....
कोई भी कथा  इन्ही दो बातों  के  बीच  की कशमकश से उपजती है और पाठक को भी अपने समय के सच को समझने में एक दृष्टि देती है । 
  इस कथा में लेखकीय अभीष्ट भी स्पष्ट नही और न ही देखा हुआ सच ही अपनी पूर्ण जटिलताओं के साथ संप्रेषित हुआ है । 
 अंततः लेखक /लेखिका को बधाई कि वह और परिमार्जन करे । 💐💐

Saksena Madhu: अभीष्ट तो ये कह सकते हैं सुरेन की आम आदमी के जीवन के सूखे में हल्की सी बारिश है ।जरूरी तो नहीं वो आये ही सही ..पर देखो शीर्षक बताने में सब की उम्मीद है की वो आये ।पाठक जुड़ गया कहानी के साथ ।' हमारी अधूरी कहानी ' शीर्षक देने में भी उम्मीद छुपी हुई है वरना आप  शीर्षक देते  की ' हमारी कहानी '


आज की कहानी पढ़ी अच्छी शुरुआत हुई, कहानी भी ठीक ही चल थी, पर पाठक पर छोड़ा गया अंत अधिक है, लगभग आधी कहानी पाठक पर छोड़ दी गयी। फिर भी अच्छी लगी।

इस कहानी का शीर्षक "नया साल" या "तुम आओगी" होना चाहिये

लेखक को बधाई

मंजूषा मन

Piyush Tiwari: आज साकीबा में प्रस्तुत कहानी बहुत ही उम्दा है । कहानीकार जो भी हैं उन्हें सादर नमस्कार व अनेकों शुभकामनायें ।
        कहानी जिस लाइन पर चलती है , वह अक्सर इस उम्र में देखने को मिलता है । बहुत सुन्दर तरीके से प्रस्तुत की गयी है , बोझिल नही लगती है और अनावश्यक लंबाई भी नही लिये है । खूबसूरत शुरुआत व अंत भी । इस प्रकार की कथाओं में अंत अधूरा ही रहता है और अब यह पाठक की सोच कि वह कयास लगाते रहे........

सुरेन सिंह 
लौ" शब्द का अर्थ जुड़ना, जैसे लौ लगना आदि रूपों में । आमतौर पर प्रेम में लगाव के लिए इस अभिव्यक्ति का उपयोग होता है । प्रेम की भी लौ होती है जिसका उजास इस कहानी में बिखरा हुआ है । लौ, केंद्रित करने का भी माध्यम है । उसके हलके प्रकाश में एक रहस्यमय, दिव्य वातावरण निर्मित होता है । उससे उठता हल्का और अदृश्य धुआँ सांसारिक बाधाओं का प्रतीक है । 

कहानी में नाटक इंतज़ार ज़रूर कर रहा है पर उसमें व्यग्रता नहीं है । इस तरह वो इंतज़ार ज़रूर कर रहा है पर साथ ही उसका आध्यात्मिक उन्नयन भी हो रहा है । जो केंडिल वो केंडिल लाइट दीनार के लियर लाया है उनकी लौ उसके भीतर उतर रही है  और उसका अंतरतम आलोकित हो गया है । सारे कलुष नष्ट होने लगे हैं ।


 Premchand Gandhi: साकीबा के सभी मित्रों के प्रति ह्रदय से आभार व्यक्त करता हूँ कि आप सबने कहानी पढ़ कर अपनी अमूल्य प्रतिक्रियाएं दीं। 
असल में यह मेरी दूसरी कहानी है, पहली कहानी कालेज की पत्रिका में प्रकाशित हुई थी और उसके बाद यह कहानी लगभग बाईस साल बाद लिखी थी। इसके लिखने का भी एक प्रसंग है। मेरे एक संपादक मित्र ने दिसम्बर में कहा कि अखबार के लिए कुछ दो, तो मैंने कहा कि कुछ करता हूँ, मैं समझा कि उन्हें कोई अनुवाद चाहिए। लेकिन मित्र ने जिद करके कहानी लिखवा ही ली। अखबार के लिहाज से आकार और समय के अनुकूल विषय की सीमा भी थी, इसे ओर विस्तृत रूप नहीं दे सकने की वजहें।
प्रकाशित होने के बाद इसके पहले पाठक आदरणीय कमला प्रसाद जी थे, जो उन दिनों मेरे घर पर ही ठहरे हुए थे। आज आप सबकी प्रतिक्रियाओं ने बहुत बल दिया ह।
[20:17, 15/6/2016] Premchand Gandhi: कमला प्रसाद जी ने कहा था कि तुम कहानी भी अच्छी लिख लेते हो। इस कहानी के लिए कहा था कि स्मृतियों का सहज बहाव है।
कहानी पोस्‍ट करने के लिए सबसे पहले तो मैं प्रवेश सोनी का आभारी हूं। इसके बाद सबसे पहले पढ़कर प्रतिक्रिया देने के लिए महज़बीं जी का आभार। मधु सक्‍सेना जी ने खुले दिल से कहानी की तारीफ की तो लगा कि लिखना शुरुआत में भी सही दिशा में जा रहा था। भाई रवींद्र स्‍वप्निल प्रजापति ने बहुत महत्‍वपूर्ण टिप्‍पणी की और कमियों की ओर इशारा भी किया। ताई से सहमत होते हुए कहना चाहता हूं कि यह उस दौर की कहानी है, जब निम्‍नमध्‍यवर्ग में खास तौर से शहरों और कस्‍बों में महिलाएं कम उम्र में ही टीबी और दमे की शिकार होकर मर जाती थीं। वैसे भी दमा रोग महिलाओं के लिहाज से बहुअर्थी व्‍यंजकता लिए हुए है। हालांकि मेरी कहानी में ऐसा नहीं है। और जहां तक कैण्‍डल लाइट डिनर की बात है, होस्‍टलर और पीजी वाले लोग जानते हैं कि छोटे-से कमरे में कैण्‍डल लाइट डिनर कैसे होता है। सुरेंद्र रघुवंशी जी ने बहुत अच्‍छी टिप्‍पणी की, आभार। रचना कई बार बस लिखे जाने की मांग करती है, अभीष्‍ट तो पाठक तय करता है, क्‍योंकि कई बार जिस अभीष्‍ट से लेखक लिखता है, वह भी पाठक तक नहीं पहुंचता। मंजूषा मन जी आपका भी सादर धन्‍यवाद। कई बार कथा में लेखक को ऐसा करना पड़ता है, जिससे हर पाठक कहानी का अंत अपने अनुसार सोचकर चल सके। लेखक का निर्णय अगर पाठक को स्‍वीकार नहीं हो तो क्‍या... ्‍या ार , त ण्‍्डल हत्‍वपूर्झा 

अलका त्रिवेदी, अजय श्रीवास्‍तव, चंद्रशेखर, सुदिन शर्मा, मणिमोहन, लक्ष्‍मीकांत कालुस्‍कर आप सबके प्रति आभारी हूं। बचे हुए मित्रों के लिए फिर से लिखता हूं।  

असल में तो ओपन एंडेड कहानी है यह, हर पाठक अपने हिसाब से इसके अंत तय कर सकता है।


आदरणीय प्रेम चन्द गाँधी जी ,
कहानी अच्छी लगी । सर्दियों में बेमौसम बरसात और पुरानी यादों के बीच किसी मनचाहे के आने की उत्कंठा  । नये साल की भोर का स्वागत आशा-आकांक्षा के साथ सचमुच स्वागत योग्य । बहुत बधाई ।

चयन के लिए प्रवेश जी को धन्यवाद ।




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